विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 1

मुखबिर के जरिए एसटीएफ को पक्की सूचना मिली थी कि विनोद सुलतानपुर के रास्ते प्रयागराज भागने की कोशिश में है. सूचना मिलते ही  डीएसपी सिंह भी सुलतानपुर पहुंच चुके थे और टीम के साथ उसे हनुमानगंज गोपालपुरवा इलाके में घेर लिया.

खुद को पुलिस टीम से घिरा देख माफिया विनोद पसीना पसीना हो गया और किसी कीमत पर पुलिस के हाथों चढऩा नहीं चाहता था. उस ने पुलिस के ऊपर स्टेनगन से फायर झोंक दिया. इंसपेक्टर हेमंत सिंह और हैडकांस्टेबल शशिकांत बालबाल बचे. एसटीएफ ने भी अपनी सुरक्षा में जबावी काररवाई शुरू कर दी.

गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका थर्रा उठा था जैसे दीपावली की आतिशबाजी हो रही हो. गोलियों की आवाज सुन कर गांव वालों की नींद टूट गई थी. वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि रात के समय कौन आतिशबाजी कर रहा है.

इधर जब दूसरी ओर से फायरिंग होनी बंद हुई, तब एसटीएफ सावधानी बरतते हुए दबेपांव मिट्टी के टीले के पीछे पहुंची तो देखा हाथ में स्टेनगन लिए माफिया विनोद लुढ़का पड़ा था. पुलिस विनोद के पास पहुंची तो देखा कि गोलियों से उस का जिस्म छलनी हो चुका था, लेकिन अभी भी उस की हलकी हलकी सांसें चल रही थीं.

एसटीएफ ने तुरंत सरकारी एंबुलेंस को फोन कर मौके पर बुलाया और उसे सरकारी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने देखते ही मृत घोषित कर दिया था.

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का रहने वाला माफिया विनोद कुमार उपाध्याय पिछले 17 सालों से आतंक का पर्याय बना हुआ था. वह बहुजन समाज पार्टी के बैनर तले विधायक का चुनाव भी लड़ चुका था. राज्य के टौप टेन अपराधियों में शुमार था, जिस की गोरखनाथ थाने में हिस्ट्रीशीट नंबर-1 बी दर्ज थी.

इस पर गोरखपुर के एडीजी (जोन) डा. के.एस. प्रताप कुमार ने एक लाख रुपए का इनाम रखा था. यह इनाम गोरखपुर के गुलरिहा थाने में दर्ज एक गंभीर मामले में वांछित होने पर रखा गया था और पिछले 8 महीने से पुलिस को विनोद उपाध्याय की तलाश जारी थी.

एडीजी (जोन) डा. के.एस. प्रताप कुमार ने नवयुवकों के रोलमाडल बने माफिया विनोद कुमार उपाध्याय को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी एसटीएफ के डिप्टी एसपी दीपक सिंह को सौंपी थी. उन्होंने अपने कुछ तेजतर्रार और पुलिस अधिकारियों को अपनी टीम में शामिल किया था, जो विनोद की जिंदगी का एकएक राज जानते थे.

इस बार उस की युद्ध स्तर पर तलाश हो रही थी और उन के बीच में लड़ाई आरपार की थी. मुख्यमंत्री का सख्त आदेश पा कर पुलिस अधिकारी सक्रिय हो गए थे. इस मिशन पर स्थानीय पुलिस के साथसाथ एसटीएफ को भी लगा दिया गया था और मिशन अतिगोपनीय रखा गया था, ताकि चाटुकार पुलिसकर्मी गुप्त मिशन की जानकारी डौन विनोद तक पहुंचा न सकें.

गोपनीय औपरेशन की काररवाई एडीजी (जोन) प्रताप कुमार के साथसाथ एसटीएफ के हैड अमिताभ यश के हाथों संचालित हो रही थी और दोनों पुलिस अधिकारियों का दिशानिर्देश डीएसपी दीपक को मिल रहा था. इस मिशन में डीएसपी दीपक सिंह के साथ इंसपेक्टर हेमंत सिंह और हैडकांस्टेबल शशिकांत भी शामिल थे.

कुख्यात गैंगस्टर कैसे मिला मिट्टी में

मुखबिर के जरिए एसटीएफ को माफिया डौन विनोद उपाध्याय के लखनऊ या प्रयागराज में छिपे होने की सूचना मिल रही थी. अपनी तरफ से पुलिस ने इन्हीं दोनों जिलों में छापेमारी तेज कर दी थी.

4 जनवरी, 2024 को फिर मुखबिर के जरिए एसटीएफ को सूचना मिली कि डौन उपाध्याय लखनऊ में छिपा था और वह पुलिस से बचने के लिए छिपतेछिपाते प्रयागराज की ओर अपनी स्विफ्ट कार से अकेला जा रहा है. उस की कार में 9 एमएम की फैक्ट्री मेड स्टेनगन भी है.

सूचना अहम थी. एसटीएफ टीम किसी भी सूरत में माफिया विनोद को इस बार हाथ से निकलना नहीं देना चाहती थी. इसलिए सूचना मिलते ही डीएसपी दीपक सिंह सचेत हो गए और उन्होंने अपनी टीम को सतर्क कर दिया था.

यही नहीं, पुलिस अधिकारी बुलेटप्रूफ जैकेट और एके 47 असलहे से लैस हो गए थे ताकि किसी काररवाई का मुंहतोड़ जबाव दिया जा सके. आखिर सुलतानपुर के हनुमानगंज गोपालपुरवा इलाके में एसटीएफ और स्थानीय पुलिस की टीम ने डौन विनोद उपाध्याय को मुठभेड़ के बाद ढेर कर दिया. उस के मरने पर पुलिस ने राहत की सांस ली.

पुलिस और माफिया के बीच करीब 8 राउंड फायरिंग हुई थी. थोड़ी ही देर में माफिया विनोद कुमार उपाध्याय के मुठभेड़ में मारे जाने की खबर पूरे जिले में फैल गई थी.

पोस्टमार्टम के बाद विनोद के शव को उस के घर वालों को सौंप दिया गया. फिलहाल चेले का भी अंत वैसा ही हुआ, जैसा उस के गुरु श्रीप्रकाश शुक्ला का हुआ था. आखिर विनोद उपाध्याय एक सीधेसादे नौजवान से आतंक का पर्याय कैसे बन गया था, उस के सिर पर किनकिन बाहुबलियों का हाथ था, उस ने कैसे माफियागिरी से राजनीति का सफर तय किया था? आइए जानते हैं—

विनोद श्रीप्रकाश शुक्ला को मानता था आदर्श

विनोद उपाध्याय के पिता राजकुमार उपाध्याय मूलरूप से उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के महाराजगंज थाना क्षेत्र के मुइयां माया बाजार के रहने वाले थे. वह करीब 35 साल पहले पत्नी शोभा को साथ ले कर गोरखपुर आ गए और गोरखनाथ थाना क्षेत्र के धर्मशाला बाजार में एक किराए का कमरा ले कर रहने लगे.

जीवनयापन के लिए उन्होंने एक सुनार की दुकान पर मुनीम की नौकरी कर ली. आगे चल कर वह 3 बच्चों के पिता बने. उन का जीवन खुशियों से भर गया था और घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

राजकुमार जिस सुनार के यहां नौकरी करते थे, वह सूद पर पैसे बांटने का भी काम करता था. जिस का लेखाजोखा वही रखते थे. जब इस गोरखधंधे में वह पूरी तरह पारंगत हो गए तो आगे चल कर उन्होंंने भी यही धंधा शुरू किया. इस धंधे में मुनाफा ही मुनाफा था.

देखते ही देखते वह सूद कारोबारी बन गए और छोटे कारोबारियों को सूद पर पैसे बांटने लगे. जो भी कारोबारी पैसे देने से आनाकानी करता, वसूलने के लिए वह अपने बेटे विनोद उपाध्याय को लगाते थे. विनोद दबंगई से उस के साथ पेश आता था और रकम वसूल हो जाती थी.

दरअसल, 21 साल की उम्र में ही विनोद उपाध्याय ने जुर्म की दुनिया में पांव रख दिया था. उस ने कुख्यात माफिया डान श्रीप्रकाश शुक्ला को अपना आदर्श और गुरु मान लिया था, जिस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ली थी.

अतीक के परिवार के लेडी गैंग

अतीक के परिवार के लेडी गैंग – भाग 3

देवरानी जेठानी में बढ़ गईं दूरियां

अशरफ की शादी कौशांबी की रहने वाली जैनब फातिमा के साथ 2013 में हुई थी. शादी के कुछ महीने पहले ही अशरफ जेल से छूट कर आया था. अतीक ने अशरफ की शादी खूब धूमधाम से की थी.

शादी के कुछ दिनों बाद तक देवरानी जेठानी में अच्छी बनी, पर बाद में दोनों के बीच अनबन रहने लगी. घर पर अतीक की पत्नी शाइस्ता की हुकूमत चलती थी. नौकर चाकर से ले कर रिश्तेदार तक शाइस्ता की ही बात मानते थे. अतीक की पत्नी होने के नाते कोई उस के सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करता था. यहां तक कि अशरफ भी भाभी के सामने कुछ नहीं बोलता था.

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रंगदारी यानी अवैध वसूली का जो पैसा आता था, वह सब शाइस्ता के पास ही आता था. जो गिफ्ट आते थे, उसे भी शाइस्ता रखती थी. जबकि जैनब को वही मिलता था, जो शाइस्ता देती थी. जैनब के पति के हाथ में भी कुछ नहीं था. क्योंकि घर का मालिक अतीक था. अशरफ को भी वही सब करना होता था, जो अतीक कहता था. यह बात तब खुली थी, जब किसी बिल्डर ने शाइस्ता को फार्च्यूनर गिफ्ट की थी, तब वह गाड़ी जैनब को इतनी पसंद आई कि उस ने पति से कहा था कि उसे भी यही कार चाहिए. इस के बाद अशरफ ने बिल्डर को फोन कर के एक और फार्च्यूनर मंगाई थी.

कहा जाता है कि इन्हीं बातों को ले कर शाइस्ता और जैनब के बीच विवाद रहने लगा था. क्योंकि अब यह सब जैनब से बरदाश्त नहीं हो रहा था. फिर तो शाइस्ता और जैनब के बीच दूरियां बढ़ती गईं. रोजमर्रा की चीजों को ले कर अनबन शुरू हुई तो इस की जानकारी अतीक और अशरफ को हुई.

दोनों भाइयों ने दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की कि शाइस्ता और जैनब एकदूसरे को समझने लगें, लेकिन समझने की कौन कहे, आगे चल कर दोनों के बीच बातचीत भी बंद हो गई. यह दूरी इतनी बढ़ गई कि अशरफ और अतीक अलगअलग घरों में रहने लगे थे. कहा जाता है कि अलग होने के बाद अशरफ अपनी अलग वसूली करने लगा था.

अतीक और अशरफ की मौत के बाद दोनों की लड़ाई अब खुल कर सामने आ गई है. शाइस्ता ने जहां अपना अलग गैंग बना लिया है, वहीं जैनब भी पीछे नहीं है. उस ने भी अपना अलग गैंग बना लिया है, जिस की कमान उस के भाई यानी अशरफ के साले सद्दाम ने संभाल रखी है. क्योंकि जब अशरफ बरेली जेल में था, तब भी उस का सारा काम साला सद्दाम ही देख रहा था. इस के लिए वह वहीं बगल में घर ले कर रह रहा था.

पता चला है कि अब अतीक की बहन आयशा नूरी भी जैनब के गुट में आ गई है. जबकि शाइस्ता ने अपना अलग गुट बना लिया है. यह सब बाहुबली की प्रौपर्टी को ले कर हुआ है. इसलिए संभावना बनती है कि इन दोनों के बीच कभी भी गैंगवार हो सकती है. जैनब अब प्रौपर्टी पर कब्जा चाहती है.

अतीक की बहन आयशा नूरी

उमेश पाल हत्याकांड में अतीक अहमद की बहन आयशा नूरी, उस की दोनों बेटियों मंतशा और उंजिला को भी धूमनगंज पुलिस ने आरोपी बना कर वांछित घोषित किया है. एसआईटी द्वारा की गई जांच में पता चला है कि आयशा को शूटरों की पूरी जानकारी थी. आयशा के पति डा. अखलाक को एसटीएफ पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है.

पुलिस ने अतीक के भाई अशरफ की पत्नी जैनब फातिमा के साथ आयशा और उस की दोनों बेटियों को भी गिरफ्तार किया था, जब 6 मार्च को प्रयागराज आ कर उस ने बेटियों और अशरफ की पत्नी जैनब के साथ प्रैस कौन्फ्रैंस की थी, तब आयशा ने अपने दोनों भाइयों अतीक और अशरफ को निर्दोष बताया था. लेकिन तब पुलिस ने पुख्ता सबूत न होने के कारण शांति भंग में चालान कर के छोड़ दिया था.

बाद में जब जांच की गई तो पता चला कि आयशा और उस की दोनों बेटियां भी उमेश पाल की हत्या की साजिश में शामिल थीं. यही नहीं, शूटरों की मदद भी की थी. एक वीडियो वायरल हुआ था, जिस में साफ दिखाई दे रहा है कि अतीक अहमद का खास शूटर 5 लाख का ईनामी गुड्डू बमबाज मेरठ स्थित इन के घर गया था.

सीसीटीवी की इस फुटेज के अनुसार उमेश पाल की हत्या के करीब 10 दिन बाद 5 मार्च को उमेश की हत्या में शामिल शूटर गुड्डू मुसलिम आयशा के घर गया था और 17 घंटे आयशा के घर रहा था, जहां उस की जम कर खातिरदारी की गई थी. यही नहीं, चलते समय उसे लाखों रुपए भी दिए गए थे.

डा. अखलाक के घर से मिले उस सीसीटीवी फुटेज में गुड्डू मुसलिम उस के घर पहुंचा और अखलाक से गले मिला. अतीक के बहनोई डा. अखलाक उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग में डाक्टर थे और मेरठ में तैनात थे. गिरफ्तारी के बाद स्वास्थ्य विभाग ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है.

इस के बाद 6 मार्च को डा. अखलाक की कार कौशांबी के थाना संदीपन घाट में मिली थी. जिसे चौकी इंचार्ज (हर्रायपुर) कृष्ण कुमार यादव और एसएचओ (संदीपन घाट) राकेश राय ने थाने ला कर लावारिस घोषित कर के जमा कर दी थी.

जांच में पता चला कि दोनों पुलिस अधिकारियों ने डा. अखलाक को बचाने के लिए ऐसा किया था. इस के बाद एसपी कौशांबी बृजेश श्रीवास्तव ने एसएचओ राकेश राय और चौकी इंचार्ज कृष्ण कुमार यादव को सस्पेंड कर दिया था.

अतीक की भांजियां भी हैं पुलिस के निशाने पर

अतीक की जिन 2 भांजियों मंतशा और उंजिला को आरोपी बनाया है, उन में से मंतशा का निकाह 5 लाख के ईनामी असद के साथ तय हो गया था. पिछले साल दोनों की सगाई भी कर दी गई थी, लेकिन उमेश पाल की हत्या के बाद असद पुलिस एनकाउंटर में मारा जा चुका है.

उमेश पाल हत्याकांड की साजिश में शामिल शूटर गुड्डू मुसलिम की मदद के आरोप में फरार चल रही माफिया अतीक की बहन आयशा नूरी और उस की दोनों बेटियों ने प्रयागराज की सीजेएम की अदालत में आत्मसमर्पण के लिए अरजी लगाई थी, लेकिन अदालत ने सुनवाई के बाद उन की इस अरजी को खारिज कर दिया था. जिस से उन के आत्मसमर्पण की संभावना खत्म हो चुकी है.

अतीक अहमद के परिवार की इन तीनों फरार महिलाओं को ले कर मीडिया रोजरोज नए खुलासे करती है, पर पुलिस इन तक पहुंच नहीं पा रही है. इस की एक सब से बड़ी वजह यह है कि ये सभी बुरके में रहती हैं. इस के अलावा ये मुसलिम इलाके में छिपी होती हैं, जहां न पुलिस पहुंच पाती है और न पुलिस के मुखबिर.

ये जब अड्डे बदलती हैं तो कहा जाता है कि इन के साथ बुरके में कई महिलाएं होती हैं, जिस की वजह से कोई अंदाजा भी नहीं लगा पाता कि ये कौन हैं. अब देखना यह है कि ये कब गिरफ्तार होती हैं.

दरअसल, इन के भागने की सब से बड़ी वजह इस परिवार की प्रौपर्टी को बचाना भी है. क्योंकि अब ऐसा बाहर कोई नहीं बचा, जो प्रौपर्टी और अतीक के गैंग की देखभाल कर सके. लेदे कर शाइस्ता बची है, जिसे पूरी प्रौपर्टी के बारे में भी पता है और गैंग के बारे में भी. क्योंकि पति के जेल जाने के बाद वही गैंग भी चला रही थी और प्रौपर्टी की भी देखभाल कर रही थी.

उसे यह भी पता है कि कितना पैसा कहां लगा है. इसीलिए वह बाहर रह कर सब कुछ इकट्ठा कर रही है, क्योंकि अगर वह जेल चली गई तो सब बिखर जाएगा. वैसे भी प्रौपर्टी पर कब्जे को ले कर देवरानी जेठानी में जंग शुरू हो चुकी है. दोनों के वफादारों में आपस में गोलियां भी चल चुकी हैं.

लेकिन अतीक के वफादार ज्यादा हैं. क्योंकि अतीक जिन लोगों के बुरे समय में काम आया था, वे आज भी शाइस्ता के ही साथ हैं. जबकि अतीक की प्रौपर्टी पर हक तो पूरा परिवार जता रहा है, जिस में अतीक की पत्नी, 4 बेटे, अशरफ की पत्नी जैनब, बहन आयशा और बहनोई डा. अखलाक शामिल हैं. इन सब का क्या होगा, यह भविष्य ही बताएगा.

इधर सोशल मीडिया पर बकरा ईद मनाते हुए आयशा की फोटो वायरल हुई थी. अब पुलिस उस की लोकेशन पता कर रही है. आयशा ने सुप्रीम कोर्ट में अपने वकील से भाइयों की हत्या की न्यायिक जांच कराने की मांग की है.

अतीक के परिवार के लेडी गैंग – भाग 2

पुलिस रिकौर्ड के अनुसार शाइस्ता परवीन पर 5 मुकदमे दर्ज हैं. इन में से धोखाधड़ी और फरजी दस्तावेज तैयार करने की 3 एफआईआर थाना कर्नलगंज में दर्ज हैं. जबकि उमेश पाल और उस के 2 सुरक्षाकर्मियों की हत्या का मुकदमा थाना धूमनगंज में दर्ज है. इस के बाद उस पर गैंगस्टर ऐक्ट भी लगा दिया गया है.

इसी उमेश पाल और उस के 2 सुरक्षाकर्मियों की हत्या वाले मामले में पुलिस उस की और उस के साथी गुड्डू मुसलिम और 5 लाख के ईनामी शूटर साबिर की तलाश कर रही है. पुलिस और एसटीएफ की टीमें लगातार उस की तलाश में छापे मार रही हैं, पर इन में से किसी का पता नहीं चल पा रहा है.

इन सभी पर ईनाम तो घोषित किया ही गया है, शाइस्ता के खिलाफ लुक आउट नोटिस भी जारी किया जा चुका है, जिस से वह देश के बाहर न जा सके.

दरअसल, पति अतीक अहमद के जेल जाने के बाद शाइस्ता ही बेटों और पति के गुर्गों की मदद से पति का आपराधिक साम्राज्य चला रही थी. माना जा रहा है कि 5 लाख का ईनामी साबिर उस के साथ है. संभावना यह भी जताई जा रही है कि लुक आउट नोटिस जारी होने के पहले ही वह विदेश भाग गई है और वहीं से पति के गैंग की कमान संभाल रही है.

शाइस्ता को ले कर रोजरोज नईनई अटकलें लगाई जाती हैं. जब अतीक के बेटे असद का एनकाउंटर हुआ तो हर कोई यही सोच रहा था कि अपने बेटे को आखिरी बार देखने शाइस्ता जरूर आएगी, लेकिन वह बेटे को भी देखने नहीं आई.

इस के बाद 15 अप्रैल, 2023 को अतीक और उस के भाई अशरफ की हत्या हुई और 16 अप्रैल को जनाजा निकला तो सभी को पूरा विश्वास था कि पति के जनाजे में शामिल होने शाइस्ता जरूर आएगी. पर उस ने सरेंडर करने के बजाय आजादी को चुना और सालों तक पति के साथ रहने वाली शाइस्ता पति के अंतिम दर्शन तक के लिए नहीं आई.

इसलाम में किसी की मौत के बाद चालीसवां दिन बहुत खास माना जाता है. मुसलिम मानते हैं कि इस दिन मरे हुए इंसान की आत्मा अपने परिवार से मिलने आती है. चालीसवें दिन चेहल्लुम का फातिहा दिया जाता है, गरीबों को खाना खिलाया जाता है. इस दिन मरने वाले की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है. परिवार वाले ये सारी रस्में पूरा करते हैं.

इसलिए सभी को उम्मीद थी कि पति से जुड़ी अंतिम रस्म के लिए शाइस्ता सरेंडर कर सकती है. पर न तो शाइस्ता आई और न ही अतीक के भाई अशरफ की पत्नी जैनब ही. देवरानी जेठानी दोनों फरार हैं. तब चालीसवें की रस्म अतीक के बहनोई ने पूरी की थी. क्योंकि अतीक की बहन आयशा नूरी भी फरार है.

पुलिस की कोशिशें हुईं नाकाम

अब सवाल यह उठता है कि आखिर शाइस्ता कहां है? पुलिस उस की तलाश में रातदिन एक किए हुए है. आखिर कौन लोग हैं, जो शाइस्ता को बचा रहे हैं, उसे खर्च दे रहे हैं, उस के खानेपीने और रहने की व्यवस्था कर रहे हैं? पुलिस ने शाइस्ता को दिल्ली के अलावा कौशांबी की कछार में ढूंढा, सैयद सरावां, उजहिनी और मेहगांवा गांव में ही नहीं, मदरसे में भी छापा मारा. कौशांबी के गांवगांव में तलाशा गया, पर पुलिस शाइस्ता का पता नहीं लगा सकी.

दरअसल, शाइस्ता तक पुलिस के न पहुंच पाने की 2 वजहें हैं. पहली वजह है उस की पहचान. एक तो वह बुरके में रहती है. फिर अतीक के समय भी वह बहुत कम मौकों पर सार्वजनिक तौर पर बाहर आई थी. उस के फोटो भी पुलिस के पास कम ही हैं. आखिरी बार वह बसपा जौइन करते समय मीडिया के सामने आई थी. पर उस समय वह बुरके में थी. उस के जो भी फोटो बिना बुरके के हैं, वे काफी पुराने हैं.

शाइस्ता का कोई नया फोटो पुलिस के पास नहीं है, इसलिए पुलिस को उस तक पहुंचने में परेशानी हो रही है. यह भी कहा जा रहा है कि अतीक के कुछ पुराने वफादार हैं, जो शाइस्ता की मदद कर रहे हैं. पुलिस ने तो अब उसे माफिया नाम भी दे दिया है.

पुलिस का कहना है कि शाइस्ता लगातार ठिकाने और फोन नंबर बदल रही है. लेकिन है वह प्रयागराज में ही. उस ने प्रयागराज में किसी मुसलिम बाहुल्य इलाके को अपना ठिकाना बना रखा है, जहां पुलिस का पहुंचना मुश्किल है.

अशरफ की पत्नी जैनब फातिमा

उमेश पाल हत्याकांड में पुलिस ने जांच के बाद शाइस्ता परवीन की देवरानी यानी अतीक अहमद के भाई अशरफ अहमद की पत्नी जैनब फातिमा को भी आरोपी बनाया है. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती है, क्योंकि पुलिस का मानना है कि अतीक और अशरफ के कई राज वह उगल सकती है.

शुरुआती जांच में पुलिस को उस के खिलाफ कई सबूत मिले हैं. पुलिस ने इसे पहले पकड़ा भी था और पूछताछ भी की थी. तब पुलिस को जैनब के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले थे, इसलिए शांति भंग के आरोप में चालान कर के उसे छोड़ दिया गया था.

तब इस ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पुलिस पर परेशान करने समेत कई अन्य आरोप लगाए थे. जैनब के साथ ही पुलिस ने अतीक की बहन आयशा नूरी और 2 भांजियों को भी पकड़ा था. पूछताछ के बाद पुलिस ने इन्हें भी शांति भंग में चालान कर के छोड़ दिया था.

जैनब का नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, लेकिन अगर आज प्रयागराज के लोगों से पूछिए तो उस की पूरी क्राइम कुंडली बता देंगे. अपनी जेठानी शाइस्ता परवीन की तरह पुलिस द्वारा पकड़े जाने के डर से जैनब भी शौहर की मौत पर कब्रिस्तान नहीं पहुंची. उस ने भी जेठानी की तरह फरार होना उचित समझा.

आज उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए जितनी चुनौती शाइस्ता है, उतनी ही चुनौती जैनब भी है. अतीक के बेटे असद के एनकाउंटर तक वह प्रयागराज वाले घर पर ही थी. उस ने मीडिया के सामने बरेली तथा प्रयागराज के थानों में जा कर पति और जेठ की सुरक्षा की मांग भी की थी.

अशरफ से शादी के पहले जैनब का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं रहा, लेकिन माफिया के घर शादी होते ही क्रिमिनल लिस्ट में उस का नाम आ गया. पुलिस का मानना है कि जैनब से पूछताछ में उमेश पाल हत्याकांड के अहम सबूत सामने आ सकते हैं. इसीलिए पुलिस को जैनब की तलाश है. पर वह भी जेठानी और ननद की तरह फरार है.

अतीक के परिवार के लेडी गैंग – भाग 1

आज शाइस्ता परवीन को कौन नहीं जानता. उमेश पाल हत्याकांड में फरार चल रही उत्तर प्रदेश पुलिस  की मोस्टवांटेड सूची में शामिल 50 हजार की ईनामी शाइस्ता परवीन के पीछे पूरे उत्तर प्रदेश की पुलिस पड़ी है. उसे इलाहाबाद के कोनेकोने में तो तलाशा ही जा रहा है, देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां उस की तलाश न हो रही हो.

इलाहाबाद शहर ही नहीं, गांवगांव और नदी के कछार तक में पुलिस छापे मार रही है. पर डौन अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता तक पुलिस पहुंच नहीं पा रही है. पुलिस को शाइस्ता की इतनी बेसब्री से तलाश क्यों है, यह जानने से पहले आइए थोड़ा उस के जीवन के बारे में जान लेते हैं.

शाइस्ता परवीन का जन्म 1972 में उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद (जो प्रयागराज के नाम से जाना जाता है) के मोहल्ला धूमनगंज के रहने वाले मोहम्मद हारुन के घर हुआ था.

मोहम्मद हारुन उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल थे और पड़ोसी जिले प्रतापगढ़ में तैनात थे, इसलिए शाइस्ता का ज्यादातर समय वहीं बीता. उस के परिवार में मातापिता के अलावा उस की 4 बहनें और 2 भाई हैं. उस के दोनों भाई मदरसे में प्रिंसिपल हैं.

शाइस्ता की स्कूली शिक्षा किदवई, प्रयागराज के मेमोरियल गर्ल्स इंटर कालेज में हुई. इस के बाद उस ने प्रयागराज से ग्रैजुएशन किया. शाइस्ता के घर वाले और अतीक के घर वाले एकदूसरे को जानतेपहचानते थे. दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना भी था. इसलिए शाइस्ता के घर वाले जब शाइस्ता का रिश्ता अतीक के लिए ले कर उस के घर गए तो उन्होंने हां कर दी. इस के बाद अगस्त, 1996 में शाइस्ता का निकाह अतीक के साथ हो गया.

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तब तक अतीक जुर्म की दुनिया में कदम रख चुका था. शाइस्ता पढ़ीलिखी तो थी ही, वह पहले से ही बोलने चालने में तेजतर्रार थी. भाईबहनों में सब से बड़ी होने की वजह से उसे घर संभालना भी आता था. इसलिए अतीक के घर आते ही उस ने उस का घर संभाल लिया था.

इतना ही नहीं, अतीक के हर जुर्म में वह उस का साथ भी देने लगी थी. वह पिता के साथ थाने आती जाती थी और पुलिस के काम करने का तरीका नजदीक से देखती थी. इस के अलावा पिता भी घर में अकसर पुलिस के तौर तरीकों और किस अपराध में कैसे बचा जा सकता है, इस की चर्चा करते रहते थे.

इसलिए शाइस्ता कभी पुलिस से नहीं डरी और समय समय पर राजनेता और बाहुबली पति अतीक अहमद की मदद करती रही. अतीक जब जेल में था, तब शाइस्ता ही उस के अपराध के साम्राज्य को संभालती रही.

पुलिस बचाव के लिए ओढ़ा राजनीतिक चोला

शाइस्ता का माफिया पति अतीक पहले अपराधी बना, उस के बाद पुलिस से बचने के लिए राजनेता बन गया था. क्योंकि जब उस के एनकाउंटर का आदेश हुआ था, तब प्रयागराज के एक बड़े कांग्रेसी नेता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से कह उस की जान तो बचाई ही थी, साथ ही सलाह भी दी थी कि अगर उसे पुलिस से बचना है तो वह राजनीति में आ जाए.

तब अतीक ने पहले तो निर्दलीय चुनाव लड़ा. उस के बाद जीत गया तो समाजवादी पार्टी में शामिल हो गया था. समाजवादी पार्टी ने उसे सांसद भी बना दिया था. उसी तरह पति के जेल जाने के बाद पति का आपराधिक साम्राज्य चलाने वाली शाइस्ता भी राजनीतिक संरक्षण पाने के लिए सितंबर, 2021 में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम में शामिल हो गई थी.

पर उत्तर प्रदेश में जब भाजपा की सरकार आई और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की सरकार ने माफियाओं पर शिकंजा कसना शुरू किया तो उस में सब से ज्यादा आफत अतीक अहमद पर ही आई. उस की कई सौ करोड़ की संपत्ति पर प्रशासन ने बुलडोजर चलवा कर जब्त कर ली.

अचानक आए इस संकट से घबरा कर शाइस्ता ने इसी साल यानी 2023 में मायावती का हाथ थाम लिया था यानी उस ने बहुजन समाज पार्टी जौइन कर ली थी. बसपा उसे प्रयागराज से मेयर का टिकट भी देने को तैयार थी.

पर इसी बीच विधायक राजू पाल के भाई और राजू पाल हत्या के चश्मदीद गवाह उमेश पाल की हत्या में माफिया अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन का नाम साजिशकर्ता के रूप में आ गया तो बसपा ने उसे प्रयागराज से मेयर का टिकट देने से मना तो कर ही दिया, पार्टी से भी निकाल दिया.

उमेश पाल की जब हत्या हुई थी, उस समय अतीक अहमद गुजरात के अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद था. अतीक का भाई अशरफ भी बरेली जेल में बंद था. जबकि शाइस्ता प्रयागराज में ही अपने घर में रह रही थी.

कहते हैं कि उमेश पाल की हत्या की बात शाइस्ता ने ही शुरू कराई थी. उमेश पाल की हत्या से पहले वह अतीक से मिलने साबरमती जेल गई थी. तभी वहां अतीक और शाइस्ता के बीच उमेश पाल की हत्या कराने की चर्चा हुई थी.

इस के लिए अतीक ने शाइस्ता से जेल में मोबाइल फोन पहुंचाने को कहा था. जेल में फोन पहुंचाने के लिए उस ने एक पुलिस वाले का नाम भी बताया था. शाइस्ता ने उसी पुलिस वाले के जरिए अतीक तक फोन पहुंचवा दिया था. इस के बाद अतीक ने शूटर्स से बात की तो वह अशरफ से बरेली जेल में जा कर मिला और फिर उमेश पाल की हत्या की फाइनल योजना बन गई और 24 फरवरी, 2023 को उमेश पाल की हत्या हो गई.

इस तरह उमेश पाल की हत्या की योजना में शाइस्ता शामिल थी. यही नहीं, उस के घर शूटरों की मीटिंग भी हुई थी. शाइस्ता ने तय किया था कि हत्या के बाद किसे कहां जाना है. उसी ने सभी को खर्च के लिए पैसे भी दिए थे.

अंडरग्राउंड हो चुकी है गैंगस्टर शाइस्ता

इसीलिए पुलिस उमेश पाल की हत्या की साजिश में शामिल शाइस्ता को गिरफ्तार करना चाहती है, क्योंकि वह सभी शूटरों को पहचानती थी. कहा तो यह भी जाता है कि उमेश की हत्या के बाद जब शाइस्ता की अतीक से फोन पर बात हुई थी तो उस ने पति से कहा था कि इस मामले में असद को नहीं शामिल करना था. तब अतीक ने कहा था कि वह शेर का बच्चा है.

उमेश पाल की हत्या के बाद से ही उत्तर प्रदेश पुलिस उसे पूछताछ के लिए तलाश रही है. अब तो लोग उसे लेडी डौन और गौडमदर भी कहने लगे हैं. पुलिस ने उस पर 50 हजार रुपए का ईनाम भी रखा है. पुलिस हाथ धो कर उस के पीछे पड़ी है, पर उस का पता नहीं लगा पा रही है.

महिला कांस्टेबल से ट्रेन में दरिंदगी

महिला कांस्टेबल से ट्रेन में दरिंदगी – भाग 3

तीनों बदमाश उस महिला सिपाही पर हावी नहीं हो पा रहे थे. इस के बाद तीनों ने उसे पकडऩे की कोशिश छोड़ कर उसे पीटना शुरू कर दिया, जिस से सिपाही बेसुध हो गई और ट्रेन के फर्श पर गिर पड़ी. तीनों बदमाशों ने उस के कपड़े फाड़ दिए.

इसी बीच मनकापुर स्टेशन आ गया. तब रात के करीब एक बज चुका था. तीनों को पकड़े जाने का डर हुआ फिर उन्होंने बेहोश महिला सिपाही को सीट के नीचे धकेल दिया. तीनों ने अपने मोबाइल फोन स्विच्ड औफ कर लिए और वहां से भाग निकले. हैडकांस्टेबल मानसी बेहोश होने के कारण सीट के नीचे पड़ी रही. रात करीब 3 बजे ट्रेन मनकापुर से प्रयागराज के लिए चली. उस समय तक मानसी को होश नहीं आया था.

सुबहसुबह 3 बज कर 40 मिनट पर ट्रेन अयोध्या स्टेशन पहुंची तो पूरा मामला खुला.

बदमाशों में मारा गया 30 वर्षीय अनीस खान और घायल आजाद खान ने नाबालिग हिंदू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा लिया था और उन का धर्मांतरण कर निकाह कर लिया था. दोनों अयोध्या के हैदरगंज थाना क्षेत्र स्थित गांव दशलावन के निवासी हैं, जो अयोध्या शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर सुलतानपुर जिले की सीमा से सटा हुआ है.

अनीस ने दलित लडक़ी और आजाद ने पिछड़े समुदाय की युवती से निकाह किया था. आजाद की शादी हुए 13 साल हो चुके हैं और वह 4 बच्चों का बाप है. कहानी लिखे जाने तक पुलिस आजाद खान और विशंभर दयाल दुबे को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित. कथा में मानसी और मनोज परिवर्तित नाम हैं.

अनीस खान और आजाद खान ने हिंदू लड़कियों से किया था निकाह

मृतक अनीस खान और घायल आजाद खान अयोध्या के हैदरगंज थाना क्षेत्र स्थित गांव दशलावन के निवासी थे. अनीस खान ने अपने घर से लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थित मनऊपर गांव की एक दलित समुदाय की युवती से निकाह किया था. निकाह से पूर्व उस युवती का नाम अंतिमा था, जबकि अब वह  बानो के नाम से जानी जाती है. बानो एक बच्ची की मां है.

अनीस खान की पत्नी बानो उर्फ अंतिमा की मां ने मीडिया को रोते हुए बताया कि उन की फूल सी बच्ची अंतिमा के पीछे अनीस खान तब से पड़ा था, जब वह नाबालिग थी. उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूल आनेजाने के दौरान अनीस खान ने कक्षा 8 में पढ़ रही अंतिमा को अपने वश में कर लिया था.

अंतिमा की मां ने आगे बताया कि अनीस खान तो पहले नाबालिग उम्र में ही निकाह करना चाहता था, परंतु पुलिस के हस्तक्षेप के कारण वह अपने इरादे में कामयाब नहीं हो पाया था. उस के बाद अनीस खान ने अंतिमा के बालिग होने का इंतजार किया और उस के बालिग होते होते ही उसे अपने साथ ले गया.

अंतिमा की मां ने आगे बताया कि उन की 5 बेटियों और 2 बेटों के साथ पूरी बिरादरी ने इस रिश्ते का विरोध भी किया था. तब मामला पुलिस तक भी गया था और हम ने अनीस खान पर अंतिमा के अपहरण का आरोप लगाया था. हालांकि पुलिस छानबीन और पूछताछ के दौरान अंतिमा ने अपने आप को बालिग बताते हुए अनीस खान के साथ ही रहने की इच्छा जताई थी.

अपनी बेटी अंतिमा के महज 25-26 वर्ष की उम्र में ही विधवा हो जाने की खबर पर रोती हुई उस की मां ने बताया कि अब वह चाह कर भी अपनी विधवा बेटी को अपने परिवार में वापस नहीं ला पाएंगी. इस की वजह उन्होंने खुद को बिरादरी द्वारा बेदखल करने की चेतावनी और खुद के बेटों द्वारा अंतिमा से कोई संबंध न रखने का संकल्प बताया.

अंतिमा की मां ने रोते हुए मीडिया को बताया, “हम हिंदू वो मुसलमान. हमारा और इन का ये कैसा मेल. अपने ही धर्म में शादी की होती तो कुछ न कुछ रास्ता अवश्य निकल सकता था. अंतिमा के एक मुसलिम युवक के साथ निकाह कर लेने के बाद मेरे पति मानसिक रूप से बीमार हो गए और अब पागलों जैसी हरकत करते हैं. अगर हमारी बेटी अंतिमा हमारी नाक नीची न करती तो अनीस अब तक जेल की सजा काट रहा होता.”

अंतिमा की मां का दावा है कि 5 साल पहले निकाह होने के बाद उन्होंने या उन के परिवार ने कभी अपनी अपनी बेटी से बात तक नहीं की. उन को ये भी पता नहीं था कि उन की बेटी अंतिमा का नाम अब बानो हो चुका था.

अंतिमा की मां के अंतिम शब्द यह थे, “मैं ने उसे अपनी कोख से पैदा किया है. बहुत दर्द है अंदर ही अंदर हमें, परंतु अब हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते. उस घर में वह इतनी लंबी जिंदगी नहीं काट पाएगी, आप लोग ही उसे हिम्मत देना.”

वहीं दूसरी तरफ पुलिस मुठभेड़ में गिरफ्तार किए गए आरोपी आजाद खान ने भी एक ओबीसी समुदाय की हिंदू युवती से निकाह किया था, जो उसी दशलावन गांव की निवासी है. निकाह से पूर्व मुन्ना की बेटी सुमन अब शबाना के नाम से जानी जाती है.

सुमन उर्फ शबाना का आजाद खान से निकाह लगभग 13 साल पहले हुआ था. अब शबाना 4 बच्चों की अम्मी है. दशलावन गांव में अनीस खान और आजाद खान का घर लगभग अगलबगल ही है.

सुमन की मां ने कहा, “मेरी बेटी स्कूल जाती थी, तब से आजाद खान उस के पीछे लगा रहता था. स्कूल आतेजाते ही दोनों एकदूसरे के संपर्क में आए थे. लगभग 13 साल पहले जब सुमन की उम्र 20 वर्ष की हुई थी तो दोनों ने निकाह कर लिया था. हम ने जब आजाद खान के खिलाफ केस दायर किया और पुलिस से ले कर कोर्ट तक में हम ने केस भी लड़ा था. मगर जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो भला कौन क्या कर सकता था.

“सुमन ने खुद ही कोर्ट और पुलिस के आगे अपने बयान में आजाद खान के साथ रहने की इच्छा जताई थी. सुमन के इस बयान के बाद हम ने कभी भी सुमन या उस के घर की तरफ मुंह उठा कर भी नहीं देखा. हम एक ही गांव में रहते थे.”

महिला कांस्टेबल से ट्रेन में दरिंदगी – भाग 2

रेलवे पुलिस और एसटीएफ जुटी जांच में

इस बीच सर्विलांस की जांच टीम ने अयोध्या रेलवे स्टेशन पर सीसीटीवी फुटेज निकलवाई. साथ ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले को एसटीएफ को सौंप दिया.एक तरफ फुटेज खंगाले जा रहे थे, जबकि दूसरी तरफ एसटीएफ की टीम अपराधियों तक पहुंचने के लिए लोगों से पूछताछ कर रही थी. इस के लिए एसटीएफ द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थी. प्रैस विज्ञप्ति जन साधारण के लिए थी.

अखबारों में छपी विज्ञप्ति में घटनास्थल और घटना के बारे में जानकारी देने के साथसाथ अभियुक्तों के बारे में सूचना देने वालों को एक लाख रुपए इनाम की भी घोषण की गई थी. यह भी कहा गया था कि मामले का मुकदमा अपराध संख्या 29/2023 धारा 333, 353, 354ख, 304 भादंवि पंजीकृत किया गया है. इसी के साथ सूचना देने के लिए उत्तर प्रदेश के एएसपी (एसटीएफ), डीएसपी (एसटीफ) और विवेचक (एसटीएफ) के मोबाइल नंबर भी दिए गए थे.

एक तरफ मानसी अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रही थी तो वहीं दूसरी तरफ रेलवे पुलिस से ले कर यूपी पुलिस की एसटीएफ टीम अपराधियों को दबोचने के अभियान में तेजी ला चुकी थी. हालांकि घटना के 20 दिन से अधिक निकल चुके थे, लेकिन उन्हें कोई बड़ा सुराग हाथ नहीं लगा था. जबकि लोग यह जानने को इच्छुक थे कि आखिर उस रात चलती ट्रेन में मानसी के साथ बदमाशों ने क्या किया? वे बदमाश कौन थे,  जिन्होंने पुलिसकर्मी के साथ यह करने की जुर्रत की? इस घटना को ले कर पूरे इलाके में सनसनी थी.

वारदात के वक्त अयोध्या स्टेशन और मानेसर पर लगे सीसीटीवी फुटेज में 3 युवकों की फुटेज बारबार दिखाई दी थी. पुलिस ने उन तसवीरों के सहारे जांच शुरू कर दी थी. सैंकड़ों लोगों से पूछताछ के अलावा साइंटिफिक सर्विलांस और काल ट्रेसिंग के जरिए आखिर पुलिस आरोपियों तक पहुंच गई.

एनकाउंटर में मारा एक आरोपी

एसटीएफ को सूचना मिली कि मामले के तीनों संदिग्ध बदमाश मनकापुर स्टेशन पर साथसाथ उतरे थे. फिर क्या था, एसटीएफ की ओर से जांच की गति तेज हो गई. घटना की टाइमिंग को ले कर जांच शुरू हुई तो मनकापुर स्टेशन पर एक साथ 3 मोबाइल स्विच औफ होने की जानकारी मिली. इस के बाद सीसीटीवी फुटेज को खंगाला गया. संदिग्धों के स्केच तैयार किए गए. पुलिस ने मोबाइल नंबरों के आधार पर बदमाशों की खोज शुरू की. इसी आधार पर 22 सितंबर, 2023 की सुबहसुबह पुलिस ने बदमाशों को घेर लिया.

यह काररवाई भी कुछ कम नाटकीय तरीके से नहीं हुई. यूपी एसटीएफ आरोपियों के मोबाइल को ट्रैक कर रही थी. इसी क्रम में उन्हें इनपुट मिला कि तीनों इनायत नगर में छिपे हुए हैं. पुलिस ने लोकेशन को लौक करते हुए तीनों को घेर लिया.

पुलिस की घेराबंदी की सूचना मिलते ही तीनों बदमाशों ने पुलिसकर्मियों पर गोलीबारी शुरू कर दी. पुलिस ने भी जवाबी काररवाई की. दोनों तरफ से गोली चलने लगी. कुछ समय में इस एनकाउंटर के दौरान घिरता देख कर एक बदमाश वहां से भाग निकला. जबकि पुलिस ने कुछ देर में ही 2 बदमाशों को काबू में कर लिया. दोनों को गोली लग चुकी थी, इस कारण वे पकड़ में आ गए.

एक बदमाश के भागने पर पुलिस ने पूरे इलाके की नाकेबंदी करा दी. इसी बीच जानकारी आई कि वह बदमाश पुराकलंदर इलाके में छिपा हुआ है. यूपी एसटीएफ ने उसे वहां घेर लिया. उस से सरेंडर करने को कहा गया तो उस ने पुलिस पर\ गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

इस गोलीबारी में पुराकलंदर थाने के एसएचओ रतन शर्मा और 2 सिपाही घायल हो गए. एसएचओ रतन शर्मा के हाथ में गोली लगी. जबकि पुलिस की गोली से बदमाश घायल हो गया. उसे अस्पताल ले जाया गया. लेकिन वहां उसे मृत घोषित कर दिया गया.

अकेली देख बदमाशों ने बनाया शिकार

पकड़े गए बदमाशों ने अपना नाम विशंभर और आजाद बताया, जबकि मारा गया बदमाश अनीस था. पकड़े गए बदमाशों ने पूछताछ में बताया कि उन्होंने महिला हैडकांस्टेबल के साथ किस तरह से दरिंदगी की. कैसे उन्होंने प्रयागराज से अयोध्या जाने वाली सरयू एक्सप्रेस में उसे अपना निशाना बनाया.

दरअसल, अनीस, आजाद और विशंभर पेशे से चोर थे. ट्रेनों में चोरी करते थे. एसटीएफ द्वारा पूछताछ करने पर पता चला कि 30 अगस्त की रात 14234 सरयू एक्सप्रेस के कोच में ये तीनों चोरी करने के इरादे से सवार हुए थे. अयोध्या स्टेशन पर बोगी खाली हो चुकी थी. तीनों सीट पर बैठ कर ब्लू फिल्म देखने लगे.

सामने महिला हैडकांस्टेबल मानसी बैठी हुई थी. मानसी ने अपराधियों के इरादों को भांप लिया और अपनी सीट बदल ली. मानसी जैसे ही दूसरी सीट पर पहुंची तो पीछे से तीनों युवक भी आ गए. अयोध्या स्टेशन पर बचे पैसेंजर भी उतर गए थे. बोगी में उन तीनों के अलावा केवल मानसी ही थी. जैसे ही ट्रेन आगे बढ़ी, तीनों ने मानसी से मारपीट व जोरजबरदस्ती करनी शुरू कर दी.

45 वर्षीया हैडकांस्टेबल मानसी ने उन से अपना बचाव भी किया, किंतु वह तीनों बदमाशों के आगे तब पस्त पड़ गई, जब उन्होंने उस पर वार करना शुरू कर दिया. इसी दौरान एक बदमाश ने उन के चेहरे पर धारदार हथियार से हमला कर दिया. असंतुलित मानसी के सिर को खिडक़ी से टकरा दिया. उस के सिर से खून निकलने लगा था. चेहरा भी जगह जगह कट चुका था. इस के बाद भी वह उन से लड़ रही थी.

महिला कांस्टेबल से ट्रेन में दरिंदगी – भाग 1

पकड़े गए बदमाशों ने पूछताछ में बताया कि सरयू एक्सप्रैस के कोच में वह तीनों सवार हुए थे. अयोध्या स्टेशन पर बोगी खाली हो चुकी थी. तीनों सीट पर बैठ कर ब्लू फिल्म देखने लगे. सामने महिला हैडकांस्टेबल मानसी बैठी हुई थी. मानसी ने अपराधियों के इरादों को भांप लिया और अपनी सीट बदल ली.

मानसी जैसे ही दूसरी सीट पर पहुंची तो पीछे से तीनों युवक भी आ गए. अयोध्या स्टेशन पर बचे पैसेंजर भी उतर गए थे. बोगी में उन तीनों के अलावा केवल मानसी ही थी. जैसे ही ट्रेन आगे बढ़ी, तीनों ने मानसी से मारपीट व जोरजबरदस्ती करनी शुरू कर दी. मानसी ने उन से अपना बचाव भी किया, किंतु वह तीनों बदमाशों के आगे तब पस्त पड़ गई, जब उन्होंने उस पर वार करना शुरू कर दिया.

इसी दौरान एक बदमाश ने उन के चेहरे पर धारदार हथियार से हमला कर दिया. असंतुलित मानसी के सिर को खिड़की से टकरा दिया. उस के सिर से खून निकलने लगा था. चेहरा भी जगहजगह कट चुका था. इस के बाद भी वह उन से लड़ रही थी. तीनों बदमाश उस महिला सिपाही पर हावी नहीं हो पा रहे थे. इस के बाद तीनों ने उसे पकड़ने की कोशिश छोड़ कर उसे पीटना शुरू कर दिया, जिस से सिपाही बेसुध हो गई और ट्रेन के फर्श पर गिर पड़ी.

तीनों बदमाशों ने जबरदस्ती करते हुए उस के कपड़े फाड़ दिए. इसी बीच मनकापुर स्टेशन आ गया. तब रात के करीब एक बज चुका था. फिर उन्होंने बेहोश महिला सिपाही को सीट के नीचे धकेल दिया.

उत्तर प्रदेश के जिला प्रयागराज के भदरी गांव की रहने वाली मानसी उत्तर प्रदेश पुलिस की हैडकांस्टेबल थी. वह 4 बहनों और 2 भाइयों में दूसरे नंबर की थी. उस की तैनाती सुलतानपुर जिले में हुई थी. वैसे वह स्पोट्र्स कोटे से 1998 में सामान्य सिपाही के पद पर भरती हुई थी, लेकिन इसी साल जनवरी में उस का हैडकांस्टेबल पद पर प्रमोशन हुआ था. अयोध्या के सावन झूला मेले में उस की ड्यूटी लगाई गई थी.

वह रोज की तरह 30 अगस्त, 2023 को अपने आवास से ड्यूटी के लिए निकली थी. शाम को करीब 6 बजे फाफामऊ स्टेशन पहुंच गई. फाफामऊ स्टेशन से वह सरयू एक्सप्रेस ट्रेन के जनरल डिब्बे में सवार हो गई. सरयू एक्सप्रेस प्रतापगढ़ होते हुए निर्धारित समय पर अयोध्या कैंट पहुंच गई. उस वक्त रात के सवा 11 बज गए थे. ट्रेन वहां 5 मिनट के लिए रुकी और 11.20 पर चल दी. मानसी को अयोध्या कैंट में उतर कर आगे हनुमानगढ़ जाना था, लेकिन वह अयोध्या नहीं उतर पाई.

सरयू एक्सप्रेस रात 12 बजे अयोध्या जंक्शन पर पहुंची. यहां पर ट्रेन 2 मिनट के लिए रुकी. वहां अयोध्या के लगभग सभी यात्री ट्रेन से उतर गए, मगर मानसी वहां पर भी नहीं उतरी. सरयू एक्सप्रेस रात 12 बज कर 50 मिनट पर अपने आखिरी स्टेशन मनकापुर पहुंच गई, लेकिन मानसी यहां भी ट्रेन से नहीं उतरी.

मनकापुर रेलवे स्टेशन पर सरयू एक्सप्रेस करीब 2 घंटे रुकी. गाड़ी का इंजन भी बदला गया. ट्रेन दूसरे दिन सुबहसुबह 3 बज कर 5 मिनट पर दोबारा मनकापुर रेलवे स्टेशन से अयोध्या के लिए चल पड़ी. जब ट्रेन अयोध्या रेलवे स्टेशन पर पहुंची तो राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) के सिपाही अपने निर्धारित समय पर ड्यूटी के अनुसार ट्रेन में चढ़े.

जीआरपी के जवानों ने वहां पर एक हृदयविदारक दृश्य देखा. वे दृश्य को देख कर सन्न रह गए. उन्होंने देखा कि एक सीट के नीचे पुलिस वरदी में एक महिला तड़प रही थी. जीआरपी के सिपाहियों ने पहले उस का वीडियो बनाया और उस के तुरंत बाद अपने उच्चाधिकारियों को हादसे की सूचना दे दी.

आननफानन में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पर पुलिस अधिकारियों ने देखा कि घायल महिला के चेहरे पर चाकू के वार के कई घाव हैं. उस के माथे और गले पर धारदार हथियार के घाव थे. उस के शरीर पर केवल पुलिस की शर्ट थी, जबकि पैंट नीचे की ओर खिसकी हुई थी.

राजकीय रेलवे पुलिस, स्थानीय पुलिस और आरपीएफ के अधिकारियों ने मौका मुआयना कर बोगी में मौजूद एक भिखारी से दिखने वाले आदमी को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया जबकि वह मानसिक तौर पर सही हालत में नहीं दिख रहा था.

हाईकार्ट ने लिया स्वत:संज्ञान

यह खबर 31 अगस्त, 2023 की सुबह 4 बजे अयोध्या रेलवे स्टेशन पर जंगल की आग की तरह फैल गई. लोगों के बीच कानाफूसी होने लगी कि सरयू एक्सप्रेस की जनरल बोगी में सीट के नीचे एक महिला हैडकांस्टेबल खून से लथपथ पड़ी है. रेलवे पुलिस ने जांचपड़ताल की. सीट के नीचे फर्श पर खून ही खून फैला था. उस के पास से मिले आईडी से उस का नामपता मालूम हुआ.

साथ ही रेलवे पुलिस तुरंत मानसी को श्रीराम अस्पताल ले गई. वहां डाक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उसे मैडिकल कालेज के अस्पताल भेज दिया. डाक्टरों ने बुरी तरह से जख्मी मानसी की नाजुक हालत को देखते हुए उसे लखनऊ स्थित ट्रामा सेंटर में रेफर कर दिया. इस की जांच की जिम्मेदारी (रेलवे) पूजा यादव को सौंपी गई थी.

डाक्टरी जांच में यह पता चला कि मानसी बुरी तरह से दरिंदगी की शिकार हो चुकी थी. उन्होंने सबूत मिटाने के लिए उस पर जानलेवा हमला भी किया गया था. यह घटना पुलिस महकमे के लिए बेहद शर्मनाक और कमजोर साबित करने वाली थी. इसे देखते हुए ही मामले की जांच के लिए जीआरपी, आरपीएफ और एसटीएफ के अलावा पुलिस की दूसरी टीमों को भी लगा दिया गया था.

इसी बीच 31 अगस्त, 2023 को मानसी के भाई मनोज ने जीआरपी अयोध्या कैंट पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी. रिपोर्ट में उस ने दरिंदों को गिरफ्तार कर सख्त सजा देने की गुहार लगाई थी.

अयोध्या के जीआरपी थाने में हैडकांस्टेबल मानसी के भाई मनोज की तहरीर पर अज्ञात अपराधियों के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने, लोक सेवक पर हमला करने और जान से मारने की मंशा के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

इस मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इतना संवेदनशील समझा कि 3 सितंबर की रात में इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच बैठी. माननीय चीफ जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर द्वारा बैठाई गई बेंच ने भारतीय रेलवे और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया. साथ ही यूपी की योगी सरकार को सूबे की कानूनव्यवस्था के बिगडऩे को ले कर तीखी टिप्प्णी की और उसे दुरुस्त करने के साथसाथ हरसंभव महिला सुरक्षा देने के आदेश दिए.

हाईकोर्ट की इस सुनवाई के बाद भारतीय रेलवे से ले कर उत्तर प्रदेश सरकार तक सकते में आ गई. कारण सुनवाई के दौरान जांच से जुड़े किसी सीनियर अधिकारी को भी अदालत में पेश होने का हुक्म दिया गया था. इस संबंध में सुनवाई अगले रोज भी हुई. रेलवे की तरफ से जवाब दाखिल किया गया. कोर्ट में एसपी (रेलवे) पूजा यादव, सीओ और विवेचना अधिकारी पेश हुए.

पूजा यादव ने 3 दिनों के दरम्यान हुई जांच की विस्तृत जानकारी दी. साथ ही उन्होंने अदालत को बताया कि मानसी की स्थिति गंभीर बनी हुई है. इस कारण उस के बयान नहीं लिए जा सके हैं. उन्हें मानसी के होश में आने का इंतजार है.

यादव ने कोर्ट को यह आश्वासन दिया कि इस गंभीर मामले में आरोपियों की पहचान के लिए काररवाई की जा रही है. घटना की विस्तार से जांच और वर्कआउट के लिए कई टीमों का गठन किया गया है. जांच टीम के लिए अच्छी खबर वारदात के 6 दिन बाद तब मिली, जब डाक्टर ने पीडि़ता मानसी को खतरे से बाहर बताया. डाक्टरों ने उसे बचा लिया था, मगर वह बयान देने की स्थिति में नहीं थी. उसे बयान देने की स्थिति में आने में और 2 दिन लगने की संभावना थी.

मानसी ने होश आने पर अपने साथ हुई दरिंदगी के बारे में जो कुछ बताया, वह बेहद रोंगटे खड़े करने वाला था. उस ने बताया कि उस के साथ दरिंदगी करने वाले 3 लोग थे. उस ने उन दरिंदों से खुद को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन के द्वारा उस पर जानलेवा हमला कर दिया गया था. किसी ने सिर पर भी हमला कर दिया था, जिस से वह बेहोश हो गई थी. उस के बाद क्या हुआ, उसे कुछ नहीं पता.

अनोखे साइबर ठग : ट्रेजरी औफिसर बन उड़ाए करोड़ों

उत्तर प्रदेश के जिला बलिया के गांव मालदेपुर के रहने वाले राजकुमार उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा थे. उन की अधिकतर पोस्टिंग प्रयागराज जिले में ही रही, इसलिए वह शिवकुटी, प्रयागराज में ही अपने परिवार के साथ रह रहे थे. वह मार्च, 2023 में रिटायर हो गए थे.

रिटायर होने के बाद वह 18 मार्च, 2023 को अपनी पेंशन संबंधी मामले में प्रयागराज की कचहरी स्थित ट्रेजरी औफिस गए हुए थे. वहां ट्रेजरी अफसर अशोक कनौजिया से उन की औपचारिक मुलाकात हुई. कुछ गपशप और चाय पीनेपिलाने के बाद राजकुमार अपने घर वापस आ गए.

20 मार्च, 2023 की सुबह दरोगाजी राजकुमार के मोबाइल पर काल आई. उन्होंने काल रिसीव की, “हैलो कौन?”

दूसरी तरफ से आवाज आई, “गुडमार्निंग सर.”

“गुडमार्निंग…गुडमार्निंग.”

“मैं ने आप को पहचाना नहीं.”

“जी, मैं ट्रेजरी औफिस से बोल रहा हूं.”

“अरे, अशोक बाबू आप?ï अभी हमारी मुलाकात परसों ही औफिस में हुई थी.”

“जी… जी, बहुत खूब. ठीक पहचाना आप ने. मैं ट्रेजरी आफिसर अशोक बाबू ही बोल रहा हूं.”

“अरे साहब, भला मैं आप को और आप की आवाज को कैसे भूल सकता हूं.”

बातचीत का सिलसिला जारी रहा.

राजकुमार बोले, “बताएं सरजी, कैसे याद किया?”

दूसरी तरफ से आवाज आई, “अरे सर, हमारा तो काम ही है आप लोगों की सेवा. हमें अपने सभी पेंशनरों का खयाल रखना पड़ता है. आप ने अपनी पेंशन के सभी कागज जमा करा दिए थे न?”

“जी, वो तो करा दिए थे. क्यों? क्या कागजों में कोई कमी रह गई है?”

“हां दरोगाजी, कुछ आवश्यक जानकारी आप को मुझे देनी होगी, जिस से मैं आप की पेंशन की फाइल कंप्लीट कर दूं ताकि बीच में आप की पेंशन नहीं रुके. अब आप के पेंशन और खाते का दोबारा वेरीफिकेशन किया जाएगा.”

“अब जैसा कि मैं आप से पूछता जाऊं, आप बताते जाएं. आप की नियुक्ति पुलिस विभाग में फलां सन में दिनांक

इतने….इतने… को हुई थी, आप फलां फलां जनपद में पोस्टेड रहे हैं. आप फलां तारीख को रिटायर हुए हैं.”

“जी…अशोक बाबू आप के द्वारा पूछी व दी गई जानकारी एकदम सही है.”

ट्रेजरी औफिसर के पास राजकुमार की पुलिस विभाग में भरती से ले कर रिटायरमेंट सहित सभी जानकारी डेट बाई डेट फुल डिटेल के साथ थी.

ट्रेजरी औफिसर उन से बातचीत कर सारी जानकारी देते व लेते रहे, जहां राजकुमार को बात समझ नहीं आ रही थी, पास ही बैठे अपने भतीजे से बात करवा देते थे, क्योंकि उन का पेंशन संबंधी वेरीफिकेशन चल रहा था. बीचबीच में अंगरेजी के कई कठिन शब्द ट्रेजरी आफीसर द्वारा पूछ लिए जा रहे थे, जिन का जवाब उन का भतीजा दे रहा था और ट्रेजरी औफिसर द्वारा पूछे जा रहे सवालों से संतुष्ट था.

“राजकुमारजी, आप का वेरीफिकेशन पूरा हुआ. अभी आप के मोबाइल पर ओटीपी का मैसेज आएगा, ओटीपी नंबर मुझे बताइएगा. ताकि आप की हर महीने की पेंशन सुचारू रूप से आप के खाते में आ सके.”

ठगों के झांसे में फंसे दरोगाजी

इतना कह कर राजकुमार ने अपना मोबाइल फोन दोबारा अपने भतीजे को थमा दिया और बोले, “देखो बेटा, ये क्या पूछ रहे हैं? कैसा मैसेज आएगा ओटीपी वगैरह का. मुझे इन सब की विशेष जानकारी नहीं है, तुम्हीं सोचसमझ कर सारी चीजें बताओ.”

“अरे चाचाजी, इस में सोचनासमझना क्या है, ट्रेजरी औफिसर आप के दोस्त हैं न? आप उन से मिल भी चुके हैं, इन के द्वारा जो भी जानकारी अपडेट की जा रही है सब सही भी है, बस ओटीपी नंबर देना है.”

“हां…हां, ठीक है तो बता दे उन्हें, मुझे ये सब नहीं आता. इस के पहले कभी पूछा नहीं गया अब स्मार्टफोन का जमाना है, घर बैठे सब कुछ औनलाइन हो जाता है. फिर भी मैं इतना नहीं जानता हूं, तुम मुझ से ज्यादा स्मार्ट हो, सो तुम्हीं इन्हें बताओ. मुझे ओटीपी सोटीपी की नालेज नहीं है.”

बहरहाल, बात आईगई हो गई. भतीजे ने फोन करने वाले ट्रेजरी औफिसर अशोक कनौजिया को ओटीपी वगैरह बता दिए.

उस के ठीक एक दिन बीत जाने के बाद यानी 21 मार्च को रिटायर्ड एसआई राजकुमार के मोबाइल पर बैंक से मैसेज आया कि 9 लाख 98 हजार रुपया उन के खाते से निकल चुका है. अब राजकुमार का सिर घूमने लगा. उन्होंने सब से पहले ट्रेजरी औफिसर अशोक कनौजिया को फोन लगाया. उधर से आवाज आई, “हैलो कौन?

“अरे अशोक बाबू मैं, राजकुमार बोल रहा हूं.”

“हांहां, जी बताएं दारोगाजी?”

“अजी गजब हो गया, मेरे बैंक अकाउंट से 9 लाख 98 हजार रुपए निकल चुके हैं, जबकि मैं ने फूटी कौड़ी तक नहीं निकाली और न ही बैंक गया.”

“अरेअरे! तो इस में इतना घबराने वाली क्या बात है, मैं बस थोड़ी ही देर में पहुंच कर आप को सारी जानकारी देता हूं, आप निश्चिंत रहें.”

करीब आधे घंटे बाद उन के मोबाइल पर काल आई, “अरे राजकुमारजी, गलती से आप का पैसा दूसरे पेंशनर के खाते में चला गया. चिंता न करें, ऐसा तकनीकी खराबी के कारण हुआ. आप का सारा पैसा दोबारा एकदो दिन मैं आप के खाते में आ जाएगा.”

दरोगाजी की उड़ गई नींद

अभी एक दिन भी नहीं बीता था कि 22 मार्च को दोबारा 10 लाख 49 हजार रुपए उन के खाते से निकल गए. अब राजकुमार का सिर चकराने लगा. कुल मिला कर 3 दिन के अंदर उन के खाते से 20 लाख रुपए से ज्यादा निकाल लिए गए थे. उन्होंने फिर से आननफानन ट्रेजरी औफिसर को फोन लगाया और सारी बात बताई.

उधर से जवाब आया, “दारोगाजी, अभी मैं अपने गांव आया हूं, परसों प्रयागराज लौटूंगा तो देखता हूं कहां क्या मिस्टेक हो रही है. चिंता न करें आप, मैं वापस आते ही औफिस पहुंच कर सब कुछ ठीक कर दूंगा.”

राजकुमार की तो जैसे नींद उड़ गई थी. बात छोटीमोटीरकम की नहीं बल्कि 20 लाख से ज्यादा रुपयों की थी. लिहाजा अगले दिन ही राजकुमार प्रयागराज कचहरी डीएम औफिस कंपाउंड में स्थित कोषागार ट्रेजरी औफिस नियत समय से पहले ही पहुंच गए.

औफिस खुलते ही सीधे वह ट्रेजरी औफिसर अशोक कनौजिया के पास पहुंचे. दुआसलाम के बाद अशोक बाबू से बातचीत का सिलसिला जारी हुआ .

“अरे आइए, आइए बैठिए दरोगाजी, बताएं कैसे आना हुआ?”

इतना सुन कर राजकुमार बड़ी बुरी तरह चौंके, “आप भी अच्छा मजाक कर लेते हैं अशोक बाबू, एकएक पल की खबर है आप के पास और उलटे मुझ से ही पूछ रहे हैं कि कैसे आना हुआ?”

अब राजकुमार से ज्यादा चौंकने की बारी ट्रेजरी औफिसर की थी.

“कैसी बात कर रहे हैं दरोगाजी, किस खबर की बात कर रहे हैं आप?”

“अशोक बाबू, लगातार 3 दिन आप से बात हुई है. मेरे खाते से 20 लाख से ज्यादा रुपए निकल गए हैं, पूरी जानकारी आप ने फोन पर ली और दी, फिर भी पूछ रहे हैं. आप ने कहा था कि गांव से आने के बाद सब ठीक कर दूंगा, किसी दूसरे पेंशनर के खाते में आप का पैसा चला गया है.” राजकुमार ने एक सांस में कह दिया.

अब बुरी तरह से चौंकने की बारी अशोक बाबू समेत पूरे डिपार्टमेंट की थी. अशोक कनौजिया फौरन समझ गए कि दरोगाजी के साथ बहुत तगड़ा फ्रौड हुआ है. उन्होंने राजकुमार से वह मोबाइल नंबर लिया, जिस पर उन की बात होती थी, फिर अपना नंबर बताया और कहा, “दरोगाजी, न मेरी आप से फोन पर बात हुई और न ही मैं गांव गया था.”

“अब पूरी तरह विस्तार से बताएं, हुआ क्या है?”

साइबर ठगों ने उड़ाए 20 लाख

रुंधे गले से राजकुमार ने पूरी कहानी अशोक कनौजिया को बता दी, जिसे पूरा स्टाफ भी सुन रहा था. उन की सारी व्यथा सुनने के बाद बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि वह बहुत बड़ी धोखाधड़ी यानी साइबर क्राइम का शिकार हो चुके थे. फौरन उन के खाते को खंगाला गया तो वास्तव में 20 लाख रुपए 3 दिन के भीतर साइबर अपराधियों ने उन के खाते से गायब कर दिए थे.

अशोक कनौजिया ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा, “दरोगाजी, आप के पास मेरा मोबाइल नंबर था. एक बार चैक तो कर लेते. आप जैसे पढ़ेलिखे लोग वो भी पुलिस विभाग से रिटायर्ड, कैसे इतना बड़ा गच्चा खा गए? एक बार आ कर औफिस में कंफर्म तो कर लेते. पहली बार में ही आप को यहां आना चाहिए था, जब आप की 10 लाख रुपए की भारीभरकम रकम निकली थी. बड़े अफसोस की बात है, आप के जीवन भर की जमापूंजी एक छोटी सी नादानी के कारण आप के अकाउंट से साइबर ठग ने निकाल ली. आखिर कैसे इतना बड़ा धोखा हो गया आप से?”

“क्या बताऊं अशोक बाबू, जब मैं 38 मार्च को आप से मुलाकात कर के घर चला गया था, उसी के ठीक तीसरे दिन उस धोखेबाज का फोन आया था. उस की आवाज हूबहू आप की आवाज से मिल रही थी, मैं ने सोचा कि आप ही मुझ से बात कर रहे हैं. इसे इत्तेफाक और मेरा दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि उस के पास जैसे मेरा पूरा रेकौर्ड था. मैं ने आप को ही समझ कर पूरी जानकारी देता गया और वह इतने कौन्फीडेंस के साथ बात कर रहा कि सिर्फ मैं ही नहीं, परिवार के सभी सदस्य उस के झांसे में आ गए.”

ट्रेजरी औफिसर और स्टाफ ने राजकुमार को सांत्वना और ढांढस बंधाते हुए साइबर सेल थाने जा कर उस साइबर क्रिमिनल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. उस के खिलाफ मुकदमा लिखवाने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा था. सो लुटेपिटे और थकेहारे रिटायर्ड एसआई राजकुमार आईजी जोन औफिस स्थित साइबर क्राइम थाने पहुंचे, जहां उन की मुलाकात इंसपेक्टर राजीव कुमार तिवारी से हुई. रिटायर्ड एसआई राजकुमार ने उन्हें अपना परिचय देते हुए अपनी सारी व्यथा उन के सामने कह डाली.

साइबर क्राइम पुलिस आई हरकत में

इंसपेक्टर राजीव कुमार तिवारी ने राजकुमार से साइबर ठग का मोबाइल नंबर वगैरह नोट करते हुए आईपीसी की धारा 410, 420 के अलावा 66सी, डी आईटी ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया. चूंकि मामला पुलिस विभाग के एक रिटायर्ड एसआई का था, जिसे साइबर ठग ने नहीं बख्शा. काफी शातिर ठग था जिस का हर हाल में परदाफाश करना था, सो राजकुमार से बोले, “राजकुमारजी, आप की हरसंभव मदद की जाएगी. हम अपराधियों को पाताल से भी निकाल लेंगे, ये मेरा वादा है.”

साइबर थाने में इसी तरह का केस सितंबर 2022 में भी आया था. मूलरूप से चंदौली जिले के कांवरनाथ बलुआ निवासी भोला चौधरी भी उत्तर प्रदेश पुलिस में हैडकांस्टेबल थे. वह प्रयागराज के खुल्दाबाद में रहते हैं. उन के रिटायर होने के बाद उन के खाते से भी 15 सितंबर, 2022 को 10 लाख रुपए साइबर अपराधियों ने निकाल लिए थे. उन्होंने 16 सितंबर, 2022 को साइबर क्राइम थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

राजकुमार की तहरीर ले कर साइबर थाने के इंचार्ज राजीव तिवारी सीधे सीओ अतुल यादव के पास पहुंचे और रिटायर्ड एसआई राजकुमार के साथ हुए साइबर फ्रौड का पूरा मामला बयान किया. जिसे सुनने के बाद फौरन सीओ अतुल यादव ने अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए एक टीम गठित की.

इस टीम में थाना इंचार्ज राजीव कुमार तिवारी, एसआई अनुज कुमार तिवारी, राघवेंद्र कुमार पांडेय, हैडकांस्टेबल सत्येश राय, कांस्टेबल रूप सिंह, लोकेश पटेल, प्रदीप कुमार यादव, अनुराग यादव, मुसलिम खां को शामिल किया गया.

पीडि़त राजकुमार द्वारा उपलब्ध कराए गए फोन नंबर को ट्रैकिंग के लिए सर्विलांस पर लगा दिया गया. पुलिस ने उस नंबर पर काल करनी चाही तो कभी नाट अवेलेबल तो कभी नाट रीचेबल तो कभी आउट औफ नेटवर्क कवरेज एरिया बताया जा रहा था.

पुलिस ने उस फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर यह जांच की कि उस नंबर से किनकिन लोगों से संपर्क किया गया. जांच टीम ने यह भी पता लगा लिया कि रिटायर्ड एसआई राजकुमार के खाते से रकम किनकिन अकाउंट में ट्रांसफर की गई थी. जानकारी मिली कि वह रकम पश्चिम बंगाल के बैंक खाते में ट्रांसफर की गई थी. फिर वह वहां से दूसरे खातों में भेजी गई.

साइबर क्राइम ब्रांच की एक टीम पश्चिम बंगाल पहुंच गई. वहां जा कर पता चला कि जिन लोगों के खातों में यह ठगी की रकम ट्रांसफर की गई थी, वे बेहद गरीब थे. उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना बैंक अकाउंट नंबर 20 हजार रुपए महीना अंकित को किराए पर दे रखा है. उन्हें नहीं पता कि अंकित उन के अकाउंट में क्या करता है. पुलिस टीम को किराए पर बैंक अकाउंट देने की जानकारी मिली थी.

बहरहाल, पुलिस को उन खाताधारकों से पता चला कि अंकित नार्थ 24 परगना के बैरकपुर में रहता है. पुलिस को उस का फोन नंबर भी मिल गया, जिसे सर्विलांस पर लगवा दिया. अंकित की काल डिटेल्स से भी पुलिस को कई और संदिग्ध फोन नंबर मिले. करीब 3 महीने तक जांच टीम साइबर अपराधियों की तलाश में जुटी रही.

आखिर मई, 2023 के तीसरे सप्ताह में पुलिस को साइबर अपराधियों तक पहुंचने में सफलता मिल गई और इस केस के 5 शातिर साइबर अपराधियों को झारखंड से गिरफ्तार कर लिया गया.

साइबर अपराधियों के गैंग का हुआ खुलासा

पूछताछ के दौरान पता चला कि गिरफ्तार साइबर ठग अब्दुल मतीन उर्फ मार्टिन (35) निवासी बारा, जिला देवघर, झारखंड जोकि इस गैंग का सरगना था और उस के साथी 29 वर्षीय अंकित अग्रवाल निवासी अलीगोत महल सदर बाजार, बैरकपुर जिला नार्थ चौबीस परगना, पश्चिम बंगाल, 25 वर्ष का बशारत अंसारी निवासी ग्राम संथाली सिमरा, जिला देवघर, झारखंड, एस.के. जीशान (25 वर्ष) न्यू टेंगरा रोड, सर्कस एवेन्यू कोलकाता पश्चिम बंगाल, विजय प्रसाद (25 वर्ष) निवासी गोविंदा खटीक रोड, सर्कस एवेन्यू, कोलकाता पश्चिम बंगाल थे.

इन्होंने पुलिस अधिकारियों को बताया कि कैसे रिटायर्ड कर्मचारियों को ओपन सोर्स से औनलाइन जानकारी कर के मोबाइल फोन पर ट्रेजरी औफिसर बन कर फोन करते थे और घटना को अंजाम देने के लिए अपने फोन नंबरों को ट्रूकालर पर ट्रेजरी अधिकारी के नाम से अपडेट कर रखे थे.

इन का पहला टारगेट पेंशन खाताधारक को नौकरी से संबंधित पूरी जानकारी जैसे नियुक्ति दिनांक, रिटायरमेंट की तारीख वगैरह बता कर पहले विश्वास में लेना होता था. उन्हें विश्वास में लेने यानी शीशे में पूरी तरह उतारने के बाद पेंशन खातों को औनलाइन वेरीफिकेशन के नाम पर गोपनीय दस्तावेजों ओटीपी को रिमोट एक्सेसिंग ऐप (एनीडेस्क, टीमव्यूवर आदि) के माध्यम से प्राप्त कर के पेंशनर के एकाउंट से औनलाइन बैंकिंग ऐप को डाउनलोड और चालू कर के रकम निकाल लेते थे.

जब साइबर क्राइम थाने की टीम ने गहराई से जानकारी जुटाई तो पाया कि इस पूरे मामले में झारखंड और पश्चिम बंगाल का गैंग शामिल है. साइबर ठगों से बरामद प्रयोग में किए जाने वाले मोबाइल सिमकार्ड, एटीएम कार्ड और मोबाइल नंबरों को तेलंगाना पुलिस और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर जब सर्च किया गया तो पाया कि अभियुक्त अब्दुल मतीन और इस के गैंग के सदस्यों द्वारा 179 साइबर ठगी की वारदातें की गई हैं. पता चला कि करोड़ों रुपए की साइबर ठगी करने वाले इस गैंग के 12 लोग पहले ही विभिन्न राज्यों से गिरफ्तार हो चुके हैं. इस गैंग ने ज्यादातर पुलिस वालों को ही ट्रेजरी औफिसर बन कर ठगा.

जानकारी मिली कि साइबर गैंग के द्वारा पूरे देश में एक लंबे समय से रिटायर्ड कर्मचारियों से कई करोड़ रुपए की ठगी की गई है, जिस का मिलान अन्य प्रदेशों की जांच एजेंसियों से संपर्क स्थापित कर के किया जा रहा है. अभियुक्तों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बैंक खातों को पुलिस अधिकारियों ने फ्रीज करा दिया है और इस खेल में शामिल अन्य लोगों की तलाश की जा रही है.

पुलिस ने गिरफ्तार किए गए साइबर ठगों से 9 मोबाइल फोन, 15 एटीएम कार्ड, 11 प्रीएक्टिवेटेड सिम कार्ड, स्मार्ट घड़ी आदि बरामदकिए. 23 मई, 2023 को पुलिस मुख्यालय प्रैस कौन्फ्रैंस कर घटना का खुलासा किया. गिरफ्तार अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

रिटायर्ड कर्मी भी ऐसे बचें साइबर ठगों से

रिटायर्ड कर्मी ट्रेजरी फ्रौड से बचने के लिए इन टिप्स को ध्यान से समझें—

ट्रेजरी विभाग की तरफ से फोन कर के पेंशनर्स से कोई जानकारी नहीं मांगी जाती, इसलिए इस डिपार्टमेंट के नाम से कोई काल करे तो उसे रिसीव न करें. यदि किसी पेंशनर को ट्रेजरी विभाग के कर्मचारियों से संपके करना है तो वह फोन करने के बजाय सीधे कार्यालय आएं, ताकि ठगी न हो सके. फोन पर बात करते हुए बैंक से जुड़ा कोई काम न करें, इस के बजाय कोई दिक्कत हो तो सीधे बैंक या ट्रेजरी कार्यालय में जाएं.

साइबर क्रिमिनल कई बार पैसों के ट्रांसफर कराने के नाम पर वेरिफिकेशन कोड मांग लेते हैं, इसलिए फोन पर ऐसी बात कभी न करें. अगर किसी के पेंशन खाते में दिक्कत आ भी रही है तो इस के लिए फोन न करें, इस के बजाय कार्यालय में आ कर ही बात करें.

सभी पेंशनर अपने मोबाइल नंबर को बैंक अकाउंट से अपडेट रखें और एटीएम कार्ड का पासवर्ड समयसमय पर बदलते रहें. पेंशनर कभी भी बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड डिटेल्स, आधार कार्ड या कोई जानकारी किसी को भी न बताएं. रिटायर होने के बाद बैंक में जा कर भी अपनी निजी जानकारी खुल कर न बताएं वरना वहां मौजूद शख्स भी फरजीवाड़ा कर सकता है.

किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करें. ट्रेजरी फ्रौड से बचने के लिए जो रिटायर होने वाले अधिकारी व कर्मचारी हैं, वह किसी भी ट्रेजरी अधिकारी के फोन करने पर अपनी कोई भी गोपनीय जानकारी जैसे एटीएम पिन ओटीपी आदि शेयर न करें. वह फोन पर आए किसी भी लिंक पर क्लिक न करें, क्योंकि बैंक और ट्रेजरी औफिस से कोई भी जानकारी फोन के माध्यम से नहीं मांगी जाती है.

इस के बावजूद भी अगर फिर भी कोई इस तरह की साइबर ठगी का शिकार हो जाते हैं तो तत्काल 1930 पर काल करें तथा नजदीकी साइबर अपराध सेल या पुलिस थाने में संपर्कं करें.

—अतुल कुमार यादव

सीओ – साइबर क्राइम थाना, प्रयागराज