Crime News: मां का इश्क चढ़ा परवान – बेटे को उतारा मौत के घाट

Crime News: 10 अगस्त को भागवत नाम के एक बुजुर्ग व्यक्ति की शिकायत सुन कर थाना समानपुर के प्रभारी उमाशंकर यादव सन्न रह गए. उन्होंने हैरत से उस बुजुर्ग पर नाराजगी जताते हुए कहा, ‘‘क्या अनापशनाप बोल रहे हो? ऐसा भी भला कहीं होता है क्या?’’

‘‘जी साहब, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी बहू कविता ने ही 15 साल के अपने बेटे को मारा है क्योंकि वह बदचलन है,’’ बुजुर्ग विश्वास दिलाते हुए बोला.

‘‘तुम्हारे पोते की लाश कहां है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साबजी, लाश दफना दी गई है. आप उस का पोस्टमार्टम करवा लेंगे तो सच्चाई सामने आ जाएगी,’’ बुजुर्ग बोले.

थानाप्रभारी यादव को जब बुजुर्ग भागवत ने अपनी बहू कविता के बारे में विस्तार से जानकारी दी तो वह माजरा समझ गए. भागवत ने थानाप्रभारी को जो कुछ बताया, वह इस प्रकार है—

3 अगस्त, 2021 की सुबह 9 साढ़े 9 बजे के करीब भागवत को अपने 15 वर्षीय पोते सोनू की मृत्यु की खबर मिली थी. सोनू अपने गांव में ही अपनी मां कविता के साथ रहता था. वह घर पास में ही था. कविता का पति शिवराज घर वालों से अलग गांव के बाहर ही रहता था. काम की वजह से उस का आसपास गांवों में आनाजाना लगा रहता था. वह अपने पिता से 8-10 दिनों बाद मिलने आ जाया करता था. शिवराज डिंडोरी में पिछले कुछ महीने से रह रहा था. उस के अलग रहने का कारण उस की पत्नी कविता ही थी. वह उस के व्यवहार और आचरण से वह दुखी था.

भागवत की बातें सुनने के बाद थानाप्रभारी यादव ने मामले को गंभीरता से लिया. उन्होंने इस की जानकारी एसपी संजय कुमार सिंह को दी. उस के बाद अदालत के आदेश पर सोनू की दफन लाश को निकलवा कर उस का पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम से यह स्पष्ट हो गया कि उस की मृत्यु किसी बीमारी से नहीं, बल्कि सिर में चोट लगने से हुई थी. पोस्टमार्टम में हत्या की बात सामने आते ही पुलिस ने तुरंत सोनू की मां कविता और उस के तथाकथित प्रेमी लालसिंह को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. उन से सख्ती से पूछताछ की गई.

थाने में उन के खिलाफ सबूत होने की बात कही गई तो कविता ने भी सोनू की मौत से जुड़ी सारी बातें बता दीं. इस के बाद सोनू की हत्या का सच कुछ इस प्रकार सामने आया—

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कविता की जब शिवराज के साथ शादी हुई थी, तब वह मात्र 16-17 साल की थी. आदिवासी परिवार में जन्मी कविता सांवली हो कर भी काफी सुंदर दिखती थी. उस के जैसा समाज में दूरदूर तक कोई नहीं था. उस की नाकनक्श, बड़ीबड़ी आंखें, काले लहराते केश, उन्नत उभार, सुडौल मांसल देह के कमर की लचक आदि पहली नजर में ही किसी को भी आकर्षित करने के लिए काफी थी. इसलिए उस के चाहने वालों की कमी नहीं थी. इस में कविता को भी अच्छा लगता था कि वह कइयों की पसंद बन चुकी है. वह गांव में सभी से हंसबोल कर बातें करती थी, लेकिन किसी को अपने करीब आने से रोकने में भी चतुर थी. बड़ी चतुराई से अपने दीवानों से पल्ला झाड़ लिया करती थी.

शिवराज की दुलहन बनने के बाद कविता और भी बेफिक्री के साथ कभी अपने मायके तो कभी ससुराल आतीजाती रहती थी. क्योंकि उस की ससुराल मायके के पास स्थित गांव में ही थी. बहुत जल्द ही उस के अल्हड़पन से ससुराल के युवक और दूसरे उम्रदराज मर्द भी परिचित हो गए थे. उस पर प्यार का भूत सवार हो चुका था. वह चाहती थी कि पति शिवराज हमेशा उस के साथ रहे. सारे कामधंधे को छोड़ उस की मरजी के मुताबिक उस के साथ बना रहे. और वह हमेशा शिवराज की बाहों में ही सिमटी रहे.

लेकिन रोज खानेकमाने वाले शिवराज के लिए यह कतई संभव नहीं था. कविता तन की प्यासी थी, जबकि उस का पति शिवराज पेट की आग बुझाने की चिंता में घुलता रहता था. उस ने प्यार से कविता को समझाया कि वह उस के साथ हमेशा कमरे में ही बंद रहेगा तो उन का और परिवार का पेट कैसे भरेगा. कविता को शिवराज की बातों का कोई असर नहीं होता था. तन की प्यासी कविता अपने मन को नहीं समझा पाई. नतीजा यह हुआ कि वह दूसरी राह तलाशने लगी. सुंदर तो वह थी ही, इसलिए ससुराल के गांव में भी उस के चाहने वालों की कमी नहीं थी.

फिर क्या था, उस ने शिवराज की गैरमौजूदगी का नाजायज फायदा उठाया और कई युवकों से संबंध बना लिए. किसी के साथ मजेदार बातें कर दिल बहलाया तो किसी के साथ हमबिस्तर हो कर तनमन की प्यास बुझाई. इस की जानकारी जल्द ही शिवराज के मातापिता को भी हो गई. लोग गांव में ही दबी जुबान से कविता की बदचलनी की चर्चा करने लगे. भागवत को इस से काफी दुख पहुंचा. भागवत ने बहू पर लगाम लगाने की कोशिश की. किंतु कोई नतीजा नहीं निकला. उल्टे घर में आए दिन विवाद होने लगा. फिर एक दिन विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि शिवराज और कविता गांव में ही अलग रहने लगे.

अपनी ससुराल के घर से अलग रहना कविता के लिए यह और भी अच्छी बात हुई. उस की एक तरह से मन की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई थी. संयोग से पड़ोस में ही रहने वाले लालसिंह को वह पहले से जानती थी. वह भी कविता का आशिक बना हुआ था, लेकिन उस ने कभी भी अपनी मंशा जाहिर नहीं की थी. कविता के पड़ोस में आने पर एक दिन उस ने मौका पा कर अपने दिल की बात कह डाली. बदले में छोटीमोटी जरूरतों के लिए घर और बाजार के काम में वह उस की मदद करने लगा. इस तरह से वह शिवराज का दोस्त बन गया. संयोग से दोनों शराब के प्रेमी थे. अभी तक शिवराज घर से बाहर ही शराब पीता था, लेकिन लालसिंह के कहने पर शिवराज घर पर ही शराब पीने लगा.

लालसिंह उस के लिए शराब लाया करता था. दोनों शराब की पार्टी करने लगे. शिवराज और लालसिंह के साथसाथ कविता भी शराब पीने लगी. उधर कविता ने मर्दों की आशिकी और मतलबी दुनिया को काफी नजदीक से देखा था. इसलिए वह जल्द ही लालसिंह की मंशा को भी भांप गई. एक समय ऐसा भी आया जब लालसिंह ने शिवराज को नशे में धुत कर दिया और कविता को अपनी बाहों में भर लिया. कविता इसी इंतजार में थी. उस की मंशा पूरी हो गई.

गांव में काम नहीं मिलने की स्थिति में शिवराज मजदूरी करने के लिए कई हफ्तों और महीनों तक बाहर रहता था. इस का फायदा उठाकर कविता की रातें लालसिंह के जरिए ही रंगीन होती थी. समय बीतते देर नहीं लगती है. कविता एक बच्चे की मां बनी और धीरेधीरे उस का बेटा सोनू 15 साल को भी हो गया. फिर भी कविता के चालचलन में कमी नहीं आई. थोड़ा फर्क यह हुआ कि अब वह शिवराज के अलावा सिर्फ लालसिंह की ही चहेती थी. एक के लिए वैध बीवी थी, तो दूसरे के साथ अवैध रखैल की जिंदगी से खुश थी. उसे भी शराब की लत लग चुकी थी.

उधर उस का बेटा सोनू किशोरावस्था में पहुंच चुका था. उस का लगाव जितना अपनी मां और पिता से नहीं था, उस से कहीं अधिक वह दादादादी के करीब था. उस का ज्यादा समय दादादादी के साथ ही बीतता था. वे भी सोनू को बहुत प्यार करते थे. वह कभीकभार ही अपने घर जाता था. कविता के लिए यह और भी अच्छा था. क्योंकि लालसिंह बेफिक्री से उस के पास आताजाता था. सोनू के दादा भागवत को भी कविता और लालसिंह के संबंधों के बारे में भनक लग चुकी थी. इस कारण वह रात के समय सोनू को अपनी मां के पास सोने के लिए भेजने लगे थे.

इसे ले कर कविता और लालसिंह के अवैध संबंधों की जिंदगी में खलल पड़ने लगी. कविता ने जल्द ही इस का हल निकाल लिया. वह बेटे सोनू के सो जाने के बाद लालसिंह को पीछे के दरवाजे से घर बुलाने लगी. सब कुछ पहले जैसा चलने लगा. घटना 2 अगस्त, 2021 की है. सोनू अपने नियत समय पर मां कविता के पास आया और सीधे अपने कमरे में सोने के लिए चला गया. आधी रात होने पर लालसिंह शराब की बोतल ले कर कविता के पास पहुंचा. दोनों ने पहले बोतल खाली की, फिर अय्याशी के नशे मे डूब गए.

उस रोज कविता को कुछ ज्यादा ही नशा हो गया था. इसलिए उसे इस बात का ध्यान नहीं रहा कि उस का किशोर उम्र का बेटा भी घर में मौजूद है. नशे में दोनों कुछ ज्यादा ही मस्ती करने लगे, जिस से शोर होने पर सोनू की नींद टूट गई. उसे मां अपने कमरे में नहीं दिखी तो वह पास वाले दूसरे कमरे में चला गया. कमरे के खुले दरवाजे पर जा कर उस ने जो देखा तो उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. मां और पड़ोस के काका लालसिंह को निर्वस्त्र लिपटे देख कर वह सन्न रह गया.

सोनू इतना तो समझ ही गया था कि उस की आंखों के सामने जो कुछ था, वह गलत था. वह समझ नहीं पाया कि क्या करे. वह तुरंत वहां से भाग कर अपने बिस्तर में आ कर एक चादर के नीचे दुबक गया. दरवाजे पर सोनू के आने और उस के हड़बड़ा कर भागने से हुई आवाज की आहट कविता और लालसिंह को भी हुई. वह समझ गए कि उन्हें सोनू ने देख लिया है. लालसिंह तुरंत कपड़े पहन कर भागने लगा, तो कविता ने उसे रोक दिया.

उस ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘सोनू ने हम दोनों को रंगेहाथों देख लिया है. सुबह होते ही वह सारी बात अपने दादादादी को बता देगा. उस के बाद बखेड़ा खड़ा हो जाएगा. फिर हम दोनों के खिलाफ कुछ भी कदम उठाए जा सकते हैं.’’

‘‘इस पर क्या किया जाए?’’ लालसिंह ने पूछा तो कविता चुपचाप उठी और कमरे में गई, वहां कोने से 2 लाठी निकाल लाई. एक लाठी लालसिंह को पकड़़ाई और दूसरी अपने हाथ में ले कर सोनू के कमरे की ओर जाने के लिए मुड़ी.

तब तक लालसिंह भी समझ चुका था कि आगे क्या करना है. कुछ पल में ही दोनों बिछावन पर चादर के नीचे बिस्तर में दुबके सोनू के कमरे में थे. उन्होंने एकदूसरे को देखा और एक साथ लाठी से उस के ऊपर वार करने लगे. लगातार लाठी की मार से सोनू की वहीं मृत्यु हो गई. यह देख कर कविता ने राहत की सांस ली. उस के बाद सुबह होते ही लालसिंह अपने घर चला गया और कविता ने फोन लगा कर अपने पति को बेटे सोनू के मौत की खबर दे दी. उस ने पति को बताया कि रात में उठी खांसी से उस की मौत हो गई. चूंकि सोनू किशोर था, इसलिए उस की लाश दफन कर दी गई थी.

कविता अपनी योजना मे सफल हो गई थी, लेकिन सोनू की मौत उस के दादा के गले नहीं उतर रही थी. इसलिए उन्होंने 8 दिन बाद थाने में जा कर अपना शक जाहिर करते हुए थानाप्रभारी से हत्या की शिकायत दर्ज की. उस के बाद पुलिस ने काररवाई कर आरोपी कविता और उस के प्रेमी लालसिंह के खिलाफ काररवाई कर उन दोनों को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Crime News

Illicit Relationship: ललिता की खतरनाक लीला – पति बना दुश्मन

Illicit Relationship: 32 वर्षीया ललिता झारखंड के कोडरमा जिले के गांव दौंलिया की रहने वाली थी. उस की मां का नाम राजवती और पिता का नाम दुल्ली था. वह 4 भाइयों की इकलौती बहन थी. इसलिए घर में सभी की लाडली थी. 16 साल की होते ही उस पर यौवन की बहारें मेहरबान हो गई थीं. बाद में समय ऐसा भी आया कि वह किसी प्रेमी की मजबूत बांहों का सहारा लेने की कल्पना करने लगी. गांव के कई नवयुवक ललिता पर फिदा थे.

ललिता भी अपनी पसंद के लड़के से नैन लड़ाने लगी. इस के बाद तो दिन प्रतिदिन उस की आकांक्षाएं बढ़ने लगीं तो अनेक लड़कों के साथ उस के नजदीकी संबंध हो गए. दुल्ली के कुछ शुभचिंतक उसे आईना दिखाने लगे, ‘‘तुम्हारी बेटी ने तो यारबाजी की हद कर दी. वह खुद तो खराब है, गांव के लड़कों को भी खराब कर रही है. लड़की जब दरदर भटकने की शौकीन हो जाए तो उसे किसी मजबूत खूंटे से बांध देना चाहिए. जितनी जल्दी हो सके, ललिता का विवाह कर दो, वरना तुम बहुत पछताओगे.’’

अपमान का घूंट पीने के बाद दुल्ली ने एक दिन ललिता को समझाया. उसी दौरान मां राजवती ने ललिता की पिटाई करते हुए चेतावनी दी, ‘‘आज के बाद तेरी कोई ऐसीवैसी बात सुनने को मिली तो मैं तुझे जिंदा जमीन में दफना दूंगी.’’

उस समय ललिता ने कसम खा कर किसी तरह अपनी मां को यकीन दिला दिया कि वह किसी लड़के से बात नहीं करेगी. ललिता बात की पक्की नहीं, बल्कि ख्वाहिशों की गुलाम थी. कुछ समय तक ललिता ने अपनी जवानी के अरमानों को कैद रखा, लेकिन अरमान बेलगाम हो कर उस के जिस्म को बेचैन करते तो वह अंकुश खो बैठी और फिर से लड़कों के साथ मटरगश्ती करने लगी. लेकिन यह मटरगश्ती अधिक दिनोें तक नहीं चल सकी. इस की वजह थी कि उस के पिता दुल्ली ने उस का रिश्ता तय कर दिया था.

ललिता का विवाह कोडरमा जनपद के ही गांव करौंजिया निवासी काली रविदास के बेटे सिकंदर रविदास से तय हुआ था. सिकंदर किसान था और एकदम सीधासादा इंसान था. लेकिन एक पैर से दिव्यांग था. उस का एक छोटा भाई जितेंद्र रविदास था. सिकंदर की उम्र विवाह योग्य हो चुकी थी, इसलिए ललिता का रिश्ता सिकंदर के लिए आया तो काली रविदास मना नहीं कर सके.

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12 साल पहले दोनों का विवाह बड़ी धूमधाम से हो गया. कालांतर में ललिता 3 बेटों की मां बन गई. विवाह के बाद से ही सिकंदर ललिता के साथ अलग मकान में रहने लगा था. सिकंदर का छोटा भाई जितेंद्र अपने मातापिता के साथ रहता था. सिकंदर दिव्यांग होने पर भी खेतों में दिनरात मेहनत करता रहता था. इसलिए जब वह घर पर आता तो थकान से चूर हो कर सो जाता था, जिस से ललिता की ख्वाहिशें अधूरी रह जाती थीं. पति के विमुख होने से ललिता बेचैन रहने लगी. इस स्थिति में कुछ औरतों के कदम गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं, ऐसा ही ललिता के साथ भी हुआ. अब उसे ऐसे शख्स की तलाश थी, जो उसे भरपूर प्यार दे और उस की भावनाओं की इज्जत करे.

उस शख्स की तलाश में उस की नजरों को अधिक भटकना नहीं पड़ा. घर में ही वह शख्स उसे मिल गया, वह था जितेंद्र. सिकंदर जहां अपने भविष्य के प्रति गंभीर तथा अपनी जिम्मेदारियों को समझने वाला था, वहीं जितेंद्र गैरजिम्मेदार था. जितेंद्र का किसी काम में मन नहीं लगता था. जितेंद्र की निगाहें ललिता पर शुरू से थीं. वह देवरभाभी के रिश्ते का फायदा उठा कर ललिता से हंसीमजाक भी करता रहता था.  जितेंद्र की नजरें अपनी ललिता भाभी का पीछा करती रहती थीं. दरअसल जितेंद्र ने ललिता को विवाह मंडप में जब पहली बार देखा था, तब से ही वह उस के हवास पर छाई हुई थी.

अपने बड़े भाई सिकंदर के भाग्य से उसे ईर्ष्या होने लगी थी. वह सोचता था कि ललिता जैसी सुंदरी के साथ उस का विवाह होना चाहिए था. काश! ललिता उसे पहले मिली होती तो वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाता और उस की जिंदगी इस तरह वीरान न होती, उस की जिंदगी में भी खुशियां होतीं. ललिता के रूप की आंच से आंखें सेंकने के लिए ही वह ललिता के घर के चक्कर लगाता. चूंकि वह घर का ही सदस्य था, इसलिए उस के आनेजाने और वहां हर समय बने रहने पर कोई शक नहीं करता था. जितेंद्र की नीयत साफ नहीं थी, इसलिए वह ललिता से आंखें लड़ा कर और हंसमुसकरा कर उस पर डोरे डाला करता था.

सिकंदर सुबह खेत पर जाता तो दीया बाती के समय ही लौट कर आता. जितेंद्र के दिमाग में अब तक ललिता के रूप का नशा पूरी तरह हावी हो गया था. इसलिए ललिता को पाने की चाह में उस के सिकंदर के घर के फेरे जरूरत से ज्यादा लगने लगे. ललिता घर पर अकेली होती थी, इसलिए जितेंद्र के पास मौके ही मौके थे. एक दिन जितेंद्र दोपहर के समय आया तो ललिता दोपहर के खाने में तहरी बनाने की तैयारी कर रही थी, जिस के लिए आलू व टमाटर काट रही थी. जितेंद्र ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘लगता है, आज अपने हाथों से स्वादिष्ट तहरी बनाने जा रही हो.’’

‘‘हां, खाने का इरादा है क्या?’’

‘‘मेरा ऐसा नसीब कहां, जो तुम्हारे हाथों का बना स्वादिष्ट खाना खा सकूं. नसीब तो सिकंदर भैया का है, जो आप जैसी रूपसी उन को पत्नी के रूप में मिलीं.’’

यह सुन कर ललिता मुसकान बिखेरती हुई बोली, ‘‘ठीक है, मुझ से विवाह कर के तुम्हारे भैया ने अपनी किस्मत चमका ली तो तुम भी किसी लड़की की मांग में सिंदूर भर कर अपनी किस्मत चमका लो.’’

‘‘मुझे कोई दूसरी नहीं, तुम पसंद हो. भाभी, अगर तुम तैयार हो तो मैं तुम्हारे साथ अपना घर बसाने को तैयार हूं.’’

ललिता जितेंद्र के रोज हावभाव पढ़ती रहती थी. इसलिए जान गई थी कि जितेंद्र के दिल में उस के लिए नाजुक एहसास है. लेकिन वह इस तरह चाहत जाहिर कर के उस से प्यार की सौगात मांगेगा, ललिता ने सोचा तक न था. अचानक सामने आई ऐसी असहज स्थिति से निपटने के लिए वह उस से आंखें चुराने लगी और कटी हुई सब्जी उठा कर रसोई की तरफ चल दी. तभी उस के बच्चे भी घर आ गए. प्यार में विघ्न पड़ता देख कर जितेंद्र भी वहां से उठ गया.

उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, वह ललिता के पास पहुंच जाता और अपने प्यार का विश्वास दिलाता. धीरेधीरे ललिता को उस के प्यार पर यकीन होने लगा. उसे भी अपने प्रति जितेंद्र की दीवानगी लुभाने लगी थी. उस की दीवानगी को देख कर ललिता के दिल में उस के लिए प्यार उमड़ पड़ा. कल तक जो ललिता जितेंद्र के हवास पर छाई थी, अब जितेंद्र ललिता के हवास पर छा गया. एक दिन जितेंद्र ने फिर से ललिता के सामने अपने प्यार का तराना सुनाया तो वह बोली, ‘‘जितेंद्र, मेरे प्यार की चाहत में पागल होने से तुम्हें क्या मिलेगा. मैं विवाहित होने के साथसाथ 3 बच्चों की मां भी हूं. इसलिए मुझे पाने की चाहत अपने दिल से निकाल दो.’’

‘‘यही तो मैं नहीं कर पा रहा, क्योंकि यह दिल पूरी तरह से तुम्हारे प्यार में गिरफ्तार है.’’

ललिता कुछ नहीं बोल सकी. जैसे उस के जेहन से शब्द ही मिट गए थे. जितेंद्र ने अपने हाथ उस के कंधे पर रख दिए, ‘‘भाभी, कब तक तुम अपने और मेरे दिल को जलाओगी. कुबूल कर लो, तुम्हें भी मुझ से प्यार है.’’

ललिता ने सिर झुका कर जितेंद्र की आंखों में देखा और फिर नजरें नीची कर लीं. प्रेम प्रदर्शन के लिए शब्द ही काफी नहीं होते, शारीरिक भाषा भी मायने रखती है. जितेंद्र समझ गया कि मुद्दत बाद सही, ललिता ने उस का प्यार कुबूल कर लिया है. उस ने ललिता के चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. ललिता भी सुधबुध खो कर जितेंद्र से लिपट गई. उस समय मन के मिलन के साथ तन की तासीर ऐसी थी कि ललिता का जिस्म पिघलने लगा.  इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. यह बात करीब 6 साल पहले की है. बाद में यह मौका मिलने पर चलता रहा.

13 मई, 2021 को दोपहर करीब 12 बजे सिकंदर दास लोचनपुर गांव के निजी कार चालक विजय दास के साथ चरवाडीह के संजय दास के यहां शादी समारोह में गया. सिकंदर और विजय दोनों कार से गए थे. कार विजय की थी. साढ़े 3 बजे शादी से दोनों निकल आए. लेकिन सिकंदर दास घर नहीं लौटा. उस के नंबर पर सिकंदर के चाचा ने फोन किया गया तो विजय ने उठाया. उस से पूछा गया कि सिकंदर कहां है तो विजय द्वारा अलगअलग ठिकाने का पता बताते हुए फोन काट दिया. इस के बाद सिकंदर की काफी तलाश की गई, वह नहीं मिला.

16 मई को ललिता ने कोडरमा के थानाप्रभारी और एसपी को एक पत्र दिया, जिस में उस ने अपने पति सिकंदर दास के लापता होने की बात लिखी. सिकंदर के गायब होने का आरोप उस ने कार चालक विजय दास पर लगाया था. चूंकि मामला चांदवारा थाना क्षेत्र के करौंजिया गांव का था. इसलिए एसपी पुलिस ने मामला चांदवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया. चांदवारा थाने के थानाप्रभारी सोनी प्रताप सिंह ने पूरा मामला जान कर थाने में सिकंदर की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

थानाप्रभारी सोनी प्रताप ने 20 मई को जामू खाड़ी से विजय दास को गिरफ्तार कर लिया. सख्ती से पुलिस ने पूछताछ की तो विजय ने सिकंदर की हत्या करने की बात स्वीकारी. उस ने इस हत्या में सिकंदर की पत्नी ललिता और भाई जितेंद्र का भी हाथ होने की बात बताई. 20 मई को विजय के बाद ललिता और जितेंद्र को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर रात में कोटवारडीह के बंद पड़े मकान से सिकंदर की लाश बरामद कर ली. वह अर्द्धनिर्मित मकान सिकंदर का था. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद चांदवारा थाने के थानाप्रभारी सोनी प्रताप सिंह अभियुक्तों को ले कर थाने आ गए. थाने में सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने हत्या के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी.

एक दोपहर को जितेंद्र और ललिता घर में बेधड़क रंगरलियां मना रहे थे कि अचानक किसी काम से सिकंदर खेतों से घर लौटा तो उस ने उन दोनों को रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. यह देख कर उसे एक बार तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि उस की पत्नी ऐसा भी कर सकती है. वह ललिता पर खुद से भी ज्यादा विश्वास करता था. लेकिन हकीकत तो सामने उस की दगाबाजी की तरफ इशारा कर रही थी. दूसरी ओर सगा छोटा भाई जितेंद्र था, जिसे वह बहुत प्यार करता था, उस का खूब खयाल रखता था. वही उस की गृहस्थी में आग लगा रहा था.

अपनों की इस दगाबाजी से सिकंदर इतना आहत हुआ कि उस ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया. ललिता और जितेंद्र ने भी उस से अपनी गलती की माफी मांग ली और भविष्य में ऐसा कुछ न करने का वादा किया तो सिकंदर शांत हुआ. जितेंद्र और ललिता ने उस समय तो अपनी जान छुड़ाने के लिए वादा कर दिया था, लेकिन वे इस पर अमल करने को कतई तैयार नहीं थे. लेकिन उन का भेद खुल चुका था, इसलिए मिलन में उन को बहुत ऐहतियात बरतनी पड़ती थी. वे चोरीछिपे फिर से मिल लेते थे.

सिकंदर ने देखा तो उस ने विरोध किया. मामला घर की चारदीवारी से निकल कर गांव के लोगों तक पहुंच गया. पंचायत तक बैठ गई. भरी पंचायत में ललिता ने जितेंद्र के साथ रहने की बात कही. लेकिन फैसला न हो सका. इस के बाद सिकंदर उन दोनों के बीच की एक बड़ी दीवार था, जिसे गिराए बिना वे हमेशा के लिए एक नहीं हो सकते थे. इसलिए ललिता और जितेंद्र ने सिकंदर की हत्या करने की ठान ली.

सिकंदर दास ने विजय दास से लोन दिलाने के नाम पर डेढ़ लाख रुपए लिए थे. सिकंदर ने जब लोन नहीं दिलाया तो विजय उस से अपने दिए रुपए वापस मांगने लगा. सिकंदर रुपए देने में टालमटोल कर रहा था. ऐसे में ललिता ने जितेंद्र से बात कर के विजय को अपने प्लान में शामिल करने की बात कही. उस ने यह भी कहा कि सिकंदर का काम तमाम होने के बाद वह अकेले विजय को उस की हत्या में फंसवा देगी, जिस से वे दोनों बच जाएंगे. जितेंद्र को उस की बात सही लगी. दोनों ने विजय से बात की तो वह सिकंदर की हत्या में उन दोनों का साथ देने को तैयार हो गया.

13 मई, 2021 को एक शादी समारोह से लौटने के बाद विजय सिकंदर को ले कर कोटवारडीह में उस के अर्धनिर्मित मकान पर ले गया. वहां ललिता और जितेंद्र पहले से मौजूद थे. तीनों ने मिल कर सिकंदर की गला दबा कर हत्या कर दी और लाश एक कमरे में डाल कर कमरा बंद कर दिया. लेकिन सिकंदर की हत्या में विजय को फंसाने की योजना ही ललिता और जितेंद्र को भारी पड़ गई. ललिता ने उस पर शक जताया तो पुलिस विजय को पकड़ कर उन तक पहुंच गई. तीनों अभियुक्तों के खिलाफ हत्या व साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर के चांदवारा पुलिस ने तीनों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. Illicit Relationship

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: ऊंचे ओहदे वाला रिश्ता – शक ने ली साक्षी की जान

True Crime Story: हर मातापिता की इच्छा होती है कि उन के बच्चे पढ़ाईलिखाई कर के आगे बढ़ें, उन की शादियां हों और वे अपनी दुनिया में खुश रहें. अशोक कुमार की बेटी साक्षी इंडियन आर्मी में मिलिट्री नर्सिंग सर्विसेज में लेफ्टिनेंट थी. साल 2017 में उस का सेलेक्शन हुआ था.

दिल्ली के तिलकनगर इलाके के रहने वाले अशोक कुमार को बेटी के आर्मी में सेलेक्शन के वक्त बधाइयां देने वालों का तांता लग गया था. तब वह खुशी से फूले नहीं समाए. जाहिर है यह बड़े गर्व की बात थी.

साक्षी की शादी नवनीत शर्मा के साथ हुई थी. नवनीत वायुसेना में स्क्वाड्रन लीडर थे. दोनों ही हरियाणा की अंबाला छावनी में तैनात थे. उन का 2 साल का एक बेटा भी था.

लोग अशोक कुमार को खुशनसीब इंसान मानते थे. कामयाब बेटी के पिता होने के नाते लोगों का सोचना भी ठीक था, लेकिन किसी इंसान की असल जिंदगी में क्या कुछ चल रहा होता है, इस बात को कोई नहीं जान पाता.

अशोक कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही था. बेटी को ले कर वह परेशान रहते थे. इस की बड़ी वजह यह थी कि बेटी का वैवाहिक जीवन उम्मीदों के विपरीत था. 20 जून, 2021 की रात का वक्त था, जब अशोक कुमार के मोबाइल पर साक्षी का फोन आया. उन्होंने बेटी से बात शुरू की.

‘‘हैलो! साक्षी बेटा कैसी हो?’’

‘‘पापा, यहां कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा, मैं बहुत परेशान हो चुकी हूं.’’ साक्षी के लहजे में परेशानी छिपी हुई थी, जिसे अशोक कुमार ने भांप लिया था.

उन्होंने धड़कते दिल से पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा?’’

‘‘पापा, नवनीत मुझे लगातार परेशान करते हैं, हद इतनी हो गई है कि मेरे साथ मारपीट भी की जाती है. पता नहीं कब तक ऐसा चलेगा.’’ वह बोली.

‘‘सब्र कर बेटा. समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. मैं समझाऊंगा उसे.’’ अशोक कुमार ने समझाया.

‘‘यह समझने वाले नहीं हैं. पता नहीं क्या होगा पापा. मैं बाद में बात करती हूं.’’ साक्षी ने सुबकते हुए फोन काट दिया.

बेटी की बातों से अशोक परेशान हो गए. उन्होंने अपने दामाद नवनीत का मोबाइल नंबर डायल किया, लेकिन कोई रिस्पांस नहीं मिला. उन्हें याद आया कि उन का नंबर दामाद ने ब्लौक किया हुआ था.

साक्षी भी यह बात अपने परिजनों को बता चुकी थी कि मायके वालों के नंबर ब्लौक लिस्ट में हैं.

इस के बाद उन्होंने साक्षी के ससुर चेतराम शर्मा को फोन किया, ‘‘भाईसाहब, आप ही बच्चों को समझाइए, काफी समय से यही सब चल रहा है. साक्षी का अभी फोन आया था और वह बता रही थी कि उस के साथ मारपीट भी की जा रही है.’’

‘‘देखिए भाईसाहब, यह उन का आपस का मामला है. नवनीत तो मेरी बात सुनता ही नहीं तो बताओ, मैं भी क्या कर सकता हूं.’’ चेतराम शर्मा बोले.

उन की बात सुन कर अशोक कुमार को बहुत निराशा हुई. इस से ज्यादा वह कर भी क्या कर सकते थे अलबत्ता वह चिंतित जरूर हो गए.

अशोक ने यह बात अपने बेटे सौरभ को बताई. उन का पूरा परिवार पूरी रात चैन की नींद नहीं सो सका. 21 जून की सुबह के करीब साढ़े 6 बजे नवनीत की मां लक्ष्मी का फोन आया और उन्होंने बताया कि साक्षी ने सुसाइड कर लिया है.

यह सुनते ही अशोक के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन का फोन केवल सूचनात्मक था. इस से ज्यादा उन्होंने कोई बात नहीं की. बेटी की मौत की खबर से अशोक के परिवार में कोहराम मच गया. आननफानन में पितापुत्र दिल्ली से अंबाला के लिए रवाना हो गए.

नवनीत और साक्षी रेसकोर्स स्थित आवास नंबर 115/04 में रहते थे. अशोक और सौरभ से वहां कोई बात करने को भी तैयार नहीं था. वह सीधे रेजीमेंट बाजार पुलिस चौकी पहुंचे और नवनीत व उस के परिजनों के खिलाफ बेटी को दहेज के लिए प्रताडि़त करने की तहरीर दे दी. पुलिस पहले ही इस मामले की तहकीकात में जुटी हुई थी.

दरअसल, पुलिस कंट्रोल रूम को 21 जून की सुबह इस घटना की सूचना मिली थी. कंट्रोल रूम से यह सूचना थाने को फ्लैश की गई. मामला हाईप्रोफाइल था, लिहाजा एसएसपी हमीद अख्तर ने अधीनस्थों को इस मामले में तत्काल सक्रिय होने के निर्देश दे दिए थे.

डीएसपी रामकुमार, इंसपेक्टर विजय व चौकी इंचार्ज कुशलपाल ने जांचपड़ताल शुरू की. पुलिस ने साक्षी के परिजनों की तहरीर पर दहेज उत्पीड़न की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. साक्षी के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. साथ ही उन के पति नवनीत को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

ओहदे थे ऊंचे पर जिंदगी थी नीरस

पुलिस की जांचपड़ताल और परिजनों से की गई पूछताछ में ऊंचे ओहदों के पीछे की ऐसी कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया. देश सेवा के लिए आर्मी जौइन करने वाली साक्षी की निजी जिंदगी में वास्तव में अंधेरा लिए हुए एक बड़ा तूफान चल रहा था.

साक्षी और नवनीत के बीच जानपहचान थी. पहले दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर यह दोस्ती प्यार में बदल गई. नवनीत का परिवार हरियाणा के पंचकूला जिले के पिंजोर कस्बे का रहने वाला था. नवनीत स्क्वाड्रन लीडर थे और साक्षी लेफ्टिनेंट. दोनों ही ऊंचे पद पर थे.

12 दिसंबर, 2018 को दोनों विवाह बंधन में बंध गए. साक्षी के परिजनों की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं थी. फिर भी उन्होंने अपनी हैसियत के अनुसार शादी में खर्च किया. शादी के बाद कुछ महीनों तक तो सब ठीक चलता रहा.

साक्षी ने एक बेटे को भी जन्म दिया. दोनों अच्छे पद पर थे. परिवार की खुशियों में चारचांद लगाने के लिए बेटा भी हो चुका था, लेकिन जिंदगी में कई बार पद और सुखसुविधाओं से खुशियों के मायने नहीं होते.

साक्षी और नवनीत के बीच मनमुटाव रहने लगा था. साक्षी ने शुरू में तो अपने परिवार में कुछ नहीं बताया, परंतु जब बात हद से ज्यादा बढ़ने लगी तो एक दिन उस ने अपने पिता को सारी बातें बताईं, ‘‘पापा, सोचा नहीं था कि ये लोग ऐसे होंगे.’’

बेटी की बात पर अशोक थोड़ा सकपका गए ‘‘मैं समझा नहीं बेटी?’’

‘‘पापा, ये लोग मुझे दहेज के लिए ताना मारते हैं. कभी कहते हैं कि गाड़ी नहीं दी, कभी कहते हैं कि रिश्तेदारों का मान नहीं रखा.’’ साक्षी ने बताया.

‘‘बेटी, इस से ज्यादा हम कर भी क्या सकते थे. तुम दोनों कमाते हो क्या किसी चीज की कोई कमी है. परिवार में यह सब बातें तो चलती रहती हैं. नवनीत को तुम समझाना.’’ अशोक ने कहा.

‘‘मैं ने बहुत समझाया है पापा, लाइफ को एडजस्ट तो बहुत कर रही हूं.’’ साक्षी बोली.

बेटी की बातें सुन कर अशोक कुमार को बहुत अफसोस हुआ. उन्होंने सोचा कि वक्त के साथ एक दिन सब ठीक हो जाएगा. यूं भी इंसान ऐसे मामलों में सकारात्मक ही सोचता है.

लालच ने घोली कड़वाहट

कहते हैं कि जब किसी परिवार में अनबन, शक और लालच जैसी चीजें घर कर जाएं, तो फिर कलह का वातावरण बन जाता है बिखराव बढ़ता चला जाता है. साक्षी के परिवार में भी ऐसा ही हो रहा था. साक्षी के पिता और भाई ने भी नवनीत को समझाया, लेकिन उन्होंने उन्हें परिवार के मामले में दखल  न देने की नसीहत दे डाली. साक्षी की जिंदगी में एक बार अनबन का सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर उस ने रुकने का नाम नहीं लिया. बाद में हालात बिगड़ते देख अशोक खुद भी बेटी के घर गए और दोनों को समझा कर आए.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, बाद में स्थिति पहले जैसी ही हो गई. रिश्तों में दूरियां तब और भी बढ़ गईं जब नवनीत साक्षी पर शक करने लगे. शक का दायरा इतना बढ़ गया कि नवनीत ने घर के बैडरूम तक में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए. साक्षी के पिता और भाई फोन करते तो नवनीत झल्ला जाते. उन्होंने दोनों के नंबर तक ब्लौक कर दिए. साक्षी परिजनों को बताती थी कि उस के साथ मारपीट भी की जाने लगी है.

साक्षी के परिजनों को पूरी उम्मीद थी कि एक दिन सब ठीक जाएगा, लेकिन यह भी सच है कि इंसान सोचता कुछ है और हो कुछ और जाता है. परिवार के बिगड़े हालात के बीच आखिर साक्षी 20 जून, 2021 की रात जिंदगी की जंग हार गई. पतिपत्नी के बीच अनबन में 20 जून को एक तूफान आया. दोनों के बीच झगड़ा और मारपीट हुई. साक्षी ने यह बात अपने पिता को भी फोन पर बताई थी. नवनीत के अनुसार, उन्होंने साक्षी को देर रात कपड़े के सहारे पंखे से झूलते हुए पाया. इस के बाद उन्होंने उसे नीचे उतारा और मिलिट्री हौस्पिटल ले गए, जहां डाक्टरों ने साक्षी को मृत घोषित कर दिया.

इस के बाद हौस्पिटल से पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी गई. साक्षी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण हैंगिग आया. नवनीत के घर पर लगे कैमरों की सीसीटीवी फुटेज डिलीट हो चुकी थी. साक्षी के परिजनों का आरोप था कि सारी फुटेज को सच्चाई छिपाने के मकसद से डिलीट किया गया.

प्रताड़ना बनी मौत की वजह

साक्षी के परिजनों का साफ कहना था कि वह मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी. उन के दहेज के आरोपों में सच्चाई है तो सोचने वाली बात है कि बड़े पदों पर नौकरी करने वाले अच्छेखासे पढ़ेलिखे लोग भी दहेज के लालच में किस स्तर तक जा सकते हैं. हालांकि दूसरी तरफ नवनीत शर्मा ने जेल जाने से पहले पुलिस कस्टडी में मीडिया के सामने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों से साफ इंकार कर दिया.

साक्षी ने वास्तव में आत्महत्या की या उस की हत्या की गई, पुलिस इस पहलू की भी बारीकी से जांच कर रही थी. प्रकरण की और भी सच्चाई तो पुलिस की पूर्ण जांच के बाद ही सामने आएगी. अदालत इस मामले में सबूतों के आधार पर फैसला भी करेगी. लेकिन जब साक्षी नवनीत और उन के परिजनों की फितरत को समझ गई थी और जब उस का वहां तालमेल नहीं बैठ रहा था, तब वह वक्त रहते ऐसे रिश्ते से पीछा छुड़ा लेती तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime Story: कायर प्रेमी

Love Crime Story: प्रेमिका की वादाखिलाफी पर प्रसाद ने सोचा कि वह प्रेमिका को मार कर खुद को भी खत्म कर लेगा. उस ने प्रेमिका को तो मार दिया लेकिन जब अपनी बारी आई तो…

उस दिन शाम के यही कोई साढ़े 7 बज रहे थे. अंधेरा धीरेधीरे शहर को आगोश में लेने लगा था. उसी समय दीपक सोसाइटी परिसर में स्थित पार्क में बैंच पर बैठे एक युवक और युवती किसी बात पर बहस करने लगे. यह सोसाइटी मुंबई शहर के उपनगर लालबाग लोवर परेल में स्थित है. सोसाइटी में आनेजाने वालों ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन जातेजाते वे उन पर एक नजर जरूर डाल लेते थे. उन्हें लगता था, किसी बात पर बहस कर रहे होंगे. लेकिन जब बहस के दौरान युवक ने चाकू से युवती पर हमला कर दिया और युवती चीख कर बैंच से नीचे गिर पड़ी, तब लोगों का ध्यान उन की ओर गया. यह बात 28 जून, 2015 की है.

फिल्मी अंदाज में घटी इस घटना से लोग हैरान तो रह ही गए, दहशत में भी आ गए. जब तक लोग उस युवती के पास पहुंचते, तब तक वह युवक एक्टिवा स्कूटर से भाग निकला था. थोड़ी ही देर में सोसायटी के तमाम लोग वहां आ गए. उसी बीच किसी ने फोन द्वारा इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. यह क्षेत्र थाना काला चौकी के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा इस की सूचना थाना काला चौकी पुलिस को दे दी गई. खबर मिलते ही सीनियर इंसपेक्टर सूर्यकांत तरडे, असिस्टैंट इंसपेक्टर सखाराम वनकर और सबइंसपेक्टर योगेश काले के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे थे.

पुलिस को पार्क में एक युवती पड़ी मिली, जिस के पेट और गले पर हुए घावों से काफी मात्रा में खून बह गया था. पुलिस को लग रहा था कि लड़की मर चुकी है. फिर औपचारिकता पूरी करने के लिए वह उसे नजदीक के केईएम अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. सीनियर इंसपेक्टर सूर्यकांत तरडे ने घटना की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी और खुद मामले की तफ्तीश करने लगे. दूसरी ओर हत्या की सूचना मिलते ही मुंबई जोन के एडिशनल कमिश्नर अशोक दुधे और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर विजय वागवे भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, लेकिन वहां ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस से हत्यारे तक पहुंचने में मदद मिलती. पूछताछ में लोगों ने बताया था कि मृतका और हत्यारे के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. युवक कौन था, यह कोई नहीं बता सका था. मृतक युवती की भी शिनाख्त नहीं हो पाई थी. सीनियर इंसपेक्टर सूर्यकांत तरडे को दिशानिर्देश देने के बाद आला अधिकारी वहां से चले गए. उन के जाने के बाद इंसपेक्टर सूर्यकांत ने थाने के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग की और इस मामले की जांच असिस्टैंट इंसपेक्टर सखाराम वनकर को सौंप दी.

इंसपेक्टर सखाराम वनकर अपनी पुलिस टीम के साथ मामले की जांच की शुरुआत करते, इस के पहले ही एक युवक ने उन के पास आ कर अपना नाम प्रसाद उर्फ दिगंबर विनायक सावंत बताते हुए कहा कि दीपक सोसाइटी के पार्क में जिस युवती की हत्या हुई थी, उस का नाम एकता अंकुश तलवडकर था और उस की हत्या उस ने ही की थी. उस की बातें सुन कर इंसपेक्टर सखाराम ने प्रसाद को गौर से देखा और हिरासत में ले लिया. उस समय वह शराब के नशे में था. जिस हत्यारे का सुराग पाने के लिए वह परेशान थे, वह इतनी आसानी से मिल जाएगा, ऐसा उन्होंने सोचा भी नहीं था.

प्रसाद से पूछताछ के बाद पुलिस को उस का और मृतका एकता अंकुश का पता मिल गया था. फोन कर के पुलिस ने दोनों के घर वालों को थाने बुला लिया. प्रसाद की करतूत पर जहां उस के घर वाले हैरान थे, वहीं एकता के पिता और भाई अस्पताल में बिलखबिलख कर रो रहे थे. पुलिस उन्हें दिलासा दे रही थी. थाने में दोनों परिवारों के लोग और नातेरिश्तेदार एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगा रहे थे. एकता के परिवार वालों का कहना था कि प्रसाद सावंत उन की बेटी से एकतरफा प्रेम करता था और उस से शादी करना चाहता था. उस के मना करने के बाद उस ने उन की बेटी की हत्या कर दी.

जबकि प्रसाद के घर वालों का कहना था कि एकता कई सालों से प्रसाद से प्यार करती थी. उस ने प्रसाद को तरहतरह के सपने दिखाए थे. अचानक उस ने उसे धोखा दे दिया. जिस से हताश हो कर उस ने यह कदम उठाया था. यह सच था कि प्रसाद ने एकता की हत्या की थी. उस ने हत्या क्यों की? यह प्रसाद से पूछताछ के बाद ही पता चल सकता था. चूंकि प्रसाद उस समय शराब के नशे में था, इसलिए पुलिस उस के नशा उतरने का इंतजार करने लगी. 1-2 घंटे बाद प्रसाद का नशा उतर गया तो पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने एकता की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

26 वर्षीय प्रसाद उर्फ दिगंबर विनायक सावंत महाराष्ट्र के जनपद रत्नागिरी की तालुका राजापुर तलगांव का रहने वाला था. उस के पिता विनायक सावंत एक किसान थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. परिवार में उस के मातापिता के अलावा एक बड़ा भाई था. प्रसाद सावंत काफी तेजतर्रार और महत्त्वाकांक्षी युवक था. उस का ध्यान खेती में कम, पढ़ाईलिखाई की तरफ ज्यादा था. उसे बचपन से चित्रकारी का शौक था. विनायक सावंत उस के इस शौक को उस के सपनों की उड़ान तक ले जाना चाहते थे. लेकिन उन के सामने परेशानी यह थी कि वह जिस गांव और तालुका में रहते थे, वहां कोई अच्छा स्कूल और कालेज नहीं था.

इस के लिए उन्होंने भांडूप में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार से बात की. उस ने प्रसाद सावंत का दाखिला भांडूप के एक अच्छे स्कूल में करा दिया. कहते हैं कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं. प्रसाद सावंत शुरू से ही होनहार था. वह हर कक्षा में अच्छे नंबरों से पास होता आया था. चित्रकारी और फोटोग्राफी के शौक को उस ने अपनी पढ़ाई के दौरान भी जारी रखा. पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने फोटोग्राफी और वीडियो का कोर्स किया. इस के बाद वह अपने रिश्तेदार का घर छोड़ कर परेल के पेरू कंपाउंड स्थित एक चाल में किराए पर रहने लगा. बाद में एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में मैनेजर के पद पर उस की नौकरी लग गई. उस कंपनी में 6 लड़के काम करते थे, जिन में सब से अच्छा रिस्पौंस प्रसाद सावंत को मिलता था.

कंपनी उस के कामकाज से बहुत खुश थी. अच्छी पगार के अलावा कंपनी की तरफ से उसे एक गाड़ी भी मिली थी. नौकरी लगने के बाद प्रसाद के रहनसहन में फर्क आ गया था. उस का रहनसहन देख कर उस के लिए बढि़या रिश्ते आने लगे थे. लेकिन वह उन रिश्तों को ठुकरा देता था, क्योंकि उस के दिल में तो सिर्फ एकता तलवडकर बसी हुई थी. वह उसी के साथ जिंदगी बिताने का सपना संजोए था. 22 वर्षीया एकता तलवडकर देखने में जितनी सुंदर और खूबसूरत थी, उतनी ही चंचल भी थी. वह परेल डिलाइट रोड पर स्थित म्हाण कालोनी में रहने वाले अंकुश तलवडकर की बेटी थी. धार्मिक प्रवृत्ति के अंकुश तलवडकर के परिवार में बेटी एकता के अलावा एक बेटा था.

वह बेटे का विवाह कर चुके थे. उन की पत्नी का देहांत उस समय हो गया था, जब एकता छोटी थी. बिन मां की बेटी एकता की हर छोटीबड़ी चीजों का पिता बड़ा खयाल रखते थे. अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद एकता भी एक ऐडवेंचर टुअर्स ऐंड ट्रैवल्स कंपनी में नौकरी करने लगी थी. जिस की वजह से उसे अकसर बाहर रहना पड़ता था. प्रसाद और एकता की लव स्टोरी आज से लगभग 11 साल पहले सन 2004 में उस समय शुरू हुई थी, जिस समय दोनों एक साथ भांडूप के स्कूल में पढ़ते थे. उस समय एकता का परिवार भांडूप में उसी जगह रहता था, जहां प्रसाद सावंत के रिश्तेदार रहते थे.

प्रसाद उस से एक क्लास सीनियर था. जिस से वह एकता की पढ़ाई में भी सहयोग कर देता था. वह एकता के घर भी आयाजाया करता था. जब तक दोनों कम उम्र के थे, उन का रिश्ता दोस्ती का था. लेकिन जैसेजैसे उन की उम्र बढ़ी, वैसेवैसे उन की सोच में भी बदलाव आने लगा. स्कूल और कालेज की पढ़ाई दोनों ने साथसाथ पूरी की थी. इस के बाद नौकरी कर के दोनों ही अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे. अलगअलग नौकरी करने की वजह से उन का रोजरोज मिलना नहीं हो पाता था, लेकिन फोन पर बातें कर के वह 1-2 दिन में मिलने का कार्यक्रम जरूर बना लेते थे.

दोनों एकदूसरे के दिलों में उतर चुके थे. बात यहां तक पहुंच गई थी कि दोनों एकदूसरे को अपने जीवनसाथी के रूप में देखने लगे थे. जब भी उन की मुलाकात होती, वे अपने भविष्य के विषय में तानेबाने बुनते. दोनों ने शादी कर के साथ रहने का फैसला जरूर कर लिया था, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. उन के प्यार को जमाने की नजर लग गई. उन के सारे सपने टूट कर उस समय बिखर गए, जिस समय उन के प्यार पर उन के परिवार वालों ने ऐतराज जताया. जैसेजैसे समय आगे बढ़ रहा था, उन का प्यार परिपक्व होता जा रहा था, लेकिन जब एकता के इस प्यार की जानकारी उस के पिता अंकुश तलवडकर को हुई तो उन्हें यह अच्छा नहीं लगा.

मामला काफी नाजुक था, इसलिए उन्होंने बेटी को अपने पास बुला कर प्रेम से प्रसाद के बारे में पूछा. एकता ने भी बिना किसी संकोच के पिता को अपने मन की बात कह दी, ‘‘पापा, प्रसाद से मैं प्यार करती हूं और उस से शादी करना चाहती हूं.’’

‘‘यह संभव नहीं है बेटी.’’ अंकुश तलवडकर ने एकता को प्यार से समझाते हुए कहा.

‘‘क्यों पापा, प्रसाद में बुराई क्या है? परिवार अच्छाखासा संपन्न है, उस की अच्छी नौकरी है और वह मुझ से प्यार भी करता है.’’ एकता बोली.

‘‘तुम्हारी इस बात पर मुझे कोई संदेह नहीं है बेटी,’’ अंकुश ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘मुझे तुम पर नाज है. मुझे पता है कि तुम समझदार और होशियार हो. तुम जो करोगी, ठीक ही करोगी. लेकिन बेटी, समाज में मेरी भी कुछ इज्जत और मानसम्मान है. क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारी वजह से समाज में मेरी गरदन झुक जाए. ऐसी बेइज्जती से तो मेरा मर जाना ही ठीक होगा.

‘‘मैं ने तुम्हारी मां को मरते समय वचन दिया था कि तुम्हारा और तुम्हारे भविष्य का खयाल रखूंगा. मैं तुम्हारी शादी अपनी बिरादरी के किसी अच्छे लड़के से करना चाहता हूं. मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं. हम जो भी कदम उठाएंगे, तुम्हारी भलाई के लिए उठाएंगे. अब तुम सोचो कि तुम्हें क्या करना है?’’

अंकुश ने तो अपने मन की बात बेटी से कही ही, भाई ने भी उसे बहुत समझाया. पिता और भाई की बातों से वह अंदर तक हिल गई. इस के बाद उस में अपने पिता और भाई के फैसले का विरोध करने की शक्ति नहीं रही. एक तरह से एकता ने अपने पिता को मूक सहमति दे दी कि वह उन की बातों से सहमत है. एकता की मनोदशा देख कर उन्होंने दौड़धूप कर अपने एक रिश्तेदार के बेटे से उस की शादी तय कर दी. एकता ने अपने दिल को यह सोच कर समझा लिया कि जो सपने सच न हो और वह परिवार के मानसम्मान और मर्यादा पर टिके हों, उन्हें देखने से क्या फायदा?

यही सोच कर वह प्रसाद को भूलने की कोशिश करने लगी. अब उस ने प्रसाद से मिलनाजुलना कम कर दिया. लेकिन वह प्रसाद को भुला नहीं पा रही थी. वह जब भी प्रसाद से मिलती, उस का चेहरा बुझाबुझा और मुरझाया हुआ सा रहता. वह उस से बात भी बहुत कम और नपेतुले शब्दों में करती थी. प्रसाद प्रेमिका के इस बदले व्यवहार को समझ नहीं पा रहा था. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अचानक एकता को क्या हो गया? पूछने पर भी वह कुछ नहीं बताती थी. आखिर एक दिन प्रसाद ने उस के मन की बात जान ही ली.

तब एकता ने प्रसाद के कंधे पर अपना सिर रख कर सिसकते कहा, ‘‘प्रसाद, हमें एकदूसरे को भूल जाना चाहिए, क्योंकि मेरे घर वालों को हमारा मिलनाजुलना पसंद नहीं है. उन्होंने मेरा रिश्ता कहीं और तय कर दिया है.’’

‘‘क्या?’’ प्रसाद को उस की इस बात से जोरदार झटका लगा. उस ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रही हो? तुम ने कुछ नहीं कहा.’’

‘‘मैं क्या कहती, उन के सामने मैं बेबस थी. मैं ने उन्हें अपने प्यार के बारे में बताया तो, लेकिन उन की बातों का विरोध नहीं कर पाई,’’ एकता उदास हो कर बोली, ‘‘प्रसाद, यहां अपनी नहीं, समाज की चलती है, मर्यादाओं की चलती है. यहां प्यार और मोहब्बत की कोई कीमत नहीं है. हम दोनों से जो गलती हुई है, उसे सुधार लेना चाहिए. हम लोग एक अच्छे परिवार से हैं, इसलिए हमारे घर वालों को हम से काफी उम्मीदें हैं. हमें उन की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए. अब तक हमारे बीच जो कुछ हुआ, उसे भूल कर हमें घर वालों की इच्छा के अनुसार चलना चाहिए.’’

‘‘ऐसा कभी नहीं होगा एकता. मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता. मैं चाचाजी से बात करूंगा. उन से विनती करूंगा, हाथ जोड़ूंगा, पैर पकड़ूंगा और तुम्हारा हाथ मांगूंगा.’’ प्रसाद ने तड़प कर कहा. वह एकता के पिता को चाचा कहता था.

एकता ने प्रसाद को लाख समझाया, इस के बावजूद प्रसाद एकता के घर जा कर उस के पिता और भाई से मिला. एकता के पिता ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उस ने बात करने के लिए अपने मांबाप को एकता के घर भेजा. लेकिन एकता के पिता उन की भी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हुए. इस बात से प्रसाद के घर वाले इतने खफा हुए कि उन्होंने प्रसाद को डांटफटकार कर घर से बाहर निकाल दिया. शादी की बात असंभव होने पर प्रसाद के दिल को गहरा धक्का लगा. वह एकता के बिना अपनेआप को अधूरा समझने लगा. यह बात इस घटना के कुछ दिनों पहले की थी. एकता के परिवार वालों के व्यवहार से आहत प्रसाद ने फैसला कर लिया कि वह एकता के साथ जी नहीं सकता तो उस के साथ मर तो सकता हूं.

उस ने अपने मन में यह बात तय कर ली कि वह एकता को अपने साथ ले कर इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाएगा. यह सोच कर वह मुंबई चोर बजार से एक तेजधार वाला चाकू खरीद लाया. इस के बाद वह एकता की तलाश में लग गया. काफी कोशिश के बाद भी वह उस से नहीं मिल पा रहा था. एक दिन उसे पता चला कि वह अपनी कंपनी के मालिक आगंस्टर मांजरा रोहिटन के साथ पिकनिक पर पुणे के हिजवाड़ी गई है और 2-3 दिनों बाद लौटेगी. घटना वाले दिन प्रसाद सावंत का मन काफी उदास था. वह कई बार एकता के औफिस के चक्कर लगा चुका था. लगभग 3 बजे एकता अपने साथ स्कूल की बच्चियों को ले कर अपने बौस के साथ पुणे से बाहर निकली.

नवी मुंबई, चेंबूर में टूर वाली बच्चियों को ड्रौप करते हुए लगभग 6 बजे वह अपने बौस के साथ अपने औफिस पहुंची तो वहां उस ने प्रसाद को अपनी एक्टिवा स्कूटर पर बैठे देखा. एकता को देख कर प्रसाद उस के पास पहुंचा और यह कह कर के उसे अपनी स्कूटर पर बैठा लिया कि उसे उस से कुछ जरूरी बातें करनी हैं. एकता उस के पीछे स्कूटर पर बैठ गई. उसे वह लालबाग लोवर परेल इलाके में स्थित दीपक सोसाइटी के पार्क में ले गया. पार्क में कुछ समय तक वह उस से इधरउधर की बातें करता रहा.

उस के बाद वह अपने असली मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘एकता, अब अपने वादे और कसमों को निभाने का समय आ गया है. हमें समाज और परिवार के सारे बंधनों को तोड़ कर एक हो जाना चाहिए. क्योंकि जीतेजी तो हम दोनों कभी एक नहीं हो पाएंगे, लेकिन साथसाथ मर तो सकते हैं.’’

यह कह कर प्रसाद ने अपनी जेब में रखा चाकू निकाल लिया. प्रसाद के हाथ में खुला चाकू देख कर एकता घबरा गई. वह प्रसाद को समझाते हुए बोली, ‘‘प्रसाद पागल मत बनो. आत्महत्या करना कोई समाधान नहीं है. समय आने पर हम दोनों मिल कर कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे.’’

लेकिन प्रसाद ने एकता की बातों पर ध्यान नहीं दिया. उस पर तो प्यार का जुनून सवार था. उस ने वह चाकू एकता के पेट में घुसेड़ दिया. इस के बाद दूसरा वार उस के गले पर किया. चाकू लगते ही एकता चीखी. उस ने एकता पर तो वार कर दिए, लेकिन जब अपनी बारी आई तो वह डर गया और खुद पर चाकू का वार नहीं कर सका. डर की वजह से वह अपनी एक्टिवा से भाग गया. वहां से वह कुछ ही दूर गया था कि उसे अपने अपराध का अहसास हुआ और उस की आत्मा एकता के लिए तड़प उठी. वह एक बार में गया और वहां उस ने खूब शराब पी. नशा चढ़ने पर वह पुलिस थाने गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

प्रसाद उर्फ दिगंमर विनायक सावंत से विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर उसे बाकायदा गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रसाद सांवत जेल में बंद था और अपने किए गुनाहों के लिए पश्चाताप कर रहा था. Love Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Hindi: सपने बेचने वाले ठग

True Crime Hindi: घर से बेदखल होने के बाद नशेड़ी प्रितपाल ने पत्नी के साथ मिल कर लोगों को ठगने का जो तरीका निकाला, वह सफल तो रहा. लेकिन उस का ठगी का यह धंधा कब तक चलता, पकड़े तो जाना ही था.

लुधियाना के रहने वाले राजकुमार पाठक और उन के दोस्त रितेश का साझे में एक्सपोर्ट का बिजनैस था. दोनों ही अपने बिजनैस को बढ़ाने में लगे हुए थे. राजकुमार के एक अन्य दोस्त ने उन की बात कनाडा के एक बिजनैसमैन से कराई. कनाडा का वह बिजनैसमैन राजकुमार से सामान खरीदने की डील करना चाहता था. डील फाइनल करने के लिए उस ने राजकुमार को कनाडा बुलाया. राजकुमार ने इस बारे में रितेश से बात की तो दोनों कनाडा जाने को तैयार हो गए. विदेश जाने के लिए दोनों के पास पासपोर्ट तो थे, लेकिन उन्हें कनाडा जाने के लिए वीजा की जरूरत थी.

दोनों दोस्त कनाडा का वीजा हासिल करने की कोशिश करने लगे. इस बारे में उन्होंने कई ट्रैवेल एजेंटों से बात की, लेकिन सफलता नहीं मिली. वे परेशान थे और चाह रहे थे कि किसी भी तरह उन्हें कनाडा का वीजा मिल जाए. एक दिन अखबार पढ़ते समय राजकुमार की नजर एक विज्ञापन पर पड़ी. वह विज्ञापन इस प्रकार था- ‘विदेश जाने के इच्छुक तुरंत संपर्क करें, स्टडी वीजा, बिजनैस वीजा एवं यात्रा वीजा हेतु शीघ्र संपर्क करें. जसप्रीत इमीग्रेशन एक्सपर्ट्स.कौम, 384, दूसरी मंजिल, डीवीए टावर आरके रोड, चीमा चौक, लुधियाना.’

राजकुमार ने जसप्रीत के औफिस का पता नोट कर लिया और अपने दोस्त रितेश के साथ 2 मार्च, 2014 को वहां पहुंच गया. वहां उन की मुलाकात जसप्रीत कौर और उन के पार्टनर महेंद्रपाल सिंह से हुई. दोनों ने राजकुमार और रितेश के पासपोर्ट व अन्य दस्तावेज देखने के बाद कहा, ‘‘आप के दस्तावेज पूरे नहीं हैं, फिर भी कोई बात नहीं. आप लोग यंग हैं, विदेश में बिजनैस जमाना चाहते हैं, इसलिए हम आप की  सहायता जरूर करेंगे. कोशिश कर के एक हफ्ते में हम आप के पेपर पूरे करवा कर कनाडा का वीजा लगवा देंगे.’’

उन की बातें सुन कर राजकुमार और रितेश के चेहरे पर चमक आ गई. राजकुमार ने जसप्रीत कौर को धन्यवाद देते हुए कहा, ‘‘लेकिन मैडम, वीजा के लिए कितना खर्चा आएगा?’’

‘‘वैसे तो हम और लोगों से 10 लाख रुपए लेते हैं, परंतु आप लोग अभी नया काम कर रहे हैं, इसलिए आप से 7 लाख ले लेंगे. यदि इस बारे में और कोई बात करनी है तो हमारी कंपनी के मालिक प्रितपाल सिंह से मिल सकते हैं.’’ जसप्रीत ने कहा.

जसप्रीत कौर और महेंद्रपाल सिंह ने उन दोनों को इस ढंग से समझाया कि उन्होंने कंपनी के मालिक प्रितपाल सिंह से मिलना जरूरी नहीं समझा और अगले दिन 3 मार्च को उन्होंने 60-60 हजार यानी एक लाख 20 हजार रुपए जसप्रीत को दे दिए. इस के बाद 5 मार्च को 58 हजार रुपए और दिए. इस तरह 4 बार में उन्होंने उसे 5 लाख 60 हजार रुपए वीजा लगवाने के लिए दे दिए. रुपए देने के बाद दोनों दोस्त काफी खुश थे. उन्हें विश्वास था कि अब हफ्तादस दिन में उन का वीजा लग जाएगा, इसलिए वे जाने की तैयारी में जुट गए.

जसप्रीत ने उन्हें 15 दिनों बाद आने को  कहा था. 15 दिनों बाद दोनों दोस्त यह सोच कर खुशीखुशी जसप्रीत के औफिस पहुंचे कि वहां से अपने लिए वीजा ले कर कनाडा जाने की तैयारी करेंगे. लेकिन वे वहां पहुंचे तो औफिस में ताला लगा हुआ था. जब पड़ोसियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह औफिस तो हफ्ते भर से बंद है. यह सुन कर उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. इस से उन्हें अपने सपने रेत के महल की तरह ढहते हुए दिखाई दिए. वे परेशान हो उठे. सोचने लगे कि पता नहीं औफिस बंद कर के सब कहां चले गए.

राजकुमार ने जसप्रीत को फोन मिलाया. उस का फोन व्यस्त आ रहा था. कई बार फोन करने के बाद जसप्रीत ने फोन तो उठाया, लेकिन ज्यादा बात नहीं की. केवल इतना ही कहा, ‘‘परेशान मत करो, अभी तुम्हारे वीजा का काम हो रहा है. जब काम हो जाएगा तो फोन कर दिया जाएगा.’’

जसप्रीत से बात कर के उन्हें थोड़ी तसल्ली हुई. इस के बाद उन की जसप्रीत कौर से 3-4 बार बात हुई. इस तरह जसप्रीत कौर कोई न कोई बहाना बना कर उन्हें टालती रही. बीचबीच में राजकुमार और रितेश जसप्रीत कौर के औफिस के चक्कर भी लगाते रहे. लेकिन हर बार औफिस बंद ही मिला. एक दिन किसी के माध्यम से जसप्रीत कौर ने उन के पासपोर्ट लौटा दिए. अब उन का कनाडा जाने का सपना धूमिल होता नजर आ रहा था. पासपोर्ट मिलने के बाद अपने दिए हुए पैसे वापस लेने के लिए राजकुमार ने जसप्रीत को फोन किया, लेकिन अब उस का फोन बंद था. राजकुमार ने कई बार फोन किया, हर बार फोन बंद मिला.

औफिस के चक्कर लगातेलगाते उन के जूते घिस गए, पर न तो जसप्रीत कौर मिली न ही उस का पार्टनर महेंद्रपाल सिंह. अब उन्हें खुद के ठगे जाने का अहसास होने लगा था. राजकुमार और रितेश जसप्रीत को करीब साढ़े 5 लाख रुपए दे चुके थे. यह रकम कोई छोटीमोटी नहीं थी, जो वे चुप बैठ जाते. दोनों ही अपने स्तर से जसप्रीत के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश में लग गए. यह कोशिश रंग लाई. उन्हें पता चला कि जसप्रीत बांजरा गांव की रहने वाली है. राजकुमार और रितेश उस के गांव पहुंचे तो वहां जसप्रीत कौर मिल गई. उन्होंने उस से अपने पैसे मांगे तो उस ने साफ कहा कि उस के पास उन का कोई पैसा नहीं है, इसलिए उन पैसों को भूल जाएं.

इतनी बड़ी रकम को भला वे कैसे भूल सकते थे. उन्होंने भी कह दिया कि उन्हें हर हालत में पैसे चाहिए. वे अपने पैसे ले कर रहेंगे. तब जसप्रीत ने उन्हें धमकी देते हुए कहा, ‘‘मुझ से ज्यादा अकड़ दिखाने की जरूरत नहीं है. बेहतर यही होगा कि चुपचाप घर बैठ जाओ. मेरी पहुंच बहुत ऊंची है. तुम्हें ऐसे केस में फंसा दूंगी कि जेल में पड़ेपड़े सड़ जाओगे.’’

यह सुन कर दोनों घबरा गए और चुपचाप वहां से चले आए. फिर तो उन्होंने उस के घर की तरफ मुड़ कर नहीं देखा. जसप्रीत की धमकी से उन्होंने उस के खिलाफ पुलिस में भी शिकायत नहीं की. लेकिन उन के दिमाग में एक बात जरूर घूम रही थी कि जसप्रीत ने उन की तरह और लोगों से भी इस तरह की धोखाधड़ी की होगी. यदि उस की शिकायत पुलिस से नहीं की गई तो न जाने कितनों को और ठगेगी. कम से कम और लोग उस के शिकार न बने, इस के लिए उन्होंने 30 फरवरी, 2015 को लुधियाना के पुलिस कमिश्नर को एक शिकायती पत्र दे दिया, जिस में उन्होंने अपने साथ हुई धोखाधड़ी की बात विस्तार से लिख दी थी.

पुलिस कमिश्नर को यह मामला गंभीर लगा. जिस इलाके में जसप्रीत का औफिस था, वह इलाका थाना डिवीजन नंबर 6 के अंतर्गत आता था. उन्होंने वहां के थानाप्रभारी कंवलजीत सिंह को अपने औफिस बुला कर उस शिकायती पत्र पर जरूरी काररवाई करने के आदेश दे दिए. कमिश्नर के आदेश पर थानाप्रभारी कंवलजीत सिंह ने नामजद लोगों ने खिलाफ भादंवि की धारा 420/120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उन की गिरफ्तारी के लिए एएसआई रछपाल सिंह, मोहन सिंह और राजेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल धर्मजीत सिंह, जीत सिंह, महिला कांस्टेबल जसप्रीत कौर आदि की एक टीम बनाई.

उधर नामजद आरोपियों को जब पता चला कि उन के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है तो वे अपनेअपने घरों से गायब हो गए. पुलिस जब उन के घरों पर पहुंची तो उसे वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा. जसप्रीत कौर और उस के साथियों ने तमाम लोगों को अपना शिकार बनाया था. जैसेजैसे लोगों को जसप्रीत के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने की खबर मिलती गई, वे अपनी शिकायतें ले कर थानाप्रभारी कंवलजीत के पास पहुंचने लगे. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि यह मामला छोटामोटा नहीं, बल्कि काफी बड़ा है.

अब उन्होंने पुलिस की 3 टीमें बना दीं. सभी टीमें अपनेअपने स्तर से आरोपियों को तलाश रही थीं. उसी दौरान पुलिस को खास मुखबिर से पता चला कि प्रितपाल सिंह जालंधर में है. 10 जुलाई, 2015 को एक टीम मुखबिर द्वारा जालंधर में बताई गई जगह पर पहुंच गई. वहां उन्हें प्रितपाल मिल गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन जालंधर में बाईपास से जसप्रीत कौर को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस को पता चला कि प्रितपाल जसप्रीत का ही पति है. थाने ला कर दोनों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर 5 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान उन की निशानदेही पर उन के 2 औफिसों से भारी मात्रा में फरजी वीजा दस्तावेज, 2 कंप्यूटर और कुछ फरजी मोहरें बरामद की गईं. इस बीच पुलिस के पास एक दरजन से भी अधिक ऐसे लोग पहुंचे, जिन के साथ जसप्रीत और उस के पति प्रितपाल सिंह ने धोखाधड़ी कर के लाखों रुपए ठगे थे. उन सभी पीडि़तों की तरफ से पुलिस ने अलगअलग रिपोर्ट दर्ज कर लीं. पूछताछ के दौरान प्रितपाल और उस की पत्नी जसप्रीत कौर ने धोखाधड़ी कर लोगों से मोटी रकम ऐंठने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

लुधियाना के थाना मेहरबान के अंतर्गत आता है एक गांव बांजरा. प्रितपाल सिंह यहीं के रहने वाले किसान सुरजीत सिंह का बेटा था. उस के अलावा उन के एक बेटा और एक बेटी थी. खेतीकिसानी के अलावा सुरजीत सिंह की गांव में आटाचक्की थी. कुल मिला कर उन का खातापीता परिवार था. अपने तीनों बच्चों को पढ़ानेलिखाने के बाद उन्होंने उन की शादी कर दी थी. उन की बेटी और एक बेटा विदेश में जा कर बस गया था. प्रितपाल भी कुछ दिनों तक उन के साथ विदेश में रहा. लेकिन वहां उस का मन नहीं लगा तो वह पंजाब लौट आया.

प्रितपाल सिंह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी व जिद्दी प्रवृत्ति का था. यहां आ कर वह किसी ऐसे काम की तलाश में लग गया, जिस में मोटी कमाई हो. वह धंधा तो नहीं तलाश सका, लेकिन दोस्तों के साथ रहने पर वह नशे की लत में जरूर फंस गया. उसी दौरान एक दिन प्रितपाल की मुलाकात जसप्रीत कौर से हुई, जो मूलरूप से रोपड़ जिले की रहने वाली थी. हाल में उस के मातापिता भामियां रोड पर तिकोना पार्क में रहते हैं. नवीं कक्षा पास जसप्रीत आजाद पंछी की तरह रह कर अपनी हसरतें पूरी करना चाहती थी. पहली ही मुलाकात में वह प्रितपाल पर फिदा हो गई. पिता ने बहुत समझाया और इलाज भी करवाया, पर प्रितपाल पर कोई असर नहीं हुआ.

तब पिता ने उसे जेबखर्च के लिए पैसे देने बंद कर दिए. प्रितपाल पूरी तरह नशेड़ी हो चुका था. जब पिता ने पैसे देने बंद कर दिए तो वह परेशान हो गया. तब उस ने नशे के लिए घर का कीमती सामान बेचना शुरू कर दिया. उस की हरकतों से मातापिता उकता गए. आखिर में थकहार कर उन्होंने प्रितपाल को अपने घरजायदाद से बेदखल कर दिया. घर से बेदखल होने के बाद प्रितपाल अपने यारदोस्तों के यहां रहा. अब उस के होश ठिकाने आने लगे. अब वह अपने कामधंधे के बारे में गंभीरता से सोचने लगा.

वह जानता था कि विदेश जाने के इच्छुक लोग अपना वीजा लगवाने के लिए मोटी रकम खर्च करने को तैयार रहते हैं. यही काम उसे अच्छा दिखाई दिया. लिहाजा उस ने जोधपुरा बस्ती के पास एक औफिस खोल कर यही काम करना शुरू कर दिया. चूंकि लोगों को पता था कि उस की बहन और भाई विदेश में रहते हैं, इसलिए लोग आसानी से उस के जाल में फंसने लगे. आमदनी बढ़ने पर उस का अपनी प्रेमिका जसप्रीत से मिलने का सिलसिला बढ़ गया. फिर सन 2010 में दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली.

इस के बाद वे किराए का मकान ले कर साथ रहने लगे. प्रितपाल ने जसप्रीत को अपने कामधंधे के बारे में नहीं बताया था. परंतु बाद में उसे सब पता चल गया. जसप्रीत कौर को जब प्रितपाल के इस गोरखधंधे का पता चला तो उसे समझाने के बजाय उस ने इस धंधे से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने की सलाह दी. इस के बाद उस ने खुद ही इस धंधे को संभाल लिया. जसप्रीत बला की खूबसूरत थी. इसलिए अपने लटकेझटके दिखा कर वह ग्राहकों को आसानी से फंसा लेती थी. एक जगह से धोखाधड़ी कर लाखों रुपए कमाने के बाद वे किसी दूसरे शहर में अपना औफिस खोल कर क्षेत्रीय अखबारों में अपना विज्ञापन प्रकाशित कराते.

इस तरह उन के पास वीजा बनवाने के इच्छुक लोगों का आनाजाना शुरू हो जाता. उस के बाद लोगों को विदेश भेजने का झांसा दे कर वे उन से लाखों रुपए झटक लेते. बाद में औफिस बंद कर के किसी और शहर में दुकान खोल लेते. इस तरह पिछले 5 सालों में उन दोनों ने लोगों से करोड़ों रुपए ऐंठ लिए. कमाई मोटी हो रही थी, इसलिए वैसे ही उन के खर्च थे. जसप्रीत महंगी शौपिंग करती तो वहीं प्रितपाल भी रोजाना कई हजार रुपए अपने नशे के शौक पर खर्च कर देता था. पुलिस पूछताछ में पता चला कि जसप्रीत और प्रितपाल लोगों से अभी तक एक करोड़ 60 लाख रुपए ठग चुके हैं. यह बात भी सामने आई है कि उन के इस काम में महेंद्रपाल सिंह, सूरज, रिधि कुमारी, खुशी और राजकुमार शर्मा भी साथ देते थे.

पुलिस की टीमें इन आरोपियों की भी तलाश में जुट गईं, लेकिन इन के घर से फरार होने की वजह से पुलिस उन के पास तक नहीं पहुंच सकी है. बहरहाल पुलिस ने प्रितपाल सिंह और उस की पत्नी जसप्रीत कौर से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर के जिला जेल भेज दिया है. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी कंवलजीत सिंह कर रहे हैं. True Crime Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Thriller Hindi Story: प्रेम कहानी का स्याह रंग

Thriller Hindi Story: अति की आजादी मिलने पर बच्चों का बिगड़ जाना कोई बड़ी बात नहीं है. कारा भी अपने मातापिता की लापरवाही से बिगड़ी थी. मांबाप यह तो जानते थे कि गलत राह पर उठे पैरों को रोकना संभव नहीं है, उन्हें यह पता नहीं था कि वह किस हद तक जा सकती है. उस दिन मौसम का मिजाज बहुत खुशगवार था. शाम को भी यही स्थिति बनी रही.देखतेदेखते शाम सिमट गई और डूबते सूरज को अलविदा कह कर अंधेरे ने अपनी चादर फैला दी.

आसमान साफ था. छोटेबड़े सभी तारे जगमगाने लगे थे. चांद ने भी कुछ पल पहले अपने आने की आहट दे दी थी. चांदनी रात थी. हवा ऐसे गायब थी, जैसे चलना ही भूल गई हो. हवा बंद होने की वजह से लंबेघने दरख्तों पर झुंड में सिर से सिर जोड़े पत्ते भी खामोश थे. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. ठंड अपने यौवन पर थी, जिस के कारण लोग अपने घरों में दुबके हुए थे. उसी शांत वातावरण में कहकहों की कई आवाजें एक साथ गूंजीं. यह आवाजें बोर्डन हाऊस नाम की एक विशाल इमारत के मुख्य दरवाजे से आई थीं. यहां माइकम बोर्डन अपनी पत्नी कैथरीन बोर्डन और 3 बच्चों के साथ रहते थे. बड़ी बेटी कैटीलिन 15 साल की थी, उस से छोटी कारा 14 साल की तो सब से छोटा बेटा जेम्स महज 11 साल का था.

आज जेम्स की पहली गर्लफ्रैंड पहली बार घर आई थी. इस खुशी को सेलीब्रेट करने के लिए घर में छोटी सी पार्टी रखी गई थी. जब जेम्स की फ्रैंड जाने लगी तो सभी उसे विदा करने दरवाजे तक आए थे. तभी किसी ने कुछ ऐसा कह दिया था कि सभी दिल खोल कर हंस पड़े थे. इसी हंसीखुशी भरे माहौल को बीते एक घंटा भी नहीं हुआ था कि बोर्डन हाऊस से फिर एक के बाद एक 2 आवाजें गूंजीं. ये आवाजें गोलियां चलने की थीं. गोलियों की आवाजें सुन कर पड़ोसियों की नींद उड़ गई. सभी उस ओर भागे. जरूर बोर्डन हाऊस में कोई हादसा पेश आया था. हादसा वाकई दिल दहला देने वाला था. लोगों ने अंदर जा कर देखा तो मुंह से चीख निकल गई.

सामने माइकल और कैथरीन की लाशें पड़ी थीं, जबकि जेम्स और कैटीलिन कोने में सहमेदुबके बैठे थे. माइकल और कैथरीन की हत्या गोली मार कर की गई थी. इसी बीच किसी ने इस मामले की सूचना पुलिस को दे दी. कुछ ही देर में पुलिस वहां आ पहुंच गई. घटनास्थल और दोनों लाशों का निरीक्षण करने के दौरान पाया गया कि माइकल को गोली सिर के पीछे और कैथरीन को माथे पर मारी गई थी. लगता था, इस दोहरे हत्याकांड को एक सोचीसमझी योजना के तहत अंजाम दिया गया था. हत्यारे का उद्देश्य लूटपाट नहीं था, बल्कि कोई दुश्मनी थी या गहरी खुन्नस.

पुलिस ने कोने में सहमेदुबके बैठे जेम्स और कैटीलिन के सिर पर प्यार से हाथ फेरा तो दोनों फफकफफक कर रो पड़े. पूछने पर कैटीलिन ने बताया कि उस ने न केवल हत्यारे को अच्छी तरह से देखा था, बल्कि वह उसे पहचानती भी थी. हत्यारा कोई और नहीं, उस की बहन कारा का प्रेमी डेविड था. उस ने रोते हुए कहा, ‘‘वह कारा को भी साथ भगा कर ले गया है.’’

‘‘पर उस ने ऐसा क्यों किया?’’ पुलिस का सवाल था.

‘‘मम्मीपापा डेविड को पसंद नहीं करते थे. वह कारा को भी उस से नहीं मिलने देते थे.’’ कैटीलिन ने कहा, ‘‘वह कह रहा था कि कारा को कहीं दूर भगा ले जाएगा.’’

पुलिस ने अंदाजा लगाया कि माइकल और कैथरीन की हत्या कर के डेविड ने कारा का अपहरण कर लिया है और वह उसे हवाई जहाज द्वारा कहीं दूर ले जाएगा. इसी सब के चलते दोनों लाशों को आननफानन में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. साथ ही सभी हवाई अड्डों को डेविड और कारा का हुलिया बताते हुए सचेत कर दिया गया कि दोनों दिखाई दें तो उन्हें रोक लिया जाए और पुलिस को सूचना दे दी जाए. शहर के सभी बार्डर पर तैनात पुलिस को भी सूचना दे दी गई. टीवी चैनलों पर भी यह खबर प्रसारित करवा दी गई कि एक 18 साल का युवक 2 हत्याएं कर के एक नाबालिग लड़की को भगा ले गया है. डेविड की फोटो तो नहीं मिल पाई थी, अलबत्ता कारा की फोटो जरूर चैनलों पर प्रसारित करवाई गई.

यह घटना 13 नवंबर, 2008 की रात की थी. पुलिस डेविड और कारा की खोज में जुटी थी. अगले दिन यानी 14 नवंबर को इंडियाना स्टेट में एक बीली विली कार तेज गति से सड़क पर दौड़ती दिखाई दी. इसे एक लड़का चला रहा था, जबकि लड़की उस की बगल वाली सीट पर बैठी थी. संभवत: यह कारा ही थी. इंडियाना अथौरिटी पुलिस उन का पीछा करने लगी. पुलिस ने कई बार कार को रोकने का संकेत भी दिया, पर कार नहीं रुकी. इस से यह बात पुख्ता हो गई कि वे दोनों डेविड और कारा ही थे. पुलिस करीब 5 किलोमीटर तक पुलिस कार का पीछा कर चुकी थी, पर कार नहीं रुकी थी. कार शहर से बाहर जंगलों में गुजर रही थी कि इसी दौरान संतुलन न रख पाने के कारण एक पेड़ से टकरा गई.

पुलिस की जीप वहां से थोड़ी दूरी पर थी, तभी पुलिस ने देखा कि कार के आगे की तरफ के दोनों दरवाजे खुले और एक तरफ से एक लड़का और दूसरी तरफ से एक लड़की बाहर निकली. दोनों भाग पाते, इस से पहले ही पुलिस वहां पहुंच गई और दोनों को हिरासत में ले लिया. ये दोनों कारा और डेविड ही थे. कार आगे से क्षतिग्रस्त हो गई थी, पर कारा और डेविड सुरक्षित थे. उन्हें खरोंच तक नहीं आई थी. डेविड को उसी समय गिरफ्तार कर लिया गया. कारा को बरामद कर के उस के एक रिश्तेदार के पास भेज दिया गया, जहां अनाथ हो चुके उस के भाईबहन भी रह रहे थे. अगले दिन डेविड को अदालत में पेश कर के उसे 2 हत्याओं और एक लड़की के अपहरण के जुर्म में जेल भेज दिया गया.

इस मामले की तफ्तीश इंडियाना अथौरिटी पुलिस कर रही थी. कई सप्ताह की तफ्तीश के बाद एक चौंका देने वाला सच सामने आया कि डेविड और कारा एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे. कारा को डेविड ने भगाया नहीं था, बल्कि वह खुद उस के साथ भागी थी. इतना ही नहीं उस के मांबाप का कत्ल भी उस की सहमति से उसी की मौजूदगी में किया गया था. यह जानकारी डेविड और कारा के इंटरनेट पर ब्लौगों को जांचने के बाद सामने आई थी. कारा के ब्लौग से साफ हो गया था कि वह अपनी मर्जी से डेविड के साथ भागी थी. अपने पिता माइकल और मां कैथरीन की हत्या की साजिश कारा ने डेविड के साथ रची थी. इतना ही नहीं, घटना वाले दिन कारा ने उसे फोन पर घटना को अंजाम देने को भी कहा था.

घटना के समय वह भी कमरे में मौजूद थी और डेविड को आंखों ही आंखों में इशारा कर रही थी कि वह फौरन उस के पिता व मां की हत्या कर दे. जैसे ही डेविड ने उस के पिता माइकल की हत्या की, कारा अंदर से दौड़ कर बाहर खड़ी डेविड की कार के पास आ गई थी और उस का इंतजार करने लगी थी. जब डेविड उस के पिता के बाद मां कैथरीन की हत्या कर के कार के पास आया तो कारा ने उस से कहा, ‘‘अब जल्दी यहां से भाग चलो, वरना पकड़े जाओगे. मैं आजाद होना चाहती हूं.’’

यह जानकारी पुलिस के लिए चौंका देने वाली थी. वह सहज ही विश्वास नहीं कर पा रही थी कि एक 14 साल की मासूम लड़की इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिलवा सकती है. पर यही सच था. कारा ने अपने मातापिता का कत्ल क्यों करवाया, यह बात अभी साफ नहीं हो पाई थी. खैर, पुलिस ने डेविड को एक बार फिर से अदालत में पेश किया. अब उस पर से कारा के अपहरण का आरोप हटा दिया गया था. जबकि दूसरी तरफ कारा को पुलिस हिरासत में ले लिया गया था. डेविड अब भी यही दोहराए जा रहा था कि उस ने कोई कत्ल नहीं किया. पर जब सबूत खुद बोलने लगे तो उस की जुबान खामोश हो गई. उस ने कुछ देर के बाद चुप्पी तोड़ी,

‘‘हां, मैं ने ही किया था कारा के मांबाप का कत्ल. यह अपराध मैं ने कारा के कहने पर किया था.’’ इस के साथ ही उस ने वह हैंडगन भी बरामद करवा दी, जिस से उस ने दोनों कत्ल किए थे.

इधर कारा भी शुरुआती दौर में यह मानने को कतई तैयार नहीं थी कि उस ने ही अपने मांबाप का कत्ल करवाया है. उस ने कहा, ‘‘यह सच है कि डेविड मेरा बौयफ्रैंड है, पर मैं ने उसे कभी नहीं कहा कि वह मेरे मम्मीपापा की हत्या कर दे. यह उसी की चाल थी. उस ने घटना को अंजाम देने के बाद मेरा भी अपहरण कर लिया था.’’

कारा के बयान पर पुलिस को हंसी आ रही थी, क्योंकि उस के खिलाफ पुख्ता सबूत थे. बावजूद इस के वह सफेद झूठ बोल रही थी. खैर, पुलिस ने उसे भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. डेविड के बयान और कारा के ब्लौग पर उस के द्वारा लिखी इबारत और डेविड के साथ की गई उस की फोन पर बातचीत की जांच के बाद इस हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह चौंका देने वाली थी. कारा अपने मातापिता की दूसरे नंबर की संतान थी. पिता माइकल पेशे से स्कूल टीचर थे, साथ ही चर्च के प्रमुख कार्यकर्ता भी. मां कैथरीन भी पढ़ीलिखी थी, पर उस ने कोई नौकरी न कर के अपनी सारी शिक्षा अपने बच्चों की परवरिश और उन्हें अच्छे संस्कार देने में लगा दी थी.

घर का माहौल धार्मिक था. बावजूद इस के जाने कहां संस्कारों में कमी रह गई थी कि 14 साल की कारा सब कुछ नजरअंदाज कर अपने अलग ढंग से जीने लगी थी. कारा खूबसूरत तो थी ही, उम्र से पहले ही समझदार और जवान भी हो गई थी. जिस उम्र में बच्चे स्कूल और अपनी किताबों के अलावा कुछ सोचते भी नहीं, उस उम्र में कारा डांस बार में जाने लगी थी. संगीत से उसे बेहद प्रेम था. वह चाहती थी कि रात भर संगीत की धुन पर नाचती रहे. बार में एक युवक गिटार बजाता था. उम्र में वह कारा से दोगुना था.

बावजूद इस के वह उस के गिटार बजाने पर ही नहीं, उस पर भी मुग्ध हो गई थी. वह घंटों उस गिटारवादक को बिना पलक झपकाए निहारती रहती थी. वह कल्पना करती थी कि वह अपने स्पर्श से उस के मन और तन की तरंगों को इस तरह छेड़े कि नसनस में आनंद प्रवाहित हो जाए. वह गिटारवादक भी कारा की चाहत से अंजान नहीं था. इसीलिए उस ने उस के साथ नजदीकी बढ़ाई. धीरेधीरे दोनों ने शारीरिक सुख भी हासिल करना शुरू कर दिया. हर मिलन में चरम पर पहुंचने के बाद कारा कहती थी, ‘‘तुम वाकई अद्भुत कलाकार हो. संगीत से मेरे मन को तृप्त करते हो तो एकांत में मेरे रोमरोम में आनंद भर देते हो.’’

सब ठीक चल रहा था, लेकिन उस के प्रति कारा का मोह ज्यादा दिन कायम नहीं रह पाया. कारण, उस गिटारवादक के कई अन्य लड़कियों के साथ भी संबंध थे, जिन्हें कारा ने खुद अपनी आंखों से देखा था. इस कारण वह जब भी उस के साथ किसी लड़की को देखती तो बुरी तरह जलभुन जाती थी. धीरेधीरे जब उस की जलन नफरत में बदल गई तो कारा ने उस से किनारा कर लिया. संयोग से इसी दौरान डांस बार भी बंद हो गया. कुछ दिन तो कारा घर में कैद रही, पर जब फिर से उसे उस युवक के साथ बिताए देहसुख के पल याद आने लगे तो वह तड़पने लगी.

उस की तलाश में उस ने शहर के तमाम डांस बार छान मारे, पर उस का कुछ पता नहीं चला. इस पर कारा ने उसे भुलाने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया. वह घंटों कंप्यूटर पर बैठी इंटरनेट खोल कर लड़कों से चैटिंग करती रहती. चैटिंग के दौरान ही उसे डेविड से मोहब्बत हो गई. दोनों के खयालात एक जैसे ही थे. इस लिए दोनों को नजदीक आते देर नहीं लगी. दोनों एकदूसरे को दिन में कईकई बार ईमेल भेज कर अपनी मोहब्बत का इजहार करने लगे. दोनों ने मेल के जरिए अपनीअपनी फोटो भी एकदूसरे को भेज दी थी.

जब कारा को पता चला कि डेविड भी उसी शहर में रहता है तो उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया. रात के समय जब घर के सभी सदस्य सो जाते तो वह घंटों डेविड से मोबाइल पर बात करती. दोनों के बीच होने वाली बात अब सामान्य नहीं रह गई थी. दोनों जहां एकदूसरे से अश्लील बातें करते, वहीं एकदूसरे को शारीरिक सुख देने की चाहत का भी इजहार करते. इसी बीच एक दिन दोनों ने पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बना लिया. दोनों पहली बार शहर से दूर एक पिकनिक स्पाट पर मिले. पहली नजर में ही एकदूसरे को देखने के बाद दोनों ने कबूल किया कि उन की पसंद गलत नहीं थी. मोहब्बत कर के उन्होंने कोई भूल नहीं की थी. कारा की तरह डेविड भी सुंदर और जवान था.

वह 18 साल का था, जबकि कारा 14 साल की थी. डेविड भी एक धनाढ्य और सम्मानित परिवार का एकलौता बेटा था. उसे प्यार और पैसे की कभी कमी नहीं रही थी, जिस की वजह से वह राह भटक गया था. उस की संगत ऐसे दोस्तों से हो गई थी, जिन का शौक नशा करना और लड़कियों के साथ ऐश करना था. पहली मुलाकात में ही कारा और डेविड इस हद तक एकदूसरे से खुल गए थे कि एकदूसरे की बांहों में तो समा ही गए, उन्होंने देहसुख की चाहत भी मन में पाल ली. दोनों भीड़ से दूर घनी झाडि़यों के बीच जा बैठे. वहां बैठ कर दोनों अपने मन की इच्छा को ज्यादा देर नहीं दबा पाए और एकदूसरे के शरीर की गहराई नापने लगे. इस से कारा तो तृप्त हुई ही, डेविड भी उस के अधखिले शरीर को पा कर दीवाना हो गया.

इसी बीच डेविड ने न केवल दोनों के बीच देहसुख के पलों की तसवीर कैमरे में कैद कर ली थीं, बल्कि विभिन्न पोजों में कारा की न जाने कितनी नग्न तसवीरें भी उतार ली थीं. कारा उस की अंधी मोहब्बत और उस से मिले देहसुख में इस हद तक खो गई थी कि उस ने इस सब का कोई विरोध नहीं किया था. उस दिन दोनों चाहत की एक अनूठी अनुभूति ले कर घर लौटे. इस के बाद तो जब दिल करता, दोनों इस अनुभूति को ताजा कर लेते. जैसेजैसे दोनों में नजदीकी बढ़ रही थी, वैसेवैसे उमंगे भी बेलगाम होती जा रही थीं. चुलबुले स्वभाव की कारा तो डेविड की दीवानगी में इतनी डूब गई थी कि वह उस की नजदीकी पाने के लिए हर शर्त मंजूर कर लेती थी.

एक दिन डेविड ने कारा के सामने शर्त रखी कि वह अपनी बड़ी बहन कैटीलिन को राजी करे कि वह उस के दोस्त के साथ दोस्ती बढ़ा कर उस से देह संबंध बनाए. फिर चारों मिल कर खूब ऐश किया करेंगे. कारा ने बिना कुछ सोचे हामी भर दी. इस के बाद उस ने किसी तरह अपनी बहन को भी राजी कर लिया. फिर एक दिन चारों एक जगह मिले तो डेविड ने देह के इस खेल की वीडियो रिकौर्डिंग का भी इंतजाम कर लिया था. उस समय डेविड काले रंग के कपड़े पहने हुए था. डेविड ने अपने 19 वर्षीय दोस्त के साथ पहले हाथों में रिवौल्वर ले कर मारपीट का दृश्य रिकौर्ड किया और फिर हाथ में नंगी तलवार ले कर ऐसे दहाड़ा, जैसे किसी का सिर कलम करने वाला हो. उस समय उस की नजर कारा पर ही थी, जो उसे ही निहार रही थी.

इस के बाद डेविड और कारा के बीच निर्वस्त्र अवस्था में बनाए गए देहसंबंधों की वीडियो बनाई गई. फिर डेविड के दोस्त और कारा की बड़ी बहन कैटीलिन के देहसंबंध की बारीकी से रिकौर्डिंग की गई. उस वक्त मस्ती के जुनून में डेविड और उस का दोस्त यह भूल गए थे कि दोनों ने न केवल नाबालिग बहनों के साथ देहसंबंध बनाने का गुनाह किया है, बल्कि बतौर सबूत उस की रिकौर्डिंग भी कर ली थी, जो कभी भी जी का जंजाल बन सकती थी. इधर कारा इतनी आजाद खयाल हो गई थी कि उसे किसी का खौफ नहीं रहा था. जब भी उस का दिल करता, डेविड को रात के समय अपने घर बुला लेती. इस के बाद सारी रात दोनों खूब मस्ती करते.

जबतब कारा रातरात भर घर से गायब हो जाती और डेविड के साथ रात गुजार कर घर लौटती. अब उस का यह आचरण घर वालों से छिपा नहीं रह गया था. उस के पिता माइकल कारा को समझाने की कोशिश करते तो वह उत्तेजित हो कर कहने लगती, ‘‘यह मेरी जिंदगी है. मैं जिस तरह भी जीना चाहूं, मुझे कोई नहीं रोक सकता.’’

बेटी के इस दुस्साहस पर माइकल का हाथ उस पर उठ जाता तो वह घायल शेरनी की तरह दहाड़ पड़ती. मां कैथरीन ने भी कारा को परिवार की इज्जत और उस के खुद के भविष्य का वास्ता दे कर राह पर आने के लिए काफी समझाया, पर वह उस राह से नहीं लौटी. इसे ले कर माइकल और कैथरीन अकसर परेशान रहते थे. उधर कारा को भी आए दिन की टोकाटाकी नागवार लगती थी. कारा आधीआधी रात तक इंटरनेट पर डेविड से अश्लील चैटिंग करती रहती थी. इस से आहत कैथरीन ने इंटरनेट का कनेक्शन ही कटवा दिया, जिस से कारा बौखला गई. अब उस ने खुलेआम डेविड को घर बुलाना शुरू कर दिया. रात भर दोनों कमरे में बंद रहते. माइकल और कैथरीन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते थे.

एक रात जब दोनों कमरे का दरवाजा बगैर बंद किए बिस्तर पर बेलिबास एकदूसरे की बांहों में खोए अश्लीलता की हदें पार कर रहे थे तो माइकल से देखा नहीं गया. उन्होंने डेविड को खूब खूरीखोटी सुनाई और अपने घर न आने की हिदायत दी. इस से डेविड का पारा तो चढ़ा ही, कारा भी भड़क उठी, ‘‘डैडी, आप को कोई अधिकार नहीं है इस तरह मेरे दोस्त की बेइज्जती करने का.’’

‘‘बेइज्जती तो उन की होती है, जिन की कोई इज्जत हो. तुम दोनों ने तो बेहयाई की हद पार कर दी है, कुछ तो शरम करो. तुम्हारे भाईबहन पर इस का क्या असर पड़ेगा? लोग जानेंगे तो कितनी बदनामी होगी हमारी? सिर उठा कर घर से निकलना दूभर हो जाएगा.’’ माइकल ने कारा को लताड़ लगाई.

‘‘गेट आउट फ्राम माई रूम.’’ कारा ने अपने ही जन्मदाता को जलील करते हुए कहा तो बेचारे माइकल अपनी इज्जत की खातिर खून का घूंट पी कर उस के कमरे से बाहर आ गए.

जातेजाते उन के कानों में डेविड की आवाज पड़ी. वह धमकी दे रहा था, ‘‘मुझे यह कतई मंजूर नहीं कि कोई मेरे प्यार के बीच में आए. अगर मेरे प्यार में ज्यादा दखल दिया तो मैं कत्ल भी कर सकता हूं, बगैर यह देखे कि कत्ल होने वाला कौन है?’’

माइकल और कैथरीन समझ चुके थे कि कारा उन के हाथों से पूरी तरह निकल चुकी है, पर उसे कैसे राह पर लाया जाए? यह सोच कर दोनों परेशान थे. वह समझ नहीं पा रहे थे कि उन के प्यार में आखिर कहां कमी रह गई थी, जो उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा था. कैथरीन ने कारा की करीबी सहेली 16 वर्षीया जेफ होवर्थ से भी कहा कि वह ही कारा को समझाए.

जेफ ने ऐसा किया भी. उस ने कारा को समझाया, ‘‘कारा तुम जो कर रही हो, वह सही नहीं है.’’

‘‘क्या सही है, क्या गलत, यह मैं अच्छी तरह समझती हूं. मैं डेविड से इतनी मोहब्बत करती हूं कि उस की चाहत में किसी हद तक भी जा सकती हूं. मैं यह बिलकुल बरदाश्त नहीं कर सकती कि मेरे प्यार में, मेरी व्यक्तिगत जिंदगी में कोई दखल दे. चाहे वह मेरे मम्मीपापा ही क्यों न हों.’’

‘‘उन्होंने तुम्हें जन्म दिया है. तुम्हारा भलाबुरा भला उन से ज्यादा कौन समझ सकता है. फिर तुम जिस राह पर जा रही हो, उस की कोई मंजिल नहीं होती. तुम खुद अपनी राह में कांटें बिखेर रही हो. देखना इस का अंजाम दुखद होगा, इसलिए वक्त रहते संभल जाओ.’’ जेफ ने कारा को समझाया.

‘‘अब चाहे कांटे मिलें या फूल, मैं इस राह पर इतना आगे बढ़ चुकी हूं कि लौट कर आना संभव नहीं है. अब तो प्यार ही मेरी जिंदगी है. डेविड ही मेरी सांसें हैं. बेहतर होगा कि तुम भी मेरे बीच में न आओ.’’ कारा ने उलटा उसे ही नसीहत दे डाली. फलस्वरूप जेफ भी हार कर चुप हो गई.

इधर कारा बेलगामी की सारी हदें पार करती जा रही थी. अब वह डेविड को घर नहीं बुलाती थी, खुद ही उस के पास पहुंच जाती थी. यहां तक कि वह 2-2 रातों तक घर नहीं लौटती थी. यह देख माइकल और कैथरीन का विरोध भी नरम पड़ गया था. कारा ने इस का उलटा ही अंदाजा लगाया और 11 नवंबर, 2008 की रात उस ने डेविड को फिर से घर बुलवा लिया.

वह आ गया तो कमरे का दरवाजा खुला छोड़ कर कारा डेविड के साथ बिस्तर में घुस गई. कारा के कमरे से आने वाली आवाजों ने सभी की नींद उचाट कर दी थी. माइकल काफी देर तक खुद को रोके रहे, पर अंत में वह कारा के कमरे में जा पहुंचे और चीख कर बोले, ‘‘अगर तुम्हें यह गंदगी फैलानी है तो कहीं और जा कर फैलाओ. मेरे घर में ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘वरना क्या कर लेंगे आप?’’ कारा बेशरमी की हद पार करते हुए डेविड की बांहों में सिमटी हुई बोली.

‘‘मैं तेरी खाल खींच दूंगा.’’ इस के साथ ही माइकल ने कारा को बिस्तर से घसीट कर जमीन पर पटक दिया. वह उस पर हाथ उठाते, इस से पहले ही डेविड ने उन का हाथ पकड़ लिया, ‘‘खबरदार, अगर कारा को हाथ लगाया तो.’’

माइकल का गुस्सा अब डेविड पर भड़क गया, ‘‘तू ने ही मेरी बेटी को बरबाद किया है. तू ने इसे राह से भटकाया है. मैं तेरे खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट करूंगा.’’

इतना सुनते ही डेविड भी तैश में आ गया, ‘‘अबे ओए बुड्ढे, जुबान संभाल कर बात कर, वरना…’’

‘‘वरना क्या कर लेगा तू?’’ माइकल की सांसें तेजी से धड़कने लगीं.

‘‘छोड़ो डेविड.’’ कारा ने उठ कर डेविड की बांह थाम ली, ‘‘क्यों इन के मुंह लगते हो. इन्हें बकवास करने दो. यह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’’ उस ने अपने पिता माइकल पर घृणा भरी दृष्टि डाली.

‘‘कर तो बहुत कुछ सकता हूं.’’ इतना कहते हुए माइकल कमरे से चले गए.

यह देख डेविड और कारा घबरा गए थे. कारा डेविड से बोली, ‘‘कुछ करो डेविड, वरना ये लोग कुछ भी कर सकते हैं. मैं तुम से जुदा नहीं होना चाहती. मैं अभी नाबालिग हूं, अगर पापा ने तुम्हारे खिलाफ पुलिस में अपनी नाबालिग बेटी को बहकाने और जबरन शारीरिक संबंध बनाने की रिपोर्ट लिखवा दी तो पुलिस तुम्हें जेल भेज देगी. ऐसा हो, इस से पहले इन्हें ही दुनिया से विदा कर दो. फिर कोई हमें रोकनेटोकने वाला नहीं रहेगा.’’

डेविड कारा का इशारा समझ गया था. साथ ही डर भी गया था कि अगर उस के खिलाफ नाबालिग के साथ बलात्कार करने की रिपोर्ट लिखवा दी गई तो उसे जेल जाने से कोई नहीं बचा पाएगा. तभी उसे याद आया कि उस ने कहीं पढ़ा था कि 19 वर्षीय चार्ल्स सर्टाकवली 14 वर्षीया कारिल एनन से बेइंतहा मोहब्बत करता था, पर कारिल के मांबाप बीच में आ गए थे. इस पर दोनों ने मिल कर कारिल के मांबाप व बहन का कत्ल कर दिया था. फिर दोनों दूसरे शहर भाग गए थे. लंबी अवधि के बाद आखिर वे पकड़े गए थे.

डेविड के दिमाग में शैतान ने पांव जमा लिए थे. उस ने पहला पक्ष सोचा, दूसरा नहीं. अंजाम की परवाह न करते हुए उस ने कारा से कहा, ‘‘ठीक है, मैं अपनी मोहब्बत के कांटों को जड़ से ही हटा दूंगा. मगर तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’

‘‘मैं तो हर समय, हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं.’’ कारा उस की बांहों में सिमट गई, ‘‘मुझे सब कुछ मंजूर है, पर तुम से अलग होना नहीं.’’

‘‘तुम परसों तक का इंतजार करो, मैं कुछ करता हूं.’’ डेविड बोला, ‘‘हां, परसों शाम को मुझे फोन कर के बता देना कि तुम्हारे मम्मीपापा घर पर हैं कि नहीं.’’

‘‘ठीक है, मगर जो भी करना, होशियारी से करना. हमारे ऊपर आंच न आए.’’ कारा बोली.

सुबह होते ही डेविड कारा के घर से चला गया. उस ने उसी दिन 40 कैलिबर हैंडगन का इंतजाम कर लिया. 13 नवंबर को कारा का छोटा भाई जेम्स अपनी गर्लफ्रैंड को पहली बार घर लाया था. इसी खुशी में घर में एक छोटी सी पार्टी रखी गई थी. कारा ने यह खबर डेविड को दी तो उस ने अपनी योजना कारा को समझा दी. रात करीब 9 बजे वह कार से कारा के घर पहुंच गया और कुछ दूरी पर कार खड़ी कर के उस के इशारे का इंतजार करने लगा. करीब साढ़े 9 बजे जेम्स की गर्लफ्रैंड वहां से चली गई तो कारा ने घर से बाहर आ कर डेविड को इशारा कर दिया. वह तुरंत चौकन्ना हो कर कारा के घर में पहुंच गया. उस समय कारा के पिता माइकल और मां कैथरीन ड्राइंगरूम में ही थे. कारा खुद भी वहां आ गई थी. उस के भाईबहन भी वहीं थे.

डेविड ने आते ही एक फायर माइकल के सिर पर पीछे से किया. यह देख कैथरीन उस की तरफ दौड़ी. मगर वह कदम आगे नहीं बढ़ा पाई. डेविड ने उस के सिर में भी गोली दाग दी. दोनों की उसी समय मौत हो गई. यह देख कारा पहले ही डेविड की कार के पास आ गई थी. डेविड के आते ही दोनों कार से भाग निकले, पर दूसरे दिन दोनों पकड़े गए. गिरफ्तारी के वक्त और बाद में भी कारा खुद को निर्दोष बताती रही, मगर सारे सबूत उस के विरुद्ध थे. बचाव का कोई रास्ता नहीं था.

अत: दूसरी पेशी पर कारा ने भी अदालत में अपना अपराध स्वीकारते हुए कहा, ‘‘डेविड ने मेरे मातापिता की हत्या की है. फिर भी मैं उस से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. मैं उस के बिना नहीं रह सकती. जेल से छूटने के बाद हम फिर से एक हो जाएंगे.’’

अदालत में उपस्थित सभी लोग कारा की इस बेहयाई पर उस का मुंह ताकते रह गए. वह सोच नहीं पा रहे थे कि प्यार में एक लड़की इतनी भी अंधी हो सकती है. अदालत ने डेविड को दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई. वहीं कारा को हत्या के लिए उकसाने और सहयोग देने पर 25 साल की सश्रम कैद सजा सुनाई गई. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि जब तक कारा व डेविड बालिग नहीं हो जाते, उन्हें जेल के बजाय बाल बंदीगृह में रखा जाएगा. बालिग होने पर दोनों को इंडियाना जेल में भेज दिया जाएगा.

डेविड अच्छे घर से था. उस के पिता ने कई बड़े वकील किए, पर तमाम कोशिशों के बाद भी उस की जमानत नहीं हो पाई. जबकि कारा की तरफ से एक एनजीओ का वकील केस देख रहा था. सन 2013 के जून माह में कारा को 5 दिन के पैरोल पर रिहा किया गया था. लेकिन वह घर पहुंची तो उस के भाई ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. उस की बहन अपने फ्रैंड के साथ घर बसा चुकी थी. कारा और डेविड ने नासमझी और प्यार में अंधे हो कर जो अपराध किया, उस की ग्लानि दोनों को अब होने लगी थी. 25 फरवरी, 2015 को डेविड के वकील ने फिर से उस की जमानत अर्जी अदालत में लगाई, जिसे नामंजूर कर दिया गया. फिलहाल दोनों जेल में हैं. Thriller Hindi Story

 

UP Crime: होटल के कमरे में प्यार का खूनी अंत, लाश के साथ बीती पूरी रात

UP Crime: एक ऐसी खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने प्यार जैसे रिश्ते को शर्मसार कर दिया. जिस हाथ को थामकर साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, उसी हाथ ने प्रेमिका की जान ले ली. यह कहानी है उस प्रेमी की, जो प्यार के नाम पर पनपी नफरत और गुस्से से हैवान बन गया. मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रेमी ने  प्रेमिका को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया और उस की पसलियां तक तोड़ डालीं.

सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिस ने प्यार को हिंसा में बदल दिया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली क्राइम स्टोरी की पूरी सच्चाई.

यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई है. 10 जनवरी, 2026 को सफाई कर्मचारी प्रवीण कुमार अपनी प्रेमिका आरती को एक होटल में ले गया. कमरे में दोनों ने साथ बैठकर शराब पी. नशे के दौरान किसी मामूली बात को ले कर दोनों के बीच विवाद हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि गुस्से में प्रवीण ने आरती पर लातघूंसे बरसाने शुरू कर दिए.

पुलिस के मुताबिक आरती और प्रवीण के बीच पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. आरती के पति की पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे थे, जबकि प्रवीण भी अपनी पत्नी से अलग रह रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि शराब के नशे में आरती ने गुस्से में प्रवीण का चेहरा नोच लिया था. इसी बात से बौखलाकर प्रवीण ने उस पर बेरहमी से हमला किया. लगातार पिटाई के कारण आरती की कई पसलियां टूट गईं और अंदरूनी चोटों की वजह से उस की मौत हो गई. आरती ने खुद को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आरोपी का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था.

हत्या के बाद प्रवीण पूरी रात शव के पास बैठा रहा. 11 जनवरी की सुबह जब वह होटल से निकलने लगा तो होटल के एक कर्मचारी ने उसे रोक लिया. महिला के बारे में पूछने पर प्रवीण गोलमोल जवाब देने लगा, जिस से उस कर्मचारी को शक हो गया.

इस के बाद में उस ने खुद पुलिस को फोन कर मैडिकल इमरजेंसी होने का नाटक किया, लेकिन सच सामने आ गया. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उस से  पूछताछ जारी है. UP Crime

Emotional Story: मेरी ममता की आवाज

Emotional Story: लोगों ने बहुत कहा कि मुझे एक ही बेटी पैदा हुई है, लेकिन मैं मां थी, इसलिए मुझे पता था कि मुझे एक नहीं, 2 बेटियां पैदा हुई थीं. और मैं ने यह बात साबित भी कर दी, लेकिन इस में 9 साल लग गए.

शादी के 2 सालों बाद मैं ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन डिलीवरी के बाद जब मैं वार्ड में पहुंची तो मुझे बताया गया कि मेरे एक ही बच्ची पैदा हुई थी. जब मैं लेबर रूम में थी, तब प्रसव पीड़ा के बीच मुझे इतना तो अहसास था कि मैं ने 2 बच्चे पैदा किए थे. वहां किसी ने कहा भी था कि जुड़वां लड़कियां हुई हैं. जब मैं ने 2 लड़कियां पैदा की थीं तो एक कहां चली गई? मैं ने सास से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक ही लड़की पैदा हुई थी. मुझे सास पर ही शक हुआ, क्योंकि वह मुझ से पहले कई बार कह चुकी थीं कि मुझे लड़का ही चाहिए, इसलिए लड़का पैदा करना.

मुझे लगा कि सास ऐसे ही कह रही होंगी, इसलिए मैं तब कुछ नहीं बोली थी. लेकिन जब अस्पताल से बच्ची गायब हो गई तो मुझे उन की धमकी याद आ गई. लेकिन मैं वहां कर भी क्या सकती थी, इसलिए उस बच्ची के लिए बेजार रोतीबिलखती  रही, पर वहां मुझ पर किसी को तरस नहीं आया. सब यही कहते रहे कि मुझे एक लड़की ही पैदा हुई होगी, सास भला बच्ची क्यों गायब करेगी. मान लिया जाए कि उसे अगर पोते की चाहत थी तो वह एक ही क्यों, दोनों लड़कियों को गायब कर देती. लेकिन उन लोगों की बातें मेरे दिल को तसल्ली नहीं दे पा रही थीं. मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि एक अस्पताल के लेबर रूम से बच्ची को आखिर कैसे गायब कर दिया गया.

यह काम बिना नर्स की मिलीभगत के बिलकुल संभव नहीं था. लेकिन नर्स जसपाल के व्यवहार और सेवा भाव को देख कर उस पर अंगुली उठाना मेरे दिल को गवारा नहीं लग रहा था. बहरहाल, घर वाले मुझे आश्वस्त करते हुए अस्पताल से घर ले आए. मेरे न मानने से घर में क्लेश होने लगा. गनीमत यह थी कि ससुराल के अन्य लोगों की तरह पति अशोकजीत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि उस क्लेश की वजह से मुझे और पति को पुश्तैनी घर छोड़ कर किराए के घर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. किराए के मकान में शिफ्ट होने के बाद हमें बहुत आर्थिक परेशानियां हुईं, इस के बावजूद भी पति ने पुश्तैनी घर में जाने से मना कर दिया. मेरी बात पर सास ने उन्हें बड़े कड़वे बोल बोले थे.

उन्होंने कहा था, ‘‘डायन भी 7 घर छोड़ देती है, लेकिन तेरी बहू ने तो मुझ पर तोहमत लगाने में डायनों को भी पीछे छोड़ दिया. उस ने मुझ पर यह आरोप तो लगा दिया, लेकिन अब मैं हकीकत में ऐसा ही कर के दिखाऊंगी. जिस बच्ची पर यह इतरा रही है, उसे मैं ऐसे गायब कर दूंगी कि सारी जिंदगी उसे नहीं ढूंढ पाएगी. पता नहीं एक कैसे पैदा कर दी, बात करती है 2-2 की.’’

घर में सास ने जो क्लेश किया था, उसे याद कर के अशोकजीत सिहर उठते थे. मां के रौद्र रूप की वजह से ही उन्होंने उस घर से दूर रहने का फैसला किया था. मुझे तो यही चिंता खाए जा रही थी कि मेरी एक बेटी तो पहले ही छिन गई, कहीं दूसरी भी न छिन जाए. कुछ दिनों बाद मेरे पति अशोक को भी लगने लगा कि मुझे 2 बेटियां पैदा होने की शायद गलतफहमी पैदा हुई थी. पति ने जब भी मुझे समझाना चाहा, मैं जोरजोर से रोने लगती. तब मैं कहती, ‘‘मां हूं मैं. इस बात की खबर मुझे नहीं, किसी और को होगी कि मुझे एक नहीं 2 बच्चे पैदा हुए. मैं अब भी पूरे दावे के साथ कह रही हूं कि तुम्हारी मां ने ही मेरी एक बेटी को गायब किया है.’’

अशोक मेरे दर्द को समझता था, इसलिए वह अकसर समझाने की कोशिश करता. लेकिन मैं उस अनदेखी बेटी को भुला नहीं पा रही थी. पति को जब लगा कि मैं बेटी वाली बात पर नरवस हो जाती हूं तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करनी ही बंद कर दी. वह मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश करते. लेकिन मैं न कभी खुश रह पाई और न अपनी अनदेखी बेटी भुला पाई. वक्त का पहिया घूमता रहा. देखतेदेखते मेरी बेटी 9 साल की हो गई. इस की जुड़वा बहन भी आज इतनी ही बड़ी होगी. उस की याद में आंसू बहाते हुए मैं अपनी इस बेटी में दूसरी बेटी का रूप देखने की कोशिश करती. उस समय मैं भावुक भी हो उठती थी. उस बेटी को मैं भले ही भुला नहीं पा रही थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी थी.

लेकिन एक दिन अजीब घटना घटी. बाजार में खरीदारी करते समय मुझे एक अनजान औरत मिली. मुझे देखते ही उस ने कहा, ‘‘अरे, तुम तो वही स्वीटी हो न, जिस ने सिविल अस्पताल में जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था, जिस में से एक बच्ची को नर्स ने बेच दिया था?’’

‘‘हां,’’ मैं हैरान हो कर बोली, ‘‘मगर तुम कौन हो, मेरा नाम तुम कैसे जानती हो? और तुम जिस बच्ची को बेचने की बात कह रही हो, तुम्हें कैसे पता चली?’’

‘‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बताओ कि क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई थी?’’ उस ने पूछा, ‘‘तुम ने शोर तो बहुत मचाया था, इस से मुझे लगा था कि तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई होगी?’’

‘‘मेरे शोर मचाने का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरी वहां किसी ने नहीं सुनी. लेकिन बहन एक बात बताओ, तुम्हें कैसे पता कि मेरी बेटी को नर्स ने बेचा था.’’ मैं ने उस महिला से बड़ी विनम्रता से पूछा.

‘‘नर्स जसपाल कौर को मैं ने बच्ची को किसी और के हाथों में सौंपते हुए अपनी आंखों से देखा था. उस ने जिस आदमी को बच्ची दी थी, उस ने नर्स को नोटों की गड्डी भी दी थी. जिन दिनों तुम अस्पताल में भरती थी, उन दिनों हमारी भी एक रिश्तेदार वहां भरती थी. मैं उसे देखने छोटी बहन के साथ रोजाना अस्पताल जाया करती थी. उसी आनेजाने से नर्स जसपाल कौर से हमारी जानपहचान हो गई थी.’’

उस महिला की बात से मुझे बल मिला. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस के आगे तुम ने वहां और क्या देखा था, मतलब जिसे मेरी बच्ची सौंपी थी, वह कौन था?’’

‘‘जिसे तुम्हारी बच्ची सौंपी थी उस शख्स को तो मैं नहीं जानती. लेकिन जिस समय नर्स उस आदमी को बच्ची सौंप रही थी, मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. उसी दौरान नर्स ने मुझे देख लिया था. तुम्हारा शोर खत्म होने के बाद नर्स मेरे पास आई थी. उस ने मुझे धमकाते हुए कहा था कि चुपचाप तमाशा देखती रहो. ध्यान रखो, अगर मैं फंस गई तो यही कहूंगी कि बच्ची उठा कर मैं ने उसे दिया था. तब उस के साथसाथ मैं भी जेल जाऊंगी.’’

‘‘बहन, तुम से मेरी एक गुजारिश है, बस नर्स जसपाल कौर का पता बता दो, अपनी बेटी को तो मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊंगी.’’ मैं ने उस महिला से कहा.

‘‘वह तो अब भी सिविल अस्पताल में ही है. मगर देखो, इस मामले में मेरा कहीं भी जिक्र नहीं आना चाहिए वरना मैं अपनी कही बातों से साफ मुकर जाऊंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं किसी से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूंगी. मुझे अपनी बच्ची से मतलब है. पिछले 9 सालों से तड़प रही हूं मैं अपनी उस औलाद के लिए. उस नर्स ने मेरी बेटी को किस के हाथों बेचा है, बस इतना पता लग जाए.’’ मैं ने उसे भरोसा दिया.

बाजार से सामान ले कर मैं जल्दी से घर लौट आई. मैं ने नर्स जसपाल के पास सीधे जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि उस ने उस समय बच्ची के बारे में कुछ नहीं बताया था तो अब 9 साल बाद क्यों बताती. अस्पताल के लोग उलटे मुझे ही बेवकूफ बनाते. इसलिए मैं सीधे थाने पहुंची. लेकिन थाना पुलिस ने मेरी बात को तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि इतने पुराने मामले में वे बिना सबूत के कुछ नहीं कर सकते. निराश हो कर मैं घर लौट आई. इस बारे में मैं ने अशोक से बात की तो अगले दिन वह मुझे ले कर एसएसपी के यहां गए. हम ने अपनी पीड़ा उन से कही. उन्होंने हमारी बात ध्यान से सुनी. मेरा यह अजीबोगरीब मामला था.

क्योंकि एक मां 9 साल बाद अपनी उस बच्ची के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराना चाह रही थी, जिस की उस ने शक्ल तक नहीं देखी थी. एसएसपी साहब ने हमारे सामने ही कुछ पुलिस अफसरों को बुला कर इस बात पर चर्चा की. मीटिंग खत्म हो गई, लेकिन एसएसपी समझ नहीं पाए कि उन्हें इस मामले में क्या काररवाई करनी चाहिए. मैं ने जो शिकायत उन्हें दी थी. उस में नर्स जसपाल कौर के अलावा अपनी सास को भी नामजद करने की बात कही थी.

फिलहाल एसएसपी ने यह कह कर हमें वापस भेज दिया कि वह इस मामले पर गहराई से अध्ययन कर के ही कुछ कर पाएंगे. हमें लगा कि थाना पुलिस की तरह वह भी हमें टरका रहे हैं. अब इतने बड़े अफसर से हम कह भी क्या सकते थे. इसलिए भरे मन से घर लौट आए. उन के यहां जा कर अपनी बच्ची तक पहुंचने की जो थोड़ीबहुत आस मुझे हुई थी, उन की बातों से मुझ से वह भी दूर होती दिखाई देने लगी थी. लेकिन कुछ दिनों बाद एसएसपी ने हमें अपने औफिस में बुला कर एक बार फिर हमारी पूरी दास्तान गौर से सुनी. इस के बाद उन्होंने मेरी सास और नर्स जसपाल कौर को बुलवाया. उन्होंने उन दोनों से भी पूछताछ की. पूछताछ में दोनों ज्यादा देर तक झूठ नहीं बोल सकीं. आखिर उन्होंने कबूल कर लिया कि मुझे 2 बेटियां पैदा हुई थीं. उन में से एक को उन्होंने एक बेऔलाद आदमी को बेच दी थी.

अशोक को जब पता चला कि इस काम में उन की मां का भी हाथ था तो वह दंग रह गए. जब मैं उस समय सास पर बच्ची चोरी का आरोप लगा रही थी तब उन्होंने मुझ पर ही गलतफहमी होने का आरोप लगाया था. पूछताछ में मेरी बेटी को चोरी करने की उन्होंने जो कहानी बताई थी, इस प्रकार निकली. इंदरजीत सिंह को औलाद नहीं थी. वह नर्स जसपाल कौर को अच्छी तरह जानते थे. उस से वह कई बार मिल कर कह चुके थे कि किसी लावारिस बच्चे का मामला उस की जानकारी में आए तो वह उसे बता दे. वह उसे अपनी औलाद बना लेंगे. नर्स जसपाल ने उन से कहा था कि वह उन के लिए बच्चे का इंतजाम कर देगी, मगर इस के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी.

इंदरजीत कई फैक्ट्रियों के मालिक थे. उन के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए उन्होंने बच्चे के लिए मुंहमांगी रकम देने की हामी भर ली थी. बच्चा पैदा होने के लिए जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मेरी सास एक ही रोना रोती रही थीं, ‘‘हाय रब्बा, देखना स्वीटी के कहीं लड़की न हो जाए, इसे तो बेटा ही होना चाहिए, तभी मेरा वंश चलेगा.’’

सास ने यही बात नर्स जसपाल कौर के सामने भी कही तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों बड़ी बी, लड़का न हो कर लड़की हो गई तो क्या करोगी?’’

‘‘अरी, शुभशुभ बोल. लड़की हो गई न तो उसे यहीं मार कर गाड़ दूंगी, अस्पताल की मिट्टी में.’’ मेरी सास ने नर्स जसपाल कौर से कहा.

मैं उस अस्पताल में चैकअप के लिए जाती रहती थी, इसलिए उस नर्स को पता था कि मेरे पेट में जुड़वां बच्चे हैं. तभी तो उस ने मेरी सास से सीधे कहा, ‘‘देख माई, तेरी बहू को होने हैं जुड़वां बच्चे. एक को ला कर मेरे हवाले कर देना, मुंहमांगी रकम दूंगी.’’

‘‘सुन मेरी बात. लड़कियां हुईं तो भले दोनों ले जाना, लड़के हुए तो नहीं ले जाने दूंगी एक को भी.’’

आखिर समय आने पर मैं ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया. मेरी सास वहीं थी. उस ने एक बच्ची उठा कर जसपाल के हवाले कर दी. यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि किसी को कुछ पता नहीं चला. यह भी संभव था कि इस अपराध में अस्पताल के कुछ अन्य लोग पहले से मिले रहे हों. जसपाल के बुलाने पर इंदरजीत सिंह भी वहां पहुंचे हुए थे. उसे अच्छीखासी रकम दे कर वह बच्ची को अपने साथ ले गए. उन लोगों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि मेरे शोर मचाने के बाद भी मेरी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. फिर तो यह मामला कुछ ऐसा टला कि नर्स जसपाल और इस मामले से जुड़े अन्य लोग इस तरह भूल गए कि कभी यह मामला खुल भी सकता है.

लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. और आखिर यह मामला खुल ही गया. पूरे 9 साल बाद केस खुलने पर पुलिस ने इंदरजीत के यहां दबिश दी. वह सचमुच बहुत बड़े आदमी थे. उन की बहुत बड़ी कोठी थी. मैं ने जब उन के यहां पल रही लड़की को देखा तो मेरा दिल खिल उठा. उस लड़की की शक्ल मेरी दूसरी बेटी से हूबहू मिल रही थी. लेकिन वह जिस शानोशौकत से उन के यहां रह रही थी, उस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. इंदरजीत ने उस का दाखिला शहर के एक नामचीन स्कूल में करा रखा था. जमाने भर की सुखसुविधाएं उसे मुहैया थीं. हमें वह पहली बार देख रही थी, इसलिए पहचानने तक से उस ने मना कर दिया.

उस के लिए तो इंदरजीत सिंह और उन की पत्नी ही उस के असली मांबाप थे. जो सुविधाएं उसे वहां मिल रही थीं, हम उसे ताउम्र नहीं दे सकते थे. पुलिस टीम ने उन्हें एसएसपी के सामने पेश किया. पूरी बात सामने आने के बाद एसएसपी ने अशोक और मुझे विश्वास में ले कर समझाना शुरू किया कि हम लोग आगे जो भी निर्णय लें, ठंडे दिमाग से सोचसमझ कर पूरी गहराई से लें. खासकर इस बात का हम ध्यान रखें कि इंदरजीत सिंह के यहां पल रही बच्ची के भविष्य पर कोई आंच न आए. जब हम ने गहराई से सोचा तो हमारे दिमाग में बारबार यही बात आती रही कि हमारी दूसरी बेटी का भविष्य इंदरजीत के यहां ही सुरक्षित है. जो परवरिश इंदरजीत के यहां बच्ची को मिल रही है, वैसी उसे हमारे यहां कदापि नहीं मिल सकती.

इस के बाद मेरी ममता ने कुछ इस तरह उछाल मारा कि मामला दर्ज करवाने की बात मैं भूल गई. उसी समय मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरी दूसरी बेटी इंदरजीत के यहां रहती है, तभी उस का भविष्य संवर सकता है. इस से हमारा संबंध भी बना रहेगा और दोनों बहनें साथसाथ रह सकती हैं. बेटी के भविष्य को देखते हुए मैं ने और अशोक ने इतनी बड़ी कुर्बानी देने का फैसला कर लिया. इस के बाद अपनी सोच से इंदरजीत सिंह को अवगत कराया. खुश होते हुए उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इस के बाद इंदरजीत के साथ कचहरी जा कर बच्ची को विधिवत गोद दिए जाने की औपचारिकताएं पूरी करवाईं.

इस एवज में मेरे पति और मैं ने इंदरजीत से कोई तोहफा लेने से इनकार कर दिया. पैसा लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन हां, इंदरजीत ने दोनों बच्चियों को बेहतरीन परवरिश का वादा किया और उन्होंने दोनों बच्चियों को एक बड़े स्कूल के हौस्टल में दाखिल करवा दिया. हर हफ्ते मैं पति के साथ दोनों बेटियों से मिलने जाती रही. दोनों ही पढ़ाई में होशियार थीं. यह क्रम कभी नहीं टूटा.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. आज दोनों लड़कियां एमबीबीएस कर रही हैं. एमबीबीएस के बाद की उच्च शिक्षा के लिए उन का विदेश जाने का इरादा है. दोनों बेटियों की सफलता पर मैं और पति दोनों खुश हैं. हमें उम्मीद है कि वे आसमान की बुलंदियों को छुएंगी. मैं ने गलत किया या सही, मैं नहीं जानती. मगर किया वही, जो मेरी ममता ने मुझ से करवाना चाहा. Emotional Story

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Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल – फिल्मों की ही नहीं, ठगी की भी नायिका

Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल ने दक्षिण भारतीय ही नहीं बौलीवुड में भी अपनी पहचान बना ली थी. लेकिन बालाजी के प्यार में पड़ कर उस ने अपना बनाबनाया कैरियर तो बरबाद किया ही, अपराध की राह भी पकड़ ली.

29 मई की सुबह 8 बजे के आसपास मुंबई के उपनगर गोरेगांव के पौश इलाके तिलक रोड स्थित बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स के नीचे एकएक कर के पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं तो देखने वालों को हैरानी के साथ उत्सुकता भी हुई. इमारत में अचानक ऐसा क्या हो गया कि इतनी सुबह पुलिस की इतनी गाडि़यां आ गईं. कौन क्या सोच रहा है, पुलिस को इस से क्या मतलब था? वे अपनी गाडि़यों से उतरे और लिफ्ट से इमारत की 32वीं मंजिल पर जा कर एक फ्लैट की डोरबेल बजाई. जैसे ही फ्लैट का दरवाजा खुला, उस में रहने वाली एक युवती और उस के साथी युवक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. आखिर कौन थी वह युवती और युवक, पुलिस ने उन्हें हिरासत में क्यों लिया था? यह सब इमारत वालों को अगले दिन तब पता चला, जब उन के बारे में अखबारों में विस्तार से छपा.

पता चला कि युवती का नाम लीना मारिया पौल और उस के साथ पकड़े गए युवक का नाम बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद शेखर था. लीना ने दक्षिण भारत की कई फिल्मों में ही नहीं, 1-2 हिंदी फिल्मों में भी काम किया था. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन के ऊपर चेन्नई और मुंबई में करोड़ों रुपए की ठगी का आरोप था. दोनों को गिरफ्तार किया था मुंबई क्राइम ब्रांच के आर्थिक अपराध शाखा के सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी, शिवाजी फडतरे, इंसपेक्टर अशोक खेडकर, जगदीश कुलकर्णी, तनवीर शेख, सबइंसपेक्टर कदम ने. इन की मदद के लिए एक दरजन पुलिस कांस्टेबल भी थे.

दरअसल, इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे को सूचना मिली थी कि बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स की 32वीं मंजिल के एक फ्लैट में रहने वाली फिल्म अभिनेत्री लीना मारिया पौल बालाजी की मदद से लगभग एक साल से कुछ रसूखदारों की मदद से जालसाजी का एक बड़ा रैकेट चला रही है. एक कंपनी बना कर उस के जरिए तरहतरह की लुभावनी स्कीमों में लोगों की मेहनत की कमाई को कम समय में डबल ट्रिपल और चौगुना करने का लालच दे कर उन्हें ठगी का शिकार बना रही है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे ने तत्काल इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों जौइंट पुलिस कमिश्नर धनंजय कमलाकर और एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को दी. दोनों अधिकारियों ने पहले मामले का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद काररवाई करने के आदेश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ही दोनों पुलिस अधिकारियों ने टीम बना कर अभिनेत्री लीना मारिया पौल और बालाजी के फ्लैट पर छापा मार कर गिरफ्तार किया था. क्राइम ब्रांच के औफिस ला कर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन के द्वारा की जाने वाली ठगी की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

27 वर्षीया लीना मारिया पौल केरल के रहने वाले सी.एस. पौल की बेटी थी. वह दुबई स्थित मैस्को कंपनी में इंजीनियर थे, और परिवार को वहीं साथ रखते थे. इसलिए लीना वहीं पैदा ही नहीं, पलीबढ़ी भी. लीना ने बीडीएस (बैचलर औफ डैंटल सर्जरी) की पढ़ाई की. दांतों की डाक्टर बनने के बाद प्रैक्टिस करने या नौकरी करने के बजाय अचानक उस पर हीरोइन बनने का भूत सवार हो गया. दरअसल, लीना के मातापिता अकसर नातेरिश्तेदारों और घर वालों से मिलनेजुलने केरल आते रहते थे. मातापिता के साथ आनेजाने में लीना को भारत आनाजाना अच्छा लगने लगा. बाद में वह समझदार हो गई तो अकेली भी भारत आने लगी.

लीना खूबसूरत तो थी ही, उस की फिगर भी आकर्षक थी, इसलिए उस ने भारतीय फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनों से अपनी तुलना की तो उसे लगा कि वह भी हीरोइन बन सकती है. पैसा और शोहरत के लालच में डाक्टरी का पेशा छोड़ कर वह हीरोइन बनने के सपने देखने लगी. लीना ने अपनी इच्छा पिता को बताई तो उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने लीना को समझाया कि यह सब इतना आसान नहीं है. लेकिन लीना ने तो ठान लिया था, इसलिए वह जिद पर अड़ गई. आखिर पिता को ही झुकना पड़ा. मजबूरी में ही सही, उन्होंने अनुमति दे दी. लीना दुबई से चेन्नई पहुंच गई. क्योंकि उसे लगता था कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में उसे आसानी से काम मिल जाएगा.

लीना को पता था कि सीधे फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं है. इसलिए वह चेन्नई पहुंच कर मौडलिंग के लिए हाथपैर मारने लगी. इस के लिए उस ने अपना पोर्टफोलियो तैयार करा कर बड़ीबड़ी एजेंसियों से संपर्क किया. इस सब की बदौलत उसे कुछ विज्ञापन मिले तो उस की खूबसूरती और आकर्षक फिगर कुछ दक्षिण भारतीय फिल्म मेकरों के सामने आई. अंतत: उसे दक्षिण भारत की कुछ फिल्में मिल ही गईं और तो वह बड़े परदे पर आ गई. उस की कुछ फिल्में बौक्स औफिस पर सफल भी रहीं. इस तरह लीना दक्षिण भारतीय फिल्मों की हीरोइन बन गई. चूंकि वह दक्षिण भारतीय फिल्मों तक सीमित नहीं रहना चाहती थी, इसलिए हिंदी फिल्मों में काम पाने की कोशिश करती रही.

उस की कोशिश सफल रही और फिल्म निर्माता सुजित सरकार की नजर पड़ गई. उन्होंने लीना को अपनी हिंदी फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में काम दे दिया. इस फिल्म में उसे लिट्टे के एक विद्रोही सदस्य की भूमिका करनी थी. फिल्म में हीरो थे जौन अब्राहम. कहते हैं, लीना की इस सफलता का राज था वे पार्टियां, जिन में वह अकसर जाया करती थीं. लीना फिल्मी पार्टियों की हौट गर्ल मानी जाती थी. शायद इसलिए जल्दी ही उस समय पुलिस की हिटलिस्ट में उस का नाम आ गया, जब वह चेन्नई और दिल्ली पुलिस के जौइंट औपरेशन में अपने बौयफ्रैंड बालाजी के साथ ठगी के आरोपों में पकड़ी गई.

बालाजी ने लीना को अपने प्यार के प्रभाव में कुछ इस तरह लिया था कि वह फिल्मों तक की डगर भूल कर उस के हर अच्छेबुरे कामों में उस का साथ देने लगी थी. उस ने लीना की जिंदगी ही नहीं, उद्देश्य तक बदल कर रख दिए थे. मूलरूप से बंगलुरु का रहने वाला बालाजी सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था. वह लोगों को अपना परिचय बड़े ही रुतबेदार अंदाज में देता था. वह खुद को कभी कर्नाटक कैडर का आईएएस अधिकारी तो कभी करुणानिधि का पोता बताता था. वह कभी अपना नाम शेखर रेड्डी तो कभी सुकेश चंद्रशेखर या बालाजी बताता था.

बालाजी ने लीना को किसी फाइवस्टार पार्टी में देखा था. उस समय उस ने लीना से खुद को पूर्व मुख्यमंत्री करणानिधि का पोता और एक बड़ा बिल्डर बताया था. उस ने लीना की फिल्में देखी थीं. साथ ही वह उसे पसंद भी करता था. इसीलिए जब वह उस से मिला तो उसे लीना से प्यार हो गया था. वह किसी भी हालत में लीना को पाना चाहता था. आखिर उस ने अपनी झूठी बातों से लीना को अपने प्रेमजाल में फांस ही लिया. लीना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उस ने फिल्म निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा को अपना जिगरी दोस्त बताया था.

लीना ने बिना सोचेविचारे बालाजी की बातों पर विश्वास कर लिया. उसे लगा कि जिस रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम करने के लिए लड़कियां लालायित रहती हैं, बालाजी उसे उन की फिल्मों में आसानी से काम दिला देगा. इस के बाद उस की किस्मत चमक जाएगी. इस मुलाकात के बाद लीना की बालाजी से अकसर मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों में लीना उस के बारे में कुछ नहीं जान पाई. शायद वह उस से भी बड़ा ऐक्टर था.

लीना और बालाजी की मुलाकातें बढ़ीं तो जल्दी ही उन में गहरी दोस्ती हो गई. इस बीच बालाजी ने लीना को रामगोपाल वर्मा के अलावा और भी कई बौलीवुड की हस्तियों से मिलवाने का लालच दिया. लीना बालाजी के रहनसहन और बातचीत से काफी प्रभावित थी. इसलिए उन की यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. परिणामस्वरूप लीना ने अपना तनमन बालाजी को सौंप दिया. इस के बाद दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. बालाजी ने लीना को अपने प्यार के जाल में कुछ इस तरह फंसाया कि उस की यह सच्चाई जानने के बाद भी कि वह एक बड़ा जालसाज है, लीना उस से अलग नहीं हो पाई. सन 2013 में लीना और जौन अब्राहम द्वारा अभिनीत फिल्म ‘मद्रास कैफे’ रिलीज हुई.

फिल्म ठीक चली. लीना के अभिनय की काफी तारीफ हुई. अगर वह चाहती तो उसे फिल्मों में आगे भी अच्छी भूमिकाएं मिल सकती थीं. लेकिन बालाजी के साथ आने के बाद उस ने ऐसी कोई कोशिश ही नहीं की. उस ने खुद फिल्मों से नाता तोड़ लिया. क्योंकि जितनी मेहनत कर के लीना साल भर में कमाती थी, उतना पैसा तो बालाजी एक झटके में कमा लेता था. शायद इसी वजह से उस का फिल्मों से मोहभंग हो गया था. वह बालाजी के साथ उस के ठगी के कारोबार में उस की मदद करने लगी थी. लीना के साथ आने के बाद बालाजी का दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा था. लोगों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए वह लीना को साथ रखता था.

लीना के साथ आने के बाद बालाजी ने बड़ीबड़ी हस्तियों को ठगी का शिकार बनाया. उन दिनों कोच्चि के रहने वाले कुछ बिजनैसमैनों ने अपने प्रोजैक्टों और शोरूम के बिजनैस प्रमोशन के लिए उस का उद्घाटन फिल्मी हस्तियों से करवाना शुरू किया. इन्हीं में एक नया नाम इमैनुवल सिल्क टैक्सटाइल कंपनी के मालिक बैजू साहब का भी था. बैजू साहब 2012 में चेन्नई में अपना एक शोरूम खोल रहे थे. वह अपने इस शोरूम का उद्घाटन किसी बड़ी फिल्मी हस्ती से कराना चाहते थे. इस बात की जानकारी बालाजी को हुई तो वह बैजू साहब से मिला, और उन्हें उन के शोरूम के उद्घाटन के लिए बड़ी अभिनेत्री कैटरीना कैफ का नाम सुझा कर 20 लाख रुपए का खर्च बताया.

बैजू साहब बालाजी से किसी फाइवस्टार पार्टी में मिल चुके थे. इसलिए बैजू ने सहज ही बालाजी पर विश्वास कर के 20 लाख रुपए दे दिए. इस के बाद कैटरीना कैफ को शोरूम के उद्घाटन के लिए लाने की बात कौन कहे, वह खुद ही गायब हो गया. कई दिनों तक बैजू साहब बालाजी को फोन करते रहे, लेकिन जब बालाजी का कुछ पता नहीं चला तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह बालाजी द्वारा ठग लिए गए हैं. इस के बाद उन्होंने थाना कलसमरी जा कर बालाजी के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी. इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर अब्दुल लतीफ को सौंपी गई.

एक ओर पुलिस बालाजी की तलाश कर रही थी, दूसरी ओर शातिरदिमाग बालाजी चेन्नई के अन्नानगर पश्चिम एक्सटेंशन में फ्यूचर टेक्निक प्राइवेट लिमिटेड नामक फरजी कंपनी खोल कर मोटा हाथ मारने की तैयारी में था. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित एम बाला सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को कंपनी का मैनेजिंग डायरैक्टर बना कर कैनरा बैंक से 19 करोड़ रुपए का लोन ले लिया. पैसा हाथ में आते ही वह लीना के साथ भूमिगत हो गया.

जब यह धोखाधड़ी सामने आई तो बैंक अधिकारियों के होश उड़ गए. बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर टीएस नालाशिवन ने बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 170 और 34 के तहत थाने में शिकायत दर्ज कराई. मामला एक बड़ी ठगी और सरकारी पैसों का था, इसलिए पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए कंपनी के बेकुसूर मैनेजिंग डायरैक्टर टी.एस. सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि असली ठग बालाजी पुलिस के हाथ नहीं लगा. पुलिस उसे तलाश रही थी. इस के बावजूद बालाजी चुप नहीं बैठा. उस ने चेन्नई स्थित स्काईलार्क टैक्सटाइल्स एंड आउटफिटर नामक कंपनी के मालिक चक्रवर्ती को अपने निशाने पर ले लिया. चक्रवर्ती राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका लेते थे. इस के लिए वह अधिकारियों से साठगांठ रखते थे.

लीना और बालाजी ने चक्रवर्ती को कर्नाटक राज्य के मैडिकल तथा ट्रांसपोर्ट डिपार्टमैंट के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका दिलाने के नाम पर 63 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. चक्रवर्ती से उस ने खुद को तमिलनाडु अरबन डेवलपमैंट प्रोजेक्ट का डायरैक्टर जयकुमार और लीना को अपनी सेक्रैटरी बताया था. खुद के ठगे जाने का एहसास होने पर चक्रवर्ती ने अपना सिर पीट लिया. हाथ मलते हुए वह 6 मई, 2013 को थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज करा दी. उन की यह शिकायत लीना और बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 120बी के तहत दर्ज हुई थी.

इस तरह जब बालाजी और लीना के खिलाफ एक के बाद एक कई शिकायतें दर्ज हुईं तो चेन्नई पुलिस और सेंट्रल क्राइम ब्रांच पुलिस लीना और बालाजी के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. पुलिस का शिकंजा कसते देख दोनों चेन्नई छोड़ कर दिल्ली चले गए. दिल्ली में वे एक फार्महाउस किराए पर ले कर वीआईपी की तरह रहने लगे. लेकिन पुलिस की निगाहों से वे वहां भी नहीं बच सके और 27 मई, 2013 को एएटीएस द्वारा पकड़े गए.

एक साल तक जेल में रहने के बाद मार्च, 2014 में जब लीना और बालाजी जमानत पर बाहर आए तो वे मुंबई आ गए और यहां भी उन्होंने अपना पुराना जालसाजी का कारोबार शुरू कर दिया. लेकिन इस बार उन की सोच कुछ अलग तरह की थी. यहां उन्होंने महज एक साल में करीब एक हजार लोगों को अपनी ठगी का शिकार बना कर लगभग 10 करोड़ रुपए ठग लिए. लोगों को जाल में फंसाने के लिए बालाजी खुद को एक बड़ा बिजनैसमैन और बंगलुरु का सांसद बताता था.

रहने के लिए उस ने गोरेगांव के पौश इलाके में 3 हजार स्क्वायर फुट का एक आलीशान फ्लैट अपने ड्राइवर के नाम पर किराए पर लिया था, जिस की डिपौजिट 3 लाख रुपए और किराया 75 हजार रुपए था. आनेजाने के लिए महंगी लग्जरी विदेशी गाडि़यां थीं. इन्होंने अंधेरी के पौश इलाके लोखंडवाला के इनफिनिटी मौल में किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया नामक एक फरजी वित्तीय संस्था का औफिस खोला. लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने घर और औफिस में लाखों रुपए इंटीरियर में खर्च किया. संस्था का चेयरमैन उन्होंने सलमान रिजवी को बनाया. उन की मदद के लिए स्टाफ भी रखा गया. कंपनी में निवेश कराने के लिए मोटे कमीशन पर एजेंटों की नियुक्ति की गई.

निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बालाजी और लीना खुद महंगी विदेशी गाडि़यों से 2-3 घंटे के लिए किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया के औफिस आते थे. इस के साथसाथ इस वित्तीय संस्था का प्रचारप्रसार कुछ इस तरह किया गया कि निवेशकों को सहज उन पर और उन की संस्था पर विश्वास हो गया. संस्था निवेशकों से 60 से ले कर 2 सौ और 15 सौ प्रतिशत तक अकल्पनीय ब्याज देने का वादा करती थी. इस के अलावा कंपनी की ओर से निवेशकों को उन के निवेश के आधार पर उपहारस्वरूप महंगी घड़ी, नैनो कार, कीमती चश्मा और विदेश घूमने का पैकेज दिया जाता था. साथ ही किसीकिसी को उस के द्वारा किए गए निवेश का 20 प्रतिशत तुरंत वापस कर दिया जाता था.

इस तरह के महंगे उपहारों के प्रचार से आकर्षित हो कर निवेशक खुदबखुद उस की कंपनी की ओर खिंचे चले आते थे. किसी निवेशक को संस्था और उन पर शक न हो, इस के लिए वे बाकायदा निवेशकों को उन के रिटर्न की गारंटी और बैंकों की ओर से फिक्स डिपौजिट की रसीद देते थे. यह अलग बात थी कि उन के द्वारा दी गई फिक्स डिपौजिट की रसीदें कैश नहीं होती थीं. क्योंकि उस के कैश होने की तारीख आने पर लीना अपनी अदाओं से और बालाजी अपनी प्रतिभा से निवेशकों को लालच दे कर उन्हें अपनी अन्य किसी स्कीम में पैसा लगाने के लिए तैयार कर लेते थे.

लीना और बालाजी ने किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया कंपनी के तहत कई अन्य लुभावनी स्कीमें भी चला रखी थीं. मसलन सुपर नंबर-5, स्पेशल हार्वेस्ट वीक, सुपर हार्वेस्ट प्लस वन, न्यू ईयर बोनस, क्रिसमस बोनस, वन प्लस वन, वन प्लस टू, गणेश स्पैशल, दुर्गा पूजा पोंगल स्पैशल और दीपावली गोल्डन डायमंड. लीना से डा. बोहरा की मुलाकात उस के इलाज के दौरान हुई थी. जब लीना के इलाज के लिए डा. बोहरा उस के फ्लैट पर गए तो उस के फ्लैट का डेकोरेशन और रहनसहन देख कर हैरान रह गए.

डाक्टर होने के नाते वह तमाम बिजनैसमैनों और उद्योगपतियों के घर गए थे, लेकिन उन्होंने इस तरह ठाठबाट से रहते हुए किसी को नहीं देखा था. लीना को देख डा. बोहरा चलने लगे तो लीना ने उन की फीस से 3 गुना फीस दी थी. इस से वह लीना और बालाजी से काफी प्रभावित हुए. वह उन के बारे में सोचने लगे कि इन का ऐसा कौन सा बिजनैस है, जो ये इस तरह शानोशौकत से रहते हैं. काफी सोचनेविचारने के बाद भी बात उन की समझ में नहीं आई.

अगले दिन जब वह लीना को देखने उन के घर गए तो उन्होंने बालाजी से उन के कारोबार के बारे में पूछ ही लिया. इस के बाद लीना और बालाजी ने उन्हें अपने कारोबार के बारे में बताया तो सच्चाई जान कर उन का मुंह खुला का खुला रह गया. यही नहीं, लीना और बालाजी ने उन से यह भी कहा कि अगर वह भी चाहे तो उन की तरह ठाठ से रह सकते हैं. उन के पास एक ऐसी स्कीम है, जिस में मात्र एक साल में 5 लाख रुपए का 15 लाख और 3 साल में 50 लाख हो सकते हैं.

डा. बोहरा पढ़ेलिखे और समझदार थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि देश के सभी वित्तीय संस्थान रिजर्व बैंक के नियमानुसार काम करते हैं और रिजर्व बैंक में कोई ऐसी स्कीम नहीं है, जो मात्र एक साल में रकम को दोगुना और 3 गुना कर दे. इस के बावजूद डा. बोहरा ने आंख मूंद कर अपने 70 लाख रुपए लीना और बालाजी की फरजी कंपनी किंग औफ लायन ओके इंडिया में निवेश कर दिए. इस की वजह यह थी कि उन्हें विश्वास था कि जिस कंपनी के निदेशक मंडल में ‘मद्रास कैफे’ जैसी सुपरहिट फिल्म की अभिनेत्री के अलावा मशहूर फिल्मी हस्ती गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के घर के लोग शामिल हों, उस संस्था में रुपए डूबने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

इस के अलावा कंपनी ने विश्वास जमाने के लिए बैंकों की गारंटी और फिक्स डिपौजिट की रसीदें दी थीं, जिन में सारी शर्तें लिखी थीं. डा. बोहरा लीना और बालाजी के रहनसहन तथा बातव्यवहार से कुछ इस तरह प्रभावित हुए थे कि उन्होंने यह बात अपने दोस्तों और क्लीनिक में आने वाले कई संपन्न मरीजों को भी बताई. उन के कहने पर ही भारीभरकम ब्याज के लालच में कई लोगों ने लीना और बालाजी की संस्था में रुपए लगा दिए. उन के एक दोस्त डा. शेख ने तो 50 लाख रुपए निवेश किए ही, उन के कई अन्य जानपहचान वालों ने भी लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी में रुपए लगा दिए.

लीना और बालाजी जिस तरह करोड़ों रुपए कमा रहे थे, उसी तरह खर्च भी कर रहे थे. उन का मकसद सिर्फ मौजमस्ती करना था. वे अपने लिए महंगीमहंगी चीजें खरीदते थे. जिस का पेमेंट वह कैश में करते थे. वे बड़ीबड़ी विदेशी गाडि़यों में फाइव स्टार होटलों में जाते और वहां पार्टियां करते और अपनी फरजी कंपनी और स्कीमों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करते. लीना और बालाजी जहां बड़े और संपन्न लोगों का ध्यान अपनी कंपनी की ओर खींच रहे थे वहीं दूसरी तरफ उन की कंपनी के कर्मचारी और एजेंट मोटे कमीशन के लालच में मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्याज का लालच दे कर उन्हें लुटवा रहे थे.

ये वे लोग थे, जो अपना पेट काट कर अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए एकएक पैसा जोड़ कर जमा कर रहे थे. ऐसे लोगों को कम समय में उन की रकम को दोगुना करने का लालच दिया जा रहा था. उन का सोचना था कि ब्याज मिलेगा तो उन की परेशानियां दूर हो जाएंगी. लेकिन इस का मौका ही नहीं आता था. जब उन के पैसे वापस करने का समय आता था तो उस पैसे का कुछ हिस्सा दे कर बाकी पैसे और अधिक ब्याज के लालच में किसी अन्य स्कीम में लगवा लिया जाता था. इस से वे खुश हो जाते थे और खुशहाल जिंदगी के सपने देखने लगते थे.

लीना और बालाजी ने इस मामले में अपने घर में काम करने वाली नौकरानी यशोदाबेन हरिजन को भी नहीं बख्शा. लीना ने उस के 50 हजार रुपए और कई महीने का वेतन रोक कर अपनी कंपनी की किसी स्कीम में लगवा दिए थे. चेन्नई से मुंबई आने के बाद लीना की मुलाकात सब से पहले फिल्म गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के पोते आदिल अख्तर हुसैन जयपुरी से जुहू के एक जिम में हुई थी. आदिल ने लीना की फिल्म ‘मद्रास कैफे’ देखी थी, जिस से वह उस से काफी प्रभावित थे. आदिल भी फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों में थे इसलिए लीना से जल्दी ही उन की दोस्ती हो गई.

दोस्ती घनिष्ठता में बदली तो लीना और बालाजी ने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया. आदिल पौश इलाके मौडल टाउन सोसायटी, गुलमोहर रोड जेवीसीडी स्कीम जुहू विलेपार्ले पश्चिम स्थित गजल विला में अपने मातापिता के साथ रहते थे. उन्होंने लीना और बालाजी को अपने पिता अख्तर हुसैन से मिलवा कर उन की योजना के बारे में बताया तो उन्हें भी खुशी हुई. बिना सोचेविचारे वह आदिल और अपने एक रिश्तेदार नासिर हुसैन जयपुरी तथा एक परिचित सलमान रिजवी के साथ उन की योजना में शामिल हो गए.

चूंकि स्व. हसरत जयपुरी का परिवार हाई प्रोफाइल था, इसलिए उस का उठनाबैठना भी वैसे ही लोगों में था. उन की वजह से तमाम लोग लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी पर विश्वास ही नहीं किया, बल्कि जुड़ भी गए. सलमान रिजवी तो उन के कहने पर मैनेजिंग डायरैक्टर बन गए. इन की वजह से फिल्मों से जुड़े लोगों ने भी लीना और बालाजी की संस्था में रुपए निवेश किए. लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर उर्फ जयकुमार न जाने कितने लोगों को शिकार बनाता, उस के पहले ही मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों को उस के इस गोरखधंधे की सूचना मिल गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद उन के फ्लैट और औफिस की तलाशी में उन के इस गोरखधंधे से जुड़े 4 सौ से अधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और निवेशकों के ढेरों फार्म बरामद हुए. दिल्ली की ही तरह ही उन के पास 7 लग्जरी गाडि़यां, जिन में रोल्स रायस फैंटम, निसान जीटीआर, एस्टन मार्टिन, हमर, पजेरो, रेंज रोवर, मित्सुबिशी इवो, बीएमडब्लू 5300, लैंड क्रूजर जैसी गाडि़यां थीं. इन गाडि़यों को लीना पौल और बालाजी ने ओएलएक्स डौट कौम से खरीदा था. जिन का उन्होंने नगद भुगतान किया था.

इस के अलावा लीना पौल और बालाजी के फ्लैट से लगभग 1 करोड़ मूल्य की 117 विदेशी घडि़यां, 4 लाख 80 हजार रुपए के 12 महंगे मोबाइल फोन, लीना पौल के 78 हैंडबैग, 8 जैकेट, 37 सनग्लास, 43 ट्राउजर्स, 40 जोड़े जूते और नामीगिरामी कंपनियों के परफ्यूम, जिस की कीमत लाखों में थी, प्राप्त हुए हैं. इन लोगों ने बाथरूम में गोल्ड प्लेटेड नल लगवा रखे थे. बालाजी की अलमारी से 42 जींस, 200 टीशर्ट, 73 शर्ट और 80 जोड़े जूते मिले. उन की इन चीजों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग कितनी शानोशौकत से रहते थे.

विस्तृत पूछताछ के बाद फिल्म अभिनेत्री से ठग बनी लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद्रशेखर उर्फ जयकुमार, अख्तर हुसैन जयपुरी, आदिल अख्तर जयपुरी, नासिर हुसैन जयपुरी, सलमान रिजवी के खिलाफ अपराध क्रमांक 33/15 पर भादंवि की धारा 420, 120बी, 3, 5, प्राइज चिटफंड सर्क्युलेशन बैंकिंग ऐक्ट 3 एमपीआईडी के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से इन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे. आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच की आर्थिक अपराध शाखा के इंसपेक्टर अशोक खेडकर कर रहे थे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Kahani: खुशियों के दुश्मन

Hindi Kahani: थानेदार ने तफ्तीश कर के रिपोर्ट पेश कर दी थी कि जमील की मौत हादसा है, लेकिन उस की मां का कहना था कि जमील की मौत हादसा नहीं, साजिश के तहत की गई हत्या है. जब इस मामले की जांच दूसरे थानेदार इंसपेक्टर अहमदयार खान ने की तो यह बात सच भी निकली.

दिल्ली की सीआईए (क्राइम ब्रांच) में तैनात एसपी पी.एल. थांपसन को हिंदुस्तानी सिपाही ही नहीं, अंगरेज अफसर भी बास्टर्ड कहा करते थे, क्योंकि वह बहुत सख्त अधिकारी था. थांपसन के चेहरे पर कभी मुसकराहट नहीं आती थी. अनुशासन के मामले में वह इतना सख्त था कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कुछ नहीं समझता था. किसी मजबूरी की वजह से भी किसी से कोई गलती हो जाती थी तो उस की मजबूरी को समझते हुए भी वह उसे माफ नहीं करता था.

थांपसन हर समय काम में लगा रहता था और किसी दूसरे को भी खाली नहीं बैठने देता था. अपने स्टाफ से वह सप्ताह में एक बार जरूर कहता था कि लोगों की इज्जत और जानमाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है. अगर कोई घटना हो जाए तो अपराधी को पकड़ने के लिए तब तक काम में लगे रहो, जब तक वह पकड़ा न जाए. वह अपने अफसरों को तांगे के घोड़ों की तरह काम में लगाए रखता था. मैं ने भी उस से सब से अच्छी बात जो सीखी थी, वह यह थी कि जो भी काम करो, लगातार और मेहनत से करो. निराशा को पास मत आने दो. जिस किसी पर जरा भी शक हो, उसे मत छोड़ो. तुम्हारी सारी सहानुभूति पीडि़त के साथ होनी चाहिए.

जिस अधिकारी को हम बास्टर्ड कहा करते थे, वह बहुत न्यायप्रिय और अपने काम को अपना नैतिक कर्तव्य समझता था. एक दिन मेरे साथी इंसपेक्टर टेनिसन ने मुझे बुला कर एक कागज पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इसे पढ़ो.’’

वह एक महिला का प्रार्थना पत्र था, जिस का जवान बेटा जिस ईंटों के भट्ठे पर काम करता था, उसी में गिर कर जल कर मर गया था. इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. थांपसन ने बताया था कि यह प्रार्थना पत्र उसे एक बड़े सम्मानित व्यक्ति ने दिया था. जिस औरत का पत्र था, वह संबंधित थाने में जाती रही थी. उसे शक था कि उस का बेटा खुद गिर कर नहीं मरा, बल्कि उसे गिरा कर मारा गया है. थाने का थानेदार उसे यह कह कर टालता रहा कि उस ने तफतीश कर ली है, उस का बेटा मारा नहीं गया था, बल्कि खुद गिर कर मरा था. जिस सम्मानित व्यक्ति ने यह कागज दिया था, वह हाईकोर्ट में एडवोकेट थे. वह अपने एक मित्र डीएसपी के साथ थांपसन से मिले थे. उस आदमी ने एसपी थांपसन को बताया था कि वह भट्ठे के मालिक को जानते हैं और उन्हें लड़के  की मौत पर शक है.

थांपसन ने इस मामले में उस इलाके के थानेदार से बात की थी, लेकिन वह थानेदार की बात से संतुष्ट नहीं थे. एसपी ने कहा कि तुम दोनों इस केस की तफ्तीश करो, अगर थानेदार ने जानबूझ कर कोई गलती की है या बिना तफतीश किए रिपोर्ट में उस की मौत संयोगवश लिख दी है तो उसे गिरफ्तार कर के मुझे रिपोर्ट करो. थांपसन के कहे अनुसार, मैं और टेनिसन उस इलाके के थाने गए, जिस इलाके में भट्ठा था. थानेदार सदाकत अली खान अंबाला का रहने वाला था. वह मौजमस्ती करने वाला अनुभवी आदमी था. उस का परिवार काफी असरदार था.

थाने पहुंच कर हम ने उसे अपने आने के बारे मे बताया तो उस ने कहा, ‘‘उस औरत ने तो मेरी नाक में दम कर रखा है. यह सच है कि उस का जवान बेटा मरा है, मैं ने उसे संतुष्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन अब पता चला कि वह ऊपर पहुंच गई है. आप लोगों को उस ने बिना वजह कष्ट दिया.’’

‘‘मां तो कभी संतुष्ट नहीं होगी, लेकिन आप हमें संतुष्ट करने के लिए केस की फाइल दिखा दें.’’ मैं ने कहा तो वह फाइल ले आया.

फाइल के अनुसार, किसी व्यक्ति ने आ कर बताया था कि उस का एक नौकर पांव फिसलने से भट्ठे में गिर गया और जल कर मर गया. वह घटनास्थल पर पहुंचा और लाश देखी. वह इतनी बुरी तरह जल गई थी कि पहचानी नहीं जा सकती थी. उस ने मौके पर 3 लोगों से पूछताछ की, जिन्होंने बताया कि वह फिसलने से ही भट्ठे में गिर कर मरा था. थानेदार ने इस घटना को संयोगवश हुई घटना बता कर केस बंद कर दिया था.

‘‘खान साहब, आप ने जबानी तौर पर मालूमात कर के जो तफतीश की थी, वह भी हमें सुना दो.

उस ने बताया, ‘‘पहली बात तो यह पता चली कि मरने वाला जमील अहमद विधवा मां का बेटा था. उस ने 2, ढाई साल पहले मैट्रिक की परीक्षा पास की थी और उस के बाद भट्ठे के मालिक के यहां नौकर हो गया था. भट्ठे का मालिक बहुत बड़ा ठेकेदार था, जो सरकारी ठेके ले कर निर्माण कार्य कराता था.’’

मैं ने थानेदार से पूछा, ‘‘इस के अलावा और कुछ बताएंगे?’’

‘‘आप पूछिए, बताता हूं.’’ उस ने कहा तो टेनिसन ने पूछा, ‘‘मरने वाले को भट्ठे पर क्या काम दिया गया था?’’

थानेदार ने कहा, ‘‘मैं ने यह नहीं पूछा था कि उसे क्या काम दिया गया था, बस इतना पता चला था कि वह वहां नौकर था.’’

‘‘आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि मरने वाले की वहां किसी से दुश्मनी रही हो और उसे भटठे में धक्का दे दिया गया हो?’’

‘‘मैं ने फाइल में तो नहीं लिखा, लेकिन मैं ने पता किया था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.’’

मैं ने नोट किया था कि यह कहते हुए थानेदार की जबान साथ नहीं दे रही थी. इस का मतलब वह झूठ बोल रहा था.

‘‘सदाकत भाई, हम तफतीश करने आए हैं, अगर कोई संदेह वाली बात हो तो हमें बता दो या यह कह दो कि आप ने तफ्तीश में उतनी रुचि नहीं ली, जितनी लेनी चाहिए थी. आप का यह कह देना काफी नहीं है कि वह मां है, इसलिए तंग कर रही है.’’

सदाकत अली बेचैन हो गया. उस के चेहरे के भावों से साफ लग रहा था कि उस से गलती हुई थी. अगर मेरे साथ अंगरेज अफसर नहीं होता तो शायद वह मुझ से बिना झिझके बात करता. अंगरेज अफसरों से हिंदुस्तानी अफसर डरते थे. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि वह हमें उस औरत के घर तक पहुंचा दे, क्योंकि पुरानी दिल्ली में किसी का मकान ढूंढना आसान नहीं था.

सदाकत अली ने हमें एक हेडकांस्टेबल के साथ उस औरत के घर भेज दिया. जाते वक्त टेनिसन ने कहा, ‘‘एक काम करना खान, ठेकेदार खलील से कहना कि वह थाने आ जाए. हम वापस थाने आएंगे.’’

उस औरत के घर पहुंच कर हम ने घर का दरवाजा खटखटाया. 5-6 मिनट बाद एक अधेड़ उम्र की औरत ने दरवाजा खोला. चेहरेमोहरे और पहनावे से वह मिडिल क्लास की अच्छीभली महिला लग रही थी. इस उम्र में भी वह काफी सुंदर थी. वह हमें घर के अंदर ले गई. औरत का नाम राशिदा था. उस के पति को मरे 4-5 साल हो गए थे. उस का भाई कुछ पैसे दे दिया करता था, जिस से घर का खर्च चलता था. उस का बेटा जमील दसवीं पास कर के भट्ठे पर नौकरी करने लगा था.

‘‘आप यह बताइए कि आप को कैसे शक हुआ कि आप का बेटा भट्ठे में खुद नहीं गिरा, बल्कि उसे धक्का दे कर आग में गिराया गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरा बेटा हर रात मेरे सपने में आता है और मुझ से कहता है कि मेरे हत्यारों को पकड़वाओ, मैं खुद नहीं गिरा.’’ उस ने भावुक हो कर कहा.

‘‘क्या वह यह नहीं बताता कि उसे किस ने धक्का दिया था?’’

‘‘नहीं, मैं पूछती हूं, तब भी नहीं बताता.’’ उस ने कहा, ‘‘लेकिन उस के इस तरह सपने में आने से मुझे पूरा यकीन है कि वह खुद नहीं गिरा.’’

यह एक मां के उदगार थे. उस की बात काटने के बजाय मैं ने और इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा कि हम सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं, जिस से कि हम हत्यारे को पकड़ सकें. मैं ने राशिदा से पूछा, ‘‘जमील भट्ठे पर कितने दिनों से काम कर रहा था, वह वहां क्या काम करता था?’’

‘‘मेरा बेटा वहां 3 सालों से काम कर रहा था, वह वहां नौकर नहीं, मुंशी था. ठेकेदार के घर भी जाता था और घरपरिवार की जरूरत की चीजें भी ला कर देता था. ठेकेदार की एक बेटी कालेज में पढ़ती थी, उसे लाने ले जाने के लिए एक तांगा लगा था. मेरा बेटा सुबह को उस लड़की को ले कर जाता था और शाम को वापस घर लाता था. ठेकेदार इस काम का उसे अलग से पैसे देता था. 5-6 दिनों से वह भट्ठे पर जा रहा था. उस ने बताया था कि भट्ठे का मुंशी छुट्टी गया है और उस के आने तक उसे ही वहां का हिसाबकिताब रखना पड़ेगा.’’

इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा, ‘‘ठेकेदार को आप के बेटे पर पूरा भरोसा था?’’

‘‘हां जी, भरोसा था तभी तो खलील अपनी बेटी को मेरे बेटे के साथ भेजता था. भरोसे की एक वजह यह भी थी कि ठेकेदार हमारा दूर का रिश्तेदार था. पहले उस का यही एक भट्ठा था. तब मकान कम बनते थे, इसलिए काम भी कम था. जब हिंदूमुसलमानों ने मकान बनाने शुरू किए तो उस के भट्ठे का काम बढ़ गया और खलील ठेकेदार भी बन गया.

‘‘आदमी होशियार और चालाक था, हर किसी को खुश करना जानता था. इसलिए जल्दी ही उस का कारोबार फैलता गया. 2 साल पहले उस ने नई दिल्ली में अपनी कोठी भी बना ली. मेरे पति के मरने के बाद उस ने हमारे ऊपर एक उपकार यह किया कि दसवीं पास करते ही मेरे बेटे को नौकरी पर रख लिया. जमील जल कर मर गया तो ठेकेदार ने मुझे 5 हजार रुपए भिजवाए, लेकिन मैं ने यह कह कर लेने से मना कर दिया कि मैं अपने बेटे की कीमत नहीं लूंगी.’’

‘‘आप को ठेकेदार पर तो शक नहीं है?’’ टेनिसन ने पूछा.

‘‘नहीं, उस पर शक नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘लेकिन उस से शिकायत जरूर है.’’

‘‘कैसी शिकायत?’’ मैं ने पूछा तो उस ने कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन पर वह खुद भी मुतमईन नहीं थी.

‘‘अगर तुम्हें ठेकेदार पर शक है तो साफ बता दो और अग

नहीं है तो कह दो कि शक नहीं है.’’ मैं ने थोड़ी झुंझलाहट में कहा.

‘‘ठेकेदार पर शक का कोई कारण नहीं है,’’ राशिदा ने कहा, ‘‘इतने अमीर आदमी के साथ हमारी क्या दुश्मनी हो सकती है? उसे जमील पर भरोसा था, तभी वह अपनी जवान बेटी को उस के साथ भेजा करता था.’’

‘‘यह भी तो एक कारण हो सकता है कि उस की बेटी जवान थी और आप का बेटा भी. हो सकता है ठेकेदार ने उन दोनों को आपत्तिजनक हालत में देख लिया हो.’’

‘‘मैं यह नहीं मान सकती, मेरा बेटा इतना होशियार और चालाक नहीं था. अगर ऐसी बात होती तो ठेकेदार मुझ से शिकायत करता या उसे नौकरी से निकाल देता. उसे पता था कि हमारे लिए यही सजा बहुत है.’’

बातोंबातों में राशिदा ने हमें बताया था कि ठेकेदार ने पहले उसे 5 हजार रुपए देने चाहे थे, बाद में यह रकम बढ़ा कर 8 हजार कर दी थी. आजकल हजार रुपए कुछ नहीं हैं, लेकिन उस जमाने के एक हजार रुपए आज के एक लाख रुपए के बराबर होते थे. राशिदा ने यह रकम नहीं ली थी और थाने पहुंच गई थी.

2 महीने गुजर गए, जमील का चालीसवां होने के बाद ठेकेदार ने अपनी बेटी की शादी कर दी थी. राशिदा 3-4 बार थाने गई. उस ने हमें बताया कि थानेदार कभी तो उस से बड़े प्यार से बातें करता था, कभी उसे थाने से निकाल देता था. जिस एडवोकेट ने उस का प्रार्थना पत्र एसपी थांपसन के पास पहुंचाया था, वह उस के पति का दोस्त था. राशिदा से हमें कोई सबूत नहीं मिला. बस एक ही बात जो शक पैदा कर रही थी, वह यह थी कि जमील ठेकेदार की बेटी को स्कूल ले जाता और ले आता था. हमें यह पता करना था कि ठेकेदार की लड़की का चरित्र कैसा था.

मैं और टेनिसन लौट कर थाने पहुंचे तो खलील ठेकेदार थानेदार के पास बैठा था. उस की उमर 50-60 साल के लगभग थी. शक्ल और सूरत से वह सम्मानित व्यक्ति लगता था. मेरी राय में वह या तो बहुत सभ्य और सम्मानित आदमी था या फिर पक्का गुरुघंटाल था. मैं ने और टेनिसन ने तय कर लिया था कि उसे भट्ठे पर ले जा कर बात करेंगे, क्योंकि हमें भट्ठा भी देखना था. हम ने उस से कहा कि वह हमें अपने भट्ठे पर ले चले. उस का भट्ठा दिल्ली के बाहरी इलाके में था.

ठेकेदार खलील के भट्ठे पर पहुंच कर हम ने उस से वह जगह दिखाने को कहा, जहां से जमील आग में गिरा था. उस ने हमें वह जगह दिखाई. मैं ने और टेनिसन ने भट्ठे का किनारा ध्यान से देखा. वहां फिसलने लायक नहीं था. ठेकेदार ने हमें बताया कि जमील किनारे तक चला गया था.

‘‘उस समय वह अकेला था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ ठेकेदार ने जवाब दिया, ‘‘मजदूर बहुत होते हैं, उन पर एक मेट होता है, जो उन्हें संभालता है. उस समय वही उस के साथ था. उसी ने मुझे यह सब बताया था.’’

‘‘तब आप को जरा भी शक नहीं हुआ कि उसे किसी ने गिरा दिया होगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आप का मतलब है कि उस की किसी से दुश्मनी रही होगी,’’ ठेकेदार ने कहा, ‘‘उस बेचारे की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी. उसे तो भट्ठे पर आए 4 दिन हुए थे.’’

ठेकेदार का पूरा बयान हमें बाद में लेना था, अभी तो हम घटनास्थल देखने आए थे. हमें यह भी देखना था कि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह था या नहीं? जिस मेट के साथ होने की बात ठेकेदार ने कही थी, वह वहीं था. मजदूर चले गए थे, चौकीदार आ गए थे. हम ने ठेकेदार से कहा कि वह रात को 9 बजे मेट को ले कर क्राइम ब्रांच औफिस आ जाए. हम दोनों रात 10 बजे हेडक्वार्टर पहुंचे. ठेकेदार मेट को लिए हमारे इंतजार में बैठा था. हम ने उसे 9 बजे का समय दिया था, लेकिन हम एक घंटा लेट आए थे. हम ने ठेकेदार को बुलाया. हमारे सवालों के जवाब में उस ने जमील के बारे में वही बातें बताईं, जो उस की मां बता चुकी थी.

‘‘साहब, मुझे इस लड़के के मरने का इतना दुख है कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते. बेचारा अनाथ था, छोटे भाई और मां का एकलौता सहारा. मेरे पास इतना कुछ है कि मैं उस लड़के को नौकरी पर लगा कर सब से ज्यादा वेतन दिया करता था. बहुत सज्जन और भरोसे का लड़का था. उस के रहते मुझे किसी बात की चिंता नहीं थी. मेरी जवान बेटी को कालेज ले जाता था. मैं उस की मां का सामना नहीं कर सकता.’’

यह सब कहते हुए ऐसा लग रहा था, जैसे वह अभी रो पड़ेगा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने उस की मां को देने के लिए 5 हजार रुपए भेजे थे, लेकिन उस ने लेने से मना कर दिया. उस के बाद तुम ने 3 हजार और बढ़ा कर भेजे, लेकिन वह भी उस ने लेने से मना कर दिया. तब तुम ने उसे धमकी दी कि वह दूसरे बेटे को भी खो दोगी, यह धमकी तुम ने क्यों दी?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने उसे कोई धमकी नहीं दी. मैं ने तो कहा था कि उस का दूसरा बेटा मैट्रिक पास कर ले तो उसे मैं नौकरी दे दूंगा.’’ यह बातें कहने में वह घबरा रहा था, ‘‘असली बात यह है साहब कि वह मां है, उस का जवान बेटा मर गया है. उसे शक है कि उस के बेटे को किसी ने उठा कर आग में फेंक दिया है. ऐसी स्थिति में मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता. हो सकता है, मैं ने उसे थाने जाने से रोकने के लिए कोई सख्त बात कह दी हो और वह उसे धमकी समझ बैठी हो. मैं ने खुद ही पुलिस को बुलाया था. थानेदार साहब ने इस मामले की बहुत मेहनत से तफ्तीश की थी.’’

‘‘जमील तुम्हारे दूसरे काम करता था, फिर तुम ने उसे भट्ठे पर क्यों भेजा था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

‘‘भट्ठे का मुंशी 7-8 दिनों के लिए छुट्टी पर चला गया था. जो नौकर थे, वे पैसों में गड़बड़ कर देते थे, जमील मेरे घर का मेंबर था, इसलिए उसे भेजा था.’’

‘‘तुम्हारा मुंशी इस के पहले कब छुट्टी पर गया था?’’ इंसपेक्टर टेनिसन ने पूछा.

अचानक पूछे गए इस सवाल से उस की जबान जरा हकला सी गई, ‘‘यह मैं पूछ कर बताऊंगा.’’

इस के बाद मैं ने और टेनिसन ने उस पर सवालों की बौछार कर दी, जिस से वह घबरा गया. घबराहट उस के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी. अपने सवालों और उस के जवाबों से हम कई बातें समझ गए थे.

‘‘खलील साहब, मैं तुम्हें भाई की हैसियत से सलाह देता हूं कि अभी तुम्हारे पास समय है. अगर तुम हमें सच्ची बात बता देते हो तो तुम्हारे लिए आसानी रहेगी, क्योंकि हमें बाद में सच्चाई पता चली तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं रहेगा. यह बात अच्छी तरह समझ लो कि इस केस की तफ्तीश सीआईए कर रही है. अभी तो तुम से बहुत आदर से बातें हो रही हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम दूसरे तरीके भी अपना सकते हैं.’’

‘‘आप को क्या शक है साहब?’’ उस ने पूछा.

‘‘शक नहीं, हमें पूरा यकीन है कि जमील को आग में फेंका गया है और तुम्हें इस की पूरी जानकारी है.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ नहीं मालूम. लेकिन जब आप कह रहे हैं कि उसे आग में फेंका गया है तो मैं इस बात का पता लगाऊंगा.’’ ठेकेदार ने कहा.

‘‘ठेकेदार साहब, हम तुम्हें कल शाम तक का समय देते हैं. अगर तुम्हारे दिल में कोई बात हो तो हमें बता दो.’’ कह कर ठेकेदार को घर भेज दिया.

ठेकेदार के जाने के बाद हम ने उस के मेट को बुलाया. वह 35-36 साल का छरहरे बदन का आदमी था. उस ने अपना नाम सिराज बताया. लेकिन सब उसे सागर के नाम से पुकारते थे. उस ने बताया कि वह पिछले 10 सालों से खलील के भट्ठे पर काम कर रहा था.

‘‘एक बात ध्यान में रख लो सागर, झूठ बोलोगे तो पिस जाओगे. यह धनी लोग अपना पाप गरीबों के खाते में डाल देते हैं. यहां भी मुझे ऐसा ही दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताओ कि जमील को ठेकेदार ने अन्य कामों से हटा कर भट्ठे पर क्यों लगाया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मुंशी छुट्टी चला गया था, उस की जगह जमील आया था.’’ उस ने कहा.

‘‘मुंशी कब से काम कर रहा है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हुजूर, कोई 6-7 साल से काम कर रहा है.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘वह इस के पहले कब छुट्टी गया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जहां तक मुझे याद है 3 साल पहले गया था.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘क्या उस समय भी ठेकेदार ने जमील को या किसी और को उस की जगह भट्ठे पर भेजा था?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘नहीं साहब.’’ उस ने कहा.

‘‘अच्छा यह बताओ, भट्ठे पर पैसे कौन खाता है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई नहीं खा सकता, क्योंकि मेमो बनता है.’’ उस ने कहा.

‘‘झूठ बोल रहे हो. पैसे तुम मारते हो,’’ मैं ने उसे भड़काने के लिए कहा, ‘‘ठेकेदार ने जमील को भट्ठे पर इसीलिए भेजा था.’’

‘‘क्या यह बात ठेकेदार ने कही है?’’ उस ने चौंक कर पूछा.

‘‘यही नहीं, ठेकेदार ने तुम्हारी बहुत सी करतूत बताई हैं.’’ मेरे इतना कहते ही उस के चेहरे का रंग बदलने लगा.

मैं ने और टेनिसन ने उस दौरान भी उस से कई सवाल पूछे. वह उन के जवाब तो दे रहा था, लेकिन हम उस के जवाब के बजाय उस के चेहरे के उतारचढ़ाव को देख रहे थे. इस से हमें लगा कि उस के दिल में कोई बात है. मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए हम ने कुछ देर के लिए उसे दूसरे कमरे में भेज दिया और हम दोनों आपसी विचारविमर्श करने लगे. भट्ठे के मजदूरों पर जो मेट लगाए जाते हैं, उन में ज्यादातर अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं. ठेकेदार खलील का यह मेट भी मुझे ऐसा ही लग रहा था. मैं ने और टेनिसन ने विचारविमर्श कर के तय किया कि इस मेट को भट्ठे पर न जाने दिया जाए, वरना इस के डर से कोई मजदूर सही बात नहीं बताएगा.

मेट सागर को हम ने दोबारा अपने कमरे में बुलाया और उस से पूछा कि जमील का चरित्र कैसा था? उस ने बताया कि उस का चरित्र ठीकठाक था. वह अपने काम से काम रखता था. उस ने यह भी बताया कि जमील ठेकेदार का दूर का रिश्तेदार था, इसलिए सब उस का सम्मान करते थे. मैं ने अपने शक की बिना पर उस से पूछा कि ठेकेदार की लड़की से जमील का क्या चक्कर चल रहा था?

‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं जानता सरकार. जमील उन के घर भी जाता था और उन की बेटी को कालेज भी ले जाता था और ले भी आता था.’’ उस ने कहा.

‘‘और लड़की के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘लड़की परदे में रहती थी, कालेज भी बुरका पहन कर जाती थी. वैसे हुजूर, मैं आप को बता दूं कि ठेकेदार की सभी औरतें परदे में रहती हैं.’’ वह बोला.

‘‘जमील जब भट्ठे में गिरा था, उस समय तुम उस के साथ थे. तब तुम ने उसे आगे जाने से रोका क्यों नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे रोका था साहब, लेकिन उस का पांव ऐसा फिसला कि वह उस में गिर गया. मुझे लगा कि जैसे वह भट्ठे की आग देखने जा रहा है.’’ सागर ने बताया.

अगले दिन सुबह 8, साढ़े 8 बजे हम भट्ठे पर गए. ठेकेदार को हम ने नहीं बताया था कि हम वहां जाएंगे. वहां वही मुंशी मिल गया, जिस की जगह पर जमील को लगाया गया था. हम ने उस की बातचीत से महसूस किया कि मुंशी सागर से डरासहमा रहता था.

‘‘तुम पिछली बार छुट्टी पर कब गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई 3 साल हो गए होंगे.’’ वह बोला.

‘‘इन 3 सालों में तुम्हें छुट्टी नहीं मिली या तुम खुद नहीं गए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं कहीं दूर का आदमी नहीं हूं साहब,’’ उस ने हाथ के इशारे से कहा, ‘‘वह जो गली दिखाई दे रही है, उसी में रहता हूं.’’

‘‘अब शायद कोई लंबा काम आ पड़ा था, इसीलिए छुट्टी पर चले गए थे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे कोई काम नहीं था. वह तो एक दिन सागर ने मुझ से कहा कि तुम्हारे छुट्टी न लेने से ठेकेदार तुम्हें मैडल तो देगा नहीं. इसलिए छुट्टी लो और घूमोफिरो, मौजमस्ती करो. इस के बाद उस ने ठेकेदार से मुझे 8 दिनों की छुट्टी दिलवा दी थी.’’

जब मैं छुट्टी से लौटा तो पता चला कि जमील भट्ठे की आग में गिर कर मर गया. उस की मौत के बारे में जान कर मुझे बहुत दुख हुआ. मुंशी की बातों से साफ लग रहा था कि मुंशी को छुट्टी भिजवाना जमील की हत्या के षडयंत्र की एक कड़ी थी. अब हमें यह पता करना था कि यह साजिश अकेले सागर की थी या उस में ठेकेदार खलील भी शामिल था.

‘‘तुम बड़े काम के आदमी हो. ठेकेदार का यह भट्ठा तुम्हीं चला रहे हो. सागर तो कुछ काम करता नहीं, वह तो सिर्फ गुंडागर्दी करता रहता है.’’ उस की पीठ थपथपाते हुए मैं ने उस के अंदर खूब हवा भरी, जिस से वह कुछ और उगल दे. इंसपेक्टर टेनिसन ने भी उस की प्रशंसा के बड़ेबड़े पुल बांधे.

‘‘एक बात बताओ इदरीस,’’ मैं ने मुंशी से कहा, ‘‘जमील को मरे 2 महीने से ज्यादा हो गए हैं, जब तुम छुट्टी से लौट कर आए तो तुम ने मजदूरों से पूछा होगा कि जमील आग में कैसे गिरा? इस के बाद तुम ने सागर से पूछा होगा?’’

‘‘सब को हैरानी इस बात पर थी कि वह आग में गिरा कैसे? इतनी तेज आग के पास तो कोई जाता तक नहीं.’’ मुंशी ने जवाब दिया.

मैं ने कहा, ‘‘इदरीस कहीं ऐसा तो नहीं कि जमील का यहां किसी लड़की से चक्कर चल रहा हो और उस लड़की को सागर भी चाहता हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है और सही बात यह है कि सागर के विरुद्ध यहां कोई जबान नहीं खोल सकता. मैं भी उस से डरता हूं,’’ मुंशी ने कहा.

‘‘कहां है सागर?’’ इंसपेक्टर टेनिशन ने पूछा.

‘‘वह अभी आ जाएगा, वह साढ़े 10 बजे तक आता है.’’ मुंशी ने बताया.

‘‘वह अब नहीं आएगा, वह हवालात में बंद है.’’ टेनिसन ने कहा.

मुंशी हैरान हो कर देखने लगा.

‘‘हैरान न हो इदरीस,’’ मैं ने कहा, ‘‘सागर को हम ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

हमारे साथ एक हेडकांस्टेबल और एक कांस्टेबल भी था. हम ने उन से कहा कि वे सागर को हथकड़ी लगा कर यहां ले आएं. मुंशी को जब पक्का यकीन हो गया कि उन का मेट गिरफ्तार हो गया है तो उस ने कहा, ‘‘साहब, अब मेरी समझ में आ गया कि सागर छुट्टी जाने के लिए मेरे पीछे क्यों पड़ा था. सच बात तो यह है कि यहां का हर मजदूर सागर से डरता है. यह आदमी मनमानी करता है.’’

पूछने पर मुंशी ने दिल्ली स्थित उस के घर का पता भी बता दिया था. इस के बाद मुंशी ने वहां काम करने वाले 5 मजदूरों को भी बुला लिया. हम ने उन सभी के बयान लिए. उन से पता चला कि सागर ही एक योजना के तहत जमील को भट्टे पर उस जगह ले गया था, जहां आग जल रही थी और उस ने उसे उस आग में धकेल दिया था. हम मजदूरों से पूछताछ कर रहे थे कि ठेकेदार आ गया. मैं ने उसे वहां से हटा दिया. ठेकेदार वहां से चला गया तो हम मजदूरों से और पूछताछ करने लगे. कुछ देर में पुलिस कांस्टेबल सागर को हथकड़ी लगाए ले आए. मैं ने देखा, मजदूर काम छोड़ कर हैरानी से सागर को हथकड़ी में बंधा देख रहे थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतना दबंग आदमी भी गिरफ्तार हो सकता है.

इस के बाद हम ने मजदूरों से सागर के बारे में पूछा तो उन्होंने उस के गंदे कामों से परदा उठाना शुरू कर दिया. वह सभी मजदूरों से 5 रुपए हर महीने कमीशन लेता था. उन की लड़कियों को अपनी नौकरानी समझता था. हमें जो कुछ पता करना था, कर लिया था. फिर उसे हेडक्वार्टर ले आए. सागर पुरानी दिल्ली का रहने वाला था. मैं ने उस इलाके के थानेदार को उस का नामपता बता कर उस के बारे में और जानकारी जुटाने को कहा, साथ ही यह भी कहा कि अगर उस का कोई जानकार हो तो उसे भी साथ ले आएं.

थानेदार ने मुझे फोन पर ही बता दिया कि यह आदमी थाने के रिकौर्ड में है और एक बार इसे सजा भी हो चुकी है. सागर के आपराधिक रिकौर्ड की पूरी रिपोर्ट उन्होंने एक कांस्टेबल द्वारा मेरे पास भिजवा दी. उस सिपाही की सागर से दोस्ती थी. उस ने सागर की पूरी कहानी हमें सुना दी. उस ने जीबी रोड की एक वेश्या का नाम भी बताया, जिस के पास सागर अकसर जाता रहता था. मैं ने उस कांस्टेबल से उस वेश्या का पता ले लिया.

अगले दिन मैं हेडक्वार्टर गया तो टेनिसन को थानेदार द्वारा सागर के बारे में दी गई रिपोर्ट दिखाई और कांस्टेबल ने जो बातें जुबानी बताई थीं, वह भी बता दीं. टेनिसन ने उस वेश्या को बुलाने के लिए एक एएसआई को भेजा. यहां मैं आप को अपराधियों की मानसिकता के बारे में बता दूं कि इस तरह के लोग मन बहलाने के लिए वेश्याओं के पास जा कर शराब पीते हैं और लूटे हुए माल से ऐश करते हैं. छोटीमोटी घटनाएं ऐसे लोगों की आदत में शामिल होती हैं, लेकिन हत्या ऐसी घटना होती है, जिसे कोई भी हजम नहीं कर सकता. आम तौर पर देखा गया है कि पेशेवर हत्यारे भी हत्या कर के अपनी प्रिय वेश्या के पास जा कर शराब के नशे में बड़े घमंड से वेश्या को बता देते हैं कि वे हत्या कर के आए हैं.

हम ने उस वैश्या को इसी आशय से बुलाया था कि उस से हत्या का कोई सुराग जरूर मिल जाएगा. लगभग एक घंटे बाद वह वेश्या आ गई. 35 की उमर रही होगी उस की. बहुत सुंदर थी वह. हम ने उसे बिठाया. उस के चेहरे पर घबराहट और डर था. हम ने उसे सामान्य करने के लिए इधरउधर की बातें कीं. वह एक वेश्या थी, जिस का सोसाइटी में न कोई स्थान था और न आदरसम्मान. मेरे इज्जत देने पर वह गुब्बारे की तरह फूलती चली गई. कुछ देर बाद बोली कि उसे यहां क्यों बुलवाया गया है?

‘‘तुम्हारा यार सागर फांसी चढ़ रहा है.’’ मैं ने कहा, ‘‘उस रात सागर तुम्हारे पास गया था, तब उस ने तुम्हें पूरी घटना बता दी थी. यह बात वह कुबूल कर चुका है. तुम्हें केवल पुष्टि के लिए बुलाया है.’’

‘‘हां.’’ उस ने एक ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘उस रात वह बहुत अधिक पी कर आया था. उल्टीसीधी बकबक कर रहा था. उस ने कहा था कि आज बहुत पैसे कमाए हैं. एक लड़के को जिंदा जला कर भस्म कर दिया है. मैं समझी कि डींगे मार रहा है.’’

‘‘नहीं, डींगें नहीं, वह सच कह रहा था. तुम्हें उस ने कितनी रकम बताई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘5 हजार रुपए बता रहा था, लेकिन मैं ने विश्वास नहीं किया कि इतनी रकम कौन देगा.’’

इस के बाद सागर को हवालता से निकलवा कर उस के कारनामों का पुलिंदा रख दिया, साथ ही वेश्या की बात भी उसे बता दी. इस के बाद उस से अपराध कबूलवाने के लिए कहा, ‘‘सागर, तुम ने किस आदमी पर भरोसा किया. उस ठेकेदार पर, जिस ने बयान में कहा है कि तुम ने जमील को धक्का दिया था. ठेकेदार ने हमें गवाह भी उपलब्ध करा दिए हैं. जिस वेश्या पर तुम ने भरोसा किया था, अभीअभी बयान दे कर गई है. इसलिए गनीमत इसी में है कि तुम अपना जुर्म स्वीकार कर लो, वरना तुम्हारी जुबान खुलवाने के लिए हमें दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

यह सुनते ही उस ने ठेकेदार को गालियां देते हुए कहा कि उसी के कहने पर ही उस ने इतना बड़ा अपराध किया था और वही मेरे खिलाफ बयान दे गया. इस के बाद उस ने पूरी कहानी बयां कर दी. सिराज उर्फ सागर ठेकेदार का बौडीगार्ड था, साथ ही भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों को भी कंट्रोल करता था. किसी व्यक्ति को डरानेधमकाने या रुकी हुई रकम निकलवाने के लिए ठेकेदार उसी को इस्तेमाल करता था. एक दिन ठेकेदार ने सागर से कहा कि जमील को जमींदोज करना है. सागर ने कारण पूछा तो उस ने कहा कि उस की बेटी को जमील ने प्रेमजाल में फांस लिया है. उन का यह चक्कर बचपन से चल रहा है. लेकिन वह उसे स्कूल ले आने और ले जाने लगा तो उसे मिलने का मौका मिल गया.

शाइस्ता के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था. लड़का शिक्षित और धनी व्यापारी का बेटा था. ठेकेदार ने रिश्ते के लिए हां कर दी. लेकिन शाइस्ता ने मां से साफ कह दिया कि वह जमील के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगी. अगर उस के साथ जबरदस्ती की गई तो वह निकाह के समय मना कर देगी. उसे मांबाप और बहनों ने बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही. ठेकेदार ने उस की पढ़ाई छुड़वा कर शादी की तैयारियां शुरू कर दीं. शाइस्ता ने अपनेआप को एक कमरे में बंद कर लिया. उस ने धमकी दी कि वह दरवाजा तभी खोलेगी, जब जमील आ कर कहेगा. उस ने खानापीना तक छोड़ दिया.

बेटी की हालत देख कर ठेकेदार ने जमील को बुलाया. अब ठेकेदार को जमील दुश्मन दिख रहा था. उस ने सागर से कहा कि जमील को इस तरह से मारा जाए कि उस की बेटी को पता न चले कि उस की हत्या हुई है. सागर ने उसे 2-3 तरीके बताए, लेकिन ठेकेदार ने यह कह कर मना कर दिया कि इस से हत्या और अपहरण का शक होगा. तब ठेकेदार ने ही बताया कि जमील को भट्ठे की आग में डाल दिया जाए. यह तरीका सागर को भी आसान लगा. ठेकेदार ने उसे भरोसा दिया कि काम हो जाने पर वह उसे 5 हजार रुपए देगा.

सागर और ठेकेदार ने जमील को भट्ठे की आग में जलाने की योजना बनाई. इस के बाद योजना के अनुसार सागर ने मुंशी इदरीस को छुट्टी पर भेज कर उस की जगह जमील को काम पर लगवा दिया. 2-3 दिनों में सागर ने जमील से दोस्ती कर ली और एक दिन जमील के पास आ कर बोला, ‘‘आओ, मैं तुम्हें दिखाऊं कि भट्ठे में कच्ची ईंटें कैसे रखी जाती हैं और आग कैसे जलाई जाती है.’’

जमील सागर की बातों में आ कर उस के साथ भट्ठे पर चला गया. सागर ने मजदूरों को दूर भेज दिया. जमील को भट्ठे के किनारेकिनारे ले जाते हुए सागर उसे वहां ले आया, जहां तेज आग जल रही थी. जमील आग की गरमी से दूर हटने लगा तो सागर ने जमील को कूल्हे से इतनी जोर से धक्का मारा कि जमील आग में जा गिरा. जिस जगह वह गिरा था, वह जगह 10 फुट गहरी थी. जमील की केवल एक चीख सुनाई दी.

सागर ने शोर मचाया तो मजदूर इकट्ठा हो गए. तब तक जमील जल कर कोयला हो चुका था. आग में पानी फेंका गया. आग तो बुझ गई, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि उस में आदमी जला है या पेड़ की टहनी. ठेकेदार को सूचना दी गई, वह आया और उस ने थाने को सूचना दी. इलाके का थानेदार सदाकत अली भट्ठे पर आया और थोड़ीबहुत पूछताछ कर के चला गया. मैं ने सागर से पूछा, ‘‘थानेदार ने तफतीश तो की होगी?’’

‘‘अजी उस ने कोई तफतीश नहीं की, 5 सौ रुपए ले कर लिख दिया कि मौके का निरीक्षण करने पर पता चला कि मौत दुर्घटना के कारण हुई थी. हम तो खुश थे कि मामला खतम हो गया. लेकिन जमील की मां की आहें रंग लाईं और असलियत सामने आ गई.’’

सागर के इस खुलासे के बाद ठेकेदार को गिरफ्तार कर लिया गया. जब उसे पता चला कि सागर ने सारा खुलासा कर दिया है तो उस के सामने भी अपना अपराध स्वीकार करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था. पूरा मामला खुल चुका था. दोनों अभियुक्त भी गिरफ्तार किए जा चुके थे. इस में सदाकत अली की भूमिका संदिग्ध दिखी. इंसपेक्टर टेनिसन ने एसपी थांपसन के सामने दोनों अभियुक्तों को पेश किया. उन्होंने भी उस से पूछताछ की. जांच के बाद एसपी ने थानेदार सदाकत अली को निलंबित कर दिया. यह हत्या शाइस्ता की वजह से हुई थी, इसलिए उस का बयान भी जरूरी था. हम ने उसे भी थाने बुलवा लिया.

लेकिन उस की जगह उस का पति आया. मैं ने कहा, ‘‘आप शाइस्ता को हमारे पास भेजें. आप निश्चिंत रहें, हम उस से दोएक बातें पूछ कर उसे आप के साथ भेज देंगे.’’

दरअसल, शाइस्ता को आप के पास भेजने से पहले मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहता हूं. आप मेरी बात सुन लें, फिर शाइस्ता से जो चाहें, पूछ लें.’’

मैं ने इंसपेक्टर टेनिसन की ओर देखा. उन्होंने सिर हिलाया. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘मैं आप को ऐसी बात बताने जा रहा हूं, जिसे सुन कर आप हैरान रह जाएंगे. शाइस्ता से शादी के बाद मैं बहुत खुश था. लेकिन शादी की पहली रात उस ने मुझ से कहा, ‘आप ने न मेरा अपहरण किया है और न ही आप के मातापिता ने मेरे साथ कोई ज्यादती की है. इस में आप का कोई दोष नहीं है, इसलिए आप को यह बताना जरूरी है कि मैं ने आप को दिल से कबूल नहीं किया है. लेकिन मैं आप को मायूस नहीं करूंगी. मेरा शरीर आप का है, आप इसे जिस तरह चाहे प्रयोग करें, लेकिन भावनात्मक तौर पर मैं आप का साथ नहीं दे सकूंगी.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हिल गया. मैं ने उस से पूछा कि क्या तुम किसी और को पसंद करती हो? उस ने कहा, ‘आप ने सुना होगा कि हमारे भट्ठे पर जमील नाम का एक लड़का आग में गिर कर मर गया था. मैं उसी से प्यार करती थी. वह दुर्घटना नहीं, बल्कि उसे मेरे घर वालों ने साजिश रच कर मारा है. लेकिन कोई भी ताकत उसे मेरे दिल से नहीं निकाल सकती. मैं आप से बागी नहीं हो सकती, आप का हर हुक्म मानूंगी.’

‘‘पता नहीं क्या हुआ सर, उस की हृदयस्पर्शी बातें सुन कर मैं ने मन ही मन तय कर लिया कि मैं शाइस्ता को उस के अतीत की बातें अपने मातापिता को भी पता नहीं चलने दूंगा. मुझ से जमील के बारे में कितनी भी बातें करे, मैं बुरा नहीं मानूंगा. मैं वही करूंगा जो वह कहेगी. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर आंखों से लगाए और बहुत रोई. आज हमारी शादी को 20-21 दिन हो गए हैं, मैं ने उसे बिलकुल भी हाथ नहीं लगाया है.’’

उस की बातों को हम ने बड़े गौर से सुना और ताज्जुब भी हुआ. हमें शाइस्ता से बात करनी थी, इसलिए उसे हम ने कमरे में बुला लिया और उस से बात होने तक उस के पति को बाहर बैठ कर इंतजार करने को कहा. उस के जाने के बाद मैं और इंसपेक्टर टेनिसन एकदूसरे का मुंह देखते रहे. मैं ने अपनी सर्विस में बहुत से लोग देखे थे, लेकिन यह आदमी सब से अलग और अनोखा था. इंसपेक्टर टेनिसन ने शाइस्ता से बात करनी शुरू की. इंसपेक्टर टेनिसन ने कहा, ‘‘क्या तुम्हें अपने पिता की गिरफ्तारी पर दुख नहीं है?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने दांत पीस कर कहा, ‘‘मुझे उस आदमी से नफरत है, उसे सख्त सजा दी जानी चाहिए.’’

2-3 बातें और पूछने के बाद हम ने कहा, ‘‘इस के लिए तुम्हें अदालत में गवाही देनी पड़ेगी.’’

‘‘मैं अदालत चलूंगी और वहां चिल्लाचिल्ला कर कहूंगी कि यह हत्यारा है और हत्या की वजह भी बताऊंगी.’’

सागर और ठेकेदार को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस के बाद न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई. शाइस्ता ने अपने पिता के खिलाफ गवाही दी. मुकदमे की लंबी काररवाही के बाद जज ने सागर को मृत्युदंड और ठेकेदार को 8 साल की सजा सुनाई. दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन उन की अपील निरस्त कर दी गईं. लगभग एक साल बाद मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आगरा घूमने गया तो इत्तफाक से वहां शाइस्ता और उस का पति मिल गया.

शाइस्ता ने बताया कि सागर को फांसी देने के बाद उस के पिता को जेल में 3 महीने बाद फालिज का अटैक पड़ा, जिस में उस की मौत हो गई. उस की लाश घर आई तो उस की ससुराल के सब लोग गए थे, लेकिन वह नहीं गई. बाप के मरने से उस के दिल को बहुत सुकून मिला था. अब वह पति के साथ खुश है. मैं ने उस के पति की ओर देखा, वह मुसकरा रहा था. उस के चेहरे से ही लग रहा था कि वह संतुष्ट है. Hindi Kahani