नेताजी को समझ में आया कानून सबके लिए एक है – भाग 1

उस दिन तारीख थी 8 दिसंबर. राजस्थान के शहर धौलपुर के कचहरी परिसर में उस दिन आम दिनों से कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. सर्दी होने के बावजूद लोग 10 बजे से पहले ही कचहरी पहुंच गए थे. कारण यह था कि उस दिन बहुचर्चित नरेश कुशवाह हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था, जिस में अभियुक्त थे धौलपुर के बसपा विधायक बी.एल. कुशवाह. अदालत के फैसले से जहां एक तरफ विधायक बी.एल. कुशवाह के भविष्य का निर्णय होना था, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के कई प्रमुख दलों की निगाहें भी इस फैसले पर टिकी थीं.

इस की वजह यह थी कि विधायक को सजा होने पर बसपा की एक सीट कम हो जाती, जिस के लिए उपचुनाव होना तय था, क्योंकि राजस्थान में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2018 तक था.  अदालत ने नरेश कुशवाह हत्याकांड का फैसला सुनाने की तारीख 8 दिसंबर पहले ही तय कर दी थी. सत्र न्यायाधीश सलीम बदर निर्धारित समय पर अदालत पहुंच गए. उन्हें ही इस केस का फैसला सुनाना था. पुलिस गार्ड भी अभियुक्तों बी.एल. कुशवाह और सत्येंद्र सिंह को जेल वैन में ले कर समय पर अदालत आ गए थे.

अपर सत्र न्यायाधीश के कुरसी संभालते ही अदालत में सन्नाटा छा गया. दोनों अभियुक्त तो अदालत में थे ही, मृतक नरेश कुशवाह के घर वाले, राज्य सरकार की ओर से नियुक्त लोक अभियोजक अजय कुमार गुप्ता, विपक्ष के वकील रामकुमार शर्मा और सत्येंद्र सिंह के वकील सुरेंद्र शर्मा भी अदालत में मौजूद थे. अदालत में शांति बनाए रखने का आदेश देने के बाद न्यायाधीश महोदय ने अपना फैसला सुनाना शुरू किया,

‘‘अदालत ने दंड के रूप में दी जाने वाली सजा पर दोनों पक्षों को ध्यान से सुना. अभियुक्तों के वकीलों का तर्क है कि इस से पहले अभियुक्तों ने कोई भी अपराध नहीं किया है. उन के विरुद्ध अपराध भी पहली बार सिद्ध हुआ है, जो जघन्य से जघन्यतम नहीं है. इसलिए उन्हें दिए जाने वाले दंड में नरमी बरती जानी चाहिए. जबकि लोक अभियोजक अजय कुमार गुप्ता ने नरेश कुशवाह हत्याकांड को जघन्य अपराध बताते हुए अधिकतम दंड देने की गुजारिश की है.’’

न्यायाधीश महोदय ने अपना फैसला सुनाते हुए आगे कहा, ‘‘दोनों पक्षों के तर्कों पर मनन करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि आरोपी बनवारी लाल कुशवाह की छोटी बहन सीमा कुशवाह का प्रेम संबंध नरेश कुशवाह के साथ था और वह नरेश से प्रेम विवाह करना चाहती थी. लेकिन दोनों परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई बराबरी नहीं थी. सीमा का परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध और रौबरुतबे वाला था. जबकि नरेश एक साधारण किसान का बेटा था.

‘‘आरोपी बनवारी लाल को यह बात बरदाश्त नहीं थी कि उस की बहन ऐसे युवक से शादी करे जिस का परिवार उस के परिवार के साथ खड़ा होने लायक ही न हो, इसलिए उस ने नरेश कुशवाह की हत्या का षडयंत्र रचा और अपने निजी सुरक्षाकर्मी सत्येंद्र सिंह और उस के करीबी रोबिन सिंह को पैसा दे कर नरेश कुशवाह की हत्या करवा दी, जो औनर किलिंग की श्रेणी में आती है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी घटनाओं पर अत्यधिक कड़ा रुख अपनाते हुए दिशानिर्देश दिए हैं कि ऐसे अपराधियों को मृत्युदंड से दंडित किया जाना चाहिए.’’

न्यायाधीश श्री सलीम बदर ने इस संबंध में कुछ उदाहरण पेश करने के बाद कहा, ‘‘प्रस्तुत मामले में आरोपी बनवारीलाल कुशवाह ने अपने धनबल का प्रयोग कर के किराए के हत्यारों से नरेश कुशवाह की हत्या इसलिए कराई ताकि उस की बहन सीमा उर्फ सुषमा नरेश से प्रेम विवाह न कर सके. इस के लिए सत्येंद्र सिंह और रोबिन सिंह को पैसा दिया गया. इस केस की तमाम पत्रावलियों और साक्ष्यों पर गौर करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि इस केस की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि इसे जघन्य से जघन्यतम माना जाए.’’

न्यायाधीश महोदय ने एक नजर अदालत में मौजूद लोगों पर डाली और फिर अपना फैसला सुनाने लगे, ‘‘अदालत आरोपी सत्येंद्र सिंह जाट, निवासी जलालपुर करीरा, जिला बुलंदशहर को भादंसं की धारा 302 और धारा 120बी के तहत हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास व 10 हजार रुपए का दंड देती है.’’

कुछ देर रुक कर न्यायाधीश महोदय ने उचटती नजरों से बी.एल. कुशवाह की ओर देखा और फिर अपना फैसला सुनाने लगे, ‘‘आरोपी बनवारीलाल कुशवाह, निवासी जमालपुर, जिला धौलपुर पर भादंसं की धारा 120बी सपठित धारा 302 भादंवि के आरोप साबित हुए हैं. अत: बनवारीलाल कुशवाह को भी आजीवन कारावास और 10 हजार रुपए के अर्थदंड की सजा दी जाती है.’’

इस केस के अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध चूंकि अभी जांच चल रही थी, इसलिए न्यायाधीश महोदय ने पुलिस को आदेश दिया कि जल्दी से जल्दी जांच और गिरफ्तारी का काम किया जाए. अदालत का फैसला सुन कर विधायक बनवारीलाल कुशवाह व सत्येंद्र सिंह के चेहरे उतर गए. जबकि मृतक नरेश कुशवाह के पिता मेघसिंह और मां जमुना देवी ने इस फैसले पर खुशी जताई.

अदालत के निर्णय के बाद पुलिस बल ने दोनों आरोपियों को अपनी कस्टडी में ले लिया. अब उन्हें आगे की जिंदगी जेल में काटनी थी. दरअसल, 27 दिसंबर, 2012 को झीलकापुरा गांव के रहने वाले थानसिंह कुशवाह ने धौलपुर के सदर पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि 2 युवक लाल रंग की डिसकवर मोटरसाइकिल पर उन के घर आए और उस के भाई नरेश कुशवाह को बुला कर ट्यूबवेल पर ले गए.

कुछ देर बाद उस ने गोली चलने की आवाज सुनी तो वह छोटे भाई पुष्पेंद्र और अन्य ग्रामीणों के साथ खेत में स्थित ट्यूबवेल पहुंचा. वहां वे दोनों युवक नरेश को गोली मार रहे थे और कह रहे थे कि जान से मार डालो. जब हम लोग वहां पहुंचे तो दोनों हमलावर मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गए. हम नरेश को अस्पताल ले कर गए, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

उसी दिन पुलिस ने सदर थाने में मुकदमा संख्या 316/2012 धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया. हत्या की सूचना पर तत्कालीन पुलिस अधिकारियों में एएसपी किशन सहाय, सीओ सिटी दशरथ सिंह, थानाप्रभारी हवा सिंह आदि मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौका मुआयना कर के पूछताछ की लेकिन यह पता नहीं चला कि नरेश की हत्या करने वाले कौन थे और हत्या की वजह क्या थी.

पुलिस ने उसी दिन नरेश के शव का पोस्टमार्टम करा कर उस के घर वालों को सौंप दिया. पुलिस ने मामले की जांचपड़ताल शुरू की. पुलिस के सामने परेशानी यह थी कि हत्यारे अज्ञात थे. उन का कोई अतापता नहीं चल पा रहा था. पुलिस ने मृतक नरेश के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने इस बात की आशंका जताई कि नरेश की हत्या प्रभावशाली लोगों के इशारे पर की जा सकती है.

इन प्रभावशाली लोगों में बनवारीलाल कुशवाह का नाम सामने आया. बनवारीलाल कुशवाह का मध्य प्रदेश व अन्य कई जगहों पर चिटफंड का लंबाचौड़ा कारोबार होने की बात भी पता चली. यह भी पता चला कि बनवारीलाल कुशवाह मध्य प्रदेश के पूर्व गृह राज्यमंत्री और मौजूदा विधायक नारायण सिंह का रिश्तेदार है. नरेश की हत्या की वजह यह पता चली कि नरेश का बनवारीलाल कुशवाह की बहन सीमा उर्फ सुषमा से प्रेम प्रसंग चल रहा था.

सीमा नरेश से विवाह करना चाहती थी. बनवारीलाल इस के खिलाफ था. इस की वजह यह थी कि नरेश बेहद गरीब परिवार से था, जबकि सीमा आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से संपन्न परिवार की बेटी थी. बनवारीलाल ने एकदो बार दूसरों के माध्यम से नरेश को इस बात के लिए आगाह भी किया था, लेकिन सीमा नरेश से ही शादी करना चाहती थी. संभव है इसी बात को ले कर नरेश की हत्या की गई हो.

अपनी ही गलती से बना हत्यारा – भाग 2

एकलौता बेटा होने की वजह से राहुल घर में सब का चहेता था. उसे सब आंखों पर बिठाए रखते थे. हाजीपुर वेहटा गांव में ही खुशबू नाम की एक खूबसूरत लड़की रहती थी. नजदीकी बढ़ाने के लिए गांव के कई लड़के उस पर डोरे डालने की कोशिश करते थे लेकिन वह उन्हें कतई लिफ्ट नहीं देती थी. इस की वजह यह थी कि वह राहुल शर्मा को चाहती थी.

जवान होने के बावजूद राहुल शर्मा अन्य लड़कों की तरह मटरगश्ती करता नहीं घूमता था, बल्कि अपना पूरा ध्यान प्रौपर्टी डीलिंग के काम में लगाता था. खुशबू राहुल के नजदीक आने की जुगत लगाती रहती थी. बताया जाता है कि एक दिन खुशबू राहुल की दुकान पर पहुंची और अपने एक जानकार का मकान बिकवाने के लिए राहुल से बात की. बातचीत के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर भी दे दिए.

इस मुलाकात के बाद दोनों के बीच फोन पर बातें होने लगीं. धीरेधीरे राहुल को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. दोनों एकदूसरे के करीब आने लगे और उन की प्रेम कहानी शुरू हो गई. उन के बीच होने वाली बातों का दायरा सिमटता गया. जल्दी ही स्थिति यह हो गई कि जब तक वे रोजाना बातें नहीं कर लेते, उन्हें चैन नहीं आता था. बाद में राहुल उसे दिल्ली घुमाने के लिए भी ले जाने लगा. इसी दौरान उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे.

दोनों ही बालिग थे, इसलिए उन्होंने शादी कर के ताउम्र साथ रहने का फैसला कर लिया. इस तरह कई सालों तक उन के प्रेम संबंधों की घर वालों को भनक नहीं लगी. लेकिन गांव के तमाम लोग उन के बारे में जानते थे. लिहाजा गांव वालों के मुंह से होती हुई यह बात राहुल के घर वालों के कानों तक भी पहुंच गई.

अपने एकलौते बेटे के बारे में जान कर आदेश कुमार परेशान हो उठे. उन्होंने उस की किसी अच्छे घर से शादी करने के सपने संजो रखे थे. उन्हें बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि बेटा ऐसा कदम उठा सकता है. उन्होंने राहुल को समझाया तो उस ने पिता से झूठ बोल दिया, ‘‘मेरे बारे में जो भी बातें उड़ रही हैं, वे सरासर झूठी हैं. मेरा किसी लड़की से कोई संबंध नहीं है. और रही बात शादी की तो आप अपनी मरजी से किसी भी लड़की से मेरी शादी करा सकते हैं.’’

बेटे की बात सुन कर आदेश कुमार को लगा कि गांव वाले यूं ही राहुल के बारे में अफवाह उड़ा रहे हैं. उन्हें यह पता नहीं चल सका था कि बेटे ने उन के सामने कितनी चालाकी से झूठ बोला है. आदेश कुमार को बेटे पर पूरा विश्वास था, इसलिए वह उस के लिए लड़की देखने लगे.

उधर पिता से बातें करने के बाद राहुल समझ गया कि उस के प्रेमसंबंधों की भनक घर वालों को लग गई है, इसलिए उस ने खुशबू से मिलने में एहतियात बरतनी शुरू कर दी. चूंकि गांव में भी उस के संबंधों की चर्चा थी इसलिए उस ने खुशबू के साथ रहने की दूसरी युक्ति सोची.

खुशबू एक सामान्य परिवार से थी. राहुल से प्रेमसंबंध की बात उस ने अपनी मां को बता रखी थी. राहुल एक अच्छे परिवार का इकलौता लड़का था. इसलिए मां ने भी सोचा था कि उस के साथ बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.  उस की खुशहाल जिंदगी को ध्यान में रखते हुए मां ने भी खुशबू का विरोध नहीं किया. इस तरह खुशबू बेधड़क अपने प्रेमी से मिलती रही.

एक दिन राहुल ने आदेश कुमार से कहा, ‘‘पापा, एक जानकार के जरिए मेरी गुड़गांव स्थित सैमसंग कंपनी में नौकरी लग रही है. आप तो औफिस में बैठते ही हैं, इसलिए मैं नौकरी ज्वाइन कर लेता हूं.’’

‘‘तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत है? अपना अच्छाखासा काम है, इसे ही आगे बढ़ाओ.’’ आदेश कुमार ने कहा तो राहुल बोला, ‘‘कुछ दिनों में नौकरी कर के भी देख लेता हूं. बाहर जाने से तजुर्बा मिलेगा, रात की शिफ्ट में काम कर के मैं सुबह को घर आ जाया करूंगा.’’  राहुल के जिद करने पर आदेश कुमार ने स्वीकृति दे दी.

दरअसल राहुल घर वालों की नजरों में एक अच्छा बेटा बने रहने के लिए उन का विश्वास बनाए रखना चाहता था. इसलिए उस ने उत्तरपूर्वी दिल्ली के करावलनगर के अंबिका विहार में रामकुमार के यहां किराए पर एक कमरा ले लिया और खुशबू के साथ रहने लगा. मकान मालिक को उस ने खुशबू को अपनी पत्नी बताया था. इसी बीच दोनों ने एक मंदिर में शादी भी कर ली थी. राहुल रात में किराए के कमरे पर खुशबू के साथ रहता था और सुबह अपने घर चला जाता था.

राहुल ने घर वालों को बता रखा था कि उस की ड्यूटी रात की शिफ्ट में है. उस मकान में 11 महीने रहने के बाद वह पास में ही उमेश के घर रहने लगा. लेकिन उमेश का मकान उसे पसंद नहीं आया तो उस ने 15 दिनों बाद ही मकान बदल दिया और 15 अप्रैल, 2013 से वह अंबिका विहार की गली नंबर- 3 में राजकुमार गिरि के यहां रहने लगा.

खुशबू की अपने घर वालों से फोन पर अकसर बात होती रहती थी. खुशबू ने अपनी मां को बता दिया था कि राहुल ने अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ उस से शादी की है, इसलिए घर वाले अभी नाराज हैं. उस की मां सोचती थी कि एक न एक दिन जब घर वालों का गुस्सा शांत हो जाएगा तो वह खुशबू को बहू के रूप में स्वीकार कर लेंगे.

खुशबू राहुल के साथ खुश थी. राहुल भी उस का हर तरह से खयाल रख रहा था. उधर राहुल के घर वालों ने उस के लिए उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक लड़की देख ली थी. उन्होंने जब इस बारे में राहुल से बात की तो वह यह नहीं कह सका कि वह किसी और से प्यार करता है. वह बुलंदशहर वाली लड़की शिखा से शादी न करने की बात भी नहीं कह सका.

दोनों तरफ से जांचपरख के बाद राहुल का रिश्ता शिखा से तय हो गया. खुशबू को इस की भनक तक नहीं लगी. शिखा से शादी तय हो जाने के बाद राहुल असमंजस में पड़ गया, क्योंकि वह खुशबू से पहले ही शादी कर चुका था. उस की स्थिति यह थी कि वह न तो खुशबू को शिखा से शादी तय होने की बात बता सकता था और न ही घर वालों को खुशबू के बारे में बता पा रहा था. चालाकी दिखा कर वह जो खुशहाल जिंदगी जीने के सपने देख रहा था, अब वह उसी चालाकी के भंवर में फंस चुका था. कुछ नहीं सूझा तो वह उस भंवर से निकलने के उपाय खोजने लगा.

एक दिन उस ने खुशबू से कहा, ‘‘खुशबू मैं एक समस्या में फंसा हुआ हूं और समस्या भी ऐसी है, जिसे तुम ही सुलझा सकती हो.’’

यह सुन कर खुशबू ने चौंक कर पूछा, ‘‘क्या समस्या है, बताओ?’’

‘‘तुम तो जानती हो कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं. घर वालों की मरजी के बिना भी मैं तुम्हारे साथ रह रहा हूं. उन्हें तुम्हारे साथ रहने का तो पता नहीं है. इसलिए उन्होंने मेरे लिए बुलंदशहर में कोई लड़की देख कर मेरा रिश्ता पक्का कर दिया है. 16 नवंबर को उन्होंने सगाई का दिन भी तय कर दिया है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं?’’

3 लव मैरिज के बाद भी बनी रही बेवफा – भाग 3

कुहनी पर पट्ïटी देख कर वह विनोद से बोली, ‘‘मैं किस तरह आप का शुक्रिया अदा करूं, आप ने मेरे घायल बेटे की पट्टी करवाई और उसे छोडऩे घर भी आ गए.’’

“मैं ने अपना इंसानी फर्ज निभाया है,’’ विनोद मुसकरा कर बोला, ‘‘वैसे आप का बेटा है बहुत समझदार. छोटा है लेकिन यह बराबर मुझे अपने घर तक ले कर आया है.’’

“इसे स्कूल से घर तक आने का रास्ता बखूबी पता है. रोज पैदल मेरे साथ स्कूल तक आताजाता है इसलिए.’’ महिला मुसकरा कर बोली, ‘‘शायद आज इस की जल्दी छुट्टी हो गई, तभी यह स्कूल से बाहर निकल आया. वैसे 12 बजे मैं इसे लेने स्कूल जाती हूं.’’ महिला ने कहा.

“जी, लेकिन स्कूल वालों की गलती है, जब तक पेरेंट न पहुंचे, बच्चे को अकेले स्कूल से बाहर नहीं आने देना चाहिए.’’

“हां, यह तो आप ठीक कह रहे हैं. मैं कल स्कूल की आया से कहूंगी.’’

“बिलकुल कहना, ताकि वह आगे ऐसी गलती न करे,’’ विनोद ने कहने के बाद अपना स्कूटर स्टार्ट करना चाहा तो महिला

चौंक कर बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हैं, यहां तक आए हैं तो एक कप चाय पी कर जाइए.’’

“जी, रहने दीजिए.’’

“नहीं, मैं इस मामले में बहुत सख्त हूं, यदि आप चाय नहीं पी कर जाएंगे तो आप से चाय के 10 रुपए वसूल कर लूंगी.’’ महिला ने इतनी बेबाकी से यह बात कही कि विनोद हंस पड़ा, ‘‘अब तो चाय पीनी ही पड़ेगी, क्योंकि मैं 10 रुपए आप को देने के मूड में नहीं हूं.’’

महिला हंस पड़ी, ‘‘मैं तो मजाक कर रही थी. आइए, मैं चाय बनाती हूं.’’ महिला ने विनोद को आदर से अपने कमरे में बिठाया. चाय बना कर लाने तक विनोद शर्मा से वह ऐसे घुलमिल गई जैसे बरसों की मुलाकात हो. उस ने अपना नाम अफसाना बताया. उस ने विनोद से वादा लिया कि वह वहां आता रहेगा. अफसाना मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी की रहने वाली थी, लेकिन बाद में उस का परिवार का सिद्धार्थ विहार में शिफ्ट हो गया.

विनोद से शादी के बाद बन गई भव्या शर्मा..

विनोद शर्मा ने चाय पीने के बाद यह वादा किया कि वह वहां आदिल से मिलने जरूर आया करेगा. उस ने यह वादा किया तो था हफ्ते में एक बार आने का, लेकिन उसे आदिल से ज्यादा अफसाना से लगाव हो गया था. वह शुरू में हफ्ते में एक बार फिर हर दूसरे दिन अफसाना से मिलने आने लगा. इन मुलाकातों ने दोनों के दिलों में प्यार का बीज बो दिया. वे दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

दोनों को अब एकदूसरे से मिले बगैर चैन नहीं आता था. एक दिन विनोद शर्मा ने अफसाना के सामने शादी का प्रस्ताव रखा जो उस ने स्वीकार कर लिया. दोनों ने शादी कर ली और आदिल को साथ ले कर दोनों वृंदावन एनक्लेव में एक किराए का कमरा ले कर रहने लगे. विनोदने अफसाना का नाम भव्या शर्मा रख दिया.

पहले विनोद ही काम पर जाता था, उस की तनख्वाह से खर्चे पूरे नहीं होते थे. इसलिए अफसाना उर्फ भव्या शर्मा ने उसे घर बैठा दिया और खुद घर से बाहर कदम बढ़ा दिए. भव्या ने बताया कि वह आयुर्वेदिक दवा सप्लाई करने का काम करती है. इस सिलसिले में वह अकसर गाजियाबाद से बाहर रहती थी. जब लौटती तो ढेरों रुपया उस के पर्स में होते थे. विनोद की आंखें इतने रुपए देख कर चौंधिया जाती थीं. उसे संदेह होता था कि भव्या दवा बेचने की आड़ में कोई और धंधा करती है.

विनोद ने पुलिस को बताया कि वह घर में रहता था, उस का काम आदिल को स्कूल छोडऩा, लाना और उसे खाना बना कर खिलाने का था. भव्या ने एक प्रकार से उसे घर की औरत बना दिया था, इस बात को वह सहन नहीं कर पा रहा था, जिस से वह टेंशन में रहने लगा तो उस ने शराब पीनी शुरू कर दी. विनोद तब हैरान रह गया जब भव्या भी शराब पीने लगी थी. वह बिजनैस टूर कर के लौटती तो पी कर घर आती या घर में बैठ कर उस के सामने ही शराब पीती. उस ने कई बार भव्या को इस के लिए रोका, लेकिन वह नहीं मानी. इस बात पर दोनों में झगड़ा भी होने लगा था.

तीसरा पति बना हत्यारा…

इस बार वह इंदौर गई तो 24 दिसंबर, 2022 की रात को भव्या ने उसे वीडियो काल की. उस के साथ उस का दूसरा पति अनीस भी था. अनीस अंसारी ने विनोद की वीडियो काल पर भद्ïदीभद्ïदी गालियां दीं और विनोद को जान से मारने की धमकी दी. विनोद इसी बात से गुस्से में था कि भव्या ने उस से शादी कर लेने के बाद भी अपने दूसरे पति का साथ नहीं छोड़ा था. उस का वह पति इंदौर में उस के साथ था. इस से विनोद का खून खौल रहा था.

भव्या 25 तारीख को इंदौर से लौट कर आई तो शराब के नशे में थी. उस का विनोद से झगड़ा हुआ. वह गुस्से में उसे उलटासीधा बकने लगी. झगड़ा अनीस अंसारी को ले कर था, भव्या अभी भी उस के साथ मौजमस्ती कर रही थी. विनोद ने आदिल को खिलौना लाने को 100 रुपए दिए, क्योंकि वह भव्या को सबक सिखाना चाहता था.

आदिल खिलौना लाने के लिए बाजार चला गया तो विनोद ने भव्या पर किचन के चाकू से हमला कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. फिर उस ने तौलिए से चाकू साफ किया और उसे अलमारी के पीछे डाल दिया. उस ने भव्या के कपड़े भी चेंज किए. खून वाले कपड़े उस ने वाशिंग मशीन में डाल दिए. उस का फोन भी मशीन में डाल दिया.

आदिल बाजार से आया तो विनोद ने उस से कहा कि उस की मां थकी हुई है, सो रही है, उसे डिस्टर्ब न करे. आदिल अपनी चारपाई पर चला गया तो पकड़े जाने के डर से विनोद वहां से भाग गया.

पुलिस ने विनोद की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू व खून सने कपड़े भी बरामद करा दिए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

3 लव मैरिज के बाद भी बनी रही बेवफा – भाग 2

घटनास्थल पर इलाके के लोगों की अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई थी. भीड़ पुलिस वैन को देख कर इधरउधर हट गई. इंसपेक्टर अनीता चौहान अपनी टीम के साथ उस कमरे में आ गईं, जिस में भव्या की लाश पड़ी हुई थी.

भव्या शर्मा के पेट पर चाकू का गहरा घाव था, जिस से खून बह कर फर्श पर फैल चुका था. उस की लाश पीठ के बल पड़ी हुई थी. इंसपेक्टर अनीता चौहान ने लाश का मुआयना किया. मृतका भव्या चेहरेमोहरे से बेहद खूबसूरत थी, उस की उम्र लगभग 35 वर्ष की लग रही थी. उस के शरीर पर जो सलवारकुरती थी, वह अस्तव्यस्त थी. सलवार का नाड़ा ठीक से नहीं बंधा था.

लाश के पास ही खून सना एक तौलिया पड़ा था. इंसपेक्टर अनीता ने इस हत्या की सूचना अधिकारियों को देने के बाद फोरैंसिक टीम और फोटोग्राफर को घटनास्थल पर आने के लिए फोन कर दिया.

पुलिस जुटी जांच में…

थोड़ी देर में पुलिस के अधिकारी और फोरैंसिक टीम फोटोग्राफर के साथ वहां आ गई. आला अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण करने के बाद इंसपेक्टर अनीता चौहान को इस केस का हल करने की जिम्मेदारी सौंप दी. अनीता चौहान के सामने कत्ल करने वाले आरोपी विनोद शर्मा का नाम आ गया था. टीपू ने उसी पर अपना संदेह जताया था.

विनोद शर्मा यहां होगा, यह सोचना भी मूर्खता होती. अकसर कत्ल करने के बाद हत्यारा मौके फरार हो जाता है. विनोद शर्मा भी भाग गया होगा. उस की तलाश करने के लिए उस का हुलिया फोटो और उस के घर वालों तथा यारदोस्तों की जानकारी हासिल करना जरूरी था.

भव्या शर्मा मर्डर का खुलासा हो चुका था, अब उस के आरोपी को गिरफ्तार करना बाकी था. इंसपेक्टर अनीता चौहान ने मृतका के भाई टीपू को बुला कर विनोद शर्मा का हुलिया और एक फोटो हासिल किया. आदिल वहीं खड़ा सुबक रहा था. वह उस के पास आ गईं. आदिल 8 साल का हो गया था, वह नासमझ नहीं था. उस से इस हत्या की बाबत बहुत कुछ जानकारी मिल सकती थी.

उन्होंने उस के सिर पर प्यार से हाथ रख कर पूछा, ‘‘तुम्हारे पापा और मम्मी का क्या अकसर झगड़ा होता रहता था?’’

“हां, पापा मेरी अम्मी को मारतेपीटते भी थे. कुछ दिनों से वह रोज अम्मी से लड़ाई कर रहे थे.’’ आदिल ने सुबकते हुए बताया, ‘‘कल भी अम्मी जब इंदौर से लौट कर घर आई थी, पापा उस से लडऩे लगे थे.’’

“किस बात पर लड़े थे तुम्हारे पापा?’’ इंसपेक्टर अनीता ने पूछा.

“पापा कह रहे थे कि अम्मी मेरे असली पापा के साथ इंदौर में क्यों थी?’’

“तुम्हारे पापा यानी अनीस अंसारी? वह तुम्हारी अम्मी के साथ इंदौर गए थे?’’

“मालूम नहीं, अम्मी तो यहां से अकेली ही इंदौर गई थी. हो सकता है मेरे पापा अनीश वहां मिल गए हों?’’

“क्या तुम्हारी अम्मी बाहर जाती रहती थी?’’

“हां, वह दवा खरीद कर उसे बेचने बाहर जाती रहती थी.’’

“तुम्हारे पापा का कल तुम्हारी अम्मी से झगड़ा हुआ था, तब क्या तुम वहां मौजूद थे?’’

“था, लेकिन विनोद पापा ने मुझे सौ रुपए दे कर खिलौना लाने के लिए बाजार भेज दिया. मुझे चाबी वाली कार चाहिए थी, जिस की मैं कई दिनों से जिद कर रहा था. पापा ने रुपए दिए तो मैं बाजार चला गया. जब मैं वापस आया तो अम्मी फर्श पर मरी पड़ी थी, उन के पेट से खून बह रहा था. पापा वहां नहीं थे. मेरे पापा विनोद ने ही मेरी अम्मी को मारा है.’’

आरोपी विनोद की हुई तलाश…

टीपू पास आ गया था. इंसपेक्टर अनीता ने विनोद के घर वालों और उस के खास दोस्तों के विषय में उस से जानकारी ली. टीपू ने विनोद शर्मा का एक एड्रैस और बताया. वह विजय शर्मा का बेटा था जो ईपी-25/16, नई बस्ती, थाना अर्जुन नगर, जिला गुरुग्राम, हरियाणा में रहते थे. आवश्यक काररवाई निपटा लेने के बाद इंसपेक्टर अनीता चौहान ने भव्या शर्मा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

टीपू के द्वारा वादी के रूप में विजयनगर थाने में उसी दिन भादंवि की धारा 302 के तहत भव्या की हत्या का मामला पंजीकृत कर लिया गया. विनोद शर्मा वांछित अपराधी था. उस के फोटो की कौपियां पुलिस टीम को दे कर उन्हें विनोद की खोज में लगा दिया गया. अनीता चौहान ने अपने खास मुखबिर भी विनोद शर्मा की तलाश में दौड़ा दिए.

गाजियाबाद के बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, ढाबों, होटलों में विनोद शर्मा की तलाश की जाने लगी. पुलिस की एक टीम को उस के पैतृक घर गुडग़ांव भेजा गया. पुलिस की मुस्तैदी और मुखबिरों की भागदौड़ का परिणाम अच्छा ही निकला. 2 दिन बाद एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस टीम ने विनोद शर्मा को डीपीएस कट के पास दिन में करीब साढ़े 11 बजे गिरफ्तार कर लिया.

भव्या शर्मा की हत्या 25 दिसंबर, 2022 को रात में की गई थी और 28 दिसंबर, 2022 को दोपहर में विनोद को गिरफ्तार कर लिया गया. यह पुलिस की बहुत बड़ी सफलता थी. विनोद शर्मा को थाना विजयनगर में लाया गया. वह समझ चुका था कि पुलिस ने उस पर हाथ क्यों डाला है. वह अब कुछ भी छिपाना नहीं चाहता था.

अनीता चौहान ने जब उस से सामने बिठा कर पूछताछ शुरू की तो उस ने अपनी पत्नी भव्या शर्मा हत्याकांड के पीछे जो कहानी बताई, वह एक खुद्दार पति के विश्वास और पत्नी के प्रति समर्पण को पूरी तरह ठेस पहुंचाने वाली थी.

इस तरह हुआ अफसाना के घर आनाजाना…

नई बस्ती थाना अर्जुन नगर, गुडग़ांव (हरियाणा) का रहने वाला था विनोद शर्मा. वह दिल्ली से सटे गाजियाबाद में किराए का कमरा ले कर एक फैक्ट्री में काम करता था. शुरू से विनोद को अच्छा पहनने व खाने का शौक था. यहां भी वह जो कमाता था, अपने पहनने खाने पर खर्च कर देता था. कुछ पैसे जोड़ कर उस ने एक स्कूटर खरीद लिया था, उसी से वह अपनी फैक्ट्री आताजाता था.

एक दिन वह अपने काम पर जा रहा था तो उस ने सडक़ किनारे एक बच्चे को रोते हुए देख कर अपना स्कूटर रोक लिया. बच्चे की कुहनी छिली हुई थी, उस में से खून बह रहा था. विनोद ने उस के सिर पर प्यार से हाथ फिराते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटे,

तुम रो क्यों रहे हो?’’

“एक रिक्शे वाला टक्कर मार कर गिरा गया मुझे…’’ बच्चे ने रोते हुए बताया.

“ओह!’’ विनोद ने उसे प्यार से पुचकारा, ‘‘तुम कहां रहते हो?’’

“विजय नगर में. अम्मी मुझे लेने आएंगी.’’

“तुम अपना घर जानते हो?’’

“हां,’’ बच्चे ने सिर हिलाया.

“चलो, पहले मैं तुम्हारी डाक्टर से पट्ïटी करवाता हूं. फिर तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूंगा.’’

विनोद ने बच्चे को स्कूटर पर बिठाया और एक डाक्टर के पास ले जा कर उस की कुहनी पर पट्टी करवा दी. इस के बाद बच्चे को ले कर उस के द्वारा बताए एक मकान के सामने पहुंच गया.

“यही है मेरा घर,’’ बच्चा स्कूटर से उतर कर बोला. विनोद ने अपने स्कूटर को जब तक स्टैंड पर खड़ा किया, बच्चा दौड़ कर अपने कमरे में चला गया. जब वह बाहर आया तो उस के साथ एक 30-31 साल की सुंदर महिला थी.

“मुझे यह अंकल ले कर आए हैं अम्मी.’’ बच्चे ने अपनी मासूम आवाज में कहा. महिला ने हैरान नजरों से विनोद को देखा,

‘‘आदिल आप को कहां मिल गया, इसे तो स्कूल में छोड़ा था मैं ने?’’

“जी, यह स्कूल के सामने सडक़ पर खड़ा रो रहा था. कोई रिक्शेवाला इसे टक्कर मार गया होगा, कुहनी से खून बह रहा था. मैं ने डाक्टर से पट्टी करवा दी है.’’

“अरे, यह तो मैं ने देखा ही नहीं.’’ महिला घबराए स्वर में बोली और नीचे झुक कर अपने बेटे आदिल की कुहनी देखने लगी.

3 लव मैरिज के बाद भी बनी रही बेवफा – भाग 1

“मैं जबलपुर जा रही हूं विनोद, आदिल का ध्यान रखना.’’ भव्या ने अपना सफारी बैग तैयार करते हुए कहा.

“अरे!’’ विनोद शर्मा के चेहरे पर आश्चर्य उमड़ आया, ‘‘अभी 2 दिन पहले ही तो तुम जबलपुर से लौटी हो. फिर जबलपुर..?’’

भव्या ने आंखें नचाईं, ‘‘क्यों, क्या दोबारा जबलपुर जाने की सरकार द्वारा पाबन्दी लगी हुई है?’’

“मेरा यह आशय नहीं है भव्या, जबलपुर एक बार क्या सौ बार जाओ, भला वहां जाने की कैसी पाबंदी. मैं तो कह रहा हूं तुम परसों ही जबलपुर हो कर आई हो, अब फिर जा रही हो.’’

“मेरा काम ही ऐसा है विनोद. मुझे दवा सप्लाई करनी होती है, दवा की दुकानों से और्डर लेने होते हैं. मेरा आनाजाना तो लगा ही रहेगा.’’

“तुम्हें कितनी बार कहा है, मुझे काम करने दो, तुम घर का चूल्हा संभालो, लेकिन तुम्हेें मेरा काम पर जाना पसंद ही नहीं है.’’

“मैं जो कर रही हूं, वह तुम नहीं कर पाओगे, फिर तुम्हें घर रहने में क्या परेशानी है, तुम्हें मैं पूरी सुखसुविधा तो दे रही हूं…’’

“यही तो परेशानी है भव्या, तुम्हारे टुकड़ों पर पल रहा हूं. लोग मुझे ताना मारने लगे हैं, निकम्मा और कामचोर समझने लगे हैं.’’ विनोद गंभीर हो गया.

“लोग मेरे मुंह पर तो कुछ नहीं बोलते, तुम्हें कौन बोलता है, बताओ, मैं उस की जुबान खींच कर हाथ में दे दूंगी.’’ भव्या गुस्से से बोली, ‘‘मैं कमा रही हूं. घर मेरा है, उस का खर्च कैसे चलता है, उन्हें क्या लेनादेना… मैं…’’

“बस.’’ विनोद ने उस की बात काट कर जल्दी से कहा, ‘‘अब गुस्सा बढ़ा कर अपना दिमाग खराब मत करो. बैग तैयार हो गया है तो जाओ, मैं आदिल की देखभाल कर लूंगा. हां, जा रही हो तो मुझे हजार रुपए देती जाओ.’’

“इतने रुपयों का क्या करोगे?’’

“आदिल को चीज दिलानी होती है और रात को मुझे अकेले नींद नहीं आती है, शराब के एकदो पैग पी लेता हूं तो सुकून मिल जाता है.’’

“बस एक साल का सब्र कर लो. मैं एक साल में अच्छा सा मकान ले लूंगी, थोड़ा जरूरत का सामान भी बना लूंगी, तब तुम्हारे साथ ही सोया करूंगी.’’ भव्या ने मुसकरा कर कहा और पर्स में से 5-5 सौ के 2 नोट निकाल कर विनोद की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘रख लो, तुम भी क्या याद रखोगे एक कमाऊ बीवी से नाता जुड़ा है.’’

विनोद शर्मा इस बात पर खुल कर हंसने वाला था, लेकिन उस की नजर भव्या के पर्स से झांक रहे 5-5 सौ रुपयों की गड्डी पर चली गई. इतने रुपए देख कर उस के दिमाग में धमाके होने शुरू हो गए ‘उस की पत्नी भव्या अनैतिक काम करती है… वह अपना जिस्म बेचती है… घर में हरे नोटों की रेलमपेल ऐसे ही नहीं हो रही. आयुर्वेदिक दवा का छोटा सा कारोबार इतनी मोटी कमाई नहीं दे सकता. भव्या बदचलन है, भव्या से शादी कर के वह धोखा खा गया है.’

भव्या कब अपना बैग उठा कर निकल गई, विनोद को पता ही नहीं चला. वह भव्या को ले कर बुरे खयालों के भंवरजाल में उलझता जा रहा था.

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के थाना विजय नगर में रोजाना की भांति कामकाज हो रहा था. इस थाने की इंसपेक्टर अनीता चौहान थी, जो अपने कक्ष में बैठी एक लूट व चोरी के मामले की फाइल देख रही थी कि कांस्टेबल अक्षय त्रिपाठी ने दरवाजे पर दस्तक दी. प्रभारी निरीक्षक ने सिर उठा कर दरवाजे की ओर देखा. कांस्टेबल अक्षय को दरवाजे पर देख कर उन्होंने उसे अंदर आने की अनुमति दे दी. कांस्टेबल अक्षय त्रिपाठी ने उन की मेज के पास आ कर सैल्यूट करने के बाद बगैर किसी भूमिका के कहा,

‘‘आवास विकास कालोनी वृंदावन एनक्लेव में एक महिला का कत्ल हो गया है मैडम.’’

“ओह!’’ हाथ में पकड़ी कलम इंसपेक्टर अनीता चौहान के हाथ से छूट कर फाइल पर गिर गई, वह चौंकते हुए बोली,

‘‘सुबहसुबह यह खबर तुम्हें कहां से मिल गई अक्षय?’’

“मैडम, वादी टीपू यहां आया है, उसी ने यह खबर दी है.’’

“कहां है टीपू, उसे अंदर बुलाओ.’’ कुरसी की पुश्त से लगती हुई अनीता चौहान ने कहा. कांस्टेबल अक्षय त्रिपाठी बाहर चला गया. कुछ ही देर में वह एक व्यक्ति के साथ अंदर आया. अनीता चौहान ने उस व्यक्ति को सिर से पांव तक देखा. वह बहुत घबराया हुआ था.

“क्या नाम है तुम्हारा?’’ अनीता चौहान ने उस के चेहरे पर नजरें जमा कर पूछा.

“जी, मेरा नाम टीपू है. मैं वृंदावन एनक्लेव की 9/2763 आवास विकास कालोनी में रहता हूं. मेरे बहन और जीजा भी इसी कालोनी के मकान नंबर 9/2556 में रहते हैं. मेरी बहन भव्या शर्मा का रात को मेरे जीजा विनोद शर्मा ने मर्डर कर दिया है.’’

“मर्डर तुम्हारे जीजा विनोद शर्मा ने किया है, यह तुम किस आधार पर कह रहे हो?’’ इंसपेक्टर चौहान ने हैरानी से पूछा.

“मेरी बहन के बेटे आदिल ने मुझे बताया है कि कल शाम से उस की मां भव्या और पिता विनोद शर्मा में जम कर झगड़ा हुआ था. वह कत्ल होते नहीं देख पाया, क्योंकि झगड़ा बढऩे पर उस को विनोद ने खिलौना लाने के लिए बाहर भेज दिया था.’’

“बैठ जाओ.’’ इंसपेक्टर अनीता चौहान ने हाथ का इशारा कर के कहा तो टीपू सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया.

“क्या तुम्हारी बहन ने अपने समाज से बाहर शादी की थी? यह विनोद शर्मा…’’

“विनोद शर्मा हिंदू ही है मैडम. मेरी बहन बेबी उर्फ अफसाना ने उस से तीसरी शादी की थी. तब उस का नाम भव्या शर्मा रख दिया गया था.’’

“क्या कह रहे हो?’’ चौंक कर प्रभारी निरीक्षक ने टीपू की ओर देखा, ‘‘तुम्हारी बहन ने 3-3 शादियां की थीं?’’

4 नाम, 3 शादियां, 2 बार बदला धर्म…

“जी हां,’’ टीपू ने बताया, ‘‘मेरी बहन बेबी उर्फ भव्या ने अपनी मरजी से पहली शादी 2004 में दिल्ली के रहने वाले योगेंद्र कुमार से की थी. योगेंद्र से शादी कर उस ने अपना नाम अंजलि रख लिया था. उस से उसे एक बेटा निहाल हुआ था, जो अब 16 साल का हो चुका है. योगेंद्र से नहीं बनी तो उस ने 2017 में अनीस अंसारी से निकाह कर लिया. अनीस से शादी कर वह अफसाना बन गई. आदिल अनीस अंसारी का ही बेटा है. मेरी बहन की अनीस से भी पटरी नहीं बैठी तो उस ने 2019 में विनोद शर्मा से शादी कर ली. आदिल इसी के साथ रहता आया है. उस ने तीनों ही लवमैरिज की थीं.’’

“हूं, अब बात मेरी समझ में आई है. नामों के घालमेल ने मुझे तो उलझा ही दिया था.’’ इंसपेक्टर अनीता चौहान हलके से मुसकरा दीं. मन ही मन वह भव्या की स्वच्छंद जिंदगी का अनुमान कर इतना तो समझ ही चुकी थी कि भव्या शर्मा उर्फ अफसाना उर्फ बेबी रंगीन तबीयत की महिला रही है, जिस की एक भी पति से पटरी नहीं बैठ पाई है.

फिलहाल मामला हत्या का था, इसलिए कुछ ज्यादा न पूछ कर रोजनामचे में अपनी रवानगी दर्ज करके एसआई योगराज सिंह, हैडकांस्टेबल अमित राय और कांस्टेबल अक्षय त्रिपाठी को साथ ले कर टीपू के साथ घटनास्थल वृंदावन एनक्लेव की आवास विकास कालोनी के लिए रवाना हो गई.

अपनी ही गलती से बना हत्यारा – भाग 1

22 नवंबर, 2013 की शाम को राजकुमार अपने घर की पहली मंजिल पर साफसफाई करने गया तो उसे वहां कुछ बदबू महसूस हुई. वह इधरउधर देखने लगा. जिस तरफ से बदबू आ रही थी, वह उसी तरफ बढ़ गया. बालकनी से होते हुए राजकुमार एक कमरे के पास पहुंचा तो वहां बदबू और बढ़ गई. वह समझ गया कि बदबू शायद उसी कमरे से आ रही है. उस कमरे में बाहर से ताला बंद था, क्योंकि उस में रहने वाला किराएदार राहुल 3 दिनों पहले अपनी पत्नी खुशबू को ले कर कहीं चला गया था.

कमरे से आने वाली बदबू किसी चूहे वगैरह के मरने की नहीं लग रही थी. किसी गड़बड़ी की आशंका से राजकुमार डर गया. वह सीधासादा आदमी था, इसलिए उस ने तुरंत 100 नंबर पर फोन कर दिया. पुलिस को जो काल मिली थी. उस में पता— मकान नंबर बी-13/1 बी, गली नंबर-3, अंबिका विहार, करावलनगर बताया गया था.  पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना करावलनगर को दे दी, साथ ही पीसीआर वैन भी बताए गए पते पर पहुंच गई. यह शाम करीब साढ़े 6 बजे की बात है. राजकुमार पुलिस वालों को पहली मंजिल पर स्थित उस कमरे पर ले गया, जिस में से बदबू आ रही थी.

चूंकि कमरे में बाहर से ताला बंद था, इसलिए पुलिस भी नहीं समझ पाई कि बदबू किस चीज की है. पीसीआर की काल मिलने पर थाना करावलनगर से एएसआई कविराज शर्मा और कांस्टेबल कृष्ण पाल को बताए गए पते पर भेजा गया. थाना पुलिस के पहुंचने तक राजकुमार के घर के पास काफी लोग जमा हो चुके थे. सभी तरहतरह के कयास लगा रहे थे. कविराज शर्मा ने भी उस कमरे के पास जा कर देखा, जिस में से दुर्गंध आ रही थी. कमरे पर लगे ताले को उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के आने से पहले छेड़ना उचित नहीं समझा.

उस कमरे में दरवाजे के ऊपर एक रोशनदान था. उस रोशनदान से कमरे में झांका जा सकता था. कविराज ने एक सीढ़ी मंगाई और उस पर चढ़ कर कमरे में झांक कर देखा. कमरे में घुप्प अंधेरा होने की वजह से कुछ दिखाई नहीं दिया. उन्होंने रोशनदान से टौर्च की रोशनी डाल कर अंदर देखा तो फर्श पर पड़े खून के साथसाथ एक बड़ा सा बैग भी दिखाई दिया. कविराज शर्मा माजरा समझ गए. उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुला लिया.

क्राइम टीम द्वारा बंद दरवाजे के फोटो वगैरह लेने के बाद कविराज शर्मा ने कमरे का ताला तोड़ा. जब दरवाजा खोला गया तो बदबू के भभके ने सभी को नाक बंद करने के लिए मजबूर कर दिया. अंदर कमरे में फर्श पर एक बड़ा सा लालकाले रंग का बैग रखा था. फर्श पर खून फैला था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. बेड पर बिछी चादर और वहां रखी रजाई पर भी खून के धब्बे दिखाई दे रहे थे. बेड पर चूडि़यों के टुकड़े पड़े थे. यह सब देख कर यही लगा कि इस बैग में किसी की लाश ही होगी.

बैग की चेन खुली थी. अंदर प्लास्टिक का एक बोरा रखा था. बोरा बैग से बाहर निकाला गया तो उस में से खून रिस रहा था. बोरा को खोला गया तो उस में से एक युवती की लाश निकली, जिस की गरदन कटी हुई थी. लाश सड़ चुकी थी. लाश देख कर राजकुमार ने बताया कि यह राहुल की बीवी खुशबू है. चूंकि राहुल वहां से गायब था, इसलिए यह बात साफ हो गई कि पत्नी की हत्या राहुल ने ही की है.

एएसआई कविराज ने इस मामले की सूचना थानाप्रभारी लेखराज सिंह को दी तो वह इंसपेक्टर अरविंद प्रताप सिंह और सबइंसपेक्टर जफर खान को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल का मुआयना कर के मकान मालिक राजकुमार गिरि से पूछताछ की. राजकुमार ने बताया कि राहुल शर्मा अपनी पत्नी खुशबू के साथ 15 अप्रैल, 2013 से वहां रह रहा था. 19 नवंबर को जब वह नीचे गैलरी में खड़ा था, तभी उस ने राहुल को जीने से उतरते देखा था.

पूछने पर राहुल ने बताया था कि खुशबू की बहन की डिलीवरी होनी है, इसलिए वह अपनी बहन के यहां जा रही है. वह आगे चली गई है. 19 तारीख के बाद राहुल वापस नहीं लौटा था. आज जब वह ऊपर की साफसफाई करने गया तो बदबू महसूस हुई. तब उस ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी. घनास्थल की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए गुरु तेग बहादुर अस्पताल भेज दी और हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इस केस को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी लेखराज सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में इंस्पेक्टर अरविंद प्रताप सिंह, सबइंसपेक्टर जफर खान, सहायक सबइंसपेक्टर कविराज शर्मा, कांस्टेबल कृष्णपाल और दयानंद आदि को शामिल किया गया.

पुलिस को राजकुमार से पता चला कि राहुल को अंबिका विहार के रहने वाले उस के एक परिचित उमेश ने किराए पर रखवाया था. इस से पहले राहुल के यहां किराए पर रहता था. पुलिस ने उमेश से संपर्क किया तो उस के पास से राहुल का फोन नंबर और पता मिल गया. वह लोनी क्षेत्र के गांव हाजीपुर वेहटा का रहने वाला था.

पुलिस ने राहुल का फोन मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. हत्या करने के बाद कोई व्यक्ति घर पर मिले, ऐसा कम ही संभव होता है. फिर भी राहुल के बारे में पता लगाने के लिए पुलिस उस के गांव हाजीपुर वेहटा गई. पुलिस ने गोपनीय रूप से राहुल के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह घर पर नहीं है. इसी पूछताछ में पुलिस को एक चौंकाने वाली बात पता चली. चौंकाने वाली बात यह थी कि राहुल शर्मा ने 20 नवंबर को बुलंदशहर की एक लड़की से शादी की थी और यह शादी घर वालों की मरजी से सामाजिक रीतिरिवाज से हुई थी. सवाल यह था कि राजकुमार दिल्ली में खुशबू नाम की जिस लड़की के साथ रहता था, वह कौन थी?

बहरहाल पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. पुलिस राहुल के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा कर बराबर वाच कर ही रही थी. 23 नवंबर की शाम को पता चला कि राहुल के फोन की लोकेशन करावलनगर चौक के आसपास है. राजकुमार गिरि राहुल को पहचानता था, इसलिए पुलिस टीम उसे अपने साथ ले कर करावलनगर चौक पहुंच गई.

पुलिस टीम सादा कपड़ों में थी. वह काफी देर तक राजकुमार को इधरउधर टहलाती रही. इसी बीच राजकुमार की नजर चाय की एक दुकान पर गई. राहुल शर्मा वहां एक बैंच पर बैठा चाय पी रहा था. राजकुमार के इशारे पर पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया. थाने ला कर जब उस से खुशबू की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बड़ी ही आसानी से हत्या की बात कुबूल ली. उस से पूछताछ के बाद एक दिलचस्प कहानी पता चली.

राहुल शर्मा के पिता आदेश कुमार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 ही बच्चे थे. बेटा राहुल और एक बेटी. हालांकि उन का छोटा सा परिवार था, लेकिन वह परिवार को हर तरह से खुश देखना चाहते थे. इसी चाह में वह गढ़मुक्तेश्वर से लोनी चले आए. लोनी में वह इसलिए आए, क्योंकि यह दिल्ली की सीमा से सटा हुआ था. उन्होंने सोचा था कि वहां रह कर अपने लिए दिल्ली में कोई कामधंधा खोज लेंगे.

थोड़ी कोशिश के बाद उन की दिल्ली होमगार्ड में नौकरी लग गई. शुरू में तो उन्हें होमगार्ड का काम करते हुए अच्छा लगा, लेकिन 5-6 सालों बाद ही इस काम से ऊबने लगे. वजह यह थी कि इस से उन्हें अच्छी आमदनी नहीं हो पाती थी. अब तक उन्होंने लोनी के पास के गांव वेहटा हाजीपुर वेहटा में मकान भी बना लिया था.  उन्होंने वेहटा रेलवे स्टेशन के नजदीक प्रौपर्टी डीलिंग की दुकान खोल ली. ड्यूटी से लौटने के बाद वह दुकान पर बैठते थे. उन का बेटा राहुल बड़ा हो चुका था, इसलिए पिता की गैरमौजूदगी में वह दुकान संभालता था.

आदेश कुमार का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा जम गया तो उन्होंने होमगार्ड की नौकरी छोड़ दी और पूरे समय दुकान पर बैठने लगे. उन की मेहनत रंग लाने लगी. आमदनी बढ़ने लगी तो उन्होंने अपने प्रौपर्टी के बिजनैस को नए आयाम देने शुरू कर दिए. लोनी के नजदीक ही उन्होंने कई एकड़ जमीन खरीद ली. उस जमीन पर उन्होंने अपने बेटे के नाम पर ‘राहुल विहार’ नाम की कालोनी बसानी शुरू कर दी.

मृतक पहुंचा सलाखों के पीछे – भाग 3

यह आइडिया आते ही सुदेश ने दिमाग लगाना शुरू कर दिया कि वह खुद को इसी तरह जेल जाने से बचा सकता है. सुदेश ने जब अपनी पत्नी को दिल की बात बताई तो थोड़ी नानुकुर के बाद अनुपमा को भी यह बात पसंद आ गई. वैसे भी कौन पत्नी नहीं चाहेगी कि उस का पति जेल जाने से बच जाए.

काफी विचारविमर्श के बाद सुदेश व अनुपमा ने इस काम के लिए एक मजदूर का इंतजाम करने के लिए अपनी छत को ठीक कराने का बहाना बनाया. इस के लिए सुदेश 18 नवंबर, 2021 को लेबर चौक गया और अपनी कदकाठी के एक मजदूर, जिस का नाम दोमन रविदास था और वह बिहार के गया जिले के अतरी का रहने वाला था, को ले आया.

18 नवंबर को सुदेश ने पहले दिन अपनी छत की स्लैब डलवाई. मजदूर रविदास के कपडे़ काफी पुराने व फटी हालत में थे लिहाजा सुदेश ने उसे अपना ट्रैकसूट पहनने के लिए दे दिया जिस की जर्सी कौफी कलर की थी और लोअर नीले रंग का था.

अगले दिन भी काम होना था, इसलिए सुदेश ने रविदास को अगले दिन फिर आने के लिए कहा.

19 नवंबर को दोमन रविदास उसी के कपड़े पहन कर फिर काम पर आया. शाम होतेहोते जब काम खत्म हो गया तो शाम को दारू पार्टी के बहाने रोक लिया. दोनों ने शराब पीनी शुरू कर दी. इस दौरान सुदेश खुद कम शराब पीता रहा जबकि उस ने रविदास को बड़ेबड़े पैग पिलाने शुरू कर दिए.

रात करीब 9 बजे रविदास को खूब नशा हो गया. इस दौरान सुदेश और उस अनुपमा ने पहले ही तय कर लिया था कि उन्हें क्या करना है. इस दौरान उन्होंने चारपाई के पाये से रविदास के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर हत्या कर दी.

यह बात बेटे सुनील को पता नहीं चले इसलिए उस ने सुनील को अपनी परचून की दुकान पर बैठने के लिए भेज दिया था.

सुदेश ने पहले ही तय कर लिया था कि वे रविदास की हत्या कर उसे सुदेश के रूप में अपनी पहचान देगा. इसीलिए एक दिन पहले उस ने अपना ट्रैकसूट रविदास को पहनने के लिए दिया था. खुद को वह दुनिया की निगाहों में मुर्दा करार दे सके, इस के लिए भी उस ने पूरी प्लानिंग कर ली थी.

सुदेश व अनुपमा को जब इत्मीनान हो गया कि रविदास की मौत हो चुकी है तो कमरे को पानी से साफ कर उस के शव को पहले एक पन्नी में लपेटा. उस के बाद उसे बोरी में भर दिया.

रात को करीब 11 बजे जब इलाके में सन्नाटा पसर गया और उस का बेटा भी सो गया तो सुदेश बोरे में भरे रविदास के शव को साइकिल पर रख कर लोनी बौर्डर थाना क्षेत्र की इंद्रापुरी कालोनी में खाली प्लौट में ले गया.

वहां शव को बोरी से निकाल कर उस के चेहरे और शरीर के ऊपरी हिस्से पर अखबार के कागज व टाट की बोरी रख कर जला दिया ताकि शव की पहचान न हो सके.

शव की पहचान सुदेश के रूप में कराने के लिए उस ने अपना आधार कार्ड रविदास की जेब में रख दिया था. पहले से तय योजना के मुताबिक सुदेश अपने घर गया और पत्नी को आ कर बताया कि जब पुलिस उस से रविदास के शव की शिनाख्त कराए तो वह उस की पहचान कर ले.

सुदेश की पूरी प्लानिंग थी कि वह रविदास को सुदेश साबित कर दे, इसलिए पत्नी के साथ बनी योजना के तहत वह इस के बाद चोरीछिपे देर रात में ही घर आता और इस के अलावा इधरउधर छिप कर अपना वक्त बिताता था.

10 दिसंबर को सुदेश ने अपनी पत्नी को फोन कर के कहा कि वह रात को घर आएगा घर की लाइट जला कर रखना. यदि सब कुछ ठीक हो तो गेट पर सफेद कपड़ा डाल देना. यह बात पुलिस ने सर्विलांस के दौरान सुन ली और पुलिस पहले से आरोपी की तलाश में उस के घर पहुंच गई और लाइट जला कर गेट पर सफेद कपड़ा डाल दिया.

सुदेश के पहुंचते ही पुलिस ने आरोपी व उस की पत्नी को दबोच लिया.

पूछताछ में सुदेश ने बताया कि जेल और सजा से बचने के लिए उस ने खौफनाक घटना को अंजाम दिया था. जेल जाने से बचने के लिए उस ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर यह साजिश रची थी. लेकिन उस ने पहली भूल यह कर दी कि काफी प्रयास के बाद भी अपने ही कदकाठी के मजदूर को नहीं तलाश सका था.

सुदेश और अनुपमा की साजिश यह थी कि इस साजिश के पूरा होने पर वे दिल्ली छोड़ कर चले जाएंगे, लेकिन आखिरकार उस के बिना जले आधार कार्ड, सीसीटीवी कैमरे की तसवीरों और दूसरे सबूतों ने उस की खौफनाक साजिश का खुलासा कर दिया.

इस दौरान पुलिस ने करावल नगर थाने और मंडोली जेल से रिकौर्ड निकलवा कर पता कर लिया था कि सुदेश की हाइट 5 फुट 6 इंच है जबकि इंद्रापुरी इलाके में जो शव मिला था, उस की हाइट 5 फुट 3 इंच थी यानी 3 इंच कम.

इसी के बाद पुलिस ने सुदेश के घर की निगरानी शुरू की. उस की पत्नी के फोन को सर्विलांस पर लगाया और वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

पुलिस ने सुदेश के साथ उस की पत्नी को भी डोमन रविदास की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया व शव को ठिकाने लगाने वाली साइकिल बरामद कर ली.

सुदेश व अनुपमा की गिरफ्तारी के बाद मुकदमे में भादंवि की धारा 201, 419, 420 व 120बी जोड़ कर उन्हें अदालत में पेश कर दिया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

दूसरी तरफ लोनी बौर्डर पुलिस ने मृतक मजूदर डोमन रविदास की करावल नगर थाने में दर्ज गुमशुदगी को अपने यहां ट्रांसफर करवा ली. रविदास के साथियों के साथ जा कर रविदास के बेटे ने थाना करावल नगर दिल्ली में जा कर घटना के 3 दिन बाद गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

—कथा पुलिस की जांच और आरोपियों तथा पीडि़त परिवार से बातचीत पर आधारित

मृतक पहुंचा सलाखों के पीछे – भाग 2

उस ने इस घटना के बाद मार्च 2018 में वंशिका की हत्या कर उस के शव को मंडोला में आवासविकास कालोनी के पास खाली जमीन में फेंक दिया. इस के बाद उस ने करावल नगर थाने में बेटी की गुमशुदगी की भादंवि की धारा 363 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

बाद में वंशिका का शव बरामद होने के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल के बाद सुदेश को अपनी बेटी की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया था. तभी से सुदेश मंडोली जेल में बंद था.

लेकिन 2021 को कोरोना की दूसरी लहर में जब सरकार ने विचाराधीन कैदियों को पैरोल पर छोड़ने का फैसला किया तो 21 मई को सुदेश को भी अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था. उसी वक्त से सुदेश अपने बच्चों के बीच था.

21 नवंबर को सुदेश की पैरोल अवधि खत्म हो गई थी. वह जेल में पेश होने के लिए गया, मगर वहां किसी कानूनी अड़चन के कारण उसे जेल में नहीं लिया गया और उसे 22 दिसंबर, 2021 दूसरी डेट पर जेल में पेश होने के लिए कहा गया.

लेकिन इसी बीच किसी ने बेदर्दी से सुदेश की हत्या कर दी. ऐसा कौन था, जिस से सुदेश की ऐसी दुश्मनी थी कि वह उस की इतनी बेदर्दी के साथ हत्या कर देगा.

यह सब जानने के लिए पुलिस ने सुदेश की पत्नी व उस के जानपहचान वालों से खूब कुरेद कर पूछताछ की, मगर सुदेश की हत्या का कारण व उस के कातिल का कोई सुराग नहीं मिल सका.

पुलिस को न तो किसी से सुदेश की दुश्मनी का सुराग मिल रहा था, न ही किसी से लेनदेन के विवाद की खबर मिल रही थी. लेकिन एक ऐसी बात जरूर थी, जिस के कारण जांच की कवायद से जुड़े एसपी देहात डा. ईरज राजा, सीओ रजनीश उपाध्याय और थानाप्रभारी सचिन कुमार उस पर घंटों से माथापच्ची कर रहे थे.

दरअसल, गहराई से पड़ताल करने के बाद कुछ ऐसे सवाल उभरे थे जिन का पुलिस को जवाब ढूंढना था. पुलिस को लाश की जेब से सुदेश कुमार का आधार कार्ड तो मिल गया था, लेकिन जो एक बात हैरान कर रही थी, वह यह कि लाश बेशक बुरी तरह जली हुई थी, लेकिन जेब में पड़ा आधार कार्ड बिलकुल सहीसलामत था, जिसे देखने से लगता था कि शायद यह कार्ड किसी ने आग बुझने के बाद लाश की जेब में डाल दिया हो.

बस यही बात थी जो पुलिस को लगातार खटक रही थी. क्योंकि अगर किसी ने सुदेश की हत्या करने के बाद उस के चेहरे को इसलिए जलाया था कि उस की पहचान न हो सके तो भला वह कातिल उस की जेब में आधार कार्ड क्यों छोड़ेगा.

दोनों ही बातें एकदम विरोधाभासी लग रही थीं और शक पैदा कर रही थीं. शक का एक दूसरा कारण और भी था. क्योंकि सुदेश की मौत के बाद जब उस के शव का पोस्टमार्टम हो गया तथा उस का अंतिम संस्कार हो गया तो 3 दिन बाद से ही उस की पत्नी लोनी बौर्डर थाने में आ कर पुलिस से सुदेश की मौत का डेथ सर्टिफिकेट देने की मांग करने लगी.

जिस महिला के पति की मौत होती है वह तो महीनों तक अपने गम व सदमे से उबर नहीं पाती, लेकिन दूसरी तरफ अनुपमा हर रोज थाने आ कर पुलिस से अपने पति की मौत का सर्टिफिकेट देने की मांग कर रही थी.

पुलिस के लिए उस का व्यवहार बड़ा अटपटा था. पुलिस ने जब उस से कारण पूछा तो वह कहने लगी कि उसे मंडोली जेल में सर्टिफिकेट देना है और उन्हें सुदेश के सरेंडर करने की डेट से पहले यह बताना है कि उस की मौत हो चुकी है.

अनुपमा का यह रवैया भी हैरान कर रहा था. इसलिए एसपी देहात ने इस केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए टैक्निकल सर्विलांस टीम के साथसाथ मुखबिरों की मदद लेने का फैसला किया. क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि सुदेश की हत्या के पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है.

सीओ उपाध्याय के निर्देश पर पुलिस की एक टीम ने गोपनीय ढंग से सुदेश के घर के आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगालने का काम शुरू किया ताकि पता लगाया जा सके कि वारदात से पहले सुदेश कब और किस के साथ घर से गया था और उस ने कौन से कपड़े पहने थे.

संयोग से सुदेश के घर से कुछ ही दूर लगे एक सीसीटीवी कैमरे में ऐसी फुटेज मिल गई, जिस ने पूरे केस की तसवीर ही बदल दी.

सीसीटीवी कैमरे में 19 नवंबर, 2021 की रात को एक संदिग्ध शख्स नजर आया. यह शख्स एक साइकिल पर एक बड़ी सी बोरी ले कर जा रहा था. पुलिस ने सीसीटीवी में दिख रहे इस शख्स की पहचान पता करने की कोशिश की और मुखबिरों को भी यह तसवीर दिखाई. तब आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि वह शख्स कोई और नहीं बल्कि खुद सुदेश कुमार था.

इस का मतलब था कि सुदेश कुमार मरा नहीं, बल्कि अब भी जिंदा है. तो फिर उस की साइकिल पर जो बोरी लदी थी, उस में वह क्या ले कर जा रहा था?

सीसीटीवी में सब से हैरान करने वाली बात यह दिखी कि आखिरी बार देर रात को करीब 11 बजे अपने घर से निकले सुदेश के शरीर पर वह कपड़े भी नहीं थे जो इंद्रापुरी में जली हालत में मिली लाश के शरीर पर थे, जिसे अनुपमा ने अपने पति की बताया था.

राज बहुत गहरा था. इसीलिए इस की तह में जाने के लिए पुलिस की टीम ने आसपास में रहने वाले कुछ लोगों को अपने विश्वास में ले कर सुदेश के घर पर नजर रखने के लिए लगा दिया.

पुलिस को 1-2 दिन में ही जानकारी मिली कि सुदेश वाकई मरा नहीं जिंदा है और अकसर देर रात में अपने घर चोरीछिपे आता है ताकि किसी को भनक न लग सके.

इतनी जानकारी मिलने के बाद पुलिस समझ गई कि यह एक बड़ी साजिश है इसीलिए पुलिस ने अब सुदेश की पत्नी के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया.

पुलिस को फोन की सर्विलांस लगाने का फायदा मिला और एक ऐसा संदेश मिला जिस से पता चला कि सुदेश न सिर्फ जिंदा है बल्कि चोरीछिपे अपने परिवार से भी मिलता है.

इसी क्रम में वह 10 दिसंबर, 2021 की रात को अपने घर आया था और आसपास जाल बिछा कर खड़ी पुलिस टीम ने सुदेश को दबोच लिया. पुलिस ने उस की पत्नी अनुपमा को भी हिरासत में ले लिया.

दोनों को थाने ला कर उच्चाधिकारियों के सामने जब पूछताछ शुरू हुई तो एक ऐसे हत्याकांड की ऐसी कहानी सामने आई, जिस में मृतक मान कर पुलिस उस के कातिल को पकड़ने के लिए दिनरात एक कर रही थी लेकिन पता चला वह न सिर्फ जिंदा है बल्कि उस ने खुद को मरा साबित करने के लिए किसी और की हत्या कर उसे अपनी पहचान दे दी थी. और इस काम में उस की पत्नी ने उस की पूरी मदद की थी.

सुदेश व उस की पत्नी से पूछताछ में पता चला कि 22 दिसंबर को इसे वापस जेल जाना था. जब वह जेल में था तो उसे साथी कैदियों ने बताया था कि जिस तरीके के सबूत उस के खिलाफ हैं, उस के मुताबिक उसे सजा मिलनी तय थी और कम से कम उसे उम्रकैद की सजा मिलेगी.

जब 21 नवंबर को उसे जेल में नहीं लिया गया तो उस ने सोचा कि शायद ऊपर वाला भी नहीं चाहता कि वह जेल जाए. इस के बाद से ही उस ने इस बात पर दिमाग लगाना शुरू कर दिया कि कैसे जेल जाने से बचा जाए. कई दिन तक खूब दिमाग लगाया, लेकिन कोई तरकीब नहीं सूझी.

अचानक एक दिन टीवी पर एक फिल्म देख कर आइडिया मिल गया, जिस में जेल से भागे एक कैदी ने किसी आदमी की हत्या कर उसे अपने कपड़े पहना कर उस के चेहरे को जला दिया और पुलिस ने मान लिया कि कैदी मारा गया है.