शक का नासूर : फोन ने घोला जिंदगी में जहर – भाग 2

2 दिन बीत चुके थे. पुलिस को नीतू के बारे में कोई क्लू नहीं मिल रहा था. उस का पति, मातापिता चिंतित और परेशान थे. वह बारबार थाने के चक्कर लगा रहे थे. मामला जवान महिला के गायब होने का था. दिल्ली में वैसे भी महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक वारदातें बढ़ती जा रही हैं. नीतू भी कहीं किसी वारदात का शिकार न हो जाए इसलिए पूर्वी दिल्ली के डीसीपी अजय कुमार ने एसीपी संजय सहरावत के निर्देशन में एक पुलिस टीम बनाई जिस में इंसपेक्टर सी.एम. मीणा, एसआई संदीप कुमार, हेडकांस्टेबल सुशील कुमार, कर्मवीर, कांस्टेबल जितेंद्र कुमार, सुरजीत, देशपाल आदि को शामिल किया.

पुलिस टीम सब से पहले यही पता लगाने में जुट गई कि नीतू पति की बताई गई जगह सेक्टर-18, नोएडा पहुंची थी या नहीं और गई भी होगी तो कल्याणपुरी से नोएडा जाने के 2 ही तरीके हैं या तो वह बस, कार, बाइक से गई होगी या फिर मैट्रो द्वारा.

कल्याणपुरी के नजदीक में मयूर विहार फेज-1 मैट्रो स्टेशन है. अगर वह मैट्रो से गई होगी तो मैट्रो स्टेशन पर लगे कैमरों में उस की तसवीर जरूर रिकौर्ड हो गई होगी. यह जानने के लिए टीम 23 जून को मयूर विहार फेज-1 मैट्रो स्टेशन पहुंची और 21 जून को दोपहर 11 बजे के बाद की रिकौर्ड की गई सीसीटीवी फूटेज देखनी शुरू कर दी. पुलिस के साथ नीतू के पिता दिनेश कुमार भी थे. ओमप्रकाश को पुलिस ने स्टेशन के नीचे खड़ी कार में बैठा रखा था. सभी फूटेज को बड़ी गौर से देख रहे थे.

तभी गेट नंबर 1 से नीतू मैट्रो स्टेशन पर चढ़ती दिखी. वह काले रंग की पेंट व मैरून कलर का टाप पहने हुई थी. उस समय वह काफी खुश दिख रही थी. दिनेश ने तुरंत अपनी बेटी को पहचान लिया. यह तसवीर सवा 11 बजे रिकौर्ड की गई थी.

इस तसवीर से यह पता लगा कि वह नोएडा के लिए निकली थी. इस के बाद पुलिस ने नोएडा सेक्टर-18 के मैट्रो स्टेशन की सीसीटीवी फुटेज देखी. वहां करीब साढ़े 11 बजे नीतू स्टेशन से बाहर निकलती दिखी. उस के साथ उस का पति ओमप्रकाश भी था. दोनों खुश थे और बतियाते हुए नीचे उतर रहे थे.

नोएडा सेक्टर-18 के मैट्रो स्टेशन के सीसीटीवी कैमरे की फूटेज देख कर पुलिस समझ गई कि ओमप्रकाश झूठ बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि नीतू उस से नहीं मिली थी जबकि फूटेज देख कर पता चलता है कि वह मैट्रो स्टेशन पर पत्नी को खुद रिसीव कर के ले गया था. इस से पुलिस को ओमप्रकाश पर ही शक होने लगा.

थाने ला कर पुलिस ने ओमप्रकाश से पूछताछ की तो वह बोला, ‘‘नीतू को मैं ने फिल्म देखने के लिए नोएडा बुलाया था. सैक्टर-18 मैट्रो स्टेशन पहुंचने से पहले उस ने मुझे फोन कर दिया था. मैं भी मैट्रो स्टेशन पहुंच गया था. फिर बाद में उस ने फिल्म देखने का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया. कह रही थी कि उसे जल्दी घर लौटना है. अट्टा मार्केट में एक दुकान से हम ने स्नैक्स खाए. कुछ देर बात करने के बाद नीतू को सैक्टर-18 के मैट्रो स्टेशन पर छोड़ कर मैं अपने औफिस चला गया था. चाहें तो आप औफिस में मेरी हाजिरी चैक कर सकते हैं.’’

‘‘जब तुम नीतू से मिले थे, तो झूठ क्यों बोले कि वो तुम्हारे पास नहीं आई थी?’’ इंसपेक्टर सी.एम. मीणा ने पूछा.

इस बात का ओमप्रकाश जवाब नहीं दे पाया तो उन्होंने उस से सख्ती से पूछताछ की. तभी ओमप्रकाश के ससुर दिनेश ने दामाद से सख्ती करने को मना कर दिया. उन्होंने पुलिस से कहा कि हमें अपने दामाद पर भरोसा है. वह हमारी बेटी के साथ बुरा नहीं कर सकता.

पुलिस को लग रहा था कि नीतू के गायब होने में ओमप्रकाश का हाथ रहा होगा. थोड़ी सख्ती करने पर वह सारा मामला उगल देता मगर दिनेश के मना करने पर पुलिस उस से पूछताछ नहीं कर सकी.

पुलिस ने दिनेश को काफी समझाने की कोशिश की लेकिन दामाद पर जमे विश्वास के आगे वह पुलिस की बात मानने को तैयार ही नहीं था. अंत में पुलिस ने यह कहते हुए ओमप्रकाश को दिनेश के हवाले कर दिया कि जांच में ओमप्रकाश से पूछताछ करने की जब भी जरूरत पड़ेगी, वही उसे थाने ले कर आएंगे.

पुलिस की इस शर्त पर दिनेश ने हामी भर ली और वह दामाद को अपने साथ घर ले गया. उन दोनों के थाने से जाने के बाद पुलिस टीम मशविरा करने लगी कि अब क्या किया जाए? क्योंकि पुलिस जांच जिस रास्ते पर आगे बढ़ रही थी, वह वहीं रुक गई थी.

मामला एक महिला से संबंधित था इसलिए पुलिस भी चुप नहीं बैठी. पुलिस टीम अब अपने मुखबिरों से नीतू के चालचलन आदि का पता लगाने लगी. यानी उस का कल्याणपुरी में किसी लड़के के साथ कोई चक्कर वगैरह तो नहीं चल रहा था.

दिनेश 23 जून की शाम को ओमप्रकाश को अपने साथ घर ले गया था. अगले दिन 24 जून की सुबह तकरीबन 4 बजे वह उसे ले कर फिर थाने आ गया. इंसपेक्टर सी.एम. मीणा और एसआई संदीप कुमार उस समय रात्रि गश्त कर के थाने लौटे थे. उन्होंने सुबहसुबह ससुरदामाद को थाने में देखा तो वे चौंके.

इस से पहले कि वह उन से थाने आने की वजह पूछते दिनेश ओमप्रकाश की तरफ इशारे करते हुए बोला, ‘‘सर, इस पर आप जो शक कर रहे थे वह सही था. अब हमें भी यकीन हो गया है कि नीतू को गायब कराने में इसी का हाथ होगा. इसे सब पता है कि इस समय मेरी बेटी कहां है? लेकिन यह हमें भी नहीं बता रहा. मैं इसी के खिलाफ नीतू का अपहरण करने की रिपोर्ट लिखाना चाहता हूं.’’

दिनेश की इस बात पर इंसपेक्टर सी.एम. मीणा को हैरानी हुई क्योंकि जो व्यक्ति कल तक अपने दामाद पर आंखें मूंद कर भरोसा कर रहा था, रात बीच में ऐसा क्या हो गया कि वह दामाद के खिलाफ हो गया. उन्होंने दिनेश से कहा, ‘‘हमें तो इस पर पहले से ही शक हो रहा था. कल जो इस से पूछताछ की जा रही थी, उसी में बता देता कि नीतू कहां है? मगर आपने इस से पूछताछ नहीं करने दी. यदि इसे अपने साथ नहीं ले गए होते तो अब तक सारी हकीकत सामने आ गई होती. मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही कि अब आप इस के खिलाफ अपहरण का केस क्यों दर्ज करा रहे हैं?’’

‘‘सर, हम इस पर बहुत विश्वास करते थे तभी तो जब आप ने इस से सख्ती की तो हम ने आप से मना कर दिया था. हमें यह लग रहा था कि आप इस के ऊपर दबाव डाल कर कुछ कुबूलवाना चाहते हैं तभी तो हम इसे थाने से ले गए थे. घर ले जा कर हम ने इस से नीतू के बारे में पूछताछ की थी. इसने उस के बारे में कुछ भी नहीं बताया. लेकिन उस समय यह बहुत घबरा रहा था और बारबार हमारे यहां से जाने की बात कह रहा था. इन्हीं बातों पर हमें इस पर शक हो रहा है.’’ दिनेश ने बताया.

दिनेश के कहने पर पुलिस ने ओमप्रकाश को हिरासत में ले लिया और दिनेश कुमार की तरफ से ओमप्रकाश के खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने ओमप्रकाश से उस की पत्नी नीतू की बाबत सख्ती से पूछताछ की तो उस ने जो राज खोला, उसे जानकर सभी सन्न रह गए. उस ने बताया कि 21 जून को ही वह नीतू की हत्या कर चुका है और लाश एक बैग में बंद कर के यमुना खादर में डाल दी थी.

नादानी का नतीजा – भाग 1

दोपहर के सवा 2 बजे के आसपास गौरव घर पहुंचा तो उसे दरवाज खुलवाने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि  दरवाजा पहले से ही खुला था. बरामदे में साइकिल खड़ी कर के वह सीधे अपने स्टडी रूम में घुस गया. बैग रख कर कपड़े बदले और किचन की ओर जाते हुए बहन को आवाज दी.

बहन ने कोई जवाब नहीं दिया तो उसे लगा कि नेहा कान में इयरफोन लगा कर गाने सुनते हुए घर के काम कर रही होगी, क्योंकि पानी की मोटर भी चल रही थी और वाशिंग मशीन में कपड़े भी धुले जा रहे थे. उस ने बहन की ओर ध्यान न दे कर प्लेट में दालचावल निकाला और अपने कमरे में जा कर खाने लगा.

गौरव खाना खा कर हाथ धो रहा था, तभी एक गंदा कुत्ता घर में घुस आया. उस के शरीर पर तमाम घाव थे, जिन से खून रिस रहा था. उसे भगाने के लिए गौरव ने डंडा उठाया तो वह भाग कर नेहा के कमरे में घुस गया. उस के पीछेपीछे गौरव कमरे में घुसा तो उस ने वहां जो देखा, उसे कुत्ते का होश ही नहीं रहा. वह बाहर आ कर चीखनेचिल्लाने लगा. उस की चीखपुकार सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए.

उन लोगों ने कमरे में जा कर देखा तो पता चला कि उस की बड़ी बहन नेहा छत में लगे कुंडे में दुपट्टा बांध कर लटकी हुई थी. गौरव ने रोते हुए यह बात फोन कर के अपनी मां कुसुमवती को बताई तो वह औफिस में ही बिलखबिलख कर रोने लगीं. किसी तरह औफिस के सहयोगियों ने उन्हें घर पहुंचाया.

नेहा द्वारा कुंडे में दुपट्टा बांध कर लटकने की सूचना पुलिस को भी दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सत्यप्रकाश त्यागी बुंदू कटरा पुलिस चौकी के प्रभारी मनोज मिश्रा के साथ कुसुमवती के घर आ पहुंचे.

कमरे और लाश की स्थिति से प्रथमदृष्टया यही लग रहा था कि नेहा के साथ दुष्कर्म कर के हत्या कर दी गई थी. उस के बाद लाश के गले में दुपट्टा बांध कर छत में लगे कुंडे से लटका दिया गया था, जिस से लगे कि इस ने आत्महत्या की थी. इस की वजह यह थी कि उस के पैर बेड पर घुटनों के बल टिके थे.

थानाप्रभारी सत्यप्रकाश त्यागी ने घटना की जानकारी अधिकारियों को भी दे दी थी. फोरेंसिक टीम को बुला कर लाश के फोटो कराए गए और फिंगरप्रिंट उठवाए गए. इस के बाद शव को नीचे उतरवा कर कमरे को सील करवा दिया. शव को पोस्टमार्टन के लिए भेज कर थानाप्रभारी पूछताछ करना चाहते थे, लेकिन कुसुमवती होश में नहीं थी, इसलिए बिना पूछताछ किए ही वह थाने आ गए.

थाने आ कर उन्होंने अपराध संख्या 697/2013 पर भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया और विवेचना की जिम्मेदारी खुद संभाल ली. यह 8 अक्टूबर, 2013 की बात थी.

अगले दिन यानी 9 अक्टूबर को पोस्टमार्टम के बाद नेहा का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया तो घर वालों ने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. 10 अक्टूबर, 2013 की दोपहर को यही कोई डेढ़ बजे कुसुमवती थाने पहुंची और थानाप्रभारी सत्यप्रकाश त्यागी को एक तहरीर दी, जिस में उन्होंने नेहा की हत्या का आरोप अपने घर के सामने ही रहने वाले स्व. ओमप्रकाश के 3 बेटों, प्रवीण, प्रमोद उर्फ कलुआ और राहुल के साथ इन के चचेरे भाइयों सुनील तथा दीपू पर लगाया था.

थानाप्रभारी सत्यप्रकाश त्यागी ने उन लोगों को नामजद करने की वजह पूछी तो कुसुमवती ने कहा, ‘‘सर, आप इन लोगों को गिरफ्तार तो कीजिए, वे खुद ही नेहा की हत्या की वजह बता देंगे.’’

कुसुमवती ने अपनी यह बात जिस दृढ़ता और विश्वास के साथ कही थी, उस से थानाप्रभारी को उन के आरोप में दम नजर आया. उन्होंने नामजद लोगों को गिरफ्तार करने के लिए उन के घरों पर छापा मारा तो सभी के सभी फरार मिले. इस बात से थानाप्रभारी का संदेह और बढ़ गया. उन्हें लगा कि नेहा की हत्या में इन लोगों की कोई न कोई भूमिका जरूर है.

लेकिन इंसपेक्टर सत्यप्रकाश त्यागी को नेहा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो उसे पढ़ कर उन्हें झटका सा लगा, क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार नेहा की मौत लटकने से ही हुई थी. वह शारीरिक संबंधों की भी आदी बताई गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सारा मामला ही उलट गया था. क्योंकि जिस स्थिति में नेहा की लाश मिली थी, ऐसे में कोई कैसे आत्महत्या कर सकता था? इस तरह के काम छिपछिपा कर किए जाते हैं, जबकि नेहा के घर के सारे दरवाजे खुले थे. पानी की मोटर भी चल रही थी और वाशिंग मशीन में कपड़े भी धुले जा रहे थे. नेहा को ऐसी क्या जल्दी थी कि वह पानी की मोटर और वाशिंग मशीन का स्विच भी नहीं औफ कर सकी?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद नेहा की मौत रहस्यों में घिर गई थी. अब उस की मौत का रहस्य तभी खुल सकता था, जब नेहा की मां कुसुमवती द्वारा नामजद लोगों को गिरफ्तार कर के उन से सचाई उगलवाई जाती. धीरेधीरे पूरा महीना गुजर गया और पुलिस नेहा के संभावित हत्यारों तक पहुंच नहीं सकी. पुलिस पर आरोप लगने लगा तो एक बार फिर पुलिस ने तेजी दिखाई. फलस्वरूप 14 नवंबर, 2013 को थाना सदर बाजार पुलिस ने नामजद लोगों में से मुख्य अभियुक्त प्रवीण को गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद एकएक कर के अन्य अभियुक्त भी गिरफ्तार कर लिए गए. थानाप्रभारी सत्यप्रकाश ने इन लोगों से नेहा की मौत के बारे में पूछताछ शुरू की तो पहले ये सभी उन्हें गुमराह करते रहे. लेकिन जब पुलिस ने उन्हें घेरा तो मजबूर हो कर उन्होंने सच्चाई उगल दी. प्रवीण ने नेहा की मौत की जो कहानी सुनाई, उस में प्यार तो था ही, उस से भी ज्यादा डर था, जिस की वजह से इस प्रेम कहानी का दुखद अंत हुआ था.

उत्तर प्रदेश के जिला अंबेडकरनगर के रहने वाले मनोज कुमार की नौकरी आगरा सीओडी में लगी तो वह आगरा आ गए थे. बच्चे छोटेछोटे थे, इसलिए वह पत्नी कुसुमवती और बच्चों को अंबेडकरनगर में ही मां के पास छोड़ आए थे. मनोज कुमार पूरे तीन साल अकेले ही रहे. 3 सालों में बच्चे कुछ बड़े हो गए तो मां ने कहा कि अब वह अपनी बीवी और बच्चों को ले जाए.

मनोज कुमार अपने परिवार को आगरा लाने की तैयारी कर ही रहे थे कि मात्र 30 साल की उम्र में ही अचानक उन की असमय मौत हो गई. तब उन के बच्चों में बेटी नेहा 6 साल की थी तो बेटा गौरव 3 साल का.

कुसुमवती की मांग ही नहीं, जिंदगी भी सूनी हो चुकी थी. वह अपना दुख ले कर बैठी रहतीं तो उन के बच्चों का क्या होता? वह अपना दुख भूल कर बच्चों की परवरिश में लग गईं. 6 महीने बाद उन्हें पति की जगह सीओडी में नौकरी मिल गई तो वह बच्चों को ले कर आगरा आ गईं. वह आगरा आ कर उसी मकान में रहने लगी थीं, जिस में मनोज कुमार रहते थे.

कुसुमवती की सास भी साथ आई थीं. बहू जब पूरी तरह व्यवस्थित हो गई तो वह अंबेडकरनगर वापस लौट गईं. सास के जाने के बाद बच्चों को ले कर घर से इतनी दूर अकेले जीवन गुजारना कुसुमवती के लिए एक बड़ी चुनौती थी. लेकिन कुसुमवती ने इस चुनौती को स्वीकार किया. एकएक कर के 16-17 साल बीत गए. इस बीच उन्होंने अपनी कमाई से नगला भवानी सिंह में अपना मकान खरीद लिया था. अपना घर हो गया तो कुसुमवती का यह शहर अपना हो गया.

जिन दिनों कुसुमवती ने नगला भवानी का अपना नया मकान खरीदा था, उन दिनों नेहा पास के ही केंद्रीय विद्यालय में 9वीं में पढ़ती थी तो उस का भाई गौरव 6 ठवीं में. भाईबहन मां के संघर्ष को देख रहे थे, इसलिए मेहनत से पढ़ाई करने के साथसाथ हर काम में मां की मदद भी करते थे.

अनुराधा रेड्डी हत्याकांड : सीसीटीवी फुटेज से खुली मर्डर मिस्ट्री – भाग 4

अनुराधा ने प्रेमी से मांगी उधार की रकम

साल 2020 में कोरोना महामारी अपने पांव पसार चुकी थी, जिस के चलते जनजीवन अस्तव्यक्त हो चुका था, कितनों के व्यापार बंद हो गए थे. कितने भूख से तड़पतड़प कर मर गए थे. ऐसे में लगे सूद पर पैसे पूरी तरह डूब गए थे. जिस जिस ने उस से सूद पर पैसे लिए थे, उस में से किसी ने उस के पैसे नहीं लौटाए थे. अनुराधा पूरी तरह से बरबाद हो गई थी.

उस के बाद अनुराधा रेड्डी ने चंद्रमोहन से अपने पैसे वापस लौटाने की बात कही तो उस ने कुछ दिनों की मोहलत मांगी और कहा कि वह उस की पाईपाई लौटा देगा, जबकि हकीकत यह थी कि उस के पास लौटाने के लिए पैसे नहीं थे, जो पैसे उस ने प्रेमिका से लिए थे, वो सारे पैसे खर्च ही गए थे. कोरोना की वजह से बिजनैस भी चौपट हो गया था. वह समझ नहीं पा रहा था कि उस के पैसे कैसे और कहां से लौटाए.

पैसों को ले कर अनुराधा रेड्डी और चंद्रमोहन के रिश्तों में खटास आ गई थी. उस पर अनुराधा पैसा लौटाने के लिए अब दबाव बनाने लगी थी. प्रेमिका के दबाव से वह परेशान रहने लगा था. उस के चलते अब दोनों के बीच झगड़े होने लगे थे.

अनुराधा की हत्या कर लाश के किए टुकड़े

12 मई, 2023 को सुबह इन्हीं पैसों को ले कर अनुराधा रेड्डी और चंद्रमोहन के बीच झगड़ा हुआ था. इस झगड़े ने हाथापाई का रूप ले लिया था. गुस्से से चंद्रमोहन का चेहरा लाल हो गया था. उस ने आव देखा न ताव, किचन में रखा सब्जी काटने वाला फलदार चाकू उठाया और अनुराधा के पेट में ताबड़तोड़ वार कर दिए. वो तब तक चाकू से वार करता रहा, जब तक अनुराधा की मौत न हो गई. ये सारा खेल बरामदे में होता रहा.

अनुराधा की मौत के बाद जब चंद्रमोहन के गुस्से की आग ठंडी हुई तो वह बुरी तरह कांप गया. अब उस के सामने सब से बड़ा प्रश्न लाश को ठिकाने लगाने का था. तभी उसे दिल्ली का श्रद्धा हत्याकांड याद आ गया कि हत्यारे आफताब ने कैसे प्रेमिका के शरीर को टुकड़ेटुकड़े कर के जंगलों में फेंक दिया था, चंद्रमोहन ने भी वैसा ही करने का फैसला किया.

इस के बाद वह बरामदे से लाश को खींच कर कमरे में ले आया. फिर खून से सने चाकू और अपने हाथों को वाशरूम में जा कर अच्छी तरह धोया. यही नहीं, उस ने हत्या के साक्ष्य मिटाने के लिए फर्श पर पोंछा लगा कर साफ कर दिया था. फिर शाम को चंद्रमोहन बाजार से पत्थर काटने वाला कटर, एक बड़ा ट्रंक (संदूक), परफ्यूम की 2 शीशियां और तेज महक वाली दरजनभर अगरबत्तियों के पैकेट खरीद कर ले आया और अनुराधा के कमरे में ले जा कर रख दिए.

यह सब करने से पहले और हत्या करने के बाद उस ने अनुराधा का मोबाइल फोन अपने कब्जे में कर लिया था और उसे औन ही रखा था. ताकि लोगों को पता रहे कि वह जिंदा है. जब भी किसी की काल आती थी तो वह काल रिसीव नहीं करता था, उस का जवाब ‘मैं अभी बिजी हूं, फ्री होते ही काल करूंगी’ मैसेज के रूप में देता था.

खैर, घटना वाली रात में सब के सो जाने के बाद कटर मशीन से अनुराधा के शरीर को टुकड़ों में बांट दिया था. सिर को धड़ से, फिर दोनों बाजू, दोनों टांगें और धड़ अलगअलग कर दिया था. हृदयहीन और शातिर चंद्रमोहन के ऐसा करते हुए हाथ तक नहीं कांपे थे, जबकि उस ने उस के साथ पति के रूप में 15 सालों का समय बिताया था.

बहरहाल, चंद्रमोहन ने कटे सिर, दोनों बाजुओं और दोनों टांगों को दोहरा करते हुए फ्रिज में रख दिया था ताकि उस में से बदबू न उठे और धड़ को संदूक के भीतर रख कर उस में परफ्यूम छिडक़ दिया और अगरबत्तियां जला दी थीं, ताकि कहीं से किसी को कोई शक न हो सके.

कटे सिर को फेंकना चाहता था नदी में

इस के 3 दिनों बाद 15 मई की दोपहर में कटे सिर को काले कपड़े में अच्छी तरह लपेट कर फिर उसे काली पौलीथिन में रख कर सिर पर टोपी और मुंह पर मास्क लगा कर वह घर से निकला ताकि उसे कोई पहचान न सके और टैंपो पर सवार हो कर मुसी नदी के किनारे थीगालगुडा रोड के डंपिंग ग्राउंड पहुंचा और टैंपो से नीचे उतरा.

फिर वहां से उल्टी दिशा जा कर एक रेस्टोरेंट में पहुंचा, वहां उस ने पीने के लिए एक लीटर वाली पानी की बोतल खरीदी, और मास्क उतार कर बोतल का पानी पीया. उसी दौरान उस का चेहरा सीसीटीवी फुटेज में आ गया था. और तो और उस ने यूपीआई से पेमेंट दिया. ये भी एक साक्ष्य पुलिस वालों को मिल गया था.

पानी पीने के बाद फिर चंद्रमोहन डंपिंग ग्राउंड की ओर वापस लौटा और सुनसान देख मुसी नदी को लक्ष्य बना कर सिर वाली पौलीथिन फेंकी ताकि सिर नदी में बह जाए और इसी के साथ अनुराधा रेड्डी की मौत एक राज बन कर रह जाए. लेकिन वह पौलीथिन नदी में गिरने के बजाए डंपिंग ग्राउंड पर ही गिर गई. इस के बाद वह तेज कदमों से वहां से निकल गया था.

17 मई, 2023 को जब कटा सिर मिला तो पूरे हैदराबाद में सनसनी फैल गई थी. उस के बाद पुलिस की मेहनत, वैज्ञानिक साक्ष्य और सीसीटीवी फुटेज ने पुलिस को अनुराधा के गुनहगार तक पहुंचा दिया था.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने मृतका के शरीर के सभी भागों, कटर, परफ्यूम की शीशियां, अगरबत्तियों के पैकेट सभी कुछ बरामद कर लिया था. कथा संकलन तक पुलिस ने आरोपी बी. चंद्रमोहन के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में पेश कर दिया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शक का नासूर : फोन ने घोला जिंदगी में जहर – भाग 1

दोपहर के पौने 2 बजे के करीब ओमप्रकाश ने अपने साले संजय के मोबाइल पर फोन किया, ‘‘संजय नीतू कहां है? मैं बहुत देर से उस का नंबर मिला रहा हूं लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा है. पता नहीं उस ने अपना फोन बंद क्यों कर रखा है. तुम देखो तो वो कहां है? और उस से मेरी बात भी करा देना.’’

नीतू ओमप्रकाश की पत्नी थी, जो उस समय अपने मायके में रह रही थी, यह बात 21 जून, 2014 की है.’’

संजय उस समय अपने घर पर नहीं था. उस ने उसी समय अपनी बहन नीतू का फोन नंबर मिलाया तो वास्तव में वह बंद था. नीतू के पास जो मोबाइल फोन था उस में वोडाफोन और आइडिया कंपनी के सिम थे. संजय ने उस के दोनों फोन नंबरों को कई बार मिलाया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ बताया गया. इस बात को वह भी नहीं समझ पाया कि नीतू ने फोन बंद क्यों कर रखा है?

फिर संजय ने अपनी मां विजम को फोन किया, ‘‘मम्मी, नीतू कहां है? उस का फोन नहीं मिल रहा. जीजाजी उस से बात करना चाहते हैं. उस से कह देना कि वह जीजाजी से बात कर ले.’’

‘‘वो तो सुबह 11 बजे के करीब घर से नोएडा में उन के जाने के लिए निकली थी. कह रही थी कि ओमप्रकाश ने उसे पिक्चर दिखाने के लिए बुलाया है. क्या 3 घंटे में वो उन के पास पहुंची नहीं तो कहां चली गई?’’ विजम चिंतित होते हुए बोलीं.

विजम ने भी बेटी के दोनों नंबर अपने फोन से मिलाए तो वे बंद आ रहे थे. फिर उन्होंने अपने दामाद ओमप्रकाश से फोन पर बात की. ओमप्रकाश ने अपनी सास को बताया कि नीतू को उस ने पिक्चर देखने के लिए बुलाया जरूर था लेकिन वह उस के पास नहीं पहुंची.

नीतू और ओमप्रकाश की शादी करीब 6 महीने पहले ही हुई थी. फोन पर बात करते समय ओमप्रकाश समझ रहा था कि नीतू को ले कर सास बहुत परेशान हो रही है. वह उन्हें समझाते हुए बोला, ‘‘मम्मी आप परेशान मत होइए. ऐसा भी हो सकता है कि वह अपनी किसी सहेली के साथ पिक्चर देखने चली गई हो. एक दो घंटे में शायद वह घर पहुंच ही जाएगी. जब वह घर पहुंच जाए तो मेरी बात जरूर करा देना. इस समय मैं औफिस में हूं. औफिस की छुट्टी के बाद मैं भी आप से मिलने आ रहा हूं.’’

‘‘ठीक है, वो घर आ जाएगी तो तुम्हारी बात करा दूंगी.’’ विजम बोली.

शाम हो गई. न तो नीतू ही घर लौटी और न ही उस का फोन मिला. विजम परेशान हुए जा रही थीं. उन्होंने यह बात पति दिनेश कुमार को भी बता दी. घर वालों ने नीतू की सहेलियों आदि से भी पूछताछ की लेकिन उस का पता नहीं चला. ओमप्रकाश ग्रेटर नोएडा में परी चौक के पास स्थित एक टेलीकौम कंपनी में काम करता था. औफिस की ड्यूटी पूरी करने के बाद वह कल्याणपुरी में स्थित अपनी ससुराल पहुंच गया.

तब तक नीतू घर नहीं लौटी थी. जिस की वजह से घर वाले परेशान थे. सभी इस बात से हैरान थे कि अपने फोन को कभी भी बंद न करने वाली नीतू ने आज अपना फोन बंद क्यों कर रखा है? वह बिना बताए इतनी देर तक गायब भी नहीं रही, फिर आज ऐसी कौन सी जगह पर है जहां उस ने अपना फोन तक बंद कर रखा है. सभी लोग बीचबीच में नीतू का फोन मिलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन स्विच्ड औफ होने की वजह से उस का फोन नहीं मिल पाया.

आपस में सलाहमशविरा करने के बाद ओमप्रकाश अपने ससुर दिनेश कुमार को ले कर थाना कल्याणपुरी चला गया और थानाप्रभारी अरविंद कुमार को नीतू के लापता होने की जानकारी दी. दिनेश की सूचना पर थानाप्रभारी ने नवविवाहिता नीतू की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. इस की जांच सबइंसपेक्टर संदीप कुमार को सौंपी गई.

एसआई संदीप कुमार ने काररवाई करते हुए सब से पहले वायरलैस से दिल्ली के समस्त थानों में नीतू का हुलिया आदि बताते हुए, उस के गायब होने की सूचना प्रसारित करा दी. नीतू के पास जो फोन था उस से भी कोई सुराग मिलने की संभावना थी, इसलिए उस के फोन में पड़े हुए वोडाफोन और आइडिया के नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाने की काररवाई की.

अगले दिन एसआई संदीप कुमार ने नीतू की मां विजम से बात की तो उन्होंने बताया, ‘‘नीतू 8 जून को अपनी ससुराल से यहां आई थी. कल सुबह तकरीबन 11 बजे घर से निकलते समय उस ने बताया था कि ओमप्रकाश ने उसे नोएडा में पिक्चर देखने के लिए बुलाया है. वह उस के पास जा रही है.

‘‘मैं तो यही सोच रही थी कि वह ओमप्रकाश के पास ही होगी लेकिन दोपहर बाद जब ओमप्रकाश ने नीतू से बात कराने के लिए फोन किया तो पता चला कि वह उस के पास पहुंची ही नहीं है.’’

ओमप्रकाश उस समय ससुराल में ही था. एसआई संदीप ने ओमप्रकाश से पूछताछ की तो उस ने कहा, ‘‘सर, मैं ने नीतू को फोन कर के नोएडा आने को कहा था उस के पहुंचने के बाद हम लोग कोई मूवी वगैरह देखने जाते. उस ने मुझ से कहा भी था कि मैट्रो से नोएडा सेक्टर-18 मैट्रो स्टेशन पहुंच जाएगी.

‘‘मैं उस का सैक्टर-18 के मैट्रो स्टेशन पर इंतजार करता रहा लेकिन वह वहां नहीं पहुंची तो मैं ने उसे फोन करने की कोशिश की, लेकिन उस का फोन बंद होने की वजह से बात नहीं हो सकी. फिर मैं अपने औफिस चला गया. मैं ने फिर संजय को फोन कर के नीतू का फोन बंद होने की बात बताई.’’

दोनों से बात करने के बाद एसआई संदीप यह समझ गए कि ओमप्रकाश ने नीतू को फिल्म देखने के लिए नोएडा बुलाया था. पति के पास जाने के लिए नीतू घर से निकली भी थी लेकिन वह पति के पास पहुंची थी या नहीं, इस बात पर संदेह था. उस समय वह विजम के घर से चले आए. और अपने स्तर से मामले की छानबीन में लग गए.  उन्होंने आसपास के लोगों से पूछा तो कुछ लोगों ने बता दिया कि उन्होंने नीतू को रिक्शे पर बैठे जाते देखा था.

बचपन का मजा, जवानी में बना सजा

दूसरा पहलू : अपनों ने बिछाया जाल

एक जवान औरत की नौटंकी – भाग 3

रीता की तहरीर पर पुलिस ने दीपक कपूर व नीरू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने नीरू को थाने बुला कर उस से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अपनी सास की हत्या उसी ने की थी. दीपक का इस में कोई हाथ नहीं था, लेकिन पुलिस के सख्ती करने पर नीरू ने कुबूल किया कि हत्या में दीपक कपूर भी साथ था. फिर नीरू ने मीरा की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी:

प्रेमी गौरव कपूर की हत्या के बाद नीरू दुखी रहने लगी थी. इस के लिए वह सास को ही कुसूरवार मान रही थी. क्योंकि वही जेल में बंद पति से मिल कर उस के कान भरती थी. इसीलिए उस के पति ने गौरव को मरवा दिया था.

नीरू ने फैसला कर लिया था कि जिस तरह गौरव को तड़पा तड़पा कर मारा गया था, उसी तरह वह सास को भी तड़पा तड़पा कर मारेगी. सास की हत्या कैसे की जाए, इस बारे में उस ने दीपक के साथ सलाहमशविरा किया. फिर दोनों ने एक योजना बना ली. योजना के अनुसार 12 फरवरी, 2014 की शाम को उस ने दीपक को अपने घर बुला लिया. उस समय उस का बेटा कशिश भी घर पर था. बेटे को उस ने फोन रिचार्ज कराने के लिए घर से बाहर भेज दिया.

सास मीरा यादव उस समय कमरे में सोफे पर बैठी थी. नीरू ने सास के सिर पर जमीन में गड्ढा खोदने वाले सब्बल का भरपूर वार किया. एक ही बार में मीरा का सिर फट गया और वह सोफे पर लुढ़क गई. इस के बाद उस ने कई और वार उस के ऊपर किए. थोड़ी देर तड़पने के बाद मीरा यादव की मौत हो गई. सास की हत्या कर के नीरू को बड़ा सुकून मिला.

सास की हत्या करने के बाद सब्बल को उस ने छत पर रखे कूलर के पास छिपा कर रख दिया और दीपक के चले जाने के बाद पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के सास की हत्या की सूचना दे दी. जिस सब्बल से मीरा यादव की हत्या की गई थी, उसे बरामद करना भी जरूरी था.

नीरू ने बताया था कि वह सब्बल उस ने अपने घर में ही छिपा दिया है. थानाप्रभारी ने वह सब्बल बरामद करने के लिए एसआई हरिशंकर मिश्रा, राजेश यादव, महिला सिपाही श्यामा देवी और प्रीती शाक्य को नीरू यादव के साथ उस के फ्लैट पर भेजा. नीरू ने चौथी मंजिल पर स्थित फ्लैट में पहुंच कर छत पर रखे कूलर के पास छिपा कर रखा सब्बल निकाल कर पुलिस को दे दिया.

पुलिस फर्द बरामदगी की काररवाई करने लगी, तभी मौका देख कर नीरू अपने बेटे कशिश को ले कर कमरे में जाने लगी, तो महिला सिपाहियों ने उसे रोकने की कोशिश की. उसी दौरान उस ने अपने पालतू कुत्ते को उन पर छोड़ दिया. दोनों सिपाही डर के मारे पीछे हट गईं. मौका देख नीरू ने झट से अंदर से दरवाजा बंद कर लिया.

पुलिस ने आवाज लगा कर नीरू से दरवाजा खोलने को कहा, लेकिन उस ने दरवाजा नहीं खोला. इसी दौरान एसआई राजेश कुमार के पास थानाप्रभारी का फोन आया तो राजेश ने उन्हें नीरू वाली बात बताते हुए तुरंत फोर्स भेजने को कहा.

गौरव कपूर की हत्या की तफ्तीश पूरी होने से पहले पुलिस के सामने मीरा यादव की हत्या का मामला सामने आ गया था. इन बातों को देख कर थाना प्रभारी को यह अंदेशा हो रहा था कि कहीं कमरे में बंद हो कर नीरू कोई उल्टासीधा काम न कर बैठे, जिस से नई समस्या पैदा हो जाए. इसलिए वह आवश्यक पुलिस बल के साथ खुद भी उस के घर पहुंच गए. लेकिन वहां उस का कुत्ता खुला हुआ देख कर वह भी घबरा गए.

देखने में वह कुत्ता खतरनाक लग रहा था. हिम्मत कर के थानाप्रभारी आगे बढ़े तो कुत्ते ने उन पर हमला कर के उन्हें घायल कर दिया. किसी तरह कुत्ते को काबू में किया गया. उसी समय फ्लैट में जलने की बू आने लगी और धुआं निकलता हुआ दिखा. यह देख कर पुलिस के हाथपांव फूल गए, क्योंकि फ्लैट के अंदर नीरू अपने बेटे के साथ मौजूद थी.  पुलिस ने दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

किसी तरह 2 दरवाजे तोड़ने के बाद पुलिस अंदर पहुंची तो वहां आग लगी थी, धुआं फैला था. आसपास के फ्लैटों में रहने वाले लोगों ने अपने यहां से पानी ला कर आग बुझाई.  धुआं छटा तो नीरू और उस के 13 वर्षीय बेटे की तलाश शुरू की गई. दोनों कहीं नहीं दिखे तो बाथरूम का दरवाजा तोड़ा गया. मांबेटे वहीं मिले, लेकिन बाथरूम में काफी मात्रा में खून फैला हुआ था, वह खून उन की कलाई से बह रहा था. नीरू ने अपनी और बेटे की जान लेने की गरज से नस काट ली थी.

पुलिस ने तुरंत दोनों को एक निजी अस्पताल पहुंचाया. फलस्वरूप उन की जान बच गई. चूंकि नीरू सास की हत्या की अभियुक्त थी, इसलिए पुलिस उसे थाने ले आई. कत्ल के अलावा पुलिस ने उस पर पुलिस के काम में बाधा डालने, आत्महत्या का प्रयास करने तथा बेटे की नस काट कर हत्या का प्रयास करने की धाराएं 309, 353, 352, 307 भी जोड़ दीं.

पूछताछ करने के बाद पुलिस ने नीरू को अदालत पर पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. अगले दिन दीपक को भी गिरफ्तार कर लिया गया. उस ने भी हत्या की बात कुबूल कर ली. उसे भी न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. दूसरी ओर दीपक के परिजनों का कहना है कि दीपक बेकुसूर है. उस का मीरा और नीरू से कोई लेनादेना नहीं था. उसे जबरदस्ती फंसा कर जेल भेजा गया है.

—कथा पुलिस सूत्रों, मीडिया रिपोर्टों पर आधारित

अनुराधा रेड्डी हत्याकांड : सीसीटीवी फुटेज से खुली मर्डर मिस्ट्री – भाग 3

25 मई, 2023 को डीसीपी सी.एच. रूपेश ने पुलिस लाइंस में प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की और 8 दिनों से रहस्य बनी सिर कटी लाश का परदाफाश करते हुए आरोपी चंद्रमोहन को पेश किया. आरोपी बी. चंद्रमोहन ने पत्रकारों के सामने भी अपना जुर्म कुबूल किया. उस के बाद पुलिस ने उसे अदालत के सामने पेश कर जेल भेज दिया. जेल जाते समय बी. चंद्रमोहन को अपने किए पर जरा भी पछतावा नहीं था.

पुलिस पूछताछ में अनुराधा रेड्डी हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

55 वर्षीय यारम अनुराधा रेड्डी मूलरूप से तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के दिलखुश नगर की रहने वाली थी. 4 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी, उस से छोटे 2 भाई और एक बहन थी, पिता किसान थे तो मां एक कुशल गृहिणी थीं. पिता ने अपनी सामथ्र्य के अनुसार चारों बच्चों को पढ़ाया और समयानुसार उन की शादियां कर के अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए थे. बेटियां अपनी ससुराल चली गईं तो बहू के पायल की मधुर छमछम से घरआंगन गूंज उठा था.

यारम अनुराधा रेड्डी बचपन से ही बड़ी जिद्दी थी. जिस काम को करने की ठान लेती थी तो उसे पूरा कर के ही दम भरती थी. इस के पीछे चाहे उस का बड़े से बड़ा नुकसान क्यों न हो जाए, परवाह नहीं करती थी. बस, उसे हासिल करना है तो करना है. यही उस का उद्देश्य होता था.

रमन रेड्डी के साथ पिता ने बेटी अनुराधा रेड्डी की गृहस्थी बसाई थी. हंसीखुशी दोनों की गृहस्थी चल रही थी. एक साल बाद अनुराधा ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी के घर में आ जाने से पतिपत्नी दोनों का जीवन खुशियों से खिल उठा था. फिर न जाने उन की खुशियों को किस की बुरी नजर लगी कि अनुराधा रेड्डी का हंसताखेलता परिवार तिनका तिनका बिखर गया.

बेटी जब एक साल की थी तभी रमन रेड्डी की दिल का दौरा पडऩे से मौत हो गई थी. पति का साथ छूट जाने के बाद अनुराधा एकदम अकेली पड़ गई थी, ऊपर से दुधमुंही बच्ची की परवरिश की जिम्मेदारी थी, सो अलग.

ऐसा नहीं था कि अनुराधा रेड्डी के सासससुर या मांबाप नहीं थे, बल्कि उस का पूरा घर भरा था नातेरिश्तेदारों से. लेकिन खुद्दार किस्म की वह किसी और से मदद लेना नहीं चाहती थी. वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर बच्ची की परवरिश करना चाहती थी.

पति के दोस्त ने की थी काफी मदद

वह पढ़ीलिखी तो थी ही, काफी समझदार और खूबसूरत भी थी. उस ने एक प्राइवेट नर्सिंगहोम में नर्स की नौकरी कर ली. वह अपने काम से इतना कमा लेती थी कि खुद की और बेटी की जरूरतों को पूरा कर के अच्छी रकम बचा लेती थी. लेकिन यहीं से उस की जिंदगी की कांटों भरी राह शुरू हो चुकी थी. संघर्ष की दीवानी अनुराधा ने कभी हार नहीं मानी. बल्कि संघर्ष की आग में तप कर कुंदन बनती रही.

अनुराधा रेड्डी के पति रमन रेड्डी के बचपन का दोस्त बी. चंद्रमोहन था, जो चैतन्यपुर मोहल्ले में अपनी मां के साथ अकेला ही रहता था. वह अपने मांबाप की इकलौती संतान था. इकलौता होने के नाते वह मांबाप का लाडला भी था.

रमन और चंद्रमोहन के बीच में गहरी दोस्ती थी. गहरी दोस्ती ऐसी जैसे धडक़न बिना दिल नहीं, सांस बिना जिस्म नहीं और चकई बिना चकवा नहीं. इतना गहरा याराना था दोनों के बीच में. रमन की मौत पर वह सब से ज्यादा दुखी हुआ. दोस्ती की डोर जब टूटी थी तब चंद्रमोहन बहुत रोया था, कई दिनों तक उस के हलक से निवाला नीचे नहीं उतरा था. उस की हालत देख कर खुद अनुराधा भी हैरान थी.

उस वक्त चंद्रमोहन ने अनुराधा की कदम कदम पर मदद की थी. सिर्फ चंद्रमोहन की ही उस ने मदद ली थी उस समय, बाकी किसी की भी मदद लेने से उस ने इनकार कर दिया था. चंद्रमोहन के एहसानों तले अनुराधा दबी हुई थी. धीरेधीरे इन एहसानों ने दोनों के बीच में दोस्ती का रूप ले लिया था. दोनों एकदूसरे पर अटूट विश्वास और भरोसा करने लगे थे. अनुराधा विधवा थी तो क्या हुआ, वह जवान और सुंदर थी. चंद्रमोहन भी कुंवारा था.

चंद्रमोहन के दिल के एक कोने में अनुराधा के लिए एक सौफ्ट कौर्नर तैयार था. वह उस के और बेटी के लिए हर घड़ी फिक्रमंद रहने लगा था और समय आने पर अपने दिल की बात उस के सामने कहना चाहता था. जबकि अनुराधा सिर्फ और सिर्फ उस से दोस्ती का ही रिश्ता बनाए रखी थी. उसे यह कतई आभास नहीं था कि चंद्रमोहन उस की दोस्ती को प्यार समझ बैठा है.

अनुराधा ने बेटी को पढऩे भेजा आस्ट्रेलिया

धीरेधीरे वक्त समय के रथ पर सवार हो कर बढ़ता रहा. अनुराधा की बेटी भी करीब 20-25 साल की हो चुकी थी और अनुराधा नर्स की नौकरी छोड़ कर एलआईसी में बीमा एजेंट बन गई थी. इस से उस ने अपने मेहनत की बदौलत अच्छी कमाई की और बेटी को पढऩे आस्ट्रेलिया भेज दिया.

बेटी के विदेश चले जाने के बाद वह अपना मकान बेच कर चंद्रमोहन के घर लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी. यह घटना से करीब 15 साल पहले की बात है. चैतन्यपुर में बी. चंद्रमोहन का अपना डबल स्टोरी मकान था. अपनी बूढ़ी मां के साथ वह ग्राउंड फ्लोर पर रहता था जबकि उस ने अनुराधा को रहने के लिए फस्र्ट फ्लोर दे दिया था.

यहां आने के बाद उन की दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे थे. चंद्रमोदन की बूढ़ी मां को उन के रिश्ते से या उन के साथ रहने से कोई ऐतराज नहीं था. वह तो चाहती थी कि जब दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं तो कोर्टमैरिज कर लें, लेकिन वह दोनों अभी कोर्टमैरिज नहीं करना चाहते थे. वे जैसे अपनी जिंदगी जी रहे थे, वैसे ही जीना चाहते थे.

जब से अनुराधा रेड्डी नर्स की नौकरी छोड़ कर एलआईसी एजेंट बनी थी, उस की किस्मत के सितारे बुलंदियों पर थे. एलआईसी से अकूत पैसा कमाया. यहीं से अनुराधा के जीवन की कुंडली में यमराज कुंडली मार कर बैठ गए थे. पैसा ही उस के जीवन के लिए काल बन गया था.

हुआ कुछ यूं था कि अनुराधा रेड्डी के पास जब खूब पैसे जमा हुए तो वह सूद पर पैसे बांटने लगी. उस ने बाजार में लाखों रुपए सूद पर बांट रखे थे. यह बात चंद्रमोहन भी जानता था. चूंकि चंद्रमोहन एक कौन्ट्रैक्टर था, ठेका लेना उस का पेशा था. एक बार बिजनैस में उस को बड़ा घाटा हुआ और लाखों रुपए डूब चुके थे.

बिजनैस को खड़ा करने के लिए उसे लाखों रुपए फिर से चाहिए थे. उस ने इस बारे में अपनी प्रेमिका अनुराधा से बात की कि उसे बिजनैस संभालने के लिए 7 लाख रुपए चाहिए. बिजनैस जैसे ही फिर से स्टैंड हो जाएगा तो वो सारे रुपए उसे लौटा देगा. ये बात साल 2018 की थी.

प्रेमी चंद्रमोहन का अनुराधा रेड्डी पर काफी एहसान था, उस के एहसान का बदला चुकाने का वक्त आ चुका था. फिर क्या था उस ने चंद्रमोहन को 7 लाख रुपए दे दिए.

अपहरण का कारण बना लिव इन रिलेशन

होली पर मंगेतर को मौत का अबीर – भाग 3

शादी से पहले ही मोहित प्रियंका पर तरहतरह की बंदिशें लगाने लगा था. उस की तानाशाही प्रियंका को भी अच्छी नहीं लगती थी. वह सोचने लगी कि जब विवाह से पहले मोहित का यह व्यवहार है तो बाद में क्या होगा. प्रियंका ने मोहित के इस व्यवहार के बारे में जब बड़ी बहन सुमन को बताया तो मोहित की यह आदत उसे भी अच्छी नहीं लगी.

जब बात ज्यादा ही बढ़ने लगी तो प्रियंका के पिता को लगा कि मोहित कहीं सनकी टाइप का तो नहीं है. इस बारे में उन्होंने छानबीन शुरू की तो पता चला कि मोहित तो नौकरी पर जाने के बजाय अकसर अपने गांव में ही रहता है. इस से प्रियंका के घर वालों को इस बात पर शक होने लगा कि जब वह नेवी में नौकरी करता है तो अपनी ड्यूटी पर न जा कर घर पर ही क्यों रहता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें मोहित के बारे में गलत जानकारी दी गई हो. यदि ऐसा हुआ तो उन की बेटी की जिंदगी ही तबाह हो जाएगी.

यह पता चलने प्रियंका ने मोहित के साथ घूमनाफिरना कम कर दिया था. उस ने फोन पर भी लंबी बातें करनी बंद कर दीं. कभीकभी मोहित को जब प्रियंका का फोन बिजी मिलता तो उसे उस पर शक होने लगता और जब किसी तरह उस से बात हो जाती तो वह मिलने के लिए उसे नियत जगह पर बुलाता. लेकिन प्रियंका ड्यूटी पर बिजी होने की बात कह देती थी. इस से मोहित को भी लगने लगा था कि प्रियंका अब उस से मिलने में आनाकानी करने लगी है.

उधर प्रियंका के घरवालों द्वारा छानबीन करने की जानकारी भी मोहित को हो गई थी. अब उसे इस बात का अंदेशा होने लगा था कि कहीं उस का प्रियंका से रिश्ता न टूट जाए.

प्रियंका की बेरुखी से वह परेशान रहने लगा. वह प्रियंका से हरगिज दूर नहीं होना चाहता था. उस ने अपने दिल की बात प्रियंका से बताई तो उस ने मोहित की बात को गंभीरता से नहीं लिया. जो प्रियंका पहले मोहित पर जान न्यौछावर करने को तैयार रहती थी, वही अब वह कहने लगी थी कि अपने घर वालों की मरजी के बिना कहीं नहीं जाएगी.

प्रियंका के घरवालों का आरोप है कि प्रियंका को मोहित का व्यवहार और हिटलरशाही पसंद नहीं थी इसलिए उस ने मोहित के साथ शादी करने से मना कर दिया. इस पर मोहित ने प्रियंका पर शादी के लिए दबाव बनाया और उसे धमकी भी दी थी कि अगर वह उस की नहीं होगी तो उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

16 मार्च, 2014 को पूरे देश में होली का त्यौहार मनाया जा रहा था. इसी दिन मोहित ने प्रियंका को सबक सिखाने की ठान ली. वह अपने गांव से दिल्ली के सागरपुर इलाके में पहुंच गया. वहां पहुंच कर उस ने शाम के समय प्रियंका को फोन कर के किसी बहाने से एक नियत जगह पर बुला लिया.

प्रियंका जब उस के पास आई तो वह उसे सागरपुर इलाके के मोहन नगर स्थित नील गगन गेस्ट हाउस ले गया. रात 8 बजे वह प्रियंका के साथ गेस्ट हाउस पहुंचा तो गेस्ट हाउस के रजिस्टर में उस ने अपना नाम मोहित लिखा और प्रियंका को अपनी पत्नी बताया. गेस्ट हाउस के मैनेजर सुनील कुमार ने उन दोनों को कमरा नंबर-105 ठहरने के लिए दे दिया.

कमरे में पहुंचने के बाद मोहित प्रियंका के लिए कोल्डड्रिंक लाया. जो कोल्डड्रिंक उस ने प्रियंका को पीने के लिए दी थी, उस में उस ने पहले ही नींद की दवा मिला दी थी. कोल्डड्रिंक पीने के कुछ देर बाद ही प्रियंका की आंखें मुंदने लगीं. जब वह गहरी नींद में सो गई तो मोहित ने अपने साथ लाए तमंचे से उस पर गोली चलानी चाही लेकिन गोली मिस हो गई.

ऐसा उस ने 2 बार किया, लेकिन दोनों बार गोली नहीं चली. तब मोहित ने गुस्से में सारे कारतूस वहीं डाल दिए और प्रियंका के मुंह पर तकिया रख कर कुछ देर तक दबाए रखा. सांस घुटने पर प्रियंका ने छटपटाहट महसूस की तो मोहित ने उसे दबोच लिया. कुछ ही देर में वह शांत हो गई. कहीं वह जिंदा न रह जाए, इसलिए मोहित ने दोनों हाथों से उस का गला और दबा दिया.

प्रियंका को ठिकाने लगाने के बाद रात करीब पौने 11 बजे उस ने उस कमरे को बाहर से बंद कर दिया और किसी तरह गेस्ट से निकलने में कामयाब हो गया. इस के बाद वह दिल्ली में ही किसी परिचित के यहां चला गया.

उधर जब गेस्ट हाउस के एक कर्मचारी ने रूम नंबर 105 का दरवाजा बाहर से बंद देखा तो उस ने यह बात मैनेजर सुनील कुमार को बता दी. सुनील कुमार ने जब रोशनदान से कमरे में झांक कर देखा तो वह सन्न रह गया. फिर उस ने यह सूचना पुलिस को दे दी थी.

मोहित से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर वह तमंचा भी बरामद कर लिया जिस से उस ने प्रियंका पर गोली चलाने की कोशिश की थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने मोहित को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी रिछपाल सिंह कर रहे थे.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित