Suicide Case: कमला पसंद मालिक की बहू दीप्ति ने किया सुसाइड

Suicide Case: एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने पूरे भारत को झकझोर कर रखा दिया है. जहां देश के मशहूर पान मसाला कंपनी के मालिक ‘कमला पसंद’ और ‘राजश्री’ के मालिक कमल चौरसिया की बहू दीप्ति चौरसिया ने आत्महत्या कर ली. आखिर ऐसी क्या वजह थी कि इतनी बड़ी कंपनी की बहू को आत्महत्या करनी पड़ी. चलिए जानते हैं इस परिवार से जुड़ी पूरी स्टोरी को, जो आप को बताएगी पूरा सच.

यह दर्दनाक घटना दिल्ली के वसंत विहार से सामने आई है. यहां दीप्ति चौरसिया ने अपने घर में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. शव को सबसे पहले उस के पति हरप्रीत चौरसिया ने फंदे पर लटका देखा. इस के बाद वह पत्नी को अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को दीप्ति के पास एक डायरी मिली, जिस में दीप्ति ने अपने पति से होने वाले झगड़े के बारे में लिखा था.

दीप्ति ने डायरी में लिखा, ‘अगर रिश्ते में प्यार और भरोसा नहीं तो फिर उस रिश्ते में जीने की वजह क्या है. अब मैं और सहन नहीं कर सकती.’

पुलिस के मुताबिक, दीप्ति का पूरा परिवार अलगअलग घरों में रहता है. आप को बता दें कि दीप्ति चौरसिया की शादी 2010 में हरप्रीत चौरसिया से हुई थी. बताया जा रहा है कि हरप्रीत ने 2 शादियां की थीं. दीप्ति का 14 साल का बेटा है. वहीं दूसरी पत्नी दक्षिण सिनेमा में काम करती है. उस की भी एक बेटी है. दीप्ति के भाई ऋषभ ने मीडिया को बताया है कि हरप्रीत के कई महिलाओं से अवैध संबंध हैं. 2011 में पता चला कि बहन के साथ जीजा और सास मारपीट करते थे. जब मारपीट हुई तो हम अपनी बहन को कोलकाता ले आए थे, लेकिन सास उसे वापस ले गई थी. फिर भी उस के साथ मारपीट की.

भाई ने बताया कि बहन मुझ से कहती थी मुझे रोज प्रताड़ित किया जाता है. भाई ने कहा मुझे नहीं पता कि मेरी बहन ने सुसाइड किया या मारी गई है. मैं ने अपनी बहन से 2 दिन पहले बात की थी. मुझे सिर्फ इंसाफ चाहिए. दक्षिणपश्चिम दिल्ली के वसंत विहार थाने की पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है. Suicide Case

Actress Murder Case: टुकड़ों में मिली अभिनेत्री की लाश

Actress Murder Case: राइमा इसलाम शिमू बांग्लादेश की एक जानीमानी अभिनेत्री थीं. उन्होंने न सिर्फ 50 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, बल्कि 2 दरजन से अधिक नाटकों में भी काम कर दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. यह महज इत्तफाक की बात है कि जिन दिनों देश भर में अपने दौर की खूबसूरत और लोकप्रिय अभिनेत्री परवीन बाबी की जिंदगी पर बनी वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ की चर्चा हो रही थी, उन्हीं दिनों बांग्लादेश की परवीन जितनी ही सैक्सी, लोकप्रिय और सुंदर एक्ट्रेस राइमा इसलाम शिमू की दुखद हत्या की चर्चा भी उतनी ही शिद्दत से हो रही थी.

फर्क सिर्फ इतना था कि परवीन बाबी की लाश उन के घर में मिली थी, जबकि राइमा की एक सड़क पर मिली थी. यह सड़क बांग्लादेश की राजधानी ढाका के केरानीगंज अलियापुर इलाके में हजरतपुर ब्रिज के नजदीक है, जो कालाबागान थाने के अंतर्गत आता है. 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिली तो बांग्लादेश में सनाका खिंच गया क्योंकि वह कोई मामूली हस्ती नहीं थीं बल्कि घरघर में उन की पहुंच थी. अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर उन्होंने अपना एक बड़ा दर्शक और प्रशंसक वर्ग तैयार कर लिया था.

जिस हाल में राइमा की लाश मिली थी, उस से साफ जाहिर हो रहा था कि उन की बेरहमी से हत्या की गई है. इस हादसे ने एक बार फिर साफ कर दिया कि रील और रियल लाइफ में जमीनआसमान का फर्क होता है और आमतौर पर फिल्म स्टार्स, फिर वे किसी भी देश के हों, की जिंदगी उतनी हसीन और खुशनुमा होती नहीं जितनी कि उन के जिए किरदारों में दिखती है. यही राइमा के साथ हुआ कि हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उन का बेहद करीबी शख्स था और हत्या की वजह कोई अफेयर, पैसों का लेनदेन, कोई विवाद या नशे की लत या फिर कोई दिमागी बीमारी भी नहीं थी.

45 वर्षीय राइमा साल 1977 में ढाका के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थीं, जिन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक था. ढाका से स्कूल और कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक्टिंग का कोर्स भी किया था. 19 साल की उम्र में ही उन्हें ‘बर्तमान’ फिल्म में काम करने का मौका मिल गया था. निर्माता काजी हयात की इस कामयाब फिल्म से वह फिल्म इंडस्ट्री में पहचानी जाने लगीं. फिल्म समीक्षकों ने तो उन की एक्टिंग को अव्वल नंबर दिए ही थे, दर्शकों ने भी उन्हें सराहा था. इस की वजह उन का ताजगी से भरा चेहरा और बेहतर एक्टिंग के अलावा उन की कमसिन अल्हड़पन और खूबसूरती भी थी.

पहली फिल्म कामयाब होने के बाद राइमा ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. देखते ही देखते उन्होंने बांग्लादेश के तमाम दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया. इन में इनायत करीम, शरीफुद्दीन खान, दीपू, देलवर जहां झंतु और चाशी नजरूल इसलाम प्रमुख हैं. सभी छोटेबड़े निर्देशकों के साथ राइमा ने 50 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया और टीवी पर भी अपना जलवा बिखेरा.

लोगों के दिलों में बसी थीं राइमा

छोटे परदे पर आना उन की व्यावसायिक मजबूरी भी हो गई थी, क्योंकि बांग्लादेश के लोग भी टीवी धारावाहिकों को ज्यादा तरजीह देने लगे हैं. राइमा ने कोई 25 धारावाहिकों में एक्टिंग की, जिस से घरघर उन की पहुंच और स्वीकार्यता बढ़ती गई. बांग्लादेश फिल्म इंडस्ट्री के लगभग सभी बड़े नायकों के साथ उन्होंने काम किया. खासतौर से अमित हसन, बप्पाराज रियाज, शाकिब खान, जाहिद हसन और मुशर्रफ करीम के साथ उन की जोड़ी खूब जमती थी.

राइमा आला कारोबारी दिमाग की मालकिन थीं, इसलिए उन्होंने खुद का प्रोडक्शन हाउस भी खोल लिया था. जिस के तहत कई टीवी सीरियल बने थे. अलावा इस के वह फिल्म पत्रकारिता भी ‘अर्थ कोथा द नैशनल बिजनैस मैगजीन’ के लिए करती थीं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस एक्ट्रेस को टीवी न्यूज चैनल एटीएन बांग्ला में सेल्स एंड मार्केटिंग में वाईस प्रेसिडेंट भी नियुक्त किया गया था. जल्द ही एक नामी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी टीएन इवेंट्स लिमिटेड के सीईओ की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई थी.

इतना ही नहीं, उन्होंने बांग्लादेश में ही अपना ब्यूटी सैलून भी शुरू कर दिया था, जिस का नाम रोज ब्यूटी सैलून है. ढाका का ग्रीन रोड इलाका राइमा के घर की वजह से भी पहचाना जाने लगा, जो दर्शकों और प्रशंसकों की नजर में किसी मन्नत या जन्नत से कम नहीं था. लेकिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि लाखों लोगों का मनोरंजन करने वाली और दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस एक्ट्रेस की निजी जिंदगी किसी नर्क से कम बदतर नहीं थी और इस की वजह था उन का पति शखावत अली नोबेल, जो कभी उन पर जान छिड़का करता था. इन दोनों ने 16 साल पहले लव मैरिज की थी.

शौहर ही निकला कातिल

आम दर्शक इस से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाता कि उस की चहेती एक्ट्रेस अपने महल जैसे घर के अंदर सदस्यों के साथ हंसखेल रही होगी, रोमांस कर रही होगी या फिर डायनिंग टेबल पर बैठी लंच या डिनर कर रही होगी. और कुछ नहीं तो पति और बच्चों के साथ आंचल हवा में लहराते लौन के झूले पर झूलती गाना गा रही होगी. उस के इर्दगिर्द रंगबिरंगे फूल और चहचहाते पक्षी होंगे. सर के ऊपर नीला खुला आसमान होगा. लेकिन ऐसा कुछ भी कम से कम राइमा की जिंदगी में तो नहीं था.

पिछले कुछ दिनों से वह बेहद घुटन भरी जिंदगी जी रही थीं. आलीशान घर के अंदर कलह स्थायी रूप से पसर चुकी थी जिस से उन के दोनों बच्चे सहमेसहमे से रहते थे. राइमा और शखावत कहने और देखने को ही साथ रहते थे और मियांबीवी कहलाना भी उन की सामाजिक मजबूरी हो चली थी. लेकिन रोजरोज की मारकुटाई और कलह आम बात हो चुकी थी. यह सब कितने खतरनाक मुकाम तक पहुंच चुका था, इस का खुलासा 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिलने के बाद हुआ. अंदर से टूटी और थकी हुई यह एक्ट्रेस 16 जनवरी को मावा एक शूटिंग के लिए गई थी. लेकिन देर रात तक वापस घर नहीं लौटी तो घर वालों को चिंता हुई क्योंकि राइमा का फोन भी बंद जा रहा था.

कालाबागान थाने में उन की गुमशुदगी की सूचना दर्ज हुई. एक रिपोर्ट राइमा की बहन फातिमा निशा ने भी लिखाई थी. पुलिस ने राइमा की ढुंढाई शुरू की, लेकिन देर रात तक कोई कामयाबी नहीं मिली तो मामला सुबह तक के लिए टल गया. इस दौरान उन का भाई शाहिदुल इसलाम खोकान लगातार पुलिस वालों से बहन को ढूंढने की गुजारिश करते खुद भी राइमा की तलाश में इस उम्मीद के साथ लगा रहा कि कहीं से कोई सुराग मिल जाए. लेकिन उस के हाथ भी मायूसी ही लगी. 17 जनवरी की सुबह कुछ राहगीरों ने हजरतपुर ब्रिज के पास एक लावारिस संदिग्ध बोरे को देख इस की खबर पुलिस को दी. पुलिस ने आ कर जैसे ही बोरे को खोला तो उस में से बरामद हुई राइमा की लाश, जो 2 टुकड़े कर बोरे में ठूंसी गई थी.

गले पर चोट के निशान भी साफसाफ दिख रहे थे, जिस से स्पष्ट हो गया कि राइमा की हत्या हुई है और लाश को यहां फेंक दिया गया है. लेकिन हत्यारा कौन हो सकता है, यह सवाल पुलिस को मथे जा रहा था. राइमा की हत्या की खबर जंगल की आग की तरह फैली और फैंस जहांतहां इकट्ठा होने लगे. शव को पोस्टमार्टम के लिए सर सलीमुल्लाह मैडिकल कालेज भेज दिया गया.

पुलिस को शखावत पर शक तो था ही, लेकिन जैसे ही राइमा के भाई शाहिदुल इसलाम खोकान ने यह कहा कि शखावत एक ड्रग एडिक्ट है. वह अकसर मेरी बहन से कलह करता था. मैं ने उस की कार में खून देखा है. वह सुबह 8 से ले कर 10 बजे तक घर पर नहीं था. मुझे लगता है कि उसी दौरान उस ने राइमा की लाश फेंक दी.

फिल्मों जैसा कत्ल

शाहिदुल की शिकायत पर पुलिस ने शखावत को घेरा तो बिना किसी ज्यादा मशक्कत के उस ने सच उगल दिया. अब तक राइमा के फैंस जगहजगह मोमबत्तियां ले कर उन की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे थे. सोशल मीडिया पर भी राइमा छाई हुई थीं. लोग श्रद्धांजलि देते राइमा के हत्यारे को गिरफ्तार करने की मांग और प्रदर्शन कर रहे थे. हिरासत में लिए गए शखावत ने बगैर किसी खास चूंचपड़ के अपना गुनाह कुबूल लिया. उस के बयान की बिनाह पर 6 लोग और गिरफ्तार किए गए, जिन में उन का ड्राइवर और एक नजदीकी दोस्त अब्दुल्ला फरहाद भी था. फरहाद को शखावत ने फोन कर बुलाया था.

पूछताछ में पता चला कि शखावत और फरहाद ने राइमा की हत्या 16 जनवरी को ही कर दी थी. वक्त था सुबह 7 बजे का. इन दोनों ने राइमा की लाश बोरे में भर दी और उसे प्लास्टिक की डोरी से सिल दिया. यह काम इत्मीनान से बिना किसी अड़ंगे के हो सके, इस के लिए उन्होंने घर पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड को नाश्ता लेने भेज दिया था. घटनास्थल से बरामद डोरी शखावत के गले का फंदा बनेगी, यह भी तय दिख रहा है क्योंकि जब पुलिस टीम घर पहुंची थी तो इस डोरी का पूरा बंडल वहां से बरामद हुआ था. जिस से शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी.

ये दोनों लाश को ठिकाने लगाने के पहले उसे मीरपुर ले गए थे, लेकिन वहां कोई उपयुक्त सुनसान जगह नहीं मिली तो वापस घर आ गए थे. राइमा की लाश उन लोगों के लिए बोझ बनती जा रही थी. मीरपुर से वापसी के बाद दोनों रात साढ़े 9 बजे के करीब हजरतपुर ब्रिज पहुंचे और लाश वाले बोरे को वहीं फेंक दिया, लेकिन हड़बड़ाहट और जल्दबाजी में गलती से डोरी वहीं छोड़ दी, जो उन के खिलाफ एक पुख्ता सबूत बन गई. लाश फेंकने के बाद घर आ कर दोनों ने सबूत मिटाने की गरज से कार को धोया और बदबू दूर करने के लिए उस में ब्लीचिंग पाउडर भी छिड़का. लेकिन इस के बाद भी खून के धब्बे पूरी तरह नहीं मिट पाए थे.

यानी राइमा शूटिंग पर गई है, यह झूठ जानबूझ कर फैलाया गया था, जिस से कत्ल को किसी हादसे में तब्दील किया जा सके या उस का ठीकरा किसी और के सिर फूटे, नहीं तो उसे तो ये लोग 16 जनवरी, 2022 को ही ऊपर पहुंचा चुके थे. गलत नहीं कहा जाता कि मुलजिम कितना भी चालाक हो, कोई न कोई सबूत छोड़ ही देता है फिर शखावत और फरहाद तो नौसिखिए थे, जो यह मान कर चल रहे थे कि उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने गुनाह को अंजाम दिया है, इसलिए पकडे़ जाने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होगा. कुछ दिन हल्ला मचेगा और फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा.

पुलिस के सामने शखावत ने शरीफ बच्चों की तरह मान लिया कि राइमा से कलह के चलते उस ने उस का कत्ल किया, लेकिन हकीकत में वह अव्वल दरजे का शराबी और ड्रग एडिक्ट था, जो पत्नी को मार कर उस की सारी दौलत हड़प कर लेना चाहता था, जिस से ताउम्र मौज और अय्याशी की जिंदगी जी सके. पर अब उसे जिंदगी भर जेल की चक्की पीसना तय दिख रहा है. हो सकता है अदालत कोई रहम न दिखाते हुए शखावत को फांसी की सजा ही दे दे, जिस का कि वह हकदार भी है. Actress Murder Case

Hindi stories: अबू सलेम की आवाज पर धड़कता था इस अभिनेत्री का दिल

Hindi stories: 1993 में मुंबई बम धमाकों के मामले की सुनवाई कर रही टाडा अदालत अबू सलेम समेत 5 अन्य दोषियों को सजा सुना दी है. इस वजह से अबू सलेम तो चर्चा में हैं ही, एक्ट्रेस मोनिका बेदी का नाम भी सुर्खियों में आ गया है. मोनिका लंबे समय तक अबू सलेम की गर्लफ्रेंड रही थीं. इन दिनों वह बेशक फिल्मी दुनिया से दूर हैं, लेकिन एक समय वो भी था जब अबू की वजह से ही उन्हें फिल्में मिलनी शुरू हुई थी.

ये जानना दिलचस्प है कि एक अंडरवर्ल्ड डौन और एक स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस के बीच प्यार की ये कहानी कहां और कैसे पनपी. मोनिका बेदी मूल रूप से पंजाब की हैं. उन्होंने ब्रिटेन की आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की. डांस और माडलिंग में भी मोनिका को काफी दिलचस्पी थी. यही दिलचस्पी उन्हें मुंबई लाई और यहां आकर 1995 में उन्हें उनकी पहली फिल्म ‘सुरक्षा’ मिली.

कहा जाता है कि अबू सलेम से मोनिका की मुलाकात एक बौलीवुड पार्टी के दौरान हुई थी. लेकिन एक मुलाकात ने ही दोनों के बीच कुछ ऐसा आकर्षण पैदा किया कि फिर मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया.

मोनिका की मानें तो थोड़े वक्त के लिए ही सही, मोनिका का दिल अबू के लिए धड़का जरूर था. मोनिका के मुताबिक उन्हें नहीं पता था कि जिस शख्स के लिए उनका दिल धड़क रहा था वो अंडरवर्ल्ड का मोस्ट वान्टेड है. उन्हें नहीं पता था कि जिसके साथ वो प्यार कर बैठी हैं उसका असली नाम अबु सलेम है.

साल 1998 में मोनिका पहली दफा फोन पर सलेम के संपर्क में आईं. मोनिका दुबई में थीं, फोन पर उन्हें दुबई में एक स्टेज शो करने का आफर मिला. बस उसी के बाद वो अबू को चाहने लगीं. मोनिका सलेम की आवाज पर फिदा हो गई थीं. अबू सलेम भी मोनिका से बेहद प्यार करता था.

बताया तो यहां तक जाता है कि मोनिका को उनकी पहली हिट फिल्म ‘जोड़ी नंबर वन’ में भी सलेम ने ही काम दिलवाया था. बौलीवुड में मोनिका के लिए वह एक ऐसा दौर था, जब सब उनकी इज्जत करने लगे थे. हर कोई उन्हें खुश करने की कोशिश करता था. जबकि ये सब मोनिका की परफार्मेंस की वजह से नहीं, बौलीवुड में सलेम के खौफ की वजह से हो रहा था.

1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट के आरोपी अबू सलेम को साल 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था. बताया जाता है कि जब यह गिरफ्तारी हुई, तब होटल में उनके साथ मोनिका बेदी भी थीं.

सुनने में आया था कि इसके बाद मोनिका ने सलेम का साथ छोड़ दिया था और सरकारी गवाह बन गई थीं. बता दें कि मोनिका फर्जी पासपोर्ट के मामले में चार साल जेल में बीता चुकी हैं.

अपने हिस्से की सजा काटकर वह कई टीवी रिएलिटी शोज में भी नजर आ चुकी हैं. वह बिग बौस सीजन 2 के अलावा झलक दिखला जा में भी नजर आई थीं. उन्होंने यूनिवर्सल म्यूजिक के एक एलबम के लिए इक ओंकार भी गाया है. साल 2013 में उन्होंने स्टार प्लस के शो सरस्वतीचंद्र में नेगेटिव रोल भी किया था.

Love Story in Hindi: अधूरी उड़ान

Love Story in Hindi: अमनदास से प्रेम विवाह करने के बाद स्वच्छंद विचारों वाली चारू पति से ऊब गई. उस ने अपने दूर के रिश्तेदार अनुराग से संबंध बना कर इश्क की ऐसी अधूरी उड़ान भरी कि…

दिल्ली के दक्षिण पश्चिम जिले के थाना नजफगढ़ के डयूटी औफिसर को दोपहर 11 बजे पुलिस नियंत्रण कक्ष द्वारा सूचना मिली कि नंगली डेरी के पास गहरे नाले में एक आदमी की लाश पड़ी है. सूचना मिलने पर इंसपेक्टर अनिल कुमार, एएसआई कृष्णचंद और कांस्टेबल अमरपाल को ले कर बताई गई जगह के लिए रवाना हो गए. वह नाला थाने से करीब दोढाई किलोमीटर दूर था. थोड़ी देर में पुलिस उस नाले के पास पहुंच गई, जिस में लाश पड़ी थी. नाले के किनारे खड़े तमाम लोग लाश को देख कर तरहतरह की बातें कर रहे थे. इंसपेक्टर अनिल कुमार ने देखा, नाले के बीचोबीच एक आदमी की लाश तैर रही थी. नाला गहरा था इसलिए समस्या यह थी कि लाश को पानी के बाहर कैसे निकाला जाए. सूचना पा कर थानाप्रभारी राजबीर मलिक भी मौके पर आ गए. वह भी लाश को बाहर निकलवाने की तरकीब सोचने लगे.

सोचविचार कर उन्होंने ट्रक के हवा भरे 2 ट्यूब मंगवाए. एक आदमी को ट्यूब पर बैठा कर लाश के पास भेजा गया. वह आदमी साथ लाए गए दूसरे ट्यूब पर लाश को डाल कर किनारे पर ले आया. मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम भी पहुंच गई थी. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. लाश 25-30 साल के एक युवक की थी. मृतक ब्राउन कलर की पैंट और सफेद रंग का बनियान पहने हुए था. उस की जेबों की तलाशी ली गई तो उन में ऐसी कोई चीज नहीं मिली जिस से उस की पहचान हो सकती. मृतक के सिर पर चोट के 3 घाव थे, इस से अनुमान लगाया गया कि हत्या करने से पहले उस के सिर पर किसी चीज से वार किए गए होंगे.

मृतक के गले में काले धागे में बंधा एक लौकेट था. उस के दाएं हाथ में लोहे का कड़ा था और बाएं हाथ की अंगुली में वह धातु का एक छल्ला पहने हुए था. वहां मौजूद लोगों से पुलिस ने लाश की शिनाख्त करानी चाही लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान पाया. प्राथमिक काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को जाफरपुर कलां स्थित राव तुलाराम मेमोरियल अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया और अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मामला दर्ज कर लिया. यह बात 12 फरवरी, 2015 की है.  हत्या के इस मामले की जांच के लिए थानाप्रभारी राजबीर मलिक के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में अतिरिक्त थानाप्रभारी अनिल कुमार, एएसआई कृष्ण चंद, हेडकांस्टेबल मनजीत, कांस्टेबल अमरपाल, अनीता आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम के सामने सब से बड़ी चुनौती मृतक की पहचान कराने की थी. पहचान होने के बाद ही हत्यारों का पता लगाया जा सकता था. मृतक का पता लगाने के लिए पुलिस ने सब से पहले अज्ञात लाश का हुलिया बताते हुए यह सूचना वायरलेस से दिल्ली के समस्त थानों को दे दी. इस के अलावा उस का फोटो दूरदर्शन पर प्रसारण के लिए भी भेज दिया. साथ ही पैंफ्लेट छपवा कर दक्षिणपश्चिम जिले के समस्त थानों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए गए. पैंफ्लेट चिपकवाने के अगले दिन यानी 13 फरवरी, 2015 को इंसपेक्टर अनिल कुमार के पास कई लोगों के फोन आए. उन लोगों को थाने बुला कर लाश के रंगीन फोटो दिखाए गए. लेकिन लाश की पहचान नहीं हो सकी. कई लोगों को अस्पताल की मोर्चरी ले जा कर भी लाश दिखाई गई लेकिन वह उन के किसी की नहीं निकली.

13 फरवरी, 2015 को ही दक्षिणपश्चिम जिले के द्वारका (उत्तरी) थाने में जयंत कुमार नाम का एक आदमी अपनी पत्नी व कुछ अन्य लोगों के साथ पहुंचा. उस ने थानाप्रभारी को बताया कि इसी थाना क्षेत्र के हरिविहार कालोनी में उस की बेटी चारू और दामाद अमनदास रहते थे. अमनदास एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में इंजीनियर था. कल से उन दोनों में से किसी का भी फोन नहीं मिल रहा. उन के कमरे का ताला भी बंद है. चारू से उन की कल बात हुई थी. लेकिन वो दोनों अब कहां हैं पता नहीं लग रहा. जयंत कुमार के साथ अमन दास की बहन प्रियंका दास भी थी.

उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि वह उन के परिचितों को भी फोन कर चुके हैं. फिर भी उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई. चारू और अमनदास ने करीब एक साल पहले ही लवमैरिज की थी. लवमैरिज की बात जान कर थानाप्रभारी को आश्ांका हुई कि कहीं वे अपने घर वालों की किसी साजिश का शिकार तो नहीं हो गए. क्योंकि औनर किलिंग की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए थानाप्रभारी ने चारू और उस के पति की गुमशुदगी दर्ज कर ली. नजफगढ़ थाने में अज्ञात युवक की लाश बरामद होने का पैंफ्लेट थाना द्वारका (उत्तरी) के थानाप्रभारी के पास भी मौजूद था. जयंत कुमार ने अपने दामाद अमनदास की उम्र करीब 28 साल बताई थी और नजफगढ़ नाले से जिस युवक की लाश बरामद हुई थी वह भी करीब 25-30 साल का था, इसलिए उन्होंने वह पैंफ्लेट जयंत कुमार को दिखाया.

उस पैंफ्लेट को देखने के बाद जयंत कुमार और प्रियंका दास गंभीर हो गए. इस की वजह यह थी कि उस का लापता हुआ भाई अमनदास भी हाथ में कड़ा और अंगुली में छल्ला पहनता था. इस के अलावा वह गले में काले धागे वाला लौकेट भी डाले रहता था. वह बोली, ‘‘सर, नजफगढ़ नाले में जो लाश मिली है मैं उसे देखना चाहती हूं.’’

‘‘इस के लिए तुम्हें थाना नजफगढ़ जाना पडे़गा. क्योंकि लाश वहीं की पुलिस ने बरामद की थी.’’ थानाप्रभारी ने बताया.

इस के बाद जयंत कुमार और प्रियंका दास व उन के साथ आए लोगों ने थाना नजफगढ़ पहुंच कर इंसपेक्टर अनिल कुमार से बात की. अनिल कुमार ने उन्हें लाश के फोटो दिखाए. फोटो देख कर प्रियंका की धड़कनें बढ़ गईं. लाश पानी में पड़ी होने की वजह से फूल चुकी थी इसलिए वह स्पष्ट रूप से पहचानने में नहीं आ रही थी. इसलिए उन्होंने लाश देखने की इच्छा जाहिर की. इंसपेक्टर अनिल कुमार उन लोगों को लाश दिखाने के लिए राव तुलाराम मेमोरियल अस्पताल ले गए. वहां उन लोगों को मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो प्रियंका दास की चीख निकल गई. उस ने रोते हुए बताया कि लाश उस के भाई अमन दास की है. दामाद की लाश देख कर पास में खड़े जयंत कुमार की आंखों से भी आंसू बहने लगे. लाश की शिनाख्त होने पर इंसपेक्टर अनिल कुमार ने राहत की सांस ली.

चूंकि इंसपेक्टर अनिल कुमार को आगे की काररवाई भी करनी थी इसलिए उन्होंने मृतक के परिजनों को सांत्वना दे कर चुप कराया. उन्होंने प्रियंका दास से अमन दास के बारे में मालूमात की तो उस ने बताया, ‘‘वह एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर था और द्वारका के हरिविहार में किराए के कमरे में अपनी पत्नी चारू के साथ रह रहा था. फोन पर उस से मेरी बात होती रहती थी. आज मेरे पास चारू के पिता जयंत कुमार का फोन आया था. उन्होंने बताया कि चारू और अमन से उन की बात नहीं हो पा रही है. उन के कमरे पर भी ताला लगा हुआ है. तब मैं नोएडा से दिल्ली आई और यहां भाई की लाश देखने को मिली.’’ कह कर वह फिर से फफकफफक कर रोने लगी.

जयंत कुमार ने इंसपेक्टर अनिल कुमार को बताया कि वह बेटी और दामाद की खैरखबर फोन से लेते रहते थे. 3-4 दिन पहले उन की चारू से बात हुई थी तो वह घबराई हुई थी. घबराने की वजह पूछने पर उस ने बताया कि उस की ननद प्रियंका को चोट लग गई है, वह अमन के पास नोएडा आई हुई है. आज जब बेटी और दामाद में से किसी का भी नंबर नहीं मिला तो मैं उन के कमरे पर गया. लेकिन कमरे पर ताला लगा देख कर मैं घबरा गया. इस पर मैं ने अमन की बहन प्रियंका को फोन किया. जयंत कुमार ने आगे बताया कि प्रियंका से बात कर के उन्हें पता चला कि उसे न तो चोट लगी थी और न ही वह चारू और अमनदास के पास गई थी. इस बात से उन्हें अंदेशा हुआ और प्रियंका को दिल्ली बुला कर वह थाना द्वारका (उत्तरी) पहुंच गए.

जयंत कुमार ने आशंका जताई कि हो न हो किसी ने दोनों की ही हत्या कर दी हो. इस अंदेशे को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने फिर से उस नाले के आसपास चारू के शव को ढूंढा लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. जयंत कुमार और प्रियंका दास ने किसी पर कोई शक वगैरह नहीं जताया तो पुलिस ने अमनदास की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि अमनदास की मौत सिर में गंभीर चोट लगने की वजह से हुई थी. अब अमनदास की बहन और ससुर से बात कर के पुलिस को यह पता लगाना था कि चारू की हत्या हो चुकी है या फिर वह कहीं छिप कर रह रही है. यानी चारू के बारे में जानकारी हासिल करना पुलिस की पहली प्राथमिकता थी.

पुलिस ने सब से पहले चारू और उस के पति अमनदास के नंबर ले कर उन के फोन की काल डिटेल्स निकलवाने की काररवाई की. काल डिटेल्स से पुलिस यह जानना चाह रही थी कि उन की आखिरी बार किस से बात हुई थी और उन के फोन की अंतिम लोकेशन किस क्षेत्र में थी. उन के फोन नंबरों की काल डिटेल्स आने तक इंसपेक्टर अनिल कुमार ने अपने स्तर पर ही मामले की छानबीन शुरू कर दी. इंसपेक्टर अनिल कुमार ने मृतक अमनदास की बहन प्रियंका दास और अन्य लोगों को पूछताछ के लिए एक बार फिर थाने बुलाया. उन्होंने उन से जानना चाहा कि चारू को आखिरी बार कब और किस के साथ देखा गया था. तभी उन के एक रिश्तेदार ने बताया कि हफ्ता भर पहले चारू को अनुराग मेहरा नाम के युवक के साथ देखा गया था.

‘‘अनुराग मेहरा कौन है?’’ इंसपेक्टर अनिल कुमार ने पूछा.

‘‘सर, अनुराग मेहरा दिल्ली में बुराड़ी के पास संतनगर में रहता है. करीब एक साल  पहले अनुराग की बहन की शादी चारू के दूर के मामा के साथ हुई थी.’’ प्रियंका ने बताया.

पुलिस टीम उत्तरी दिल्ली स्थित बुराड़ी के नजदीक संतनगर कालोनी में अनुराग मेहरा के पहुंची. अनुराग घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. थानाप्रभारी के सामने पहुंच कर अनुराग डर गया. थानाप्रभारी राजबीर मलिक उस की घबराहट को भांप गए. उन्होंने उस से चारू के बारे में पूछा तो उस ने अनभिज्ञता जताई. जबकि अनुराग के हावभाव से लग रहा था कि वह कुछ सच्चाई छिपा रहा है. इसलिए उन्होंने उस से सख्ती से पूछताछ की. इस पर अनुराग बोला, ‘‘सर, मैं चारू से 5-6 फरवरी की रात को मिला था. सुबह होने पर मैं अपने घर चला गया था. चारू अपने कमरे पर ही रह गई थी. बाद में वह कहां गई, पता नहीं.’’

‘‘तुम उस से रात में ही मिलने क्यों गए थे? 5-6 की रात को जब तुम उस से मिले थे तब उस का पति अमनदास कहां था?’’ राजबीर सिंह ने पूछा.

‘‘सर, वो भी अपने कमरे में ही था.’’

यह सुन कर थानाप्रभारी थोड़ा चौंके. उन्हें लगा कि अमनदास का हत्यारा वही होगा. क्योंकि जब वह रात को चारू से मिलने आया होगा तो शायद उस के पति अमनदास ने उसे और चारू को एकांत में देख लिया होगा. फिर भेद खुलने के डर से अनुराग ने अमनदास की हत्या कर दी होगी. साथ ही उन के दिमाग में यह भी आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि चारू ने पति की हत्या का विरोध किया हो और अनुराग ने चारू को भी मार कर कहीं दूसरी जगह ठिकाने लगा दिया हो. इसलिए उन्होंने उस से सीधे सवाल किया, ‘‘तुम ने चारू की लाश कहां डाली है?’’

‘‘चारू की लाश!’’ अनुराग घबरा कर बोला.

‘‘हां, तुम सीधे बताते हो या फिर…’’

‘‘सर, मैं ने चारू को नहीं मारा. हम ने सिर्फ अमनदास की हत्या की थी. उस की हत्या में चारू खुद शामिल थी. रात को उस की लाश नाले में डालने के बाद सुबह को मैं अपने घर चला गया था.’’ अनुराग ने बताया.

अनुराग मेहरा ने चारू के साथ मिल कर उस के पति अमनदास की हत्या क्यों की, पुलिस ने इस बारे में अनुराग से पूछताछ की तो अमनदास की हत्या की जो कहानी सामने आई वह मन को झकझोर देने वाली थी. अमनदास मूलरूप से असम का रहने वाला था. उस के पिता भारतीय सेना में नौकरी करते थे जो अब रिटायर हो चुके हैं. कई साल पहले वह दिल्ली के उत्तमनगर क्षेत्र में रहते थे और एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. उत्तमनगर में ही उन के पड़ोस में जयंत कुमार रहते थे. जयंत कुमार दिल्ली की साप्ताहिक बाजारों में दुकान लगाते हैं.

पासपास रहने की वजह से दोनों परिवारों के बीच पारिवारिक संबंध बन गए थे. अमनदास ने असम के एक पालिटेक्निक कालेज से डिप्लोमा किया था. वह दिल्ली में नौकरी की तलाश में था. उधर चारू भी जवान थी. अमनदास और चारू के अकसर मिलनेजुलने से उन के बीच प्यार हो गया और उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. यह बात दोनों ने घर वालों को बता भी दी कि वे दोनों शादी करना चाहते हैं. अमन के घर वालों को बेटे की पसंद पर कोई एतराज नहीं था. अब सब कुछ चारू के घर वालों की इच्छा पर निर्भर था. चारू के पिता जयंत कुमार जानते थे कि अमनदास पढ़ालिखा और होनहार लड़का है. उन्होंने सोचा कि आज नहीं तो कल अमन की नौकरी लग ही जाएगी. उस के साथ चारू की जिंदगी हंसीखुशी से कटेगी.

यही सोच कर उन्होंने बेटी की बात मान ली. इस से चारू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इस के बाद सामाजिक रीति रिवाज से दोनों की शादी हो गई. यह सन 2011 की बात है. शादी के बाद अमनदास के घर वाले असम चले गए. चारू भी उन के साथ गई थी. अमन के पिता ने वहीं पर एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली. चारू और अमन असम में करीब एक साल रहे. इस दौरान चारू ने एक बेटी को जन्म दिया लेकिन जन्म के एक दिन बाद ही उस बच्ची की मौत हो गई. बेटी की मौत के बाद चारू एक तरह से सदमे में आ गई. उसे डाक्टर के पास ले जाया गया तो डाक्टर ने सलाह दी कि उसे काउंसलिंग की जरूरत है.

बहरहाल, कुछ दिनों तक असम में रहने के बाद अमन और चारू दिल्ली आ गए. दिल्ली आ कर अमन नौकरी की तलाश में जुट गया. थोड़ी कोशिश के बाद बाहरी दिल्ली के ढिचाऊं कलां के पास एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में उस की नौकरी लग गई. अमनदास को नौकरी मिल जाने के बाद पतिपत्नी ककरोला गांव में किराए पर कमरा ले कर रहने लगे. पति के नौकरी पर चले जाने के बाद चारू दिन भर घर में अकेली रहती थी. घर के कामधाम निपटाने के बाद अकेलेपन से वह ऊब जाती थी. उस ने इस बारे में एक दिन अमन से कहा, ‘‘मैं खाली समय में घर पर पड़ेपड़े बोर हो जाती हूं, इसलिए मैं चाहती हूं कि आसपास कहीं नौकरी कर लूं. इस से चार पैसे घर में आएंगे.’’

चारू पढ़ीलिखी तेजतर्रार युवती थी. इसलिए अमन को उस की तरफ से कोई चिंता नहीं थी. उस ने उसे नौकरी की इजाजत दे दी. साथ ही वह खुद भी यारदोस्तों के माध्यम से उस के लिए नौकरी तलाशने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि एक जानने वाले व्यक्ति की  मार्फत रमेशनगर स्थित एक काल सेंटर में चारू को नौकरी मिल गई. नौकरी लगने के बाद चारू में एकदम बदलाव आने शुरू हो गए. उसे जो सेलरी मिलती थी, उस का ज्यादातर हिस्सा वह अपने बननेसंवरने पर खर्च कर देती थी. कभी अमन उस से फिजूलखर्ची रोकने की बात करता तो वह कह देती कि वह जो भी खर्च करती है अपनी कमाई का करती है. पत्नी का जवाब सुन कर अमन को गुस्सा तो आता लेकिन घर का माहौल खराब न हो यह सोच कर वह अपने गुस्से को जाहिर नहीं करता था.

जब पत्नी नौकरी करने घर से निकलती है तो उस की किसी न किसी बाहरी व्यक्ति से बातचीत तो होती ही है. चारू के साथ भी यही  हुआ. औफिस में काम करने वाले कुछ लोगों के साथ उस की दोस्ती हो गई. यह बात अमनदास को पसंद नहीं थी. उस ने चारू को समझाया कि वह केवल अपने काम से मतलब रखे और डयूटी कर के सीधी घर आ जाए. मगर चारू स्वच्छंद विचारों वाली महिला थी, उस ने पति की बातों को गंभीरता से नहीं लिया. चारू के एक दूर के मामा थे दीपक. वह अविवाहित थे. एक दिन चारू ने अपने औफिस में काम करने वाले सुधीर नाम के युवक से अपने मामा दीपक के लिए कोई लड़की बताने को कहा.

उसी औफिस में अनुराग मेहरा नौकरी करता था. अनुराग उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी थाने के अंतर्गत आने वाले संतनगर में रहता था. उस की बहन भी शादी लायक थी. अनुराग ने अपने यार दोस्तों से अपनी बहन के लिए कोई ठीक सा लड़का बताने को कह रखा था. चारू ने जब सुधीर से अपने मामा के लिए लड़की देखने की बात कही तो सुधीर ने उस से कहा, ‘‘अनुराग की बहन भी शादी योग्य है. इस बारे में तुम सीधे उस से बात कर लो. अगर दोनों के बीच बात बन गई तो इस से अच्छा क्या हो सकता है?’’

चारू ने इस बारे में सीधे अनुराग मेहरा से बात की. इस के बाद अनुराग के घर वालों ने दीपक को देखा. उन्हें दीपक का घरपरिवार ठीक लगा. दोनों तरफ से बात तय हो जाने के बाद दीपक की शादी अनुराग की बहन के साथ तय हो गई. शादी हो जाने के बाद चारू और अनुराग के औफिस के संबंध रिश्तेदारी में बदल गए. यह एक साल पहले की बात है. इस के कुछ दिन बाद अनुराग ने नौकरी छोड़ दी और संतनगर इलाके में ही मोबाइल  फोन रिचार्ज करने और उस से संबंधित अन्य सामान बेचने की दुकान खोल ली. इस बीच उस का चारू के घर आनाजाना शुरू हो गया था. दरअसल इस की वजह यह थी कि अनुराग मेहरा अविवाहित था. उस की नजर चारू पर थी. वह मन ही मन चारू को चाहने लगा था.

उधर काम बढ़ने पर अमनदास ज्यादा व्यस्त हो गया था. वह देर रात घर लौटता था. थकामांदा होने की वजह से वह खापी कर सो जाता. पत्नी की शारीरिक जरूरतों की तरफ उस का कोई ध्यान नहीं था. पति की इस बेरुखी से चारू के कदम बहक गए. चारू काफी दिनों से 25 वर्षीय अनुराग मेहरा की आंखों की भाषा को समझ रही थी. वह उस की बातों से उस के मन की चाहत को भांप गई थी. पति की बेरुखी ने उसे अनुराग की तरफ बढ़ने के लिए मजबूर कर दिया. वह अनुराग के साथ बिना किसी झिझक के घूमनेफिरने लगी. एक बार तो वह अनुराग के साथ मथुरा भी घूमने गई. वहां वे दोनों एक होटल में ठहरे. तभी उन के बीच जिस्मानी संबंध भी कायम हो गया.

मथुरा जाने से पहले चारू ने अमनदास को बताया था कि औफिस की तरफ से एक टूर मथुरा जा रहा है. उस टूर में वह भी जा रही है. अमनदास ने भी इस बारे में छानबीन नहीं की. उसे क्या पता था कि वह उस की आंखों में धूल झोंक कर अपने प्रेमी के साथ रंगरलियां मनाने जा रही है. कोई भी महिला जब इस तरह के कदम उठाती है तो वह अपने स्वार्थ में इतनी अंधी हो जाती है कि उसे इज्जतबेइज्जती की भी परवाह नहीं रहती. वह हमेशा अपने स्वार्थ को पूरे करने के तानेबाने बुनती है. चारू ने सोचा था कि उस की हरकतों का पति को पता नहीं लगेगा, इसलिए पति के ड्यूटी पर निकलते ही वह अपने कमरे पर अनुराग को बुला लेती थी. इस के बाद उन की रासलीला शुरू हो जाती थी. काफी दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा. इसी दौरान चारू ने नौकरी भी छोड़ दी.

चारू भले ही पति की आंखों में धूल झोंक रही थी लेकिन वह मोहल्ले में रहने वालों की नजरों को धोखा नहीं दे सकती थी. अनुराग उस के पति की गैरमौजूदगी में उस के कमरे पर आ कर घंटों तक रुकता था. मोहल्ले वाले इस का मतलब समझ रहे थे. बहरहाल चारू और अनुराग के संबंधों को ले कर मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई. किसी तरह यह बात अमनदास के कानों तक भी पहुंच गई. अमनदास पत्नी पर विश्वास करता था. उसे लोगों की बातों पर यकीन नहीं आया लेकिन इन बातों ने उस के दिल में शक की लहर जरूर दौड़ा दी.

उस ने इस बारे में चारू से बात की तो वह उस के सामने एकदम सती सावित्री सी बन गई. उस ने कहा कि अनुराग हमारा रिश्तेदार है. वह कभीकभार यहां आ जाता है तो पता नहीं लोगों को क्यों जलन होती है. उस ने पति पर विश्वास जमाते हुए कहा कि उस के और अनुराग के बीच ऐसा कुछ भी नहीं है. अमन ने भी उस की बातों पर विश्वास कर लिया. पति के कुछ न कहने पर चारू अपनी चालाकी पर इतरा रही थी. वह मन ही मन खुश थी कि उस ने कितनी आसानी से पति को मूर्ख बना दिया. उस ने पहले की ही तरह अनुराग से मिलनाजुलना जारी रखा. उधर अमन ने भले ही पत्नी से कुछ नहीं कहा था लेकिन उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. सच्चाई जानने के लिए टाइमबेटाइम अपने कमरे पर आने लगा.

एक दिन दोपहर के समय वह अपने कमरे के करीब पहुंचा ही था तभी उस ने कमरे से अनुराग को निकलते देखा. अनुराग ने उसे नहीं देखा था. कमरे से निकल कर अनुराग सीधे अपनी कार में बैठ कर वहां से चला गया था. अमन कमरे में गया. उसे अचानक आया देख कर चारू चौंक गई. अमन ने उस से पूछा, ‘‘लगता है, अनुराग ने यहां आना बंद कर दिया है.’’

‘‘जब लोग फालतू की बातें करते हैं तो वो यहां क्यों आएगा.’’ चारू तपाक से बोली.

उस की बात सुन कर अमन समझ गया कि चारू उस से झूठ बोल रही है. अनुराग को उस ने घर से निकलते देखा था जबकि चारू ने यह बात उसे नहीं बताई. अपने वहम की पुष्टि के लिए उस ने फिर पूछा, ‘‘मेरे आने से पहले क्या कोई मेहमान यहां आया था?’’

‘‘नहीं तो, किस ने बताया आप को? यहां तो कोई नहीं आया था.’’ वह घबराते हुए बोली.

‘‘तुम झूठ बोल रह हो. यहां अभी अनुराग आया था. तुम्हारी बातों से तो लग रहा है कि मोहल्ले वाले तुम्हारे बारे में जो बातें कह रहे हैं वह सही हैं.’’ अमन झल्लाते हुए बोला.

पति के तेवर देख कर चारू चुप रही. पत्नी को कुछ देर डांटनेडपटने के बाद अमन भी चुप हो गया. लेकिन उस दिन के बाद दोनों के बीच मनमुटाव शुरू हो गया. रोजाना का झगड़ा आम बात हो गई. बात चारू के मायके तक पहुंची तो उस के पिता जयंत कुमार ने चारू को समझाया. लेकिन चारू अनुराग के प्यार में इतनी अंधी हो चुकी थी कि उस ने पिता की बातों को भी हवा में उड़ा दिया. उस ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह अनुराग के साथ शादी कर के अलग घर बसाएगी. इस के लिए उस ने अमन से तलाक देने को कहा. लेकिन अमन उसे तलाक देने को राजी नहीं हुआ.

चारू को जब लगा कि सीधी अंगुली से घी नहीं निकलेगा तो उस ने अनुराग से साफ कह दिया कि अब अमन को ठिकाने लगाना ही पड़ेगा. इस के बाद ही हम साथसाथ रह सकते हैं. अनुराग ने जब कहा कि अमन को मार कर मुझे क्या मिलेगा तो चारू तपाक से बोली, ‘‘मैं मिलूंगी. मुझे हासिल करने के लिए तुम्हें यह काम करना ही पड़ेगा.’’

अनुराग भी चारू को बहुत चाहता था. जब उसे लगा कि चारू मानने वाली नहीं है तो उस ने अमन को ठिकाने लगाने की हामी भर दी. अनुराग किराए के हत्यारे से अमन की हत्या कराना चाहता था. लेकिन उस के सामने समस्या यह थी कि वह ऐसे किसी शख्स को नहीं जानता था जो पैसे ले कर यह काम कर सके. तब चारू और अनुराग ने खुद ही अमन को ठिकाने लगाने की योजना तैयार कर ली. 4 फरवरी, 2015 को अचानक अमन के हाथ से चाय का प्याला गिर गया. गर्म चाय से उस का पैर जल गया था. उस की वजह से वह 2 दिन से अपनी ड्यूटी पर नहीं जा पा रहा था. चारू और अनुराग ने इसी का फायदा उठाया.

5 फरवरी की रात को अमन पत्नी की योजना से बेखबर हो कर सो गया. तभी चारू ने अनुराग को फोन कर दिया. अनुराग अपनी सैंट्रो कार नंबर डीएल8सी एफ5776 से अमनदास के कमरे पर पहुंच गया. उस ने कमरे के बाहर पहुंच कर चारू को फोन किया. चारू ने दरवाजा खोल दिया और उसे यह कहते हुए छत पर भेज दिया कि आधी रात के बाद जब वह फोन करे तो छत से नीचे आ जाना. अनुराग छत पर चला गया. चारू पति के गहरी नींद में सो जाने का इंतजार करने लगी. जब वह गहरी नींद सो गया तो चारू ने अनुराग को छत से कमरे में बुला लिया. अनुराग अपने साथ बेसबाल का बैट लाया था. अनुराग ने योजनानुसार बेड पर सोए अमनदास पर बेसबाल बैट से जोरदार वार किया.

सिर पर प्रहार होते ही अमन की चीख निकल गई. तभी चारू ने उस की आंखों में मिर्ची पाउडर झोंक दिया. वह चीखता हुआ आंखें मलने लगा. उसी दौरान अनुराग ने उस के सिर पर कई वार किए. अमन के सिर से खून बहने लगा. वार करते समय बेसबाल के बैट का हत्था टूट गया तो चारू घर में रखी लकड़ी की सोंटी उठा लाई. उस ने उस सोंटी से अमन के सिर पर कई वार किए. कुछ ही देर में अमनदास बेहोश हो गया तो दोनों ने बेड की चादर सहित उसे फर्श पर डाल दिया. चारू कमरे में रखा लोहे का पाइप उठा लाई. चारू ने उस पाइप से पति पर वार किया. बाद में अनुराग अमन के पेट पर बैठ गया और उस का गला दबा दिया.

अमनदास की हत्या करने के बाद उन्होंने लाश उसी बेडशीट में लपेट दी फिर बाथरूम में अपने हाथ वगैरह साफ किए. एक पिलो कवर पर भी खून के ज्यादा धब्बे लगे थे, उस पिलो कवर को भी उन्होंने बेडशीट के साथ लपेट दिया. हाथपैर साफ करने के बाद चारू ने अपने कपड़े वगैरह एक बैग में भर दिए ताकि उसे ठिकाने लगाने के बाद वह भी वहां से खिसक जाए. अनुराग की सैंट्रो कार दरवाजे के बाहर खड़ी थी. दोनों ने चादर में लपेटी अमनदास की लाश सैंट्रो कार की पिछली सीट पर डाल दी. जैसे ही अनुराग ने कार स्टार्ट करनी चाही, वह स्टार्ट नहीं हुई. वह घबरा गया कि अब क्या करे.

उसी समय इत्तफाक से 2 लोग उधर से आ रहे थे, अनुराग ने उन लोगों से कार में धक्का लगवाया. कार स्टार्ट होने पर चारू बैग ले कर कार में अगली सीट पर बैठ गई. बैग ले कर वह अगली सीट पर इसलिए बैठी ताकि पुलिस चेकिंग में उन्हें परेशानी न आए. अमूमन रात में चैकिंग के दौरान गाड़ी में किसी महिला के बैठे होने पर पुलिस यही समझती है कि वह परिवार की ही महिला है. कार ले कर अनुराग पहले बहादुरगढ़ रोड पर गया. लेकिन वहां मौका न मिलने पर वह वापस नजफगढ़ की ओर लौट आया और नंगली डेरी के पास गहरे नाले में चादर से लाश निकाल कर फेंक दी. बाद में चादर और पिलो कवर भी वहीं फेंक दिया.

लाश ठिकाने लगा कर वे दोनों कमरे पर पहुंचे. चारू ने बेड और फर्श पर लगे खून के धब्बे साफ किए. अनुराग भी वहीं सो गया. सुबह होते ही अनुराग अपने घर चला गया. थोड़ी देर बाद चारू ने अंकित नाम के युवक को फोन किया. अंकित नजफगढ़ में ही रहता था और उस के औफिस में ही काम करता था. उस ने अंकित से कहा कि अमन उस से लड़झगड़ कर उसे अकेला छोड़ कर कहीं चला गया है. उस ने उस के पास रहने को कहा. अंकित ने सहानुभूति जताते हुए उसे अपने कमरे पर बुला लिया. चारू बैग में अपने कपड़े आदि भर कर दरवाजे पर ताला लगा कर अंकित के कमरे पर चली गई. इस बीच चारू की अपने घर वालों से फोन पर बात होती रही.

एक दिन चारू अंकित के सामने अपना दुखड़ा रो रही थी तभी उस के पिता जयंत कुमार का फोन आया. फोन पर बात करते समय जयंत कुमार को लगा कि चारू सामान्य नहीं है. उन्होंने उस से घबराहट की वजह पूछी तो चारू ने बता दिया कि ननद के चोट लगी है. उन्हें देखने के लिए वह नोएडा आई हुई है. लेकिन 12 फरवरी को उस ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर दिया. 12 फरवरी के बाद जयंत कुमार की बेटी से बात नहीं हुई तो वह परेशान हो गए. उधर अनुराग और चारू ने नाले में अमनदास की जो लाश फेंकी थी वह उस समय तो पानी में डूब गई थी. बाद में वह 12 फरवरी को फूलकर पानी की सतह पर आ गई. नाले में लोगों ने लाश देखी तो उस की सूचना पुलिस को दी.

अनुराग से पूछताछ के बाद पुलिस ने 14 फरवरी, 2015 को ही चारू को अंकित के यहां से गिरफ्तार कर लिया. चारू फोन पर अनुराग से बात करती ही रहती थी. उस ने अनुराग को बता दिया था कि वह नजफगढ़ में अंकित के पास रह रही है. थाने में चारू ने अपने प्रेमी को पुलिस हिरासत में देखा तो वह समझ गई कि अनुराग ने सारी सच्चाई पुलिस को बता दी है इसलिए उस ने भी पुलिस के सामने पति की हत्या की बात कुबूल कर ली. पुलिस ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बेसबाल का बैट, सोंटी और लोहे का पाइप चारू के कमरे से बरामद कर लिया. नाले में फेंकी गई बेडशीट और पिलो कवर बरामद नहीं हो सके. चारू और अनुराग मेहरा को गिरफ्तार कर पुलिस ने द्वारका कोर्ट में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की तफ्तीश इंसपेक्टर अनिल कुमार कर रहे हैं. Love Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

एक हत्या ऐसी भी : कौन था मंजूर का कातिल?

एक हत्या ऐसी भी : कौन था मंजूर का कातिल? – भाग 5

मैं 2 घंटे बाद अपने औफिस आया, गामे शाह अभी नहीं आया था. आमना आ चुकी थी. मैं ने उस से कहा, ‘‘आमना, मेरे दिल में तुम्हारे लिए हमदर्दी पैदा हो गई थी, लेकिन तुम ने सच फिर भी नहीं बोला और कहा कि पता नहीं मंजूर कहां गया था. जबकि तुम ने ही उसे रशीद के पास भेजा था.’’

आमना की हालत रशीद की तरह हो गई. मैं ने उस का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘आमना, अब भी समय है. सच बता दो. मैं मामले को गोल कर दूंगा.’’

‘‘अब यह बताओ, तुम्हारा पति अपने दुश्मन के पास गया था, वह सारी रात वापस नहीं लौटा. क्या तुम ने पता करने की कोशिश की कि वह कहां गया है और क्या रशीद ने उस की हत्या कर के कहीं फेंक न दिया हो?’’

आमना का चेहरा लाश की तरह सफेद पड़ गया. मैं ने उस से 2-3 बार कहा लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘तुम कयूम को बुला कर उस से कह सकती थी कि मंजूर बाग में गया है और वापस नहीं आया. वह उसे जा कर देखे.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

मुझे उस की हालत देख कर ऐसा लगा जैसे उस का दम निकल जाएगा.

‘‘तुम ने मंजूर को सलाह दी थी कि वह शाम को बाग में जाए. उस की हत्या के लिए तुम ने रास्ते में एक आदमी बिठा रखा था ताकि जब वह लौटे तो वह मंजूर की हत्या कर दे. वह आदमी था कयूम.’’

वह चीख पड़ी, ‘‘नहीं…नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है.’’

‘‘क्या रशीद ने उस की हत्या की है?’’

‘‘नहीं…’’ यह कह कर वह चौंक पड़ी.

कुछ देर चुप रही. फिर बोली, ‘‘मैं घर पर थी, मुझे क्या पता उस की हत्या किस ने की?’’

‘‘मेरी एक बात सुनो आमना,’’ मैं ने उस से प्यार से कहा, ‘‘मुझे तुम से हमदर्दी है. तुम औरत हो, अच्छे परिवार की हो. मैं तुम्हारी इज्जत का पूरा खयाल रखूंगा. मुझे पता है कि हत्या तुम ने नहीं की है. आज का दिन मैं तुम्हें अलग किए देता हूं. खूब सोच लो और मुझे सच सच बता दो. तुम्हें इस केस में बिलकुल अलग कर दूंगा. तुम्हें गवाही में भी नहीं बुलाऊंगा.’’

उस की हालत पतली हो चुकी थी. उस ने मेरी किसी बात का भी जवाब नहीं दिया. मैं ने कांस्टेबल को बुला कर कहा, इस बीबी को अंदर ले जाओ और बहुत आदर से बिठाओ. किसी बात की कमी नहीं आने देना. पुलिस वाले इशारा समझते थे कि उस औरत को हिरासत में रखना है.

गामे शाह आ गया. मेरा अनुभव कहता था कि हत्या उस ने नहीं की है. लेकिन हत्या के समय वह कुल्हाड़ी ले कर कहां गया था? मैं ने उसे अंदर बुला कर पूछा कि कुल्हाड़ी ले कर कहां गया था.

उस ने एक गांव का नाम ले कर बताया कि वह वहां अपने एक चेले के पास गया था. मैं ने एक कांस्टेबल को बुलाया और गामे शाह के चेले का और गांव का नाम बता कर कहा कि वह उस आदमी को ले कर आ जाए.

‘‘जरा ठहरना हुजूर, मैं उस गांव नहीं गया था. बात कुछ और थी.’’ उस ने कहा.

वह बेंच पर बैठा था. मैं औफिस में टहल रहा था. मैं ने उस के मुंह पर उलटा हाथ मारा और सीधे हाथ से थप्पड़ जड़ दिया. वह बेंच से नीचे गिर गया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया.

असल बात उस ने यह बताई कि वह उस गांव की एक औरत से मिलने गया था, जिसे उस से गांव से बाहर मिलना था. कुल्हाड़ी वह अपनी सुरक्षा के लिए ले गया था. अब हुजूर का काम है, उस औरत को यहां बुला लें या उस से किसी और तरह से पूछ लें. मैं उस का नाम बताए देता हूं. किसी की हत्या कर के मैं अपने कारोबार पर लात थोड़े ही मारूंगा.

दिन का पिछला पहर था. मैं यह सोच रहा था कि आमना को बुलाऊं, इतने में एक आदमी तेजी से आंधी की तरह आया और कुरसी पर गिर गया. वह मेज पर हाथ मार कर बोला, ‘‘आमना को हवालात से बाहर निकालो और मुझे बंद कर दो. यह हत्या मैं ने की है.’’

वह कयूम था.

वह खुशी और कामयाबी का ऐसा धचका था, जैसे कयूम ने मेरे सिर पर एक डंडा मारा हो. यकीन करें, मुझ जैसा कठोर दिल आदमी भी कांप कर रह गया.

मैं ने कहा, ‘‘कयूम भाई, थोड़ा आराम कर लो. तुम गांव से दौड़े हुए आए हो.’’

उस ने कहा, ‘‘नहीं, मैं घोड़ी पर आया हूं, मेरी घोड़ी सरपट दौड़ी है. तुम आमना को छोड़ दो.’’

वह और कोई बात न तो सुन रहा था और न कर रहा था. मैं ने प्यार मोहब्बत की बातें कर के उस से काम की बातें निकलवाई. पता यह चला कि मैं ने आमना को जब हिरासत में बिठाया था तो किसी कांस्टेबल ने गांव वालों से कह दिया था कि आमना ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और उसे गिरफ्तार कर लिया गया है. गांव का कोई आदमी आमना के घर पहुंचा और आमना के पकड़े जाने की सूचना दी. कयूम तुरंत घोड़ी पर बैठ कर थाने आ गया.

‘‘कयूम भाई, अगर अपने होश में हो तो अकल की बात करो.’’

उस ने कहा, ‘‘मैं पागल नहीं हूं, मुझे लोगों ने पागल बना रखा है. आप मेरी बात सुनें और आमना को छोड़ दें. मुझे गिरफ्तार कर लें.’’

कयूम के अपराध स्वीकार करने की कहानी बहुत लंबी है. कुछ पहले सुना चुका हूं और कुछ अब सुना रहा हूं. मंजूर रशीद से बहुत तंग आ चुका था. वह गुस्सा अपने अंदर रोके हुए था. एक दिन आमना ने कयूम से कहा कि रशीद की हत्या करनी है. उसे खूब भड़काया और कहा कि अगर रशीद की हत्या नहीं हुई तो वह मंजूर की हत्या कर देगा.

कयूम आमना के इशारों पर नाचता था. वह तैयार हो गया. मंजूर से बात हुई तो योजना यह बनी कि रशीद बाग से शाम होने से कुछ देर पहले घर आता है. अगर वह रात को आए तो रास्ते में उस की हत्या की जा सकती है. उस का तरीका यह सोचा गया कि मंजूर रशीद के बाग में जा कर नाटक खेले कि वह दुश्मनी खत्म करने आया है और उसे बातों में इतनी देर कर दे कि रात हो जाए. कयूम रास्ते में टीलों के इलाके में छिप कर बैठ जाएगा और जैसे ही रशीद गुजरेगा तो कयूम उस पर कुल्हाड़ी से वार कर देगा.

यह योजना बना कर ही मंजूर रशीद के पास बाग में गया था. कयूम जा कर छिप गया. अंधेरा बहुत हो गया था. एक आदमी वहां से गुजरा, जहां कयूम छिपा हुआ था. अंधेरे में सूरत तो पहचानी नहीं जा सकती थी, कदकाठी रशीद जैसी थी.

कयूम ने कुल्हाड़ी का पहला वार गरदन पर किया. वह आदमी झुका, कयूम ने दूसरा वार उस के सिर पर किया और वह गिर कर तड़पने लगा.

कयूम को अंदाजा था कि वह जल्दी ही मर जाएगा, क्योंकि उस के दोनों वार बहुत जोरदार थे. पहले वह साथ वाले बरसाती नाले में गया और कुल्हाड़ी धोई. फिर उस पर रेत मली. फिर उसे धोया और मंजूर के घर चला गया.

वहां उस ने अपने कपड़े देखे, कमीज पर खून के कुछ धब्बे थे जो आमना ने तुरंत धो डाले. कुल्हाड़ी मंजूर की थी. आमना और कयूम बहुत खुश थे कि उन्होंने दुश्मन को मार गिराया.

उस समय तक तो मंजूर को वापस आ जाना चाहिए था. तय यह हुआ था कि मंजूर दूसरे रास्ते से घर आएगा. वह अभी तक घर नहीं पहुंचा था. 2-3 घंटे बीत गए. तब आमना ने कयूम से पूछा कि उस ने रशीद को पहचान कर ही हमला किया था. उस ने कहा कि वहां से तो रशीद को ही आना था, ऐसी कोई बात नहीं है कि वह गलती से किसी और को मार आया हो.

जब और समय हो गया तो उस ने कयूम से कहा कि जा कर देखो गलती से किसी और को न मारा हो. वह माचिस ले कर चल पड़ा. जा कर उस का चेहरा देखा तो वह मंजूर ही था.

कयूम दौड़ता हुआ आमना के पास पहुंचा और उसे बताया कि गलती से मंजूर मारा गया. आमना का जो हाल होना था वह हुआ, लेकिन उस ने कयूम को बचाने की तरकीब सोच ली.

उस ने कयूम से कहा कि वह अपने घर चला जाए और बिलकुल चुप रहे. लोगों को पता ही है कि रशीद की मंजूर से गहरी दुश्मनी है. मैं भी अपने बयान में यही कहूंगी कि मंजूर को रशीद ने ही मारा है.

कयूम को गिरफ्तार कर के मैं ने आमना को बुलाया और उसे कयूम का बयान सुनाया. कुछ बहस के बाद उस ने भी बयान दे दिया.

उन्होंने जो योजना बनाई थी, वह विफल हो गई. आमना का सुहाग लुट गया. लेकिन उस ने इतने बड़े दुख में भी कयूम को बचाने की योजना बनाई. मंजूर को लगा था कि वह रशीद की इस तरह से हत्या कराएगा तो किसी को पता नहीं चलेगा कि हत्यारा कौन है.

मैं ने आमना और कयूम के बयान को ध्यान से देखा तो पाया कि आमना ने पति की मौत के दुख के बावजूद अपने दिमाग को दुरुस्त रखा और मुझे गुमराह किया. कयूम को लोग पागल समझते थे, लेकिन उस ने कितनी होशियारी से झूठ बोला.

मैं ने हत्या का मुकदमा कायम किया. कयूम ने मजिस्ट्रैट के सामने अपराध स्वीकार कर लिया. मैं ने आमना को गिरफ्तार नहीं किया था और कयूम से कहा था कि आमना का नाम न ले. यह कहे कि उसे मंजूर ने हत्या करने पर उकसाया था. कयूम को सेशन से आजीवन कारावास की सजा हुई, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे शक का लाभ दे कर बरी कर दिया.

एक हत्या ऐसी भी : कौन था मंजूर का कातिल? – भाग 4

रात को मैं थाने आ गया, जिन की जरूरत थी, उन सब को थाने ले आया. उन में रशीद भी था. रशीद मेरे लिए बहुत खास संदिग्ध था.

रात काफी हो चुकी थी. मैं आराम करने नहीं गया, बल्कि रशीद को लपेट लिया. उस की ऐसी हालत हो गई जैसे बेहोश हो जाएगा. मैं ने अपना सवाल दोहराया, तो उस की हालत और बिगड़ गई.

मैं ने उस का सिर पकड़ कर झिंझोड दिया, ‘‘तुम मंजूर के जाने के बाद जब बाग से निकले तो तुम्हारे हाथ में कुल्हाड़ी थी और तुम ने मुझे बताया कि सूरज डूबते ही तुम घर आ गए थे. मुझे इन सवालों का संतोषजनक जवाब दे दो और जाओ, फिर मैं कभी तुम्हें थाने नहीं बुलाऊंगा.’’

उस ने बताया, ‘‘हत्या करने से मुझे कुछ नहीं मिलना था. हुआ यूं था कि वह सूरज डूबने से थोड़ा पहले मेरे पास आया था. मैं उसे देख कर हैरान हो गया. मुझे यह खतरा नहीं था कि वह मेरे साथ झगड़ा करने आया था, सच बात यह है कि मंजूर झगड़ालू नहीं था.’’

‘‘क्या वह कायर या निर्लज्ज था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं, वह बहुत शरीफ आदमी था. अब मुझे दुख हो रहा है कि मैं ने उस के साथ बहुत ज्यादती की थी. परसों वह मेरे पास आया था, मैं क्यारियों में पानी लगा रहा था. मंजूर ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे कमरे के ऊपर ले गया. मैं समझा कि वह मुझ से बंटवारे की बात करने आया है. मैं ने सोच लिया था कि उस ने उल्टीसीधी बात की तो मैं उसे बहुत पीटूंगा, लेकिन उस ने मुझ से बहुत नरमी से बात की.

‘‘उस ने कहा, ‘हम लोग एक ही दादा की संतान हैं. हमें लड़ता देख कर दूसरे लोग हंसते हैं. मैं चाहता हूं कि हम सब भाइयों की तरह से रहें.’ मैं ने उस से कहा कि बाद में फिर झगड़ा करोगे तो उस ने कहा, ‘नहीं, मैं ये सब बातें भूल चुका हूं.’ वह रात होने तक बैठा रहा और जाते समय हाथ मिला कर चला गया.

‘‘मैं उस के जाने के आधे घंटे बाद बाग से निकला. उस वक्त मेरे हाथ में एक डंडा था, वह मैं आप को दिखा सकता हूं. मेरा रास्ता वही था, जहां मंजूर की लाश पड़ी थी. मैं उस जगह पहुंचा और माचिस जला कर देखा तो वह मंजूर की लाश थी. हर ओर खून ही खून फैला था.

‘‘मैं ने माचिस जला कर दोबारा देखा तो मुझे पूरा यकीन हो गया. दूर जहां से घाटी ऊपर चढ़ती है, मैं ने वहां एक आदमी को देखा. मैं उस के पीछे दौड़ा, हत्यारा वही हो सकता था. लेकिन वह अंधेरे में गायब हो चुका था. आगे खेत थे, मुझे इतना यकीन है कि वह आदमी गांव से ही आया था.’’

‘‘तुम ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?’’

‘‘यही बात तो मुझे फंसा रही है,’’ उस ने कहा, ‘‘मेरा फर्ज था कि मैं आमना को बताता, फिर अपने घर वालों को बताता. शोर मचाता, थाने जा कर रिपोर्ट करता, लेकिन मुझे एक खतरा था कि मंजूर की मेरे साथ लड़ाई हुई थी. सब यही समझते कि मैं ने उसे मारा है.

‘‘पैदा करने वाले की कसम, हुजूर मैं ने सारी रात जागते हुए गुजारी है. जब आप ने बुलाया तो मेरा खून सूख गया कि आप को पता लग गया है कि मरने से पहले मंजूर मेरे पास आया था.’’

मैं ने कहा, ‘‘दुश्मनी के कारण बहुत से होते हैं, हत्याएं हो जाती हैं.’’

‘‘हां हुजूर, जमीन के बंटवारे के अलावा मैं ने आमना पर भी बुरी नजर रखी थी. उस की इज्जत पर भी हाथ डाला था. मंजूर की जगह कोई और होता तो मेरी हत्या कर देता. सच बात तो यह है कि हत्या मेरी होनी थी, लेकिन मंजूर की हो गई.’’

मैं उठ कर बाहर गया और एक कांस्टेबल से कहा कि वह आमना को ले कर आ जाए. फिर अंदर जा कर रशीद का बयान सुनने लगा. वह सब बातें खुल कर कर रहा था. मुझे आमना से यह पूछना था कि वास्तव में उस ने मंजूर को रशीद के पास भेजा था, जबकि उस ने यह कहा था कि उसे पता ही नहीं था कि मंजूर कहां गया था.

‘‘एक बात सच सच बता दो रशीद, आमना कैसे चरित्र की है?’’

‘‘आप ने लोगों से पूछा होगा आमना के बारे में, सब ने उसे सज्जन ही बताया होगा. मेरी नजरों में भी आमना एक सज्जन महिला है, क्योंकि उस ने मुझे दुत्कार दिया था. लेकिन उस ने अपनी संतुष्टि के लिए एक आदमी रखा हुआ है, वह है कयूम.’’

‘‘कयूम तो पागल है.’’

‘‘पागल बना रखा है,’’ उस ने कहा, ‘‘लेकिन अपने मतलब भर का.’’

‘‘मैं ने सुना है कि उसे कोई भी अपनी बेटी का रिश्ता नहीं देता, क्योंकि वह पागल है?’’

‘‘यह बात नहीं है हुजूर, बेटियों वाले इसी गांव में हैं. वे देख रहे हैं कि कयूम आमना के जाल में फंसा हुआ है.’’

बहुत से सवालों के जवाब के बाद मुझे यह लगा कि रशीद सच बोल रहा है, लेकिन फिर भी मुझे इधरउधर से पुष्टि करनी थी. रशीद यह भी कह रहा था कि उसे हवालात में बंद कर के तफ्तीश करें.

गामे के 3 आदमी थाने में बैठे थे, मैं ने उन्हें बारी बारी बुला कर पूछा कि हत्या की पहली रात गामे कहां था और क्या उन्हें पता है कि मंजूर की हत्या गामे शाह या तुम में से किसी ने की है.

मैं ने पहले भी बताया था कि ऐसे लोगों से थाने में पूछताछ दूसरे तरीके से होती है. ये तीनों तो पहले ही थाने के रिकौर्ड पर थे. मैं ने एक कांस्टेबल और एक एएसआई बिठा रखा था. मैं एक से सवाल करता था और फिर उन्हें इशारा कर देता था, वे उसे थोड़ी फैंटी लगा देते थे.

सुबह तक यह बात सामने आई कि गामे शाह दूसरी औरतों की तरह आमना को भी खराब करना चाहता था. गामे शाह ने उन तीनों को तैयार करना चाहा था कि वे मंजूर की हत्या कर दें, लेकिन वे तैयार नहीं हुए. उस के बाद वह आमना का अपहरण कर के उसे बहुत दूर पहुंचाना चाहता था, लेकिन हत्या कोई मामूली बात नहीं थी, जो ये छोटेमोटे जुआरी करते.

कोई भी तैयार नहीं हुआ तो गामे शाह ने कहा कि वह खुद बदला लेगा. तीनों ने बताया कि उस शाम जब वे गामे शाह के मकान पर गए तो वह घर पर नहीं मिला. वे वहीं बैठ गए. बहुत देर बाद गामे शाह आया तो उस के हाथ में कुल्हाड़ी थी. उन्होंने उस से पूछा कि वह कहां गया था, उस ने कहा कि एक शिकार के पीछे गया था. इस के अलावा उस ने कुछ नहीं बताया.

एक हत्या ऐसी भी : कौन था मंजूर का कातिल? – भाग 3

रात आधी से अधिक बीत चुकी थी. मेरे सामने एक जटिल विवेचना थी. मैं थोड़ा सा आराम करने के लिए लेट गया. मेरे बुलाए गामे शाह के तीनों आदमी आ गए थे. उन से भी मुझे पूछताछ करनी थी. ऐसे लोगों से जांच थाने में ही होती है. मैं ने उन्हें यह कह कर थाने भेज दिया कि मेरा इंतजार करें.

सुबह मेरी आंख खुली. नाश्ते के बाद मैं ने सब से पहले रशीद को बुलवाया. वह भी सुंदर जवान था. मैं ने उसे अपने सामने बिठाया, वह घबराया हुआ था. उस की आंखें जैसे बाहर को आ रही थीं.

मैं ने कहा, ‘‘तुम ही कुछ बताओ रशीद, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं. मंजूर की हत्या किस ने की है?’’

‘‘मैं क्या बता सकता हूं सर,’’ उस के मुंह से ये शब्द मुश्किल से निकले थे.

‘‘इतना मत घबराओ, जो कुछ तुम्हें पता है, सचसच बता दो. मुझे जो दूसरों से पता चलेगा वह तुम ही बता दो. फिर देखो, मैं तुम्हें कितना फायदा पहुंचाता हूं.’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानता सर,’’ उस ने आंखें झुका लीं.

‘‘ऊपर देखो, तुम सब कुछ जानते हो. तुम्हें बोलना ही पड़ेगा. मंजूर अपना हिस्सा लेने की कोशिश कर रहा था, तुम ने सोचा इसे दुनिया से ही उठा दो.’’

‘‘नहीं सर,’’ वह तड़प कर बोला, जैसे उस में जान आ गई हो. वह अपने आप को निर्दोष साबित करने लगा.

हत्या के जितने भी कारण बताए गए थे. मैं ने एकएक कर के उस के सामने रखे. वह सब से इनकार करता रहा. मैं ने जब उस से पूछा कि हत्या के समय वह कहां था तो उस ने बताया कि वह घर पर ही था.

‘‘सूरज डूबने के कितनी देर बाद घर आए थे?’’

‘‘मैं तो सूरज डूबते ही घर आ गया था.’’

‘‘इस से पहले कहां थे?’’

‘‘बाग में.’’

चूंकि वह मेरी नजरों में संदिग्ध था, इसलिए मैं ने उस से खास तरह की पूछताछ की. रशीद से जो बातें हुईं, मैं ने उन्हें अपने दिमाग में रखा और बाहर आ कर चौकीदार से कहा कि रशीद के बाग में जो मजदूर काम करता है, उसे और उस की पत्नी को ले आए.

रशीद को मैं ने बाहर बिठा दिया और उस के बाप को बुलाया. बाप आ गया तो मैं ने उस से पूछा, ‘‘हत्या के दिन रशीद घर किस समय आया था?’’

उस ने बताया कि वह सूरज डूबने के बाद आया था.

‘‘एक घंटा या 2 घंटे बाद?’’

‘‘डेढ़ घंटा समझ लें.’’

यह रशीद का बाप था, इसलिए मैं उस से उम्मीद नहीं रख सकता था कि वह सच बोलेगा.

रशीद का नौकर जो बाग में रहता था, मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम इन लोगों के रिश्तेदार नहीं हो, नौकर हो. इन के गले की फांसी का फंदा अपने गले में मत डलवाना. मैं जो पूछूं, सचसच बताना. तुम जानते हो कल रात मंजूर की हत्या हुई है. शाम को रशीद बाग में था, क्या यह सही है?’’

‘‘हां हुजूर, वह बाग में ही था.’’

‘‘पहले तो वह अकेला ही था,’’ मजदूर ने जवाब दिया, ‘‘पनेरी लगानी थी. रशीद हमारे साथ था, फिर मंजूर आ गया था.’’

‘‘कौन मंजूर?’’ मैं ने हैरानी से कहा.

‘‘वही मंजूर सर, जिस की हत्या हुई है.’’

मुझे ऐसा लगा, जैसे अंधेरे में रोशनी की किरन दिखाई दी हो.

‘‘हां, फिर क्या हुआ?’’ मैं ने इस आशा से पूछा कि वह यह कहेगा कि उन की लड़ाई हुई थी.

‘‘मंजूर रशीद को अलग ले गया.’’ मजदूर ने कहा, ‘‘फिर वे चारपाई पर बैठे रहे.’’

‘‘कितनी देर बैठे रहे?’’

‘‘सूरज डूबने तक बैठे रहे.’’

‘‘तुम में से किसी ने उन की बातें सुनीं?’’

‘‘नहीं हुजूर, हम दूर क्यारियों में पनेरी लगा रहे थे. जब अंधेरा हो गया तो हम काम छोड़ कर अपने कोठों में चले गए.’’

‘‘ये बताओ, क्या वे ऊंची आवाज में बातें कर रहे थे? मेरा मतलब क्या वे झगड़ रहे थे?’’

‘‘नहीं हुजूर, वे तो बड़े आराम से बातें कर रहे थे. जब अंधेरा हुआ तो दोनों ने हाथ मिलाया और मंजूर चला गया.’’

‘‘…और रशीद?’’

‘‘वह कुछ देर बाग में रहा, उस ने हम से पनेरी के बारे में पूछा और फिर वह भी चला गया.’’

‘‘तुम ने उसे जाते हुए देखा था? उस के हाथ में कुल्हाड़ी थी?’’

‘‘नहीं हुजूर,’’ उस ने जवाब दिया, ‘‘जाने से पहले वह कमरे में गया था. जब वापस आया तो अंधेरा हो गया था. उस के हाथ में क्या था, हमें दिखाई नहीं दिया.’’

मैं ने उस की पत्नी को बुला कर उस से पूछा कि क्या मंजूर पहले कभी बाग में आया था. उस ने बताया कि परसों से पहले वह तब आया था, जब उन का झगड़ा चल रहा था. मैं ने उस से पूछा कि रशीद जब बाग से निकल रहा था तो क्या उस के हाथ में कुल्हाड़ी थी?

‘‘हां थी हुजूर.’’

‘‘अंधेरे में तुम्हें कैसे पता चला कि उस के हाथ में कुल्हाड़ी है?’’

‘‘डंडा होगा या कुल्हाड़ी होगी. अंधेरे में साफसाफ नहीं दिखा.’’

मैं ने मजदूर को अंदर बुलाया और कुछ बातें पूछ कर जाने दिया. उस के बाद मेरे 2 मुखबिर आ गए. उन्होंने वही बातें बताईं जो मुझे पहले पता लग गई थीं. उन्होंने विश्वास के साथ कहा कि आमना चरित्रवान औरत है. कयूम के बारे में बताया कि वह दिमागी तौर पर कमजोर है, लेकिन बात खरी करता है. उन्होंने भी रशीद पर शक किया.

उन में से एक ने कहा, ‘‘जनाब, आप गामे शाह को भी सामने रखें. कयूम और मंजूर ने उसे ऐसी फैंटी लगाई थी कि वह काफी देर तक बेहोश पड़ा रहा था. वह बहुत जहरीला आदमी है, बदला जरूर लेता है.’’

‘‘लेकिन उस ने कयूम से तो बदला नहीं लिया?’’

‘‘वह कहता था कि मंजूर को ठिकाने लगा कर उस की बीवी का अपहरण करेगा.’’

उस समय तक मृतक का अंतिम संस्कार हो चुका था. मैं ने मंजूर की पत्नी को बुलवाया. उस की आंखें सूजी हुई थीं. लेकिन मुझे पूछताछ करनी थी. अभी तक मुझे आमना और कयूम पर ही शक था.

‘‘मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता आमना. यह समय पूछने का तो नहीं है, लेकिन मैं केस की जांच कर रहा हूं. मैं चाहता हूं कि तुम से यहीं कुछ पूछ लूं, नहीं तो तुम्हें थाने में आना पड़ता, जो अच्छा नहीं होता. तुम जरा अपने आप को संभालो और मुझे बताओ कि मंजूर और रशीद की दुश्मनी का क्या मामला था?’’

उस ने वही बातें बताईं जो पहले बता चुकी थी.

‘‘क्या रशीद ने तुम्हारे साथ कोई छेड़छाड़ की थी?’’ मैं ने आमना से पूछा. उस ने बताया कि 2 बार की थी. मैं ने तंग आ कर यह बात अपने पति को बता दी थी. कयूम को भी पता लग गया. दोनों उस का वही हाल करना चाहते थे जो उन्होंने गामे शाह का किया था.

‘‘मैं ने सुना है कि वह रशीद के बाग में गया था. वह वहां से निकला तो लेकिन घर नहीं पहुंचा. क्या तुम्हें पता है कि वह रशीद के बाग में गया था?’’

आमना ने जवाब दिया, ‘‘नहीं, वह बताता भी कैसे. आप के कहने के मुताबिक वह वहां से निकला तो लेकिन घर नहीं पहुंच सका. जाहिर है, रशीद ने उस की हत्या कर दी थी.’’

‘‘यह तो तुम कभी नहीं बताओगी कि कयूम के साथ तुम्हारे संबंध कैसे थे?’’

उस कहा, ‘‘मैं तो बता दूंगी, लेकिन आप यकीन नहीं करेंगे. वह मेरा भाई है.’’

‘‘आमना…सच्ची बात कहनी है तो खुल कर कहो. कयूम के साथ तुम्हारे संबंध कैसे हैं, मेरा इस से कुछ लेना देना नहीं. मैं ने मंजूर के हत्यारे को पकड़ना है. क्या तुम्हारे दिल में वैसी ही मोहब्बत है, जैसी कयूम के दिल में तुम्हारे लिए है.’’

‘‘नहीं,’’ आमना ने कहा, ‘‘जब वह महज 12-13 साल का था, तभी से हमारे यहां आता था. अब वह जवान हो गया है. मुझे डर था कि मेरा शौहर आपत्ति करेगा, लेकिन उस ने कोई आपत्ति नहीं की. मैं ने कयूम से कहा था, जवान औरत से जवान आदमी की मोहब्बत किसी और तरह की होती है. कयूम ने मेरी ओर हैरानी से देखा और देखते ही देखते उस की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘वह मुझ से 4-5 साल छोटा है. मैं ने उसे अपने गले से लगा लिया तो वह हिचकियां ले कर रोने लगा. मैं ने उसे चुप कराया. वह बोला, ‘आमना, यह कहने से पहले मुझे जहर दे देती.’ इस मोहब्बत को देख कर लोगों ने उसे रिश्ते देने बंद कर दिए.

‘‘मैं ने उस से कहा, मैं तुम्हारा किसी और जगह रिश्ता करवा दूंगी. उस ने दोटूक जवाब दिया, जब तक तुम जिंदा हो, मैं कहीं शादी नहीं कर सकता. अगर किसी लड़की से मेरी शादी हो भी जाती है और वह मुझे अच्छी लगती है तो मैं उसे पत्नी नहीं समझूंगा, क्योंकि उस में मुझे तुम दिखाई दोगी और मैं तुम्हें बहुत पवित्र समझता हूं.’’

मैं ने आमना को जाने की इजाजत दे दी, लेकिन अपने दिमाग में उसे संदिग्ध ही रखा.

जिंदगी के रंग निराले : कुदरत का बदला या धोखे की सजा?

एक हत्या ऐसी भी : कौन था मंजूर का कातिल? – भाग 2

मैं ने दूसरों से बाहर बैठने को कहा. जब वे चले गए तो मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम्हारे खास दोस्त की हत्या हो गई. जब तुम्हें उस की हत्या की सूचना मिली तो तुम ने सोचा होगा कि हत्यारा कौन हो सकता है?’’

‘‘यह तो स्वाभाविक है. लेकिन मंजूर ऐसा आदमी था कि दुश्मनी को दबा लेता था. कोशिश करता था कि किसी के साथ लड़ाईझगड़ा न हो.’’

‘‘क्या तुम बता सकते हो कि उस के दुश्मन कौन कौन थे?’’

‘‘इतनी गहरी दुश्मनी तो उस की किसी के साथ नहीं थी, लेकिन मंजूर मुझ से एक ही आदमी की बात करता था और उस के दिल में उस आदमी से दुश्मनी बैठी हुई थी. वह उस के चाचा का लड़का है. वे 3 भाई हैं, वह बीच का है.’’

‘‘उस के साथ क्या दुश्मनी थी?’’

‘‘यह दुश्मनी जमीन के बंटवारे पर हुई थी. सब जानते हैं कि उन्होंने मंजूर की जमीन का कुछ हिस्सा धांधली से हड़प लिया था. मंजूर ने चाचा को बताया था, चाचा मान गया था कि मंजूर ठीक कहता है. उस का बड़ा बेटा भी मान गया था लेकिन बीच वाला, जिस का नाम रशीद है, वह नहीं माना था. यहां तक कि वह मरने मारने पर उतर आया था.

‘‘मंजूर अपना यह दुखड़ा मुझे सुनाता रहता था. उस के दादा का एक बाग है, जिस में उस के बाप ने कुआं, रेहट भी लगवाई थी. उस ने इस बाग में बहुत मेहनत की थी. बाप मर गया तो मंजूर ने बाग में जाना शुरू कर दिया. रशीद भी जाने लगा और धीरेधीरे बाग पर कब्जा कर लिया. मंजूर की मजबूरी यह थी कि वह अकेला था, 2-3 भाई होते तो किसी की हिम्मत नहीं होती.’’

उस ने बताया कि रशीद मंजूर को छेड़ता रहता था. 2-3 बार मंजूर सीधा हुआ तो उस ने रशीद से कहा कि मैं परिवार की इज्जत की वजह से चुप रहता हूं, अगर तुम ने अपनी जबान बंद नहीं की तो मैं तुम्हारी जबान बंद कर के दिखा दूंगा.

उन की दुश्मनी का एक और कारण था. बिरादरी के एक परिवार ने अपनी बेटी का रिश्ता मंजूर को दे दिया. बात पक्की हो गई. मंजूर ने लड़की को कपड़े और अंगूठी भेज दी. 8-10 दिन बाद अंगूठी वापस आ गई, साथ ही कपड़े भी. यह भी कहा गया था कि मंगनी तोड़ दी गई है. 2-3 दिन बाद उस की मंगेतर के घर वालों ने उस की शादी रशीद से कर दी और कुछ दिन बाद मंजूर की शादी आमना से हो गई.

‘‘आमना का चालचलन कैसा है?’’

उस ने कहा, ‘‘सर, वह चालचलन की बहुत अच्छी है.’’

‘‘यह कयूम का क्या चक्कर है?’’

‘‘कोई चक्कर नहीं है सर, उस के घर में आने पर और काफीकाफी देर तक बैठने पर न तो आमना को ऐतराज था और न मंजूर को.’’

‘‘आमना के साथ कयूम का कैसा संबंध था?’’

‘‘सर, संबंध एकदम पाक था. उस के अच्छे चरित्र का एक उदाहरण सुनाता हूं. 10 साल तक जब उसे कोई बच्चा नहीं हुआ तो आमना गामे शाह के पास गई. गामे शाह चरित्रहीन व्यक्ति है. उस के पास चरित्रहीन औरतें आती हैं और उन औरतों ने ही गामे शाह को मशहूर कर रखा है कि वह निस्संतान औरतों को संतान देता है.

‘‘आमना भी गामे शाह के घर पहुंच गई. उस ने आमना की इज्जत पर हाथ डाला तो वह गाली गलौज कर के चली आई. अगर वह चरित्रहीन होती तो उस से संतान ले कर आ जाती और मंजूर उसे अपनी संतान समझ कर पाल लेता.’’

‘‘यह घटना कब की है?’’

‘‘4-5 दिन पहले की बात है. जब आमना ने गामे शाह की बात मंजूर को बताई तब कयूम वहीं बैठा हुआ था. कयूम भड़क गया, वे दोनों उस के घर गए और उसे बाहर बुला कर इतना पीटा कि वह बहुत देर तक उठ नहीं सका. उस के पास 2-3 जुआरी शराबी रहते थे. वे गामे शाह को बचाने आए तो दोनों ने उन्हें भी पीटा.’’

‘‘अगर मैं कहूं कि मंजूर का हत्यारा कयूम है तो तुम क्या कहोगे?’’ मैं ने मंजूर के दोस्त से कहा.

‘‘मैं नहीं मानूंगा,’’ उस ने जवाब दिया, ‘‘मुझ से अगर पूछोगे तो मैं 2 आदमियों के नाम लूंगा. एक तो गामे शाह और दूसरा रशीद.’’

मैं इस सोच में पड़ गया कि हो सकता है मंजूर और रशीद का कहीं आमनासामना हो गया हो और उन का झगड़ा हुआ हो. इसी झगड़े में रशीद ने उसे मार डाला हो. यह घटना ऐसी थी, जिस का कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था.

सूरज डूबने वाला था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई थी. उस में हत्या का समय लगभग सूरज छिपने के डेढ़-2 घंटे बाद का लिखा था. सर्जन ने सिर पर 2 ही घाव लिखे थे, जो मैं ने देखे थे. उस ने यह भी लिखा था कि वह इन घावों के कारण ही मरा था.

मैं ने कयूम को बुलाने के लिए कहा. कुछ देर बाद एक सुंदर जवान मेरे सामने लाया गया. नंबरदार ने बताया कि यही कयूम है.

‘‘आओ जवान,’’ मैं ने दोस्ताना तौर पर कहा, ‘‘हमें तुम्हारी जरूरत थी.’’

मैं ने नंबरदार को इशारा किया तो वह बाहर चला गया.

मेरे पूछने पर उस ने रशीद के बारे में वही सब बातें कहीं जो मंजूर के दोस्त ने सुनाई थी. मैं ने उस से सवाल किया, ‘‘एक बात बताओ कयूम, मंजूर ने कभी यह कहा था कि वह रशीद की हत्या कर देगा?’’

कयूम ने तुरंत जवाब नहीं दिया. पहले उस ने दाएंबाएं फिर ऊपर देखा. फिर मेरी ओर देख कर ऐसे सिर हिलाया, जैसे उसे पता न हो. ‘‘शायद कभी कहा हो.’’ उस ने मरी सी आवाज में कहा. फिर बोला, ‘‘मंजूर, उस से बहुत परेशान था. सरकार, उसे तो मैं ही पार लगाने वाला था, लेकिन आमना भाभी ने रोक लिया.’’

‘‘कोई खास बात हुई थी या पुरानी बातों पर तुम उसे खत्म करना चाहते थे?’’

‘‘बड़ी खास बात थी सरकार. कोई डेढ़-2 महीने पहले की बात है. रशीद मंजूर के घर किसी काम से गया था. उस कमीने ने आमना भाभी को अकेला देख कर उन्हें फांसने की कोशिश शुरू कर दी थी. आमना भाभी ने उसे उसी समय भलाबुरा कह कर घर से बाहर कर दिया था.

‘‘2-3 दिन बाद आमना भाभी खेतों में गईं तो रशीद उन्हें रोक कर बोला, ‘‘पता नहीं, तुम मंजूर जैसे कमजोर और कायर आदमी के साथ कैसे गुजर कर रही हो.’’

आमना भाभी ने कहा, ‘‘शायद तुम जिंदा नहीं रहना चाहते हो. तुम तो दुनिया में नहीं रहोगे लेकिन तुम्हारे पीछे रहने वाले लोग मान जाएंगे कि मंजूर कमजोर नहीं था.’’

मंजूर से मैं ने यह बात बहुत बाद में सुनी. मैं ने उस से कहा कि उस ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई. जवाब में मंजूर ने कहा, ‘‘मुझे जो करना था, कर दिया.’’

मैं ने उस से पूछा कि उस ने क्या किया था. उस ने बताया कि उस ने रशीद की गरदन अपनी बांहों में ऐसे दबा ली थी कि उस की आंखें बाहर निकल आई थीं. फिर उस की गरदन छोड़ कर कहा, ‘‘जा इस बार छोड़ दिया.’’

रशीद ने दूर जा कर कहा, ‘‘मंजूरे, मैं तुझ से बदला जरूर लूंगा.’’

‘‘उस के बाद रशीद ने तो कोई हरकत नहीं की?’’

‘‘अगर करता तो आज मैं आप के सामने नहीं होता और न रशीद दुनिया में होता. मैं ने एक दिन खेत में उस का कंधा हिला कर कहा था, गांव में सिर उठा कर मत चलना. और हां, मंजूर को कमजोर मत समझना. तेरी मौत उसी के हाथों लिखी है.’’

‘‘उस ने कुछ जवाब दिया?’’

‘‘वह कांपने लगा, ऐसा लगा जैसे माफी मांग रहा हो. वास्तव में मंजूर और आमना में बहुत मोहब्बत थी.’’

‘‘आमना तो तुम से भी मोहब्बत करती थी,’’ मैं ने कहा.

‘‘सरकार, किस बहन और भाई में मोहब्बत नहीं होती. अंतर यह है कि हम दोनों के मांबाप अलग अलग थे, लेकिन मैं महसूस करता हूं कि हम दोनों एक ही मां के पेट से पैदा हुए थे.’’

‘‘मुझे किसी ने बताया था कि कोई तुम्हें अपनी बेटी का रिश्ता नहीं देता?’’

‘‘कोई रिश्ता देगा भी तो मैं कबूल नहीं करूंगा. जब तक आमना मेरे सामने मौजूद है, मैं किसी और औरत का रिश्ता कबूल नहीं करूंगा.’’

मैं ने उस का अर्थ यह निकाला कि उस का और आमना का संबंध दूसरी तरह का था. मतलब आमना को बहन कहना परदा डालने जैसा था.

मंजूर के घर से रोने और चीखने की आवाजें आ रही थीं. आमना की चीख सुनाई दी तो कयूम ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, आप मुझे इजाजत दें, जब आप बुलाएंगे मैं हाजिर हो जाऊंगा.’’ मैं ने उसे जाने दिया.