सुहागन से पहले विधवा बनी स्नेहा – भाग 1

23 वर्षीय गुलशन गुप्ता ड्यूटी से थकामांदा कुछ ही देर पहले घर पहुंचा था, तभी उस ने फोन देखा तो पता चला कि उस के जिगरी यार राहुल सिंह का कई बार फोन आ चुका था. उस ने सोचा कि पता नहीं राहुल ने क्यों फोन किया है.

झट से उस ने राहुल को फोन कर वजह पूछी तो राहुल बोला, ”गुलशन, तू घर पहुंच गया हो तो मेरे घर आ जा, कहीं चलना है.’’

”ठीक है, मैं आता हूं.’’ गुलशन ने कहा और उस ने अपनी मम्मी से चाय बनवाई.

वह चाय की चुस्की ले फटाफट हलक के नीचे गरमागरम उतारता गया. मिनटों में चाय की प्याली खाली कर अपनी बाइक निकाली और मम्मी को दोस्त राहुल के घर जाने की बात कह कर चल दिया. कुछ देर बाद वह राहुल के घर पहुंच गया था. यह बात 16 सितंबर, 2023  की है.

गुलशन गुप्ता पंजाब के लुधियाना जिले की डाबा थानाक्षेत्र के न्यू गगन नगर कालोनी में मम्मी सोनी देवी और 3 बहनों के साथ रहता था. उस के पापा की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. मां सोनी देवी और खुद गुलशन यही दोनों मिल कर परिवार की जिम्मेदारी संभाले हुए थे.

गुलशन का दोस्त 25 वर्षीय राहुल सिंह लुधियाना के माया नगर में अपने मम्मीपापा के साथ रह रहा था. वह अपने मम्मीपापा की इकलौती संतान था. सब का लाडला था. उस की एक मुसकान से मांबाप की सुबह होती थी. वह अपनी जो भी ख्वाहिश उन के सामने रखता था, वह पूरी कर देते थे. पापा अशोक सिंह एक प्राइवेट कंपनी में थे, पैसों की उन के पास कोई कमी नहीं थी, बेटे पर वह अपनी जान छिड़कते थे.

गुलशन को देख कर राहुल का चेहरा खुशी से खिल उठा था तो गुलशन ने भी उसी अंदाज में राहुल के साथ रिएक्ट किया था. वैसे ऐसा कोई दिन नहीं होता था, जब वे एकदूसरे से न मिलते हों. इन की यारी ही ऐसी थी कि बिना मिले इन्हें चैन नहीं आता था. ये जिस्म से तो दो थे, लेकिन जान एक ही थी.

खैर, राहुल गुलशन के ही आने का इंतजार कर रहा था. उस के आते ही उस की बाइक अपने घर के सामने खड़ी कर दी और बाहर खड़ी अपनी एक्टिवा ड्राइव कर गुलशन को पीछे बैठा कर मम्मी से थोड़ी देर में लौट कर आने को कह निकल गया.

दोनों दोस्त कैसे हुए लापता

राहुल सिंह के साथ गुलशन गुप्ता को निकले करीब 4 घंटे बीत गए थे, लेकिन न तो राहुल घर लौटा था और न गुलशन ही घर लौटा था. और तो और दोनों के सेलफोन भी बंद आ रहे थे.

राहुल के जितने भी दोस्त थे, पापा अशोक सिंह ने सब के पास फोन कर के उस के बारे में पूछा. यही नहीं लुधियाना में रह रहे अपने रिश्तेदारों और चिरपरिचितों से भी राहुल के बारे में पूछ लिया था, लेकिन किसी ने भी उस के वहां आने की बात नहीं कही.

दोनों के घर वालों ने रात आंखों में काट दी थी. अगले दिन 17 सितंबर को सुबह 10 बजे राहुल के पापा अशोक सिंह और गुलशन की मम्मी सोनी देवी दोनों डाबा थाने जा पहुंचे. उन्होंने राहुल और गुलशन के गायब होने की पूरी बात बता दी. गुलशन की मम्मी सोनी देवी ने बताया कि सर, हमें पूरा यकीन है कि हमारे बच्चों का अमर यादव ने अपहरण किया है.

”क्या..?’’ सोनी देवी की बात सुन कर इंसपेक्टर सिंह उछले, ”अमर यादव ने आप के बच्चों का अपहरण किया है? लेकिन यह अमर यादव है कौन और उस ने दोनों का अपहरण क्यों किया?’’

अमर यादव पर क्यों लगाया अपहरण का आरोप

सोनी देवी ने राहुल और गुलशन के अपहरण किए जाने की खास वजह इंसपेक्टर कुलवीर सिंह को बता दी. उन की बातों में दम था. फिर इंसपेक्टर ने राहुल और गुलशन की एक एक फोटो मांगी तो उन्होंने दोनों के फोटो उन के वाट्सऐप पर सेंड कर दिए.

सोनी ने लिखित तहरीर इंसपेक्टर कुलवीर सिंह को सौंप दी थी. इस बीच एक जरूरी काल आने के बाद अशोक सिंह वहां से जा चुके थे. उधर कुलदीप सिंह ने सोनी देवी से तहरीर ले कर अपने पास रख ली और आवश्यक काररवाई करने का आश्वासन दे कर उन्हें वापस घर भेज दिया था.

राहुल सिंह के पिता अशोक सिंह को एक परिचित ने फोन कर के बताया कि टिब्बा रोड कूड़ा डंप के पास लावारिस हालत में राहुल की एक्टिवा खड़ी है और वहीं मोबाइल फोन भी पड़ा है. यह सुन कर वह इंसपेक्टर कुलवीर सिंह से टिब्बा रोड चल दिए थे. वह जैसे ही वहां पहुंचे, सफेद एक्टिवा और मोबाइल देख कर अशोक पहचान गए, दोनों ही चीजें उन के बेटे राहुल की थीं.

अभी वह खड़े हो कर कुछ सोच ही रहे थे कि उसी वक्त एक और चौंका देने वाली सूचना उन्हें मिली. टिब्बा रोड से करीब 2 किलोमीटर दूर वर्धमान कालोनी से गुलशन का मोबाइल फोन बरामद कर लिया गया.

राहुल की एक्टिवा और दोनों के लावारिस हालत में पड़े हुए फोन की सूचना अशोक ने डाबा थाने के इंसपेक्टर कुलवीर सिंह को फोन द्वारा दे दी थी. सूचना मिलने के बाद कुलवीर सिंह मय दलबल के मौके पर पहुंच गए, जहां अशोक सिंह खड़े उन के आने का इंतजार कर रहे थे.

दोनों मोबाइल फोन बंद थे. इंसपेक्टर कुलवीर सिंह ने दोनों फोन औन किए. उन्होंने राहुल के फोन की काल हिस्ट्री चैक की तो पता चला कि बीती रात साढ़े 5 बजे के करीब उस के फोन पर एक नंबर से फोन आया था. उसी नंबर से 15 सितंबर को करीब 3 बार काल आई थी.

इंसपेक्टर सिंह ने इस नंबर पर काल बैक किया तो वह नंबर लग गया. काल रिसीव करने वाले से उस का नाम पूछा गया तो उस ने अपना नाम अमर यादव बताया और टिब्बा रोड स्थित रायल गेस्टहाउस का कर्मचारी होना बताया.

अमर यादव का नाम सुन कर वह चौंक गए, क्योंकि सोनी देवी ने भी बच्चों के अपहरण करने की अपनी आशंका इसी के प्रति जताई थी और राहुल के फोन में आखिरी काल भी अमर यादव की ही थी. इस का मतलब था कि राहुल और गुलशन के गायब होने में कहीं न कहीं से अमर यादव का हाथ हो सकता है.

जोरू और जमीन : लालची प्रेमी ने पहुंचाया जेल

जोरू और जमीन : लालची प्रेमी ने पहुंचाया जेल – भाग 3

प्रीति उर्फ कमलजीत कौर अपने भाई जोगा सिंह से 4 कदम आगे थी. खूबसूरत तो वह इतनी थी कि जिस की भी नजर एक बार उस पर पड़ जाती, हटाने का नाम नहीं लेता था. यही वजह थी कि राह चलते लोगों को पलक झपकते वह अपना दीवाना बना लेती थी. यही वजह थी कि प्रीती के जवान होते ही उस के चाहने वालों की लाइन लग गई थी. लेकिन वह सभी को मय के भरे प्याले की तरह अपनी जवानी को दूर से दिखा कर ललचाती रहती थी, किसी को हाथ नहीं लगाने देती थी.

उसी बीच उस के भाई जोगा सिंह के हाथों एक कत्ल हो गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. माता पिता बहन भाई के कारनामों से वैसे ही दुखी थे, इसलिए उन की ओर से जोगा की पैरवी का सवाल ही नहीं उठता था. इसलिए प्रीति को ही भाई को छुड़ाने की पैरवी करनी पड़ रही थी. वह सप्ताह में 2 बार उस से मिलने करनाल जेल भी जाती थी.

उन्हीं दिनों हरियाणा के जींद का रहने वाला विजय कुमार भी अपने दोस्त नरेश से मिलने सप्ताह में 2 बार करनाल जेल आता था. उसी दौरान प्रीति की मुलाकात विजय से हुई थी. विजय भी हृष्टपुष्ट एवं इस तरह का खूबसूरत युवक था कि कोई भी लड़की उसे देखे तो कम से कम एक बार उसे और देखने का मन हो जाए.

विजय शक्लसूरत और पहनावे से ठीकठाक तो लगता ही था, यह भी लगता था कि उस के पास पैसों की कमी नहीं है. जबकि सच्चाई यह थी कि वह हरियाणा के एक ऐसे अपराधी गिरोह का सदस्य था, जो लूटमार, अपहरण और डकैती आदि से मोटी कमाई कर रहा था.

बहरहाल, जेल में अपने अपने मिलने वालों का नाम लिखवा कर विजय और प्रीति जेल के बाहर बैठ कर मिलाई का इंतजार करते थे. प्रीति सुंदर तो थी ही, विजय खाली समय में उसे ही ताकता रहता था. स्मार्ट विजय प्रीति को भा गया, इसलिए वह भी उस से आंखें मिलाने लगी. परिणामस्वरूप जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई तो वे सब से अलग हट कर एकांत में एक साथ बैठने लगे. जल्दी ही दोनों की यह दोस्ती काफी गहरी हो गई.

विजय अपने दोस्त नरेश की जमानत की कोशिश कर ही रहा था, प्रीति से दोस्ती के बाद उस ने जोगा की जमानत के लिए कोशिश ही नहीं की, बल्कि पैसा भी पानी की तरह बहाया. उसी की कोशिश का नतीजा था कि नरेश के साथ जोगा को भी जमानत मिल गई.

नरेश और जोगा की जमानतें हो गईं तो विजय और प्रीति का करनाल जेल जाना बंद हो गया, लेकिन अब तक दोनों के संबंध इतने गहरे हो चुके थे कि वे कभी हिसार तो कभी जींद तो भी करनाल तो कभी कुरुक्षेत्र में मिलने लगे. विजय ने प्रीति पर जो एहसान किया था, वह उसे कैसे भूल सकती थी. धीरेधीरे वह विजय के इतने करीब आ गई कि घर वालों को बिना बताए ही विजय से कोर्टमैरिज कर ली.

मांबाप से तो वैसे भी कोई मतलब ही नहीं था, लेकिन बहन का यह कदम भाई जोगा सिंह को भी अच्छा नहीं लगा. अत: वह भी उस से नफरत करने लगा, क्योंकि वह विजय की असलियत अच्छी तरह जानता था.

शादी के बाद कुछ दिनों तक प्रीति विजय के साथ करनाल में रही, लेकिन उस के बाद विजय और नरेश उसे ले कर लुधियाना आ गए. लुधियाना के मुंडिया में किराए का मकान ले कर सभी एक साथ रहने लगे. दरअसल विजय का प्रीति से शादी कर के लुधियाना आने की वजह यह थी कि हरियाणा पुलिस, खासकर जींद पुलिस विजय और नरेश के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी. वे कभी भी ऐनकाउंटर में मारे जा सकते थे. इसलिए वे लुधियाना भाग आए थे. प्रीति से शादी उस ने इसलिए की थी कि पत्नी के साथ रहने पर लोगों को संदेह कम होता है और मकान वगैरह भी आसानी से मिल जाता है.

विजय और नरेश आपराधिक गिरोह के सदस्य हैं, यह बात प्रीति को पहले मालूम नहीं थी. लेकिन जब उसे इस बात का पता चला तो भी उस ने बुरा नहीं माना, क्योंकि वह ऐशोआराम से जीने की आदी थी. विजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. इस के अलावा उस के पास रुतबा भी था. उस के एक बार कहने पर विजय और नरेश किसी को भी गोली मार सकते थे.

विजय और प्रीति का दांपत्य ठीकठाक चल रहा था. लेकिन इस में दरार तब आ गई, जब विजय को अपने दोस्त नरेश को ले कर प्रीति पर शक हो गया. दरअसल हुआ यह कि एक दिन नरेश जल्दी घर आ गया. खाना खा कर वह प्रीति के पास बैठ कर बातें करने लगा. किसी बात पर दोनों हंस रहे थे कि तभी अचानक विजय आ गया. उस ने नरेश और प्रीति की इस हंसी का कुछ और ही नतीजा निकाल लिया.

अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की सोच कुछ ऐसी होती है. क्योंकि उन्हें जब स्वयं पर ही विश्वास नहीं होता तो वे दूसरे पर भला कैसे विश्वास कर सकते हैं. बस उसी दिन से विजय और प्रीति के बीच क्लेश शुरू हो गया. धीरेधीरे यह क्लेश इतना बढ़ गया कि प्रीति विजय से नफरत करने लगी.

उसी दौरान विजय के घर उस के गिरोह के सरगना सुरजीत का आना जाना शुरू हो गया. सुरजीत, बिट्टू और सोनू डागर का एक ऐसा गिरोह था, जिस का आतंक उन दिनों पूरे हरियाणा में था. इन के हाथ इतने लंबे थे कि जेल में रहते हुए भी ये आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहते थे. नरेश और विजय सुरजीत के गिरोह के सक्रिय सदस्य थे.

उसी बीच किसी बैंक को लूटने के चक्कर में सुरजीत कई दिनों तक विजय के घर रुका तो प्रीति की खूबसूरती पर वह रीझ गया. वहां रहते हुए उस ने देखा था कि विजय रोज शराब पी कर उस की पिटाई करता है. प्रीति की परेशानी को देखते हुए एक दिन उस ने कहा, ‘‘प्रीति, अगर तुम विजय को छोड़ दो तो मैं तुम्हें अपनाने को तैयार हूं. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि गिरोह का सरगना मैं हूं. विजय और नरेश मेरे गिरोह के सदस्य हैं. मेरे सामने इन की क्या औकात है. अगर मैं इन्हें अपने गिरोह से निकाल दूं तो इन्हें सड़क पर खड़े हो कर भीख मांगनी पड़ेगी.’’

प्रीति भी महसूस कर रही थी कि सुरजीत उस पर पूरी तरह से फिदा है. उस की बात में दम भी था. गिरोह का सरगना वही था. उस ने देखा भी था कि किसी की भी हिम्मत उस के सामने बोलने की नहीं होती थी. उस के सामने शेर बना रहने वाला विजय सुरजीत के सामने आंख तक नहीं उठाता था.

प्रीति सुरजीत की बात मान कर उस की झोली में जा गिरी. अब समस्या यह थी कि विजय से कैसे पीछा छुड़ाया जाए. अगर सुरजीत चाहता तो अपनी ताकत के बल पर भी प्रीति को अपने साथ भी रख सकता था. लेकिन इस में खतरा था. जोरू के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है. सामने से नहीं तो पीछे से विजय वार कर ही सकता था. इसलिए सुरजीत ने सोचा, विजय को खत्म कर दिया जाए. जब वह रहेगा ही नहीं तो वार कौन करेगा.

विजय से शादी की वजह से जोगा सिंह प्रीति से काफी नाराज था. इसी वजह से प्रीति को भी भाई से नफरत हो गई थी. जिस की वजह से वह भाई के बारे में कुछ और ही सोचने लगी थी. जोगा सिंह की पैतृक जमीन की कीमत करोड़ों में थी. उस पर उस का अकेले का कब्जा था. जब इस बात का पता सुरजीत को चला तो उस ने बहन भाई की नफरत को हवा दे कर प्रीति को उकसाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी करोड़ों की जमीन जोगा सिंह हड़पे हुए है. अगर उसे निपटा दिया जाए तो करोड़ों की वह जमीन तुम्हारी हो सकती है.’’

करोड़ों की जमीन के लालच में प्रीति भाई की हत्या कराने के लिए तैयार हो गई. इस के बाद वह सुरजीत को ले कर जींद के सापर गांव में रहने वाली अपनी बड़ी बहन बलजीत कौर के यहां भी गई. उस ने भी हामी भर दी, क्योंकि जोगा सिंह ने उसे भी हिस्सा नहीं दिया था.

इस के बाद सुरजीत ने जो योजना बनाई, उस के अनुसार पहले विजय और नरेश को ठिकाने लगा कर प्रीति को हासिल करना था. प्रीति के साथ आने के बाद उसे जोगा सिंह से प्रीति के हिस्से की जमीन मांगना था. अगर उस ने जमीन दे दी तो ठीक अन्यथा उसे ठिकाने लगा कर पूरी जमीन पर कब्जा कर लेना था. इस के बाद प्रीति को भी ठिकाने लगा कर करोड़ों की उस जमीन पर वह कब्जा कर लेता. इस योजना को अंजाम देने के लिए सुरजीत ने सोनू डागर को साथ मिला लिया.

यहां यह बताना जरूरी है कि सुरजीत और सोनू सजायाफ्ता अपराधी थे. करनाल के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के यहां से सुरजीत को उम्रकैद की सजा हुई थी. 6 साल की सजा काटने के बाद  वह 32 दिनों के पैरोल पर जेल से बाहर आया तो लौट कर गया ही नहीं. इस के बाद अदालत से उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया था.

जिस रात विजय और नरेश की हत्या हुई थी, उस से एक दिन पहले सुरजीत ने विजय को फोन कर के कहा था कि अगर वह लुधियाना में उस के रहने की व्यवस्था कर दे तो कुछ दिनों के लिए वह लुधियाना आ जाए. विजय ने ऊपर वाले जिस कमरे में नरेश रहता था, उसी में सुरजीत के रहने की व्यवस्था कर के उस ने उसे लुधियाना आने के लिए कह दिया था.

फिर उसी दिन शाम को सुरजीत और सोनू डागर समराला चौक पहुंच गए थे. विजय और नरेश वहां खड़े उन का इंतजार कर रहे थे. विजय उन्हें साथ ले कर अपने घर पहुंचा. घर जाते हुए रास्ते में उन्होंने खानेपीने की चीजें खरीद ली थीं. घर पहुंचते ही महफिल जम गई थी. सुरजीत को देख कर प्रीति खुशी से झूम उठी थी, क्योंकि उसे पता था उस दिन उसे विजय से मुक्ति मिल जाएगी.

योजना के अनुसार, सुरजीत ने विजय और नरेश को अधिक शराब पिला दी थी. उन की महफिल देर रात तक जमी रही. रात 11 बजे खाना खा कर सब सो गए. साढ़े 11 बजे के बाद सुरजीत उठा और बगल में सो रहे नरेश को गोली मार दी. नरेश को मार कर दोनों नीचे उतरे. नीचे आ कर सोनू ने सो रहे विजय को गोली मार कर उस का भी खेल खत्म कर दिया. प्रीति खड़ी तमाशा देखती रही.

साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाली प्रीति ने सुख और दौलत के लिए अपनी आंखों के सामने पति की हत्या करवा कर खुद को विधवा करवा लिया. विजय और नरेश की हत्या कर के सुरजीत और सोनू विजय के ही स्कूटर से चले गए. उन के जाने के बाद प्रीती ने अपना नाटक शुरू किया.

पूछताछ के बाद मैं ने प्रीती को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मैं ने सुरजीत और सोनू की तलाश में न जाने कहांकहां छापे मारे, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. मैं ने समय से इस मामले की चार्जशीट अदालत में पेश कर दी, जिस से मुकदमा चला. हत्या का षड्यंत्र रचने और पुलिस को गुमराह करने के जुर्म में प्रीति को 5 साल की सजा हुई. इस समय वह लुधियाना की जेल में अपनी सजा काट रही है. मजे की बात यह है कि सुरजीत और सोनू का पता आज तक नहीं चला है.

— प्रस्तुति : हरमिंदर खोजी

जोरू और जमीन : लालची प्रेमी ने पहुंचाया जेल – भाग 2

विजय के साथी ने आंखों से कोई इशारा किया तो विजय ने प्रीति की ओर देखते हुए कहा, ‘‘प्रीति, तुम थोड़ी देर के लिए बाहर चली जाओ. हमें एक जरूरी बात करनी है.’’

विजय की इस बात पर प्रीति हैरान रह गई. उस की समझ में नहीं आया कि ऐसी कौन सी बात है, जो आधी रात को होनी है, सुबह नहीं हो सकती. बात करने का यह भी कोई समय है.

प्रीति उतनी रात को बाहर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन विजय जिद पर अड़ गया. आधी रात को कोई तमाशा न खड़ा हो, यह सोच कर प्रीति गुस्से से पैर पटकती हुई बाहर निकल गई. प्रीति कमरे से बाहर निकली ही थी कि एक धमाका हुआ. वह गोली चलने की आवाज थी. गोली चलने की आवाज सुन कर वह तुरंत लौट पड़ी. वह कमरे के दरवाजे पर ही पहुंची थी कि अंदर से वह लड़का तेजी से प्रीति को धक्का दे कर निकल गया. उस के हाथ में पिस्तौल थी. पिस्तौल देख कर ही वह सारा मामला समझ गई.

तभी एक धमाका ऊपर हुआ. उस ने ऊपर की ओर देखा तो सीढि़यों से उस का दूसरा साथी उतर रहा था. दोनों लड़के नीचे मिले और बाहर गली में खड़े उस के स्कूटर को स्टार्ट किया. पीछे वाले लड़के ने प्रीति को पिस्तौल दिखा कर कहा, ‘‘हम लोगों के जाने तक चुप रहना. अगर शोर मचाया तो तुझे भी गोली मार दूंगा.’’

दोनों लड़के उसी के स्कूटर से चले गए. प्रीति असमंजस की स्थिति में किसी बुत की तरह खड़ी यह सब देखती रही. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. लड़कों के जाने के बाद वह भाग कर कमरे में गई. अंदर की हालत देख कर उस की सांस थम सी गई. बेड पर उस के पति की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के सीने से खून बह रहा था. यह देख कर उस के होश उड़ गए.

प्रीति चीखती चिल्लाती हुई मदद के लिए ऊपर के कमरे की ओर भागी. हड़बड़ाहट में उसे खयाल ही नहीं रहा कि ऊपर भी एक धमाका हुआ था. बेड पर पड़ी नरेश की लाश देख कर उसे उस धमाके की याद आ गई. नरेश की लाश उसी तरह पड़ी थी, जिस तरह विजय की लाश पड़ी थी. 2-2 लाशें देख कर प्रीति पागलों की तरह मदद के लिए चीखने लगी.

प्रीति का चीखनाचिल्लाना सुन कर आसपास वाले अपनेअपने घरों से बाहर आ गए, लेकिन हत्यारे तो कब के भाग चुके थे. पड़ोसी प्रीति को सांत्वना देने लगे.

इतनी जानकारी मिलने के बाद मैं ने प्रीति से हत्यारों का हुलिया जानना चाहा तो उस ने बताया, ‘‘दोनों की उम्र 30 साल के आसपास रही होगी. उन की लंबाई ठीकठाक थी. उन के सिर के बाल छोटेछोटे थे. एक ने जींस पर शर्ट पहन रखी थी तो दूसरे ने टीशर्ट.’’

प्रीती से पूछताछ के बाद एक बार फिर मैं ने प्रीति के पड़ोसियों से पूछताछ की. पड़ोसियों ने बताया था कि आधी रात को गोलियों के चलने की आवाज से उन की आंखें खुल गई थीं. उस के बाद स्कूटर स्टार्ट होने की आवाज आई थी. स्कूटर के चले जाने के कुछ देर बाद प्रीति के चीखनेचिल्लाने की आवाज आई तो सभी घर से बाहर आ कर उस की ओर दौड़ पड़े थे.

लुधियाना का मुंडियां कलां अभी नया बस रहा मोहल्ला था. इसलिए वहां के ज्यादातर प्लौट खाली पड़े थे. लेकिन यह मोहल्ला सुनसान भी नहीं था. प्रीति जिस गली नंबर 3 के मकान में रहती थी, उस गली में कोई भी प्लौट खाली नहीं था. मैं ने इंचार्ज सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह और हेडकांस्टेबल हरभजन सिंह को गुप्तरूप से इस मामले की जांच करने का आदेश दिया.

अब तक की जांच से यह पता चल गया था कि हत्यारे मारे गए लोगों की जानपहचान के थे. लेकिन बाद में जो जानकारियां मिलीं, वे चौंकाने वाली थीं. पड़ोसियों ने बताया था कि प्रीति का असली नाम कमलजीत कौर था. पतिपत्नी में लगभग रोज ही झगड़ा होता था. लेकिन वे इस झगड़े की वजह नहीं बता सके थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि झगड़े की वजह नरेश भी हो सकता था, क्योंकि वह शुरू से ही उन दोनों के साथ रह रहा था.

पड़ोसियों ने यह भी बताया था कि विजय और नरेश कोई खास कामधंधा नहीं करते थे. इस के बावजूद उन के खर्च शाही थे. इस का अंदाजा तो उन के घर को देख कर भी लगाया जा सकता था. क्येंकि घर में सुखसुविधा का हर सामान मौजूद था. इस का मतलब यह हुआ कि कहने को वे डोरविंडो फिटिंग का काम करते थे, लेकिन उन का असली काम कुछ और ही था. उन का रहनसहन, खानपान, पहनावा और खर्च देख कर कहीं से भी नहीं लगता था कि वे मेहनतमजदूरी करने वाले साधारण लोग थे.

बहरहाल, अब तक मेरी और सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह की जांच एवं पड़ोसियों से मिली जानकारी से यही नतीजा निकल रहा था कि इस दोहरे हत्याकांड की वजह कहीं न कहीं से अवैध संबंध हैं, क्योंकि अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि ये हत्याएं लूटपाट या आपसी रंजिश की वजह से नहीं हुई थीं. अगर ये हत्याएं रंजिश की वजह से हुई होतीं तो हत्यारे प्रीति को भी जिंदा न छोड़ते.

क्योंकि कोई भी अपराधी यह कभी नहीं चाहेगा कि उस के किए अपराध का कोई चश्मदीद गवाह जिंदा रहे. यह सोचने वाली बात थी कि घर के 2 लोगों की हत्या कर के हत्यारे प्रीति को जिंदा क्यों छोड़ गए? यह पता लगाना जरूरी था. क्योंकि इसी के पीछे विजय और नरेश की हत्या का रहस्य छिपा था. इसी बात को ध्यान में रख कर मैं ने अपनी जांच आगे बढ़ाई.

मैं ने कुछ विश्वसनीय और तेजतर्रार पुलिस वालों की एक टीम बना कर प्रीति के बारे में पता लगाने के साथ अपने कुछ मुखबिरों की भी मदद ली. टीम को मैं ने मारे गए विजय और नरेश के कामधंधे एवं उन के चरित्र के बारे में भी पता करने को कहा था. आखिर मेहनत रंग लाई और कुछ ही दिनों में जो नतीजा सामने आया, वह चौंकाने वाला था. मजे की बात यह थी कि इस दोहरे हत्याकांड की साजिश रचने वाली खुद प्रीति उर्फ कमलजीत कौर ही थी.

मेरे कहने पर सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह प्रीति को थाने ले आए. मैं ने उस से पूछताछ शुरू की तो वह उस हर बात से मना करती रही, जो मैं ने अपने सूत्रों से पता किया था. मैं ने उस पर दबाव बनाने की कोशिश की तो वह पुलिस को बुराभला कहते हुए बोली, ‘‘मेरे ही पति की हत्या हुई है. आप लोग हत्यारों को ढूंढ़ने के बजाय मुझे ही दोषी ठहराने पर तुले हैं.’’

जब मुझे लगा कि सीधी अंगुली से घी निकलने वाला नहीं है तो मैं ने पुलिसिया दांव आजमाने का मन बनाया. मैं ने उसे महिला पुलिस जसबीर कौर और सिमरन कौर के हवाले कर दिया. फिर तो थोड़ी ही देर में प्रीति अपना अपराध स्वीकार कर के इस दोहरे हत्याकांड की सच्चाई बताने को तैयार हो गई. इस के बाद उस ने विजय और नरेश की हत्याओं के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी:

प्रीति उर्फ कमलजीत कौर मूलरूप से हरियाणा के करनाल की रहने वाली थी. उस के परिवार में मातापिता के अलावा एक भाई जोगा सिंह था. मातापिता का नाम बताना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि वे शरीफ, सज्जन और इज्जतदार लोग हैं. जोगा सिंह और प्रीति, दोनों बचपन से उच्च महत्त्वाकांक्षी और स्वच्छंद प्रवृत्ति के थे. मौजमस्ती में डूबे रहने की वजह से दोनों ही ज्यादा पढ़लिख नहीं सके तो अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अपराधियों से संबंध बना लिए और अपहरण, लूटपाट, डकैती और हत्याओं जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने लगे.

जोरू और जमीन : लालची प्रेमी ने पहुंचाया जेल – भाग 1

इलाके की गश्त से लौटते लौटते मुझे सुबह के 4 बज गए थे. थाने आते ही मैं ने एक सिपाही से चाय बना कर लाने को कहा. पूरी रात गश्त करने की वजह से काफी थकान महसूस  हो रही थी, इसलिए कमर सीधी करने की गरज से मैं रेस्टरूम में पड़े बेड पर लेट गया.

सिपाही चाय बना कर लाता, उस के पहले ही मुंशी ने मेरे पास आ कर कहा, ‘‘सर, अभीअभी मुंडियां चौकी से वायलैस संदेश आया है कि गुरु तेगबहादुर नगर की गली नंबर-3 में किसी की हत्या कर दी गई है.’’

चूंकि संदेश स्पष्ट नहीं था, इसलिए अधिक जानकारी नहीं मिल सकी थी. लेकिन उस के बाद चौकीइंचार्ज सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह ने फोन कर के मुझे जल्दी घटनास्थल पर पहुचंने को कहा है. मुंशी अपना काम कर के चला गया था. हत्या की जानकारी मिलने पर चाय पीने का होश कहां रहा. चाय की बात भूल कर मैं उठा और परिसर में खड़ी जीप पर सवार हो कर ड्राइवर से मुंडिया चौकी की ओर चलने को कहा. मेरे जीप पर सवार होते ही मेरे साथ गश्त कर रहे सिपाही भी जीप पर सवार हो गए थे. सब के सवार होते ही जीप चल पड़ी थी.

मुंडिया चौकी, लुधियाना-चंडीगढ़ रोड पर मुंडियां गांव से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर थी. सड़क से गांव जाने वाली टूटीफूटी सड़क पर हम हिचकोले खाते हुए लगभग 25 मिनट में मुंडिया चौकी पहुंचे. चौकी का मुंशी हेडकांस्टेबल सुखविंदर सिंह चौकी पर ही मिल गया था. उसे साथ ले कर मैं घटनास्थल पर जा पहुंचा.

चौकीइंचार्ज वरनजीत सिंह और हेडकांस्टेबल हरभजन सिंह वहां पहले ही पहुंच गए थे. जिस घर में वारदात हुई थी, उस के सामने काफी भीड़ जमा थी. उन्हीं लोगों के बीच 24-25 साल की एक खूबसूरत औरत दहाड़े मार कर रो रही थी. पूछने पर पता चला कि इस का नाम प्रीति है और इसी के पति की हत्या हुई है.

‘‘जिस की हत्या हुई है, उस का नाम क्या है?’’ मैं ने सबइंसपेक्टर वरनजीत से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘सर, एक नहीं, 2 लोग मारे गए हैं. यह महिला रो रही है, इस के पति का नाम विजय कुमार था. दूसरा उस का साथी नरेश था. उस की लाश ऊपर के कमरे में पड़ी है.’’

एक ही मकान में 2-2 हत्याओं की बात सुन कर मैं चकरा गया. प्रीति का रोरो कर बुरा हाल था. वह छाती पीटपीट कर रो रही थी. आसपड़ोस की औरतें उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं. फिलहाल वह कुछ बताने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए मैं ने मोहल्ले वालों से घटना के बारे में पूछना शुरू किया. उन लोगों ने बताया कि 2 गोलियां चली थीं.

उस के बाद प्रीति गली में खड़ी हो कर चिल्ला रही थी, ‘‘मार दिया रे, मेरे पति को गोली मार दिया रे… पकड़ो… गोली मार कर वे भागे जा रहे है.’’

उस की चीखपुकार सुन कर ही लोग बाहर आए थे. मैं उन लोगों से जानना चाहता था कि गोली मारने वाले कौन थे, कहां से आए थे, उन्होंने दोनों को गोली क्यों मारी? लेकिन इस बारे में आसपड़ोस वाले कुछ नहीं बता सके थे. इस घटना की सूचना अधिकारियों को देने के साथ सुबूत जुटाने के लिए मैं ने क्राइम टीम को भी घटनास्थल पर बुला लिया. चौकीइंचार्ज वरनजीत सिंह के साथ मैं ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण किया.

लगभग 35-40 गज का वह 2 मंजिला मकान था. भूतल पर एक कमरा, रसोई, टायलेट था, तो ऊपर वाली मंजिल पर सिर्फ एक कमरा और उस के सामने बरामदा बना हुआ था. मारा गया विजय कुमार पत्नी प्रीती के साथ भूतल पर रहता था. ऊपर वाले कमरे में उस का दोस्त नरेश अकेला ही रहता था. वह विजय के साथ ही काम करता था और उस का खानापीना भी उसी के साथ होता था.

विजय कुमार की लाश नीचे वाले कमरे में बेड पर पड़ी थी. वह 26-27 साल का अच्छाखासा जवान था. उस के सीने पर एक सुराख था, जिस से उस समय तक खून रिस रहा था. सीने के उस सुराख को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस पर एकदम करीब से गोली चलाई थी.

मैं ने कमरे में एक नजर डाली. कमरे का सारा सामान यथावत था. किसी भी चीज के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई थी. अच्छी तरह निरीक्षण करने के बाद भी वहां से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला, जिस से हत्यारों तक पहुंचने में मदद मिलती.

इस के बाद मैं सबइंसपेक्टर वरनजीत सिंह के साथ ऊपर वाले कमरे में गया. उस कमरे का हाल भी लगभग नीचे वाले कमरे जैसा ही था. नरेश की उम्र भी 26-27 साल थी. उस की भी सीने में गोली मर कर हत्या की गई थी. कमरे में पड़े बेड के पास ही 3 कुरसियां और एक टेबल रखी थी. टेबल पर कांच के 4 खाली गिलास, बीयर की 4 खाली बोतलें, एक शराब की खाली बोतल, पानी का जग और एक प्लेट रखी थी, जिस में शायद खानेपीने का कोई सामान रखा गया था. इस का मतलब था कि हत्याएं होने से पहले सब ने एकसाथ बैठ कर शराब पी थी.

मेरे कहने पर वरनजीत सिंह ने वह सारा सामान कब्जे में ले लिया. क्राइम टीम ने भी अपना काम निबटा लिया तो अन्य औपचारिक काररवाई पूरी कर के मैं ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दीं. इस के बाद थाने लौट कर मैं ने अज्ञात लोगों के खिलाफ इस मामले का मुकदमा दर्ज करा कर जांच शुरू कर दी.

प्रीति का बयान लेने की गरज से उसी दिन दोपहर को मैं उस के घर पहुंचा. सांत्वना दे कर मैं ने उस से पूरी घटना के बारे में विस्तार से बताने को कहा.

प्रीति गुरु तेगबहादुर नगर की गली नंबर 3 निहाल सिंह वाली मुंडियां में स्थित मकान में अपने पति विजय कुमार के साथ किराए पर रहती थी. विजय कुमार ने वह पूरा मकान किराए पर ले रखा था. इसी मकान के ऊपर वाले कमरे में उस का दोस्त नरेश रहता था.

विजय अपने साथी नरेश के साथ मकानों और औफिसों में एल्युमिनियम की खिड़कीदरवाजे लगाने का काम करता था. काम न होने की वजह से उस दिन सुबह से ही दोनों घर पर थे. प्रीति एक ब्यूटीपार्लर में काम करती थी. उस दिन उस की साप्ताहिक छुट्टी थी, इसलिए वह भी घर पर थी.

करीब 3 बजे विजय ने प्रीति से कहा, ‘‘तुम 2-3 घंटे के लिए ब्यूटीपार्लर वाली अपनी सहेली के यहां चली जाओ. बाहर से मेरे कुछ दोस्त आ रहे हैं. उन से हमें कुछ व्यक्तिगत बातें करनी हैं, जो तुम्हारे सामने नहीं हो सकतीं.’’

विजय कुमार के कहने पर प्रीति अपनी सहेली के घर चली गई. उसी के साथ विजय और नरेश भी स्कूटर से अपने आने वाले दोस्तों को लेने के लिए समराला चौक की ओर रवाना हो गए थे. शाम 7 बजे के आसपास प्रीति वापस आई तो ऊपर वाले कमरे से बातचीत और हंसने की आवाजें आ रही थीं. प्रीति ने ऊपर जा कर कमरे में झांक कर देखा तो विजय और नरेश के साथ 2 लड़के बैठे थे. सब शराब पीते हुए आपस में हंसीमजाक कर रहे थे.

विजय के साथ बैठे उन लड़कों को प्रीति ने इस के पहले कभी नहीं देखा था. उसे देख कर विजय उठा और उस के पास आ कर बोला, ‘‘अच्छा हुआ तुम आ गईं. मैं तुम्हें फोन करने वाला था. तुम नीचे जाओ और सभी के लिए खाने का इंतजाम करो.’’

प्रीति नीचे आ गई और खाना बनाने लगी. 10 बजे तक उस का खाना बन गया तो वह बेड पर लेट गई, क्योंकि अभी तक ऊपर उन लोगों की महफिल जमी हुई थी. रात करीब 11 बजे विजय ने प्रीति से खाना लगाने को कहा तो उस ने खाना लगा दिया. खाना खा कर नरेश और बाहर से आए दोनों लड़के ऊपर वाले कमरे में सोने चले गए तो विजय और प्रीति नीचे वाले कमरे में लेट गए.

नशे में होने की वजह से विजय तुरंत सो गया, लेकिन प्रीति को नींद नहीं आ रही थी. लगभग आधे घंटे बाद विजय के दोनों दोस्तों में से एक ने नीचे आ कर कमरे का दरवाजा खटखटाया. प्रीति ने सोचा किसी को पानी वगैरह चाहिए, इसलिए उस ने दरवाजा खोल दिया. विजय का वह दोस्त धीरे से अंदर आ गया और कमरे में पड़े बेड पर बैठ गया. खटर पटर से विजय की भी आंख खुल गई थी. दोस्त को देख कर वह भी उठ कर बैठ गया.

फूल खिलने से पहले ही उजड़ गया गुलिस्तां

फूल खिलने से पहले ही उजड़ गया गुलिस्तां – भाग 4

अंत में अमितपाल ने फैसला लिया कि हरप्रीत कौर नाम की जिस लड़की से हरप्रीत की शादी हो रही है, उस लड़की की सुंदरता को नष्ट कर दिया जाए तो यह शादी अपने आप ही रुक जाएगी. पलविंदर ने भी उस की इस योजना का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘अगर हरप्रीत कौर के चेहरे पर तेजाब डाल कर जला दिया जाए तो हमारी योजना सफल हो जाएगी.’’

अमितपाल ने पलविंदर को यह काम करने के लिए 10 लाख रुपए की सुपारी दे दी और सवा लाख रुपए एडवांस भी दे दिए.

पलविंदर उसी दिन से इस योजना पर काम करने लगा. उस ने अपने साथ अपने चचेरे भाई सनप्रीत उर्फ सन्नी को शामिल कर लिया. दोनों कुरियर मैन बन कर बरनाला में जसवंत के घर पहुंच गए, लेकिन हरप्रीत से मुलाकात न होने पर उन की योजना सफल न हो सकी. उन्होंने 2-3 बार कोशिश की, लेकिन सफल न हो सके.

जैसेजैसे शादी के दिन निकट आते जा रहे थे, अमितपाल को इस बात की चिंता होने लगी थी कि कहीं उस के द्वारा दी गई धमकी झूठी न पड़ जाए. इसलिए उस ने पलविंदर पर दबाव डालना शुरू कर दिया. पलविंदर के कहने पर सन्नी ने राकेश कुमार प्रेमी, जसप्रीत और गुरुसेवक को अपनी इस योजना में शामिल कर लिया. इस के बाद उन्होंने हरप्रीत की रेकी करनी शुरू कर दी. इस काम के लिए वह कई बार बरनाला और लुधियाना भी गए.

उधर अमितपाल पैसों का लालच दे कर रंजीत सिंह के यहां काम करने वाले एक नौकर से फोन पर उन के यहां होने वाली हरेक गतिविधि की जानकारी लेती रही. कभीकभी वह अपने बच्चों से भी बात कर लेती थी. इस प्रकार घर बैठे वह पूरा नेटवर्क चलाती रही. रंजीत सिंह के यहां की हर खबर वह पलविंदर को बताती.

5 दिसंबर, 2013 को जब जसवंत सिंह का परिवार बरनाला से लुधियाना आ गया तो पलविंदर पूरी तैयारी के साथ लुधियाना चल पड़ा. उस ने अपने फूफा से यह कह कर उन की मारुति जेन कार संख्या पीबी03-5824 मांग ली कि वह अपने किसी दोस्त की शादी में जा रहा है. पलविंदर ने कार की नंबर प्लेट उतार कर उस पर पीबी11जेड9090 की फरजी नंबर प्लेट लगा दी. सभी लोग उसी कार से लुधियाना आ गए. एक दिन सभी लुधियाना रह कर हरप्रीत कौर की शादी की तैयारियों का जायजा लेते रहे.

6 दिसंबर को अमितपाल को रंजीत सिंह के नौकर और अपने बेटों द्वारा यह पता चला कि शादी वाले दिन यानी 7 दिसंबर को हरप्रीत कौर सुबह 7 बजे सराभानगर की किप्स मार्केट में स्थित लैक्मे सैलून ब्यूटीपार्लर में तैयार होने जाएगी. यह जानकारी उस ने पलविंदर को दे दी. जिस के बाद पलविंदर साथियों सहित किप्स बाजार पहुंच गया.

ठीक साढ़े 7 बजे हरप्रीत कार द्वारा पार्लर पहुंच गई. लेकिन उस समय उस के साथ उस के मातापिता और सहेलियां थीं, इसलिए वे काम को अंजाम न दे सके. मांबाप उसे ब्यूटीपार्लर में छोड़ कर कहीं चले गए. तब पलविंदर और उस के साथी बाहर खड़े हो कर हरप्रीत के तैयार हो कर लौटने का इंतजार करने लगे.

पलविंदर फोन द्वारा अमितपाल के संपर्क में था. जब 9 बजे तक हरप्रीत तैयार हो कर ब्यूटीपार्लर से बाहर नहीं निकली, तब वह पार्लर में चला गया और घटना को अंजाम दे डाला.

अमितपाल कौर से पूछताछ के बाद पुलिस ने पलविंदर सिंह उर्फ पवन उर्फ विक्की, मनप्रीत सिंह उर्फ सन्नी, जसप्रीत सिंह, गुरुसेवक बराड़ और राकेश कुमार को अलगअलग जगहों से गिरफ्तार कर लिया. उन्हें 9 दिसंबर, 2013 को न्यायालय में ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर 3 दिनों के रिमांड पर ले कर अहम सुबूत इकट्ठे किए. फिर सभी अभियुक्तों को 12 दिसंबर को पुन: न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया.

उधर डीएमसी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही हरप्रीत कौर की हालत दिनप्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी. उसे बचाने के लिए डाक्टरों की टीम लगी हुई थी. इसी दौरान घटना के 2 दिन बाद हरप्रीत को 2 बार होश आया. तब उस ने मां दविंदर से पूछा, ‘‘मां अब मेरी शादी होगी, क्या हनी (हरप्रीत) मुझ से शादी करेगा? क्या मैं ठीक हो जाऊंगी?’’

दविंदर कौर ने ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘हां बेटा, तू ठीक हो जाएगी.’’

पुलिस आयुक्त निर्मल सिंह ढिल्लो व थानाप्रभारी हरपाल सिंह को जब पता चला कि हरप्रीत को होश आ गया है तो वे उस से मिलने अस्पताल पहुंचे. पुलिस अधिकारियों से वह केवल इतना ही कह पाई, ‘‘सर, अपराधियों को सजा जरूर देना, उन्हें फांसी पर चढ़ा देना.’’ इस के बाद उस की हालत बिगड़ने लगी. उस की जुबान बंद हो गई.

उस के इलाज में जुटे डीएमसी अस्पताल के डाक्टरों ने जब देखा कि हरप्रीत की हालत सीरियस होती जा रही है तो उन्होंने उसे मुंबई के नेशनल बर्न सेंटर ले जाने की सलाह दी. तब पुलिस आयुक्त ने हरप्रीत कौर को मुंबई ले जाने के लिए एक विशेष विमान की व्यवस्था कराई और 13 दिसंबर, 2013 को विशेष विमान से उसे मुंबई भेजा. मुंबई के नेशनल बर्न सेंटर के डा. सुनील केसवानी के नेतृत्व में हरप्रीत कौर का इलाज शुरू हुआ.

वहां 20 दिनों तक इलाज होने के बाद हरप्रीत कौर की हालत में कोई सुधार न हुआ और 27 दिसंबर, 2013 को सुबह 5 बजे उस ने दम तोड़ दिया.

पुलिस आयुक्त निर्मल सिंह ढिल्लो ने हरप्रीत का शव लेने के लिए एक पुलिस पार्टी विमान द्वारा मुंबई भेजी. टीम ने मुंबई में ही हरप्रीत की लाश का पोस्टमार्टम कराया और विमान द्वारा डेड बाडी ले कर दिल्ली लौट आई. फिर सड़क मार्ग द्वारा बरनाला पहुंच कर उस के मातापिता को डेडबौडी सुपुर्द कर दी. हरप्रीत की मौत पर लोगों में आक्रोश बढ़ गया.

नारेबाजी करते हुए लोग सड़कों पर उतर आए तो प्रदेश सरकार के वित्तमंत्री परमिंदर सिंह ढींढसा मौके पहुंचे. उन्होंने मृतका के परिजनों को 5 लाख रुपए और परिवार के एक सदस्य को डीसी दफ्तर में नौकरी देने का वादा किया. इस के बाद ही हरप्रीत का अंतिम संस्कार किया गया.

यहां यह बताना आवश्यक है कि हरप्रीत पर तेजाब डाले जाने के बाद उस के ससुरालियों ने कोई सहायता नहीं की थी. सारा खर्च लुधियाना पुलिस आयुक्त निर्मल सिंह ढिल्लो और स्वयं सेवी संस्थाओं ने उठाया.

पुलिस ने अमितपाल और अन्य अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के भले ही जेल भेज दिया, लेकिन अमितपाल की सनक का खामियाजा हरप्रीत कौर ने दर्दनाक मौत के रूप में सहा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फूल खिलने से पहले ही उजड़ गया गुलिस्तां – भाग 3

इस के बाद एक दिन जसवंत सिंह के घर श्री गुरुग्रंथ साहिब का पाठ था. जो युवक पहले हरप्रीत कौर को गिफ्ट देने आए थे, वही दोनों उस दिन भी उन के यहां फिर आ गए. उस दिन भी वे हरप्रीत को गिफ्ट देने की बात कर रहे थे. वे हरप्रीत से मिलने की जिद कर रहे थे. जब जसवंत सिंह ने उन से कहा कि हरप्रीत किसी से नहीं मिलेगी. जो गिफ्ट है वह उन्हें ही दे दें तो उन्होंने गिफ्ट उन्हें नहीं दिया और वहां से चले गए.

शादी के लिए लड़के वालों ने लुधियाना का स्टर्लिंग रिजौर्ट बुक करा लिया था. तब फोन पर जसवंत सिंह को यह भी धमकी मिली कि वे लोग लुधियाना आएं. लेकिन उन्होंने धमकियों को गंभीरता से नहीं लिया. शादी की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. शादी से 2 दिन पहले जसवंत सिंह परिवार के साथ लुधियाना पहुंच गए.

रंजीत सिंह बेटे की शादी पूरे शानोशौकत के साथ करना चहते थे. तभी तो उन्होंने स्टर्लिंग रिजौर्ट को किसी फिल्म के सैट जैसा सजवा रखा था. शादी के समारोह में पंजाब और कोलकाता के कई वीआईपी के भी शामिल होने की संभावना थी, लेकिन ऐन मौके पर अमितपाल ने पल भर में इस खुशी को रंज में बदल दिया. लाखों रुपए से बना शादी का मंडप भी वीरान हो गया. शादी समारोह में शामिल होने के लिए जो लोग रिजौर्ट पहुंच रहे थे, दुखद समाचार सुन कर वे अस्पताल पहुंचने लगे थे.

पूरे प्रकरण में अब सवाल यह उठता है कि आखिर बेकुसूर हरप्रीत कौर के ऊपर तेजाब क्यों डाला गया. उस की न तो तेजाब फेंकने वाले से कोई दुश्मनी थी और न डलवाने वाली अमितपाल कौर से. फिर हरप्रीत कौर इस की शिकार कैसे बनी? इस बारे में पूछताछ करने पर अमितपाल कौर की दिलचस्प कहानी सामने आई.

अमितपाल कौर उर्फ डिंपी उर्फ परी लुधियाना के दुगरी के रहने वाले सोहन सिंह की बेटी थी. सोहन सिंह सन 2003 में पटियाला आ गए थे और वहां ग्रिड रोड स्थित रंजीतनगर में एक कोठी खरीद कर रहने लगे थे. उन के 2 बच्चे थे. एक बेटा और एक बेटी अमितपाल कौर.

अमितपाल की शिक्षा लुधियाना में ही हुई थी. महत्त्वाकांक्षी अमितपाल बचपन से ही स्वच्छंद और अपनी इच्छा से जिंदगी जीने की आदी थी. वह खूबसूरत तो थी ही. अपनी आदतों की वजह से वह युवा होने से पहले ही बहक गई थी. कई युवकों से उस के संबंध बन गए थे. उस के जिद्दी और झगड़ालू स्वभाव की वजह से पिता भी उस पर अंकुश नहीं लगा पाए थे. थकहार कर उन्होंने उसे उसी के हाल पर छोड़ दिया था.

अपनी मरजी से जिंदगी जीते हुए सन 2003 में उस ने सरदार रंजीत सिंह के बड़े बेटे तरनजीत सिंह से विवाह कर लिया और उस के साथ कोलकाता चली गई थी. कोलकाता में तरनजीत सिंह बार का बिजनेस संभालता था. शुरूशुरू में अपने प्यार से अमितपाल कौर ने रंजीत सिंह के परिवार का दिल जीत लिया, जिस के बाद रंजीत सिंह ने उसे अपने एक बार का कैशियर मैनेजर बना दिया.

शादी के कुछ दिनों बाद ही अमितपाल को पता चला कि उस का पति नपुंसक है. भले ही वह करोड़ों की संपत्ति की मालकिन बन गई थी, लेकिन पति की एक कमी ने उसे चिड़चिड़ा बना दिया था. इस के बाद घर में क्लेश होना शुरू हो गया.

इस तरह दिनप्रतिदिन वह परिवार पर हावी होती गई. अपनी शारीरिक कमजोरी की वजह से तरनजीत उस के सामने कुछ नहीं बोल पाता था. फिर भी वह उसे प्यार से समझाता, लेकिन अमितपाल कौर उस की एक न सुनती. वह यह समझता था कि अमितपाल को शायद कोई मानसिक प्राब्लम है, जिस की वजह से वह अकसर टेंशन में रहती है. इसलिए अपनी शारीरिक और पत्नी की मानसिक बीमारी का इलाज कराने के लिए तरनजीत सिंह पत्नी के साथ विदेश चला गया.

दोनों वहीं पर कई साल रहे. वहीं पर अमित पाल ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया. बाद में जिन के नाम अनंत और मिरर रखे गए. कुछ साल विदेश में रहने के बाद वे बच्चों के साथ कोलकाता लौट आए. वापस लौटने के बाद घरेलू झगड़ा, क्लेश कम होने के बजाय बढ़ता गया और तलाक तक की नौबत आ गई. तरनजीत सिंह का आरोप था कि अमितपाल कौर के कई लोगों से अवैध संबंध हैं. वह अधिकतर घर से बाहर रहती है और अपने प्रेमियों से मिलती है.

आखिर में इस विवाद का निपटारा तलाक होने पर ही खत्म हुआ. इस तलाक में अमितपाल कौर ने अपने ससुरालियों से करीब 74 लाख रुपए की चलअचल संपत्ति ली. तलाक के बाद अमितपाल दोनों बच्चों को तरनजीत के पास छोड़ कर मायके चली आई.

तरनजीत से तलाक होने के बाद अमितपाल पूरी तरह से आजाद हो गई थी. इस के बाद उस ने फरवरी, 2013 में एक एनआरआई अमरेंद्र सिंह से शादी कर ली. अमरेंद्र सिंह वेस्ट लंदन में रहता था. शादी के बाद वह वापस लंदन चला गया और अमितपाल अपने मायके पटियाला आ कर रहने लगी. लंदन जाने के बाद अमरेंद्र जैसे उसे भूल गया.

पटियाला में ही अमितपाल की मुलाकात पलविंदर सिंह उर्फ पवन से हुई. पलविंदर आपराधिक प्रवृत्ति का था, जिस वजह से उस के पिता अजीत सिंह ने उसे घर से बेदखल कर दिया था. अमितपाल को भी एक सहारे की जरूरत थी, इसलिए उस ने पलविंदर सिंह से नजदीकियां बना लीं. उन दोनों के बीच संबंध भी बन गए. फिर तो पलविंदर उस के इशारों पर नाचने लगा.

मार्च, 2013 में जब अमितपाल को इस बात का पता चला कि उस के पूर्व पति तरनजीत सिंह के छोटे भाई हरप्रीत की शादी बरनाला की एक खूबसूरत लड़की से तय हुई है तो बेवजह की एक सनक उसे चढ़ गई. उस ने ठान ली कि चाहे कुछ भी हो, वह उस के परिवार में किसी सदस्य की शादी नहीं होने देगी.

इसी ईर्ष्या के चलते उस ने अपने पूर्व ससुर रंजीत सिंह व पूर्व पति तरनजीत सिंह को भी धमकी दे डाली, ‘‘मैं तुम्हारे घर में दोबारा शहनाई नहीं बजने दूंगी.’’

ऐसी ही धमकी अमितपाल कौर ने तलाक के समय भी दी थी, इसलिए उन लोगों ने इस धमकी को गंभीरता से नहीं लिया था. अपने मन की बात उस ने अपने नए प्रेमी पलविंदर को भी बताई. अमितपाल के पास पैसे की कमी तो थी नहीं, जिस से वह कुछ भी करा सकती थी.

सब से पहले उस ने योजना बनाई कि कोलकाता जा कर इस परिवार का अनिष्ट किया जाए. काफी सोचनेविचारने के बाद भी वे दोनों ऐसा कोई ठोस विचार नहीं बना सके कि जिस से कोलकाता जा कर काम को आसानी से अंजाम दिया जा सके.

फूल खिलने से पहले ही उजड़ गया गुलिस्तां – भाग 2

उधर नगरवासियों का पुलिस पर दबाव बढ़ रहा था, जिस से पुलिस अधिकारी भी इस संवेदनशील मामले को ले कर बहुत चिंतित थे. डीसीपी ने इस केस को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी हरपाल सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में सबइंस्पेक्टर मनजीत सिंह, हेडकांस्टेबल अमरजीत सिंह, स्वर्ण सिंह, कमलजीत सिंह, बिशन सिंह, सुरेंद्र सिंह, महिला कांस्टेबल कलविंदर कौर व राजवंत कौर को शामिल किया गया.

थानाप्रभारी अब हरप्रीत के घर वालों से बात करना चाहते थे. उस समय उस के घर वाले डीएमसी अस्पताल में ही थे, इसलिए वह अस्पताल पहुंच गए. पूछताछ के दौरान हरप्रीत की मां दविंदर कौर से उन्हें कई काम की बातें मालूम हुईं.

उन्होंने बताया कि जब से हरप्रीत की शादी तय हुई है, तब से 2 युवक उन्हें कभी फोन पर तो कभी घर पर आ कर धमकी देते आ रहे थे. वे कहते थे कि अपनी लड़की की शादी वहां न करो, जहां कर रहे हो. 2 दिन पहले भी एक अनजान युवक हमारे घर फिर आया था. उस ने हम से फिर कहा था कि हरप्रीत की शादी करने लुधियाना न जाएं.

‘‘क्या हरप्रीत कौर उस युवक को जानती हैं?’’

‘‘नहीं, मेरी बच्ची उन्हें नहीं जानती.’’ दविंदर कौर ने कहा.

बातचीत में दविंदर कौर ने पुलिस को आगे बताया था कि वह बरनाला की रहने वाली हैं और विशाल नाम के किसी लड़के को नहीं जानतीं.

यह मामला कहीं एकतरफा प्यार का तो नहीं है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम बरनाला भेज दी और खुद एक बार फिर उसी ब्यूटीपार्लर में पहुंचे, जहां घटना घटी थी.

थानाप्रभारी ने ब्यूटीपार्लर के संचालक संजीव से पूछा, ‘‘हरप्रीत के मेकअप की बुकिंग किस ने करवाई थी और तब से अब तक पार्लर में हरप्रीत के बारे में किसकिस के फोन आए और फोन करने वालों से तुम्हारी क्याक्या बातें हुई थीं?’’

‘‘बुकिंग तो हरप्रीत कौर के घर वालों ने कराई थी, लेकिन यहां अमितपाल कौर नाम की एक महिला का फोन अकसर आता था. वह हरप्रीत कौर के बारे में ज्यादा पूछती थी. मसलन वह ब्यूटी ट्रीटमेंट लेने और मेकअप कराने कबकब पार्लर आएगी?’’

अमितपाल कौन है, इस बारे में थानाप्रभारी ने दविंदर कौर से बात की तो उन्होंने बताया कि अमितपाल कौर उर्फ परी उन के होने वाले दामाद हरप्रीत उर्फ हनी की तलाकशुदा भाभी है.

तलाकशुदा भाभी का ब्यूटीपार्लर में फोन कर हरप्रीत के विषय में पूछताछ करना थानाप्रभारी की समझ में नहीं आया. उन्होंने हरप्रीत कौर के होने वाले ससुर रंजीत सिंह से पूछा. रंजीत सिंह ने थानाप्रभारी को जो बात बताई, उस से उन के सामने मामले की तसवीर स्पष्ट होने लगी.

उन्होंने एक पुलिस टीम पटियाला स्थित अमितपाल कौर के घर भेज दी. अमितपाल घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे ले कर लुधियाना आई. पूछताछ में अमितपाल पहले तो इधरउधर की बातें करती रही, लेकिन जब उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो पता चला कि हरप्रीत कौर पर तेजाब डलवाने की मास्टरमाइंड वही थी. दिल दहलाने वाले इस मामले की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

पंजाब के बरनाला जिले के ढनोला रोड पर स्थित फतहनगर के रहने वाले जसवंत सिंह के परिवार में पत्नी दविंदर कौर के अलावा 2 बेटे और एक बेटी हरप्रीत कौर थी. बाल काटने की उन की एक दुकान थी. इसी पुश्तैनी काम से होने वाली आमदनी से वह घर का खर्च चलाते थे. तंगी झेल कर उन्होंने बच्चों की पढ़ाई कराई.

हरप्रीत कौर का पढ़ाई के प्रति उत्साह और लगन देख कर उन्होंने उसे बीएड कराया. वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन आर्थिक हालात के कारण वह उसे और नहीं पढ़ा सके. तब हरप्रीत ने सिलाईकढ़ाई सीख ली.  बेटी जवान थी और उस की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी, इसलिए जसवंत सिंह उस के लिए कोई अच्छा घरवर देखने लगे, ताकि वह उस के हाथ पीले कर सकें.

लुधियाना में हरप्रीत की बुआ भोली रहती थी. उस की मार्फत फरवरी, 2013 में हरप्रीत कौर की शादी की बात सरदार रंजीत सिंह के बेटे हरप्रीत सिंह उर्फ हनी से चली. रंजीत सिंह एक संपन्न व्यक्ति थे. वैसे तो वह मूलरूप से दोराहा के रहने वाले थे, लेकिन कई वर्ष पहले वह कोलकाता जा कर रहने लगे थे. वहां उन का होटल और बार का काफी बड़ा व्यवसाय था.

धनदौलत की उन के पास कमी न थी, इसलिए वह किसी गरीब और शरीफ खानदान की लड़की से अपने बेटे हरप्रीत उर्फ हनी की शादी करना चाहते थे. उन के पास जसवंत सिंह की बेटी हरप्रीत कौर की शादी का प्रस्ताव आया तो जांचपड़ताल करने के बाद उन्हें यह रिश्ता पसंद आया और उन्होंने बेटे की शादी के लिए हां कर दी और मार्च, 2013 में रिश्ता पक्का हो गया. 7 दिसंबर, 2013 को शादी का दिन भी मुकर्रर कर दिया गया.

जसवंत सिंह और रंजीत सिंह की हैसियत में जमीनआसमान का अंतर था. जसवंत सिंह तो बेटी के लिए अपनी हैसियत का परिवार देख रहे थे. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि बेटी के लिए इतना संपन्न परिवार मिलेगा. वह इस बात से खुश हो रहे थे कि बेटी को वहां किसी तरह की परेशानी नहीं होगी.

रिश्ता तय होने के कुछ दिनों बाद ही जसवंत सिंह के यहां किसी अज्ञात व्यक्ति के फोन आने शुरू हो गए. वह कहता था कि इस रिश्ते को तोड़ दो अन्यथा अंजाम अच्छा नहीं होगा. जसवंत सिंह परेशान होने लगे कि पता नहीं कौन है, जो इस तरह के फोन कर रहा है? उन्होंने इस बारे में अपने होने वाले समधी रंजीत सिंह से बात की.

तब रंजीत सिंह ने कहा, ‘‘कुछ लोगों से हमारी रंजिश है, इसलिए वही लोग आप के यहां फोन करते होंगे. लेकिन आप चिंता न करें. हमारी तरफ से ऐसी कोई बात नहीं है.’’

समधी से बात हो जाने के बाद जसवंत सिंह शादी की तैयारियों में जुट गए. शादी की तारीख से करीब एक, डेढ़ महीने पहले 2 अनजान युवक जसवंत सिंह के घर बरनाला आए. उन के हाथों में कुछ सामान था. उन्होंने कहा था कि वह हरप्रीत कौर की होने वाली ससुराल की तरफ से आए हैं. ये गिफ्ट हरप्रीत कौर को ही देने हैं.

जसवंत सिंह के पास पहले भी धमकी भरे फोन आए थे. उन्हें उन दोनों युवकों पर शक हो रहा था, इसलिए उन्होंने उन्हें बेटी से मिलने से मना कर दिया. इस के बाद वे युवक लौट गए थे.

जसवंत सिंह ने इस बारे में रंजीत सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी होने वाली बहू को कोई गिफ्ट नहीं भेजा था. इस बात को ले कर वह भी परेशान थे कि ऐसा कौन सा शख्स है, जो इस रिश्ते को तोड़वाने की कोशिश लगातार कर रहा है. उन्होंने जसवंत सिंह से भी कह दिया था कि ऐसे लोगों से सतर्क रहें.

फूल खिलने से पहले ही उजड़ गया गुलिस्तां – भाग 1

मन में हजारों सपने संजोए हरप्रीत कौर ने दहलीज से बाहर कदम रखा तो उस के पांव जमीन पर नहीं टिक रहे थे. भावी पिया की डोर से बंधने में  केवल 3 घंटे बचे थे. इसलिए वह अपने होने वाले पति की सूरत मन में बसाए इंद्रधनुषी सपनों की डोर में बंधी दूर उड़ी जा रही थी. 3 घंटे बाद यानी 10 बजे लुधियाना के महंगे और प्रसिद्ध स्टर्लिंग रिजौर्ट में उस की शादी हरप्रीत सिंह के साथ होनी थी.

रिजौर्ट में शादी का मंडप सजा हुआ था. मात्र 3 घंटे बाद उसे हरप्रीत सिंह की अर्धांगिनी बन जाना था. इसी सुखद अहसास और कल्पनाओं में वह खोई हुई थी. तभी उस की मां दविंदर कौर ने आवाज दी तो उस की तंद्रा टूटी. वह बोली, ‘‘जी मम्मी.’’

‘‘बेटा क्या सोच रही हो? 7 बज चुके हैं, जल्दी चलो. ब्यूटीपार्लर में तुम्हें काफी टाइम लगेगा.’’ दरअसल हरप्रीत को मेकअप कराने के लिए ब्यूटीपार्लर जाना था.

‘‘हां मम्मीजी, चलो मैं तैयार हूं.’’ हरप्रीत कौर बोली.

इस के बाद हरप्रीत कौर अपने मातापिता और सखियों के साथ इनोवा कार से साढ़े 7 बजे लुधियाना के सराभानगर स्थित लैक्मे सैलून नाम के ब्यूटीपार्लर पहुंच गई. उस के मेकअप के लिए लैक्मे सैलून को पहले से ही बुक करा रखा था. सैलून संचालक को 3 हजार रुपए भी पेशगी दे दिए थे.

सैलून पहुंचते ही संचालक संजीव गोयल ने हरप्रीत का मेकअप कराना शुरू कर दिया. उस समय हरप्रीत बहुत खुश थी. उसी दौरान करीब 9 बजे एक युवक पार्लर में घुसा. उस ने स्वेटशर्ट से अपना सिर ढक रखा था और मुंह पर रूमाल बांध रखा था. संजीव ने सोचा कि युवक ने ठंड से बचने के लिए यह किया होगा. उस के हाथ में प्लास्टिक का एक डिब्बा था.

पार्लर में घुसते ही वह उधर ही गया, जिधर हरप्रीत कौर का मेकअप किया जा रहा था. जितने बेधड़क तरीके से वह मेकअप केबिन में घुसा इसे देख कर संजीव गोयल ने सोचा कि यह शायद हरप्रीत कौर का कोई परिचित होगा और डिब्बे में दुलहन के लिए नाश्ता वगैरह लाया होगा. इसीलिए उस ने उस युवक को रोकने की कोश्शि नहीं की.

वह युवक लंबेलंबे डग भरता हुआ हरप्रीत के पास पहुंचा और ऊंची आवाज में धमकी देते हुए बोला, ‘‘मैं यह शादी हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

उस अनजान युवक को यह कहता देख हरप्रीत चौंकी. वह समझ नहीं पा रही थी कि यह युवक न मालूम कौन है, जो इस तरह की बातें कर रहा है. वह उस युवक से बोली, ‘‘आप कौन हैं और इस तरह की बातें क्यों कर रहे हैं?’’

उस की बात का कोई जवाब देने के  बजाय उस युवक ने एक पत्र हरप्रीत को पकड़ा दिया. हरप्रीत सोचने लगी कि पता नहीं यह कौन है और उस से क्या चाहता है? फिर भी उस ने उस युवक द्वारा दिए गए पत्र पर एक नजर डाली और गुस्से से उस पत्र को जमीन पर फेंक दिया. इस से पहले कि वह उस युवक से कुछ कह पाती, उस युवक ने डिब्बे में पड़ा तरल पदार्थ हरप्रीत के चेहरे पर फेंक दिया और उस डिब्बे को वहीं फेंक कर भाग खड़ा हुआ. यह सारा घटनाक्रम केवल 8 सेकेंड में घटा था, इसलिए कोई कुछ समझ नहीं पाया.

कुछ सेकेंड बाद हरप्रीत ने चीखना शुरू किया. हरप्रीत को तैयार कर रही ब्यूटीशियनों और बराबर की सीट पर बैठी एक और लड़की ने हरप्रीत की तरफ देखा तो उस के शरीर से धुआं उठ रहा था. यह देखते उन सभी को समझते देर न लगी कि उस युवक ने हरप्रीत के ऊपर तेजाब डाला है. वे चीखने लगीं.

आवाज सुन कर संजीव गोयल केबिन में पहुंचे तो पता चला कि जो युवक अंदर आया था, उस ने मेकअप करा रही हरप्रीत कौर के ऊपर तेजाब डाल दिया है. उस युवक को पकड़ने के लिए संजीव गोयल जब तक सैलून से बाहर आया, तब तक वह युवक मारुति जेन कार से भाग गया था. संजीव ने उस की कार का नंबर देख लिया था. उस कार में अन्य कई लोग बैठे थे.

हरप्रीत की हालत बहुत नाजुक थी. तेजाब इतनी अधिक मात्रा में डाला गया था कि वह उस के चेहरे से ले कर छाती, जांघों आदि से होता हुआ उस चेयर तक पहुंच गया था, जिस पर वह बैठी थी. तेजाब से उस चेयर की सीट तक जल गई थी. हरप्रीत तेजाब की जलन से तड़प रही थी. तेजाब की छीटें ब्यूटीशियनों पर भी पड़ी थीं.

संजीव ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को घटना की खबर दे दी और हरप्रीत कौर व अन्य घायलों को डीएमसी अस्पताल ले गया. सूचना मिलते ही सराभानगर के थानाप्रभारी हरपाल सिंह ग्रेवाल पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां उन्हें पता चला कि घायलों को डीएमसी अस्पताल पहुंचाया गया है तो वह भी अस्पताल पहुंच गए.

हरप्रीत की हालत बेहद नाजुक थी, इसलिए उसे आईसीयू में शिफ्ट कर के इलाज शुरू कर दिया गया. अन्य घायलों को उपचार के बाद अस्पताल ने छुट्टी कर दी. मामला बेहद गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना आला अधिकारियों को दे दी. जिस के बाद लुधियाना के पुलिस आयुक्त निर्मल सिंह ढिल्लो, अतिरिक्त आयुक्त जोगिंदर सिंह, सहायक आयुक्त हर्ष बंसल सहित कई उच्चाधिकारी डीएमसी अस्पताल पहुंच गए.

हरप्रीत के ऊपर तेजाब डालने की खबर उस के घरवालों और ससुराल पक्ष के लोगों को मिली तो वे भी अस्पताल पहुंच गए. हरप्रीत की हालत देख कर वे स्तब्ध थे और समझ नहीं पा रहे थे कि यह सब किस ने और क्यों किया, क्योंकि उन की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी.

इस के बाद तो जिस ने भी यह खबर सुनी, वह डीएमसी अस्पताल की तरफ चल दिया, जिस से कुछ ही देर में अस्पताल के अंदर और बाहर लोगों का हुजूम जमा हो गया. हरप्रीत से पहले शहर में ही राजवंत और उस की 2 सहेलियों पर भी तेजाब डाला गया था, जिन में से एक लड़की की मौत भी हो गई थी और राजवंत 50 प्रतिशत से अधिक जल गई थी. इसी कारण स्वयंसेवी संस्थाओं, सामाजिक संगठनों के अलावा आम जनता में पहले से आक्रोश भरा हुआ था. आंदोलनों के जरिए इन का गुस्सा पुलिस प्रशासन पर फूट पड़ा था.

डीएमसी अस्पताल के अंदर और बाहर लगे हुजूम में आक्रोश था. लोग कह रहे थे कि पुलिस के निष्क्रिय रहने की वजह से एक और तेजाब कांड हो गया. अगर पुलिस राजवंत और उस की सहेलियों पर तेजाब डालने वालों के खिलाफ कठोर काररवाई करती तो तेजाब डालने की यह घटना कतई न होती. भीड़ को देखते हुए भारी मात्रा में पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई थी. उधर डाक्टरों ने बताया कि हरप्रीत कौर 50 प्रतिशत से अधिक जली है और उस की हालत नाजुक है. इस वजह से पुलिस उस का बयान भी नहीं ले पा रही थी.

थानाप्रभारी हरपाल सिंह को यह मामला प्रेमसंबंध का लग रहा था. क्योंकि जितने भी इस प्रकार के तेजाब कांड हुए हैं, उन में से ज्यादातर केसों में सिरफिरे मजनुओं का ही हाथ रहा है. थानाप्रभारी ने जो जानकारी जुटाई, उस से पता चला कि सुबह 10 बजे हरप्रीत कौर की कोलकाता के रहने वाले हरप्रीत उर्फ हनी से शादी होने वाली थी. हनी के घरवालों ने शादी का प्रोग्राम लुधियाना के स्टर्लिंग रिजौर्ट में रखा था. वे सब लुधियाना के होटल में ठहरे हुए थे.

अब सवाल यह था कि ऐसा कौन सा शख्स था, जिस ने शादी से कुछ समय पहले ही शादी की खुशी को मातम में बदल दिया था. लेकिन इतना तो तय था कि वारदात में हरप्रीत कौर के किसी परिचित का हाथ रहा होगा, जिसे हरप्रीत कौर के यहां होने वाले हर कार्यक्रम की जानकारी थी.

इस बारे में पुलिस को हरप्रीत कौर, उस के घरवालों या ससुराल पक्ष के लोगों से बात कर के कोई क्लू मिलने की संभावना थी. हरप्रीत बयान देने की पोजीशन में नहीं थी और अन्य लोगों से थानाप्रभारी ने बाद में बात करना मुनासिब समझा. वह पहले उस ब्यूटीपार्लर में पहुंच गए, जहां यह घटना घटी थी.

ब्यूटीपार्लर में कई सीसीटीवी कैमरे लगे थे. थानाप्रभारी हरपाल सिंह ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर देखी और उस पत्र को भी देखा, जो हमलावर ने हरप्रीत कौर को दिया था. पत्र लिखने वाले ने अपना नाम विशाल लिखा था. सीसीटीवी फुटेज में जो शख्स दिखा था, उस ने अपने चेहरे पर रूमाल बांध रखा था और अपने सिर को स्वेटशर्ट से ढक रखा था. जिस से उस शख्स की शिनाख्त नहीं हो सकी थी.

पार्लर के संचालक संजीव से पुलिस को हमलावर की मारुति जेन कार का नंबर पीबी11-जेड9090 मिला. थानाप्रभारी को इस कार नंबर से हमलावर तक पहुंचने की उम्मीद थी, लेकिन जांच की गई तो यह कार नंबर फरजी पाया गया, जिस से थाना पुलिस की तफ्तीश आगे नहीं बढ़ सकी.