देह की राह के राही – भाग 3

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना पा कर थाना सिंहानी गेट के थानाप्रभारी मनोज कुमार यादव, सीनियर सबइंसपेक्टर चंद्रप्रकाश चतुर्वेदी, सबइंसपेक्टर विनोद कुमार त्यागी, अवधेश कुमार, हेडकांस्टेबल के.पी. सिंह के साथ नंदग्राम स्थिति मंजू शर्मा के घर पहुंच गए. लाश की स्थिति से ही पता चल रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी. क्योंकि उस के गले से चुन्नी लिपटी हुई थी, गले पर कसने के निशान भी थे.

सुमन को कमरा बबिता ने दिलाया था, इसलिए मंजू ने उसे भी सुमन की हत्या की सूचना दे दी थी, जिस से इस बात की सूचना सुमन के घर वालों तक पहुंच गई थी.

पुलिस घटनास्थल एवं लाश का निरीक्षण कर मकान मालकिन मंजू शर्मा से पूछताछ कर रही थी कि रोतेबिलखते सुमन के घर वाले भी पहुंच गए. थोड़ी देर के लिए वहां का माहौल काफी गमगीन हो गया.

पुलिस को मंजू शर्मा से मृतका के बारे में काफी जानकारी मिल चुकी थी. उस ने बताया कि मृतका यहां अकेली रहती थी. उस का अपने पति से कोई संबंध नहीं था. उस से मिलने एक लड़का आता था. कभीकभी वह उस के कमरे पर रुकता भी था. इस से पुलिस को लगा कि यह हत्या अवैध संबंधों की वजह से हुई है.

पुलिस ने सुमन के घर वालों को ढांढस बंधाया और घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए हिंडन स्थित मोर्चरी भिजवा दिया. इस के बाद थाना सिंहानी गेट पुलिस मृतका सुमन के घर वालों को साथ ले कर थाने आ गई, जहां मृतका की छोटी बहन राखी की ओर से सुमन की हत्या का मुकदमा धूकना निवासी सत्येंद्र त्यागी के बेटे राजीव उर्फ राजू उर्फ नोनू त्यागी के खिलाफ दर्ज कर लिया.

मामला हत्या का था और रिपोर्ट नामजद दर्ज थी, इसलिए क्षेत्राधिकारी अनुज यादव ने अगले दिन अभियुक्त की गिरफ्तारी के लिए थानाप्रभारी मनोज कुमार यादव के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी.  इस टीम ने राजीव को गिरफ्तार करने के लिए धूकना स्थित उस के घर छापा मारा, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. इस के बाद पुलिस टीम ने कई जगहों पर छापा मारा, लेकिन वह पुलिस टीम के हाथ नहीं लगा.

इस के बाद राजीव की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी सीनियर सबइंसपेक्टर चंद्रप्रकाश चतुर्वेदी को सौंप दी गई. उन्होंने राजीव को काबू में करने के लिए उस का मोबाइल फोन सर्विलांस पर लगवा दिया, जिस से उन्हें उस की लोकेशन का पता चल गया.

मोबाइल के लोकेशन के आधार पर ही सीनियर सबइंसपेक्टर चंद्रप्रकाश ने अपनी टीम की मदद से गाजियाबाद के पुराने बसअड्डे के पास से 5 जून की शाम 7 बजे उसे गिरफ्तार कर लिया. राजीव को थाने ला कर पूछताछ की गई तो उस ने किसी भी तरह की बहानेबाजी किए बगैर सुमन की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने हत्या की जो वजह बताई, वह इस प्रकार थी.

शुरूशुरू में राजीव और सुमन का संबंध लेनदेन का रहा. वह सुमन के खर्च उठाता था और सुमन उसे औरत वाला सुख देती थी. राजीव ने सुमन से ये संबंध सिर्फ औरत का सुख पाने के लिए बनाए थे, लेकिन कुछ दिनों बाद सुमन कहने लगी कि उसे उस से प्यार हो गया है. उसे खुश करने के लिए राजीव ने भी कह दिया कि वह भी उस से प्यार करता है.

सुमन ने राजीव की इस बात को सच माना और उस के साथ शादी के सपने ही नहीं देखने लगी, बल्कि उसे साकार करने की कोशिश भी करने लगी. राजीव उसे टालता रहा.  सुमन को जब लगा कि राजीव उसे टाल रहा है तो वह उस पर शादी के लिए दबाव बनाने के साथसाथ ज्यादा से ज्यादा माल झटकने की कोशिश करने लगी.

सुमन की हरकतों से राजीव को लगने लगा कि मौजमस्ती के लिए की गई यह दोस्ती गले का फांस बन रही है. वह सुमन से बचने की कोशिश करने लगा. लेकिन उस से मिलने वाले सुख के बिना वह रह नहीं सकता था, इसलिए मजबूर हो कर उसे उस के पास आता भी रहा.

3 जून की शाम को राजीव सुमन से मिलने आया तो सुमन ने एक बड़ी फरमाइश कर डाली. उस ने मुरादनगर में एक प्लौट दिलाने को कहा. हजारों की बात होती तो शायद राजीव तैयार भी हो जाता, लेकिन यहां तो मामला लाखों का था, इसलिए राजीव ने मना कर दिया. तब सुमन उसे फंसाने की धमकी देने लगी.

सुमन द्वारा धमकी देने पर राजीव को गुस्सा आ गया कि इस औरत के लिए उस ने कितना कुछ किया. उस का एहसान मानने के बजाय यह उसे बेनकाब करने की धमकी दे रही है. उसी गुस्से में उस ने सुमन के गले में पड़ी चुन्नी को पकड़ा और लपेट कर कस दिया. सुमन फर्श पर गिरी और मर गई. उसे उसी तरह छोड़ कर राजीव भाग गया. घबराहट में वह सुमन के कमरे का दरवाजा भी बंद करना भूल गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने राजीव के खिलाफ सारे सुबूत जुटा कर अगले दिन अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस तरह देह का यह राही जेल पहुंच गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

संजीव जीवा : डाक्टरी सीखते सीखते बना गैंगस्टर – भाग 3

जीवा पर कृष्णानंद की हत्या वाला मुकदमा चल ही रहा था कि हरिद्वार के एक बिजनैसमैन अमित दीक्षित उर्फ गोल्डी, जो कारपेट का बिजनैस करते थे, की गोली मार कर हत्या कर दी गई. उत्तराखंड पुलिस ने एक सप्ताह के अंदर ही शूटरों को पकड़ लिया. शूटरों से पूछताछ में जीवा का नाम आया तो पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया. उस से भी पूछताछ की गई.

वैसे तो जीवा के खिलाफ 2 दरजन से ज्यादा मुकदमे दर्ज थे, जिन में से 17 में वह बरी भी हो गया था. पर 2 मामलों में वह घिर गया. पहला था ब्रह्मदत्त की हत्या वाला मामला और दूसरा हरिद्वार के बिजनैसमैन की हत्या वाला मामला. इन दोनों ही मामलों में संजीव जीवा को उम्रकैद की सजा हुई थी. अमित दीक्षित वाले मामले में उस के साथ 4 अन्य लोगों को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.

हालांकि बाद में जीवा ने कहा था कि उस के शूटरों ने गलती की थी. जो बिजनैसमैन मारा गया था, उसे नहीं मारना था. मारना तो किसी दूसरे को था, वह गलती से मारा गया.

जीवा को बुलेटप्रूफ जैकेट पहना कर लाया जाता था कोर्ट

अब तक जीवा उत्तर प्रदेश के 65 अपराध माफिया की लिस्ट में शामिल हो चुका था. उस पर कई बार गैंगस्टर ऐक्ट के तहत काररवाई हो चुकी थी. प्रशासन ने उस की कई करोड़ की प्रौपर्टी भी जब्त की थी. सजा होने के बाद जीवा जेल चला गया. बागपत जेल में जब मुन्ना बजरंगी की हत्या कर दी गई तो जीवा पहली बार डर गया कि कहीं जेल या पेशी के लिए अदालत ले जाते समय उस की भी हत्या न कर दी जाए. तब जीवा की पत्नी पायल ने पति की जान को खतरा बताते हुए कोर्ट में अरजी लगाई.

परिणामस्वरूप कोर्ट ने आदेश दिया कि उस की सुरक्षा का ध्यान रखा जाए. तब पुलिस उसे जब भी पेशी पर अदालत ले जाती, बुलेटप्रूफ जैकेट पहना कर ले जाती थी. लेकिन जीवा की पत्नी पायल का आरोप है कि इधर 2 पेशी से पुलिस उसे बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के ही पेशी पर अदालत ला रही थी. उसी का नतीजा था कि जीवा पर जब गोलियां चलाई गईं तो उसे जो 6 गोलियां लगीं, उन में से 4 सीने में और 2 कमर में लगीं, जिस की वजह से उस की मौत हुई.

जीवा की हत्या के आरोप में जो युवक पकड़ा गया था, पूछताछ में पता चला कि उस का नाम विजय यादव है. वह उत्तर प्रदेश के ही जिला जौनपुर का रहने वाला था. वह बीकौम तक पढ़ा था. पढ़ाई करने के बाद वह मुंबई चला गया था, जहां उस ने पानी की पाइप बनाने वाली एक कंपनी में 3 सालों तक नौकरी की थी. देश में जब कोरोना महामारी फैली तो वह गांव आ गया था.

जब पुलिस ने पता लगाया कि इतने बड़े डौन को मारने वाले युवक का आपराधिक इतिहास क्या है तो पता चला कि उस के खिलाफ मात्र 2 केस दर्ज थे. पहला आजमगढ़ जिले में दर्ज था, जिस में एक नाबालिग लडक़ी को भगाने के आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया था. इस मामले में वह 6 महीने जेल में भी रहा. जब लडक़ी के घर वालों ने सुलह कर ली तो वह जेल से बाहर आ गया था.

बाद में पता चला कि लडक़ी को भगाने वाला तो कोई और ही था, विजय को पुलिस ने गलती से पकड़ लिया था. दूसरा मामला कोरोना के नियमों के उल्लंघन का था, जिस का हत्या जैसे अपराधों से कोई संबंध नहीं हो सकता.

20 लाख की सुपारी दे कर कराया जीवा का मर्डर

पुलिस पूछताछ में पता चला कि एक रिश्तेदार की शादी में विजय 10 मई, 2023 को घर आया था. 11 मई को वह यह कह कर घर से निकला था कि अब वह मुंबई नहीं जाएगा, यहीं लखनऊ में ही कोई नौकरी ढूंढेगा. इस के बाद से घर वालों से उस का कोई संपर्क नहीं हुआ था.

विजय यादव ने जिस रिवौल्वर से जीवा की हत्या की थी, वह काफी महंगी थी. उस की कीमत करीब 7 लाख रुपए बताई जाती है. जबकि घर वालों ने बताया था कि विजय के पास तो कभीकभी फोन रिचार्ज कराने के लिए भी पैसे नहीं होते थे. तब पुलिस को लगा कि अतीक-अशरफ की तरह संजीव की भी हत्या कराने वाला कोई और है, जिस ने विजय को इतनी महंगी रिवौल्वर उपलब्ध कराई थी.

बता दें कि इलाहाबाद के डौन अतीक अहमद और उस के भाई अशरफ की तब 3 अज्ञात लोगों ने हत्या कर दी थी, जब दोनों भाई इलाहाबाद में अस्पताल से मैडिकल करा कर बाहर निकल रहे थे. पकड़े गए हत्यारे न तो अतीक और अशरफ को जानते थे और न उन की उन से कोई दुश्मनी थी. वे पत्रकार बन कर आए थे. तीनों बेहद गरीब परिवारों से आते थे. जबकि उन के पास से जो रिवौल्वर मिले थे, वे विदेशी थे और उन की कीमत लाखों में थी, जिन्हें खरीदने की उन की हैसियत नहीं थी.

ऐसा ही संजीव जीवा की हत्या के मामले में भी था. विजय की न तो जीवा से कोई दुश्मनी थी और न वह उस से कभी मिला था. उस के पास से भी जो रिवौल्वर मिली थी, उस की हैसियत उसे खरीदने की नहीं थी. इस का साफ मतलब था कि जीवा की हत्या किसी और ने विजय को सुपारी दे कर कराई थी.

रिमांड के दौरान पूछताछ में विजय ने बताया कि संजीव जीवा की हत्या की डील उस ने नेपाल में की थी. अशरफ ने उसे जीवा की हत्या की सुपारी दी थी. अशरफ का भाई आतिफ लखनऊ जेल में बंद था. जीवा जेल में आतिफ को परेशान करता था. उस ने आतिफ की दाढ़ी तक नोच ली थी.

इसी अपमान का बदला लेने के लिए अशरफ ने संजीव जीवा की हत्या कराई है. आगे की जांच में पता चला कि विजय मई के अंत में नेपाल की राजधानी काठमांडू गया था. विजय को जीवा की हत्या की सुपारी 20 लाख रुपए में दी गई थी. उसे रिवौल्वर बहराइच में उपलब्ध कराई गई थी. फिलहाल तो विजय लखनऊ की जेल में बंद है.

देवर के इश्क़ में – भाग 2

अब रामखिलौने का उस के यहां आनाजाना उस समय होने लगा, जब रामनिवास और गायत्री खेतों पर होते. एक दिन मौका पा कर रामखिलौने घर आया तो बातोंबातों में उस ने पुष्पा की खूबसूरती की तारीफ शुरू कर दी. पुष्पा हैरानी से उस की ओर देखने लगी. इस से पहले कि वह उस से कुछ कह पाती, उस ने लपक कर उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो?’’  पुष्पा अपना हाथ छुड़ा कर बोली, ‘‘जानते हो मैं तुम्हारे बड़े भाई की पत्नी हूं.’’

पुष्पा कहने को तो यह बात कह गई, लेकिन उसे रामखिलौने का स्पर्श अच्छा लगा था.

रामखिलौने ने कहा, ‘‘भाभी, मैं वादा करता हूं कि हमेशा तुम्हारा साथ दूंगा और जीवन भर तुम्हें प्यार करता रहूंगा.’’

पुष्पा रामखिलौने की बात का जवाब दिए बगैर दूसरे कमरे में चली गई. उस के तेवर देख कर रामखिलौने डर गया और वहां से चला गया. उस के जाने के बाद  पुष्पा परेशान हो कर चारपाई पर बैठ गई और अभीअभी जो हुआ था, उसी के बारे में देर तक सोचती रही. आखिर उस के बागी मन ने तय कर लिया कि वह रामखिलौने की मोहब्बत को कुबूल कर लेगी.

अगले कुछ दिनों तक रामखिलौने डर की वजह से  पुष्पा के यहां नहीं आया. पुष्पा काफी परेशान थी. एक दिन उस ने गली में रामखिलौने को खड़ा देखा तो उसे चाहत भरी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘बस यही है तुम्हारी मोहब्बत. उस दिन तो बड़ीबड़ी बातें कर रहे थे.’’

पुष्पा की बातें सुन कर रामखिलौने खुश हो गया. वह समझ गया कि पुष्पा उस से नाराज नहीं है. उस ने कहा, ‘‘भाभी, मैं तो आने ही वाला था.’’

‘‘सब जानती हूं मैं.’’  पुष्पा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आज आधी रात को आ जाना, मैं इंतजार करूंगी.’’

रामखिलौने का दिल बल्लियों उछलने लगा. वह अपने घर चला गया और रात होने का इंतजार करने लगा. अब उस के लिए एकएक पल बहुत लंबा महसूस हो रहा था. वह चाह रहा था कि जल्द से जल्द रात हो, जिस से वह पुष्पा से मिल सके. सूरज छिपने के बाद जैसेजैसे अंधेरा गहरा रहा था, रामखिलौने के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं.

दूसरी ओर पुष्पा को पूरा विश्वास था कि रामखिलौने रात को जरूर आएगा. इसलिए उस ने फटाफट घर का काम निपटाया और बेटे को सुला दिया. सासससुर भी खापी कर सो गए. वह बेसब्री से रामखिलौने का इंतजार करने लगी. आधी रात के करीब उस के दरवाजे पर हलकी सी दस्तक हुई.  पुष्पा का दिल धड़कने लगा.

दबे पांव पुष्पा दरवाजे पर पहुंची. जैसे ही उस ने दरवाजा खोला, सामने रामखिलौने को देख कर खुश हो गई. इशारे से उस ने उसे अंदर बुला लिया और अपने कमरे में ले गई. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. कुछ ही देर में उन के रिश्ते तारतार हो गए.

इस के बाद रामखिलौने खुश हो कर चुपचाप वहां से चला गया. दिल्ली में बैठा अनिल अपनी नौकरी में व्यस्त था. उस की गृहस्थी में उस का चचेरा भाई सेंध लगा सकता है, ऐसा उस ने कभी सोचा भी नहीं था. वह तो इसी कोशिश में लगा था कि किसी तरह वह दिल्ली में अपना घर बना ले.

अवैध संबंधों की राह बड़ी ही ढलवां होती है, जो कोई एक बार इस राह पर कदम बढ़ाता है, वह गर्त में धंसता चला जाता है. अब तो पुष्पा को जब भी मौका मिलता, वह रामखिलौने को अपने घर बुला लेती. चूंकि उन का यह खेल घर में होता था, इसलिए काफी समय उन के संबंधों की किसी को भनक नहीं लगी.

इस बीच पुष्पा के तेवर काफी बदल गए थे. गायत्री समझ नहीं पा रही थी कि वह बहू से कुछ काम करने को कहती है तो वह तबीयत खराब होने की बात कह कर टाल क्यों देती है, जबकि जब कभी रामखिलौने आता है, तुरंत उठ कर चाय बनाने चली जाती है.

गायत्री ने पहले तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब एक पड़ोसन ने रामखिलौने के उन के घर रोजाना आने की बात बताई तो वह चौंकी. गायत्री सोचने लगी कि कहीं उस की बहू और रामखिलौने के बीच कोई चक्कर तो नहीं है. यह शक गायत्री के दिमाग में बैठ गया.

अगले दिन वह पति के साथ खेत पर नहीं गई. दोपहर में रामखिलौने घर आया तो ताई को देख कर सकपका गया. उस ने कहा, ‘‘रामिखलौने, तू दिनभर इधरउधर घूमता रहता है, तेरे पास कोई काम नहीं क्या है?’’

रामखिलौने हंसने लगा, ‘‘तुम ने यह कैसे सोच लिया ताई कि मैं कोई काम नहीं करूंगा? देखना एक दिन मैं ऐसा काम करूंगा कि तुम हैरान रह जाओगी.’’

‘‘ठीक है, जब करना तब करना, लेकिन दिन भर मेरे घर के फेरे लगाने की जरूरत नहीं है.’’

सास की यह बात पुष्पा ने भी सुन ली थी. वह डर गई कि कहीं सास को उन के संबंधों पर शक तो नहीं हो गया, जो वह रामखिलौने से इस तरह कह रही है. ताई की बात सुन कर रामखिलौने का भी चेहरा उतर गया. वह उसी समय बिना कुछ कहे वहां से चला गया.  रामखिलौने ने अब पुष्पा के यहां जाना बंद कर दिया. प्रेमी से मुलाकात न होने की वजह से पुष्पा बेचैन रहने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि उस से कैसे मिले.

एक दिन पुष्पा की तबीयत खराब हो गई. वह गांव के डाक्टर से दवा लेने गई. घर लौटते समय उसे रामखिलौने मिल गया. उस ने रामखिलौने से बेचैनी प्रकट की तो उस ने कहा, ‘‘तुम चिंता न करो भाभी. मैं तुम्हें एक मोबाइल दे दूंगा. तुम जब भी बुलाओगी, मैं आ जाऊंगा.’’

‘‘लेकिन ऐसा कब तक चलेगा? मैं जानती हूं कि जब अनिल आएगा तो इस बात को ले कर घर में तूफान खड़ा हो जाएगा. इसलिए बेहतर होगा कि तुम सतर्क रहो.’’

2 दिनों बाद रामखिलौने ने एक मोबाइल फोन खरीद कर पुष्पा को दे दिया. अब दोनों मोबाइल से रात को अपने मन की बातें करने लगे. चूंकि अब पुष्पा की सास सतर्क हो चुकी थी, इसलिए वह बहू की गतिविधियों पर नजर रखने लगी थी. एक रात उस ने बहू और रामखिलौने को छत पर देख लिया. गायत्री को देख कर रामखिलौने छत से कूद कर भाग गया. इस के बाद गायत्री ने पुष्पा को बहुत फटकारा.

देह की राह के राही – भाग 2

25 वर्षीया सुमन सिंह अपने 3 साल के बेटे तनुष के साथ उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के नंदग्राम में मंजू शर्मा के मकान में किराए पर रहती थी. उस के मकान का किराया 3 हजार रुपए महीना था. उस के पिता नत्थू सिंह अपनी पत्नी विमलेश और 4 बच्चों के साथ गाजियाबाद के इंद्रापुरम के न्यायखंड-3 में रहते थे.

नत्थू सिंह मूलरूप से मुरादनगर के रहने वाले थे. जहां वह चाट का ठेका लगाते थे. यह उन का पुश्तैनी धंधा था. गाजियाबाद आ कर भी उन्होंने अपने इसी काम को तरजीह दी और यहां वह अपना चाट का ठेला अपने एकलौते बेटे की मदद से न्यायखंड की मेन बाजार में लगाने लगे. यहां भी उन का धंधा बढि़या चल रहा था.

बच्चों में सुमन सब से बड़ी थी, इसलिए मांबाप की कुछ ज्यादा ही लाडली थी. लाड़प्यार से वह जिद्दी होने के साथसाथ बेलगाम भी हो गई थी. चाट के ठेले से इतनी कमाई नहीं होती थी कि नत्थू सिंह अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला पाते. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि उस के बच्चे अनपढ़ थे. जरूरत भर की शिक्षा उस ने सभी को दिला रखी थी.

कहा जाता है कि बेटी के सयानी होने की जानकारी मातापिता से पहले पड़ोसियों को हो जाती है. नत्थू सिंह की बेटी सुमन भी सयानी हो गई थी, बेटी वैसे ही जिद्दी और बेलगाम थी. कोई ऊंचनीच हो, नत्थू सिंह और विमलेश उस से पहले ही उस के हाथ पीले कर उसे विदा कर देना चाहते थे.

विमलेश ने जब इस बारे में नत्थू सिंह से बात की तो उस ने कहा, ‘‘मैं तो पूरा दिन घर से बाहर काम में लगा रहता हूं. अगर तुम्हीं कोई ठीकठाक लड़का देख कर शादी तय कर लो तो ज्यादा ठीक रहेगा. मेरे आनेजाने से नुकसान ही होगा.’’

इस तरह नत्थू सिंह ने यह जिम्मेदारी पत्नी पर डाल दी. विमलेश तेजतर्रार थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं ही कुछ करती हूं.’’

विमलेश ने कहा ही नहीं, बल्कि लड़के की तलाश भी शुरू कर दी. उस ने अपने तमाम रिश्तेदारों एवं परिचितों से सुमन के लायक लड़का बताने के लिए कह दिया.

विमलेश की यह कोशिश रंग लाई और जल्दी ही इस का सुखद नतीजा सामने आ गया. किसी से उसे पता चला कि गांव के रिश्ते की एक मौसी का एकलौता बेटा परवीन शादी लायक है. वह दिल्ली नगर निगम के उद्यान विभाग में माली था. उस के पिता सहदेव की मौत हो चुकी थी. यहां वह परिवार के साथ फरीदाबाद के लक्कड़पुर में रहता था.

सरकारी नौकरी वाला लड़का था, वेतन तो ठीकठाक था ही, उस के साथ भविष्य भी सुरक्षित था. यही सोच कर नत्थू सिंह और विमलेश ने परवीन के साथ सुमन की शादी फरवरी, 2008 में अपनी हैसियत के हिसाब से दहेज दे कर कर दी.

विदा हो कर सुमन ससुराल आ गई. तेजतर्रार, सपनों में जीने वाली सुमन ने जैसे पति की कामना की थी, परवीन उस का एकदम उलटा था. साधारण शक्लसूरत वाला परवीन बहुत ही सीधा था. वह न तो किसी से ज्यादा बातचीत करता था और न ही किसी से ज्यादा मेलजोल रखता था. अपने काम से काम रखने वाले परवीन का रवैया पत्नी के प्रति भी ऐसा ही था. शादी के बाद भी उस की इस आदत में कोई बदलाव नहीं आया तो सुमन परेशान रहने लगी.

सुमन तो अपनी ही तरह का खुशमिजाज पति चाहती थी, जो खुद भी हंसताबोलता रहे और दूसरों को भी बोलबोल कर हंसाता रहे. शाम को साथ घूमने जाने को कौन कहे, परवीन घर में भी सुमन से प्यार के 2 शब्द नहीं बोलता था. जब तक घर में रहता, मौनी बाबा की तरह चुप बैठा रहता. बोलता भी तो सिर्फ जरूरत भर की बात करता. पति की इस आदत से सुमन जल्दी ही ऊब गई.

सुमन को परवीन के साथ जिंदगी बोझ लगने लगी और घुटन सी होने लगी तो वह उसे छोड़ कर मायके आ गई. हालांकि अब तक वह परवीन के 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. उस की 5 साल की बेटी तनु थी और 3 साल का बेटा तनुष. मात्र 6 साल ही उस का यह वैवाहिक संबंध चला था.

सुमन के घर वालों ने ही नहीं, परवीन के घर वालों ने भी बहुत कोशिश की कि परवीन और सुमन एक बार फिर साथ आ जाएं, लेकिन सुमन इस के लिए कतई तैयार नहीं हुई. दोनों बच्चे भी उसी के साथ थे. नत्थू सिंह का अपना छोटा सा मकान था, जिस में 9 लोग नहीं रह सकते थे. इस के अलावा सुमन को पता था कि मांबाप के घर से विदा होने के बाद अगर किसी वजह से बेटी वापस आ जाती है तो उसे पहले जैसा सम्मान नहीं मिलता.

सुमन के आने से रहने में तो परेशानी हो ही रही थी, मांबाप पर खर्च का बोझ भी बढ़ गया था. इसलिए अपने और बच्चों के गुजरबसर के लिए उस ने जोरशोर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप जल्दी ही उसे गाजियाबाद की एक गारमेंट फैक्टरी में ‘पैकर’ की नौकरी मिल गई. रोजीरोटी का जुगाड़ हो गया तो समस्या आई रहने की, क्योंकि उस छोटे से घर में उतने लोगों का रहना मुश्किल हो रहा था.

सुमन की मां विमलेश ने गाजियाबाद के ही नंदग्राम इलाके में रहने वाली अपनी एक मुंहबोली बहन बबिता उर्फ पारो से बात की तो उस ने अपनी जिम्मेदारी पर मंजू शर्मा के मकान में पहली मंजिल के हिस्से को 3 हजार रुपए महीने के किराए पर दिला दिया. सुमन उसी मकान में अपने 3 वर्षीय बेटे तनुष के साथ रहने लगी, जबकि बेटी मांबाप के साथ रहती थी.

सुमन की जिंदगी पटरी पर आ रही थी कि एकाएक उस की नौकरी चली गई, जिस से जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतर गई. सुमन के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. नौकरी चली जाने से वह आर्थिक परेशानियों में घिर गई. अब उसे मकान का किराया भी देना पड़ रहा था  मातापिता भी कब तक सहारा देते. संकट की इस घड़ी में एक बार फिर सहारा दिया मुंहबोली मौसी बबिता ने. उसी ने सुमन की दोस्ती धूकना गांव के रहने वाले राजीव त्यागी से करा दी, जो उस का पूरा खर्च उठाने लगा.

राजीव त्यागी के पिता सत्येंद्र त्यागी की नंदग्राम में बिजली के सामान की दुकान थी, जिसे बापबेटे मिल कर चलाते थे. दुकान ठीकठाक चलती थी, इसलिए राजीव के पास पैसों की कमी नहीं थी. पैसे वाला होने की वजह से सुमन का खर्च उठाने में उसे कोई दिक्कत नहीं हो रही थी.

राजीव और सुमन का लेनदेन का यह संबंध प्यार में बदला तो सुमन को लगने लगा कि राजीव उस से शादी कर लेगा. वह राजीव से शादी करना भी चाहती थी, क्योंकि राजीव ठीक वैसा था, जैसा पति वह चाहती थी. लेकिन वह राजीव की पत्नी बन पाती, उस के पहले ही 3 जून, 2014 को उस की हत्या हो गई.

रात 9 बजे के आसपास मकान मालकिन मंजू शर्मा किसी काम से पहली मंजिल पर गईं तो उन्होंने देखा, सुमन का कमरा खुला पड़ा है. उन्होंने कमरे में झांका तो दरवाजे के पास ही वह चित पड़ी दिखाई दी. उस की चुन्नी गले में लिपटी थी, इसलिए उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उस की हत्या की गई है. उन्होंने इस बात की जानकारी पड़ोसियों को दे कर सुमन की हत्या की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दिला दी.

संजीव जीवा : डाक्टरी सीखते सीखते बना गैंगस्टर – भाग 2

अपहरण के इस मामले में उस ने उस समय 2 करोड़ की फिरौती वसूली थी. यह 1992 की बात है. उस समय 2 करोड़ की रकम बहुत बड़ी होती थी. उस की इस वसूली पर इलाके में सनसनी फैल गई थी.

इस के बाद अपराध की दुनिया में जीवा का भी नाम हो गया. कहते हैं न कि बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हो ही गया. ऐसा ही जीवा के साथ भी हुआ. लोग जानने लगे की इलाके में संजीव जीवा नाम का भी कोई बदमाश है, जो बड़ेबड़े लोगों का अपहरण कर के फिरौती में मोटी रकम वसूलता है.

जीवा का छुटभैया बदमाशों का गैंग था, जिन की बदौलत वह फिरौती, रंगदारी आदि वसूलता था और जमीनों पर कब्जा करता था. लेकिन कोलकाता वाले अपहरण के बाद वह मुजफ्फरनगर के गिनेचुने बदमाशों में गिने जाने वाले नाजिम गैंग में शामिल हो गया. कुछ दिन इस गैंग के साथ काम करने के बाद जीवा को रविप्रकाश नाम के गैंगस्टर ने अपनी गैंग में शामिल कर लिया.

तमाम गैंगों में होने लगी जीवा की मांग

रविप्रकाश के गैंग में शामिल होने के बाद जीवा की गिनती बड़े बदमाशों में होने लगी. अब वह रंगदारी वसूलने के साथसाथ हथियारों की हेराफेरी भी करने लगा था. क्योंकि हथियारों की सप्लाई से भी अच्छी कमाई होती थी और जीवा को पैसा कमाना था, इसलिए पैसे के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था.

गैंगस्टर रविप्रकाश के गैंग में रह कर जीवा ने कुछ बहादुरी वाले कारनामे किए तो उसी इलाके के रविप्रकाश से भी बड़े गैंगस्टर सत्येंद्र बरनाला ने संजीव जीवा को बुला कर अपने गैंग में शामिल कर लिया. जिस तरह प्राइवेट नौकरियों में जिन का नाम हो जाता है, उन्हें दूसरी कंपनियां ज्यादा पैसे का औफर दे कर अपने यहां बुला लेती हैं, वैसा ही इन गैंगस्टरों के बीच भी होता है.

सत्येंद्र बरनाला ने संजीव जीवा को ज्यादा हिस्सा और सुविधा का लालच दिया तो वह रविप्रकाश का गैंग छोड़ कर सत्येंद्र बरनाला के यहां चला गया. कुछ दिन सत्येंद्र के साथ काम करने के बाद जीवा को लगने लगा कि वह दूसरों के लिए काम करने के बजाय अपना काम क्यों न करे. फिर उस ने कुछ बदमाशों को इकट्ठा कर के अपना गैंग बना लिया. क्योंकि अब तक वह इतना सक्षम हो चुका था कि अपना स्वतंत्र गैंग चला सकता था.

90 के दशक में जब जीवा उभर रहा था, उस समय उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ेबड़े डौन जैसे मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी, भोला जाट, बदन सिंह बद्दो आदि जुर्म की दुनिया के बादशाह थे. जीवा मुजफ्फरनगर का रहने वाला था, साथ में उत्तराखंड था. ये सभी डौन जुर्म की दुनिया में नाम कमा रहे थे, भले ही गलत तरीके से नाम कमा रहे थे. लेकिन प्रदेश का हर कोई इन के नाम से परिचित था. हर कोई इन के नाम से खौफ खाता था.

भाजपा नेता की हत्या में आया जीवा का नाम

उसी बीच 10 फरवरी, 1997 को बीजेपी नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या हो गई. ब्रह्मदत्त द्विवेदी भाजपा के राज्य के एक कद्दावर नेता थे. उन के कद का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन के अंतिम संस्कार में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता आए थे. ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या का आरोप मुख्तार अंसारी के साथ संजीव जीवा पर भी लगा था.

इस के बाद तो उत्तर प्रदेश का लगभग हर डौन यही चाहने लगा कि शार्पशूटर संजीव जीवा उस के साथ आ जाए. क्योंकि उन सब का यही सोचना था कि जो आदमी इतने बड़े नेता की हत्या कर सकता है, उस से कोई भी काम कराया जा सकता है. सभी ने जीवा को अपनेअपने गैंग में शामिल होने का न्यौता दिया. जबकि जीवा को सब से ज्यादा कोई पसंद था तो वह था मुन्ना बजरंगी. जीवा मुन्ना बजरंगी का फैन था और मुन्ना बजरंगी मुख्तार अंसारी का आदमी था.

जीवा को जब लोगों के औफर मिले तो उस ने मुन्ना बजरंगी को चुना. क्योंकि मुन्ना बजरंगी का काम करने का तरीका उसे बहुत पसंद था. उस समय मुन्ना बजरंगी जेल में था. वह मुन्ना बजरंगी से मिलने जेल गया और उस से अपनी मंशा बताई तो जीवा जैसा हिम्मत वाला साथी पा कर मुन्ना बजरंगी को खुशी ही हुई.

मुन्ना बजरंगी भले जेल में था, लेकिन उस के जुर्म का कारोबार तो चल रहा ही रहा था. अब उस का जुर्म का कारोबार जीवा भी देखने लगा. चूंकि मुन्ना बजरंगी मुख्तार का आदमी था, इसलिए जीवा मुन्ना की बदौलत मुख्तार तक पहुंच गया और अब वह मुख्तार अंसारी के लिए काम करने लगा.

इसी बीच भाजपा के एक और नेता कृष्णानंद राय की गोली मार कर हत्या कर दी गई. कहते हैं उन्हें 4 सौ गोलियां मारी गई थीं. कृष्णानंद राय की हत्या में मुख्तार अंसारी के साथ संजीव जीवा का भी नाम आया था. इस तरह ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या के बाद संजीव जीवा का एक और नेता की हत्या में नाम आया.

गिरफ्तारी भी हुई और मुकदमा भी चला. ब्रह्मदत्त की हत्या वाले मामले में मुख्तार को तो सजा हो गई, पर संजीव जीवा बरी हो गया. जबकि पुलिस सूत्रों की मानें तो कृष्णानंद राय की हत्या में जिन हथियारों का उपयोग किया गया था, वह संजीव जीवा ने ही उपलब्ध कराए थे.

यूपी और उत्तराखंड में बढ़ गया जीवा का रुतबा

अब तक संजीव जीवा का नाम प्रदेश के गिनेचुने बदमाशों में होने लगा था. 2-2 हत्याओं में उस का नाम आ चुका था. उसे उम्रकैद की सजा भी हो चुकी थी. लेकिन मुख्तार का करीबी होने के कारण वह अकसर जमानत पर या पैरोल पर बाहर आ जाता था. अब तक जीवा का अपराध का कारोबार मुजफ्फरनगर के अलावा गाजियाबाद, दिल्ली और मेरठ तक फैल गया था. बड़ेबड़े लोग इलाके में अपना रुतबा बनाने के लिए उसे अपने यहां बुलाने लगे थे.

ऐसे में वह गाजियाबाद में किसी शादी में गया था तो वहां उस की नजर पायल शर्मा नाम की एक लडक़ी पर पड़ी तो उस से उसे प्यार हो गया. बाद में पायल से शादी कर ली.

देवर के इश्क़ में – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जिला एटा के थाना नया गांव के तहत आता है एक गांव असदपुर, जहां रामनिवास  लोधी अपने 3 बेटों, मुखराम, अनिल और भूप सिंह के साथ रहते थे. रामनिवास की खेती की कुछ जमीन थी, उसी से वह परिवार का भरणपोषण करते थे. मुखराम जब जवान और समझदार हुआ तो वह घर की आमदनी बढ़ाने के उपाय खोजने लगा.

उस के गांव के कई लड़के दिल्ली में नौकरी करते थे, वे काफी खुशहाल थे. दिल्ली जाने के बारे में उस ने भी पिता से बात की और अपने एक दोस्त के साथ दिल्ली चला गया. कुछ दिन वह दोस्त के यहां रहा. उसी के सहयोग से उसे एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई. बाद में वह दिल्ली के नंदनगरी इलाके में किराए का कमरा ले कर अकेला रहने लगा.

नौकरी करने के बाद मुखराम को फैक्ट्री से जो तनख्वाह मिलती थी, उस में से वह अपने खर्चे के पैसे रख कर बाकी पैसे घर भेज देता था. इस से घर के आर्थिक हालात सुधरने लगे. पैसा आया तो मुखराम बनठन कर रहने लगा. उस की शादी के लिए रिश्ते भी आने लगे. घर वालों को एटा की ही रजनी पसंद आ गई. बातचीत के बाद मुखराम की रजनी से शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों बाद मुखराम रजनी को दिल्ली ले आया. इस तरह उन की जिंदगी हंसीखुशी से कटने लगी.

भाई को देख कर अनिल ने भी गांव की संकुचित सीमा से निकल कर दिल्ली के खुले आकाश में सांस लेने का फैसला कर लिया. एक दिन वह भी बड़े भाई मुखराम के साथ दिल्ली चला गया. भाई ने उस की भी नौकरी लगवा दी.

दोनों भाई साथ रह रहे थे, इसलिए घर वाले उन की तरफ से बेफिक्र थे. अनिल को भी दिल्ली की जिंदगी रास आ गई थी. दोनों भाई 2-4 दिनों के लिए छुट्टियों पर ही घर जाते थे. घर पर उन का छोटा भाई भूप सिंह ही रह गया था. वह पिता के साथ खेती करता था. अनिल भी कमाने लगा तो रामनिवास उस के लिए भी लड़की तलाशने लगा.

एक रिश्तेदार के जरिए फर्रुखाबाद जिले के गांव रहीसेपुर के रहने वाले सुरेश की बेटी पुष्पा का रिश्ता अनिल के लिए आया तो रामनिवास ने उस की भी शादी पुष्पा से कर दी. यह करीब 5 साल पहले की बात है. कुछ दिनों बाद पुष्पा भी अनिल के साथ दिल्ली आ गई. दोनों भाई एक ही कमरे में रहते थे. पुष्पा को यह अच्छा नहीं लगता था.

अनिल ने पुष्पा को समझाया कि महानगर की जिंदगी ऐसी ही होती है. आदमी को हालात से समझौता करना पड़ता है. पुष्पा का दिल्ली में मन लग जाए, इस के लिए अनिल ने पुष्पा को दिल्ली में खूब घुमायाफिराया. पुष्पा के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. उसे अच्छा तो लगा, लेकिन किराए के छोटे से कमरे में उस का मन नहीं लगा तो अनिल उसे गांव छोड़ आया.

उस बीच अनिल का छोटा भाई भूप सिंह भी अपने भाइयों के पास दिल्ली आ गया. अनिल दिल्ली में था और पुष्पा गांव में सासससुर के पास. नईनवेली दुलहन को पति के साथ रहने के बजाय तनहाई में रहना पड़ रहा था. उस की उमंगे दम तोड़ती नजर आ रही थीं. केवल मोबाइल के जरिए ही उस की पति से बात हो पाती थी.

पुष्पा अपने मन की बात पति से बताती तो वह 1-2 दिन की छुट्टी ले कर घर आ जाता.  पुष्पा मन की पूरी बात भी नहीं कह पाती थी कि अनिल वापस जाने की बात करने लगता था, क्योंकि उसे अपनी ड्यूटी भी तो देखनी थी. हर बार पुष्पा उदास मन से उसे विदा करती. एक बार पुष्पा की उदासी देख कर अनिल ने अपने मांबाप से कहा कि वह पुष्पा को दिल्ली ले जाना चाहता है. मांबाप ने इजाजत दे दी तो वह उसे एक बार फिर दिल्ली ले गया.

पुष्पा अनिल के साथ उसी एक कमरे के घर में आ गई. वह मन लगाने की कोशिश करने लगी. अनिल ने सोचा कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उसी बीच पुष्पा गर्भवती हो गई. पुष्पा ने यह खुशखबरी सास गायत्री को दी तो गायत्री को लगा कि ऐसी हालत में बहू को गांव आ जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे में काफी देखभाल की जरूरत होती है. इसलिए गायत्री ने अनिल से कह दिया कि छुट्टी मिलने पर वह बहू को गांव छोड़ जाए.

कुछ दिनों बाद पुष्पा गांव आ गई. अब सास उस की देखभाल करने लगी. समय आने पर  पुष्पा ने बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म के बाद घर में खुशी छा गई. अनिल भी फूला नहीं समा रहा था. बच्चे का नाम आयुष रखा गया.

घर में पोते के आ जाने से रामनिवास और गायत्री के दिन उस के साथ अच्छे से कटने लगे. उधर अनिल का भी मन करता कि बेटा उस की नजरों के सामने रहे, ताकि वह उसे प्यार कर सके. लेकिन ऐसा संभव नहीं था. वह महीने-दो महीने में घर आता और 1-2 दिन रह कर दिल्ली चला जाता.

रामनिवास का छोटा भाई वेदराम उस के घर से कुछ दूरी पर अपने परिवार के साथ रहता था. उस का बेटा रामखिलौने अविवाहित था. रामनिवास के तीनों बेटे दिल्ली में थे, इसलिए रामखिलौने जबतब ताऊ के घर आ जाता और घर के छोटेमोटे काम कर देता.

घर में किसी के न होने से पुष्पा भी रामखिलौने से ही अपनी जरूरत का सामान मंगवाती थी. वह जब भी उस के घर आता,  पुष्पा उसे चायनाश्ता करा देती थी. पुष्पा की नजदीकी रामखिलौने की जवान उमंगों को हवा दे रही थी, इसलिए उस का नजरिया भाभी के प्रति बदल रहा था. नजरिया बदला तो उस का वहां आनाजाना बढ़ गया.

एक दिन रामखिलौने ताऊ के घर आया तो पुष्पा अकेली थी. रामखिलौने को लगा कि भाभी से अपने दिल की बात कहने का यह अच्छा मौका है.  पुष्पा उस के लिए चाय बना कर लाई तो चाय पीते हुए उस ने कहा, ‘‘भाभी भैया कितना निर्दयी है कि उसे न तो तुम्हारी परवाह है और न ही छोटे से बच्चे की. बीवीबच्चे को यहां छोड़ कर वह दिल्ली में आराम से बैठा है.’’

इस के बाद रामखिलौने कुछ देर पुष्पा की तारीफ करता रहा. वह तो चला गया, पर उस की बातों ने पुष्पा के मन में चिंगारी लगा दी, जो धीरेधीरे सुलगने लगी थी. अब उसे अपनी जेठानी से जलन होने लगी, जो दिल्ली में अपने पति के पास रह रही थी. तनहाई के उन उदास दिनों में उसे लगने लगा कि रामखिलौने ही एक ऐसा आदमी है, जो उस के दर्द को समझता है.

एक दिन रामखिलौने आयुष के लिए कपड़े ले आया. पुष्पा के मना करने के बाद भी वह जबरदस्ती उसे थमा गया. अब वह आयुष के बहाने पुष्पा के नजदीक आने कोशिश करने लगा था. उस के जाने के बाद पुष्पा देर तक उस के बारे में सोचती रही. उसे लगा कि रामखिलौने अच्छा इंसान है, जो उस के बारे में चिंतित रहता है. जबकि पति को उस की जरा भी परवाह नहीं है. धीरेधीरे उस का झुकाव रामखिलौने की तरफ होने लगा.

देह की राह के राही – भाग 1

फोन की घंटी बजी तो सुमन ने स्क्रीन पर नंबर देखा. नंबर मुंहबोली मौसी बबिता का  था, जो उस के घर से कुछ दूरी पर रहती थीं. उस ने जल्दी से फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो, मौसी नमस्ते, आप कैसी हैं, फोन कैसे किया?’’

‘‘नमस्ते बेटा, मैं तो ठीक हूं. तू बता कैसी है?’’ बबिता ने अपने बारे में बता कर सुमन का हालचाल पूछा तो वह बोली, ‘‘मैं भी ठीक हूं मौसी. बताइए, फोन क्यों किया?’’

‘‘मैं ने फोन इसलिए किया है कि तू ने जिस काम के लिए मुझ से कहा था, वह हो गया है. तू जब भी उस से मिलना चाहे, मिल सकती है.’’

‘‘अगर मैं आज ही उस से मिलना चाहूं तो..?’’ सुमन ने चहक कर पूछा.

‘‘हां…हां, आज ही मिल ले. लेकिन रुक, मैं उसे एक बार और फोन कर के पूछ लेती हूं. उस के बाद तुझे फोन करती हूं.’’ कह कर बबिता ने फोन काट दिया.

कुछ देर बाद बबिता ने फोन कर के कहा, ‘‘ठीक है, आज शाम को राजनगर के प्रियदर्शिनी पार्क में तू उस से मिल सकती है. उस का नाम राजीव है. मैं तुझे उस का मोबाइल नंबर दिए देती हूं. जाने से पहले तू उसे एक बार फोन कर लेना.’’

इस के बाद बबिता ने राजीव का मोबाइल नंबर सुमन को लिखा दिया. दरअसल सुमन ने अपनी मुंहबोली मौसी बबिता से कहा था कि नौकरी छूट जाने की वजह से वह काफी तंगी में आ गई है. इसलिए वह उस की दोस्ती किसी ऐसे आदमी से करा दे, जो उस की हर तरह मदद कर सके और वक्त जरूरत काम आ सके. उसी के लिए बबिता ने उसे फोन किया था. उस ने कहा था कि राजीव अच्छा लड़का है और उसे भी उसी की तरह एक बढि़या दोस्त की तलाश है.

बबिता से नंबर ले कर सुमन ने राजीव को फोन किया तो उस ने सुमन को शाम को राजनगर के प्रियदर्शिनी पार्क में मिलने के लिए बुला लिया. राजीव को प्रभावित करने, एक तरह से उसे अपने जाल में फंसाने के लिए सुमन खूब सजसंवर कर तय समय पर पार्क पहुंची तो राजीव उसे इंतजार करता मिला.

24 वर्षीय राजीव चढ़ती उम्र का खूबसूरत नौजवान था. पहली ही नजर में वह सुमन को भा गया. मौसी ने बताया था कि वह काफी पैसे वाला भी है. इस तरह सुमन ने जिस तरह के दोस्त की कल्पना की थी, राजीव एकदम वैसा ही था.

25 वर्षीया सुमन भी कम सुंदर नहीं थी. यही वजह थी कि उस पर राजीव की नजर पड़ी तो वह हटा नहीं सका. उसे सुमन बेहद खूबसूरत लगी. दोनों ही एकदूसरे को भा गए, इसलिए इसी पहली मुलाकात में उन दोनों की दोस्ती पक्की हो गई. वैसे भी आजकल के नौवजवान ऐसे पलों में एकदूसरे के प्रति कुछ अधिक ही जोशीले अंदाज में पेश आते हैं.

इस के बाद राजीव और सुमन घर के बाहर तो मिलने ही लगे, राजीव सुमन के घर भी आनेजाने लगा. राजीव को पता ही था कि सुमन ने उस से दोस्ती क्यों की है, इसीलिए वक्त जरूरत वह उस की मदद भी करने लगा. राजीव यह मदद ऐसे ही नहीं कर रहा था. वह सुमन की देह से अपनी पाई पाई वसूल रहा था.

राजीव स्मार्ट तो था ही, बातचीत में भी तेजतर्रार था. इसलिए सुमन को लगा कि अगर वह उस से शादी कर ले तो उस की सूनी जिंदगी में एक बार फिर बहार तो आ ही जाएगी, यह जिंदगी आराम से कट भी जाएगी. यही सोच कर एकांत के क्षणों में एक दिन उस ने राजीव कहा, ‘‘राजीव, आज मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं.’’

राजीव और सुमन में प्यार जैसा कुछ भी नहीं था. उन का लेनदेन का संबंध था, इसलिए उसे लगा कि सुमन कोई बड़ी मांग करेगी. थोड़ा गंभीर हो कर उस ने कहा, ‘‘बताओ, क्या चाहिए?’’

‘‘मैं जो चाहती हूं, पता नहीं तुम दे भी पाओगे या नहीं?’’

‘‘आज तक तुम ने जो भी मांगा है, मैं ने कभी मना किया है,’’ राजीव ने कहा, ‘‘जो भी चाहिए, साफसाफ कहो. पहेलियां मत बुझाओ.’’

‘‘मैं कोई चीज नहीं मांग रही हूं.’’ सुमन ने करीब आ कर राजीव का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए.’’

सुमन के मुंह से ये शब्द सुन कर राजीव जैसे झूम उठा. उस ने अपने हाथ से सुमन का हाथ दबा कर कहा, ‘‘मैं तुम्हें प्यार ही तो दे रहा हूं. अगर तुम से प्यार न होता तो मैं तुम्हारे पास आता ही क्यों.’’

‘‘यह प्यार थोड़े ही है. हमारा तुम्हारा संबंध तो लेनदेन का है. तुम मेरी जरूरत पूरी करते हो और मैं तुम्हें खुश करती हूं. लेकिन तुम्हें खुश करते करते ही अब मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

‘‘हमारा तुम्हारा जो भी संबंध है, बिना प्यार के हो ही नहीं सकता. तुम जिस तरह के संबंध की बात कर रही हो, वैसा बाजार में होता है. वहां आदमी ने पैसे फेंके, मौज लिया और चल दिया. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. जरूरतें तो आदमी पत्नी की भी पूरी करता है. तो क्या वहां भी इसी तरह लेनदेन का संबंध होता है. सुमन सही बात तो यह है कि मैं भी तुम से प्यार करता हूं. बस, परेशानी यह है कि तुम मुझ से बड़ी हो.’’ राजीव ने कहा.

‘‘सिर्फ एक ही साल तो बड़ी हूं. पुरुष तो 20-20 साल बड़े होते हैं. तब तो कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ सुमन ने कहा.

‘‘मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. कहां तुम्हें छोड़ कर जा रहा हूं.’’ राजीव ने सुमन के गले में बाहें डाल कर कहा तो वह उस के सीने से लग कर बोली, ‘‘अच्छा राजीव, इस प्यार को कब तक निभाओगे?’’

सुमन की आंखों में आंखें डाल कर राजीव ने कहा, ‘‘आखिरी सांस तक, जब तक जिंदा रहूंगा. तुम यह कभी मत सोचना कि मैं सिर्फ तुम्हारा शरीर पाने के लिए तुम्हारे पास आता हूं. मुझे तो तुम से पहले ही दिन प्यार हो गया था. अब वह इतना बढ़ गया है कि अब मैं तुम से अलग हो कर रह ही नहीं सकता. अगर जरूरत पड़ी तो दिखा भी दूंगा.’’

‘‘एक बार फिर सोच लो राजीव. तुम सहानुभूति की वजह से तो ऐसा नहीं कर रहे हो? क्योंकि मैं पति से अलग रहने वाली 2 बच्चों की मां हूं.’’ सुमन ने भावुक हो कर राजीव के सामने अपनी हकीकत बयां कर दी.

सुमन की हकीकत जान कर राजीव एक पल को चौंका. लेकिन उसे सुमन की देह का चस्का लग चुका था, इसलिए तुंरत संभल कर हंसते हुए उस ने उस का गाल थपथपा कर कहा, ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा. प्यार में जब जाति और उम्र नहीं देखी जाती तो मैं इसे ही क्यों देखूंगा.’’

राजीव का इतना कहना था कि सुमन उस की बांहों में समा गई. इस के बाद जहां राजीव सुमन पर पति की तरह अधिकार जताने लगा था, वहीं सुमन भी राजीव से पत्नी की तरह हर जरूरत पूरी करवाने लगी थी. राजीव अब कभीकभी सुमन के कमरे पर रात को भी रुकने लगा था. बात यहां तक पहुंच गई तो सुमन और राजीव के संबंधों की जानकारी सुमन के मकान मालकिन मंजू शर्मा को ही नहीं, उस के घर वालों को भी हो गई.

पहले तो मकान मालकिन मंजू शर्मा ने उसे टोका. लेकिन सुमन ने उस की टोकाटाकी पर ध्यान नहीं दिया, तब उस ने उस से मकान खाली करने के लिए कह दिया. मांबाप ने सुमन से राजीव के बारे में पूछा तो उस ने सबकुछ सचसच बता दिया. उस ने बताया कि राजीव उस से शादी करने को तैयार है तो मांबाप ने कोई आपत्ति नहीं की.

मकान मालकिन जब सुमन को ज्यादा परेशान करने लगी तो एक दिन सुमन ने उस से भी कह दिया कि वह राजीव से शादी करने वाली है. इस के बाद उन्होंने भी टोकाटाकी बंद कर दी.

संजीव जीवा : डाक्टरी सीखते सीखते बना गैंगस्टर – भाग 1

7 जून, 2023 की शाम 4 बजे उत्तर प्रदेश के टौपमोस्ट अपराधियों में 13वें नंबर के अपराधी संजीव माहेश्वरी उर्फ संजीव जीवा की लखनऊ के वजीरगंज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में विशेष न्यायाधीश नरेंद्र कुमार तृतीय एससी/एसटी ऐक्ट कोर्ट में हत्या के एक मामले की पेशी थी.

वैसे उसे हत्या के 2 मामलों में उम्रकैद की सजा मिल चुकी थी. पर हमारे यहां का कानून कहता है कि जितने भी मुकदमे चल रहे हैं, उन का निपटारा तो होना ही चाहिए. इसलिए संजीव जीवा को लखनऊ की अदालत में चल रहे मुकदमे की पेशी के लिए भारी पुलिस सुरक्षा में लाया गया था.

पुकार होने पर शाम के 4 बजे जैसे ही जीवा कोर्टरूम में दाखिल होने के लिए दरवाजे के पास पहुंचा, तभी काला कोट पहने एक आदमी उस के पीछे से आया और कोट के अंदर से रिवौल्वर निकाल कर संजीव पर पीछे से गोली चला दी. उस ने वकीलों और पुलिस वालों के सामने ही अपने रिवौल्वर की सारी गोलियां संजीव के शरीर में उतार दीं. संयोग से उस समय जज साहब कोर्ट में नहीं थे.

गोली चलते ही कोर्टरूम के अंदर और बाहर अफरातफरी मच गई. संजीव के साथ आए पुलिस वालों में कुछ तो स्तब्ध खड़े रह गए तो कुछ जान पर खतरा देख कर बाहर की ओर भागे. गोली लगते ही संजीव लडख़ड़ा कर दरवाजे के पास ही जमीन पर गिर गया. बाद में पता चला कि उस की मौत हो चुकी है, क्योंकि उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश नहीं की गई.

वकीलों का तो यह भी कहना है कि पुलिस उस के मरने का इंतजार करती रही, इसलिए एंबुलेंस तक नहीं बुलाई गई. इस हमले में एक महिला, कुछ अन्य लोग और एक बच्ची भी घायल हो गई थी. उस की हत्या करने वाला युवक अपना काम कर के भागना चाहता था. पर वह भाग पाता, उस के पहले ही कोर्टरूम में मौजूद वकीलों ने उसे दबोच लिया और लातघूंसों से उस की पिटाई शुरू कर दी. बाद में पुलिस ने किसी तरह हत्यारे को मार रहे लोगों के चंगुल से छुड़ाया और हिरासत में ले लिया. इस तरह संजीव जीवा का हत्यारा पकड़ा गया.

कोर्टरूम में घुस कर हत्या करने वाले हत्यारे के बारे में जानने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि कोर्टरूम में जिस की हत्या की गई, वह संजीव माहेश्वरी उर्फ संजीव जीवा कौन था? उस ने ऐसा क्या किया था कि उसे 2 बार उम्रकैद की सजा हुई थी? लखनऊ में उसे किस मामले मे एमपी-एमएलए अदालत लाया गया था और कोर्टरूम में उस की हत्या क्यों की गई?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, अब शामली के थाना बाबरी के गांव आदमपुर में संजीव जीवा का जन्म हुआ था. परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए वह पढ़ाई के साथसाथ पार्टटाइम नौकरी भी करता था. जीवा पढ़लिख डाक्टर बनना चाहता था. पर परिवार की हालत ठीक न होने के कारण उस का यह सपना पूरा होना मुश्किल लग रहा था.

डाक्टरी सीखतेसीखते बना बदमाश

संजीव जीवा मुजफ्फरनगर में जहां पार्टटाइम नौकरी करता था, वहीं पड़ोस में एक डा. राधेश्याम का शंकर दवाखाना था. जीवा को लगा कि वह पढ़लिख कर डाक्टर तो बन नहीं सकता, क्यों न डाक्टर के यहां नौकरी कर के ही झोलाछाप डाक्टर बन जाए. डाक्टर के यहां थोड़ीबहुत डाक्टरी सीख कर बाद में ग्रामीण इलाके में जा कर वह अपनी क्लीनिक खोल लेगा, जिस से वह ठीकठाक कमाई कर सकेगा.

जीवा गरीब घर का लडक़ा था. इसलिए उसे ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने की चाहत थी. क्योंकि उस ने देखा था कि इस समाज में इज्जत उसी की है, जिस के पास पैसा है. अब तक जीवा की समझ में आ गया था कि वह पैसे की वजह से पढ़ाई नहीं कर सका था. उस ने पढ़ाई छोड़ दी और डाक्टर राधेश्याम के यहां कंपाउंडर की नौकरी कर ली.

डाक्टर के यहां काम करते हुए धीरेधीरे वह दवाएं देना भी सीख ही गया और इंजेक्शन लगाना भी. धीरेधीरे वह डाक्टर के लिए उपयोगी आदमी बन गया था. डाक्टर क्लीनिक चलाने के साथसाथ लोगों को ब्याज पर पैसे भी उधार देता था. पैसे उधार लेने वालों में कुछ तो समय से पैसे वापस कर देते थे तो कुछ लोग ऐसे भी थे, जो लेटलपेट लौटाते थे. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो पैसा लौटाने के लिए बहाने पर बहाने बनाते रहते थे.

एक दिन डाक्टर ने ऐसे ही एक आदमी के यहां पैसे लेने के लिए जीवा को भेजते हुए कहा, ‘‘अगर तुम उस से पैसे ले आए तो मैं तुम्हारा वेतन तो बढ़ा ही दूंगा और उचित ईनाम भी दूंगा.’’

संजीव जीवा गया और थोड़ी ही देर में पैसे ला कर डाक्टर की मेज पर रख दिए. डाक्टर ने संजीव जीवा का वेतन तो नहीं बढ़ाया, पर ईनाम के रूप में कुछ रुपए जरूर उसे थमा दिए. डाक्टर खुश हुआ कि उस के फंसे पैसे निकल आए और जीवा भी खुश हुआ कि उसे वेतन के अलावा भी कुछ पैसे मिल गए. इस के बाद तो जहांजहां डाक्टर के पैसे फंसे थे, डाक्टर वसूली के लिए जीवा को भेजने लगा. जीवा जाता और डाक्टर के पैसे ला कर उस की मेज पर रख देता. इस तरह जीवा की कुछ अतिरिक्त कमाई होने लगी.

अब आप सब यही सोच रहे होंगे कि जो पैसा देने वाला डाक्टर नहीं वसूल पा रहा था, जीवा एक ही बार में कैसे वसूल लाता था. यह तो आप सब को भी पता है कि सीधी अंगुली से घी नहीं निकलता. तो जीवा भी सीधी अंगुली से घी नहीं निकालता था. वह हडक़ा कर, धौंस दे कर डाक्टर के पैसे वसूल लाता था.

संजीव जीवा को पैसे कमाना था. लोगों को डराधमका कर डाक्टर के पैसे वसूलतेवसूलते जीवा की समझ में यह आ गया कि अगर आदमी के पास हिम्मत है तो वह जितना चाहे, उतना पैसा कमा सकता है. लोग बहुत डरपोक हैं, इसलिए किसी को भी डराधमका कर पैसा वसूला जा सकता है.

डाक्टर का ही कर लिया अपहरण

जीवा ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना चाहता था. इसलिए अब वह छोटेमोटे लोगों को डराधमका कर पैसे वसूलने लगा. एक तरह से वह छोटीमोटी रंगदारी वसूलने लगा था. अब उस का काम डाक्टर से मिलने वाली ईनाम की रकम, छोटीमोटी रंगदारी से नहीं चल रहा था. इसलिए उस ने कुछ अलग करने के बारे में सोचा, जिस में ज्यादा से ज्यादा पैसे मिल सकें.

पैसे के लिए ही उस ने अपराध की दुनिया में कदम रखा, क्योंकि उस ने देख लिया था कि गरीब कुछ नहीं कर पाता, यहां तक कि अपने बच्चों को पढ़ा भी नहीं सकता. उसी बीच संजीव जीवा की डाक्टर से पैसे को ले कर कुछ अनबन हो गई तो पैसे के ही लिए संजीव जीवा ने उसी डाक्टर का अपहरण कर लिया, जिस के यहां नौकरी करता था.

डाक्टर को छोडऩे के एवज में उस ने जो रकम मांगी, वह उसे आराम से मिल भी गई. इस तरह उसे पैसे कमाने का एक और जरिया मिल गया. उस ने 2-4 छोटेमोटे बदमाशों का अपना एक गैंग बना लिया और छोटेमोटे लोगों का अपहरण कर फिरौती वसूलना, रंगदारी वसूलने और जमीनों पर कब्जा करने का धंधा शुरू कर दिया. वह कुख्यात बदमाश बन गया.

इस तरह उस के पास कुछ पैसा आया तो उस ने हथियारों की व्यवस्था की और अपनी गैंग की मदद से कोलकाता के एक बड़े बिजनैसमैन के बेटे का अपहरण कर लिया.

तोते की गवाही : सजा उम्रकैद

उत्तर प्रदेश के आगरा जिले की एक अदालत में 23 मार्च, 2023 को काफी गहमागहमी थी. उस रोज एक बहुचर्चित मामले की सुनवाई होने वाली थी. केस आगरा से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘स्वराज्य टाइम्स’के संपादक विजय शर्मा की पत्नी नीलम शर्मा की हत्या और उन के घर में लूटपाट का था. विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावी क्षेत्र) मोहम्मद राशिद के जरिए उस बहुचर्चित केस का फैसला सुनाया जाना था.

दोनों आरोपियों को न्यायालय में कड़ी सुरक्षा के बीच लाया जा चुका था. पीडित पक्ष के लोग पहले ही आ चुके थे. कोर्टरूम के बाहर बड़ी तादात में मीडिया की निगाहें भी उन पर टिकी हुई थीं. न्यायाधीश मोहम्मद राशिद कोर्टरूम में अपनी कुरसी पर बैठ चुके थे.

अखबार के संपादक के घर हुई वारदात

जिस मामले की सुनवाई होनी थी, वह वारदात दरअसल 9 साल पुरानी 20 फरवरी, 2014 की थी. उस रोज गंगे गौरीबाग, बल्केश्वर क्षेत्र के रहने वाले ‘स्वराज्य टाइम्स’ के संपादक विजय शर्मा अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी समारोह में शामिल होने के लिए फिरोजाबाद गए हुए थे. अपने साथ बेटी निवेदिता और बेटे अंजेश को भी ले गए थे.

घर पर उन की 48 वर्षीया पत्नी नीलम शर्मा और वृद्ध पिता आनंद शर्मा रह गए थे. शर्मा को अपने बच्चों समेत उसी रोज आधी रात तक वापस लौट आना था. तय कार्यक्रम के अनुसार शर्मा बच्चों समेत लौट आए. घर का दरवाजा खटखटाते ही वह अपनेआप खुल गया. अंदर दाखिल हुए तो भीतर का दृश्य देख कर सन्न रह गए. सामने जो दिखा, उसे देख उन के होश उड़ गए. घर का सामान जहांतहां बिखरा पड़ा था. पत्नी नीलम के कमरे का दरवाजा भी खुला था. कमरे की लाइट जल रही थी.

शर्मा और बच्चे जैसे ही दरवाजे पर पहुंचे, बेटी निवेदिता और बेटे की चीख निकल गई. शर्मा कमरे घुसे. वहां पालतू जरमन शैफर्ड डौग ‘टफी’ भी खून से लथपथ पड़ा था. वहीं नीलम भी पास में ही मृत पड़ी थीं. उन के शरीर से बहुत सारा खून निकल कर पूरे फर्श पर फैल चुका था.

मां की लाश देख कर दोनों भाईबहन रोने लगे. शर्मा तो जड़वत बन गए थे. वे समझ नहीं पा रहे कि यह सब कैसे हो गया? ऐसा किस ने किया? पिता आनंद शर्मा का ख्याल आते ही उन के कमरे की ओर गए. उन के कमरे की बाहर से कुंडी लगी थी. कुंडी खोली तो भीतर अंधेरा था. संभवत: वह सो रहे थे. आनंद शर्मा बेसुध सोए हुए थे. सांस चलने की आवाज आ रही थी.

दोबारा अपने कमरे में आ कर ध्यान से देखा तो पाया कि पत्नी की धारदार हथियार से हत्या की गई थी. कुत्ते पर भी कई हमले की जाने का निशान था. अलमारी की तिजोरी के खुले होने पर गहने, नकदी आदि लूट के भी सबूत मिले. कमरे से बाहर पालतू तोते ‘हीरा’का पिंजरा शाल से ढंका हुआ था. बच्चों के द्वारा शाल हटाते ही तोता जोरजोर से पंख फडफ़ड़ाता हुआ चीखने लगा.

वारदातके मिटा दिए थे सबूत

शर्मा परिवार ने इधरउधर नजर दौड़ाई. उन्होंने पाया कि वारदात के सबूत मिटाने की पूरी कोशिश की गई थी. दीवारों, फर्श आदि पर खून के दागधब्बे मिटाए जाने के निशान दिख रहे थे. फर्श की सफाई की गई थी. विजय शर्मा के घर से बच्चों के रोने और शोरशराबे की आवाज सुन कर कुछ पड़ोसी आ गए थे. वे भी घर का दृश्य देख कर दंग रह गए.

शर्मा ने इस बारे में पुलिस को सूचित कर दिया. संपादक की पत्नी के मर्डर की सूचना पा कर कुछ मिनटों में ही थाना न्यू आगरा से पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. शर्मा ने उन्हें अज्ञात बदमाशों द्वारा पत्नी और पालतू कुत्ते की हत्या के साथसाथ ज्वैलरी, नकदी, घड़ी व अन्य सामान लूट की आशंका जताई.

इस जानकारी को ध्यान में रखते हुए पुलिस टीम ने गहन जांच की, लेकिन फिंगरप्रिंट्स मिटाए जाने और दूसरे साक्ष्य खत्म किए जाने के चलते वारदात की तह तक जाने के सबूत नहीं मिले. हालांकि फोरैंसिक टीम को कुछ सबूत जमा करने में सफलता मिल गई थी

पुलिस के सामने हत्या और लूट की जांच एक बड़ी चुनौती थी. वे उलझन में पड़ गए थे कि हमलावर कितने लोग होंगे? घर में कैसे घुसे होंगे? इस के पीछे लूटपाट के अलावा और क्या कारण हो सकता है? इस पर पुलिस ने अनुमान लगाया कि संभव है नीलम या उस वक्त घर में मौजूद परिवार के दूसरे किसी ने सोने से पहले दरवाजा अंदर से बंद नहीं किया होगा. यह भी आशंका जताई गई कि पूरी वारदात को अंजाम देने वाला कोई परिचित भी हो सकता है.

पुलिस जांच टीम पालूत कुत्ते को धारदार हथियार से बेरहमी से मार दिए जाने को ले कर हैरान थी. नीलम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी हत्या संबंधी कुछ जानकारियां मिल गई थीं. कुत्ते के शव का पोस्टमार्टम करवा कर उस की रिपोर्ट जुटा ली गई थी. पड़ोसियों ने कुत्ते के बारबार भौंकने की आवाजें सुनी थीं, लेकिन उन्होंने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. कारण पालतु कुत्ता बीचबीच में अकसर भौंकता रहता था. उन्होंने पुलिस को घटना के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया.

पुलिस को नहीं मिला सुराग

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार नीलम के शरीर पर धारदार हथियार से 14 और पालतू कुत्ते ‘टफी’ पर 9 वार किए गए थे. गहरी चोटें और अत्यधिक खून बहने से दोनों की मौत हो गई थी. इस संबंध में थाना न्यू आगरा में अज्ञात अपराधियों के खिलाफ लूट व हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया था.

नीलम शर्मा मर्डर केस के सबूत जुटाने और सुराग के लिए जांच टीम ने विजय शर्मा के घर को 3 दिनों तक सील कर दिया था. उन से पूछताछ के बाद पुलिस को 3 लोगों पर संदेह हुआ था, लेकिन सबूत के बिना उन के खिलाफ काररवाई नहीं हो पाई थी. विजय शर्मा ने भी अपने बयान में उन्हीं 3 लोगों पर शक जताया था, जिन पर पुलिस को संदेह था.

संदिग्धों में से एक व्यक्ति का संबंध जमीन खरीद को ले कर था. इस सिलसिले में उस के साथ रुपए के लेनदेन में कुछ ज्यादा ही विवाद हो गया था. उस से पूछताछ करने पर उस ने हत्या से इनकार कर दिया, लेकिन पैसे को ले कर शर्मा के साथ विवाद की बात मान ली.

कई दिन बीत जाने के बावजूद मामले को सुलझाया नहीं जा सका था. मामला एक अखबार के संपादक से जुड़ा हुआ था. इस कारण मीडिया में जांच की देरी को ले कर कई सवाल उठने और पुलिस पर दबाव भी बनने लगा था. तत्कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने पुलिस की टीमें बनाईं और जल्द से जल्द इस घटना का परदाफाश करने के निर्देश दिए.

तोता ‘हीरा’ने दिया हत्यारे का सुराग

शर्मा परिवार को अपने पालतु कुत्ते ‘टफी’ और तोते ‘हीरा’ से काफी प्यार था. दोनों ही परिवार के सभी सदस्यों को अच्छी तरह पहचानते थे. तोता तो घर वालों की बातों को समझता भी था. श्रीमती शर्मा खुद और उन के दोनों बच्चे तोते से बातें भी किया करते थे. वह तुरंत बोल देता था.

नीलम शर्मा तोते को अपने हाथों से छोटाछोटा निवाला दिया करती थीं. तोता पिंजरे से नुकीली चोंच बाहर निकाल कर निवाला मुंह में ले लेता था. तुरंत गटकने के बाद खुशी से पंख फडफ़ड़ा देता था. नीलम शर्मा भी खुशी से बोल देती थीं, ‘‘चलो हो गया! बस बस!!’’

यही हाल टफी का भी था. उसे भी परिवार के सदस्यों के हाथों से परोसा गया उस का खाना या उस के लिए बाजार से मंगवाया गया खाना ही पसंद था. घटना को हुए 3 दिन बीत चुके थे, लेकिन पुलिस अभियुक्तों को पकडऩा तो दूर, उन का सुराग तक नहीं लगा पाई थी.

उधर मालकिन की मौत के बाद तोता ‘हीरा’ सुस्त हो गया था. उस ने खानापीना छोड़ दिया था. कारण उस से बात करने वाला कोई नहीं था. हत्यारे ने तोते के पिंजरे पर शाल डाल दी थी. पुलिस ने जांच के सिलसिले इस बात पर भी गौर किया. मतलब निकाला गया कि बदमाशों ने टफी की तो हत्या कर दी, लेकिन तोते ने भी शोर मचाया होगा, इस कारण उस के पिंजरे को शाल से ढंक दिया होगा.

पूछताछ में शर्मा ने जब किसी परिचित पर संदेह जताया तब उन्हें एक पड़ोसी ने तोते से बात करने की सलाह दी. शायद उस से कोई सुराग मिल सके. शर्मा और उन के बच्चों को यह बात सही लगी और वे पिंजरे के पास जा कर तोते से बात करते हुए कहा, ‘‘हीरा, हीरा! घर में मालकिन का कत्ल हो गया और तुम देखते रहे! बताओ, क्यों नहीं बचाया?’’

यह सुनते ही तोता अपना पंख तेजी से फडफ़ड़ाने लगा. पिंजरे में ही इधरउधर, ऊपरनीचे करने लगा. इस हालत से उस की बेचैनी साफ झलक रही थी. उस के शांत होने पर बेटी प्यार से बोली, ‘‘मेरे मिट्ठू! मेरे हीरा!! मम्मी को किस ने मारा? आशु ने मारा?’’

यह नाम सुनते ही तोता ‘आशु आशु’ कह कर तेजी से गरदन हिला कर चीखने लगा. ऐसा कई बार हुआ. आशुतोष उर्फ आशु विजय शर्मा का भांजा था. इस की जानकारी विजय शर्मा ने पुलिस को दी. यह भी बताया कि पत्नी के अंतिम संस्कार के दिन आशु घर आया था. उस के बाद वह एक बार भी घर नहीं आया. शर्मा के कहने पर पुलिस ने भी घर आ कर इस बात को देखा कि तोता आशु के नाम पर अपना गरदन ऊपर नीचे हिला कर ‘आशुआशु’ चीखने लगता था.

तोते की गवाही पर आशु हुआ गिरफ्तार

पुलिस ने 25 फरवरी, 2014 को अर्जुन नगर, थाना शाहगंज निवासी आशुतोष गोस्वामी उर्फ आशु को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने इस घटना से इनकार किया, किंतु पूछताछ के दौरान उस के दाएं हाथ पर कई जख्म दिखाई दिए. इस पर पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए उन जख्मों के बारे में जानना चाहा. इस पर आशु सकपका गया. चोट के संबंध में पुलिस के सवालों के आगे आशु टिक नहीं पाया. उस ने इस अपराध को अंजाम देने की बात स्वीकार कर ली. पुलिस के सामने जो कुछ बताया उस से काफी चौंकाने वाला सच सामने आया.

उस ने बताया कि इस घटना में उस का दोस्त रोनी मैसी भी शामिल था. उस की भी तुरंत गिरफ्तारी हो गई. दोनों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कटार (चाकू), हत्या के दौरान लूटे गए गहने, नकदी व घड़ी समेत वारदात में प्रयोग किया गया स्कूटर बरामद कर लिया गया. हत्या का खुलासा होने के बाद पुलिस ने माल बरामदगी के साथ पूरा क्राइम सीन रीक्रिएट कर साक्ष्य जुटाए. आशु ने बताया कि उस ने अपने दोस्त रोनी मैसी के साथ मिल कर ही इस घटना को अंजाम दिया था. पहले वह मामामामी के घर में ही रहता था.

दरअसल, विजय शर्मा का बेटा अजेश मानसिक रूप से बीमार रहता था. तब उन्होंने अपने सगे भांजे आशुतोष गोस्वामी उर्फ आशु को बेटे की तरह पाला था, लेकिन उस के गलत आचरण की वजह से उन्होंने उसे अलग रहने को कह दिया. तब वह अपने दोस्त रोनी मैसी के साथ अर्जुन नगर में रहने लगा. लेकिन उस का अपने मामा के यहां आनाजाना लगा रहता था. उसे उन के घर की हर चीज की जानकारी थी.

आशु को मामा के पास घर में काफी गहने व नकदी मौजूद होने की जानकारी थी. उसे वारदात वाली रात को मामा के फिरोजाबाद में शादी में जाने और मामी के घर में अकेले होने की जानकारी थी. उसे रुपयों की जरूरत थी. इसी लूट के इरादे से उस ने अपनी योजना में दोस्त रोनी मैसी को भी शामिल कर लिया.

भांजा बना आस्तीन का सांप

योजना के अनुसार दोनों रात को स्कूटर से मामा के घर पहुंचे. आशु ने आवाज दे कर दरवाजा खुलवाया. आवाज पहचान कर मामी नीलम शर्मा ने दरवाजा खोल दिया. दोनों घर में घुस आए. पालतू कुत्ता टफी भौंका, लेकिन आशु ने उसे पुचकार कर शांत कर दिया. वह आशु को पहचानता था. रोनी मैसी नकाब में था. उस ने नीलम शर्मा को कमरे में ले जा कर उन्हें धमकाते हुए कहा कि यदि अपनी जान की खैर चाहती हो तो कैश और गहने निकाल कर दे दो.

पीछे से आशु भी कमरे में पहुंच गया. इस पर नीलम की नजर उस पर पड़ी. उन्होंने आशु से नाराज हो कर ऐसा करने से मना किया. इस पर आशु भी गुस्से में आ गया और साथ लाए तेज धार वाले कटार (चाकू) से नीलम शर्मा के ऊपर ताबड़तोड़ हमले कर दिए. वह तुरंत जमीन पर गिर पड़ीं.

नीलम पर हमला होते देख पालतू कुत्ता ‘टफी’ आशु पर झपट पड़ा. अपने बचाव में आशु ने कटार से कुत्ते पर भी तेजी से लगातार वार कर दिया. उसे भी वहीं मार डाला. यह देख कर पिंजरे में बंद तोते ने शोर मचाया तो उन्होंने पिंजरा वहां पड़े शाल से ढक दिया. मामी और कुत्ते की हत्या के बाद गहने, नकदी आदि लूट कर दोनों फरार हो गए. फरार होने से पहले दोनों ने सारे सबूत भी मिटा दिए.

आशु और रोनी के इन बयानों के आधार पर पुलिस ने दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 394, 302, 429, 411, 4/25 आम्र्स ऐक्ट के अंतर्गत मामला दर्ज कर कोर्ट में पेश कर दिया. कोर्ट में सुनवाई के बाद दोनों को जेल भेज दिया गया.

9 साल बाद मिला न्याय

इस सनसनीखेज केस की सुनवाई आगरा जिले के विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावी क्षेत्र) मोहम्मद राशिद की कोर्ट में 9 साल तक चली. पुलिस ने जो चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की थी, उस में जुटाए गए साक्ष्य ज्यादा ठोस नहीं थे, लेकिन अभियोजन टीम ने इन को मजबूत साक्ष्यों के रूप में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया. इस मामले में फोरैंसिक टीम जांच के बाद किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी थी.

अभियोजन पक्ष के पास परिस्थितिजन्य साक्ष्य के अलावा गवाह भी थे, लेकिन वह बहुत अधिक मजबूत नहीं लग रहे थे. ऐसे में अभियोजन पक्ष के सामने उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर दोषियों का दोष सिद्ध कर उन्हें सजा दिलाने की कड़ी चुनौती थी.

अभियोजन टीम ने इस संबंध में आगरा के संयुक्त निदेशक अभियोजन महेंद्र कुमार दीक्षित से सलाहमशविरा किया. अभियोजन पक्ष, जिस में वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी जय नारायण गुप्ता, अभियोजन अधिकारी मनीष कुमार तथा एडीजीसी (क्राइम) आदर्श चौधरी शामिल थे, ने ठोस साक्ष्यों के अभाव के बावजूद अथक परिश्रम कर मौजूद साक्ष्यों की छोटी से छोटी कडिय़ों को जोड़ कर दमदार पैरवी की.

दोषियों को हुई उम्रकैद

9 साल तक केस का ट्रायल चला. बहस के दौरान अभियोजन टीम ने अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया. इस केस में वादी संपादक विजय शर्मा की कोरोना के दौरान 2021 में मृत्यु हो चुकी थी. अभियोजन पक्ष की ओर से 14 गवाह पेश किए गए. इन में वादी की बेटी निवेदिता तथा 3 अन्य गवाह लोकेश शर्मा, हरेश पचौरी व सुनील शर्मा के बयानों को आधार बनाया.

अभियोजन टीम ने बहस के दौरान कहा कि गवाह लोकेश शर्मा ने आरोपी आशुतोष गोस्वामी व उस के दोस्त रोनी मैसी को स्कूटर पर विजय शर्मा के घर की ओर जाते देखा था. वहीं हरेश पचौरी ने उसी स्कूटर पर आशुतोष गोस्वामी व उस के दोस्त को निकलते देखा था. जबकि गवाह सुनील शर्मा ने घटना के बाद जब मृतका नीलम शर्मा की डैडबौडी पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार के लिए घर पर आई तो उस समय आरोपी आशुतोष गोस्वामी उर्फ आशु, जिसे वे पहले से जानते थे, को वहां देखा. आशुतोष के हाथ पर चोट के निशान थे, जो मृतका नीलम की हत्या के समय उन के पालतू डौगी द्वारा आशुतोष पर हमला किए जाने के दौरान आए थे.

बहस के दौरान अभियोजन अधिकारियों ने कहा कि उस के बाद आरोपी आशुतोष व उस का दोस्त रोनी मैसी फरार हो गए. बाद में पुलिस ने दोनों को उसी स्कूटर सहित गिरफ्तार कर लिया और उन की निशानदेही पर मृतका नीलम के घर से लूटे गए आभूषण, नकदी तथा हत्या में प्रयुक्त (आलाकत्ल) कटार को बरामद कर लिया गया.

घटना के समय नीलम शर्मा के वफादार पालतू जरमन शैफर्ड डौग टफी तथा तोते ने अपनी अपनी तरह से आरोपियों का प्रतिरोध किया था. इस दौरान आशुतोष के शरीर पर चोटें आई थीं. इस पर आशुतोष ने डौग टफी को मार दिया गया व तोते के शोर मचाने पर पिंजरे को शाल से ढंक दिया गया था. इस के बाद हत्या व लूट को अंजाम दिया. इन आरोपियों के अलावा यह अपराध अन्य किसी ने नहीं किया है. अभियुक्तों की ओर से एक गवाह पेश किया गया. जिस की गवाही न्यायालय ने नहीं मानी. वहीं बचाव पक्ष की दलीलों को भी नकार दिया गया.

कोर्ट में पेश किए गए गवाहों, सबूतों और दोनों ओर के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश मोहम्मद राशिद ने दोनों आरोपियों आशुतोष गोस्वामी उर्फ आशु और रोनी मैसी को दोषी मानते हुए उम्रकैद व 72 हजार रुपए के अर्थदंड की सजा सुनाई.

दोनों आरोपियों को 4 मामलों में सजा सुनाई गई. आशुतोष और रोनी मैसी को धारा 394 भादंवि लूट के मामले में 10 वर्ष के कठिन कारावास और 10 हजार रुपए का जुरमाने की सजा मिली, वहीं धारा 302 आईपीसी में आजीवन कारावास और 20 हजार रुपए जुरमाना था. धारा 429 आईपीसी में 4 वर्ष कारावास, 3 हजार रुपए जुरमाना, धारा 411 आईपीसी में लूटा गया माल बरामदगी में 3 वर्ष के कारावास और 2 हजार रुपए का जुरमाना तथा आशुतोष को धारा 4/25 आयुध अधिनियम में 2 वर्ष के कारावास और 2 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई गई. कोर्ट ने कहा कि सभी सजाएं साथसाथ चलेंगी.

दोनों अभियुक्तों आशुतोष गोस्वामी उर्फ आशु और उस के दोस्त रोनी मैसी जमानत पर थे. वे दोनों कोर्ट में मौजूद थे. पुलिस ने फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों को हिरासत में ले कर जेल भेज दिया.

एडीजीसी आदर्श चौधरी ने बताया कि इस केस में तोता ‘हीरा’ पुलिस की विवेचना का हिस्सा रहा था, लेकिन वह साक्ष्य का हिस्सा नहीं हो सका, क्योंकि कोर्ट में पक्षी की गवाही के लिए कोई कानूनन विधि नहीं है.

ऐसे अपराधी सोचते हैं कि वे मौके से साक्ष्य मिटा कर के अपना गला बचा लेंगे. सजा मिलने से ऐसे अपराधियों को खौफ होगा और न्याय की देवी पर लोगों का भरोसा कायम रहेगा.

बरखास्त सिपाही बना एटीएम बाबा

इस बार होली का त्यौहार खत्म होते ही बिहार में पंचायत चुनाव की गहमागहमी तेज हो चुकी थी. छपरा के रहने वाले सुधीर मिश्रा की 30 वर्षीया पत्नी रेखा मिश्रा पर भी चुनाव लडऩे की सनक सवार थी. वह छपरा में मोहब्बत परसा गांव से मुखिया के लिए चुनाव लडऩे पर अड़ी हुई थी. वह पूरे गांव के लोगों को अपनी तरफ करने के लिए हर तरह की जोरआजमाइश कर रही थी.

उस के समर्थक चाहते थे कि उस की तरफ से गांव के लोगों को ‘भोजभात’ करवाया जाए. रेखा के देवर नीरज और भाई भास्कर ओझा समेत गांव के कुछ लोग भी इस के पक्ष में थे. उन का मानना था कि बहुमत वाली जाति से अधिक जरूरी छोटीछोटी जातियों के समर्थन का था. महादलित के वोट से उन की जीत को कोई नहीं रोक सकता था. इसलिए वह उन के सभी टोले के लोगों के लिए मीटचावल का भोजभात करवाना चाहती थी.

चुनाव जीतने की बनाई प्लानिंग

रेखा ने अपने लोगों के साथ बैठ कर इस के लिए मीटिंग की. सभी ने एकजुट में कहा कि उन्हें एक नहीं 2 भोजभात करवाने होंगे. एक ऊंची जाति के लोगों के लिए और दूसरा सभी अनुसूचित जाति के लोगों के लिए होना चाहिए. महादलित औरतों को साड़ी भी बंटवानी होगी. साड़ी तो सवर्ण जाति की महिलाओं को भी देनी होगी. रेखा चाहती थी कि गांव के पोखर की भी साफसफाई अभी ही करवा दे, ताकि छठ आने तक उस में बारिश का साफ पानी जमा हो सके.

“इन सब पर कितना खर्चा आ जाएगा?” रेखा ने सवाल किया.

“भाभी, खर्चा तो लाखों में आएगा, लेकिन वोट भी तो हजारों में मिलेंगे.” रेखा का देवर नीरज बोला.

“तो फिर भाई को बोलो न,” रेखा ताना मारते हुए बोली.

उसी वक्त सुधीर मिश्रा वहां आ पहुंचा. उस ने भी अपनी नेताइन पत्नी रेखा का व्यंग्य सुना.

उसी के लहजे में वह बोला, “पैसे की बात आती है तब सुधीर मिश्रा. मुझे एटीएम समझ रखा है क्या?”

“अरे हां, तुम हमारे एटीएम नहीं तो और क्या हो? सिर्फ तुम्हारी जेब में हाथ डालनी होती है.” रेखा का यह कहना था कि वहां मौजूद सभी खिलखिला कर हंस पड़े.

“अरे जीजाजी, तभी तो लोग आप को ‘एटीएम बाबा’ कहते हैं,” सुधीर का साला भास्कर बोला.

“एटीएम मेरी जेब में लगा है क्या?” सुधीर व्यंग्य से बोला.

“जेब में नहीं लगा है, लेकिन कहीं और तो लगा है न…” भास्कर बोला.

“क्या मतलब है तुम्हारा?” सुधीर नाराजगी के साथ बोला.

“मैं नहीं जानती, एटीएम कहां लगा है कहां नहीं. मुझे तो भोजभात के खर्च का इंतजाम चाहिए. अब तुम जहां से करवा दो.” रेखा बोली.

“भैया, लखनऊ में तो आप के बहुत जानपहचान वाले हैं, क्यों नहीं उन से बात करते हैं. आप को मदद करने में वे कभी पीछे नहीं हटेंगे.” नीरज बोला.

“कहता तो ठीक है, मेवात वाले से भी बात करता हूं.” अब तक सुधीर गंभीर हो गया था, “अब बीवी ने चुनाव जीतने की सौगंध खा ली है तो मेरा भी तो उस का साथ देने का फर्ज बनता है.”

“फर्ज की बात करते हो, सरकारी ठेका आएगा तो सब से पहले तुम्हीं हाथ पसारे आओगे.” रेखा बोली.

“भाभी, वह तो बाद की बात है. अगर भैया को ठेका मिलेगा तो घी कहां गिरेगा दाल में ही न!” नीरज बोला.

“हां दीदी, हमें मत भूलना.” भास्कर बोला.

“चलो मीटिंग खत्म करो, तुम लोग अभी से ही खयाली पुलाव पकाने लगे. पहले सब मिल कर पैसे का इंतजाम करो, बाकी आगे मैं सब कुछ संभाल लूंगी.” रेखा बोली और मीटिंग से जाने के लिए अपनी कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई.

उस के साथ सहयोगी महिला रजिस्टर संभालती हुई बोली, “हमें पंडिताइन के दालान में भी मीटिंग में जाना है. वहां 150 से अधिक महिलाएं पहुंच चुकी हैं. फोन आया था.”

“अरे हां, मैं तो भूल ही गई थी. ठीक है, चलो, चलो जल्दी करो.”

एटीएम काट कर निकाले 40 लाख रुपए

बात 3 अप्रैल, 2023 की है. लखनऊ के सुशांत लोक थाने में सुबह करीब 10 बजे किसी ने फोन कर बताया कि उन के इलाके का एसबीआई एटीएम टूटा पड़ा है. लगता है उसे काट कर पैसे निकाल लिए गए हैं. इस सूचना पर एसएचओ शैलेंद्र गिरि तुरंत अपने कुछ सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे.

एटीटीएम थाने से 2 किलोमीटर दूर खुरदही बाजार में था. शैलेंद्र गिरि के साथ हैडकांस्टेबल अमरनाथ और 3 सिपाहियों में रामायण भारती, चंद्रप्रकाश सिंह और धर्मेंद्र भी थे. घटनास्थल पर टूटे एटीएम को देख कर अनुमान लगाया गया कि इसे रात में गैस कटर से गया है. उस में से निकाले गए पैसों की जानकारी उस में दर्ज रिकौर्ड से हुई, जो 39.58 लाख थे.

एसएचओ ने वारदात का खाका खींचने के बाद वहां लगे सीसीटीवी कैमरे पर नजर दौड़ाई, जिसे खोल लिया गया था. उस की आसपास खोज की गई. एटीएम बूथ और उस के आसपास काफी छानबीन के बाद कैमरे एक दुकान के चबूतरे के नीचे मिले.

इस घटना की जांच को ले कर थाने में पुलिस अधिकारियों की गहन बैठक हुई. कई कोणों से इस तरह की बढ़ती घटना की तह में जाने के लिए जौइंट कमिश्नर निलाब्ज चौधरी के निर्देश पर 5 टीमें बनाई गईं. उन को सर्विलांस से ले कर अपराधियों की गिरफ्तारी और पैसे की बरामदगी तक की जिम्मेदारी सौंपी गई. एक टीम ने सीसीटीवी कैमरो में मिली लोकेशन का अध्ययन किया. जिस से मालूम हुआ कि लुटेरे नीले रंग की कार से आए थे और घटना को अंजाम देने के बाद वे उसी से वापस चले गए थे.

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सर्विलांस टीम (दक्षिणी) के सदस्यों में एसआई सुमित बालियान, हैडकांस्टेबल मंजीत सिंह, बद्री विशाल तिवारी, सौरभ दीक्षित, सिपाही गिरीश चौधरी और रविंद्र सिंह को एसएचओ ने शहर के चारों दिशाओं में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, आगरा एक्सप्रैसवे, सीतापुर लखनऊ राजमार्ग, सुलतानपुर अयोध्या राजमार्ग, बुंदेलखंड एक्सप्रैसवे के बौर्डर पर लगा दिया. वे टोल प्लाज केंद्रों पर तैनात कर दिए गए थे.

वहां लगे हुए सीसीटीवी कैमरों को खंगाला गया. पूर्वांचल एक्सप्रैसवे पर एक नीले रंग की कार जाती दिख गई. साथ ही टोल प्लाजा पर फास्टटैग चुकाते समय उस की लोकेशन भी मिल गई. टोल प्लाजा से मिला सुराग जांच की कड़ी को जोडऩे के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुआ. उस से गाड़ी का नंबर मिल गया और लुटेरों तक पहुंचने की कुछ उम्मीद जाग गई.

लेकिन इस जांच मेंं जल्द ही निराशा भी हाथ लगी. पूर्वांचल एक्सप्रैसवे पर ही गोसाईगंज, लखनऊ में टोल प्लाजा पर लगे सीसीटीवी में उसी गाड़ी का नंबर दूसरा था. इस का मतलब साफ था कि वारदात करने वालों ने गोसाईगंज टोल प्लाजा पर पहुंचने से पहले गाड़ी की नंबर प्लेट बदल दी थी. किंतु वहां से वह मारुति बलेनो कार पूर्वांचल एक्सप्रैसवे की सीमा से लगे हैदरगंज बाराबंकी की ओर जाती हुई दिखाई दी.

सीसीटीवी कैमरों के सहारे आगे बढ़ी जांच

उस के बाद हैदरगंज बाराबंकी में लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच की गई तो वहां कार का नंबर बदला हुआ पाया गया. उस नंबर से कार बिहार की थी. उस नंबर की जांच में पाया गया कि कार छपरा (बिहार) निवासी वितेश कुमार के नाम दर्ज है. इस छोटे से सुराग के सहारे दक्षिण जोन के डीसीपी विनीत जायसवाल ने जौइंट पुलिस कमिश्नर क्राइम (उत्तर प्रदेश) के निर्देश पर एडिशनल डीसीपी, एसीपी (गोसाईंगंज) सुश्री स्वाति चौधरी तथा डीसीपी (दक्षिणी जोन) के सर्विलांस की 2 अलगअलग टीमों का गठन किया गया.

दोनों टीमें सुशांत गोल्फ सिटी के एसएचओ शैलेंद्र गिरि के नेतृत्व में बनाई गई थीं, जिन्हें बिहार भेज दिया गया. छपरा में यूपी पुलिस की मेहनत रंग लाई. उन्होंने बलेनो कार के मालिक वितेश कुमार को ढूंढ निकाला. उस ने बताया कि 3 अपै्रल, 2023 को सुधीर मिश्रा उस के घर आया था. उसे लोग बुलबुल मिश्रा के नाम से भी जानते हैं, लेकिन एटीएम बाबा के रूप में वह लोकप्रिय है. सुधीर मिश्रा के बारे में तहकीकात से पता चला कि वह बिहार पुलिस का एक बरखास्त सिपाही है.

वितेश ने उत्तर प्रदेश पुलिस को बताया कि 3 अप्रैल को सुधीर उस के पास आ कर बोला कि उस की पत्नी की तबियत काफी बिगड़ गई है, उसे अस्पताल ले जाना है, इसलिए उस की बलेनो कार की जरूरत है. शैलेंद्र गिरि के लिए इस जानकारी में चौंकाने वाली एक बात उस का चर्चित नाम ‘एटीएम बाबा’भी था.

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वह सोच में पड़ गए कि उसे लोग आखिर इस नाम से क्यों पुकारते होंगे? क्या वह एटीएम इस्तेमाल के बारे में जानकारी रखता था? इस के इस्तेमाल के तरीके के बारे में लोगों को गाइड करता था? या फिर उस की सुरक्षा में लगा हुआ था? इन्हीं सवालों में एक और सवाल मन में आया कि कहीं वह किसी एटीएम लुटेरों के गैंग से तो नहीं जुड़ा था?

एसएचओ ने इन सवालों का जवाब पाने के लिए उन्होंने सर्विलांस टीम को सुधीर मिश्रा के बारे में पूरी जानकारी मालूम करने के लिए लगा दिया. इस जांच में पता चला कि सुधीर एटीएम लुटेरों के गैंग में शामिल था, जिस का खास सदस्य विजय पांडेय और देवेश पांडेय हैं. दोनों इंजीनियर हैं और संत कबीरनगर में रहते हैं.

दोनों एटीएम में कैश लोड करने का काम करते थे और एटीएम के एक्सपर्ट थे. दोनों गोमती विहार के सरयू अपार्टमेंट में किराए के फ्लैट में रहते थे. उन्हें पुलिस गिरफ्तार तो नहीं कर पाई, पर इतना जरूर पता चला कि वे सुधीर मिश्रा के छोटे भाई नीरज मिश्रा के संपर्क में थे.

पुलिस को नीरज मिश्रा तक पहुंचने में ज्यादा मुश्किल नहीं हुई. वह छपरा में दबोच लिया गया. उस की गिरफ्तारी होते ही सुधीर मिश्रा समेत पंकज, राज, भीम के अलावा 4 मेवात के लुटेरे भी पकड़ लिए गए. उन से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि एटीएम लूट को उन्होंने ही सुधीर मिश्रा के इशारे पर अंजाम दिया था. इस की साजिश सुधीर मिश्रा ने ही रची थी. जिस एटीएम को निशाना बनाया गया, उस की रेकी देवेश व विजय ने ही करवाई थी.

बड़ी आसानी से काट लिया एटीएम

पूछताछ में वारदात के सरगना सुधीर मिश्रा ने बताया कि एटीएम के भीतर घुसते ही उन्होंने पहले सीसीटीवी पर काली स्याही डाल दी थी. इस से वे कैमरे में कैद नहीं हो पाए थे. बाहर के फुटेज और गाड़ी नंबर के आधार पर पुलिस ने जांच शुरू की थी. घटनास्थल पर 3 मोबाइल नंबर सक्रिय मिले थे. इन की मदद से गिरोह तक पुलिस पहुंच पाई थी.

जांच में पता चला कि सरगना सुधीर मिश्रा व उस के गिरोह के सदस्यों पर दरजनों केस दर्ज हैं. कुछ लोगों पर हत्या व लूट के केस भी हैं. सुधीर पर एटीएम काटने संबंधी 12 केस हैं. वह पहले भी जेल जा चुका है, इसलिए वह एटीएम बाबा के नाम से मशहूर है. वह खुद बिहार में बैठ कर अलगअलग राज्यों में मेवातियों की मदद से वारदात को अंजाम देता रहा है.

एटीएम में चोरी करने की रिपोर्ट हितांक्षी पेमेंट सर्विसेज (सीएमएस) प्राइवेट लिमिटेड के लीगल एडवाइजर एडवोकेट मोहम्मद सलमान ने 3 अप्रैल, 2023 को भादंवि की धारा 457/380 के अंतर्गत दर्ज करवा दी. उन के बारे में पूरी कहानी 8 मई, 2023 को विजय पांडेय उर्फ सर्वेश की गिरफ्तारी के बाद सामने आई. इस में सुधीर की पत्नी रेखा मिश्रा का नाम सामने आया तो वह फरार हो गई थी. पकड़े गए सभी अभियुक्तों से 14 लाख 63 हजार रुपए रकम बरामद हुई.

गिरफ्तार किए गए सभी 11 आरोपियों की अपनीअपनी क्राइम हिस्ट्री थी, जिन का सरगना बरखास्त सिपाही सुधीर मिश्रा ही था. लखनऊ के नए स्थापित थाना गोल्फ सिटी से करीब 25 किलोमीटर दूर सुलतानपुर रोड पर खरदही बाजार है. यह शहर के बाहरी इलाके में है. यहां अंसल ग्रुप द्वारा सुशांत गोल्फ सिटी कई दूसरी नई कालोनियां विकसित की गई हैं. यहीं पराग दूध डेरी (फैक्ट्री), पुलिस विभाग का डीजीपी कार्यालय और पुलिस विभाग का हेल्पलाइन मुख्यालय भी बनाए गए हैं.

दूसरी तरफ सुधीर मिश्रा की पत्नी रेखा मिश्रा एक समाजसेवी महिला होने के कारण लोकल राजनीति में सक्रिय थी. उसे नेतागिरी का जबरदस्त चस्का लगा हुआ था. उसे पति सुधीर मिश्रा समेत परिवार के दूसरे सदस्यों की शह मिली थी. सभी उस की महत्त्वाकांक्षा को हवा देने में उस से चार कदम आगे रहते थे. वे उस की बदौलत भविष्य में सरकारी ठेका हासिल करने का मंसूबा रखते थे.

रेखा देख रही थी विधायक बनने का सपना

आजादखयालों वाली रेखा का सपना एक दिन विधायक बनने का भी था. वह बीते 2 सालों से 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार करने में जुटी हुई थी. गांव के हर सामाजिक आयोजनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. किसी के घर में शादीब्याह होने पर उपहार के साथ वरवधू को आशीर्वाद देने पहुंच जाती थी. किसी का निधन होने पर बगैर बुलाए वहां जा कर उस के दुख में शामिल हो जाती थी. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की संतुष्टि के लिए ही उस ने पति सुधीर मिश्रा से चुनाव लडऩे की पेशकश की थी.

कहने को तो सुधीर मिश्रा बिहार पुलिस में सिपाही था, लेकिन उस के संबंध अपराधी तत्त्वों से भी बने हुए थे. उन की संगति में ही वह कई वैसे गिरोहों के संपर्क में था, जो चोरी और एटीएम लूट आदि का काम करते थे. इस की न केवल पुलिस के बड़े अधिकारियों को भनक लगी, बल्कि एक एटीएम लूट में उस का नाम भी आ गया तो उसे बरखास्त कर दिया गया.

वह पंचायत चुनाव लडऩे के लिए पत्नी के दबाव में धन जुटाने की तैयारी में लग गया था. सब से पहले उस ने अपने भाई नीरज मिश्रा को साथ ले कर योजना बनाई. उस ने ही कुछ अन्य साथियों के साथ विजय पांडेय से संपर्क किया. वह हितांक्षी पेमेंट सर्विस (सीएमएस) प्राइवेट लिमिटेड द्वारा एटीएम को सप्लाई करने वाली नकद करेंसी का काम करता था.

हालांकि वह अपनी संदिग्ध गतिविधियों के चलते कंपनी से निष्कासित हो चुका था. नीरज के कहने पर वह उस के गैंग में शामिल हो गया था. उस के साथ राज तिवारी, पंकज कुमार पांडेय, कुमार भास्कर ओझा और सुधीर मिश्रा भी थे. सुधीर मिश्रा पहले भी कुछ आपराधिक गतिविधियों के चलते जेल जा चुका था, जहां राजस्थान के मेवाती गैंग के संपर्क में आ गया था और अपने भाई नीरज के साथ मिल कर नया गैंग बना लिया था.

नीरज मिश्रा ने लखनऊ के खुरदही बाजार में एटीएम की पलसर बाइक से रेकी कर मालूम कर लिया कि 3 अप्रैल की रात ही उस में 39 लाख रुपए की रकम डाली गई है. उस ने तुरंत अपने साथी गैंग के सभी सदस्यों को अलर्ट कर उन्हें एटीएम के पास बुला लिया. राज तिवारी, पंकज कुमार पांडेय, कुमार भास्कर ओझा गैस कटर ले कर आ गए. उन्होंने फटाफट एटीएम काटी और रकम निकाल कर नीले रंग की बलेनो कार से रात के डेढ़ बजे लखनऊ आ गए.

बाद में पुलिस ने बरखास्त सिपाही सुधीर मिश्रा की पत्नी रेखा मिश्रा को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में लुटेरों ने बताया कि पहले वे बगैर सिक्योरिटी गार्ड वाले एटीएम को टारगेट बनाया करते थे. गार्ड नहीं होने की वजह से उस का शटर गिरा कर टेक्निकल सदस्य बन कर काम करते थे. इस दौरान सुधीर खुद बाहर रखवाली किया करता था. वे बाहर से सीसीटीवी कैमरों पर ब्लैक पेंट कर दिया करते थे.

आरोपियों से पूछतछ के बाद उन की निशानदेही पर 14.63 लाख रुपए नकद के अलावा, 2 फरजी नंबर प्लेट, मारुति बलेनो कार, पलसर बाइक, 6 आरी, गैस पाइप, सिलेंडर, रेग्युलेटर, पेचकस, प्लास आदि सामान बरामद हुआ.

सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.