Web Series. वेब सीरीज ‘इसाकापटनम’ काले कारोबार के अवैध साम्राज्य पर कब्जा करने पर आधारित है. सीरीज में एक खूंखार माफिया नायडू के काले कारोबार पर कब्जा करने के लिए उस की ही बेटी भारती तरहतरह की साजिशें चलती है. बाद में वही बेटी पिता की मौत के बाद खुद माफियाओं की महारानी बन जाती है.
कलाकार: पी. समुथिरकानी, ऐश्वर्या राजेश, सुनील, नरेश अगस्त्य, मेरिन फिलिप, राजीव कानकाला, सुधाकर कोमाकुला, रोहिणी, माइम गोपी, राजा चेंबोलु, बनर्जी, ज्वाला कोटि, दयानंद रेड्डी आदि
डायरेक्टर: गेरी बीएच, प्रोड्यूसर: साइदीप रेड्डी बोरा, राहुल तमांडा, लेखक: शशिधर मुन्नांगी, प्रशांत रागठी, ताजुद्दीन सैयद, ओटीटी: अमेजन प्राइम वीडियो
‘इसाकापटनम’ अमेजन प्राइम वीडियो की नई तेलुगु क्राइम थ्रिलर है, जो बंदरगाह शहर की सत्ता और अपराध की कहानी दिखाती है. यह ‘मिर्जापुर’ और ‘वाडा चेन्नई’ जैसी अन्य गैंगस्टर सीरीज से मिलतीजुलती है, लेकिन 7 एपिसोड में बनी इस सीरीज ने बापबेटी के टकराव को केंद्र में रख कर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की है.
एपिसोड नंबर 1
‘इसाकापटनम’ अमेजन प्राइम वीडियो की नई तेलुगु क्राइम थ्रिलर है, जो बंदरगाह शहर की सत्ता और अपराध की कहानी दिखाती है. यह ‘मिर्जापुर’ और ‘वाडा चेन्नई’ जैसी अन्य गैंगस्टर सीरीज से मिलतीजुलती है, लेकिन बापबेटी के टकराव को केंद्र में रख कर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की गई है.
हिंदी में डब वेब सीरीज ‘इसाकापटनम’ में मुख्य रूप से समुथिरकानी, ऐश्वर्या राजेश, सुनील वर्मा, नरेश अगस्त्य, मेरिन फिलिप, राजीव कनकाला, रोहिणी मुख्य भूमिका में है.
कहानी की शुरुआत समुद्र के किनारे खड़ी भारती से होती है. उसे अपने बचपन का एक भयानक हादसा अकसर याद आता है, जब उस के पिता ने उस की मां को जिंदा जला दिया था. उस वक्त भारती ने अपनी आंखों के सामने अपनी मां को मरते देखा था. यही हादसा उस के मन पर गहरी छाप छोड़ चुका था.
अब कहानी हमें इसाकापटनम ले जाती है, जहां नायडू (समुथिरकानी) का दबदबा था. पूरा इलाका उस के इशारों पर चलता था. इसाकापटनम पोर्ट पर उस का कब्जा था और करीब 1,300 नावों का मालिक वही था. पोर्ट से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा नायडू के पास जाता था. इतना ही नहीं, वह पोर्ट के जरिए ड्रग्स और हथियारों की अवैध सप्लाई भी करता था.
नायडू की बेटी थी भारती (ऐश्वर्या राजेश). भारती कालेज में पढ़ाती थी. एक दिन कालेज में वह विद्यार्थियों को सोशल वर्क के बारे में समझा रही थी.
क्लास खत्म होने के बाद भारती के पास चक्रपाणी (राजेश्वर) नाम का एक व्यक्ति आता है. वह एक एनजीओ चलाता था, चक्रपाणी चाहता था कि नायडू उस के एनजीओ की आर्थिक मदद करे. भारती जानती थी कि उस का पिता ऐसा कभी नहीं करेगा. इसलिए वह अपने हाथों के सोने के कंगन उतार कर चक्रपाणी को दे देती है.
भारती उस से कहती है कि ये कंगन उस के हाथ में सिर्फ एक गहना हैं, जबकि इन्हें बेच कर मिलने वाला पैसा कई लोगों की जिंदगी बदल सकता है.
दूसरी तरफ कहानी में सीआई सत्य (दयानंद रेड्डी) की एंट्री होती है. सत्य ने नायडू का करोड़ों रुपए का माल ट्रकों में पकड़ा हुआ था.
जब नायडू के आदमी शेखर (राजा चेंवोलु) को इस की जानकारी मिलती है तो वह अपने साथी सूर्य के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचता है. वह सत्य से कहता है कि यह माल नायडू का है. तो सीआई सत्या बोलता है कि वह किसी नायडू से नहीं डरता और माल किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा. बल्कि वह नायडू के खिलाफ एफआईआर दर्ज करेगा.
सत्य नायडू के आदमियों को धक्के दे कर थाने से बाहर निकाल देता है. उसी रात वह अपने आदमी राजू (ऐश्वर) को सत्य के घर भेजता है. राजू चाकू से हमला कर के सत्य की हत्या कर देता है और उस के शव को बोरे में भर कर जला देता है.
कुछ दिनों बाद इसाकापटनम में सत्य की जगह नए सीआई वर्मा (सुनील वर्मा) की पोस्टिंग होती है. वर्मा को नायडू के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, इसलिए वह जेल में बंद एक व्यक्ति से मिलता है और उस से पूछता है कि आखिर नायडू इतना बड़ा गैंगस्टर कैसे बना? वह कहां से आया और उस ने इतना बड़ा साम्राज्य कैसे खड़ा किया? इस के साथ ही कहानी कई साल पीछे चली जाती है.
साल था 1985. उस समय इसाकापटनम पर चिन्ना राव (राजीव कनकाला) नाम के एक स्थानीय नेता का दबदबा था. वह पोर्ट पर रहने वाले लोगों और मछुआरों की मदद करता
था. इसी वजह से मछुआरे उसे अपना नेता मानते थे.
उस समय मछुआरों का बर्मा से आए लोगों के साथ अकसर विवाद होता रहता था. लेकिन चिन्ना राव उन्हें समझाता था कि वे भी हमारे ही भाई हैं. वे यहां मछली पकड़ कर अपना परिवार चलाने आए हैं. धीरेधीरे उस ने दोनों समुदायों के बीच एकता कायम करने की कोशिश की.
लेकिन बर्मा से आए मछुआरों में पोतना (ज्वाला कोटि) नाम का एक व्यक्ति चिन्ना राव से जलता था. वह लोगों को चिन्ना राव के खिलाफ भड़काता रहता था. इसी दौरान नायडू इसाकापटनम पहुंचता है. वह काम की तलाश में आया था और कोटिया (बनर्जी) नाम के व्यक्ति के घर पर रहता था.
एक दिन नायडू चिन्ना राव के पास काम मांगने पहुंचता है. चिन्ना राव उसे कुछ पैसे देता है, लेकिन नायडू पैसे लेने से मना कर देता है. उस का कहना था कि उसे भीख नहीं, काम चाहिए.
नायडू की यह बात चिन्ना राव को पसंद आती है. वह उस से वादा करता है कि कुछ दिनों में उस के लिए अच्छा काम ढूंढ देगा.
इसी बीच गंगम्मा थल्ली का त्योहार करीब आता है. इस दौरान करीब 3 महीने तक मछलियां अंडे देती हैं. इसलिए स्थानीय नियम था कि इस अवधि में कोई भी मछुआरा समुद्र में नाव नहीं उतारेगा और मछली नहीं पकड़ेगा.
चिन्ना राव इस नियम का सख्ती से पालन करवाता था.
लेकिन पोतना के भड़काने पर उस के कुछ आदमी समुद्र में मछली पकडऩे चले जाते हैं. पुलिस उन्हें पकड़ लेती है.
जब चिन्ना राव को इस की जानकारी मिलती है तो वह अपने लोगों को समझाता है कि तीन महीने तक कोई भी समुद्र में मछली पकडऩे नहीं जाएगा.
दूसरी तरफ नायडू चुपचाप पोर्ट का पूरा जायजा ले रहा था. वह देख रहा था कि यहां पैसा कहां से आता है, किस का कितना हिस्सा है और इस पूरे कारोबार पर कब्जा कर के कितना कमाया जा सकता है.
चिन्ना राव पूजा के दौरान लोगों की मदद के लिए दान पेटी रखवाता है. उस का कहना था कि सभी मछुआरे अपनी क्षमता के अनुसार इस में पैसा डालेंगे और इस रकम से जरूरतमंद लोगों की मदद की जाएगी.
चिन्ना राव पूजा में व्यस्त था. तभी नायडू हाथ में एक बड़ी तलवार ले कर वहां पहुंचता है और चिन्ना राव की गरदन काट देता है. यही वह पल था, जब नायडू ने अपनी असली ताकत दिखानी शुरू की.
चिन्ना राव की हत्या के बाद नायडू ने पोतना को अपने साथ मिला लिया और धीरेधीरे पूरे इसाकापटनम पोर्ट पर अपना कब्जा जमा लिया. देखते ही देखते नायडू ने डर और अपराध के दम पर अपना एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया.
यही थी नायडू की वह कहानी, जिस ने उसे एक आम आदमी से इसाकापटनम के सब से ताकतवर अपराधी तक पहुंचा दिया. अब कहानी वापस वर्तमान में आती है.
नायडू की बेटी भारती (ऐश्वर्या राजेश) अपने ही घर में काम करने वाले एक नौकर से प्यार करती थी. लेकिन नायडू के डर के कारण वह नौकर भारती से खुल कर बात तक नहीं कर पाता था. भारती उसे समझाती थी कि वह उस से मालकिन की तरह व्यवहार न करे, क्योंकि वह उस से प्यार करती है.
एक दिन कालेज से लौटने के बाद नायडू भारती पर गुस्सा करता है. उसे पता चल चुका था कि भारती ने अपने सोने के कंगन एनजीओ को दे दिए हैं. नायडू कहता है कि अगर वह इसी तरह लोगों की मदद करती रही तो एक दिन उस का दबदबा कम हो जाएगा. बापबेटी के बीच बहस होती है और भारती अपने कमरे में चली जाती है.
अगले दिन भारती चक्रपाणी के पास पहुंचती है. वह उस से कहती है कि वह एनजीओ में फुल टाइम काम करना चाहती है और लोगों की मदद करना चाहती है.
चक्रपाणी उसे समझाता है कि उस के पास एक अच्छी जिंदगी है और उसे इन सब मामलों में नहीं पडऩा चाहिए. लेकिन भारती फैसला कर चुकी थी. वह हर हाल में जरूरतमंद लोगों की मदद करना चाहती थी.
इसी बीच कहानी में पेदा नाम के एक और व्यक्ति की एंट्री होती है. उस का छोटा भाई चिन्ना था. पेदा चाहता था कि उस का भाई पढ़लिख कर एक अच्छा इंसान बने. पेदा अपने इलाके की समस्याओं को ले कर लगातार अधिकारियों को पत्र लिखता रहता था.
दूसरी तरफ पोतना भी नायडू से नाराज था. नायडू ने उसे अपने साथ तो मिला लिया था, लेकिन पोर्ट का केवल छोटा हिस्सा उस के हवाले किया था. पोतना इस से संतुष्ट नहीं था और अपना हिस्सा बढ़ाना चाहता था.
जब वह नायडू के सामने अपनी बात रखता है तो नायडू उसे डांट कर भगा देता है. नायडू उसे धमकी देता है कि अगर उस ने ज्यादा बोलने की कोशिश की तो उस का वही हाल कर देगा, जो 20 साल पहले चिन्ना राव का किया था. इस धमकी के बाद पोतना के मन में नायडू के खिलाफ गुस्सा और बढ़ जाता है.
इसी बीच प्रताप वर्मा नाम के एक और ताकतवर व्यक्ति की एंट्री होती है. वह विजयपुरम का रहने वाला था और वहां उस का अच्छाखासा दबदबा था. उस के पास काफी जमीन थी, लेकिन उस की महत्त्वाकांक्षा इस से कहीं बड़ी थी.
वह इसाकापटनम पर भी कब्जा करना चाहता था. वह कई बार चुनाव में नायडू को चुनौती दे चुका था, लेकिन हर बार नायडू उसे हरा देता था.
अब पोतना प्रताप वर्मा से हाथ मिला लेता है. दोनों का मकसद एक था. नायडू को बरबाद करना और उसे इसाकापटनम से हटाना. इस तरह पोतना और प्रताप वर्मा, दोनों नायडू के दुश्मन बन चुके थे.
वहीं दूसरी तरफ थंगाबेलू (माइम गोपी) नाम का एक और व्यक्ति था, जो चेतापनम पोर्ट पर राज करता था. कुछ साल पहले उस के पोर्ट पर एक बड़ा हादसा हुआ था, जिस के बाद वहां का कारोबार काफी प्रभावित हुआ. अब वह इसाकापटनम पोर्ट पर अपना कारोबार फैलाना चाहता था.
थंगाबेलू नायडू से मिलने पहुंचता है और कारोबार के लिए उस का सहयोग मांगता है. नायडू इस के बदले 20 प्रतिशत हिस्सेदारी मांगता है, जबकि थंगाबेलू केवल 5 प्रतिशत देने को तैयार था. थंगाबेलू को नायडू की मांग बहुत ज्यादा लगती है.
इस तरह अपने कारोबार को बढ़ाने की कोशिश में नायडू ने कई नए दुश्मन बना लिए थे. एक तरफ पोतना और प्रताप वर्मा उस के खिलाफ हाथ मिला चुके थे, दूसरी तरफ थंगाबेलू भी उस के साथ सौदे को ले कर असमंजस में था.
और दूसरी ओर उस की अपनी बेटी भारती उस के विचारों के बिलकुल खिलाफ खड़ी थी. नायडू का साम्राज्य बाहर से जितना मजबूत दिखाई दे रहा था, उस के भीतर उतनी ही तेजी से दरारें पैदा हो रही थीं. इसी मोड़ पर पहला एपिसोड खत्म हो जाता है.
नायडू के किरदार में वह खौफ और वजन उतना उभर कर नहीं आता जितना एक पोर्ट किंगपिन में होना चाहिए. पोथन्ना का अचानक वफादार से विलेन यानी षडयंत्रकारी बनना भी थोड़ा जल्दबाजी भरा लगता है.
एपिसोड नंबर 2
दूसरे एपिसोड की शुरुआत पेड्डा (नरेश अगस्त्य) से होती है. पेड्डा ऐसा आदमी था जो अपने इलाके में कोई भी गलत चीज देखता तो चुप नहीं बैठता था. वह हर छोटीबड़ी समस्या को ले कर आवाज उठाता रहता था. हालात यह थे कि वह लगभग हर रोज किसी न किसी से झगड़ा कर के घर लौटता था. उस की पत्नी भी उस से परेशान रहती थी.
पिछले कई सालों से वह अपने इलाके के कारपोरेटर जग्गू को लगातार चिट्ठियां लिख रहा था. उस की शिकायत थी कि इलाके में गैस की पाइपलाइन खराब है, सड़कें खराब हैं और लोगों को बहुत परेशानी हो रही है. वह जग्गू से कहता था कि इन समस्याओं को जल्द से जल्द ठीक करवाया जाए.
दूसरी तरफ भारती अब एक एनजीओ के साथ जुड़ चुकी थी. वह धीरेधीरे बस्ती के लोगों की मदद करने लगी थी. वह पोतना और प्रताप नायडू की ताकत को चुनौती देने के लिए भी लोगों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही थी.
उधर पोतना प्रताप नायडू को उन लोगों से मिलवाता है, जो नायडू के खिलाफ खड़े थे. जब प्रताप इतने सारे लोगों को अपने साथ खड़ा देखता है तो उस के अंदर एक नई उम्मीद पैदा होती है. उसे पहली बार लगता है कि शायद वह चुनाव जीत सकता है. अगर वह जीत गया तो इसाकापट्टनम में नायडू के दबदबे को खत्म किया जा सकता है.
इसी बीच भारती और सूरी (सुधाकर) की प्रेम कहानी भी आगे बढ़ रही थी. दोनों एकदूसरे के साथ काफी समय बिताते थे. उन के बीच प्यार बढ़ता जा रहा था. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही.
एक रात बस्ती के बच्चे स्कूल में सिनेमा देख रहे होते हैं. उसी इलाके से नायडू की गैस फैक्ट्री की गैस पाइपलाइन में जोरदार धमाका हो जाता है. स्कूल में मौजूद बच्चे इस की चपेट में आ जाते हैं. कई लोग घायल हो जाते हैं और कई लोगों की जान चली जाती है.
हादसे के बाद पूरे इसाकापटनम में गुस्सा फैल जाता है. लोग सवाल करने लगते हैं कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है? पेड्डा के लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं था. उस के लिए यह उस व्यवस्था की नाकामी थी, इसी इमोशनल सीन के साथ दूसरा एपिसोड यहीं खत्म होता है.
एक तरफ बड़ा राजनीतिक ड्रामा और गंभीर मुद्ïदा चल रहा है, वहीं बीच में भारती और सूरी की लव स्टोरी को जबरदस्ती ठूंसा हुआ सा लगता है, जिस से मुख्य घटना का असर कम हो जाता है. उस के बाद अचानक इतना बड़ा हादसा हो जाता है. दोनों के प्रेम के बीच कोई छोटा सा यादगार या भावुक दृश्य होता तो हादसे का असर और बढ़ सकता था.
एपिसोड में घटनाओं का तालमेल सही नहीं है. शुरुआत की चीजें बहुत धीमी चलती हैं और आखिरी का गैस ब्लास्ट वाला हिस्सा अचानक से सामने आ जाता है, जिस से दर्शकों को उस भावनात्मक दुख से जुडऩे का पूरा समय नहीं मिलता.
एपिसोड नंबर 3
तीसरे एपिसोड की शुरुआत में बस्ती में नायडू के खिलाफ आवाज उठने लगती है. वहीं नायडू इस घटना को दबाने के लिए पुलिस वालों को पैसे खिला रहा था, ताकि उस के ऊपर से उस का इलजाम हट जाए और वह इस घटना में किसी और को जिम्मेदार ठहराए.
भारती भी अब बस्ती वालों की मदद करने को तैयार थी. वहीं दूसरी तरफ सीआई वर्मा पर ऊपर से प्रेशर आ रहा था कि वह जल्द से जल्द इस मामले की जांच करें और कुछ लोगों को पकड़ कर पूछताछ करें.
जांच के दौरान वह 2 लोगों को देखता है जो उसे देखते ही भागने लगते हैं. वर्मा उन का पीछा कर के पकड़ लेता है और पुलिस स्टेशन ले जा कर उन से पूछताछ करता है.
पूछताछ से पता चलता है कि इन दोनों ने ही यह कांड किया था. उन का कहना था कि वह किसी के कहने पर नहीं, बल्कि उन्हें नायडू पर गुस्सा था. नायडू को फंसाने के लिए हम ने ऐसा किया.
दूसरी तरफ भारती एनजीओ की तरफ से दिनरात घायल लोगों की इलाज में लगी हुई थी.
इसी बीच वह पेदा के भाई को भी देखती है, जिस के हाथ पर भारी चीज गिरने की वजह से उस का हाथ कट चुका था. पेदा कुछ लोगों को इकट्ठा कर के गैस फैक्ट्री गेट पर धरना देने लगता है. थोड़ी देर में वहां पर भारती भी आ जाती है. वह भी उन के साथ धरना दे रही थी.
दूसरी तरफ नायडू को जब लगता है कि ये लोग अब फैक्ट्री बंद करवा के ही मानेंगे तो वह तुरंत वर्मा को कौल करता है और उसे सारी बातें बताता है.
वर्मा जब आता है तो वह भारती और पेदा से यही कहता है कि फैक्ट्री में जिन लोगों ने ब्लास्ट किया था, उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है.
वर्मा उन दोनों गुनहगारों को दिखाते हुए पेदा से कहता है कि असली जिम्मेदार यही लोग हैं और ये तुम्हारे लोग हैं.
वर्मा पेदा पर बहुत ज्यादा गुस्सा करता है और उसे हवालात में बंद कर देता है.
अब बातों ही बातों में यह भी पता चलता है कि शेखर ने तो नायडू के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश रची थी. दरअसल, वह नायडू की बेटी भारती को फंसा कर उस के जरिए उस की गद्ïदी पाना चाहता था, इसलिए वह मौके की तलाश में था.
दूसरी तरफ नायडू के पीछे प्रताप पड़ सकता है, इसलिए वह अपने आदमियों से कहता है कि वह किसी तरह प्रताप से उस की मीटिंग फिक्स करें. वह उससे कुछ बात करना चाहता है.
वहीं अगली सुबह भारतीय एक लोकल लायर के जरिए पेदा सहित बाकी के लोगों को थाने से बेल दिला देती है. उधर प्रताप पोतना से कहता है कि तुम ने जो गैस पाइप लाइन ब्लास्ट कराया, उस से नायडू की हालत खराब हो चुकी है. वह तो बुरी तरह फंस चुका है.
यह सुनते ही पोथना हैरान था. वह कहता है कि भाई मैं ने ब्लास्ट नहीं कराया. मैं तो सोच रहा हूं कि आखिर यह ब्लास्ट किस ने कराया? यहां मालूम चल चुका था कि गैस पाइप लाइन ब्लास्ट में पोथना और प्रताप का भी हाथ नहीं था. वह बातें ही कर रहे थे कि तभी नायडू का आदमी कोटिया आ जाता है.
कोटिया को देखते ही पोतना छिप जाता है, क्योंकि वह जानता था कि अगर यह बात नायडू को पता चला तो वह उसे नहीं छोड़ेगा. वहीं कोटिया प्रताप को बताता है कि उसे तो नायडू ने अपने घर दावत पर बुलाया. वह कुछ जरूरी बात करना चाहते हैं.
प्रताप जब यह बात सुनता है तब पहले तो उसे शक था कि कहीं नायडू उसे मारने का तो प्लान नहीं बना रहा है. पर थोड़ी देर में उसे यकीन हो जाता है और फिर विश्वास कर के नायडू के घर खाने चला जाता है.
नायडू उस की खूब मेहमाननवाजी करता है. उसे अच्छे से खाना खिलाता है और उसे एक ऐसी बात बोलता है, जिसे सुन कर वहां बैठे सभी लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं.
दरअसल, नायडू अपनी बेटी भारती की शादी प्रताप से करने का प्रस्ताव रखता है. प्रताप तो शुरू से ही इसाकापटनम पर राज करना चाहता था, इसीलिए वह यह खबर सुनते ही कंफ्यूज था. उसे विश्वास नहीं हो रहा था, इसलिए वह थोड़ा टाइम मांगता है.
प्रताप जैसे ही घर वापस जा रहा था तो यहां पर नायडू एक चाल चलता है. वह प्रताप पर ब्लास्ट के जरिए एक हमला कराता है, जिस में उस के ड्राइवर की जान चली जाती है. प्रताप बुरी तरह डर जाता है. उसे शक होता है कि वह नायडू से मिलने गया था. उसी वजह से यह हमला पोथरा ने कराया होगा तो यह सोच कर प्रताप तुरंत भारती से शादी करने को तैयार हो जाता है और नायडू से हाथ मिला लेता है.
वह कहता है कि अब पोतना को नहीं छोड़े. कुछ इस तरह नायडू ने बड़ी ही चालाकी से अपने सब से बड़े दुश्मन से हाथ मिला लिया था. वहीं इस रिश्ते से शेखर (राजा चेंवोलु) काफी ज्यादा परेशान था, क्योंकि कहीं न कहीं वह भी तो भारती से शादी कर के नायडू की गद्ïदी पाना चाहता था. तो अचानक जब यह बात उसे पता चलती है तो वह हैरान हो जाता है. यहीं पर तीसरा एपिसोड को भी खत्म हो जाता है.
एपिसोड की सब से कमजोर चीज है प्रताप द्वारा शादी के प्रस्ताव पर इतनी जल्दी नायडू पर भरोसा कर लेना. यह जानते हुए भी कि उस की उम्र लड़की से शादी करने लायक नहीं है.
पेदा के भाई वाले भावनात्मक हिस्से का पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ. हाथ कटने की घटना बहुत मजबूत भावनात्मक मोमेंट हो सकती थी. इसी तरह कहानी में बहुत ज्यादा घटनाएं एक साथ हैं.
नायडू, भारती, वर्मा, पेदा, पोथना, प्रताप, शेखर और जग्गू, बहुत सारे किरदारों की कहानी एक ही एपिसोड में आगे बढ़ती है. इस से मुख्य कहानी थोड़ी बिखरी हुई लगती है.
एपिसोड नंबर 4
एपिसोड की शुरुआत में नायडू अपनी बेटी भारती की धूमधाम से शादी की तैयारियां करता है. उसी दौरान वह पोथना का सुराग लगाने की कोशिश में जुटा है, क्योंकि वह चाहता है कि शादी से पहले पोथना गिरफ्तार हो जाए.
इस के लिए नायडू एक चाल चलता है. वह कारपोरेटर उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करता है, जिस में पोथना के वार्ड से किसी को भी टिकट नहीं दिया जाता. इस से पोथना बौखला जाता है और विरोध करने के लिए बाहर आता है.
इसी का फायदा उठा कर पुलिस को उस के ठिकाने का पता चल जाता है और वर्मा मौके पर पहुंच कर उसे गिरफ्तार कर लेता है. इस तरह नायडू बड़ी ही चालाकी से अपने दोनों कांटों को रास्ते से हटा देता है. एक के साथ बेटी का रिश्ता जोड़ देता है और दूसरे को जेल भिजवा देता है.
इधर सुहागरात के वक्त, भारती प्रताप से साफ कह देती है कि वह किसी और से प्यार करती है और यह शादी उस की मरजी के खिलाफ हुई है.
भारती उस के करीब आने से मना करती है, वह जबरदस्ती करने की कोशिश करता है. भारती रोतीचिल्लाती रह जाती है, पर जब प्रताप नहीं मानता तो भारती बड़ी बेरहमी से प्रताप की हत्या कर देती है.
जब नायडू को इस वारदात की खबर मिलती है तो वह बदहवास हो कर प्रताप के घर पहुंचता है. प्रताप की लाश देख कर नायडू भड़कते हुए भारती से पूछता है, ”तुम ने इसे क्यों मारा?’’
भारती नफरत से जवाब देती है, ”जब तुम अपनी पसंद के खिलाफ जाने वाले किसी भी इंसान को जान से मार सकते हो तो मैं ने भी वही किया. मुझे भी यह इंसान पसंद नहीं था, इसलिए मैं ने इसे खत्म कर दिया.’’
इसी मोड़ पर कहानी का एक खौफनाक सच सामने आता है. भारती के दिल में अपने पिता के लिए भरी नफरत का कारण उस की मां का अतीत था.
नायडू हमेशा काले कारनामों में लिप्त रहता था, जिस का उस की पत्नी विरोध करती थी. नायडू चेन्ना राव (राजीव कानकाला) का कत्ल कर के खून से लथपथ घर लौटा था तो उस की पत्नी ने पुलिस को सब सच बताने की धमकी दी. इस पर आगबबूला हो कर नायडू ने उसे थप्पड़ मारा और कुछ दिनों बाद अपनी ही पत्नी को घर के अंदर जिंदा जला दिया, वह भी नन्ही भारती की आंखों के सामने.
अपनी मां को तड़पतड़प कर मरते देखने का वह भयानक मंजर भारती कभी भूल नहीं पाई थी और तभी से वह अपने बाप से बेइंतहा नफरत करती आ रही थी. इसी सस्पेंस और ड्रामा के साथ चौथा एपिसोड समाप्त हो जाता है.
नायडू की चाल का बचकाना होना कहानी के लेखन में बड़ी कमी है. केवल टिकट न देने से पोथना जैसा शातिर अपराधी इतने गुस्से में आ जाए कि खुद पुलिस की जद में आ जाए, यह थोड़ा अवास्तविक और सिनेमाई संयोग लगता है.
मां की जलने वाली इतनी बड़ी घटना अचानक एक ही डायलौग के बीच में डाल दी गई. इसे अगर पहले से थोड़ाथोड़ा दिखाया जाता तो ड्रामा ज्यादा असरदार होता.
एपिसोड नंबर 5
पांचवें एपिसोड की शुरुआत में दिखाया जाता है कि प्रताप की मौत की वजह से नायडू के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी होने वाली थीं, क्योंकि प्रताप उस का दामाद बन चुका था. दामाद की हत्या की खबर पर लोग नायडू पर ही सवाल उठाते कि उस के रहते दामाद का खून किस ने कर दिया.
दूसरी तरफ, भारती इस मर्डर केस में फंसने वाली थी, लेकिन सूरी (सुधाकर) उसे बचाने के लिए हत्या का इल्जाम खुद अपने सिर ले लेता है और जेल चला जाता है.
इसी बीच, नायडू अपने साथियों के साथ मिल कर थंगाबेलू (माइम गोपी) के अवैध माल को इसाकापटनम में उतारने की योजना बनाता है कि माल को प्रताप की शोकसभा के दिन उतारा जाए, क्योंकि उस समय सभी पुलिसकर्मी शोकसभा की सुरक्षा में व्यस्त होंगे.
उधर, पुलिस अफसर वर्मा को शक होता है कि प्रताप के मर्डर के पीछे नायडू का ही हाथ हो सकता है. सीनियर नायडू के पचड़े में न पड़ कर अपनी ड्यूटी पर ध्यान देने की हिदायत देता है.
तभी शोकसभा का दिन आता है. सभी लोग नायडू के घर भोजन के लिए आमंत्रित थे और पुलिस भी वहां मौजूद थी. दूसरी ओर, थंगाबेलू का माल बड़ी ही आसानी से डिलीवर हो जाता है.
इसी दौरान कहानी में 2 बड़े खुलासे होते हैं. भारती शुरू से सीधीसादी बनने का नाटक कर रही थी, वास्तव में उस का असली मकसद एनजीओ की जमीन को अपने नाम करना था.
किसी दूसरे व्यक्ति के जरिए एनजीओ की जमीन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. एनजीओ को बचाने के चक्कर में चक्रपाणि ने एनजीओ की जमीन भारती की मां के नाम कर दी.
जेल में सूरी से मिलने कोटिया आता है. कोटिया को शक हो चुका था कि सूरी भारती से प्यार करता है. जब वह सूरी से इस बारे में पूछता है तो सूरी बता देता है कि वे दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं. कोटिया तुरंत यह बात नायडू को बता देता है.
यह सुन कर नायडू जेल में ही सूरी की हत्या करवाने के लिए गुंडे भेजता है. वे सूरी पर हमला कर देते हैं. तभी पोथना (ज्वाला कोटि) आ कर उस की जान बचा लेता है. इस के बाद पोथना और सूरी हाथ मिला लेते हैं और नायडू को बरबाद करने की कसम खाते हैं.
जब यह बात सूरी के भाई राजू (ऐश्वर) को पता चलती है तो वह भारती के पास पहुंच कर कहता है, ”मेरा भाई तेरी खातिर जेल गया और तेरे बाप ने उसे जेल में ही मारने की साजिश रच दी!’’
यह सुनते ही भारती जेल में सूरी से मिलने पहुंचती है. भारती कहती है कि अगर उन्हें एक होना है तो नायडू से भी ज्यादा ताकतवर बनना होगा और उस का साम्राज्य छीनना होगा. भारती सूरी का इस्तेमाल कर के नायडू की गद्ïदी हथियाना चाहती है.
अगले दिन, राजू आटोनगर में जबरन वसूली करने जाता है. वह दुकानदारों को डराधमका कर पैसे वसूल रहा होता है. राजू जब पेदा (नरेश अगस्त्य) से पैसे मांगता है, दोनों के बीच खूब मारपीट होती है. पेदा राजू की बेरहमी से पिटाई करता है और अंत में उसे जिंदा जला देता है.
शुरुआत में राजू ने भी सत्य को मार कर उस की लाश जला दी थी. इस तरह पेदा राजू को मार कर बदला ले लेता है और यहीं पर पांचवां एपिसोड समाप्त हो जाता है.
सूरी एक तरफ तो मर्डर का इल्जाम अपने सिर ले कर जेल जाने जितना शातिर और बहादुर दिखाया गया है, लेकिन दूसरी तरफ कोटिया जैसे संदिग्ध व्यक्ति के पूछने पर वह तुरंत कबूल कर लेता है कि वह नायडू की बेटी से प्यार करता है.
नायडू के गुंडे जेल में खाना देने के बहाने हथियार ले कर घुस जाते हैं और जानलेवा हमला कर देते हैं. जेल के अंदर हत्या की कोशिश को बहुत ही साधारण तरीके से दिखाया गया है. हाईप्रोफाइल मर्डर केस के आरोपी की सुरक्षा इतनी ढीली होना और अचानक पोथना का वहां आ कर उसे बचा लेना काफी बौलीवुड/सिनेमैटिक ढर्रे जैसा लगता है. इस में यथार्थ की कमी है.
भारती का एनजीओ हड़पने का अतीत दिखाया जाता है, नायिका को खलनायिका के रूप में पेश करना एक अजीब लगता है.
एपिसोड नंबर 6
इस एपिसोड की शुरुआत में राजू बुरी तरह जला हुआ अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहा होता है. दूसरी ओर, पोर्ट पर थंगाबेलू का माल उतर चुका होता है जिसे ट्रकों में भर कर ले जाने की तैयारी है. पोतना का आदमी यह देख लेता है और सीआई वर्मा को फोन करने की कोशिश करता है.
शुरुआती संपर्क न होने के बाद जब वर्मा का कौल बैक आता है तो उसे ट्रकों की जानकारी मिलती है. वर्मा पोर्ट पहुंच कर माल जब्त करने की कोशिश करता है, लेकिन तब तक नायडू को मुखबिर (पोतना के आदमी) का पता चल जाता है और नायडू उसे मौत के घाट उतार देता है.
दूसरी तरफ, चक्रपाणी अपने एनजीओ का नाम बदले जाने से परेशान हो कर भारती के पास आता है. तब भारती कहती है कि वह किसी समाजसेवा के लिए नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ के लिए एनजीओ में आई थी. वह उसे प्रताप की हत्या की बात बता कर धमकाती है, जिस से डरकर चक्रपाणी चुपचाप चला जाता है.
थंगाबेलू का माल सहीसलामत ठिकाने पहुंचने से नायडू को भारी मुनाफा होता है. खुशी में नायडू कोटिया को बौस बना देता है. लेकिन उसी रात भारती के भड़काने पर कोटिया का बेटा शेखर अपने ही पिता की हत्या कर देता है और एपिसोड यहीं समाप्त होता है.
जब पोतना का आदमी पुलिस (सीआई वर्मा) को पोर्ट पर माल उतरने की सूचना देने की कोशिश करता है और फोन नहीं मिलता तो वर्मा बाद में कौल बैक करते हैं. एक पुलिस अधिकारी का ऐसा ढीला रवैया और पोर्ट जैसे संवेदनशील इलाके पर तुरंत काररवाई न करना कहानी को अवास्तविक बनाता है.
भारती एक एनजीओ में काम करने वाली चालाक महिला दिखाई गई है, लेकिन वह चक्रपाणी के सामने बिना किसी दबाव के तुरंत स्वीकार कर लेती है कि उस ने प्रताप का खून किया है. एक शातिर अपराधी इतनी आसानी से हत्या का राज किसी आम व्यक्ति के सामने नहीं खोलता.
राजू गंभीर रूप से जला हुआ अस्पताल में भरती है. भारती उस से बयान दिलवाती है कि उस ने प्रताप को मारा है और पुलिस बिना किसी फोरैंसिक जांच या पुख्ता सबूत के सूरी को रिहा कर देती है. यह पुलिस तफ्तीश को बहुत कमजोर और बचकाना दिखा कर कहानीकार की कमी दिखाई देती है.
एपिसोड नंबर 7
सातवें और आखिरी एपिसोड की शुरुआत कोटिया की मौत से होती है. कोटिया उन गिनेचुने लोगों में से था, जो बिना किसी स्वार्थ के शुरू से उस के साथ खड़ा रहा था. उस की वफादारी का सम्मान करते हुए नायडू उस के बेटे से वादा करता है कि अगले चुनाव में वह उसे मेयर बनाएगा.
नायडू का यह फैसला सुन कर शेखर भारती से किया हुआ अपना समझौता तोड़ देता है और उस से हाथ पीछे खींच लेता है.
भारती के लिए यह बड़ा झटका होता है. भारती को समझ आ जाता है कि अब उसे अपनी योजना को दूसरे तरीके से अंजाम देना होगा.
इसी बीच कारपोरेटर चुनने का वक्त आ जाता है. पेदा को पूरा भरोसा होता है कि नायडू इस बार उसे कारपोरेटर जरूर बनाएगा, क्योंकि नायडू ने उस से ऐसा वादा किया था. इसी उम्मीद में पेदा पूरी तैयारी के साथ वहां पहुंचता है.
एकएक कर के सभी कारपोरेटर के नामों का ऐलान होता है, लेकिन पेदा का नाम नहीं आता. पेदा को लगता है कि नायडू ने उस के साथ धोखा किया है.
पेदा रात को शराब के नशे में सीधे नायडू के घर पहुंच जाता है. वह नायडू को जम कर खरीखोटी सुनाता है. नायडू के आदमी किसी तरह उसे वहां से बाहर निकाल देते हैं. पेदा ने इतनी शराब पी रखी थी कि वह अपने घर तक नहीं जा पाता और रात बाहर ही गुजार देता है.
इसी दौरान उस के घर कुछ लोग पहुंचते हैं और उस के भाई की हत्या कर देते हैं. सुबह जब पेदा को अपने भाई की हत्या की खबर मिलती है तो उसे लगता है कि इस के पीछे भी नायडू का हाथ हो सकता है.
दूसरी तरफ नायडू एक बार फिर थंगाबेलू के ट्रकों में आए माल को बेचने की कोशिश में लगा हुआ था. लेकिन इस बार उस की यह डील भी खतरे में पड़ जाती है. इस की भनक सीआई वर्मा को लग जाती है और वर्मा नायडू के 3 ट्रक पकड़ लेता है.
इसी बीच रात में पेदा नायडू के घर पहुंचता है. दोनों के बीच जम कर संघर्ष होता है. नायडू खुद को बचाने की पूरी कोशिश करता है, पेदा आखिरकार उसे चाकू मार देता है, जिस से नायडू की मौत हो जाती है. लेकिन इस संघर्ष के दौरान पेदा भी बुरी तरह घायल हो कर वहीं बेहोश हो जाता है.
कुछ ही देर बाद नायडू की मौत की खबर पूरे शहर में फैल जाती है. जिस नायडू के नाम से कभी पूरा इसाकापटनम कांपता था, उस के मारे जाने की खबर से शहर में हड़कंप मच जाता है.
अगली सुबह सत्ता का पूरा समीकरण बदल चुका होता है. नायडू की जगह भारती को नया नेता चुन लिया जाता है. जिस कुरसी पर बैठने का भारती ने सपना देखा था, वह सपना पूरा हो जाता है. अब वह नायडू की जगह बैठ चुकी थी और पूरे ‘इसाकापटनम’ की नई ताकत बन
चुकी थी.
लेकिन यहीं कहानी का सब से बड़ा राज सामने आता है. पता चलता है कि नायडू की बरबादी के पीछे कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि उस की अपनी बेटी भारती थी. गैस पाइपलाइन ब्लास्ट की पूरी साजिश भारती ने ही रची थी. उस का मकसद था कि इस घटना का आरोप नायडू पर आए और उस की छवि खराब हो.
इतना ही नहीं, थंगाबेलू के माल की जानकारी भी भारती ने ही पुलिस तक पहुंचाई थी, ताकि नायडू का कारोबार कमजोर हो.
पेदा के भाई की हत्या भी भारती की साजिश का हिस्सा थी. उस ने सूरी के जरिए पेदा के भाई को मरवा दिया था. भारती जानती थी कि भाई की मौत के बाद पेदा का गुस्सा नायडू के खिलाफ भड़क उठेगा और यही गुस्सा उस के पिता के अंत का कारण बनेगा.
यानी अब साफ हो जाता है कि पिछले कई एपिसोड में हुई घटनाओं के पीछे असली मास्टरमाइंड भारती ही थी. उस ने एकएक कर के अपने रास्ते की सारी बाधाएं हटा दीं. भारती ने जैसा सोचा था, ठीक वैसा ही हुआ. लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी.
इसी बीच भारती अपने वकील को अम्माजी (मोरिन फिलिप) के पास भेजती है. वह चाहती है कि अम्माजी की मदद से सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करे और नए कारपोरेटर के चयन की प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में ले.
उधर सुरक्षित जगह पर छिपा हुआ पेदा अब भी अपने भाई की मौत का सच नहीं जानता था. वर्मा उस के सामने सब से बड़ा खुलासा करता है. वह पेदा को बताता है कि उस के भाई चिन्ना की मौत के पीछे नायडू नहीं, बल्कि भारती का हाथ था. यह सुन कर पेदा के होश उड़ जाते हैं.
जिस नायडू को वह अपने भाई की मौत का जिम्मेदार समझ कर मार चुका था, असल में वह भारती की साजिश का शिकार बना था.
अब पेदा के सामने एक नया सवाल खड़ा हो जाता है, क्या वह भारती के खिलाफ जाएगा? और क्या वर्मा भारती की पूरी साजिश को दुनिया के सामने ला पाएगा? इसी सवाल के साथ कहानी खत्म हो जाती है.
जिस सत्ता को पाने के लिए भारती ने अपने ही पिता को रास्ते से हटा दिया था, उसी सत्ता की नींव अब उस के खिलाफ खड़े होने वाले 2 लोगों पेदा और सीआई वर्मा के हाथों हिलने लगी थी. यहीं इसकापटनम वेब सीरीज का पहला सीजन समाप्त होता है.
पी. समुथिरकानी
पी. समुथिरकानी दक्षिण भारतीय सिनेमा का जानामाना अभिनेता, फिल्म निर्देशक, लेखक और डबिंग कलाकार है. उस ने मुख्य रूप से तमिल फिल्मों में काम किया है, लेकिन तेलुगु और मलयालम फिल्मों में भी अपनी पहचान बनाई है. समाज से जुड़े मुद्ïदों और आम लोगों की जिंदगी पर आधारित कहानियों के लिए उसे खासतौर पर जाना जाता है.
समुथिरकानी का जन्म 26 अप्रैल, 1973 को तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के सेथुर में हुआ था. उस ने राजपालयम राजूस कालेज से गणित में बीएससी की पढ़ाई की. इस के बाद चेन्नई के डा. अंबेडकर ला कालेज से कानून की पढ़ाई पूरी की.
हालांकि उस ने पढ़ाई पूरी कर ली थी, लेकिन उस का मन अभिनय में ही था. उस ने कई बार बताया है कि शुरुआत में लोगों ने उस के अभिनय के सपने का मजाक उड़ाया. कुछ लोगों का मानना था कि उस में अभिनेता बनने के लिए न तो सही कदकाठी है और न ही जरूरी प्रतिभा. इस के बावजूद उस ने अपना सपना नहीं छोड़ा.
फिल्मों में काम करने के जुनून के कारण समुथिरकानी ने वकालत का रास्ता छोड़ दिया और चेन्नई चला गया. वहां उसे शुरुआत में काफी संघर्ष करना पड़ा. अभिनेता बनने की कोशिश में उसे कई बार निराशा और आलोचना का सामना करना पड़ा.
जब अभिनय में तुरंत सफलता नहीं मिली तो उस ने निर्देशन की तरफ कदम बढ़ाया. वर्ष 1997 में सहायक निर्देशक के तौर पर काम शुरू किया.
इस दौरान उस ने मशहूर निर्देशक के. बालाचंदर के साथ भी काम किया. उन के साथ काम करने का अनुभव समुथिरकानी के करिअर में काफी अहम साबित हुआ.
समुथिरकानी ने वर्ष 2003 में फिल्म ‘उन्नई चरणदाइंधेन’ से निर्देशक के तौर पर अपनी शुरुआत की.
हालांकि उसे बड़ी सफलता 2009 में आई फिल्म ‘नादोडिगल’ से मिली. यह फिल्म दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई और इस के बाद समुथिरकानी की पहचान एक ऐसे निर्देशक के रूप में बनने लगी जो मनोरंजन के साथसाथ समाज से जुड़े मुद्ïदों को भी फिल्मों में उठाते हैं.
समुथिरकानी ने अभिनय की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई. ‘सुब्रमण्यपुरम’ (2008) में उस के अभिनय को काफी पसंद किया गया. इस के बाद उस ने कई अलगअलग तरह के किरदार निभाए.
समुथिरकानी को अभिनय और निर्देशन के लिए कई पुरस्कार मिल चुके हैं. उसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है.
इस के अलावा उसे तमिलनाडु राज्य फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर अवार्ड साउथ और साइमा, दक्षिण भारतीय अंतर्राष्ट्रीय मूवी पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले हैं.
तेलुगु फिल्म ‘अला वैकुंठपुरमलो’ में खलनायक के किरदार के लिए उसे साइमा अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ नकारात्मक भूमिका का पुरस्कार मिला.
समुथिरकानी की फिल्मों की कहानियां सिर्फ तमिल दर्शकों तक सीमित नहीं रहीं. उस की कई फिल्मों को दूसरी भारतीय भाषाओं में भी बनाया गया. यही वजह है कि उस की पहचान धीरेधीरे पूरे दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में बनी.
अभिनेता के तौर पर भी उस ने तमिल के अलावा तेलुगु और दूसरी भाषाओं की फिल्मों में काम किया है. ‘आरआरआर’ और ‘हनुमान’ जैसी पैनइंडिया फिल्मों का हिस्सा बन कर उस ने हिंदी समेत देशभर के दर्शकों के बीच अपनी पहचान और मजबूत की.
ऐश्वर्या राजेश
चेन्नई की चहलपहल भरी गलियों में पलीबढ़ी ऐश्वर्या राजेश की जिंदगी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही है. 10 जनवरी, 1990 को चेन्नई में जन्मीं ऐश्वर्या राजेश एक तेलुगु परिवार से आती है.
उस के पिता राजेश तेलुगु फिल्मों में अभिनेता थे और मां नागमणि नृत्य से जुड़ी थी. उस के परिवार का सिनेमा से पुराना रिश्ता है.
ऐश्वर्या ने चेन्नै के एथिराज कालेज फार वीमेन से वाणिज्य में स्नातक की पढ़ाई की. इस ने अपने करिअर की शुरुआत सन टीवी के कौमेडी शो ‘असाथा पोवाथु यारू’ में एंकर के रूप में की थी.
इस के बाद 2011 में तमिल फिल्म ‘अवरगलुम इवरगलुम’ से अपने अभिनय की शुरुआत की, लेकिन सही पहचान मिली फिल्म ‘अट्टाकथी’ और ‘काका मुत्तई’ से.
‘काका मुत्तई’ फिल्म के लिए उसे तमिलनाडु राज्य का फिल्म पुरस्कार भी मिला. इस के अलावा ऐश्वर्या को फिल्मफेयर (दक्षिण) के 2 पुरस्कार भी मिल चुके हैं.प्रस्तुति: मो. आसिफ ‘कमल’ एडवोकेट. Web Series






