UP News: पूरे परिवार का मर्डर फिर करंट लगा कर किया सुसाइड

UP News: एक ऐसी सनसनीखेज घटना सामने आई जिस ने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया. एक व्यक्ति ने पहले अपनी पत्नी और 3 मासूम बच्चों की हत्या की और फिर खुद बिजली का करंट लगाकर आत्महत्या कर ली. घटना के बाद गांव में सन्नाटा पसर गया. किसी को समझ नहीं आ रहा कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति बनी कि उस ने इतना खतरनाक कदम उठा लिया. आइए इस दर्दनाक घटना को विस्तार से जानते हैं, जो हमें कई गंभीर सवालों से रूबरू कराती है.

यह चौंकाने वाली वारदात उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के महावन क्षेत्र के गांव खपरपुर की है. यहां एक ही परिवार के 5 लोगों की मौत से हड़कंप मच गया. आरोपी मुकेश ने कथित तौर पर अपनी पत्नी सीमा और 3 मासूम बच्चों की हत्या करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली. एक बच्ची का शव चारपाई पर मिला, जबकि मुकेश का शव कमरे के फर्श पर पड़ा था. पूरे घर का मंजर दिल को झकझोरने वाला था.

एसएसपी (मथुरा) श्लोक कुमार ने बताया कि गांव खपरपुर में एक ही परिवार के 5 शव घर के अंदर मिले. मुकेश खेतीकिसानी करता था और उस के भाई का घर पास में ही है. सुबह जब घर में कोई हलचल नहीं दिखी तो भाई को शक हुआ. वह दीवार फांदकर अंदर पहुंचे और दरवाजा तोड़ने पर सभी शव कमरे में पड़े मिले. मौके से दीवार और कौपी पर लिखा सुसाइड नोट मिला. साथ ही मुकेश का मोबाइल फोन भी बरामद हुआ, जिस में उस ने आत्महत्या से पहले एक वीडियो बनाया था.

मनीष ने पत्नी सीमा और 3 बच्चों-पंकज, प्रियांशी व हनी की गला दबाकर हत्या कर दी. परिवार को खत्म करने के बाद खुद बिजली का करंट लगाकर आत्महत्या कर ली. पुलिस को मौके से एक सुसाइड नोट और मनीष द्वारा बनाया गया वीडियो भी मिला है.
पुलिस ने सभी शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की गहन जांच की जा रही है. UP News

Bengaluru Crime: रेप नहीं कर सका तो सौफ्टवेयर इंजीनियर की कर दी हत्या

Bengaluru Crime: एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिस ने समाज को झकझोर दिया है. एक सौफ्टवेयर इंजीनियर महिला की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, क्योंकि उस ने संबंध बनाने से मना कर दिया. आखिर कौन था वह शख्स जो महिला पर दबाव बना रहा था और उस के इंकार करने पर उस की जान ले ली. चलिए जानते हैं पूरी कहानी.

यह सनसनीखेज मामला बेंगलुरु से सामने आया है. किराए के घर में रहने वाली सौफ्टवेयर इंजीनियर के घर 3 जनवरी, 2026 की रात करीब 9 बजे एक व्यक्ति स्लाइडिंग खिड़की से घुस आया. उस ने महिला इंजीनियर के साथ जबरदस्ती संबंध बनाने की कोशिश की और विरोध पर उस का मुंह और नाक दबा दी, जिस से वह अर्धबेहोश हो गई. इस दौरान झड़प में उसे गंभीर चोटें आईं और काफी खून भी बहा.

पुलिस को शुरुआती जांच में शक हुआ कि आग लगने के बाद दम घुटने से मौत हुई होगी. लेकिन जांच तकनीकी साक्ष्यों के आधार आगे हुई तो पुलिस ने पड़ोसी कर्नल कुरई को आरोपी के रूप में चिन्हित किया, जो उस के बगल में रहता था.

पूछताछ में आरोपी ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस के अनुसार सबूत मिटाने के लिए उस ने महिला के कपड़े और सामान गद्दे पर रखकर आग लगा दी और वहां से भाग गया. भागते समय उस ने महिला का मोबाइल भी चोरी कर लिया था.

लाश मिलने के बाद पुलिस भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 194(3)(iv) के तहत मामला दर्ज कर जांच आगे बढ़ा रही है. Bengaluru Crime

UP Crime News: नशे में डूबे पति का कहर – गर्भवती पत्नी और मासूम बेटे की हत्या

UP Crime News: एक दिल दहला देने वाली वारदात, जिस ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया. यहां एक शराबी पति ने अपनी गर्भवती पत्नी और ढाई साल के मासूम बेटे को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. आखिर ऐसी क्या वजह रही कि उस ने अपने ही परिवार को खत्म कर दिया? क्या है इस डबल मर्डर का पूरा सच, पढ़िए पूरी कहानी, जो आप को आने वाले खतरों के प्रति सचेत और सावधान करेगी.

यह दर्दनाक घटना उत्तर प्रदेश में कानपुर (देहात) के घाटमपुर कोतवाली क्षेत्र के गोपालपुर गांव के मजरा सर्देपुर से सामने आई. यहां सुरेंद्र नाम के शख्स ने शराब के नशे में अपनी गर्भवती पत्नी रूबी और ढाई साल के बेटे पर बांके से हमला कर दिया, जिस से दोनों की मौके पर ही मौत हो गई. यह घटना रात करीब 9 बजे की है, जब सुरेंद्र नशे में घर पहुंचा तो पत्नी ने विरोध किया. इसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा बढ़ गया और गुस्से में उस ने पहले पत्नी के गले पर बांके से वार किया, फिर मासूम बेटे के सिर पर कई वार कर दिए.

घर से शोर सुनकर आसपास के लोग पहुंचे, लेकिन सुरेंद्र ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. लोगों ने इसे रोज का घरेलू झगड़ा समझ कर अनदेखा कर दिया और वहां से चले गए. इसी बीच मौका पा कर सुरेंद्र घटनास्थल से फरार हो गया. कुछ देर बाद जब आरोपी का भाई पप्पू घर पहुंचा तो वह खून से सने शव देखकर दंग रह गया और तुरंत पुलिस को सूचना दी. मौके पर पहुंची पुलिस और फोरैंसिक टीम ने सबूत जुटाए.

डीसीपी दीपेंद्र नाथ चौधरी ने बताया कि जांच में सामने आया है कि नशे में पतिपत्नी में विवाद हुआ और गुस्से में सुरेंद्र ने पत्नी के गले और बेटे के सिर पर बांके से वार कर दोनों की हत्या कर दी. दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. पुलिस ने आरोपी सुरेंद्र को गोपालपुर रेलवे क्रासिंग के पास से गिरफ्तार कर लिया है. UP Crime News

West Bengal: नहाने गई तो देखा, नल के नीचे लाश धो रहा था युवक

West Bengal: एक ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली खौफनाक घटना सामने आई है, जिसे जानकर हर कोई हैरान रह जाएगा. एक महिला जब नहाने के लिए बाहर निकली तो वहां का नज़ारा देखकर उस की सांसें थम गईं. उस ने देखा कि एक शख्स नल के नीचे एक लाश को धो रहा था. यह दृश्य इतना डरावना था कि महिला पल भर के लिए सन्न रह गई.

आखिर वह व्यक्ति कौन था, जो नल के नीचे लाश साफ कर रहा था? उस की मंशा क्या थी? महिला कौन थी और उस का इस घटना से क्या संबंध था? इस सनसनीखेज वारदात के पीछे छिपा पूरा सच क्या है?

यह दर्दनाक घटना पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले से सामने आई है. यहां फिरदौस आलम नाम के युवक ने एक बुजुर्ग की निर्मम हत्या कर दी. जांच में सामने आया कि आरोपी की मंशा बेहद डरावनी थी. वह शव का मांस खाने की नीयत से लाश को साफ कर रहा था.

घटना उस वक्त सामने आई, जब एक महिला नहाने के लिए घर से बाहर निकली. उस ने देखा कि आरोपी नल के नीचे शव को धो रहा है. यह नजारा देखकर वह घबरा गई. पुलिस के मुताबिक यह घटना 16 जनवरी, 2026 शुक्रवार की है. फिरदौस गांव के श्मशान घाट के पास पहुंचा, जहां एक बुजुर्ग व्यक्ति आराम कर रहा था. उस ने बुजुर्ग को बहाने से बुलाया और धान के खेत के पास ले गया. मौका पा कर उस ने चाकू निकाला और बुजुर्ग के गले पर 3 बार वार कर उस की हत्या कर दी.

हत्या के बाद आरोपी शव को कंधे पर उठाकर करीब एक किलोमीटर दूर ले गया और पड़ोसी खातून मलिक के घर के नल के नीचे रख दिया. उस ने शव को साफ करने के लिए मोटर चालू कर दी. मोटर की आवाज सुनकर खातून बाहर आई, तो सामने लाश देखकर उस के होश उड़ गए. खातून के पूछने पर फिरदौस ने कहा कि इस के शरीर से बदबू आ रही है, इसलिए वह इसे नहला रहा है.

यह सुनते ही खातून चीख पड़ी. घबराकर फिरदौस लाश को वहीं से उठाकर भाग गया. इस के बाद आरोपी ने खून से सने कपड़े जला दिए और घर लौट आया. पुलिस ने काररवाई करते हुए फिरदौस को गिरफ्तार कर लिया है. उस के पास से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद हुआ है. पुलिस ने बताया कि फिरदौस ने कुछ साल पहले अपने पेरेंट्स को खो दिया था और वह मानसिक तनाव में था. हालांकि पुलिस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है. आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस भी इस घटना की भयावहता देखकर हैरान रह गई. West Bengal

True Crime Story: बदनामी का दाग

True Crime Story: शादी के बाद भी सरोज अपने प्रेमी सूरज को भुला नहीं पाई थी. फिर एक दिन वह मायके में आई तो प्रेमी के साथ भाग गई. बदनामी के इस दाग को धोने के लिए सरोज की ससुराल और मायके वालों ने ऐसी खौफनाक साजिश को अंजाम दिया कि…

उ त्तर प्रदेश के लखनऊ-हरदोई मार्ग पर थाना कस्बा मलिहाबाद बसा है, जो आमों के लिए भी मशहूर है. इसी थाने के गांव वंशीगढ़ी से थोड़ा आगे निकलते ही जंगल शुरू हो जाता है. 26 जुलाई की सुबह गांव के कुछ लोग जानवरों को चराने इसी जंगल में गए तो उन्हें वहां एक लड़के और एक लड़की की लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने यह बात गांव के चौकीदार निहाल पासी को बताई तो उस ने यह सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दे दी.

लाशें पड़ी होने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सुधाकर पांडेय, एसएसआई अमरनाथ और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर बंशीगढ़ी के जंगल पहुंच गए. जंगल में काफी अंदर एक जवान लड़के और लड़की की क्षतविक्षत लाश पड़ी थी. सबूत की तलाश में सुधाकर पांडेय ने आसपास की झाडि़यों में ताकझांक की तो उन्हें एक हैंडबैग मिला. उस की तलाशी ली गई तो उस में लड़की के कुछ कपड़े और एक पहचानपत्र मिला.

वह पहचानपत्र मृतक युवक का था. उस के अनुसार मृतक सूरज धानुक था, जो थाना मलिहाबाद के गांव सिरगामऊ का रहने वाला था. घर वालों से उस की पहचान हो सकती थी. इसलिए सुधाकर पांडेय ने लाशों की फोटोग्राफी करा कर मृतकों का सामान कब्जे में ले लिया और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ भिजवा दिया. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने चौकीदार निहाल की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

सुधाकर पांडेय ने पहचानपत्र से मिले पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां उस की मां गुडि़या मिली. जब उस से सूरज की हत्या के बारे में बताया गया तो वह अपने देवर के बेटे के साथ रोते हुए थाना मलिहाबाद पहुंची. गुडि़या ने लाशों के फोटो देखने के बाद रोते हुए बताया कि सूरज के साथ जिस युवती की लाश मिली है, वह लड़की सरोज है. दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. कुछ दिनों पहले सूरज सरोज को उस की ससुराल से ले कर भाग गया था, जिस की वजह से सरोज की ससुराल तथा मायके वाले काफी नाराज थे. 18 जुलाई को सरोज के पति मंजेश ने हरदोई के थाना संडीला में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. उसे पूरा यकीन है कि दोनों की हत्या उन्हीं लोगों ने की है.

गुडि़या के बताए अनुसार, मृतका का नाम सरोज था. वह उसी के गांव के रहने वाले रामऔतार पाल की बेटी थी, जो हरदोई के थाना संडीला के गांव ककराली के रहने वाले मंजेश के साथ ब्याही थी. गुडि़या ने यह भी बताया कि थाना संडीला में सरोज को भगाने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. उन्होंने पता किया तो सचमुच वहां रिपोर्ट दर्ज थी. उन्होंने इस मामले को वहां ट्रांसफर करने की कोशिश शुरू कर दी. लेकिन अधिकारियों के आदेश के बाद मुकदमा ट्रांसफर नहीं हो सका.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सूरज और सरोज की मौत बेरहमी से मारपीट और गला घोंटने से हुई थी. पोस्टमार्टम के बाद लाशें सौंपने की बात आई तो सूरज के घर वाले तो उस की लाश ले गए, लेकिन सरोज की लाश लेने न तो उस की ससुराल से कोई आया और न ही मायके से. काफी देर बाद उस की मां और बहनें आईं तो पुलिस ने सरोज की लाश उन के हवाले कर दी. पुरुषों के न आने से पुलिस को संदेह हुआ. सुधाकर पांडेय सरोज के पति मंजेश की तलाश में उस के घर पहुंचे तो मंजेश ही नहीं, घर के अन्य पुरुष भी गायब थे. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि दोनों हत्याएं इन्हीं लोगों ने की होंगी.

मंजेश की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने उस के सभी रिश्तेदारों के घर छापा मारा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. पुलिस ने मंजेश के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि सरोज जब ससुराल से भागी थी, तभी से मंजेश अपने दोनों सालों दिनेश उर्फ तिवारी और शिवकुमार के संपर्क में था. इस के बाद सुधाकर पांडेय सिरगामऊ स्थित सरोज के मायके पहुंचे तो उस के भाई दिनेश और शिवकुमार भी घर से गायब मिले.

5 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने मुखबिर की सूचना पर दिनेश और शिवकुमार को उन के घरों से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर की गई पूछताछ में दिनेश और शिवकुमार ने अपना जुर्म कबूल करते हुए इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के बारे में पुलिस के सामने जो बयान दिया, उस में औनर किलिंग की एक खौफनाक कहानी सामने आई, जो इस प्रकार थी. लखनऊ की थानाकोतवाली मलिहाबाद का एक गांव है सिरगामऊ. इसी गांव में शुकुल धानुक  अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी गुडि़या, 2 बेटे सूरज, रोहित और 2 बेटियां थीं. शुकुल धानुक खेतीबाड़ी कर के गुजारा करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, जिस की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सका.

22 साल का सूरज खेती करने के साथसाथ आम के बागों की देखभाल करता था. बेटियां और दूसरा बेटा अभी छोटे थे. इसी गांव में रामऔतार भी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रूपमती, 3 बेटियां तथा 2 बेटे दिनेश और शिवकुमार थे. रामऔतार लखनऊ में सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करता था. बड़ा बेटा दिनेश एक स्कूल की बस चलाता था. गांव में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस से खानेपीने भर का अनाज पैदा हो जाता था. इस तरह परिवार का गुजारा आराम से हो रहा था. रामऔतार और शुकुल धानुक के घर अगलबगल थे. लेकिन अलगअलग जाति के होने की वजह से दोनों परिवारों में ज्यादा मेलजोल नहीं था. हां, उन के बच्चे जातिपांत को न मानते हुए आपस में मेलजोल रखते थे.

सूरज और रामऔतार की तीसरे नंबर की बेटी सरोज हमउम्र थे, इसलिए बचपन से साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. सूरज को सरोज बहुत अच्छी लगती थी. जब भी वह सरोज को देखता, उस की आंखों में अनोखी चमक आ जाती. इसलिए वह उसे हमेशा देखते रहना चाहता था. सरोज ने भी इस बात को महसूस किया तो उस के मन में भी सूरज के लिए कोमल भावनाएं अंगड़ाई लेने लगीं. इस का परिणाम यह निकला कि दोनों एकदूसरे को चाहने लगे.

सरोज उर्फ बउवा गोरे रंग की खूबसूरत लड़की थी. शोख, चंचल और मिलनसार स्वभाव की होने की वजह से सभी उसे प्यार करते थे. सूरज का घर बगल में ही था, इसलिए वह जैसे ही घर से बाहर निकलता, सरोज को पता चल जाता. इस के बाद किसी बहाने से वह सूरज से मिलने बागों की ओर निकल जाती, जहां दोनों घंटों अकेले में बैठ कर प्यार की मीठीमीठी बातें करते और एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाते. लेकिन जब शादी की बात आई तो सूरज ने कहा कि वह छोटी जाति का है, इसलिए उस के घर वाले इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

इस बात से सरोज उदास हो गई. उसे उदास देख कर सूरज ने कहा कि वह उस के बिना जीने की बात सोच नहीं सकता, इसलिए गांव से भाग कर कहीं दूर चले जाएंगे, जहां उन के घर वाले उन्हें खोज नहीं पाएंगे. इस के बाद कुछ पैसे ले कर दोनों भाग गए. शाम को जब सरोज के घर से भाग जाने का पता चला तो बदनामी के डर से रामऔतार बेटों के साथ चोरीछिपे उस के बारे में पता लगाने लगा. उस ने थाने में सूरज के खिलाफ रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई. उस के घर जा कर धमकी जरूर दे आए कि अगर सूरज ने सरोज को जल्दी घर ला कर नहीं छोड़ा तो इस का परिणाम बहुत भयानक होगा.

शुकुल धानुक और गुडि़या वैसे भी सीधेसादे स्वभाव के थे, उन्होंने इस मामले में चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. दूसरी ओर जीनेमरने की योजना बना कर भागे सूरज और सरोज के पास जब तक पैसे रहे, तब तक पतिपत्नी के रूप में अपनी ही दुनिया में डूबे रहे. लेकिन जब पैसे खत्म हो गए तो आटेदाल के भाव का पता चला. सूरज ने कामधंधे की बहुत तलाश की, लेकिन जहां भी काम मिलता, वेतन इतना कम होता कि दोनों का गुजारा होना मुश्किल था. जब उन के भूखों मरने की नौबत आ गई तो घर लौटने के अलावा उन के पास कोई उपाय नहीं बचा. आखिर हिम्मत कर के दोनों घर लौट आए. उन का सोचना था कि वे घर वालों से कह कर शादी कर लेंगे.

सरोज के लौटने पर पहले तो घर वालों ने उसे जी भर कर कोसा, उस के बाद उस के लिए लड़के की तलाश करने लगे. इसी के साथ उस के घर से बाहर निकलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई. सरोज समझ गई कि अब सूरज के साथ जिंदगी बिताने का उस का सपना सपना ही बन कर रह जाएगा, क्योंकि उस के घर वाले किसी भी हालत में उस की शादी सूरज के साथ नहीं करेंगे. काफी दौड़धूप के बाद रामऔतार को पड़ोस के गांव ककराली में मिश्रीलाल का बेटा मंजेश सरोज के लिए पसंद आ गया. इस के बाद मंजेश से उस की शादी हो गई. यह सन 2012 की बात है.

शादी के बाद सरोज ससुराल चली गई. मंजेश सरोज जैसी सुंदर पत्नी पा कर बेहद खुश था. यही वजह थी कि वह पत्नी की हर इच्छा का खयाल रखता था. इस के बावजूद सरोज सूरज को भुला नहीं पाई. वह जब भी अकेली होती, सूरज को याद कर के आंसू बहाती रहती. धीरेधीरे ढाई साल गुजर गए. इस बीच वह मंजेश के बेटे की मां बन गई. सूरज भी सरोज को नहीं भुला सका था. दिनरात सरोज उस के खयालों में छाई रहती. शायद वह अपनी जिंदगी सरोज की यादों में काटना चाहता था. इसीलिए अभी तक उस ने शादी नहीं की थी. उसी बीच उस के पिता की मौत हो गई तो परिवार चलाने की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ गई.

एक दिन वह बागों से लौटा तो पता चला कि सरोज मायके आई है. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, वह सरोज से जरूर मिलेगा और उस के दिल का हाल पूछेगा. अब तक सरोज के घर वालों को लगने लगा था कि सरोज सूरज को भूल चुकी होगी, इसलिए उन्होंने उसे गांव में किसी के घर आनेजाने की छूट दे दी होगी. सूरज मौके की तलाश में रहने लगा. एक दिन दोनों मिले तो एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. सरोज ने सूरज का नंबर सहेली के नाम से सेव कर लिया. इस बीच दोनों सब की नजरें बचा कर कई बार मिले. इन मुलाकातों में जब सरोज ने बताया कि वह इस शादी से जरा भी खुश नहीं है तो सूरज चौंका. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सरोज अब भी उसे अपने दिल में बसाए है. उसे लगता था कि सरोज उसे भुला कर अपने परिवार में रम गई होगी.

सूरज ने पूछा, ‘‘क्या तुम अब भी मेरे साथ जिंदगी गुजारने को तैयार हो.’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए अपना बसा-बसाया घर छोड़ने को लिए तैयार हूं.’’

इस के बाद दोनों ने खूब सोचविचार कर योजना बना डाली. मायके से सरोज का भागना ठीक नहीं था. वैसे भी उस के घर वाले ज्यादा देर तक बाहर रहने पर चौकन्ने हो जाते थे. इसलिए उस ने कहा कि ससुराल जाने के कुछ दिनों बाद वह बच्चे को छोड़ कर अकेली सूरज के साथ भाग जाएगी. सरोज के साथ घर से भागने की योजना बनाने के बाद सूरज पैसों का इंतजाम करने लगा. कुछ दिनों बाद मंजेश आया तो सरोज ससुराल चली गई. ससुराल में किसी को भी उस के घर से भाग जाने का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस के घर से बाहर आनेजाने की पूरी छूट थी.

16 जुलाई को सूरज सरोज से संडीला कस्बे में शीतला देवी के मेले में मिला तो कहा कि रात में वह गांव के बाहर आ कर उसे फोन कर देगा. उस के बाद वह तुरंत घर से निकल कर उस के पास आ जाए. सरोज ने हामी भर दी. रात में सूरज ने फोन किया तो अपने 8 महीने के बेटे को सोता छोड़ कर सरोज गांव के बाहर इंतजार कर रहे सूरज के पास आ गई. सूरज सरोज को साथ ले कर मन में नई जिंदगी बसाने के सतरंगी सपने देखता हुआ लखनऊ की ओर चल पड़ा. कुछ देर बाद बच्चे का रोना सुन कर उस की सास सोमा देवी ने सरोज को आवाज देते हुए बच्चे को चुप कराने को कहा. जब बच्चा चुप नहीं हुआ तो वह बहू सरोज के कमरे में गई. लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. सोमा को चिंता हुई कि इतनी रात में बहू कहां चली गई. उस ने बेटे को जगाया. इस के बाद सभी सरोज को तलाशने लगे.

सरोज के न मिलने पर घर वालों को शक हो गया कि जरूर वह किसी के साथ भाग गई होगी. इस के बाद मंजेश ने सरोज के घर छोड़ कर कहीं जाने की बात अपने साले दिनेश को बता कर पूछा कि कहीं सरोज वहां तो नहीं गई है. दिनेश ने कह दिया कि वह यहां नहीं आई है. बहन की करतूत सुन कर दिनेश ने अपना सिर पीट लिया. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि शादी के ढाई, तीन साल बाद सरोज इस तरह घर छोड़ कर चली जाएगी. उन्होंने मंजेश से कहा कि वह पता लगाए कि सरोज को जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं, वह किस के साथ गई है.

काफी खोजबीन के बाद भी जब सरोज का कुछ पता नहीं चला तो 2 दिन बाद मंजेश ससुराल आ कर गांव में हो रही अपनी बदनामी के बारे में बता कर गालीगलौच करने लगा. रामऔतार का परिवार बेटी की इस करतूत से काफी दुखी था. दामाद की पीड़ा को समझते हुए उन्होंने उसे सब कुछ बता दिया. तब 18 जुलाई को मंजेश ने संडीला कोतवाली में सूरज और उस के दोस्त धर्मेंद्र के खिलाफ अपनी पत्नी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. संडीला पुलिस ने काररवाई करते हुए सूरज के घर जा कर पूछताछ की तो वे उस के बारे में कुछ नहीं बता सके. सूरज का दोस्त धर्मेंद्र घर में ही मिल गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह सूरज और सरोज के प्रेमसंबंधों के बारे में तो जानता था, लेकिन वे कहां हैं, इस बात की जानकारी उसे नहीं है.

पूछताछ के बाद धर्मेंद्र को छोड़ दिया गया. इधर पुलिस ने सूरज और सरोज के मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. दूसरी ओर मंजेश अपने साले दिनेश, शिवकुमार तथा अन्य कुछ रिश्तेदारों के साथ सरोज की तलाश में लगा था. मंजेश के गांव ककराली में उस की पत्नी सरोज के घर से भाग जाने की बात चर्चा का विषय बनी हुई थी. लोग चटखारे लेले कर आपस में तरहतरह की बातें कर रहे थे, जिस से घर वालों का बाहर निकलना दूभर हो गया था. 26 जुलाई की शाम मंजेश अपने चचेरे चाचा राकेश के साथ अपनी ससुराल पहुंचा, तभी उस के मोबाइल पर सरोज का फोन आया कि वह इस समय दुबग्गा में है और उस के साथ घर चलना चाहती है.

सरोज का फोन सुन कर मंजेश ने दिनेश से कहा कि गांव में उस की इतनी बदनामी हो चुकी है कि अब वह सरोज को अपने घर नहीं ले सकता. दिनेश और शिवकुमार भी उसे अपने घर में नहीं रखना चाहते थे. तुरंत सभी ने सरोज की हत्या की योजना बना डाली. इस में दिनेश और शिवकुमार ने अपने चचेरे भाई हिन्ना उर्फ सुनील को भी शामिल कर लिया. वे भी चाहते थे कि किसी तरह सूरज मिल जाए तो वे उस का भी काम तमाम कर दें. मंजेश की मोटरसाइकिल पर राकेश और हिन्ना और दिनेश व शिवकुमार अपनी मोटरसाइकिल से रात 11 बजे अंधे की चौकी के पास कलामंडी होते हुए दुबग्गा में सरोज द्वारा बताए स्थान पर पहुंच गए. सरोज वहां मिल गई.

सरोज से सूरज के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले वह उसे छोड़ कर बालागंज की ओर गया है. दिनेश के चचेरे भाई सुनील उर्फ हिन्ना ने राकेश को तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और बालागंज की ओर चल पड़ा. थोड़ी दूर जाने पर सूरज दिखाई दे गया. हिन्ना उसे गांव में पंचायत के सामने सरोज से उस की शादी करवाने का झांसा दे कर मोटरसाइकिल पर बीच में बैठा लिया और उसे भी वहां ले आया जहां मंजेश, राकेश और दिनेश सरोज को ले कर उस का इंतजार कर रहे थे.

सरोज ने डरते हुए चोर नजरों से सब की ओर देखा. उन के चेहरों के भाव देख कर वह कांप उठी. लेकिन अब बाजी उस के हाथ से निकल चुकी थी. दोनों को ले कर वे माल की ओर जाने वाली रोड पर चलते हुए वंशीगढ़ी के जंगल में पहुंचे. जंगल में सन्नाटा छाया था. राकेश सूरज को पकड़ कर एक जगह खड़ा हो गया तो मंजेश सरोज को ले कर जंगल के अंदर चला गया. उस के पीछेपीछे सरोज के दोनों भाई दिनेश और शिवकुमार भी थे. मंजेश ने सरोज को पकड़ने का इशारा किया तो दिनेश और शिवकुमार ने सरोज के हाथ और पैर कस कर पकड़ लिए. इस के बाद मंजेश ने सरोज के गले में पड़ी चुन्नी से उस का गला कस दिया. सरोज के बेहोश होने पर मंजेश ने डंडे से तो दिनेश, हिन्ना और शिवकुमार ने उसे लातघूंसों से मारना शुरू किया. थोड़ी देर में सरोज की मौत हो गई.

सरोज को मार कर वे सूरज के पास पहुंचे. सूरज अब तक समझ चुका था कि उन लोगों ने सरोज की हत्या कर दी होगी, अब उस की बारी है. सरोज को भी वे उसी जगह ले गए, जहां सरोज की लाश पड़ी थी. दिनेश ने उस के दोनों हाथ पकड़े तो राकेश ने उस का मुंह दबाया. हिन्ना और शिवकुमार ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के बैग से शर्ट निकाल कर उसे वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. शर्ट से हिन्ना और शिवकुमार ने सूरज का गला कस दिया, जिस से वह भी बेहोश हो गया. इस के बाद उसे भी डंडे और लातघूंसों से पीटपीट कर मार दिया गया.

दोनों की हत्या करने के बाद मंजेश और उस के चाचा राकेश अपने गांव ककराली चले गए तो सरोज के भाई दिनेश, शिवकुमार तथा हिन्ना अपने गांव सिरगामऊ लौट आए. हत्या के 2 दिनों बाद जब उन्हें पता चला कि मलिहाबाद पुलिस लाशों को बरामद कर के जांच कर रही है तो सभी अपनेअपने घरों से फरार हो गए. लेकिन पुलिस के हाथ उन के गिरेबान तक पहुंच ही गए. शिवकुमार की  मोटरसाइकिल यूपी32-ईएल 3768 पुलिस ने बरामद कर ली थी. सूरज एसपी था, इसलिए मुकदमे में धारा 147 और 3(2)5 एससी/एसटी एक्ट की धारा और बढ़ा दी गई थी.

6 अगस्त को इंसपेक्टर सुधाकर पांडेय ने इस दोहरे हत्याकांड के आरोपी दिनेश उर्फ तिवारी तथा शिवकुमार को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 7 अगस्त को सरोज के पति मंजेश ने भी न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 11 अगस्त को सुबह 10 बजे पुलिस ने हिन्ना उर्फ सुनील को कुशनगरी गांव के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जाने की फिराक में था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हिन्ना की मोटरसाइकिल यूपी32- डीएच3125 भी अपने कब्जे में ले ली. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

21 अगस्त को सुधाकर पांडेय ने अभियुक्तों की निशानदेही पर आलाकत्ल वे लाठीडंडे भी बरामद कर लिए गए, जिन से सूरज और सरोज की हत्या की गई थी. कथा लिखे जाने तक इस हत्याकांड का एक आरोपी राकेश फरान था. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: पूरा न हुआ सपना का सपना – हत्यारा बाप

UP Crime: कानपुर जिले के घाटमपुर थाना अंतर्गत एक गांव है बिहारिनपुर. इसी गांव में शिवआसरे परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी मीना के अलावा 2 बेटियां सपना, रत्ना तथा 2 बेटे कमल व विमल थे. शिवआसरे ट्रक ड्राइवर था. उस के 2 अन्य भाई रामआसरे व दीपक थे, जो अलग रहते थे और खेतीबाड़ी से घर खर्च चलाते थे.

शिवआसरे की बेटी सपना भाईबहनों में सब से बड़ी थी. वह जैसेजैसे सयानी होने लगी, उस के रूपलावण्य में निखार आता गया. 16 साल की होतेहोते सपना की सुंदरता में चारचांद लग गए. मतवाली चाल से जब वह चलती, तो लोगों की आंखें बरबस उस की ओर निहारने को मजबूर हो जाती थीं. सपना जितनी सुंदर थी, उतनी ही पढ़नेलिखने में भी तेज थी. उस ने पतारा स्थित सुखदेव इंटर कालेज में 9वीं कक्षा में एडमिशन ले लिया था. जबकि उस की मां मीना उसे मिडिल कक्षा से आगे नहीं पढ़ाना चाहती थी, लेकिन सपना की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा.

सपना के घर से कुछ दूरी पर शालू रहता था. शालू के पिता बैजनाथ किसान थे. उन के 3 बच्चों में शालू सब से बड़ा था. 17 वर्षीय शालू हाईस्कूल की परीक्षा पास कर चुका था और इंटरमीडिएट की पढ़ाई घाटमपुर के राजकीय इंटर कालेज से कर रहा था. शालू के पिता बैजनाथ और सपना के पिता शिवआसरे एक ही बिरादरी के थे, सो उन में गहरी दोस्ती थी. दोनों एकदूसरे का दुखदर्द समझते थे. किसी एक को तकलीफ हो तो दूसरे को दर्द खुद होने लगता. बैजनाथ और शिवआसरे बीते एक दशक से गांव में बटाई पर खेत ले कर खेती करते थे. हालांकि शिवआसरे ट्रक चालक था और खेतीबाड़ी में कम समय देता था. इस के बावजूद दोनों की पार्टनरशिप चलती रही. दोनों परिवारों में घरेलू संबंध भी थे. लिहाजा उन के बच्चों का भी एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था.

शालू सपना को चाहता था. सपना भी उस की आंखों की भाषा समझती थी. सपना के लिए शालू की आंखों में प्यार का सागर हिलोरें मारता था. सपना भी उस की दीवानी होने लगी. धीरेधीरे उस के मन में भी शालू के प्रति आकर्षण पैदा हो गया. सपना शालू के मन को भाई तो वह उस का दीवाना बन गया. सपना के स्कूल जाने के समय वह बाहर खड़ा उस का इंतजार करता रहता. सपना उसे दिखाई पड़ती तो वह उसे चाहत भरी नजरों से तब तक देखता रहता, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो जाती. अब वह सपना के लिए तड़पने लगा था. हर पल उस के मन में सपना ही समाई रहती थी. न उस का मन काम में लगता था, न ही पढ़ाई में.

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शालू का शिवआसरे के घर जबतब आनाजाना लगा ही रहता था. घर आनाजाना काम से ही होता था. लेकिन जब से सपना शालू के मन में बसी, शालू अकसर उस के घर ज्यादा जाने लगा. इस के लिए उस के पास बहाने भी अनेक थे. शिवआसरे के घर पहुंच कर वह बातें भले ही दूसरे से करता, लेकिन उस क ी नजरें सपना पर ही जमी रहती थीं. शालू की अपने प्रति चाहत देख कर उस का मन भी विचलित हो उठा. अब वह भी शालू के आने का इंतजार करने लगी.

दोनों ही अब एकदूसरे का सामीप्य पाने को बेचैन रहने लगे थे. लेकिन यह सब अभी नजरों ही नजरों में था. शालू की चाहत भरी नजरें सपना के सुंदर मुखड़े पर पड़तीं तो सपना मुसकराए बिना न रह पाती. वह भी उसे तिरछी निगाहों से घूरते हुए उस के आगेपीछे चक्कर लगाती रहती. अब शालू अपने दिल की बात सपना से कहने के लिए बेचैन रहने लगा. शालू अब ऐसे अवसर की तलाश में रहने लगा, जब वह अपने दिल की बात सपना से कह सके. कोशिश करने पर चाह को राह मिल ही जाती है. एक दिन शालू को मौका मिल ही गया. उस दिन सपना के भाईबहन मां मीणा के साथ ननिहाल चले गए थे और शिवआसरे ट्रक ले कर बाहर गया था. सपना को घर में अकेला पा कर शालू बोला, ‘‘सपना, यदि तुम बुरा न मानो तो मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

सपना जानती थी कि शालू उस से क्या कहेगा. इसलिए उस का दिल जोरजोर धड़कने लगा. घबराई सी वह शालू की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगी. शालू ने हकलाते हुए कहा, ‘‘सपना वो क्या है कि मैं तुम्हारे बारे में कुछ…’’

‘‘मेरे बारे में…’’ चौंकने का नाटक करते हुए सपना बोली, ‘‘जो भी कहना है, जल्दी कहिए.’’ शायद वह भी शालू से प्यार के शब्द सुनने के लिए बेकरार थी.

‘‘कहीं तुम मेरी बात सुन कर नाराज न हो जाओ…’’ शालू ने थोड़ा झेंपते हुए कहा.

‘‘अरे नहीं…’’ मुसकराते हुए सपना बोली, ‘‘नाराज क्यों हो जाऊंगी. तुम मुझे गालियां तो दोगे नहीं. जो भी कहना है, तुम दिल खोल कर कहो, मैं तुम्हारी बातों का बुरा नहीं मानूंगी.’’

सपना जानबूझ कर अंजान बनी थी. जब शालू को सपना की ओर से कुछ भी कहने की छूट मिल गई तो उस ने कहा, ‘‘सपना, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. मुझे तुम्हारे अलावा कुछ अच्छा नहीं लगता. हर पल तुम्हारी ही सूरत मेरी नजरों के सामने घूमती रहती है.’’

शालू की बातें सुन कर सपना मन ही मन खुश हुई, फिर बोली, ‘‘शालू, प्यार तो मैं भी तुम से करती हूं, लेकिन मुझे डर लग रहा है.’’

‘‘कैसा डर सपना?’’ शालू ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यही कि हमारेतुम्हारे प्यार को घर वाले स्वीकार करेगें क्या?’’

‘‘हम एक ही जाति के हैं. दोनों परिवारों के बीच संबंध भी अच्छे हैं. हम दोनों अपनेअपने घर वालों को मनाएंगे तो वे जरूर मान जाएंगे.’’

उस दिन दोनों के बीच प्यार का इजहार हुआ, तो मानो उन की दुनिया ही बदल गई. फिर वे अकसर ही मिलने लगे. सपना और शालू के दिलोदिमाग पर प्यार का ऐसा जादू चढ़ा कि उन्हें एकदूजे के बिना सब कुछ सूना लगने लगा.

जब भी मौका मिलता, दोनों एकांत में एक साथ बैठते और अपने ख्वाबों की दुनिया में खो जाते. प्यार में वे इस कदर खो गए कि उन्होंने जीवन भर एकदूसरे का साथ निभाने की कसमें भी खा लीं. एक बार मन से मन मिला तो फिर दोनों के तन मिलने में भी देर नहीं लगी.

सपना और शालू ने लाख कोशिश की कि उन के संबंधों की जानकारी किसी को न हो. लेकिन प्यार की महक को भला कोई रोक सका है. एक दिन पतारा बाजार से लौटते समय गांव में ही रहने वाले उन्हीं की जाति के युवक मोहन ने उन दोनों को रास्ते में हंसीठिठोली करते देख लिया. घर आते ही उस ने सारी बात शिवआसरे को बता दी. कुछ देर बाद जब सपना घर लौटी तो शिवआसरे ने सपना को डांटाफटकारा और पिटाई करते हुए हिदायत दी कि भविष्य में वह शालू से न मिले.

सपना की मां मीना ने भी इज्जत का हवाला दे कर बेटी को खूब समझाया. सपना पर लगाम कसने के लिए मां ने उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया. साथ ही उस पर कड़ी निगरानी रखने लगी. मीना ने शालू के घर जा कर उस के मांबाप से शिकायत की कि वह अपने बेटे को समझाएं कि वह उस की इज्जत से खिलवाड़ न करे. लेकिन कहावत है कि लाख पहरे बिठाने के बाद भी प्यार कभी कैद नहीं होता. सपना के साथ भी ऐसा ही हुआ. मां की निगरानी के बावजूद सपना और शालू का मिलन बंद नहीं हुआ. किसी न किसी बहाने वह शालू से मिलने का मौका ढूंढ ही लेती थी.

कभी दोनों नहीं मिल पाते तो वे मोबाइल फोन पर बतिया लेते और दिल की लगी बुझा लेते. सपना को मोबाइल फोन शालू ने ही खरीद कर दिया था. इस तरह बंदिशों के बावजूद उन का प्यार बढ़ता ही जा रहा था. दबी जुबान से पूरे गांव में उन के प्यार के चर्चे होने लगे थे. एक शाम सहेली के घर जाने का बहाना बना कर सपना घर से निकली और शालू से मिलने गांव के बाहर बगीचे में पहुंच गई. इस की जानकारी मीना को हुई तो सपना के घर लौटने पर मां का गुस्सा फट पड़ा, ‘‘बदजात, कुलच्छिनी, मेरे मना करने के बावजूद तू शालू से मिलने क्यों गई थी. क्या मेरी इज्जत का कतई खयाल नहीं?’’

‘‘मां, मैं शालू से प्यार करती हूं. वह भी मुझे चाहता है.’’

‘‘आने दे तेरे बाप को. प्यार का भूत न उतरवाया तो मेरा नाम मीना नहीं.’’ मीना गुस्से से बोली.

‘‘आखिर शालू में बुराई क्या है मां? अपनी बिरादरी का है. पढ़ालिखा स्मार्ट भी है.’’ सपना ने मां को समझाया.

‘‘बुराई यह है कि शालू तुम्हारे चाचा का लड़का है. जातिबिरादरी के नाते तुम दोनों का रिश्ता चचेरे भाईबहन का है. अत: उस से नाता जोड़ना संभव नहीं है.’’ मां ने समझाया.

मांबेटी में नोकझोंक हो ही रही थी कि शिवआसरे घर आ गया. उस ने पत्नी का तमतमाया चेहरा देखा तो पूछा, ‘‘मीना, क्या बात है, तुम गुस्से से लाल क्यों हो?’’

‘‘तुम्हारी लाडली बेटी सपना के कारण. लगता है कि यह बिरादरी में हमारी नाक कटवा कर ही रहेगी. मना करने के बावजूद भी यह कुछ देर पहले शालू से मिल कर आई है और उस की तरफदारी कर जुबान लड़ा रही है.’’ मीना ने कहा.

पत्नी की बात सुन कर शिवआसरे का गुस्सा बेकाबू हो गया. उस ने सपना की जम कर पिटाई की और कमरा बंद कर दिया. गुस्से में उस ने खाना भी नहीं खाया और चारपाई पर जा कर लेट गया. रात भर वह यही सोचता रहा कि इज्जत को कैसे बचाया जाए. सुबह होते ही शिवआसरे शालू के पिता बैजनाथ के घर जा पहुंचा, ‘‘तुम शालू को समझाओ कि वह सपना से दूर रहे. अन्यथा अंजाम अच्छा नहीं होगा. अपनी इज्जत के लिए वह किसी हद तक जा सकता है.’’

इस घटना के बाद दोनों परिवारों के बीच दरार पड़ गई. शिवआसरे और बैजनाथ के बीच साझेदारी भी टूट गई. इधर चौकसी बढ़ने पर शालू और सपना का मिलनाजुलना लगभग बंद हो गया था. जिस से दोनों परेशान रहने लगे थे. अब दोनों की बात चोरीछिपे मोबाइल फोन पर ही हो पाती थी. 14 मई, 2021 को शिवआसरे के साले मनोज की शादी थी. शिवआसरे ने घर की देखभाल की जिम्मेदारी भाई दीपक को सौंपी और सुबह ही पत्नी मीना व 2 बच्चों के साथ बांदा के बरुआ गांव चला गया. घर में रह गई सपना और सब से छोटा बेटा विमल.

दिन भर सपना घर के काम में व्यस्त रही फिर शाम होते ही उसे प्रेमी शालू की याद सताने लगी. लेकिन चाचा दीपक की निगरानी से वह सहमी हुई थी. रात 12 बजे जब पूरा गांव सो गया, तो सपना ने सोचा कि उस का चाचा भी सो गया होगा. अत: उस ने शालू से मोबाइल फोन पर बात की और मिलने के लिए उसे घर बुलाया. शालू चोरीछिपे सपना के घर आ गया. लेकिन उसे घर में घुसते हुए दीपक ने देख लिया. वह समझ गया कि वह सपना से मिलने आया है. उस ने तब दरवाजा बाहर से बंद कर ताला लगा दिया और बड़े भाई शिवआसरे को फोन कर के सूचना दे दी.

शिवआसरे को जब यह सूचना मिली तो वह साले की शादी बीच में ही छोड़ कर अकेले ही बरुआ गांव से चल दिया. 15 मई की सुबह 7 बजे वह अपने घर पहुंच गया. तब तक शालू के मातापिता सीमा और बैजनाथ को भी पता चल चुका था कि उन के बेटे शालू को बंधक बना लिया गया है. वे लोग शिवआसरे के घर पहले से मौजूद थे. शिवआसरे घर के अंदर जाने लगा तो बैजनाथ ने पीछे से आवाज लगाई. इस पर शिवआसरे ने कहा कि वह बस बात कर मामला हल कर देगा और घर के अंदर चला गया. पीछे से बैजनाथ और सीमा भी घर के अंदर दाखिल हुए. लेकिन वे अपने बेटे शालू तक पहुंच पाते, उस के पहले ही शिवआसरे शालू और सपना को ले कर एक कमरे में चला गया और उस में लगा लोहे का गेट बंद कर लिया.

शालू के पिता बैजनाथ व मां सीमा खिड़की पर खड़े हो गए, जहां से वे अंदर देख सकते थे. बैजनाथ ने एक बार फिर शिवआसरे से मामला सुलझाने की बात कही. इस पर उस का जवाब यही था कि बस 10 मिनट बात कर के मामला सुलझा देगा. इधर पिता का रौद्र रूप देख कर सपना कांप उठी. शिवआसरे ने दोनों से सवालजवाब किए तो सपना पिता से उलझ गई. इस पर उसे गुस्सा आ गया. शिवआसरे ने डंडे से सपना को पीटा. उस ने शालू की भी डंडे से पिटाई की.

लेकिन पिटने के बाद भी सपना का प्यार कम नहीं हुआ. वह बोली, ‘‘पिताजी, मारपीट कर मेरी जान भले ही ले लो, पर मेरा प्यार कम न होगा. आखिरी सांस तक मेरी जुबान पर शालू का नाम ही होगा.’’

बेटी की ढिठाई पर शिवआसरे आपा खो बैठा. उस ने कमरे में रखी कुल्हाड़ी उठाई और सपना के सिर व गरदन पर कई वार किए. जिस से उस की गरदन कट गई और मौत हो गई. इस के बाद उस ने कुल्हाड़ी से वार कर शालू को भी वहीं मौत के घाट उतार दिया.

यह खौफनाक मंजर देख कर शालू की मां सीमा की चीख निकल गई. सीमा और बैजनाथ जोरजोर से चिल्लाने लगे. सीमा ने मदद के लिए कई घरों के दरवाजे खटखटाए लेकिन कोई मदद को नहीं आया. प्रधान पति राजेश कुमार को गांव में डबल मर्डर की जानकारी हुई तो उन्होंने थाना घाटमपुर पुलिस तथा बड़े पुलिस अधिकारियों को फोन द्वारा सूचना दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी धनेश प्रसाद, एसपी (आउटर) अष्टभुजा प्रताप सिंह, एएसपी आदित्य कुमार शुक्ला तथा डीएसपी पवन गौतम पहुंच गए.

शिवआसरे 2 लाशों के बीच कमरे में बैठा था. थानाप्रभारी धनेश प्रसाद ने उसे हिरासत में ले लिया. आलाकत्ल कुल्हाड़ी भी कमरे में पड़ी थी. पुलिस ने उसे भी सुरक्षित कर लिया. जबकि शिवआसरे के अन्य भाई दीपक व रामआसरे पुलिस के आने से पहले ही फरार हो गए थे. पुलिस अधिकारियों ने शिवआसरे से पूछताछ की तो उस ने सहज ही जुर्म कबूल कर लिया और कहा कि उसे दोनों को मारने का कोई गम नहीं है.

पुलिस अधिकारियों ने गांव वालों तथा मृतक शालू के पिता बैजनाथ से पूछताछ की. बैजनाथ ने बताया कि वह और उस की पत्नी सीमा बराबर शिवआसरे से हाथ जोड़ कर कह रहे थे कि बेटे को बख्श दे. लेकिन वह नहीं माना और आंखों के सामने बेटे पर कुल्हाड़ी से वार कर उस की जान ले ली.

पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक शालू व सपना के शवों को पोस्टमार्टम हेतु हैलट अस्पताल, कानपुर भिजवा दिया. चूंकि शिवआसरे ने डबल मर्डर का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल कुल्हाड़ी भी बरामद हो गई थी, अत: थानाप्रभारी धनेश प्रसाद ने बैजनाथ की तरफ से भादंवि की धारा 302 के तहत शिवआसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे गिरफ्तार कर लिया. 16 मई, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त शिवआसरे को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Firozabad Crime: प्यार की राह का रोड़ा – पति को बनाया पराया

Firozabad Crime: घटना उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना टूंडला के गांव नगला राधेलाल की है. 30 अक्तूबर की सुबह जब हरभेजी सो कर उठी तो बराबर के कमरे में उन्हें कोई हलचल नहीं दिखी. उस कमरे में उन का बेटा गब्बर बहू विवेक कुमारी उर्फ लालपरी तथा पोते अनुज के साथ सोया था. गब्बर के 2 बच्चे हरभेजी के साथ ही सोए थे. हरभेजी जब गब्बर के कमरे में गईं तो अंदर का दृश्य देखते ही उन के मुंह से चीख निकल गई.

उन का 40 वर्षीय बेटा गब्बर पंखे से बंधे फंदे पर लटका हुआ था, उस के पैर कमरे के फर्श को छू रहे थे. गब्बर के चेहरे से खून टपक रहा था. मां हरभेजी ने बहू लालपरी को आवाज लगाई, लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. न ही वहां उस का बेटा अनुज था. बहू की तलाश की गई पर उस का कोई पता नहीं चला. इस घटना से परिवार में कोहराम मच गया. मां के रोने की आवाज सुन कर उन के और बेटे भी वहां आ गए. कुछ ही देर में मोहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. उसी दौरान किसी ने आत्महत्या करने की सूचना पुलिस को फोन द्वारा दे दी.

सूचना पर थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय फोर्स सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने शव के साथ मकान का भी निरीक्षण किया. सूचना मिलने पर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां आ गए. निरीक्षण के उपरांत पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि गब्बर ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उस की पीटपीट कर हत्या करने के बाद शव को फंदे पर लटकाया गया है. गब्बर के साथ कमरे में उस की पत्नी ही सोई थी, जो वहां से फरार थी, इसलिए पूरा शक पत्नी पर ही था. अब सवाल यह था कि शव को अकेले पत्नी पंखे पर नहीं लटका सकती. इस काम में किसी ने उस की मदद जरूर की होगी.

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो वहां एक ऐसी मैक्सी मिली, जिस पर खून लगा हुआ था. पता चला कि वह मैक्सी मृतक की पत्नी लालपरी की थी. लालपरी के कुछ कपड़े और अन्य सामान कमरे से गायब थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि वह पति की हत्या के बाद अपना सामान व अपने साथ सोए बच्चे को ले कर फरार हो गई है. पुलिस ने घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि रात को पतिपत्नी में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ था. झगड़े के समय लालपरी का प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा भी वहां मौजूद था. स्वामी टूंडला थाने के गांव बन्ना का रहने वाला था. उस समय परिवार के लोगों ने दोनों को समझाबुझा कर झगड़ा शांत करा दिया था. इस के बाद वे अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे.

मृतक के भाई योगेश ने पुलिस को बताया कि शादी के पहले से ही लालपरी के स्वामी से अवैध संबंध थे. मौके की जांच करने के बाद पुलिस ने गब्बर की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फिरोजाबाद भेज दी. पुलिस ने मृतक के भाई योगेश की ओर से विवेक कुमारी उर्फ लालपरी व उस के प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस नामजद आरोपियों की तलाश में जुट गई. पुलिस ने कई संभावित स्थानों पर दबिश भी दी, लेकिन उन का कोई पता नहीं लगा. तब पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया.

लालपरी की शादी गब्बर से हो जरूर गई थी लेकिन वह उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. वह अपने घर वालों की मरजी का विरोध भी नहीं कर सकी थी. यानी घर वालों की वजह से उस ने गब्बर से शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस का प्रेमी बसा था. यही वजह थी कि वह प्रेमी को शादी के बाद भी भुला न सकी. प्रेमी स्वामी उस के पति की गैरमौजूदगी में उस के घर आनेजाने लगा. जब पति काम पर चला जाता तो मौका देख कर लालपरी प्रेमी को फोन कर बुला लेती थी. इस के बाद दोनों ऐश करते थे लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी तो नहीं रहतीं.

लालपरी व स्वामी के संबंधों की जानकारी मोहल्ले के साथ ससुराल के लोगों को भी हो गई. इस की भनक जब गब्बर को लगी तो उस ने कई बार पत्नी को समझाया, लेकिन लालपरी की समझ में कुछ नहीं आया. इस बात को ले कर दोनों में कई बार झगड़ा भी हुआ, पर उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना जारी रखा. घटना के 3 सप्ताह बाद भी लालपरी और उस के प्रेमी स्वामी के बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं मिली थी. 21 नवंबर, 2018 को पुलिस को एक जरूरी सूचना मिली कि लालपरी और उस का प्रेमी इस समय टूंडला से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित एफएच मैडिकल कालेज में मौजूद हैं. थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने एसआई नेत्रपाल शर्मा के नेतृत्व में तुरंत एक पुलिस टीम वहां भेज दी.

पुलिस को अस्पताल में स्वामी घायलावस्था में उपचार कराते मिला, जबकि उस की प्रेमिका लालपरी अस्पताल में उस की देखभाल कर रही थी. पता चला कि स्वामी एक सप्ताह पहले सड़क हादसे में घायल हो गया था. उस के सिर में गहरी चोट लगी थी. उस की प्रेमिका उसे गंभीर हालत में उपचार के लिए एफ.एच. मैडिकल कालेज ले कर आई थी. लेकिन उपचार के दौरान दोनों के बीच अस्पताल में ही किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था. झगड़े में वे दोनों गब्बर की हत्या को ले कर एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे.

करीब 3 सप्ताह पहले हुई गब्बर की हत्या की जानकारी मीडिया द्वारा अस्पताल के स्टाफ को मिल चुकी थी. उन की बातों से वहां के स्टाफ को यह शक हो गया कि गब्बर हत्याकांड में ये लोग शामिल हैं. इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी थी. पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को हिरासत में ले लिया. स्वामी और उस की प्रेमिका लालपरी को थाने ले जा कर उन से पूछताछ की गई. हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की खबर पा कर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए. उन के सामने थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने लालपरी और स्वामी से पूछताछ की तो उन्होंने गब्बर की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने गब्बर की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी-

रोजाबाद जिले के गांव नगला राधेलाल के रहने वाले गब्बर की शादी करीब 9 साल पहले विवेक कुमारी उर्फ लालपरी से हुई थी. बाद में वह 3 बच्चों का बाप बन गया. गब्बर के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, उस से बमुश्किल परिवार का गुजारा होता था. तब खाली समय में गब्बर राजमिस्त्री का काम कर लेता था. शादी से पहले ही लालपरी के पैर बहक गए थे. बन्ना गांव के रहने वाले स्वामी उर्फ सुम्मा से उस का चक्कर चल रहा था. करीब एक साल पहले की बात है. लालपरी का अपने प्रेमी स्वामी के साथ रंगरेलियां मनाते हुए अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इस से गब्बर और उस के परिवार की बड़ी बदनामी हुई थी.

इस के बाद गब्बर को मोहल्ले के लोगों के ताने सुनने पड़े थे. गब्बर ने पत्नी से कहा कि वह स्वामी से संबंध खत्म कर ले, लेकिन वह इतनी बेशर्म हो चुकी थी कि उलटे पति से ही झगड़ने लगती थी. एक बार वह पति से झगड़ कर बन्ना स्थित कांशीराम कालोनी में जा कर रहने लगी थी. कुछ समय बाद जब लालपरी का गुस्सा शांत हो गया तो वह पति के घर लौट आई. वहां वह कुछ दिनों तक तो ठीक से रही लेकिन बाद में उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना फिर शुरू कर दिया. पति जब उसे टोकता तो उसे उस की बात बुरी लगती थी. एक तरह से उसे पति रास्ते का कांटा नजर आने लगा. उस कांटे से वह हमेशा के लिए निजात पाना चाहती थी, ताकि प्रेमी के साथ चैन से रह सके.

एक दिन उस ने इस सिलसिले में प्रेमी से बात करने के बाद पति को ठिकाने लगाने की तरकीब खोजी. लालपरी ने एक बार पति को मारने के लिए उस के खाने में जहर मिला दिया. जहर का असर होते ही गब्बर सिंह की हालत बिगड़ गई. घर वाले उसे इलाज के लिए तुरंत आगरा ले गए और उसे एक अस्पताल में भरती करा दिया. परिवार वालों को लालपरी पर शक तो था, लेकिन वे यह भी सोच रहे थे कि कहीं खाने में छिपकली तो नहीं गिर गई. बहरहाल, उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को नहीं दी. उन्होंने लालपरी से इस बारे में पूछताछ की तो उस ने कहा कि हो सकता है उस की लापरवाही से खाने में कोई छिपकली वगैरह गिर गई हो. इस के लिए लालपरी ने घर वालों से माफी मांग ली.

अस्पताल से पति के घर वापस आने के बाद लालपरी ने रोरो कर गब्बर से भी माफी मांग ली. यह सब लालपरी का ड्रामा था. सीधेसादे गब्बर ने पत्नी को इस घटना के बाद भी माफ कर दिया और खुद पत्नी की तरफ से बेफिक्र हो गया. लालपरी भले ही अपने मतलब के लिए पति से माफी मांग लेती थी, लेकिन हकीकत यह थी कि वह दबंग थी. सीधेसादे गब्बर पर वह अकसर हावी रहती थी. स्वामी से उस के संबंधों को ले कर पति जब उस पर नाराज होता तो वह उलटे उस की शिकायत थाने में कर आती थी. कई बार वह पति व ससुरालियों के खिलाफ मारपीट की थाने में शिकायत दर्ज करा चुकी थी. इस के चलते पति व ससुराल वाले उस का कोई विरोध नहीं कर पाते थे.

समाज को दिखाने के लिए उस ने करवाचौथ का व्रत भी रखा था. लेकिन वह अब पति से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी. इस बारे में उस ने अपने प्रेमी स्वामी के साथ एक अंतिम योजना तैयार कर ली थी. 29 अक्तूबर, 2018 को स्वामी लालपरी के घर आया. गब्बर ने स्वामी से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन पत्नी से झगड़ने लगा. स्वामी और घर वालों ने दोनों को समझा कर शांत कराया. उसी समय लालपरी ने स्वामी से कह दिया था कि इस कांटे को आज रात ही निकाल देना है. प्रेमिका की बात सुन कर स्वामी वहां से चला गया.

उस रात लालपरी अपने 6 साल के बेटे अनुज के साथ पति के कमरे में ही सोई थी. उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं लगाई. जब गब्बर गहरी नींद में सो गया तो लालपरी ने फोन कर के प्रेमी को बुला लिया. दोनों ने मिल कर सोते हुए गब्बर को दबोच लिया और मारपीट की, फिर गला दबा कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद इसे आत्महत्या का रूप देने के लिए दोनों ने उस की लाश पंखे पर लटका दी. उस ने अपने प्रेम संबंधों की राह में रोड़ा बने पति को हटा दिया. पुलिस ने स्वामी उर्फ सुम्मा और लालपरी से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया.

लालपरी ने प्यार की खातिर अपने घर को ही नहीं, अपनी मांग के सिंदूर को भी उजाड़ लिया. बच्चों के सिर पर भी मांबाप का साया नहीं रहा. बिलखते हुए बच्चों को देख कर लोग लालपरी को कोस रहे थे कि प्रेमी के साथ जाना था तो ऐसे ही चली जाती, पति को क्यों मार डाला. Firozabad Crime.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Gorakhpur Crime: जानवर सी सोच वाला आदमी

Gorakhpur Crime: डा. पूनम और डा. धन्नी कुमार जो भी कर रहे थे, उदयसेन के भले के लिए कर रहे थे, लेकिन भाई और भाभी की अच्छाई भी उसे बुरी लगी. इस के बाद खुन्नस में उस ने जो किया, अब शायद उस की पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी  गोरखपुर की अदालत संख्या-3 में अपर सत्र न्यायाधीश श्री पुर्णेंदु कुमार श्रीवास्तव कीअदालत में 4 हत्याओं का आरोपी उदयसेन गुप्ता फैसला सुनने के लिए कठघरे में खड़ा हुआ तो उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. सरकारी वकील जयनाथ यादव जहां सामने कठघरे में खड़े मासूम से दिखने वाले उदयसेन को शातिर अपराधी बता कर अधिक से अधिक सजा देने की गुहार लगा रहे थे, वहीं बचाव पक्ष के वकील रामकृपाल सिंह उसे निर्दोष बताते हुए साजिशन फंसाए जाने की बात कर रहे थे.

इस मामले में क्या फैसला सुनाया गया, यह जानने से पहले आइए हम यह जान लें कि यह उदयसेन गुप्ता कौन है और उस ने 4 निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की? हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बावजूद उसे अपने किए पर मलाल क्यों नहीं था? दिल दहला देने वाली इस कहानी की बुनियाद 12 साल पहले पड़ी थी. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर के बशारतपुर स्थित मोहल्ला रामजानकीनगर में चंद्रायन प्रसाद गुप्ता परिवार के साथ रहते थे. वह विद्युत विभाग में अधिशासी अभियंता थे. उन के परिवार में पत्नी शुभावती के अलावा 4 बच्चे, जिन में बेटी पूनम, बेटा संतोष, बेटी सुमन और बेटा अभय कुमार गुप्ता उर्फ चिंटु थे.

चंद्रायन प्रसाद के बच्चे समझदार थे, सभी पढ़ने में भी ठीक थे. पूनम पढ़लिख कर डाक्टर बन गई तो उस से छोटा संतोष बीटेक की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया. पूनम के डाक्टर बनने के बाद उन्होंने जिला कुशीनगर के फाजिलनगर के रहने वाले डा. धन्नी कुमार गुप्ता के साथ उस का विवाह कर दिया. इस के बाद घर में मात्र 4 लोग ही रह गए. उस समय सुमन गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थी तो अभय जुबली इंटर कालेज में बारहवीं में पढ़ रहा था. परिवार के दिन हंसीखुशी से कट रहे थे. 28 दिसंबर, 2006 को पूनम मांबाप का हालचाल जानने के लिए सुबह से ही फोन कर रही थी, लेकिन न मोबाइल फोन उठ रहा था और न ही लैंडलाइन. धीरेधीरे 10 बज गए और फोन नहीं उठा तो पूनम को चिंता हुई.

उस ने दिल्ली में बीटेक कर रहे छोटे भाई संतोष को फोन कर के पूरी बता कर कहा कि वह फोन कर के पता करे कि घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?

‘‘ठीक है, अभी पता कर के बताता हूं कि क्या बात है?’’ संतोष ने कहा और पिता के मोबाइल तथा घर के नंबर पर फोन किया. जब उस का भी फोन किसी ने रिसीव नहीं किया तो उस ने मोहल्ले के अपने परिचित प्रशांत कुमार मिश्रा को फोन कर के अपने घर भेजा कि वह पता कर के बताए कि घर वाले फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं. संतोष के कहने पर प्रशांत अपने साथी सोनू के साथ उस के घर पहुंचा और बाहर से जोरजोर से आवाज लगाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए. कई बार आवाज लगाने पर भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो दोनों चारदीवारी फांद कर अंदर जा पहुंचे. बाहर बरामदे से कमरे के अंदर उन्हें जो भयानक दृश्य दिखाई दिया, उस से वे कांप उठे. मकान के अंदर चंद्रायन प्रसाद गुप्ता, उन की पत्नी शुभावती, बेटी सुमन और बेटा अभय खून से लथपथ पड़े थे.

प्रशांत ने घटना की सूचना मोबाइल फोन से संतोष को दी. घर के सभी लोगों की हत्या की बात सुन कर वह सन्न रह गया. उस ने चाचा रवींद्र प्रसाद गुप्ता को फोन किया. वह चौरीचौरा के रामपुर बुजुर्ग गांव में रहते थे. पड़ोसियों ने घटना की सूचना कोतवाली शाहपुर पुलिस को दी तो तत्कालीन कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) रामचंद्र यादव, सीओ हरिनाथ यादव, डौग स्क्वायड और फिंगर एक्सपर्ट की टीमों के साथ पहुंच गए. जांच में पुलिस ने पाया कि शुभावती और चंद्रायन प्रसाद की सांसे चल रही हैं, जबकि सुमन और अभय की मौत हो चुकी है. पुलिस ने दोनों को अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण कर के सारे साक्ष्य जुटाने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ हत्या करना था. क्योंकि लूटपाट के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे. अगर थोड़ीबहुत लूटपाट हुई भी थी तो कोई बताने वाला नहीं था. चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन गायब था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटाने के बाद चंद्रायन प्रसाद के भाई रवींद्र प्रसाद की ओर से हत्याओं का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह ने जांच शुरू की. उम्मीद थी कि अगर दोनों में से कोई भी बच गया तो हत्यारों तक पहुंचने में आसानी रहेगी. लेकिन शुभावती ने अगले ही दिन दम तोड़ दिया.

चंद्रायन प्रसाद भी इस हालत में नहीं थे कि वह कुछ बता सकते. 6 महीने बाद नोएडा के एक अस्पताल में चंद्रायन प्रसाद ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 2 टीमें गठित की गई थीं. जांच में पता चला कि मृतक सुमन को उस की सगी मौसी का बेटा प्यार करता था और वह उस से विवाह करना चाहता था. जबकि सुमन और उस के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. डेयरी कालोनी में रहने वाली मृतका सुमन की मौसी के बेटे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कई दिनों तक पुलिस उस से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस को उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस को जब लगा कि वह निर्दोष है तो उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया गया.

घर वालों से पुलिस को कोई उम्मीद नहीं थी. यह हत्याकांड पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था. पुलिस के लिए उम्मीद की किरण चंद्रायन प्रसाद गुप्ता का मोबाइल फोन था. पुलिस उसी के चालू होने की राह देख रही थी. आखिर 19 जनवरी को वह मोबाइल चालू हो गया. पुलिस को सर्विलांस के माध्यम से पता चला कि उस की लोकेशन कुशीनगर के सुकरौली बाजार है. पुलिस ने वहां जा कर सत्यप्रकाश गुप्ता को पकड़ लिया. सत्यप्रकाश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि यह मोबाइल फोन उस के साले उदयसेन गुप्ता ने उसे दिया था. इस के बाद फाजिलनगर से उदयसेन गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते ही उस ने कहा, ‘‘आप लोग काफी दिनों बाद सही आदमी तक पहुंचे हैं. मैं ने ही वे हत्याएं की थीं.’’

उदयसेन गुप्ता की बात सुन कर पुलिस दंग रह गई. पुलिस उसे गोरखपुर ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने उन हत्याओं के पीछे की जो वजह बताई, उस से साफ हो गया कि उस ने मात्र खुन्नस की वजह से वे हत्याएं की थीं. उस के बताए अनुसार हत्या के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के फाजिलनगर निवासी चांदमूरत गुप्ता के 3 बेटों में उदयसेन सब से बड़ा था. चांदमूरत काफी रसूख वाले थे. वह अकूत धनसंपदा के मालिक भी थे. उदयसेन शुरू से ही उग्र स्वभाव का था. वह गोरखपुर के मोहद्दीपुर में किराए का कमरा ले कर अकेला ही रहता था और पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से एमकौम की पढ़ाई कर रहा था.

चंद्रायन प्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी पूनम की शादी इसी उदयसेन गुप्ता के बड़े पिता के बेटे डा. धन्नी कुमार गुप्ता से हुई थी. उदयसेन के पिता 5 भाई थे. पांचों भाइयों का परिवार एक साथ एक में ही रहता था. परिवार में डा. धन्नी कुमार के पिता का काफी मानसम्मान था. उन की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता था. उदयसेन भाभी पूनम का काफी सम्मान करता था, इसलिए वह भी उसे बहुत मानती थीं. पैसे वाले बाप का बेटा होने की वजह से उदयसेन काफी बिगड़ा हुआ था. डा. धन्नी कुमार जब भी गोरखपुर आए, उदयसेन को घर से लाए रुपयों से अपने 4 दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते देखा. इस के बाद उन्होंने इस बात की शिकायत अपने चाचा से कर दी. जब ऐसा कई बार हुआ तो उदयसेन को भाई से नफरत होने लगी.

भाई से चिढ़े उदयसेन ने एक दिन भाभी पूनम से कहा कि पापा बंटवारे के लिए कह रहे थे, लेकिन वह बड़े पापा से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वह अपने अन्य भाइयों से डरते हैं कि कहीं उन के परिवार की हत्या कर के उन की संपत्ति न हड़प लें. पूनम ने यह बात डा. धन्नी कुमार को बताई तो क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपने पापा से बात की. तब उन्होंने चांदमूरत को बुला कर उन से बात की. बड़े भाई की बात सुन कर चांदमूरत को जैसे काठ मार गया, क्योंकि उन्होंने इस तरह की कोई बात कही ही नहीं थी. कहने की छोड़ो, इस तरह की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी. बेटे की इस बेहूदगी से उन का सिर झुक गया था.

इस के लिए उन्होंने पूरे परिवार के सामने उदयसेन को जलील ही नहीं किया, बल्कि जम कर पिटाई भी की. इस के बाद उस से परिवार वालों से माफी भी मंगवाई. मरता क्या न करता, उदयसेन ने सब से माफी मांगी. लेकिन इस सब से उस ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उदयसेन गोरखपुर आ गया. उस के साथ जो हुआ था, इस सब के लिए वह डा. धन्नी कुमार और डा. पूनम को दोषी मान रहा था. इसलिए उस ने उन से अपने अपमान का बदला लेने का मन बना लिया. वह उन दोनों की हत्या कर देना चाहता था. उस ने दोनों की हत्या की कई बार कोशिश भी की, लेकिन अपने इस खतरनाक मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ.

भैया और भाभी की हत्या करने में असफल होने के बाद उस ने दोस्तों से मदद मांगी. तब उस के दोस्तों ने उसे समझाया कि यह सब जो भी हुआ है, वह पूनम भाभी की वजह से हुआ है, इसलिए सजा उसे ही मिलनी चाहिए. अगर तुम ने उस की हत्या कर दी तो उसे सजा का पता कैसे चलेगा, इसलिए तुम उस के किसी ऐसे को मार दो कि वह जब तक जिंदा रहे, उस की याद में तड़पती रहे. शातिर उदयसेन को पूनम के मायके वालों की याद आ गई. उस ने उस के मायके वालों को निशाने पर लिया और तय कर लिया कि जो भी करेगा, अकेले करेगा. उसे पता था कि पूनम के मायके में मातापिता और एक बहन तथा एक भाई रहता है. लेकिन कभी वह उन के यहां गया नहीं था. योजना बनाने के बाद पहली बार वह 27 दिसंबर, 2006 की शाम उन के यहां पहुंचा.

दामाद का चचेरा भाई था, इसलिए उसे काफी सम्मान दिया गया. बढि़या खाना बना कर खिलाया गया. खाने के बाद बैठक के बैड को खिसका कर एक फोल्डिंग बिछाई गई. फोल्डिंग पर अभय लेटा तो बैड पर उदयसेन सोया. चंद्रायन प्रसाद पत्नी के साथ अपने कमरे में चले गए तो सुमन अपने कमरे में जा कर सो गई. जब सभी सो गए तो उदयसेन उठा और चंद्रायन प्रसाद  के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी और साथ लाए पेचकस से अभय की हत्या कर दी. नफरत की आग में जल रहे उदयसेन ने अभय की हत्या तो कर दी, पर बाद में उसे खयाल आया कि अब उस की पूरी जिंदगी जेल में कटेगी, क्योंकि पूरे घर को पता है कि इस कमरे में अभय के साथ वही सोया था. खुद को जेल की सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए उस ने सभी को खत्म करने का मन बना लिया.

इस के बाद उस ने चंद्रायन प्रसाद के कमरे के बाहर की सिटकनी खोली तो खट की आवाज सुन कर अंदर से उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

जवाब में उदयसेन ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं उदयसेन, जरा देखिए तो अभय को न जाने क्या हो गया है?’’

बेटे के बारे में सुन कर चंद्रायन प्रसाद उस के कमरे में पहुंचे और झुक कर देखने लगे, तभी उदयसेन ने पेचकस से उन पर भी हमला कर दिया. वह जोर से चीखे तो उन की इस चीख से शुभावती और सुमन की आंखें खुल गईं. दोनों भाग कर कमरे में आईं तो देखा चंद्रायन प्रसाद फर्श पर पड़े तड़प रहे थे और उदयसेन उन की पीठ पर सवार उन की कनपटी पर पेचकस से वार कर रहा था. मांबेटी के होश उड़ गए. चंद्रायन प्रसाद को बचाने के लिए मांबेटी उदयसेन पर टूट पड़ीं. सुमन उस के बाल पकड़ कर खींचने लगी तो शुभावती कमीज पकड़ कर खींचने लगीं. इस तरह तीनों गुत्थमगुत्था हो गए. उदयसेन को लगा कि उस का बचना मुश्किल है तो उस ने मांबेटी पर भी हमला बोल दिया.

मांबेटी निहत्थी थीं और उस के पास पेचकश था. उसी से उस ने मांबेटी को भी बुरी तरह से घायल कर दिया. वे दोनों भी घायल हो कर फर्श पर गिर पड़ीं तो उस ने एकएक के पास जा कर देखा कि कौन जीवित है और कौन मर गया? चंद्रायन प्रसाद, सुभावती और सुमन की सांसें चल रही थीं. उदयसेन अपने खिलाफ कोई भी सुबूत नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने पैंट की जेब से ब्लेड निकाली और चारों का गला काटने की कोशिश की. जब उसे लगा कि चारों मर गए हैं तो उस ने बाथरूम में नहाया, क्योंकि उस के कपड़ों में ही नहीं, शरीर में भी खून लग गया था.

अपने कपड़े उस ने पौलीथिन में रख लिए और अभय के कपड़े पहन कर चारदीवारी फांद कर बाहर आ गया. चलते समय उस ने चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन और अलमारी में रखे कुछ रुपए और गहने निकाल कर पौलीथिन में रख लिए थे. रात उस ने रेलवे स्टेशन पर गुजारी. स्टेशन पर जाते हुए उस ने गहने निकाल कर कपड़ों की पोटली महाराजगंज की ओर जा रहे एक ट्रक पर फेंक दी थी. मोबाइल फोन का सिम निकाल कर उस ने रास्ते में फेंक दिया था. रात स्टेशन पर बिता कर सुबह 7 बजे वह मोहद्दीपुर स्थित अपने कमरे पर आ गया. सुबह अखबारों से पता चला कि चंद्रायन प्रसाद बच गए हैं तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने अस्पताल जा कर उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन पुलिस सुरक्षा सख्त होने की वजह से वह उन तक पहुंच नहीं सका.

उदयसेन गुप्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था. पुलिस ने आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया. 9 सालों तक यह मुकदमा चला. पुलिस ने उस के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए. उसी का नतीजा था कि उदयसेन को 4 हत्याओं का दोषी ठहराते हुए 30 मार्च, 2015 को आजीवन कारावास के साथ 1 लाख रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त उदयसेन जेल में बंद था. उस के वकील रामकृपाल सिंह उस की जमानत के लिए हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे. Gorakhpur Crime

कथा अदालत के फैसले पर आधारित.

Hindi Crime Stories: एक थी प्रिया

Hindi Crime Stories: डा. प्रिया की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन उन के और डा. कमल के संबंध पतिपत्नी की तरह नहीं बन पाए थे. आखिर इस की वजह क्या थी, आगे इस का परिणाम क्या हुआ?  दिल्ली के थाना नबी करीम पुलिस की जीप 18 अप्रैल की रात करीब 2 बजे पहाड़गंज स्थित होटल प्रेसीडेंसी पहुंची तो मैनेजर बाहर ही मिल गया. थानाप्रभारी जीप से जैसे ही उतरे, मैनेजर ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, हमारे होटल के कमरा नंबर 302 में ठहरी डा. प्रिया वेदी  के कमरे में कोई हलचल नहीं हो रही है. हमें डर लग रहा है कि उस में कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?’’

‘‘डा. प्रिया वेदी कौन हैं, होटल में कब से ठहरी हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘वह अकेली ही थीं या उन के साथ कोई और भी था?’’

‘‘सर, आज ही दिन के साढ़े बारह बजे के आसपास वह अकेली ही आई थीं. सामान के नाम पर उन के पास एक ट्रौली बैग था. पहचान पत्र के रूप में उन्होंने राजस्थान ट्रांसपोर्ट अथौरिटी की ओर से जारी किया गया ड्राइविंग लाइसेंस दिया था.’’

‘‘वह जब से आईं, बाहर बिलकुल नहीं निकलीं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कमरे में जाने के बाद से उन्होंने न तो रूम अटेंडेंट को बुलाया है और न ही कमरे से बाहर निकली हैं. सर, जब वह यहां आई थीं तो कुछ तनाव में लग रही थीं. रिसैप्शन पर ही मैं ने उन्हें ठंडा पानी मंगा कर पिलाया था, ताकि वह रिलैक्स महसूस करें. मैं ने उन से पूछा भी था, पर उन्होंने कुछ बताया नहीं था. वैसे भी किसी से उस की व्यक्तिगत बातों के बारे में ज्यादा नहीं पूछा जा सकता.’’

‘‘इस बीच आप ने उन के बारे में पता करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘सर, आधी रात तक जब उन के कमरे से किसी तरह की सर्विस की कोई काल नहीं आई तो मैं ने रूम अटेंडेंट को भेजा कि जा कर मैडम से पूछ लो कि उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है. लेकिन बारबार बेल बजाने के बाद भी जब उन्होंने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे शक हुआ और मैं ने पुलिस को सूचना दे दी.’’ मैनजर ने एक ठंडी सांस ले कर कहा.

‘‘चलो, मुझे वह कमरा दिखाओ, जिस में डा. प्रिया वेदी ठहरी हुई हैं.’’

मैनेजर पुलिस टीम को तीसरी मंजिल स्थित कमरा नबंर 302 पर ले गया. थानाप्रभारी ने कमरे का दरवाजा खुलवाने की काफी कोशिश की. जब दरवाजा खुलवाने की उन की हर कोशिश नाकामयाब हो गई तो उन्होंने कहा, ‘‘अब कमरे का दरवाजा तोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.’’

मैनेजर ने रिसैप्शन से 2-3 कर्मचारियों को बुलवा लिया तो उन्होंने कमरे के दरवाजे पर जोरजोर धक्के दिए, जिस से अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर कमरे में पड़ा बैड खाली मिला. कमरे से अटैच बाथरूम खोला गया तो उस में डा. प्रिया खून से लथपथ पड़ी थीं. उन के एक हाथ की नस कटी थी तो दूसरे में ड्रिप लगी थी. होटल मैनेजर ने बताया कि यही डा. प्रिया वेदी हैं. थानाप्रभारी ने डा. प्रिया की नब्ज देखी तो वह थम चुकी थी. उन में जीवन का कोई भी लक्षण नहीं था. थाना नबी करीम पुलिस डा. प्रिया की लाश का निरीक्षण कर ही रही थी कि उन के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर थाना डिफेंस कालोनी पुलिस भी उन के घर वालों के साथ होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई.

घर वालों ने भी उस लाश की शिनाख्त डा. प्रिया के रूप में कर दी. उन्होंने बताया कि यह दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट थीं और अपने पति डा. कमल वेदी के साथ एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहती थीं. पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो डा. प्रिया वेदी का लिखा साढ़े 3 पेज का एक सुसाइड नोट मिला. होटल के कमरे का हर सामान अपनी जगह रखा था. डा. प्रिया का भी सामान सुरक्षित था. इस से साफ लग रहा था कि यह हत्या का नहीं, खुदकुशी का ही मामला है. पुलिस ने जरूरी काररवाई के बाद डा. प्रिया वेदी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इतनी काररवाई निपटातेनिपटाते सुबह हो गई थी.

19 अप्रैल को पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने डा. प्रिया की लाश घर वालों को सौंप दी तो उसी दिन उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अंतिम संस्कार में एम्स के भी कई डाक्टर शामिल हुए थे. वे डा. प्रिया की मौत को ले कर तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डा. प्रिया वेदी ने आत्महत्या की है. उन का कहना था कि वह बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थीं. साथी डाक्टरों से उन के काफी अच्छे संबंध थे. उन का कहना था कि उन्होंने अपने दिल में छिपे दर्द का  कभी किसी को अहसास नहीं होने दिया. डा. प्रिया एम्स में अगस्त, 2014 से एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के पद पर काम कर रही थीं. उन के पति डा. कमल वेदी भी एम्स में ही स्किन के डाक्टर थे. वह डा. कमल से एक साल जूनियर थीं.

होटल के कमरे में पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, उस में डा. प्रिया ने पति पर समलैंगिक होने का आरोप लगाया था. पुलिस की शुरुआती जांच में यह बात सामने भी आई है कि डा. प्रिया ने खुदकुशी करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर कई बातें लिखी थीं. डा. प्रिया ने फेसबुक पर लिखा था कि मैं पिछले 5 सालों से डा. कमल वेदी के साथ शादीशुदा जिंदगी बिता रही हूं, लेकिन हमारे शारीरिक संबंध नहीं बने, जो कि दांपत्य के लिए जरूरी होते हैं. शादी ही इसी के लिए होती है. मुझे एक फर्जी ईमेल आईडी मिली थी, जिस के द्वारा मेरे पति समलैंगिकों से बातें करते थे. मुझे जब इन सब बातों का पता चला तो मुझे प्रताडि़त किया जाने लगा.

उसी दिन डा. प्रिया के घर वालों ने दिल्ली के नबी करीम पुलिस थाने में डा. कमल के खिलाफ दहेज प्रताड़ना एवं अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करा दिया. दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जांच में मिले साक्ष्यों एवं डा. प्रिया के घर वालों के बयान के आधार पर 19 अप्रैल को डा. कमल को गिरफ्तार कर लिया. डा. प्रिया कौन थीं, कितने संघर्षों के बाद डाक्टर बन कर उन्होंने पिता का सपना पूरा किया था? इतना संघर्ष कर के जीवन को संवारने वाली डा. प्रिया ने आखिर आत्महत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए हमें जयपुर से शुरुआत करनी होगी.

राजस्थान की राजधानी जयपुर, जो गुलाबी नगर के नाम से मशहूर है, के चांदपोल बाजार में एक छोटी सी गली है, जिसे गोविंदरावजी का रास्ता कहते हैं. इसी रास्ते में कान महाजन बड़ के पास रामबाबू वर्मा रहते हैं. वह टेलरिंग यानी कपड़ों की सिलाई की दुकान से गुजरबसर करते थे. उन के 3 बच्चे थे, सब से बड़ा बेटा विजय, उस से छोटी बेटी प्रिया और सब से छोटा बेटा लोकेश. उन के तीनों ही बच्चे पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थे. रामबाबू वर्मा खुद तो ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, लेकिन वह बच्चों को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे. यही उन का सपना भी था, जिसे पूरा करने के लिए वह जम कर मेहनत कर रहे थे. उन का चूनेमिट्टी का मकान था. सीमित आय थी. जाहिर है, घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे. कपड़ों की सिलाई की आमदनी से किसी तरह परिवार की दालरोटी चल रही थी. बच्चे पढ़ने लगे तो खर्च बढ़ता गया.

लेकिन रामबाबू ने हिम्मत नहीं हारी. वह बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन दूनी और रात चौगुनी मेहनत करने लगे. पत्नी भी उन का साथ देती थीं. इस तरह बच्चों की पढ़ाई के लिए पतिपत्नी न दिन देख रहे थे न रात. पतिपत्नी की दिनरात की मेहनत रंग लाई और बड़े बेटे विजय का सिलेक्शन मैडिकल में हो गया. प्रिया उस से छोटी थी. भाई के सिलेक्शन के बाद उस ने भी डाक्टर बनने का मन बना लिया. पढ़ाई में वह तेज थी ही, भाई का सपोर्ट मिला तो उस ने भी मातापिता को निराश करने के बजाय उन के सपनों में रंग भर दिया.

प्रिया ने प्रीमैडिकल टैस्ट पास कर लिया. बड़ा बेटा विजय मैडिकल की पढ़ाई कर ही रहा था. रामबाबू वर्मा के लिए 2 बच्चों की मैडिकल की पढ़ाई का खर्च वहन करना मुश्किल था. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बैंक से बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया, लेकिन उन की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी. प्रिया का अजमेर के जेएलएन मैडिकल कालेज में दाखिला हुआ था. वह पूरी लगन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. बीचबीच में वह घर भी आती रहती थी. इस तरह चांदपोल की गली में प्रिया आइडियल गर्ल बन गई थी. क्योंकि पुराने से मकान में रह कर गरीबी में पलबढ़ कर वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब प्रिया एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर के डाक्टर बन गई. रामबाबू वर्मा के लिए वह सब से ज्यादा खुशी का दिन था. उन का सब से बड़ा सपना पूरा हो गया था. बड़े बेटे विजय के डाक्टर बनने से ज्यादा खुशी उन्हें प्रिया के डाक्टर बनने से हुई थी. इस के बाद 24 अप्रैल, 2010 को उन्होंने प्रिया की शादी डा. कमल वेदी से कर दी. डा. कमल वेदी राजस्थान के सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले महेश वेदी के बेटे थे. परिवार वालों की सहमति से दोनों की शादी धूमधाम से हुई थी. रामबाबू वर्मा के लिए खुशी की बात थी कि उन्हें डाक्टर बेटी के लिए डाक्टर दामाद भी मिल गया था. वह निश्चिंत थे कि बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.

दोनों की जोड़ी खूब जमेगी. प्रिया भी अपने ही पेशे का जीवनसाथी मिलने से खुश थी. वह जानती थी कि एक डाक्टर की भावना को दूसरा डाक्टर ही अच्छी तरह समझ सकता है. बेटी को डाक्टर बना कर और उस की शादी कर के रामबाबू वर्मा  एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए थे. अब उन के ऊपर छोटे बेटे लोकेश की जिम्मेदारी रह गई थी. लोकेश भी पढ़ाई में तेज था. वह बैंक की नौकरियों की तैयारी कर  रहा था. वह भी अपने प्रयासों में सफल हो गया और उसे बैंक में नौकरी मिल गई. फिलहाल वह कोटा में एक बैंक में प्रोबेशनरी अफसर है. डा. कमल वेदी को उसी बीच सन 2012 में दिल्ली के एम्स में नौकरी मिल गई. वह एम्स में स्किन के डाक्टर हैं. इस के बाद सन 2014 में डा. प्रिया भी एम्स में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के रूप में तैनात हो गईं. पतिपत्नी को एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहने के लिए मकान भी मिल गया था.

डा. प्रिया को भले ही एम्स में पति डा. कमल के साथ नौकरी मिल गई थी, लेकिन वह खुश नहीं थीं. डा. प्रिया के मायके वालों के अनुसार डा. कमल ने प्रिया को कभी पति का प्यार नहीं दिया. वह अपने वैवाहिक जीवन को ले कर परेशान रहती थी. जब इस बात की जानकारी रामबाबू को हूई तो उन्होंने कमल के पिता महेश वेदी से बात की. महेश वेदी ने रामबाबू को भरोसा दिलाया कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. डा. कमल ने भले ही प्रिया के वैवाहिक जीवन के सुनहरे सपनों को चूरचूर कर दिया था, लेकिन प्रिया अपने पति कमल से बेहद प्यार करती थी. वह न तो पति को छोड़ना चाहती थी और न ही अपने परिवार को टूट कर बिखरने देना चाहती थी.

करीब ढाई साल पहले रामबाबू वर्मा को जब बेटी पर हो रहे जुल्मों की जानकारी मिली तो प्रिया ने उन्हें मां की कसम दिला  कर चुप करा दिया था. वह चुपचाप मानासिक और शारीरिक अत्याचार सहन करती रही. डा. प्रिया ने फेसबुक पर पोस्ट लिख कर अपना दर्द बयां किया था. उन्होंने लिखा था कि शादी के 6 महीने बाद ही मुझे यकीन हो गया था कि मेरा पति डा. कमल समलैंगिक है और उस के कई लोगों के साथ समलैगिक संबंध हैं. उनहोंने लोगों के नाम भी फेसबुक पर लिखे थे. उन्होंने जब कमल के लैपटौप में उस के समलैंगिक संबंधों के सबूत दिखाए तो कमल ने कहा कि किसी ने उस का एकाउंट हैक कर के इस तरह की चीजें डाल दी हैं.

डा. प्रिया ने आगे लिखा था कि मैं सच जान चुकी थी. फिर भी मैं कमल से बेहद प्यार करती थी, लेकिन वह मेरे प्यार को समझ नहीं पाए. अगर हमारे समाज में ऐसे लोग हैं तो कभी उन से शादी मत कीजिए. अपने जीवन के अंतिम समय से कुछ घंटे पहले डा. प्रिया ने फेसबुक पर जो स्टेटस अपडेट किया था, उस में डा. कमल को गुनहगार बताया था. उन का कहना था कि वह कमल से बेहद प्यार करती थीं, इस के बावजूद उस ने उसे छोटीछोटी चीज के लिए तरसाया. केवल एक महीने पहले उस ने खुद को समलैंगिक माना. इस सब के बावजूद वह उस की मदद करना चाहती थीं, लेकिन वह उसे टौर्चर करता रहा.

इसी फेसबुक पेज पर डा. प्रिया ने एक रात पहले के वाकए का जिक्र करते हुए लिखा था, ‘तुम ने मुझे इतना अधिक टौर्चर किया है कि अब तुम्हारे साथ सांस भी नहीं ले सकती. तुम इंसान नहीं, राक्षस हो, क्योंकि तुम ने मेरी खुशी छीन ली. तुम्हारे जैसे लोग केवल लड़की और उस के घर वालों की भावनाओं से खेलते हैं. डा. कमल, मैं ने तुम से कभी कुछ नहीं चाहा था, क्योंकि मैं तुम्हें बेहद प्यार करती थी, जबकि तुम ने कभी मेरे प्यार की अहमियत नहीं समझी. कमल तुम मेरे गुनहगार हो. 18 अप्रैल की सुबह डा. प्रिया जब उठीं तो बेहद तनाव में थीं. बीती रात ही डा. कमल ने उस से झगड़ा किया था. वह फ्रेश हुईं और एक ट्रौली बैग में जरूरी सामान रख कर कुछ देर वह सोचती रहीं, फिर एकाएक मन को कठोर कर के अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी होने की बात कह कर घर से निकल पड़ीं.

सुबह करीब साढ़े 9 बजे प्रिया ने जयपुर में अपने पिता को फोन किया कि प्लीज पापा, जल्दी आ जाओ. आप नहीं आओगे तो मेरा मरा मुंह देखोगे. उसी दिन सुबह करीब 11 बजे प्रिया ने कोटा में रहने वाले अपने छोटे भाई लोकेश को फोन कर के यही बातें कही थीं. प्रिया की बातों से उस के घर वालों की चिंता बढ़ गई थी. रामबाबू वर्मा तुरंत घर वालों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. दूसरी ओर कोटा से छोटा भाई लोकेश भी अपने एक कजिन के साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा था. रास्ते से उन्होंने कई बार प्रिया को फोन किए, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इस बीच प्रिया का भी कोई फोन नहीं आया.

जब रामबाबू वर्मा, लोकेश और उन के अन्य रिश्तेदार दिल्ली पहुंचे तो रात हो चुकी थी. प्रिया के बारे में जब उन्हें कोई सही सूचना नहीं मिली तो सभी थाना डिफेंस कालोनी पहुंचे और प्रिया की गुमशुदगी दर्ज करने का अनुरोध किया. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर प्रिया के मोबाइल के आधार पर उस की लोकेशन पता की तो वह पहाड़गंज इलाके में मिली. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि वह पहाड़गंज में होंगी. पुलिस ने प्रिया के पति डा. कमल एवं घर के अन्य लोगों से भी बात की. वे भी प्रिया के बारे में कुछ नहीं बता सके थे. इस के बाद पुलिस मिली मोबाइल लोकेशन के आधार पर रामबाबू वर्मा, लोकेश एवं डा. कमल आदि को साथ ले कर पहाड़गंज के होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई, जहां डा. प्रिया की लाश मिली.

पूछताछ में पता चला कि डा. प्रिया एवं डा. कमल के रिश्तों में इतनी दूरियां आ चुकी थीं कि इसी साल 26 जनवरी को जब जयपुर में प्रिया के छोटे भाई लोकेश की शादी थी तो उस में केवल प्रिया ही गई थी. लेकिन प्रिया ने अपने व्यवहार से किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि हालत यहां तक पहुंच चुकी है. बहरहाल, डा. प्रिया की मौत ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं. उस के घर वाले प्रिया को इंसाफ दिलाने की मांग कर रहे हैं. जयपुर के स्टैच्यू सर्किल पर प्रिया की याद में कैंडल मार्च भी निकाला गया. फेसबुक पर तेजी से वायरल होने के बाद डा. प्रिया का सुसाइड नोट उस में से हटा दिया गया. डा. प्रिया का वाल पोस्ट उस की मौत के बाद करीब साढ़े 3 हजार लोगों ने शेयर किया था. इस के बाद फेसबुक ने प्रिया की प्रोफाइल को रिमेंबरिंग प्रिया वेदी कर दिया, साथ ही उन का वाल पोस्ट फेसबुक से हटा दिया. Hindi Crime Stories

 

Gujarat Crime Story: पूत जब बना कपूत

Gujarat Crime Story: अदनान की बुरी आदतों से परेशान हो कर पिता ने उसे घर से ही नहीं निकाल दिया, बल्कि अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दिया. इस के बाद अपना हक पाने के लिए अदनान ने जो किया, क्या वह उचित था.रोज की तरह शुक्रवार 20 मार्च, 2015 की रात लगभग 8 बजे फर्नीचर सामग्री के व्यापारी खुजेमा बैगवाला अपनी दुकान बंद कर के मोटरसाइकिल से सैफीनगर स्थित अपने घर की ओर चल पड़े. अलग मोटरसाइकिल से उन के 2 कर्मचारी भी उन के साथसाथ चल रहे थे. 57 वर्षीय खुजेमाभाई ने जैसे ही अपने मोहल्ले में प्रवेश किया, अचानक एक मोटरसाइकिल उन के बराबर में आई, जिस पर 2 लोग सवार थे. मोटरसाइकिल चला रहे व्यक्ति ने हेलमेट पहन रखा था, जबकि पीछे बैठे व्यक्ति ने अपने चेहरे पर कपड़ा बांध रखा था.

उस के पीछे एक अन्य मोटरसाइकिल पर अपने चेहरों पर कपड़े बांधे 2 युवक और चल रहे थे. दोनों मोटरसाइकिलें खुजेमाभाई के करीब आईं तो उन चारों में से किसी ने चिल्ला कर कहा, ‘यही है खुजेमा?’ उस का इतना कहना था कि खुजेमाभाई कुछ समझ पाते, उन के बगल चल रही मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे व्यक्ति ने तमंचा निकाला और उन पर गोली चला दी. गोली खुजेमाभाई के बाएं कान के पास लगी. गोली लगते ही वह मोटरसाइकिल सहित सड़क पर गिर पड़े और बेहोश हो गए.

आसपास के लोग मामला समझ पाते, खुजेमाभाई पर हमला करने वाले दोनों मोटरसाइकिल सवार फरार हो गए. खुजेमाभाई के साथ चल रहे उन के दोनों कर्मचारी घबरा गए. तुरंत भीड़ लग गई. एंबुलैंस को फोन किया गया. एंबुलैंस आई, साथ आए डाक्टर ने खुजेमा की जांच की. गोली बाईं ओर कान के पास लगी थी, जिस से खून बह रहा था. खुजेमा की सांस चल रही थी. उन्हें तुरंत घटनास्थल से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित इंदौर के चोईराम अस्पताल ले जाया गया. खुजेमाभाई को तुरंत भरती कर के औपरेशन की तैयारी शुरू कर दी गई. घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी गई थी, जिस से घटनास्थल से संबंधित थाना जूनी के थानाप्रभारी पवन सिंघल तो अस्पताल पहुंचे ही, अन्य पुलिस अधिकारी भी धीरेधीरे वहां पहुंचने लगे. अस्पताल के डाक्टरों ने तुरंत औपरेशन कर के खुजेमाभाई के कान के पास फंसी गोली, जो खोखे सहित थी, निकाल लिया था.

खुजेमाभाई पर हमले की खबर जैसेजैसे सैफीनगर मोहल्ले में फैलती गई, लोग इकट्ठा होते गए. सैफीनगर में लगभग 95 प्रतिशत बोहरा समाज के लोग रहते हैं और खुजेमाभाई भी बोहरा समाज के ही हैं. खुजेमाभाई न केवल एक बड़े और प्रतिष्ठित व्यापारी थे, समाज में भी उन की काफी इज्जत थी. वह मृदुभाषी होने के साथ समाज की सेवा के लिए भी हमेशा सब से आगे रहते थे. यही वजह थी कि पूरी रात उन की समाज के लोग अस्पताल में मजमा लगाने के साथसाथ वे पुलिस से जल्दी से जल्दी हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग करते रहे.

अगले दिन यानी 21 मार्च, दिन शनिवार की सुबह जब डाक्टरों ने खुजेमाभाई को खतरे से बाहर बताया तो उन के घर वालों को ही नहीं, समाज और पुलिस की भी जान में जान आई. अस्पताल में खुमेजाभाई का हालचाल पूछने वालों का तांता लगा था. लेकिन डाक्टरों ने साफ कह दिया था कि अभी वह किसी से नहीं मिल सकते. केवल घर के 2 लोग ही उन के पास रह सकते थे. वह भी इस शर्त पर कि कोई भी खुजेमाभाई से बात नहीं करेगा. इस के बावजूद अस्पताल के बाहर उन के समाज के लोगों की भीड़ लगी थी. बोहरा समाज के दबाव की वजह से पुलिस तेजी से हरकत में आ गई थी. थानापुलिस एवं क्राइम ब्रांच की टीमें जांच में जुट गई थीं. फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. सुधीर शर्मा ने खुजेमाभाई के कान के पास से निकली गोली देखी तो वह सिहर उठे. गोली खोखा समेत थी.

उन्होंने बताया कि यह गोली जिस तमंचे से चलाई गई थी, उस में कोई खराबी थी, वरना अगर यह गोली सही तरीके से सही तमंचे से चली होती तो खुजेमाभाई के सिर के परखच्चे उड़ जाते. ऐसी गोली को ‘बर्स्ट बोल’ कहा जाता है. यह गोली पिस्टल से निकल कर आदमी के शरीर से टकराती है तो बम की तरह फट जाती है. उस स्थिति में आदमी का बचना बेहद मुश्किल होता है. 2 दिनों बाद खुजेमाभाई को आईसीयू से प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट किया गया तो वह स्वयं को काफी अच्छा महसूस कर रहे थे. इस के बाद डाक्टरों ने मिलने की इजाजत दे दी थी, लेकिन बात करने और एक समय में 2 से अधिक लोगों के अंदर जाने से साफ मना कर दिया था.

पुलिस अपने हिसाब से हमलावरों तक पहुंचने की पूरी कोशिश में लगी थी. दूसरी ओर बोहरा समाज के जो लोग पुलिस के आला अधिकारियों से ज्ञापन देने की तैयारी कर रहे थे, तभी उन्हें एक बड़ा झटका तब लगा, जब समाज में हो रही यह खुसुरफुसुर उन के कानों में पड़ी कि खुजेमाभाई पर परिवार के ही किसी सदस्य ने हमला किया है या फिर किराए के हमलावरों से कराया है. इस के बाद समाज के लोगों ने पुलिस अधिकारियों से मिलने का अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया. थानाप्रभारी पवन सिंघल को जांच के दौरान अपने किसी मुखबिर से पता चला था कि खुजेमाभाई का बड़ा बेटा अदनान इस घटना के लिए जिम्मेदार हो सकता है.

क्योंकि उस की अपने पिता से गहरी अनबन चल रही थी. इस के बाद पवन सिंघल ने अदनान को उस के घर से उठवा लिया. थाने में उस से पूछताछ की गई तो वह अकड़ गया, ‘‘मेरे ही बाप को गोली मारी गई है और आप लोग हमलावरों को पकड़ने के बजाय मुझे ही पकड़ लाए हैं.’’

लेकिन ज्यादा समय तक अदनान की अकड़ कायम नहीं रह सकी. जब पुलिस ने अपने सवालों से उसे घेरा तो वह टूट गया. उस ने पिता को जान से मरवाने की जो साजिश रची थी, उस का अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने पिता की हत्या की जो साजिश रची थी, उस की पूरी कहानी पुलिस को सुना दी, जो कुछ इस तरह थी. इंदौर के मोहल्ला सैफीनगर में रहने वाले बोहरा समाज के खुजेमा बैगवाला की 3 संतानें थीं, 27 साल का बड़ा बेटा अदनान, उस से छोटा 22 साल का अली अकबर और सब से छोटी 12 साल की बेटी. खुजेमाभाई का फर्नीचर सामग्री का विशाल शोरूम इंदौर के महंगे इलाके सपना संगीता रोड पर था, जिस में फोम, रैक्सीन, कपड़े आदि मिलते थे.

उन के इस शोरूम का नाम एलिगेंट फोम एंड फर्निशिंग प्रा.लि. था. खुजेमा ने अपनी सूझबूझ से कारोबार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की थी. कई नौकरों और अपने बड़े बेटे अदनान के साथ वह अपने इस शोरूम को चला रहे थे. कारोबार बढि़या चल रहा था, किसी चीज की कमी नहीं थी. दौलत की रेलमपेल थी. लेकिन कभीकभी अधिक पैसा भी अभिशाप बन जाता है. कुछ ऐसा ही खुजेमाभाई के साथ भी हुआ. उन का बड़ा बेटा अदनान गलत संगत में पड़ गया. उस की गलत आदतों और अनापशनाप खर्च को देख कर खुजेमाभाई चिंतित रहने लगे थे.

उन्होंने अदनान को खूब समझाया कि वह गलत संगत और गलत आदतें छोड़ दे. पिता के आगे वह आज्ञाकारी बेटे की तरह सिर झुकाए उन की हिदायतें सुनता रहता और भविष्य में कोई गलत काम न करने की बात भी कहता, लेकिन आगे से हटते ही वह सब भूल जाता. परेशान हो कर खुजेमाभाई ने अदनान पर आर्थिक पाबंदियां लगानी शुरू कर दीं. इस से अदनान सुधरने के बजाए और उग्र हो गया. परिणामस्वरूप बापबेटे में तकरार होने लगी. उसी बीच अदनान को एक लड़की से प्यार हो गया और वह उस से शादी करने के बारे में सोचने लगा. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने साफ मना कर दिया.   इस की वजह थी अंधविश्वास. वैसे तो वह लड़की उन्हीं की बिरादरी की थी, लेकिन उन्हें कहीं से पता चला था कि उस के घर वाले जादूटोना करते हैं, इसीलिए उन्होंने शादी से मना कर दिया था. यह सन 2012 की बात थी.

खुजेमाभाई ने अदनान को भले ही पैसे देने बंद कर दिए थे, लेकिन उस के खर्च में कोई कमी नहीं आई थी. अब वह अपने खर्च के लिए जानपहचान वालों से कर्ज लेने लगा था. कुछ दिनों बाद कर्ज देने वालों के तकादे आने लगे तो परेशान हो कर खुजेमाभाई ने अदनान को अपनी प्रौपर्टी से बेदखल कर दिया. वह सब कुछ बरदाश्त कर सकते थे, लेकिन बदनामी उन्हें बरदाश्त नहीं थी. घरपरिवार से बेदखल होने के बाद अदनान को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा. उस के पास बैंक में भी ज्यादा पैसे नहीं थे. घर से निकाले जाने के बाद सब से पहले तो उस ने अपने रहने के लिए एक बेडरूम का छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया.

इस के बाद अपने बचपन के अजीज दोस्त अली असगर से सलाहमशविरा कर के साझे में कोई कारोबार करने का विचार किया. आखिर थोड़ीबहुत जो पूंजी थी, उस से दोनों ने रियल एस्टेट एम.सी. एक्स एवं कपड़ों का कारोबार करने की बात की. अली असगर भी अच्छी हैसियत वाला था. उस के पिता हकीम थे. हकीमी शफाखाना यूनानी के नाम से इंदौर की घनी आबादी वाले मारोठया बाजार में उन का यह शफाखाना पुरखों के समय से चला आ रहा था. चूंकि यहां भी बोहरा समाज की आबादी एवं दुकानें अधिक हैं, इसलिए इसे बोहरा बाजार के नाम से भी जाना जाता है. उन के इस शफाखाने की एक शाखा मुंबई में भी है, जहां अली असगर के पिता हकीम सादिक अली हर महीने की 5 से 10 तारीख तक मरीजों को देखते हैं.

संयोग से अदनान और अली असगर का कारोबार चल निकला. ठीकठाक कमाई होने लगी तो अदनान ने किराए का फ्लैट छोड़ कर अपना एक बड़ा फ्लैट खरीद लिया. इस के बाद अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ अपनी प्रेमिका से शादी कर ली और हनीमून मनाने के लिए स्विटजरलैंड गया. इतना सब होने के बाद भी अदनान की बुरी आदतों ने पीछा नहीं छोड़ा. जबकि दोस्त और पार्टनर अली असगर ने भी उसे बहुत समझाया, लेकिन उस पर दोस्त के समझाने का भी जरा असर नहीं हुआ. हालांकि कारोबार में होने वाले फायदे को वे आधाआधा बांट लेते थे. अदनान अपने हिस्से से ही अपनी जरूरी और गैरजरूरी जरूरतें पूरी करता था.

अदनान ने एक आल्टो कार एवं हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल खरीद ली थी. इस के बाद 2 बातें हुईं. एक तो उन के कारोबार में नुकसान होने लगा, दूसरे इस नुकसान की भरपाई के लिए वे कर्ज लेने लगे. धीरेधीरे यह कर्ज बढ़तेबढ़ते 75 लाख रुपए तक पहुंच गया. अली असगर ने तो अपनी साख बचाए रखी, लेकिन अदनान बुरी आदतों की वजह से अपनी साख नहीं बचा सका. नुकसान और कर्ज की वजह से उन का साझे का यह कारोबार बंद हो गया. कर्ज देने वालों के तकादे बढ़ने लगे तो अदनान परेशान रहने लगा. तब अली असगर ने उसे सलाह दी कि वह पिता से माफी मांग कर कर्ज चुकाने के लिए पैसा या जायदाद में हिस्सा मांग ले. अदनान अकेला नहीं जाना चाहता था, इसलिए उस ने उस से भी साथ चलने को कहा. लेकिन अली असगर ने यह कह कर मना कर दिया कि इस मामले में वह बीच में नहीं पड़ना चाहता.

मरता क्या न करता, अदनान पत्नी को साथ ले कर जायदाद में हिस्सा मांगने अपने पिता के घर पहुंच गया. लेकिन खुजेमाभाई ने साफ कह दिया कि न वह हिस्सा देंगे और न किसी तरह की मदद ही करेंगे. उन्होंने अदनान की पत्नी को भी बहू मानने से मना कर दिया था. अदनान मायूस हो कर लौट आया. यह 4-5 महीने पहले की बात थी. मायूसी और परेशानियों ने खतरनाक मनसूबों को जन्म देना शुरू कर दिया. खुजेमाभाई के पास बड़ा कारोबार ही नहीं, अथाह धनदौलत और काफी जमीनजायदाद थी. उन्हें अपने छोटे बेटे अली अकबर से भी कम ही उम्मीद थी. वह भी शानोशौकत से रहता था. वैसे खुजेमाभाई को इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए था,  क्योंकि अली अकबर अभी बच्चा ही तो था. लेकिन खुजेमाभाई उस से ज्यादा अपने वफादार मैनेजर हुसैन पर भरोसा करते थे.

कहने को तो हुसैन खुजेमाभाई का नौकर था, लेकिन अब वह परिवार का एक अहम सदस्य बन चुका था और एकएक पाई का हिसाब रखता था. खुजेमाभाई और हुसैन ने अपने कारोबार पर ऐसी पकड़ बना रखी थी कि एक तिनका भी इधर से उधर नहीं हो सकता था. जब अदनान को पता चला कि उस के पिता अपनी सारी संपत्ति का वारिस मैनेजर हुसैन को बनाने वाले हैं तो उस का दिमाग खराब हो गया. फिर जैसी कहावत है कि ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ वैसा ही अदनान ने पिता खुजेमाभाई को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली.

अदनान ने बाजार में पिता की हैसियत का लाभ लेते हुए एक कारोबारी से 5 लाख रुपए उधार लिए. ये रुपए उस ने एक ऐसे गिरोह को देने के लिए लिए थे, जो रुपए ले कर हत्याएं करता था. उस ने उन रुपयों में से उस गैंग को पिता की हत्या के लिए ढाई लाख रुपए एडवांस दे दिए. बाकी रकम काम होने के बाद देने की बात हुई. उस गैंग ने रुपए तो ले लिए, पर काम नहीं किया. अदनान उन से जब भी काम की बात करता, वे यही कहते कि उस का काम हो जाएगा. अदनान उन से जबरदस्ती भी नहीं कर सकता था. मजबूर हो कर अदनान ने किसी दूसरे गिरोह से बात की. इस दूसरे गिरोह से खुजेमा के मुनीम सुरेश यादव ने बात कराई थी. किसी बात से नाराज हो कर वह खुन्नस में अदनान से मिल गया था.

खुजेमा की हत्या करने के लिए सुरेश अदनान को निमरानी गांव के एक बाबा के पास ले गया, जो जादूटोना से ले कर हत्या तक करवाता था. बाबा ने अदनान को धरमपुरी के रहने वाले कुख्यात गुंडे इदरीस का मोबाइल नंबर दे दिया. इदरीस ने अदनान को इंदौर के पिपली बाजार के रहने वाले विशाल उर्फ सोनू पहलवान से मिलवाया. सोनू ने खुजेमा भाई की हत्या के लिए 25 लाख रुपए मांगे. एडवांस में भी उस ने आधे पैसे देने को कहा, तब अदनान ने अपनी आल्टो कार एवं हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल को 3 लाख रुपए में बेच कर, बाकी रुपए इधरउधर से ले कर 12 लाख रुपए की व्यवस्था कर के सोनू को दे दिए.

पैसे मिलने के बाद सोनू ने अपने गुर्गों को तैयार किया और खुद भी कार से खुजेमाभाई की रेकी करने लगा. पूरी तैयारी कर लेने के बाद 20 मार्च, 2015 को खुजेमाभाई की हत्या की तैयारी कर ली गई. उस दिन उन की निगरानी में करीब दरजन भर लोग लगे थे. खुजेमाभाई का घर दुकान से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर था. 8 बजे दुकान बंद कर के वह घर के लिए रवाना हुए. उन के निकलते ही मुनीम सुरेश यादव ने अदनान को सूचना दे दी कि खुजेमाभाई रवाना हो गए हैं, उन के साथ अलग मोटरसाइकिल से 2 कर्मचारी भी हैं. खुजेमाभाई अपने घर पहुंचते, उस के पहले ही शूटरों ने अपना काम कर दिया. यह संयोग ही था कि तमंचा और गोली ने धोखा दे दिया. पूछताछ में पता चला कि देशी पिस्तौल और 25 कारतूस अदनान ने इदरीस के माध्यम से जिला धार के गांव गुजरी के रहने वाले प्रताप सिंह से 50 हजार रुपए में खरीदा था. देशी पिस्तौल 315 बोर का था.

लेकिन इदरीस ने प्रताप सिंह को मात्र 15 हजार रुपए ही दिए थे. प्रताप सिंह पुलिस में वांटेड था और उस पर 5 हजार रुपए का इनाम था. उधर जब डाक्टरों ने खुजेमाभाई को पूरी तरह खतरे से बाहर बताया तो अदनान सन्न रह गया. उस के किए पर पानी फिर गया था. शूटरों से पिस्तौल और बचे कारतूस वापस लिए और खुद ही पिता को मारने का निश्चय ही नहीं किया, बल्कि पिस्तौल ले कर अस्पताल गया भी, लेकिन भीड़ लगी होने के कारण वह अपने इरादे में कामयाब नहीं हुआ. अदनान मौके की तलाश में था. लेकिन वह अपना काम कर पाता, उस के पहले ही पकड़ा गया. अदनान के पकड़े जाने के बाद मात्र 24 घंटे में थानाप्रभारी पवन सिंघल ने इस घटना में शामिल विशाल पहलवान, प्रताप सिंह, इदरीस, शहनवाज, मोहम्मद आसिफ, अब्दुल मन्नान, मुनीम सुरेश यादव को गिरफ्तार कर लिया, जबकि अली असगर, मोंटी, शूटर सलमान शेख एवं राजू दूधवाला फरार हो गए.

अली असगर पर आरोप है कि उस ने पिता की हत्या के लिए सुपारी देने के लिए अदनान को 5 लाख रुपए उधार दिए थे. पुलिस ने पूछताछ के बाद पकड़े गए सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां बाकी आरोपियों को तो जेल भेज दिया, लेकिन अदनान और विशाल उर्फ सोनू को साक्ष्य जुटाने के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान अदनान और विशाल की निशानदेही पर इंदौर से 80 किलोमीटर दूर धरमपुरी से अदनान की वह सफेद रंग की आल्टो कार, जिस का नंबर एमपी09सी ई4616 था, को बरामद कर लिया गया.

पुलिस ने वह देशी पिस्तौल और कारतूस भी बरामद कर लिए थे, जिस से खुजेमाभाई पर गोली चलाई गई थी. रिमांड समाप्त होने पर पुलिस ने अदनान एवं विशाल उर्फ सोनू पहलवान को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें भी जेल भेज दिया गया. 30 मार्च, 2015 को शूटर सलमान शेख और मोहम्मद जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया गया. ये दोनों कुछ दिनों तक शहर से बाहर कहीं छिपे थे. जब उन्हें लगा कि शायद उन का नाम सामने नहीं आया है, तब वे अपनेअपने घर वापस आ गए थे. उन के घर आते ही पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पकड़ लिया था. पुलिस ने वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली थी, जिस पर सवार हो कर शूटरों ने उन पर गोली चलाई थी.

पुलिस की अब तक की जांच में पता चला है कि खुजेमाभाई की हत्या की योजना में अदनान की मदद उस के दोस्त अली असगर ने भी की थी. यह बात उन के फोन के काल डिटेल्स से पता चली है. पुलिस अन्य अभियुक्तों की भी काल डिटेल्स निकलवा कर जांच कर रही है. शूटर सलमान शेख, इंदौर के नंदलाल पुरा, कबूतर खाना का रहने वाला था. जीशान और शूटर शेख ने अपना अपराध स्वीकार कर के मामले से जुड़ी सारी बातें विस्तार से पुलिस को बता दी हैं. दोनों ने बताया है कि उन्होंने जो भी किया है, वह अदनान, अली असगर और विशाल उर्फ सोनू पहलवान के कहने पर किया है. 31 मार्च को बजरिया के रहने वाले उन के साथी शहनवाज उर्फ गोलू कुरैशी को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने इन तीनों को भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया है.

अली असगर और राजू दूधवाला अभी पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं. कथा लिखे जाने तक जेल गए मुजरिमों में से किसी की भी जमानत नहीं हुई थी. पुलिस फरार अभियुक्तों की तलाश कर रही थी. Gujarat Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.