Story in Hindi. चांदनी राठौर और आलोक चतुर्वेदी एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे, लेकिन जाति और आर्थिक स्थिति में अंतर होने की वजह से आलोक के फादर ने उन की शादी नहीं होने दी. समय बदलता गया और आलोक पुलिस विभाग में डीवाईएसपी हो गया और उस की मुलाकात एक शराब बार में चांदनी से हुई. एकदूसरे को देख कर उन का प्यार जीवित हो गया. फिर इस के बाद जो हुआ

आगंतुक ने रुपए काउंटर पर फेंके और रौब से आदेश दिया, ”ऐ चांदनी, एक बोतल ब्लैक लेबल और एक पैकेट डनहिल का दे.’’

चांदनी काउंटर के पीछे से बाहर आई और आगंतुक के गाल पर 2 जोरदार थप्पड़ जड़ दिए. आगंतुक की आंखों के आगे अंधेरा छा गया.

इस के बाद चांदनी बोली, ”साले, सूअर की औलाद. यह चांदनी का अड्डा है, तेरे बाप का घर नहीं. चांदनी राठौर से तमीज से बात करनी चाहिए, समझा? घर में बीवी के सामने कुछ चलती नहीं होगी, इसलिए चांदनी पर रौब झाडऩे आया है?’’

आगंतुक सकपका गया. फिर भी गाल सहलाते हुए धमकी देने लगा, ”मेरी पुलिस वालों से अच्छी जानपहचान है. एक शिकायत करूंगा नहीं कि तेरा यह अड्डा बंद हो जाएगा.’’

चांदनी ने कहा, ”देखते हैं, तेरी पहचान काम करती है या मेरा हफ्ता. तुझे पता नहीं है, बड़ेबड़े पुलिस अफसर इस चांदनी के ग्राहक हैं. अरे, कितने ही राजनेता, अदालत के वकील और जज, व्यापारी, उद्योगपति, बिल्डर, डौक्टर, नामी गुंडे और न जाने कितने बड़ेबड़े लोग मेरे ग्राहक हैं. तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. चुपचाप अपना सामान उठा और निकल जा. लगता है, पहली बार यहां आया है. कभी दोबारा आना हो तो जरा तमीज से पेश आना, नहीं तो इस से भी बुरा हाल कर दूंगी.’’

आगंतुक चांदनी की बातों से शर्मिंदा हो गया. उस ने अपनी बोतल और सिगरेट का पैकेट उठाया और दबेपांव अड्डे से बाहर निकल गया.

ऐसे थे चांदनी के तेवर. उस की उम्र लगभग 30-32 साल के आसपास थी, लेकिन उस ने अपने शरीर को इस तरह संभाल कर रखा था कि मुश्किल से 25-26 साल की लगती थी. इस उम्र में भी वह नियमित योग और व्यायाम के द्वारा अपने शरीर के आकर्षण को बनाए हुए थी. उस की तेजस्वी और धारदार आंखों में आत्मविश्वास छलकता था. उस के हाथों में इतनी ताकत थी कि 2-3 मर्दों को भी मात दे सकती थी.

एक महिला के लिए शराब और जुए का अड्डा चलाने के लिए जो विशेषताएं चाहिए थीं, वे सारी उस में थीं. कोई नहीं जानता था कि यह चांदनी कौन थी और कहां से आई थी. उस से यह पूछने की हिम्मत भी किसी में नहीं थी.

शहर के डीवाईएसपी बंसल साहब, जो चांदनी के अड्डे के नियमित ग्राहक थे, उन्हें एसपी के पद पर पदोन्नति मिली थी और उन का तबादला भी हो गया था. उन्होंने चांदनी से कहा, ”कल रात यहीं चांदनी के अड्डे पर मेरी पदोन्नति और तबादले की खुशी में एक कौकटेल पार्टी रखनी है. लगभग 50 लोग आएंगे. पर्याप्त मात्रा में शराब की व्यवस्था हो जाएगी न? बोतलें कम नहीं पडऩी चाहिए.’’

चांदनी ने कहा, ”साहब, आप इस की चिंता मत कीजिए. यह सब चांदनी पर छोड़ दीजिए. सारी व्यवस्था हो जाएगी.’’

अगली रात देर रात तक पार्टी चली. वहां मौजूद सभी लोगों ने खूब शराब पी, खूब आनंद किया. धीरेधीरे सभी मेहमान जाने लगे. बंसल साहब चांदनी के साथ पार्टी का हिसाब कर रहे थे, तभी इंसपेक्टर मेहरा ने उन से पूछा, ”साहब, अब तो आप जा रहे हैं. आप की जगह नए डीवाईएसपी के रूप में कौन आने वाला है?’’

बंसल साहब बोले, ”सत्यवादी और सिद्धांतवादी आलोक चतुर्वेदी का यहां तबादला हुआ है.’’

आलोक चतुर्वेदी नाम सुन कर चांदनी के कान खड़े हो गए. उस का मन विचारों के भंवर में डूब गया. ‘आलोक चतुर्वेदी, क्या वही होगा? मेरा कायर और बेवफा प्रेमी, उस ने अपने पापा की बातों में आ कर मेरे साथ विश्वासघात किया था और मेरी जिंदगी की यह हालत कर दी थी.’

आलोक चतुर्वेदी और चांदनी राठौर एक ही मोहल्ले में आमनेसामने रहते थे. आलोक के पापा अधिकारी थे. उन के बंगले के सामने ही चांदनी का छोटा सा रूम था. चांदनी के पापा सरकारी औफिस में बाबू थे. चांदनी खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह शील, संस्कार और उच्च आदर्शों की पक्षधर भी थी.

आलोक और चांदनी बचपन से साथ खेले और साथ पढ़े थे. दोनों के हृदय एकदूसरे में रचबस गए थे. दोनों ने पढ़ाई पूरी होने के बाद विवाह करने का फैसला किया था. ऐसी बातें हवा की तरह फैलती हैं.

आलोक और चांदनी के प्रेमप्रसंग की बात आलोक के पापा के कानों तक पहुंच गई. वह आलोक पर बहुत नाराज हुए. उसे बुला कर डांटते हुए बोले, ”तुम्हें अपनी जातिबिरादरी और प्रतिष्ठा का कुछ ध्यान है या नहीं? हमारे और चांदनी के परिवार के बीच कितनी बड़ी आर्थिक और सामाजिक खाई है, यह तुम्हें दिखाई नहीं देता? जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह केवल एक आकर्षण है, सिर्फ आकर्षण. अपरिपक्व मन से लिए गए बचकाने और दिशाहीन निर्णय तुम्हारी जिंदगी बरबाद कर देंगे.’’

पापा को जवाब देना आलोक ने उचित नहीं समझा, लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग था. जब उस के पापा ने देखा कि आलोक अपने निर्णय पर अडिग है.

उन के समझानेबुझाने का उस के व्यवहार और विचारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. तब अगले दिन उन्होंने आलोक को बुला कर कहा, ”आलोक, तुम महीने, 2 महीने के लिए अपने मामा के यहां चले जाओ. उन के यहां बिजनैस में काम बढ़ गया है, इसलिए उन्हें मदद के लिए किसी भरोसेमंद आदमी की जरूरत है.’’

उन्होंने होशियारी से आलोक को उस के मामा के घर भेज दिया.

अगले दिन वह चांदनी के पास जा कर बोले, ”तुम ने अपनी खूबसूरती के मोहजाल में मेरे बेटे को फंसा लिया है, लेकिन तुम उसे पाने में समर्थ नहीं हो. आलोक को छोडऩे की क्या कीमत लोगी? बोलो, तुम्हारी हैसियत क्या है 2 लाख, 5 लाख, 10 लाख? बोलो, कितने रुपए चाहिए तुम्हें?’’

चांदनी ने विनम्रतापूर्वक कहा, ”चतुर्वेदी साहब, इंसान की हैसियत केवल पैसे से नहीं आंकी जाती. संस्कार, आदर्श और नैतिक मूल्य भी महत्त्व रखते हैं. क्षमा कीजिए, आप भले ही बड़े आदमी हैं, लेकिन मेरे प्रेम को खरीदने की बात कर के बहुत ही गरीब आदमी साबित हुए हैं.’’

चतुर्वेदी साहब बोले,”ये सारी बातें केवल सिद्धांतों तक ही अच्छी लगती हैं, व्यवहार में नहीं. तुम उसे भूल जाओ, उसी में उस की और तुम्हारी, दोनों की भलाई है. इस समय वह अपने मामा के घर गया है. 2 दिन बाद वहीं हमारी जाति की एक लड़की के साथ उस की सगाई होने वाली है.’’

चांदनी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि आलोक इस तरह उस से बेवफाई करेगा. वह पूरी रात सो नहीं सकी. आधी रात को उस ने अपने पिता के नाम एक पत्र लिखा, ‘पापा, मेरा जीवन दिशाहीन हो गया है. मैं घर छोड़ कर जा रही हूं. कहां जा रही हूं, यह मुझे भी नहीं पता. मुझे खोजने में अपना समय और शक्ति व्यर्थ मत कीजिएगा. अपने जीवन की नई राह मैं स्वयं बना लूंगी.’

सुबह किसी के जागने से पहले ही वह घर छोड़ कर निकल गई.

वह रेलवे स्टेशन पहुंची. उस ने निश्चय किया कि सब से पहले जो ट्रेन मिलेगी, उसी में वह बैठ जाएगी और जहां वह ट्रेन जाएगी, वहीं वह चली जाएगी.

एक ट्रेन चलने की तैयारी में खड़ी थी. वह उस में बैठ गई. ट्रेन लगभग खाली थी. एक वृद्ध यात्री से उस ने पूछा, ”दादा, यह ट्रेन कहां जाएगी?’’

उस ने पूछा, ”आप को कहां जाना है?’’ चांदनी ने कहा, ”जहां यह ट्रेन जाएगी, वहीं जाना है.’’

5 मिनट बाद ट्रेन चल पड़ी.

अगले स्टेशन पर 2 अधेड़ उम्र के व्यक्ति 2 बड़े बैग ले कर ट्रेन में चढ़े. उन्होंने वे बैग चांदनी के पास रख दिए. उन में से एक ने कहा, ”बेटी, जरा इन बैगों का ध्यान रखना. हम चाय पी कर आते हैं.’’

चांदनी के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना वे दोनों चाय पीने उतर गए. उन के लौटने से पहले ही ट्रेन चल पड़ी. चांदनी ने खिड़की से देखा कि वे दोनों 3-4 डिब्बे छोड़ कर चलती ट्रेन में चढ़ गए हैं. उसे लगा कि अगले स्टेशन पर वे उस के डिब्बे में आ कर अपना सामान ले लेंगे. ट्रेन आगे बढ़ती रही, लेकिन बैग लेने कोई नहीं आया. चांदनी चिंतित होने लगी.

अगले स्टेशन पर रेलवे पुलिस के 3 जवान उस के डिब्बे में आए. चांदनी पराई अमानत समझ कर उन दोनों बैगों पर हाथ रखे बैठी थी. एक पुलिस वाले ने कहा, ”टिकट दिखाओ.’’ उस ने कहा, ”टिकट तो नहीं है साहब.’’

पुलिस वाले ने कहा, ”बिना टिकट यात्रा करती है? अच्छा, अब ये बैग खोलो.’’ चांदनी बोली, ”ये बैग मेरे नहीं हैं.’’

पुलिस ने बहुत कोशिश की, लेकिन बैगों के ताले नहीं खुले. उन्होंने चांदनी से चाबी मांगी. चांदनी ने कहा, ”जब बैग मेरे नहीं हैं तो उन की चाबी मेरे पास कहां से होगी?’’

”यह ऐसे नहीं मानेगी.’’ इतना कह कर पुलिस वालों ने दोनों बैगों के ताले तोड़ दिए. हर बैग में विदेशी ब्रांड की 40-40 महंगी शराब की बोतलें निकलीं. पुलिस वाले बोले, ”एक तो बिना टिकट सफर करती है और ऊपर से शराब की तस्करी भी करती है?’’

उन्होंने चांदनी को हिरासत में ले लिया. चांदनी गिड़गिड़ाती रही कि उस का उन बैगों से कोई संबंध नहीं है, लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी. पुलिस के झंझट में कौन पड़े, यह सोच कर डिब्बे के दूसरे यात्रियों ने भी उस का साथ नहीं दिया. चांदनी के साथ भलाई करतेकरते विपत्ति आ पड़ी थी.

शहर पहुंचने पर उसे रेलवे मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया गया. बिना टिकट यात्रा करने और शराब की तस्करी के अपराध में उसे 6 महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.

6 महीने की सजा पूरी कर के वह बाहर आई. अब कहां जाए और क्या करे, उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. उसे कोई रास्ता या दिशा नहीं दिखाई दे रही थी. उस बिलकुल अनजान शहर में उसे किस का सहारा मिलता?

भूख और प्यास से व्याकुल वह काफी दूर तक चलती रही. थक कर चूर हो गई तो फुटपाथ के पास एक बेंच पर बैठ गई.

थोड़ी देर बाद उस बेंच के पीछे बने एक मकान की खुली खिड़की से किसी महिला ने उसे आवाज दी, ”ऐ लड़की, कौन है तू? कहां से आई है?’’

क्या उत्तर दे, यह उस की समझ में नहीं आया. वह चुपचाप बैठी रही. उस महिला ने फिर आदेशात्मक स्वर में कहा, ”दरवाजा खुला है. अंदर आ जा.’’

चांदनी उठी और जैसे किसी यंत्र की तरह मकान के भीतर चली गई. वह तीनमंजिला पक्का मकान था. वह महिला एक बड़े सोफे पर बैठी थी. अधेड़ आयु की उस महिला का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था. मकान के भीतर का वातावरण देख कर चांदनी स्तब्ध रह गई. उस महिला ने कहा, ”यहां मेरे पास आ कर बैठो. घबराने की जरूरत नहीं. तुम बहुत दुखी लग रही हो. यह ‘मौसी’ का अड्डा है. यहां सब लोग अपना दुख भुलाने आते हैं. देखो, उस कोने में बैठ कर शराब पी रहा है, वह अमित है. उस की प्रेमिका उस के सब से खास दोस्त के साथ भाग गई है. अब यह रोज यहां आता है और दर्दभरी शायरियां तथा गजलें लिखता रहता है.

”वह जो बुजुर्ग बैठे हैं, उन की चौथी बीवी इस उम्र में सारे गहने ले कर भाग गई है. सामने बैठे गोवर्धनदास ने शेयर बाजार के सट्टे में लाखों रुपए गंवा दिए हैं. और वह विलियम पांचवीं बार सीए फाइनल की परीक्षा में फेल हो गया है. ये सब लोग रोज यहां शराब पीने आते हैं और अपने दुखदर्द भुलाते हैं.’’

मौसी ने एक नौकर को बुला कर चांदनी के लिए खाना मंगवाया. न जाने कितने समय बाद उस ने तृप्त हो कर खाना खाया था. उसे इत्मीनान से खाते देख कर मौसी ने पूछा, ”तुम कौन है और कहां से आई हो?’’

चांदनी ने संक्षेप में अपनी दुखभरी कहानी सुना दी.

मौसी ने कहा, ”ओह, तो तुम वही लड़की है, जो शराब की बोतलों के साथ पकड़ी गई थी?’’

फिर उन्होंने जोर से आवाज लगाई, ”अरे वल्लभ और गोपाल, जरा यहां तो आओ.’’

बगल के कमरे से अधेड़ उम्र के 2 आदमी आ कर मौसी के सामने खड़े हो गए. मौसी ने चांदनी से पूछा, ”क्या यही दोनों आदमी ट्रेन में तुम्हें शराब की बोतलों से भरे बैग सौंप कर गए थे?’’

चांदनी फटी आंखों से उन दोनों को देखती रह गई. फिर आश्चर्य से बोली, ”अरे हां, यही दोनों थे. लेकिन ये यहां कैसे? ये यहां क्या करते हैं?’’

मौसी ने बहुत शांति से उत्तर दिया, ”ये मेरे आदमी हैं. ये मेरे लिए शराब की बोतलें लाते हैं. यही मेरा धंधा है. ये लोग ट्रेन के किसी भी डिब्बे में शराब से भरे बैग रख कर दूसरे डिब्बे में चले जाते हैं. मंजिल आने पर फिर उसी डिब्बे में जा कर बैग उतार लेते हैं. रास्ते में यदि जांच हो जाती है तो माल जब्त हो जाता है, लेकिन मेरे आदमी नहीं पकड़े जाते. हां, कभीकभी तुम्हारे जैसा कोई निर्दोष पकड़ा जाता है और सजा भुगतता है. निर्दोष होते हुए तुम्हें भी मेरी वजह से सजा मिली, इस का मुझे दुख है. यदि तुम चाहो तो हमेशा के लिए यहां मेरे साथ रह सकती हो.’’

उस वातावरण में चांदनी का मन घुट रहा था. उस ने कहा, ”मेरे संस्कार, आदर्श और नैतिक मूल्य मुझे इस माहौल में रहने नहीं देंगे. बस, आज की रात मुझे यहां गुजार लेने दीजिए. कल सुबह मैं यहां से चली जाऊंगी. अपना रास्ता मैं खुद खोज लूंगी.’’

मौसी ने प्रेम और ममता से कहा, ”बेटी, रास्ता ढूंढना उतना आसान नहीं है, जितना तुम समझ रही हो. एक सुंदर लड़की के लिए इस समाज में अकेले रहना बहुत कठिन होता है. इस तथाकथित सभ्य समाज के भूखे भेडि़ए तुझे नोच खाएंगे.

शराब की बोतलों के साथ पकड़े जाने की खबर यहां के सभी अखबारों में तुम्हारी तसवीर के साथ छपी थी. अब संस्कार, आदर्श और नैतिक मूल्यों की बातें तुम्हारे लिए बेकार हो चुकी हैं. मेरी बात पर शांति से विचार करो और जो निर्णय उचित लगे, वही करो. अब इस दुनिया में तुम्हारे लिए मौसी के अड्डे जैसा दूसरा कोई सुरक्षित स्थान नहीं है.’’

चांदनी की पूरी रात मानसिक उधेड़बुन और असमंजस में बीती. वह लगातार सोचती रही कि अब क्या किया जाए. आखिरकार उस ने मौसी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वहीं रहने का निर्णय कर लिया. उस ने सोचा, शायद यही उस के भाग्य में लिखा था.

सुबह उठ कर उस ने अपना निर्णय मौसी को बता दिया. मौसी ने उस के निर्णय का स्वागत किया. धीरेधीरे चांदनी इस नए वातावरण में स्वयं को ढालने लगी. अड्डे के कामकाज और उस की कार्यप्रणाली को समझते हुए वह मौसी की विश्वसनीय सहयोगी बन गई.

समय बीतने के साथसाथ मौसी अड्डे के सभी कामों से धीरेधीरे अलग होती गई और सारी जिम्मेदारी चांदनी ने अपने ऊपर ले ली. अब मौसी केवल सलाहकार की भूमिका निभाने लगी. मौसी और चांदनी के बीच मांबेटी जैसा संबंध बन चुका था.

इसी तरह सालदरसाल बीतते गए. एक दिन मौसी की मौत हो गई. चांदनी को ऐसा दुख हुआ मानो उस ने अपनी सगी मां को खो दिया हो. उस ने अकेले ही पूरे अड्डे का संचालन अपने हाथ में ले लिया. अब मौसी का अड्डा चांदनी का अड्डा कहलाने लगा था.

चांदनी अतीत की स्मृतियों में खोई हुई थी. इस बीच बंसल साहब हिसाब की रकम तथा टिप के रूप में एक बड़ी राशि रख कर जा चुके थे. अतीत की यादों से बाहर निकल कर चांदनी फिर वर्तमान में लौट आई.

2 दिन बाद आलोक चतुर्वेदी ने शहर के डीवाईएसपी के रूप में कार्यभार संभाल लिया. एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में उस की पहचान थी. शहर में चल रही असामाजिक और गैरकानूनी गतिविधियों को खत्म करने के लिए वह प्रतिबद्ध था.

नशाबंदी विभाग की सहायता ले कर उस ने शहर में चल रहे शराब और जुए के अड्डों को बंद कराने का अभियान शुरू किया. वह ऐसे अनेक अड्डे बंद कराने में सफल भी रहा. इसी अभियान के अंतर्गत एक दिन वह चांदनी के अड्डे पर पहुंचा.

काउंटर पर खड़ी चांदनी को देख कर वह चौंक गया. उस ने कल्पना भी नहीं की थी कि चांदनी का अड्डा उस की उसी चांदनी का होगा.

चांदनी ने उस की ओर देख कर उस का स्वागत करते हुए कहा, ”पधारिए डीवाईएसपी आलोक चतुर्वेदी साहब, चांदनी के अड्डे में आप का स्वागत है. कहिए, क्या लेंगे वोदका, व्हिस्की, जिन, रम या बीयर? सारा माल बिलकुल ओरिजिनल है, साहब.’’

आदर्शवादी और मूल्यनिष्ठ चांदनी का यह बदला हुआ रूप देख कर आलोक कुछ क्षणों के लिए हैरान रह गया. वह चांदनी के पास गया और बहुत शांत स्वर में बोला, ”देखो चांदनी, मैं तुम्हें 3 दिन की मोहलत देता हूं. 3 दिनों के भीतर अपना यह गैरकानूनी कारोबार समेट कर स्वयं पुलिस के सामने हाजिर हो जाओ. मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें कम से कम सजा मिले. नहीं तो मुझे कानूनी काररवाई कर के तुम्हारा यह अड्डा बंद कराना पड़ेगा. मैं तुम्हें इस नरक जैसी जिंदगी में कल्पना भी नहीं कर सकता था. क्या यह जीवन तुम्हें शोभा देता है?’’

चांदनी बोली, ”नरक जैसी यह जिंदगी तुम्हारी बेवफाई की ही सौगात है. अगर अपने बीवीबच्चों की सलामती चाहते हो तो चांदनी का अड्डा बंद कराने का विचार अपने दिमाग से निकाल दो.’’

आलोक ने कहा, ”मुझे उस की कोई चिंता नहीं. मैं ने आज तक विवाह ही नहीं किया है.’’

चांदनी ने आश्चर्य से पूछा, ”तो फिर तुम्हारे पापा ने जो तुम्हारी सगाई होने की बात कही थी, उस का क्या?’’

आलोक ने कहा, ”मुझे लगता है कि हमें शांति से बैठ कर बात करनी चाहिए.’’

दोनों एक कोने में कुरसियां ले कर बैठ गए. आलोक ने बात शुरू की, ”हमारे प्रेम प्रसंग का पता चलने पर मेरे पापा ने मुझे बहुत डांटा था. फिर भी मैं अपने निर्णय पर अडिग रहा. इसलिए उन्होंने चालाकी से मुझे मामा के यहां भेज दिया और मेरी सगाई की झूठी बात गढ़ दी. एक महीने बाद जब मैं मामा के घर से लौटा तो मुझे पता चला कि उन्होंने तुम्हें पैसों से खरीदने की भी कोशिश की थी. मेरे प्रेम पर संदेह कर के तुम घर छोड़ कर चली गई.

”3-4 महीने तक मैं ने तुम्हें खोजने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं तुम्हें नहीं ढूंढ़ सका. इसी बीच पापा ने मुझ पर विवाह करने का बहुत दबाव डाला. उन्होंने मुझे कई लड़कियां दिखाईं, लेकिन मैं ने साफ इंकार कर दिया.

”मैं ने उन का खुल कर विरोध किया. मैं ने उन से साफ कह दिया था कि यदि विवाह करूंगा तो केवल चांदनी से ही करूंगा. मैं उसे खोजने का प्रयास करूंगा. यदि वह नहीं मिली तो जीवन भर अविवाहित रहूंगा. मेरी जिद के आगे अंतत: वह झुक गए.

”तुम्हें खोजने के मेरे सारे प्रयास असफल रहे. मेरे विवाह की इच्छा मन में लिए ही पापा और मम्मी दोनों इस संसार से चले गए. मैं भी तुम्हें पाने की आशा लगभग छोड़ चुका था. मैं ने कभी कल्पना भी नहीं थी कि तुम मुझे इस रूप में मिलोगी. आज तुम्हें देख कर मुझे जितनी खुशी मिली है, उस का वर्णन मैं नहीं कर सकता. चांदनी, मैं तुम्हें पहले भी बहुत चाहता था, आज भी चाहता हूं और जीवन भर चाहता रहूंगा. क्या तुम मुझ से विवाह करोगी?’’

आलोक के इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चांदनी आश्चर्य और आनंद से अभिभूत हो गई. आलोक की बात पूरी होतेहोते उस की आंखों से आंसू बहने लगे. उस के हृदय के किसी अंधेरे कोने में दबी हुई प्रेम की चिंगारी फिर से प्रज्ज्वलित हो उठी. भरे हुए गले से उस ने आलोक से कहा, ”मुझे माफ कर दो. तुम्हें समझने में मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई. मैं तुम से विवाह करने के लिए तैयार हूं.’’

आलोक ने चांदनी से कहा, ”चांदनी, अभी भी देर नहीं हुई है. 3 दिनों के भीतर अपना यह गैरकानूनी कारोबार समेट कर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दो. उस के बाद हम विवाह कर लेंगे.’’

चांदनी ने कहा, ”उस के लिए 3 दिनों की क्या जरूरत है?’’

वह कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई और वहां उपस्थित सभी ग्राहकों को संबोधित करते हुए बोली, ”चांदनी के अड्डे के सभी ग्राहकों को सूचित किया जाता है कि आज से, बल्कि इसी क्षण से चांदनी का अड्डा हमेशा के लिए बंद किया जाता है. इस समय यहां जो भी माल सामान स्टौक में पड़ा है, उसे आप सब ग्राहक आपस में बांट लें. यह चांदनी की ओर से आप सभी के लिए अंतिम भेंट है.’’

अगले ही दिन आलोक के साथ सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह कर के चांदनी पुलिस के सामने स्वयं उपस्थित हो गई. जहां कभी ‘चांदनी का अड्डा’ हुआ करता था, वहां ‘चांदनी नशा मुक्ति केंद्र’ खुल गया. Story in Hindi

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