Real Love Story Hindi: पाकिस्तान की रहने वाली ताहिरा ने मकबूल से निकाह के लिए लंबा इंतजार तो किया ही, पति के साथ रहने के लिए उन्होंने वह हर शर्त मान ली थी, जो भारत सरकार ने उन पर थोपी थी. उन में एक यह भी थी कि जब तक उन्हें भारतीय नागरिकता नहीं मिल जाती, वह कादियां से बाहर नहीं जाएंगी. आखिर उन्हें 13 सालों बाद अब जा कर नागरिकता मिली है.

100 बरस से ज्यादा पुरानी अहमदिया जमात का एक ही नारा है- ‘मोहब्बत सबलिए, नफरत किसी से नहीं.’ पाकिस्तान में इस संप्रदाय को इस्लामपरस्त नहीं माना जाता, जबकि भारत में इस जमात का अपना अहम रुतबा है. संयुक्त भारत के जिला स्यालकोट के रहने वाले चौधरी मंजूर अहमद इसी जमात के थे. इतना ही नहीं, वह दिनरात इस के प्रचारप्रसार में लगे रहते थे. वह अविवाहित थे और घरपरिवार की तरफ से उन के ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी. इसलिए उन का समय जमात के प्रचारप्रसार में ही गुजारता था.

भारतपाक विभाजन के समय चौधरी मंजूर अहमद अपने 313 साथियों को ले कर कादियां (भारत) आ गए थे. यहां आने के बाद भी वह अपने साथियों के साथ अपनी जमात का प्रचारप्रसार करने में लगे थे. देखतेदेखते 10 बरस का लंबा दौर गुजर गया. बात सन 1957 की है. धर्मप्रचार के एक कार्यक्रम के तहत मंजूर अहमद का लखनऊ जाना हुआ. वहीं पर बनारस के अब्दुल हकीम आए हुए थे. उस पहली मुलाकात में उन्हें मंजूर अहमद इस कदर भा गए कि उन्होंने अपनी बेटी खुर्शीदा हकैया का उन से निकाह करने का फैसला कर लिया.

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