Hindi Crime Story: जो सिर्फ दिमाग चलाते हैं

Hindi Crime Story: एक एनजीओ संचालक ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम बना कर बौलीवुड फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तरह एक बिल्डर के यहां छापा मार कर 21 लाख रुपए और गहने जिस तरह ठगे, हैरान करने वाली बात है. लेकिन क्या वे पुलिस से बच पाए?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर रोज की तरह उस दिन भी वाहनों की आवाजाही लगी थी. रात के लगभग 9 बजे दिल्ली नंबर की एक चमचमाती सफेद रंग की एलैंट्रा कार नंबर- डीएल 3सी एक्यू 0504 सहारनपुर चौक से राजपुर की ओर चली जा रही थी. कार में 4 आदमी और 2 औरतें सवार थीं. सभी ने सफेद रंग की पैंट और कमीज पहन रखी थी.

कार कारगी चौक पहुंच एक किनारे खड़ी हो गई. कार के रुकते ही वहां पहले से खड़े 2 लोग उस के नजदीक आए तो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक उन से मुखातिब हुआ, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘यस, लाइन क्लियर है. बस आप लोगों का ही इंतजार था.’’ कह कर वे दोनों भी कार में सवार हो गए. इस के बाद कार फिर चल पड़ी तो कुछ देर में वह पौश इलाके सरकुलर रोड पर कोठी नंबर 92 के सामने जा कर रुकी.

यह कोठी बिल्डर यशपाल टंडन की थी. यशपाल प्रौपर्टी का काम करते थे. इस के अलावा बड़ीबड़ी कमेटियां भी डालते थे, जिस में लाखों रुपए का लेनदेन होता था.

यशपाल का अपना औफिस भी था, जिस में वह सुबह से शाम तक बैठते थे. कोई नहीं जानता था कि उस दिन यशपाल का वास्ता एक बड़ी मुसीबत से पड़ने वाला था. कार में बाद में सवार हुए दोनों लोगों को छोड़ कर बाकी सभी कार से नीचे उतरे. उन में से एक के हाथ में ब्रीफकेस था. कार से उतरे लोग कोठी के गेट पर जा कर खड़े हो गए. उन्होंने डोरबैल बजाई तो कुछ सेकैंड बाद दरवाजे पर यशपाल टंडन खुद आए. उन के दरवाजा खोलते सब से आगे खड़े एक आदमी ने पूछा, ‘‘आप यशपाल टंडन?’’

‘‘जी हां, लेकिन आप कौन?’’ उन्होंने पूछा तो उसी आदमी ने रौब जमाते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘‘हम लोग प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से हैं. आइए अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

टंडन सकपका गए. एकाएक उन की कुछ समझ में नहीं आया. आने वालों के तेवर उन्हें ठीक नहीं लग रहे थे. उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘‘ल…ल…लेकिन इस तरह.’’

‘‘कहा न, चलो अंदर चल कर बात करते हैं.’’ कहने के साथ ही टीम का नेतृत्व कर रहे उस आदमी ने साथियों से कहा, ‘‘दरवाजा बंद कर के इन्हें अंदर ले आइए और बाहर खड़े लोगोें से कहिए कि बिना इजाजत कोई अंदर न आने पाए.’’

हालात अचानक बदल गए थे. टंडन चुपचाप उन के साथ अंदर आ गए. ड्राइंगरूम में आते ही उन्होंने टंडन को सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘मि. टंडन, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है. हमें शिकायत मिली है कि तुम्हारे पास बहुत ब्लैकमनी है.’’

‘‘ऐसा तो कुछ भी नहीं है सर, जरूर आप को किसी ने गलत सूचना दी है.’’ टंडन ने सफाई देनी चाही तो टीम का नेतृत्व कर रहा आदमी बड़े ही आत्मविश्वास से बोला, ‘‘हमारी इन्फौरमेशन गलत नहीं है. हम तुम पर तभी से नजर रख रहे हैं, जब तुम्हारे दोस्त विजय मनचंदा के यहां आयकर का छापा पड़ा था, उस समय तुम खुद भी तो वहां मौजूद थे.’’

उस की इस बात पर यशपाल चौंके, क्योंकि उस अधिकारी ने जो कहा था, वह एकदम सही था. दरअसल 4 महीने पहले उन के दोस्त विजय मनचंदा के यहां जब आयकर विभाग ने छापा मारा था, तब वह भी वहां मौजूद थे. इतना ही नहीं, आयकर विभाग ने उन का पहचान पत्र ले कर उन्हें गवाह भी बना लिया था. वह घबरा गए. यह सब उन की पत्नी भी देखसुन रही थीं. वह भी घबरा गईं. टंडन और उन की पत्नी को सोफे पर एक तरह से बंधक बना कर बैठा दिया गया.

‘‘मि. टंडन, हमें कोऔपरेट कीजिए.’’ सामने बैठे आदमी ने कहा तो टीम में शामिल युवा लड़कियां टंडन दंपति के इर्दगिर्द खड़ी हो गईं, जबकि बाकी लोग कोठी की तलाशी लेने लगे. करीब आधा घंटे तक जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उन्होंने सेफ की चाबी ले कर सारा सामान उलटपलट दिया. इस जांचपड़ताल में उन के हाथ संपत्ति के कुछ कागजात, नकदी और गहने लगे.

उन्हें जो भी मिला, वह सब एक स्थान पर रखते गए. उन के बारे में तरहतरह के सवाल भी करते रहे. टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने यशपाल को गहरी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन सब का हिसाब देने तुम्हें कल औफिस आना होगा. तुम्हारे खिलाफ एफआईआर तो होगी ही, जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी भी हो सकती है.’’

यशपाल के तो होश उड़ गए. उन्हें परेशान देख कर अधिकारी ने कहा, ‘‘हमारे पास एक बीच का रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ डरेसहमे यशपाल टंडन ने पूछा तो राजदाराना अंदाज में वह बोला, ‘‘अगर हमें 50 लाख रुपए मिल जाएं तो तुम आगे की काररवाई से बच सकते हो.’’

इस काररवाई से दहशत में आए यशपाल सोच में पड़ गए. गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, ‘‘सर, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. कुछ कम हो जाए तो मैं कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘ठीक है, रकम कम करेंगे तो हम इन्हें अपने साथ ले जाएंगे.’’ उस ने गहनों की ओर इशारा कर के कहा.

यशपाल इजाजत ले कर सोफे से उठे और घर में रखे 6 लाख रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए.

लेकिन छापा मारने वाली टीम ने उन्हें लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि इतने में बात नहीं बनेगी. इस के बाद टंडन ने फोन कर के अपने किसी परिचित व्यापारी से 10 लाख रुपए मंगा कर लिए. यह रकम लेने टंडन खुद दरवाजे तक गए थे. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपने किसी अन्य परिचित से 5 लाख रुपए और मंगा कर दिए.

टीम का मुखिया इतने पर भी संतुष्ट नजर नहीं आया. उस ने सारी नकदी और आभूषण एक बैग में रख लिए. इस के बाद चलने लगा तो कहा, ‘‘थोड़ी देर के लिए अपनी स्कूटी देना.’’

टंडन ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, हमारा कर्मचारी आ कर उसे दे जाएगा.’’

करीब सवा 2 घंटे की काररवाई के बाद पूरी टीम चली गई.

यशपाल टंडन के यहां ईडी का यह छापा 2 नवंबर, 2015 की रात पड़ा था. इस छापे से वह काफी परेशान थे. उन्होंने अपने परिचितों को फोन कर के इस छापे की जानकारी दी तो बिना पुलिस के रात में छापा मारना और स्कूटी मांग कर ले जाने वाली बात से उन लोगों को यह सब संदिग्ध लगा. जब यह साफ हो गया कि आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रात में छापा नहीं मारता तो लगा कि उन के साथ कोई बड़ी गड़बड़ हुई है. परिचितों से सलाहमशविरा कर के यशपाल टंडन ने इस की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी.

फरजी ईडी टीम द्वारा छापे के बहाने लाखों रुपए ले जाने की घटना की सूचना पा कर थाना कोतवाली के प्रभारी एस.एस. बिष्ट और लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह पुलिस बल के साथ टंडन की कोठी पर पहुंच गए. अधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया था. इस घटना से जिला पुलिस में हड़कंप मच गया था. एसपी (सिटी) अजय सिंह और सीओ मनोज कत्याल भी मौके पर पहुंच गए थे. सभी ने यशपाल से पूछताछ की तो उन्होंने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यशपाल टंडन को छापे के बहाने शातिराना अंदाज में ठगा गया है. प्रवर्तन निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुख पी.के. चौधरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि उन की किसी टीम ने छापा नहीं डाला है.

यशपाल बुरी तरह हताश हो गए. ठग पूरी तैयारी के साथ आए थे और बड़ी चालाकी से उन्हें ठग कर चले गए थे. मामला बेहद गंभीर था. थाना कोतवाली में यशपाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या- 304/2015 पर भादंवि की धारा 595, 419, 420, 120 बी, 406 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. वह काफी हैरान थे. इस की वजह यह थी कि यह फिल्मी स्टाइल में किया गया अपनी तरह का एक अलग अपराध था. उन्होंने एसपी (सिटी) अजय सिंह से सलाह कर के इस मामले के खुलासे के लिए एक टीम का गठन करने का आदेश दिया.

इस स्पैशल औपरेशन ग्रुप की संयुक्त टीम में थानाप्रभारी एस.एस. बिष्ट, लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह, एसआई दिलबर सिंह, एएसआई सर्वेश कुमार, कांस्टेबल अरविंद भट्ट, मनमोहन सिंह, कुलवीर, सत्येंद्र नेगी, प्रमोद, गंभीर सिंह और महिला कांस्टेबल रजनी कोहली तथा सुमन को शामिल किया गया. इस का नेतृत्व खुद एसपी (सिटी) अजय सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम तुरंत अपने काम में लग गई. यशपाल टंडन से हुई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक्सपर्ट से एक आरोपी का स्कैच भी बनवा कर जारी कर दिया.

यशपाल ने कार का जो नंबर बताया था, पुलिस ने अगले दिन उस की जांच की तो वह पंजाब प्रांत की किसी मोटरसाइकिल का निकला. 2 बातें स्पष्ट होती थीं, एक तो यह कि यशपाल को ठीक से नंबर याद नहीं था या फिर कार में फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. यशपाल की स्कूटी पुलिस ने उसी दिन कारगी चौक से लावारिस अवस्था में खड़ी बरामद कर ली थी. उन की कोठी के बाहर बाईं ओर एसजीआरआर स्कूल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग चैक की, लेकिन उस से कार का नंबर पकड़ में नहीं आ सका.

राजधानी के मुख्य चौराहों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से हाई डैफिनेशन कैमरे लगे हैं. पुलिस ने रात 9 से साढ़े 11 बजे तक की उन की फुटेज बारीकी से चैक की तो आशारोड़ी क्षेत्र के कैमरे में वह कार दिख गई, जिस में सवार हो कर कथित ईडी टीम के सदस्य आए थे. इस में कार का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. इस तरह पुलिस को नंबर मिल गया. अब तक कई दिन बीत चुके थे. चूंकि नंबर दिल्ली का था, इसलिए एसआई राकेश शाह के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली भेज दी गई.

दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने आरटीओ औफिस से कार के मालिक के बारे पता किया. पुलिस आरटीओ औफिस से मिले पते पर पहुंची तो वहां जो मिला, पता चला उस ने कार बेच दी थी. जिस व्यक्ति को उस ने कार बेची थी, पुलिस उस के पास पहुंची तो वहां भी निराश होना पड़ा, क्योंकि उस ने भी किसी अन्य को कार बेच दी थी. पुलिस टीम दिल्ली में ही डेरा डाले थी. कार आदर्शनगर निवासी पुष्पा को बेची गई थी. पुलिस खोजबीन करते हुए पुष्पा के यहां पहुंची तो उस ने बताया कि उस की कार को एक एनजीओ संचालक प्रदीप सिंह मांग कर ले गया था.

प्रदीप के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि वह अपने भाई बबलू और कुछ अन्य साथियों के साथ जहांगीरपुरी में एक औफिस खोल कर एनजीओ चलाता है. उस के यहां स्टाफ भी था. पुलिस ने पूछताछ कर के उस के बारे में जानकारी इकट्ठा कर ली. पुलिस को कार पुष्पा के यहां मिल गई थी. पुलिस को जो सुराग मिले थे, वे काम के थे. 25 नवंबर को पुलिस टीम जहांगीरपुरी स्थित फ्लैट नंबर डी 268 पर पहुंची. फ्लैट में औफिस चल रहा था. पुलिस को वहां प्रदीप तो नहीं मिला, उस के यहां काम करने वाली 2 लड़कियां मिल गईं.

ईडी के छापे में चूंकि 2 लड़कियां भी शामिल थीं, इसलिए पुलिस ने उन्हें शक के दायरे में रख कर पूछताछ शुरू कर दी. उन लड़कियों में एक श्रद्धानंद कालोनी निवासी बेबी पुत्री वीरेंद्र और दूसरी राखी पुत्री कल्लू थीं. दोनों बेहद साधारण परिवारों से थीं. वे दोनों कई महीने से इस एनजीओ में काम कर रही थीं. पुलिस ने उन से घुमाफिरा कर सवाल किए तो वे जवाब देने में उलझ गईं. उन्होंने जो सच बताया, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस फरजी छापे की योजना किस ने तैयार की थी, यह तो वे नहीं जानती थीं, लेकिन प्रदीप के साथ छापे में वे भी गई थीं. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर देहरादून आ गई. पुलिस प्रदीप के जहांगीरपुरी स्थित एमसीडी में फ्लैट नंबर 306 पर भी गई थी, लेकिन वहां ताला लगा था.

पुलिस ने दोनों लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 2 नवंबर को प्रदीप छापा मारने की बात कह कर उन्हें अपने साथ ले गया था. उस के साथ उस का भाई बबलू और 2 दोस्त भी थे, जबकि 2 लोग उन्हें देहरादून में मिले थे. बेबी और राखी प्रदीप एवं बबलू के अलावा किसी और को नहीं पहचानती थीं. पुलिस ने यशपाल टंडन से लड़कियों का आमनासामना कराया तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया. लड़कियों ने हैरान करने वाली बात यह बताई कि प्रदीप ने यह छापा फिल्म ‘स्पैशल-26’ की स्टाइल में मारा था. इस के लिए उस ने खुद तो रिहर्सल किया ही था, उन्हें भी रिहर्सल कराया था. उन्हें कई बार फिल्म भी दिखाई थी.

टीम असली लगे, इस के लिए उन्होंने सफेद रंग के कपड़े सिलवाए थे. अपनी बनाई योजना के अनुसार वे छापा मार कर चले गए थे. प्रदीप के पास ही पूरी रकम थी. छापा मारने के पहले जो 2 लोग देहरादून में मिले थे, वे देहरादून में ही रह गए थे. लड़कियों ने बताया था कि यशपाल टंडन ने टीम को पूरा सहयोग दिया था. उन्होंने खुद ही बताया था कि अमुकअमुक स्थान पर तलाशी लें. इस से यशपाल की भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी.

यशपाल कमेटी डलवाते थे. हो सकता था कि घाटा दिखाने के लिए उन्होंने ही यह योजना बनाई हो. इस मुद्दे पर उन से भी पूछताछ की गई, लेकिन इस में उन का कोई हाथ नहीं निकला. अलबत्ता लड़कियों और उन के बयानों में थोड़ा विरोधाभास जरूर बना रहा. अभी मामले का खुलासा पूरी तरह नहीं हो सका था. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 26 नवंबर को अपने औफिस में प्रेसवार्ता कर के इस फरजी छापे का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने दोनों लड़कियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि वारदात में स्थानीय लोगों का भी हाथ जरूर था. पुलिस टीम प्रदीप की तलाश में जुटी थी, लेकिन अगले कई दिनों तक वह हाथ नहीं आया. पुलिस प्रदीप और उस के भाई के मोबाइल नंबरों की जांच कर रही थी. लेकिन वे बंद हो चुके थे. पुलिस हर सूरत में पूरे मामले का परदाफाश करना चाहती थी. एसपी (सिटी) अजय सिंह समयसमय पर टीम के काम की समीक्षा करते रहते थे. देखते ही देखते घटना को घटे डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लग जाए, इस के लिए पुलिस ने जेल में बंद राखी और बेबी से दोबारा पूछताछ की.

पुलिस आरोपियों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स पर भी काम कर रही थी. इस से कडि़यां जुड़ती चली गईं. इस कड़ी में एक नाम धर्मपाल भाटिया का सामने आया. धर्मपाल हरियाणा के जिला करनाल के हांसी रोड पर रहता था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई और उस से पूछताछ के आधार पर देहरादून के थाना क्लेमन टाउन के गोकुल एन्कलैव में रहने वाले दीपक मनचंदा को भी 4 जनवरी, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ की. इन से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि यह पूरी योजना एक महिला द्वारा तैयार की गई थी तो हैरानी बढ़ गई. सभी लोगों ने योजना बना कर जिस तरह फिल्मी अंदाज में छापा मारा था, पुलिस उलझ कर रह गई थी. ठगी का शिकार हुए यशपाल टंडन का उन का अपना कलैक्शन एजेंट ही उन्हें दगा दे गया था. दरअसल, दीपक मनचंदा यशपाल के दोस्त विजय मनचंदा का भतीजा था. इसी नाते उन्होंने भरोसा कर के उसे अपने यहां कमेटी का पैसा जुटाने और अन्य कामों के लिए रख लिया था. दीपक ने खूब मेहनत कर के काम किया, जिस से यशपाल टंडन को उस पर पूरा भरोसा हो गया. वह उस के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगे.

जरूरी नहीं कि इंसान जैसा दिखता है, ठीक वैसा हो ही. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह बुरी आदतों का शिकार था. उन में एक आदत अनापशनाप खर्च करना भी थी. यशपाल के लिए वह मोटी रकम इकट्ठा करता था. धीरेधीरे उस ने उन से 5 लाख रुपए उधार ले लिए. जब रुपए लौटाने की बात आई तो वह परेशान रहने लगा. दीपक मूलरूप से करनाल का ही रहने वाला था और कुछ सालों पहले ही देहरादून आया था. उस की जानपहचान धर्मपाल भाटिया और उस की पत्नी निशा उर्फ रेखा से थी. निशा तेजतर्रार महिला थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपनी परेशानी दोनों को बताने के साथ यह भी बताया कि उस का मालिक काफी दौलतमंद आदमी है.

‘‘तुम उसी से पैसा क्यों नहीं कमाते?’’ निशा ने रहस्यमय अंदाज में कहा.

‘‘वह कैसे?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘इस की तरकीब मैं तुम्हें बताऊंगी.’’ निशा ने कहा.

आश्वासन मिलने पर दीपक को थोड़ी राहत मिल गई. जहांगीरपुरी में रहने वाले प्रदीप और बबलू निशा के भाई थे. दोनों काफी शातिर थे. वे एनजीओ की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करते थे. निशा और धर्मपाल ने इस मुद्दे पर उन से बात की तो काफी सोचविचार कर उन्होंने फिल्म ‘स्पैशल 26’ की स्टाइल में यशपाल टंडन को लूटने की सोची.

इस के बाद उन्होंने दीपक से बात की तो उस ने यशपाल के बारे में सब कुछ बता दिया. उस ने यह भी बताया कि यशपाल चूंकि कमेटी के साथ ब्याज पर भी रुपए देने का काम करते हैं, इसलिए उन के पास बिना हिसाबकिताब की मोटी रकम होती है. प्रदीप और निशा को वह सौफ्ट टारगेट लगे. प्रदीप स्मार्ट युवक था और अधिकारियों वाले अंदाज में रहता था.

सभी ने मिल कर यशपाल को प्रवर्तन निदेशालय के फरजी छापे के जरिए अपना शिकार बनाने का फैसला किया. प्रदीप ने इस योजना  में अपने एक दोस्त पंकज तिवारी, भांजे रमन और एनजीओ में काम करने वाली बेबी और राखी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया. प्रदीप, उस का भाई, दोस्त, भांजा और दोनों लड़कियों ने कई बार ‘स्पैशल 26’ फिल्म देखी. प्रदीप को अधिकारी की भूमिका में रहना था, जबकि बाकी को टीम के सदस्य के रूप में. योजना बन गई तो तय दिन 2 नवंबर के एक दिन पहले ही धर्मपाल दीपक के पास देहरादून पहुंच गया.

अगले दिन प्रदीप ने बहाने से पुष्पा की कार मांगी और बबलू, पंकज, रमन, बेबी और राखी के साथ शाम को दिल्ली से चल कर करीब 8 बजे देहरादून पहुंच गया. यशपाल और दीपक तय योजना के तहत उन्हें रास्ते में मिल गए. सभी लोग यशपाल की कोठी पर पहुंचे. चूंकि यशपाल दीपक को पहचानते थे, इसलिए वह धर्मपाल के साथ बाहर कार ही में रुक गया. यशपाल को उन के फरजी ईडी होने का शक न हो, इस के लिए प्रदीप ने उन्हें उन के दोस्त के यहां पूर्व में पड़े आयकर विभाग के छापे का जिक्र किया. यह बात दीपक उसे पहले ही बता चुका था. उन्होंने बेहद शातिराना अंदाज में 21 लाख कैश और गहने ठग लिए. जातेजाते वे स्कूटी भी ले गए, जिसे उन्होंने कारगी चौक पर छोड़ दिया.

इस के बाद दीपक अपने घर चला गया. धर्मपाल करनाल और बाकी लोग दिल्ली. प्रदीप ने कहा कि वह माल का बंटवारा बाद में करेगा. लेकिन वह सभी से शातिर निकला और अपने भाई के साथ पूरी रकम ले कर फरार हो गया. उस ने सिर्फ बेबी और राखी को 6 हजार रुपए खर्च के लिए दिए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों का सामना यशपाल टंडन से कराया. वह अपने दोस्त के भतीजे द्वारा दी गई दगा से आहत थे. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 5 जनवरी, 2016 को आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के केस का खुलासा किया और पुलिस टीम को ढाई हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने बाद में गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक जेल गए आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी अन्य आरोपी निशा उर्फ रेखा, प्रदीप, बबलू, पंकज और रमन की तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story Hindi: चाय की तरह – खून पीने वाले ड्रैकुला

Suspense Story Hindi: ड्रैकुला, पिशाच अथवा चुड़ैल जैसे शब्दों की अवधारणा सदियों से चली आ रही है. कहानियों के माध्यम से ये शब्द लोगों के मन में दहशत भी पैदा करते रहे हैं. लेकिन हकीकत में डै्रकुला, पिशाच या चुडै़ल जैसा कुछ नहीं होता. वैसे मानवीय खून पीने वाले ड्रैकुला आज भी इंसानों के बीच मौजूद हैं.

अगर आप मानते हैं कि इंसानी खून पीने वाले ड्रैकुला महज किस्सेकहानियों का हिस्सा हैं तोआप गलतफहमी में हैं. क्योंकि दुनिया में 1-2 नहीं बल्कि 20 लाख से ज्यादा चलतेफिरते ऐसे जिंदा लोग हैं, जो रोज या अकसर चाय या काफी की तरह इंसानी खून पीते हैं. जिस तरह तमाम लोगों को शराब, स्मैक या अफीम की लत होती है, वैसे ही इन्हें रोजाना खून पीने की लत होती है. इन की सब से मुखर मौजूदगी उस अमेरिका में ही है जो आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक सोच का गढ़ माना जाता है.

खून पीने वाले ये बिलकुल आम लोग हैं. इन में कोई क्लर्क है तो कोई बेकरी वाला तो कोई इमीग्रेशन महकमे का अधिकारी है तो कोई नर्स. कोई किसी स्कूल में कविताएं पढ़ाने वाली अध्यापिका है तो कोई मसाज करने वाली या कालगर्ल. यहां तक कि नियमित खून पीने वाले इन पिशाचों में पूरे रस्मोरिवाज से धार्मिक अनुष्ठान कराने वाला किसी धर्म का कोई व्यक्ति भी हो सकता है.

एक और हैरान करने वाली बात यह है कि न केवल दुनिया में नियमित खून पीने वाले लोग मौजूद हैं, बल्कि नियमित रूप से खून पिलाने वाले लोग भी मौजूद हैं. खून पिलाने वाले लोग भी बिलकुल हमारे आप के जैसे आम लोग ही हैं. दुनिया भर की तमाम कहानियों में भले ही ड्रैकुला, पिशाच या चुड़ैलें लोगों को मार कर उन का खून पीते हों, लेकिन हकीकत से इस का कुछ लेनादेना नहीं है. स्थिति यह है कि अब तो ज्यादातर ड्रैकुलाओं को सहमति से खून पिलाने वाले उपलब्ध हैं. यह बात खून पीने और पिलाने वाले की आपसी रजामंदी से तय होती है कि खून शरीर में से सीधे चीरा लगा कर पीया जाएगा या फिर सक्शन पाइप से गिलास में निकाल कर सिप करते हुए पीया जाएगा.

बीबीसी फ्यूचर के लिए इस विषय पर एक रिसर्च लेख लिखने वाले डेविड राबसन कहते हैं, ‘‘एक दिन अमेरिका के न्यू आरलींस के फ्रेंच क्वार्टर इलाके में मैं ने पाया कि जान एडगर ब्राउनिंग के ‘रक्तदान’ का एक खास सत्र शुरू होने वाला था. इसे चिकित्सीय अंदाज में शुरू किया गया. उन के एक जानकार ने एल्कोहल से उन की पीठ का एक हिस्सा साफ किया. फिर उन की पीठ पर डिस्पोजेबल छुरी से एक कट लगाया, जिस से शरीर से खून निकलने लगा. फिर उस ने उस निकलते खून को पीना शुरू कर दिया. इस तथाकथित ड्रैकुला ने ब्राउनिंग का थोड़ा सा खून पीने के बाद, खून पीना बंद कर दिया. उस ने उन के शरीर को फिर एल्कोहल से साफ किया और कटी हुई जगह पर पट्टी लगा दी.

क्योंकि पीने वाले के मुताबिक ब्राउनिंग के खून में मैटेलिक तत्वों की मात्रा कम थी, जिस से वह उस के टेस्ट के मुताबिक नहीं था. कह सकते हैं कि ड्रैकुला यूं ही किसी का खून नहीं पी लेते, वह खून उन के टेस्ट के अनुरूप भी होना चाहिए.’’

वास्तव में हर किसी के खून का स्वाद उस के खानपान, शरीर में पानी की मात्रा और ब्लडग्रुप से तय होता है. दरअसल, ब्राउनिंग, लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हैं. वह न्यूआरलींस रियल वैंपायर समुदाय पर हो रहे शोध से जुड़े हैं. अमेरिका में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें खून पीने की लत है. पहले ब्राउनिंग मानते थे कि ब्लड फीडिंग महज एक तरह की तांत्रिक गतिविधि या कोई धार्मिक कर्मकांड है. लेकिन तब तक वह उन लोगों से नहीं मिले थे, जो सीधे किसी इंसान के शरीर से उस का खून पीते हैं. ऐसे में जब उन्होंने ब्लड फीडिंग के लिए खुद को डोनर के तौर पर पेश किया तो उन का नजरिया ही बदल गया.

यहां यह बता देना भी जरूरी है कि खून पीने वाले लोगों में से ज्यादातर का अलौकिक शक्तियों पर कोई भरोसा नहीं होता. कहने का मतलब यह कि ये लोग अपनी खुद की इच्छा के लिए खून पीते हैं. फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे लोग एक खास तरह की मन:स्थिति के शिकार होते हैं. क्योंकि नियमित रूप से खून पीने वाले लोगों को अगर कभी खून नहीं मिलता या मिलने में देर हो रही होती है तो इन की हालत बड़ी विचित्र हो जाती है. ये थकान, सिरदर्द और असहनीय पेट दर्द का शिकार होने लगते हैं. दरअसल खून पीते वक्त इन के दिलोदिमाग में पूरी ताकत से यह बात बैठी होती है कि उन्हें केवल इंसानों का खून पीने से ही राहत मिल सकती है.

दुनिया में मौजूद जीवित ड्रैकुलाओं का किस्से कहानियों के ड्रैकुलाओं से कोई संबंध नहीं है. वर्तमान में पूरी दुनिया में इंसानी रक्त पीने वाले जो लोग मौजूद हैं, वे वितृष्णाओं और विकृतियों की देन हैं. ऐसे लोगों ने आधुनिक वैज्ञानिक विकास को भी बहुत होशियारी से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है. मसलन इंटरनेट से पहले के जमाने में ये लोग जहां अलगथलग पड़े हुए थे, वहीं आज इन लोगों के समूहों ने अपनी वेबसाइटें बना रखी हैं. वेब पन्ने बना रखे हैं. इन लोगों का नेटवर्क भी खासा विकसित है. इंसानी खून पीने के अपने अलगअलग तरीकों और अलगअलग तरह की आदतों की वजह से इन के कई रूप हैं.

मसलन खून पीने वाली नर्सें, बार स्टाफ, सेके्रटरी या फिर ऐसे ही कई अन्य पेशेवर लोग सामान्य नौकरियां करते हैं. दूसरी तरफ सेठ ड्रैकुला जो बहुत रईस हैं, जो अपने लिए हर दिन पसंदीदा किस्म के खून का इंतजाम करते हैं. खून पीने वाले पिशाचों या ड्रैकुलाओं में जहां कुछ शर्मीले स्वभाव के होते हैं, वहीं कई धार्मिक किस्म के होते हैं, जिन का संबंध अलगअलग धर्मों से होता है. ऐसे लोग अपना जीवन पूरे धार्मिक भाव से ईमानदारी के साथ गुजारते हैं. कई लोग हर रोज उसी तरह शाम को खून पीते हैं, जैसे कई दूसरे लोग शाम को शराब पीते हैं.

कइयों के बारे में किसी को पता भी नहीं चलता कि वे किसी ब्लड बैंक से चुपचाप ब्लड खरीदते हैं और आराम से घर बैठ कर पीते हैं. कई लोग खून को चाय में मिला कर पीते हैं तो कई इसे विभिन्न किस्म की जड़ीबूटियों के साथ पीते हैं. कई लोग ऐसे भी हैं, जो इंसान के साथसाथ कभीकभार जानवर का खून भी पी लेते हैं. खासकर तब जब इंसान का खून उपलब्ध नहीं हो पाता. कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो बहुत परोपकारी होते हैं. खून पीने वाले आज के ड्रैकुला माइथोलौजी की कथाओं की तरह न तो कब्रिस्तान जाते हैं और न वहां रहते हैं, बल्कि नाइट क्लब जाते हैं.

कई नाइट क्लबों में भी चुपचाप खून परोसा जाता है. ब्राउनिंग जैसे शोधकर्ताओं  ने पाया कि ऐसे कई ‘वैंपायर’ भी होते हैं, जिन के लिए खून पीना एक मनोवैज्ञानिक जरूरत बन जाती है. अपने शोध के दौरान ब्राउनिंग की एक ऐसे किशोर से मुलाकात हुई, जो मुश्किल से 13-14 साल का था. उस ने ब्राउनिंग को बताया कि वह हमेशा कमजोर महसूस करता था, दोस्तों के साथ खेलते हुए थक जाता था. एक दिन उस का अपने किसी दोस्त से झगड़ा हो गया.

इस झगड़े में उस के दोस्त को चोट लग गई, खून बहने लगा और उसी दौरान वह खून उस के मुंह, दांतों में लग गया, जिस से उसे लगा कि अचानक उस के अंदर ताकत आ गई है. खून के स्वाद ने खून की भूख बढ़ा दी. अब वह नियमित खून पीता है. किसी शराबी की तरह जब तक वह खून नहीं पीता, उस के शरीर में वह स्फूर्ति नहीं आती. कुल मिला कर यह विकृति एक मनोवैज्ञानिक नशा ही है. मिलिए ब्लट से. 28 साल की ब्लट कैटशेन ड्रैकुलाओं को अपना खून पिलाती हैं. मगर यह ऐसा नहीं कहतीं. यह खुद को एक ब्लड डोनर बताती हैं. ब्लट अमेरिका के मैक्सिको प्रांत के लूसियाना शहर में रहती हैं. वह हमारे आप के जैसी ही बिलकुल सामान्य महिला हैं. भिखारियों के प्रति दयालु, बच्चों से प्यार करने वाली सभ्य महिला, अपने से बड़ों की इज्जत करने वाली.

कहने का मतलब बिलकुल सामान्य और खुशमिजाज. लेकिन वह टेक्सास में रहने वाले अपने एक वैंपायर दोस्त के घर भी जाती रहती हैं, ताकि उसे अपना खून पिला सकें. माइकल वैकमील नाम का उन का यह दोस्त नियमित रूप से उन का खून पीता है. यह जानने की इच्छा स्वाभाविक है कि आखिर अलगअलग वैंपायरों को ब्लट अपना खून कैसे पिलाती होंगी? पीठ से निकाल कर या वह कहती होंगी कि सीधे चीरा लगा कर वह खून पी लें. हकीकत यह है कि ब्लट दोनों ही तरह से खून पिलाती हैं.

कई बार खून पीने के लिए वैंपायर उन की पीठ पर कट लगाते हैं. इस के बाद सीधे मुंह लगा कर खून पी लेते हैं तो कई बार पहले सक्शन कप की मदद से खून शरीर से निकाला जाता है, फिर आसानी से बातचीत करते हुए पीया जाता है. खून किस तरीके से पीया जाना है, यह दोनों की रजामंदी से तय होता है. Suspense Story Hindi

लेखक – निनाद गौतम    

 

Family Dispute: भाभी के लिए भाई बना दुश्मन

Family Dispute: निठल्ले अंग्रेज सिंह की नीयत अपनी खूबसूरत भाभी पर ही नहीं, भाई की दौलत पर भी खराब थी. यह सब पाने के लिए उस ने दोस्तों की सलाह पर जो किया, वह किसी भी कीमत पर उचित नहीं था.  सखेतों का काम निपटा कर सुखविंदर सिंह ने दोपहर का खाना खाने के लिए घर जाने से पहले जानवरों के कमरे में जा कर उन का चारा वगैरह देख लिया था. पूरी तरह संतुष्ट हो कर वह घर के लिए चल पड़ा. उस के खेतों से कुछ दूरी पर कुलदीप सिंह के खेत थे. उस के आगे लखविंदर और जसबीर के खेत थे.

चूंकि कुलदीप दूर के रिश्ते में उस का भाई लगता था और गांव जाने का रास्ता उस के खेतों से था, इसलिए उस ने सोचा कि वह उस से भी पूछ ले कि अगर वह भी घर चल रहा है तो दोनों साथसाथ बातचीत करते चले जाएंगे. यही सोच कर सुखविंदर खेतों में बने कुलदीप के नलकूप वाले कमरे की ओर बढ़ा. जैसे ही वह नलकूप की टंकी के पास पहुंचा, उस के पैर जहां थे, वहीं रुक गए. उस का शरीर कांप उठा और मारे डर के उस का चेहरा पीला पड़ गया. एकाएक उस के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली.

नलकूप वाले कमरे के दरवाजे के ठीक बीचोबीच कुलदीप सिंह की लहूलुहान लाश पड़ी थी. उस के सिर, पेट और शरीर के अन्य अंगों से खून अभी भी रिस रहा था. कुलदीप को उस हालत में देख कर सुखविंदर घबरा गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह तेजी से गांव की ओर भागा. गांव पहुंच कर सीधे वह कुलदीप के घर पहुंचा और एक ही सांस में उस की पत्नी करमजीत कौर को पूरी बात बता दी. संयोग से उस समय करमजीत कौर का भाई रछपाल सिंह भी बहन से मिलने आया था. सुखविंदर की बात सुन कर करमजीत कौर भाई रछपाल, सुखविंदर और गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ खेतों की ओर भागी.

नलकूप पर इन लोगों ने जो देखा, सब की सांसें अटक गईं. करमजीत तो दहाड़ मार कर पति के ऊपर गिर पड़ी. कुछ लोगों ने कुलदीप की नाड़ी देखी तो पता चला कि वह मर चुका है. तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस को दी गई. यह घटना 9 सितंबर, 2015 की है. हत्या की सूचना मिलते ही थाना सुलतानपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह, एसआई जसप्रीत सिंह, एएसआई लखविंदर सिंह, हैडकांस्टेबल जसविंदर सिंह, वतन सिंह, सुखदेव सिंह और कमलजीत सिंह के साथ गांव माछीछोआ पहुंच गए. अब तक वहां लगभग पूरा गांव जमा हो चुका था.

हत्या की सूचना मिलने के तुरंत बाद हरप्रीत सिंह ने घटना की सूचना एसपी (डी) जगजीत सिंह सरोआ के साथसाथ क्राइम टीम को भी दे दी थी. इसलिए उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते क्राइम टीम भी पहुंच गई थी. हरप्रीत सिंह ने लाश का गहराई से निरीक्षण किया तो मृतक के सिर और पेट पर चोटों के गंभीर निशान नजर आए. शायद वे किसी तेजधार हथियार से किए गए थे. यही गंभीर चोटें मौत का कारण बनी थीं. उन्होंने आसपास का भी निरीक्षण किया कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए, जिस की मदद से जांच आगे बढ़ सके.

बहरहाल, क्राइम टीम को जो सबूत मिले, उन्हें कब्जे में ले लिए तो हरप्रीत सिंह ने अन्य औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाना लौट कर उन्होंने मृतक की पत्नी करमजीत कौर की ओर से कुलदीप सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर दिया. इस के बाद इस अंधे कत्ल के खुलासे के लिए एसएसपी राजेंद्र सिंह ने सीआईए स्टाफ की एक टीम गठित कर दी.

काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं चला कि कुलदीप की हत्या किस ने और क्यों की थी? पहले पुलिस ने इस हत्या को अवैध संबंधों से जोड़ कर देखा और अपने कुछ मुखबिरों को करमजीत कौर पर नजर रखने के लिए लगा दिया. मृतक कुलदीप की भी कुंडली खंगाली गई. पुलिस को संदेह था कि अवैध संबंधों में रोड़ा बनने की वजह से करमजीत कौर ने ही पति को मरवा दिया होगा. इस बात पर भी गौर किया जा रहा था कि कहीं कुलदीप के ही किसी से नाजायज संबंध न रहे हों और उस के घर वालों ने कुलदीप को रास्ते से हटा दिया हो.

थाना सुलतानपुर लोधी पंजाब के जिला कपूरथला के अंतर्गत आता है. इसी थाने का एक गांव है माछोछीआ, जिस में सरदार समुंद्र सिंह परिवार के साथ रहते थे. उन के पास काफी उपजाऊ जमीन थी, गांव में पक्का मकान था. खेतों से इतनी पैदावार हो जाती थी कि साल का खर्च निकालने के बाद भी उन के पास काफी कुछ बच जाता था, जिस में से गुरु का आदेश ‘वंड छक्को’ मान कर काफी पैसा वह गरीबों और जरूरतमंदों को दे देते थे. कुल मिला कर समुंद्र सिंह अपने नाम की ही तरह नेकदिल और दरियादिल थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे थे. बड़ा कुलदीप सिंह, उस से छोटा अंग्रेज सिंह और सब से छोटा रणजीत सिंह.

रणजीत सिंह थोड़ा मंदबुद्धि था. जबकि अंग्रेज सिंह काफी चालाक और शातिरदिमाग था. वह जिस तरह का दिखाई देता था, उस तरह का था नहीं. बड़ा कुलदीप सिंह पिता की ही तरह धार्मिक सोच वाला सीधासादा नेक इंसान था. दूसरों और जरूरतमंदों के काम आना उसे अच्छा लगता था. उस की व्यवहार कुशलता और स्वभाव की वजह से गांव में उस की बड़ी इज्जत थी. सभी उस से प्यार भी करते थे. जबकि उस के छोटे अंग्रेज सिंह को गांव का कोई भी आदमी पसंद नहीं करता था. तीनों भाई अपने पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे.

हरप्रीत सिंह ने मृतक की पत्नी करमजीत कौर और गांव वालों से पूछाताछ की. सब का यही कहना था कि कुलदीप की किसी से न कोई दुश्मनी थी और न अदावत. वह सब के काम आने वाला इंसान था. लोग उस की बहुत इज्जत करते थे. मुखबिरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मृतक और उस की पत्नी करमजीत कौर का चरित्र एकदम पाकसाफ था. ना तो मृतक के किसी औरत से नाजायज संबंध थे और न ही करमजीत कौर की किसी अन्य मर्द से बोलचाल थी. कुलदीप पूरा दिन अपने खेतों में व्यस्त रहता था. फालतू बातों के लिए पतिपत्नी के पास जरा भी समय नहीं था. मुखबिरों ने यह भी बताया था कि यह काम किसी बाहरी आदमी ने किया है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के रिश्तेदारों तथा अगलबगल के गांव वालों से भी पूछताछ की. लेकिन इस का भी कुछ नतीजा नहीं निकला. हर किसी ने मृतक की तारीफ ही की. किसी ने उस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा. जब इस मामले की जांच आगे नहीं बढ़ सकी तो एसएसपी राजेंद्र कुमार ने तीन टीमें बना कर जांच में लगा दीं. थानाप्रभारी हरप्रीत सिंह ने इस मामले को चुनौती के रूप में लिया. उन्हें लगता था कि कहीं कोई ऐसी बात है, जो उन की नजरों के सामने नहीं आ रही है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के छोटे भाई अंग्रेज सिंह को बुला कर पूछाताछ की तो उस के बयानों में तमाम बातें विरोधाभासी मिलीं. वह किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था. वह हर बात को घुमाफिरा कर ही कहता था. पूछताछ के बाद उन्होंने उसे जाने तो दिया, लेकिन उस पर नजर रखने के लिए अपने कुछ चालाक मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद ही मुखबिरों ने अंग्रेज सिंह के बारे में जो सूचनाएं दीं, उसे सुन कर हरप्रीत सिंह को लगा कि अब हत्यारे उन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं हैं.

हरप्रीत सिंह अंग्रेज सिंह को पकड़ कर थाने ले आए और सख्ती से पूछताछ शुरु कर दी. हर अपराधी की तरह अंग्रेज सिंह भी खुद को निर्दोष बताता रहा. लेकिन हरप्रीत सिंह के पास जो सबूत थे, उन्हें सामने रख कर जब पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने भाई की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने कहा कि उसी ने अपने दोस्तों, बगीचा सिंह पुत्र निम्मा सिंह निवासी गांव थेहवाला, जसवंत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, राजू पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, परविंदर सिंह पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव मुहालम, जिला फिरोजपुर तथा चरणजीत सिंह पुत्र सुच्चा सिंह निवासी गांव थेहवाला के साथ मिल कर भाई की हत्या की थी.

इस के लिए उस ने अपने इन दोस्तों को 2 लाख रुपए देने का वादा किया था, जिस में से एक लाख रुपए उस ने किसी से उधार ले कर दे भी दिए थे. उसी दिन हरप्रीत सिंह ने इस हत्या में शामिल लोगों के घरों पर छापे मारे, जिस में से बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पकड़ लिए गए. बाकी के 3 लोग फरार होने में सफल रहे. शायद उन्हें पुलिस की काररवाई की भनक लग गई थी. गिरफ्तार किए गए तीनों अभियुक्तों से पूछताछ में कुलदीप सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह हीनभावना से ग्रस्त एक ईर्ष्यालु भाई की घृणित मानसिकता का परिणाम था. कुलदीप सिंह और उस के छोटे भाई अंग्रेज सिंह की सोच में जमीनआसमान का अंतर था.

कुलदीप सिंह जहां धार्मिक सोच वाला दयालु आदमी था, वहीं अंग्रेज सिंह शैतानी सोच वाला ईर्ष्यालु आदमी था. तीसरा भाई रणजीत सिंह मंदबुद्धि था, इसलिए उसे परिवार की किसी चीज से कोई मतलब नहीं था. उस का ज्यादातर समय गुरुद्वारा में बीतता था. गांव वाले अकसर कुलदीप सिंह की बड़ाई किया करते थे. यह बात अंग्रेज को बिलकुल नहीं भाती थी. गांव में कोई समारोह होता तो कुलदीप सिंह को उस में सब से आगे रखा जाता. यह सब देख कर अंग्रेज सिंह जल उठता था. उसे इस बात पर गुस्सा आता था कि कुलदीप सिंह की तरह लोग उस की इज्जत क्यों नहीं करते.

एक दिन शराब पीते समय यही बात उस ने अपने दोस्त बगीचा सिंह से कही तो उस ने कहा, ‘‘उस के रहते तुझे कोई नहीं पूछेगा भाई, इसलिए तू उसे खत्म क्यों नहीं कर देता.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ अंग्रेज सिंह ने हैरानी से कहा.

‘‘भाई बढि़या आइडिया दे रहा हूं. तुझे भाभी बहुत अच्छी लगती है न? कब से तू उस के पीछे पड़ा है, लेकिन वह तुझे हाथ नहीं रखने दे रही है. कुलदीप को मार देगा तो वह तेरी हो जाएगी. इस के अलावा उस की जमीन भी तेरी हो जाएगी. तेरा छोटा भाई पागल ही है, उस के हिस्से की भी जमीन तुझे ही मिलेगी. इस तरह पूरी प्रौपर्टी का मालिक तू अकेला हो जाएगा.’’ बगीचा सिंह ने कहा.

अंग्रेज सिंह की आंखे हैरानी से फैल गईं. उस ने कहा, ‘‘यार बगीचा, तू ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई. तू ने कितनी सच बात कही है, भाई के न रहने पर भाभी करमजीत कौर न खुद को संभाल पाएगी और न इतनी जमीन को. मजबूरन उसे मेरा सहारा लेना पड़ेगा. फिर तो मेरी चांदी ही चांदी हो जाएगी.’’

यह बात दिमाग में आते ही अंग्रेज सिंह भाई कुलदीप की हत्या की योजना बनाने लगा. 2 बार तो उस ने नलकूप की मोटर के स्टार्टर में बिजली का नंगा तार बांध दिया कि कुलदीप मोटर स्टार्ट करने आए तो करंट से उस की मौत हो जाए. लेकिन तार पर नजर पड़ जाने की वजह से कुलदीप बच गया. इस के बाद अंग्रेज ने कुएं के ऊपर रखा लकड़ी का पटरा हटा कर पतली सी प्लाई रख दी, जिस से कुलदीप उस पर चढ़े तो वह टूट जाए और कुलदीप सीधे कुएं में गिर जाए. नीचे पंखा लगा था, अगर कुलदीप उस पर गिरता तो मर जाता. लेकिन उस पर भी कुलदीप की नजर पड़ गई. उस ने उसे हटा कर मोटा पटरा रख दिया.

इस तरह कुलदीप सिंह को मारने की अंग्रेज सिंह की सारी कोशिशें विफल हो गईं. अपनी इन कोशिशों में असफल होने के बाद अंग्रेज सिंह ने कुलदीप की हत्या पैसे ले कर हत्या करने वालों से कराने पर विचार किया और बगीचा सिंह के माध्यम से उस ने राजू, परविंदर और चरणजीत सिंह को 2 लाख रुपए में बड़े भाई की हत्या की सुपारी दे दी. एक लाख रुपए उस ने एक आदमी से उधार ले कर एडवांस भी दे दिए. रुपए देने के बाद अंग्रेज सिंह ने पांचों को पिस्तौल खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश भेजा. ये सभी बरेली, अलीगढ़ आदि शहरों में घूम कर 7 सितंबर को लौट आए. इन्हें कहीं पिस्तौल नहीं मिली. आखिर में तय हुआ कि किसी तेजधार हथियार से कुलदीप सिंह की हत्या कर दी जाए.

9 सितंबर की दोपहर को जब कुलदीप सिंह खेतों का काम निपटा कर मोटर बंद करने के लिए नलकूप के कमरे में गया तो वहां बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पहले से बैठे थे. कुलदीप मोटर बंद करने के लिए जैसे ही कमरे में घुसा, दोनों ने एकदम से कुलदीप पर हंसिया और चाकू से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से कुलदीप चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा और कुछ देर तड़प कर मर गया. कुलदीप सिंह मर गया तो अंग्रेज सिंह बगीचा और परविंदर को अपनी मोटरसाइकिल से सुलतानपुर लोधी छोड़ आया. इस के बाद घर लौट कर वह इस तरह सामान्य बना रहा, जैसे उसे किसी बात का पता ही नहीं है.

इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह ने मुखबिरों को तो अंग्रेज सिंह के पीछे लगाया ही था, उसी समय उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवा ली थी. इसी काल डिटेल्स से पता चला था कि कुलदीप के कत्ल वाले दिन 9 सितंबर को कुलदीप की हत्या से कुछ देर पहले और बाद में अंग्रेज सिंह ने 4-5 लोगों से 60-70 बार बात की थी. उन्हीं पांचों नंबरों से ही अंग्रेज सिंह के पांचों साथियों का पता चला था. बहरहाल, गिरफ्तार अंग्रेज सिंह, बगीचा सिंह और परविंदर का बयान लेने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान बगीचा सिंह और परविंदर की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया और चाकू बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर 15 सितंबर को तीनों अभियुक्तों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे, किसी की जमानत नहीं हुई थी. बाकी बचे तीनों अभियुक्तों की पुलिस तलाश कर रही थी. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं गए थे. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: इश्क की राह में भटकी औरत

Love Story: जिस महेश के लिए राधा ने पति से बेवफाई की, उसी महेश की नीयत जब उस की 14 साल की बेटी पर बिगड़ी तो भला राधा इस बात को कैसे बरदाश्त करती. फिर उस ने जो किया, क्या वह ठीक था

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के थाना झीझंक का एक गांव है महेवा. इसी गांव में राम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी राधा थी. राम सिंह घी का कारोबार करता था. वह गांवगांव जा कर लोगों के यहां से घी खरीदता और उसे ले जा कर कानपुर में बेच आता. इस से उसे जो फायदा होता, उसी से उस के परिवार की गुजरबसर होती थी.

राम सिंह की बेटी राधा सुंदर होने के साथसाथ थोड़ी चंचल भी थी. इसलिए सयानी होने पर गांव का हर लड़का उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लग गया था. जब यह सब राम सिंह ने देखा तो उसे लगा कि अब जल्दी ही राधा की शादी कर देनी चाहिए. उस ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू की तो उसे गांव बेलूपुर में एक लड़का मिल गया.

लड़के का नाम अजय था. उस के पिता लाखन सिंह के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. इसी वजह से उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. बातचीत शुरू हुई तो राधा और अजय का रिश्ता तय हो गया. इस रिश्ते में अगर कोई खटकने वाली बात थी तो यह कि अजय सांवला था, जबकि राधा गोरी थी. इस के बावजूद अजय का पलड़ा भारी था, क्योंकि उस के पास 10 बीघा जमीन थी. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई.

अजय तो सुंदर पत्नी पा कर खुश था, जबकि राधा अपने सांवले पति से खुश नहीं थी. शादी के पहले उस के मन में पति की जो छवि थी, अजय उस में कहीं भी फिट नहीं बैठता था. लेकिन अब विवाह हो गया था, इसलिए साथ तो रहना ही था. धीरेधीरे राधा एक बेटी अर्पिता और 2 बेटों जय तथा विजय की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी राधा में कोई बदलाव नहीं आया था. उस के मन में न तो बच्चों के प्रति वह मोह जागा था, जो एक मां को अपने बच्चों के प्रति होता है और न ही पति के प्रति वह चाहत जागी थी, जो जागनी चाहिए थी. पत्नी की इस उपेक्षा से अजय काफी दुखी था.

इस दुख को कम करने के लिए वह शराब पीने लगा. जब वह पक्का शराबी हो गया तो खेतीकिसानी से उस का मन हट गया. उसे लगता था कि आखिर वह किस के लिए मेहनत करे. जब वह पूरी तरह से निठल्ला हो गया तो मांबाप ने उसे अलग कर दिया. गांव में अजय का एक और अन्य मकान था, इसलिए मांबाप से अलग होने पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई. वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. वह मेहनत कर नहीं सकता था, इसलिए बाप से मिली जमीन उस ने बटाई पर दे दी.

राधा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी उस की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. बल्कि शरीर भर गया था, इसलिए वह पहले से भी ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. स्वभाव से हंसमुख और चंचल राधा का मन घरगृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि वह कभी अजय को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाई. शायद इसी वजह से उस का मन भटकता रहता था. राधा की सुंदरता और चंचलता की वजह से गांव के महेश का दिल उस पर आ गया था. वह उस तक पहुंचने का तिकड़म भिड़ाने लगा था.

3 भाइयों में महेश सब से बड़ा था. उस के पिता भवानी सिंह ने उस का विवाह शिवली कस्बा की रहने वाली रजनी से कर दिया था. लेकिन अपनी आशिकमिजाजी की वजह से वह पत्नी का हो कर नहीं रह सका. वह इधरउधर मुंह मारता फिरता था. गांव की कई महिलाओं से उस के संबंध थे. लेकिन उन के बारे में कोई नहीं जान सका. राधा पर वह पूरी तरह से मोहित था. इसलिए उस तक पहुंचने के लिए उस ने उस के खेत बटाई पर ले लिए. इस से उसे राधा के घर आनेजाने में आसानी हो गई थी. वह जब भी राधा के घर जाता, मौका मिलने पर उस से हंसीमजाक करने से नहीं चूकता.

राधा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. एक दिन महेश आया तो अजय घर में नहीं था. राधा को अकेली पा कर उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वैसा ही कुछ हाल राधा का भी था. उस ने इठलाते हुए कहा, ‘‘आओ देवरजी, कैसे आना हुआ?’’

‘‘खेतों पर काम कर रहा था, अचानक तुम्हारी याद आई तो मन मचल उठा. पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, जब वह नहीं माना तो यह सोच कर चला आया कि चल कर प्यारी भाभी का दीदार कर लूं. कभीकभी सोचता हूं कि इतनी सुंदर भाभी कालेकलूटे अजय भैया के पल्ले कैसे पड़ गईं?’’

‘‘अपनाअपना नसीब है देवरजी. मेरी तकदीर में यही लिखा था.’’ राधा ने लंबी सांस ले कर कहा.

राधा के इस जवाब से महेश को लगा कि उस का तीर सही निशाने पर लगा है. वह उस के एकदम करीब आ कर बोला, ‘‘नसीब अपने हाथ में होता है भाभी, मैं आप से प्यार करता हूं. मैं कोई पराया तो हूं नहीं. वैसे भी मैं न जाने कब से तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना हूं.’’

‘‘देवरजी, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं वह आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे?’’ राधा ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

महेश ने उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, पर खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’

राधा को बांहों में भरते ही उस ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी. राधा ने उस की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इस की वजह यह थी कि वह भी यही चाहती थी. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भूखे भेडि़ए की तरह क्यों टूटे पड़ रहे हो, थोड़ा सब्र से काम लो, दरवाजा खुला है. वैसे भी तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक नहीं है.’’

महेश समझ गया कि राधा को कोई आपत्ति नहीं है. इस का उस ने पूरा फायदा उठाया और अपने तथा राधा के बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. इस तरह राधा के कदम एक बार बहके तो बहकते चले गए. मौका मिलते ही महेश राधा के घर आ जाता. राधा भी हर तरह से उस का सहयोग कर रही थी. इस की वजह यह थी कि वह उस के पति से हर मायने में इक्कीस था. महेश और राधा का यह अवैध संबंध चोरीछिपे सालों तक चलता रहा, किसी को पता नहीं चला. आखिर कब तक उन का यह गलत संबंध छिपा रहता. वे समय के साथ लापरवाह होते गए, परिणामस्वरूप एक दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उन के बीच यह खेल काफी दिनों से चल रहा है.

महेश चूंकि दबंग स्वभाव का था, इसलिए अजय ने उस से सीधे टकराना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद उस ने राधा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘शरम आनी चाहिए तुम्हें यह सब करते हुए. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद तुम नीचता पर उतर आई हो.’’

इस के बाद जब दोनों में तूतूमैंमैं शुरू हुई तो बात बढ़ती गई. इस के बाद अजय ने राधा की जम कर पिटाई कर दी. लेकिन इस पिटाई के बाद भी राधा ने महेश को नहीं छोड़ा. वह महेश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि जब उसे घर में उस से मिलने का मौका नहीं मिलता तो वह किसी न किसी बहाने खेतों पर जा कर उस से मिल लेती. जब इस का पता अजय को चलता तो वह शराब पी कर राधा और महेश को खूब गालियां देता.

ज्यादा शराब पीने की वजह से अजय बीमार पड़ गया. राधा ने कानपुर ले जा कर उस का इलाज कराया. समय पर सही इलाज मिलने से अजय ठीक हो गया. उस के इलाज में सारा पैसा महेश ने लगाया था, इसलिए वह उस के एहसान तले दब गया. अब उस ने महेश से समझौता कर लिया कि वह उस के और राधा के बीच में बाधा नहीं बनेगा. इस के बाद महेश ने उस की नौकरी झीझंक कस्बा में एक आढ़ती के यहां लगवा दी. अजय सुबह 11 बजे घर से निकलता तो शाम को ही वापस आता. कभीकभी काम ज्यादा होता तो वह आढ़त पर ही रुक जाता.

अब तक राधा की बेटी अर्पिता 14 साल की हो चुकी थी. वह भी मां की तरह सुंदर और चंचल थी. गांव के रिश्ते के नाते वह महेश को भइया कहती थी. मां और महेश के संबंधों की उसे जानकारी थी. लेकिन मां के डर की वजह से वह विरोध नहीं कर पाती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि स्कूल की फीस से ले कर बाकी के उस के सारे खर्च महेश ही उठाता था. शायद इसीलिए वह अपनी जुबान बंद रखती थी.

एक दिन अजय ने घर से जाते समय राधा से कहा कि रात को वह घर नहीं आ पाएगा, इसलिए वह बच्चों के साथ खाना खा कर सो जाए. शाम ढलते ही राधा ने महेश को फोन कर के बता दिया कि वह जल्दी से घर आ जाए. आज की पूरी रात उन की अपनी है. क्योंकि अजय घर नहीं आएगा. राधा की बात सुन कर महेश बहुत खुश हुआ. रात 10 बजे के आसपास वह शराब के नशे में झूमता हुआ राधा के घर पहुंचा. अब तक राधा ने बच्चों को खिलापिला कर दूसरे कमरे में सुला दिया था. महेश ने आते ही राधा को बांहों में भरा और उस के साथ कमरे में चला गया.

आधी रात के बाद महेश लघुशंका के लिए कमरे से बाहर निकला तो उस की नजर दूसरे कमरे में सो रही अर्पिता पर पड़ी. उस को उस रूप में देख कर महेश की सांसें तेज हो गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा. उस के बाद लघुशंका कर के लौटा तो एक बार फिर उस की नजरें अर्पिता कर टिक गईं.

उस की नीयत खराब  होने लगी. वह राधा के कमरे में आया तो देखा राधा सो रही थी. अब तक उस की नीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह लौटा और जा कर अर्पिता के बगल में लेट गया. उस ने अर्पिता से छेड़छाड़ की तो उस की नींद खुल गई. उस ने चीखना चाहा. लेकिन महेश ने उस के मुंह पर हाथ रख कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘चुप रह, मैं हूं महेश.’’

‘‘महेश भइया तुम? यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘चुप रह, मैं जो करने जा रहा हूं, इस में बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘नहीं भइया, यह गलत है. आप को जो करना है, मम्मी के साथ करो. मेरे साथ कुछ किया तो शोर मचा दूंगी.’’ अर्पिता ने धमकाया तो महेश डर गया और चुपचाप राधा के कमरे में चला गया.

अर्पिता राधा से ज्यादा सुंदर थी, इसलिए वह महेश के दिलोदिमाग में बस गई. अर्पिता को पाने के लिए वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस छेड़छाड़ का परिणाम यह निकला कि अर्पिता को भी मजा आने लगा. अब वह भी महेश के आने का इंतजार करने लगी. महेश अर्पिता के साथ कुछ कर पाता, इस से पहले ही एक दिन राधा ने उसे अर्पिता से छेड़छाड़ करते देख लिया. उस के बाद तो राधा महेश पर बिफर पड़ी, ‘‘मेरी फूल सी बच्ची को बरगलाने में तुम्हें शरम नहीं आई, मैं ने पति से बेवफाई कर के तुम्हारा साथ दिया, जबकि तुम मेरी ही बेटी को बरबाद करने पर तुले हो. कान खोल कर सुन लो, आज के बाद तुम ने उसे बरगलाने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा.’’

राधा की धमकी का महेश पर कोई असर नहीं हुआ. उसे जब भी मौका मिलता, वह अर्पिता के साथ छेड़खानी कर बैठता. एक दिन तो हद हो गई, महेश ने राधा के सामने ही अर्पिता को अपनी बांहोें में भर लिया. इस के बाद तो राधा आपा खो बैठी. उस ने महेश और अर्पिता दोनों की पिटाई कर दी. इस के बाद राधा और महेश में जम कर कहासुनी हुई. राधा की समझ में आ गया कि महेश ऐसा सांप है, जो किसी भी दिन उस की बेटी को डंस सकता है, इसलिए उस ने इस सांप का फन कुचलने का निश्चय कर लिया.

14 दिसंबर, 2015 की सुबह राधा थाना झीझंक पहुंची और थानाप्रभारी आर.के. सिंह को बताया कि बेलूपुर के रहने वाले महेश ने उस के घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. उस की इस सूचना पर आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. उस समय राधा के घर के बाहर भीड़ लग चुकी थी. भीड़ को हटा कर थानाप्रभारी वहां पहुंचे, जहां महेश फांसी के फंदे से झूल रहा था. महेश जीने की ग्रिल से लटका था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. पहली ही नजर में फांसी लगाने जैसा कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा था. न तो उस के मुंह से झाग निकला था और न ही मलमूत्र निकला था. शक होने पर आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

उन्होंने राधा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि महेश ने उस के खेत बटाई पर ले रखे हैं, इसलिए उस का उस के घर आनाजाना था. उस के पति अजय के नौकरी पर जाने के बाद महेश आया और उस की साड़ी का फंदा बना कर ग्रिल से झूल गया. उस ने महेश को न आते देखा और न फांसी पर झूलते देखा. आर.के. सिंह ने मृतक महेश के पिता भवानी सिंह से पूंछतांछ की तो फफकफफक कर रोते हुए उस ने बताया कि महेश की हत्या राधा और उस के पति अजय ने की है. पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश को फंदे पर लटकाया गया है. हत्या की वजह राधा और मेहश के बीच अवैध संबंध हैं.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो आर.के. सिंह चौंके. क्योंकि महेश की मौत गला दबाने से हुई थी. उस ने आत्महत्या नहीं की थी. चूंकि शक के घेरे में राधा और उस का पति अजय था, इसलिए वह उन्हें हिरासत में ले कर थाने ले आए और पूछताछ की. अजय ने बताया कि वह घर पर नहीं था, इसलिए महेश की हत्या किस ने की, उसे पता नहीं है. अजय ने हत्या करने से साफ मना कर दिया तो आर.के. सिंह ने राधा से पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करती रही, लेकिन जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और महेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि उस के और महेश के बीच पिछले कई सालों से संबंध थे. उस के प्यार में अंधी हो कर उस ने पति तक से बेवफाई कर डाली. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह बेवफाई उस की बेटी की जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. महेश उस की बेटी अर्पिता पर बुरी नजर डाल रहा था. राधा ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने साजिश रच कर 14 दिसंबर की सुबह 4 बजे जब अजय काम पर चला गया तो महेश को बुला लिया. आते ही महेश ने जैसे ही उसे पकड़ा, उस ने उस के नाजुक अंग को दांतों से काट लिया.

वह दर्द से तड़पने लगा तो वह उस की छाती पर सवार हो गई और साड़ी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने उस की लाश को फंदे से जीने की ग्रिल से लटका दिया. उस के बाद थाने जा कर पुलिस को सूचना दे दी. राधा के इसी बयान के आधार पर आर.के. सिंह ने मृतक के पिता भवानी सिंह की ओर से अपराध संख्या 347/2015 पर महेश की हत्या का मुकदमा राधा के खिलाफ दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

17 दिसंबर, 2015 को थाना झीझंक पुलिस ने राधा को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. चूंकि अजय निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. Love Story

 

Jharkhand Crime: अय्याशी की राह पर गुनाह

Jharkhand Crime: प्रभाकरण अय्याश तबीयत का आदमी था. खूबसूरत पत्नी के रहते वह अस्पताल की महिला डाक्टरों और नर्सों पर लाइन मारता था. जब दूर के रिश्ते की बहन हेमा नर्स बन कर अस्पताल आई तो उस ने उसे भी नहीं छोड़ा. हेमा की वजह से डा. प्रभाकरण की पत्नी डा. शांति ने तो घर छोड़ दिया पर हेमा के साथ जो हुआ वह बहुत भयानक था…

झारखंड के जिला सिंहभूम में एक तहसील है घाटशिला. इस तहसील का उपनगर मउभंडार हिंदुस्तान कौपर लिमिटेड की वजह से प्रसिद्ध है. मउभंडार में जहां कौपर फैक्ट्री है, वहां पास में ही कौपर कालोनी है, जो वर्कर्स के लिए बनाई गई है. इस कालोनी से थोड़ा हट कर मउभंडार वर्क्स हौस्पिटल है, जो स्थानीय लोगों के लिए बनाया गया है. सन 1979 में इस हौस्पिटल में एक डाक्टर तैनात था प्रभाकरण. उस की पत्नी डा. शांति भी उसी अस्पताल में तैनात थीं. इस डाक्टर दंपति को अस्पताल के प्रांगण में ही रहने के लिए बंगला मिला हुआ था. डाक्टर प्रभाकरण शक्लसूरत और व्यवहार से जितना असभ्य, बदमिजाज और क्रूर लगता था, डा. शांति अपने नाम के अनुरूप उतनी ही शांत स्वभाव की थीं.

डा. प्रभाकरण और डा. शांति के 2 बच्चे थे, एक बेटा एक बेटी. दोनों बच्चे मोसाबनी कौनवेंट स्कूल में पढ़ रहे थे. डा. प्रभाकरण असभ्य और बदमिजाज ही नहीं बल्कि दिलफेंक भी था. अस्पताल की किसी डाक्टर अथवा नर्स के साथ उस का चक्कर चलता रहता था. कई बार तो उस की प्रेम कहानियों की चर्चा अस्पताल से बाहर कालोनी तक पहुंच जाती थीं. यही वजह थी कि डा.  शांति को पति की इन गलत हरकतों की वजह से कालोनी के लोगों की चुभती नजरों का सामना करना पड़ता था.

कई बार तो क्लब वगैरह में मुंहफट अफसर कह भी देते थे, ‘‘भाभीजी, डाक्टर साहब को नकेल डाल कर रखिए. इतनी काबिल और खूबसूरत पत्नी के होते हुए भी पता नहीं किसकिस नाले का पानी पीते रहते हैं.’’

डा. शांति अपमान का घूंट पीने के अलावा कुछ नहीं कर पाती थीं. अस्पताल की सभी लेडी डाक्टर और नर्सें एक जैसी नहीं थीं. कई बार डा. प्रभाकरण को किसी लेडी डाक्टर या नर्स के हाथों अपमानित भी होना पड़ता था. चीफ मैडिकल औफिसर डा. पुरुकायस्थ ने प्रभाकरण को कई बार समझाया भी था लेकिन इस का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. कड़वे मीठे अनुभवों के बीच जैसेतैसे जिंदगी गुजर रही थी, तभी डा. शांति के जीवन में तूफान बन कर आई हेमा. हेमा डा. प्रभाकरण की दूर के रिश्ते की बहन की बेटी थी और उस की नियुक्ति बतौर नर्स टाटा मेन हौस्पिटल टाटानगर में हुई थी.

पूर्व में हेमा डा. प्रभाकरण से शादी के सपने देखा करती थी. दोनों के रिश्ते की बात भी चली थी, लेकिन प्रभाकरण ने हेमा का रिश्ता ठुकरा कर डा. शांति से प्रेम विवाह कर लिया था. उस समय हेमा बहुत रोई थी, उस की मां और बहन ने भी खूब हंगामा किया था. मउभंडार हौस्पिटल से प्रतिदिन 2-3 मरीजों को एंबुलेंस से 30-35 किलोमीटर दूर टाटा हौस्पिटल टाटानगर भेजा जाता था. इस की वजह यह थी कि मउभंडार अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं, गंभीर मरीजों को टाटा हौस्पिटल भेजना पड़ता था. हेमा टाटानगर स्थित टाटा हौस्पिटल के हौस्टल में रहती थी. शनिवार को वह अस्पताल की एंबुलेंस से मउभंडार आ जाती थी और सोमवार सुबह एंबुलेंस से ही टाटानगर लौट जाती थी.

मउभंडार में वह डा. प्रभाकरण के बंगले पर ही ठहरती थी. डा. प्रभाकरण रंगीनमिजाज आदमी था, डा. शांति की गैरमौजूदगी का लाभ उठा कर उस ने हेमा से संबंध बना लिए थे. जब डा. शांति घर में नहीं होती थी तो प्रभाकरण और हेमा इस का जम कर लाभ उठाते थे. डा. शांति को अपने घर में हेमा की मौजूदगी अच्छी नहीं लगती थी. इस की वजह यह कि उन्हें पति की फितरत अच्छी तरह मालूम थी. लेकिन वह चाह कर भी इसलिए कुछ नहीं कर पाती थीं क्योंकि हेमा उन के ससुराल पक्ष से थी. जिस दिन हेमा मउभंडार आई होती थी, उस दिन डा. प्रभाकरण नाइट ड्यूटी पर रहता था. काम सिखाने का बहाना कर के वह हेमा को भी साथ रखता था.

जब हेमा और प्रभाकरण की कहानियां सार्वजनिक होने लगीं तो डा. शांति हेमा के मउभंडार आने पर आपत्ति करने लगीं. लेकिन प्रभाकरण पर हेमा के मादक और मांसल शरीर का नशा छाया हुआ था. हेमा को ले कर डा. प्रभाकरण और डा. शांति के बीच अकसर झगड़े और हाथापाई होती थी, जिस की आवाजें बंगले के बाहर तक सुनाई देती थीं. सर्वेंट क्वार्टर में रहने वाले नौकरचाकर भी बंगले की कहानी खूब चटकारे ले कर सुनाते थे. यह अलग बात है कि उन सब की सहानुभूति डा. शांति के साथ रहती थी. जैसेतैसे दिन गुजर रहे थे कि एक दिन खबर आई कि डा. शांति का ट्रांसफर खेतड़ी कौपर प्रोजेक्ट में हो गया है. चूंकि कालोनी छोटी थी इसलिए इस बात को फैलने में देर नहीं लगी.

महीने भर के अंदर ही डा. शांति अपने दोनों बच्चों के साथ खेतड़ी चली गईं और वहां पर वर्क्स हौस्पिटल जौइन कर लिया. इस के पीछे डा. पुरुकायस्थ का हाथ था. दरअसल ऐसा कर के उन्होंने अपनी मानवता का भरपूर परिचय दिया था. लेकिन डा. शांति के जाने के बाद प्रभाकरण ने अपनी पत्नी के डा. पुरुकायस्थ के साथ झूठेअवैध संबंध की कहानी सुनानी शुरू कर दी. जबकि पत्नी और बच्चों के जाने के बाद वह खुद और भी ज्यादा धूर्त हो गया था. अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था.

हेमा का टाटा अस्पताल से मउभंडार आनाजाना पूर्ववत चलता रहा. हेमा की पोस्टिंग मउभंडार वर्क्स हौस्पिटल में हो जाए इस के लिए प्रभाकरण कलकत्ता औफिस में हर तरह से जुगाड़ बैठा रहा था. इसलिए अब हेमा ज्यादा दिन मउभंडार में ही रहा करती थी. शांति के चले जाने के बाद प्रभाकरण और हेमा ने निर्लज्जता की सारी सीमाओं को पार कर दिया था. टाटा अस्पताल का हौस्टल छोड़ कर वह मउभंडार में ही रहने लगी थी. ड्यूटी के लिए अब वह मउभंडार से ही हौस्पिटल की एंबुलेंस से टाटानगर आनाजाना करने लगी थी.

डा. शांति के जाने, हेमा और प्रभाकरण के साथसाथ रहने की बातें धीरेधीरे पुरानी पड़ने लगी थीं. प्रभाकरण और हेमा जल्दी ही केरल जा कर शादी करेंगे. इस के लिए प्रभाकरण ने डा. शांति को तलाक का नोटिस भेजा है, जैसी बातें लोगों को अकसर सुनने को मिलती रहती थीं. लेकिन कालोनी वालों को यह सब सुननेजानने में अब कोई दिलचस्पी नहीं थी.

इसी बीच अफवाह फैली कि अब डा. प्रभाकरण की नजर डा. शांति की जगह पर आई डा. मधु करकेट्टा पर है. उसे रिझाने के लिए वह उस के आगेपीछे घूम रहा है. प्रभाकरण संथाली सौंदर्य डा. मधु करकेट्टा का उपासक बन गया है, यह जानकारी मिलते ही हेमा किसी घायल नागिन की तरह फुफकार उठी. आए दिन दोनों के चीखनेचिल्लाने की आवाजें हौस्पिटल परिसर में गूंजने लगीं. ऐसी बातों को फैलाने में सर्वेंट क्वार्टर में रहने वाले ही हवा देते थे. मउभंडार हौस्पिटल में हेमा की नियुक्ति होना निश्चित हो गया था कि अचानक हेमा केरल चली गई. उसे केरल के किसी हौस्पिटल में अच्छी नौकरी मिल गई थी. यह बात प्रभाकरण ने लोगों को खुद बताई थी.

हेमा के जाने के ठीक एक महीने बाद उस के पिता और भाई उसे समझाबुझा कर केरल ले जाने के लिए मउभंडार आए. लेकिन हेमा वहां नहीं थी. जब प्रभाकरण ने उन्हें बताया कि हेमा एक महीने पहले ही वहां से चली गई है तो उन्हें आश्चर्य हुआ. हेमा केरल पहुंची ही नहीं थी. वहां उसे कोई नौकरी मिलने वगैरह की कोई बात भी उन के सामने नहीं आई थी. उस ने केरल आने की खबर भी नहीं दी थी. सोचने वाली बात यह थी कि हेमा केरल नहीं गई तो कहां गई? अगर प्रभाकरण ने उसे केरल जाने वाली ट्रेन में बैठाया तो फिर वह रास्ते में गायब कैसे हो गई, जैसे कितने ही सवाल मुंह बाए खड़े थे.

प्रभाकरण की झूठीसच्ची बातों ने उसे शक के घेरे में डाल दिया था. फिर भी उन दोनों ने 2 दिनों तक हौस्पिटल के डाक्टर, नर्स से ले कर सारे कर्मचारियों से हेमा के बारे में पूछताछ की. लेकिन सब का एक ही जवाब था कि पिछले एक महीने से उसे किसी ने नहीं देखा. हर ओर से निराश हो कर वे दोनों टाटा मेन हौस्पिटल जमशेदपुर भी गए, पर हेमा का कुछ पता नहीं लग सका. वे लोग दुखी और निराश हो कर लौट तो गए, लेकिन 2 हफ्ते बाद ही केरल पुलिस हेमा के लापता होने के संदर्भ में पूछताछ करने के लिए मउभंडार आ पहुंची. लेकिन डा. प्रभाकरण डा. करकेट्टा के साथ दीर्घा बीच गया हुआ था.

जब 2 दिन तक प्रभाकरण नहीं लौटा तो पुलिस टीम दीर्घा पहुंची और प्रभाकरण को ढूंढ़ निकाला. पूछताछ के दौरान वह एक ही बात दोहराता रहा कि हेमा को उस ने केरल जाने वाली गाड़ी में चढ़ा दिया था. हेमा कहां गई उसे कुछ नहीं पता. निराश हो कर पुलिस वापस तो लौट गई लेकिन अभी प्रभाकरण की मुश्किलें कम नहीं हुई थीं.

उस साल इतनी बारिश हुई थी कि स्वर्णरेखा नदी का उफान बहुत ही उन्मादी और भयानक हो गया था. इतना भयानक कि नदी का पानी कौपर फैक्टरी के गेट तक आ पहुंचा था. ऐसा लग रहा था कि पूरी कालोनी ही जल निमग्न हो जाएगी. बहुत सारे बहे हुए मृत जानवरों की लाशें बह कर आ गई थीं और कालोनी में दुर्गंध पैदा कर रही थीं. प्रभाकरण के घर से भी बहुत बदबू आ रही थी.

इसी बीच केरला पुलिस सादे कपड़ों में फिर से मउभंडार आ पहुंची. उस ने हौस्पिटल में ही प्रभाकरण को जा घेरा. सब की मौजूदगी में जब प्रभाकरण के बंगले को तलाशी के लिए खोला गया तो मारे दुर्गंध के लोगों को नाक पर रूमाल रखने पड़े. जिस कमरे से भयानक दुर्गंध आ रही थी, उस में टीन का एक बक्सा रखा हुआ था. पानी उस बक्से में से बह कर बाहर आंगन में आ कर नाली में मिल रहा था. पुलिस ने जैसे ही बक्से को खोला, वहां खड़े लोगों की रूह कांप उठी. बक्से में टुकड़ों में कटी हेमा की लाश नमक और एसिड में रखी हुई थी.

थोड़ा हिलाते ही उस के चेहरे से मांस अलग हो गया. उस भयानक दृश्य को देखने के लिए हजारों की भीड़ एकत्र हो गई. सारे सबूतों के साथ पुलिस प्रभाकरण को ले कर जमशेदपुर के टाटा पुलिस स्टेशन ले गई. जहां उस ने अपना गुनाह कबूल लिया. उस ने जो बताया वह क्रूरता की पराकाष्ठा तो थी ही साथ ही मउभंडार वर्क्स हौस्पिटल के मैनेजमैंट की लापरवाही का भी शर्मनाक नमूना था. हेमा के दर्दनाक अंत की कहानी सुन कर सभी हतप्रभ रह गए.

प्रभाकरण से हेमा गर्भवती हो गई थी. वह प्रभाकरण पर जल्द से जल्द शादी  कर लेने के लिए प्रभाकरण पर दबाव डाल रही थी. जबकि उस की बातों पर गौर करने के बजाय प्रभाकरण डा. करकेट्टा के साथ रंगरेलियां मना रहा था. एक दिन हेमा टाटा हौस्पिटल से जल्दी घर लौट आई. घर में प्रभाकरण के साथ डा. मधु करकेट्टा को देख कर वह क्रोध में चिल्लाने लगी.

उस ने डा. करकेट्टा को धक्का देते हुए गेट से बाहर कर दिया और प्रभाकरण को खुले शब्दों में चेतावनी दी, ‘‘मुझे शांति मत समझना जो तुम्हारी रंगरेलियों की वजह से बुजदिल की तरह मुंह छिपा कर कहीं चली जाऊंगी. केरल से मां और नानी को बुला कर पूरे मउभंडार के लोगों के सामने तुम्हारी उस अय्याशी के परिणाम के बारे में बताऊंगी जो मेरे पेट में पल रहा है. वैसे तुम्हारी रंगीनमिजाजी की बात सभी जानते हैं. उस चुड़ैल डाक्टरनी का तो मैं गला दबा कर खून पी जाऊंगी. तुम ने जल्द से जल्द शादी नहीं की तो मैं पुलिस के पास जा कर तुम्हारी करतूत के बारे में बताऊंगी.’’ उस वक्त उस की चीखें बाहर तक सुनाई पड़ रही थीं.

हेमा की धमकियों से प्रभाकरण को बहुत गुस्सा आया. फिर भी उस ने सौरी कहते हुए हेमा से क्षमा मांग ली और जल्दी ही शादी करने की बात कह कर उसे आश्वस्त कर दिया. इस घटना के 2 हफ्ते बाद ही एक रात उस ने हेमा को कोल्डड्रिंक में नींद की दवा डाल कर पिला दी और उसी रात उस ने गला दबा कर उस की हत्या कर दी. प्रभाकरण के अमानवीय कृत्य का अंत यहीं तक नहीं हुआ. उस ने आपरेशन थिएटर से तेज धार वाले औजार ला कर हेमा की लाश के टुकड़े किए और एक बड़े बक्से में रख कर नमक और एसिड डाल दिया. इस काम में डा. करकेट्टा ने उस का साथ दिया.

प्रभाकरण अगर चाहता तो हेमा की लाश के टुकड़ों को एकएक कर के बड़ी आसानी से फैक्टरी गेट तक उफनती हुई स्वर्णरेखा नदी के पानी में फेंक सकता था, जो उस के बंगले से सौ कदम दूरी पर ही था. लेकिन घर में इतने दुस्साहसी काम को अंजाम देने वाला प्रभाकरण ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सका. पहाड़ी नदी की उफनती धारा ने हाथियों तक को बहा दिया था. कहते हैं कि गुनाह सिर चढ़ कर बोलता है, शायद इसी डर से प्रभाकरण ऐसा नहीं कर सका या फिर उचित समय का इंतजार करता रहा जो कभी नहीं आया. अपने बंगले में वह यदाकदा ही जाता था. ज्यादा समय वह हौस्पिटल में ही गुजारता था. वहीं की कैंटीन में वह खातापीता था.

प्रभाकरण के बंगले की नाली से बदबूदार पानी निकलने पर भी कोई सोच तक नहीं सका कि घर के अंदर लाश के टुकड़े सड़ रहे हैं. क्योंकि ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी. पुलिस ने हेमा के पिता और भाई को टाटानगर बुलवाया और पूरी घटना से अवगत कराते हुए उन्हें हेमा की लाश के टुकड़े सौंप दिए. रोतेबिलखते हुए उन्होंने अपने केरल समाज के अनुसार हेमा की अंत्येष्टि टाटानगर में ही कर दी.

हेमा को रिश्तों में बेवफाई की कीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी थी. सच ही कहते हैं स्त्रियां ही स्त्रियों की दुश्मन होती है. शांति एवं उस के बच्चों का अधिकार छीनने की कीमत हेमा को अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी थी. जहां मर्द की अय्याशी ढकीछिपी रह जाती है वहीं स्त्री की कोख उस के गुनाह से सारे परदे उठा देती है.

यही सब से बड़ा अंतर है स्त्रीपुरुष के दुष्कर्म करने में. पुलिस कस्टडी में प्रभाकरण को केरल ले जाया गया, वहां उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई. डा. करकेट्टा को डा. पुरुकायस्थ और हौस्पिटल मैनेजमैंट ने किसी तरह पैरवी कर के बचा लिया था. Jharkhand Crime

 

Camel Festival: ऊंटों का रोमांचक महोत्सव

Camel Festival: खेतीबाड़ी और ऐसे ही और कामों के लिए आई आधुनिक मशीनों ने भले ही ऊंटों के महत्त्व को कम कर दिया हो, पर राजस्थान में ऊंट आज भी महत्त्वपूर्ण है. उस की महत्ता को बनाए रखने के लिए ही यहां हर साल कई ऊंट प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं.

गुलाबी नगरी जयपुर और मरुभूमि बीकानेर का अपना अलगअलग महत्त्व है. ऐतिहासिक नजरिए से दोनों नगर गरिमामय हैं, जयपुर की अपनी अलग खूबसूरती है और रेत के धोरों से घिरे बीकानेर की अलग. बीकानेर मेरे लिए कोई नया नहीं था, पहले भी गया था मैं वहां. लेकिन इस बार ऊंट महोत्सव देखने का रोमांच कुछ अलग ही था. इस रोमांच के लिए ठंडी के मौसम में 335 किलोमीटर का थका देने वाला उबाऊ सफर भी मुझे रोकने में असमर्थ रहा. आखिर मैं ठंड या थकान की चिंता किए बिना बीकानेर पहुंच ही गया. बीकानेर का अपना गौरवशाली इतिहास है.

किसी जमाने में यहां राजेरजवाड़ों की तूती बोलती थी. लेकिन अब उन की यादें और उन के द्वारा स्थापित महलोंचौबारों के अवशेष ही नजर आते हैं, जिन्हें यह नगर किसी धरोहर की तरह अपने आंचल में समेटे है. इस से हट कर बात करें तो आज बीकानेरी भुजिया और रसगुल्ले दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. खैर, मेरा मकसद केवल 2 दिनों का ऊंट महोत्सव देखना था, जिसे देखने के लिए दुनिया भर के सैलानी आते हैं. ऊंट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है. देश में ऊंटों की संख्या भले ही घट रही हो, पर राजस्थान खासकर राजस्थान का वह भूभाग जहां रेत ही रेत है, ऊंट के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल लगता है. इसीलिए राजस्थान सरकार ने ऊंट को स्टेट एनिमल घोषित किया है.

आमतौर पर देखें तो ऊंट सवारी करने, खेती में काम आने वाला प्राणी अथवा सामान ढोने वाला जानवर है, लेकिन बीकानेर के पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन ने अन्य सालों की तरह इस बार 9 और 10 जनवरी को ऊंट महोत्सव का आयोजन इसलिए किया, ताकि लोग यह देख सकें कि ऊंट के कितने रंग हैं, उस में कितनी कलाएं हैं. यही सब देखने के लिए मैं बीकानेर गया था. ऊंट महोत्सव के पहले दिन यानी 9 जनवरी को जूनागढ़ किले से सादुल क्लब तक सजेधजे ऊंटों की शोभायात्रा निकाली गई. यह कोई सामान्य यात्रा नहीं थी. सजेधजे ऊंटों पर रोबीली मूंछों और रंगबिरंगी पगड़ी वाले लोेग राजस्थानी योद्धाओं की तरह नंगी तलवार लिए बैठे थे तो उन के आगे नाचतेगाते चल रहे कलाकारों और उन से भी आगे सिर पर कलश ले कर चल रही बालिकाओं ने अलग ही रंग जमा रखा था.

यह शोभायात्रा जूनागढ़ से शुरू हो कर कचहरी रोड, अभिलेखागार, वीर दुर्गादास सर्किल होते हुए सादुल क्लब पहुंची. सादुल क्लब के मैदान में आयोजित महोत्सव में ढोल की थाप पर ऊंटों ने नृत्य करने जैसे हैरतंगेज करतब दिखाए, जिन्हें देख कर देशीविदेशी पर्यटक ही नहीं, स्थानीय लोग भी अचरज में पड़ गए. ग्रामीण और राजस्थानी संस्कृति से ओतप्रोत इस आयोजन ने सैलानियों का मन मोह लिया.

राजस्थान की अलगअलग जगहों से अपनेअपने ऊंटों के साथ आए लोगों ने अपने ऊंटों के करतब दिखाए. झुंझनू जिले के सावंतसरी गांव के रहने वाले धरमा उर्फ धर्मेंद्र अपने जिगरी दोस्त हंसराज के साथ मैदान में उतरे. हंसराज उन के 16 वर्षीय ऊंट का नाम है, जो पिछले 8 सालों से उन के साथ है. इन दोनों के प्यार को देखते हुए लोगों ने इन्हें धरमेला (धर्मभाई) नाम दे दिया है, हंसराज कभी दोनों पैरों को उठा कर लोगों से सैल्यूट करता तो कभी ठुमके लगा कर नाचता. हंसराज ने चारपाई पर चढ़ कर करतब दिखाए तो दर्शक हैरान रह गए.

हंसराज कभी अपने मालिक धरमा की छाती पर पैर टिकाता और हलके से छू कर पैर उठा लेता तो कभी आगे के पैर उन के सिर पर रख कर आशीर्वाद देता. ऊंट महोत्सव देखने आए लोगों की सांसें तब थम गईं, जब हंसराज ने अचानक धरमा की गरदन अपने जबड़ों में फंसा ली. एक तरफ धरमा की पूरी गरदन ऊंट के जबड़ों में और दूसरी ओर साफा बांधे धरमा का सिर और कनपटी से गाल तक नसें खिंचा हुआ तमतमाया चेहरा. ऊंट के दांतों का हल्का सा दबाव भी बढ़ जाता तो धरमा की जिंदगी का काम तमाम होना तय था.

एकबारगी सब कुछ ठहर सा गया. लोग खड़े हो गए. लगा, अनहोनी न हो जाए. अचानक ढोल बजा और हंसराज अपने मालिक की गरदन छोड़ कर ठुमकने लगा. धरमा ने ठहाका लगाया तो हंसराज ने भी थुथला कर अपने मुंह से झाग छोड़े मानो वह भी मालिक से ऐसी अठखेली कर खिलखिला रहा हो. इंसान व जानवर के अद्भुत रिश्ते की कई कहानियां ऊंट महोत्सव में जीवंत होती नजर आईं. ये कहानियां ऊंटों को सजानेसंवारने और बाल कतरने में दिखाई कलात्मकता से भी झलक रही थीं. अपने मनमोहक नृत्य के साथ झुक कर अभिवादन करते हुए ऊंट मानो अपने व्यवहार से इंसान को रिश्तों की अहमियत और अपनत्व का पाठ पढ़ा रहे थे.

इस से पहले सादुल क्लब मैदान में ढोल की थाप और शंख ध्वनि के बीच जिला कलेक्टर पूनम, जनरल औफिसर कमांडिंग मेजर के.के. शर्मा, स्टेट बैंक औफ बीकानेर ऐंड जयपुर के मुख्य महाप्रबंधक वेंकटरमन एस. आदि ने सफेद कबूतर और रंगबिरंगे गुब्बारे छोड़ कर ऊंट महोत्सव का शुभारंभ किया. जिला कलेक्टर पूनम ने ऐतिहासिक किले जूनागढ़ से शोभायात्रा को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया. इस शोभायात्रा में राजस्थान के पारंपरिक वाद्ययंत्रों, कालबेलिया, गैर और गरबा जैसे लोकनृत्यों ने बहुरंगी संस्कृति को साकार कर देशीविदेशी पर्यटकों का मन मोह लिया.

ऊंट महोत्सव में पहली बार निकली मोटरसाइकिल रैली बीकानेर अरबन लूप-2016 भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र रही. राजस्थान रौयल्स मोटर साइकिलिंग क्लब व पर्यटन विभाग के साझा तत्वावधान में शोभायात्रा से पहले जूनागढ़ से निकले ये बाइकर्स बीकानेर शहर के विभिन्न इलाकों से होते हुए सादुल क्लब मैदान पहुंचे. रैली में हार्ले डेविडसन के विभिन्न मौडल के साथ 37 बाइकर्स ने भागीदारी की. इन में जयपुर से बेनली बाइक पर आए इंजीनियर मुदित अस्थाना, हार्ले 48 पर आए प्रतीक और उन की पत्नी डा. कृति भी शामिल थीं.

पहले दिन ऊंट नृत्य, साजसज्जा सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया. राजस्थान में ऊंटों को सजाने की पुरानी परंपरा है. माना जाता है कि जिस की ऊंटनी जितनी सजीधजी हसीना जैसी होगी, उस का मालिक उतना ही धनवान होगा. बीकानेर के ऊंट महोत्सव, पुष्कर मेला, बाड़मेर व जैसलमेर में होने वाले ऊंटों के उत्सव में ऊंट ऊंटनियों को सजानेसंवारने और उन के डांस की काफी डिमांड रहती है. राजस्थान में कई जगह ऊंटों को सजानेसंवारने वाले हैं, वे अपनी दुकान को ऊंटनी का ब्यूटीपार्लर कहते हैं.

इन पार्लरों में ऊंट और ऊंटनियों का शृंगार किया जाता है. सब से पहले ऊंट के गले का शृंगार होता है, इस में गोरबंद का इस्तेमाल किया जाता है. गले में ही चांदी और जरी की कसीदाकारी पट्टियां भी लगाई जाती हैं. पैरों में नेवरी बांधी जाती है. घुंघरू पहनाए जाते हैं. ऊंट की पीठ पर भी शृंगार किया जाता है. पहले काठी पहनाई जाती है. इस में 2 लोगों के बैठने की जगह होती है. इस के नीचे गद्दियां और ऊपर छेवटी रखी जाती है. काठी के सब से ऊपर गादी रखी जाती है, जो बैठने वालों के लिए आरामदेह होती है. ऊंट को गले के दोनों ओर पांवों तक लुंबाझुंबा पहनाया जाता है. यह रंगबिरंगा होता है. इस के बाद मुंह, कान व नाक को ढकते हुए चांदी का कसीदा किया हुआ मोहरा पहनाया जाता है.

इस मौके पर हुई प्रतियोगिता में मिस्टर बीकाणा का खिताब भंवरलाल ओझा के नाम रहा, जबकि रविंद्र जोशी दूसरे और नवीन बिस्सा तीसरे स्थान पर रहे. मिस मरवण का खिताब हेमा कंवर राठौड़ और निशा सांखला के नाम रहा. सुमन चौधरी दूसरे और शिखा राजपुरोहित तीसरे स्थान पर रहीं. मिस मरवण के लिए पहुंची युवतियों ने कैटवाक भी किया. फर कटिंग में ऊंटपालकों ने ऊंटों के शरीर पर विभिन्न आकृतियां उकेरीं. कैमल फर कटिंग प्रतियोगिता में रामलाल (अक्कासर) प्रथम, जापान की मैगोमी टाकेड़ची द्वितीय और स्वरूपदेवर के गोविंदराम तीसरे स्थान पर रहे. ऊंट साजसज्जा प्रतियोगिता में ऊंटों का दुलहन की तरह साजशृंगार किया गया.

ऊंट शृंगार प्रतियोगिता में स्वरूपदेसर के लक्ष्मणराम सियाग प्रथम, इमरान खां द्वितीय और अख्तर अली तीसरे स्थान पर रहे. महोत्सव के तहत विदेशियों और स्थानीय महिलाओं और पुरुषों की खोखो प्रतियोगिता, मटका दौड़ और रस्साकसी प्रतियोगिताएं भी हुईं. ग्रामीणों ने कुश्ती में भी अपने दांवपेच दिखाए. विदेशी पर्यटकों के लिए साफा बांधने की प्रतियोगिता भी हुई. कबड्डी का मैच भी खेला गया. रौबीले मूंछों का प्रदर्शन भी किया गया. शाम को सजी नाचगाने की महफिल में लोक कलाकारों ने समां बांध दिया. ऊंट महोत्सव का दूसरा दिन भी यादगार रहा. सादुल क्लब मैदान में दिन भर कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताएं होती रहीं. देशीविदेशी सैलानियों की जोरआजमाइश देख कर पूरा मैदान जोर लगा कर हइशा… के उद्घोष से गूंज उठा. पुरुषों व महिलाओं की खोखो प्रतियोगिता से दूसरे दिन की शुरुआत हुई.

कुश्ती में पहलवानों ने दांव दिखाए. रस्साकसी, कबड्डी, साफा बांधने की प्रतियोगिता, ऊंट नृत्य, महिलाओं की मटका दौड़, म्यूजिकल चेयर आदि की प्रतियोगिताएं भी हुईं. साफा बांधने की प्रतियोगिता में स्पेन की लुइस रुबियो ने प्रथम स्थान हासिल किया, जबकि आस्ट्रेलिया की सैंडी बोले दूसरे व स्पेन की सुमाना तीसरे स्थान पर रहीं. महिला रस्साकसी प्रतियोगिता में विदेशी महिलाओं ने बाजी मारी.

विदेशी महिला टीम में कनाडा की मोनिका, फ्रांस की जोइले, रशिया की ओल्गा, आस्ट्रेलिया की डा बोलेश और अमेरिका की डी हर्ले शामिल थीं. पुरुष रस्साकसी में स्थानीय लोगों ने जीत दर्ज की. टीम में सहीराम, प्रदीप कुमार, मेहरचंद, रामप्रताप सिंह, प्रेमनाथ, जुगल किशोर व रामप्रताप शामिल थे. ऊंट नृत्य में झुंझनूं जिले के सांवतसरी गांव के धरमा प्रथम रहे. जबकि झुंझनूं के ही नेकीराम व रामअवतार दूसरे तथा तीसरे स्थान पर रहे. समापन पर धधकते अंगारों पर जसनाथी संप्रदाय की ओर से प्रस्तुत अग्नि नृत्य ने लोगों को रोमांचित कर दिया. सतगुरु सिंवरो मोवणा, जिन गुरु संवार उपाया…पारंपरिक जसनाथजी की स्तुति के साथ जसनाथ संप्रदाय के लोगों ने धधकते अंगारों पर नृत्य किया तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा.

जसनाथजी महाराज की स्तुति व वंदना के अग्नि नृत्य को मालासर के महंत रूपनाथ सिद्ध एंड पार्टी ने पेश किया. इस में 4 क्विंटल खेजड़ी की लकड़ी के अंगारों पर जगदीशनाथ, पुरखनाथ, मेघनाथ, तपसीनाथ, किशननाथ, ऊदनाथ व गौरीशंकर ने नृत्य किया. इन्होंने अंगारों को मुंह में रखा और नंगे पैरों से फूलों की तरह उठाया. नगाड़े की थाप के साथ इन नर्तकों की गति भी बढ़ती गई. नगाड़ा वादन मानाराम कर रहे थे. सैलानियों की दिन भर की थकावट शाम को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों से दूर हुई. इस में देश के विभिन्न इलाकों से आए लोक कलाकारों ने एक से बढ़ कर एक शानदार प्रस्तुतियां दीं.

सांस्कृतिक कार्यक्रम में बीकानेर की तरुणा शेखावत एंड पार्टी ने राजस्थानी लोकनृत्य, हरियाणा के कलाकारों ने हरियाणवी होली व बम लहरी लोकनृत्य, गुजरात के कलाकारों ने गरबा रास, चुरू की मनीषा शांडिल्य ने लोकगीत व उत्तराखंड के कलाकारों ने गढ़वाली लोकनृत्य प्रस्तुत किए. 2 दिनों के इस अंतरराष्ट्रीय महोत्सव से ऊंटों को बचाने का संदेश भी दिया गया. रेगिस्तानी जहाज ऊंट राजस्थान की शान रहा है. अब भले ही ऊंटों की तादाद दिन पर दिन घट रही है, लेकिन ऊंट आज भी गांवों में रोजीरोटी का जरिया है. राजस्थान में सन 1997 की पशुगणना में 6 लाख 68 हजार ऊंट थे, जो सन 2003 में घट कर 4 लाख 98 हजार रह गए. सन 2008 में इन की तादाद और भी घट कर 4 लाख 30 हजार 426 रह गई. सन 2012 में राज्य में केवल 3 लाख 25 हजार 713 ऊंट थे. Camel Festival

 

Uttar Pradesh Crime: अंधविश्वास का नतिजा

Uttar Pradesh Crime: तंत्रमंत्र की क्रियाओं या अंधविश्वास से किसी का भला नहीं होता, फिर भी अंधविश्वासी लोग ऐसे चक्करों में पड़ जाते हैं. अगर वक्त रहते जफर ने तंत्रमंत्र की राह छोड़ कर अपनी घरगृहस्थी पर ध्यान दिया होता तो वह न होता जो हुआ…

जफर हुसैन उर्फ चांद बाबू के सिर पर धर्म का उन्माद सवार रहता था. वह तरहतरह की तंत्र क्रियाएं करता रहता है, यह पूरा गांव जानता था. इसी वजह से कोई उसे तांत्रिक कहता था तो कोई पागल तो कोई कुछ और. गांव के लोगों से उस के ताल्लुकात अच्छे नहीं थे. इस की वजह यह थी कि वह छोटीछोटी बातों पर गुस्सा हो जाता था. वादविवाद की स्थिति में लोगों को तांत्रिक क्रियाओं की धमकी देना उस की आदत में शुमार था. लिबास भी वह ढोंगियों और पाखंडियों जैसा पहनता था. उस की इन अजीबओगरीब हरकतों से गांव वाले भी अंधविश्वास का शिकार हो गए कि उसे नाराज करने से उन का कोई अनिष्ट हो सकता है. यही वजह थी कि लोग उस से मेलजोल बढ़ाने से कतराते थे.

जफर उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के भोजीपुरा थाना के गांव मैमोर में रहता था. उस के परिवार में पत्नी नईम बानो के अलावा 4 बच्चे, 7 साल का फरहान, 5 साल की फरहीन, 4 साल का फयाज और 1 साल का फमान. जफर का वास्ता चूंकि लोगों से कम था, इसलिए दूसरे लोग भी उस पर कम ही ध्यान देते थे. लेकिन एक दोपहर जफर के घर से आने वाली चीखनेचिल्लाने की आवाजों ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया.

उस के दरवाजे पर पहुंचे लोगों ने अंदर का नजारा देखा तो ठिठक गए. उन्होंने बाहर खड़े हो कर देखा, जफर अपनी बेटी फरहीन को बुरी तरह पीट रहा था. डरीसहमी मासूम बच्ची उस के चंगुल के छूटने के लिए छटपटा रही थी. नईम बानो बेटी को बचाने के लिए उस के साथ धक्कामुक्की कर रही थी.

‘‘इस ने मेरी सारी तांत्रिक क्रिया खराब कर दी. मेरा अच्छा वक्त आने वाला था, लेकिन इस ने उसे खत्म कर दिया. यह मेरी बेटी नहीं, बल्कि इस के अंदर किसी शैतानी आत्मा का साया है.’’ जफर फरहीन को प्रताडि़त करते हुए बड़बड़ा रहा था.

‘‘क्या बकवास कर रहे हो तुम?’’ नईम बानो चिल्लाई तो वह उसे समझाने वाले अंदाज में बोला, ‘‘यह हकीकत है बानो, इस ने शैतानी हरकत की है. मैं इसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’ कहते हुए वह बेटी को बेरहमी से पीटने लगा. नईम बानो तेजतेज चिल्लाने लगी. नईम ही नहीं, फरहीन भी चिल्ला रही थी, ‘‘अब्बू, मुझे छोड़ दो, मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘कैसे छोड़ दूं. तू फरहीन नहीं, बल्कि ऐसा शैतान है, जो मेरी जिंदगी को तबाह कर देना चाहता है. मेरी तांत्रिक क्रिया को फेल करना चाहता है. अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूं. चूल्हे के पास ही तेरी कब्र बना दूंगा.’’

जफर गुस्से में बड़बड़ा रहा था. उस के सिर पर जैसे खून सवार था. डर की वजह से जफर के बाकी बच्चे बरामदे में पड़े तख्त के नीचे छिप गए थे. बाप की ही तरह वे भी हरे व काले रंग का खास लिबास पहने हुए थे और उन के सिर पर वैसे ही रंग का कपड़ा बंधा था.

यह नजारा देख रहे लोग चिल्लाए, ‘‘जफर, पागल हो गया है तू. मार ही डालेगा क्या बच्ची को?’’

जफर ने उन की तरफ घूर कर देखते हुए कहा, ‘‘खबरदार, मेरे बीच कोई मत आना वरना भस्म कर दूंगा.’’

इस के साथ ही उस ने मासूम फरहीन का सिर जमीन पर पटकना शुरू कर दिया. उस का दिल जरा भी नहीं पसीजा. नईम बानो हैवान बने शौहर से फरहीन को बचाने आई तो उस ने उसे धक्का दे कर दूर कर दिया. फरहीन के सिर से खून बह निकला. कुछ देर के लिए उस का शरीर छटपटाया और फिर शांत हो गया. यह देख कर नईम बानो बदहवास हो गई. बाहर खड़ा कोई शख्स अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा सका. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर पड़ोस में रहने वाले जफर के चाचा वली हुसैन भी वहां आ पहुंचे.

उस जगह का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह घर के अंदर दाखिल हो कर जफर के नजदीक पहुंचे तो उस ने उन पर चाकू से हमला कर दिया. वली हुसैन वापस दरवाजे पर आ गए. लोग तमाशबीन बने देखते रहे. जबकि जफर पालथी मार कर फरहीन के पास बैठ गया. डरीसहमी पत्नी व दोनों बच्चे भी उस के पास बैठ गए. जफर मन ही मन कुछ बुदबुदाने लगा.

दिल दहला देने वाले इस हैरतअंगेज नजारे ने गांव वालों के रोंगटे खड़े कर दिए. इस बीच घटना की खबर पा कर स्थानीय मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच गए. लेकिन कोई भी घर के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं जुटा सका. गांव के चौकीदार मुकेश ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी अनिल सिरोही, एसआई अखिलेश सिंह और कुछ अन्य पुलिसकर्मी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने जफर को हिरासत में ले लिया. वह पुलिस की पकड़ से छूटने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘मुझे क्यों पकड़ रहे हो? मैं ने तो शैतान का कत्ल किया है. मेरी बेटी तो अभी कुछ देर में जिंदा हो जाएगी. मैं उसे जिंदा कर दूंगा.’’

मामला संगीन था. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी धर्मवीर को भी दे दी थी. बाद में पुलिस अधीक्षक (देहात) ब्रजेश श्रीवास्तव भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस ने मौका मुआयना किया और पंचनामा भर कर बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. आरोपी के घर का माहौल बिलकुल अजीब था. वहां तंत्र क्रियाओं का कई तरह का सामान मौजूद था. पुलिस ने संदिग्ध चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. फिर उस की पत्नी, बच्चों और गांव वालों से पूछताछ की.

यह घटना किसी को भी झकझोर सकती थी. पुलिस आरोपी को थाने ले आई और उस से विस्तृत पूछताछ की. जफर से हुई पूछताछ व ग्रामीणों के बयानों के बाद अंधविश्वास के साए में जी रहे एक ऐसे शख्स की कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने अंधविश्वास में डूब कर अपने परिवार को तो तबाह कर ही दिया था, साथ ही अपना भविष्य भी बरबाद कर लिया था.

जफर उन नौजवानों में से था, जो बिना मेहनत किए बड़ेबड़े ख्वाब देखते हैं. सालों पहले जफर का विवाह नईम बानो के साथ हुआ तो वह परिवार से अलग हो गया. वक्त के साथ वह 3 बच्चों का पिता बन गया. जफर के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. बस किसी तरह छोटेमोटे काम कर के वह परिवार की गाड़ी खींच रहा था. काम के बाद उस का बाकी का वक्त यारदोस्तों में बीतता था. गनीमत यह थी कि वह किसी बुरी आदत का शिकार नहीं था. जफर जब भी दोस्तों के बीच बैठता था, बड़ीबड़ी खयाली बातें किया करता था.

गांवदेहात के इलाकों में अंधविश्वास के अनेक रोचक किस्से होते हैं. समाज का मनोविज्ञान है कि लोग अंधविश्वास के किस्सों को रहस्य के साथ बड़ी रुचि से सुनाते हैं. इन किस्सों पर लोगों के बीच चर्चा होती है. अंधविश्वास के नकारात्मक पहलुओं पर इतनी चर्चा नहीं होती, जितनी कि इत्तेफाकिया सही हो जाने वाले मामलों की होती है. इसे लोग चमत्कार भी समझते हैं. फलस्वरूप अंधविश्वास की कहानियां बचपन से ही दिमाग में बैठनी शुरू हो जाती हैं. जफर भी अंधविश्वास का शिकार था. दोस्तों के बीच वह ऐसे किस्सों को दिल लगा कर सुनता और दिनचर्या की बातों और जीवन में आने वाली बाधाओं को अंधविश्वास से जोड़ कर देखता है.

जफर किसी भी परेशानी का शिकार होता तो वह सीधा किसी बाबा या तांत्रिक के पास जा पहुंचता. तांत्रिक उस के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उस से रुपए ऐंठ कर कभी ताबीज पकड़ा देते तो कभी भभूत. बच्चों को कोई बीमारी होती तो भी वह चिकित्सकों से ज्यादा बाबाओं पर भरोसा करता था. उसे यह समझाने वाला कोई नहीं था कि अंधविश्वास के आईने में वह यथार्थ को न भुलाए. दरअसल सुझाव का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान होता है. यह व्यक्ति के उद्देश्य, मत, विचार एवं जीवन में भी परिवर्तन लाता है. बशर्ते सुझाव सही और उसे मानने वाला अच्छेबुरे का फर्क करना जानता हो.

जफर ने आजीविका चलाने के लिए एक बैंडबाजा मंडली में काम करना शुरू कर दिया था. इस से जो कमाई होती थी, उसी से उस का घर चलता था. इस काम में उसे आमदनी कम थी, लिहाजा वह किसी चमत्कार की उम्मीद किया करता था. तांत्रिकों के संपर्क में आने के बाद वह खुद भी अजीब ढंग से जिंदगी जीने लगा था. इस के बावजूद उस के हालत जस के तस थे. वह चाहता था कि उस के हालात अच्छे हों और जिंदगी आसान सी हो जाए.

इंसान का व्यवहार तब बदल जाता है? जब उस की उम्मीदें पूरी नहीं होतीं. जफर जिन उम्मीदों को पाले हुए था, वे मेहनत के बलबूते ही पूरी हो सकती थीं. जबकि वह अंधविश्वास में पड़ कर चमत्कार की चाहत पाले बैठा था. बैंडबाजे के काम से गुजर मुश्किल हो गई, तो जफर ने एक चिटफंड कंपनी में बतौर एजेंट काम करना शुरू कर दिया. इस से उस की पारिवारिक स्थिति थोड़ी सुधरी. उस ने अपनी जानपहचान वाले लोगों का रुपया तो कंपनी में लगवाया ही, अपनी कमाई भी उस में निवेश कर दी. यह कंपनी अपनी आकर्षक स्कीमों के जरिए तय वक्त पर लोगों को उन के निवेश का बड़ा फायदा देने का वादा करती थी. बाजारों में ऐसी चिटफंड कंपनियों की भरमार है, जो लोगों को बड़ेबड़े सपने दिखा कर रुपया बंटोरती हैं.

अधिकांशत: इन का शिकार वे लालची लोग होते हैं, जो कम वक्त में रईस बनने के सपने देखते हैं. उन्हें लगता है कि बैठेबिठाए ही उन की रकम बढ़ जाएगी, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं नहीं है. ऐसी कंपनियां मोटी रकम एकत्र होते ही चंपत हो जाती हैं. जफर जिस कंपनी में काम करता था, उस ने भी एक दिन ऐसा ही किया. कंपनी के लापता होते ही जफर दोराहे पर आ खड़ा हुआ. लोगों ने भी उस से रुपए मांगने शुरू कर दिए. इस से वह परेशान रहने लगा. परेशानी के इसी दौर में अंधविश्वास के शिकार जफर ने फिर पाखंडी तांत्रिकों का सहारा लेने की सोची.

वह तांत्रिकों से मिला तो उन लोगों ने उसे कुछ टोनेटोटके समझा दिए. साथ ही बताया कि वह सब्र से काम ले, बहुत जल्द उस की जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी. जफर के लिए यह सब किसी सुखद सपने जैसा था. इस के बाद वह लोगों से कहने लगा कि अब बहुत जल्द उस का वक्त बदलने वाला है. बेरोजगार होने के बाद जफर के पास कोई काम नहीं बचा था. वह नौजवान था. वह चाहता तो कोई भी काम कर के अपने पारिवारिक हालात को संवार सकता था, लेकिन अंधविश्वास ने उसे बुरी तरह जकड़ रखा था. निठल्ला होने की वजह से वक्त उस के लिए महायातना बन गया. कमाई धेले की नहीं थी, नतीजतन बच्चों के भूखे मरने की नौबत आ गई.

नईम बानो ने अपने पिता को खबर की. उस का मायका पीलीभीत, जहानाबाद क्षेत्र के गांव चका में था. खबर मिलते ही उस के पिता मोहम्मद अनवार मैमोर आ गए. उन्होंने रुपए दे कर मदद तो की ही, साथ ही वह जफर को समझाया भी, ‘‘बेटा, मेरी बात को गलत मत समझना. मेरी सलाह है कि कोई कामधंधा ढूंढ लो.’’

‘‘मैं बहुत जल्द सब ठीक कर दूंगा.’’ जफर ने खयाली अंदाज में आत्मविश्वास से जवाब दिया. मोहम्मद अनवार ने उस से कहा, ‘‘अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो मैं बानो और बच्चों को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाता हूं. जब हालात सुधर जाएं तो तुम इन्हें ले आना.’’

इस बात पर जफर भड़क गया, ‘‘नहीं, यह मुझे हरगिज मंजूर नहीं है.’’

अनवार ने अपनी बात पर अडिग रहने की कोशिश की तो जफर ने चेतावनी दी कि अगर वह बच्चों को ले गए तो वह मौत को गले लगा लेगा. दामाद का इस तरह का व्यवहार देख कर अनवार बुझे मन से वापस चले गए. जफर अंधविश्वास में पूरी तरह डूब चुका था. वह तंत्र क्रियाओं में लीन रहता था. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया था. कोई उस पर किसी तरह की टिप्पणी कर देता तो वह बुरी तरह भड़क जाता. इस के अलावा वह लोगों से छोटीछोटी बातों पर झगड़ने लगता था.

उस की इस तरह की आदत से एक तरफ जहां लोग उस से कतराने लगे थे, वहीं उस ने भी सब से दूरियां बना ली थीं. लोग तब उस से और भी डरने लगे, जब उस ने अपने चचेरे भाई मोहम्मद हुसैन से झगड़ा होने पर एक रात उस की मोटरसाइकिल को आग लगा दी और प्रचारित किया कि उस ने तंत्रमंत्र के बल पर ऐसा किया है. नईम बानो अनपढ़ महिला थी. जफर ने उसे व बच्चों को भी अपने रंग में रंग लिया था. इसी तरह वक्त बीतता गया. टोनेटोटकों से न हालात सुधरने थे और न सुधरे. जफर अजीब सी गफलत में रहने लगा. उसे लगने लगा कि उस के परिवार पर कोई शैतानी साया है, जो उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. आर्थिक हालात दिनबदिन बिगड़ते जा रहे थे. जफर के घर के आर्थिक हालात मोहल्ले वालों से भी छिपे नहीं थे. वे मदद करने का प्रयास करते तो जफर उन्हें गालियां दे कर भगा देता.

स्थिति बिगड़ती गई तो उस ने एक तांत्रिक क्रिया करने का फैसला किया. इस के लिए उस ने सब से पहले पूरे परिवार के लिए काले व हरे रंग के कपड़े सिलवाए. इन कपड़ों को सभी को पहना कर वह घर में तरहतरह की क्रियाएं करता. बच्चों के सिर पर वह टोपीनुमा एक कपड़ा बंधवा देता. उस ने एक दिन पत्नी व बच्चों को समझाते हुए कहा, ‘‘किसी के भी सिर से एक सप्ताह तक यह कपड़ा नहीं उतरना चाहिए, वरना बहुत बुरा हो जाएगा. यह कपड़ा बंधा रहा तो जल्द ही मेरा वक्त सुधर जाएगा.’’

घर में पत्नी और बच्चे उस के हुक्म के गुलाम थे. सब ने ऐसा ही किया. वह बच्चों के साथ घर में घंटो बैठ कर अजीबअजीब क्रियाएं करता रहता. बच्चों व पत्नी के घर से निकलने पर भी उस ने पाबंदी लगा दी थी. 2 अक्तूबर, 2015 की दोपहर का वक्त था. जफर अपनी तंत्र क्रिया में लीन था. इसी बीच नईम बानो खाना बनाने लगी. फरहीन घर में खेलते हुए मां के पास रोटी लेने चली गई. जैसे ही वह रोटी लेने के लिए झुकी, उस के सिर से दुपट्टेनुमा बंधा कपड़ा हट गया. जफर की नजर उस पर गई तो वह आगबबूला हो उठा,‘‘यह क्या किया तू ने, सिर से दुपट्टा कैसे हट गया?’’

‘‘गलती हो गई अब्बू.’’ फरहीन ने डर कर जवाब दिया. यह सुन कर जफर गुस्से में बोला, ‘‘तू जरूर वही शैतानी साया है, जो मुझे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. अच्छा हुआ तू पकड़ में आ गया. आज मैं तुझे सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’

इस के साथ ही जफर ने मासूम फरहीन को पीटना शुरू कर दिया. उस का भयानक रूप देख कर फरहीन के भाई पिटाई के डर से तख्त के नीचे छिप गए. नईम बानो ने बेटी को बचाने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन जफर ने आखिर उसे बेरहमी से मार ही डाला. पूछताछ में पता चला कि जफर की इस कहानी से पुलिस भी हैरान थी. आर्थिक परेशानियों और अंधविश्वास की वजह से जफर की हालत पागलों जैसी हो गई थी. पुलिस ने उस के खिलाफ गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया. अगले दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

जफर ने मेहनत कर के जिंदगी को संवारा होता और अंधविश्वास में न पड़ा होता तो ऐसी नौबत कभी न आती. कथा लिखे जाने तक जफर की जमानत नहीं हो सकी थी. उस की पत्नी व बच्चे नातेरिश्तेदारों की रहमोकरम पर पल रहे थे. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Kahani: गुनाह जो माफी लायक नहीं

Crime Kahani: कोकीन की लत लग जाने से रोनाल्ड के ऊपर काफी कर्ज हो गया था. इस कर्ज को उतारने और अपनी लत को पूरा करने के लिए उस ने प्रेमिका के साथ जो घिनौना अपराध किया, वह सचमुच माफी के लायक नहीं है.

रात के साढ़े 11 बजे बौब फ्लारडे घर लौटा तो दरवाजे पर उस ने पत्नी को इंतजार करते पाया. उसदिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, इसलिए उसे हैरानी हुई. वह कुछ कहता, उस से पहले ही पत्नी ने पूछा, ‘‘तान्या कहां है?’’

‘‘तान्या?’’ फ्लारडे ने जवाब देने के बजाय चौंक कर सवाल किया, ‘‘क्या तान्या अभी तक घर नहीं आई है?’’

‘‘नहीं, मुझे तो लग रहा था कि तुम उसे साथ ले कर आओगे?’’ मिसेज फ्लारडे ने कहा.

‘‘हां, इरादा तो यही था. उसे क्लब के बाहर छोड़ते हुए मैं ने कहा भी था कि पार्टी खत्म होने पर मैं उसे लेने आ जाऊंगा, पर उस ने मना कर दिया था. उस ने कहा था कि वह अपनी किसी सहेली के साथ घर आ जाएगी.’’

‘‘उस का क्या, तुम्हें सोचना चाहिए था. जवान बेटी का इतनी रात गए घर से बाहर रहना क्या ठीक है?’’ मिसेज फ्लारडे ने चिंता व्यक्त की.

‘‘हमारी बेटी समझदार है, किसी सहेली के यहां चली गई होगी. चलो, उस के मोबाइल पर फोन कर के पूछते हैं कि वह कहां है?’’

बौब फ्लारडे ने ड्राइंगरूम में जा कर वहां रखे लैंडलाइन फोन से तान्या के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन उस के मोबाइल का स्विच औफ था, इसलिए बात नहीं हो सकी. उन्होंने कई बार फोन किया, हर बार जवाब यही मिला कि फोन का स्विच औफ है. बौब फ्लारडे परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी रात को वह बेटी को ढूंढ़ने कहां जाएं. जवान बेटी थी, कहीं कोई हादसा न पेश आ गया हो?

यह सोच कर उन का कलेजा कांप उठा. उन्होंने तुरंत जूलियन बिस्त्रे क्लब को फोन किया. पार्टी वहीं थी. काफी देर तक घंटी बजने के बाद फोन उठा तो फ्लारडे ने बेचैनी से पूछा, ‘‘हैलो, बिस्त्रे क्लब?’’

‘‘जी, कहिए?’’ दूसरी तरफ से किसी ने कहा.

‘‘तुम्हारे यहां शाम को स्कूली बच्चों की एक पार्टी थी, क्या वह खत्म हो गई?’’

‘‘पार्टी तो कब की खत्म हो गई, सब बच्चे चले भी गए हैं.’’

‘‘क्या कोई लड़की अभी…?’’ फ्लारडे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए कि दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘अब यहां कोई नहीं है, सिवाय मेरे.’’

‘‘तुम वहां क्या कर रहे हो?’’ फ्लारडे ने पूछा.

‘‘मैं यहां का चौकीदार हूं,’’ उस व्यक्ति ने तल्खी से कहा, ‘‘शायद अब यह बताने की जरूरत नहीं होगी कि मैं यहां क्या कर रहा हूं?’’

‘‘तुम मेरी बात का बुरा मन गए,’’ फ्लारडे ने विनम्रता से कहा, ‘‘माफ करना, मैं अपनी बेटी को ले कर परेशान हूं. उस का नाम तान्या है, क्या उसे किसी के साथ देखा है?’’

‘‘सौरी, पार्टी के बाद कौन किस के साथ गया, इस की जानकारी मुझे नहीं है. मेरी ड्यूटी तो क्लब बंद होने के बाद शुरू होती है.’’ चौकीदार ने कहा और फोन काट दिया.

इस के बाद फ्लारडे को ऐनी की याद आई. वह तान्या के साथ ही पढ़ती थी. पार्टी में वह भी गई थी. वह फ्लारडे के खास दोस्त और उन के रेस्तरां के खानसामा के पार्टनर थौमस को बेटी थी. उन्होंने थौमस को फोन किया. पता चला कि वह तो सवा 11 बजे ही घर आ गई थी. उस समय वह सो रही थी. वहां से भी मायूसी ही हाथ लगी. अब एक और व्यक्ति बचा था, जो तान्या के बारे में जानकारी दे सकता था. वह था स्कूल का वार्डन नेड कैली. उसी की निगरानी में स्कूल के बच्चों की यह फेयरवेल पार्टी आयोजित की गई थी.

फ्लारडे ने नेड को फोन किया. काफी देर बाद उस ने फोन रिसीव किया तो फ्लारडे ने जब उसे बताया कि तान्या अभी तक घर नहीं पहुंची है तो वह चौंका. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैं क्लब से घर के लिए निकला था तो वह क्लब में ही थी.’’

‘‘क्या तुम पार्टी खत्म होने से पहले ही चले गए थे?’’

‘‘दरअसल, 11 बजे मेरी पत्नी का फोन आया तो मुझे वहां से निकलना पड़ा. लेकिन तब तक पार्टी खत्म हो चुकी थी. काफी बच्चे जा भी चुके थे. मुझे लगा कि बच्चे समझदार हैं, इसलिए मैं ने उन की सुरक्षा की जरूरत महसूस नहीं की. बहरहाल आप परेशान मत होइए, मैं आ रहा हूं.’’

करीब आधे घंटे बाद नेड आ पहुंचा. इस बीच फ्लारडे ने अपने कुछ परिचितों और तान्या की सहेलियों को फोन कर के उस के बारे में पता किया था, लेकिन कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला था.फ्लारडे नेड को अपना शुभचिंतक मानता था और उस पर विश्वास भी करता था. इसीलिए उसे तान्या का ट्यूटर भी नियुक्त किया था. नेड के आते ही वह अपने आंसू नहीं रोक सका और रोते हुए बोला, ‘‘यह क्या हो गया नेड, कहां है मेरी बेटी?’’

‘‘धीरज रखो मि. फ्लारडे. तान्या मिल जाएगी. मेरे खयाल से पुलिस को इत्तिला कर देनी चाहिए.’’

13 जून, 2003 की रात करीब 3 बजे फ्लारडे और नेड पास ही स्थित हाईवे पुलिस चौकी पहुंचे और ड्यूटी औफिसर को तान्या की फोटो दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत शहर के सभी पुलिस स्टेशनों में तान्या का फोटो सहित हुलिया प्रेषित कर उस की तलाश में सहयोग की अपील की. तान्या दक्षिण अफ्रीका के रैडबर्ग सिटी, जोहानेसबर्ग के रहने वाले बौब फ्लारडे की एकलौती संतान थी. 18 साल की खूबसूरत तान्या चंचल और हंसमुख स्वभाव की थी. वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के रेस्तरां में भी उन का हाथ बंटाती थी.

उस की लगन और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश को देखते हुए फ्लारडे उसे बतौर मैनेजर ट्रेनिंग दे रहे थे, ताकि वह अपने व्यवसाय को अच्छी तरह संभाल सके. उस के दोस्तों की संख्या ज्यादा नहीं थी. उस का किसी लड़के से प्रेम संबंध भी नहीं था. सुबह 8 बजे फ्लारडे फिर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. उसे उम्मीद थी कि पुलिस को तान्या के बारे में कुछ न कुछ पता चल ही गया होगा. तब तक चौकीइंचार्ज महिला इंसपेक्टर क्रिस्टीले सटीन होवे अपनी ड्यूटी पर आ चुकी थीं. उन्होंने तान्या की गुमशुदगी के बारे में सारी जानकारी ले ली थी. क्रिस्टीले ने फ्लारडे को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तान्या को खोजने की हर मुमकिन कोशिश करेंगी.

ठीक उसी समय किसी हेनीर रीडर ने फोन पर सूचना दी कि डैरनवुड स्थित हिलबरोव झील पर एक पेड़ के नीचे एक लड़की की लाश पड़ी है. क्रिस्टीले तुरंत सहकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं. उन्होंने फ्लारडे को भी साथ ले लिया था. वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. वहां एक लड़की की लाश औंधे मुंह पड़ी थी. लाश पर कुछ मिट्टी और पेड़ के सूखे पत्ते पड़े थे, जिन्हें हटा कर क्रिस्टीले लाश का निरीक्षण करने लगीं. मृतका के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस की उम्र 17-18 साल थी. उस के पूरे शरीर पर चोटों के निशान थे, गले में नायलौन की रस्सी बंधी थी. संभवत: उसे उसी रस्सी से गला घोंट कर मारा गया था.

मृतका की हालत देख कर ही पता चला रहा था कि उस के साथ हत्या से पूर्व कई लोगों द्वारा दुष्कर्म किया गया था. उस की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. क्रिस्टीले को वह लाश तान्या की लगी, इसलिए उन्होंने अब तक फ्लारडे को लाश नहीं दिखाई थी. लाश को चादर से ढक कर सिर्फ उस का चेहरा फ्लारडे को दिखाया गया तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस के इस तरह रोने से ही साफ हो गया कि लाश उस की बेटी तान्या की थी. आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टपार्टम के लिए भिजवा दिया गया. इस के बाद फ्लारडे से जब पूछा गया कि उसे किसी पर शक है तो उस ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि उसे नहीं लगता कि उस की बेटी ने आज तक किसी का कुछ बिगाड़ा है. वह बेहद मासूम थी. उस की संगत भी गलत नहीं थी. जाने किस ने उस की बेटी के साथ…?

जब तान्या के ट्यूटर नेड कैली के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह ऐसा कतई नहीं कर सकता. लेकिन पुलिस को उसी पर शक था. इस का कारण यह था कि उस की उम्र अभी 25-26 साल थी. वह तान्या के स्कूल का वार्डन होने के साथसाथ ट्यूटर भी था. तान्या खूबसूरत लड़की थी. संभव था कि पढ़ाई के दौरान दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने के साथ शारीरिक संबंध भी बन गए हों. इस के बाद किसी बात को ले कर दोनों के रिश्ते में खटास आ गई हो और नेड ने दुष्कर्म कर के उस की हत्या कर दी हो. यह भी संभव था कि नेड तान्या से एकतरफा प्रेम करने लगा हो और तान्या ने उस के प्रेम को स्वीकार न किया हो. बदले में उस ने जबरदस्ती कर के उस का कत्ल कर दिया हो?

लेकिन तान्या की हत्या करना अकेले नेड के बस की बात नहीं थी. इसलिए इस मामले में उस के कुछ अन्य साथी भी रहे होंगे. नेड ने उन्हें दौलत और तान्या के कुंवारे जिस्म को भोगने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया होगा. उसी दिन शाम को तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, मरने से पहले तान्या से 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. वह पुरुष संसर्ग की आदी नहीं थी. उस के शरीर पर किसी तेजधार हथियार से वार किए गए थे. उस के साथ मारपीट की गई थी, उस के बाद नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर उस की हत्या की गई थी. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान थे.

फ्लारडे को नेड पर विश्वास था. इस के बावजूद नेड को शक के आधार पर पुलिस चौकी बुला कर कई दौर में पूछताछ की गई. इस पूछताछ में कोई भी तथ्य सामने नहीं आया, जिस से उस पर किए जाने वाले शक की पुष्टि होती. पूछताछ में पता चला कि कुछ समय पहले ही उस की शादी हुई थी. उस की पत्नी काफी सुंदर थी. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. नजदीकी होने के बावजूद नेड कभी तान्या के प्रति गलत विचार मन में नहीं लाया. तान्या को ही नहीं, किसी भी लड़की को उस ने बुरी नजरों से नहीं देखा. वह स्कूल का वार्डन था और अपने कर्तव्य का निर्वाह ईमानदारी से कर रहा था. नेड से पता चला कि घटना वाली रात तान्या पार्टी में अकेली आई थी. क्लब से जाते समय उस ने तान्या को पार्टी में देखा था.

तान्या के दुष्कर्म और हत्याकांड की गुत्थी उलझती जा रही थी. अब जांच के लिए 2 ही चीजें बची थीं, एक तान्या का मोबाइल फोन और दूसरा जुलियन बिस्त्रे क्लब. तान्या के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. उस से पता चला कि घटना की रात तान्या ने न तो किसी को अपने मोबाइल से फोन किया था और न ही उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. हां, उस ने रात करीब डेढ़ बजे अपनी एक सहेली को एसएमएस जरूर भेजा था कि मैं सुरक्षित हूं. वहीं रात भर उस का मोबाइल बंद था, लेकिन उस के मोबाइल सेटर का सिमकार्ड बदला गया था.

इस से भी कोई सार्थक जानकारी नहीं मिली. अब क्लब को जांच का लक्ष्य बनाया गया. जुलियन बिस्त्रे क्लब शहर के बीचोबीच स्थित था. पुलिस टीम ने 13 जून, 2003 को क्लब में हुई पार्टी व अन्य गतिविधियों की जांच की. इस जांच में पता चला कि तान्या ने रात करीब 11 बजे क्लब से एक फोन किया था. टेलीफोन एक्सचेंज से पता चला कि वह फोन रोनाल्ड एडवर्ड ग्रीम्सली को किया गया था. रोनाल्ड का पता भी मिल गया था. वह फोंटने ब्ल्यू स्थित एक छोटे से मकान में रहता था. कुछ पुलिसकर्मी उस के घर भेजे गए तो वहां ताला बंद मिला. आसपड़ोस वालों को भी उस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उन लोगों को सिर्फ इतना पता था कि वह किसी विज्ञापन फिल्में बनाने वाली कंपनी में काम करता था.

रोनाल्ड पूरी तरह शक के घेरे में आ गया था. फ्लारडे से रोनाल्ड के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया, ‘‘हां, एक बार तान्या ने मुझे उस से मिलवाया था. उस ने कहा था कि वह उस का अच्छा दोस्त है. लेकिन तान्या को मैं ने उस के साथ कहीं आतेजाते नहीं देखा था.’’

शहर भर की सभी उन फिल्म कंपनियों को खंगाला गया, जो मुख्य तौर पर विज्ञापन फिल्में बनाती थीं. इस बीच रोनाल्ड के घर जब भी दबिश दी गई, दरवाजे पर ताला ही लटका मिला. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. आखिर 18 जुलाई, 2003 को वह पुलिस की पकड़ में आ गया. उस से पूछताछ की जाने लगी तो वह चुप रहा. वह एक शब्द भी नहीं बोला. लेकिन उस के चेहरे के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह किसी राज को दिल की गहराई में छिपाए है. जब उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला गया तो उस ने बेहद गंभीर स्वर में सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘हां, मैं गुनहगार हूं. मैं ने ही तान्या के साथ दुष्कर्म किया है और फिर गला दबा कर उसे मार दिया है.’’

काफी कोशिश के बाद भी उस ने यह नहीं बताया कि उस ने ऐसा क्यों किया? तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि उस के साथ 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. संभवत: वे भी उस की हत्या में शामिल थे. लेकिन रोनाल्ड ने इस बारे में जुबान नहीं खोली. इस से यही लगा कि या तो रोनाल्ड बेहद शातिर है या फि वह किसी से डरासहमा है. खैर, अपराध स्वीकार करने के बाद रोनाल्ड को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. लेकिन तान्या के साथ दुष्कर्म और उस की हत्या का कारण रहस्य ही बना रहा.

रोनाल्ड ने जेल में कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की. एक बार उस ने ब्लेड से अपने हाथ की नसें काट डालीं तो दूसरी बार चादर से गला घोंटने की कोशिश की. दोनों बार उसे बचा लिया गया, लेकिन मानसिक तनाव की वजह से वह कोमा में चला गया. इस के बाद बैरक में रखे उस के सामान की तलाश ली गई तो उस में एक पत्र मिला, जिस में उस ने तान्या के पिता फ्लारडे को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘‘मुझे 13 जून के लिए माफ कर देना. खुद को जीवित रखने के लिए मुझे तान्या की हत्या करनी पड़ी थी.’’

इस पत्र ने केस को और पेचीदा बना दिया था. शायद यह उस का सुसाइड नोट था. इस से लगता था कि रोनाल्ड की कोई मजबूरी रही होगी, जिस की वजह से उस ने तान्या की हत्या की थी, वरना वह ऐसा करना नहीं चाहता था. अब पुलिस को इसी तथ्य को उजागर करना था, लेकिन रोनाल्ड कोमा में था. करीब 2 महीने बाद रोनाल्ड कोमा से बाहर आया तो उसे देख कर लगता था कि वह काफी हताश है, अपराधबोध में जकड़ा हुआ है. उस से जब हमदर्दी जताते हुए उस की दुखती रग को दबाया गया तो सचाई उस के मुंह से बाहर आ गई.

उस ने नजरें नीची कर के कहा, ‘‘मैं पिछले 9 सालों से कोकीन का आदी था. इसी वजह से अकसर मेरे पास पैसों की तंगी रहती थी. नशे के सौदागरों का काफी कर्ज मुझ पर चढ़ गया था.’’ इतना कह कर रोनाल्ड रुका. फिर उस ने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘उस दिन मेरे पास कोकीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. नशे के बिना मैं काफी बेचैनी महसूस कर रहा था. मैं चुटकी भर कोकीन के लिए कोकीन बेचने वालों के सामने गिड़गिड़ाया, पर उन्होंने नहीं दी. उलटा कर्ज चुकाने को कहा और धमकी दी कि अगर मैं ने उन के पैसे नहीं दिए तो वे मुझे मार डालेंगे. तब कोकीन और कर्ज की खातिर मैं ने उन से एक डील कर ली.’’

‘‘कैसी डील?’’ इंसपेक्टर क्रिस्टीले ने पूछा.

रोनाल्ड ने चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू भरे थे. वह बोझिल आवाज में बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि अगर मैं किसी लड़की के साथ अपनी ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे दूं तो न केवल वे मेरा सारा कर्ज माफ कर देंगे, बल्कि मुझे नशे की लत को पूरा करने के लिए काफी पैसे भी देंगे. नशे की लत और जिंदगी की चाहत ने मुझे हैवान बना दिया. मैं ने अपनी ही चाहत को दागदार कर के उस की हत्या कर दी.’’

इतना कह कर रोनाल्ड फफकफफक कर रोने लगा. यहां जानने वाली बात यह है कि लड़कों से दूर भागने वाली तान्या करीब 6 महीने पहले रोनाल्ड से मिली थी. तान्या ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा था कि उस के दिल में हलचल सी मच गई थी. उस ने इस के पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था. रोनाल्ड की नजर भी उसी पर जमी थी. पहली नजर और पहली मुलाकात में ही तान्या और रोनाल्ड एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

तान्या की तरह रोनाल्ड भी सभ्य व संस्कारी था, पर उस में एक कमी यह थी कि उसे कोकीन के नशे की लत लग गई थी. बस, इसे छोड़ कर उस में और कोई कमी नहीं थी. उस की इस आदत को तान्या नहीं जान पाई थी. दोनों अकसर मिलने लगे थे. लेकिन मिलने में वे इतनी सावधानी बरतते थे कि कभी किसी को उन के प्यार का पता नहीं चल सका.

रोनाल्ड थोड़ा सामान्य हुआ तो उस ने आगे कहा, ‘‘13 जून को कोकीन न मिलने की वजह से मेरी सांसें घुटी जा रही थीं. हाथपांव कांप रहे थे. मौत नजदीक आती दिखाई दे रही थी. पार्टी के बाद तान्या ने मुझ से मिलने का वादा किया था. रात करीब 11 बजे तान्या का फोन आया तो मुझे जैसे जिंदगी मिलती नजर आई. मेरा जमीर उस पल मर गया और मैं ने एक ऐसा फैसला ले लिया, जिस के बारे में मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. मैं इंसान से हैवान बन गया. कुछ सोच कर मैं उसे लेने क्लब चला गया और मैं उसे ले कर अपने घर आ गया.’’

रोनाल्ड ने तान्या के आने की जानकारी कोकीन सप्लाई करने वाले नाइजीरियन सौदागरों को दे दी थी. उस ने कोकीन की एक पुडि़या के लिए उन से वादा कर लिया था कि वह प्रेमिका के साथ ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे देगा. तान्या रोनाल्ड के घर पहुंची तो उन नाइजीरियन युवकों को देख कर डर गई. लेकिन अब तो वह फंस चुकी थी. उन्होंने उस से कपड़े उतारने को कहा तो उस ने अपने प्रेमी रोनाल्ड की तरफ देखा. वह समझ नहीं पा रही थी कि रोनाल्ड को यह क्या हो गया है?

तान्या ने विरोध किया तो नाइजीरियन युवकों ने उस के साथ मारपीट की. इस के बाद चाकू की नोक पर उस के हाथपैर बांध कर सोफे पर डाल दिया. रोनाल्ड उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा तो वे उस की फिल्म बनाने लगे. रोनाल्ड के बाद उन दोनों ने भी तान्या के साथ जबरदस्ती की. अब तक तान्या अधमरी सी हो चुकी थी. उस के जीवित रहने से तीनों फंस सकते थे, इसलिए वहां पड़ी नायलौन की रस्सी से उस का गला घोंट दिया गया.

इस के बाद तीनों रात के अंधेरे में तान्या की लाश को झील के पास स्थित एक पेड़ के नीचे फेंक आए. दोनों नाइजीरियन अपना कैमरा ले कर चले गए तो रोनाल्ड को होश आया. वह कांप उठा कि उस ने यह क्या कर डाला? मगर अब क्या हो सकता था. वह पुलिस के डर से छिपता भागता रहा, लेकिन कब तक भागता फिरता, आखिर पकड़ा गया. इस के बाद पुलिस ने दोनों नाइजीरियन युवकों को पकड़ने की काफी कोशिश की, लेकिन वे पकड़े नहीं जा सके. 2 सालों तक मुकदमा चला.

17 जुलाई, 2005 को जोहानेसबर्ग कोर्ट के जज बेनडस्टन ने दुष्कर्म, हत्या, चोरी और अश्लील फिल्म बनाने के आरोप में रोनाल्ड को 18 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई. इस बीच रोनाल्ड का नशा छुड़ाने का इलाज भी चलता रहा. सजा के दौरान रोनाल्ड की कोकीन की लत छूट गई. जेल में वह ज्यादातर बाइबल पढ़ता रहता था. उस के चालचलन के मद्देनजर जेल प्रशासन ने उस की सजा कम करने की गुजारिश की, लेकिन रोनाल्ड ने अपने ऊपर किसी तरह का रहम न किए जाने की बात कही.

उस का कहना था कि उस ने जो गुनाह किया है, उस के लिए उसे मौत की सजा मिलनी चाहिए.  अब वह आत्मग्लानि का बोझ ले कर जीना नहीं चाहता. उस के चालचलन को देखते हुए फरवरी, 2015 में उस की बाकी सजा माफ करते हुए कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया. लेकिन 25 मार्च, 2015 को उस ने कोर्ट से अपील की कि उसे मौत की सजा दे दी जाए. लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इस के बाद 14 मई, 2015 को उस ने दोबारा अपील की है कि उसे ताउम्र कैद की सजा दी जाए. उस की इस अपील पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है. Crime Kahani

 

Hindi Crime Story: आशिकी का अंजाम

Hindi Crime Story: तुलसीराम से शादी हो जाने के बाद भी कीर्तिबाला ने पुराने प्रेमियों से मिलना जारी रखा. 3 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी उस ने आशिकी का ऐसा खेल खेला कि उसे जेल जाना पड़ा.

23 सितंबर, 2015 की सुबह इंदौर के थाना ऐरोड्रम के थानाप्रभारी बलजीत सिंह अपने औफिस में पहुंचे ही थे कि लक्ष्मीबाई अपनी 9 साल की भतीजी चांदनी को ले कर उन के पास पहुंची. वह इलाके के ही अखंडनगर में रहती थी. उस का भाई तुलसीराम पिछले कई दिनों से लापता था. तुलसीराम शादीविवाह के कार्यक्रमों में खाना बनाने का ठेका लेता था. लक्ष्मीबाई के अनुसार, उस की भाभी कीर्तिबाला ने उसे बताया था कि तुलसीराम किसी शादी में खाना बनाने की बात कह कर गए हैं. जबकि यह बात सही नहीं है. हकीकत में कीर्तिबाला ने कुछ युवकों के साथ मिल कर तुलसीराम को मार डाला है और लाश को औटो में रख कर कहीं फेंक दिया है. मामला बेहद गंभीर था. थानाप्रभारी ने लक्ष्मीबाई से पूछा, ‘‘तुलसीराम की हत्या होने की बात तुम इतने दावे के साथ कैसे कह रही हो?’’

‘‘मैं यह सब इस आधार पर कह रही हूं कि मुझे इस बच्ची ने बताया है. यह तुलसीराम की बेटी है. इस ने अपनी आंखों के सामने पिता का कत्ल होते देखा है. आप इस से खुद मालूम कर सकते हैं.’’ लक्ष्मीबाई ने थानाप्रभारी को बताया.

बलजीत सिंह ने 9 साल की बच्ची चांदनी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछा तो उस ने पिता की हत्या किए जाने की सच्चाई उन्हें बता दी. इस के बाद बलजीत सिंह ने पूरे मामले से एसपी (सिटी) आर.एस. घुरैया को अवगत करा दिया. उन के निर्देश पर उन्होंने एक पुलिस टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले तुलसीराम की पत्नी कीर्तिबाला को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करती रही, लेकिन सख्ती करने पर उस ने पति की हत्या का राज उगल दिया. उस से की गई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस के प्रेमी विशाल जगताप, संजय सिंघल उर्फ चिंटू, संदीप जाधव और औटोचालक विशाल चालसे को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में जब पांचों अभियुक्तों का एकदूसरे से सामना हुआ तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उन की कहानी अब खत्म हो चुकी है. पुलिस ने उन सभी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए तुलसीराम की हत्या की जो कहानी बयां की, वह इस प्रकार थी. कीर्तिबाला मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी. उस के मातापिता दोनों ही काम पर जाते थे. घर की बड़ी बेटी होने की वजह से कीर्ति ही अपने अन्य भाईबहनों की देखभाल करती थी. कीर्ति जब जवानी में पहुंची तो मोहल्ले के आवारा किस्म के कई युवक उस पर डोरे डालने लगे. उन में से एक युवक कीर्ति का दूर का रिश्तेदार भी था. उस युवक का कीर्ति के घर काफी आनाजाना था.

कीर्ति उस पर विश्वास करती थी. वह मौका मिलने पर कीर्ति के साथ छेड़छाड़ करता था. लेकिन रिश्तेदार होने की वजह से कीर्ति ने न तो उस का विरोध किया और न ही इस की शिकायत अपने मांबाप से की. इस से उस युवक की हिम्मत बढ़ती गई. कीर्ति उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रही थी, वह बड़ा ही फिसलनभरा होता है. उस रिश्तेदार की बातों में फंस कर कीर्ति फिसल गई. इस के बाद तो वह अपने मोबाइल पर उसे अश्लील फिल्में दिखाने लगा. उसी दौरान उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद यह सिलसिला बन गया.

फिर तो कीर्ति ऐसी बहकी कि उस के मोहल्ले के कई लड़कों से नाजायज संबंध हो गए. लेकिन जब बेटी के बहके कदमों की जानकारी मातापिता को हुई तो उन्होंने बिना देरी किए कीर्ति की शादी तुलसीराम के साथ कर दी. यह 10 साल पहले की बात है. तुलसीराम इंदौर के अखंडनगर में रहता था. वह शादीविवाह में ठेके पर खाना आदि बनवाने का काम करता था. उस के साथ इस काम में और भी लोग जुड़े थे. इसलिए उस के पास साल भर काम रहता था. इस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. चूंकि अपने काम की वजह से वह रातों को घर से बाहर रहता था, इसलिए कीर्ति को उस का यह काम पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि पति ऐसा कोई काम करे, जिस से शाम को वह घर लौट आया करे.

इस बारे में कीर्ति ने बात की तो तुलसीराम कोई दूसरा काम करने के लिए राजी नहीं हुआ. वह अपना वही काम करता रहा. रातरात भर जागने के बाद तुलसी सुबह थकाहारा घर लौटता और गहरी नींद सो जाता. कीर्ति इसे पति की बेरुखी समझती. उसे तो कमउम्र में ही शारीरिक संबंध की लत लग गई थी. पति की बेरुखी पर उस ने जल्द ही अपने मायके के पुराने प्रेमियों से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. देखतेदेखते कीर्ति एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. तुलसीराम के साथ कृष्णबाग कालोनी में रहने वाला संजय उर्फ चिंटू भी काम करता था. काम के सिलसिले में वह अकसर तुलसी के घर आताजाता रहता था. चिंटू अविवाहित था. कीर्ति के सौंदर्य ने उसे पहली ही नजर में अपना दीवाना बना दिया था. इसलिए वह जब भी उस के घर आता, उस से अधिक से अधिक बातें करने के फेर में रहता.

कीर्ति तो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी. इसलिए वह जल्द ही उस की नजरों को भांप गई. ॐस ने भी उसे आमंत्रण देते हुए उस के मन की आग को हवा देनी शुरू कर दी. चिंटू जब कभी कीर्ति के घर आता, उस से हंसीमजाक करता. उस की हंसीमजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देती थी. इस से वे एकदूसरे के करीब आते चले गए और फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों की इच्छाएं पूरी हो गईं. उस दिन के बाद चिंटू और कीर्ति दुनिया से नजरें बचा कर इस अनैतिक रास्ते पर चल पड़े. चिंटू का एक दोस्त था विशाल जगताप. चिंटू ने कीर्ति के साथ अपने संबंधों की कहानी विशाल को सुनाई तो उस ने भी चिंटू के साथ कीर्ति के घर आनाजाना शुरू कर दिया. क्योंकि कीर्ति के किस्से वह भी अन्य लोगों से सुन चुका था.

इसलिए उस से संबंध बनाने की उस की भी लालसा जाग उठी थी. नएनए लड़कों से संबंध बनाने की कीर्ति की लत लग चुकी थी. उस ने जल्द ही विशाल को भी अपने सांचे में उतार लिया. फिर एक समय ऐसा आया कि चिंटू और विशाल अकसर कीर्ति के पास आने लगे. कीर्ति की बेटी चांदनी 9 साल की हो चुकी थी. इतनी बड़ी बेटी से कीर्ति को न कोई शरम थी और न कोई डर. वह बेटी को बाहर के कमरे में बैठा कर अपने प्रेमियों के साथ दरवाजा बंद कर के मौजमस्ती करती थी. लेकिन कहते हैं कि पाप ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता.

आखिर कीर्ति के अवैध संबंधों की जानकारी तुलसीराम को किसी तरह हो ही गई. पत्नी की सच्चाई जान कर तुलसीराम को बड़ा दुख हुआ. उस ने कीर्ति को समझाया. लेकिन वह कहां मानने वाली थी. तुलसीराम को इस बात की चिंता थी कि मां की गलत आदतों का असर बेटी चांदनी पर न पड़े. इसलिए वह बेटी को अकसर समझाता रहता था. चांदनी भी मां की हरकतों की जानकारी तुलसी को देती रहती थी, जिस से वह परेशान रहने लगा. तब उस ने न केवल कीर्ति पर सख्ती बरतनी शुरू की, बल्कि चेतावनी दी कि यदि उस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह आत्महत्या कर लेगा.

इन बातों का कीर्ति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था. उस का अपने प्रेमियों से पहले की ही तरह मिलनाजुलना जारी रहा. रोज नए युवकों के साथ वक्त बिताना उस की जैसे आदत बन चुकी थी. पति की रोजरोज की किचकिच से वह उकता गई. एक तरह से उसे अब पति में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी. वह उस से निजात पाना चाहती थी, ताकि उस से कोई टोकाटाकी न कर सके. कीर्ति ने पति की लाखों रुपए की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा ली थी. इस के बाद उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अपने प्रेमी विशाल से बात की. विशाल ने उस से वादा किया कि तुलसीराम की हत्या के बाद वह उस से शादी कर लेगा.

यह काम विशाल अकेले नहीं कर सकता था, लिहाजा उस ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने 2 दोस्तों, चिंटू और संदीप को भी राजी कर लिया. फिर योजना बना कर कीर्ति ने एक दिन विशाल, चिंटू और संदीप को अपने यहां बुला कर एक कमरे में छिपा दिया. रात को तुलसीराम घर लौटा तो खाना खाने के बाद वह बिस्तर पर जा कर लेट गया. थोड़ी देर में उसे नींद आ गई. तभी कीर्ति भी उस के पास जा कर लेट गई. कीर्ति ने पहले तो पति को हिलाडुला कर देखा कि वह सो रहा है या जाग रहा है? जब तुलसीराम ने कोई हरकत नहीं की तो उस ने फटाफट अपना दुपट्टा उतार कर पति के गले में लपेट दिया और उस के दोनों सिरे पलंग के दोनों ओर लटका दिए.

इस के बाद उस के आवाज देने पर उस के दोनों प्रेमी विशाल और चिंटू कमरे में आ गए. आते ही उन्होंने दुपट्टे के दोनों सिरे खींचने शुरू कर दिए तो संदीप तुलसीराम के पैरों पर बैठ गया. उसी समय तुलसीराम की बेटी चांदनी की आंखें खुल गईं. वह उन तीनों को पहचानती थी. पिता को तड़पता देख कर वह चीखी तो कीर्ति ने झट से उस का मुंह बंद कर लिया और 2 थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिए.

इस के बाद वह उसे किचन में ले गई. वह उसे डराते हुए बोली, ‘‘खबरदार, किसी को बताया तो तुझे भी मार डालूंगी.’’

मां की धमकी से बच्ची डर गई. तुलसीराम की हत्या करने के बाद उन्हें लाश ठिकाने लगानी थी. इस के लिए उन्होंने लाश को बांध कर विशाल के औटो में रख दिया. लाश को ये नैनोद के पास ले गए और वहीं पर बने एक ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर लाश उस में डाल दी. इन का सोचना था कि लाश वहां से काफी दूर बह जाएगी और पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी.

बेटी कहीं मुंह न खोल दे, इसलिए कीर्ति अगले दिन भी उसे डराती रही. उसी दिन दोपहर के समय तुलसीराम का भाई शिवकुमार और बहनोई घर आए तो उन्होंने कीर्ति से तुलसीराम के बारे में पूछा. तब कीर्ति ने उन्हें बताया कि वह किसी शादी में खाना बनाने गए हैं. वहां मौजूद चांदनी उन्हें सचाई बताना चाहती थी, लेकिन जब उस ने कीर्ति की तरफ देखा तो मां ने आंखें तरेरी तो वह डर गई. कीर्ति ने पति को ठिकाने लगाने वाली बात अपनी मां वंदना को भी बता दी थी. नानी वंदना ने भी चांदनी को पीटा और कहा कि अगर उस ने किसी से कुछ बोला तो उसे भी मार कर कहीं फेंक देंगे. शाम को तुलसीराम की बहन लक्ष्मीबाई घर आई तो वह चांदनी को अपने घर ले गई. तब चांदनी ने बुआ को सारी बात बता दी.

अगले दिन सुबहसुबह लक्ष्मीबाई चांदनी को ले कर थाना ऐरोड्रम पहुंची और थानाप्रभारी बलजीत सिंह को पूरी कहानी बता दी. हत्या का खुलासा होने पर डीआईजी संतोष कुमार सिंह और एसपी (पश्चिमी) डी. कल्याण चक्रवर्ती भी थाने पहुंच गए. उन्होंने भी अभियुक्तों से पूछताछ की. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर तुलसीराम की लाश बरामद कर ली. पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा संकलन तक तुलसीराम के तीनों बच्चे अपनी बुआ के पास थे. पति की हत्या करने का कीर्ति को तनिक भी अफसोस नहीं था.

जेल जाते समय उस ने कहा कि उसे अब बच्चों से कोई मतलब नहीं है. जेल से छूटने के बाद वह विशाल के साथ शादी कर अपनी गृहस्थी नए सिरे से बसाएगी.

Pathankot Attack: भारत की अस्मिता पर – आतंकी हमला

Pathankot Attack: पाक आतंकियों द्वारा भारत में घुसपैठ कर के आतंकी हमले करना कोई नई बात नहीं है. पठानकोट एयरबेस का हमला भी पाक आतंकियों की सोचीसमझी रणनीति थी. इस हमले में भारत के 7 जवान शहीद हुए, लेकिन राहत की बात यह है कि पहली बार पाकिस्तान अपने यहां बैठे आतंकियों के आकाओं के विरुद्ध काररवाई करने की बात कर रहा है. पर क्या ऐसा होगा?

किसी निहायत सनसनीखेज कांड को अंजाम देने की भूमिका तभी सामने आ गई थी, जब दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 29 दिसंबर, 2015 को एयरफोर्स के बर्खास्त नान कमीशंड औफिसर रंजीत के.के. को पंजाब के बठिंडा से गिरफ्तार किया था. उस पर पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई को गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराने का आरोप था.

दरअसल, बठिंडा में तैनात रंजीत को एक अज्ञात महिला ने सोशल साइट फेसबुक पर जाल में फांस कर एयरफोर्स की गोपनीय जानकारी हासिल कर ली थी. दिल्ली पुलिस की इस काररवाई से पंजाब पुलिस पूरी तरह अनजान थी. जांच से जुड़े दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के बताए अनुसार, जासूसी रैकेट में अब तक सेना और बीएसएफ के एकएक जवान और एक पूर्वसैनिक सहित 5 लोग गिरफ्तार किए जा चुके थे. दिल्ली पुलिस इस मामले में पूरी गंभीरता से जांच कर रही थी, ताकि षडयंत्रकारियों की जड़ तक पहुंच सके.

24 वर्षीय रंजीत केरल के मलप्पुरम जिले का रहने वाला था. उस ने सन 2010 में इंडियन एयरफोर्स जौइन की थी. सन 2013 में उसे अपने फेसबुक एकाउंट पर दामिनी मैकनोट के नाम से एक महिला की फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट मिली थी, जिसे उस ने खुशी से स्वीकार कर लिया था. दामिनी ने अपने प्रोफाइल में बताया था कि वह देशदुनिया की खबरों पर आधारित यूके की एक पत्रिका में फीचर राइटर है. रंजीत के मैसेज बौक्स में उस ने अपना निजी मोबाइल नंबर छोड़ कर उस से बात करने की गुजारिश की थी. रंजीत ने उस नंबर पर बात की तो दोनों की अच्छीभली दोस्ती हो गई.

कुछ दिन प्यार भरी मीठीमीठी बातें करते रहने के बाद एक दिन उस ने रंजीत से यह कहते हुए भारतीय वायु सेना से संबंधित कुछ जानकारियां मांगी कि वह इस विषय पर अपनी पत्रिका के लिए एक फीचर तैयार करना चाहती है. रंजीत पहले ही उस के हनीट्रैप में फंस चुका था. उस ने जो भी जानकारी चाही, रंजीत ने बेझिझक दे दी. रंजीत को किसी मामले में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. इस के बाद ही वह दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर उस से गहन पूछताछ की. उम्मीद थी कि उस से कई बड़े खुलासे होंगे.

दिल्ली में अभी यह सब चल ही रहा था कि पंजाब में इस बीच एक बड़ी अनहोनी हो गई. पहली जनवरी, 2016 की भोर में पठानकोट के थाना नरोट जैमलसिंह के अधीन पड़ने वाली रावी नदी पर बनी कंबलौर पुलिया के पास एक लावारिस लाश मिली. उस से थोड़े फासले पर एक गाड़ी खड़ी थी. अनुमान लगाया गया कि मरने वाला उसी गाड़ी का ड्राइवर रहा होगा. अभी यह गुत्थी सुलझ भी नहीं पाई थी कि एक अन्य सनसनीखेज समाचार चर्चा का विषय बन गया. पता चला कि विगत रात पठानकोट के एसपी (हैडक्वार्टर) रहे सलविंदर सिंह को आतंकियों ने अपहृत कर के उन से बुरी तरह मारपीट की और उन्हें एक सुनसान जगह पर छोड़ दिया और अपने साथ उन की नीली बत्ती लगी गाड़ी ले गए.

जिस ड्राइवर की लाश बरामद की गई थी, पुलिस छानबीन में उस के बारे में यह जानकारी सामने आई कि वह थाना नरोट जैमलसिंह के तहत आने वाले गांव भगवाल का रहने वाला 35 वर्षीय इकागर सिंह था. वह अपनी इनोवा गाड़ी टैक्सी के रूप में चलाया करता था. पिछली रात करीब 9 बजे कुछ लोगों ने फोन कर के उस की गाड़ी किराए पर ली थी और उसे कहीं अज्ञात जगह पर बुलाया था. तब से वह अपनी गाड़ी समेत घर से गायब था. भोर में अड्डा कोहलियां के नजदीक से जब उस की गाड़ी बरामद की गई तो गाड़ी के चारों पहियों की हवा निकली हुई थी. गाड़ी को और भी काफी नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया था.

उस जगह से थोड़ी दूरी पर स्थित कंबलौर पुलिया के पास से ड्राइवर इकागर सिंह की लाश मिली थी. लाश पर चाकुओं के अनगिनत जख्म थे. यह सीधे कत्ल का मामला था. एसपी सलविंदर सिंह का 2 दिन पहले पठानकोट से तबादला हुआ था, मगर अभी तक उन्होंने अपना चार्ज नहीं छोड़ा था. पहली जनवरी की भोर में गुलपुर सिंबली गांव पहुंच कर उन्होंने किसी के फोन से पुलिस हैडक्वार्टर को सूचित किया था कि वह अपने एक रसोइए व करीबी दोस्त राजेश वर्मा के साथ इलाके के एक धार्मिक स्थल पर मत्था टेकने गए थे. जब वह अपनी महिंद्रा एक्सयूवी गाड़ी नंबर पीबी02ए बी0313 से वापस घर लौट रहे थे तो रास्ते में फौजी वर्दी पहने 2 व्यक्तियों ने सड़क पर सामने आ कर उन्हें रुकने का इशारा किया.

गाड़ी रुकने पर 3 अन्य व्यक्ति भी वहां आ गए. इस के बाद उन लोगों ने खतरनाक हथियारों के बल पर उन का अपहरण कर लिया. गाड़ी में सलविंदर सिंह को उन के रसोइया से मारपीट कर के गुलपुर सिंबली के पास उन्हें गाड़ी से उतार दिया गया, जबकि उन के साथी राजेश वर्मा को आतंकवादी अपने साथ ले गए. उन के सेलफोन भी आतंकियों ने पहले ही हथिया लिए थे. यह गंभीर मामला पुलिस की जानकारी में आया तो पठानकोट व गुरदासपुर में रेडअलर्ट जारी कर के चारों तरफ सख्त नाकाबंदी कर दी गई.

कुछ देर बाद राजेश वर्मा भी पुलिस से संपर्क साधने में सफल हो गया. उस की बुरी तरह पिटाई करने के साथ ऐसा लग रहा था, जैसे उस की गर्दन काटने का भी प्रयास किया गया था. उस की गर्दन पर तेजधार हथियार का गहरा घाव था. जिस पर उस ने अपनी कमीज बांध रखी थी. कमीज खून से पूरी तरह लाल हो गई थी. राजेश को तुरंत सिविल अस्पताल में दाखिल करा दिया गया. चेकिंग के दौरान पुलिस को पठानकोट के गांव अकालगढ़ के नजदीक एक वीरान जगह से एसपी सलविंदर सिंह की गाड़ी खड़ी मिल गई.

इनोवा चालक इकागर सिंह के कत्ल के संबंध में थाना नरोट जैमलसिंह में केस दर्ज करने और एसपी व उन के साथियों के अपहरण के मामले में गुरदासपुर के सदर थाना में आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद पठानकोट के एसएसपी रवींद्र कुमार बख्शी व गुरदासपुर के एसएसपी गुरप्रीत सिंह तूर अपनी विशेष पुलिस टीमों के साथ मामले की तह में जाने और वांछित आतंकियों की धरपकड़ के लिए जुट गए. मगर देर रात तक न तो पुलिस के हाथ कोई आतंकी लगा और न ही उन के बारे में कहीं से अन्य कोई सुराग मिल पाया.

इस बीच स्थिति का जायजा लेने के लिए पहली जनवरी की सुबह ही एडीजीपी (ला एंड और्डर) हरदीप सिंह ढिल्लो, बौर्डर रेंज के आईजी लोकनाथ आंगरा व डीआईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह, चंडीगढ़ और अमृतसर से पठानकोट आ पहुंचे. उन के आते ही पुलिस और सेना का जौइंट सर्च औपरेशन शुरू करवा दिया गया.

पुलिस के ये तीनों उच्चाधिकारी दिन भर एसपी सलविंदर सिंह से पूछताछ करते रहे. उन्हें अपना यह कनिष्ठ औफिसर संदेह के दायरे में आता दिख रहा था. यों भी इस एसपी का पिछला आचरण सही नहीं माना जा रहा था. एक साथ 5 महिला सिपाहियों ने उस के खिलाफ गलत आचरण की शिकायत की थी, जिस आधार पर उस का पठानकोट से ट्रांसफर किया गया था. मगर वह तुरंत रिलीव हो कर नई जगह पर जौइन करने के बजाय पठानकोट में ही जमा हुआ था.

अभी 5 महीने पहले ही गुरदासपुर के कस्बा दीनानगर में बड़ी आतंकवादी वारदात हुई थी. आतंकियों ने यहां के पुलिस स्टेशन को अपने कब्जे में ले लिया था. मौजूदा स्थिति को देखते हुए सेना ने आशंका जताई कि इस बार भी आतंकवादियों की ओर से वैसा ही कोई हमला हो सकता है. इसलिए इन बातों को नजरअंदाज न कर के पूरी सुरक्षा व्यवस्था कर ली गई थी. मगर सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की मुस्तैदी के दावों के बावजूद 2 जनवरी, 2016 की अलसुबह ठीक सवा 3 बजे आतंकवादी पठानकोट के एयरफोर्स स्टेशन में हथियारों समेत दाखिल होने में कामयाब हो गए. उन लोगों ने एयरफोर्स स्टेशन में दाखिल होते ही अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.

इस में डिफेंस सिक्योरिटी कोर के औफिसर औनरेरी कैप्टन फतेह सिंह व हवलदार कुलवंत सिंह शहीद हो गए, साथ ही अन्य कई जवान भी जख्मी हुए. हालांकि मरने से पूर्व बुरी तरह जख्मी हो जाने पर भी फतेह सिंह व कुलवंत सिंह ने 20 मिनट तक आतंकवादियों को आगे बढ़ने से रोके रखा था. इस बीच हमले की जानकारी मिलते ही एयरफोर्स के अनेक अधिकारी तो घटनास्थल के पास पहुंचे ही, पठानकोट की विशेष पुलिस फोर्स ने भी वहां पहुंच कर एयरफोर्स स्टेशन की समूची हद को चारों तरफ से पूरी तरह से सील कर दिया. भीतर छिपे आतंकियों से निपटने के लिए समूची कमान एयरफोर्स के साथ एनएसजी कमांडोज व भारतीय सेना के जवानों ने भी मोर्चा संभाल लिया. यह औपरेशन लगातार 17 घंटे से भी अधिक समय तक चला.

इस दौरान कई बार अतिरिक्त फौज भी बुलाई गई. बख्तरबंद गाडि़यों की भी मांग की जाती रही. आतंकवादियों की ओर से इन गाडि़यों के बुलेटप्रूफ कांच पर अंधाधुंध फायरिंग कर के इन के भीतर बैठे जवानों को नुकसान पहुंचाने के प्रयास लगातार किए जाते रहे, मगर इन गाडि़यों पर एके 47 असाल्ट राइफल की फायरिंग का भी कोई असर नहीं हुआ. देर शाम एयरफोर्स स्टेशन में एक टैंक भेजा गया. स्थिति का जायजा लेने के लिए इस्तेमाल में लाए गए एमआई 35 हेलीकौप्टरों से रुकरुक कर फायरिंग की गई. इन हेलीकौप्टरों में जीपीएस सिस्टम के साथ ऐसे कैमरे भी फिट हैं, जो दूरदराज के कोनों तक के भी साफ फोटो ले सकते हैं, जिन्हें देख कर अचूक निशाना साधा जा सकता है.

इस तरह की आधुनिक तकनीक व मारक हथियारों की मदद से सुरक्षाबलों ने एकएक कर के एयरफोर्स स्टेशन में घुसे 5 आतंकवादियों को मार गिराया. भीतर घुस आए आतंकवादियों ने औनरेरी कैप्टन फतेह सिंह व हवलदार कुलवंत सिंह का 20 मिनट तक मुकाबला कर के उन्हें शहीद करने के बाद कैंटीन का रुख कर लिया था. यहां धुआंधार फायरिंग कर के उन्होंने जिन जवानों को जख्मी किया, वे थे—सूबेदार मेजर दलबीर सिंह, नायक वेदव्यास, लांस नायक किशोरीलाल, सिपाही बिशनदास, सिपाही करतार सिंह, नायक गौरव, नायक बी.एस. जोर, हवलदार जसपाल, रोहित शर्मा व भूप सिंह, एनएसजी कमांडोज व डिफेंस सिक्योरिटी कोर के भी कई जवान घायलों में शामिल थे.

एयरफोर्स स्टेशन में हवाई फौज के मिग-21 लड़ाकू जहाज व एमआई-24 हेलीकौप्टरों समेत अन्य सैन्य साजोसामान मौजूद था, जिन्हें आतंकवादी नुकसान पहुंचा सकते थे. मगर यहां पर तैनात फोर्स की मुस्तैदी की वजह से आतंकवादी इन तक पहुंचने में सफल नहीं हो सके. जिस बर्खास्त एयरफोर्स अधिकारी रंजीत को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने काबू किया था, उस से जब इस मुद्दे पर पूछताछ की गई तो उस ने माना कि इस हमले की उसे पहले से ही जानकारी थी, साथ ही उस ने बताया कि पठानकोट के अलावा बठिंडा व जैसलमेर भी आतंकवादियों के निशाने पर हैं.

इस से पहले 30 अगस्त, 2015 को पठानकोट पुलिस ने एयरमैन सुनील कुमार को गिरफ्तार किया था. वह फेसबुक के जरिए हनीट्रैप में फंस कर एक लड़की के माध्यम से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को एयरफोर्स की गुप्त सूचनाएं लीक कर रहा था. मगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के लंबी पूछताछ के बाद छोड़ दिया था. जाहिर है, अब ये गलतियां नहीं दोहराई जा सकती थीं. दिल्ली पुलिस ने बठिंडा से पकडे़ गए रंजीत के कस्टडी रिमांड की अवधि बढ़ा कर उस से महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर पूछताछ शुरू कर दी. इस बीच बठिंडा कैंट की जबरदस्त सुरक्षा बढ़ा कर पंजाब सहित पूरे देश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया.

चर्चा यह थी कि पठानकोट एयरबेस में घुसे आतंकी अगर अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते तो वहां भारी नुकसान पहुंचा सकते थे. इस के बावजूद यह कहना गलत न होगा कि माल का नुकसान भले ही ज्यादा न सही, बेशकीमती जानों का नुकसान तो उन लोगों ने कर ही दिया था. गांव झंडा गुज्जरां के शहीद कैप्टन फतेह सिंह राजपूत सेना की 16 डोगरा रेजीमेंट से बतौर कैप्टन रिटायर हो कर अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश में रह रहे थे. कुछ वर्ष पहले वह फिर सेना में बतौर अफसर डीएससी कोर में शामिल हो गए थे. फतेह सिह सेना में अंतरराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज थे. वह एशिया और अन्य कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों में निशानेबाजी में अनेक पदक जीत चुके थे. उन का एक बेटा गुरदीप सिंह दीपू भी सेना में तैनात है.

दूसरे शहीद हवलदार कुलवंत सिंह सन 1985 में आर्टिलरी सेना के केंद्र हैदराबाद में बतौर सिपाही भरती हुए थे. सन 2004 में रिटायरमेंट के बाद वह घर आ गए. सन 2006 में वह फिर सेना की डीएससी (डीसैंस सिक्योरिटी कौप) सेवा में भरती हो गए. 2 माह पहले ही वह ओडिशा से ट्रांसफर हो कर पठानकोट की एयरबेस में ड्यूटी पर आए थे. शहीद होने से एक दिन पहले ही वह अपने घर वालों से मिल कर वापस ड्यूटी पर पहुंचे थे.

पठानकोट पर यह आतंकी हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा के एक सप्ताह बाद हुआ था. ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि दोनों देशों के सुधरते रिश्तों पर इस का क्या असर होगा? वैसे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस हमले की कड़े शब्दों में आलोचना कर के सकारात्मक संदेश देने के प्रयास किए हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में भारत के साथ है. इस परिप्रेक्ष्य में भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना बयान इस तरह से जारी किया, ‘हम न केवल पाकिस्तान, बल्कि अपने सभी पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं. लेकिन भारत पर अगर कोई आतंकी हमला होता है तो हम उस का करारा जवाब देंगे.’

वैसे अब तक की छानबीन में यह बात सामने आई है कि पठानकोट हमले में जैशएमोहम्मद का हाथ है. इस हमले में सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहरण व दिसंबर, 2001 में संसद पर हुए हमले से जुड़े आतंकवादियों का ही हाथ है. संदर्भवश बता दें कि आतंकवादी अफजल गुरु के बाद आतंकियों ने अपने संगठन को दूसरे तरीके से तैयार किया है और फिदायीन हमलावरों की टोली बनाई है. इन्हें ट्रेनिंग देने का काम युद्धस्तर पर शुरू किया गया. कश्मीर में आतंकवादियों के एनकाउंटर से जुड़े सुरक्षा अधिकारियों ने सीधेसीधे आशंका जताई है कि पठानकोट हमले में सन 2001 में संसद पर हुए हमले के दोषी अफजल गुरु से जुड़े लोगों का हाथ है.

इन लोगों ने सन 2014 में स्क्वैड औफ जैश नामक संगठन बनाया था. गुरु उत्तरी कश्मीर के सोपोर क्षेत्र का रहने वाला था, जिसे फरवरी, 2013 में तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी. इस से पहले जैश नामक आतंकी संगठन को मौलाना मसूद अजहर ने बनाया था. अजहर वही आतंकी है, जिसे सन 1999 में हाइजैक हुए इंडियन एयरलाइंस के विमान को अफगानिस्तान के कंधार ले जा कर रिहा करवा लिया गया था.  यह घटनाक्रम कुछ इस तरह से था कि 24 दिसंबर, 1999 को 5 हथियारबंद आतंकवादियों ने 178 यात्रियों के साथ इंडियन एयरलाइंस के आईसी-814 विमान को काठमांडू से हाइजैक कर लिया था. वे उसे अफगानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर ले गए. वहां 25 साल के भारतीय नागरिक रूपेन कत्याल की हत्या कर के उस के शव को प्लेन से बाहर फेंक दिया गया था.

आतंकियों ने भारत के सामने 178 यात्रियों की हिफाजत के बदले 3 आतंकियों की रिहाई का सौदा किया. उस वक्त की वाजपेयी सरकार ने पैसेंजरों की जान बचाने के लिए तीनों आतंकियों को छोड़ने का फैसला किया. तब भारत की जेलों में बंद आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर व अहमद उमर सईद शेख को कंधार ले जा कर रिहा किया गया था.

बहरहाल, ताजा पठानकोट आतंकी हमले की छानबीन में यह बात सामने आई है कि हमला करने वाले आतंकवादी अपने पाकिस्तानी आकाओं से निरंतर संपर्क में थे. उन आकाओं ने इन आतंकवादियों के लिए पाकिस्तानी फोन नंबर का इस्तेमाल कर एक टोयोटा इनोवा टैक्सी की व्यवस्था की थी. रास्ते में टैक्सी का रिम खराब होने के कारण आतंकवादी उस से उतर गए थे. उस के बाद उन्होंने एसपी सलविंदर सिंह से उन की गाड़ी छीन ली. उन का मोबाइल फोन भी छीन लिया गया, जिस से एक आतंकवादी ने पाकिस्तान बात की थी.

खैर, पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले से एक बार तो लगा कि अंदर घुसे सभी आतंकवादियों का सफाया कर दिया गया है, मगर 3 जनवरी को गोलियां चलने का क्रम फिर से शुरू हो गया. अचानक बनी इस स्थिति से यह अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा था कि एयरबेस में अभी कितने और आतंकी छिपे हैं और उन के पास किस तरह के हथियार हैं, कैसी विस्फोटक सामग्री है? अभी तक तो यही समझा जा रहा था कि कुल 5 आतंकवादी थे और वे मारे जा चुके हैं.

उस दिन एक अति दुखद घटना यह घटी कि एक आतंकी की लाश को हटाते वक्त भयानक विस्फोट हुआ, जिस में एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन ई. कुमार शहीद हो गए. साथ ही 6 कमांडो भी गंभीर रूप से घायल हो गए. रविवार सुबह करीब साढ़े 8 बजे लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन एनएसजी के कमांडो के साथ एक आतंकी का शव उठवाने गए थे. तभी आतंकी के शव पर लगे आईईडी में विस्फोट हो गया था. अब तक 5  आतंकियों के मारे जाने का अनुमान था, जिन में से 4 के शव बरामद कर लिए गए थे. जबकि वायु सेना के शहीद हुए जवानों की संख्या 7 तक पहुंच गई थी.

लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन पर एनएसजी (नैशनल सिक्योरिटी गार्ड) को ही नहीं, पूरी आर्म्ड फोर्स को नाज था. उन का जन्म बंगलुरू में बीईएमएल के अधिकारी ई.के. शिवरंजन के यहां हुआ था. उनके 2 भाई व 1 बहन हैं. मां का निधन बचपन में ही हो गया था. निरंजन अपने पीछे विधवा डा. के.जी. राधिका व 2 साल की बेटी विस्मय को छोड़ गए हैं. निरंजन एनएसजी के बम निरोधक दस्ते के सदस्य थे. पठानकोट एयरबेस में वह एनएसजी की टीम को लीड कर रहे थे. एयरबेस में सुरक्षाबलों व आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ अभी भी जारी थी. इस बीच शहीद हुए शूरवीरों की शौर्यगाथाएं भी बाहर आने लगी थीं.

गरनाला, अंबाला सिटी के रहने वाले 28 वर्षीय गुरसेवक सिंह अपने फौजी पिता व बड़े भाई की तरह करीब 6 साल पहले भारतीय वायु सेना में भरती हुए थे. बचपन से ही दिलेर रहे गुरसेवक को एयरफोर्स की गरुड़ कमांडो विंग का हिस्सा बनते देर नहीं लगी. अपनी इस नौकरी से वह बहुत खुश थे. उन की शादी 18 नवंबर, 2015 को कुराली की रहने वाली जसप्रीत कौर से हुई थी. लंबी छुट्टी काटने के बाद उन्होंने 20 दिसंबर को फिर से अपनी ड्यूटी जौइन की थी. पहली जनवरी, शुक्रवार की आधी रात में ही उन्हें पठानकोट एयरबेस पहुंचने का आदेश मिला और वह अपनी टीम के साथ तत्काल वहां के लिए कूच कर गए.

अगले दिन बहादुरी दिखाते हुए उन्होंने अपनी जान देश पर न्यौछावर कर दी. त्रासदी यह कि उन की विधवा जसप्रीत कौर के हाथों की मेहंदी भी अभी नहीं छूट पाई थी. ऐसे ही डीएससी कोर के सिपाही संजीव कुमार राणा, जगदीशचंद व करतार सिंह भी अपनी जांबाजी के सबूत दे कर वतन के लिए जान दे कर अपनी शौर्यगाथाएं छोड़ गए. 4 आतंकियों की पहली टुकड़ी ने जब एयरबेस की मैस में घुस कर फायरिंग शुरू की थी, तब जगदीशचंद खाना बना रहे थे.

उन की आंखों के सामने आतंकियों ने 3 जवानों को मौत के घाट उतार दिया तो जगदीश निहत्थे ही आतंकियों के पीछे दौड़ पड़े. एक आतंकी की राइफल छीन कर उस पर गोलियों की बौछार करते हुए उसे मौत के घाट उतारने के बाद वह दूसरे आतंकी की ओर बढ़े. मगर तब तक बाकी बचे तीनों आतंकियों ने उन्हें घेर लिया था. तीनों ने एक साथ उन पर इतनी गोलियां चलाईं कि उन का पूरा जिस्म गोलियों से छलनी हो गया. इस आतंकवादी घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है.

पाकिस्तानी मीडिया का कहना है कि भारतीय वायु सेना के प्रमुख अड्डे पर हुआ यह आतंकी हमला दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता की राह में रोड़ा साबित होगा. भारतीय मीडिया की भी यही राय है. यह हमला चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की औचक लाहौर यात्रा के एक हफ्ता बाद हुआ था, इसलिए इसे पुरानी घटनाओं से जोड़ते हुए पाकिस्तान की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं. बहरहाल, पठानकोट एयरबेस में तीसरे दिन भी मुठभेड़ जारी रही. सुरक्षाबलों ने उस इमारत को टैंक से उड़ा दिया, जिस में आतंकवादियों के छिपे होने की आशंका थी. इस प्रयास में एक आतंकवादी का शव मिला, जबकि वहां और भी आतंकवादियों के छिपे होने का अनुमान था.

आतंकवादी हमले के पीछे की पूरी साजिश की जांच के लिए एनआईए ने 4 जनवरी को 3 मामले दर्ज कर के पुलिस अधीक्षक रैंक की अगुवाई में एक विशेष टीम का गठन किया. 5 जनवरी को देश के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पठानकोट पहुंच कर संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया और इस बात की घोषणा की कि एयरबेस में घुसे सभी 6 आतंकियों को मार गिराया गया है. अब कौंबिंग औपरेशन को अंजाम दिया जा रहा है.

6 जनवरी को चंडीमंदिर स्थित वैस्टर्न कमांड के मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल के.जी. सिंह ने बताया कि इस औपरेशन को इसलिए सफलतम कहा जा सकता है, क्योंकि इसे अंजाम देते वक्त करीब 11 हजार आम नागरिकों व 23 विदेशी नागरिकों की जिंदगी बचाने में भी सफलता मिली है. उल्लेखनीय है कि इस एयरबेस में लगभग 3 हजार परिवार रहते हैं और 4 मित्र देशों के 23 सैनिक प्रशिक्षण के लिए यहां आए हुए थे.

जांच एजेंसियां इस हमले की गहराई में जाने को पूरी तरह प्रयासरत हैं. जांच एजेंसियों का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने गुरदासपुर के पुलिस अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं पर विचार करने के लिए 1 जनवरी, 2016 को शाम साढ़े 7 बजे बैठक बुलाई थी, जबकि आतंकी तब तक वायु सेना परिसर के निकट पहुंच चुके थे.

जांचकर्ताओं के अनुसार, यह तो तय है कि आतंकी पाकिस्तान से ही आए थे. वायु सेना हवाईअड्डे पर थर्मल इमेजिज उपकरण में लगे कैमरे में जो तसवीरें कैद हुई हैं, उन्होंने भी जांच एजेंसियों की काफी मदद की है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के कुछ अधिकारियों का मानना है कि पहली जनवरी को आतंकियों के पास तीनों मोबाइल फोन एक्टिव रहे. इन में एक फोन ज्वैलर राजेश वर्मा का था, जिस से पाकिस्तान में काल की गई थी. दूसरा फोन एसपी सलविंदर सिंह व तीसरा उन के रसोइए मदनगोपाल का था. एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या 10 घंटे तक पठानकोट हवाईअड्डे के निकट आतंकियों को स्थानीय मदद मिली थी. एनआईए का मानना है कि मृत आतंकियों की वस्तुओं को देखने से पता चलता है कि वे बहावलपुर से संबंध रखते हैं, जोकि जैशएमोहम्मद का मुख्यालय है.

जांचकर्ताओं के लिए यह जांच का मुख्य मुद्दा है कि 1 जनवरी की सुबह पठानकोट पहुंचे आतंकी मध्यरात्रि तक वायु सेना परिसर में दाखिल होने का इंतजार करते रहे. इन 10 घंटों केदौरान वे कहां रुके, इस का पता लगाया जाना निहायत जरूरी है. इसी से यह बात सामने आ सकती है कि क्या इन आतंकियों को वहां रुकने में किसी ने मदद की थी.

आईबी (इंटेलीजेंस ब्यूरो) ने बीएसएफ व पंजाब पुलिस को 3 महीनों में 3 अलगअलग अलर्ट भेजे थे, जिन में आतंकियों की संभावित घुसपैठ का उल्लेख किया गया था. इन संदेशों में यह भी बताया गया था कि कितने आतंकी घुसपैठ करने को तैयार बैठे हैं. सब से ताजा अलर्ट में कहा गया था कि औटोमैटिक हथियारों व हैंडग्रेनेड के साथ 6 आतंकी पाकिस्तानी पंजाब के मसरूर बड़ा भाई गांव में बैठे हुए हैं तथा भारत में दाखिल हो कर तबाही मचाने की सोच रहे हैं. हालांकि इस अलर्ट में यह नहीं बताया गया था कि ये आतंकी किस दिन, किस वक्त व भारत के किस क्षेत्र में दाखिल होंगे. इतना जरूर कहा गया था कि ये आतंकी घुसपैठ के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं तथा उत्तरी पंजाब के हिस्से बमियाल से घुसपैठ कर सकते हैं.

इस से पहले अक्तूबर व नवंबर महीने में भी अलर्ट भेजे गए थे. इंटेलीजेंस अधिकारियों का कहना है कि आतंकियों की घुसपैठ के सही दिन के बारे में बताना कठिन होता है. वे उचित समय की प्रतीक्षा में रहते हैं और अंतिम समय में ही एकदम से घुसपैठ करते हैं. मसरूर बड़ा भाई गांव बमियाल से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां आतंकवादी यदाकदा जमा होते रहते हैं. एजेंसियों का यह भी मानना है कि गुरदासपुर के दीनानगर पर हमला करने वाले पाक आतंकी भी भारत में दाखिल होने से पहले मसरूर बड़ा भाई गांव में रुके थे. वे बमियाल क्षेत्र के साथ लगते नाले की आड़ में भारत में घुसे थे.

इस संबंध में सीमा सुरक्षा बल का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में उन के जवान 24 घंटे अलर्ट रहते हैं. दूसरी ओर इंटेलीजेंस की तरफ से अलर्ट अकसर मिलते रहते हैं. यों मारे गए 6 आतंकियों के बाद अब एनआईए टीम ने विधिवत जांच शुरू कर दी है. जांच एवं सुरक्षा एजेंसियों के लिए सब से बड़ा प्रश्न उस रूट का पता लगाना था, जिसे आतंकियों ने पठानकोट पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया था. फिलहाल इन एजेंसियों की निगाह बमियाल में पड़ने वाली उज्ज नदी पर जमी है. इस नदी के साथ ही खूनी नाला पड़ता है, जो सीधा पाकिस्तान की सीमा से मिलता है.

इस खूनी नाले के किनारे पर जसपाल सिंह की जमीन है, जिस ने जांच एजेंसियों को अपने खेतों में जूतों के अजीब तरह के निशान दिखाए थे. इन निशानों पर अंगरेजी के कुछ शब्द अंकित थे. जांच एजेंसी ने इन निशानों को आतंकवादियों से जोड़ कर देखा. यह रूट आतंकियों द्वारा अपनाया गया हो सकता था, क्योंकि ये निशान खूनी नाले के बीच में तथा भारतपाक सीमा से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पाए गए थे. यहां पर यह बताना तर्कसंगत रहेगा कि मृतक ड्राइवर इकागर सिंह के मामा के घर की ओर भी यही रास्ता जाता था. इकागर के घर वालों ने भी बताया था कि वह घटना की रात साढ़े 9 बजे अपने मामा के घर की ओर गया था.

बहरहाल, जांच पूरी होने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है. इस आतंकवादी घटना से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा आलोचना के घेरे में आ गई है. इसी के मद्देनजर 7 जनवरी, 2016 को भारत की ओर से पाकिस्तान पर दबाव बनाते हुए स्पष्ट कर दिया गया कि पठानकोट हमले के उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों पर त्वरित और निर्णायक काररवाई के बाद ही द्विपक्षीय बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ सकता है. इस के साथ ही हमले में शामिल आतंकियों के आकाओं के रूप में इन नामों की सूची पाकिस्तान को सौंप दी गई थी—जैशएमोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, उस का भाई अब्दुल रऊफ असगर, अशफाक एवं कासिम. यह भी बताया गया है कि हमले की साजिश लाहौर के पास रची गई थी.

इस सिलसिले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उसी दिन इस सिलसिले में एक उच्चस्तरीय मीटिंग बुला कर पठानकोट आतंकी हमले पर वार्ता की. उन्होंने अपने अधिकारियों की ओर से इस बात की पुष्टि चाही कि वे भारत द्वारा सौंपे गए सबूतों पर त्वरित काररवाई करते हुए जरूरी एक्शन लेंगे. इस आतंकी हमले में आतंकवादियों की ड्रग तस्करों से गठजोड़ की भी जांच हो रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 जनवरी को पठानकोट पहुंच कर स्थिति का जायजा लेने के साथ यहां के जवानों की पीठ भी ठोंकी. आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सुरक्षा बल की हौसलाअफजाई की. उसी दिन अमेरिका ने पाकिस्तान को चेताया कि वह पठानकोट एयरबेस पर हमला करने वाले आतंकियों के खिलाफ त्वरित काररवाई करे.

छहों मृत आतंकियों के शवों को पोस्टमार्टम करने के बाद उन के डीएनए टेस्ट के लिए भेज कर शवों को कड़ी सुरक्षा के बीच शवगृह में रखवा दिया गया. पुलिस प्रशासन द्वारा पठानकोट में आर्मी की वर्दी की खुले में बिक्री पर सख्त रोक लगा दी गई. भारत ने इस हमले के जो सबूत पाकिस्तान को सौंपे थे, वे यूके, यूएसए, जापान, फ्रांस व दक्षिण कोरिया को भी भेजे गए हैं. इन देशों ने भी भारत को भरोसा दिलाया है कि वे पाकिस्तान पर जांच में तेजी लाने के लिए दबाव बनाएंगे. भारत की कोशिशों का असर दिखा भी.

अमेरिकी विदेश मंत्री जौन कैरी ने पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से फोन पर बात की. इस बातचीत में शरीफ ने भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान जल्द ही पठानकोट हमले का सच सामने लाएगा. लेकिन 11 जनवरी को पाकिस्तान ने भारत की ओर से हासिल सबूतों को नकार दिया. उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान को 2 फोन नंबर सौंपे थे +92-1017775253 और +92-3000597212. भारत का दावा था कि ये नंबर पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों के थे, जिन पर पठानकोट हमले से जुड़े आतंकियों ने बात की थी. मगर पाकिस्तान की ओर से साफ कह दिया गया कि ये नंबर पाकिस्तान में रजिस्टर्ड नहीं हैं.

अंतत: पाकिस्तान पर अमेरिका और भारत का दबाव काम आया. पाक पीएम नवाज शरीफ ने पठानकोट के एयरबेस पर हुए हमले की जांच के लिए संयुक्त टीम बनाने के आदेश दे दिए. इस टीम में पाकिस्तान आईबी, आईएसआई, मिलिट्री इंटेलीजेंस और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. नवाज शरीफ ने दावा किया कि वह पठानकोट हमले को ले कर काफी गंभीर हैं. उन्होंने सख्त रवैया अख्तियार कर लिया है. वह इस हमले की तह तक जा कर यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता कौन है, इस संबंध में उन्होंने अपने आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ से भी बात की.

पाकिस्तानी खबरिया चैनल एआरवाई न्यूज ने इस बारे में अपनी एक खबर के माध्यम से कहा कि इस सिलसिले में कुछ गिरफ्तारियां हुई हैँ, लेकिन पुलिस ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि  ये गिरफ्तारियां पठानकोट हमले के सिलसिले में हुई हैं. चैनल ने समाचार प्रसारित करते हुए यह भी कहा कि इन संदिग्धों को गिरफ्तार कर के पूछताछ के लिए अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है.

11 जनवरी को दिल्ली में संपन्न 68वें आर्मी डे पर आयोजित समारोह में भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पठानकोट एयरबेस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बोलते हुए कहा कि अगर कोई इस देश को नुकसान पहुंचा रहा है तो उस शख्स और संगठन को भी वैसा ही दर्द झेलना होगा. पठानकोट हमले को अमेरिका ने बेहद गंभीरता से लिया है. 12 जनवरी को उस ने पाकिस्तान को झटका देते हुए 8 एफ-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री रोक दी. इसी दिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि पाक पर अविश्वास नहीं, मगर इन हालात के बीच विदेश सचिव स्तरीय बातचीत फिलहाल टाल देना ही ठीक है. 14 जनवरी, 2016 को पाकिस्तान से धमाकेदार खबर आई कि पठानकोट हमले के मास्टरमाइंड और जैश के सरगना मसूद अजहर को बहावलपुर से 10 अन्य कथित आतंकियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया है.

खबर में यह भी बताया गया कि पठानकोट हमले के संबंध में वांछित आरोपियों को पकड़ने के लिए न केवल ताबड़तोड़ छापेमारी की जा रही है, बल्कि पाकिस्तान का विशेष जांच दल भी पठानकोट जाएगा. इस के अगले ही दिन पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस से इनकार करते हुए कहा कि उसे मसूद की गिरफ्तारी की कोई जानकारी नहीं है. भारतपाक विदेश सचिवों की वार्ता भी फिलहाल टल गई है. 15 जनवरी को पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के कानून मंत्री राणा सनाउल्लाह ने साफ किया कि मसूद को गिरफ्तार नहीं किया गया है, बल्कि उसे ऐहतियातन हिरासत (प्रोटेक्टिव कस्टडी) में रखा गया है.

इस पर 16 जनवरी को जयपुर में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक सवाल के जवाब में कहा, ‘‘बहुत हुआ, सहने की जो क्षमता इस देश की थी, वह खत्म हो गई है. रक्षामंत्री के तौर पर मेरी भी यह क्षमता खत्म हो गई है. अब तो अगले एक साल में दुनिया इस के नतीजे देखेगी.’  फिलहाल, जांच एजेंसियों की छानबीन तो इस ओर इशारा कर रही है कि आतंकियों की मदद करने वाले पंजाब में ही बैठे वे घर के भेदी हैं, जो पैसों के लालच में अपना ईमान तक बेचने से नहीं हिचकते. आतंकियों के मारे जाने के बाद एयरबेस से जो असलहा एवं गोलाबारूद बरामद हुआ है, उस का वजन एक क्विंटल से ज्यादा है.

एयरबेस तक आतंकियों को पहुंचाने वाले एक गाइड का सुराग भी जांच एजेंसियों को मिला है. हनीट्रैप में फंस कर अपने ही देश से गद्दारी पर उतारू सुनील व रंजीत वगैरह पहले ही संदेह के घेरे में आ चुके हैं. इन्हें फिर से कस्टडी में ले कर व्यापक पूछताछ की तैयारी चल रही है. एसपी सलविंदर सिंह व उन के साथी भी संदेह के घेरे में हैं. नैशनल इन्वैस्टीगेशन एजेंसी इन से कई बार पूछताछ कर चुकी है. इन का लाई डिटेक्टर टेस्ट भी करवाया गया है. एनआईए को इस काररवाई से महत्त्वपूर्ण सूचनाएं मिली एनआईए का दावा है कि बिना भीतर की मदद के बाहर से आए आतंकवादी इतने खतरनाक हमले की योजनाएं नहीं बना सकते.

मारे गए आतंकियों के शवों के पोस्टमार्टम कर इन के पार्ट्स डीएनए के लिए भेजे गए हैं. शवों को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है. इन आतंकियों की उम्र 20 से 30 वर्ष के बीच थी. इन के फिंगरप्रिंट भी संरक्षित कर लिए गए हैं. इन लाशों का क्या किया जाना है, यह गृह मंत्रालय तय करेगा. फिलहाल पठानकोट के सिविल अस्पताल के मोर्चरी विभाग में शवों को सुरक्षित रख कर ताला लगा दिया गया है और वहां कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था कर दी गई है.

एसपी सलविंदर सिंह के बारे में बताया गया है कि एनआईए की पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया है कि वह ड्रग माफिया की खेप पार करवाने के लिए उन से हीरे लिया करता था, जिन की जांच उस का ज्वैलर दोस्त राजेश वर्मा किया करता था. उस रात भी एसपी निकला तो इसी काम के लिए था, मगर उन का सामना हो गया आतंकवादियों से. गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के बताए अनुसार, 40 से अधिक संवेदनशीन जगहों पर लेजर दीवारें खड़ी कर के किसी भी तरह की घुसपैठ से निजात हासिल कर ली जाएगी. Pathankot Attack