भांजे के इश्क में फंसी रीना – भाग 1

मुरैना के स्टेशन रोड थाना क्षेत्र में बुद्धाराम का पुरा गांव निवासी रामहेत 3 दिनों से दिखाई नहीं दिया था. इस कारण आसपास के लोग उस की पत्नी रीना से पूछताछ करने लगे थे. पहले तो वह चुप लगा जाती थी, फिर थोड़ा रुक कर बताती थी कि काम के सिलसिले में मुरैना से बाहर ग्वालियर गए हुए हैं. जब उस से पूछा जाता कि रामहेत ग्वालियर से कब आएगा? इस पर वह बेरुखी से जवाब देती, ‘‘पता नहीं.’’

“कब गया, हमें तो कुछ बताया ही नहीं?’’ रामहेत के दोस्त ने कहा.

“अरे, मुझे भी कहां कुछ बताया था. अचानक आधी रात को उठा और जाने को तैयार हो गया,’’ रीना बोली.

“गजब का मर्द है! उस के लायक यहां काम नहीं था क्या, जो परदेस में चला गया? वहां क्या कमाएगा, क्या खाएगा और क्या बचाएगा?’’

“ये तो वही जाने,’’ रीना बोलती हुई तेज कदमों से घर आ गई थी.

अभी वह चौखट लांघी ही थी कि उस के ससुर ने आवाज लगाई, ‘‘अरे बहू! सुनती हो, रामहेत का कोई फोन आया क्या?’’

“नहीं, अभी नहीं आया, उस बेशर्म का फोन आएगा, तब सब से पहले तुम्हें बताऊंगी. लो देख लो.’’ यह कह कर हाथ से पकड़े मोबाइल को अपने ससुर तुलाराम की ओर बढ़ा दिया.

“अरे बहू, तुम तो नाराज हो गई. मुझे तो चिंता हो रही है. ग्वालियर जाने से पहले वह मुझ से मिला तक नहीं, पता नहीं क्यों?’’ तुलाराम बोला.

“मैं तो जाने से पहले बोली थी बाबूजी का आशीर्वाद ले लो, लेकिन वह अपनी मरजी का मालिक जो ठहरा.’’

“होली आने वाली है, तुम भी उसे फोन कर लिया करो.’’ तुलाराम बोला.

“मैं क्या करूं? उसे फोन करकर के थक गई हूं. उस का मोबाइल फोन हमेशा बंद बताता है तो कभी टों…टों करने लगता है,’’ रीना बोली.

“अपने भांजे सूरज को बोल वह ग्वालियर जा कर पता कर लेगा. पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’

“अब उसे क्या कहूं? तुम्हीं जा कर देख आओ, कहीं पोहे का ठीहा लगाता होगा या मजदूरी कर रहा होगा हरामखोर, कमीना इंसान है.’’

“इतनी बेरुखी से क्यों बोलती हो? गाली तो मत दो, तुम्हारा पति है!’’

तुलाराम जब भी रीना से रामहेत के बारे में बातें करता तो वह चिढ़ जाती थी. तुलाराम समझ नहीं पा रहा था कि वह ऐसा क्यों कर रही है. फिर वह यही सोच कर चुप जाता था कि मियांबीवी के बीच की आपसी बात है. तुलाराम जाटव को आशंका थी कि उस का बेटा घर छोड़ कर कहीं चला गया है. वह तब और परेशान हो जाता था, जब उस के दिमाग में बात आती थी कि रामहेत किसी गलत कामधंधे में तो नहीं लग गया. कई महीने से काफी उलझन में दिख रहा था.

वह जहां भी जाता, अपने बेटे के बारे में पूछता था. एक तरह से वह उस की तलाश करने लगा था. उस के दोस्तों से पूछताछ करने लगा था, किंतु वे भी रामहेत के बारे में कुछ नहीं बता रहे थे. तुलाराम को रामहेत के बारे में मालूम करने की हर कोशिश नाकाम रही. तब वह थकहार कर मुरैना के स्टेशन रोड थाने जापहुंचा. वह एसएचओ रविंद्र कुमार से मिला.

तुलाराम ने बताया कि उन का 35 वर्षीय बेटा रामहेत जाटव उर्फ लल्लू 23 जनवरी, 2023 से घर नहीं लौटा है. वह पत्नी रीना से काम के सिलसिले में ग्वालियर जाने की बात बोला था. उसे ले कर चिंता इसलिए भी हो रही है, क्योंकि उस का फोन भी नहीं आया है. और उस का फोन बंद आ रहा है. तुलाराम की शिकायत और जानकारी के आधार पर थाने में 26 जनवरी, 2023 को पुलिस ने रामहेत की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली.

एसएचओ रविंद्र कुमार ने इस सूचना से एसपी आशुतोष बागरी और एडिशनल एसपी रायसिंह नरवरिया समेत एसपी (सिटी) अतुल सिंह को अवगत करा दिया. इस के लिए एक टीम बनाई गई. तुलाराम से मिली जानकारी से पुलिस इतना तो समझ ही गई थी कि बाकी की जानकारी रामहेत की पत्नी से मिल सकती है. एसएचओ ने रीना को तुरंत थाने बुलवा कर उस से रामहेत के बारे में पूछताछ की. इसी सिलसिले में पुलिस ने उस का और रामहेत का मोबाइल नंबर ले कर सर्विलांस पर लगा दिया.

रीना पहले तो उसी तरह जवाब देती रही, जैसा पड़ोसियों और अपने ससुर को दे चुकी थी. उस की पति के प्रति बेरुखी दिखाने वाला जवाब सुन कर पुलिस को उस के चरित्र को ले कर संदेह हुआ. यहां तक कि उस की बौडी लैंग्वेज और हावभाव भी पुलिस को अजीब लगा. पुलिस ने बातचीत के दौरान यह भी महसूस किया कि रीना को पति के लापता होने की कोई चिंता नहीं थी. उस के साथ जब सख्ती के साथ पूछताछ की गई, तब उस ने जो सच्चाई उगली, उस में अनैतिक संबंध की कहानी उजागर हो गई और रामहेत के बारे में भी जानकारी मिल गई.

एसएचओ ने रामहेत और उस की पत्नी रीना के मोबाइल नंबर ले कर उन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि रीना एक नंबर पर सब से ज्यादा बातें किया करती थी, जिस दिन 23 जनवरी, 2023 को रामहेत घर से काम पर जाने की कह कर लापता हुआ. उस दिन भी रामहेत के नंबर से उस नंबर पर काफी लंबी बात हुई थी. उस नंबर की जांच हुई तो वह रामहेत के ठीक बगल में रहने वाले सूरज का निकला. जबकि वह पड़ोस में रहता था और वह उसे मामी कह कर बुलाता था.

जिद ने उजाड़ा आशियाना – भाग 2

इकबाल और शफकत का प्यार जब इतना गहरा हो गया कि वे जुदा होने के नाम पर घबराने लगे तो एक दिन इकबाल ने हंसते हुए कहा, ‘‘शफकत, तुम मेरे चक्कर में कहां पड़ रही हो? शायद तुम्हें पता नहीं कि मैं पहले से ही शादीशुदा हूं. मेरी एक बेटी भी है. लेकिन मेरी बीवी मुझ से अलग रहती है, जिस के लिए मुझे गुजाराभत्ता देना पड़ता है.’’

शफकत अब तक इकबाल के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उस की इन बातों पर उसे विश्वास नहीं हुआ, इसलिए इस बात को मजाक समझ कर वह उस के साथ जिंदगी के सुनहरे सपने बुनती रही. दोनों के दिल एकदूसरे के लिए मचल रहे थे. इकबाल शफकत से बेपनाह मोहब्बत करने लगा था, इसलिए एक दिन उस ने अपने दिल की बात अब्दुल्ला से कह दी, ‘‘दोस्त, आप की भतीजी शफकत से मुझे प्यार हो गया है. मैं उस से निकाह करना चाहता हूं. आप अपने भैया से बात करो.’’

अब्दुल्ला को इस निकाह से कोई ऐतराज नहीं था. इकबाल और शफकत पढ़ेलिखे और समझदार थे. दोनों ही अपना अच्छाबुरा सोचनेसमझने लायक थे. इसलिए दोनों के निकाह में उसे कोई बुराई नजर नहीं आई. इस के बाद अब्दुल्ला जयपुर गया तो उस ने भाई शमशाद से शफकत और इकबाल के रिश्ते की बात चलाई. थोड़ी नानुकुर के बाद शमशाद ने इस रिश्ते की मंजूरी दे दी.

इकबाल के पहले निकाह की बात जब अब्दुल्ला को ही नहीं मालूम थी तो शमशाद को कैसे मालूम होती. शफकत से उस ने कहा था तो उस ने इसे मजाक समझा था, इसलिए उस के पहले निकाह की बात राज ही बनी रही. शमशाद अहमद के हामी भरने के बाद 23 दिसंबर, 2012 को इकबाल और शफकत का निकाह दिल्ली में हो गया.

इस निकाह में शफकत के घर वालों के साथ रिश्तेदार भी शरीक हुए थे, लेकिन इकबाल के घर वालों के साथ केवल कुछ दोस्त ही आए थे. शफकत के घर वालों ने इस बात पर ज्यादा तूल नहीं दिया, क्योंकि अब्दुल्ला और इकबाल में अच्छी दोस्ती थी, इसलिए सब को यही लगा था कि वह उसे अच्छी तरह जानता होगा. उस के व्यवहार से भी वाकिफ होगा.

निकाह के बाद इकबाल अपनी बेगम शफकत को गांव बिछोर ले गया. बिछोर में रहते हुए भी शफकत को इकबाल के पहले निकाह की जानकारी नहीं हो सकी. जबकि सच्चाई यह थी कि उस का हरियाणा के नूंह की ही रहने वाली साजिदा से 26 मई, 2006 को निकाह हो चुका था. 2 साल बाद साजिदा ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिस का नाम इकबाल ने सदर रखा था.

बेटी के जन्म के कुछ दिनों बाद इकबाल और साजिदा के बीच जमीन नाम कराने को ले कर मनमुटाव हो गया. यह मनमुटाव इतना बढ़ा कि साजिदा ने इकबाल और उस के घर वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने इकबाल, उस के वालिद याकूब खां और मां जमीला को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. यह दिसंबर, 2008 की बात थी.

बाद में सभी जमानत पर रिहा हुए. इस के बाद पारिवारिक न्यायालय के आदेश पर इकबाल को साजिदा को हर महीने 3 हजार रुपए गुजाराभत्ता देना पड़ रहा था.

शफकत गांव बिछोर में ही रह रही थी, जबकि इकबाल दिल्ली रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा था. बीचबीच में वह गांव भी जाता रहता था. 2-4 बार वह शफकत को भी दिल्ली ले आया. जयपुर शहर में रह कर पढ़ीलिखी शफकत को उम्मीद थी कि पढ़ाई पूरी होने के बाद इकबाल की नौकरी लग जाएगी तो वह उस के साथ दिल्ली या किसी अन्य शहर में रह कर मजे से जिंदगी गुजारेगी. इसी उम्मीद में वह गांव में रह रही थी.

9 नवंबर, 2013 को शफकत ने एक बेटे को जन्म दिया. इकबाल ने उस का नाम अथर रखा. शफकत का निकाह हुए एक साल से ज्यादा हो गया, एक बेटा भी हो गया, इस के बाद भी इकबाल उसे साथ रखने को तैयार नहीं था. शहर में रहने वाली शफकत को बिछोर जैसे छोटे से गांव में अच्छा नहीं लगता था.

दिन भर परदे में रहने और पढ़ाईलिखाई का कोई उपयोग न होने से शफकत कुंठित होने लगी. उसे घुटन सी होने लगी तो वह इकबाल से जयपुर चल कर रहने के लिए कहने लगी. जबकि इकबाल इस के लिए राजी नहीं था. वह दिल्ली में रह कर पढ़ाई पूरी करना चाहता था. इसी बात को ले कर दोनों में अनबन रहने लगी.

शफकत जब बारबार जयपुर चल कर रहने की जिद करने लगी तो इकबाल को उस के चरित्र पर संदेह होने लगा. उसे लगने लगा कि इस का वहां किसी लड़के से प्रेम संबंध होगा, इसीलिए यह जयपुर चलने की जिद कर रही है. शक ऐसी बला है, जिस से जल्दी पीछा नहीं छूटता. यही हाल इकबाल का हुआ. इस तरह उस की और शफकत की प्रेम कहानी में शक का घुन लग गया, जो दांपत्य के विश्वास को धीरेधीरे खोखला करने लगा.

शफकत की छोटी बहन का निकाह लखनऊ में तय हुआ, जिसे अप्रैल, 2014 में होना था. संयोग से उसी बीच इकबाल के छोटे भाई अब्बास का भी निकाह तय हो गया. शफकत की बहन का निकाह पहले था, इसलिए शमशाद अहमद अपनी बीवी के साथ एक दिन बिछोर गए और शफकत को विदा करा लाए. अब तक शक की वजह से इकबाल और शफकत के बीच मनमुटाव इतना बढ़ गया था कि इकबाल न तो शफकत की बहन की शादी में गया और न ही शफकत इकबाल के भाई की शादी में आई.

बिछोर से जयपुर आने के बाद शफकत ने अपने गुजरबसर के लिए नौकरी ढूंढ़ ली. उसे एक प्राइवेट स्कूल में मैथ और साइंस पढ़ाने की नौकरी मिल गई. भले ही वह इकबाल से दूर थी और जयपुर में नौकरी कर रही थी, लेकिन उस की इकबाल से मोबाइल पर बातचीत होने के साथ वाट्सएप पर चैटिंग भी होती रहती थी.

इस बातचीत और चैटिंग में शफकत उसे जयपुर आ कर रहने के लिए कहती थी. इस बात पर इकबाल को गुस्सा आ जाता तो वह उसे भलाबुरा कहता. इस के बाद शफकत भी उसे उसी तरह जवाब देती. पुलिस के अनुसार, शफकत उसे चिढ़ाने के लिए यह भी कहने लगी थी कि उस ने दूसरा हमसफर ढूंढ लिया है, इसलिए अब वह उस के साथ नहीं जाएगी.

जिद ने उजाड़ा आशियाना – भाग 1

अदालत के आदेश पर बीवी पर गोली चलाने वाले इकबाल को जेल पहुंचाने आई पुलिस टीम उसे जेल स्टाफ को सौंपने के लिए लिखापढ़ी की काररवाई कर रही थी, तभी थाना रामगंज के थानाप्रभारी रामकिशन बिश्नोई के रीडर जगदीश चौधरी ने इकबाल को जो बताया, उसे सुन कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. उस की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे.

जेल में ऐसा होना आम बात है. लेकिन इकबाल का मामला कुछ अलग तरह का था. वह नासमझ नहीं, पढ़ालिखा इंसान था. दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय से एम.फिल. कर रहा था. पढ़ालिखा और समझदार होने के बावजूद उस ने गुस्से में बीवी को एक नहीं, 2 गोलियां मार दी थीं. उस ने गोलियां ऐसी जगह मारी थीं, जिस से वह मरे न, लेकिन वह मर गई थी.

इस बात की जानकारी इकबाल को तब तक नहीं थी. उसे यही मालूम था कि उस का अस्पताल में इस इलाज चल रहा है. यही वजह थी कि जेल स्टाफ को सौंपते समय जब रीडर जगदीश चौधरी ने उसे बताया कि उस की बीवी शफकत मर चुकी है तो वह सन्न रह गया था.

बीवी की मौत के बारे में जान कर इकबाल की आंखों से आंसू बहने लगे थे. उस के दोनों हाथ दुआओं के लिए उठ गए थे. इस के बाद हथेली से आंसू पोंछते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं शफकत से बहुत प्यार करता था और शायद इतना ही प्यार हमेशा करता रहूंगा. आप मेरे सासससुर से कहिएगा कि वे उस की कब्र पर कोई निशान लगा कर रखेंगे. मैं जेल से बाहर आऊंगा तो बाकी की जिंदगी उसी की कब्र पर बिताऊंगा. क्योंकि अब मैं सिर्फ उसी का हो कर रहना चाहता हूं. मैं अपने सासससुर से भी दूर नहीं रहना चाहता. ताउम्र उन से नाता बनाए रखना चाहता हूं.’’

जयपुर (उत्तर) के थाना रामगंज की पुलिस ने इकबाल को 19 अगस्त को अपनी बीवी शफकत को गोली मारने के आरोप में गिरफ्तार किया था. लेकिन अस्पताल पहुंचतेपहुंचते शफकत की मौत हो गई थी. पुलिस ने इकबाल को अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.

उस की मनोस्थिति को देखते हुए पुलिस ने उसे यह नहीं बताया था कि शफकत अब इस दुनिया में नहीं रही. बीवी की मौत के बारे में जानकारी न होने की वजह से इकबाल रिमांड अवधि के दौरान खुदा से शफकत के जल्द से जल्द ठीक होने की दुआएं मांगता रहा.

लेकिन रिमांड अवधि खत्म होने पर अदालत के आदेश पर इकबाल को न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो उसे जेल पहुंचाने आई पुलिस टीम में शामिल रीडर जगदीश चौधरी ने जब उसे बताया कि शफकत अब इस दुनिया में नहीं रही तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘आप झूठ बोल रहे हैं. ऐसा कैसे हो सकता है. उस ने साथ जीने और मरने की कसमें खाई थीं. वह मुझे इस तरह छोड़ कर नहीं जा सकती. सासससुर ने शफकत को मेरे साथ नहीं भेजा, इसीलिए मैं ने उसे गोली मारी थी. मुझे पता नहीं था कि इस तरह वह मेरा साथ छोड़ देगी.’’

इकबाल की बातें सुन कर पुलिस वालों को भी उस पर दया आ गई थी. पुलिस वालों ने इकबाल को समझाबुझा कर शांत किया और उसे जेलकर्मियों के हवाले कर दिया. जेल वाले उसे बैरक में ले गए. जेल की बैरक में पहुंच कर इकबाल अपनी मोहब्बत की दुनिया में खो गया. उस की आंखों के सामने शफकत से प्यार, निकाह और बेटे अथर के पैदा होने से ले कर गोली मारने तक की पूरी घटना फिल्म की तरह चलने लगी.

हरियाणा के नूंह जिले की पुन्हाना तहसील के गांव बिछोर के रहने वाले याकूब खां के बड़े बेटे इकबाल ने गांव से इंटर पास कर के आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया था.  जिन दिनों इकबाल एमए कर रहा था, उस की जानपहचान अब्दुल्ला से हुई. लखनऊ का रहने वाला अब्दुल्ला इकबाल से सीनियर था. उस समय वह जामिया से ही पीएचडी कर रहा था, साथ ही वह किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता भी था.

अब्दुल्ला से इकबाल की जानपहचान हुई तो वह उसी के साथ उसी के कमरे में रहने लगा. साथ रहने की वजह से दोनों की दोस्ती और गहरी हो गई तो वे अपनेअपने परिवारों तथा दुखदर्द के साथसाथ दुनियाजहान की बातें करने लगे. अब्दुल्ला के रिश्ते के एक भाई शमशाद अहमद जयपुर में रहते थे. मूलरूप से वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना नांगल सोती के गांव सबलपुरा बीतरा के रहने वाले थे. सन 2008 में वह अपने परिवार के साथ जयपुर आ गए थे और वहां वह रामगंज स्थित रैगरों की कोठी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे.

शमशाद अहमद एमए पास थे, लेकिन उन्होंने नौकरी करने के बजाय व्यवसाय को महत्व दिया. जयपुर में उन्होंने हल्दियों का रास्ता में बच्चों के कपड़ों की दुकान खोली, जो बढि़या चल रही है. दुकान से उन्हें ठीकठाक आमदनी होती थी, जिस से वह आराम की जिंदगी बसर कर रहे थे. वह खुद पढ़ेलिखे थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों की भी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया. शमशाद की 6 संतानों में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. शफकत उन की दूसरे नंबर की बेटी थी. उस का पूरा नाम था शफकत खानम.

अब्दुल्ला और इकबाल में जब कभी घरपरिवार और नातेरिश्तेदारों की बातें होतीं तो कभीकभी शमशाद अहमद की बेटी शफकत का भी जिक्र हो जाता. शफकत जयपुर के वैदिक कन्या कालेज से बीएससी कर रही थी. उसी बीच अब्दुल्ला के साथ इकबाल भी एकदो बार जयपुर घूमने गया.

चूंकि वहां अब्दुल्ला भाई के घर रुकता था, इसलिए दोस्त होने के नाते इकबाल भी वहीं रुकता था. इसी आनेजाने और घर में रुकने की वजह से इकबाल और शफकत खानम के दिलों में एकदूसरे के लिए चाहत पैदा हो गई. इस के बाद कभीकभी इकबाल से मिलने के लिए शफकत अपने चाचा अब्दुल्ला के पास दिल्ली आने लगी.

अब तक दोनों एकदूसरे से काफी खुल चुके थे. अब्दुल्ला को दोस्त पर विश्वास था, इसलिए वह शफकत को उस के साथ अकेली छोड़ कर चला जाता था. ऐसे में ही एक दिन इकबाल और शफकत शाहरुख खान की फिल्म ‘बाजीगर’ देख रहे थे तो टीवी स्क्रीन पर गाना आया, ‘किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुम ने, मगर कोई चेहरा भी तुम ने पढ़ा है..?’

इस लाइन के पूरा होते ही शफकत ने इकबाल की कलाई थाम कर शरारत भरे अंदाज में कहा, ‘‘क्या तुम ने भी किसी का चेहरा पढ़ा है?’’

इकबाल उस की शरारत को समझ गया. इसलिए गाने की लय से लय मिलाते हुए बोला, ‘‘पढ़ा है, मेरी जां नजर से पढ़ा है…’’

अब भला शफकत क्यों चुप रहती. उस ने गाने को आगे बढ़ाया, ‘‘बता, मेरे चेहरे पर क्याक्या लिखा है?’’

इस तरह शरारतशरारत में मोहब्बत का इजहार हो गया तो कभी इकबाल शफकत से मिलने जयपुर जाने लगा तो कभी शफकत उस से मिलने दिल्ली आने लगी. इन मुलाकातों में दोनों साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाते हुए भविष्य के सपने बुनने लगे.

पाक प्यार में नापाक इरादे – भाग 2

पुलिस ने देखा कि सर्वेश इस तरह लाइन पर नहीं आ रही है तो पुलिस ने उस के साथ ऐसा खेल खेला कि बड़ी आसानी से वह उस में फंस गई. पुलिस ने उस से कहा था कि नेत्रपाल उन के कब्जे में है और उस ने बता दिया है कि तुम्हारी मदद से उसी ने पाकेश की हत्या की थी.

सर्वेश एकदम से बोली, ‘‘साहब, वह झूठ बोल रहा है. मैं ने उस से पाकेश की हत्या के लिए नहीं कहा था. उस ने अपने आप उस की हत्या की थी.’’

इस तरह सर्वेश ने सच्चाई उगल दी. इस के बाद लंबी पूछताछ में पुलिस ने सर्वेश से पाकेश की हत्या की पूरी कहानी उगलवा ली, जो इस प्रकार थी.

उत्तराखंड के जसपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर का एक गांव है मोहद्दीपुर हसनपुर. कृपाल सिंह का परिवार इसी गांव में रहता था. उस के पास जो खेतीबाड़ी थी, उसी में मेहनत कर के वह गुजरबसर कर रहा था. शादी के बाद बड़ा बेटा हरियाणा में जा कर रहने लगा था. उस से छोटा धर्मवीर मंदबुद्धि था.

भाईबहनों में पाकेश सब से छोटा था, जो खेतीबाड़ी में कृपाल सिंह की मदद करता था. धर्मवीर मंदबुद्धि था, इसलिए उस की शादी नहीं हो रही थी. तब कृपाल सिंह ने सोचा कि वह पाकेश की शादी कर दें, क्योंकि उस की शादी के लिए लोग आने लगे थे.

बिजनौर के थाना रेहड के पास एक गांव है देहलावाला. उसी गांव के रहने वाले देवेंद्र सिंह चौहान की बेटी सर्वेश कृपाल सिंह को पसंद आ गई तो उस ने पाकेश की शादी उसी से कर दी.

देवेंद्र सिंह भी कृपाल सिंह की ही तरह सीधासादा आदमी था. लेकिन उस की पत्नी मूर्ति देवी काफी तेजतर्रार थी और घर में उसी की चलती थी. सर्वेश ने जैसा अपने घर में देखा था, वैसा ही कुछ ससुराल में करने की कोशिश करने लगी. पाकेश सीधा और शांत स्वभाव का था, इसलिए चंचल स्वभाव वाली सर्वेश को ससुराल में अपनी चलाने में जरा भी परेशानी नहीं हुई.

देहलावाला गांव की गिनती इलाके में अच्छे गांवों में नहीं होती, क्योंकि यहां की कई औरतें देह के धंधे से जुड़ी थीं. वे खुद तो यह धंधा करती ही थीं, अपने साथ कई लड़कियों को भी जोड़ रखा था. इसी देह के धंधे की कमाई से उन के रहनसहन में और गांव के अन्य लोगों के रहनसहन में जमीनआसमान का अंतर था.

उन्हीं के रहनसहन को देख कर सर्वेश की मां मूर्ति देवी भी गांव छोड़ कर काशीपुर आ गई थी. काशीपुर आने के बाद उस ने भी वही रास्ता अपना लिया था और नोट कमाने लगी थी. हालांकि सर्वेश को मां के इस धंधे की जानकारी नहीं थी. लेकिन मां के रहनसहन को ही देख कर उस की भी काशीपुर में रहने की इच्छा होने लगी थी.

शादी के कुछ दिनों बाद ही कृपाल सिंह की मौत हो गई थी, इसलिए पाकेश अकेला पड़ गया था. वह सीधासादा तो था ही, इसलिए सर्वेश जैसा कहती थी, वह वैसा ही करती थी. सर्वेश उस पर काशीपुर चलने के लिए दबाव बनाने लगी. वह पत्नी को बहुत प्यार करता था, इसलिए उसे नाराज नहीं करना चाहता था. पत्नी के कहने पर ही उस ने अपनी एक एकड़ जमीन बेचने का मन बना लिया.

गांव की जमीन बिकते ही सर्वेश अपनी मां की मदद से काशीपुर में घर बनाने के लिए प्लौट ढूंढने लगी. मूर्ति देवी की काशीपुर के कई प्रौपर्टी डीलरों से अच्छी जानपहचान थी. उन्हीं प्रौपर्टी डीलरों की मदद से मूर्ति देवी ने सर्वेश को बाजपुर रेलवे लाइन के किनारे काशीपुर विकास कालोनी में एक प्लौट दिला दिया.

काशीपुर में प्लौट तो खरीद लिया गया, लेकिन जब उस की रजिस्ट्री करानी हुई तो पाकेश और सर्वेश में तकरार होने लगी. पाकेश उस प्लौट की रजिस्ट्री अपने नाम से कराना चाहता था, जबकि सर्वेश चाहती थी कि रजिस्ट्री उस के नाम हो. इस बात को ले कर विवाद ज्यादा बढ़ा तो पाकेश को ही झुकना पड़ा. क्योंकि वह पत्नी को नाराज नहीं करना चाहता था.

सर्वेश के नाम प्लौट की रजिस्ट्री करा कर पाकेश ने घर बनवा लिया. अब तक सर्वेश 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, जिन में बेटा तुषार और बेटी गार्गी थी. सर्वेश ने अपने दोनों बच्चों का दाखिला भी काशीपुर में करा दिया था.

काशीपुर में गुजरबसर के लिए पाकेश महुआखेड़ा की फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. पाकेश का घर जिस मोहल्ले में था, वहां अभी इक्कादुक्का घर ही बने थे. दोनों बच्चे स्कूल चले जाते थे और पाकेश अपनी नौकरी पर. उस के बाद सर्वेश घर में अकेली रह जाती, ऐसे में उस के लिए समय काटना मुश्किल हो जाता था.

काशीपुर आने के बाद सर्वेश का अपनी मां के यहां आनाजाना बढ़ गया था. इसी आनेजाने में उसे मां की हकीकत का पता चल गया. वैसे तो वह महुआखेड़ा की किसी फैक्ट्री में नौकरी करती थी, लेकिन उस की कमाई का मुख्य स्रोत लड़कियों की दलाली थी. यह काम वह मोबाइल फोन से करती थी. उसे लड़कियों की दलाली से अच्छी कमाई हो रही थी.

मां की हकीकत जान कर सर्वेश ने भी उसी राह पर चलने का इरादा बना लिया. उस ने पाकेश से दिन में अकेली रहने वाली परेशानी बता कर एक जूता फैक्ट्री में नौकरी कर ली. उसी जूता फैक्ट्री में उस की मुलाकात नेत्रपाल से हुई. नेत्रपाल वहां सुपरवाइजर था. सर्वेश जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं ज्यादा चंचल और शोख थी.

नेत्रपाल उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के गांव चतरपुर का रहने वाला था. उस का गांव महुआखेड़ा के नजदीक ही था, इसलिए वह घर से ही अपनी ड्यूटी पर आताजाता था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. इसलिए नेत्रपाल के नेत्र सर्वेश से लड़े तो वह उस के लिए पागल हो उठा. जबकि सर्वेश 2 बच्चों की मां थी. लेकिन उस की कदकाठी ऐसी थी कि देखने में वह कुंवारी लगती थी.

कुछ ही दिनों में नेत्रपाल सर्वेश के लिए ऐसा पागल हुआ कि दिनरात उसी के बारे में सोचने लगा. नेत्रपाल के पास सर्वेश का मोबाइल नंबर था ही, इसलिए वह छुट्टी के बाद भी फोन कर के उस से बातें करने लगा.

पाकेश पूरे दिन नौकरी पर रहता था. शाम को थकामांदा आता तो खाना खा कर सो जाता. उसे इस बात की भी चिंता नहीं रहती थी कि पत्नी क्या कर रही है. सर्वेश इसी बात का फायदा उठा कर नेत्रपाल से देर रात तक बातें करती रहती. मोबाइल पर बातें करतेकरते ही नेत्रपाल सर्वेश को अपने इतने नजदीक ले आया कि मौका मिलते ही उस ने उस से अवैध संबंध बना लिए.

नेत्रपाल से संबंध बनने के बाद सर्वेश को पाकेश की अपेक्षा नेत्रपाल की जरूरत ज्यादा महसूस होने लगी थी. सर्वेश को जब भी मौका मिलता, नेत्रपाल को फोन कर देती. नेत्रपाल को उस के फोन का इंतजार रहता ही था, संदेश मिलते ही वह सर्वेश के घर आ जाता.

सवालों के घेरे में मोटिव, मर्डर, वेपन और चश्मदीद – भाग 3

हद तो तब हो गई, जब सीरत का कस्टडी रिमांड हासिल करने के लिए उसे सुबह अदालत में पेश किया गया. वहां माननीय जज से उस ने सीधे कहा कि एकम ने अपने लाइसैंसी रिवौल्वर से आत्महत्या की थी. डर जाने की वजह से वह उस की लाश को ठिकाने लगाने की भूल कर बैठी. अब पुलिस उसे एकम के कत्ल के झूठे केस में फंसा रही है.

माननीय जज ने सीरत को 2 दिनों के कस्टडी रिमांड में रखने का आदेश देते हुए पुलिस से कहा था कि मामला हाईप्रोफाइल है, जांच में कहीं कोई कमी नहीं होनी चाहिए. उसी दिन मोहाली के फेज-6 स्थित सिविल अस्पताल के 3 डाक्टरों मनहर सिंह, हिम्मत मोहन सिंह और कुलदीप सिंह ने एकम के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी और स्टिल फोटोग्राफी भी कराई गई.

अपनी रिपोर्ट में डाक्टरों ने लिखा कि गोली एकम के सिर में कान के पास से होते हुए दिमाग को चीर कर दूसरी तरफ निकल गई थी. लेकिन रिपोर्ट में एकम के जिस्म पर किसी चोट का कोई उल्लेख नहीं था. मृतक का विसरा ले कर रासायनिक परीक्षण के लिए खरड़ स्थित फोरैंसिक लैब में भिजवा दिया गया था. एकम के भाई और पिता को पहले से ही मोहाली पुलिस पर भरोसा नहीं था. उन का आरोप था कि एसपी पंधेर आरोपियों को बचा रहे हैं. इस बात की शिकायत करने के लिए वे 20 मार्च को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मिले.

मुख्यमंत्री के आदेश पर एसपी पंधेर को इस केस से अलग कर मोहाली के युवा एसएसपी कुलदीप सिंह चाहल की अगुवाई में स्पैशल इनवैस्टीगेटिव टीम (एसआईटी) का गठन कर दिया गया, साथ ही यह आदेश भी पारित किया गया कि इस केस की छानबीन के संबंध में एसएसपी अपनी रिपोर्ट तैयार कर रोजाना मुख्यमंत्री को भेजा करेंगे. ऐसा ही किया भी जाने लगा था, लेकिन पूछताछ में समस्या यह आ रही थी कि जब सीरत से पूछताछ की जाने लगी तो वह कभी अपने कपड़े फाड़ने लगती तो कभी चीखचीख कर थाना सिर पर उठा लेती. वह अपने बच्चों से मिलवाने की जिद भी कर रही थी.

उस की हरकतों से परेशान हो कर पुलिस वाले थाने से बाहर निकल कर अधिकारियों को फोन करने लगते थे. सीरत के इसी नाटक में 2 दिन का कस्टडी रिमांड खत्म हो गया. अब उस का लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाने की कवायद शुरू की गई. उस की रिमांड अवधि भी 6 दिनों की करवा ली गई. लेकिन सीरत ने लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाने से मना कर दिया. इस बीच सीसीटीवी कैमरे की एक ऐसी फुटेज पुलिस के हाथ लग गई, जिस में सीरत अकेली सीढि़यों से सूटकेस घसीटते हुए नीचे ला रही थी और बारबार खून के धब्बे साफ कर रही थी.

इस से लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वाकई उस ने अकेले ही इस हत्याकांड को अंजाम दिया हो और अब जानबूझ कर अन्य लोगों को फंसाने का प्रयास कर रही हो. जबकि उस की अपने भाई से पिछले लंबे अरसे से बोलचाल नहीं थी.

6 दिनों का कस्टडी रिमांड भी निकल गया. लेकिन पुलिस सीरत से जरूरी पूछताछ नहीं कर सकी. 27 मार्च को उसे अदालत में पेश कर के रिमांड अवधि बढ़ाने की मांग की गई तो सक्षम जज ने मना करते हुए सीरत को न्यायिक हिरासत में नाभा की हाई सिक्योरिटी जेल भेज दिया. अब पुलिस बिना अदालत की अनुमति के उस से एक भी सवाल नहीं पूछ सकती थी. जबकि एकम परिवार के सदस्य न्याय की खातिर बारबार पुलिस के बड़े अधिकारियों से गुहार लगा रहे थे.

3 अप्रैल, 2017 को सीरत के भाई विनय प्रताप सिंह बराड़ उर्फ विन्नी ने एसएसपी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई, जिस में वह बेकसूर पाया गया. उसे रिहा करने के अलावा पुलिस के पास कोई उपाय नहीं था. इसी तरह 10 अप्रैल को सीरत की मां जसविंदर कौर ने भी अपने वकील के साथ एसएसपी कुलदीप सिंह चाहल के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उस से भी पुलिस ने पूछताछ की. वह भी पूछताछ में बेकसूर पाई गई तो उसे भी छोड़ दिया गया.

यह एक निहायत उलझा हुआ हाईप्रोफाइल केस था. सीरत के पिता का तभी देहांत हो गया था, जब वह काफी छोटी थी. उस का लालनपालन उस के मामा अजीत सिंह मोफर ने किया था, जो बाद में पंजाब की सरदूलगढ़ सीट से कांग्रेसी विधायक चुने गए थे. सीरत की मरजी के अनुसार एकम से शादी करवाने में भी उस के इस मामा ने अपना पूरा सहयोग दिया था. सीरत की अपने भाई से नहीं बनती थी. वह उस की शादी में भी शामिल नहीं हुआ था.

कहते हैं कि सीरत आधुनिक विचारों की खुले हाथों खर्च करने वाली औरत थी. सन 2011 में जिन दिनों एकम पंजाब एग्रो विभाग में मैनेजर के पद पर कार्यरत था, वहां करोड़ों रुपए का घोटाला हुआ था. इस बारे में आपराधिक केस भी दर्ज हुआ था, जिस में कुछ अन्य लोगों के अलावा एकम और सीरत भी आरोपी थे.

यह केस अभी भी मोहाली की एक अदालत में चल रहा है. एकम हत्याकांड में तभी कुछ सामने आ सकेगा, जब कड़ी से कड़ी जोड़ कर व्यापक छानबीन की जाएगी. पुलिस भी खुल कर सामने नहीं आ रही है. केस को ले कर उस के पास शायद कुछ ऐसे पत्ते हैं, जिन्हें वह अभी खोलना नहीं चाहती. वक्त आने पर ही शायद खोल कर केस को मजबूत करे.

अभी तक तो मर्डर का न मोटिव सामने आया है, न मर्डर वेपन ही विश्वसनीय लग रहा है और न ही इस कांड का कोई चश्मदीद गवाह है. फिलहाल औटोचालक का रोल भी परदे के पीछे कर दिया गया है.

एकम के उस रात शराब न पीने की पुष्टि हो चुकी है. कहा जाता है कि वह एक महीने पहले ही शराब पीना छोड़ चुका था. उस का लाइसैंसी रिवौल्वर भी तब से थाने में जमा था, जब पंजाब में विधानसभा के चुनाव हुए थे. ऐसे में वह पिस्तौल किस की थी, जिस से गोली चलने की बात मान कर मौके से कब्जे में लिया गया.

फिलहाल, केस की ताजा स्थिति यह है कि न्यायिक हिरासत की अवधि समाप्त होने पर सीरत जब मोहाली की अदालत में पेश हुई तो उस की हिरासत अवधि बढ़ाते हुए माननीय जज ने आदेश दिया कि आगे उस की पेशी वीडियो कौन्फ्रैंसिंग से हुआ करेगी. मतलब सीरत को निजी रूप से अदालत में पेश नहीं होना पड़ेगा. सीरत ने अपने बच्चों की कस्टडी हासिल करने की बात भी जज से कही थी, जिस के लिए उसे संबंधित अदालत में अर्जी लगाने को कहा गया.

पुलिस का कहना है कि इस केस में अभी भी जांच जारी है. फिलहाल इस में किसी को क्लीनचिट नहीं दी गई है. जिन्हें छोड़ा गया है, उन्हें पूछताछ के लिए कभी भी फिर से बुलाया जा सकता है.

सवालों के घेरे में मोटिव, मर्डर, वेपन और चश्मदीद – भाग 2

लेकिन लंबे अरसे बाद 8 मार्च की रात एकम सिंह अचानक पिता के पास जा पहुंचा. उस समय वह काफी दुखी और परेशान था. रोते हुए उस ने पिता को बताया था कि वह अपनी जिंदगी से काफी परेशान है. उस की पत्नी और सास उसे परेशान कर रही हैं. उस ने यह भी बताया था कि कल उस के साथ बड़ा धोखा हो सकता है. इस के अलावा भी उस ने कई और चौंकाने वाली बातें बताई थीं.

जसपाल सिंह ने उसे आश्वस्त किया था कि वह जल्दी ही उस के घर आ कर इस मामले में उस की पत्नी और सास से बात कर के उस की समस्या का हल निकालने की कोशिश करेंगे. इस के बाद उन्होंने एकम से खाना खा कर जाने को कहा, लेकिन वह भूख न होने की बात कह कर चला गया था.

अगले दिन सवेरे ही दर्शन सिंह ढिल्लो को उस के किसी दोस्त ने फोन कर के एकम के साथ कोई हादसा होने की बात बताई थी. फोन सुनते ही वह उस के घर की ओर चल पड़ा था. एकम पहले चंडीगढ़ के सैक्टर-35 में किराए के मकान में रहता था, जहां वह 80 हजार रुपए महीना किराया देता था. करीब 20 दिनों पहले ही वह मोहाली में एक कनाल की इस कोठी की पहली मंजिल किराए पर ले कर बीवीबच्चों के साथ रहने आया था.

भाई के घर आने पर दर्शन सिंह को भाई के कत्ल के बारे में पता चला था तो उस ने फोन कर के पिता को भी बुला लिया था.

पुलिस ने लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए मोहाली के सिविल अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम का काम निपटाया गया. पुलिस ने दर्शन सिंह ढिल्लो की तहरीर पर भादंवि की धाराओं 302, 201 व 34 के तहत थाना मटौर में मुकदमा दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी.

चूंकि मृतक के सिर में गोली लगने का घाव साफ दिखाई दे रहा था, इसलिए पहली ही नजर में यह मामला गोली मार कर हत्या करने का लग रहा था. इसलिए मुकदमे में शस्त्र अधिनियम की धाराओं 25/54 एवं 59 का भी समावेश किया गया था.

दर्शन सिंह ने अपनी तहरीर में जिन लोगों को नामजद किया था, उस में सीरत कौर ढिल्लो, विनय सिंह बराड़ और जसविंदर कौर बराड़ थीं. इन में विनय एकम सिंह का साला था तो जसविंदर कौर सास. इन तीनों को मुख्यरूप से आरोपी बनाने के अलावा शिकायत में यह भी आशंका व्यक्त की गई थी कि वारदात के समय इन के साथ कुछ और लोग भी रहे होंगे.

इस की वजह मजबूत कदकाठी के लंबेतगड़े आदमी के साथ मारपीट करने और गोली मार कर हत्या करने के बाद उस की लाश को सूटकेस में ठूंस कर भरने का काम 2 महिलाएं और एक आदमी के वश की बात नहीं थी. फिर महिलाओं में भी एक औरत दुबलीपतली और बूढ़ी थी. मौके पर ही दर्शन सिंह ढिल्लो एक बात चीखचीख कर कह रहा था कि सीरत कौर पंजाब के एक बड़े कांग्रेसी नेता की सगी भांजी है, इसलिए पुलिस इस मामले को कतई गंभीरता से नहीं लेगी.

नामजद अभियुक्त फरार हो चुके थे. उन की तलाश में पुलिस ने भागदौड़ शुरू की. पुलिस को इस मामले में कोई सफलता मिलती, उस के पहले ही उसी दिन शाम को एक आदमी बड़ी सी गाड़ी में आया और नामजद मुख्य अभियुक्ता सीरत कौर को थाना मटौर में छोड़ गया. सीरत ने थानाप्रभारी के सामने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर औपचारिक पूछताछ शुरू की.

इस पूछताछ में पता चला कि सीरत की दोस्ती अपने भाई विनय प्रताप सिंह बराड़ के एक दोस्त से थी. इसी दोस्ती की वजह से उस ने भाई और उस के उस दोस्त के साथ मिल कर अपने पति को मौत के घाट उतार दिया था. इस बात की जानकारी उस की मां जसविंदर कौर को भी थी. सीरत के दोस्त ने एकम सिंह पर 2 गोलियां चलाई थीं. उन में से एक उस की खोपड़ी में लगी थी और दूसरी पिस्टल में ही फंस कर रह गई थी.

एकम को खत्म करने की योजना बना कर सभी शनिवार की रात घर आ गए थे. देर रात एकम घर आया तो पहले उस से मारपीट की गई. उस के बाद उसे जबरदस्ती बाथरूम में ले जाया गया और गोली मार दी गई. जब वह मर गया तो वहां पड़े खून के धब्बों को साफ कर के एकम की लाश को ठिकाने लगाने के लिए सूटकेस में ठूंस दिया गया.

सुबह सीरत अकेली सूटकेस को खींचती हुई नीचे ले आई. सूटकेस उतारते समय सीढि़यों में जहांतहां भी खून टपका, उस ने उसे साफ कर दिया. इस से पहले वह नीचे जा कर गाड़ी का गेट खोल कर इस बात का अंदाजा लगा आई थी कि सूटकेस को कहां रखना चाहिए.

इसी चक्कर में गाड़ी की चाबी डिक्की में गिर गई थी और इस बात से बेखबर सीरत ने डिक्की बंद कर दी थी. कार के दरवाजे खुले ही थे. सूटकेस नीचे ला कर जब वह सूटकेस गाड़ी में नहीं रख पाई तो वहां सवारी छोड़ने आए औटोचालक को रोक कर उस से मदद मांगी. सूटकेस रखवा कर वह चला तो गया, लेकिन सीरत को उस की बातों से लगा कि उसे उस पर शक हो गया है.

थोड़ी ही देर में सीरत कौर को पुलिस वैन आती दिखाई दी तो वह वहां से भाग गई. उस के बताए अनुसार, उस के साथ कोई अन्य औरत नहीं थी. औटोचालक ने पता नहीं क्यों झूठ बोला था. पुलिस की तो जैसे लौटरी निकल आई थी. जरा सी देर में बिना खास प्रयास के एक हाईप्रोफाइल मर्डर केस का खुलासा हो गया था. सीरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था. अब अन्य अभियुक्तों को भी आसानी से पकड़ा जा सकता था.

परंतु रात में ही पुलिस की आशा निराशा में बदल गई. सीरत की गिरफ्तारी की सूचना पा कर रात में जब पुलिस के बड़े अधिकारी उस से पूछताछ करने थाने पहुंचे तो वह पिछले बयानों से मुकर गई. अब वह कहने लगी थी कि पति के अत्याचारों से तंग आ कर उस ने अकेले ही उस की हत्या की थी. एकम उस के चरित्र पर शक करते हुए उस से मारपीट करता था. पिछली रात भी वह शराब पी कर आया और उस से मारपीट करते हुए उस ने उस पर अपना रिवौल्वर तान दिया. मौका पा कर रिवौल्वर छीन कर उस ने उसी पर गोली चला दी.

रिवौल्वर के बारे में उस ने बताया कि वह घर की अलमारी में पड़ी है. लेकिन इस कांड में उस के साथ कोई और नहीं था. उस ने अकेले अपनी सुरक्षा को ध्यान में रख कर यह कत्ल किया है और वह अपना अपराध स्वीकार कर रही है.

सवालों के घेरे में मोटिव, मर्डर, वेपन और चश्मदीद – भाग 1

19 मार्च, 2017 की सुबह एक औटोचालक गुरुद्वारा के सामने खड़ी पीसीआर वैन के पास पहुंचा तो काफी बदहवास था. औटोचालक औटो चलाता हुआ आया था, जिस से उस के चेहरे पर हवा भी लगी होगी, पर उस हाल में भी उस के माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा रही थीं. औटो से लगभग कूदता हुआ वह पीसीआर वैन के पास पहुंचा और वैन में बैठे सिपाहियों से बोला, ‘‘साहब, उधर एक कोठी में 2 औरतें एक बीएमडब्ल्यू कार में बड़े साइज का सूटकेस रख रही थीं. सूटकेस भारी था, इसलिए उन्होंने मेरा औटो रुकवा कर मुझ से मदद मांगी.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ वैन में बैठे एक सिपाही ने पूछा.

‘‘मैं सूटकेस गाड़ी में रखवाने लगा तो देखा उस में से खून रिस रहा था. जब मैं ने उन से खून के बारे में पूछा तो एक औरत ने अपना खून सना हाथ दिखाते हुए कहा कि सूटकेस नीचे उतारते वक्त उस के हाथ में चोट लग गई थी, यह उसी का खून है.’’

‘‘वहां हुआ क्या है, तुम यह क्यों नहीं बताते?’’ सिपाही ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मुझे लग रहा है कि किसी की हत्या कर के वे औरतें लाश को उस सूटकेस में रख कर कहीं फेंकने ले जा रही हैं. आप लोग वहां जल्दी पहुंचें वरना वे लाश ले कर निकल जाएंगी.’’ औटोचालक ने कहा.

जैसे ही औटोचालक ने लाश की बात कही, पीसीआर में बैठे सिपाहियों ने औटोचालक को गाड़ी में बिठाया और उसे ले कर मोहाली के फेज-3 बी-1 की कोठी नंबर 116 के सामने पहुंच गए. कोठी के सामने सिल्वर कलर की बीएमडब्ल्यू कार खड़ी थी, जिस का नंबर था सीएच04एफ 0027 था. उस समय वहां कार के अलावा कोई नहीं था. कोई औरत भी वहां नजर नहीं आई.

औटोचालक के कहने पर पीसीआर वैन से आए सिपाहियों ने बीएमडब्ल्यू का पिछला दरवाजा खोला तो उस में गहरे रंग का एक बड़ा सूटकेस रखा था, जिस से खून रिस कर बाहर आ रहा था. पीसीआर वैन के इंचार्ज ने तुरंत इस बात की सूचना संबंधित थाना मटौर को दे दी. थोड़ी ही देर में थाना मटौर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलजिंदर सिंह पन्नू पुलिस टीम के साथ वहां आ पहुंचे.

पुलिस को देख भीड़ जुटने लगी. उस भीड़ में से एक आदमी ने आगे आ कर अपना नाम दर्शन सिंह ढिल्लो बताते हुए कहा, ‘‘सर, अभीअभी मुझे किसी ने बताया है कि मेरे बड़े भाई एकम सिंह किसी हादसे का शिकार हो गए हैं. प्लीज, बताइए न मेरे भाई को क्या हुआ है?’’

बलजिंदर सिंह पन्नू अभी कुछ देर पहले ही वहां आए थे. वहां की स्थिति देख कर उन्होंने कोई काररवाई करने से पहले अपने अधिकारियों को सूचित करना उचित समझा. अधिकारियों को सूचना दे कर वह उन के आने का इंतजार कर रहे थे. इसलिए दर्शन को वह कुछ नहीं बता सके.

थोड़ी देर में डीएसपी (सिटी-1) आलम विजय सिंह के अलावा कुछ अन्य पुलिस अधिकारी भी वहां आ पहुंचे. इंसपेक्टर अतुल सोनी के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम भी आ गई थी. डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीमों को भी बुला लिया गया था.

पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में मौके का नक्शा बना कर बीएमडब्ल्यू कार से सूटकेस निकलवा कर खोला गया तो उस में एक लंबेतगड़े आदमी की लाश निकली, जिसे इस तरह तोड़मोड़ कर ठूंसा गया था कि उस के घुटने उस की ठुड्डी को छू रहे थे. उसे देखते ही दर्शन सिंह ढिल्लो ने कहा कि यह लाश उस के बड़े भाई एकम सिंह ढिल्लो की है. उस ने बताया कि उस के भाई का कद सवा 6 फुट से ज्यादा लंबा और उन का वजन 90-95 किलोग्राम था. चौंकाने वाली बात यह थी कि जिस सूटकेस में लाश ठूंसी गई थी, उस का आकार 2 बाई ढाई फुट था.

पुलिस लाश का निरीक्षण कर रही थी कि मृतक एकम सिंह के पिता जसपाल सिंह भी आ गए. शायद उन्हें दर्शन ने फोन कर के बुला लिया था. लाश का पंचनामा तैयार कर उसे कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने वहां मौजूद कुछ लोगों के बयान लेने के साथ दर्शन सिंह ढिल्लो और उस के पिता जसपाल सिंह से भी काफी विस्तार से पूछताछ की. ये बापबेटे मोहाली के फेज-6 में रहते थे. दोनों से हुई बातचीत में मृतक के बारे में जो पता चला, वह इस तरह से था…

सरदार जसपाल सिंह अपना कारोबार तो करते ही थे, साथसाथ पंजाब के जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे. दरअसल, खालिस्तान मूवमेंट के फाउंडर संत जरनैल सिंह भिंडरावाला से उन की अच्छी जानपहचान थी. उन के प्रति वह काफी हमदर्दी भी रखते थे. औपरेशन ब्लूस्टार के बाद जसपाल सिंह पूरी तरह ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट बन गए थे. 1990 में कुछ हार्डलाइनर्स सिखों से संबंध रखने के आरोप में वह पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ्तार भी किए गए थे. समाज में उन का अच्छाखासा रुतबा था.

जसपाल सिंह ने 3 शादियां की थीं. इन दिनों वह अपनी तीसरी पत्नी और छोटे बेटे दर्शन सिंह के साथ रह रहे थे. दर्शन सिंह ढिल्लो की शादी कुछ दिनों पहले ही हुई थी, लेकिन जल्दी ही उस का पत्नी से तलाक हो गया था. बडे़ बेटे एकम सिंह ने सन 2005 में सीरत कौर से प्रेम विवाह किया था, जिस से उसे 2 बच्चे बेटा गुरनवाज सिंह और बेटी हुमायरा कौर हुई थी.

शादी के 6 महीने बाद ही 40 वर्षीय एकम सिंह पत्नी को ले कर अपने परिवार से अलग हो गया था. कुछ समय तक उस ने असम में नौकरी की. उस के बाद वहां से लौट कर वह चंडीगढ़ के एक बड़े होटल में काम करने लगा था. कुछ दिनों बाद उस ने यह नौकरी भी छोड़ दी थी. इस समय वह स्टोन क्रैशर व कंस्ट्रक्शन का कारोबार कर रहा था. मोहाली के कस्बा नयागांव में उस का अच्छा काम चल रहा था.

इस समय उस का बेटा 11 साल का था तो बेटी 6 साल की. दोनों चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित स्कूलों में पढ़ रहे थे. एकम की अपने छोटे भाई और पिता से बोलचाल नहीं थी. फिर भी उन्हें कहीं न कहीं से एकम के बारे में जानकारी मिलती रहती थी. बेटा बातचीत नहीं करना चाहता था तो वे क्या कर सकते थे. फिर भी जसपाल सिंह को यह जान कर खुशी थी कि एकम तरक्की कर रहा है. उन का सोचना था कि एकम अपने परिवार के साथ बहुत खुश है.

अपनी ही गलती से बना हत्यारा – भाग 3

शादी की बात सुनते ही खुशबू सन्न रह गई. जिस की खातिर उस ने अपना घर त्यागा, वही किसी और का हो जाएगा, यह उस ने सोचा भी नहीं था. उस ने सोचा कि राहुल की जिस लड़की के साथ शादी होने जा रही है, उस से उस का रिश्ता एक दिन में तो तय नहीं हुआ होगा. राहुल को इस की पहले से ही जानकारी रही होगी, लेकिन उस ने यह बात उस से छिपाए रखी. इसलिए वह बोली, ‘‘राहुल ऐसी बात तो नहीं है कि घर वालों ने तुम्हारी मरजी के बिना शादी तय कर दी हो. जब तुम से पूछा होगा तो तुम्हें शादी के लिए मना कर देना चाहिए था. लेकिन तुम ने ऐसा नहीं किया.’’

‘‘खुशबू, मैं चाह कर भी घर वालों की बात का विरोध नहीं कर सका. लेकिन तुम थोड़ी सूझबूझ से काम लो तो समस्या का हल निकल सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘इस का एक ही तरीका है कि शादी होने के बाद तुम भी उसे स्वीकार लो. यानी दोनों साथ रहो.’’

कोई भी औरत नहीं चाहती कि उस के पति को कोई दूसरी औरत बांटे, इसलिए राहुल की बात सुन कर खुशबू भड़क उठी, ‘‘राहुल, तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि दोनों एक साथ रहेंगी. यह हरगिज नहीं हो सकता. तुम एक बात और जान लो, 16 तारीख को जो तुम्हारी सगाई है, वह हरगिज नहीं होगी. उस दिन तुम घर नहीं जाओगे.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? मेरे घर न पहुंचने पर हंगामा हो जाएगा.’’

‘‘और गए तो यहां हंगामा हो जाएगा. अब खुद ही सोच लो कि क्या करना है?’’

खुशबू के सख्त तेवर देख कर राहुल परेशान हो गया. उस ने खुशबू को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह जिद पर अड़ी रही.  उसी दौरान राहुल ने तय कर लिया कि वह अपने घर वालों की इज्जत हरगिज खराब नहीं होने देगा, भले ही उसे खुशबू को रास्ते से क्यों न हटाना पड़े. इसी के मद्देनजर उस ने खुशबू को रास्ते से हटाने की योजना तैयार कर ली. योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वह बाजार से एक छुरा भी खरीद लाया.

16 नवंबर, 2013 को राहुल के तिलक का कार्यक्रम निश्चित था. उस के कार्यक्रम में किसी तरह की कोई अड़चन न पड़े, इसलिए उस ने तिलक के कार्यक्रम से पहले ही खुशबू को ठिकाने लगाना उचित समझा. 15 नवंबर की शाम को खाना खाने के बाद खुशबू और राहुल सोने के लिए बिस्तर पर लेटे थे. थोड़ी देर बाद खुशबू को तो नींद आ गई, लेकिन राहुल की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह रात गहराने का इंतजार कर रहा था.

जब उसे लगा कि मकान मालिक वगैरह सो चुके हैं तो उस ने गहरी नींद में सोई खुशबू के गले पर छुरे से वार किया. एक ही बार में खुशबू की सांस की नली कट गई और वह छटपटाने लगी. वह छटपटाती हुई बेड से नीचे गिर गई और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

पत्नी को ठिकाने लगाने के बाद राहुल ने राहत की सांस ली और बाथरूम में जा कर खून से सने हाथपैर धोए. इस के बाद चादर से लाश ढंक कर वह सुबह को अपने गांव चला गया. उसी दिन उस के तिलक का कार्यक्रम था, जिस में उस के सभी सगेसंबंधी इकट्ठा हुए थे. उस कार्यक्रम में भी वह पूरी तरह सामान्य रहा. उस ने किसी को जरा भी महसूस नहीं होने दिया कि वह कोई बड़ा अपराध कर के आया है.

लाश को छिपाने के लिए राहुल 19 नवंबर को बाजार से खेलने का सामान रखने वाला एक बड़ा सा बैग खरीद कर अंबिका विहार वाले कमरे पर पहुंच गया. खुशबू की लाश को उस ने चादर में लपेट कर प्लास्टिक के एक बोरे में भर कर बंद कर दिया. उस बोरे को उस ने साथ लाए बैग में रख दिया. उस ने सोचा था कि शादी के बाद उस बैग को कहीं ठिकाने लगा देगा.

19 नवंबर को पत्नी की लाश को बैग में रखने के बाद वह शाम को कमरे का ताला लगा कर जीने से उतर ही रहा था कि उसी समय उसे मकान मालिक राजकुमार गिरि मिल गया. उस ने राहुल को अकेले जाते देखा तो उस ने वैसे ही खुशबू के बारे में पूछ लिया. इस पर राहुल ने कहा कि खुशबू की बहन की डिलीवरी होने वाली है, वह आगे निकल गई है. उसे उस की बहन के यहां छोड़ने जा रहा है.

मकान मालिक ने उस की बात पर विश्वास कर लिया. उसे क्या पता था कि उस का किराएदार उस के कमरे में एक बड़ा अपराध कर चुका है. अंबिका विहार से राहुल सीधे अपने गांव पहुंचा. अगले दिन 20 नवंबर को बड़ी धूमधाम के साथ उस की बारात बुलंदशहर पहुंची और वह शिखा को दुलहन बना कर घर ले आया.

राहुल निश्चिंत था कि पुलिस उस तक नहीं पहुंच सकेगी. 22 नवंबर को राजकुमार जब पहली मंजिल पर सफाई करने के लिए पहुंचा तो उसे बदबू महसूस हुई. क्योंकि बोरे में बंद लाश सड़ने लगी थी. राजकुमार की सूचना पर पुलिस उस के घर पहुंची और लाश के बारे में पता लगा. 23 नवंबर को राहुल खुशबू की लाश को ठिकाने लगाने के लिए अंबिका विहार वाले कमरे पर पहुंचा. जब वह करावलनगर में चौक के पास एक दुकान पर बैठा चाय पी रहा था, तब उसे यह पता नहीं था कि पुलिस उस के पीछे लगी हुई है. इसलिए पुलिस ने उसे आसानी से गिरफ्तार कर लिया.

राहुल शर्मा से पूछताछ के बाद जांच अधिकारी इंसपेक्टर अरविंद प्रताप सिंह ने 24 नवंबर को उसे कड़कड़डूमा कोर्ट में मुख्य महानगर दंडाधिकारी रविंद्र वेदी के समक्ष पेश कर उसे एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में पुलिस ने राहुल को उन जगहों पर ले जा कर तसदीक की, जहां से उस ने छुरा और बैग आदि खरीदे थे. फिर 25 नवंबर, 2013 को उसे पुन: अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया.

पति के जेल जाने के बाद शिखा की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. उसे क्या पता था कि दुलहन बनने की जो खुशी वह मन में समेटे हुए थी, वह हाथ की मेहंदी धूमिल होने से पहले ही काफूर हो जाएगी. इस के बाद भी उसे उम्मीद है कि राहुल जल्द ही जेल से बाहर आ जाएगा.

(कहानी में शिखा परिवर्तित नाम है)

—कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित

नेताजी को समझ में आया कानून सबके लिए एक है – भाग 3

जेल जाने के बाद से ही कुशवाह जमानत हासिल करने के प्रयासों में जुटे थे, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने उन की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. बाद में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2016 में आदेश दिया कि इस केस को 6 महीने में निपटाया जाए. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद धौलपुर के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय में 6 महीने से इस मामले की निरंतर सुनवाई चल रही थी. सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दी गई 6 महीने की अवधि 22 अगस्त, 2016 को पूरी हो गई तो कुशवाह ने अपने वकील के मार्फत अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश धौलपुर की अदालत में जमानत अर्जी दाखिल की, जिसे 2 सितंबर, 2016 को अदालत ने खारिज कर दिया.

इस के बाद 8 दिसंबर, 2016 को इस केस में फैसला सुना दिया गया. बाद में 13 दिसंबर को राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने धौलपुर से बसपा विधायक बी.एल. कुशवाह की सदस्यता समाप्त कर दी. इस के साथ ही धौलपुर विधानसभा सीट खाली होने की घोषणा कर दी गई. यह संयोग ही रहा कि बी.एल. कुशवाह सन 2013 में 8 दिसंबर को पहली बार विधायक चुने गए थे और ठीक 3 साल बाद 8 दिसंबर, 2016 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. बाद में विधानसभा अध्यक्ष ने उन की सदस्यता भी 8 दिसंबर, 2016 से ही समाप्त की.

नरेश हत्याकांड के अभी 3 आरोपी फरार चल रहे हैं. इन में बी.एल. कुशवाह के भाई शिवराम और जितेंद्र कुशवाह के अलावा शूटर रोबिन शामिल हैं. रोबिन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का रहने वाला है. पुलिस के अनुसार, रोबिन ने ही नरेश को गोली मारी थी. नरेश की हत्या के समय वह सत्येंद्र के साथ था. पुलिस की जांचपड़ताल एवं अदालत के फैसले में नरेश कुशवाह एवं सीमा उर्फ सुषमा कुशवाह के प्रेम प्रसंग की जो कहानी सामने आई है, वह इस प्रकार है—

धौलपुर के सदर थानान्तर्गत गांव झीलकापुरा के रहने वाले मेघसिंह कुशवाह के 5 बेटे थे. मेघसिंह गरीब किसान हैं. खेतीबाड़ी कर अपना गुजरबसर करते हैं. मेघसिंह का बेटा नरेश कुशवाह धौलपुर की कमला कालोनी में किराए का कमरा ले कर 12वीं की पढ़ाई कर रहा था. खर्च चलाने के लिए वह कुछ कामकाज भी करता था. इसी मकान में नरेश के ऊपर वाले कमरे में किराए पर बी.एल. कुशवाह की बहन सीमा उर्फ सुषमा अपनी बहन रिंकेश के साथ रहती थी. ये दोनों बहनें धौलपुर में गर्ल्स स्कूल में 9वीं कक्षा की छात्राएं थीं.

इसी दौरान नरेश का सीमा से प्रेम शुरू हुआ. दोनों एक साथ ही खाना बनाते और खाते थे. बाद में उन का प्यार परवान चढ़ता गया. सीमा ने तय कर लिया था कि वह शादी नरेश से ही करेगी. नरेश से वह उस के मोबाइल पर बात भी करती थी. नरेश ने उसे कई बार फोन करने को मना भी किया लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर थी, इसलिए नहीं मानी.

नरेश उस से कहता था कि हम दोनों की शादी नहीं हो सकती, क्योंकि तुम बड़े और पैसे वाले घर की लड़की हो. इस पर सीमा नरेश से कहती कि चाहे कुछ भी हो जाए, शादी मैं तुम से ही करूंगी. मैं अपने भाइयों को तुम से शादी करने के लिए मना लूंगी. सीमा ने 2-3 बार नरेश की मां जमुनादेवी से भी बात की थी. उन्होंने उसे नरेश से बातें करने से मना किया था लेकिन सीमा ने नरेश की मां को समझाया कि इलेक्शन के बाद मैं अपने भाइयों को शादी के लिए मना लूंगी.

सीमा ने जमुनादेवी को बताया कि उस ने अपनी भाभी से भी यह बात बता दी है. जमुनादेवी ने नरेश को भी समझाया था कि सीमा पैसे वाले बड़े घर की लड़की है, जिस के साथ तेरी शादी नहीं हो सकती. तू उस से बात मत किया कर. इस पर नरेश ने कहा था कि सीमा खुद फोन करती है और कहती है कि शादी करूंगी तो तुझ से वरना मर जाऊंगी.

नरेश की हत्या से 20 दिन पहले जब दोनों बात कर रहे थे तो सीमा के छोटे भाई को पता चल गया. इस के बाद उस ने नरेश को धमकी दी कि तू उस की बहन का पीछा छोड़ दे वरना अंजाम ठीक नहीं होगा. नरेश की हत्या से 7-8 दिन पहले बनवारीलाल कुशवाह ने भी सीमा से प्रेम को ले कर नरेश को अंजाम भुगतने की धमकी दी थी.

सीमा नरेश को प्रेमपत्र भी लिखती थी. एक बार वह नरेश के साथ एक मंदिर में मनौती मांगने भी गई थी, वहां नरेश ने अपने एक चचेरे भाई को सीमा से मिलवाते हुए कहा था कि यह तेरी भाभी है. हम शादी की मन्नत मांगने आए हैं.

बाद में सीमा के लिखे प्रेमपत्र नरेश के एक बैग से मिले. यह बैग काफी दिनों तक धौलपुर में उसी मकान मालिक के पास पड़ा रहा, जिस में नरेश किराए का कमरा ले कर रहता था. पुलिस ने इन प्रेमपत्रों की लिखावट की पुष्टि के लिए सीमा की स्कूल की उत्तर पुस्तिकाओं व प्रेमपत्रों की हस्तलिपि की जयपुर में विधि विज्ञान प्रयोगशाला में जांच कराई. इस में दोनों हस्तलेख एक ही पाए गए थे.

जिस दिन नरेश की हत्या की गई थी, उस दिन सीमा जयपुर में थी. इस घटना का उसे बाद में पता चला था. नरेश की हत्या से पहले ही सीमा का रिश्ता धौलपुर के रहने वाले गोरेलाल कुशवाह के लड़के आकाश से तय कर दिया गया था.

नरेश हत्याकांड की जांच के दौरान 5 जनवरी, 2013 यानी नरेश की हत्या से करीब एक हफ्ते बाद धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज कराए अपने बयानों में सीमा ने अपने व नरेश के प्रेम संबंधों को सहज व स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया था. हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलट गई थी. इस पर जज साहब ने अपने फैसले में लिखा कि सीमा अभियुक्त बनवारीलाल कुशवाह की सगी छोटी बहन है. बनवारीलाल कुशवाह वर्तमान में धौलपुर से निर्वाचित विधायक हैं.

कोई लड़की जो अपने प्रेमी के साथ विवाह करना चाहती हो और इस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर रही हो, वह तब तक ही अपने प्रेमी का साथ देगी, जब तक उस का अपना अंतिम उद्देश्य अर्थात प्रेमी के साथ विवाह न हो जाए. लेकिन जब उस का प्रेमी ही जीवित न हो तो उस का अपने परिवार वालों के साथ बगावत करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. उस लड़की की लाचारी को शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता, जिसे उसी घर में रहना है, जिस घर का व्यक्ति उसी के प्रेम संबंधों के चलते उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में जेल में बंद हो.

कथा अदालत के फैसले एवं विभिन्न रिपोर्ट्स पर आधारित

नेताजी को समझ में आया कानून सबके लिए एक है – भाग 2

इस बीच, बनवारीलाल कुशवाह ने सन 2013 के आखिर में हुए राजस्थान की 14वीं विधानसभा के चुनाव में धौलपुर सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में नामांकन पत्र दाखिल कर दिया. कहते हैं कि चिटफंड कंपनियों से मोटा पैसा कमाने और छोटे भाई बालकिशन की ससुराल राजनीतिक परिवार में होने के कारण बनवारीलाल कुशवाह की राजनीति में आने की इच्छा थी.

बनवारीलाल कुशवाह ने अपने संपर्कों के बल पर बसपा का टिकट हासिल कर लिया. राजस्थान में उस समय जनता महंगाई जैसे कारणों को ले कर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की सरकार बदलना चाहती थी. इसलिए भाजपा के पक्ष में लहर चल निकली. भाजपा की लहर के बावजूद धौलपुर से बसपा के टिकट पर बनवारीलाल कुशवाह विधायक चुन लिए गए.

विधानसभा चुनाव के दौरान बनवारीलाल कुशवाह द्वारा भरे गए नामांकन पत्र के साथ 8 नवंबर, 2013 को नोटरी से सत्यापित शपथपत्र में उन्होंने खुद की वार्षिक आय 1 करोड़ 47 लाख 64 हजार 130 रुपए बताई, जबकि पत्नी शोभारानी की वार्षिक आय 38 लाख 55 हजार 750 रुपए बताई. शपथपत्र में बनवारीलाल ने खुद की ओर से 18 कंपनियों में 12 करोड़ 55 लाख रुपए एवं पत्नी शोभारानी की ओर से 15 कंपनियों में 2 करोड़ 85 लाख रुपए का निवेश बताया गया. शपथपत्र में कुशवाह ने धौलपुर के गांव जमालपुर में 3.83 एकड़ जमीन, दलेलपुर में 0.63 एकड़ जमीन और धौलपुर में 20,664 वर्गफुट गैर कृषि भूमि होना बताया. इस के अलावा उन्होंने दिल्ली एवं ग्वालियर में अपनी संपत्तियां होने की बात भी कही थी.

विधायक चुने जाने के बाद बनवारीलाल कुशवाह पर विधानसभा चुनाव में गलत शपथपत्र पेश करने के आरोप भी लगे. इस संबंध में कई लोगों की ओर से अलगअलग अधिकारियों को ज्ञापन भी दिए गए. ज्ञापन में आरोप लगाए थे कि बनवारीलाल कुशवाह मध्य प्रदेश में चिटफंड धोखाधड़ी मामले में आरोपी हैं. बनवारीलाल कुशवाह भले ही धौलपुर से विधायक चुने गए, लेकिन वे गिरफ्तारी के डर से राजस्थान विधानसभा के पहले सत्र में तय समय पर शपथ लेने नहीं पहुंचे.

बाद में 6 फरवरी, 2014 को वे शपथ लेने विधानसभा पहुंचे, उस से पहले ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले कर पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि वे अंतरिम जमानत पर हैं. बाद में पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के बाद बनवारीलाल कुशवाह ने 7 फरवरी, 2014 को विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल के चैंबर में शपथ ली. अगर वे चुनाव के 60 दिनों के भीतर शपथ नहीं लेते तो उन की विधानसभा सदस्यता रद्द हो सकती थी.

दूसरी ओर पुलिस नरेश हत्याकांड की जांच कर रही थी. एक साल से अधिक समय से मामले की जांच एक से दूसरे पुलिस अधिकारियों के बीच घूमती रही. मृतक नरेश के परिजनों द्वारा पुलिस पर लगातार काररवाई का दबाव बनाने से मामले की जांच में तेजी आई. जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अप्रैल 2014 में सत्येंद्र सिंह को नरेश की हत्या के आरोप में उत्तर प्रदेश की बुलंदशहर जेल से रिमांड लिया.

बुलंदशहर जिले के शिकारपुर थानाक्षेत्र के गांव करीरा के रहने वाले सत्येंद्र सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि नरेश की हत्या की साजिश धौलपुर विधायक बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने रची थी. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद धौलपुर पुलिस ने नरेश हत्याकांड में सत्येंद्र सिंह के विरुद्ध धारा 302, 120बी एवं 201 भादंसं के तहत और बनवारीलाल कुशवाह के विरुद्ध भादंसं की धारा 302 एवं 120बी के तहत मामला दर्ज कर लिया. इन के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी इस मामले में नामजद किया गया.

नरेश हत्याकांड में नाम आने से विधायक बनवारीलाल कुशवाह की मुश्किलें बढ़ गईं. कुशवाह के साथ उन के भाई शिवराम एवं चचेरे भाई जितेंद्र कुशवाह ने जून, 2014 में धौलपुर की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई. अदालत ने 6 जून, 2014 को तीनों कुशवाह भाइयों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी. इस अर्जी में कुशवाह बंधुओं ने कहा कि नरेश की हत्या में उन्हें गलत फंसाया जा रहा है.

इस के जवाब में लोक अभियोजक अनंतराम त्यागी ने अदालत में दलील दी कि नरेश की हत्या के अपराध में पुलिस ने सत्येंद्र नामक व्यक्ति को पकड़ा था. उस ने पुलिस को बताया कि नरेश की हत्या की योजना विधायक बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने बनाई थी. नरेश की हत्या के लिए 4 लाख रुपए की सुपरी दे कर बुलंदशहर से एक शूटर को भी बुलाया गया था.

त्यागी ने अदालत को बताया कि नरेश के परिजनों ने सत्येंद्र की शिनाख्त धौलपुर जिला कारागार में की थी. इस प्रकरण की जांच भरतपुर आईजी द्वारा की जा रही है. प्रारंभिक जांच में माना गया है कि नरेश हत्याकांड में बी.एल. कुशवाह का हाथ है. विधायक कुशवाह ने बाद में दूसरी अदालतों से इस मामले में अग्रिम जमानत हासिल करने के प्रयास किए, लेकिन उन्हें किसी भी अदालत से राहत नहीं मिली. पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिशों में जुटी थी.

इसी बीच विधायक के खिलाफ मामला होने के कारण इस प्रकरण की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई. सीबीसीआईडी ने जांच कर के विधायक कुशवाह की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए. पुलिस के बढ़ते दबाव को देख कर आखिरकार कुशवाह ने 13 अक्तूबर, 2014 को जयपुर स्थित पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया. आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने विधायक बी.एल. कुशवाह को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने इस की सूचना राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल को भी दे दी. कुशवाह के आत्मसमर्पण के मौके पर सीबीसीआईडी के डीआईजी डा. गिरराज मीणा ने बताया कि मामले की जांच के दौरान पुलिस को एक सिमकार्ड की जानकारी मिली थी. यह सिमकार्ड दिल्ली स्थित गरिमा होम्स एंड फार्म्स लिमिटेड के नाम थी, जो कंपनी के कर्मचारी सत्येंद्र सिंह को जारी हुई थी.

सत्येंद्र सिंह विधायक कुशवाह का गनमैन था. नरेश की हत्या के बाद से वह भी फरार था. उत्तर प्रदेश पुलिस ने सत्येंद्र को आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार किया था. राजस्थान पुलिस सत्येंद्र को बुलंदशहर जेल से गिरफ्तार कर के लाई थी. डीआईजी डा. मीणा ने बताया था कि सत्येंद्र सिंह ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि उस ने अपने साथी रोबिन के साथ मिल कर नरेश की हत्या की थी.

इस हत्या की साजिश विधायक बी.एल. कुशवाह ने अपने साथियों के साथ रची थी. जांच में सामने आया कि नरेश और विधायक कुशवाह की बहन के प्रेम संबंध थे. वे दोनों शादी करना चाहते थे, इसीलिए बी.एल. कुशवाह और उन के भाई नरेश को अपनी बहन से दूर रहने की चेतावनी देते थे. बाद में बी.एल. कुशवाह और उस के साथियों ने धौलपुर के मनिया स्थित गेस्टहाउस में गनमैन सत्येंद्र के साथ मिल कर नरेश की हत्या की साजिश रची थी.

नरेश की हत्या के लिए घटना से कुछ दिन पहले शूटर रोबिन सिंह को धौलपुर लाया गया था. आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने बी.एल. कुशवाह को दूसरे दिन अदालत में पेश कर के रिमांड पर ले लिया. बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में धौलपुर जिला जेल भेज दिया गया. आवश्यक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने अक्तूबर, 2014 के आखिर में धौलपुर के न्यायिक मजिस्ट्रैट (एक) की अदालत में बी.एल. कुशवाह एवं सत्येंद्र सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया.

यह प्रकरण विधिवत सुनवाई के लिए धौलपुर के सत्र न्यायालय में पहुंचा. जहां इस केस की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायायाधीश ने शुरू की. इसी बीच कुशवाह ने अपनी मां की तबीयत खराब होने की बात कह कर मां की देखभाल के लिए अंतरिम जमानत की अर्जी लगाई. अदालत ने 27 मई, 2015 को कुशवाह को 2 लाख रुपए के मुचलके पर सशर्त अंतरिम जमानत दे दी. बाद में 10 जून को कुशवाह ने धौलपुर जिला कारागार में अपनी हाजिरी दी.