अधेड़ उम्र का खूनी प्यार – भाग 2

पिछले 8 सालों से सविता पास के ज्ञान भारती स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी. स्कूल से वापस आने के बाद उसे पति की गालियां सुनने को तो मिलती ही थीं, साथ में अपने पीटे जाने का दर्द भी झेलना पड़ता. 3-3 जवान बच्चों के पिता होने के बाद भी मधुसूदन की हरकतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं.

सविता को अब मधुसूदन के साथ जिंदगी का एकएक पल बिताना भारी पड़ रहा था. लेकिन वह करे भी तो क्या करे, उस का कोई और ठिकाना नहीं था. वैसे भी वह घर जितना मधुसूदन का था, उतना ही सविता का का भी. वह घर छोड़ कर जाना नहीं चाहती थी. सविता के दिमाग में अजीब सी उथलपुथल मची रहती थी.

लगभग 2 साल पहले एक खूबसूरत हैंडसम नौजवान सविता के स्कूल में बच्चों को विज्ञान और गणित पढ़ाने के लिए आया. उस नौजवान का नाम था आशीष वर्मा उर्फ टीनू. वह अविवाहित था और बादशाहपुर में ही रहता था.

आशीष सविता से 10 साल छोटा था. एक ही स्कूल में दोनों पढ़ाते थे, इसलिए दोनों का पहले मिलना जुलना, फिर बात करना शुरू हुआ. दोनों को एकदूसरे का साथ और बातें करना ऐसा भाया कि दोनों दोस्त बन गए. सविता को आशीष में एक अच्छे हमसफर के गुण दिखने लगे. हर लिहाज से आशीष साधारण से दिखने वाले शराबी पति मधुसूदन से लाख गुना अच्छा लगा था.

आशीष जैसे हमसफर की सविता ने कामना की थी, लेकिन समय और किस्मत ने कुछ ऐसा खेल खेला कि उस की शादी उस से 13 साल बड़े साधारण से दिखने वाले टेलर मास्टर मधुसूदन से हो गई. उस से शादी कर के मधुसूदन को खुश होना चाहिए था, अपनी पलकों पर बैठा के रखना चाहिए था, लेकिन हुआ इस का उल्टा. मधुसूदन ने कभी उस की कद्र नहीं की, प्यार देने के बजाय उसे गाली देता रहता और मारतापीटता रहता था.

आशीष ने दिल में बसा लिया था सविता को

जहां मधुसूदन ऐसा था, वहीं दूसरी तरफ आशीष सविता की परवाह करता था, उस की कद्र करता है, उस के लिए पलक पावड़े बिछाए रहता था. उस की तारीफ करता, उस के काम की सराहना करता, हर काम में उस की मदद करता. ऐसा इंसान जिंदगी में आ जाए तो इंसान खुशी से फूला नहीं समाता. सविता भी खुशी से फूली नहीं समा रही थी.

वह आशीष के नजदीक रहतेरहते उस से प्यार करने लगी थी, उस के साथ ही आगे की जिंदगी बिताना चाहती थी. आशीष के प्रति उस का प्यार उस की आंखों से साफ झलकता था. आशीष भी उसे चाहने लगा था, क्योंकि सविता जितनी अच्छी तरह से उसे समझती थी, अपनापन जताती थी, उतना समझने वाला अपनापन जताने वाला कोई नहीं था. सविता की खनकती हंसी और उस की मीठी बोली उस के दिल को लुभाती थी.

सविता उम्र में उस से बड़ी जरूर थी, लेकिन देखने में उस से बड़ी लगती नहीं थी. सविता उस से लाख हंस कर बातें करती थी, लेकिन आशीष उस की आंखों में उस के बात करने के लहजे में कभीकभी बहुत दर्द महसूस करता था. सविता के दिल में कैद दर्द जब भी उस के चेहरे और आवाज में झलकता तो आशीष भी बेचैन हो उठता था. घूमने, खानेपीने दोनों अकसर साथ बाहर जाते रहते थे.

एक दिन जब दोनों रेस्टोरेंट में बैठे हुए थे, तब आशीष ने सविता को थोड़ा कुरेदा और उस के दर्द की वजह जानने के उद्देश्य से सविता से पूछा, “सविता, मैं ने कई बार तुम्हारी आवाज में दर्द महसूस किया है. ऐसा क्या दर्द है तुम को, जो असहनीय है. वह समयसमय पर छलक कर बाहर आ ही जाता है. कहते हैं दर्द बांटने से हल्का होता है, तुम मुझे बता कर अपना दर्द कम कर सकती हो, अगर मुझे अपना मानती हो तो…”

आशीष ने सविता के दिल के जख्मों पर लगाया प्यार का मरहम

आशीष ने सविता की आंखों में झांकते हुए अपना मानने वाली बात कही. जैसे वह सविता के अंदर की बात जानने का प्रयास कर रहा हो कि सविता के लिए वह कितना मायने रखता है. सविता भी उस से अपना दर्द छिपातेछिपाते परेशान हो गई थी और वह भी चाहती थी कि वह अपना हाल आशीष को बता दे, फिर देखे आशीष क्या प्रतिक्रिया देता है.

आशीष उस के साथ रिश्ता बना कर आगे बढऩे का इच्छुक होगा तो उस के दर्द को समझेगा और उस के दर्द पर अपने प्यार का मरहम लगाएगा और उसे दर्द से निजात दिलाएगा, नहीं तो वह पीछे हट जाएगा.

सविता को भी आशीष की प्रतिक्रिया जानने की जल्दी थी, इसलिए उस ने आशीष से कहा, “क्या करोगे जान कर, मेरा दर्द दूर नहीं होगा, बल्कि कुरेदने से और बढ़ जाएगा. तुम भी नाहक परेशान हो जाओगे. तुम इस में कुछ कर भी नहीं सकते. वैसे तुम्हें अपना ही मानती हूं, इसीलिए तुम्हारे साथ बैठ कर बातें कर लेती हूं, घूम लेती हूं. वरना सब होते हुए भी मेरा कोई सहारा नहीं, न ही मुझे कोई समझने वाला.”

आशीष तड़प उठा, “ये कैसी बातें कर रही हो सविता. एक पल में मुझे अपना कहती हो, दूसरे ही पल मुझे पराया कर देती हो. मैं तुम्हारा अपना हूं, मैं तुम्हें अपना मानता हूं इसलिए तुम्हारे साथ समय बिताता हूं, बातें करता हूं. मेरे रहते हुए तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं. कोई दिक्कत है तो मैं बनूंगा तुम्हारा सहारा.” आशीष ने सविता को विश्वास दिलाते हुए कहा.

आशीष की बातों से सविता के अंदर का विश्वास जागा कि आशीष उस का साथ जरूर निभाएगा तो उस ने अपना दर्द बयान कर दिया. पति मधुसूदन के शराबी होने की बात और उस के द्वारा रोज गालियां देते हुए पिटाई करने की बात बता दी.

दूसरी शादी का दुखद अंत – भाग 2

जरीना के घर वालों ने शैफी से उस की शादी उस की संपन्नता की वजह से की थी. शैफी 3 बच्चों का बाप था, जबकि जरीना कुंवारी थी. जरीना भले ही शैफी के 7 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन वह शैफी से न कभी तन से संतुष्ट हुई, न मन से. उस ने अपनी जवानी कसमाहट में निकाल दी थी. उस की भावना का जो ज्वार उफान मारता था, शैफी कभी उसे शांत नहीं कर पाया था.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. शैफी ने पहली पत्नी से पैदा हुई संतानों का विवाह कर दिया. बड़ी बेटी हसीना का विवाह उस ने मथुरा के मांट कस्बे में किया तो बड़े बेटे शमशेर का विवाह आगरा के ही बाईपुर में किया था.

जरीना शैफी की पहली पत्नी के बेटे शमशेर को अपनी पत्नी के साथ कमरे में सोते देखती तो उस के मन में आता कि अगर उस का विवाह किसी हमउम्र के साथ हुआ होता तो वह भी इसी तरह उस के साथ कमरे में लेटी होती. ऐसा ही कुछ सोचतेसोचते उस की नजर घर के सामने रहने वाले हनीफ खां के बेटे वकील पर पड़ी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था.

वकील और उस की उम्र का अंतर इसी बात से लगाया जा सकता है कि जरीना की शादी के 2 साल बाद वकील पैदा हुआ था. वकील उम्र के उस दौर से गुजर रहा था, जब औरतें बहुत आकर्षित करती हैं. इस उम्र में अच्छेबुरे और रिश्तेनातों का भी खयाल नहीं रहता. आदमी की यह उम्र जल्द ही भटका देने वाली होती हैं.

जरीना की नजरें वकील पर पड़ीं तो उस ने उसे हुस्न के लटकेझटके दिखाने शुरू किए. महिला देह के आकर्षण में बंधे वकील को भटकते देर नहीं लगी. जरीना की देह को पाने के लिए उस का मन मचल उठा. पिता की मौत के बाद वकील के भाइयों ने घर का बंटवारा कर लिया था. वकील के हिस्से में भी एक कमरा आया था, जिस में वह अकेला ही रहता था. वही कमरा वकील और जरीना के मिलने का साधन बना.

पिता की मौत के बाद वकील का कोई निश्चित ठौर ठिकाना नहीं रहा था तो शैफी ने उस के खानेपीने की व्यवस्था अपने यहां करवा दी थी. कभी वह उन के घर जा कर खाना खा लेता था तो कभी जरीना उस के कमरे पर जा कर खाना दे आती थी. ऐसे ही पलों में दोनों का एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ा था और परिणामस्वरूप उन के बीच अवैध संबंध बन गए थे.

दोनों मौके का फायदा उठा रहे थे. कोई उन पर शक भी नहीं करता था. इस की वजह दोनों की उम्र का अंतर था. जरीना की उम्र वकील की उम्र से दोगुनी से अधिक थी. दोनों मांबेटे जैसे लगते थे.

धीरेधीरे महीनों बीत गए. जरीना को प्रेमी से छिपछिप कर मिलना अच्छा नहीं लगता था. वह प्रेमी के साथ खुल कर मौजमजा करना चाहती थी. शैफी उस की जो इच्छाएं पूरी नहीं कर सका था, अब वह अपने आशिक के साथ पूरी कर लेना चाहती थी. लेकिन यह तभी संभव था, जब दोनों साथ रहें.

जरीना वैसे भी शैफी से बुरी तरह ऊब चुकी थी. इसी का नतीजा था कि उस ने अपनी आधी से भी कम उम्र के प्रेमी वकील के साथ भागने का निश्चय कर लिया. अपने शरीर के आकर्षण की बदौलत उस ने प्रेमी वकील को इस के लिए भी राजी कर लिया. वकील अकेला तो था ही, शायद इसीलिए जरीना ने जब उस से भागने को कहा तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

योजना बनी और फिर उसी योजना के अनुसार एक दिन हैदराबाद जाने की बात कह कर वकील अपने कमरे पर ताला लगा कर जरूरत का सारा सामान अपने साथ ले कर चला गया.

वकील ने घर में भले ही हैदराबाद बताया था, लेकिन वह हाथरस गया था, जहां पहले ही उस ने मोहल्ला वालापट्टी में कमरा किराए पर ले रखा था. आगरा वाले कमरे का सामान उस ने वहां पहुंचा दिया. वह अपने साथ ऐसा कोई सामान नहीं ले गया था, जिस से लोग उस पर शक करते. वकील के जाने के 15 दिनों बाद अचानक एक दिन जरीना भी घर से गायब हो गई.

जरीना का इस तरह अचानक घर से गायब हो जाना हैरानी वाली बात थी. 7 बच्चों की मां जरीना के बेटे बेटियों में 2 की तो शादी भी हो चुकी थी. सालभर पहले वह नानी भी बन चुकी थी, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता था कि किसी के प्रेम में पागल हो कर वह पति और बच्चों को छोड़ कर भाग गई होगी. 45-50 वर्षीया जरीना का अपने शौहर शैफी से कोई झगड़ा वगैरह भी नहीं हुआ था. वह किसी पराई औरत के प्यार में पागल भी नहीं था कि घर में किसी तरह का क्लेश रहा हो.

पूरे परिवार ने जरीना को कहांकहां नहीं खोजा, लेकिन उस का कोई सुराग नहीं मिला. शैफी उत्तर प्रदेश के शहर आगरा के थाना एत्माद्दौला के मोहल्ला इसलामनगर का रहने वाला था. मोहल्ले में उस की गिनती एक तरह से संपन्न और प्रभावशाली लोगों में होती थी. इसलिए दुख की इस घड़ी में पूरा मोहल्ला उस के साथ था. जरीना की खोजखबर में सभी उस की मदद कर रहे थे.

कई दिन बीत गए और जरीना का कुछ पता नहीं चला तो मोहल्ले के कुछ वरिष्ठ और प्रभावशाली लोगों के साथ वह थाना एत्माद्दौला पहुंच गया. थाना पुलिस ने जरीना की गुमशुदगी दर्ज कर ली और कहा कि वह तो जरीना को तलाश करेगी ही, वह खुद भी उस की तलाश करता रहे. यह 4 साल पहले की बात है.

पुलिस को जरीना की क्या चिंता थी, जो उस के पीछे भागती. लेकिन शैफी की तो पत्नी थी, इसलिए वह लगातार उस की तलाश करता रहा. अगर जरीना अपना मोबाइल फोन साथ ले गई होती तो उस के लोकेशन के आधार पर थाना पुलिस शायद उस का पता लगा लेती. लेकिन जरीना का फोन उस के बैड पर पड़ा मिला था.

दिन, हफ्ते, महीने ही नहीं, पूरे ढाई साल गुजर गए, जरीना का कुछ पता नहीं चला. वह जिंदा है या मर गई, इस बात का भी कुछ पता नहीं चला था. उस का इस तरह रहस्यमय ढंग से गायब हो जाना मोहल्ले वालों के लिए हैरानी की बात थी.

प्रेम में डूबी जब प्रेमलता – भाग 2

उन्होंने उस लडक़े को प्रेमलता से मिलने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महिला सिपाही रेनू सारस्वत को उस के पीछे लगा दिया कि वह किसी भी तरह उन की बातें सुनने की कोशिश करे. रेनू उधर से गुजरी तो लडक़ा कह रहा था, “तुम ने ताजमहल वाले फोटो जला दिए हैं न?”

“हां, जला दिए हैं. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?”

यह सुन कर रेनू चौंकी. वह तुरंत मुंशी मंसूर अहमद के पास पहुंची और उन से बता दिया कि प्रेमलता से जो लडक़ा मिलने आया है, वही बबलू है. मंसूर अहमद तेजी से बाहर आए. बबलू को शायद शक हो गया था, इसलिए वह तेजी से बाहर की ओर चला जा रहा था. मंसूर अहमद ने संतरी को आवाज देते हुए तेजी से उस की ओर दौड़े. आखिर उन्होंने उसे दबोच ही लिया.

इस के बाद उसे अंदर ला कर पूछताछ की गई तो एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस में प्रेम की राह में रोड़ा बनने वाले गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या कर दी गई थी. यह पूरी कहानी इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी का एक गांव है भरथरा, जहां महेशचंद फौजी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 4 बेटियां थीं. प्रेमलता उन में सब से बड़ी थी. उस ने बीए करने के बाद बीएड किया और नौकरी की तलाश में लग गई. इसी के साथ महेशचंद उस की शादी के लिए लडक़ा ढूंढऩे लगे.

महेशचंद की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी, बेटी भी पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह उस के लिए खातेपीते परिवार का पढ़ा लिखा लडक़ा तलाश रहे थे. इसी तलाश में उन्हें किसी से जिला एटा के थाना बागवाला के गांव लोहाखार के रहने वाले रामसेवक के बेटे गवेंद्र के बारे में पता चला तो वह उस के घर जा पहुंचे.

रामसेवक का खातापीता परिवार था. उस के पास ठीकठाक जमीन थी. गांव में पक्का मकान था, एक मकान मैनपुरी के नगला कीरतपुर में भी था. गवेंद्र ने पौलिटैक्निक करने के साथ बीए भी कर रखा था. वह नौकरी की तलाश में था.  महेशचंद को गवेंद्र प्रेमलता के लिए पसंद आ गया. उसे लगा कि गवेंद्र को जल्दी ही कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. उस के बाद उन की बेटी की जिंदगी संवर जाएगी.  उस ने गवेंद्र को प्रेमलता के लिए पसंद कर लिया और उस के साथ प्रेमलता की शादी कर दी.

प्रेमलता ससुराल आ गई. रामसेवक का छोटा सा परिवार था. पतिपत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी नीरज थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. इसलिए घर में सिर्फ 4 ही लोग बचे थे. प्रेमलता को पूरा विश्वास था कि उस के पति को जल्दी ही कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी. वैसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पति की कमाई की बात अलग ही होती है.

गवेंद्र नौकरी की कोशिश में लगा था, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही थी. इस बीच वह 2 बच्चों उमंग और तमन्ना का पिता बन गया. प्रेमलता खुद भी बीए, बीएड थी. लेकिन बच्चे छोटे थे, दूसरे गवेंद्र नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे, इसलिए प्रेमलता ने अपने लिए कोशिश नहीं की.

सन 2012 में गवेंद्र को मैनपुरी के कीरतपुर स्थित सेवाराम जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिल गई. नौकरी भले ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की थी, लेकिन सरकारी थी, इसलिए उस ने इसे जौइन कर लिया. लेकिन प्रेमलता को यह नौकरी पसंद नहीं थी, वह शायद किसी अधिकारी की बीवी बनना चाहती थी. चपरासी की बीवी कहलवाना उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था. इसलिए उस ने सोचा कि अब उसे ही कुछ करना होगा. वह अपने कैरियर के बारे में सोचने लगी. उस के बच्चे भी बड़े हो गए थे, इसलिए वह खुद कुछ कर के समाज में नाम और पैसा कमाना चाहती थी.

उसी बीच ससुराल जाते समय बस में उस की मुलाकात बबलू से हुई. बबलू भी उसी सीट पर बैठा था. रास्ते में बबलू उस के बच्चों से बातें करतेकरते उस से भी बातें करने लगा. उस ने बताया कि वह आगरा के आईआईएमटी कालेज से जीएनएम (जनरल नॄसग मिडवाइफरी) का कोर्स कर के आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल में नौकरी करता है.

जब प्रेमलता ने कहा कि उस ने भी बीए, बीएड किया है, लेकिन लगता नहीं कि उसे नौकरी मिलेगी तो उस ने कहा, “अगर तुम जीएनएम का कोर्स कर लो तो जल्दी ही तुम्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. रही बात दाखिले की तो वह तुम मुझ पर छोड़ दो.”

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. 2-4 दिन ससुराल में रह कर प्रेमलता पति के पास आई तो उस ने गवेंद्र से कहा, “भई अब इस तरह काम नहीं चलेगा. बच्चों के भविष्य के लिए मुझे भी कुछ करना होगा. बीए, बीएड से तो नौकरी मिल नहीं सकती, इसलिए मैं जीएनएम का कोर्स करना चाहती हूं. इस से किसी न किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी.”

गवेंद्र को लगा कि अब बच्चे समझदार हो गए हैं. ऐसे में प्रेमलता कुछ करना चाहती है तो इस में बुराई क्या है. वह प्रेमलता को जीएनएम का कोर्स कराने के लिए राजी हो गया. गवेंद्र के पिता रामसेवक रिटायर हो चुके थे. इसलिए अब वह भी उसी के साथ रहने लगे थे.

प्रेमलता ने बबलू की मदद से आईआईएमटी में अपना दाखिला करा लिया. बबलू उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने लगा. प्रेमलता की पढ़ाई शुरू हो गई. बबलू लायर्स कालोनी में कमरा किराए पर ले कर रहता था. प्रेमलता को भी उस ने उसी कालोनी में कमरा दिला दिया. अब दोनों की रोज मुलाकात होने लगी. बबलू प्रेमलता के कमरे पर भी आनेजाने लगा.

लगातार मिलने और कमरे पर आनेजाने से प्रेमलता और बबलू में प्यार ही नहीं हो गया, प्रेमलता ने उस से शारीरिक संबंध बना कर उस ने रिश्तों की मर्यादा भंग कर दी. सपनों को ख्वाहिश बनाया तो तन और मन से पति से ही नहीं, बच्चों से भी दूर हो गई.

बबलू को जब लगा कि प्रेमलता पूरी तरह से उस की हो गई है तो उस ने उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. तब प्रेमलता ने कहा, “बबलू यह सब इतना आसान नहीं है. क्योंकि गवेंद्र मुझे आसानी से छोडऩे वाला नहीं है.”

“तो ठीक है, मैं उसे रास्ते से हटाए देता हूं.” बबलू ने कहा तो प्रेमलता गंभीर हो कर बोली, “यह तो और भी आसान नहीं है.”

प्रेमलता भी अब गवेंद्र से छुटकारा पा कर बाकी की जिंदगी बबलू के साथ बिताना चाहती थी, लेकिन वह उसे छोड़ कर बबलू से शादी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने पर मायके वाले उस का साथ न देते. इसलिए वह बड़ी उलझन में फंसी थी. वह इस बारे में कुछ करती, उस के पहले ही उस की पोल खुल गई.

अधेड़ उम्र का खूनी प्यार – भाग 1

देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटा हरियाणा का एक जिला है गुरुग्राम. इसी गुरुग्राम जिले के बादशाहपुर के बड़ा बाजार में सिटी हेल्थ सेंटर के पास रहता था मधुसूदन सिंगला. मधुसूदन की उम्र करीब 52 वर्ष थी. मधुसूदन घर में ही टेलरिंग शौप चलाता था. 22 वर्ष पहले मधुसूदन का विवाह सविता से हुआ था. सविता बादशाहपुर के ज्ञान भारती स्कूल में टीचर थी.

उन के 3 बच्चे हुए, जिन में 2 बेटियां और एक बेटा है. इस समय बड़ी बेटी 21 साल की, दूसरी बेटी 19 साल की और बेटा 18 साल का है. तीनों बच्चे पढ़ रहे थे. रोज तीनों बच्चे कालेज चले जाते थे. सविता भी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के लिए चली जाती थी. घर दुकान में अकेला रह जाता था मधुसूदन.

26 जून 2023 को भी मधुसूदन रोज की तरह घर में अकेला था. दोपहर ढाई बजे के करीब मधुसूदन की बड़ी बेटी रवीना कालेज से वापस घर आई तो घर का मेन गेट खुला हुआ था. गेट से जब वह अंदर पहुंची तो कमरे में सामने ही अपने पिता को खून से लथपथ पड़ा देखा. अपने पिता को उस हाल में देख कर उसकी चीख निकल गई. वह फौरन वहां से तेजी से बाहर निकली और थोड़ी दूर पर रहने वाले अपने चाचा सोनू के पास पहुंच गई.

उस ने रोतेबिलखते चाचा को पिता के खून से लथपथ कमरे में पड़े होने की बात बता दी. यह सुनते ही सोनू और घर के अन्य लोग तेज कदमों से मधुसूदन के घर पहुंच गए. सोनू और घर वालों ने जब मधुसूदन को देखा तो पता चला कि मधुसूदन की मौत हो चुकी है. चीखपुकार सुन कर आसपास के लोग भी वहां एकत्र हो गए. उन में से ही किसी व्यक्ति ने स्थानीय बादशाहपुर थाने को घटना की सूचना दे दी.

खून से लथपथ मिली लाश

बादशाहपुर पुलिस और पुलिस के आला अधिकारीगण घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक मधुसूदन के सिर पर किसी भारी वस्तु से प्रहार किया गया था, यह बात उस के सिर के घाव देखने के बाद पता चली. इस के अलावा उस के गले को किसी तेज धारदार हथियार से काटा गया था.

कमरे का सारा सामान बिखरा पड़ा था, अलमारियां खुली पड़ी थीं. शुरुआती जांच में मामला लूट के बाद हत्या का लग रहा था. अनुमान लगाया जा रहा था कि मधुसूदन घर में अकेले थे, इसलिए कोई बदमाश लूट के इरादे से घर में घुसा, मधुसूदन ने विरोध किया तो बदमाश ने उन की हत्या कर दी होगी.

बदमाश घर से कोई सामान ले जाने में सफल हुआ कि नहीं, ये पता नहीं चला. पति की हत्या की खबर मिलने पर सविता भी घर आ गई थी. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने किसी पर शक नहीं जताया. घर से क्या कुछ गायब हुआ है तो सविता भी कुछ न बता सकी.

पुलिस ने आसपास के लोगों से जानकारी जुटाई तो पता चला कि मृतक के घर की जमीन के लेनदेन को ले कर कुछ समझौता हुआ था, जिस के एवज में कई लाख रुपए मिले थे, जिस की सूचना उन के परिचित व कुछ निजी लोगों को थी. हो सकता है, उन पैसों के कारण यह घटना तो अंजाम नहीं दी गई. यह बात भी पता चली कि घटना से पहले मधुसूदन के पास बिना मूंछों वाला एक व्यक्ति बैठा देखा गया था.

क्राइम ब्रांच ने की जांच शुरू

फिलहाल पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. फिर थाने में अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस हत्याकांड की जांच क्राइम ब्रांच सेक्टर 39 की यूनिट को सौंप दी गई. इस यूनिट के प्रभारी थे पंकज कुमार.

थाना पुलिस के सहयोग से क्राइम ब्रांच यूनिट ने केस की जांच शुरू कर दी. पुलिस ने घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले. उन कैमरों की फुटेज में कोई भी संदिग्ध व्यक्ति नहीं दिखा, लेकिन घटना से पहले मधुसूदन की पत्नी जरूर घर आतीजाती एक युवक के साथ दिखी. उस युवक के हाथ में एक छाता था.

घटना से पहले और बाद में भी उन का साथ जाना पुलिस वालों के जेहन में शक पैदा कर गया. आनेजाने के बीच का समय काफी ज्यादा था. घटना भी दोपहर एक बजे से दो बजे के बीच अंजाम दी गयी थी. घटना का समय और उन दोनों के आने जाने का समय इस बात का यकीन दिला रहा था कि मधुसूदन की हत्या इन दोनों द्वारा ही की गई है.

सविता के साथ वाले युवक के बारे में पता किया गया तो पता चला कि सविता के साथ दिखने वाला युवक आशीष वर्मा उर्फ टीनू है. वह सविता के स्कूल में ही टीचर है. जानकारी जुटाने के बाद पुलिस ने दोनों के खिलाफ और सुबूत जुटाने शुरू किए.

पुलिस ने सविता के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस में सविता द्वारा एक नंबर पर हर रोज ज्यादा बात किए जाने की बात पता चली. घटना वाले दिन भी उस फाने पर बातें हुई थीं. घटना के समय दोनों के नंबरों की लोकेशन भी घटनास्थल पर पाई गई. जांच करने पर वह नंबर किसी और का नहीं, बल्कि आशीष वर्मा का ही निकला. आशीष बादशाहपुर में ही रहता था.

इस के बाद अगले ही दिन 27 जून, 2023 को पुलिस ने सविता और आशीष वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. बादशाहपुर थाने ला कर जब सविता और आशीष से पूछताछ की गई तो दोनों पुलिस को बरगलाने लगे, लेकिन जब पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, काल डिटेल्स और लोकेशन रिपोर्ट दोनों के सामने सुबूत के तौर पर रखी तो दोनों समझ गए कि इन का भांडा फूट गया है. तब दोनों ने इस मर्डर केस का जुर्म स्वीकार करते हुए हत्या के पीछे की पूरी कहानी बयान कर दी.

स्कूल के टीचर से हो गया प्यार

मधुसूदन सिंगला के साथ सविता 22 साल से किसी तरह निभा रही थी. मधुसूदन शराब का शौकीन था. ये शौक उस की आदत में इस कदर शुमार था, कि वह हर रोज शराब पीता था. यहां तक तो चलो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन इस के बाद जो होता था, वह बरदाश्त के बाहर वाला मामला था. शराब पीने के बाद मधुसूदन हैवान बन जाता था, वह रोज किसी न किसी बात को ले कर सविता से झगड़ पड़ता था और उस की जम कर पिटाई कर देता था.

मां के प्रेम का जब खुला राज – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले का एक ऐतिहासिक कस्बा है- कालपी. इसी कालपी कस्बे के स्टेशन रोड पर नरेश कुमार तिवारी सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी उमा के अलावा 2 बेटियां राधा व सुधा थीं. नरेश कुमार प्राइवेट नौकरी करते थे. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. बड़ी मुश्किल से वह परिवार की दोजून की रोटी जुटा पाते थे.

गरीबी में पलीबढ़ी राधा जब जवान हुई तो उस के रंगरूप में निखार आ गया. हर मांबाप बेटी के लिए अच्छा घर तथा सीधा शरीफ वर ढूंढते हैं, वे यह नहीं देखते कि बेटी ने अपने जीवनसाथी को ले कर क्या सपने संजोए हुए हैं. राधा के मातापिता ने भी बेटी का मन नहीं टटोला. उन्होंने अश्वनी दुबे से उस का विवाह रचा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री भर कर दी.

अश्वनी के पिता ओमप्रकाश दुबे जालौन जिले के माधौगढ़ थाना अंतर्गत सिरसा दोगड़ी गांव के निवासी थे. अश्वनी दुबे उन का इकलौता बेटा था. ओमप्रकाश किसान थे. किसानी में बेटा अश्वनी भी उन का हाथ बंटाता था. खेती के अलावा वह दुधारू जानवर भी पाले हुए थे. दूध के कारोबार से उन की अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी.

अश्वनी दुबे जैसा मेहनती और सीधासादा दामाद पा कर नरेश कुमार निश्ंचत हो गया था कि बेटी का जीवन संवर गया. राधा के मन के दर्पण में क्याक्या दरका, यह कोई नहीं जानता था. राधा एक महत्त्वाकांक्षी युवती थी. उस ने अपने मन में सपना संजोया हुआ था कि शादी के बाद उस के पास बड़ा सा घर, खूब सारा पैसा और स्मार्ट पति होगा. लेकिन मिला क्या? मामूली सा घर और रोटी के लिए जूझता हुआ मामूली सा पति.

अश्वनी के पास थोड़ी सी जमीन थी, जिस के सहारे वह गृहस्थी की नैया को खे रहा था. ससुर और पति के खेत पर चले जाने के बाद राधा अपने टूटे हुए सपनों को जोडऩे की उधेड़बुन में लगी यही सोचती कि अब कभी उस की चाहतें पूरी नहीं होंगी.

बहरहाल, शादी हुई थी तो निभाना ही था और बच्चे भी होने ही थे. राधा ने पहले बेटी साहनी को जन्म दिया, उस के बाद बेटे को. लेकिन 2 बच्चों के बाद भी राधा दिल से अश्वनी के साथ जुड़ नहीं पाई. उसे हमेशा यह एहसास सालता रहता था कि उसे मनपसंद पति नहीं मिला.

राधा के पड़ोस में रहता था नेत्रपाल सिंह. वह कुंवारा था. पड़ोसी होने के नाते उस का राधा के घर आनाजाना था. राधा को वह भाभी कहता था. देवरभाभी के नाते कभीकभार राधा उस से हंसबोल लिया करती थी.

एक दिन राधा गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार में गई तो वहां उसे नेत्रपाल सिंह मिल गया. नेत्रपाल सिंह ने उस से कहा, “भाभी, चलो आज आप को चाट खिलाऊं. वो देखो, उस ठेले पर कनपुरिया चाट मिलती है.”

चाट का नाम सुन कर राधा के मुंह में पानी आ गया. फिर वह सकुचाते हुए बोली, “लेकिन मेरे पास तो अब पैसे बचे ही नहीं है.”

“अरे भाभी, पैसों की बात मत करो, मैं हूं न, मैं खिलाउंगा तुम्हें.”

राधा उस की बात टाल नहीं सकी. चाट वाले के पास पहुंच कर नेत्रपाल सिंह बोला, “यार रामू, जरा बढिय़ा सी चाट खिलाना हमारी भाभी को.”

नेत्रपाल डालने लगा राधा पर डोरे

कुछ ही देर में चाट का पत्ता राधा के हाथ में था. राधा ने चाट खाई, फिर पानी पूरी भी खाई. चूंकि रामू नेत्रपाल सिंह का दोस्त था, अत: उस ने राधा को भरपूर आदर के साथ हर चीज पेश की. चाट खाने के बाद नेत्रपाल सिंह ने रामू को पैसे देने चाहे तो उस ने नाराजगी से कहा, “कैसी बात करता है यार, तेरी भाभी मेरी भाभी नहीं है क्या?”

बाजार से लौटते वक्त नेत्रपाल ने राधा का थैला उठाया और उसे घर के बाहर तक छोड़ गया. रास्ते में दोनों के बीच खूब बातें हुईं. नेत्रपाल का बातबात में खिलखिलाना और राधा के चेहरे को निहारना, उसे अच्छा लगा था. पहली बार उस ने नेत्रपाल को गौर से देखा था. वह स्मार्ट भी था और स्वस्थ भी. राधा की कद्र भी खूब कर रहा था.

जाते वक्त उस ने नेत्रपाल का शुक्रिया अदा किया तो वह हंसते हुए बोला, “मेरी सारी मेहनत को इस एक शब्द में बहा दिया न भाभी आप ने. अपनों को भी शुक्रिया कहा जाता है क्या?”

उस की यह अदा भी राधा को बहुत अच्छी लगी थी. उस सारी रात राधा की आंखों में नेत्रपाल सिंह का चेहरा ही घूमता रहा. उस का अपनापन, उस का अंदाज उस के उदास मन की तनहाइयों को सहलाता रहा.

तीसरे दिन की बात थी. राधा को सुबह खाना बनाने में देर हो गई थी. अश्वनी ने कहा, “राधा हमारा खाना तुम खेत पर ही दे जाना.”

खाना बना कर राधा ने टिफिन में डाला. बेटी को पड़ोस के घर छोड़ा और मासूम बेटे को गोद में ले कर वह खेत की ओर बढ़ चली. टिफिन पति को थमा कर वह खेत से घर की ओर आ ही रही थी कि रास्ते में नेत्रपाल सिंह टकरा गया. देखते ही बोला, “अरे भाभी, तुम यहां?”

“हां, तुम्हारे भैया का खाना देने खेत पर गई थी.” राधा ने मुसकरा कर जवाब दिया.

“लाओ बेटे को हमें दे दो. हम ले कर चलते हैं,” कहते हुए नेत्रपाल सिंह ने राधा की गोद से बच्चा ले लिया.

बच्चा पकड़तेे वक्त उस की अंगुलियां राधा के उरोजों के साथसाथ उस के हाथों को छू गईं. पता नहीं उस स्पर्श में ऐसा क्या था कि राधा की देह में एक सनसनी सी भर गई. पति के स्पर्श से उस ने कभी ऐसा रोमांच महसूस नहीं किया था.

घर पहुंच कर नेत्रपाल ने अनुज को गोद से उतार कर राधा की गोद में दे दिया तो एक बार फिर दोनों की अंगुलियां टकरा गईं. वही सनसनी फिर राधा की देह से गुजर गई. नेत्रपाल ने मुसकरा कर कहा, “अब चलता हूं भाभी.”

“अरे ऐसे कैसे जाओगे? तुम ने मेरी इतनी मदद की है, बदले में मेरा भी तो फर्ज बनता है. अंदर चलो, चाय पी कर जाना.” कहते हुए राधा ने घर का ताला खोला और नेत्रपाल का हाथ पकड़ कर उसे अंदर ले आई.

भीतर आ कर उस ने बेटे को गोद से उतार कर बिस्तर पर लिटा दिया. इस के बाद उस ने साड़ी का पल्लू सिर से उतारा ही था कि झटके से उस का जूड़ा खुल गया. लंबे बाल कंधों पर लहराने लगे. नेत्रपाल को राधा की यह दिलकश अदा भा गई.

दूसरी शादी का दुखद अंत – भाग 1

26 जुलाई, 2014 को जिला हाथरस कोतवाली सदर के प्रभारी बी.एस. त्यागी को सुबहसुबह सूचना मिली कि कोटा रोड पर नरहौली बंबे के पास एक युवक की लाश  पड़ी है. सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

शुरुआती निरीक्षण से ही पता चल गया कि यह हत्या का मामला है. मृतक का चेहरा किसी भारी पत्थर से कुचल दिया गया था. शायद ऐसा शिनाख्त मिटाने के लिए किया गया था. तलाशी में भी उस के पास से ऐसा कुछ नहीं मिला, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. जब वहां इकट्ठा लोगों ने भी उसे पहचानने से मना कर दिया तो थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

हत्या का यह मामला हाथरस कोतवाली सदर में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया और अज्ञात युवक की हत्या के इस मामले की जांच एसएसआई रविंद्र कुमार को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक मुसलिम था, जिस की हत्या किसी भारी पत्थर से कुचल कर की गई थी. मृतक के पुरुषांग को भी कुचला मसला गया था.

इस बात से मामले की जांच कर रहे रविंद्र कुमार को लगा कि हत्यारा मृतक से काफी नफरत करता रहा होगा. ऐसा अधिकतर अवैध संबंधों के मामले में ही होता है. इसलिए इसी बात को ध्यान में रख कर जांच बढ़ाई गई. लेकिन जांच तभी आगे बढ़ सकती थी, जब मृतक की शिनाख्त हो जाती.

संयोग से उन्हें मृतक की शिनाख्त के लिए ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ा. 27 जुलाई की शाम को एक आदमी ने आ कर थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी को बताया कि उस का किराएदार वकील 2 दिनों से गायब है. उस का फोन भी बंद है. पूछने पर जब उस आदमी ने वकील का हुलिया बताया तो वह हुलिया नरहौली के बंबे पर मिली लाश से पूरी तरह से मेल खा रहा था.

थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी ने तुरंत उस आदमी को थाने की जीप से पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया तो उस ने मृतक की शिनाख्त अपने किराएदार वकील के रूप में कर दी.

पूछताछ में उस आदमी ने बताया कि वकील ने लगभग 6 महीने पहले विष्णुपुरी स्थित उस के मकान में एक कमरा किराए पर लिया था, जिस में वह अपनी पत्नी के साथ रहता था. इस समय उस की पत्नी मथुरा के मांट में ब्याही अपनी बेटी की ससुराल गई हुई है.

उस आदमी से पुलिस को मृतक वकील की पत्नी का फोन नंबर मिल गया था. इसलिए पुलिस ने उसे वकील की हत्या की सूचना दे दी. लगभग दोढाई घंटे बाद मृतक की पत्नी थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी के सामने हाजिर हुई तो उसे देख कर वह हैरान रह गए. क्योंकि उस की उम्र 45 साल से ज्यादा थी, जबकि मृतक वकील की उम्र 20 साल थी. पूछताछ में उस ने अपना नाम जरीना बताया.

मामला अजीबोगरीब था, 20 साल के युवक की 45-50 साल की पत्नी को देख कर सभी हैरान थे, लेकिन पुलिस को इस से क्या मतलब था? जरीना रोरो कर कह रही थी उस के शौहर की हत्या उस के पहले पति, बेटे और चचेरे देवर ने की है.

इस के बाद जरीना की तहरीर पर उस के शौहर वकील की हत्या का मुकदमा उस के पहले शौहर शैफी मोहम्मद, बेटे शमशेर और चचेरे देवर फुर्रा के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.  लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने मृतक वकील के घर वालों को भी सूचना दे दी थी.

घर वालों ने हाथरस कोतवाली पहुंच कर वकील की हत्या का आरोप जरीना पर ही लगा दिया. वकील के बड़े भाई शब्बीर का कहना था कि जरीना ने ही अपने पहले शौहर शैफी मोहम्मद, देवर फुर्रा और बेटे शमशेर के साथ साजिश रच कर उस के भाई वकील की हत्या कराई है. उन्होंने वकील की हत्या के इस मामले में उसे भी अभियुक्त बनाया जाए.

इस के बाद हत्यारों में जरीना का नाम भी जोड़ दिया गया और कोतवाली में मौजूद जरीना को हिरासत में ले लिया गया. इस के बाद हाथरस पुलिस ने आगरा के इसलामनगर जा कर शैफी मोहम्मद, उस के भाई फुर्रा और बेटे शमशेर को भी गिरफ्तार कर लिया.

कोतवाली ला कर तीनों से पूछताछ शुरू हुई तो उन का कहना था कि 4 साल से वकील से न उस की मुलाकात हुई है, न कोई बातचीत. ऐसे में वे उस की हत्या कैसे कर सकते हैं. लेकिन जब थानाप्रभारी बी.एस. त्यागी ने उन के मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स और लोकेशन उन के सामने रख दी तो तीनों ने वकील की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करने के साथ हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से जिला हाथरस के सादाबाद के गांव जरिया की गढ़ी के रहने वाले हनीफ खां रोजीरोटी की तलाश में वर्षों पहले आगरा आ बसे थे. यह उस समय की बात है, जब आगरा में यमुना नदी के किनारे इसलामनगर मोहल्ला बस रहा था. हनीफ खां जब आगरा आए तब उन की 2 संतानें थीं. बाद में वह कुल 9 बच्चों के बाप बने, जिन में 4 बेटियां और 5 बेटे थे. वकील उन का सब से छोटा बेटा था. हनीफ जैसेतैसे बच्चों की शादी करते गए थे, सब अपनीअपनी पत्नियों के साथ अलग होते गए थे.

अंत में उन के साथ सब से छोटा बेटा वकील बचा. जिन दिनों वह हाईस्कूल में पढ़ रहा था, तभी हनीफ खां की तबीयत खराब हुई. पिता की देखरेख की वजह से वकील हाईस्कूल की परीक्षा नहीं दे सका. इस से भी दुखद यह रहा कि उस के अब्बू भी चल बसे.

हनीफ खां के इंतकाल के बाद वकील का कोई नहीं रह गया. उसे कभी एक भाई के यहां खाना पड़ता तो कभी दूसरे के यहां. कोई भी भाई उसे अपने साथ स्थाई रूप से रखने को तैयार नहीं था. पढ़ाई तो छूट ही गई थी, धक्के खाते हुए मोटर मैकेनिक का काम सीखने लगा. भाइयों ने मदद नहीं की तो ऐसे में उस की मदद के लिए आगे आए उसी मोहल्ले के रहने वाले शैफी मोहम्मद.

शैफी मोहम्मद का घर हनीफ खां के घर के ठीक सामने था. मोहल्ले में उस की गिनती संपन्न लोगों में होती थी. 3 बच्चों के पैदा होने के बाद उस की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद उस ने दूसरी शादी जरीना से की थी. जरीना से भी उसे 7 बच्चे हुए. जरीना ने बेशक अपनी कोख से 7 बच्चों को जन्म दिया था, लेकिन उसे देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वह इतने बच्चों की मां होगी.

प्रेम में डूबी जब प्रेमलता – भाग 1

अभी सुबह का उजाला भी ठीक से फैला नहीं था कि मैनपुरी कोतवाली के गेट से एक महिला अंदर घुसी. वह काफी अस्तव्यस्त और घबराई हुई लग रही थी, इसलिए ड्यूटी पर तैनात संतरी ने आगे बढ़ कर पूछा, “कहो, कैसे आई?”

“साहब से मिलना है.”

“क्यों, क्या परेशानी है?” संतरी ने पूछा.

संतरी का इतना कहना था कि महिला रोने लगी. संतरी ने उसे चुप कराते हुए कहा, “साहब तो अभी आए नहीं हैं. तुम अपनी परेशानी बताओ. अगर कोई ज्यादा परेशानी वाली बात होगी तो मैं साहब से जा कर बता दूंगा.”

“मेरे पति ने रात में आत्महत्या कर ली है. उन की लाश घर में पड़ी है.” महिला ने सिसकते हुए कहा.

इस के बाद संतरी महिला को ड्यूटी पर तैनात मुंशी के पास ले गया और उसे पूरी बात बताई. मामला गंभीर था, इसलिए मुंशी ने संतरी से कोतवाली प्रभारी को सूचना देने के लिए कहा.

सूचना पा कर कुछ ही देर में कोतवाली प्रभारी मनोहर सिंह यादव आ गए. उन्होंने महिला को अपने कक्ष में बुला कर पूछा,

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“जी प्रेमलता, घर में सब पिंकी कहते हैं.”

“कहां से आई हो?”

“नगला कीरत से. वहीं अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी.”

“पति का क्या नाम था?”

“गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू.”

“बच्चे कितने हैं?”

“2, बेटा 8 साल का और बेटी 5 साल की है.”

प्रेमलता जिस तरह टकर टकर मनोहर सिंह के सवालों का जवाब दे रही थी, उस से उन्हें उस पर संदेह हुआ. जिस औरत का पति मरा हो, वह इस तरह कतई बातें नहीं कर सकती. उन्होंने पूछा, “यह सब हुआ कैसे?”

“साहब, हम क्या बताएं. रात को हम सब खाना खा कर सोए और सवेरे उठे तो उन की लाश मिली. आप चलिए और लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम करा दीजिए. हम उन का जल्दी से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं.”

आगे कुछ पूछने के बजाय कोतवाली प्रभारी कुछ सिपाहियों और प्रेमलता को साथ ले कर कीरतपुर नगला जा पहुंचे. प्रेमलता के घर के सामने भीड़ लगी थी. भीड़ को हटा कर मनोहर सिंह अंदर पहुंचे तो कमरे में पड़ी चारपाई अस्तव्यस्त हालत में पड़ी थी.

मनोहर सिंह ने लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर चोट का कहीं कोई निशान नहीं था. गले पर जरूर कुछ इस तरह का निशान था, जो गला दबाने पर पड़ जाते हैं. उन्हें जो आशंका थी, लाश देख कर वह सच नजर आ रही थी. घर में एक ही दरवाजा था, उसी से अंदर आया या बाहर जाया जा सकता था. प्रेमलता का कहना था कि रात में उस ने खुद कुंडी लगाई थी.

मनोहर सिंह ने औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रेमलता से पूछताछ की. उस का कहना था कि वह रहते भले तनाव में थे, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़े. शाम को सब ठीकठाक था. बात भी अच्छी तरह कर रहे थे. कहीं से नहीं लगता था कि वह रात में आत्महत्या कर लेंगे.

पूछताछ में पता चला कि मृतक गवेंद्र सिंह की सरकारी नौकरी थी. वह सरकारी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. वह बहुत खुशदिल था. हर किसी से हमेशा हंस कर मिलता था. मनोहर सिंह को गवेंद्र सिंह की आत्महत्या का यह मामला पूरी तरह से संदिग्ध लग रहा था, लेकिन जब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आ जाती, वह कुछ नहीं कर सकते थे.

प्रेमलता ने 6 बजे ही अपने ससुर रामसेवक को फोन कर के गवेंद्र की मौत की सूचना दे दी थी. उसी सूचना पर रामसेवक 9 बजे घर वालों के साथ नगला कीरतपुर पहुंचे तो पुलिस वहां मौजूद थी. बेटे की लाश देख कर रामसेवक ने रोते हुए कहा,

“साहब, मेरे बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है. आखिर वह आत्महत्या क्यों करेगा, उसे किसी चीज की कमी थोड़े ही थी.”

“कोई बात नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सब पता चल जाएगा. उस के पहले हम कुछ नहीं कह सकते.” मनोहर सिंह ने उसे आश्वासन दिया.

मनोहर सिंह ने मृतक के पिता रामसेवक की ओर से अपराध संख्या 1341/2015 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया था. मनोहर सिंह ने मुखबिरों से प्रेमलता के बारे में पता लगाने को कहा, क्योंकि उन्हें उस का चरित्र संदिग्ध लग रहा था.

आखिर जब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो सारा मामला साफ हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत दम घुटने से हुई थी. उस की गला दबा कर हत्या की गई थी. ऐसे में संदेह प्रेमलता पर ही था, क्योंकि घर में मृतक के साथ वही थी और थाने आ कर उस ने झूठ भी बोला था.

मनोहर सिंह ने पूरे परिवार को इकट्ठा किया तो उन की नजरें मृतक के बच्चों पर जम गईं. हत्या वाली रात वे भी साथ थे. बच्चे डरे हुए लग रहे थे. बेटी तो छोटी थी, लेकिन बेटा उमंग 8 साल का था. वह कुछ बता सकता है, यह सोच कर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पुचकार कर पूछा तो उस ने कहा, “मम्मी ने बबलू अंकल और 2 लोगों के साथ मिल कर पापा को मारा है.”

अब क्या था, पुलिस ने तुरंत प्रेमलता उर्फ पिंकी को हिरासत में ले लिया. लेकिन जब उस से हत्या में शामिल बबलू तथा 2 अन्य लोगों के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि न वह बबलू को जानती है और न 2 अन्य लोगों को. उमंग ने बबलू का नाम तो बता दिया था, लेकिन वह कौन था, कहां का रहने वाला था, यह सब वह नहीं बता सका था.

पुलिस बबलू के बारे में पता करने लगी. उसी बीच उसे पता चला कि प्रेमलता इन दिनों आगरा की लायर्स कालोनी स्थित आईआईएमटी से नॄसग की पढ़ाई कर रही थी और वहीं कमरा ले कर रहती थी. इस से पुलिस को लगा कि कहीं बबलू आगरा का ही रहने वाला तो नहीं है.

पुलिस वहां जा कर बबलू के बारे में पता लगाने की सोच ही रही थी कि प्रेमलता से मिलने एक लडक़ा आया. उस ने थानाप्रभारी से प्रेमलता को अपनी बहन बता कर मिलने की गुजारिश की तो मनोहर सिंह ने उसे प्रेमलता से मिलने की इजाजत दे दी.

सूरज ने बुझाया जिंदगी का दीया

रामाश्रय यादव आ कर ड्राइंगरूम में पड़े सोफे पर बैठे ही थे कि उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन उठा कर देखा, नंबर किसी खास का था, इसलिए फोन रिसीव करते हुए उन के चेहरे पर मुसकान थिरक उठी थी.

दूसरी ओर से महिला की शहदघुली आवाज आई. ‘‘तुम कब तक मेरे यहां पहुंच रहे हो? मैं ने दोपहर को ही बता दिया था कि पैसों की व्यवस्था हो गई है. जानते ही हो, समय कितना खराब चल रहा है. कहीं से चोरउचक्कों को हवा लग गई तो अनर्थ हो जाएगा, इसीलिए एक बार फिर कह रही हूं कि आ कर अपने पैसे उठा ले जाओ.’’

‘‘ठीक है, मैं थोड़ी देर में तुम्हारे यहां पहुंच रहा हूं.’’ कह कर रामाश्रय ने फोन काट दिया.

फोन काट कर रामाश्रय उठा और अपने कमरे में जा कर अलमारी से एक डायरी निकाल कर पत्नी आशा से बोला, ‘‘गामा की पत्नी का फोन आया था, पैसे देने के लिए बुला रही है. मुझे लौटने में देर हो तो तुम लोग खाना खा लेना. मेरी राह मत देखना.’’

‘‘कभी आप को खिलाए बिना मैं ने अपना मुंह जूठा किया है कि आज ही खा लूंगी. लौट कर आओगे तो साथ बैठ कर खाना खाऊंगी.’’ आशा ने कहा.

‘‘ठीक है भई, साथ ही खाएंगे. लेकिन बच्चों और बहुओं को भूखा मत रखना, उन्हें खिला देना.’’ रामाश्रय ने कहा और डायरी ले कर बाहर आ गया. अब तक उस के छोटे बेटे राकेश ने उस की मोटरसाइकिल निकाल कर बाहर खड़ी कर दी थी. डायरी उस ने डिक्की में रखी और मोटरसाइकिल स्टार्ट कर के चल पड़ा. उस समय शाम के यही कोई 6 बज रहे थे और तारीख थी 12 नवंबर, 2013.

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की थानाकोतवाली शाहपुर के मोहल्ला नंदानगर दरगहिया के रहने वाले रामाश्रय यादव ब्याज पर रुपए देने का काम करते थे. इसी की कमाई से उस ने अपना आलीशान मकान बनवा रखा था, जिस में वह पत्नी आशा, 2 बेटों दिनेश यादव उर्फ पहलवान और राकेश यादव के साथ रहते थे. उस ने करीब 40 लाख रुपए जरूरतमंदों को 10 से 15 प्रतिशत ब्याज पर दे रखा था.

इसी ब्याज की ही कमाई से रामाश्रय ने करोड़ों रुपए का प्लौट खरीद कर अपना यह आलीशान मकान तो बनाया ही था, एक फार्महाउस भी बनवा रखा था. उस का मकान और फार्महाउस आमनेसामने थे. फार्महाउस में उस ने भैंसें पाल रखी थीं, जिन का दूध बेच कर भी वह मोटी कमाई कर रहा था. यही नहीं, कुसुम्ही में 20 बीघे जमीन भी खरीद रखी थी, जिस पर खेती करवाता था. इन सब के अलावा वह प्रौपर्टी में भी पैसा लगाता था. एक तरह से वह बहुधंधी आदमी  था. उस के इन कारोबारों में उस का छोटा बेटा राकेश उस की मदद करता था.

रामाश्रय यादव को घर से गए 3 घंटे से ज्यादा हो गया और न ही उस का फोन आया और न ही वह आया तो आशा को चिंता हुई. उस ने राकेश से कहा, ‘‘अपने पापा को फोन कर के पूछो कि उन्हें आने में अभी कितनी देर और लगेगी. इस समय वह कहां हैं?’’

राकेश ने रामाश्रय को फोन किया तो पता चला कि उस का फोन बंद है. यह बात उसे अजीब लगी, क्योंकि ऐसा कभी नहीं होता था. राकेश की समझ में यह बात नहीं आई तो मां से कह कर वह अपनी मोटरसाइकिल से गामा यादव के घर के लिए निकल पड़ा. गामा के घर की दूरी 6 किलोमीटर के आसपास थी. वह अभिषेकनगर, शिवपुर, नहर कालोनी में रहता था. यह इलाका थाना कैंट के अंतर्गत आता था. गामा यादव तो नौकरी की वजह से बाहर रहता था, यहां उस की पत्नी मंजू बच्चों के साथ रहती थी. मंजू से रामाश्रय के अच्छे संबंध थे, जिस की वजह से वह अकसर उस के यहां आताजाता रहता था.

करीब 20 मिनट में राकेश मंजू के यहां पहुंच गया. उस ने घंटी बजाई तो मंजू ने ही दरवाजा खोला. उतनी रात को अपने यहां राकेश को देख कर वह चौंकी. उस ने कहा, ‘‘आओ, अंदर आओ. कहो, क्या बात है?’’

‘‘आप के यहां पापा आए थे, अभी तक लौटे नहीं. उन का फोन भी बंद है.’’

वह तो मेरे यहां दोपहर में आए थे. पैसों का हिसाबकिताब करना था, ले कर तुरंत चले गए थे.’’ मंजू ने कहा.

मंजू के इस जवाब से राकेश हैरान रह गया, क्योंकि घर से निकलते समय उस के पापा ने इन्हीं के यहां आने की बात कही थी. जबकि यह कह रही थी कि पापा इस के यहां दोपहर में आए थे और हिसाबकिताब कर के पैसे ले कर चले गए थे. वह क्या कहता, बिना कुछ कहेसुने ही बाहर से लौट आया. घर लौट कर उस ने सारी बात मां को बताई तो आशा का दिल घबराने लगा.

मां की हालत देख कर राकेश ने कहा, ‘‘आप परेशान मत होइए, फोन कर के अन्य परिचितों से पूछता हूं. हो सकता है किसी के घर जा कर बैठ गए हों. बातचीत में उन्हें समय का खयाल ही न हो.’’

राकेश ने लगभग सभी जानपहचान वालों को फोन कर के पिता के बारे में पूछ लिया. लेकिन कहीं से उसे कोई जानकारी नहीं मिली. अब तक काफी रात हो गई थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी रात गए वह कहां जा कर पिता को ढूंढे. किसी तरह रात बिता कर सुबह होते ही राकेश पिता को ढूंढ़ने के लिए निकल पड़ा.

सुबह भी वह सब से पहले मंजू के ही घर गया. इस बार भी मंजू ने वही जवाब दिया, जो रात में दिया था. इस के बाद वह पिता को जगहजगह ढूंढ़ने लगा. शाम होतेहोते उस के किसी परिचित ने बताया कि थाना झंगहा पुलिस ने नया बाजार स्थित मंदिर के पास से एक मोटरसाइकिल लावारिस स्थिति में खड़ी बरामद की है. जा कर देख लो, कहीं वह उस के पिता की तो नहीं है.

अब तक राकेश के कुछ दोस्त भी उस की मदद के लिए आ गए थे. वह अपने दोस्तों के साथ थाना झंगहा जा पहुंचा. राकेश ने मोटरसाइकिल देखी तो वह वही थी, जो पिछली शाम उस के पिता ले कर निकले थे. उस ने डिक्की देखी तो उस में वह डायरी नहीं थी, जो उस के पिता उस में रख कर ले गए थे. डायरी न पा कर उसे लगा कि उस के पापा के साथ अवश्य कोई अनहोनी हो चुकी है.

अगले दिन 14 नवंबर, 2013 की सुबह राकेश अपने दोस्तों के साथ थाना कोतवाली शाहपुर पहुंचा. कोतवाली प्रभारी उपेंद्र कुमार यादव को पूरी बात बताई तो कोतवाली प्रभारी ने उस से एक तहरीर ले कर रामाश्रय यादव के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया.

मुकदमा दर्ज कराने के बाद कोतवाली प्रभारी उपेंद्र कुमार यादव ने रामाश्रय यादव का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवाने के साथ उस की काल डिटेल्स निकलवा ली. काल डिटेल्स में अंतिम फोन अभिषेकनगर, शिवपुर, नहर कालोनी की रहने वाली मंजू यादव के मोबाइल से किया गया था.

मंजू यादव के यहां ही जाने की बात कह कर घर से निकले थे. उसी के बाद से उस का पता नहीं चल रहा था. मोबाइल भी बंद हो गया था. पुलिस को मंजू पर शक हुआ तो उस के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगवा दिया. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि रामाश्रय के अपहरण में कहीं न कहीं से उस का हाथ जरूर है.

2 दिनों तक उस नंबर पर न तो किसी का फोन आया और न ही उसी ने किसी को फोन किया. 17 नवंबर, 2013 की सुबह मंजू ने अपने एक रिश्तेदार को फोन कर के रामाश्रय यादव के बारे में कुछ इस तरह की बातें कीं कि जैसे उस के गायब होने के बारे में उसे जानकारी है.

मामला एक संभ्रांत औरत से जुड़ा था, इसलिए पुलिस ने सारे साक्ष्य जुटा कर ही उस पर हाथ डालने का विचार किया. पुलिस की एक टीम बनाई गई, जिस में सिपाही राम विनय सिंह, संजय पांडेय, रामकृपाल यादव, अजीत सिंह, महिला सिपाही पिंकी सिंह और इंदु बाला को शामिल किया गया. इस टीम का नेतृत्व कोतवाली प्रभारी उपेंद्र कुमार यादव कर रहे थे.

गुप्त रूप से सारी जानकारियां जुटा कर उपेंद्र कुमार ने रात को अपनी टीम के साथ मंजू के घर छापा मारा. घर पर उस समय मंजू और उस का बेटा सौरभ था. उतनी पुलिस देख कर मंजू सकपका गई. दरवाजा खुलते ही पुलिस घर में घुस कर तलाशी लेने लगी. पीछे के कमरे की तलाशी लेते समय पुलिस ने देखा कि कमरे का आधा फर्श इस तरह है, जैसे गड्ढा खोद कर पाटा गया हो, जबकि बाकी का आधा हिस्सा लीपा हुआ था.

दरअसल मकान का फर्श अभी बना नहीं था. एक सिपाही ने उस पर पैर मारा तो वह जमीन में धंस गया. संदेह हुआ तो पुलिस ने लोहे की सरिया का टुकड़ा उठा कर उस में घुसेड़ा तो वह आसानी से घुसता चला गया. इस के बाद मंजू से पूछताछ की गई तो पहले वह इधरउधर की बातें करती रही. लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस को बताया कि रामाश्रय यादव की हत्या कर के उसी की लाश यहां गाड़ी गई है.

कोतवाली प्रभारी उपेंद्र कुमार यादव ने मंजू को हिरासत में ले कर इस बात की सूचना क्षेत्राधिकारी नम्रता श्रीवास्तव को दे दी. इस के बाद नम्रता श्रीवास्तव, पुलिस अधीक्षक (नगर) परेश पांडेय, सिटी मजिस्ट्रेट रामकेवल तिवारी, इंसपेक्टर भंवरनाथ चौधरी और इंजीनियरिंग कालेज चौकी के चौकीप्रभारी भी वहां पहुंच गए.

सिटी मजिस्ट्रेट रामकेवल तिवारी की उपस्थिति में फर्श की खुदाई कर के लाश बरामद की गई. पुलिस ने मृतक रामाश्रय के बेटे राकेश को फोन कर के बुलवा लिया था. लाश देखते ही वह बिलखबिलख कर रोने लगा था. लाश की शिनाख्त हो ही गई थी. पुलिस ने अपनी औपचारिक काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

मंजू यादव को हिरासत में ले कर पुलिस थाने ले आई. थाने में एसपी (सिटी) परेश पांडेय और क्षेत्राधिकारी नम्रता श्रीवास्तव की उपस्थिति में उस से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में मंजू ने रामाश्रय यादव की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस तरह थी.

40 वर्षीया मंजू यादव मूलरूप से गोरखपुर के थाना कैंट के मोहल्ला अभिषेकनगर, शिवपुर की नहर कालोनी की रहने वाली थी. उस के परिवार में पति गामा यादव और 2 बेटे, सूरज कुमार तथा सौरभ कुमार थे. करीब 5 साल पहले गामा यादव सेवानिवृत्ति हुए तो उन्हें झारखंड के बोकारो में नौकरी मिल गई. वह वहां अकेले ही रहते थे. उन की पत्नी मंजू गोरखपुर में रह कर दोनों बच्चों को पढ़ा रही थी.

अभिषेकनगर में रहने से पहले गामा यादव का परिवार नंदानगर दरगहिया में किराए के मकान में रहता था. वहीं रहते हुए उन की मुलाकात रामाश्रय यादव से हुई तो जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई. धीरेधीरे यह दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि दोनों परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना हो गया. रामाश्रय यादव की शादी तो हो ही गई थी, वह 2 बेटों का बाप भी बन गया था. जबकि गामा यादव की नईनई शादी हुई थी. यह लगभग 20-25 साल पहले की बात है.

गामा यादव के ड्यूटी पर जाने के बाद घर में मंजू यादव ही रह जाती थी. ऐसे में कभीकभार घूमतेफिरते रामाश्रय उस के घर पहुंच जाता तो घंटों उस से बातें करता रहता था. बातें करतेकरते ही उस के मन में दोस्त की बीवी के प्रति आकर्षण पैदा होने लगा.

मंजू 2 बेटों सूरज और सौरभ की मां बन गई थी. 2 बेटों के जन्म के बाद उस के शरीर में जो निखार आया, वह रामाश्रय को और बेचैन करने लगा. मंजू के आकर्षण में बंधा वह जबतब उस के घर पहुंचने लगा. लेकिन अब वह उस के घर खाली हाथ नहीं जाता था. बच्चों के बहाने वह कुछ न कुछ ले कर जाता था. मंजू और उस के बीच हंसीठिठोली होती ही थी, इसी बहाने वह उस से अश्लील मजाक करते हुए शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगा. मंजू ने कभी विरोध नहीं किया, इसलिए उस की हिम्मत बढ़ती गई और फिर एक दिन उस ने उसे बांहों में भर लिया.

ऐसे में न तो रामाश्रय ने घरपरिवार की चिंता की न मंजू ने. उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि जब इस बारे में घर वालों को पता चलेगा तो इस का परिणाम क्या होगा. दोनों ही किसी तरह की परवाह किए बगैर एक हो गए. इस के बाद उन का यह लुकाछिपी का खेल लगातार चलने लगा. दोनों ही यह खेल इतनी सफाई से खेल रहे थे कि इस की भनक न तो गामा को लगी थी और न ही आशा को.

गामा नंदानगर में किराए के मकान में रहता था. बच्चे बड़े हुए तो जगह छोटी पड़ने लगी. रामाश्रय सूदखोरी के साथ प्रौपर्टी का भी काम करता था. इसी वजह से मंजू ने उस से प्लौट दिलाने की बात कही तो रामाश्रय ने उसे अभिषेकनगर का यह प्लौट दिला दिया. प्लौट खरीदने का पैसा भी रामाश्रय ने ही दिया. लेकिन गामा ने उस का यह पैसा धीरेधीरे अदा कर दिया था.

रामाश्रय ने मंजू को प्लौट ही नहीं दिलवाया, बल्कि उस का मकान भी बनवा दिया था. मकान बनने के बाद मंजू बच्चों को ले कर अपने मकान में आ गई. यह 18 साल पहले की बात है. उसी बीच गामा नौकरी से रिटायर हो गया तो उसे झारखंड के बोकारो में बढि़या नौकरी मिल गई, जहां वह अकेला ही रह कर नौकरी करने लगा.

गामा के आने से जहां मंजू और रामाश्रय को मिलने में दिक्कत होने लगी थी, वहीं उस के बोकारो चले जाने के बाद उन का रास्ता फिर साफ हो गया. सूरज और सौरभ बड़े हो गए थे. लेकिन वे स्कूल चले जाते थे तो मंजू घर में अकेली रह जाती थी. उसी बीच रामाश्रय उस से मिलने आता था. मंजू को पता ही था कि रामाश्रय ब्याज पर पैसे देता है. उस के मन में आया कि क्यों न वह भी अपने शारीरिक संबंधों को कैश कराए. वह रामाश्रय से रुपए ऐंठने लगी. उन पैसों को वह 12 प्रतिशत की दर से ब्याज पर उठाने लगी. इसी तरह उस ने रामाश्रय से करीब 15 लाख रुपए ऐंठ लिए.

15 लाख रुपए कोई छोटी रकम नहीं होती. रामाश्रय मंजू से अपने पैसे वापस मांगने लगा. जबकि मंजू देने में आनाकानी करती रही. रामाश्रय को लगा कि उस के पैसे डूबने वाले हैं तो उस ने थोड़ी सख्ती की. किसी तरह मंजू ने 10 लाख रुपए तो वापस कर दिए, लेकिन 5 लाख रुपए उस ने दबा लिए. उस ने कह भी दिया कि अब वह ये रुपए नहीं देगी. इस के बाद रामाश्रय ने उस से पैसे मांगने छोड़ दिए.

12 नवंबर, 2013 की शाम 6 बजे मंजू ने फोन कर के रामाश्रय को अपने घर बुलाया, क्योंकि उस समय वह घर में अकेली थी. उस के दोनों बेटे कहीं घूमने गए थे. घर से निकलते समय रामाश्रय ने पत्नी को बता दिया था कि वह मंजू के यहां हिसाबकिताब करने जा रहा है. उसे लौटने में देर हो सकती है, इसलिए वह उस का इंतजार नहीं करेगी.

जिस समय रामाश्रय मंजू के यहां पहुंचा, सौरभ आ चुका था. उसे देख कर दोनों अचकचा गए. तब रामाश्रय ने उसे बाहर भेजने के लिए कुछ रुपए दे कर कोई सामान लाने को कहा. उस के जाते ही दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. वह वासना की आग ठंडी कर ही रहे थे कि सूरज आ गया. दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजे की झिर्री से झांका तो उसे अंदर से खुसुरफुसुर की आवाज आती सुनाई दी.

सूरज दीवाल के सहारे छत पर चढ़ गया. सीढि़यों से उतर कर वह कमरे में पहुंचा तो मां को रामाश्रय के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख कर उसे गुस्सा आ गया. सूरज को देख कर मंजू हड़बड़ा कर उठी. वह कुछ करती, उस के पहले ही सूरज ने गुस्से में फावड़ा उठा कर रामाश्रय के सिर पर वार कर दिया.

एक ही वार में रामाश्रय का सिर फट गया और वह बिस्तर पर लुढ़क गया. मंजू डर गई. वह हड़बड़ा कर बिस्तर से नीचे कूद गई. तब तक सौरभ भी आ गया. वह भी छत के रास्ते नीचे आया था. रामाश्रय को खून में लथपथ देख कर वह बुरी तरह से डर कर रोने लगा. मंजू ने उसे डांट कर चुप कराया.

जो होना था, सो हो चुका था. तीनों डर गए कि अब उन्हें जेल जाना होगा. पुलिस से बचने के लिए मंजू ने बेटों के साथ मिल कर कमरे के अंदर गड्ढा खोदा और रामाश्रय की लाश को उसी में दबा दिया. इस के बाद अपने एक रिश्तेदार की मदद से सूरज उस की मोटरसाइकिल को थाना झंगहा के अंतर्गत आने वाले नया बाजार के मंदिर के पास खड़ी कर आया. वहां से लौट कर वह उसी दिन पिता के पास बोकारो चला गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने मंजू को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 21 नवंबर, 2013 को पुलिस ने सूरज को हिरासत में ले कर बच्चों की अदालत में पेश किया, जहां से उसे बालसुधार गृह भेज दिया गया.

इस मामले मे मृतक के बेटे राकेश का कहना है कि उस के पिता के मंजू से अवैध संबंध बिलकुल नहीं थे. पैसे लौटाने न पड़ें, इस के लिए उस ने उस के पिता की हत्या की है. यही नहीं, घटना वाले दिन उस के पिता के पास 2 लाख रुपए के चैक और 2 लाख रुपए नकद थे, वे भी गायब हैं. उन का मोबाइल भी नहीं मिला.

कथा लिखे जाने तक न तो मंजू की जमानत हुई थी, न सूरज की. गामा यादव ने उन की जमानत की कोशिश भी नहीं की थी. शायद उन्होंने बेटे और पत्नी को उन के किए की सजा भुगतने के लिए छोड़ दिया है.

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