जीजा साली का जुनूनी इश्क – भाग 1

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के नौबस्ता थाने के अंतर्गत एक कालोनी है खाड़ेपुर. यह कालोनी  कानपुर विकास प्राधिकरण ने मध्यमवर्गीय आवास योजना के तहत विकसित की थी. इसी कालोनी के बी-ब्लौक में जगराम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था.

उस के परिवार में पत्नी मीना सिंह के अलावा 2 बेटियां ममता, पूजा के अलावा एक बेटा राजकुमार था. जगराम सिंह पनकी स्थित एक फैक्ट्री में काम करता था. फैक्ट्री से मिलने वाली तनख्वाह से उस के घर का खर्च आसानी से चल जाता था.

बड़ी बेटी ममता की इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद जगराम सिंह ने उस की शादी कानपुर के कठारा निवासी मनोज से कर दी. मनोज 3 बहनों का एकलौता भाई था. पिता अपनी पुश्तैनी जमीन पर सब्जियां उगाते थे. मनोज उन सब्जियों को टैंपो से नौबस्ता मंडी में थोक में बेच आता था. इस से अच्छाखासा मुनाफा हो जाता था.

मनोज गांव से टैंपो पर सब्जी लाद कर नौबस्ता मंडी लाता था. नौबस्ता से खाडे़पुर कालोनी ज्यादा दूर नहीं थी. इसलिए वह हर तीसरेचौथे दिन ससुराल पहुंच जाता था.

नईनई शादी हुई हो तो दामाद के लिए ससुराल से बेहतरीन कोई दूसरा घर नहीं होता. इस का एक कारण भारतीय परंपरा भी है. दामाद घर आए तो सभी लोग उस के आगमन से विदाई तक पलक पावड़े बिछाए रहते हैं. खूब स्वागतसत्कार होता है. विदाई के समय उपहार भी दिया जाता है. यह उपहार सामान की शक्ल में भी होता है और नकदी के रूप में भी.

मनोज की ससुराल में दिल लगाने, हंसीमजाक और चुहल करने के लिए एक जवान और हसीन साली भी थी पूजा. हालांकि एक साला राजकुमार भी था, मगर मनोज उसे ज्यादा मुंह नहीं लगाता था. उस की कोशिश पूजा के आसपास बने रहने और उस के साथ चुहलबाजी, छेड़छाड़ करते रहने की होती थी. पूजा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. दोनों में खूब पटती थी.

पूजा के घर वाले पूजा और मनोज की चुहलबाजी को जीजासाली की स्वाभाविक छेड़छाड़ मानते थे और उन दोनों की नोकझोंक पर खुद भी हंसते रहते थे. ससुराल वाले मनोज को दामाद कम बेटा अधिक मानते थे. दरअसल मनोज ने अपने कुशल व्यवहार से अपनी सास व ससुर का दिल जीत लिया था. वह उन के घरेलू काम में भी मदद कर देता था. इसी के चलते वह मनोज पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने लगे थे.

मनोज जब ससुराल में ज्यादा आनेजाने लगा तो उस का धंधा भी प्रभावित होने लगा. पिता ने डांटा तो उस के दिमाग से ससुराल का नशा उतरने लगा. जिंदगी की ठोस हकीकत सामने आनी शुरू हुई तो मनोज का ससुराल में जल्दीजल्दी आनाजाना बंद हो गया. हां, फुरसत मिलने पर वह ससुराल में हो आता था.

पत्नी चाहे जितनी खूबसूरत हो, उस का नशा हमेशा नहीं रहता. वह जितनी तेजी से चढ़ता है उतनी ही तेजी से उतरने भी लगता है. शादी के 2 साल बाद ही मनोज को ममता बासी और उबाऊ लगने लगी. पत्नी से मन उचटा तो कुंवारी और हसीन साली पूजा में रमने लगा.

मन नहीं माना तो मनोज ने फिर से ससुराल के फेरे बढ़ा दिए. पर इस बार मनोज का ससुराल आना बेमकसद नहीं था. उस का मकसद थी पूजा. लेकिन ममता को पति के असली इरादे की भनक नहीं थी. वह तो यही समझती थी कि मनोज उस के परिवार का कितना खयाल रखता है, जो वह उस के मातापिता की मदद करने के लिए उस के मायके चला जाता है. पत्नी के इसी विश्वास की आड़ में मनोज अपना मकसद पूरा करने में लगा था.

ससुराल पहुंचने पर मनोज की आंखें साली को ही खोजती रहती थीं, वह पूजा से मौखिक छेड़छाड़ तो पहले से करता था, अब उस ने मौका मिलने पर शारीरिक छेड़छाड़ भी शुरू कर दी थी. पूजा को यह सब अजीब तो लगता था मगर वह जीजा का विरोध नहीं करती थी. वह सोचती थी कि कहीं जीजा बुरा न मान जाएं.

एक दिन मनोज मर्यादा की हद लांघ गया. उस दिन पूजा के मातापिता कहीं गए थे और भाई राजकुमार अपने दोस्तों के साथ घूमने के लिए निकल गया.

घर में केवल पूजा और मनोज ही थे. अच्छा मौका पा कर मनोज ने पूजा को आलिंगबद्ध कर लिया. पूजा उस के चंगुल से छूटने को कसमसाई तो वह उस के गालों पर होंठ रगड़ने लगा. इस के बाद उस ने पूजा की गरदन को गर्म सांसों से सहला दिया.

यह पहला मौका था, जब किसी पुरुष ने पूजा को मर्दाना स्पर्श की अनुभूति कराई थी. मनोज के स्पर्श से वह रोमांच से भर गई. इस के बावजूद किसी तरह उस ने मनोज को अपने से दूर कर दिया. पूजा ने नाराजगी से मनोज को देखते हुए कहा, ‘‘जीजा, पिछले कुछ दिनों से मैं ने नोट किया है कि तुम कुछ ज्यादा ही शरारत करने लगे हो.’’

‘‘तुम ने सुना ही होगा कि साली आधी घर वाली होती है.’’ मनोज ने भी बेहयाई से हंसते हुए कहा, ‘‘तो मैं तुम पर अपना अधिकार क्यों न जताऊं.’’

‘‘नहीं जीजा, यह सब मुझे पसंद नहीं है.’’ वह बोली.

‘‘सच कहता हूं पूजा, तुम ममता से ज्यादा खूबसूरत और नशीली हो.’’ कहते हुए मनोज ने उस का हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रख दिया, ‘‘मेरी बात का यकीन न हो तो इस दिल से पूछ लो, जो तुम्हें प्यार करने लगा है. काश, मेरी शादी ममता के बजाए तुम से हुई होती.’’

‘‘जीजा, तुम हद से आगे बढ़ रहे हो,’’ कह कर पूजा ने हाथ छुड़ाया और वहां से चली गई. मनोज ने उसे रोकने या पकड़ने का प्रयास नहीं किया. वह अपनी जगह पर खड़ा मुसकराता रहा.

पूजा पत्थर हो, ऐसा नहीं था. जीजा की रसीली बातों और छेड़छाड़ से उस के मन में भी गुदगुदी होने लगी थी.

बहरहाल, उस दिन के बाद से मनोज पूजा से जुबानी छेड़छाड़ कम और जिस्मानी छेड़छाड़ ज्यादा करने लगा. अब वह उस का विरोध भी नहीं करती थी. पूजा का अपने जीजा से लगाव बढ़ गया. वह स्वयं सोचने लगी कि शादी जब होगी, तब होगी. क्यों न शादी होने तक जीजा से मस्ती कर ली जाए. परिणाम वही हुआ, जो ऐसे मामलों में होता है.

शादी के पहले ही पूजा ने खुद को जीजा के हवाले कर दिया. इस के बाद तो वह जीजा की दीवानी हो गई. मनोज भी आए दिन ससुराल में पड़ा रहने लगा. रात को अपने बिस्तर से उठ कर वह चुपके से पूजा के कमरे में चला जाता और सुबह 4 बजे अपने बिस्तर पर आ जाता था.

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ – भाग 3

पुलिस ने मुन्ना को दिल दहला देने वाली यातनाएं दे कर जुर्म कबूल करवा लिया कि उस के सोनू व उस की 10 वर्षीय बेटी दिव्या से नाजायज संबंध थे. दिव्या के रेप व मर्डर की बात कबूल करा कर उसे कानपुर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. लेकिन पुलिस की इस कहानी को सोनू भदौरिया ने सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि मुन्ना बेगुनाह है. पुलिस ने उसे झूठा फंसाया है. मीडिया वालों ने मुन्ना लोध की गिरफ्तारी पर संदेह जता कर छापा तो पुलिस तिलमिला उठी.

सोनू भदौरिया व उस की बेटी दिव्या के चारित्रिक हनन तथा मुन्ना लोध को झूठा फंसाने को ले कर शहर की जनता में फिर से गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

महिला मंच की नीलम चतुर्वेदी, अनीता दुआ, पार्षद आरती दीक्षित, गीता निषाद, श्रम संगठन के ज्ञानेश मिश्रा तथा स्कूली बच्चों ने जगहजगह धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिए. बड़े प्रदर्शन से पुलिस बौखला गई और उस ने प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं. पुलिस ने उन पर शांति भंग करने का मुकदमा भी दर्ज कर दिया.

एसपी (ग्रामीण) लालबहादुर व सीओ लक्ष्मीनारायण की शासन में पकड़ मजबूत थी. इसी का लाभ उठा कर उन्होंने पुलिस बर्बरता कायम रखी. सोनू भदौरिया की मदद को जो भी आगे आया, पुलिस अफसरों ने उसे प्रताडि़त किया और झूठे मुकदमे में फंसा दिया. पुलिस रात में दरवाजा खटखटा कर लोगों को डराने लगी.

महिला दरोगा शालिनी सहाय सोनू भदौरिया को धमकाती कि वह केस वापस ले ले. साथ ही सोनू को शहर छोड़ कर गांव चली जाने का भी दबाव बनाया गया. वह उस की बेटी दीक्षा से कहती थी कि वह मां से कहे कि उसे शहर में नहीं गांव में जा कर रहना है.

सोनू के मकान मालिक राजन शुक्ला को भी पुलिस ने धमकाया कि वह सोनू को मकान से निकाल दे. पुलिस ने राजन शुक्ला, उन के भतीजे तथा अन्य किराएदारों को भी पूछताछ के नाम पर प्रताडि़त किया.

समाचार पत्रों ने भी निभाई भूमिका

स्थानीय समाचार पत्रों ने पुलिस की इस दमन नीति को सुर्खियों में छापना शुरू किया तो पुलिस अफसरों की भृकुटि तन गईं. उन्होंने अखबारनवीसों को चेताया कि पुलिस की छवि खराब न करें अन्यथा परिणाम अच्छा नहीं होगा.

लेकिन पुलिस की धमकी से अखबारनवीस डरे नहीं, बल्कि उन्होंने दिव्या कांड व पुलिस की दमन नीति को ले कर कानपुर शहर व प्रदेश की कानूनव्यवस्था बिगड़ने के खतरे का समाचार प्रकाशित किया.

इस के बाद यह मामला सड़क से संसद तथा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक गूंजा. सांसद राजाराम पाल ने दिव्या कांड का मामला संसद में उठाया तो कानपुर शहर के विधायकों ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को इस मामले से अवगत कराया.

राज्यपाल ने प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को चिट्ठी लिखी. इस के बाद जब यह मामला मायावती के संज्ञान में आया तो उन्होंने त्वरित काररवाई करते हुए 23 अक्तूबर, 2010 को यह मामला लखनऊ सीबीसीआईडी को सौंप दिया. यही नहीं मायावती ने दिव्या कांड को उलझाने वाले तथा आरोपियों की मदद करने वाले पुलिस अफसरों पर भी बड़ी काररवाई की.

डीआईजी प्रेम प्रकाश का शासन ने स्थानांतरण कर दिया और उन के खिलाफ जांच बैठा दी गई. एसपी (ग्रामीण) लाल बहादुर, सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्र तथा इंसपेक्टर अनिल कुमार को तत्काल निलंबित कर उन के खिलाफ साक्ष्य छिपाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

आखिर ऊंट आया पहाड़ के नीचे

मामला सीबीसीआईडी के हाथ में आया तो इंसपेक्टर ए.के. सिंह ने अपनी टीम के साथ बारीकी से जांच शुरू की. उन्होंने स्कूल जा कर छानबीन की और खून आदि के नमूने एकत्र किए. इस के बाद मृतका दिव्या के आंतरिक वस्त्र और स्कर्ट में मिले स्पर्म का नमूना लिया. स्पर्म ब्लड के मिलान के लिए जांच अधिकारी ए.के. सिंह ने सीएमएम कोर्ट में 13 लोगों का नमूना लेने की अरजी डाली.

अरजी मंजूर होने पर 9 नवंबर, 2010 को सीबीसीआईडी ने अदालत के आदेश पर चंद्रपाल वर्मा, मुकेश वर्मा, पीयूष वर्मा, संतोष व मुन्ना सहित 13 संदिग्धों के रक्त के नमूने सीएमएम अदालत में लिए. पीयूष, मुकेश, संतोष व चंद्रपाल का स्पर्म नमूना ले कर लखनऊ स्थित एफएसएल लैब भेजा गया. जांच में पीयूष वर्मा के स्पर्म का नमूना दिव्या के स्कर्ट से मिले स्पर्म से मेल हो गया.

सीबीसीआईडी ने अपनी जांच में पीयूष वर्मा, मुकेश वर्मा, चंद्रपाल वर्मा तथा संतोष वर्मा को मामले में दोषी ठहराया, जिस में पीयूष वर्मा को मुख्य आरोपी तथा 3 अन्य को साक्ष्य छिपाने तथा गैरइरादतन हत्या का ठहराया, जबकि मुन्ना लोध को निर्दोष बताया गया. विवेचना के दौरान सीबीसीआईडी को मुन्ना के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला.

सीबीसीआईडी ने धारा 196 (अपराध का होना न पाया जाना) के तहत कोर्ट में अरजी दी. जिस के आधार पर मुन्ना के वकील शिवाकांत दीक्षित ने कोर्ट में बहस की. अदालत ने उसे दोषमुक्त करार दे कर जेल से छोड़ने का आदेश दिया.

11 जनवरी, 2011 को सीबीसीआईडी ने डीएनए टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर पीयूष वर्मा के खिलाफ भादंवि की धारा 377, 302, 201, 109, 376(2)(एफ), 202, 511 के तहत कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की. वहीं चंद्रपाल वर्मा, मुकेश वर्मा और संतोष के विरुद्ध भादंवि की धारा 304ए, 201 के तहत कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई.

आरोपियों ने अपने बचाव व जमानत के लिए कानपुर कोर्ट के चर्चित अधिवक्ता गुलाम रब्बानी को नियुक्त किया, जबकि सोनू भदौरिया ने केस को मजबूती से लड़ने के लिए अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया व संजीव सिंह सोलंकी को नियुक्त किया.

अजय सिंह ने आर्थिक रूप से कमजोर सोनू का केस नि:शुल्क लड़ा. गुलाम रब्बानी ने आरोपियों की जमानत हेतु कोर्ट में जम कर बहस की. दूसरी ओर अभियोजन पक्ष के वकील अजय सिंह ने उन के तर्कों का विरोध किया. दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद चंद्रपाल वर्मा, मुकेश वर्मा, पीयूष व संतोष ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

हाईकोर्ट ने अंतत: 2 साल जेल में रहने के बाद 19 अप्रैल, 2012 को चंद्रपाल वर्मा, मुकेश व संतोष को जमानत दे दी. लेकिन पीयूष को जमानत नहीं मिली.

इस के बाद इस मामले की कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. सीबीसीआईडी के अधिवक्ता नागेश कुमार दीक्षित ने कोर्ट के सामने मामले को रेयरेस्ट औफ रेयर बताया और आरोपियों के लिए फांसी की सजा की मांग की.

अदालत ने खूब निभाई अपनी भूमिका

अभियोजन पक्ष ने इस मामले में 39 गवाह पेश किए. बचावपक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता गुलाम रब्बानी ने कोर्ट में 39 गवाहों से 115 पेज की लिखित बहस पेश की. वहीं जवाब में पीडि़त पक्ष (अभियोजन) की ओर से सीबीसीआईडी के वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी नागेश कुमार दीक्षित व पीडि़ता के अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया व संजीव सिंह सोलंकी ने मात्र 12 पेज की संक्षिप्त बहस में सभी तर्कों को खारिज कर दिया.

एडीजे द्वितीय ज्योति कुमार त्रिपाठी ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा, ‘‘बचाव पक्ष के सभी तर्क निराधार हैं. यह एक गंभीर अपराध है. ऐसे अपराध रेयरेस्ट औफ रेयर की ही श्रेणी में आते हैं. ऐसे अपराध और कुकृत्य से समाज में दहशत फैलती है, इसलिए इस अपराध के अभियुक्तों को किसी भी सूरत में राहत नहीं दी जा सकती.’’

इसी के साथ ही उन्होंने दुष्कर्म और हत्या के आरोपी पीयूष वर्मा को आजीवन कारावास की सजा तथा 75 हजार रुपए का जुरमाना भरने की सजा सुनाई.

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सहअभियुक्त मुकेश वर्मा व संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी को गैर इरादतन हत्या व अपराध की सूचना न देने का दोषी मानते हुए एक साल 3 महीने की सजा तथा 21 हजार रुपए के जुरमाने की सजा दी गई. साक्ष्य के अभाव में अदालत ने चंद्रपाल वर्मा को बरी कर दिया गया. माननीय जज ने जुरमाने की आधी रकम पीडि़त पक्ष को देने का आदेश दिया.

दिव्या रेप मर्डर में फैसला आने में 8 साल का समय लगा. इस का कारण गवाहों का अधिक होना था. कभी गवाह के न आने तो कभी आने पर भी गवाही न होने के कारण तारीख पर तारीख लगती रही. यह मुकदमा 4 कोर्टों में ट्रांसफर हुआ. सुनवाई के दौरान 7 जज बदले.

अंत में 5वीं कोर्ट के एडीजे द्वितीय ज्योति कुमार त्रिपाठी ने अंतिम बहस पूरी की और फैसला सुनाया. फैसले के बाद पीयूष वर्मा को जेल भेज दिया गया.

कोर्ट के फैसले से दिव्या की मां सोनू भदौरिया खुश नहीं है. उस का कहना है कि पीयूष वर्मा को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी. अन्य आरोपियों को भी कम सजा मिली है. वह कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपियों को अधिक सजा दिलाने के लिए हाईकोर्ट की शरण लेगी और अपने अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया के मार्फत अपील करेगी.

—कथा कोर्ट के फैसले तथा लेखक द्वारा एकत्र की गई जानकारी पर आधारित

डुप्लीकेट दवाओं का सरगना

उड़ीसा में नकली दवाएं बरामद होने के बाद पता चला कि नकली दवाओं की खेप वाराणसी से देश के अलगअलग क्षेत्रों में भेजी जाती हैं. इस के पुख्ता सबूत मिलने के बाद से एसटीएफ की टीम जुट गई थी. पिछले कुछ महीनों से एसटीएफ की टीम नकली दवाओं के गैंग पर नजर भी बनाए हुए थी कि इसी बीच गुरुवार को नकली दवाओं के गैंग के सरगना अशोक कुमार के वाराणसी के सिगरा थाना क्षेत्र की चर्च कालोनी में मौजूद होने की पुख्ता जानकारी मिली.

ऐसे में टीम ने घेराबंदी कर के अशोक को एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में बुलंदशहर के सिकंदराबाद थाना क्षेत्र की टीचर्स कालोनी के रहने वाले अशोक कुमार ने कई खास जानकारियां दीं. उस की निशानदेही पर चर्च कालोनी के एक मकान में रखी 108 पेटी नकली दवाएं बरामद की गईं. इस के अलावा 4 लाख 40 हजार रुपए नकद, फरजी बिल, अन्य दस्तावेज तथा एक फोन बरामद किया.

उस से पूछताछ में मंडुवाडीह थाना क्षेत्र के महेशपुर लहरतारा स्थित गोदाम में भारी मात्रा में नकली दवाएं होने की जानकारी मिली तो वहां से भी एसटीएफ ने गोदाम में छापा मार कर 208 पेटी नकली दवाएं बरामद कर लीं, जो अलगअलग 316 कार्टन में पैक थीं.

उत्तर प्रदेश के शहर वाराणसी का कैंट यानी शहर का सब से व्यस्त इलाका, कैंट रेलवे स्टेशन, रोडवेज बस डिपो यहीं मौजूद होने से नाकेनाके पर पुलिस का यहां पहरा भी होता है, लेकिन 2 मार्च, 2023 को अचानक बड़ी संख्या में पुलिस बल की दौड़धूप, पुलिस के वाहनों के बजते सायरन बरबस ही लोगों को सोचने को मजबूर कर रहे थे कि आखिरकार माजरा क्या है?

फिर खयाल आया कि हो न हो कोई वीवीआईपी शहर में आया हो, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई हो? क्योंकि यहां अकसर वीआईपी आते रहते हैं. बातों और कयासों का दौर चल ही रहा था कि तभी शहर के कुछ हिस्सों में एसटीएफ की छापेमारी की खबर फैलने लगी.

तभी कैंट चौराहे पर तैनात पुलिस वाहन में लगा वायरलेस घनघना उठा. दूसरी ओर से आवाज आई, ”हर आनेजाने वाले वाहनों की गहनता से जांच कराई जाए, कोई भी संदिग्ध व्यक्ति या वाहन नजर आए तो उसे रोका जाए.’‘

इतना सुनते ही पुलिस जीप का चालक बुदबुदाया, ”आज भी सुकून से रोटी मिलनी तो दूर चाय भी नसीब नहीं होती दिखाई दे रही है…’‘ बड़बड़ाते हुए उस ने लहरतारा की ओर गाड़ी घुमा दी.

यह बात 2 मार्च, 2023 की है. दरअसल, वाराणसी शहर के मंडुआडीह थाना क्षेत्र के लहरतारा, सिगरा थाना क्षेत्र सहित कैंट के कई इलाकों में एसटीएफ टीम की रेड पड़ गई थी. एसटीएफ ने कैंट इलाके के रोडवेज के पीछे व लहरतारा, महेशपुर में छापेमारी की, जहां उसे पेटेंट दवा कंपनियों के नाम की भारी तादाद में एलोपैथी दवाएं मिली थीं, जिसे देख टीम में शामिल जवानों की आंखें फटी की फटी रह गई थीं. सभी के मुंह से निकल पड़ा था, ”ओफ! इतना बड़ा नकली दवाओं का रैकेट…’‘

खैर, एसटीएफ टीम ने इस की फौरन सूचना अपने उच्चाधिकारियों को देने के साथ ही मौके से नकली दवा कारोबार के सरगना को मौके से गिरफ्तार कर लिया, जिन की निशानदेही पर टीम ने कैंट रोडवेज के पीछे चर्च कालोनी व ट्रांसपोर्ट क्षेत्र लहरतारा के महेशपुर से भारी तादाद में एलोपैथी नकली दवाएं बरामद कीं, जिन की कीमत 7.5 करोड़ बताई गई. विभिन्न नामीगिरामी कंपनियों के नाम पर बनी ये नकली दवाएं 316 बड़े डिब्बों में पैक थीं.

पता चला कि नकली दवाओं का कारोबार करने वाले गिरोह का गिरफ्तार सरगना अशोक कुमार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का निवासी है. उस ने पूछताछ में वाराणसी के 3 लोगों समेत 12 लोगों के नामों का खुलासा किया था, जो इस नकली दवा कारोबार से जुड़े थे.

पुलिस के मुताबिक नकली दवा कारोबार की जड़ें काफी गहरी होने के साथसाथ देश के कई राज्यों से होते हुए पड़ोसी देशों बांग्लादेश तक में अपनी गहरी जड़ें जमा चुकी हैं, जिन की कहानी कुछ इस प्रकार से है—

देश में दवा का काफी बड़ा कारोबार है, अमूमन आज हर एक व्यक्ति की निर्भरता दवाओं पर हो गई है. ऐसे में देश में नकली दवा का कारोबार भी तेजी से न केवल पनपा है, बल्कि इन की जड़ें भी काफी गहरी हो चली हैं. कुछ महीने पहले उड़ीसा में बारगढ़ व झाडड़ूकड़ा में नकली दवा के बरामद होने और उस के तार वाराणसी से जुड़े होने की जानकारी होने पर वाराणसी पुलिस सहित एसटीएफ की टीम सक्रिय हो गई थी.

उड़ीसा की घटना के बाद सक्रिय हुए वाराणसी एसटीएफ प्रभारी विनोद सिंह काफी दिनों से नकली दवाओं के कारोबार की छानबीन और सरगना को दबोचने के लिए जाल बिछाए हुए थे. 2 मार्च, 2023 को वह अपनी टीम के साथ बैठ कर इसी पर रणनीति बना रहे थे कि कैसे व किस प्रकार से इस कारोबार के साथ गैंग का खुलासा करना है कि तभी उन का एक विश्वासपात्र साथी सैल्यूट मारते हुए उन के पास आया और धीरे से उन के कान में कुछ बुदबुदाने लगा.

उस की बात सुनते ही खुशी के मारे एसटीएफ प्रभारी विनोद सिंह उछल कर बोल पड़े, ”फिर देर किस बात की है, तुम पहुंच कर नजर रखो, मैं भी पहुंच रहा हूं.’‘

इतना कह कर विनोद सिंह ने फोन कर अपने उच्चाधिकारियों को इस सूचना से अवगत कराया. उन के दिशानिर्देशों के बाद वह भी पुलिस टीम के साथ निकल गए.

कौन था नकली दवाओं का सरगना

नकली दवाओं का कारोबारी अशोक कुमार पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था. भारी मात्रा में नकली दवा बरामद होने के बाद भी गैंग का सरगना अशोक कुमार एसटीएफ टीम को बरगलाने के साथसाथ खुद को फंसाए जाने की बात कहता रहा. वह बारबार बस यही कह रहा था,  ”साहब, मैं बेकुसूर हूं, इन दवाओं से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. दूसरे लोगों ने मुझे फंसाया है.’‘

”ठीक है तो तुम्हीं बताओ कि किन लोगों ने तुम्हें फंसाया है?’‘

इस सवाल पर वह पूरी तरह से एसटीएफ टीम से नजरें बचा कर नीचे की ओर देखने लगा. उसे बोलते नहीं बन रहा था कि वह अब क्या सफाई दे.

सही जानकारी देने पर पुलिस ने उसे बख्श देने की बात कही तो वह पूरी तरह से टूट गया और रट्टू तोते की तरह बोलने लगा था. उस ने कई नामों का खुलासा किया, जो इस गोरखधंधे में उस के साथी थे.

उन में रोहन श्रीवास्तव (प्रयागराज), रमेश पाठक (पटना), दिलीप (बिहार), अशरफ (पूर्णिया), लक्ष्मण (हैदराबाद), नीरज चौबे शिवपुर (वाराणसी), डा. मोनू, रेहान, बंटी, ए.के. सिंह, शशांक मिश्रा आशापुर (वाराणसी), अभिषेक कुमार सिंह न्यू बस्ती परासी (सोनभद्र) थे.

पुलिस के मुताबिक पकड़े गए अशोक कुमार ने बताया कि वह इन्हीं साथियों की मदद से अपने कमरे व गोदाम पर दवाएं स्टोर करता था. बसों पर माल रखने वाले कुलियों के द्वारा बसों, ट्रांसपोर्ट के माध्यमों से कोलकाता, उड़ीसा, बिहार, हैदराबाद व उत्तर प्रदेश के वाराणसी, आगरा, बुलंदशहर में दवा कारोबार करने वालों को सप्लाई किया करता था.

जांच में पता चला कि नकली दवा का धंधा करने वाले गिरोह के सरगना अशोक कुमार ने वर्ष 1987 में बुलंदशहर के किसान इंटरकालेज से हाईस्कूल की पढ़ाई की, लेकिन फेल होने पर पढ़ाई छोड़ दी. इस के बाद गद्ïदे की फैक्ट्री में मजदूरी करने लगा था.

वर्ष 2003 में मजदूरी छोड़ कर 7 साल आटोरिक्शा चलाया पर फायदा नहीं होने के कारण फिर से गद्ïदे की कंपनी में नौकरी करने लगा और लगातार 10 साल तक काम किया. काम के बदले उसे हर महीने 12 हजार रुपए मिलते थे.

एक बार फिर से नौकरी छूट गई और वह फिर से आटो चलाने लगा. इसी दौरान उस की मुलाकात बुलंदशहर के ही नीरज से हुई. नीरज एलोपैथी की नकली दवाओं का काम करता था. नीरज से मिल कर अशोक अपने आटो से नकली दवाओं की सप्लाई करने लगा. यहीं से उसे इस काले कारोबार के बारे में जानकारी हुई.

शुरू में वह नीरज से ही थोड़ीबहुत नकली दवाएं खरीद कर स्थानीय झोलाछाप डाक्टरों को बेचने लगा था. कहते हैं कि आमदनी होने पर व्यक्ति की हसरतें भी बढ़ने लगती हैं, कुछ ऐसा ही अशोक के साथ भी हुआ. नकली दवा का कारोबार चलने पर उस की आमदनी भी बढ़ने लगी थी. जब आमदनी बढ़ी तो लालच भी बढ़ने लगा.

वर्ष 2019 में अमरोहा (यूपी) में नीरज की बेची गई नकली दवा पकड़ी गई थी. इस में नीरज का नाम आने के बाद पुलिस ने नीरज को गिरफ्तार कर लिया था.

इस मामले में नीरज के पिता ने पुलिस वालों के ही खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया था, जिस के बाद अशोक वहां से भाग कर 3 साल से वाराणसी में आ कर कैंट रोडवेज बस डिपो के पीछे चर्च कालोनी में किराए पर रहने लगा.

इस के बाद उस ने लहरतारा में किराए पर गोदाम ले कर हिमाचल प्रदेश से नामीगिरामी पेटेंट दवा कंपनियों के नाम की नकली दवाएं बनाने वालों पंचकूला के अमित दुआ, हिमाचल प्रदेश के बद्ïदी के सुनील व रजनी भार्गव से संपर्क कर नकली दवाएं, फरजी बिल्टी व बिल से ट्रांसपोर्ट के माध्यम से मंगाने लगा था.

एसटीएफ टीम के मुताबिक बाहर से दवाएं मंगा कर अशोक रोडवेज बसों में सामान रखने वाले कुलियों के माध्यम से उन्हें प्रदेश के अलगअलग जिलों और अन्य राज्यों में वाराणसी में रह कर भेजा करता था.

नकली दवाओं की आपूर्ति से अशोक को तगड़ा मुनाफा होने लगा था. जिस नकली दवा पर कीमत 100 रुपए दर्ज होती थी, वह उसे हिमाचल प्रदेश से 30 रुपए में मिलती थी. उसे वाराणसी तक लाने पर लगभग 10 रुपए खर्च होते थे. इन दवाओं पर 35 से 40 फीसदी की बचत हो जाती थी.

अशोक कुमार द्वारा नकली दवा कारोबार में शामिल होने की बात स्वीकार कर लेने और उस की निशानदेही पर एसटीएफ प्रभारी विनोद कुमार सिंह ने ड्रग इंसपेक्टर अमित बंसल की मौजूदगी में बरामद दवाओं को सील किया. अशोक कुमार के खिलाफ सिगरा थाने में भादंसं की धारा 420, 468, 471 आदि के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया है.

दूसरी ओर गिरफ्तार अशोक कुमार ने पूछताछ में वाराणसी के 3 लोगों समेत दूसरे 12 लोगों के नामों का खुलासा किया, जो इस नकली दवा कारोबार के धंधे के साझेदार थे. खबर मिलने पर वे सभी अंडरग्राउंड हो गए थे, जिन्हें पुलिस तलाश रही थी.

नकली दवाओं के साथ फरजी मैडिकल रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में महज नकली दवाओं का ही कारोबार नहीं, बल्कि फरजी मैडिकल रिपोर्ट तैयार करने का भी काम किया जाता है. अगस्त 2023 में ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जिस में 2 सरकारी डाक्टरों को फौरन गिरफ्तार भी कर लिया गया था.

दरअसल, जून महीने में दलित समुदाय के सदस्यों पर हमला करने के आरोप में सुरेंद्र विश्वकर्मा और अमित विश्वकर्मा के खिलाफ 2 मुकदमे दर्ज हुए थे. शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि हमले में उन्हें गंभीर चोटें आईं.

सोनभद्र जिला अस्पताल में तैनात डाक्टरों की मेडिको-लीगल रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई थी. जांच के बाद पुलिस ने सोनभद्र के जिला अस्पताल में तैनात 2 डाक्टरों को पैसे के बदले फरजी मैडिकल रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में गिरफ्तार किया.

गिरफ्तार किए गए डाक्टरों की पहचान डा. पुरेंदु शेखर सिंह और डा. दयाशंकर सिंह के रूप में की गई. दोनों की उम्र 50 वर्ष के आसपास थी. उन पर भादंसं की धारा 420 (धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति की डिलीवरी के लिए प्रेरित करना), 468 (धोखाधड़ी के उद्ïदेश्य से जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रौनिक रिकौर्ड को असली के रूप में उपयोग करना) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था.

सोनभद्र के सीओ राहुल पांडे के मुताबिक चूंकि सोनभद्र वाराणसी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम अदालत के क्षेत्राधिकार में आता है, ऐसे में गिरफ्तार दोनों डाक्टरों को वाराणसी की एक अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

दोनों मामलों की जांच के दौरान सुरेंद्र और अमित ने कहा कि उन पर झूठे आरोप लगाए गए हैं. उन्होंने यह भी दावा किया कि शिकायतकर्ताओं को कोई चोट नहीं आई थी. सुरेंद्र और अमित ने दावा किया कि जिला अस्पताल के डाक्टरों द्वारा कथित तौर पर झूठा मेडिको-लीगल तैयार किया गया था.

अपने दावे के समर्थन में सुरेंद्र और अमित ने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने जिला अस्पताल से अपना मैडिकल परीक्षण कराया और बताया कि उन के शरीर पर चोट के झूठे निशान हैं.

वहीं, उन्होंने दूसरे अस्पताल से अपनी मैडिकल जांच कराई, जिस में कहा गया कि उन के शरीर पर कोई चोट नहीं पाई गई है. उन्होंने दावा किया कि कथित तौर पर जिला अस्पताल के कर्मचारियों को पैसे दे कर झूठी मैडिकल रिपोर्ट हासिल की गई.

दोनों रिपोर्टों के आधार पर, अगस्त में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जिस में कहा गया था कि अस्पतालों में झूठी मैडिकल रिपोर्ट तैयार की जा रही थी. जिस की शिकायत के बाद वाराणसी भ्रष्टाचार इकाई ने 2 डाक्टरों को गिरफ्तार किया.

ऐसे बच सकते हैं नकली दवाओं से

डा. ए.के. सिन्हा, वरिष्ठ चिकित्सक, मंडलीय अस्पताल, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश

देश में दवाओं का एक लंबा कारोबार है. किसी आम व्यक्ति के बस की बात नहीं है कि वह आसानी से

दवाओं की पहचान कर सके. फिर भी जहां तक हो सके, जेनेरिक दवाएं और चिकित्सक के परामर्श, प्रतिष्ठित मैडिकल दुकान से ही लें, साथ ही साथ दवा का बिल भी लेना न भूलें. ताकि दवाओं के गलत और नकली होने की दशा में उस की पहचान हो सके.

मिर्जापुर मंडलीय अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डा. ए.के. सिन्हा का मानना है कि प्रत्येक तीमारदार और मरीज को डाक्टर द्वारा लिखी हुई दवाओं का ही सेवन करना चाहिए और प्रतिष्ठित दुकानों से ही दवा वह भी रसीद के साथ लेनी चाहिए. इस से नकली दवाओं के जाल में फंसने से काफी हद तक बचा जा सकता है.

वह कहते हैं कि अकसर लोग सस्ती दवा के चक्कर में बिना डाक्टरी परामर्श के ही दवा लेने के साथ ही इस का सेवन भी करना शुरू कर देते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो होता ही है. यह जोखिम के साथसाथ जेब पर भी भारी पड़ता है.

वह कहते हैं कि देश में मैडिकल सिस्टम व्यापक पैमाने पर दिनप्रतिदिन व्यापक रूप लेता जा रहा है, ऐसे में कुछ लोग चंद पैसों के लिए जीवनरक्षक दवाओं की आड़ में नकली दवाओं का कारोबार कर लोगों की जान से खिलवाड़ करते आ रहे हैं. ऐसे लोगों पर कठोरतम काररवाई होनी चाहिए, ताकि दोबारा कोई इस प्रकार का धंधा करने का साहस तो क्या सोचने की भी हिम्मत न कर सके.

पैरामैडिकल फ्रेंचाइजी से भरी तिजोरी

इस फरवाड़े का जन्म 1998 में हुआ, जिस की नींव आगरा के लोटस इंस्टीट्यूट में पड़ी थी. लोमड़ी से भी शातिर दिमाग वाले पंकज पोरवाल ने मैडिकल लाइन में अपना पहला कदम रखा और आयुष पैरामैडिकल काउंसिल औफ इंडिया की नींव रखी. पंकज पोरवाल ने सन 2013 में दिल्ली के एनसीबी चिट फंड संस्थान से अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट पैरामैडिकल का रजिस्ट्रैशन कराया.

अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट पैरामैडिकल की फ्रेंचाइजी लेने के लिए लोगों का तांता लगने लगा. एक फ्रेंचाइजी के लिए 3 से 4 लाख रुपए तय हुआ था. रेवड़ी की तरह फ्रेंचाइजी बांटने का काम उत्तर प्रदेश से शुरू किया गया था. जांचपड़ताल में पता चला कि फरजी पैरामैडिकल बोर्ड के जरिए उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि बिहार, उत्तराखंड और पंजाब समेत कुल 427 फरजी कालेज खोले गए. फ्रेंचाइजी के नाम पर मोटी रकम वसूली गई.

उस दिन 10 सितंबर, 2023 की तारीख थी. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर ने कैंट सर्किल के एएसपी (ट्रेनी) मानुष पारिख की अगुवाई में एक टीम को इस गोरखधंधे के मुख्य आरोपी पंकज पोरवाल को गिरफ्तार करने के लिए आगरा के शाहगंज थाने रवाना किया था.

दरअसल, गोरखपुर जिले के चौरीचौरा के रहने वाले विजय प्रताप सिंह ने जुलाई 2023 में अदालत में सीआरपीसी की धारा 156 (3) के अंतर्गत एक वाद दाखिल किया था.

कोर्ट में दाखिल वाद में उन्होंने आरोप लगाया था कि साल 2020 में उस ने पंकज पोरवाल को करीब साढ़े 3 लाख रुपए दे कर अब्दुल कलाम पैरामैडिकल इंस्टीट्यूट की फ्रेंचाइजी ली थी और कुशीनगर जिले के हाटा कस्बे में जननी पैरामैडिकल नर्सिंग साइंस कालेज के नाम पर उसे संचालित करता रहा.

बाद के दिनों में पता चला कि उस के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है. उस ने जो फ्रेंचाइजी पंकज पोरवाल से ली थी, वो फरजी निकला. फिर उस ने कसया थाने में डायरेक्टर पंकज पोरवाल के खिलाफ एक तहरीर दी, जिस का परिणाम यह निकला था कि पुलिस ने उस का मुकदमा दर्ज करने के बजाय उसे ही जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया था.

जेल से जमानत पर छूटने के बाद विजय प्रताप सिंह ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था और कोर्ट के माध्यम से चौरीचौरा थाने में डायरेक्टर पंकज पोरवाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

उसी मुकदमे के आधार पर एसएसपी ग्रोवर ने मामले की जांच करवाई तो घटना सच पाई गई और आरोपी पंकज पोरवाल को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस की टीम 10 सितंबर, 2023 को आगरा भेजी थी. इस मामले की जांच गोरखपुर जिले के गुलरिहा थाने के एसएचओ अतुल कुमार को सौंपी गई थी.

एसएचओ अतुल कुमार पुलिस टीम के साथ 10 सितंबर, 2023 को आरोपी पंकज पोरवाल को गिरफ्तार करने के लिए रवाना हो गए थे. अगले दिन वह पुलिस टीम के साथ आगरा के शाहगंज थाने पहुंचे और वहां के थानेदार समीर सिंह से पूरी बात बता कर अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट पैरामैडिकल के डायरेक्टर आरोपी पंकज पोरवाल को गिरफ्तार कराने में सहयोग मांगा तो वह सहर्ष तैयार हो गए.

अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट पैरामैडिकल का औफिस 15 गणेश नगर, सुचेता, आगरा में स्थित था. संयुक्त पुलिस टीम ने अपनी कार्यशैली अति गोपनीय रखी ताकि भ्रष्ट पुलिस को किसी बात का पता न चले और वह सीधे तौर पर आरोपी को कोई लाभ न पहुंचा सके. इसी के बाद इंस्टीट्यूट पर दबिश डालने की योजना बनी थी.

यह मात्र संयोग ही था. डायरेक्टर पंकज पोरवाल को औफिस आ कर बैठे मुश्किल से 20 मिनट ही बीते होंगे कि पुलिस टीम आ धमकी और पंकज पोरवाल को गिरफ्तार कर लिया. उस के औफिस को पूरी तरह से खंगाला. औफिस में रखे उस के लैपटाप और ड्राअर में रखे समस्त डाक्यूमेंट्स अपने कब्जे में ले लिए. उस के बाद पुलिस आगरा से गोरखपुर के लिए रवाना हो गई.

12 सितंबर, 2023 को गुलरिहा पुलिस आरोपी पंकज पोरवाल को गुलरिहा थाने ले कर पहुंची और इस की जानकारी इंसपेक्टर ने एएसपी मानुष पारिख को दे दी.

कौन था इस गोरखधंधे का मास्टरमाइंड

सूचना पा कर एएसपी मानुष पारिख गुलरिहा थाने पहुंच गए. सामने एक कुरसी पर खुद बैठे और दूसरी कुरसी पर पंकज को बैठा दिया. फिर उन्होंने उस से सख्ती से पूछताछ करनी शुरू की. एएसपी पारिख के तीखे सवालों से पंकज बुरी तरह कांपने लगा था. वह समझ गया कि उस का बचना अब मुश्किल है. बेहतर यही होगा कि उन के सवालों का जवाब बिना किसी हीलाहवाली के दे दे.

आखिरकार, पंकज पोरवाल एएसपी के सामने टूट गया और अपना जुर्म कुबूल करते हुए कहा, ”हां सर, ये सच है कि फरजी पैरामैडिकल का बड़ा कारोबार मैं ने साथियों के साथ मिल कर चलाया था. मेरे इस कारोबार में मेरे कई लोग बराबर के भागीदार थे. मैं ने और मेरे साथियों ने मिल कर 3 से 4 लाख रुपए ले कर प्रदेश के कई जिलों में 14 फरजी कालेजों की फ्रेंचाइजी दी है.’’

इस के बाद वह एकएक कर सारी कहानी विस्तारपूर्वक बताता चला गया. जिसे सुन कर पुलिस अधिकारियों के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. समाज में कैसेकैसे शातिर लोग छिपे हुए हैं, जिन्हें देख कर कोई कह नहीं सकता है कि इन समाज के खतरनाक जालसाजों से कैसे पेश आना चाहिए? जो अपने निजी स्वार्थ के चलते हजारों विद्यार्थियों के जीवन को गर्त में झोंकने में तनिक भी नहीं झिझके.

खैर, एएसपी पारिख ने आरोपी पंकज से पूछताछ करने के बाद पूरी जानकारी पुलिस कप्तान डा. गौरव ग्रोवर को दी. एसएसपी ग्रोवर ने भी अपने स्तर से पूछताछ की. आरोपी का बयान सुन कर वे भी चौंके बिना नहीं रह सके. अगले दिन 13 सितंबर को एसएसपी ग्रोवर ने पुलिस लाइन में प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की.

पत्रकारवार्ता के दौरान एसएसपी गौरव ग्रोवर ने पत्रकारों को पंकज पोरवाल के गोरखधंधे की जानकारी दी. आरोपी पोरवाल ने निर्भीक हो कर पत्रकारों के सवालों का जबाव दिया. बाद में पुलिस ने आरोपी को अदालत में पेश कर केंद्रीय जेल बिछिया, गोरखपुर भेज दिया.

इस के बाद पुलिस उस के अन्य सहयोगियों सुरेंद्र बाबू गुप्ता (पिता), इंदीवर पोरवाल (भाई), कंचन पोरवाल (पत्नी), जयवीर प्रसाद पोरवाल (चाचा), दोस्तों नरेश कुमार, कमल कांत, सुरेंद्र कुमार, दर्शन कुमार खत्री, मोहित कुमार, अनिरुद्ध कुमार, निखिल कुमार, कुलदीप वर्मा और प्रेमचंद और महिला मित्र रुचि गुप्ता की तलाश में जुट गई, जिस में कंचन पोरवाल को छोड़ कर सभी आरोपी सलाखों के पीछे भेज दिए गए थे.

पुलिस पूछताछ में आरोपी पंकज पोरवाल द्वारा दिए गए बयान से कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

55 वर्षीय पंकज पोरवाल मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शहर आगरा के शाहगंज थानाक्षेत्र के सुचेता गांव का रहने वाला था. सुरेंद्र बाबू गुप्ता के 2 बेटों में पंकज बड़ा था. वह बेहद होशियार और उतना ही परिश्रमी भी था. यही नहीं वह पढ़ालिखा भी था.

वह अपने जीवन में अपनी मेहनत से इतना पैसा कमाना चाहता था कि लोग उस की गिनती देश के एक धनाढ्य के रूप में करें. पर कैसे? इसी जद््दोजेहद में वह दिनरात जुटा रहा. आखिरकार उस ने रास्ता निकाल ही लिया, वह रास्ता अपराध की डगर से हो कर जाता था.

पंकज ने कैसे रखी जुर्म की बुनियाद

पंकज ने आयुष पैरामैडिकल काउंसिल औफ इंस्टीट्यूट की स्थापना की. यह मैडिकल के क्षेत्र में उस का पहला संस्थान था. इस पैरामैडिकल के जरिए उस ने मध्यमवर्गीय बच्चों को शिकार बनाना शुरू किया था.

उस ने छात्रों को होम्योपैथ, योगासन आदि की डिग्रियां बांटनी शुरू की और हर छात्र से 2 से 3 लाख रुपए वसूले थे. धीरेधीरे उस की यह धोखे की दुकान चल पड़ी और उस ने संस्थान के कारोबार को विस्तार देने के लिए अपने पिता सुरेंद्र बाबू गुप्ता, भाई इंदीवर पोरवाल और पत्नी कंचन पोरवाल को बोर्ड औफ डायरेक्टर में जोड़ लिया और संस्थान को बढ़ाने लगा.

आयुष पैरामैडिकल कांउसिल औफ इंस्टीट्यूट की स्थापना के डायरेक्टर पंकज पोरवाल ने सन 2013 में दिल्ली के एनसीबी चिट फंड संस्थान से अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट का रजिस्ट्रैशन कराया.

संस्थान ने उसे रजिस्ट्रैशन नंबर- 8901190 आवंटित किया था और साल 2015 में उत्तर प्रदेश सरकार से रजिस्ट्रैशन कराया. इस के तहत उस ने छात्रों को एएनएम, जीडीए, मैडिकल ड्रेसर, सीएमएस, डीएमआईटी, डीएमआरटी, एक्सरे, ईसीजी, सीएमएलटी, सीसीसीई, डेंटल नर्सिंग, डेंटल हाइजीनिस्ट, डीओटीटी, डायलिसिस टेक्नीशियन, डिप्लोमा इन हैल्थ सेनेटरी, औप्थलैमिक असिस्टैंट, डीपीटी और एचडीएचएचएम कोर्स पढ़ाने का फैसला लिया और बदले में छात्रों से मोटी रकम वसूलने की भी  योजना बनाई.

इस के बाद संस्थान को और विस्तार करते हुए उस ने अपने दोस्तों नरेश कुमार, कमलकांत, सुरेंद्र कुमार, दर्शन कुमार खत्री, मोहित कुमार, अनिरुद्ध कुमार, निखिल कुमार, कुलदीप वर्मा, प्रेमचंद और महिला मित्र रुचि गुप्ता को संस्थान का दायित्व सौंप दिया था.

इस के बाद शातिर दिमाग पंकज पोरवाल के घर में जैसे लक्ष्मीजी स्थाई रूप से बैठ ही गई थीं. घर में नोटों की बारिश होने लगी थी. अब्दुल कलाम इंस्टीट्यूट के दाखिले में कोर्स के हिसाब से प्रति छात्र ढाई से 3 लाख रुपए की रकम वसूली जा रही थी. संस्थान का नाम बड़ा हुआ और देश के कई राज्यों में नाम फैलने लगा तो उस ने इसे कैश करने का मन बना लिया. उस ने इस की फ्रेंचाइजी देनी शुरू कर दीं.

पूरे देश में कैसे बांटीं 427 फ्रेंचाइजी

अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट पैरामैडिकल का फ्रेंचाइजी लेने के लिए लोगों का तांता लगने लगा. एक फ्रेंचाइजी के लिए 3 से 4 लाख रुपए तय हुआ था. रेवड़ी की तरह फ्रेंचाइजी बांटने का काम उत्तर प्रदेश से शुरू किया गया.

पहली फ्रेंचाइजी की नींव जीवन छवि पैरामैडिकल कालेज, प्रयागराज में पड़ी और संचालनकर्ता थे निरंकार त्रिपाठी. इन्होंने फ्रेंचाइजी लेने के लिए 4 लाख रुपए दिए. इस के साथ शंभुनाथ तिवारी कालेज औफ नर्सिंग गंगौली, अयोध्या, संचालक चंद्रदेव तिवारी, छत्रपति शिवाजी कालेज औफ साइंस एंड पैरामैडिकल देवरिया, संचालक प्रशांत कुमार कुशवाहा ने फ्रेंचाइजी ली.

इस के अलावा वंश पैरामैडिकल कालेज सिरसागंज, जिला फिरोजपुर, संचालक कमल किशोर, प्रतिभा पैरामैडिकल एंड नर्सिंग कालेज ट्रस्ट, देवरिया, संचालक प्रतिभा सिंह, जननी पैरामैडिकल नर्सिंग साइंस, पालिका परिषद, कुशीनगर, संचालक विजय प्रताप सिंह, सौय शाक्य पैरामैडिकल देवरिया, संचालक रमाकांत कुशवाहा, मां विंध्यवासिनी पैरामैडिकल कालेज, गोरखपुर, संचालिका गिरिजा त्रिपाठी, अपमूर्णानंद पैरामैडिकल, बलिया, संचालक गुप्तेश्वर पांडेय ने भी उस से फ्रेंचाइजी ली.

रुद्रा पैरामैडिकल कालेज, वाराणसी, संचालक डा. पवन साहनी, आल इंडिया पैरामैडिकल, सीतापुर, राजीव विश्वास, सतीशचंद्र इंस्टीट्यूट, शाहजहांपुर, संचालक मुकेश शुक्ला, सान हौस्पिटल, बरेली, संचालक डा. फहीम खान, वासु पैरामैडिकल, बुलंदशहर, संचालिका रुचि गुप्ता को भी फ्रेंचाइजी दी गई. ये आंकड़े कोरोना काल के पहले तक के हैं, जिन में किसी ने 3 लाख तो किसी ने 4 लाख रुपए दिए. कोरोना काल खत्म होने के बाद उत्तर प्रदेश के 40 जिलों में फ्रेंचाइजी दी गई.

पंकज पोरवाल की जालसाजी का यह कारोबार उत्तर प्रदेश के साथसाथ बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में तेजी से पांव पसारने लगा. और जहांजहां पैरामैडिकल की फ्रेंचाइजी ली गई, वहांवहां बच्चों ने अपने सुनहरे भविष्य की कल्पना लिए लाखों रुपए खर्च कर उस में दाखिला लिया.

18 जनवरी, 2022 को राष्ट्रीय खबर टीवी चैनल पर अपने 14 मिनट 21 सेकेंड के साक्षात्कार में पंकज पोरवाल ने खुद स्वीकार किया है कि उस ने देश भर में कुल 427 फ्रेंचाइजी खोली हैं.

सनद रहे, एक सेंटर खोलने के एवज में 4 लाख रुपए के हिसाब से यह कुल रकम 17 करोड़ 8 लाख रुपए की बनती है और इस दौरान तकरीबन 4 हजार विद्यार्थियों ने अपना भविष्य दांव पर लगा कोर्स के हिसाब से प्रति छात्र से ढाई से 3 लाख रुपए लिए जाते थे. इस हिसाब से यह रकम भी करोड़ों के आसपास पहुंचती है, लेकिन यह लोग बच्चों को उज्जवल भविष्य के सुनहरे सपने दिखा कर धोखे की चाबी से अपनी तिजोरियां भर रहे थे.

शिकायतकर्ता को ही क्यों जाना पड़ा जेल

जुर्म की जिस खोखली बुनियाद पर करीब 24 साल से वह अपराध की फसल काट रहा था, वह बुनियाद पूरी तरह ढह चुकी थी. आयुष पैरामैडिकल के प्रमाणपत्र और मार्कशीट पर तो छात्रों को होम्योपैथिक विभागों में सरकारी नौकरियां तो मिल जाती थीं, लेकिन जब वे अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट पैरामैडिकल के प्रमाणपत्रों और मार्कशीटों को ले कर सीएमओ औफिस में रजिस्ट्रैशन करवाने जाते थे तो उन्हें अपने ठगे जाने की जानकारी मिलती थी.

ऐसी ही एक घटना कुशीनगर जिले में सामने आई. जननी पैरामैडिकल नर्सिंग साइंस, कुशीनगर, संचालक विजय प्रताप सिंह को उन के छात्रों ने अपने ठगे जाने की जानकारी दे कर जब हंगामा किया तो वह सक्रिय हुए और अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर पंकज पोरवाल के खिलाफ एक लिखित शिकायत कोतवाली हाटा को दी.

संचालक विजय प्रताप सिंह के शिकायत पत्र सौंपने से पहले ही कुछ पीड़ित छात्र अपने साथ हुई धोखाधड़ी के संबंध में शिकायत दर्ज करा चुके थे. पुलिस उस कंप्लेंट की जांच कर रही थी, उसी दौरान संस्थान के संचालक विजय प्रताप भी अपनी शिकायत ले कर थाने पहुंच गए थे. फिर क्या था पुलिस ने विजय की शिकायत दर्ज करने से पहले ही छात्रों की शिकायत पर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. ये जनवरी 2013 की बात थी.

भले ही पुलिस ने विजय सिंह को गिरफ्तार कर के जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था, लेकिन उस के दिल में अभीअभी छात्रों के साथ हुए धोखे का मलाल कुलांचे भर रहा था. वह पछतावे की आग में जल रहा था और ठान लिया था कि छात्रों के भविष्य के साथ हुए खिलवाड़ का जब तक वह बदला नहीं ले लेगा, तब तक वह चुप बैठने वाला नहीं है.

डिप्लोमा और मार्कशीटों ने कैसे खोली पोल

करीब 6 महीने बाद जमानत पर विजय जेल से छूट कर बाहर आया. बाहर आते ही उस ने जुलाई 2020 में अदालत का दरवाजा खटखटाया और अब्दुल कलाम ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर पंकज पोरवाल के खिलाफ पैरामैडिकल के नाम पर छात्रों के साथ की गई धोखाधड़ी के संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156 (3) के तहत गोरखपुर सेशन कोर्ट में एक रिट दाखिल करवाई.

मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद यह मामला एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर के संज्ञान में आया तो उन्होंने छात्रों के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मामले की जांच के लिए सीओ (कैंट सर्किल) ट्रेनी आईपीएस मनीष पारिख को पुटअप

किया. उन्होंने अपनी जांच में पाया कि अब्दुल कलाम ग्रुप औफ एजुकेशन बोर्ड (इंस्टीट्यूट) आगरा को कानूनी मान्यता नहीं है. अब्दुल कलाम ग्रुप औफ एजुकेशन बोर्ड का खाता आगरा के एचडीएफसी बैंक में था. खाते का संचालन संयुक्त रूप से पंकज पोरवाल और उस की पत्नी कंचन पोरवाल के नाम से किया जाता था.

109 फ्रेंचाइजी उत्तर प्रदेश के 40 जिलों सहित बिहार, उत्तराखंड, पंजाब में होने का खुलासा हो चुका था. फ्रेंचाइजी देने के नाम पर 3 से 4 लाख रुपए संचालक पंकज पोरवाल वसूल करता था. पैरामैडिकल से संबंधित कोर्स कराने के लिए ढाई से 3 लाख वसूली होती थी.

यही नहीं, संचालित बोर्ड में मार्कशीट व प्रमाणपत्रों पर पंकज पोरवाल द्वारा एग्जाम कंट्रोलर के स्थान पर सगे भाई इंदीवर पोरवाल और आयुष पैरामैडिकल के प्रमाणपत्र पर उस के पिता सुरेंद्र बाबू गुप्ता के हस्ताक्षर होते थे. और तो और रजिस्ट्रैशन के बाद अवैध तरीके से शिक्षण संस्थान बनाए गए थे.

जांच में एक ऐसी चौंकाने वाली बात पता चली थी कि एएसपी मानुष के पैरों तले से जमीन खिसकती नजर आई. जांच में यह पता चला कि विद्यार्थियों को दी जाने वाली डिग्री पर अंगरेजी में साफसाफ लिखा जाता था कि किसी भी सरकारी या प्राइवेट नौकरी में यह डिग्री इस्तेमाल नहीं की जा सकती है. अब्दुल कलाम इंस्टीट्यूट और आयुष पैरामैडिकल काउंसिल औफ इंस्टीट्यूट के नाम से अंकपत्र और प्रमाणपत्र देते थे, यह सब फरजी होते थे.

एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर ने बताया कि नियमानुसार संस्था को खोलने के लिए उत्तर प्रदेश स्टेट पैरामैडिकल या अटल बिहारी बाजपेयी मैडिकल यूनिवर्सिटी में पंजीकरण कराना होता है. मगर इस संस्था का पंजीकरण नहीं था. डीजीएसई और सीएसओ दफ्तर में कोई प्रमाण नहीं मिला, इसी से संस्था के फरजी होने का पता चला.

करोड़ों रुपए की संपत्ति हुई बरामद

पुलिस ने जब आरोपी का औफिस खंगाला तो वहां 2 कंप्यूटरों में फ्रेंचाइजी का विवरण मिला. 109 फ्रेंचाइजी से संबंधित फार्म में मूल प्रति उपलब्ध थे.

पैरामैडिकल से संबंधित किताबें, पैरामैडिकल से संबंधित मार्कशीट का प्रमाणपत्र, विभिन्न कोर्स से संबंधित किताबें, फ्रेंचाइजी के नाम पर ली गई धनराशि की रसीदें, दंपति का अपराध से अर्जित 1400 स्क्वायर फीट संपत्ति, पंकज पोरवाल का मकान थाना अंतर्गत शाहगंज, आगरा, 3 बीएचके फ्लैट और अर्द्धनिर्मित मकान के कागजात आगरा के मिले, 1200 स्क्वायर फीट का एक प्लौट के कागजात जो शाहगंज, आगरा में मौजूद है, मिला और एक और प्लौट आगरा में होने की बात भी सामने आई है.

उसी औफिस से एचडीएफसी बैंक के संयुक्त खाते में मौजूद राशि 90467.68 रुपए, एसबीआई शाहगंज के खाते में पंकज पोरवाल की राशि 41171. 55 रुपए, एसबीआई शाखा जयपुर हाउस में पत्नी कंचन पोरवाल की राशि 5 लाख 77 हजार रुपए, केनरा बैंक साकेत कालोनी, आगरा में कंचन का खाता, सैंट्रल बैंक अछल्दा इटावा में कल्पना पोरवाल (साली) और कंचन पोरवाल के खाते में 16 लाख रुपए के बैंक पासबुक मिले, जो पुलिस ने अपने कब्जे में ले लीं और उन के तमाम अकांउट को फ्रीज करा दिया, ताकि वो न तो रुपए निकाल सके.

खैर, कथा लिखे जाने तक डायरेक्टर पंकज पोरवाल, सुरेंद्र बाबू गुप्ता (पिता), इंदीवर पोरवाल (भाई), कंचन पोरवाल (पत्नी), जयवीर प्रसाद पोरवाल (चाचा), दोस्तों नरेश कुमार, कमलकांत, सुरेंद्र कुमार, दर्शन कुमार खत्री, मोहित कुमार, अनिरुद्ध कुमार, निखिल कुमार, कुलदीप वर्मा और प्रेमचंद गिरफ्तार हो चुके थे और महिला मित्र रुचि गुप्ता फरार थी. सभी आरोपी जेल के सलाखों के पीछे कैद थे.

कंचन पोरवाल अभी भी फरार चल रही है. इतने बड़े पैमाने पर फरजीवाड़े से देश भर में हड़कंप मचा हुआ है. आखिर इस के लिए दोषी कौन है? क्यों नहीं किसी भी राज्य के सरकारों को इस फरजीवाड़े का पता चला? कैसे कई सालों तक फरजीवाड़े की दुकान बेखौफ चलती रही? समाज के सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ – भाग 2

रिपोर्ट दर्ज कर के भी मनमानी  करती रही पुलिस

भारतीय ज्ञान स्थली स्कूल में मासूम छात्रा दिव्या से कुकर्म व हत्या की सूचना पा कर कल्याणपुर थानाप्रभारी अनिल कुमार सिंह, रावतपुर चौकी इंचार्ज शालिनी सहाय, सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्रा, एसपी (ग्रामीण) लाल बहादुर श्रीवास्तव तथा डीआईजी प्रेमप्रकाश भी हैलट अस्पताल पहुंच गए.

उन्होंने हंगामा कर रहे लोगों को किसी तरह शांत कराया और कहा कि घटना की जांच होगी. दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाएगा. शाम 6 बजे सोनू भदौरिया की तहरीर पर भारतीय ज्ञान स्थली स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा तथा उन के दोनों बेटों पीयूष वर्मा व मुकेश वर्मा के खिलाफ कुकर्म व हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई.

रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस अधिकारियों ने स्कूल में छापा मारा तो वहां ताला बंद मिला. पुलिस स्कूल के पास ही रह रहे स्कूल के प्रबंधक के घर पहुंची तो प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा तथा उस के दोनों बेटे पीयूष वर्मा व मुकेश वर्मा फरार थे. घर में मौजूद महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उन से स्कूल की चाबी ले कर स्कूल खोला गया. पुलिस ने जब स्कूल की जांच की तो वहां पर दिव्या के साथ हुई हैवानियत के सबूत मिलने शुरू हो गए.

पुलिस को स्कूल की सीढि़यों पर खून के धब्बे मिले. सीढि़यों से ऊपर बने लैब में भी खून के धब्बे थे, जिन्हें पोंछने तथा साफ करने का प्रयास किया गया था. एक कुरसी पर भी खून लगा था. इस के अलावा बाथरूम में भी खून फैला था अैर वाशबेसिन टूटा था.

स्कूल में लगे सीसीटीवी कैमरों से छेड़छाड़ की गई थी, वे सब बंद थे. एसपी (ग्रामीण) के आदेश पर खून के धब्बों का खून बतौर सैंपल एकत्र कर लिया गया. इस के साथ ही दिव्या के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

भारतीय ज्ञान स्थली स्कूल का प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा शातिर दिमाग व्यक्ति था. उस की शासन प्रशासन में अच्छी पकड़ थी. उस ने जब खुद को और बेटों को फंसते देखा तो पहले ही दिन से बेटों व स्वयं को बचाने के लिए हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए. उस ने हर उस अधिकारी को प्रभाव में लेने का प्रयास किया, जो मामले की जांच कर रहा था.

हर वह सबूत मिटाने का प्रयास किया, जो उन लोगों को फंसा सकता था. वह हर उस नेता को खरीदने का प्रयास करने लगा, जो सोनू भदौरिया का साथ दे रहा था. उस ने कई ऐसे गुर्गों को भी अपने पक्ष में कर लिया था, जो सोनू भदौरिया को केस वापस लेने को धमका सकें.

दौलत के प्रभाव में लपेटा कई को

चंद्रपाल वर्मा के प्रभाव का असर यह हुआ कि घटना की शाम तक सोनू के पक्ष में खड़ी पुलिस अचानक बदल गई. पुलिस अधिकारी कहने लगे कि यह मामला दुष्कर्म का नहीं है. दिव्या की मौत बीमारी से हुई है. इस के लिए सीओ (कल्याणपुर) लक्ष्मी नारायण मिश्रा ने प्राइवेट डा. आभा मिश्रा को स्कूल में जांच के लिए बुलाया. आभा मिश्रा उन की रिश्तेदार थी.

आभा मिश्रा ने जांच में सारा मामला ही पलट दिया. डा. आभा मिश्रा ने कहा कि दिव्या गर्भवती थी. उस ने गर्भ गिराने के लिए गोलियां खाईं, जिस से ब्लीडिंग शुरू हुई. अधिक रक्तस्राव से उस की मौत हो गई. डा. आभा मिश्रा की यह बात आम लोगों के गले नहीं उतरी. इस से लोग आक्रोशित हो उठे.

लोगों के आक्रोश को देखते हुए 28 सितंबर, 2010 को 3 डाक्टरों के पैनल ने दिव्या के शव का पोस्टमार्टम किया. दिव्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट दिल दहला देने वाली थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार दिव्या के साथ कुकर्म किया गया था और उस के नाजुक अंग को नाखून से नोचा गया था. डाक्टरों ने बताया कि कोई मानसिक विक्षिप्त आदमी ही ऐसी हैवानियत कर सकता है. उस का गुदाद्वार पूरी तरह से फट गया था और अत्यधिक खून बहने से उस की मौत हो गई थी.

पोस्टमार्टम हाउस में चर्चित महिला नेता पार्षद आरती दीक्षित व पार्षद गीता निषाद भी मौजूद थीं. इन महिला नेताओं ने दिव्या का शव मिलने के बाद पोस्टमार्टम हाउस के बाहर सड़क जाम कर दी और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग कर रही थीं.

जाम की सूचना पा कर सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्रा, इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह तथा एसपी (ग्रामीण) लालबहादुर आ गए. आते ही पुलिस ने जाम खुलवाने के लिए लाठी चार्ज कर दिया. इस लाठी चार्ज में पार्षद आरती दीक्षित, गीता निषाद तथा सोनू भदौरिया घायल हो गईं. इस के बावजूद पुलिस ने पार्षद आरती दीक्षित व गीता निषाद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

दिव्या उर्फ दिव्या की हत्या से पहले कुकर्म करने की खबर जब कानपुर के प्रमुख समाचारपत्रों में छपी तो लोगों में क्रोध की आग भड़क उठी. लोगों का गुस्सा पुलिसिया काररवाई पर था, जो आरोपियों को बचाने में जुटी थी. देखते ही देखते पूरा शहर मासूम को न्याय दिलाने के लिए उमड़ पड़ा.

पुलिस की कार्यशैली से नाराज लोगों ने आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए कैंडिल मार्च, जुलूस और प्रदर्शन का सहारा लिया. बच्चे हों या बड़े, महिलाएं हों या बुजुर्ग हर कोई हाथों में कैंडिल और बैनर ले कर दिव्या को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर आया.

लोगों ने लाठियां खाईं पर दिव्या को न्याय दिलाने की मुहिम कमजोर नहीं पड़ने दी. नानाराव पार्क से जुलूस निकाला गया तो माल रोड की दोनों तरफ की सड़कें लोगों की भीड़ से पट गईं.

लोग उतर आए सड़कों पर

भारी भीड़ के आगे पुलिस को सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने पड़े. राजनीतिक दल, स्कूली बच्चे, सामाजिक संगठन, व्यापारी, डाक्टर, शिक्षक, कर्मचारी संगठन, श्रम संगठन और महिला संगठन दिव्या को न्याय दिलाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे. हर घर से मासूम को न्याय दिलाने की आवाज सुनाई दे रही थी.

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मोतीझील में निकाले गए कैंडिल मार्च की अगुवाई करने के लिए मुंबई से फिल्म निर्माता निर्देशक महेश भट्ट भी आए थे. इस के बाद तो पूरा शहर उमड़ पड़ा. यह कैंडिल मार्च ऐसा था, जिस में पूरे शहर को आंदोलन की चपेट में ले लिया था. सोनू भदौरिया की आर्थिक मदद हेतु भी लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे थे. हर रोज उस के खाते में हजारों रुपए आने लगे थे.

आखिर उमड़े जनसैलाब के आगे पुलिस को झुकना पड़ा और उस ने स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा तथा उस के दोनों बेटों पीयूष व मुकेश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. लेकिन पुलिस ने अपना खेल अभी भी बंद नहीं किया. इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह ने सोनू भदौरिया के घर के पास किराए पर रहने वाले किन्नर काजल पर जुर्म कबूल करने का दबाव डाला. उसे यातनाएं दीं. लेकिन जब बात नहीं बनी तो उसे छोड़ दिया गया.

इस के बाद पुलिस ने दिव्या की मां सोनू भदौरिया के नजदीक में रहने वाले रिक्शा चालक मुन्ना लोध को टारगेट बनाया. 6 अक्तूबर, 2010 को उसे दिव्या रेप और मर्डर केस में गिरफ्तार कर लिया गया. मुन्ना लोध मूलरूप से उन्नाव जिले के सरावां गांव का रहने वाला था.

वह अपने रिक्शे से बच्चों को स्कूल पहुंचाता था. मुन्ना लोध सोनू भदौरिया की मदद करता था. इन्हीं मधुर संबंधों को जोड़ कर एसपी (ग्रामीण) लालबहादुर श्रीवास्तव, सीओ लक्ष्मीनारायण मिश्रा व इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह ने अनोखी कहानी रच दी.

नई कहानी बनाई पुलिस ने

पुलिस की कहानी के अनुसार मुन्ना लोध के सोनू भदौरिया से अवैध संबंध थे. वह उस की बेटियों दिव्या व दीक्षा की देखभाल करता था. इसी बीच उस ने दिव्या से भी अवैध संबंध बना लिए. अवैध रिश्तों के चलते दिव्या गर्भवती हो गई.

इस की जानकारी जब मुन्ना को हुई तो वह घबरा गया और मैडिकल स्टोर से गर्भ गिराने वाली गोलियां ले आया. घटना वाले दिन उस ने दिव्या को वह गोलियां खिला दीं और स्कूल छोड़ आया. गोलियां खाने से दिव्या को ब्लीडिंग शुरू हो गई. बाद में ज्यादा खून बहने से उस की मौत हो गई.

बाहरी प्यार के चक्कर में पति मारा – भाग 3

एक दिन अनस हाशमी प्रियंका से मिलने उस के घर आया, प्रियंका ने दरवाजा बंद किया और अंदर आ कर उस से बातें करने लगी. कुछ देर में प्रियंका 2 प्याली चाय ले कर आई तो अनस हाशमी ने पूछा, ”भाईजान आए थे क्या?’’

”हां, आए तो थे, लेकिन एक सप्ताह रह कर चले गए.’’ प्रियंका बेमन से बोली.

अनस हाशमी को लगा कि वह रविकांत भाईजान से खुश नहीं है. उस ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा, ”भाभी, मैं कुछ कहना चाहता हूं. पर डर लगता है कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

”नहीं, तुम बताओ क्या बात है?’’

”भाभी, सच तो यह है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो और मैं तुम से मोहब्बत करने लगा हूं.’’ अनस हाशमी ने एक ही झटके में अपनी बात कह दी.

प्रियंका बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोली, ”क्या मतलब है तुम्हारा और हां प्यार का मतलब जानते हो. फिर मैं तुम्हारे दोस्त की पत्नी हूं. रिश्ते में तुम्हारी भाभी हूं.’’

”हां, लेकिन इस दिल का क्या करूं, जो तुम पर आ गया है. अब तो दिलोदिमाग पर तुम ही छाई रहती हो.’’ कहते हुए अनस हाशमी ने प्रियंका के गले में बांहें डाल दीं.

कैसे हिली रमाकांत की गृहस्थी की नींव

उस दिन के बाद प्रियंका की तो जैसे दुनिया ही बदल गई. अनस हाशमी प्रियंका के घर बेखौफ और बिना रोकटोक आता और दोनों रंगरलियां मनाते. अनस हाशमी जो भी कमाता, वह सब प्रियंका व उस के बच्चों पर ही खर्च करने लगा. प्रियंका भी बेखौफ हो कर अनस हाशमी के साथ घूमने फिरने लगी.

अनस हाशमी का पति की गैरमौजूदगी में प्रियंका के घर आनाजाना पड़ोसियों को खलने लगा. एक पड़ोसिन ने इस की शिकायत प्रियंका की सास से कर दी. शकुंतला बहू को ऊंचनीच सिखाने उस के घर आईं तो प्रियंका सास पर ही हावी हो गई और बोली, ”अम्मा, तुम हमारी फिक्र मत करो. अपने घर का खयाल मैं खुद रख लूंगी. तुम अपना घर संभालो. हमें नसीहत मत दो.’’

कुछ दिनों बाद रविकांत जब घर आया, तो पड़ोसियों ने उस के कान भरे. मां ने भी प्रियंका की शिकायत की. इस से रविकांत को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उस ने प्रियंका से पूछा, ”अनस हाशमी का क्या चक्कर है? वह रोजरोज घर क्यों आता है?’’

पति की बात सुन कर प्रियंका की धड़कनें बढ़ गईं, ”यह क्या कह रहे हो तुम. तुम्हारा दोस्त है. कभीकभी घर आ जाता है. इस में गलत क्या है?’’

रविकांत 4-5 दिन घर रुक कर वापस अपने काम पर चला गया. लेकिन इस बार उस का काम में मन नहीं लगा. उसे लगता था जैसे उस की गृहस्थी की नींव हिल रही है.

एक दिन अचानक रविकांत छुट्टी ले कर बिना बताए घर आ गया. उस ने घर में कदम रखा तो घर में कोई बच्चा दिखाई नहीं दिया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो सन्न रह गया. उस की पत्नी प्रियंका दोस्त अनस हाशमी की बांहों में थी. गुस्से में रविकांत ने प्रियंका की खूब पिटाई की जबकि अनस हाशमी भाग गया.

पिटने के बाद भी प्रियंका के चेहरे पर डर नहीं था. वह गुर्रा कर बोली, ”इस सब में मेरी नहीं, बल्कि तुम्हारी गलती है. मैं ने कहा था न कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. लेकिन तुम ने मेरी भावनाओं का खयाल कहां रखा.’’

रविकांत को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह गुस्से को पी गया. उस ने प्रियंका की बात का कोई जवाब नहीं दिया. 3 दिन बाद रविकांत राजकोट चला गया. उस के जाने के बाद प्रियंका और अनस हाशमी फिर रातें रंगीन करने लगे. हां, इतना जरूर था कि अब दोनों सावधानी बरतने लगे थे. अनस हाशमी अब रात के अंधेरे में ही प्रियंका के घर आता था.

इधर रविकांत का मन अब काम में नहीं लगता था. उस ने सोच लिया था कि वह नौकरी छोड़ देगा और बीवीबच्चों के साथ ही रहेगा. 20 अगस्त, 2023 को रविकांत ने प्रियंका से मोबाइल फोन पर बात की और बताया कि उस ने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी छोड़ दी है और जल्द ही घर वापस आ रहा है. अब वह बच्चों के साथ ही रहेगा.

पति की नौकरी छोडऩे की बात सुन कर प्रियंका परेशान हो उठी. क्योंकि पति के रहने से उसे अनस हाशमी से मिलने का मौका नहीं मिल सकता था. उस ने सारी बात अनस हाशमी को बताई. तब दोनों ने मिल कर रविकांत को ही ठिकाने लगाने की योजना बनाई.

25 अगस्त, 2023 को रविकांत राजकोट से कानपुर आ गया. रविकांत के आने की जानकारी अनस हाशमी को हुई तो वह उस से मिलने घर आ गया. रविकांत ने नाराजगी जताई और मिलने से इंकार कर दिया. लेकिन बारबार माफी मांगने पर रविकांत पिघल गया और उसे माफ कर दिया. इस के बाद दोनों में दोस्ती हो गई और शराब पार्टी भी होने लगी.

दोस्त क्यों बना कातिल

30 अगस्त, 2023 को रक्षाबंधन था. रविकांत दोपहर बाद अपनी पत्नी व बच्चों के साथ अपनी मां के घर राजे नगर (नौबस्ता) पहुंचा. वहां उस ने अपनी बहन सीमा से राखी बंधवाई और सभी ने मिल कर खाना खाया. शाम को रविकांत घर लौट आया. प्रियंका और अनस हाशमी को अब रविकांत कांटे की तरह चुभने लगा था. वह उन के मिलन में बाधक था, इसलिए दोनों ने जल्द ही इस कांटे को निकालने की योजना बना ली. योजना के तहत अनस हाशमी पहली सितंबर की रात 8 बजे रविकांत के घर पहुंचा और उसे शराब पिलाने के बहाने ले आया.

दोनों गल्ला मंडी पहुंचे. वहां अनस हाशमी ने शराब की बोतल, नमकीन व गिलास खरीदे, फिर दोनों पैदल ही हंसपुरम बंबा की ओर चल दिए.

योजना के तहत अनस हाशमी रविकांत को हंसपुरम बंबा की तीसरी पुलिया पर लाया. यहां सन्नाटा पसरा था. पुलिया के किनारे बैठ कर दोनों ने शराब पी. शराब पीने के दौरान प्रियंका से अवैध संबंधों को ले कर दोनों में बहस होने लगी.

रविकांत गालीगलौज करने लगा तो अनस हाशमी ने उस का गला पकड़ लिया. रविकांत गिर गया, तब उस ने उसे घसीट कर सूखे नाले में फेंक दिया. पर उसे यकीन नहीं हुआ कि रविकांत मर चुका है, इसलिए उस ने अपनी जेब से चाकू निकाला और उस की गरदन रेत दी. इस के बाद रविकांत का मोबाइल फोन बंद कर झाडिय़ों में फेंक दिया तथा खून सना चाकू भी झाडिय़ों में छिपा दिया.

रविकांत को मौत की नींद सुलाने के बाद अनस हाशमी प्रियंका के पास पहुंचा और बताया कि उस ने रविकांत को ठिकाने लगा दिया है.

इस के बाद दोनों ने संबंध बनाए. फंसने के डर से प्रियंका ने सास शकुंतला को फोन पर सूचना दी कि रविकांत घर का सामान लाने बाजार गए थे, लेकिन अब तक लौटे नहीं. शकुंतला तब चिंतित हो उठीं. उन्होंने बेटे को खोजने का प्रयास किया. पता न चलने पर उन्होंने थाना नौबस्ता में गुमशुदगी दर्ज करा दी.

तीसरे रोज उन्हें बेटे की हत्या की सूचना मिली. 5 सितंबर, 2023 को पुलिस ने आरोपी अनस हाशमी और प्रियंका को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. प्रियंका के दोनों मासूम बच्चे दादी शकुंतला के पास थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बड़े गुनाह की छोटी सजा : मासूम को नहीं मिला इंसाफ – भाग 1

उस दिन दिसंबर 2018 की 5 तारीख थी. वैसे तो कानपुर कोर्ट में हर रोज चहलपहल रहती है, लेकिन उस दिन  अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (द्वितीय) ज्योति कुमार त्रिपाठी की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. पूरा कक्ष लोगों से भरा था. कक्ष के बाहर भी भीड़ जुटी थी.

दरअसल उस दिन एक ऐसे मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था, जिस ने पूरी मानवता को शर्मसार किया था. लोग तरहतरह के कयास लगा रहे थे. कोई फांसी की सजा की बात कह रहा था तो कोई आजीवन कारावास होने का अनुमान लगा रहा था.

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ज्योति कुमार त्रिपाठी ने ठीक साढ़े 10 बजे न्यायालय कक्ष में प्रवेश किया और कुरसी पर विराजमान हो गए. मुकदमे के 4 अभियुक्त पीयूष वर्मा, मुकेश वर्मा, चंद्रपाल वर्मा तथा संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी कठघरे में खड़े थे. उन के आसपास पुलिस का पहरा था. उन के चेहरों पर न्याय का भय साफ झलक रहा था.

माननीय न्यायाधीश ने अंतिम बार अभियोजन व बचावपक्ष के वकीलों की बहस सुनी और अभियोजन पक्ष के गवाहों की सूची पर नजर डाली, 39 गवाह थे. फैसले की यह घड़ी आने में 8 साल का समय लग गया था.

आखिर मामला क्या था, जिस के फैसले को जानने के लिए सैकड़ों लोग अदालत पहुंचे थे. इस के लिए हमें 8 साल पहले घटी उस घटना को जानना होगा, जो बेहद हृदयविदारक थी.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के कल्याणपुर थाने के अंतर्गत एक मोहल्ला है रोशननगर. इसी मोहल्ले में राजन शुक्ला के मकान में सोनू भदौरिया नाम की महिला किराए पर रहती थी. सोनू के परिवार में पति हमीर सिंह के अलावा 2 बेटियां दिव्या (10 वर्ष) तथा दीक्षा (7 वर्ष) थीं. सोनू भदौरिया माल रोड स्थित एक मौल में काम करती थी. मौल से मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का भरणपोषण होता था.

सोनू भदौरिया का पति हमीर सिंह मूलरूप से मध्य प्रदेश के भिंड जिले के गांव रामगढ़ का निवासी था. गांव में रह कर हमीर सिंह खेती करता था. उस की पत्नी सोनू पढ़ीलिखी महिला थी. वह अपनी बेटियों को भी पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहती थी, इसलिए वह गांव छोड़ कर सन 2010 में कानपुर आ गई थी. यहां उस ने रोशन नगर निवासी राजन शुक्ला के मकान में किराए पर एक कमरा ले लिया था और बेटियों के साथ रहने लगी थी.

उस ने बेटियों के पढ़ने के लिए अच्छे स्कूल की जानकारी जुटाई तो पता चला कि गणेश नगर (रावतपुर) स्थित भारती ज्ञान स्थली स्कूल अच्छा है. उस ने इसी स्कूल में अपनी बेटियों दिव्या का दाखिला कक्षा-6 में तथा दीक्षा का कक्षा-3 में करा दिया. सोनू बच्चों को स्कूल भेज कर अपने काम पर चली जाती थी. पति से अलग रह कर भी वह बच्चों की अच्छी तरह से देखभाल कर रही थी.

मालिकों ने ही स्कूल को बनाया दुष्कर्म का अड्डा

सोनू भदौरिया मिलनसार व व्यवहार कुशल महिला थी. मकान मालिक राजन शुक्ला व मकान में रहने वाले अन्य किराएदार सोनू से सहानुभूति रखते थे. सोनू के पड़ोस में रहने वाला रिक्शाचालक मुन्ना लोध सोनू की दोनों बेटियों को स्कूल से घर लाता था. सोनू के काम से वापस आने तक वही उन की देखभाल करता था.

भारती ज्ञान स्थली स्कूल के प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा धनाढ्य व्यक्ति थे. गणेश नगर में ही उन का आलीशान स्कूल व बंगला था. चंद्रपाल के 2 बेटे थे मुकेश व पीयूष. दोनों ही स्कूल के संचालन में उन की मदद करते थे. चंद्रपाल का छोटा बेटा पीयूष वर्मा अय्याश प्रवृत्ति का था. उस की कुदृष्टि खूबसूरत लेडी टीचरों व छात्राओं पर गड़ी रहती थी. कुछ तो उस की कुदृष्टि से बच निकलती थीं, पर कुछ मजबूर हो जाती थीं.

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एक रोज पीयूष की नजर दिव्या पर पड़ी. पीयूष ने दिव्या के परिवार के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह सोनू भदौरिया की बेटी है जो प्राइवेट नौकरी करती है. 10 वर्षीय दिव्या को अपनी बातों में फांसने के लिए उस ने उस से बोलना बतियाना शुरू कर दिया और उस मासूम के शरीर पर नजरें गड़ाने लगा. दिव्या मासूम बच्ची थी, वह उस के कुत्सित इरादों को कैसे भांपती.

हर रोज की तरह 27 सितंबर, 2010 को सोनू भदौरिया दोनों बेटियों को स्कूल छोड़ कर अपने काम पर चली गई. मौका मिलने पर पीयूष वर्मा दिव्या को बहलाफुसला कर दूसरी मंजिल पर स्थित लैब में ले गया. लैब में पहुंचते ही उस ने दरवाजा बंद कर लिया और दिव्या के साथ अश्लील हरकतें करने लगा.

दिव्या ने विरोध किया तो उस ने उस की पिटाई कर दी. डरीसहमी दिव्या की जुबान बंद हुई तो वह उस मासूम पर बाज की तरह टूट पड़ा. उस ने मासूम बच्ची के साथ प्राकृतिक, अप्राकृतिक कुकृत्य किया.

इस दरम्यान दिव्या दर्द से चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन उस हवस के दरिंदे को उस पर जरा भी दया नहीं आई. हवस के दौरान वह इतना वहशी हो गया कि उस ने मासूम के गुप्तांग पर चोट तो पहुंचाई ही, साथ ही दांतों से उस के चेहरे को भी जख्मी कर दिया.

कर्मचारियों को भी घसीटा जुर्म में

दरिंदा बना पीयूष वर्मा तब घबराया, जब दिव्या बेहोश हो गई और उस के गुप्तांग से ब्लीडिंग होने लगी. घबराहट में पीयूष वर्मा ने स्कूल के क्लर्क संतोष कुमार उर्फ मिश्राजी को बुलाया. संतोष ने दिव्या की हालत देखी तो वह सब समझ गया. संतोष ने तत्काल स्कूल की आया परवीन व माया को बुलाया और ब्लीडिंग बंद कराने का प्रयास कराया, लेकिन दोनों ही असफल रहीं.

खून साफ करने के लिए दिव्या को बाथरूम ले जाया गया. इस के बाद माया व परवीन ने दिव्या के कपड़े बदले. बच्चों का दाखिला होते समय ड्रैस और किताबें स्कूल प्रबंधन द्वारा बेची जाती थीं. दिव्या के कपड़े खून से सन जाने के कारण उस के खून सने कपड़े उस के बैग में रख दिए गए और नई ड्रैस उसे पहना दी गई.

इस के बाद क्लर्क संतोष कुमार, माया और परवीन दिव्या को उस के घर छोड़ कर वापस लौट गए. मकान मालिक राजन शुक्ला ने दिव्या की हालत देखी तो वह घबरा गए. उन्होंने तत्काल सोनू भदौरिया को फोन कर के दिव्या की हालत की जानकारी दे दी. बेटी के बारे में सुन कर सोनू घबरा गई. वह तुरंत औफिस से घर के लिए निकल गई. सोनू घर पहुंची तो दिव्या बेहोश पड़ी थी.

राजन ने बताया कि स्कूल वाले दिव्या को इस हालत में यहां छोड़ कर बिना कुछ बताए चले गए. सोनू ने मकान मालिक राजन शुक्ला तथा 2 किराएदारों गोविंद व योगेंद्र को साथ लिया और दिव्या को इलाज के लिए कुलवंती अस्पताल ले गई.   लेकिन दिव्या की हालत देख कर अस्पताल के डाक्टरों ने उसे अपने यहां भरती करने से मना कर दिया.

इस के बाद लगभग 3 बजे सोनू बेटी को ले कर लाला लाजपतराय अस्पताल (हैलट) पहुंची. वहां के डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया. बेटी की मौत से सोनू बदहवास हो गई और उस के स्कूल बैग को सीने से चिपका कर रोने लगी. इसी बीच सोनू की निगाह बैग पर लगे खून के धब्बे पर पड़ी.

उस ने बैग खोल कर देखा तो उस में बेटी के खून से सने अंडरगारमेंट देख उस का माथा ठनका. उस ने बेटी के शरीर को गौर से देखा तो उस के नीचे का हिस्सा खून से सना हुआ था और खून रोकने के लिए नाजुक अंग पर पट्टी बांधी गई थी. स्कूल में बेटी के साथ हुए कुकर्म की आशंका से सोनू ने हंगामा खड़ा कर दिया. पड़ोसी भी सोनू का साथ देने लगे.

बाहरी प्यार के चक्कर में पति मारा – भाग 2

4 सितंबर, 2023 की सुबह 10 बजे एडीसीपी अंकिता शर्मा ने अनस हाशमी से रविकांत की हत्या के संबंध में पूछताछ की. कुछ देर वह पुलिस को बरगलाता रहा, लेकिन सख्ती करने पर टूट गया और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं उस ने मृतक रविकांत का मोबाइल फोन तथा हत्या में प्रयुक्त खून सना चाकू भी बरामद करा दिया.

अनस हाशमी और प्रियंका से पुलिस से विस्तार से पूछताछ की तो रविकांत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की चाशनी में डूबी निकली—

उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर के थाना विधनू के अंतर्गत एक गांव है- मटियारा. इसी गांव में हरविलास शुक्ला अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सरला के अलावा 2 बेटियां राधिका व प्रियंका तथा एक बेटा शिव था. हरविलास किसान थे. वह अपने खेतों में सब्जियां उगाते थे और शहरकस्बे की मंडियों में बेचते थे. इस से होने वाली आमदनी से ही वह परिवार का भरणपोषण करते थे.

बड़ी बेटी का विवाह वह औंग (फतेहपुर) निवासी राधेश्याम तिवारी से कर चुके थे.

सास से क्यों झगड़ती थी प्रियंका

राधिका से छोटी प्रियंका थी. वह भी जवान हुई तो उस के योग्य वर की खोज करने लगे. काफी प्रयास के बाद उन्हें रविकांत पसंद आ गया.

रविकांत के पिता रामबहादुर पांडेय नौबस्ता (कानपुर) के राजे नगर मोहल्ले में सपरिवार रहते थे. परिवार में पत्नी शकुंतला के अलावा 2 बेटे रविकांत, अनूप तथा बेटी सीमा थी. सीमा की शादी हो चुकी थी. बड़ा बेटा रविकांत एक इनवर्टर बनाने वाली कंपनी में काम करता था.

उचित घर वर देख कर रामविलास ने प्रियंका का रिश्ता रविकांत से पक्का कर दिया. इस के बाद 8 फरवरी, 2016 को उन्होंने प्रियंका का विवाह रविकांत से कर दिया.

खूबसूरत पत्नी पा कर रविकांत खुद को बहुत खुशकिस्मत समझ रहा था. जबकि अपने से अधिक उम्र का पति पा कर प्रियंका खुश नहीं थी. प्रियंका को यह बात हमेशा सालती रहती थी कि उस का पति उम्र में उस से काफी बड़ा है. यही टीस कभी दर्द बन जाती तो पतिपत्नी में झगड़ा हो जाता. हालांकि लड़ाईझगड़ा रविकांत को पसंद नहीं था.

शादी के एक साल बाद प्रियंका ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म से प्रियंका की सास शकुंतला भी खुश थी, लेकिन प्रियंका बेटे की परवरिश को ले कर चिंतित रहने लगी थी. दरअसल, रविकांत जो भी कमाता था, वह मां के हाथ पर रखता था. प्रियंका को यह बात अखरती थी. वह चाहती थी कि पति पैसा केवल उसे ही दे ताकि वह बेटे की देखभाल ठीक से कर सके.

प्रियंका को संयुक्त परिवार में रहना भी पसंद न था. इसलिए वह घर में कलह करने लगी थी. किसी न किसी बात को ले कर उस का हर रोज सास से झगड़ा होने लगा था. वह पति पर अलग रहने का भी दबाव डालने लगी थी.

रोज रोज की कलह से परेशान हो कर रविकांत ने मां का घर छोड़ दिया और पत्नी प्रियंका के साथ नौबस्ता गल्ला मंडी में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. इसी बीच प्रियंका ने दूसरे बेटे को जन्म दिया. प्रियंका को आर्थिक परेशानी खलती थी. पति की कमाई इतनी नहीं थी कि वह बच्चों के साथ खुशहाल जिंदगी जी सके.

अनस हाशमी कौन था और क्यों आता था रविकांत के घर

रविकांत जिस इनवर्टर कंपनी में काम करता था, उसी में 20 साल का अनस हाशमी भी काम करता था. साथ काम करते दोनों में दोस्ती हो गई थी.

अनस हाशमी मूलरूप से उत्तर भारत के बलरामपुर जिले के गांव लालपुर का रहने वाला था. रविकांत व अनस हाशमी खानेपीने के शौकीन थे, इसलिए दोनों की महफिल जमती रहती थी.

एक रोज रविकांत ड्यूटी नहीं गया तो अनस हाशमी देर शाम उस का हालचाल लेने उस के घर आ गया. यहां पहली बार प्रियंका की मुलाकात अनस हाशमी से हुई. दोनों एकदूसरे से प्रभावित हुए और उन के बीच बातचीत भी हुई. इस के बाद जबतब अनस हाशमी का रविकांत के घर आनाजाना होने लगा. लेकिन इस बीच प्रियंका व अनस हाशमी मर्यादा में रहे. हालांकि दोनों के दिलों में हलचल शुरू हो चुकी थी.

रविकांत का एक रिश्तेदार अनुज तिवारी था. वह गुजरात के राजकोट में किसी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड था. उसे अच्छा वेतन मिलता था. जनवरी 2021 में रविकांत की पारिवारिक शादी समारोह में अनुज तिवारी से मुलाकात हुई. बातचीत के दौरान रविकांत ने आर्थिक समस्या बताई तो अनुज ने उसे राजकोट में नौकरी दिलाने का वादा किया.

अनुज के साथ रविकांत राजकोट चला गया. वहां अनुज ने एक खिलौना बनाने वाली कंपनी में रविकांत को सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी दिलवा दी. इस तरह रविकांत राजकोट में नौकरी करने लगा और प्रियंका दोनों बच्चों के साथ नौबस्ता गल्ला मंडी में रहने लगी. रविकांत को जब छुट्टी मिलती, तभी वह कानपुर आता और हफ्ते भर तक रुक कर वापस चला जाता.

प्रियंका के क्यों बहके थे कदम

अनस हाशमी को जब पता चला कि उस का दोस्त रविकांत दूरदराज शहर में नौकरी करने लगा है तो उस की नीयत में खोट आ गई. वह उस की पत्नी प्रियंका से नजदीकियां बढ़ाने के लिए उस के घर आनेजाने लगा.

वह जब भी आता बच्चों को खानेपीने की चीजें लाता. खानेपीने की चीजें पा कर बच्चे खुश होते. बच्चों ने प्रियंका से अनस हाशमी के बारे में पूछा तो उस ने बच्चों से कहा कि यह तुम्हारे संदीप मामा हैं. प्रियंका भी उसे संदीप कह कर ही बुलाती थी.

अनस हाशमी विवाहित था, लेकिन उस की बीवी की मौत हो गई थी. स्त्री सुख से वंचित होने से वह प्रियंका पर डोरे डालने लगा था. पति के राजकोट जाने के बाद उस के जिस्म की भूख फिर सिर उठाने लगी. वह उदास हो गई. तब उस के दिलोदिमाग में अनस हाशमी घूमने लगा. वह उस से मिलने को उतावली हो उठी.

प्रियंका ने इस का कोई विरोध नहीं किया. इस से अनस की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद प्रियंका भी खुद को नहीं रोक सकी तो मर्यादा तारतार होते वक्त नहीं लगा. जोश उतरने पर जब होश आया तो दोनों में से किसी के भी मन में पछतावा नहीं था.

प्रेमी के लिए कातिल बनी रक्षा

बाहरी प्यार के चक्कर में पति मारा – भाग 1

एक रोज अनस हाशमी दोपहर में प्रियंका के घर आया और चारपाई पर बैठ कर उस ने इधरउधर की बातें करने लगा. तभी अचानक वह उस  के पास आ कर बोला, ”भाभी, तुम जानती हो कि तुम कितनी सुंदर हो?’’

अनस हाशमी की बात सुन कर पहले तो प्रियंका चौंकी, उस के बाद हंस कर बोली, ”मजाक अच्छा कर लेते हो.’’

”नहीं भाभी, ये मजाक नहीं है, तुम मुझे सचमुच बहुत अच्छी लगती हो. तुम्हें देखने को दिल चाहता है, तभी तो मैं तुम्हारे यहां आता हूं.’’ अनस ने मुसकराते हुए कहा.

अनस की बात सुन कर प्रियंका के माथे पर बल पड़ गए. उस ने कहा, ”तुम यह क्या कह रहे हो अनस? क्या मतलब है तुम्हारा?’’

”कुछ नहीं भाभी, तुम यहां बैठो और यह बताओ कि भाईजान कब आएंगे?’’

”उन्हें छुट्टी कहां मिलती है. तुम सब कुछ जानते तो हो, फिर भी पूछ रहे हो?’’ प्रियंका ने थोड़ा गुस्से में कहा.

”तुम्हारे ऊपर दया आती है भाभी, भाईजान को तो तुम्हारी फिक्र ही नहीं है. अगर उन्हें फिक्र होती तो इतने दिनों बाद घर न आते. वह चाहते तो यहीं कोई दूसरी नौकरी कर लेते.’’ यह कह कर अनस हाशमी ने जैसे प्रियंका की दुखती रग पर हाथ रख दिया.

इस के बाद प्रियंका के करीब आ कर वह उस का हाथ पकड़ते हुआ बोला, ”भाभी, अब तुम चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा.’’

उस दिन अनस हाशमी के जाने के बाद प्रियंका देर तक उसी के बारे में सोचती रही कि आखिर अनस चाहता क्या है. उस रात प्रियंका को देर तक नींद भी नहीं आई.

3 सितंबर, 2023 की सुबह 10 बजे कानपुर शहर के थाना नौबस्ता के एसएचओ जगदीश पांडेय को फोन के जरिए सूचना मिली कि हंसपुरम बंबा की पुलिया नंबर 3 के पास माया स्कूल के सामने वाले सूखे नाले में एक युवक की लाश पड़ी है. चूंकि खबर हत्या की थी, इसलिए उन्होंने इस सूचना से पुलिस अधिकारियों को भी अवगत करा दिया. उस के बाद वह सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

थाना नौबस्ता से घटनास्थल की दूरी 5 किलोमीटर उत्तरपश्चिम दिशा में थी, इसलिए पुलिस को वहां तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. उस समय वहां लोगों की भीड़ थी. पुलिस को देखते ही भीड़ हट गई. पुलिसकर्मियों ने नाले में पड़े शव को बाहर निकाला.

मृतक युवक की उम्र 35 साल के आसपास थी. उस की हत्या किसी तेजधार हथियार से गला रेत कर की गई थी. शव से बदबू आ रही थी, जिस से लग रहा था कि हत्या 1-2 दिन पहले की गई होगी. जामातलाशी में उस के पास से कुछ भी बरामद नहीं हुआ. अब तक तमाम लोग शव को देख चुके थे, लेकिन उस की शिनाख्त नहीं हो पाई थी.

जांच के दौरान ही एसएचओ जगदीश पांडेय को याद आया कि शकुंतला पांडेय नाम की महिला ने उन के थाने में एक दिन पहले अपने बेटे रविकांत की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. कहीं यह लाश उस के बेटे की तो नहीं? यह खयाल आते ही उन्होंने शकुंतला को घटनास्थल पर बुलाने के लिए एसआई आर.के. सिंह और एक सिपाही को भेज दिया.

पुलिस जीप राजे नगर (गल्ला मंडी) स्थित शकुंतला के घर पर रुकी तो वह सकते में आ गईं. उन्होंने पूछा, ”साहब, मेरे बेटे का कुछ पता चला?’’

जवाब देने के बजाय एसआई आर.के. सिंह ने शकुंतला से कहा कि वह उस के साथ चलें. वहां उन्हें सब पता चल जाएगा.

शकुंतला अपने छोटे बेटे अनूप के साथ घटनास्थल पहुंचीं. वहां एसएचओ जगदीश पांडेय ने उन्हें युवक का शव दिखाया तो वह फफक पड़ीं और बोलीं, ”साहब, यह लाश मेरे बड़े बेटे रविकांत की है.’’

अनूप भी भाई का शव देख कर बिलखने लगा.

प्रियंका को पति रविकांत की हत्या की जानकारी हुई तो वह भी घटनास्थल पर पहुंच गई और शव देख कर विलाप करने लगी. शकुंतला ने उसे नफरतभरी नजर से देखा फिर बोली, ”आखिर तुम ने रास्ते का कांटा निकाल ही दिया. अब रोने धोने का नाटक क्यों कर रही हो?’’

प्रियंका ने शकुंतला के कटाक्ष का कोई जवाब नहीं दिया. वह छाती पीटपीट कर रोती रही. एकदो बार उस ने बेहोशी का भी नाटक किया.

इसी चीखपुकार के बीच एडिशनल सीपी (साउथ) अंकिता शर्मा तथा एसीपी अभिषेक पांडेय घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया फिर प्रभारी निरीक्षक जगदीश पांडेय से घटना के संबंध में कुछ जरूरी जानकारी हासिल की.

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मौके पर मृतक की मां शकुंतला पांडेय मौजूद थीं. एडीसीपी अंकिता शर्मा ने उन से पूछा, ”मांजी, तुम्हारे बेटे रवि की हत्या किस ने और क्यों की? क्या तुम्हें किसी पर शक है?’’

”हां जी, मुझे अपनी बहू प्रियंका पर ही शक है.’’ शकुंतला ने बताया.

”वह कैसे?’’ अंकिता शर्मा ने पूछा.

”साहब, प्रियंका बदचलन है. वह लड़ झगड़ कर परिवार से अलग किराए का कमरा ले कर बेटे के साथ रहने लगी थी. बेटा परदेश कमाने गया तो प्रियंका बहक गई. वह अपने आशिक के साथ मौजमस्ती में डूब गई. बेटे ने विरोध जताया तो उसे मौत की नींद सुला दिया. प्रियंका ने ही अपने आशिक के साथ मिल कर मेरे बेटे की हत्या की है. आप उसे गिरफ्तार कर लीजिए वरना वह फरार हो जाएगी.’’ इतना कह कर वह सुबकने लगी.

पुलिस ने मौके की काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपत राय अस्पताल भेज दी.

एडिशनल डीसीपी ने प्रियंका के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस से पता चला कि प्रियंका की एक मोबाइल नंबर पर लगातार बात होती थी. उस नंबर की जांच की गई तो पता चला कि वह नंबर बलरामपुर जिले के लालपुर गांव निवासी अनस हाशमी का है.

एडीसीपी ने थाने में प्रियंका से अनस हाशमी के संबंध में पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह उस के पति रविकांत का दोस्त है. वह नौबस्ता के कबीर नगर मछरिया में बरकती मसजिद के पास किराए पर रहता है. उस का उस के घर में आनाजाना था.

प्रियंका के मोबाइल फोन में एक युवक की फोटो थी. वह फोटो जब प्रियंका के बच्चों को दिखाई गई तो उन्होंने बताया कि यह फोटो संदीप मामा की है. संदीप के संबंध में पूछने पर प्रियंका ने बताया कि अनस हाशमी ही संदीप है. उस ने बच्चों को अनस हाशमी का नाम संदीप बताया था और कहा था कि यह तुम्हारे मामा है, अत: बच्चे उसे संदीप मामा कहते थे.

अनस हाशमी को गिरफ्तार करने के लिए अंकिता शर्मा ने एसीपी अभिषेक पांडेय की अगुवाई में एक पुलिस टीम का गठन किया. पुलिस टीम ने अनस हाशमी के कबीर नगर (मछरिया) स्थित किराए वाले कमरे पर पहुंची, लेकिन उस के कमरे पर ताला लटका मिला.

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पुलिस टीम जब वापस लौट रही थी तो फारुख अली गली के मोड़ पर पुलिस के मुखबिर ने जीप रुकवाई और बताया कि अनस हाशमी बरकती मसजिद में छिपा बैठा है. कुछ देर बाद वह अपने कमरे पर जाएगा.

मुखबिर की इस सूचना पर पुलिस टीम सतर्क हो गई. रात 12 बजे के आसपास अनस हाशमी जैसे ही मसजिद से बाहर निकला, पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया. उसे थाने लाया गया.