प्रेम में डूबी जब प्रेमलता – भाग 2

उन्होंने उस लडक़े को प्रेमलता से मिलने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महिला सिपाही रेनू सारस्वत को उस के पीछे लगा दिया कि वह किसी भी तरह उन की बातें सुनने की कोशिश करे. रेनू उधर से गुजरी तो लडक़ा कह रहा था, “तुम ने ताजमहल वाले फोटो जला दिए हैं न?”

“हां, जला दिए हैं. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?”

यह सुन कर रेनू चौंकी. वह तुरंत मुंशी मंसूर अहमद के पास पहुंची और उन से बता दिया कि प्रेमलता से जो लडक़ा मिलने आया है, वही बबलू है. मंसूर अहमद तेजी से बाहर आए. बबलू को शायद शक हो गया था, इसलिए वह तेजी से बाहर की ओर चला जा रहा था. मंसूर अहमद ने संतरी को आवाज देते हुए तेजी से उस की ओर दौड़े. आखिर उन्होंने उसे दबोच ही लिया.

इस के बाद उसे अंदर ला कर पूछताछ की गई तो एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस में प्रेम की राह में रोड़ा बनने वाले गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या कर दी गई थी. यह पूरी कहानी इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी का एक गांव है भरथरा, जहां महेशचंद फौजी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 4 बेटियां थीं. प्रेमलता उन में सब से बड़ी थी. उस ने बीए करने के बाद बीएड किया और नौकरी की तलाश में लग गई. इसी के साथ महेशचंद उस की शादी के लिए लडक़ा ढूंढऩे लगे.

महेशचंद की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी, बेटी भी पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह उस के लिए खातेपीते परिवार का पढ़ा लिखा लडक़ा तलाश रहे थे. इसी तलाश में उन्हें किसी से जिला एटा के थाना बागवाला के गांव लोहाखार के रहने वाले रामसेवक के बेटे गवेंद्र के बारे में पता चला तो वह उस के घर जा पहुंचे.

रामसेवक का खातापीता परिवार था. उस के पास ठीकठाक जमीन थी. गांव में पक्का मकान था, एक मकान मैनपुरी के नगला कीरतपुर में भी था. गवेंद्र ने पौलिटैक्निक करने के साथ बीए भी कर रखा था. वह नौकरी की तलाश में था.  महेशचंद को गवेंद्र प्रेमलता के लिए पसंद आ गया. उसे लगा कि गवेंद्र को जल्दी ही कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. उस के बाद उन की बेटी की जिंदगी संवर जाएगी.  उस ने गवेंद्र को प्रेमलता के लिए पसंद कर लिया और उस के साथ प्रेमलता की शादी कर दी.

प्रेमलता ससुराल आ गई. रामसेवक का छोटा सा परिवार था. पतिपत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी नीरज थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. इसलिए घर में सिर्फ 4 ही लोग बचे थे. प्रेमलता को पूरा विश्वास था कि उस के पति को जल्दी ही कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी. वैसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पति की कमाई की बात अलग ही होती है.

गवेंद्र नौकरी की कोशिश में लगा था, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही थी. इस बीच वह 2 बच्चों उमंग और तमन्ना का पिता बन गया. प्रेमलता खुद भी बीए, बीएड थी. लेकिन बच्चे छोटे थे, दूसरे गवेंद्र नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे, इसलिए प्रेमलता ने अपने लिए कोशिश नहीं की.

सन 2012 में गवेंद्र को मैनपुरी के कीरतपुर स्थित सेवाराम जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिल गई. नौकरी भले ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की थी, लेकिन सरकारी थी, इसलिए उस ने इसे जौइन कर लिया. लेकिन प्रेमलता को यह नौकरी पसंद नहीं थी, वह शायद किसी अधिकारी की बीवी बनना चाहती थी. चपरासी की बीवी कहलवाना उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था. इसलिए उस ने सोचा कि अब उसे ही कुछ करना होगा. वह अपने कैरियर के बारे में सोचने लगी. उस के बच्चे भी बड़े हो गए थे, इसलिए वह खुद कुछ कर के समाज में नाम और पैसा कमाना चाहती थी.

उसी बीच ससुराल जाते समय बस में उस की मुलाकात बबलू से हुई. बबलू भी उसी सीट पर बैठा था. रास्ते में बबलू उस के बच्चों से बातें करतेकरते उस से भी बातें करने लगा. उस ने बताया कि वह आगरा के आईआईएमटी कालेज से जीएनएम (जनरल नॄसग मिडवाइफरी) का कोर्स कर के आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल में नौकरी करता है.

जब प्रेमलता ने कहा कि उस ने भी बीए, बीएड किया है, लेकिन लगता नहीं कि उसे नौकरी मिलेगी तो उस ने कहा, “अगर तुम जीएनएम का कोर्स कर लो तो जल्दी ही तुम्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. रही बात दाखिले की तो वह तुम मुझ पर छोड़ दो.”

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. 2-4 दिन ससुराल में रह कर प्रेमलता पति के पास आई तो उस ने गवेंद्र से कहा, “भई अब इस तरह काम नहीं चलेगा. बच्चों के भविष्य के लिए मुझे भी कुछ करना होगा. बीए, बीएड से तो नौकरी मिल नहीं सकती, इसलिए मैं जीएनएम का कोर्स करना चाहती हूं. इस से किसी न किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी.”

गवेंद्र को लगा कि अब बच्चे समझदार हो गए हैं. ऐसे में प्रेमलता कुछ करना चाहती है तो इस में बुराई क्या है. वह प्रेमलता को जीएनएम का कोर्स कराने के लिए राजी हो गया. गवेंद्र के पिता रामसेवक रिटायर हो चुके थे. इसलिए अब वह भी उसी के साथ रहने लगे थे.

प्रेमलता ने बबलू की मदद से आईआईएमटी में अपना दाखिला करा लिया. बबलू उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने लगा. प्रेमलता की पढ़ाई शुरू हो गई. बबलू लायर्स कालोनी में कमरा किराए पर ले कर रहता था. प्रेमलता को भी उस ने उसी कालोनी में कमरा दिला दिया. अब दोनों की रोज मुलाकात होने लगी. बबलू प्रेमलता के कमरे पर भी आनेजाने लगा.

लगातार मिलने और कमरे पर आनेजाने से प्रेमलता और बबलू में प्यार ही नहीं हो गया, प्रेमलता ने उस से शारीरिक संबंध बना कर उस ने रिश्तों की मर्यादा भंग कर दी. सपनों को ख्वाहिश बनाया तो तन और मन से पति से ही नहीं, बच्चों से भी दूर हो गई.

बबलू को जब लगा कि प्रेमलता पूरी तरह से उस की हो गई है तो उस ने उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. तब प्रेमलता ने कहा, “बबलू यह सब इतना आसान नहीं है. क्योंकि गवेंद्र मुझे आसानी से छोडऩे वाला नहीं है.”

“तो ठीक है, मैं उसे रास्ते से हटाए देता हूं.” बबलू ने कहा तो प्रेमलता गंभीर हो कर बोली, “यह तो और भी आसान नहीं है.”

प्रेमलता भी अब गवेंद्र से छुटकारा पा कर बाकी की जिंदगी बबलू के साथ बिताना चाहती थी, लेकिन वह उसे छोड़ कर बबलू से शादी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने पर मायके वाले उस का साथ न देते. इसलिए वह बड़ी उलझन में फंसी थी. वह इस बारे में कुछ करती, उस के पहले ही उस की पोल खुल गई.

एक रात में टूटी दोस्ती की इमारत – भाग 1

जिला फर्रूखाबाद के थाना  मउ दरवाजा क्षेत्र में एक गांव है हथियापुर. इस के पास  कायमगंज रोड पर एक भट्ठा है, जिस का नाम है बजरंग भट्ठा. सुनसान जगह पर खेतों के बीच होने की वजह से भट्ठे के पास जरूरतमंद लोग ही आतेजाते हैं. भट्टे का मुनीम अरविंद कुमार सुबह को भट्ठे पर जाता है और कामकाज के बाद शाम को घर लौट आता है.

21 जुलाई 2014 को सुबह साढ़े 7 बजे जब अरविंद कुमार भट्ठे पर जा रहा था तो उस ने भट्ठे के पास के एक खेत में सिर कटी एक लाश पड़ी देखी. मृतक के शरीर पर केवल कच्छा बनियान था. अलबत्ता पास ही कुछ कपड़े जरूर पड़े थे. लाश देख कर अरविंद डर गया. उस ने उसी समय अपने मोबाइल से फोन कर के उस लाश से संबंधित सूचना थाना मउ दरवाजा को दे दी.

उस दिन सोमवार था, गंगा स्नान का दिन. थाना मउ दरवाजा के थानाप्रभारी राघवन सिंह पुलिस टीम के साथ घटियाघाट पर ड्यूटी के लिए गए हुए थे. थाने से उन के सीयूजी नंबर पर बजरंग भट्ठे के पास सिर कटी लाश पड़ी होने की सूचना दी गई.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी राघवन सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. सिर कटी लाश लगभग 30 वर्षीय व्यक्ति की थी. उस के शरीर पर केवल कच्छा बनियान था. जबकि लाश के पास ही कुछ कपड़े पड़े हुए थे. पुलिस ने उन कपड़ों को देखा, तो लगा उन में एक जोड़ी कपड़े मृतक के रहे होंगे. बाकी कपड़ों को देख कर लग रहा था जैसे उन्हें किसी बैग वगैरह से निकाल कर वहां डाले गए हों.

राघवन सिंह ने अनुमान लगाया कि हत्यारों ने वे कपड़े मृतक के बैग से निकाल कर वहां डाल दिए होंगे और मय बैग के उस में रखा कीमती सामान अपने साथ ले गए होंगे. पुलिस ने उन कपड़ों की तलाशी ली तो एक एटीएम कार्ड के अलावा कुछ नहीं मिला. एटीएम कार्ड आईसीआईसीआई बैंक का था और उस पर धारक का नाम गौहर अली लिखा था. पुलिस ने आसपास के खेतों में मृतक का कटा सिर खोजने की काफी कोशिश की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला.

प्राथमिक जांच के बाद पुलिस ने एटीएम कार्ड और कपड़े कब्जे में ले लिए और लाश का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए फर्रूखाबाद मोर्चरी भिजवा दिया.

एटीएम कार्ड से मृतक का पता चल सकता था, इसलिए थाने लौट कर राघवन सिंह ने सब से पहले एटीएम कार्ड की जांच कराई. पता चला कि वह कार्ड जयपुर के मोहल्ला बदनापुरा निवासी गौहर अली के नाम पर था. बदनापुरा जयपुर के थाना गलता गेट क्षेत्र में आता था. राघवन सिंह ने थाना गलता गेट की पुलिस  से रिक्वेस्ट कर के गौहर अली के परिवार से संपर्क करने को कहा.

स्थानीय पुलिस ने मोहल्ला बदनापुरा जा कर संपर्क किया तो गौहर अली के पिता शौकत अली घर पर ही मिल गए. उन्हें फर्रूखाबाद की घटना के बारे में बता दिया गया. उन का बेटा गौहर अली फर्रूखाबाद गया हुआ था. हत्या की बात सुन कर पूरा परिवार सन्न रह गया. शौकत अली दूसरे बेटे अनवर अली और कुछ लोगों के साथ अगले दिन यानी 22 जुलाई को फर्रूखाबाद पहुंच गए.

शौकत अली ने लाश के कपड़े और मृतक के शरीर पर तिल व अन्य निशानों को देख कर उस की शिनाख्त अपने बेटे गौहर अली के रूप में कर दी. पूरा माजरा समझने के बाद उन्होंने थाने में एक लिखित तहरीर दी, जिस में उन्होंने पैसों के लेनदेन के विवाद की वजह से बेटे की हत्या का आरोप उस के दोस्त जावेद पर लगाया. जावेद फर्रूखाबाद के ही मोहल्ला खटकपुरा इज्जत खां में रहता था.

तहरीर के मुताबिक जावेद ने ही गौहर को फोन कर के फर्रूखाबाद बुलाया था. वह 19 जुलाई की सुबह पहुंचा था. उस दिन रात को वह जावेद के घर रुका.

अगले दिन 20 जुलाई को वह जावेद के साथ थाना फर्रूखाबाद की असगर रोड पर रहने वाले अपने मामा आफाक उर्फ हद्दू के यहां भी गया. उस के बाद ही रात में किसी वक्त जावेद ने किन्हीं लोगों के साथ मिल कर गौहर की हत्या की होगी.

थाना प्रभारी राघवन सिंह ने शौकत अली की लिखित तहरीर के आधार पर जावेद के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.पोस्टमार्टम हो चुका था. लिखापढ़ी कर के पुलिस ने गौहर की लाश उस के पिता शौकत को सुपुर्द कर दी. शौकत अली बेटे की लाश ले कर अपने पैतृक गांव राजापुर जनपद कन्नौज चले गए.

जावेद को अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की बात पता चली तो वह अपनी सफाई देने खुद मऊ दरवाजा थाने जा पहुंचा. थानाप्रभारी राघवन सिंह ने जावेद को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि 20 जुलाई रविवार की रात 8 बजे वह गौहर को बाइक पर बस अड्डे ले गया था. उस के साथ उस के मोहल्ले का ही कासिम भी था. उन्होंने गौहर को आगरा जाने वाली बस में बैठा दिया था.

बस रवाना होने से पहले ही गौहर ने उन दोनों को वापस भेज दिया था. गौहर भट्ठे के पास कैसे पहुंचा और उस की हत्या कैसे हुई, उसे नहीं पता. उस ने यह भी बताया कि जो बाइक उस के पास है वह उस ने जयपुर में गौहर के नाम से ली थी, लेकिन उस की किस्तें वह खुद भर रहा है. पैसे के लेनदेन के बारे में उस ने बताया कि गौहर के उस पर 5 हजार रुपए बाकी हैं. जावेद के अनुसार गौहर का असगर रोड निवासी कल्लू से किसी बात को ले कर विवाद चल रहा था.

थानाप्रभारी ने कल्लू से पूछताछ की, लेकिन उस की घटना में संलिप्तता का कोई सुराग नहीं मिला. उस क्षेत्र के लोगों से पूछताछ की गई तो पता चला कि घटना वाले दिन गौहर को जावेद व कासिम के साथ देखा गया था. इस का मतलब यह था कि जावेद पुलिस को बरगलाने की कोशिश कर रहा था. यह पता चलने के बाद जावेद से कई चरणों में सख्ती के साथ पूछताछ की गई. अंतत: उस ने सारा सच उगल दिया.

जावेद से हुई पूछताछ के बाद जो कहानी पता चली वह कुछ इस तरह थी.

शौकत अली उत्तर प्रदेश की इत्र नगरी कन्नौज के थाना सौरिख क्षेत्र के गांव राजापुर के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी रफीका बेगम के अलावा 2 बेटे और 3 बेटियां थीं.उन के सब से बड़े बेटे अनवार का निकाह शहाना परवीन से हो चुका था. दोनों की कोई संतान नहीं थी. गौहर उर्फ रिंकू अभी अविवाहित था. बेटियों में शफीका, जरीना और निशात थीं. इन में केवल शफीका ही विवाहित थी. शफीका की शादी लखनऊ निवासी रिजवान से हुई थी. वह जयपुर में रह कर जरदोजी का काम करता था.

शौकत के पास खेती की जमीन तो थी, लेकिन उस में खेती करने से कोई फायदा नहीं होता था. यह देख कर शौकत ने कुछ और करने की ठानी. उन के दोनों बेटे भी जवान और अपने पैरों पर खड़े होने लायक थे.उन का दामाद रिजवान पहले से ही जयपुर में था और जरदोजी के काम में अच्छाभला कमा लेता था.

शौकत ने जयपुर जा कर जरदोजी के काम में अपनी किस्मत आजमाने की सोची. 10 साल पहले वह जयपुर चले गए और वहीं दामाद के साथ रह कर जरदोजी का काम करने लगे. उन्होंने दोनों बेटों को भी इस काम में लगा दिया. इस तरह पूरा परिवार जयपुर में रहने लगा. पहले यह परिवार किराए के मकान में रहता था, बाद में शौकत ने गाल्टा गेट थाना क्षेत्र के बदनापुरा मोहल्ले में अपना मकान बनवा लिया.

मां के प्रेम का जब खुला राज – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले का एक ऐतिहासिक कस्बा है- कालपी. इसी कालपी कस्बे के स्टेशन रोड पर नरेश कुमार तिवारी सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी उमा के अलावा 2 बेटियां राधा व सुधा थीं. नरेश कुमार प्राइवेट नौकरी करते थे. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. बड़ी मुश्किल से वह परिवार की दोजून की रोटी जुटा पाते थे.

गरीबी में पलीबढ़ी राधा जब जवान हुई तो उस के रंगरूप में निखार आ गया. हर मांबाप बेटी के लिए अच्छा घर तथा सीधा शरीफ वर ढूंढते हैं, वे यह नहीं देखते कि बेटी ने अपने जीवनसाथी को ले कर क्या सपने संजोए हुए हैं. राधा के मातापिता ने भी बेटी का मन नहीं टटोला. उन्होंने अश्वनी दुबे से उस का विवाह रचा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री भर कर दी.

अश्वनी के पिता ओमप्रकाश दुबे जालौन जिले के माधौगढ़ थाना अंतर्गत सिरसा दोगड़ी गांव के निवासी थे. अश्वनी दुबे उन का इकलौता बेटा था. ओमप्रकाश किसान थे. किसानी में बेटा अश्वनी भी उन का हाथ बंटाता था. खेती के अलावा वह दुधारू जानवर भी पाले हुए थे. दूध के कारोबार से उन की अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी.

अश्वनी दुबे जैसा मेहनती और सीधासादा दामाद पा कर नरेश कुमार निश्ंचत हो गया था कि बेटी का जीवन संवर गया. राधा के मन के दर्पण में क्याक्या दरका, यह कोई नहीं जानता था. राधा एक महत्त्वाकांक्षी युवती थी. उस ने अपने मन में सपना संजोया हुआ था कि शादी के बाद उस के पास बड़ा सा घर, खूब सारा पैसा और स्मार्ट पति होगा. लेकिन मिला क्या? मामूली सा घर और रोटी के लिए जूझता हुआ मामूली सा पति.

अश्वनी के पास थोड़ी सी जमीन थी, जिस के सहारे वह गृहस्थी की नैया को खे रहा था. ससुर और पति के खेत पर चले जाने के बाद राधा अपने टूटे हुए सपनों को जोडऩे की उधेड़बुन में लगी यही सोचती कि अब कभी उस की चाहतें पूरी नहीं होंगी.

बहरहाल, शादी हुई थी तो निभाना ही था और बच्चे भी होने ही थे. राधा ने पहले बेटी साहनी को जन्म दिया, उस के बाद बेटे को. लेकिन 2 बच्चों के बाद भी राधा दिल से अश्वनी के साथ जुड़ नहीं पाई. उसे हमेशा यह एहसास सालता रहता था कि उसे मनपसंद पति नहीं मिला.

राधा के पड़ोस में रहता था नेत्रपाल सिंह. वह कुंवारा था. पड़ोसी होने के नाते उस का राधा के घर आनाजाना था. राधा को वह भाभी कहता था. देवरभाभी के नाते कभीकभार राधा उस से हंसबोल लिया करती थी.

एक दिन राधा गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार में गई तो वहां उसे नेत्रपाल सिंह मिल गया. नेत्रपाल सिंह ने उस से कहा, “भाभी, चलो आज आप को चाट खिलाऊं. वो देखो, उस ठेले पर कनपुरिया चाट मिलती है.”

चाट का नाम सुन कर राधा के मुंह में पानी आ गया. फिर वह सकुचाते हुए बोली, “लेकिन मेरे पास तो अब पैसे बचे ही नहीं है.”

“अरे भाभी, पैसों की बात मत करो, मैं हूं न, मैं खिलाउंगा तुम्हें.”

राधा उस की बात टाल नहीं सकी. चाट वाले के पास पहुंच कर नेत्रपाल सिंह बोला, “यार रामू, जरा बढिय़ा सी चाट खिलाना हमारी भाभी को.”

नेत्रपाल डालने लगा राधा पर डोरे

कुछ ही देर में चाट का पत्ता राधा के हाथ में था. राधा ने चाट खाई, फिर पानी पूरी भी खाई. चूंकि रामू नेत्रपाल सिंह का दोस्त था, अत: उस ने राधा को भरपूर आदर के साथ हर चीज पेश की. चाट खाने के बाद नेत्रपाल सिंह ने रामू को पैसे देने चाहे तो उस ने नाराजगी से कहा, “कैसी बात करता है यार, तेरी भाभी मेरी भाभी नहीं है क्या?”

बाजार से लौटते वक्त नेत्रपाल ने राधा का थैला उठाया और उसे घर के बाहर तक छोड़ गया. रास्ते में दोनों के बीच खूब बातें हुईं. नेत्रपाल का बातबात में खिलखिलाना और राधा के चेहरे को निहारना, उसे अच्छा लगा था. पहली बार उस ने नेत्रपाल को गौर से देखा था. वह स्मार्ट भी था और स्वस्थ भी. राधा की कद्र भी खूब कर रहा था.

जाते वक्त उस ने नेत्रपाल का शुक्रिया अदा किया तो वह हंसते हुए बोला, “मेरी सारी मेहनत को इस एक शब्द में बहा दिया न भाभी आप ने. अपनों को भी शुक्रिया कहा जाता है क्या?”

उस की यह अदा भी राधा को बहुत अच्छी लगी थी. उस सारी रात राधा की आंखों में नेत्रपाल सिंह का चेहरा ही घूमता रहा. उस का अपनापन, उस का अंदाज उस के उदास मन की तनहाइयों को सहलाता रहा.

तीसरे दिन की बात थी. राधा को सुबह खाना बनाने में देर हो गई थी. अश्वनी ने कहा, “राधा हमारा खाना तुम खेत पर ही दे जाना.”

खाना बना कर राधा ने टिफिन में डाला. बेटी को पड़ोस के घर छोड़ा और मासूम बेटे को गोद में ले कर वह खेत की ओर बढ़ चली. टिफिन पति को थमा कर वह खेत से घर की ओर आ ही रही थी कि रास्ते में नेत्रपाल सिंह टकरा गया. देखते ही बोला, “अरे भाभी, तुम यहां?”

“हां, तुम्हारे भैया का खाना देने खेत पर गई थी.” राधा ने मुसकरा कर जवाब दिया.

“लाओ बेटे को हमें दे दो. हम ले कर चलते हैं,” कहते हुए नेत्रपाल सिंह ने राधा की गोद से बच्चा ले लिया.

बच्चा पकड़तेे वक्त उस की अंगुलियां राधा के उरोजों के साथसाथ उस के हाथों को छू गईं. पता नहीं उस स्पर्श में ऐसा क्या था कि राधा की देह में एक सनसनी सी भर गई. पति के स्पर्श से उस ने कभी ऐसा रोमांच महसूस नहीं किया था.

घर पहुंच कर नेत्रपाल ने अनुज को गोद से उतार कर राधा की गोद में दे दिया तो एक बार फिर दोनों की अंगुलियां टकरा गईं. वही सनसनी फिर राधा की देह से गुजर गई. नेत्रपाल ने मुसकरा कर कहा, “अब चलता हूं भाभी.”

“अरे ऐसे कैसे जाओगे? तुम ने मेरी इतनी मदद की है, बदले में मेरा भी तो फर्ज बनता है. अंदर चलो, चाय पी कर जाना.” कहते हुए राधा ने घर का ताला खोला और नेत्रपाल का हाथ पकड़ कर उसे अंदर ले आई.

भीतर आ कर उस ने बेटे को गोद से उतार कर बिस्तर पर लिटा दिया. इस के बाद उस ने साड़ी का पल्लू सिर से उतारा ही था कि झटके से उस का जूड़ा खुल गया. लंबे बाल कंधों पर लहराने लगे. नेत्रपाल को राधा की यह दिलकश अदा भा गई.

प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल – भाग 1

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना भोजीपुरा का एक गांव है कैथोला बेनीराम. जसवीर अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. गांव का वह बेहद संपन्न किसान था.

22 नवंबर को वह बरेली शहर में रह कर पढ़ रहे अपने तीनों बच्चों से मिलने जाने लगा तो पत्नी गुरप्रीत से कहा कि चाहे तो वह भी साथ चल सकती है. गुरप्रीत को भी तीनों बच्चों से मिले काफी समय हो गया था, इसलिए उस ने सोचा कि वह भी चली जाए. एक तो बच्चों से मुलाकात हो जाएगी, दूसरे वहां से वह अपनी जरूरत के सामान भी खरीद लेगी.

गुरप्रीत तैयार हो गई तो जसवीर उसे मोटरसाइकिल से बरेली ले गया. पहले गुरप्रीत ने खरीदारी की, उस के बाद दोनों बच्चों से मिलने गई. मम्मीपापा को साथ आया देख कर बच्चे काफी खुश हुए. बच्चों से मिलने में उन्हें काफी देर हो गई. गुरप्रीत की इच्छा बच्चों को छोड़ कर घर आने की नहीं हो रही थी, लेकिन जब अंधेरा होने लगा तो जसवीर ने उस से घर चलने को कहा.

गुरप्रीत को भी लगा कि देर करना ठीक नहीं है, इसलिए बच्चों को प्यार कर के वह पति के साथ मोटरसाइकिल से गांव की ओर चल पड़ी. जाड़े के दिनों में दिन छोटा होने की वजह से अंधेरा जल्दी घिर आता है. जसवीर जल्दी घर पहुंचना चाहता था, इसलिए वह खेतों के बीच बनी सडक़ से तेजी से घर की ओर चला जा रहा था.

रास्ता सुनसान था. जैसे ही वह गांव के पास नत्थू मुखिया के खेतों के नजदीक पहुंचा, 2 मोटरसाइकिल सवारों ने उसे ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस के आगे अड़ा दी. मजबूरन जसवीर को अपनी मोटरसाइकिल रोकनी पड़ी. तभी एक और मोटरसाइकिल उस के पीछे आ कर इस तरह खड़ी हो गई कि वह उन लोगों से बच कर भाग न सके. दोनों मोटरसाइकिलों पर बैठे चारों लोग उतर कर उस के सामने आ गए.

जसवीर कुछ समझ पाता, उन में से एक ने तमंचा निकाल कर उस पर गोली चला दी. गोली उसे लगने के बजाय उस के सिर को छूते हुए निकल गई. उस ने दूसरी गोली चलाई तो वह उसे लगने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी गुरप्रीत की कनपटी पर जा लगी. वह नीचे गिर कर तड़पने लगी.

सडक़ से थोड़ी दूरी पर जसवीर के चाचा नरेंद्र सिंह और मामा बलविंदर सिंह खेतों में पानी लगाए हुए थे. गोली चलने की आवाज सुन कर वे उस की ओर दौड़े तो उन्हें आते देख कर बदमाश भाग गए. जसवीर ने मोटरसाइकिल की हैडलाइट के उजाले में हमलावरों में से एक को पहचान लिया था. उस का नाम नबी बख्श था और वह उस से रंजिश रखता था. बाकी लोगों के चेहरों पर कपड़ा बंधा था, इसलिए वह उन्हें नहीं पहचान पाया था.

बदमाशों के भाग जाने के बाद जसवीर चाचा और मामा की मदद से बुरी तरह से घायल गुरप्रीत को अस्पताल ले जा रहा था कि रास्ते में उस की मौत हो गई. लाश अस्पताल में ही छोड़ कर वह थाना भोजीपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी अनिल कुमार सिरोही को पूरी बात बताई.

अनिल कुमार सिरोही पुलिस बल ले कर जसवीर के साथ अस्पताल पहुंचे और लाश का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर जसवीर ने नबी बख्श और उस के 3 अज्ञात साथियों के खिलाफ जो तहरीर दी, उसी के आधार पर अपराध संख्या 637/2015 भादंवि की धारा 302/307 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद अनिल कुमार सिरोही ने नामजद नबी बख्श और उस के साथियों को पकडऩे के लिए एक टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई, कांस्टेबल धीरेंद्र सिंह, संजीव कुमार आदि को शामिल किया. इस का नेतृत्व वह खुद कर रहे थे. वह टीम के साथ नबी बख्श की तलाश में उस के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गया.

वह उसे हिरासत में ले कर थाने ले आए और जब उस से जसवीर पर जानलेवा हमला और उस की पत्नी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो उस ने कहा कि जिस समय जसवीर घटना को अंजाम देने की बात कर रहा है, उस समय तो वह कुछ लोगों के साथ अपने घर पर था.

अनिल कुमार सिरोही ने जब नबी बख्श के बयान की उन लोगों से तसदीक की तो बात सही निकली. तब नबी बख्श ने कहा, ‘‘साहब, कुछ दिनों पहले औटो में बैठने को ले कर मेरा जसवीर से झगड़ा हुआ था. उस झगड़े में मारपीट भी हो गई थी. उसी मारपीट का बदला लेने के लिए जसवीर उसे और उस के साथियों को झूठे मुकदमे में फंसा रहा है.’’

अनिल कुमार सिरोही को नबी बख्श निर्दोष लगा तो उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. अब सवाल यह था कि नबी बख्श ने गुरप्रीत की हत्या नहीं की थी तो हत्या किस ने की थी? उस की जसवीर से क्या रंजिश थी?

गुरप्रीत के हत्यारों को पकडऩे की पुलिस के सामने कठिन चुनौती थी. थाना भोजीपुरा पुलिस गुरप्रीत के हत्यारों की तलाश कर ही रही थी कि पंचायत चुनाव पड़ गए, जिस से इस मामले पर वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई. चुनाव खत्म होते ही अनिल कुमार सिरोही गुरप्रीत के हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे कि 16 दिसंबर की शाम 4 बजे जसवीर घायल अवस्था में थाना भोजीपुरा पहुंचा. उस के पेट में गोली लगी थी, जहां से उस समय भी खून बह रहा था.

संयोग से गोली एकदम किनारे लगी थी. एक तरह से वह मौत के मुंह में जाने से बालबाल बचा था. इस बार भी उस ने गोली मारने का आरोप नबी बख्श पर लगाया. जसवीर ने भले ही नबी बख्श पर आरोप लगा कर तहरीर दी थी, लेकिन थानाप्रभारी ने इस बार नामजद मुकदमा दर्ज कराने के बजाय अपराध संख्या 680/2015 पर भादंवि की 307 के तहत अज्ञात हमलावर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

एक तो अनिल कुमार ने नबी बख्श को छोड़ दिया था, दूसरे इस बार जब उस के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज नहीं किया तो जसवीर को यह बात बड़ी नागवार गुजरी, लेकिन वह कुछ करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए चुपचाप चला गया.

अनिल कुमार सिरोही की समझ में नहीं आ रहा था कि जसवीर आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? वह जिस तरह हमलों में बारबार बचा जा रहा था, उस से उन्हें लगा कि कहीं वह खुद तो ऐसा नहीं कर रहा? जसवीर जिस तरह नबी बख्श पर आरोप लगा रहा था, उस से उन्हें उस पर शक हुआ.

सावधान! ऐसे दोस्तों से : दोस्त की बेटी पर बुरी नजर – भाग 1

मुरादाबाद के मोहल्ला वारसीनगर के रहने वाले रईस मंसूरी का इनवर्टर बनाने और उस की मरम्मत करने का काम था. उस का यह काम काफी अच्छा चल रहा था. 15 दिसंबर, 2015 को इनवर्टर लगवाने के लिए उस के दोस्त जमा खां के बेटे आलम ने फोन किया.

आलम शहर के ही मोहल्ला बखलान की चामुंडा वाली गली में रहता था. इनवर्टर लगाने के लिए वह रईस को 5 हजार रुपए पहले ही दे चुका था. लेकिन काम ज्यादा होने की वजह से रईस को आलम के यहां इनवर्टर लगाने का समय नहीं मिला था.

आलम ने 15 दिसंबर को रईस को फोन कर के अपने यहां जल्द इनवर्टर लगाने को कहा तो रईस ने उसे भरोसा दिया कि उसी दिन शाम को वह उस के यहां इनवर्टर जरूर लगा देगा. अपने वादे के अनुसार उसी दिन शाम को लगभग साढ़े 7 बजे रईस अपनी स्कूटी से आलम के घर के लिए निकला. आलम के घर जाने वाली बात उस ने अपनी पत्नी नुसरत को बता दी थी.

रईस को आलम के घर गए कई घंटे बीत गए. न तो वह लौटा और न ही उस ने फोन किया. इस से पहले जब कभी उसे देर होने लगती थी तो वह पत्नी को फोन कर देता था. घर आने में कितनी देर और लगेगी, यह जानने के लिए नुसरत ने फोन किया तो रईस का फोन बंद मिला.

नुसरत ने 2-3 बार पति को फोन किया, हर बार कंप्यूटर द्वारा फोन बंद होने की बात बताई गई. नुसरत परेशान हो गई कि उन्होंने फोन बंद क्यों कर दिया है? आधे घंटे बाद उस ने फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद मिला. पति से संपर्क न होने की बात उस ने अपने देवर अमीर को बताई. अमीर आलम को तो जानता ही था, उस ने उस का घर भी देखा था. अमीर भाई के बारे में पता लगाने आलम के घर पहुंचा.

पूछने पर आलम ने बताया कि वह तो इनवर्टर लगा कर 8 बजे ही चले गए थे. अमीर घर लौट आया. अमीर और नुसरत रईस के बारे में पता लगाने लगे, लेकिन कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली. रात भर दोनों परेशान होते रहे. सुबह होते ही रईस के घर वालों ने एक बार फिर उस की खोज शुरू कर दी. सभी रिश्तेदारों से फोन कर के उस के बारे में पूछा, लेकिन सभी ने कहा कि वह उन के यहां नहीं आया था.

जब कहीं से रईस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले चिंतित हो गए. 16 दिसंबर को अमीर हुसैन ने थाना मुरादाबाद पहुंच कर भाई रईस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. रईस के मामले में पुलिस कोई काररवाई करती, उस के पहले ही क्रिकेट खेलने वाले कुछ बच्चों ने रईस के बारे में पता कर लिया.

हुआ यह कि 16 दिसंबर की दोपहर को कुछ बच्चे शहर के किनारे से गुजरने वाली रामगंगा नदी के किनारे क्रिकेट खेल रहे थे. उन्हीं बच्चों में से किसी ने ऐसा शौट मारा कि गेंद पानी के किनारे जा कर गिरी. जैसे ही एक बच्चा गेंद लेने गया, उसे वहां एक आदमी का हाथ पड़ा दिखाई दिया. हाथ देख कर वह बच्चा डर गया और उस ने शोर मचा दिया.

शोर सुन कर सभी बच्चे वहां आ गए. हाथ देख कर बच्चे क्रिकेट खेलना भूल कर शोर मचाने लगे. इस के बाद आसपास के खेतों में काम करने वाले भी आ गए. सभी इस बात को ले कर परेशान थे कि यह कटा हाथ किस का हो सकता है? किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. वह इलाका थाना मुगलपुरा के तहत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना मुगलपुरा को दे दी गई.

खबर मिलते ही मुगलपुरा के थानाप्रभारी अनिल कुमार वर्मा एसएसआई मनोज कुमार सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों को साथ ले कर रामगंगा नदी के किनारे पहुंच गए. हाथ के बालों को देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि यह हाथ किसी आदमी का है. पुलिस को लगा कि इस हाथ को कुत्ता वगैरह यहां खींच कर ले आया है. लाश भी यहीं आसपास ही होगी.

पुलिस वाले लाश को इधरउधर तलाशने लगे. वहां से कुछ दूरी पर रामगंगा पर बने पुल के नीचे 4 बोरे मिले. पुलिस ने उन बोरों को खोला तो उन में से आदमी के कटे अंग निकले. लेकिन उस में सिर और एक हाथ नहीं मिला.

थानाप्रभारी ने यह सूचना एसएसपी नितिन तिवारी, एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव को दी तो दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने सिर और एक हाथ को आसपास बहुत ढूंढा, लेकिन वे नहीं मिले. शायद उन्हें कोई जंगली जानवर उठा ले गया था.

5 टुकड़ों में लाश मिलने की खबर थोड़ी देर में ही शहर में फैल गई. मीडिया वाले भी वहां पहुंच गए. एक दिन पहले ही थाना मुगलपुरा में रईस मंसूरी की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. थानाप्रभारी ने गुमशुदगी वाला रजिस्टर चेक किया तो पता चला कि गुम हुए व्यक्ति की कदकाठी और हुलिया मरने वाले से मिल रहा था.

यह गुमशुदगी अमीर ने दर्ज कराई थी. अमीर का फोन नंबर लिखा ही था, थानाप्रभारी ने उस नंबर पर फोन कर के उसे बुला लिया. अनिल कुमार वर्मा से बात होने के बाद अमीर अपनी भाभी नुसरत को ले कर रामगंगा के किनारे पहुंच गया. हालांकि लाश का सिर नहीं था, इस के बावजूद कपड़ों से अमीर और नुसरत ने उस की शिनाख्त रईस मंसूरी की लाश के रूप में कर दी.

पति के शरीर के 5 टुकड़े देख कर नुसरत रोरो कर बेहोश हो गई. अमीर समझ नहीं पा रहा था कि उस के भाई की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि उस की हत्या कर उसे इस तरह टुकड़ों में काट कर यहां फेंक गया. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि हत्यारों ने उस के गुप्तांग को काट डाला था. हत्या करने से पहले रईस ने शराब भी पी थी.

हत्या के इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए एसएसपी ने एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम ने मृतक की पत्नी नुसरत और भाई अमीर से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रईस का किसी से कोई झगड़ा वगैरह नहीं था. उस दिन शाम को वह आलम के घर इनवर्टर लगाने गया था. उस के बाद नहीं आया.

नाजायज रिश्ते में पति की बलि – भाग 1

कानपुर देहात जनपद के थाना मूसानगर का एक गांव है कृपालपुर, जिस में रामसुमेर यादव अपने 2 बेटों रघुराज व सुरेंद्र के साथ रहता था. रामसुमेर की खेतीबाड़ी की कुछ जमीन थी, जिस से परिवार का भरणपोषण होता था. वह भले ही संपन्न किसान नहीं था, लेकिन गांव में उस की अच्छीभली इज्जत थी.

रामसुमेर का बड़ा बेटा रघुराज तो पिता के साथ खेती में हाथ बंटाने लगा था, लेकिन सुरेंद्र का मन खेतीबाड़ी में नहीं लगता था. समय के साथ रामसुमेर ने रघुराज का घर बसा दिया, लेकिन सुरेंद्र के साथ परेशानी यह थी कि उस की संगत ठीक नहीं थी. वह नशा करने का आदी हो गया था. नशे में वह लड़ाईझगड़ा और मारपीट करता तो उस की शिकायत रामसुमेर तक पहुंचती.

ऐसे में लोगों ने सलाह दी कि सुरेंद्र का विवाह कर दिया जाए. इस के पांव में गृहस्थी की बेडिय़ां पड़ेंगी तो यह अपनेआप सुधर जाएगा. लोगों की सलाह मान कर रामसुमेर सुरेंद्र के लिए लडक़ी की तलाश में जुट गया. नतीजा सार्थक रहा. कुछ ही दिनों बाद सुरेंद्र का विवाह घाटमपुर तहसील के सजेती गांव निवासी सूरज सिंह यादव की बेटी प्रियंका से हो गया.

प्रियंका काफी खूबसूरत थी. सुरेंद्र ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी खूबसूरत बीवी मिलेगी. उस के रूपसौंदर्य ने उस पर जादू सा कर दिया. प्रथम मिलन की रात प्रियंका जिस तरह उसे समर्पित हुई, उस से सुरेंद्र उस का दीवाना हो गया. सुंदर और समझदार प्रियंका ने सुरेंद्र के आवारा कदमों में ऐसी बेडिय़ां डालीं कि वह घरगृहस्थी के कामों में रम गया.

विवाह के बाद परिवार का खर्च बढ़ा तो खेती की पैदावार से दोनों भाइयों का गुजारा होना मुश्किल हो गया. तंगी की वजह से परिवार में कलह शुरू हो गई. यह देख कर रामसुमेर ने दोनों बेटों का बंटवारा कर दिया. बंटवारे के बाद सुरेंद्र प्रियंका के साथ अलग रहने लगा. उस का मन खेती में कम लगता था, इसलिए वह किसी दूसरे काम की तलाश में जुट गया.

गांव के कुछ लडक़े गुजरात के सूरत शहर की कपड़ा मिलों में काम करते थे. वे काफी खुशहाल थे. सुरेंद्र ने पत्नी से सूरत जाने की बात की तो उस ने इजाजत दे दी. इस के बाद वह अपने एक दोस्त के साथ सूरत चला गया. वहां वह उसी दोस्त के साथ रहा. उसी के सहयोग से उसे एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई, बाद में वह किराए का कमरा ले कर अलग रहने लगा.

सुरेंद्र सूरत में था और प्रियंका गांव में. नईनवेली दुलहन को पति के साथ रहने के बजाय तनहाई में रहना पड़ रहा था. उस की उमंगें दम तोड़ रही थीं. पति से सिर्फ उस की मोबाइल के जरिए बात हो पाती थी. प्रियंका अपने मन की बात पति से कहती तो वह हफ्ते भर की छुट्टी ले कर घर आ जाता.

तब वह उस से कहती, “तुम सूरत में रहते हो और मैं यहां गांव में अकेली पड़ी रहती हूं, क्यों नहीं मुझे भी अपने साथ ले चलते?”

सुरेंद्र हर बार प्रियंका से वादा करता कि अगली बार जब आएगा तो वह उसे साथ ले जाएगा. लेकिन वह दिन कभी नहीं आया. इस तरह 4 साल से अधिक बीत गए. इस दौरान प्रियंका 2 बच्चों आलोक और अंशिका की मां बन गई.

प्रियंका की सभी जरूरतें तो पति के हिस्से की जमीन तथा उस के भेजे पैसे से पूरी हो जाती थीं, लेकिन देह की जरूरतें वह कैसे पूरी करती? तनहा रातों में बिस्तर उसे काटने दौड़ता था. आखिर उस ने एक ऐसे मर्द की तलाश शुरू कर दी, जो उस के तनमन का सच्चा साथी बन सके.

प्रियंका के घर से चंद कदमों के फासले पर करन सिंह रहता था. वह शरीर से हृष्टपुष्ट और भरपूर जवान था. वह नौकरी कर के अच्छा कमाता था. रहता भी खूब ठाटबाट से था. वह सिगरेट और शराब का शौकीन था. सुरेंद्र और करन रिश्ते में चाचाभतीजा थे.

सुरेंद्र परिवार से अलग रहता था. चूंकि वह सूरत में नौकरी करता था और उस की पत्नी बच्चों के साथ गांव में अकेली रहती थी, इसलिए करन ने उस के घर आनाजाना शुरू कर दिया. सुरेंद्र जब छुट्टी पर घर आता, दोनों की सुरेंद्र के घर पर ही महफिल जमती.

करन प्रियंका को चाची कहता था. प्रियंका के मन में पाप समाया तो वह करन से हंसीमजाक करने लगी. कभीकभी मजाक में वह कोई ऐसी बात कह देती कि करन झेंप जाता. करन कोई दूधपीता बच्चा तो था नहीं, इसलिए जल्द ही समझ गया कि चाची उस से क्या चाहती है. परिणामस्वरूप वह भी उस के रूपसौंदर्य की तारीफें करते हुए उस के आगेपीछे मंडराने लगा.

दो बच्चों की मां बनने के बावजूद प्रियंका के रूपलावण्य में कोई कमी नहीं आई थी. उस की चाल में ऐसी मस्ती थी कि देखने वालों के मुंह से आह निकलती थी. गांव के कई युवक उस का दीदार करने को तरसते थे. एक करन ही ऐसा था, जिसे प्रियंका के पास घंटों बैठने और बतियाने का मौका मिलता था. प्रियंका उस से खूब हंसीमजाक करती थी.

चूंकि करन सुरेंद्र का भतीजा था, इसलिए उस ने कभी चाचीभतीजे के रिश्ते से अलग हट कर नहीं देखा. लेकिन सुरेंद्र को क्या मालूम था कि उस का भतीजा ही उस की पीठ में छुरा घोंपेगा. घर आतेजाते करन अक्सर प्रियंका की तारीफें करता तो वह गदगद हो जाती.

एक दिन करन जब उस की खूबसूरती की तारीफ करने लगा तो वह बोली, “ऐसी खूबसूरती किस काम की, जिस की पति ही कद्र न करे. मैं ने कितनी बार कहा कि साथ ले चलो, लेकिन वह हर बार टाल जाते हैं.”

करन को प्रियंका की किसी ऐसी ही कमजोर नस की तलाश थी. जब उस ने अपने पति की बेरुखी बयां की तो करन उस का हाथ थाम कर बोला, “तुम क्यों चिंता करती हो चाची, आज से तुम्हारे सारे दुख मेरे और मेरी सारी खुशियां तुम्हारी.”

“सच करन?” प्रियंका ने मुसकरा कर पूछा.

“हां चाची, सोलह आने सच.”

“तो कल दोपहर में आना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.”

करन ने वह रात करवटें बदलते हुए काटी. सारी रात वह प्रियंका के खयालों में डूबा रहा. अगले दिन दोपहर होते ही वह प्रियंका के घर जा पहुंचा.

प्रेम में डूबी जब प्रेमलता – भाग 1

अभी सुबह का उजाला भी ठीक से फैला नहीं था कि मैनपुरी कोतवाली के गेट से एक महिला अंदर घुसी. वह काफी अस्तव्यस्त और घबराई हुई लग रही थी, इसलिए ड्यूटी पर तैनात संतरी ने आगे बढ़ कर पूछा, “कहो, कैसे आई?”

“साहब से मिलना है.”

“क्यों, क्या परेशानी है?” संतरी ने पूछा.

संतरी का इतना कहना था कि महिला रोने लगी. संतरी ने उसे चुप कराते हुए कहा, “साहब तो अभी आए नहीं हैं. तुम अपनी परेशानी बताओ. अगर कोई ज्यादा परेशानी वाली बात होगी तो मैं साहब से जा कर बता दूंगा.”

“मेरे पति ने रात में आत्महत्या कर ली है. उन की लाश घर में पड़ी है.” महिला ने सिसकते हुए कहा.

इस के बाद संतरी महिला को ड्यूटी पर तैनात मुंशी के पास ले गया और उसे पूरी बात बताई. मामला गंभीर था, इसलिए मुंशी ने संतरी से कोतवाली प्रभारी को सूचना देने के लिए कहा.

सूचना पा कर कुछ ही देर में कोतवाली प्रभारी मनोहर सिंह यादव आ गए. उन्होंने महिला को अपने कक्ष में बुला कर पूछा,

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“जी प्रेमलता, घर में सब पिंकी कहते हैं.”

“कहां से आई हो?”

“नगला कीरत से. वहीं अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी.”

“पति का क्या नाम था?”

“गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू.”

“बच्चे कितने हैं?”

“2, बेटा 8 साल का और बेटी 5 साल की है.”

प्रेमलता जिस तरह टकर टकर मनोहर सिंह के सवालों का जवाब दे रही थी, उस से उन्हें उस पर संदेह हुआ. जिस औरत का पति मरा हो, वह इस तरह कतई बातें नहीं कर सकती. उन्होंने पूछा, “यह सब हुआ कैसे?”

“साहब, हम क्या बताएं. रात को हम सब खाना खा कर सोए और सवेरे उठे तो उन की लाश मिली. आप चलिए और लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम करा दीजिए. हम उन का जल्दी से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं.”

आगे कुछ पूछने के बजाय कोतवाली प्रभारी कुछ सिपाहियों और प्रेमलता को साथ ले कर कीरतपुर नगला जा पहुंचे. प्रेमलता के घर के सामने भीड़ लगी थी. भीड़ को हटा कर मनोहर सिंह अंदर पहुंचे तो कमरे में पड़ी चारपाई अस्तव्यस्त हालत में पड़ी थी.

मनोहर सिंह ने लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर चोट का कहीं कोई निशान नहीं था. गले पर जरूर कुछ इस तरह का निशान था, जो गला दबाने पर पड़ जाते हैं. उन्हें जो आशंका थी, लाश देख कर वह सच नजर आ रही थी. घर में एक ही दरवाजा था, उसी से अंदर आया या बाहर जाया जा सकता था. प्रेमलता का कहना था कि रात में उस ने खुद कुंडी लगाई थी.

मनोहर सिंह ने औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रेमलता से पूछताछ की. उस का कहना था कि वह रहते भले तनाव में थे, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़े. शाम को सब ठीकठाक था. बात भी अच्छी तरह कर रहे थे. कहीं से नहीं लगता था कि वह रात में आत्महत्या कर लेंगे.

पूछताछ में पता चला कि मृतक गवेंद्र सिंह की सरकारी नौकरी थी. वह सरकारी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. वह बहुत खुशदिल था. हर किसी से हमेशा हंस कर मिलता था. मनोहर सिंह को गवेंद्र सिंह की आत्महत्या का यह मामला पूरी तरह से संदिग्ध लग रहा था, लेकिन जब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आ जाती, वह कुछ नहीं कर सकते थे.

प्रेमलता ने 6 बजे ही अपने ससुर रामसेवक को फोन कर के गवेंद्र की मौत की सूचना दे दी थी. उसी सूचना पर रामसेवक 9 बजे घर वालों के साथ नगला कीरतपुर पहुंचे तो पुलिस वहां मौजूद थी. बेटे की लाश देख कर रामसेवक ने रोते हुए कहा,

“साहब, मेरे बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है. आखिर वह आत्महत्या क्यों करेगा, उसे किसी चीज की कमी थोड़े ही थी.”

“कोई बात नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सब पता चल जाएगा. उस के पहले हम कुछ नहीं कह सकते.” मनोहर सिंह ने उसे आश्वासन दिया.

मनोहर सिंह ने मृतक के पिता रामसेवक की ओर से अपराध संख्या 1341/2015 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया था. मनोहर सिंह ने मुखबिरों से प्रेमलता के बारे में पता लगाने को कहा, क्योंकि उन्हें उस का चरित्र संदिग्ध लग रहा था.

आखिर जब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो सारा मामला साफ हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत दम घुटने से हुई थी. उस की गला दबा कर हत्या की गई थी. ऐसे में संदेह प्रेमलता पर ही था, क्योंकि घर में मृतक के साथ वही थी और थाने आ कर उस ने झूठ भी बोला था.

मनोहर सिंह ने पूरे परिवार को इकट्ठा किया तो उन की नजरें मृतक के बच्चों पर जम गईं. हत्या वाली रात वे भी साथ थे. बच्चे डरे हुए लग रहे थे. बेटी तो छोटी थी, लेकिन बेटा उमंग 8 साल का था. वह कुछ बता सकता है, यह सोच कर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पुचकार कर पूछा तो उस ने कहा, “मम्मी ने बबलू अंकल और 2 लोगों के साथ मिल कर पापा को मारा है.”

अब क्या था, पुलिस ने तुरंत प्रेमलता उर्फ पिंकी को हिरासत में ले लिया. लेकिन जब उस से हत्या में शामिल बबलू तथा 2 अन्य लोगों के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि न वह बबलू को जानती है और न 2 अन्य लोगों को. उमंग ने बबलू का नाम तो बता दिया था, लेकिन वह कौन था, कहां का रहने वाला था, यह सब वह नहीं बता सका था.

पुलिस बबलू के बारे में पता करने लगी. उसी बीच उसे पता चला कि प्रेमलता इन दिनों आगरा की लायर्स कालोनी स्थित आईआईएमटी से नॄसग की पढ़ाई कर रही थी और वहीं कमरा ले कर रहती थी. इस से पुलिस को लगा कि कहीं बबलू आगरा का ही रहने वाला तो नहीं है.

पुलिस वहां जा कर बबलू के बारे में पता लगाने की सोच ही रही थी कि प्रेमलता से मिलने एक लडक़ा आया. उस ने थानाप्रभारी से प्रेमलता को अपनी बहन बता कर मिलने की गुजारिश की तो मनोहर सिंह ने उसे प्रेमलता से मिलने की इजाजत दे दी.

मौज मजा बन गया सजा