षडयंत्र : पैसों की चाह में

षडयंत्र : पैसों की चाह में – भाग 3

अभियुक्त स्वर्ण सिंह और उस का साला कुलविंदर सिंह शुरू से जमीनजायदाद के फर्जी काम करते आ रहे थे. पर ज्यादा पढ़ेलिखे न होने की वजह से वे छोटीमोटी ठगी तक ही सीमित थे. लेकिन रोहित कुमार यानी अमित कुमार से मिलने के बाद उन के पर निकल आए थे. उसी के कहने पर वे किसी बड़े काम की तलाश में लग गए थे. इसी तलाश में अमरजीत सिंह पर उन की नजर जम गई थी.

इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड अमित कुमार उर्फ विजय कुमार उर्फ रोहित कुमार था, जिस का असली नाम रोहित चोपड़ा था. वह लुधियाना के घुमार मंडी के सिविल लाइन के रहने वाले दर्शन चोपड़ा के तीन बेटों में सब से छोटा था. लगभग 7 साल पहले उस की शादी इंदू से हुई थी, जिस से उसे 5 साल की एक बेटी थी.

रोहित बचपन से ही अति महत्त्वाकांक्षी, शातिर दिमाग था. एलएलबी करने के बाद तो उस का दिमाग शैतानी करामातों का घर बन गया था. वह रातदिन अपराध करने और उस से बचने के उपाय सोचता रहता था. स्वर्ण सिंह से मिलने के बाद जब उसे अमरजीत सिंह की दौलत, जमीनजायदाद और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पता चला तो वह स्वर्ण सिंह के साथ मिल कर उन की प्रौपर्टी और रुपए हथियाने के मंसूबे बनाने लगा.

एक तरह से स्वर्ण सिंह रोहित चोपड़ा के लिए मुखबिर का काम करता था. रोहित को जब स्वर्ण से पता चला कि अमरजीत सिंह बेटों से ज्यादा वास्ता नहीं रखता तो उसे अपना काम आसान होता नजर आया. स्वर्ण सिंह ने उसे बताया था कि एक बेटा भारतीय सेना में है तो दूसरा जमीनों की देखभाल करता है.

इस के बाद रोहित कुमार ने अमरजीत सिंह का माल हथियाने की जो योजना बनाई, उस के अनुसार सब से पहले उन की ओर से डिप्टी कलेक्टर को एक पत्र लिखवाया गया. जिस में उस ने लिखवाया था कि ‘मेरे दोनों बेटे गुरदीप सिंह और गुरचरण सिंह मेरे कहने में नहीं हैं. वे मेरी जमीनजायदाद हड़पने के चक्कर में मेरी हत्या करना चाहते हैं.’

अमरजीत सिंह शराब पीने के आदी थे और अभियुक्तों पर पूरा विश्वास करते थे. यही वजह थी कि शराब पीने के बाद वह उन के कहने पर किसी भी कागज पर हस्ताक्षर कर देते थे. डिप्टी कलेक्टर के नाम पत्र लिखवाने के बाद उन्होंने अमरजीत सिंह की हत्या की योजना बना डाली थी. लेकिन समस्या यह थी कि अमरजीत सिंह के पास अपना लाइसेंसी हथियार था. जरा भी संदेह या चूक होने पर उन लोगों की जान जा सकती थी. इसलिए वे मौके की तलाश में रहने लगे.

मई के अंतिम सप्ताह में उन्हें मौका मिला. अमरजीत सिंह अपने किसी मिलने वाले की जमीन के झगड़े का फैसला कराने सिंधवा वेट, जगराओं गए हुए थे. घर में भी उन्होंने यही बताया था. रोहित कुमार ने सोचा कि अगर बाहर से ही अमरजीत सिंह को कहीं ले जा कर हत्या कर दी जाए तो किसी को उस पर संदेह नहीं होगा. उस ने स्वर्ण सिंह से सलाह कर के अमरजीत सिंह को फोन किया, ‘‘जमीन का एक बढि़या टुकड़ा बिक रहा है. अगर आप देखना चाहें तो मैं आप के पास आऊं.’’

लेकिन अमरजीत सिंह ने जाने से मना कर दिया. इस तरह रोहित कुमार और स्वर्ण सिंह की यह योजना फेल हो गई. वे एक बार फिर मौका ढूंढने लगे. इसी बीच उन्होंने अमरजीत को ढाई करोड़ रुपए में एक जमीन खरीदवा दी. इस की फर्जी रजिस्ट्री भी उन्होंने करा दी. इस में भी गवाह स्वर्ण सिंह था. पार्टी को पैसे देने के नाम पर उन्होंने उन से 50-50 लाख कर के 1 करोड़ रुपए भी ले लिए.

किसी भी जमीन की रजिस्ट्री करवाने के बाद उस का दाखिल खारिज कराना जरूरी होता है. उसी के बाद खरीदार निश्चिंत हो जाता है कि उस जमीन पर किसी तरह का विवाद नहीं है. अमरजीत सिंह द्वारा खरीदी गई जमीन के दाखिल खारिज का समय आया तो स्वर्ण सिंह और रोहित कुमार को चिंता हुई, क्योंकि उस जमीन के सारे कागजात फर्जी थे. जब जमीन ही नहीं थी तो कैसी रजिस्ट्री और कैसा दाखिल खारिज.

पोल खुलने के डर से रोहित कुमार और स्वर्ण सिंह परेशान थे. ऐसे में अमरजीत सिंह की हत्या करना और जरूरी हो गया था. क्योंकि सच्चाई का पता चलने पर अमरजीत सिंह उन्हें छोड़ने वाला नहीं था.

दाखिल खारिज के लिए 10-12 दिन बाकी रह गए तो वे अमरजीत सिंह को सस्ते में जमीन दिलाने की बात कह कर खरीदने के लिए उकसाने लगे. स्वर्ण सिंह और उस की पत्नी सुखमीत कौर ने अमरजीत सिंह को बताया कि उस के भाई कुलविंदर सिंह की पृथ्वीपुर में काफी जमीन है, जिसे वह बेचना चाहता है. उसे पैसों की सख्त जरूरत है, इसलिए वह कुछ सस्ते में दे देगा.

उसी जमीन के बारे में बातचीत करने के लिए 24 अगस्त की रात स्वर्ण सिंह अमरजीत सिंह के औफिस में ही रुक गया. देर रात तक वे शराब पीते रहे. स्वर्ण सिंह अमरजीत सिंह को अधिक शराब पिला कर पृथ्वीपुर चल कर जमीन देखने के लिए राजी करता रहा. जब अमरजीत सिंह चलने के लिए तैयार हो गए तो सुबह के लगभग साढ़े 5 बजे अपने घर थरीके जा कर वह अपनी सफेद रंग की इंडिका कार ले आया, जिस का नंबर पीबी 19 ई-2277 था. उस के साथ उस की पत्नी सुखमीत कौर भी थी.

स्वर्ण सिंह ने कार ब्रह्मकुमारी शांति सदन के मोड़ पर खड़ी कर दी और अमरजीत सिंह के औफिस जा कर बोला, ‘‘भाईजी चलो, गाड़ी आ गई है.’’

नशे में धुत अमरजीत सिंह सोचनेसमझने की स्थिति में नहीं थे. वह उठे और जा कर कार में बैठ गए. उसी समय गांव के कृपाल सिंह ने उन्हें इंडिका कार में स्वर्ण सिंह के जाते देख लिया था. अंबाला दिल्ली होते हुए वे पृथ्वीपुर पहुंचे. वहां स्वर्ण सिंह के भाई गुरचरण सिंह और साले कुलविंदर सिंह ने अमरजीत सिंह का स्वागत बोतल खोल कर किया.

शराब पीतेपीते ही शाम हो गई. अब तक अमरजीत सिंह खूब नशे में हो चुके थे. उन से उठा तक नहीं जा रहा था. उसी स्थिति में उन्हें वहीं कमरे में गिरा दिया और सब मिल कर पीटने लगे. लकड़ी का एक मोटा डंडा पड़ा था. स्वर्ण सिंह उसे उठा कर अमरजीत सिंह की गरदन और सिर पर वार करने लगा. उसी की मार से अमरजीत की गरदन टूट कर एक ओर लुढ़क गई और उस के प्राणपखेरू उड़ गए.

जब उन लोगों ने देखा कि अमरजीत का खेल खत्म हो गया है तो उन्होंने लाश को कार में डाला और उसे ठिकाने लगाने के लिए चल पड़े. रामगंगा नदी के पुल पर जा कर उन्होंने अमरजीत सिंह की लाश को नदी में फेंक दिया. इस के बाद गुरचरण और कुलविंदर पृथ्वीपुर लौट गए तो स्वर्ण सिंह पत्नी सुखमीत कौर के साथ लुधियाना आ गया.

पुलिस ने स्वर्ण सिंह, सुखमीत कौर, गुरचरण सिंह और कुलविंदर सिंह को तो जेल भेज दिया, लेकिन अमित कुमार उर्फ रोहित कुमार पुलिस के हाथ नहीं लगा था. 15 दिसंबर, 2013 को इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई थी. कथा लिखे जाने तक अमरजीत सिंह की लाश बरामद नहीं हो सकी थी.

षडयंत्र : पैसों की चाह में – भाग 2

बहरहाल, अमरजीत सिंह के गायब होने के बाद उन के दोनों बेटे, गुरदीप सिंह और गुरचरण सिंह हर संभावित जगह पर उन की तलाश करते रहे. लेकिन उन का कहीं पता नहीं चल रहा था. ऐसे में ही किसी दिन उन की मुलाकात गांव के ही कृपाल सिंह से हुई तो उस ने उन्हें बताया कि जिस दिन से सरदार जी गायब हैं, उस दिन सुबह वह खेतों पर जा रहा था तो उस ने उन्हें स्वर्ण सिंह और उस की पत्नी सुखमीत कौर के साथ देखा था. उस समय वह काफी नशे में लग रहे थे.

उस के पूछने पर सुखमीत कौर ने बताया था कि वे सरदारजी को अपने भाई की जमीन दिखाने यूपी ले जा रहे हैं. उस समय वे लोग ब्रह्मकुमारी सदन के मोड़ पर खड़े थे. कुछ देर बाद एक इंडिका कार आई तो सभी उस में सवार हो कर चले गए थे.

कृपाल सिंह से मिली जानकारी चौंकाने वाली थी, क्योंकि पिता के स्वर्ण सिंह के साथ जाने की बात उन्हें बिलकुल पता नहीं थी. स्वर्ण सिंह ने भी यह बात नहीं बताई थी. इस के अलावा अमरजीत सिंह के औफिस से ढाई करोड़ रुपए की जमीन के सौदे के कागजात भी मिल गए थे, जिन्हें देख कर दोनों भाइयों ने अंदाजा लगाया कि कहीं इसी ढाई करोड़ रुपए की जमीन के लिए तो उन के पिता का अपहरण नहीं किया गया.

इस के बाद गुरचरण सिंह और गुरदीप सिंह को लगा कि अब समय बेकार करना ठीक नहीं है. दोनों भाई थाना सदर के थानाप्रभारी अमनदीप सिंह बराड़ से मिले और उन्हें पूरी बात बताई. चूंकि अमरजीत सिंह ग्रेवाल बड़े और जानेमाने आदमी थे, सो अमनदीप सिंह बराड़ ने गुरदीप सिंह के बयान के आधार पर ही अमरजीत सिंह के मामले को अपराध संख्या 124/2013 पर भादंवि की धारा 364-120बी के तहत दर्ज कर मामले की सूचना उच्चाधिकारियों को दे कर खुद इस की जांच शुरू कर दी.

थानाप्रभारी अमनदीप सिंह बराड़ ने स्वर्ण सिंह और उस की तलाश के लिए एक टीम बनाई, जिस में एएसआई रामपाल सिंह, दविंदर सिंह, मुख्तियार सिंह, हेडकांस्टेबल कुलवंत सिंह, हरपाल सिंह, सुखविंदर सिंह और तलविंदर सिंह को शामिल किया गया. अगले ही दिन इस पुलिस टीम ने मुखबिरों की सूचना पर लुधियाना के बाहरी क्षेत्र से स्वर्ण सिंह और उस की पत्नी सुखमीत कौर को कार सहित गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर इन से पूछताछ की जाने लगी तो इन्होेंने अमरजीत सिंह के साथ यूपी जाने की बात से साफ मना कर दिया. उन का कहना था कि उन्होंने अमरजीत सिंह को जगराओं के निकट एक जमीन दिखा कर उन्हें उन के घर छोड़ दिया था.

पुलिस टीम ने लाख कोशिश की, लेकिन वे अपने बयान पर अड़े रहे. इधर थाना पुलिस पूछताछ में लगी थी तो दूसरी ओर गुरदीप सिंह जीटी रोड स्थित शंभू बार्डर के टोल टैक्स नाका से सीसीटीवी की फुटेज ले आया. थानाप्रभारी अमनदीप सिंह बराड़ ने वह फुटेज देखी तो उस में स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि 25 अगस्त की सुबह 9 बजे के आसपास इंडिका कार, जिस का नंबर पीबी19ई-2277 था. उस की अगली सीट पर नशे की हालत में अमरजीत सिंह बैठे थे. ड्राइवर की सीट पर स्वर्ण सिंह बैठा था और पीछे की सीट पर सुखमीत कौर बैठी थी. अगले दिन यानी 26 अगस्त की शाम को वही गाड़ी लौटी थी, लेकिन उस में अमरजीत सिंह नहीं थे.

फुटेज देख कर स्वर्ण सिंह कुछ कहने लायक नहीं रह गया था. फिर भी उस ने बात को घुमाने की कोशिश की. उस ने कहा कि कुछ जमीन अंबाला के पास थी. सरदारजी ने कहा था कि जब यहां तक आए हैं तो लगे हाथ उसे भी देख लेते हैं. उसे देखने के लिए वे अंबाला चले गए थे. लेकिन स्वर्ण सिंह का यह बहाना भी नहीं चला और उसे अपना अपराध स्वीकार करना पड़ा.

स्वर्ण सिंह ने बताया था कि अमरजीत की हत्या कर के उन की लाश को उन लोगों ने नहर में फेंक दी थी. स्वर्ण सिंह के बताए अनुसार, इस हत्याकांड में 5 लोग शामिल थे, एक तो वह स्वयं था, दूसरा उस का भाई गुरचरन सिंह, तीसरा साला कुलविंदर सिंह, चौथा पत्नी सुखमीत कौर और पांचवां था अमित कुमार.

स्वर्ण सिंह और सुखमीत कौर पुलिस गिरफ्त में थे. उन के बयान के बाद पुलिस ने इस मुकदमे में धारा 364-120बी के साथ 302-201बी, 25-54-59 आर्म्स एक्ट जोड़ कर स्वर्ण सिंह और सुखमीत कौर को ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से विस्तृत पूछताछ के लिए 2 दिनों के रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान ही उन की निशानदेही पर उत्तर प्रदेश के पृथ्वीपुर से उस के भाई गुरचरन सिंह और साले कुलविंदर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने स्वर्ण सिंह और सुखमीत कौर के साथ गुरचरण सिंह एवं कुलविंदर सिंह को अदालत में पेश कर के लाश एवं सुबूत जुटाने के लिए 9 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान ही अभियुक्तों की निशानदेही पर पंजाब पुलिस ने उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद से उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद के निकट रामगंगा नदी में जाल डाल कर मृतक अमरजीत सिंह की लाश की तलाश के लिए मीरजापुर से जलालाबाद तक जाल डाला. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी लाश बरामद नहीं हो सकी.

पुलिस ने गिरफ्तार अभियुक्तों की निशानदेही पर इस हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त अमित कुमार उर्फ विजय उर्फ रोहित चोपड़ा की तलाश में कई जगह छापे मारे, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लगा. इस बीच पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त कार, डंडा, 32 और 315 बोर के 2 रिवाल्वर के साथ 10 लाख रुपए नकद बरामद किए थे.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने चारों अभियुक्तों स्वर्ण सिंह, उस की पत्नी सुखमीत कौर, उस के भाई गुरचरन सिंह और साले कुलविंदर सिंह को एक बार फिर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जिला जेल भेज दिया गया.

गिरफ्तार चारों अभियुक्तों से की गई पूछताछ में अमरजीत सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह ठगी, बेईमानी, ईर्ष्या और उच्च महत्त्वाकांक्षा की पृष्ठभूमि पर तैयार की गई थी. सही बात तो यह थी कि इस हत्याकांड की पृष्ठभूमि काफी पहले ही तैयार कर ली गई थी. अगर हत्यारे अपनी योजनानुसार अपने इरादों में सफल हो जाते तो उन की जगह मृतक के दोनों बेटे पिता की हत्या के आरोप में जेल की हवा खा रहे होते और अभियुक्त उन की प्रौपर्टी पर ऐश कर रहे होते.

षडयंत्र : पैसों की चाह में – भाग 1

सुबह के नाश्ते पर आने की कोई बात ही नहीं थी. लेकिन दोपहर का खाना खाने से पहले ज्ञान कौर काफी देर तक अपने पति अमरजीत सिंह की राह देखती रहीं. धीरे धीरे 3 बज गया और अमरजीत सिंह घर नहीं आए तो उन्हें थोड़ी चिंता हुई. यह स्वभाविक भी था.

वह सोचने लगीं, सरदारजी ने रात में न आने  की बात की थी, सुबह भी नहीं आए तो कोई बात नहीं थी. अब वह खाना खाने भी नहीं आए, जबकि फिर वह खाना समय पर खाते थे. आज वह बिना बताए कहां चले गए? कहीं कोई जमीन तो देखने नहीं चले गए या फिर किसी जमीन के कागज बनवाने तो नहीं चले गए? काम में फंसे होने की वजह से बता नहीं पाए होंगे.

ज्ञान कौर ने 3-4 बार अमरजीत सिंह के मोबाइल पर फोन किया था, लेकिन संपर्क नहीं हो सका था. तरहतरह की बातें सोचते हुए ज्ञान कौर ने खाना खाया और आराम करने के लिए लेट गईं. सरदारजी के बारे में ही सोचते हुए वह सो गई तो शाम को उठीं. उस समय भी सरदार अमरजीत सिंह घर नहीं लौटे थे. शाम को ही नहीं, रात बीत गई और सरदारजी लौट कर नहीं आए.

कई बार ज्ञान कौर के मन में आया कि सरदारजी के घर न आने की बात वह अपने बड़े बेटे गुरचरण सिंह को बता दें. लेकिन उन के मन में आता कि बच्चे बेवजह ही परेशान होंगे. सरदारजी कोई बच्चे तो हैं नहीं कि गायब हो जाएंगे. 70 साल के स्वस्थ और समझदार आदमी हैं. वह ऐसे हैं कि खुद ही दूसरों को गायब कर दें, उन्हें कौन गायब करेगा?

इसी उहापोह और असमंजस की स्थिति में ज्ञान कौर का वह दिन भी बीत गया. जब दूसरी रात भी सरदार अमरजीत सिंह घर नहीं लौटे तो ज्ञान कौर ने परेशान हो कर अगली सुबह यानी 27 अगस्त, 2013 को गांव में रह रहे अपने बड़े बेटे गुरचरन सिंह के पास खबर भेजने के साथ बाघा बार्डर पर ड्यूटी कर रहे छोटे बेटे गुरदीप सिंह को भी फोन द्वारा सरदार अमरजीत सिंह के 2 दिनों से घर न आने की सूचना दे दी.

गुरदीप सिंह भारतीय सेना की 69 आर्म्स बटालियन में सिपाही था. इन दिनों वह बाघा बार्डर पर तैनात था. मां से पिता के 2 दिनों से घर न आने की जानकारी मिलते ही गुरदीप सिंह छुट्टी ले कर गांव आया और सब से पहले भाई को साथ ले कर थाना सदर जा कर अपने पिता के गायब होने की सूचना दे कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. इस के बाद दोनों भाई पिता की तलाश में जुट गए.

सरदार अमरजीत सिंह लुधियाना के थाना सदर के अंतर्गत आने वाले गांव झांदे में रहते थे. काफी और उपजाऊ जमीन होने की वजह से गांव में उन की गिनती बड़े जमीनदारों में होती थी. गांव के बीचोबीच उन की महलनुमा शानदार कोठी थी, जिस में वह पत्नी ज्ञान कौर और 2 बेटों गुरचरन सिंह और गुरदीप सिंह के साथ रहते थे. दोनों बेटे पढ़ाई के साथसाथ खेती में भी बाप का हाथ बंटाते थे. बड़ा बेटा गुरचरन सिंह पढ़ाई पूरी कर के जमीनों की देखभाल करने लगा तो छोटा गुरदीप सिंह भारतीय सेना में भर्ती हो गया.

गुरचरन सिंह और गुरदीप सिंह कामधाम से लग गए तो सरदार अमरजीत सिंह ने उन की शादियां कर दीं. उन की भी अपनी संतानें हो गई थीं. इस तरह उन का भरापूरा खुशहाल परिवार हो गया था. वैसे भी धनदौलत की उन के पास कोई कमी नहीं थी, लेकिन जब देहातों का शहरीकरण होने लगा तो उन्होंने अपनी काफी जमीनें करोड़ो रुपए में बेच कर बरनाला में उन्होंने इस के बदले दोगुनी जमीन खरीद कर बटाई पर दे दी. बाकी पैसों से उन्होंने प्रौपर्टी डीलर का काम शुरू कर दिया.

अमरजीत की जमीनों, मंडियों और आढ़त आदि का सारा काम बड़ा बेटा गुरचरन सिंह देखता था. जबकि अमरजीत सिंह अपने प्रौपर्टी डीलर वाले काम में व्यस्त रहते थे. इस के लिए उन्होंने गांव के बाहर लगभग 5 सौ वर्गगज में एक आलीशान औफिस और कोठी बनवा रखी थी. वह अपनी पत्नी ज्ञान कौर के साथ उसी में रहते थे, जबकि परिवार के अन्य लोग गांव वाली कोठी में रहते थे.

अमरजीत सिंह का इधर ढाई, 3 सालों से बगल के गांव थरीके के रहने वाले स्वर्ण सिंह के साथ कुछ ज्यादा ही उठना बैठना था. वैसे तो स्वर्ण सिंह मोगा का रहने वाला था, लेकिन उस ने और उस के भाई गुरचरन सिंह ने मोगा की सारी जमीन बेच कर उत्तर प्रदेश के पृथ्वीपुर में काफी जमीन खरीद ली थी. जिस की देखभाल गुरचरन सिंह भाई स्वर्ण सिंह के साले कुलविंदर सिंह के साथ करता था.

जबकि स्वर्ण सिंह थरीके में रहते हुए प्रौपर्टी का काम करता था. ऐसे में जब उसे पता चला कि झांदे गांव के रहने वाले अमरजीत सिंह का प्रौपर्टी का बड़ा काम है तो वह उन के पास भी आनेजाने लगा. उस ने उन से 3-4 प्लाटों के सौदे भी करवाए, जिन से उन्हें अच्छाखासा लाभ मिला. उन्होंने स्वर्ण सिंह का पूरा कमीशन तो दिया ही, लेकिन इस के बाद से उन्हें उस पर पूरा भरोसा हो गया था. साथसाथ खानापीना होने लगा तो दोनों में मित्रता भी हो गई. इस के बाद अमरजीत सिंह का कोर्टकचहरी जा कर कागजात आदि बनवाने और प्लाट वगैरह दिखाने का ज्यादातर काम स्वर्ण सिंह ही करने लगा.

उसी बीच स्वर्ण सिंह ने अमरजीत सिंह की मुलाकात अमित कुमार से करवाई. अमित ने उन्हें बताया था कि वह गोल्ड मैडलिस्ट वकील है. लेकिन वह वकालत न कर के प्रौपर्टी का बड़ा काम करता है. वह छोटेमोटे नहीं, बड़े सौदे करता और करवाता है.

अमित कुमार ने अमरजीत सिंह से इस तरह बातें की थीं कि वह उस से काफी प्रभावित हुए थे. इस के बाद अमित कुमार ने अमरजीत सिंह को 2-3 प्लाट भी खरीदवाए थे, जिन्हें बेच कर अमरजीत सिंह ने अच्छाखासा लाभ उठाया था.

स्वर्ण सिंह की ही तरह अमरजीत सिंह अमित कुमार पर भी विश्वास करने लगे थे. इस के बाद अमित कुमार ने अमरजीत सिंह के साथ मिल कर करीब ढाई करोड़ रुपए का एक सौदा किया, जिस के लिए उन्होंने 50-50 लाख रुपए का 2 बार में भुगतान किया था. इस सौदे में स्वर्ण सिंह गवाह था. लेकिन इतने बड़े सौदे की अमरजीत सिंह के घर के किसी भी सदस्य को कोई जानकारी नहीं थी.

पंजाब की डाकू हसीना

पंजाब की डाकू हसीना – भाग 4

गैंग के साथ बनाया लूट का खाका

जब लूट के लिए सभी विश्वासपात्र एकत्र हो गए तो इस की आगे की प्लानिंग बनाई गई. वह महीना था फरवरी और तारीख थी 23. मोना इतनी शातिर थी कि जुम्माजुम्मा शादी हुए हफ्ते भर नहीं हुआ था कि पति जसविंदर को भी अपने हुस्न की जाल से गुनाह के दलदल में उतार लिया था.

खैर, 5 महीने तक लूट की योजना बनती रही. घटना को अंतिम रूप देने के लिए 9 जून, 2023 दिन शुक्रवार तय किया. इस के पीछे खास वजह यह थी कि इस दिन रुपयों का कलेक्शन ज्यादा होता था, क्योंकि शनिवार और रविवार छुट्टी होती थी. एटीएम में पैसे डालने का काम नहीं होता था इसीलिए शुक्रवार का दिन चुना गया.

9 जून को सभी लुटेरे जगरांव में इकट्ठे हुए. समय शाम के 6 बजे के आसपास हो रहा था. करीब 3 घंटे तक आपस में मीटिंग हुई. अंत में गिरोह 2 टुकड़ों बांट दिया गया. जिस में तय हुआ कि एक पार्ट को मोना उर्फ डाकू हसीना अपना नेतृत्व देगी. वो अपनी क्रूज कार में जसविंदर सिंह (पति), हरप्रीत सिंह (भाई) अरुण कुमार कोच, आदित्य उर्फ नन्नी और गुलशन को बैठा कर पीछे वाले रास्ते से कार ले जाएगी.

जबकि दूसरी पार्टी का नेतृत्व मनजिंदर सिंह उर्फ मनी को सौंपा गया. उस के साथ में हरविंदर सिंह, मनदीप सिंह, परमजीत सिंह उर्फ पम्मा और नरिंदर सिंह लगाए गए. उन्हें 2 बाइकों पर सवार हो कर आगे के रास्ते से सीएमएस पहुंचना था. पते की बाद तो ये थी कि ये इतने शातिर थे कि पकड़े जाने के डर से कोई भी अपना मोबाइल अपने पास नहीं रखे था.

मीटिंग खत्म करने के बाद खुद मोना ने कार की ड्राइविंग संभाली और उस के बगल में जसविंदर सिंह बैठा बाकी तीनों पीछे की सीट पर बैठे. सब ने अपना चेहरा नकाब से पूरी तरह ढक रखा था तो मनजिंदर सिंह और बाकी साथी बाइक से निकले. इन सभी ने सुनसान रास्ते का इस्तेमाल किया था, जहां स्ट्रीट लाइटें कम थीं.

मनजिंदर और उस के चारों साथी आगे के रास्ते से सीएमएस के दफ्तर में घुसे तो मोना दफ्तर में पीछे के रास्ते साथियों संग घुसी थी. मनजिंदर को पता था कि सेंसर सिस्टम कहां है, इसलिए सब से पहले उस ने सेंसर सिस्टम की वायर काटी ताकि कोई अलार्म न बजा सके. उस के बाद ये सभी पीछे के रास्ते से ही अंदर दाखिल हुए.

गार्डों को बंधक बना कर काटे सायरन के तार

उन्होंने पहुंचते ही सब से पहले सो रहे तीनों सुरक्षा कर्मचारियों अमर सिंह, बलवंत सिंह और परमदीन खान को बंधक बनाया. उन के हथियार छीन लिए, जिस के बाद डीवीआर और साइरन के सभी तार और सामान समेट लिया. उस के बाद मनजिंदर और जसविंदर कैश गिनने वाले कमरे में दाखिल हुए, जहां 2 कर्मचारी हिम्मत सिंह और हरमिंदर सिंह कैश गिन रहे थे.

असलहे की नोंक पर दोनों ने उन पर काबू किया तो मोना, हरप्रीत, विक्की, लंबू, नन्नी और अरुण कोच 2 नीले रंग के बड़े बैग में नोट भरने का काम करते रहे. ये खेल रात 2 बजे से 5 बजे तक चला. जब दोनों बैग रुपयों से भर गए तो उन्हें सीएमएस कंपनी की कैश वैन संख्या पीबी10जेए -7109 में रुपए भरे और खुद मनजिंदर सिंह वैन को ड्राइव कर गांव के रास्ते होते हुए फरार हो गया तो कार में मोना अपने साथियों को साथ ले कर और बाकी अपनी बाइक पर फरार हो गए.

सभी लुटेरे वहीं पहुंच कर इकट्ठा हुए, जहां मीटिंग (जगरांव) की थी. एक बैग के रुपए आपस में काम के अनुरूप बांट दिए थे, जबकि दूसरे बैग के नोट मोना ने अपनी क्रूज गाड़ी में रख कर अरुण कोच के घर के पास खड़ी कर पति के साथ फरार हो गई.

सभी आरोपी जानते थे सुबह तक यह घटना जंगल में आग की तरह फैल जाएगी, इसलिए रुपए ले कर वे सभी भूमिगत हो गए थे लेकिन कैश वैन की बरामदगी, उस में लगे जीपीएस और गुप्त कैमरे से मनजिंदर का ट्रेस होना और मुखबिर की सक्रिय भूमिका से लूट का पूरा खुलासा हो गया और लूट की शतप्रतिशत रकम भी बरामद कर ली गई.

अंत में सीएमएस के प्रबंधक के बयान ने लूट की रकम को उलझा दिया. तीसरी बार अपने बयान में प्रबंधक प्रवीण ने कहा कि लूट की रकम 7 करोड़ नहीं, बल्कि 8 करोड़ 49 लाख थी, जिस में से 7 करोड़ 14 लाख की रकम बरामद कर ली गई है. जबकि अभी भी 1 करोड़ 37 लाख रुपए बरामद करना शेष है.

इस कहानी में एक लोचा तब आ गया था, जब क्रूज कार अरुण के घर के बाहर खड़ी थी. अरुण के साथी नीरज को इस घटना के बारे में पता चल चुका था और उस ने मुंह बंद रखने के लिए अपना हिस्सा मांगा तो अरुण ने कुछ भी देने से मना कर दिया. इस पर नीरज अपने साथियों प्रिंस, मनदीप उर्फ बब्बू और अभिसिंगला कार का शीशा तोड़ कर 70 लाख रुपए उस में से चुरा लिए. वे चारों भी चोरी के रकम के साथ पकड़े जा चुके हैं.

इस तरह से इस घटना में कुल 16 आरोपी पकड़े जा चुके हैं. जांच के दौरान पुलिस ने मोना के घर से उस की बिना नंबर वाली स्कूटी बरामद की थी. उस की डिक्की में बड़ी मात्रा में सीरिंज बरामद हुईं. पुलिस इस से अनुमान लगा रही है कि मोना ड्रग भी लेती होगी या किसी को देती होगी. इसे भी पुलिस ने अपनी जांच में शामिल कर लिया है.

खैर, घटना का खुलासा करने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पंजाब की डाकू हसीना – भाग 3

इस टीम ने बड़ी सूझबूझ के साथ घटना के नौवें दिन यानी 19 जून, 2023 को उत्तराखंड के श्री हेमकुंड साहिब दरबार के बाहर से डाकू हसीना और उस के पति जसविंदर को उस समय गिरफ्तार किया, जब फ्रूटी लंगर में खड़े हो कर वे फ्रूटी लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा रहे थे. दोनों के फोटो मोबाइल में कैद कर लिए और कप्तान सिद्धू के पास भेज कर दोनों के फोटो को वेरीफाई करा लिया. भेजे गए फोटो से दोनों की तसदीक हो गई कि फोटो मनदीप उर्फ डाकू हसीना और उस के पति जसविंदर सिंह की है.

फिर क्या था? पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर उत्तराखंड से पंजाब ले आई. तलाशी के दौरान मनदीप के पास से 12 लाख रुपए और उस के पति के पास से एक करोड़ रुपए नकद बरामद हुए. वे अपनी कार में रुपए रख कर साथसाथ घूम रहे थे. मनदीप ने प्रार्थना की थी कि यदि वह अपने इरादे (लूटकांड) में सफल हुई तो हरिद्वार, केदारनाथ और श्री हेमकुंड साहिब के दर्शन करेगी, इसलिए डकैती के बाद वह धामों का दर्शन करने गई, जो पकड़ी गई.

खैर, 20 जून, 2023 को पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर पत्रकारों के सामने लुटेरों को पेश कर उन के पास से बरामद कुल 6 करोड़ 96 लाख रुपए की रिकवरी दिखाई. उस के बाद सभी आरोपियों को अदालत में पेश कर लुधियाना के ताजपुर रोड स्थित सेंट्रल जेल भेज दिया.

सभी आरोपियों से की गई पूछताछ के बाद पुलिस द्वारा जो कहानी सामने आई, वो इस प्रकार निकली—

30 वर्षीय मनदीप कौर उर्फ मोना उर्फ डाकू हसीना मूलरूप से लुधियाना के डेहलों की रहने वाली थी. 3 भाईबहनों में वह बीच की थी, उस से बड़े भाई का नाम काका और सब से छोटे भाई का नाम हरप्रीत सिंह था, जो 18 साल का था. कुलवंत कौर मनदीप की मां का नाम है. उस के पिता की काफी समय पहले मौत हो चुकी थी.

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, मनदीप के जीवन के अतीत के पन्ने तंगहाली की काली रोशनाई से लिखे गए थे. पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद 3 बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी कुलवंत कौर के कंधों पर आ गई थी. तब बच्चों की उम्र 8 से 12 साल के बीच की रही होगी.

कुलवंत के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं था. बच्चों की परवरिश कैसे करे? समझ नहीं पा रही थी. उसे जब कुछ नहीं सूझा तो उस ने घरों में बरतन मांजने का काम किया. उस कमाई से जो पैसे मिलते थे, उसे बच्चों की परवरिश, उन की शिक्षा और खाने में खर्च कर देती थी.

बच्चे धीरेधीरे बड़े होने लगे. बड़ा बेटा काका बहुत समझदार और मेहनती था. लोगों के घरों में मां को जब जूठन साफ करते देखता था तो उस के कलेजे पर सांप लोट जाता था. फिर वह इस लायक भी नहीं था कि मां को घर में बैठा कर उन्हें अच्छी जिंदगी दे सके. वह कसमसा कर रह जाता था.

मनदीप भी छोटी थी. वह भी घर की माली हालत का देख कर अपनी किस्मत पर आंसू बहाती थी. छोटी होने के साथसाथ उस के मखमली सपने थे, शहजादियों की तरह रहना चाहती थी. महंगी और चमचमाती लग्जरी कारों में घूमना चाहती थी. लजीज और शाही पकवान हर दिन खाना चाहती थी, जो उस के लिए सिर्फ मुंगेरी लाल के हसीन सपने से ज्यादा कुछ भी नहीं था.

घर की गरीबी और तंगहाली देख कर मोना ऊब चुकी थी. वह सोचती थी कि कैसे गरीबी नामक डायन से पीछा छूटेगा. वह कब मालामाल होगी? कब वह नोटों के बिस्तर पर सोएगी? यह प्रश्न उस के लिए सिर्फ प्रश्न बन कर ही रह गया था. उत्तर की तलाश में मृग बनी फिर रही थी.

मोना बला की खूबसूरत थी. उस के अंगअंग से जवानी की खुशबू फूट रही थी. शरीर का अंगअंग विकसित हो चुका था. दीवानों की कतारें लग चुकी थीं. मोना ऐसे किसी भी मनचले को दिल देना नहीं चाहती थी, जो उसे बीच मंझधार में छोड़ जाए. दिल तो उसे देना चाहती थी, जो उसे माल भी खिलाए और उस की डूबती नैया को भी पार लगाए.

शुरुआत में की थी ब्यूटीपार्लर में नौकरी

इस दौरान मोना ने एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली थी, उस नौकरी से वह अपना खर्च निकाल लेती थी. चार पैसे जब उस के हाथ में आने लगे तो उस के पांव बहकने लगे. घर से कईकई दिनों तक वह गायब रहती थी. इस दरमियान वह कहां जाती थी, किस से मिलती थी, क्या काम करती थी, घर वालों को कुछ भी नहीं बताती थी.

मोना के इस कृत्य से बड़ा भाई काका बहुत दुखी और परेशान रहता था. घरपरिवार की इज्जत की दुहाई दे कर वह उसे समझाता भी था डांटता भी था, लेकिन मां भाई के डांट का उस पर कोई असर नहीं होता. बेटी के पैरों में जंजीर डालने और उसे सुधारने के लिए मां ने बरनाला के रामगढिय़ा रोड के रहने वाले जसविंदर सिंह के साथ उस की शादी करा दी. यह शादी इसी साल फरवरी 2023 में हुई थी. बाद में पता चला कि मोना की यह तीसरी शादी थी. इस से पहले वह 2 शादियां पहले भी कर चुकी थी.

दूसरे पति के खिलाफ उस ने लुधियाना की कोर्ट में रेप का मुकदमा दर्ज करवाया था. यह बात उस का तीसरा पति जसविंदर सिंह भी जानता था. सनद रहे, मोना ने कब और कैसे पहले 2 शादियां की थीं, पुलिस इस की अलग से जांच का रही है. मुकदमे की पैरवी करने मोना खुद बरनाला से लुधियाना आती थी तो कभीकभी पति जसविंदर के साथ तो कभी छोटे भाई हरप्रीत सिंह के साथ, जो मोना की शादी के बाद से उस की ससुराल बरनाला में रहता था.

समय के साथ मोना के पास पैसे आते रहे. महंगा मोबाइल रखना उस का शौक था, वह अपने पास रखती भी थी और अपने भाई को महंगे मोबाइल देती. बहन की तरह उस का भाई हरप्रीत भी गजब का शातिर बन चुका था. मोना जल्द से जल्द अमीर बन जाना चाहती थी, इस के लिए साम, दाम, दंड और भेद कोई भी नीति अपनाने के लिए तैयार रहती थी.

इस के शातिरपन का नमूना तो देखिए. उस के घर पैसे लेने वालों के चक्कर लगते रहते थे. आए दिन दुकानदार या बैंक वाले किसी न किसी मामले को ले कर विवाद करते रहते थे. मोना कभी फ्रिज, एलसीडी या कोई भी घरेलू सामान दुकान से किस्तों पर खरीद लाती थी, एकदो किस्त देने के बाद पैसे नहीं देती थी. कई बार तो कुछ लोग घर से सामान तक उठा कर ले जाते थे.

छोटेमोटे खेल खेल कर मोना ऊब चुकी थी. वो एकबारगी लंबा हाथ मार कर रातोंरात अमीर बन जाना चाहती थी. उसी दौरान उस के दिमाग में एक विचार आया. वह विचार उस के साथी का था, जो डेहलों में पुराने उस के घर से पास वाले मकान में रहता था. उस का नाम मनजिंदर सिंह था. मनजिंदर उर्फ मनी सीएमएस कंपनी में नौकरी करता था. यह बात मोना जानती थी.

मोना के दिमाग में एक जबरदस्त प्लान आया. चूंकि वह मुकदमे के सिलसिले में अकसर लुधियाना आती रहती थी. इस दौरान मनजिंदर से मिलने सीएमएस कंपनी भी जाती थी. यह कंपनी विभिन्न एटीएम में रुपए भरने का काम करती थी. उस ने अपना प्लान जब मनाजिंदर का बताया तो डर के मारे कांप उठा. प्लान यह था जब कंपनी में बड़ी रकम इकट्ठा होवे, तब लूट की जाए. ऐसा करने पर एक बार में सभी की तकलीफें दूर हो सकती हैं. उन रुपयों से सुख की जिंदगी खरीदी जा सकती है.

मनजिंदर ने पहले तो नानुकुर किया, फिर वह लालच में मोना की प्लानिंग में शामिल हो गया. लेकिन 2 लोगों के बस में करोड़ों रुपए लूटना आसान नहीं था. उन्हें इस के लिए और बंदों की जरूरत थी. तब मोना और मनजिंदर ने अपने विश्वासपात्र 9 और लोगों को प्लान में शामिल कर लिया.

इन के अलावा प्लान में जो 9 लोग थे, उन के नाम मनदीप सिंह उर्फ विक्की, हरविंदर सिंह उर्फ लंबू, परमजीत सिंह उर्फ पम्मा, हरप्रीत सिंह (मोना का भाई 18 साल), नरिंदर सिंह उर्फ हैप्पी,पति जसविंदर सिंह, अरुण कुमार कोच, आदित्य कुमार उर्फ नन्नी और गुलशन थे.

पंजाब की डाकू हसीना – भाग 2

इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने इस की जानकारी सीपी मनदीप सिंह सिद्धू को दी. थोड़ी देर बाद जिले के तमाम पुलिस अफसर, एफएसएल टीम और मीडिया मौके पर पहुंच गई थी. पुलिस अब इस बात की खोजबीन करने में जुट गई थी कि बदमाश वाहन यहीं क्यों छोड़ कर फरार हुए? किनकिन रास्तों से होती हुई ये वैन यहां तक पहुंची?

पुलिस ने जहांजहां संभावना थी, वहां के सीसीटीवी की फुटेज खंगाली मगर फुटेज में इस की कहीं तसवीर नहीं दिखी थी. इस से पुलिस का शक पुख्ता हो गया कि बदमाशों ने राष्ट्रीय राजमार्ग इस्तेमाल करने के बजाए गांव के रास्तों का इस्तेमाल किया था ताकि पुलिस उन तक किसी कीमत में न पहुंच सके. कुल मिला कर इस घटना ने पुलिस महकमे को हिला कर रख दिया था. पूरे दिन की जांच का कोई खास नतीजा नहीं निकला था. मतलब ये था पुलिस की जांच जहां से चली थी, वहीं आ कर खड़ी थी.

कर्मचारी मनजिंदर पर हुआ शक

अगले दिन यानी 11 जून, 2023 को पुलिस को एक चौंकाने वाली जानकारी मिली. सीएमएस कंपनी में करीब 300 कर्मचारी काम करते थे. पुलिस ने सभी वर्कर्स को सख्त हिदायत दे रखी थी कि जब तक घटना का खुलासा नहीं हो जाता, तब कोई भी वर्कर न तो छुट्टी करेगा और न ही शहर छोड़ कर बाहर जाएगा. ऐसे में कंपनी का एक पुराना कर्मचारी मनजिंदर सिंह उर्फ मनी निवासी अब्बुवाल थाना डेहलो, लुधियाना काम पर नहीं आया था और घटना वाले दिन भी घर पर नहीं था. और तो और उस का फोन भी बंद आ रहा था.

प्रबंधक प्रवीण ने इस की जानकारी एडिशनल पुलिस कमिश्नर शुभम अग्रवाल को दे दी थी. एडिशनल सीपी अग्रवाल ने इंसपेक्टर सिंह को उस पर कड़ी नजर रखने की सख्त हिदायत दी, क्योंकि कंपनी में घटित घटना के बाद से उस का हावभाव कुछ अलग तरीके का ही दिख रहा था. ये बात मैनेजर प्रवीण को पता नहीं क्यों अजीब लग रही थी, इसीलिए उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को दे दी थी.

अब तक तक की जांच में पुलिस के शक की सूई बारबार वहीं जा कर टिक जा रही थी, जहां से संदिग्ध हालत में सीएमएस की कैश वैन बरामद की गई थी. पुलिस को अनुमान था कि लूटकांड से जुड़े लुटेरे इसी इलाके के इर्दगिर्द होंगे या छिपे होंगे. उस के बाद पुलिस ने उस इलाके के चारों ओर अपने मुखबिरों का जाल फैला दिया.

इस का सकारात्मक रिजल्ट पुलिस को मिला भी. मुखबिरों द्वारा पुलिस को सूचना मिली की कैश वैन बरामद स्थल से करीब 5 किलोमीटर की रेंज में कुछ लुटेरों की हलचल दिखी है, अगर सतर्कता बरती जाए तो लुटेरे काबू में किए जा सकते हैं. मुखबिर की इस सूचना के बाद पुलिस और ज्यादा सक्रिय हो गई थी और सादे वेश में जगरांव गांव में चारों तरफ फैल गई थी.

मुखबिर की निशानदेही पर गांव के बाहर झुरमुट में 2 युवक छिपे दिखे तो पुलिस ने दोनों युवकों, जिन की उम्र 25 से 30 के करीब थी, को हिरासत में ले ली. उन से मौके पर ही कड़ाई से पूछताछ करनी शुरू की. क्योंकि खबरी ने पुलिस को पक्की जानकारी थी कि लूटकांड के 2 आरोपी उक्त जगह छिपे बैठे हैं और उन के पास बड़ी रकम भी मौजूद है, जिसे काले रंग के पौलीथिन रख कर एक गड्ढे के भीतर छिपा रखे हैं.

दोनों आरोपियों ने खोल दिया डकैती का राज

कड़ाई से की गई पूछताछ में दोनों युवकों ने अपना नाम मंदीप सिंह उर्फ विक्की और हरविंदर सिंह उर्फ लंबू बताया. दोनों युवक कोठे हरिसिंह गांव के थे. पुलिस ने दोनों पर जब थोड़ी लगाम और कसी तो उन्होंने डर के मारे ऐसे राज उगल दिए, जिसे सुन कर पुलिस वाले ऐसे उछले थे जैसे उन्होंने बहुत बड़ी जंग फतह कर ली हो.

पुलिस के सामने विक्की और लंबू दोनों हाथ जोड़े गिड़गिड़ा उठे कि उन्हें मारना मत, वह सब सचसच बता देंगे. उस के बाद दोनों में से एक विक्की ने गड्ढे खोद कर उस में छिपा कर रख काले रंग की 2 पौलीथिन निकाल कर उन की ओर बढ़ा दीं. पुलिस वालों ने जल्दीजल्दी पौलीथिन खोल कर देखी तो उन के होश उड़ गए थे. दोनों पैकेट में 500-500 रुपए की गड्डियां थीं. ये वही रकम थी, जो 2 दिन पहले सीएमएस कंपनी में डकैती के दौरान उन्होंने लूटी थी.

एक पैकेट में 500 रुपए के 10 बंडल तो दूसरे पैकेट में 500 रुपए के 15 बंडल थे. हरेक बंडल में 5 लाख रुपए थे, जो प्लास्टिक की रस्सी से अलगअलग बंधे हुए थे. यह कुल रकम 1 करोड़ 25 लाख रुपए की हो रही थी, जिस में 75 लाख रुपए लंबू के थे और 50 लाख रुपए विक्की के थे.

मतलब मुखबिर ने पुलिस को जो सूचना दी थी शत प्रतिशत पक्की थी. 7 करोड़ रुपए लूट के असल आरोपी पुलिस के हाथ लग चुके थे. यह देख पुलिस की खुशी का ठिकाना नहीं था, पुलिस रुपए से भरे पैकेट और दोनों आरोपियों को अपने कब्जे में ले कर सराभा थाने ले आई.

दोनों आरोपियों से गहन पूछताछ शुरू की तो 7 करोड़ डकैती का पूरा मामला खुल कर सामने आ गया, लेकिन पुलिस ने इस बात को अतिगोपनीय ही रखा, ताकि मामला लीक न हो सके, नहीं तो बाकी के आरोपी फरार हो सकते थे.

खैर, इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने लूटकांड के 2 आरोपियों के सवा करोड़ रुपए के साथ गिरफ्तार करने और मामले का खुलासा होने की सूचना कप्तान मनदीप सिंह सिद्धू को दिया तो वे खुशी से उछल उठे. इस के बाद उन्होंने उन्हें कुछ खास हिदायत दी और जौइंट पुलिस कमिश्नर सौम्या मिश्रा, एडिशनल पुलिस कमिश्नर शुभम अग्रवाल को आरोपियों से आगे की पूछताछ के लिए थाने भेज दिया.

अन्य आरोपियों की हुई धड़ाधड़ गिरफ्तारी

अपने कप्तान का आदेश पा कर दोनों अधिकारी थाने पहुंच कर गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों विक्की और लंबू से कड़ाई से पूछताछ शुरू की तो पूरा मामला परत दर परत खुलता गया. पूछताछ में विक्की और लंबू ने बताया कि लूटकांड की मास्टरमाइंड मनदीप कौर उर्फ मोना उर्फ डाकू हसीना है. उसी के इशारे पर यह डकैती डाली गई थी. मोना का साथ सीएमएस कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी मनजिंदर सिंह उर्फ मनी ने दिया था. इस के अलावा 6 और लोग घटना में शामिल थे.

सनद रहे, पुलिस का शक पहले से ही मनजिंदर सिंह पर शक था. उस के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों की निशानदेही पर अब्बुवाल से मनजिंदर सिंह उर्फ मनी को गिरफ्तार कर उस से डेढ़ करोड़ रुपए, परमजीत सिंह उर्फ पम्मा को गिरफ्तार कर उस के पास से 25 लाख रुपए, नरिंदर सिंह उर्फ हैप्पी को गिरफ्तार उस से 25 लाख रुपए और हरप्रीत सिंह को गिरफ्तार कर उस के पास से 25 लाख रुपए कैश बरामद किया.

उक्त चारों से पूछताछ के बाद पता चला कि अरुण कुमार कोच नामक एक और आरोपी के घर के पास खड़ी क्रूज गाड़ी में 2 करोड़ 25 लाख रुपए रखे हैं. पुलिस इन की निशानदेही पर क्रूज गाड़ी और उस में से एक करोड़ 55 लाख रुपए ही बरामद कर सकी थी. कार का शीशा तोड़ कर किसी ने 70 लाख रुपए गायब कर दिए थे.

6 आरोपियों से पुलिस ने कुल 5 करोड़ 7 सौ रुपए बरामद किए थे. इन 6 के अलावा 5 और आरोपी मनदीप कौर उर्फ मोना उर्फ डाकू हसीना, उस का पति जसविंदर सिंह, अरुण कुमार कोच, आदित्य कुमार उर्फ नन्नी और गौरव कुमार उर्फ गुलशन अभी भी पुलिस की पकड़ से बहुत दूर थे.

ऐसे पकड़ में आई डाकू हसीना

इन आरोपियों के पास कितनी नकदी है, किसी को पता नहीं था. अलबत्ता पुलिस कमिश्नर सिद्धू ने मास्टरमाइंड मनदीप कौर और उस के पति को गिरफ्तार करने के लिए सीआईए (काउंटर इनवैस्टीगेशन एजेंसी) के प्रभारी बेअंत जुनेजा और इंसपेक्टर कुलवंत सिंह को लगा दिया था.

पंजाब की डाकू हसीना – भाग 1

पंजाब राज्य के लुधियाना जिले का पारा तब और बढ़ गया था, जब सीएमएस इंफो सिस्टम लिमिटेड में हुई 11 करोड़ रुपए की डकैती की खबर फिजा में फैली थी. उस समय सुबह के 7 बज रहे थे, जब सीएमएस के प्रबंधक प्रवीण कुमार ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी थी.

सूचना सुन कर कंट्रोल रूम में ड्यूटी पर तैनात एसआई सुशील के तो जैसे हाथपांव ही फूल गए थे. सूचना थी ही ऐसी, जिसे सुन कर हर कोई हैरान हो सकता था और सुशील भी ऐसे उछले थे. फौरन उन्होंने वायरलैस सेट के जरिए जिले के सभी थानों को सूचित कर दिया. वह इलाका थाना सराभा नगर के न्यू राजगुरु नगर में पड़ता था.

न्यू राजगुरु नगर स्थित सीएमएम दफ्तर में हुई 11 करोड़ रुपए की डकैती की सूचना मिलते ही पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह के भी जैसे होश उड़ गए. उन्होंने सब से पहले जिले की सभी सीमाओं को सील करने का आदेश दिया, ताकि बदमाश जिला छोड़ कर बाहर भाग न सकें. क्योंकि 11 करोड़ रुपए कोई छोटीमोटी रकम नहीं होती है, फिर बड़े पुलिस अफसरों के सवालों के जबाव देने में उन्हें मुश्किल हो सकती थी.

जंगल में आग की तरह यह खबर जिले में फैल चुकी थी सीएमएस इंफो सिस्टम लिमिटेड, जो एटीएम मशीनों में रुपए रखने का काम करती है, के यहां रात 9/10 जून, 2023 की रात को इस डकैती की वारदात को अंजाम दिया. डकैत कैश बाक्स से 11 करोड़ रुपए लूट कर सीएमएस कंपनी की कैश वैन में रख कर फरार हो गए.

हडक़ंप मचा देने वाली यह खबर जिले से होते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सिंह और डीजीपी गौरव यादव तक पहुंच चुकी थी. मुख्यमंत्री भगवंत मान सिंह ने डीजीपी गौरव यादव को आड़े हाथों लेते हुए अपनी नाराजगी जताई थी कि किसी भी कीमत पर घटना का जल्द से जल्द परदाफाश होना चाहिए और अपराधियों के मनोबल को धूल में देना होगा. मुझे जल्द से जल्द इस का सकारात्मक रिजल्ट चाहिए.

मुख्यमंत्री भगवंत मान के आदेशों का पालन करते हुए डीजीपी गौरव यादव ने लुधियाना के पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू को आदेश दिया कि लुधियाना की पूरी पुलिस फोर्स लगा दो, हर कीमत पर आरोपी पकड़े जाने चाहिए और रकम की भी रिकवरी होनी चाहिए. ये पुलिस की साख का प्रश्न है.

हाई कमान से आदेश मिलने के बाद पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू ने आरोपियों को पकडऩे के लिए अपनी अनोखी कार्यशैली के लिए मशहूर तेजतर्रार जौइंट पुलिस कमिश्नर सौम्या मिश्रा और एडीशनल पुलिस कमिश्नर शुभम अग्रवाल के हाथों में कमान सौंप दी.

इस से पहले जब घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम के जरिए थाना सराभा नगर को मिली थी, इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने मय पुलिस फोर्स मौके पर पहुंच कर छानबीन शुरू कर दी थी. उस के आधे घंटे के अंतराल में पुलिस कमिश्नर मनदीप सिंह सिद्धू, जौइंट सीपी सौम्या मिश्रा, एडीसीपी शुभम अग्रवाल, सीआईए (तृतीय) इंसपेक्टर बेअंत जुनेजा, सीआईए (चतुर्थ) इंसपेक्टर कुलवंत सिंह सहित तमाम पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच चुके थे. उस समय सीएमएस औफिस जैसे पुलिस छावनी बन चुका था.

हालात देख कर घबरा गए मैनेजर

इधर घटना की सूचना पा कर सुबह साढ़े 6 बजे के करीब जब सीएमएस के मैनेजर प्रवीण कुमार दफ्तर पहुंचे थे तो उन्होंने मेन वाल्ट के बाहर वाले कमरे में कर्मचारी हिम्मत सिंह और हरमिंदर के दोनों हाथ और पैर बंधे तथा मुंह पर टेप चिपके हालत में मिले थे. जल्दी जल्दी उन्होंने दोनों कर्मचारियों को बंधन मुक्त करते हुए मुंह के ऊपर से टेप हटाया.  घबराहट के मारे उन की सांसें तेज चल रही थीं. उन के मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी.

मैनेजर प्रवीण कुमार हालत देख कर समझ गए थे कि मामला गंभीर है. उन्होंने हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को ठंडा पानी पिलाया और उन्हें ढांढस बढ़ाया. थोड़ी देर बाद जब दोनों सामान्य स्थिति में आ गए, तब दोनों ने उन्हें बताया कि रात के करीब 2 बज रहे थे, जब दोनों कैश रूम में रुपए गिन रहे रहे थे. कमरे के बाहर सिक्योरिटी गार्ड बलवंत सिंह, परमदीन खान और अमर सिंह राइफल लिए अपनी ड्यूटी पर तैनात थे.

अचानक से 8-10 नकाबपोश, जिन के हाथों में असलहे थे, दफ्तर के भीतर घुस आए और तीनों गार्डों को अपने असलहे के बल पर बंधक बना उन के असलहे छीन लिए. तीनों के हाथपैर बांध कर उन की आंखों में लाल मिर्च पाउडर झोंक दिया ताकि वह उन का विरोध न कर सकें.

इस के बाद उन्होंने उन्हीं असलहे के बल पर हमें बंधक बना हमारे हाथपैर रस्सियों से बांध कर हमें यहां फेंक दिया और बड़े सूटकेस में रुपए भर कर ले भागे. उन लुटेरों के बीच से किसी महिला की आवाज आ रही थी, जो उन्हें खूनखराबा से मना करती हुई जल्दीजल्दी काम निबटाने का हुक्म दे रही थी.

कर्मचारी हिम्मत सिंह और हरमिंदर सिंह से जानकारी जुटाने के बाद मैनेजर ने सीएमएस के सीनियर अधिकारी गोयल शेखावत को जानकारी दे कर उन्हें दफ्तर पहुंचने का आग्रह किया था. इस के बाद मैनेजर प्रवीण कुमार ने थाना सराभानगर पुलिस को फोन कर इस लूट कांड की जानकारी दे दी. मैनेजर की तहरीर पर इंसपेक्टर अरविंद सिंह ने आईपीसी के विविध धाराओं 395, 342, 323, 506, 427, 120बी और आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर आगे की आवश्यक काररवाई शुरू कर दी थी.

चूंकि मामला 11 करोड़ रुपए की डकैती से जुड़ा हुआ था, इसलिए पुलिस फूंकफूंक कर कदम रख रही थी ताकि उन की नजरों में कोई सबूत अथवा साक्ष्य छूट न जाए, जिस से अपराधियों को लाभ मिल सके.

खैर, पुलिस सीएमएस दफ्तर के चप्पेचप्पे को खंगालने में जुटी हुई थी. पड़ताल के दौरान पता चला था कि बदमाश अपने साथ सीसीटीवी की डीवीआर ले गए थे. दफ्तर में घुसते ही बदमाशों ने सब से पहले साइरन वाले सेंसर तार को काट दिया था, ताकि वह बज न सके. अगर साइरन बजता तो बदमाश अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकते थे, इसलिए उन्होंने घुसते ही साइरन के तार को काट दिए थे.

पुलिस को एक बात बहुत देर से परेशान कर रही थी कि बदमाशों को कैसे पता चला था कि कंपनी में सेंसर तार कहां लगा है. उसे ही पहले क्यों काटे? इस का मतलब शीशे के समान साफ है कि कंपनी का कोई कर्मचारी बदमाशों से मिला हुआ है. उसी की मुखबिरी से इतनी बड़ी घटना घटी. वह गद्दार वह आस्तीन का सांप कौन है? ये जांच का विषय था.

लावारिस हालत में मिली कैश वैन

पुलिस ने पीडि़त कर्मचरियों हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह से पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया, जो 11 करोड़ रुपए लूट की बात कही जा रही थी, लूट वाली रकम इतनी थी ही नहीं.

दरअसल, कंपनी के कैश चेस्ट में कुल 11 करोड़ संग्रह हुए थे, 7 करोड़ एक जगह और दूसरी जगह 4 करोड़ रखे थे, कर्मचारियों के बयानों के मुताबिक कुल रुपए 2 अलगअलग जगहों पर रखे गए थे. बदमाशों ने 11 करोड़ रुपए नहीं लूटे, बल्कि वे अपने साथ बड़े बैग में 7 करोड़ रुपए भर कर भागे थे. पुलिस पड़ताल के दौरान 4 करोड़ रुपए मौके से बरामद कर लिए गए, जो खुले हुए कैश बौक्स में रखे गए थे.

इतनी बड़ी रकम जिस बेपरवाह तरीके से रखी गई थी, घटनास्थल चीखचीख कर गहरी साजिश की ओर इशारा कर रही थी यानी कंपनी के ही किसी नमकहराम ने बदमाशों से मिल कर इस घटना को अंजाम दिया अथवा दिलवाया था. वह गद्दार कौन हो सकता है?

पुलिस जांचपड़ताल कर रही थी. वहीं पुलिस ने शक के आधार पर तीनों सिक्योरिटी गार्डों अमर सिंह, बलवंत सिंह और परमदीन खान को हिरासत में ले लिया कि जब इन के पास हथियार थे तो फायरिंग क्यों नहीं की. यह जांचपड़ताल करते दोपहर के 12 बज गए थे. तभी पुलिस को सूचना मिली कि लुधियाना के मोगा रोड पर मुल्लापुर दाखा गांव पंडोरी में एक कैश वैन लावारिस हालत में खड़ी पड़ी है. उस का पीछे का दरवाजा टूटा हुआ है और उस में 2 असलहे भी पड़े हैं जिन पर सीएमएस लिखा है, जिस का नंबर है- पीबी10जेए-7109.

सूचना मिलने के बाद इंसपेक्टर अरविंद सिंह मय फोर्स के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लावारिस हालत में मिली वैन की गहन छानबीन की. उस का पिछला दरवाजा टूटा पड़ा था और उस के अंदर 2 असलहे पड़े थे और कैश पूरी तरह से नदारद था.

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार