Love Story in Hindi : आखिर कब तक- धर्म के नाम पर दो प्रेमियों की बलि

Love Story in Hindi : राम रहमानपुर गांव सालों से गंगाजमुनी तहजीब की एक मिसाल था. इस गांव में हिंदुओं और मुसलिमों की आबादी तकरीबन बराबर थी. मंदिरमसजिद आसपास थे. होलीदीवाली, दशहरा और ईदबकरीद सब मिलजुल कर मनाते थे. रामरहमानपुर गांव में 2 जमींदारों की हवेलियां आमनेसामने थीं. दोनों जमींदारों की हैसियत बराबर थी और आसपास के गांव में बड़ी इज्जत थी.

दोनों परिवारों में कई पीढि़यों से अच्छे संबंध बने हुए थे. त्योहारों में एकदसूरे के यहां आनाजाना, सुखदुख में हमेशा बराबर की साझेदारी रहती थी. ब्रजनंदनलाल की एकलौती बेटी थी, जिस का नाम पुष्पा था. जैसा उस का नाम था, वैसे ही उस के गुण थे. जो भी उसे देखता, देखता ही रह जाता था. उस की उम्र नादान थी. रस्सी कूदना, पिट्ठू खेलना उस के शौक थे. गांव के बड़े झूले पर ऊंचीऊंची पेंगे लेने के लिए वह मशहूर थी.

शौकत अली के एकलौते बेटे का नाम जावेद था. लड़कों की खूबसूरती की वह एक मिसाल था. बड़ों की इज्जत करना और सब से अदब से बात करना उस के खून में था. जावेद के चेहरे पर अभी दाढ़ीमूंछों का निशान तक नहीं था. जावेद को क्रिकेट खेलने और पतंगबाजी करने का बहुत शौक था. जब कभी जावेद की गेंद या पतंग कट कर ब्रजनंदनलाल की हवेली में चली जाती थी, तो वह बिना झिझक दौड़ कर हवेली में चला जाता और अपनी पतंग या गेंद ढूंढ़ कर ले आता.

पुष्पा कभीकभी जावेद को चिढ़ाने के लिए गेंद या पतंग को छिपा देती थी. दोनों में खूब कहासुनी भी होती थी. आखिर में काफी मिन्नत के बाद ही जावेद को उस की गेंद या पतंग वापस मिल पाती थी. यह अल्हड़पन कुछ समय तक चलता रहा. बड़ेबुजुर्गों को इस खिलवाड़ पर कोई एतराज भी नहीं था. समय तो किसी के रोकने से रुकता नहीं. पुष्पा अब सयानी हो चली थी और जावेद के चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आने लगी थीं. अब जावेद गेंद या पतंग लेने हवेली के अंदर नहीं जाता था, बल्कि हवेली के बाहर से ही आवाज दे देता था.

पुष्पा भी अब बिना झगड़ा किए नजर झुका कर गेंद या पतंग वापस कर देती थी. यह झुकी नजर कब उठी और जावेद के दिल में उतर गई, किसी को पता भी नहीं चला. अब जावेद और पुष्पा दिल ही दिल में एकदूसरे को चाहने लगे थे. उन्हें अल्हड़ जवानी का प्यार हो गया था. कहावत है कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. गांव में दोनों के प्यार की बातें होने लगीं और बात बड़ेबुजुर्गों तक पहुंची.

मामला गांव के 2 इज्जतदार घरानों का था. इसलिए इस के पहले कि मामला तूल पकड़े, जावेद को आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया गया. यह सोचा गया कि वक्त के साथ इस अल्हड़ प्यार का बुखार भी उतर जाएगा, पर हुआ इस का उलटा. जावेद पर पुष्पा के प्यार का रंग पक्का हो गया था. वह सब से छिप कर रात के अंधेरे में पुष्पा से मिलने आने लगा. लुकाछिपी का यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चल सका. उन की रासलीला की चर्चा आसपास के गांवों में भी होने लगी.

आसपास के गांवों की महापंचायत बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि गांव में अमनचैन और धार्मिक भाईचारा बनाए रखने के लिए दोनों को उन की हवेलियों में नजरबंद कर दिया जाए. ब्रजनंदनलाल और शौकत अली को हिदायत दी गई कि बच्चों पर कड़ी नजर रखें, ताकि यह बात अब आगे न बढ़ने पाए. कड़ी सिक्योरिटी के लिए दोनों हवेलियों पर बंदूकधारी पहरेदार तैनात कर दिए गए. अब पुष्पा और जावेद अपनी ही हवेलियों में अपने ही परिवार वालों की कैद में थे. कई दिन गुजर गए. दोनों ने खानापीना छोड़ दिया था. आखिरकार दोनों की मांओं का हित अपने बच्चों की हालत देख कर पसीज उठा. उन्होंने जातिधर्म के बंधनों से ऊपर उठ कर घर के बड़ेबुजुर्गों की नजर बचा कर गांव से दूर शहर में घर बसाने के लिए अपने बच्चों को कैद से आजाद कर दिया.

रात के अंधेरे में दोनों अपनी हवेलियों से बाहर निकल कर भागने लगे. ब्रजनंदनलाल और शौकत अली तनाव के कारण अपनी हवेलियों की छतों पर आधी रात बीतने के बाद भी टहल रहे थे. उन दोनों को रात के अंधेरे में 2 साए भागते दिखाई दिए. उन्हें चोर समझ कर दोनों जोर से चिल्लाए, पर वे दोनों साए और तेजी से भागने लगे. ब्रजनंदनलाल और शौकत अली ने बिना देर किए चिल्लाते हुए आदेश दे दिया, ‘पहरेदारो, गोली चलाओ.’

‘धांयधांय’ गोलियां चल गईं और 2 चीखें एकसाथ सुनाई पड़ीं और फिर सन्नाटा छा गया.

जब उन्होंने पास जा कर देखा, तो सब के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. पुष्पा और जावेद एकदूसरे का हाथ पकड़े गोलियों से बिंधे पड़े थे. ताजा खून उन के शरीर से निकल कर एक नई प्रेमकहानी लिख रहा था. आननफानन यह खबर दोनों हवेलियों तक पहुंच गई. पुष्पा और जावेद की मां दौड़ती हुई वहां पहुंच गईं. अपने जिगर के टुकड़ों को इस हाल में देख कर वे दोनों बेहोश हो गईं. होश में आने पर वे रोरो कर बोलीं, ‘अपने जिगर के टुकड़ों का यह हाल देख कर अब हमें भी मौत ही चाहिए.’

ऐसा कह कर उन दोनों ने पास खड़े पहरेदारों से बंदूक छीन कर अपनी छाती में गोली मार ली. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि कोई उन को रोक भी नहीं पाया. यह खबर आग की तरह आसपास के गांवों में पहुंच गई. हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी. सवेरा हुआ, पुलिस आई और पंचनामा किया गया. एक हवेली से 2 जनाजे और दूसरी हवेली से 2 अर्थियां निकलीं और उन के पीछे हजारों की तादाद में भीड़. अंतिम संस्कार के बाद दोनों परिवार वापस लौटे. दोनों हवेलियों के चिराग गुल हो चुके थे. अब ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की जिंदगी में बच्चों की यादों में घुलघुल कर मरना ही बाकी बचा था.

ब्रजनंदनलाल और शौकत अली की निगाहें अचानक एकदसूरे से मिलीं, दोनों एक जगह पर ठिठक कर कुछ देर तक देखते रहे, फिर अचानक दौड़ कर एकदूसरे से लिपट कर रोने लगे. गहरा दुख अपनों से मिल कर रोने से ही हलका होता है. बरसों का आपस का भाईचारा कब तक उन्हें दूर रख सकता था. शायद दोनों को एहसास हो रहा था कि पुरानी पीढ़ी की सोच में बदलाव की जरूरत है. Love Story in Hindi

MP News : यह तूने क्या किया सोनू

MP News : जिस सोनू को भावना बेटे की तरह मानती थी और उसे घर के अंदर तक आने देती थी, उसी सोनू ने ऐसा कुछ क्या किया कि भावना को अंत में कहना पड़ा, ‘यह तू ने क्या किया सोनू…’

वक्त और तरहतरह के अनुभव भावना को दिनोंदिन मजबूत बनाते गए. अब से कोई 10 साल पहले जब उन के पति दरियाव वर्मा की एक हादसे में मौत हो गई थी तो भावना पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. वह मध्य प्रदेश के खरगौन जिले के कस्बा कसरावद स्थित एक सरकारी अस्पताल में नौकरी जरूर करती थी, लेकिन उस के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि वह अपने चारों बच्चों की परवरिश कैसे करे? पति अपने पीछे 3 बेटियां और एक बेटा छोड़ गए थे. भावना के साथ उस के नातेरिश्तेदार जो हमदर्दी दिखा रहे थे, उस में हमदर्दी कम, दिखावा ज्यादा लग रहा था.

लिहाजा वह समझ गई कि उसे जो भी करना है, अपने दम पर करना है. नौकरी के बाद उस ने अपना सारा ध्यान बच्चों की परवरिश और पढ़ाई पर लगा दिया. 5 सदस्यों वाले इस परिवार का गुजारा भावना की मामूली तनख्वाह से जैसेतैसे हो रहा था. उस के सामने जब कोई बड़ा खर्चा आ जाता तो वह इधरउधर से मदद ले लेती थी. इस के बाद उसे जैसे ही तनख्वाह मिलती, वह कर्ज निपटा देती. चूंकि वह सरकारी कर्मचारी थी और नीयत की साफ थी, इसलिए जरूरत पर हर कोई उसे पैसे उधार दे देता था. भावना की सब से बड़ी चिंता उस की 3 बेटियां थीं, जो देखतेदेखते बड़ी हो रही थीं.

उसे उन की शादियों की चिंता सता रही थी. वह सोचती थी कि बेटियों की शादी के बाद वह एकलौते बेटे अभिषेक (बदला नाम) के साथ रहेगी. वह उसे अपने बुढ़ापे की लाठी समझती थी. भावना ने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए थे. उस की तीनों बेटियां बेहद शरीफ और समझदार थीं. यही वजह थी कि कसरावद में लोग उस की बेटियों की मिसालें देते थे. इस से भावना का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता था. अपनी तपस्या उसे सफल होती नजर आ रही थी. लेकिन एक दिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि उस का आत्मविश्वास डोल गया. उस के बेटे अभिषेक का एक दोस्त था आशिक उर्फ सोनू. बचपन का दोस्त होने की वजह से सोनू का उस के घर आनाजाना आम बात थी.

भावना उसे बेटे का दोस्त नहीं, बल्कि बेटे जैसा ही मानती थी. एक तरह से वह परिवार के सदस्य की तरह था. उस पर उस की बेटियां भी पूरा भरोसा करती थीं. वह एक धनाढ्य परिवार का लड़का था, जिस से उस की जेबों में हमेशा अच्छेखासे पैसे रहते थे. कई मौके ऐसे भी आए, जब जरूरत पड़ने पर सोनू ने उस की मदद की थी. भावना की सब से छोटी बेटी थी दर्शना, जिस की उम्र 17 साल हो गई थी. दर्शना पढ़ने में होशियार थी और जीवन के प्रति गंभीर भी थी. वह जानती थी कि मां किन स्थितियों से जूझते हुए चारों बच्चों की परवरिश कर रही है. कमउम्र में ही दर्शना ने फैसला कर लिया था कि वह खूब मन लगा कर पढ़ाई करेगी और अच्छी सी नौकरी हासिल करेगी, जिस से वह मां की हर तरह से मदद कर सके. वह कसरावद के कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 10वीं कक्षा में पढ़ती थी.

पिता की मौत के समय दर्शना 7 साल की थी. सोनू उस समय भी उस के घर आताजाता था. वह दर्शना के साथ खूब खेलता था. दर्शना भी भाई का दोस्त होने के नाते उसे भाई जैसा मानती थी. समय के साथ दर्शना बड़ी होती गई. देखते ही देखते उस के शरीर में परिवर्तन तो हुए ही, साथ ही बुद्धि भी व्यावहारिक हो गई. 14 की होतेहोते दर्शना के सौंदर्य में काफी निखार आ गया. सोनू दर्शना में आ रहे तमाम बदलावों का गवाह था, लेकिन पिछले 2-3 सालों से वह जब भी दर्शना को देखता था, उस के दिल में कुछकुछ होने लगता था. खुद में आ रहे बदलावों से बेखबर दर्शना पहले की ही तरह उस के सामने पड़ती. उस के सामने पड़ते ही सोनू का हलक सूखने लगता था और जुबान जैसे लड़खड़ाने सी लगती थी.

वह खुद को स्वाभाविक और सामान्य दिखाने की कोशिश करता था, ताकि कोई उस के ऊपर शक न कर सके. दरअसल सोनू मन ही मन उसे चाहने लगा था. चौबीसों घंटे उस के दिलोदिमाग में दर्शना ही घूमती रहती थी. सोनू का झुकाव इस परिवार के प्रति दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था. अब वह पहले से ज्यादा भावना की आर्थिक मदद करने लगा था. भावना को उस से आर्थिक मदद लेने में संकोच तो होता था, लेकिन सोनू हर बार उसे असमंजस में देख कर यही कहता था, ‘‘आंटी, क्या मैं आप का बेटा नहीं?’’

सोनू की यह बात उसे निरुत्तर कर देती थी. चूंकि वह स्वाभिमानी थी, इसलिए सोनू की पाईपाई वापस कर देती थी. पिछले कुछ दिनों से सोनू की भावनाएं, नीयत और ईमान बदल रहा है, इस बात को वह भांप नहीं सकी. उसी का नतीजा था कि सोनू उस के लिए भोलाभाला मासूम नहीं, बल्कि राक्षस बन गया था. जिस के पंजे में वह फंसी हुई महसूस कर रही थी. पिछले साल होली के आसपास की बात थी. सोनू अभिषेक के घर गया तो दर्शना अकेली थी. उसे लगा कि आज दिल की बात अपनी माशूका पर जाहिर कर देनी चाहिए. फिर ऐसा सुनहरा मौका जाने कब मिले. लिहाजा उस ने हिम्मत जुटाते हुए दर्शना की कलाई पकड़ कर कहा, ‘‘आई लव यू दर्शना.’’

इस अप्रत्याशित पेशकश से दर्शना घबरा गई. कुछ पल तो उस की समझ में ही नहीं आया कि सोनू क्या कर रहा है और वह उस की बात का जवाब दे या नहीं. दर्शना के चुप रहने से सोनू की अंगुलियां उस के शरीर पर रेंगने लगीं. एक नादान नौसिखिया आशिक इस से ज्यादा जानतासमझता भी नहीं था. वह इस बात को नहीं जानता था कि प्यार एक हसीन जज्बा है. जिस्म की जरूरत जैसी बातों से उस का कोई वास्ता नहीं होता. उस की अंगुलियां दर्शना के नाजुक अंगों पर आतीं, उस के पहले ही दर्शना ने झटके से सोनू का हाथ पकड़ लिया और उस से दूर जा खड़ी हुई.

गहरी सांसें लेते हुए दर्शना ने खुद पर काबू पाया तो उस का आत्मविश्वास भी लौट आया. उस ने जम कर सोनू को लताड़ लगाई. सोनू को इस की उम्मीद नहीं थी. वह तो सोच रहा था कि जो आग उस के जिस्म और दिल में लगी है, वही दूसरी तरफ भी लगी होगी. दर्शना के तेवर देख कर सोनू अपना सा मुंह लिए वापस चला गया. दर्शना की हालत और ज्यादा अजीब थी. सोनू अभी जो कह और कर गया था, उस के मायने वह समझती थी. वह जानती थी कि अगर उस ने सोनू की हरकत छिपाई तो उस के हौंसले और बढ़ेंगे. मुमकिन है कि बाद में लोग उसे ही गलत समझने लगें. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह मां को सब कुछ बता देगी.

भावना अस्पताल की ड्यूटी कर के वापस आई तो दर्शना ने सारी बात उसे बता दी. भावना को लगा मानो किसी ने उसे आसमान से जमीन पर पटक दिया है. सोनू से उसे ऐसी उम्मीद सपने में भी नहीं थी. 19-20 साल के एक नौजवान की मदद और एहसान के मायने उसे अब समझ में आ रहा था, साथ ही अपने लाचार होने का भी अहसास हो रहा था. सामान्य होने के बाद उस ने तय किया कि चुप रहने से काम नहीं चलेगा. उस ने उसी समय सोनू को फोन कर के बुला लिया. भावना का फोन आते ही सोनू समझ गया कि भावना ने उसे क्यों बुलाया है. गलती करने के बावजूद वह दर्शना के घर जा पहुंचा. लेकिन इस बार उस का सिर अहसानों के गुरूर से उठा हुआ नहीं, बल्कि शर्म से झुका हुआ था.

भावना ने उसे नजरें गड़ा कर देखा तो वह और सकपका उठा. सोनू को सामने देख कर भावना उस की उतनी सख्त और तल्ख आवाज में खिंचाई नहीं कर पाईं, जितनी उस के आने से पहले मन ही मन सोच रही थी.

‘‘सोनू, मैं हमेशा तुम्हें बेटे की तरह मानती रही. इस के बावजूद तुम ने जो किया, वह सही नहीं था. तुम्हें अपने किए पर शरम आनी चाहिए.’’ खीझ और आवेग में भावना कांपती आवाज में बोली. सोनू को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि उस के साथ इतनी नरमी से बात की जाएगी. वह सिर झुकाए उसी तरह खड़ा रहा. बात को यहीं खत्म करने के अंदाज मेंभावना ने कहा, ‘‘जो हुआ सो हुआ, अब यह मसला यहीं खत्म हो जाना चाहिए.’’

भावना की बात खत्म होते ही सोनू शांत और गंभीर आवाज में बोला, ‘‘आंटी, मैं दर्शना को बहुत प्यार करता हूं और उस से निकाह करना चाहता हूं.’’

सोनू की बात सुन कर भावना की रूह तक कांप उठी. उस के मन में आया कि वह उसे खरीखोटी सुना कर उसी समय घर से भगा दे. लेकिन बदनामी के डर से वह कोई बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहती थी. उस की बात से वह इतना तो समझ गई थी कि यह लड़का सीधे नहीं मानेगा. इस के बावजूद वह अपने गुस्से को काबू में रख कर संयत स्वर में बोली, ‘‘यह नामुमकिन है, तुम जानते हो कि हमारे तुम्हारे बीच कितने और कैसेकैसे फासले हैं.’’

पर सोनू अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ. भावना ने उसे समझाया, ‘‘तुम मुसलमान हो और दर्शना अभी नाबालिग है. इस के अलावा मेरे सिर पर और 2 लड़कियों की शादी की जिम्मेदारी है. जिस समाज में हम रहते हैं, वह इसे कतई मंजूर नहीं करेगा.’’

सोनू ने उस की बात नहीं मानी और साफसाफ कह दिया कि वह दर्शना को नहीं भूल सकता. नरमी से बात न बनते देख भावना को गुस्सा आ गया. उस ने सोनू को धमकाते हुए कहा, ‘‘निकल जाओ यहां से और अब कभी इस घर में पांव भी मत रखना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

बहरहाल, उस दिन सोनू वहां से चला तो गया, लेकिन जातेजाते कह गया कि वह दर्शना को हरगिज नहीं छोड़ेगा. इस तरह जातेजाते वह दर्शना और भावना की नींद और चैन लेता गया. दर्शना जब भी उसे दिखती, उस का दिल बल्लियों उछलने लगता. पर मायूसी उस वक्त होती, जब वह नफरत से मुंह फेर लेती. यह बात उसे बड़ी बुरी लगती थी. दर्शना के प्रति चाहत ने सोनू की नींद और चैन उड़ा दिया था. दिनरात, सुबहशाम उसे हर जगह दर्शना ही दर्शना नजर आती थी. सोनू को उम्मीद थी कि जीत उस के प्यार की ही होगी. एक दिन भावना आंटी उसे बुला कर कहेंगी,‘ तेरा प्यार सच्चा था और तू जीत गया. अब मैं दर्शना का हाथ तेरे हाथ में देती हूं.’ लेकिन उस की यह उम्मीद उम्मीद ही बन कर रह गई.

भावना की सख्ती की वजह से दर्शना ने घर से निकलना कम कर दिया था. सोनू उस की याद में परेशान रहने लगा. इसी तरह 2 महीने बीत गए. अपना गम भुलाने के लिए सोनू शराब पीने लगा और नशे की झोंक में अपने यारदोस्तों से भी अपनी माशूका दर्शना का जिक्र सरेआम करने लगा. इस का नतीजा यह हुआ कि मोहल्ले में यह बात फैल गई. इस से दर्शना की बदनामी होने लगी. वैसे भी मजहबी तौर पर कसरावद एक संवेदनशील इलाका है, जहां जबतब हिंदूमुसलिम झड़पें होती रहती हैं. लिहाजा सोनू की बातों को एक वर्ग विशेष के लोगों ने गंभीरता से लेते हुए आपत्ति जतानी शुरू कर दी. ये बातें कोई दूसरा रूप न ले लें, इसलिए नियाज अली ने अपने इश्कजादे बेटे सोनू को खरगौन भेज दिया.

न चाहते हुए भी सोनू पिता के कहने पर कसरावद से खरगौन चला तो गया, लेकिन वहां उस का मन नहीं लगा. वहां वह इस तरह छटपटा रहा था, जैसे उस की आत्मा कसरावद में ही रह गई है. पारिवारिक अंकुश न रह जाने की वजह से वह अब पहले से ज्यादा शराब पीने लगा था. नशे में वह दर्शना को हासिल करने के तरीकों पर सोचा करता था. कसरावद में तो स्कूल या कोचिंग आतेजाते दर्शना उसे दिख जाती थी, लेकिन खरगौन आ कर तो यह सुख भी छिन गया था. किसी भी आदमी की जब यह स्थिति हो जाती है तो वह सोचनेसमझने की ताकत खो बैठता है. यही हाल सोनू का भी था. ऐसी स्थिति में एक खतरनाक खयाल उस के जेहन में आया.

दर्शना रोज की तरह 12 अक्टूबर, 2014 को शाम 6 बजे कसरावद के मोहल्ला शाहबाद स्थित कोचिंग सैंटर से पढ़ कर बाहर निकली. वह सिर झुकाए सीधे अपने घर की ओर चली जा रही थी. 5-6 मिनट में वह मंडी रोड वाली मसजिद के सामने पहुंची थी कि तभी तेज गति से पीछे की तरफ से आती एक मोटरसाइकिल उस के पास रुक गई. उस ने बाइक पर पीछे बैठे शख्स को देखा तो सहम गई. चेहरे पर रूमाल बांधे उस शख्स को वह पहचान गई. वह कोई और नहीं, आशिक उर्फ सोनू था. उस की नजरों से लग रहा था कि उस के इरादे नेक नहीं हैं.

डर के मारे उस के हाथों से कापीकिताबें छूट कर जमीन पर गिर गईं. वह वहां से भागी और खुद को महफूज करने के लिए एक मकान का दरवाजा खटखटाने लगी. वह मकान मुबारक खान का था.

खटखटाने की आवाज सुन कर अंदर से एक जनाना आवाज आई, ‘‘कौन है, आती हूं.’’

लेकिन दरवाजा खुल पाता, उस के पहले ही सोनू दौड़ कर उस के पास आया और अंटी से कट्टा निकाल कर गोली सीधे दर्शना के सिर पर दाग दी. मुबारक खान की पत्नी ने दरवाजा खोला तो चौखट पर दर्शना पड़ी थी. वह उसे पहचान गईं. दर्शना शायद बेहोशी की हालत में थी. कुछ ही देर में वहां तमाम लोग जमा हो गए. उन्होंने दर्शना के घर वालों को खबर करने के साथ इलाज के लिए उसे उसी सरकारी अस्पताल ले गए, जहां उस की मां भावना काम करती थी. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है और दर्शना को हुआ क्या है? उस की गंभीर हालत को देखते हुए उसे कसरावद के अस्पताल से जिला अस्पताल खरगौन के लिए रैफर कर दिया गया.

लेकिन अस्पताल पहुंचते ही दर्शना की मौत हो गई. इसी बीच खबर पा कर पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई थी. अब तक सभी लोग इसे सड़क दुर्घटना मान कर चल रहे थे, लेकिन खरगौन अस्पताल में उस के सिर के घाव की जांच की गई तो उस की मौत की असल वजह सामने आ गई. क्योंकि सिर पर गोली का निशान था.

खरगौन के एसपी अमित सिंह भी अस्पताल पहुंच गए थे. उन्होंने सदमे में डूबी भावना को बताया कि उन की बेटी की मौत एक्सीडेंट से नहीं, बल्कि गोली लगने से हुई है. इतना सुनते ही भावना के मुंह से निकला, ‘‘यह तू ने क्या किया सोनू.’’

बाद में भावना ने पूरी बात पुलिस को बता दी. लोगों को जब पता चला कि मुसलिम युवक सोनू ने दर्शना की हत्या की है तो दूसरे वर्ग के लोगों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. इस से पुलिस प्रशासन घबरा गया. एसपी अमित सिंह ने कसरावद के टीआई गिरीश जेजुकर और एसडीओपी सुनील लाली को सोनू उर्फ आशिक को जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए. पुलिस सोनू को गिरफ्तार करने उस के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. तब एसपी के आदेश पर जिले के समस्त थाना क्षेत्रों में नाकेबंदी कर दी और सारे टोल नाकों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए. तब कहीं रात 2 बजे हत्यारे आशिक को सनावद से पकड़ा जा सका.

सोनू के साथ उस के साथी गुरू उर्फ भूरे को भी गिरफ्तार कर लिया गया था. सोनू से पूछताछ करने के बाद लकी उर्फ शुभम गुप्ता को भी धर दबोचा गया. लकी सोनू का दोस्त था और उसी ने हत्या में इस्तेमाल की गई बाइक सोनू को दी थी. पूछताछ कर के पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. MP News

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Best Hindi Story : नादानी में प्राय: गलतियां हो जाती हैं, कभीकभी उन गलतियों का खामियाजा भी उठाना पड़ता है. गार्गी के साथ भी ऐसा ही हुआ. लेकिन एक पैर गंवा कर उसे रिश्तों और संबंधों का महत्त्व पता चल गया. आखिर ऐसा क्या हुआ था उस की…

तेजी से आई एक कार झटके से त्रिवेणी अस्पताल के सामने रुकी, कार का दरवाजा खोल कर जल्दी से 3-4 लोग उतरे. उन में से 25-26 साल का एक युवक लगभग दौड़ता हुआ अस्पताल के अंदर गया, बाकी लोग एक युवती को कार से बाहर निकालने लगे. युवती को कार से निकालते देख अस्पताल के गेट पर खड़े लोगों ने उत्सुकतावश कार को घेर लिया. तभी अस्पताल के अंदर गया युवक कंपाउंडर के साथ स्ट्रेचर ले कर आया. युवती को जल्दी से स्ट्रेचर पर लिटा कर सभी उसे ले कर औपरेशन थिएटर की ओर भागे.

दुर्घटना में युवती का एक पैर पूरी तरह नष्ट हो चुका था. देख कर ही लग रहा था कि पैर घुटनों से काटना पड़ेगा. खून से लथपथ जींस में लिपटा वह पैर घुटने के पास से एकदम झूल गया था. बाकी शरीर में कहीं खरोंच तक नहीं आई थी. युवती को उठा कर लाने में उस के बाल खुल गए थे. टीशर्ट भी अस्तव्यस्त हो गई थी. जिस से उस के अंग झलक रहे थे. उसे अंदर लाने वाले युवक ने देखा तो अपनी शर्ट उतार कर उस के ऊपर डाल दी. औपरेशन थिएटर में ले जाते समय वह बेहोश थी. इस बीच डा. ऋतुल त्रिपाठी आ गए थे. युवती की ओर देखे बगैर उन्होंने स्टाफ से औपरेशन की तैयारी करने को कहा. औपरेशन की तैयारी होने लगी. युवती बेहोश थी, फिर भी वह पीड़ा से छटपटा रही थी.

कंपाउंडर ने एक इंजेक्शन लगाया, तब उस का शरीर शांत हुआ. तब तक डा. सिद्धार्थ राय भी आ गए. उन्होंने एनेस्थेसिया का इंजेक्शन दिया, फिर औपरेशन शुरू हुआ. अभी तक युवती के घरपरिवार से कोई नहीं आया था. साथ आए लोगों में से एक युवक ने कहा, ‘‘लड़की भले घर की लगती है. देखा नहीं, उस का चेहरा दूध की तरह सफेद है. यह किसी खानदानी रईस परिवार की है.’’

‘‘कपड़ों से लगता है, परिवार भी काफी मौडर्न है. पता नहीं क्यों, इस के घर से कोई आया नहीं?’’ बगल में खड़े आदमी ने कहा.

‘‘घर वालों को पता चलेगा तब तो आएंगे. हम लोगों ने तो अपना धर्म निभा दिया. अब आगे क्या होगा, वह डाक्टर के हाथ में है. यह बचती है या मरती है, डाक्टर जानें या ऊपर वाला. इस के घर वाले आएं न आएं, उन की मरजी. अगर इस का पैर काटना पड़ा तो इस की जिंदगी खराब हो जाएगी.’’ वहीं बैठे एक बुजुर्ग ने कहा.

तभी भाग कर स्ट्रेचर लाने वाले युवक ने आ कर कहा, ‘‘भाइयों, मदद के लिए बहुतबहुत धन्यवाद. आप लोग चाहें तो जा सकते हैं.’’

‘‘अरे भाई धन्यवाद किस बात का. तुम भी तो हमारी तरह हो. युवती तुम्हारी कोई रिश्तेदार तो है नहीं?’’

युवक ने कोई जवाब नहीं दिया. धीरेधीरे एकएक कर के सभी चले गए. सब के जाने के बाद उस युवक ने युवती के पास मिले मोबाइल को जेब से निकाला. मोबाइल बंद था. उस ने उसे हथेली से साफ कर के चलाने की कोशिश की. संयोग से वह चल गया. कौन्टैक्ट लिस्ट खोल कर वह नाम देखने लगा. तभी कंपाउंडर ने आ कर पूछा, ‘‘सर, आप का नाम?’’

‘‘नील रत्न.’’

कंपाउंडर ने एक फौर्म उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लीजिए,  इस पर साइन कर दीजिए.’’

‘‘औपरेशन चालू होने के बाद साइन करवा रहे हो?’’ नील ने पूछा.

‘‘जी सर, इमरजेंसी केस में ऐसा ही होता है. अब दुर्घटना के किसी भी मामले में पुलिस केस की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं.’’ कंपाउंडर ने कहा.

‘‘ओके…ओके.’’ कह कर नील ने फौर्म पर साइन कर दिए.

कंपाउंडर चला गया तो नील फिर कौन्टैक्ट लिस्ट देखने लगा. पहला ही नंबर अक्कू डार्लिंग के नाम से सेव था. नील को लगा, आकाश शायद लड़की का बौयफ्रैंड रहा होगा. उस ने अक्कू को फोन किया, ‘‘हैलो.’’

‘‘हां, कौन?’’

‘‘आप आकाश बोल रहे हैं?’’

‘‘हां, मैं आकाश ही बोल रहा हूं, आप कौन?’’

‘‘मैं नील बोल रहा हूं. एक लड़की का एक्सीडेंट हो गया है, जिसे मैं अस्पताल ले आया हूं. अभी तक उस के घर से कोई नहीं आया है. शायद उन्हें सूचना नहीं मिली होगी. लड़की के मोबाइल में पहला नंबर आप का ही है. इसीलिए आप को बताने के लिए फोन किया है.’’

‘‘सौरी ब्रदर, रांग नंबर. मैं ने तो हाल ही में यह नंबर लिया है.’’ कह कर आकाश ने फोन काट दिया.

नील के मन को चैन नहीं पड़ा. इसलिए उस ने दूसरा नंबर देखना शुरू किया. उस ने ‘पी’ अक्षर पर देखा, पर उसे जो चाहिए था, वह नहीं मिला. ‘एम’ पर देखा, वहां भी असफलता ही मिली. पापा या मम्मी किसी का नंबर नहीं मिला. इसी तलाश में उसे एक नाम नियति दिखाई दिया. शायद यह लड़की की फ्रैंड होगी, सोच कर उस ने नियति को फोन मिला दिया. घंटी जाते ही फोन रिसीव हो गया. दूसरी ओर से कहा गया

‘‘हां, बोल गार्गी.’’

‘‘जी, मैं नील बोल रहा हूं. गार्गी का एक्सीडेंट हो गया है.’’

‘‘कब और कहां? आप कौन?’’

‘‘नियतिजी, आप मुझे नहीं जानतीं. मैं तो गार्गी को जानता भी नहीं. आप ने फोन उठाते ही गार्गी का नाम लिया, इसलिए मुझे पता चल गया कि दुघर्टना में जो घायल हुई है, उस का नाम गार्गी है.’’

‘‘अच्छा तो आप डाक्टर बोल रहे हैं?’’

‘‘जी नहीं, मैं गार्गी को अस्पताल लाने वालों में एक हूं.’’

‘‘आप ने आकाश को फोन क्यों नहीं किया?’’

नियति ने आकाश का नाम लिया तो नील कोे धक्का सा लगा. इस का मतलब वही आकाश था, जिस ने रौंग नंबर कह कर फोन काट दिया था. कोई जवाब न पा कर नियति ने दोबारा पूछा, ‘‘आप ने आकाश को फोन किया?’’

‘‘किया था, लेकिन उस ने रौंग नंबर कह कर फोन काट दिया.’’

‘‘मुझे पता था कि साला हरामी है. पर गार्गी ने मेरी सुनी कहां.’’ नियति बड़बड़ाई.

नील को चिंता होने लगी, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘मैं कुछ समझा नहीं?’’

‘‘आप और गार्गी किस अस्पताल में हैं?’’

‘‘सेक्टर 22 वाले त्रिवेणी अस्पताल में.’’

‘‘सेक्टर 22 वाले..?’’ नियति ने पूछा.

‘‘जी.’’

‘‘डाक्टर त्रिपाठी..?’’ नियति को धक्का सा लगा.

‘‘आप जरा भी चिंता मत कीजिए. डाक्टर साहब बहुत अच्छे हैं. उन्होंने बिना पैसे लिए औपरेशन शुरू कर दिया है. अगर आप गार्गी के घर वालों को ले कर आ जाएं तो…’’ नील इतना ही कह पाया था कि मोबाइल बंद हो गया.

नील अस्पताल के वेटिंग रूम में बैठ कर नियति का इंतजार करने लगा. थोड़ी देर में औपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला तो स्ट्रेचर पर गार्गी को निकाला जा रहा था. पीछेपीछे डाक्टर भी निकल रहे थे. नील ने लगभग दौड़ते हुए डाक्टर के पास जा कर पूछा, ‘‘डाक्टर साहब अब गार्गी कैसी है?’’

डा. त्रिपाठी ने उस का कौलर पकड़ कर लगभग झकझोरते हुए बोले, ‘‘तू मेरे हर काम में टांग अड़ाने क्यों चला आता है.’’

डा. त्रिपाठी के इन शब्दों से नील को लगा जैसे अस्पताल की पूरी इमारत उस के सीने पर गिर पड़ी हो. डा. त्रिपाठी दांत पीसते हुए अपने चैंबर की ओर चले गए. उस के साथ डाक्टर ने ऐसा व्यवहार क्यों किया, नील समझने की कोशिश कर रहा था कि नियति आ गई. नील को आईसीयू के आगे बैठा देख कर उस ने पूछा, ‘‘आप, मिस्टर नील?’’

‘‘जी.’’

‘‘मैं नियति, ’’ कह कर उस ने अपना दाहिना हाथ आगे किया तो नील ने हाथ मिलाते हुए कहा, ‘‘औपरेशन तो हो गया, पर…’’

‘‘पर क्या..?’’ नियति ने घबरा कर पूछा तो नील ने डाक्टर त्रिपाठी के व्यवहार के बारे में बताया.

नियति ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘देखिए मिस्टर नील… ’’

‘‘प्लीज आप मुझे केवल नील ही कहिए,’’ नील बीच में बोल पड़ा.

‘‘हां तो नील, यह डाक्टर त्रिपाठी ही गार्गी के हसबैंड हैं.’’

‘‘क्या?’’ नील की आंखें फैल गईं.

‘‘जी, यही सच है.’’

‘‘तो फिर आकाश कौन है? उस ने ऐसा क्यों कहा? रौंग नंबर का क्या मतलब?’’ नील ने एक साथ कई सवाल कर डाले.

‘‘आकाश गार्गी का दूसरा पति है. और डा. त्रिपाठी ने तुम्हें शायद आकाश ही समझा है. क्योंकि उन्होंने कभी आकाश को देखा नहीं है.

‘‘ओह, आई सी.’’ नील को एक बार फिर धक्का सा लगा, ‘‘यह भी कैसा संयोग है. एक्सीडेंट होने पर गार्गी अपने पूर्व पति के ही अस्पताल में आई.’’

‘‘सब संयोग की ही बात है.’’ नियति की आंखों में चमक सी आई.

‘‘आप गार्गी के घर वालों को तो बता दीजिए.’’ नील ने कहा.

‘‘कोई फायदा नहीं है. उस के घर वाले नहीं आएंगे. वह मर जाए, तब भी नहीं आएंगे.’’ कह कर नियति ने सिर झुका लिया.

‘‘क्यों नहीं आएंगे? बेटी की यह हालत है. ऐसे में भला घर वाले क्यों नहीं आएंगे?’’ नील ने हैरानी से पूछा.

‘‘गार्गी एक धार्मिक संस्कारी ब्राह्मण परिवार की बेटी है. जब वह कालेज में पढ़ रही थी, तभी उसे आकाश से प्यार हो गया था. वह यह बात घर में नहीं बता सकी, क्योंकि आकाश उस की जाति का नहीं था. घर वालों ने डा. त्रिपाठी से उस की शादी कर दी. डा. त्रिपाठी उसे बहुत प्यार करते थे. वह एक अच्छे  पति थे. उन का यह अपना अस्पताल है. उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. पर गार्गी आकाश को भुला नहीं पाई और शादी के 2 महीने बाद उस ने भाग कर आकाश के साथ शादी कर ली.

‘‘डा. त्रिपाठी फ्रैंडली और खुले दिमाग के थे, इसलिए उन्होंने मुकदमा वगैरह कुछ नहीं किया. उन्होंने गार्गी के घर वालों से भी कुछ नहीं कहा. पर इकलौती बेटी ने समाज में नाक कटा दी थी, इसलिए गार्गी के पिता रामनारायण शास्त्री के लिए वह उसी दिन मर गई थी.’’

‘‘ओ माई गौड.’’ नील को गार्गी की कहानी फिल्मों जैसी लगी, पर हकीकत यही थी.

थोड़ी देर में कंपाउंडर नील और नियति को गार्गी के पास ले गया. गार्गी को देख कर नियति रो पड़ी. उस का एक पैर घुटनों से काट दिया गया था. कटा पैर देख कर नियति और नील कांप उठे. बातचीत में नियति ने गार्गी को आकाश के बारे में जो बताया, गार्गी के लिए यह हैरान करने वाली बात नहीं थी. अंत में गार्गी ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘मुझे सब पता है नियति.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता है?’’ नील ने हैरानी से पूछा.

‘‘जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था, वह कमीना मेरे साथ ही था.’’ कह कर गार्गी रोने लगी. क्योंकि हृदय की वेदना पैर कटने से हजार गुना ज्यादा थी. गार्गी को रोते देख नियति उस से लिपट गई. गार्गी ने रोते हुए कहा, ‘‘मैं कहीं की नहीं रही नियति… मेरे मांबाप, ऋतुल, अब मुझे सहारा देने वाले नहीं हैं.’’

गार्गी की हालत वाकई खराब थी. उस ने गलती तो की ही थी, पर अभी उस की उम्र ही क्या थी कि वह इस बारे में सोच सकती. गार्गी इस तरह रो रही थी कि सुनने वाले का कलेजा फट जाए. उस का चांद जैसा चेहरा वेदना में बुझ गया था. डाक्टर ऋतुल की हालत भी कुछ वैसी ही थी. वह भी केबिन में बैठे रो रहे थे. कहने को तो वह लाखों रुपए कमा रहे थे, लेकिन उन्हें प्यार करने वाला कोई नहीं था. साहब कहने वाले कंपाउंडर और नर्सें तो बहुत थीं, पर बेटा कहने वाला कोई नहीं था. ऋतुल ने जिस साल डाक्टरी की पढ़ाई पूरी की थी, उसी साल मांबाप दोनों ही 3 महीने के अंतर में गुजर गए थे. अब डा. ऋतुल का सिर्फ एक भाई था, जो हौस्टल में रह कर पढ़ रहा था.

गार्गी के भाग जाने के बाद उन की हालत गार्गी से भी करुण हो गई थी. वह एकदम अकेले पड़ गए थे, अंदर ही अंदर घुटते रहते थे. उन के पिता की मौत ठीक से इलाज न हो पाने की वजह से हुई थी. इसीलिए वह अस्पताल चला रहे थे. अगर भाई न होता तो शायद वह मतलबी संसार को छोड़ कर कब के साधु बन गए होते. उन का दुख बहुत बड़ा था. उन्होंने गार्गी के मांबाप से कभी कोई शिकायत नहीं की थी. क्योंकि वह जानते थे कि किसी को भी बांध कर नहीं रखा जा सकता. अचानक गार्गी के पैर से खून बहने लगा. नील भाग कर डाक्टर के पास पहुंचा. नील को देख कर डा. ऋतुल ने खुद को संभालने की कोशिश की. हांफते हुए नील ने कहा, ‘‘डाक्टर साहब, गार्गी को ब्लीडिंग हो रही है.’’

कुछ कहे बगैर डा. ऋतुल गार्गी के कमरे में पहुंचे. थोड़ा सकुचाए तो पर एक डाक्टर के रूप में आगे बढ़े, शर्म या झिझक यहां नहीं चल सकती थी. उन्होंने चादर हटा कर पैर देखा. उस के बाद नील से कहा, ‘‘यह तो नौर्मल ब्लीडिंग है. अभी कुछ समय तक इसी तरह रहेगा.’’

डा. त्रिपाठी के इन शब्दों ने नील और नियति को राहत पहुंचाई. पर गार्गी शर्म के मारे मुंह फेर कर रोती रही. डा. ऋतुल ने उस के हाथ पर अपना हाथ रख कर कहा, ‘‘रोती क्यों हो गार्गी, जो होना था, वह हो गया. अब मैं दोबारा शादी पर रुपए खर्च नहीं करूंगा.’’

डा. ऋतुल त्रिपाठी के यह कहते ही कमरे में सन्नाटा पसर गया. एकदम नीरव शांति. नियति और नील का मुंह खुला का खुला रह गया. यह आदमी है या आदमी के रूप में देवता. अपनी लाचारी और शर्म के साथ गार्गी ने डबडबाई आंखों से ऋतुल की ओर देखा. वह ऋतुल के पैर पकड़ने के लिए उठना चाहती थी, पर उसे याद आया कि उस का एक पैर तो काट दिया गया है. उस दिन बिना किसी की मौत हुए अस्पताल में सभी खूब रोए थे. शायद ऋतुल पहले डाक्टर होंगे, जो खुद अस्पताल में रोए थे. अगले दिन गार्गी के कपड़े बदलने के और उस की देखभाल के लिए डा. त्रिपाठी ने नियति से जल्दी आने को कहा, पर नियति नहीं आई. उस का इरादा गलत नहीं था. ऐसा नहीं था कि वह गार्गी की सेवा नहीं करना चाहती थी.

वह जानती थी कि वह समय पर नहीं पहुंचेगी तो यह काम डा. ऋतुल त्रिपाठी खुद करेंगे. इसी बहाने दोनों नजदीक आएंगे और गार्गी के वैवाहिक संसार का पहिया एक बार फिर सही रास्ते पर चल पड़ेगा. नियति और नील अस्पताल पहुंचे तो ऋतुल और गार्गी इस तरह बातें कर रहे थे, जैसे सालों से साथ रहे हों.

‘‘गुड मौर्निंग गार्गी, गुड मौर्निंग डाक्टर.’’ नील और नियति ने हंसते हुए दोनों की बातचीत में खलल डाला. ऋतुल ने नील के साथ जो व्यवहार किया था, उस के लिए उस से माफी मांगी और उस के घरपरिवार के बारे में पूछा. गार्गी ने हाथ जोड़ कर नील का आभार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘नील, तुम्हें बहन नहीं है और मुझे भाई. 15 दिनों बाद दिवाली है. उस के बाद भइया दूज. भाई तुम्हें मैं भइया दूज पर टीका करना चाहती हूं.’’

उसी दिन डा. ऋतुल त्रिपाठी ने अपने ससुर रामनारायण शास्त्री को फोन कर के सारी बात बताई तो पहले तो वह भड़क उठे, ‘‘अरे तुम ने उसे जहर का इंजेक्शन क्यों नहीं लगा दिया.’’ कह कर उन्होंने फोन काट दिया. उन की पत्नी रेणुका ने यह बात सुन ली थी. उन्होंने अंदाज से ही कहा, ‘‘तुम बाप हो या राक्षस?’’

‘‘तुम यह क्या कह रही हो रेणुका?’

‘‘जहर का इंजेक्शन दिलाने के लिए तुम ने हाथी घोड़ा बन कर उसे पीठ पर बैठा कर घुमाया था?’’ रेणुका बस इतना ही कह सकी थी. कोई भी मां हो, ऐसे में वह स्वाभाविक रो पड़ेगी. पर उस दिन रुढि़वादी ब्राह्मण रामनारायण शास्त्री की भी भारी आवाज रुदन में बदल गई थी. अस्पताल पहुंच कर सिद्धांतवादी रामनारायण शास्त्री बेटी का कटा पैर देख उस के बचपन की बातों, शैतानियों और खिलखिलाहटों को याद कर के वह जिस तरह रोए, देखने वालों की भी आंखें भर आईं. इस के बाद गार्गी के जीवन में पति, मांबाप, दोस्त और एक भाई नील आ गया था. गार्गी और ऋतुल एक बार फिर सुखी जीवन की राह पर चल पड़े. नील रोजाना बहन से मिलने आता. एक पैर गंवा कर गार्गी जीवन के हजारों रहस्य एक साथ समझ गई थी. उस एक पैर के बदले उसे सच्चे संबंधों की जानकारी हो गई थी.

भइया दूज के दिन सुबह ही नील बहन के घर पहुंच गया. टीका करवा कर वह घर से निकलने लगा तो पीछे से गार्गी ने कहा, ‘‘नील…’’

पलट कर नील ने कहा, ‘‘जी दीदी.’’

‘‘आज नियति के बारे में कुछ नहीं पूछोगे?’’ यह कहते हुए गार्गी के चेहरे पर रहस्यमई मुसकान फैल गई.

Hindi Stories : जुड़वा बहनें चिंकी और मिंकी की कहानी

Hindi Stories :  जुड़वा बहनें चिंकी और पिंकी वाकई अपने आप में अजूबा हैं, जिन की बातें, अदाओं, एक्टिंग और प्रस्तुति को देख कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. अभी इन बहनों का एक्टिंग सफर शुरु हुआ है. देखिए आगे…

जुड़वा बच्चों का जीवन हमेशा ही चर्चा का विषय रहा है. इस को ले कर कई फिल्में भी बनीं और उपन्यास भी लिखे गए. कह सकते हैं यह विषय हमेशा से रोचक रहा है. दिल्ली की रहने वाली ‘चिंकी- मिंकी’ ने जब टिकटौक और इंस्टाग्राम पर अपने रोचक वीडियो पोस्ट करने शुरू किए तो रातोंरात वे मशहूर हो गईं. अपनी इस खासियत को अपना हुनर बना कर ‘चिंकी-मिंकी’ ने खुद को टीवी की दुनिया में भी स्थापित कर लिया है. अब वे फैशन, टीवी और फिल्मों की दुनिया में अपना नाम कमाना चाहती हैं. कम उम्र में ही दोनों ने दौलत और शोहरत दोनों ही हासिल कर ली है. ‘चिंकी-मिंकी’ दोनों में ही भरपूर ग्लैमर है. जिस की वजह से वे लगातार हिट हो रही हैं.

भारत और चीन के विवाद में भले ही टिकटौक को बंद कर दिया गया हो, पर टिकटौक पर वीडियो बना कर मशहूर होने वालों की संख्या कम नहीं है. छोटे शहरों और गांव के युवा अपने वीडियो बना कर खूब मशहूर हुए हैं. ‘चिंकी-मिंकी’ उन में सब से मशहूर हैं. दिल्ली की रहने वाली चिंकी मिंकी जुड़वा बहनों के असली नाम सुरभि मेहरा और समृद्धि मेहरा हैं. ये दोनों टिकटौक की पापुलर स्टार्स हैं. इन दोनों के टिकटौक पर करीब 10 लाख फालोअर्स हैं. 2019 के टौप 5 वायरल वीडियो में से एक वीडियो इन दोनों का भी था. खास बात यह है कि दोनों सिर्फ टिकटौक पर ही नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम पर भी बेहद मशहूर हैं. चिंकी और मिंकी का नाम इतना मशहूर हुआ कि दोनों के असली नाम सुरभि मेहरा और समृद्धि मेहरा को लोग भूल ही गए हैं.

दिल्ली की रहने वाली इन दोनों जुड़वा बहनों के जीवन में तमाम ऐसे पल मौजूद हैं, जो मुश्किल और हास्यपूर्ण भी रहे हैं. दोनों को देख कर अंदाज लगाना मुश्किल है कि किस का क्या नाम है. चिंकी और मिंकी दोनों केवल 60 सेकेंड के अंतर से छोटी और बड़ी बहनें हैं. चिंकी यानी सुरभि मेहरा बड़ी और मिंकी यानी समृद्धि मेहरा छोटी है. समृद्धि मेहरा की आवाज थोड़ी पतली है. इन का जन्म दिसंबर 1998 में हुआ था. चिंकी और मिंकी दोनों की पढ़ाई दिल्ली के 2 अलगअलग कालेजों से हुई. चिंकी ने पीजीडी कालेज लाजपतनगर से अपनी 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की और मिंकी ने एसएसबी कालेज, नई दिल्ली से 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की. चिंकी को 92 प्रतिशत और मिंकी को 89 प्रतिशत नंबर मिले थे.

कालेज औफ वोकेशनल स्टडीज, शेख सराय, दिल्ली से दोनों ने ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के दौरान ही चिंकी मिंकी दोनों टिकटौक वीडियो बनाने लगी थीं. ये दोनों ही बहनें स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करना चाहती थीं. इन की तैयारी कनाडा जाने की थी. इसी बीच मशहूर हास्य टीवी सीरियल ‘द कपिल शर्मा शो’ में औडिशन के लिए इन्होंने अपना वीडियो भेजा तो उन को सिलेक्ट कर लिया गया. यह बात जब दोनों ने अपने पैरेंट्स को बताई तो उन्हें लगा कि दोनों मस्तीमजाक कर रही हैं. जब उन को पता चला कि यह सच बोल रही हैं तो इन को शूटिंग के लिए मुंबई बुलाया गया. वहां इन लोगों ने स्क्रिप्ट याद कर के मेहनत से अपना किरदार निभाया और इन के लिए सफलता का रास्ता खुल गया.

अब चिंकी मिंकी ने जौब करने का फैसला दरकिनार कर दिया है. दोनों अलगअलग फैशन ब्रांड के लिए फोटो शूट और तमाम दूसरे तरह के काम करने लगी हैं. सुरभि और समृद्धि मेहरा में सब से खास बात यह है कि दोनों हुबहू एक जैसी हैं. दोनों अपने हेयरस्टाइल और गेटअप को भी एकदूसरे से पूरी तरह मैच रखती हैं. चिंकी मिंकी को देख कपिल शर्मा भी कंफ्यूज हो गए थे. चिंकी बताती है कि उन्हें खुद उन के पैरेंट्स नहीं पहचान पाते थे. ऐसे में कई बार बीमार एक होती थी और दवाई दूसरी को खिला दी जाती थी. 22 साल की उम्र में ही इन का फीगर 32-28-32 किसी अभिनेत्री को मात देता है. इस से साफ लगता है कि फिल्मों में भी ये बहुत आसानी से सफल हो सकती हैं.

फैशन ब्रांड, फोटो शूट, वीडियोज और इवेंट के जरिए ये दोनों बहनें 1 से 2 लाख रुपए हर माह कमा लेती हैं. इन की अपनी सालाना कमाई 70 से 80 लाख के करीब होगी. चिंकी मिंकी दोनों को ही घूमने का बेहद शौक  है. इन दोनों को अपने वीडियो बनाने, पबजी खेलने का भी शौक है. इन का पहला वीडियो ‘चिंकी मिंकी झाबुआ इंदौर ब्लौग’ था. इसे बहुत सफलता मिली. चिंकी मिंकी दोनों को ही अपना फीगर बनाए रखने का बेहद शौक  है. ऐसे में ये खानेपीने का बहुत ख्याल रखती हैं. इस के बाद भी कभीकभार चौकलेट और पिज्जा खाती हैं. टमाटर सूप इन को बेहद पसंद है. फलों में आम खाने का शौक है और पहनने में काला और पीला रंग बेहद पसंद है.

चिंकी मिंकी दोनों को ही दूसरों को चौंकाने में मजा आता है. इस कारण दोनों एक जैसे कपड़े पहनती हैं और एक जैसे हावभाव प्रदर्शित करती हैं. उन की बातों से किसी को यह पता नहीं चलता कि कौन चिंकी है कौन मिंकी. दोनों की आवाज में थोड़ा सा अंतर है. इस के अलावा हावभाव और बातचीत करने के अंदाज में अंतर है. यह अंतर वही पकड़ सकता है जो लगातार इन के साथ रहता हो, इन्हें पूरी तरह से समझता हो. सामान्य लोगों के लिए इस अंतर को पकड़ना सरल नहीं है. जिस से ये सभी को चौंकाती रहती हैं.

 

Best Hindi Stories : ऑस्ट्रेलिया की जल परियों की कहानी

Best Hindi Stories : आस्टे्रलिया की रहने वाली जेसिका बेल और अमेलिया लासेटर की मुलाकात तब हुई थी जब दोनों वहां की एडिथ कोवन यूनिवर्सिटी में आर्ट्स एंड विजुअल फोटो की पढ़ाई कर रही थीं. दोनों के शौक भी एक जैसे थे और सोच भी. दोनों डिज्नी चैनल देखने की शौकीन थीं. एक जैसी सोच और विचारों की वजह से दोनों में दोस्ती हो गई. उसी दौरान जेसिका की अंडर वाटर फोटोग्राफी में रूचि बढ़ी. दोनों ने बचपन में राजकुमारी और जलपरियों की कहानियां सुनी थीं, जिन से प्रभावित भी थीं सो दोनों ने जलपरी बन कर समुद्र के जल में तैरने का फैसला किया. जल्दी ही दोनों की यह इच्छा जुनून बन गई.

इस के लिए जेसिका और अमेलिया ने एक लाख रुपए में सिलिकौन से बनी मछली जैसी पूंछ बनवाई. अब दोनों आस्ट्रेलिया के समुद्र में शार्क और कछुओं के साथ तैरती नजर आती हैं. बच्चे इन्हें समुद्र में तैरते देख सचमुच की जलपरी समझते हैं. जेसिका बताती हैं कि जब वह छोटी थी तो मां समुद्र किनारे ले जाती थी. वहां वह पानी से खेलती रहती थी. जलपरी बनने के सपने ने तभी जन्म लिया. जेसिका और अमेलिया शादी समारोहों और अन्य मौकों पर जलपरी बन कर इक्वेरियम में भी तैरती हैं. बच्चे उन्हें देख कर बहुत खुश होते हैं. रवि होंगले पेशे से फोटोग्राफर हैं. एक पत्रिका के लिए रिपोर्टिंग भी करते हैं और फोटोग्राफी भी. 49 साल के रवि पिछले 33 सालों से फोटोग्राफी कर रहे हैं. यानि जब 16 साल के थे तभी फोटोग्राफी शुरू कर दी थी. धीरेधीरे फोटोग्राफी उन का जुनून बन गई.

जुनून भी ऐसा कि जब मन में ‘हाउस औफ ड्रीम’ का विचार आया तब भी फोटोग्राफी और कैमरा ही दिलोदिमाग में घूम रहा था. काफी सोचा, माथापच्ची की, पत्नी से विचारविमर्श हुआ और अंतत: इस नतीजे पर पहुंचे कि घर ऐसा हो जिसे देखते ही लगे किसी फोटोग्राफर का घर है. इस मुद्दे पर इंजीनियरों और वास्तुकारों से 2 सालों तक मंथन चला. अंतत: वह लोग अपने हुनर को रवि होंगले के सपने से जोड़ने में सफल हो गए. सोच विचार और मंथन में भले ही 2 साल लगे लेकिन रवि का घर 2 महीने में बन गया. वह भी उन की इच्छानुसार, जिसे देख कर कोई भी कह सके किसी जुनूनी फोटोग्राफर का घर है. 3 मंजिल के इस घर की लागत आई 71 लाख, 63 हजार, 48 रुपए. घर का नाम रखा ‘क्लिक.’

रवि के 3 बेटे हैं. एक 20 साल का है, कैनन. दूसरा निकोन 18 साल का और तीसरा इप्शन 13 साल का. मतलब तीनों के नाम विश्व प्रसिद्ध कैमरों के नाम पर हैं. तीनों के अलगअलग कमरों की नक्काशी भी फोटोग्राफी पर आधारित है. मकान की रेलिंग कैमरे की रील की तरह बनाई गई हैं. मुख्य द्वार को भी कैमरे की तरह बनाया गया है. एक लैंस, उस के ऊपर एक बड़ी सी फ्लैश, फिर शो रील और मैमोरी कार्ड सा लुक. साथ ही दरवाजा कैमरे के शटर जैसा. रवि का घर आजकल इंटरनेट पर चर्चओं में है. वह कहते हैं, मैं ने तो ड्रीम हाउस बनाया था. यह सोचा भी नहीं था कि दुनियाभर में चर्चा में आ जाएगा.

 

 

Love Story : वाईफाई पासवर्ड वाली लव स्टोरी

Love Story : प्रेम एक पूजा है. पहली नजर का प्यार पूजा की तरह पवित्र होता है, बशर्ते दोनों ओर से हो. प्रकाश और श्रुति के बीच…

लिफ्ट की साफसफाई चल रही थी, इसलिए प्रकाश तीसरी मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट में जाने के लिए सीढि़यां चढ़ने लगा. वह 2-4 सीढि़यां चढ़ा ही था कि उसे लगा उस के पीछे कोई आ रहा है. उस ने पलट कर देखा तो उस के पीछे एक लड़की सीढि़यां चढ़ रही थी. उस ने उसे देखा तो उस की नजर उस के चेहरे से फिसल कर कहीं और ही मुड़ गई. उसे यह अनुभव पहली नजर में ही नहीं बल्कि उस ने जब भी लड़की को देखा, तबतब हुआ था. पता नहीं उस के चेहरे में ऐसा क्या था कि वह जब भी दिखाई दे जाती, अनायास प्रकाश की आंखें उस की ओर चली जाती थीं.

मगर टिकी नहीं रहती थीं. क्या यह उस के आकर्षण की वजह से था. लेकिन उसे लगता था, आकर्षण के अलावा भी उस में कुछ और था. सहज आत्मविश्वास और हर किसी के प्रति अवहेलना का भाव. अपने आकर्षक होने की सहज अनुभूति और मिलीजुली मासूमियत. जैसे उसे इस बात का गहरा अहसास हो कि वह युवा है, पर उसे इस का अहसास न हो कि जवानी क्या है. उस के चेहरे का खोजता हुआ भाव उस की सुंदरता को और बढ़ा देता था. उस की आंखों से ऐसा लगता था, जैसे वह बाहर कम अपने अंदर ज्यादा देखती है. चुस्त जींस और चुस्त टौप, मानो उस ने अपनी नजरों से नहीं, दूसरों की नजरों से प्रकाश की ओर देखा हो.

उस के बड़ेबड़े बालों और सुंदर चेहरे की बड़ीबड़ी आंखों के अलावा प्रकाश की नजर फिसल कर जहां मुड़ी थी, वह उसी में खो गया था, जिस की वजह से उस की चाल धीमी हो गई थी. पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा था. वह उसी तरह तेजी से सीढि़यां चढ़ती हुई उस के बगल से निकल गई. प्रकाश को लगा, अब उसे भी चाल बढ़ानी होगी. क्योंकि अब वह यह देखे बिना नहीं रह सकता था कि वह किस फ्लैट में जाती है. यह जानने के लिए प्रकाश ने अपनी चाल बढ़ा दी. वह उसी तीसरी मंजिल पर पहुंच कर रुक गई, जहां प्रकाश को जाना था. वह फ्लैट नंबर था 303. प्रकाश का फ्लैट नंबर 301 था. वह लड़की सामने वाले फ्लैट में आई है, यह जान कर उसे बहुत खुशी हुई. पर यह कौन है, क्योंकि उस फ्लैट में प्रकाश ने उसे आज पहली बार देखा था.

उसे लगा, कोई रिश्तेदार होगी, किसी काम से आई होगी. वह प्रकाश के मन को भा गई थी, इसलिए एक बार और देखने के लोभ में उस ने अपने फ्लैट का मुख्य दरवाजा खुला छोड़ दिया. इस में वक्त ने उस का साथ यह दिया कि उस दिन उस के फ्लैट में कोई नहीं था. सभी एक शादी में गए हुए थे. प्रकाश दरवाजे के बाहर नजरें टिकाए बेचैनी से ताक रहा था कि वह बाहर निकले ताकि वह उसे एक नजर देख ले. घंटों बीत गए, पर वह नहीं निकली. वह टकटकी लगाए उस के फ्लैट का दरवाजा ताकता रहा. धीरेधीरे वह निराश होने लगा.

पर शाम होते ही फ्लैट का दरवाजा खुला. प्रकाश के शरीर में जैसे जान आ गई. एक बार उसे और देखने के लिए वह फुरती से उठा और बाहर आ गया. तब तक वह लिफ्ट में घुस गई थी. प्रकाश ने फटाफट दरवाजा लौक किया और लिफ्ट के चक्कर में न पड़ कर तेजी से सीढि़यां उतरने लगा. उस के ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचने के साथ ही लिफ्ट भी नीचे पहुंच गई थी. लिफ्ट का दरवाजा खोल कर वह बाहर निकली और सामने सड़क की ओर चल पड़ी. लड़की के रेशम जैसे काले लंबे बाल, सुडौल देह, वह लड़की सुंदर ही नहीं प्रकाश को अद्भुत भी लगी. उस की चाल गजब की थी. उसे देख कर कोई भी उस के प्रेम में पड़ सकता था. प्रकाश की नजर उस पर से हट नहीं रही थी.

वह मेनरोड पार कर के सामने दुकान पर पहुंच गई. अब प्रकाश उसे सामने से मन भर कर देखना चाहता था. इसलिए वह वहीं सोसाइटी के गेट पर खड़ा रहा. उसे सामने से आता देख वह खो गया. इस के बाद तो क्रम सा बन गया. प्रकाश उस के आगेपीछे चक्कर लगाने लगा. इसी के साथ उस ने लड़की के बारे में एकएक जानकारी जुटा ली. उस का नाम श्रुति था. उस के सामने वाले फ्लैट में उस की मौसी रहती थीं. वह मौसी के यहां रह कर बीटेक की अपनी पढ़ाई कर रही थी. इस के पहले वह हौस्टल में रह कर पढ़ रही थी. वहां कोई बवाल हो गया था, जिस की वजह से वह मौसी के यहां रहने आ गई थी.

प्रकाश ने उस से बात करने की कोशिश शुरू कर दी. पर उस की बातों का वह छोटा सा जवाब दे कर उसे टाल देती थी. फिर भी वह उस के पीछे पड़ा रहा. प्रकाश अकसर देखता, वह उस के फ्लैट के दरवाजे के पास खड़ी हो कर अपने मोबाइल में कुछ करती रहती थी. ऐसे में जब प्रकाश से उस का सामना होता तो धीरे से मुसकरा देती. इस से प्रकाश को लगा कि शायद वह उसे पसंद करने लगी है. पर क्यों, यह उसे पता नहीं था. पर एक दिन जब प्रकाश ने अपने ओपन वाईफाई में पासवर्ड सेट कर दिया तो सच्चाई का पता चल गया. उस के पासवर्ड सेट करने के बाद जब वह बाहर निकला तो वह उस की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख प्रकाश के दिल की धड़कन बढ़ गई. शरीर में रोमांच सा हुआ.

प्रकाश के पास आ कर उस ने अपनी आवाज में शहद सी मिठास लाते हुए कहा, ‘‘आप अपने वाईफाई का पासवर्ड दे देंगे क्या?’’

‘‘क्यों नहीं, श्योर. लाइए, मैं आप के मोबाइल में कनेक्ट कर देता हूं.’’

श्रुति ने मोबाइल दिया, तो प्रकाश ने कांपते हाथों से वाईफाई का पासवर्ड सेट कर दिया. उस ने थैंक्स कहते हुए उस का मोबाइल नंबर मांगा तो प्रकाश ने फटाफट अपना नंबर सेव करा दिया. प्रकाश ने उस का नंबर मांगा तो उस ने भी बेहिचक अपना नंबर बता दिया. प्रकाश को उस का नाम पता था, फिर भी बात को आगे बढ़ाने के लिए उस ने उस का नाम पूछा.

‘‘मेरा नाम श्रुति है.’’ कह कर वह चली गई.

नंबर मिलने के बाद प्रकाश वाट्सऐप पर गुडमौर्निंग और गुडनाइट के मैसेज भेजने लगा. श्रुति की ओर से बराबर जवाब भी आता था. अकसर जानबूझ कर प्रकाश पासवर्ड बदल देता था. श्रुति का तुरंत फोन आ जाता था. कभीकभार वह वाट्सऐप पर मैसेज कर के पूछ लेती थी. एक दिन पासवर्ड बदल कर जैसे ही प्रकाश बाहर निकला, श्रुति सामने आ गई. उस ने पासवर्ड पूछा तो जवाब में प्रकाश ने कहा, ‘‘आई लव यू.’’

गुस्सा हो कर श्रुति ने कहा, ‘‘मैं वाईफाई का पासवर्ड पूछ रही हूं और तुम ‘आई लव यू’ कह रहे हो. तुम इस तरह की बात करोगे, मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.’’

इस के अलावा भी श्रुति ने बहुत कुछ कहा. प्रकाश जवाब में जो कुछ कहना चाहता था, वह उसे सुनने को तैयार ही नहीं थी. अपनी बात कह कर वह पैर पटकती हुई चली गई. प्रकाश ने वाट्सऐप पर रिक्वेस्ट की, पर उस ने मैसेज खोल कर देखा ही नहीं. अंत में प्रकाश ने टेक्स्ट मैसेज भेजा कि ‘आई लव यू’ मैं ने तुम्हें नहीं कहा, वह तो वाईफाई का पासवर्ड है. अगले दिन श्रुति मिली तो उस ने कहा, ‘‘तुम ने ऐसा जानबूझ कर किया था न? ऐसा कर के मुझे परेशान किया. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. तुम्हें बता दूं कि मुझे ऐसी बातों में रुचि नहीं है.’’

‘‘अगर किसी को किसी से पहली नजर में प्यार हो जाए तो…’’ प्रकाश ने कहा.

‘‘और दूसरी नजर में ब्रेकअप हो जाए तो…’’ जवाब में श्रुति ने कहा.

‘‘यह तुम्हारा वहम है.’’

‘‘और प्रेम हो जाए यह?’’ श्रुति ने कहा.

‘‘यह मेरा अनुभव है. किस से हुआ है प्रेम?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘मैं यह नहीं बताऊंगी. पर हुआ है, यह निश्चित है.’’

‘‘क्यों नहीं बता सकती?’’ प्रकाश ने सवाल कर दिया.

‘‘अगर वह मांगे तो जीवन ही नहीं, सांसें भी दे दूं,‘‘ श्रुति ने कहा, ‘‘तुम ने कभी किसी से प्यार किया है या सिर्फ वाईफाई का पासवर्ड ही ‘आई लव यू’ रखा है?’’

‘‘किया है न, तभी तो  ‘आई लव यू’ पासवर्ड रखा है. सीधेसीधे कहने की हिम्मत नहीं पड़ी तो पासवर्ड के बहाने कह दिया. अब तुम कहो, उस दिन तो तुम ने बहुत कुछ कह दिया. उस से तो..’’

‘‘मुझे अच्छे तो तुम भी लगते थे, पर तब तक इस बारे में कुछ सोचा नहीं था. पर जब सोचा तो लगा कि तुम ने यह पासवर्ड सेट करने के बजाय सच में ‘आई लव यू’ कहा होता तो…’’ श्रुति ने कहा.

उस की बात बीच में ही काट कर प्रकाश ने कहा, ‘‘तो क्या तुम भी..?’’

‘‘हां, पर अब यह पासवर्ड किसी दूसरी लड़की को मत बताना.’’ श्रुति ने कहा.

इसी के साथ दोनों हंस पड़े.

Love Story : कॉलेज लाइफ की लव स्‍टोरी

Love Story : वैलेंटाइंस डे पर हर्ष ने अनुशा को गुलाब का फूल दे कर अपने प्यार का इजहार किया था, लेकन उस ने न ऐतबार किया और न स्वीकार. लेकिन जब हर्ष उस की फ्रैंड रितु से शादी करने लगा तो…

एमबीबीएस की पढ़ाई का पहला साल. प्रवेश प्रक्रिया पूरी होते ही हौस्टल में रहने आए सभी छात्र अपनी नई जीवनशैली के अनुकूल ढलने की कोशिश कर रहे थे. सभी के मन में नए साथियों से मिलने का आनंद था, साथ ही घर से दूर आ कर घर की याद भी सता रही थी. सभी स्टूडेंट घर और हौस्टल में संतुलन साधने का प्रयास कर रहे थे. इसी समिश्रित लगाव को मन में छिपाए हौस्टल से कालेज जा रहे गेट के पास तेजी से चली आ रही एक लड़की हर्ष से टकरा गई. उस लड़की ने झिझकते हुए कहा, ‘‘सौरी, मैं जरा जल्दी में थी. मेरा एडमिशन आज ही हुआ है. क्या आप बता देंगे कि एमबीबीएस फर्स्ट ईयर का लेक्चर हाल कहां है?’’

‘‘इट्स ओके. सेकेंड फ्लोर लेक्चर हाल नंबर 705.’’ हर्ष ने जवाब दिया.

‘‘थैंक्स.’’ कह कर लड़की पलभर में गायब हो गई. जैसेजैसे प्रवेश प्रक्रिया का काम पूरा हो रहा था, वैसेवैसे कालेज में नए चेहरे आते जा रहे थे. उस लड़की के कोमल मुलायम कंधे का स्पर्श और मधुर स्वर में हुआ संवाद हर्ष के हृदय को गति दे रहा था. लेक्चर हाल में दाखिल होते ही हर्ष की निगाहें स्टूडेंट्स के बीच उसी चेहरे को खोज रही थीं. आखिर पहली ही लाइन में वह चेहरा दिखाई दे गया. उस पर नजर पड़ते ही उस के हृदय की गति तेज हो गई. उस दिन के बाद हर्ष रोजाना उस चेहरे को निहारता रहता और मन ही मन तेज गति से धड़कते दिल की धड़कन को काबू करने की कोशिश करता रहता. इस के पहले उस ने किसी के लिए इतना लगाव महसूस नहीं किया था.

हर्ष किसी भी तरह उस लड़की से बात करना चाहता था. उस की इस चाहत को पूरा करने में मदद की रितु ने. रितु और हर्ष एक शहर के रहने वाले तो थे ही, एक ही कालेज में साथ पढ़े थे. हर्ष ने रितु को पूरी बात बताई तो उस ने खुश हो कर कहा, ‘‘अनुशा मेरी बेस्ट फ्रैंड है. मैं उस से तुम्हारी बात तो करा दूंगी, पर…’’

‘‘पर क्या?’’ हर्ष ने पूछा.

‘‘इस के बदले में मुझे क्या मिलेगा?’’

‘‘इस के लिए तुम जो कहो, मैं करने को तैयार हूं.’’ हर्ष ने उत्तेजित हो कर कहा.

‘‘तुम्हें मेरी एनाटौमी का जर्नल लिखना होगा. इस के अलावा कैंटीन में रोज एक आइसक्रीम खिलानी पड़ेगी.’’

‘‘ओके डन.’’ हर्ष के हिसाब से सौदा बहुत सस्ते में पट गया था.

और रितु ने कैंटीन में हर्ष की मुलाकात अनुशा से करा दी, ‘‘इट इज नाइस टू मीट यू अगेन.’’ कहते हुए हर्ष की आंखों में अपार खुशी छलक रही थी.

‘‘हम दोनों अपने कालेज के पहले दिन मिले थे.’’ अनुशा ने जवाब दिया.

पता चला अनुशा भी उसी शहर की रहने वाली थी, जिस शहर के वे दोनों थे. थोड़ी बातचीत उस के बाद आइसक्रीम पार्टी कर के तीनों हौस्टल के लिए निकल गए. हर्ष अपने हौस्टल के कमरे की ओर जा तो रहा था, लेकिन उस के मन में अनुशा ही बसी थी. बस, इसी तरह मुलाकातें बढ़ती गईं. कभी कैंटीन में हर्ष और अनुशा के साथ रितु भी होती तो कभी सिर्फ हर्ष और अनुशा ही होते. हर्ष का मन अनुशा के साथ उत्कट प्रणय संबंध में बंध गया था, पर यह प्रणय एकतरफा था. सौदे के अनुसार हर्ष रितु का काम तो करता ही, अनुशा के भी उसे कई काम करने होते थे. कैंटीन में अनुशा और रितु के लिए नाश्ता और कौफी वही लाता था. पर वह चाह कर भी वह दिल की बात अनुशा से नहीं कह सका.

इसी तरह 3 साल बीत गए. चौथे साल के पहले सेमेस्टर की भी परीक्षा हो गई थी. सभी स्टूडेंट्स फाइनल एग्जाम की तैयारी में लगे थे. फाइनल एग्जाम अप्रैल-मई में होने थे. इसी बीच फरवरी का महीना आ गया. पे्रम करने वालों के लिए इस महीने की 14 तारीख महत्त्वपूर्ण होती है. जिन के वैलेंटाइन होते हैं, वे अपनेअपने वैलेंटाइन को गुलाब का फूल और उपहार देते हैं. यानी एक तरह से प्रेम का इजहार करते हैं. हर्ष ने अनुशा से अपने प्यार का इजहार करने के लिए इसी दिन को चुना, क्योंकि यह उस के लिए अंतिम चांस था. अगर इस बार वह चूक जाता तो फिर जल्दी मौका नहीं मिलता. क्योंकि एग्जाम के दौरान ऐसी बात नहीं की जा सकती थी. एग्जाम खत्म होते ही सब को अपनेअपने घर चले जाना था. हर्ष को पूरी उम्मीद थी कि अनुशा उस के प्यार को अस्वीकार नहीं करेगी.

आखिर 14 फरवरी यानी वैलेंटाइंस डे को कैंटीन में हर्ष ने अनुशा को गुलाब का फूल दे कर सहज रूप से हैप्पी वैलेंटाइंस डे कहा और अपने दिल की बात उस के सामने रखी, ‘‘अनुशा, मैं ने एक सपना देखा है कि शहर की पौश कालोनी में नदी के किनारे एक फ्लैट है. उस फ्लैट की गैलरी में तुम खड़ी हो और मैं शाम को तुम्हारे लिए कौफी बना कर लाता हूं. क्या तुम मुझे ऐसा मौका दोगी कि मैं तुम्हारे लिए रोज कौफी बनाऊं?’’

‘‘मतलब?’’ अनुशा की भौंहें तन गईं.

‘‘आई लव यू अनुशा. कालेज के पहले दिन ही तुम्हें देख कर मेरा दिल धड़कने लगा था. और अब यह हमेशाहमेशा के लिए सिर्फ तुम्हारी खातिर धड़कना चाहता है. तुम्हारे लिए इस में अनहद प्रेम है और सदा इसी तरह अनहद रहेगा.’’ कहते हुए हर्ष ने प्रेमभरी नजरों से अनुशा को देखा और उस के प्रत्युत्तर की राह तकने लगा.

‘‘हर्ष, मैं जो कहने जा रही हूं, तुम उस का बुरा मत मानना. मैं ने कभी भी तुम्हें एक फ्रैंड से ज्यादा नहीं माना. जीवनसाथी को ले कर मेरे मन में बड़ी अपेक्षाएं हैं, जिस में तुम्हारा साधारण और सामान्य रूप फिट नहीं बैठता. मुझे अपनी सुंदरता पर अभिमान तो नहीं है पर चाहती हूं कि मेरा जोड़ीदार ऐसा हो, जिस के साथ मैं खड़ी होऊं तो लोग कहें कितनी सुंदर जोड़ी है.’’ अनुशा ने अपनी बात स्पष्ट कर दी. अनुशा के इन शब्दों ने हर्ष के दिल की गति मंद कर दी थी. अनुशा संभवत: उस के प्रणय की परिभाषा नहीं समझ सकी थी. हर्ष को आघात तो लगा, पर वह दुखी होने का समय नहीं था. जिस के लिए वह अपना घरपरिवार छोड़ कर वहां आया था, वह काम जरूरी था. उसी दिन से हर्ष अपनी पढ़ाई में लग गया और उस ने पूरे मन से परीक्षा दी.

परीक्षा दे कर अनुशा अपने मामा के यहां चली गई, क्योंकि उन का अपना नर्सिंगहोम था. रितु और हर्ष अपने शहर लौट गए. क्योंकि उन के घर वालों की उन्हीं के शहर में जमीजमाई प्रैक्टिस थी. सभी अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए. एक दिन अचानक रितु ने अनुशा को फोन किया, ‘‘हैलो अनुशा, कैसी हो?’’

‘‘हाय वैनवी, बहुत मजे में तो नहीं हूं, फिर भी चल रहा है. बस, वही रूटीन क्लिनिक वर्क. तुम बताओ, आज सवेरेसवेरे कैसे याद कर लिया. कोई गुड न्यूज है क्या? क्योंकि तुम्हारी बातों में ही खुशी झलक रही है.’’

‘‘बहुत होशियार हो गई हो दिल्ली जा कर. तुम्हें तो बातों से सब पता चल जाता है. सुनो, 16 फरवरी को मेरी शादी है. तुम्हें आज ही यहां आना है. अभी मेरी सारी की सारी शौपिंग बाकी है. तुम्हारे आने के बाद ही शौपिंग शुरू करूंगी.’’

‘‘वाव दैट्स ग्रेट न्यूज. कौन है भाई वह भाग्यशाली, जो मेरी रितु को ले जा रहा है?’’ अनुशा के मन में भी खुशी भर गई थी.

‘‘तुम आ जाओ बस, सब बताऊंगी. तुम्हें लेने मैं एयरपोर्ट पर आऊंगी.’’ वर्षों बाद अनुशा से मिल कर सब कुछ बताने की उत्कंठा और खुशी रितु के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.

एयरपोर्ट पर रितु को देखते ही अनुशा उस के गले लग गई. दोनों की आंखों में हर्ष और खुशी टपक रही थी. गले लगेलगे ही अनुशा ने पूछा, ‘‘अब तो बताओ, कौन है वह खुशनसीब, यह सब कब तय हुआ?’’

‘‘धीरज रखो, तुम्हारे जीजाजी यहीं हैं. कार लाने पार्किंग में गए हैं. तुम खुद ही देख लेना मेरी पसंद.’’ रितु ने कहा. उस समय उस की आंखों में एक अजीब चमक थी.

दोनों बातें कर रही थीं, तभी उन के पास एक होंडा सिटी कार आ कर रुकी. अंदर से ब्लैक गोगल्स लगाए एक आकर्षक युवक बाहर निकला. वह आकर्षक युवक दोनों के नजदीक आ कर काला चश्मा उतारते हुए अनुशा की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘कैसी हो मिस अनुशा, पहचाना या नहीं?’’

अनुशा चौंकी. उस ने हैरानी से उस युवक को ताकते हुए कहा, ‘‘हर्ष तुम..? तुम कितने बदल गए हो? बहुत हैंडसम लग रहे हो, यह चमत्कार कैसे हुआ?’’

‘‘थोड़ी एक्सरसाइज, जिम और थोड़ी स्किन ट्रीटमेंट, क्योंकि आजकल लोगों को किसी चीज की गुणवत्ता की अपेक्षा पैकिंग में ज्यादा रुचि होती है.’’ हर्ष ने कहा और खिलखिला कर हंसने लगा. रितु ने भी हंसने में उस का साथ दिया. न चाहते हुए अनुशा को भी उन का साथ देना पड़ा क्योंकि वह समझ गई थी कि यह बात हर्ष ने उसी को लक्ष्य बना कर कही थी. कार में रितु आगे की सीट पर हर्ष के साथ बैठ गई. हर्ष ने उस का सीट बेल्ट बांधा और उस का हाथ पकड़ कर ‘आई लव यू’ कहा तो रितु ने भी उन्हीं शब्दों में जवाब दिया. अनुशा को यह अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वह उतनी दूर से उसी के लिए आई थी. वह सोच रही थी कि रितु उस के साथ बैठेगी तो दोनों बातें करेंगी. चूंकि अब उन दोनों की शादी होने जा रही थी, इसलिए अनुशा ने अपने मन को मना लिया.

कार एयरपोर्ट से निकल कर रितु के घर की ओर चल पड़ी. रास्ते में रितु ने अनुशा की ओर देखते हुए कहा, ‘‘शादी तक तुझे मेरे घर पर ही रहना है. मैं ने अंकलआंटी से बात कर ली है.’’

‘‘ओके डियर रितु, जैसा तुम चाहोगी वैसा ही होगा. मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी.’’ इस तरह खुशीखुशी अनुशा ने रितु की मांग मान ली. दोनों की बातचीत बंद करा कर हर्ष ने एक मैरिज हाल की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखो अनुशा, हमारी शादी यहीं होगी.’’

अनुशा ने उत्कंठा से खिड़की के बाहर देखा. उस के बाद बोली, ‘‘वाव, कितनी सुंदर जगह है. एकदम स्वर्ग जैसी.’’

मैरिज हाल देख कर अनुशा ने तारीफ तो की पर मन में एक अजीब तरह का असमंजस महसूस किया, लेकिन वह समझ नहीं सकी कि ऐसा क्यों हुआ. अनुशा के आते ही रितु शादी की तैयारी में मशगूल हो गई. अनुशा को साथ ले कर रितु शौपिंग के लिए निकल पड़ती. हर्ष भी उन के साथ होता. रितु के सभी शौपिंग बैग ले कर हर्ष उस के पीछेपीछे चलता. कुछ भी लेने से पहले रितु उस से पूछती और हर्ष सहर्ष उस की पसंद को सम्मान देता. सभी शौपिंग करतेकरते थक जाते तो हर्ष सब के लिए नाश्तापानी की व्यवस्था करता.

हर्ष और रितु एक ही प्लेट में नाश्ता करते. तब अनुशा को कालेज के दिनों की याद आ जाती. यहां फर्क बस इतना था कि तब हर्ष की आंखों में उस के लिए प्रेम छलकता था, जबकि अब वही प्रेम रितु के लिए था. शौपिंग कर के शाम को वापस आते तो अपने घर जाते समय हर्ष रितु का हाथ पकड़ कर उसे चूमते हुए ‘आई लव यू’ कहता. थोड़ा शरमाते हुए आंखें झुका कर रितु भी उन्हीं शब्दों को वापस करती. तब अनुशा कहती, ‘‘अरे ओ मेरे लैलामजनूं और रोमियो जूलियट, अब तुम्हारे विरह के कुछ ही दिन बचे हैं.’’

इस के बाद तीनों हंसने लगते. हंसते हुए हर्ष कार में बैठता और खुशीखुशी अपने घर चला जाता. एक दिन सवेरेसवेरे रितु ने कहा, ‘‘अनुशा, आज जल्दी तैयार हो जाना, शादी का जोड़ा पसंद करने चलना है. मैं तुम्हारी पसंद का जोड़ा लूंगी. लहंगाचोली भी एकदम मस्त पहनूंगी. उसे भी तुम्हें ही पसंद करना है. चलो, आज ही खरीद लेते हैं, क्योंकि फिटिंग में भी तो समय लगेगा.’’

रितु के आदेश के बाद अनुशा समय से तैयार हो गई. अनुशा ने रितु के लिए एक बहुत ही सुंदर शादी का जोड़ा पसंद किया. उस के बाद उस जोड़े को खुद ओढ़ कर दुकान में लगे दर्पण में खुद को देखा तो खयालों में खो गई. तभी रितु उस के लिए एक लहंगा चोली ले कर आई, ‘‘देखो अनुशा, मैं ने तुम्हारे लिए इसे पसंद किया है. कैसा लग रही है?’’

रितु के पुकारने से अनुशा का ध्यान भंग हुआ. उस ने लहंगाचोली की ओर निहारते हुए कहा, ‘‘बहुत सुंदर है. और यह जो मैं ने तुम्हारे लिए पसंद किया है, कैसा है?’’

‘‘बहुत सुंदर है अनुशा, तुम न होती तो शौपिंग करना, मेरे लिए कितना मुश्किल होता.’’

रितु की शौपिंग में अनुशा ने काफी मदद की थी. अनुशा रितु की मदद तो पूरे मनोयोग से कर रही थी, पर सहेली की शादी में जिस तरह खुश होना चाहिए, उस तरह खुश नहीं थी. उस के मन में एक टीस सी उठती रहती थी, जिसे वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. शादी के कुछ ही दिन बाकी रह गए थे. हर्ष कभीकभी रात को रितु के घर आ जाता और दोनों बालकनी में देर रात तक शीतल चांदनी में बैठ कर बातें करते. अनुशा बिस्तर पर रितु का इंतजार करते हुए करवटें बदलती रहती, साथ ही किसी तरह मन को समझाती रहती. 13 फरवरी की शाम को रितु ने अचानक कहा, ‘‘अरे अनुशा, मैं ने तुम्हें अपनी शादी का कार्ड तो दिखाया ही नहीं. देखो, यह हर्ष की शादी का कार्ड, जिसे मैं ने पसंद किया है और यह देखो मेरी शादी का कार्ड, जिसे हर्ष ने पसंद किया है.’’

अनुशा दोनों कार्ड हाथ में ले कर देखने लगी. एक कार्ड पर लिखा था—डा. हर्ष वेड्स डा. रितु और दूसरे पर लिखा था डा. रितु वेड्स डा. हर्ष. अनुशा ने डा. हर्ष के नाम पर हाथ फेरा. उस दिन अनुशा को अपने मन में होने वाली टीस का पता चल गया था. रितु के प्रति हर्ष का अनहद प्यार अब उस से देखा नहीं जा रहा था, क्योंकि ऐसा प्यार उस ने अब तक के जीवन में देखा नहीं था. अब शायद उसे अपनी उस बात पर अफसोस हो रहा था, जो उस दिन हर्ष से कही थी. अगर उस ने हर्ष का प्रपोजल स्वीकार कर लिया तो आज उस कार्ड में हर्ष के साथ रितु की जगह उस का नाम होता. अगले दिन 14 फरवरी यानी वैलेंटाइंस डे था. उसे वह दिन याद आ गया, जिस वैलेंटाइन डे को हर्ष ने उसे गुलाब का फूल दे कर अपने दिल की बात कही थी. अपनी कही बात को याद कर के उस का दिल दुखी हो गया.

एकदम से अनुशा के हृदय में हर्ष के लिए प्रेम उमड़ आया. वह रितु की जगह खुद को हर्ष के साथ रख कर सोचने लगी और एकदम से व्यग्र हो उठी. कार्ड देख कर उस की आंखों में आंसू भर आए थे, जिन्हें उस ने रितु से बड़ी होशियारी से छिपा लिया था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अगले दिन का सामना कैसे करेगी. उस पूरी रात अनुशा हर्ष के बारे में सोचती रही. आंखों में बस हर्ष की यादें तैर रही थीं. वह पूरी रात उस ने नम आंखों में गुजारी. उस का मन हो रहा कि वह हर्ष से माफी मांग कर उसे ‘आई लव यू टू हर्ष’ कह कर उस के सीने पर सिर रख कर खूब रोए. पर अब यह संभव नहीं था. हर्ष तो अब किसी और की अमानत था.

अनुशा ने रात में ही तय कर लिया कि शादी की तो छोड़ो, वह कल वैलेंटाइंस डे को भी यहां नहीं रहेगी. क्योंकि वह हर्ष को रितु को गुलाब का फूल देते नहीं देख पाएगी. इसलिए उस ने तय कर लिया कि सवेरा होते ही वह मामा के यहां वापस चली जाएगी. अगर वह मम्मीपापा के यहां रही तो उसे शादी में आना पड़ेगा. अब वह हर्ष को किसी और का होता नहीं देख सकती. उठते ही उस ने अपना बैग पैक करना शुरू कर दिया. अनुशा को बैग पैक करते देख रितु ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘अनुशा इस तरह अचानक, क्या हुआ? तुम बैग क्यों पैक कर रही हो? कहीं जा रही हो क्या?’’

‘‘मैं मामा के यहां वापस जा रही हूं. कारण मैं तुम्हें बाद में बताऊंगी.’’ अनुशा ने नम आंखों को पोंछते हुए कहा.

‘‘पर कारण तो मैं अभी जानना चाहूंगी. जब तक कारण नहीं बताओगी, मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी. अब 4-5 दिनों की ही तो बात है.’’ रितु की बातों में अनुशा को रोकने की जिद थी.

‘‘रितु, मुझे माफ करना. मैं अब यहां बिलकुल नहीं रुक सकती.’’ अनुशा भी अपने निर्णय पर अडिग लग रही थी.

‘‘जब तक तुम सहीसही कारण नहीं बता देती, मैं तुम्हें यहां से जाने नहीं दे सकती. मैं कारण जानना चाहती हूं.’’ रितु भी इस तरह अचानक अनुशा द्वारा लिए गए निर्णय के बारे में जानना चाहती थी.

रितु को जिद पर अड़ी देख कर अनुशा ने कहा, ‘‘तो सुनो, मैं भी हर्ष को उतना ही प्रेम करती हूं, जितना तुम. इसलिए मैं हर्ष की शादी तुम्हारे साथ होते देख नहीं सकती. आज वैलेंटाइंस डे है. वह तुम्हें गुलाब दे कर वैलेंटाइन डे मनाएगा, यह भी मुझ से देखा नहीं जाएगा. इसीलिए मैं जा रही हूं.’’

अनुशा की बातें सुन कर रितु जोर से हंसी. उस के बाद अपनी हंसी को रोकते हुए बोली, ‘‘अरे पगली, यही तो मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती थी.’’

‘‘मतलब?’’ अनुशा की भौंहें तन गईं.

‘‘अनुशा, मानव की सहज प्रवृत्ति ऐसी है कि जब अपना प्रेमी या प्रेमिका किसी अन्य से प्रेम न करने लगे, तब तक हम उस के प्रेम की कद्र नहीं करते.’’

रितु के होंठों पर अब खुशी उतर आई थी. उस ने अपनी बात को सरल बनाते हुए आगे कहा, ‘‘जैसे मंदगति से चल रहे हृदय को गति देने के लिए शौक देने की जरूरत पड़ती है, उसी तरह सुषुप्तावस्था में रहे तुम्हारे हर्ष के प्रति प्रेम को चेतना में लाने के लिए हमें यह हाई वोल्टेज ड्रामा करना पड़ा.’’

‘‘तो यह सब ड्रामा था?’’ अनुशा हैरानी से रितु को देखती रह गई.

रितु ने अनुशा को हकीकत बताते हुए कहा, ‘‘जब हर्ष ने तुम्हारे सामने प्यार का प्रस्ताव रखा तब शायद वह इस समय की तरह आकर्षक नहीं था. तुम ने उस के बाह्यरूप को देख कर उस के प्रेम को स्वीकार नहीं किया. तब तुम ने उस के सौम्य रूप और हृदय में अनहद प्रेम को नहीं देखा था. क्या प्रणय की परिभाषा समझाने के लिए किसी का आकर्षक होना जरूरी है. इस पूरी घटना की मैं साक्षी हूं. तुम ने उस के प्रेम को अस्वीकार तो कर दिया, पर हर्ष ने तुम्हारे हृदय में प्रणय का बीज तो रोप ही दिया था, जो तुम्हारे बातव्यवहार से पता चल रहा था. अब मुझे उस बीज को बड़ा वृक्ष बनाना था और मैं उस में कामयाब भी रही.

‘‘अरे वह पागल तो तुम्हारे मामा के यहां जाने के बाद जीवन से ही हार मान बैठा था. उस के लिए जिंदगी सिर्फ तुम थीं. मुझ से उस की दशा देखी नहीं गई इसलिए मेरे दिमाग में इस योजना ने आकार लिया. सब से पहले हर्ष को मनाया. अरे वह बेवकूफ तो इस नाटक में मेरा हाथ तक पकड़ने को तैयार नहीं था. किसी तरह उसे मनाया.

‘‘इस के बाद हम तुम्हारे मम्मीपापा से मिले. हर्ष उन्हें बहुत पसंद आया. उन्होंने इस संबंध के लिए हामी भर दी. उस के बाद हम ने उन्हें अपनी योजना बताई तो उन्होंने पूरा सहयोग करने का वचन दिया. अब तुम पूरा घटनाक्रम याद करो. तुम एयरपोर्ट पर उतरीं तो मैं ने तुम्हें तुम्हारे घर नहीं जाने दिया, क्योंकि तुम्हारे घर भी शादी की तैयारी चल रही है.

‘‘अगर तुम अपने घर जाती तो मेरी योजना पर पानी फिर जाता. शादी का जोड़ा भी तुम्हारी पसंद का खरीदा, क्योंकि उसे तुम्हें ही पहनना था. रही बात निमंत्रण कार्ड की तो मात्र एक कार्ड में मेरा और हर्ष का नाम लिखा है. बाकी के कार्ड तुम्हारे और हर्ष के नाम छपे हैं.’’

इतना कह कर रितु ने निमंत्रण कार्ड का बंडल ला कर अनुशा के सामने रख दिया. अनुशा ने जल्दी से बंडल खोल कर निमंत्रण कार्ड देखे, उन में लिखा था, ‘डा. अनुशा वेड्स डा. हर्ष’.

अनुशा की आंखें मारे खुशी के छलक उठीं.

‘‘और सुनो, तुम्हें बैग पैक करते देख मैं ने हर्ष को मैसेज कर दिया था. तुम्हारा वह फिल्मी हीरो तुम्हारे लिए गुलाब का बुके ले कर आ गया है. उसे हीरो बनाने में मेरा दिमाग है समझी.’’

अनुशा ने नम आंखों से रितु को बांहों में भर लिया. थैंक्स या इस तरह का कोई शब्द कहने की जरूरत नहीं थी. क्योंकि अनुशा की आंखों से ही सब व्यक्त हो रहा था. अनुशा दौड़ती हुई हर्ष के पास पहुंची. वह गुलाब का बुके लिए कार से टेक लगाए खड़ा उसी की राह देख रहा था. अनुशा ने उस के हाथ से बुके छीन कर उस के सीने से लगते हुए कहा, ‘‘हैप्पी वैलेंटाइंस डे हर्ष. हर्ष मैं ने एक सपना देखा है. शहर के पौश इलाके में नदी के किनारे एक फ्लैट है. उस फ्लैट की गैलरी में शाम को तुम खड़े हो और मैं तुम्हारे लिए कौफी बना रही हूं. क्या तुम रोज उस तरह अपने लिए कौफी बनाने का मौका दोगे? आई लव यू हर्ष.’’

हर्ष के दोनों हाथों ने अनुशा को जकड़ लिया था. अब मुंह से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं रह गई थी.

 

 

Love Story : मेल पर चेट करते करते सरिता को हो गया प्यार

Love Story : कई बार चाहते हुए भी मन की बात कहना मुश्किल होता है. सरिता की हालत भी कुछ ऐसी ही थी. फिर भी अंजाम की सोचे बिना उस ने मन की बात कह दी. आखिर…

3 दिनों से बंद फ्लैट की साफसफाई और हर चीज व्यवस्थित कर के साक्षी लैपटौप और मोबाइल फोन ले कर बैठी तो फोन में बिना देखे तमाम मैसेज पड़े थे. लैपटौप में भी तमाम मेल थे. पिछले 3 दिनों में लैपटौप की कौन कहे, मोबाइल तक देखने को नहीं मिला था. मां को फोन भी वह तब करती थी, जब बिस्तर पर सोने के लिए लेटती थी. मां से बातें करतेकरते वह सो जाती तो मां को ही फोन बंद करना पड़ता. पहले उस ने लैपटौप पर मेल पढ़ने शुरू किए. वह एकएक मैसेज पढ़ने लगी. ‘‘हाय, क्या कर रही हो? आज आप औनलाइन होने में देर क्यों कर रही हैं?’’

‘‘अरे कहां है आप? कल भी पूरा दिन इंतजार करता रहा, पर आप का कोई जवाब ही नहीं आया?’’

‘‘अब चिंता हो रही है. सब ठीकठाक तो है न?’’

‘‘मानता हूं काम में बिजी हो, पर एक मैसेज तो कर ही सकती हो.’’ सारे मैसेज एक ही व्यक्ति के थे. मैसेज पढ़ कर हलकी सी मुसकान आ गई सरिता के चेहरे पर. उसे यह जान कर अच्छा लगा कि कोई तो है जो उस की राह देखता है, उस की चिंता करता है. उस ने मैसेज टाइप करना शुरू किया.

‘‘मैं अपने इस संबंध को नाम देना चाहती हूं. आखिर हम कब तक बिना नाम के संबंध में बंधे रहेंगे. आप का तो पता नहीं, पर मैं तो अब संबंध की डोर में बंध गई हूं. यही सवाल मैं ने आप से पहले भी किया था, पर न जाने क्यों आप इस सवाल का जवाब टालते रहे. जवाब देने की कौन कहे, आप बात ही करना बंद कर देते हो. आखिर क्यों.?

‘‘एक बात आप अच्छी तरह जान लीजिए. बिना किसी नाम का दिशाहीन संबंध मुझे पसंद नहीं है. हमेशा दुविधा में रहना अच्छा नहीं लगता. पिछले 3 दिनों से आप के संदेश की राह देख रही हूं. गुस्सा तो बहुत आता है पर आप पर गुस्सा करने का हक है भी या नहीं, यह मुझे पता नहीं. आखिर मैं आप के किसी काम की या आप मेरे किस काम के..?

‘‘आप के साथ भी मुझे मर्यादा तय करनी है. है कोई मर्यादा? आप को पता होना चाहिए, अब मैं दुविधा में नहीं रहना चाहती. मैं आप को किसी संबंध में बांधने के लिए जबरदस्ती मजबूर नहीं कर रही हूं. पर अगर संबंध जैसा कुछ है तो उसे एक नाम तो देना ही पड़ेगा. खूब सोचविचार कर बताइएगा.

‘‘मेरे लिए आप का जवाब महत्त्वपूर्ण है. मैं आप की कौन हूं? इतनी निकटता के बाद भी यह पूछना पड़ रहा है, जो मुझे बहुत खटक रहा है. —आप के जवाब के इंतजार में सरिता.’’

सरिता काफी देर तक लैपटौप पर नजरें गड़ाए रही. उन के बीच पहली बार ऐसा नहीं हो रहा था. इस के पहले भी सरिता ने कुछ इसी तरह की या इस से कुछ अलग तरह की बात कही थी. पर हर बार किसी न किसी बहाने बात टल जाती थी. देखा जाए तो दोनों के बीच कोई खास संबंध नहीं था. दोनों कभी मिले भी नहीं थे. एकदूसरे से न कोई वादा किया था, न कोई वचन दिया था. बस, उन के बीच बातों का ही व्यवहार था. कभी खत्म न हो, ऐसी बातें. उस की बातें सरिता को बहुत अच्छी लगती थीं. दोनों दिनभर एकदूसरे को मेल या चैटिंग करते रहते. बीचबीच में अपना काम कर के फिर चैटिंग पर लग जाते. समयसमय पर मेल भी करते.

दोनों की जानपहचान अनायास ही हुई थी. मेल आईडी टाइप करने में हुई एक अक्षर की अदलाबदली की तरह से. ध्यान नहीं दिया और मेल सैंड हो गया. उस के रिप्लाय में आया. सौरी, सामने से फिर जवाब, करतेकरते दोनों को एकदूसरे का जवाब देने की आदत सी पड़ गई. जल्दी ही उन की बातें एकदूसरे की जरूरत बन गईं. दोनों का परिचय हुए 3 महीने हो चुके थे, पर ऐसा लगता था, जैसे वे न जाने कब से परिचित हैं, दोनों में गहरा लगाव हो गया था, उन का स्वभाव भी अलग था और व्यवसाय भी, फिर भी दोनों नजदीक आ गए थे. वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कालेज में हिंदी का प्रोफेसर था. साहित्य का भंडार था उस के पास. कभी वह खुद की लिखी कोई गजल या शायरी सुनाता तो कभी अपनी यूनिवर्सिटी की मजाकिया बातें कह कर हंसाता.

सरिता उस की छोटी से छोटी बात ध्यान से सुनती और पढ़ती. उस के साथ के क्षणों में, उस की बातों में आसपास का सब बिसार कर खो सी जाती. पर जब वह 3 दिनों के लिए कंपनी टूर पर मुंबई गई तो मन जैसे अपनी बात कहने को विकल हो उठा. आज दिल की बात कह ही देनी है, यह निश्चय कर के वह दाहिने कान के पीछे निकल आई लट को अंगुलियों में ले कर डेस्क पर रखे लैपटौप की स्क्रीन में खो गई. जैसे वह सामने बैठा है और वह उस की आंखों में आंखें डाल कर अपनी बात कह रही है. वह मैसेज टाइप करने लगी.

‘‘हाय 3 दिनों के लिए कंपनी टूर पर मुंबई गई थी. जाने का प्लान अचानक बना, इसलिए तुम्हें बता नहीं सकी, बहुत परेशान किया न तुम्हें? पर सच कहूं, 3 दिनों तक तुम से दूर रह कर मेरे मन में हिम्मत आई कि मैं अपने मन की बात तुम से खुल कर कह सकूं. क्या करूं, थोड़ी डरपोक हूं न? आज तुम्हें मैं अपने एक दूसरे मित्र से मिलवाती हूं. अभी नईनई मित्रता हुई है जानते हो किस से? जी हां, दरिया से… हां, दरिया, समुद्र, सागर…

‘‘नजर में न भरा जा सके, इतना विशाल, चाहे जितना देखो, कभी मन न भरे. इतना आकर्षक कि मन करता है हमेशा देखते रहो. मेरे लिए यह सागर हमेशा एक रहस्य ही रहा है. कहीं कलकल बहता है तो कहीं एकदम शांत तो कहीं एकदम तूफानी.

‘‘समुद्र मुझे बहुत प्यारा लगता है. घंटों उस के सान्निध्य में बैठी रहती हूं, फिर भी थकान नहीं लगती. पर मेरा यह प्यार दूरदूर से है. दूर से ही बैठ कर उस की लहरों को उछलते देखना, उस की आवाज को मन में भर लेना. इस तरह देखा जाए तो यह सागर मेरा ‘लौंग डिसटेंस फ्रेंड’ कहा जा सकता है, एकदम तुम्हारी ही तरह. हम मन भर कर बात करते हैं, कभीकभी एकदूसरे से गुस्सा भी होते हैं, पर जब नजदीकी की बात आती है तो मैं डर जाती हूं. दूर से ही नमस्कार करने लगती हूं.

‘‘पर इस सब को कहीं एक किनारे रख दो. मैं भले ही सागर के करीब न जाऊं, दूर से ही उसे देखती रहूं, पर वह किसी न किसी युक्ति से मुझे हैरान करने आ ही जाता है. दूर रहते हुए भी उस की हलकी सी हवा का झोंका मेरे शरीर में समा जाता है. मजाल है कि मैं उस के स्पर्श से खुद को बचा पाऊं. एकदम तुम्हारी ही तरह वह भी जिद्दी है.

‘‘उस की इस शरारत से कल मेरे मन में एक नटखट विचार आया. मन में आया कि क्यों न हिम्मत कर के एक कदम उस की ओर बढ़ाऊं. चप्पल उतार कर उस की ओर बढ़ी. एकदम किनारे रह कर पैर पानी में छू जाए इतना ही बढ़ी थी. वह पहले से भी ज्यादा पागल बन कर मेरी ओर बढ़ा और मुझे पूरी तरह भिगो दिया. जैसे कह रहा हो, बस मैं तुम्हारी पहल की ही राह देख रहा था, बाकी मैं तो तुम्हें कब से भिगोने को तैयार था.

‘‘मैं उस के इस अथाह प्रेम में डूबी वहीं की वहीं खड़ी रह गई. मैं ने तो केवल पैर धोने के लिए पानी मांगा था, उस ने मुझे पूरी की पूरी अपने में समा लिया था. कहीं सागर तुम्हारा रूप ले कर तो नहीं आया था? शायद नाम की वजह से दोनों का स्वभाव भी एक जैसा हो. वह समुद्र और तुम सागर. दोनों का स्थान मेरे मन में एक ही है. सच कहूं, अगर मैं एक कदम आगे बढ़ाऊं तो क्या तुम मुझे खुद में समा लोगे? —तुम्हारी बनने को आतुर सरिता’’

क्या जवाब आता है, यह जानने के लिए सरिता का दिल जोजोर से धड़कने लगा था. दिल में जो आया, वह कह दिया. अब क्या होगा, यह देखने के लिए वह एकटक स्क्रीन को ताकती रही. सागर में उछाल मार रहे समुद्र की एक फोटो भेजी. मतलब सरिता की पहल को उस ने स्वीकार कर लिया था. प्रकृति के नियम के अनुसार फिर एक सरिता बहती हुई अपने सागर मे मिलने का अनोखा मिलन रचने जा रही थी.