तंत्र मंत्र: पैसों के लिए दी इंसानी बलि – भाग 3

एक दिन की बात है. माखनदास मानिकपुरी ने सुभाषदास से जिज्ञासावश पूछा, ‘‘गुरु, क्या सचमुच कोई ऐसी अदृश्य ताकत है जो हमें रुपएपैसे से मालामाल कर सकती है? यह हनुमान सिक्का क्या है? इस के बारे में सुना तो मैं ने बहुत  है, मगर…’’

संशय भाव से माखनदास के पूछने पर सुभाषदास ने जवाब दिया, ‘‘अरे, अगरमगर क्या होता है, क्या तुम्हें इस बात में शक है कि भूतप्रेत और आत्मा होती है. नहीं न…’’

‘‘ नहीं, कभी नहीं. यह तो मानना पड़ेगा कि आत्मा होती है भूतप्रेत होते हैं.’’ माखनदास ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा.

‘‘तो फिर इस में क्या इंकार कि इन शैतानी शक्तियों को अगर प्रसन्न कर लिया जाए तो उस के जरिए कुछ भी कियाकरवाया जा सकता है. और सुनो, हनुमान सिक्का अगर किसी को मिल जाए तो आदमी लखपति क्या करोड़पति बन सकता है. ऐसी ही कितनी विधाएं और साधनाएं हैं. मैं इस दिशा में सफलता की ओर बहुत आगे बढ़ चुका हूं. मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही मुझे इन शक्तियों का आशीर्वाद मिलने लगेगा.’’ सुभाषदास ने आंखें घुमाते हुए कहा.

‘‘गुरु, फिर तो आप मालामाल हो जाओगे, अब मुझे विश्वास हो चला है कि यह ताकत होती है. मुझे जो भी कहोगे, मैं करूंगा.’’ माखनदास खुश होते हुए बोला.

‘‘मुझे बहुत अफसोस होता है कि तुझ जैसा समझदार आदमी क्यों बारबार रास्ते से भटक जाता है. तुम ने पहले भी मेरा साथ दिया था और मैं ने इस दिशा में कई सफलताएं पाई हैं. तभी तो लोगों का हम पर भरोसा भी बना है.’’ सुभाषदास ने समझाया.

‘‘गुरु, जब सफलता नहीं मिलती तो मन टूट जाता है, कितने ही लोगों को मैं ने आप से मिलवाया और आप ने उन को हनुमान सिक्के, 21 नाखून के रास्ते बतलाए, तंत्रमंत्र भी किया… मगर लाभ कहां मिला? ऐसे में आप ही बताओ, मन कैसे नहीं विचलित होगा. फिर भी मैं मानता हूं कि तंत्रमंत्र की इस विद्या से कोई भी लखपति, करोड़पति बन सकता है. कई बार साधना में असफलता भी मिलती है. उस के कई कारण हो सकते हैं. आप में कूवत भी है.’’ माखनदास बोला.

‘‘होगा, जरूर होगा. हमें सफलता भी मिलेगी, लोगों को हमारी साधना का भी लाभ मिलेगा. बस, भरोसा रखो. एक दिन तुम भी देखना, किस तरह मैं तंत्रमंत्र की ताकत से तुम को भी मालामाल कर दूंगा. असल में हमें जैसी साधना करनी चाहिए उस में चूक हो रही है. यह मैं ने एहसास कर लिया है. कल देखना, देखते ही देखते मानो छप्पर फट जाएगा और सोनाचांदी बरसने लगेगा.’’ सुभाषदास ने अपनी लच्छेदार बातों से माखनदास को प्रभावित कर दिया था.

‘‘ऐसा है तो गुरु, कुछ जल्दी करो. क्यों हम अपना समय नष्ट कर रहे हैं.’’ माखनदास बोला.

‘‘ठीक है, तुम ने एक बार मुझे सुरेश साहू से मिलवाया था, उसे तुम फिर ले कर आओ. और सुनो, इस बार जो तंत्रमंत्र मैं करूंगा वह किसी भी हालत में खाली नहीं जाएगा. हम दोनों मालामाल हो जाएंगे.’’ सुभाषदास बोला.

‘‘ठीक है गुरु, मैं आज ही सुरेश से मिलता हूं और उसे आप के पास ले आता हूं. बेचारा कितने सालों से धन की खोज में लगा हुआ है. आप ने भी उसे आश्वासन दिया था.’’

‘‘ठीक है, उसे जितनी जल्दी हो सके लाओ, हम मुरू पथराली खार में तंत्र साधना करेंगे. यह साधना बहुत महत्त्वपूर्ण होगी और सफलता मिलने की पूरी शतप्रतिशत गारंटी है.’’

अगले ही दिन माखनदास ने सुरेश कुमार साहू की सुभाषदास से मुलाकात करवा दी. खरकेन में संतराम साहू का बड़ा बेटा सुरेश कुमार साहू सुभाषदास से मिल कर काफी प्रभावित हुआ. उस के सामने ही माखनदास ने कहा, ‘‘गुरु, यह हमारे गांव के खूब पैसे वाले हैं. पूरा परिवार सुखीसंपन्न और मानमर्यादा वाला है. अभी इन की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं है. मगर इन्हें विश्वास है कि इन के पुश्तैनी घर में गड़ा धन रखा हुआ है. आप कृपा कर दो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

सुभाषदास मानिकपुरी ने माखनदास की बातें सुन कर सुरेश साहू की ओर अपलक देखते हुए कहा, ‘‘मैं यहां बैठेबैठे सब ठीक कर सकता हूं. मैं देख रहा हूं कि तुम आने वाले समय में बहुत पैसे वाले बनने वाले हो, तुम्हारे मकान के नीचे खूब सोनाचांदी छिपा हुआ है, जो तुम्हारे पूर्वजों का है.’’

यह सुन कर सुरेश तांत्रिक सुभाषदास मानिकपुरी के पैरों पर गिर पड़ा और सविनय कहा, ‘‘गुरुदेव, हम पर कृपा करो. हम तो बरबाद हो गए हैं. अगर वह धन हमें मिल जाएगा तो हमारी जिंदगी संवर जाएगी. हमारे घर में खुशियां लौट आएंगी. हमारे कर्ज चुकता हो जाएंगे.’’

सुभाषदास ने सुरेश की अधीरता को भांपते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारी मदद अवश्य करूंगा. इस के लिए मुझे तुम्हारे घर आ कर के एक तांत्रिक साधना करनी पड़ेगी.’’

यह सुन कर सुरेश ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘गुरुदेव, हमारे घर का माहौल ठीक नहीं है. आप का वहां आना सब पसंद नहीं करेंगे, मेरा भाई और उस की पत्नी तो इस पर थोड़ा भी यकीन नहीं करते हैं.’’

इस पर हंसते हुए सुभाषदास ने मधुर वाणी में कहा, ‘‘दुनिया में ऐसे कितने ही लोग हैं, जो इस पर विश्वास नहीं करते. मगर जब वे देखेंगे कि पैसों की हांडी बाहर आ गई है, तो खुशी से नाच पड़ेंगे.’’

‘‘हां, यह बात तो सही है, मगर मैं उन्हें कैसे समझाऊं. कोई रास्ता निकालो गुरुदेव.’’ सुरेश बोला.

‘‘देखो भाई, तुम अपने घर में बात करो और उन्हें समझाओ. देखो अगर तंत्र साधना की तैयारी करोगे तो भला तो तुम्हारे परिवार का ही है. उन्हें इस साधना को घर में सुखशांति बनाए रखने वाला कह कर मना लो.’’

सुभाषदास की बातें सुन कर सुरेश समझ गया कि कैसे अपने परिवार के सदस्यों को इस साधना के बारे में आश्वस्त करना है. यही फैसला कर सुरेश साहू अपने घर पहुंचा और अपने भाई रामप्रसाद से बात की. उस ने कहा, ‘‘भैया, अगर आप बुरा न मानें तो सिर्फ एक बार घर में तांत्रिक साधना करवा लें. मुझे विश्वास है कि आप को भी यकीन हो जाएगा.’’

सुरेश साहू की बातें सुन कर बड़े भाई रामप्रसाद साहू ने कहा, ‘‘भाई, मुझे तो इस सब में कोई विश्वास ही नहीं है, मगर तुम चाहते हो तो एक बार पूजापाठ करवा कर देख लो.’’

यह सुन कर कि सुरेश साहू खुश हो गया और 2 दिन बाद ही सुभाषदास और माखनदास को तांत्रिक साधना के लिए घर बुला लिया. उन के घर पर सुभाषदास और माखनदास आए और रात भर तंत्र साधना करते रहे. उन्हें विश्वास दिलाया कि जैसे ही यह सिद्धि पूरी होगी, उन के घर में गड़ा हुआ रुपया उन्हें मिल जाएगा.

यह अनुष्ठान 3 दिन तक चला, जो रात के वक्त ही किए गए. इस के बदले में दोनों तांत्रिकों ने मोटी फीस वसूली. उस के बाद भी जब गड़ा धन नहीं निकल पाया तब दोनों तांत्रिक बगलें झांकने लगे.

सुभाषदास ने माखन से कहा, ‘‘भाई, मुझे लगता है यहां कोई गड़ा धन है ही नहीं.’’

माखनदास ने धीरे से कहा, ‘‘फिर आगे क्या होगा, सुरेश साहू तो हाथ से निकल जाएगा.’’

सुभाषदास ने कहा, ‘‘मैं ने तंत्र साधना पूरी कर ली है, अगर रुपए होते तो हमें इशारा मिल जाता. अब अगर यहां रुपए नहीं हैं तो मैं या तुम क्या कर सकते हैं. इन लोगों को गलतफहमी है कि उन के पूर्वजों ने पैसा जमीन में  गाड़ कर रखा था.

‘‘यह भी हो सकता है कि आसपास के किसी जानकार तांत्रिक ने साधना कर पहले ही यहां का गड़ा धन दूसरे की जमीन में खींच कर निकलवा लिया हो. कई बार यह भी होता है कि गड़ा हुआ धन अपने आप कहीं दूसरी जगह चला जाता है.’’

माखन ने हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘हां, ऐसा हो सकता है, मैं ने भी सुना है.’’

                                                                                                                                        क्रमशः

तीन साल बाद खुला रहस्य – भाग 2

मां ने भले ही समझाया, लेकिन जयकुमार के प्यार में डूबी प्रीति को मां की बात समझ में नहीं आई. परेशान हो कर रीना ने सारी बात पति को बता दी. बेटी की आशिकी के बारे में सुन कर देवेंद्र तिलमिला उठा. वह मकान मालिक गंजू से मिला और उन से कहा कि वह जयकुमार को घर आने से मना करें, क्योंकि वह उस की बेटी प्रीति को बरगला रहा है.

‘‘आप का कहना ठीक है, लेकिन अपने किसी रिश्तेदार को मैं घर आने से कैसे रोक सकता हूं. आप अपनी बेटी को थोड़ा संभाल कर रखिए.’’ मकान मालिक गंजू ने कहा.

गंजू की इस बात से देवेंद्र ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. अब वह मकान मालिक से तो कुछ नहीं कह सकता था, लेकिन जयकुमार उसे जब भी मिलता, उसे धमकाता कि वह जो कर रहा है, ठीक नहीं है. वह उस की बेटी का पीछा छोड़ दे वरना उसे पछताना पड़ सकता है. लेकिन जयकुमार भी प्रीति के प्रेम में इस तरह डूबा था कि देवेंद्र की चेतावनी का उस पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. जबकि देवेंद्र मन ही मन बौखलाया हुआ था.

प्रीति की अर्द्धवार्षिक परीक्षा की तारीख आ गई तो वह परीक्षा देने अपने मामा प्रमोद कुमार के यहां अलीगढ़ चली गई. उस के मामा अलीगढ़ के थाना गांधीपार्क की बाबा कालोनी में रहते थे. घर वाले तो यही जानते थे कि प्रीति बस से अलीगढ़ गई है, लेकिन घर से निकलने से पहले उस ने जयकुमार को फोन कर दिया था, इसलिए वह मोटरसाइकिल ले कर उसे रास्ते में मिल गया था. उस के बाद प्रीति उस की मोटरसाइकिल से अलीगढ़ गई थी.

मामा के घर रह कर प्रीति ने परीक्षा दे दी. उसी बीच प्रीति के मामामामी अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी में चले गए तो घर खाली देख कर उस ने जयकुमार को फोन कर के अलीगढ़ बुला लिया. प्रेमिका के बुलाने पर घर में बिना किसी को कुछ बताए जयकुमार उस से मिलने अलीगढ़ पहुंच गया. प्रेमी को देख कर प्रीति का दिल बल्लियों उछल पड़ा. वह प्रेमी के आगोश में समा गई.

जयकुमार और प्रीति को उस दिन पहली बार एकांत और आजादी मिली थी, इसलिए उन्होंने सारी सीमाएं तोड़ दीं. ऐसे में जयकुमार ने प्रीति से वादा किया कि कुछ भी हो, हर हालत में वह उसे अपना कर रहेगा. प्रीति को भी प्रेमी पर पूरा विश्वास था. लेकिन उस दिन दोनों ने एक गलती कर दी. जयकुमार को प्रेमिका से मिल कर वापस आ जाना चाहिए था, लेकिन वह तो उस दिन और पिला दे साकी वाली स्थिति में था. प्रीति भी भूल गई थी कि अगले दिन मामामामी लौट आएंगे.

दोनों एकदूसरे में इस तरह खो गए कि सब कुछ भूल गए. याद तब आया, जब दरवाजे पर दस्तक हुई. प्रीति ने दरवाजा खोला तो मामामामी को देख कर सन्न रह गई. जयकुमार घर में ही था. प्रमोद ने अपने घर में जयकुमार को देखा तो पूछा, ‘‘यह कौन है?’’

‘‘यह जयकुमार है. मेरे मकान मालिक का साला.’’ प्रीति ने बताया.

प्रमोद को जब पता चला कि जयकुमार एक दिन पहले उस के घर आया था और प्रीति के साथ रात में रुका था तो उसे इस बात की चिंता हुई कि यह लड़का यहां क्यों आया था? उसे दाल में कुछ काला लगा तो उस ने जयकुमार को एक कमरे में बंद कर दिया और अपने बहनोई देवेंद्र को फोन कर के सारी बात बता दी. देवेंद्र उस समय उत्तराखंड के रुद्रपुर में था. उस ने कहा, ‘‘जब तक मैं आ न जाऊं, तब तक उसे उसी तरह कमरे में बंद रखना.’’

प्रीति डर गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि प्रेमी को छुड़ाने के लिए वह क्या करे. उस ने मामामामी से बहुत विनती की कि वे जयकुमार को छोड़ दें, लेकिन प्रमोद कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था, इसलिए उस ने जयकुमार को नहीं छोड़ा.

शाम को देवेंद्र अलीगढ़ पहुंचा तो उस ने पहले ही मन ही मन तय कर लिया था कि बेटी के इस प्रेमी के साथ उसे क्या करना है? उस ने रास्ते में ही शराब की बोतल खरीद ली थी और साले के यहां पहुंचने से पहले ही उस ने शराब पी कर मूड बना लिया था.

नशे में धुत्त वह साले के यहां पहुंचा तो जयकुमार को कमरे से निकाल कर बातचीत शुरू हुई. इस बातचीत में जयकुमार ने साफसाफ कह दिया कि वह प्रीति से प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है. यह सुन कर देवेंद्र का खून खौल उठा और वह जयकुमार की पिटाई करने लगा.

पिटाई करते हुए ही उस ने जयकुमार से कहा, ‘‘इस बार तुम ने जो किया, माफ किए देता हूं. अब दोबारा ऐसी गलती मत करना. चलो, हम तुम्हें दिल्ली जाने वाली बस में बिठा देते हैं. फरीदाबाद आऊंगा तो तुम्हारी मां से बात करूंगा.’’

प्यार में बड़ी उम्मीदें होती हैं, जयकुमार को भी लगा कि शायद प्रेमिका का बाप मां से बात कर के शादी करा देगा. लेकिन देवेंद्र के मन में तो कुछ और था. अब तक अंधेरा गहरा चुका था. देवेंद्र और प्रमोद जयकुमार को ले कर पैदल ही चलते हुए नगला मानसिंह होते हुए रेलवे लाइन की ओर नई बस्ती के अवतारनगर में रहने वाले अपने एक परिचित विनोद के घर पहुंचे.

विनोद ने चाय बनवाने के लिए कहा तो देवेंद्र ने सिर्फ पानी लाने को कहा. विनोद ने जयकुमार के बारे में पूछा तो देवेंद्र ने बताया कि यह उस के दोस्त का बेटा है. विनोद पानी ले आया तो प्रमोद और देवेंद्र ने शराब पी. नशा चढ़ा तो दोनों जयकुमार को ले कर रेलवे लाइन की ओर चल पड़े. अब तक काफी अंधेरा हो चुका था. जयकुमार कुछ समझ पाता, उस के पहले ही सुनसान पा कर दोनों ने उसे एक गड्ढे में गिरा दिया.

वह संभल भी नहीं पाया, उस के पहले ही दोनों ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी. इस के बाद दोनों वहीं बैठ कर ट्रेन के आने का इंतजार करने लगे. थोड़ी देर बाद उन्हें ट्रेन आती दिखाई दी तो जयकुमार की लाश को उठा कर दोनों ने पटरी पर रख दिया. ट्रेन लाश के ऊपर से गुजर गई तो वह कई टुकड़ों में बंट गई.

देवेंद्र और प्रमोद ने राहत की सांस ली, क्योंकि अब कांटा निकल गया था. लेकिन अब क्या करना है, अभी देवेंद्र को इस बारे में सोचना था. उस ने जो किया था, उसे भले ही किसी ने नहीं देखा था, लेकिन उसे होशियार तो रहना ही था. सुबह प्रीति ने उस से पूछा, ‘‘पापा, जयकुमार चला गया क्या?’’

देवेंद्र ने उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘तू अपनी पढ़ाई से मतलब रख. कौन कहां गया, इस से तुझे क्या मतलब?’’

प्रीति को शक हुआ. अगले दिन उस ने जयकुमार को फोन किया. लेकिन उस का तो फोन बंद था, इसलिए बात नहीं हो सकी. अब प्रीति की समझ में आ गया कि जयकुमार के साथ क्या हुआ है. वह बुरी तरह डर गई.

                                                                                                                                 क्रमशः

तंत्र मंत्र: पैसों के लिए दी इंसानी बलि – भाग 2

सुरेश हत्याकांड के सिलसिले में कड़ी पूछताछ में वह टूट गया. उस ने सुरेश के साथ हुई वारदात की सारी कहानी पुलिस को बता दी. उस के बाद पुलिस के सामने नई चुनौती सुभाषदास मानिकपुरी को ढूंढ निकालने की थी.

अपने साथी सुभाषदास के बारे में माखनदास ने सिर्फ इतना बताया था कि वह जबलपुर में कहीं सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा है. वह विवाहित है. उस की एक प्रेमिका भी है. उस की पत्नी से बहुत पहले ही संबंध टूट चुके थे. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाते हुए सुभाषदास की प्रेमिका का नाम मालूम कर लिया. फिर जबलपुर बिल्डिंग निर्माण वाले इलाके में गार्ड की नौकरी में लगे लोगों से पूछताछ करने लगी.

पुलिस ने पहले छत्तीसगढ़ के रहने वाले गार्ड्स के बारे में जानकारी जुटाई. इस में जबलपुर पुलिस की मदद से जांच टीम को सुभाषदास की भी जानकारी मिल गई. वह मैडिकल कालेज में बतौर गार्ड तैनात था. पुलिस उसे हिरासत में ले कर बिलासपुर आई. पहले तो उस ने नानुकुर की और गिरफ्तारी को ले कर सवालजवाब करने लगा. किंतु जब उसे सुरेश हत्याकांड और तांत्रिक अनुष्ठान के बारे में बताया, तब वह ठंडा पड़ गया.

पूछताछ के दौरान पुलिस ने उस का सामना माखनदास से करवा दिया. उसे देख कर वह समझ गया कि अब उस का बचना नामुमकिन है. वह सुरेश हत्याकांड से संबंधित सारी बातें बताने को तैयार हो गया. उस ने पुलिस के सामने अपने इकबालिया बयान में पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीके से बता दिया. साथ ही यह भी स्वीकार कर लिया कि सुरेश की हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी भी उसी की थी, जिसे वह अपने घर ले आया था. दोनों ढोंगी तांत्रिकों की अंधविश्वास की करतूतें कुछ इस प्रकार सामने आईं—

सुभाषदास मानिकपुरी (40 साल) मूलत: छत्तीसगढ़ के सरगुजा के बुंदिया लखनपुर का रहने वाला था. बचपन से ही उसे यह विश्वास हो गया था कि तंत्रमंत्र के द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है और खूब धन पाया जा सकता है. उस ने मात्र 8वीं तक की ही पढ़ाई की थी. जैसेजैसे बड़ा हुआ उस की तंत्रमंत्र और पराशक्ति की साधना में रुचि लेने लगा. वह वैसे लोगों से ही अधिक मिलता था, जो तंत्रमंत्र की बातें करते थे. उसे लगता था कि इस में इतनी अधिक शक्ति होती है कि इस से दुनिया का कोई भी काम चंद मिनटों में सिद्ध किया जा सकता है. यह बात उस के मनमस्तिष्क में काफी गहराई तक बैठ चुकी थी.

नतीजा यह हुआ था कि उस का मन कभी किसी काम में नहीं लगता था. वह लाखों रुपए कमाने के लिए तंत्रमंत्र सामानों हनुमान सिक्के, पीला कछुआ, रुद्राक्ष माला, पारद लिंग, अघोरपंथी, बारहसिंघा, हत्थाजोड़ी आदि को हासिल करने की कोशिश में लगा रहता था. जहां कभी कोई ऐसी बात होती या कोई इस सोच का व्यक्ति मिलता, तो वह उस के साथ हो लेता था. घंटों तंत्रमंत्र की चर्चा में लगा रहता था. उस से मिलनेजुलने वाले लोगों को हर समस्या का उपाय तांत्रिक साधन से बताता था.

जब उस के घर में लोगों ने देखा कि सुभाष हमेशा तंत्रमंत्र की दुनिया में रमा रहता है, तब उस की शादी करवा दी. मातापिता ने सोचा घरगृहस्थी की जिम्मेदारी आने पर उस में सुधार हो जाएगा. उस का विवाह सरगुजा के प्रेम नगर की एक युवती के साथ हुआ, लेकिन कुछ समय बाद ही पत्नी उस के व्यवहार और बातों से ऊब गई और उसे छोड़ कर अपने मायके चली गई.

सुभाषदास भी अपना गांव छोड़ बिलासपुर के कोरियापारा, सिरगिट्टी में जा कर रहने लगा. वहीं उस के एक महिला से प्रेम संबंध बन गए थे. अकेली रहने वाली महिला को लोग घरेलू उपचार करने वाली के रूप में जानते थे. वह उस के पास रहते हुए तंत्रमंत्र का काम भी करने लगा.

जब लोग महिला के पास किसी मर्ज को ठीक करवाने के लिए आते थे, तब वह उस से तंत्रमंत्र की बातें कर उस की ताकत के बारे में बताता था. दुख को दूर करने के लिए पूजापाठ करने की सलाह देता था. धीरेधीरे दूरदराज के लोगों के बीच वह तांत्रिक पूजापाठ करवाने वाले साधक के रूप में प्रसिद्ध हो गया था.

उसी दरम्यान उस की मुलाकात माखनदास मानिकपुरी से हो गई. वह भी उस का हमउम्र था और अमसैना, थाना सिरगिट्टी का निवासी था. उस की भी तंत्रमंत्र में गहरी रुचि थी. उस की इच्छा थी कि कोई ऐसा जादू हो जाए और कहीं से गड़ा हुआ अकूत खजाना हाथ लग जाए, ताकि उस की जिंदगी मजे में कटने लगे. उस ने भी सुभाषदास की  प्रसिद्धि और साधना के बारे में सुन रखा था. माखनदास उस के पास आनेजाने लगा. उस ने उसे एक तरह से अपना गुरु बना लिया था.

अब दोनों ही गुरुशिष्य बन कर आसपास के लोगों की हर समस्या का समाधान तंत्रमंत्र से करने का दावा करने लगे थे. यही उन के जीविकोपार्जन का जरिया बन गया था. पूजापाठ के बदले में पैसे लेते थे, लेकिन उन्हें बड़ा हाथ नहीं लगा था. दूसरों को तो धनसंपदा की बरसात का दावा करते थे, गड़े धन को ढूंढ निकालने का आश्वासन देते, लेकिन इस के लिए कोई वैसा इच्छुक व्यक्ति नहीं मिला था.

                                                                                                                                 क्रमशः

सिरफिरे का प्यार : बना गले की फांस – भाग 2

राहुल नेहा के प्यार में पागल था. यह देख नेहा ने राहुल को सच बताने की कोशिश की. लेकिन वह नाराज न हो जाए, इसे ले कर वह उलझन में थी. राहुल उस के साथ प्यार भरी बातें कर के भविष्य के ख्वाब बुनता तो वह उस की हां में हां मिलाती रहती थी.

सच्चाई सुन कर चौंक पड़ा राहुल

प्यारभरे लम्हों में एक दिन राहुल ने नेहा से अपने दिल की बात कही, ‘‘नेहा, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘कितना?’’ नेहा ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा तो वह बोला, ‘‘बहुत ज्यादा. तुम अपने घर पर बात करो, मैं हमेशा के लिए तुम्हें अपनी बना लूंगा. आखिर कब तक हम यूं ही मिलते रहेंगे.’’

‘‘मैं जानती हूं राहुल लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ राहुल ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हें एक सच भी बताना चाहती हूं.’’

‘‘ऐसा भी तुम्हारा कौन सा सच है जो मुझे पता नहीं है.’’

‘‘राहुल, प्लीज तुम नाराज नहीं होना.’’

‘‘ऐसी क्या बात है नेहा?’’ कहते हुए राहुल गंभीर हो गया.

‘‘मैं शादीशुदा और एक बच्चे की मां हूं.’’

‘‘क…क…क्या?’’ राहुल को झटका लगा. यह सुन कर वह जमीन पर आ गिरा. कुछ पलों के लिए वह विवेकशून्य हो गया. उसे ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी. नेहा ने इस खामोशी को तोड़ा, ‘‘हां, यही सच है राहुल, मैं भी तुम से प्यार करती हूं इसलिए सच बता कर तुम्हें नाराज नहीं करना चाहती थी.’’

सच जान कर राहुल को झटका तो बहुत बड़ा लगा, लेकिन वह नेहा को खोना भी नहीं चाहता था. उस ने बात को वहीं खत्म कर देना बेहतर समझा.

समय अपनी गति से चलता रहा. 3 जून को राहुल का जन्मदिन था. नेहा ने उसे एक होटल में पार्टी दी. राहुल पहले ही होटल पहुंच गया और बाहर खड़े हो कर नेहा के आने का इंतजार करने लगा.

उसे यह देख कर झटका लगा कि नेहा को वहां छोड़ने के लिए एक फौर्च्युनर कार आई थी. कार सवार से वह हंसहंस कर बातें कर रही थी. राहुल ने जन्मदिन तो मनाया लेकिन उस का माथा ठनक गया. पूछने पर नेहा ने बताया कि वह औटो से होटल आई थी.

शक ने बढ़ा दीं दूरियां

राहुल को शक हुआ कि नेहा के संबंध किसी अन्य के साथ भी हैं. इस बात को अभी एक महीना ही बीता था कि राहुल ने एक बार फिर उसे फौर्च्युनर गाड़ी से उतरते देखा. इस के बाद राहुल के दिमाग में यह शक पूरी तरह घर कर गया कि नेहा न केवल उसे, बल्कि अपने पति को भी धोखा दे रही है. उस के शक का इलाज नेहा ही कर सकती थी, लेकिन राहुल के ज्यादा सवालजवाब करने से वह नाराज हो गई. दोनों के बीच इस बात को ले कर खूब झगड़ा हुआ.

फलस्वरूप दोनों के बीच की दूरियां बढ़ गईं और नेहा ने फोन पर भी राहुल को इग्नोर करना शुरू कर दिया. राहुल के सिर पर नेहा के प्यार का जुनून सवार था. राहुल ने उस से शिकायत की, ‘‘क्या बात है, आजकल तुम मुझ से दूरियां बना रही हो?’’

‘‘इस में चौंकने जैसी कोई बात नहीं है राहुल. वजह तो तुम भी जानते हो. शक से रिश्ते नहीं चला करते.’’

‘‘तुम्हारे पास शक का इलाज है, इलाज कर दो.’’

‘‘हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता.’’ नेहा ने कहा तो इस मुद्दे पर दोनों के बीच एक बार फिर बहस हो गई. नेहा नाराज हो कर अपने घर चली गई.

नेहा को लगने लगा था कि राहुल उस पर जरूरत से ज्यादा ही हक जताने लगा है. इसलिए उस ने राहुल से दूर रहने में ही भलाई समझी. उस ने राहुल से साफ कह दिया कि वह उस के साथ रिश्ता नहीं रखना चाहती. नेहा के बदले हुए रुख से राहुल को अपने सपने टूटते नजर आए. उस ने राहुल की बारबार की कोशिशों के बाद भी उस से मिलना बिलकुल ही छोड़ दिया. राहुल सिर्फ अपने शक का इलाज करना चाहता था, उसे छोड़ना नहीं.

राहुल को जब लगा कि नेहा उस से पीछा छुड़ा रही है तो वह परेशान हो उठा. उस की कुछ समझ नहीं आया. वह पारदर्शी रिश्ता रखना चाहता था. उस ने नेहा को मनाने की बहुत कोशिश की. जब बात नहीं बनी तो उस ने यह बात अपने साथी पुष्कर त्यागी व आयुषि त्यागी को बताई. राहुल ने उन्हें पूरी बात बताते हुए कहा, ‘‘मैं बहुत उलझन में हूं. तुम दोनों को मेरे साथ नेहा के घर चलना होगा.’’

‘‘उस से क्या फायदा? जब वह रिश्ता नहीं रखना चाहती तो तुम्हें भी उस से दूर हो जाना चाहिए.’’

‘‘मैं उसे मनाने की कोशिश करूंगा. नहीं मानी तो उस के पति के सामने पोल खोल दूंगा. फिर शायद पति उसे छोड़ दे और वह मेरी हो जाए.’’ उन दोनों को उस की बात अजीब लगी, लेकिन चूंकि दोनों राहुल के दोस्त थे, इसलिए उन्होंने उस के साथ जाने का वादा कर लिया. 30 जुलाई को वे राहुल के साथ नेहा के घर पहुंच गए.

नेहा के घर वालों को बता दी सच्चाई

राहुल को अचानक अपने घर आया देख नेहा के होश उड़ गए, लेकिन वह उसे भगा भी नहीं सकती थी. उस की मुलाकात नेहा के पति व सास से भी हुई. राहुल ने उन के सामने नेहा से संबंध स्वीकार किए तो सब को झटका लगा. पीछा छुड़ाने के लिए नेहा को कहना पड़ा कि राहुल से उस की दोस्ती रही है लेकिन अब वह जबरन उस के पीछे पड़ा है.

नेहा ने राहुल को चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘‘मेरा घर उजाड़ने की कोशिश मत करो राहुल, तुम सुधर जाओ वरना मैं तुम्हारे खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दूंगा. आइंदा मेरे रास्ते में आने की कोशिश भी मत करना वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

बात न बनती देख राहुल ने भी धमकी भरा लहजा अपनाया, ‘‘अभी तो मैं चला जाता हूं, लेकिन ध्यान रखना नेहा मैं भी इतनी आसानी से पीछा छोड़ने वाला नहीं हूं.’’

राहुल वहां से निकल गया. नेहा के लिए राहुल से रिश्ता रखना अब गले की फांस बन चुका था. वह अपने निर्णय पर पछता रही थी. वह उस से पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन राहुल किसी भी सूरत में उस से दूर होने के लिए तैयार नहीं था. वह उसे जबरन अपना बनाना चाहता था.

दोस्त के साथ रची तेजाब डालने की साजिश

नेहा ने सोचा था कि वक्त के साथ राहुल उसे भूल जाएगा और पीछा छोड़ देगा, लेकिन यह सिर्फ उस की सोच थी. दूसरी तरफ जब राहुल को इस बात का भरोसा हो गया कि नेहा अब उस की होने वाली नहीं है तो उस ने उसे सबक सिखाने की ठान ली. कई दिनों की दिमागी उथलपुथल के बाद उस ने यह खतरनाक निर्णय ले लिया कि वह तेजाब डाल कर नेहा के चेहरे को हमेशा के लिए बिगाड़ देगा.

राहुल का एक दोस्त था उमंग प्रताप. बीएससी पास उमंग गाजियाबाद के शास्त्रीनगर में रहता था और वह एसएससी परीक्षा की तैयारी कर रहा था. उमंग की एक बार बुरे वक्त में राहुल ने मदद की थी. राहुल ने उसे 5 हजार रुपए उधार दिए थे. राहुल जानता था कि उमंग पर उस का अहसान है, इसलिए वह उस का साथ जरूर देगा.

हुआ भी बिलकुल ऐसा ही. उस ने अपने दोस्त उमंग को पूरी बात बता कर अपना साथ देने के लिए तैयार कर लिया. उमंग ने राहुल को समझाने की कोशिश भी की मगर वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. जल्द ही उस ने उमंग की मदद से एक डिब्बे में तेजाब का इंतजाम कर लिया. यह 11 अगस्त की बात थी.

राहुल ने अगले कुछ दिन नेहा को फोन किए ताकि बात बन जाए लेकिन उस ने उसे जरा भी भाव नहीं दिया तो वह भन्ना गया. वह जानता था कि हर शाम नेहा अपने बच्चे को ट्यूशन छोड़ने जाती है. उस ने नेहा पर 20 अगस्त को तेजाब डालने की योजना बना ली.

वह उमंग के साथ बाइक पर सवार हो कर निकल गया. पहले उस ने शराब पी और फिर पी ब्लौक चौराहे पर जा कर खड़ा हो गया. उमंग प्रताप बाइक चला रहा था, जबकि वह तेजाब का डिब्बा लिए पीछे बैठा था. बाइक का नंबर छिपाने के लिए उन्होंने उस पर सफेद कागज चिपका दिया था. जैसे ही नेहा वहां आई तो राहुल ने उसे रोका और तेजाब डाल दिया.

                                                                                                                                            क्रमशः

तीन साल बाद खुला रहस्य – भाग 1

पिछले साल सन 2016 के सितंबर महीने में अलीगढ़ का एसएसपी राजेश पांडेय को बनाया गया तो चार्ज लेते ही उन्होंने पुलिस अधिकारियों की एक मीटिंग बुला कर सभी थानाप्रभारियों को आदेश दिया कि जितनी भी जांचें अधूरी पड़ी हैं, उन की फाइलें उन के सामने पेश करें. जब सारी फाइलें उन के सामने आईं तो उन में एक फाइल थाना गांधीपार्क में दर्ज प्रीति अपहरण कांड की थी, जिस की जांच अब तक 10 थानाप्रभारी कर चुके थे और यह मामला 12 दिसंबर, 2013 में दर्ज हुआ था.

राजेश पांडेय को यह मामला कुछ रहस्यमय लगा. उन्होंने इस मामले की जांच सीओ अमित कुमार को सौंपते हुए जल्द से जल्द खुलासा करने को कहा. अमित कुमार ने फाइल देखी तो उन्हें काफी आश्चर्य हुआ. क्योंकि इतने थानाप्रभारियों ने मामले की जांच की थी, इस के बावजूद मामले का खुलासा नहीं हो सका था. उन्होंने थानाप्रभारी दिनेश कुमार दुबे को कुछ निर्देश दे कर फाइल सौंप दी.

मामला काफी पुराना और रहस्यमयी था, इसलिए इसे एक चुनौती के रूप में लेते हुए दिनेश कुमार दुबे ने मामले की तह तक पहुंचने के लिए अपनी एक टीम बनाई, जिस में एसएसआई अजीत सिंह, एसआई धर्मवीर सिंह, कांस्टेबल सत्यपाल सिंह, मोहरपाल सिंह और नितिन कुमार को शामिल किया.

फाइल का गंभीरता से अध्ययन करने के बाद उन्होंने मामले की जांच फरीदाबाद से शुरू की, क्योंकि प्रीति को भगाने का जिस युवक जयकुमार पर आरोप था, वह फरीदाबाद का ही रहने वाला था. दिनेश कुमार दुबे फरीदाबाद जा कर उस की मां संध्या से मिले तो उस ने बताया कि जयकुमार उस का एकलौता बेटा था. उस पर जो आरोप लगे हैं, वे झूठे हैं. उस का बेटा ऐसा कतई नहीं कर सकता. उस ने उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा रखी थी.

संध्या से पूछताछ के बाद दिनेश कुमार दुबे को मामला कुछ और ही नजर आया. अलीगढ़ लौट कर उन्होंने 13 जनवरी, 2016 को प्रीति के पिता देवेंद्र शर्मा को थाने बुलाया, जिस ने जयकुमार पर बेटी को भगाने का मुकदमा दर्ज कराया था. पुलिस के सामने आने पर वह इस तरह घबराया हुआ था, जैसे उस ने कोई अपराध किया हो. जब सीओ अमित कुमार, एसपी (सिटी) अतुल कुमार श्रीवास्तव ने उस से जयकुमार के बारे में पूछताछ की तो पुलिस अधिकारियों को गुमराह करते हुए वह इधरउधर की बातें करता रहा.

लेकिन यह भी सच है कि आदमी को एक सच छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं. ऐसे में ही कोई बात ऐसी मुंह से निकल जाती है कि सच सामने आ जाता है. उसी तरह देवेंद्र के मुंह से भी घबराहट में निकल गया कि कहीं जयकुमार ने घबराहट में ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या तो नहीं कर ली.

देवेंद्र की इस बात ने पुलिस अधिकारियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इसे कैसे पता चला कि जयकुमार ने ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली है. पुलिस ने दिसंबर, 2013 के ट्रेन एक्सीडेंट के रिकौर्ड खंगाले तो पता चला कि थाना सासनी गेट पुलिस को 7 दिसंबर, 2013 को ट्रेन की पटरी पर एक लावारिस लाश मिली थी.

इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने देवेंद्र के साथ थोड़ी सख्ती की तो उस ने जयकुमार की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने जयकुमार की हत्या की जो कहानी सुनाई, उस की शातिराना कहानी सुन कर पुलिस हैरान रह गई. देवेंद्र ने बताया कि अपनी इज्जत बचाने के लिए उसी ने अपने साले प्रमोद कुमार के साथ मिल कर जयकुमार की हत्या कर दी थी. इस बात की जानकारी उस की बेटी प्रीति को भी थी.

इस के बाद पुलिस ने देवेंद्र शर्मा की बेटी प्रीति और उस के साले प्रमोद को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में प्रीति और प्रमोद ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. तीनों की पूछताछ में जयकुमार की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के थाना गांधीपार्क के नगला माली का रहने वाला देवेंद्र शर्मा रोजीरोटी की तलाश में हरियाणा के फरीदाबाद आ गया था. उसे वहां किसी फैक्ट्री में नौकरी मिल गई तो रहने की व्यवस्था उस ने थाना सारंग की जवाहर कालोनी के रहने वाले गंजू के मकान में कर ली. उन के मकान की पहली मंजिल पर किराए पर कमरा ले कर देवेंद्र शर्मा उसी में परिवार के साथ रहने लगा था. यह सन 2013 के शुरू की बात है.

उन दिनों देवेंद्र शर्मा की बेटी प्रीति यही कोई 17-18 साल की थी और वह अलीगढ़ के डीएवी कालेज में 12वीं में पढ़ रही थी. फरीदाबाद में सब कुछ ठीक चल रहा था. देवेंद्र शर्मा की बेटी प्रीति जवान हो चुकी थी. मकान मालिक गंजू की पत्नी गुडि़या का ममेरा भाई जयकुमार अकसर उस से मिलने उस के यहां आता रहता था. वह पढ़ाई के साथसाथ एक वकील के यहां मुंशी भी था. इस की वजह यह थी कि उस के पिता शंकरलाल की मौत हो चुकी थी, जिस से घरपरिवार की जिम्मेदारी उसी पर आ गई थी. वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा भी रहा था.

जयकुमार अपनी मां संध्या के साथ जवाहर कालोनी में ही रहता था. फुफेरी बहन गुडि़या के घर आनेजाने में जयकुमार की नजर देवेंद्र शर्मा की बेटी प्रीति पर पड़ी तो वह उस के मन को ऐसी भायी कि उस से प्यार करने के लिए उस का दिल मचल उठा. अब वह जब भी बहन के घर आता, प्रीति को ही उस की नजरें ढूंढती रहतीं.

एक बार जयकुमार बहन के घर आया तो संयोग से उस दिन प्रीति गुडि़या के पास ही बैठी थी. जयकुमार उस दिन कुछ इस तरह बातें करने लगा कि प्रीति को उस में मजा आने लगा. उस की बातों से वह कुछ इस तरह प्रभावित हुई कि उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया.

जयकुमार देखने में ठीकठाक तो था ही, अपनी मीठीमीठी बातों से किसी को भी आकर्षित कर सकता था. उस की बातों से ही आकर्षित हो कर प्रीति ने उस का मोबाइल नंबर लिया था. इस के बाद दोनों की बातचीत मोबाइल फोन से शुरू हुई तो जल्दी उन में प्यार हो गया. फिर खतरों की परवाह किए बिना दोनों प्यार की राह पर बेखौफ चल पड़े. दोनों घर वालों की चोरीछिपे जब भी मिलते, घंटों भविष्य के सपने बुनते रहते.

जल्दी ही प्रीति और जयकुमार प्यार की राह पर इतना आगे निकल गए कि उन्हें जुदाई का डर सताने लगा था. उन के एक होने में दिक्कत उन की जाति थी. दोनों की ही जाति अलगअलग थी. उन की आगे की राह कांटों भरी है, यह जानते हुए भी दोनों उसी राह पर आगे बढ़ते रहे.

देवेंद्र गृहस्थी की गाड़ी खींचने में व्यस्त था तो बेटी आशिकी में. लेकिन कहीं से प्रीति की मां रीना को बेटी की आशिकी की भनक लग गई. उन्होंने बेटी को डांटाफटकारा, साथ ही प्यार से समझाया भी कि जमाना बड़ा खराब है, इसलिए बाहरी लड़के से बातचीत करना अच्छी बात नहीं है. अगर किसी ने देख लिया तो बिना मतलब की बदनामी होगी.

                                                                                                                                   क्रमशः

तंत्र मंत्र: पैसों के लिए दी इंसानी बलि – भाग 1

छत्तीसगढ़ के जिला बिलासपुर में थाना सिरगिट्टी के प्रभारी शांत कुमार साहू सुबह करीब 10 बजे अन्य पुलिसकर्मियों को कोरोना प्रकोप से संबंधित आवश्यक निर्देश देने में मशगूल थे. केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एक बार फिर लौकडाउन के नए दिशानिर्देश जारी किए जा चुके थे. उसे सख्ती से पालन के लिए राज्य सरकारों को भी विशेष हिदायतें दी गई थीं.

पुलिस को एक बार फिर बड़ी जिम्मेदारी निभानी थी. छत्तीसगढ़ में भी उसी दिन से लौकडाउन लगा दिया गया था. इस के चलते पुलिस के कंधों पर कानूनव्यवस्था को दुरुस्त रखने की और भी ज्यादा जिम्मेदारी आ गई थी. इस मुद्दे को ले कर कई तरह की भ्रामक चर्चाएं भी गर्म थीं. इसे ध्यान में रखते हुए पुलिसकर्मियों को विभिन्न कार्यभार सौंपे जा रहे थे. उसी दौरान एक व्यक्ति काफी घबराया हुआ थाने में घुस आया. शांत कुमार उस के उड़े हुए चेहरे की रंगत देख कर समझ गए कि वह जरूर किसी गंभीर परेशानी में है.

उन्होंने उसे वहीं थोड़ी दूरी पर बैठने का इशारा किया. वह एक खाली कुरसी पर बैठ गया. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. कुछ मिनट बाद थानाप्रभारी ने सहजता से पूछा, ‘‘क्या बात है? तुम कौन हो?’’

‘‘साहब, मेरा नाम रामप्रसाद साहू है. मैं खरकेना, कोडियापार से आया हूं. मेरे छोटे भाई सुरेश कुमार साहू की हत्या हो गई है. उस की लाश एक अनजान

वीराने घर में पड़ी हुई है…’’ कहते हुए वह सुबकने लगा.

थानाप्रभारी ने पहले उस के लिए एक गिलास पानी मंगवाया. पानी पीने के बाद थानाप्रभारी ने उस से कहा, ‘‘अब बताओ, कहां पर हत्या हुई है? उस के बारे में क्या जानते हो?’’

‘‘जी, साहबजी, कल शाम अंधेरा होने पर मेरा छोटा भाई किसी दोस्त के यहां जाने को कह कर बाइक से निकला था, उस की रात में ही किसी ने हत्या कर दी. हत्यारों ने उस का काफी बेरहमी से खून कर दिया है. आप अभी वहां पर चलिए. लाश वहीं वीरान घर में पड़ी हुई है.’’

हत्या जैसे गंभीर मामले को सुन कर थानाप्रभारी शांत कुमार साहू ने कहा, ‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि वहां हत्या हुई है? क्या तुम भी उस में शामिल थे? सब कुछ सचसच बताओ. झूठ मत बोलना.’’

इसी के साथ थानाप्रभारी ने एक कांस्टेबल को उस की पूरी बात लिखने के लिए कहा और खुद मोबाइल में रिकौर्ड करने लगे. रामप्रसाद बताने लगा, ‘‘साहबजी, मेरा भाई घर से जब निकला था तब उस के हाथ में एक थैला था. उस में पूजापाठ और दान का कुछ सामान था. उस ने जाते हुए कहा था कि थैले में पुजारी सुभाषदास का कुछ बचा हुआ सामान है. यही सामान पुजारी को देने जा रहा है.’’

‘‘फिर क्या हुआ?’’

थानाप्रभारी के टोकने के बाद रामप्रसाद आगे बोला, ‘‘देर रात तक जब वह नहीं लौटा तब मैं उस के बताए पुजारी के पास जाने के लिए निकला. किंतु पुजारी के रहने वाले स्थान से काफी पहले ही मुझे वीरान खंडहरनुमा घर के दरवाजे के बाहर उस का थैला दिख गया. उस में वह सामान नहीं था, जो वह ले कर गया था. लेकिन मैं ने उस थैले को पहचान लिया था, क्योंकि वह मेरे घर के बरामदे में ही 2 सप्ताह से टंगा था.

‘‘वहीं मेरे भाई की एक झाड़ी में चप्पल भी दिख गई. कुछ दूरी पर मेरे भाई की मोटरसाइकिल भी नजर आ गई. मैं समझ गया कि हो न हो भाई इसी मकान में होगा.

‘‘मैं ने उस के अधखुले दरवाजे से अंदर जा कर देखा तो मेरे होश उड़ गए. वहां का दृश्य देख कर मैं डर गया और भागाभागा सीधा आप के पास आ गया. आगे का वर्णन मैं नहीं कर सकता. आप खुद ही वहीं चल कर देख लीजिए और मेरे भाई के हत्यारे को पकड़ लीजिए.’’

यह बात 13 अप्रैल, 2021 की है. रामप्रसाद के बयान के आधार पर पहले उस की तरफ से थाने में एक लिखित शिकायत दर्ज की गई. उस के बाद थानाप्रभारी तत्काल घटनास्थल के लिए कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर निकल पड़े. साथ में रामप्रसाद साहू को भी ले लिया.

घटनास्थल ठीक वैसा ही था, जैसा रामप्रसाद साहू ने थाने में वर्णन किया था. वहां पहुंच कर घटनास्थल का मुआयना किया, जो वास्तव में काफी वीभत्स और डरावना था. वहीं सुरेश साहू की क्षतविक्षत लाश पड़ी थी. उस के चेहरे और शरीर के दूसरे कई हिस्से जख्मी थी, जिन से खून निकल कर सूख चूका था.

पास में ही खून से सनी एक कुल्हाड़ी पड़ी थी और पूजापाठ के मुख्य सामान बिखरे पड़े थे. उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था मानो पूजापाठ के बाद उस की बलि चढ़ाई गई हो. यह घटना बीती रात 12 अप्रैल की थी, उस दिन अमावस्या की काली रात थी. शांत कुमार साहू को समझते देर नहीं लगी कि सारा घटनाक्रम तंत्रमंत्र और नरबलि से जुड़ा हुआ है.

जांचपड़ताल के अलावा रामप्रसाद के बयानों के अनुसार यह तथ्य सामने आ गया कि सुरेश साहू तंत्रमंत्र में बहुत विश्वास करता था. वह 2 तांत्रिकों के संपर्क में भी था. अब सवाल यह था कि आखिर सुरेश साहू की हत्या किस ने की? तांत्रिक पुजारियों ने या फिर किसी और ने तांत्रिकों के कहने पर उस की नरबलि दे दी? मामला गंभीर होने के बावजूद पुलिस को कोई वैसी सूचना या जानकारी नहीं मिल पा रही थी, जिस से मामले को जल्द सुलझाया जा सके.

संयोग से प्रदेश में 13 अप्रैल से लौकडाउन लगने के कारण पुलिस और प्रशासन के जिम्मे अतिरिक्त जिम्मेदारियां आ गई थीं. नतीजतन सुरेश कुमार साहू हत्या की तहकीकात का मामला टल गया. लगभग 2 महीने तक लौकडाउन लगा रहा. लौकडाउन खुलने के बाद थानाप्रभारी शांत कुमार साहू ने सुरेश साहू हत्याकांड की फाइल एक बार फिर से पलटनी शुरू की. उस की नए सिरे से जांच के लिए एक खास टीम बनाई गई.

पुलिस टीम ने अपराधियों का सुराग लगाने के लिए लगभग 70 संदिग्ध लोगों के बयान दर्ज किए. जांच में 2 तथाकथित तांत्रिक सुभाषदास मानिकपुरी और माखनदास मानिकपुरी के नाम सामने आ रहे थे. दोनों ही महीनों से लापता थे. थानाप्रभारी ने दोनों की खोज करवाई. रामप्रसाद ने भी इस की पुष्टि कर दी कि उस के भाई की उन से जानपहचान थी और घटना के दिन वह उन के पास ही गया था.

उन की तलाश के लिए पुलिस ने मुखबिर की मदद ली. तब 16 नवंबर, 2021 को माखनदास पकड़ में आ गया. उस ने अपने घर वालों को बता रखा था कि वह सतना में रेलवे का गार्ड है. पुलिस उसे सतना से पकड़ कर बिलासपुर ले आई. पूछताछ करने पर पहले तो उस ने साफ इंकार कर दिया और बताया कि वह रोजीरोटी कमाने के लिए सतना में प्राइवेट काम कर रहा रहा था. घर वालों से झूठ बोला था कि वह रेलवे में गार्ड है.

                                                                                                                                               क्रमशः

सिरफिरे का प्यार : बना गले की फांस – भाग 1

सड़क पर पड़ी वह खूबसूरत महिला दर्द से बुरी तरह छटपटाते हुए बिलखबिलख कर चीख रही थी. उस के शरीर से गंधनुमा धुआं सा निकल रहा था. तड़पते हुए वह खुद को अस्पताल ले जाने की गुहार लगा रही थी. उस की सफेद रंग की स्कूटी वहीं बराबर में खड़ी थी. उस के चेहरे पर असीम दर्द था. मौके पर लोगों की भीड़ तो एकत्र थी लेकिन बदले जमाने की फितरत के हिसाब से कोई भी उस की मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था.

लोग तमाशबीन बने खड़े थे. तभी एक महिला भीड़ को चीरते हुए आगे आई और लोगों को देख कर बोली, ‘‘अरे, एसिड अटैक हुआ है इस बेचारी पर. शर्म आनी चाहिए तुम सब को, एक औरत तड़प रही है और तुम सब तमाशा देख रहे हो. तुम्हारी बहनबेटी होती तब भी ऐसे ही तमाशा देखते क्या?’’

‘‘हम तो यहां अभी पहुंचे हैं, पुलिस को फोन भी कर दिया है. शायद आने वाली ही होगी.’’ भीड़ में से एक व्यक्ति ने कहा तो महिला बोली, ‘‘किसी की मदद के लिए पुलिस का इंतजार करना जरूरी है क्या? मैं अस्पताल ले जाती हूं इसे.’’ कहते हुए महिला आगे बढ़ी तो अन्य लोग भी साथ देने को तैयार हो गए. इत्तफाक से तभी पुलिस वहां आ पहुंची.

दरअसल, महिला पर एसिड अटैक की यह सनसनीखेज वारदात देश की राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर के थाना कविनगर क्षेत्र स्थित संजयनगर के सैक्टर-23 के पी ब्लौक चौराहे पर हुई थी. प्रत्यक्षदर्शियों ने जो कुछ पुलिस को बताया, उस के मुताबिक करीब साढ़े 5 बजे वह महिला स्कूटी से जा रही थी. तभी बाइक पर सवार 2 लोग आए. उन्होंने उसे रोका और पलक झपकते ही साथ लाए डिब्बे से तेजाब उस के ऊपर उड़ेल दिया. जब तक लोग कुछ समझ पाते, तब तक हमलावर वहां से भाग निकले.

यह घटना 21 अगस्त, 2018 की थी. इस घटना की सूचना मिलने पर पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया, जिस के बाद थानाप्रभारी प्रदीप कुमार त्रिपाठी व सीओ आतिश कुमार सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए. आननफानन में महिला को अस्पताल ले जाया गया. डाक्टरों ने तुरंत उस का उपचार शुरू कर दिया. महिला का चेहरा, हाथ, पैर, पेट व कमर का हिस्सा झुलस गया था. उस की हालत गंभीर थी, लिहाजा उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के लिए रैफर कर दिया गया. पुलिस अधिकारी भी अस्पताल पहुंचे.

महिला बहुत ज्यादा बात करने की स्थिति में तो नहीं थी, फिर भी औपचारिक पूछताछ में उस ने हमले में शामिल एक युवक का नाम पुलिस को बता दिया. उस के मुताबिक उस ने साथियों के साथ मिल कर उस पर तेजाब से हमला किया था. जब वह अपने बेटे को स्कूटी से ट्यूशन की क्लास में छोड़ कर वापस घर जा रही थी, तभी उस युवक ने अपने साथियों के साथ उस पर एसिड फेंका.

पीडि़ता के पति की तहरीर के आधार पर पुलिस ने राहुल नामक युवक को नामजद करते हुए उस के और उस के साथियों के खिलाफ भादंवि की धारा 326ए व 120बी के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी वैभव कृष्ण ने अपने अधीनस्थों को इस मामले में तत्काल काररवाई के निर्देश दिए.

सरेआम हुई इस वारदात की गूंज प्रदेश की सत्ता के शिखर लखनऊ तक भी पहुंची. मामला गंभीर था, लिहाजा मेरठ जोन के एडीजी प्रशांत कुमार भी अस्पताल पहुंचे और पीडि़ता का हाल जाना. एडीजी ने एसएसपी को निर्देश दिए कि आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी हो. उन्हें किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए.

पुलिस मामले की तहकीकात में जुट गई. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यही था कि महिला पर तेजाबी हमला क्यों किया गया? पीडि़ता चूंकि युवक को जानती थी तो यह बात साफ थी कि हमलावर का मकसद उस का चेहरा बिगाड़ना था. मामला प्रेम प्रसंग का लग रहा था.

इस बात को बल तब मिला जब महिला के पति ने भी पुलिस को बताया कि राहुल उस की पत्नी के साथ जबरन रिश्ता रखना चाहता था. वह उस पर साथ रहने का दबाव बनाता था. साथ ही उस ने धमकी भी दी थी कि अगर वह उस के साथ नहीं रहेगी तो वह उसे किसी के साथ रहने लायक नहीं छोड़ेगा.

पुलिस ने टीम बना कर मुख्य आरोपी की तलाश शुरू कर दी. घटनास्थल वाले रास्ते के सीसीटीवी फुटेज भी देखे गए, जिस में 2 युवक बाइक से जाते हुए दिख रहे थे लेकिन बाइक का नंबर या उन के चेहरे नहीं दिख रहे थे. बाइक सवारों में से एक ने हेलमेट लगाया था, जबकि दूसरे ने चेहरे पर गमछा बांधा हुआ था.

पुलिस ने महिला के मोबाइल से राहुल का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया, जिस से नामपता मिलने के साथ ही उस की लोकेशन भी मिलनी शुरू हो गई. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के लिए जाल बिछा दिया. अगले दिन पुलिस ने राहुल को गाजियाबाद स्थित हापुड़ चुंगी से गिरफ्तार कर लिया. उस के साथ एक अन्य युवक भी था. पूछताछ में उस ने अपना नाम उमंग प्रताप बताया. वह भी राहुल के साथ घटना में शामिल था. पुलिस दोनों को थाने ले आई. पुलिस ने विस्तार से पूछताछ की तो दोस्ती, प्यार व नफरत में डूबी चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

फेसबुक पर हुई दोस्ती

नेहा (परिवर्तित नाम) संजयनगर की रहने वाली थी. वह पेशे से डायटीशिन थी, जबकि उस के पति का कोचिंग सेंटर था. नेहा खूबसूरत भी थी और आधुनिक भी. वह सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का इस्तेमाल करती थी. करीब 8 महीने पहले एक दिन उस के पास राहुल गर्ग नाम के एक युवक की फ्रैंड रिक्वेस्ट आई. राहुल गाजियाबाद के ही राजनगर का रहने वाला था. बीए पास राहुल के पिता की हार्डवेयर की दुकान थी. वह भी व्यवसाय में पिता का हाथ बंटाता था.

राहुल अच्छी कदकाठी का आकर्षक नौजवान था. नेहा ने उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला. जल्द ही दोनों के बीच दोस्ती हो गई और उन्होंने एकदूसरे का नंबर ले लिया. बातों का दायरा बढ़ा तो बातों के साथसाथ मुलाकातें भी शुरू हो गईं.

चंद दिनों की मुलाकातों में दोनों के बीच प्यार हो गया. नेहा शादीशुदा थी, लेकिन उस ने यह बात राहुल से छिपा ली थी. वक्त के साथ दोनों का प्यार परवान चढ़ा, तो राहुल उस के साथ अपनी दुनिया बसाने का ख्वाब देखने लगा. राहुल उसे दिल से चाहता है, नेहा यह बात बखूबी जानती थी. यही वजह थी कि वह उस की एक आवाज पर दौड़ी चली आती थी.

सामाजिक लिहाज से शादीशुदा हो कर भी किसी युवक के साथ इस तरह का रिश्ता रखना यूं तो गलत था, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में बह कर नेहा भी दिल के हाथों मजबूर हो गई थी. पतन की डगर कभी अच्छी नहीं होती. शुरुआत में भले ही किसी को अंदाजा न हो, लेकिन एक दिन ऐसे रिश्तों की कीमत चुकानी पड़ती है.

                                                                                                                                           क्रमशः

अनीता की अनीति : मतलबी प्यार

60 साल का लुटेरा: 18 महिलाओं से शादी करने वाला बहरूपिया – भाग 4

हाईप्रोफाइल वाली कमाऊ महिलाओं को फांसने में है माहिर

66 साल का रमेशचंद्र स्वैन दिखने में बेहद ही साधारण शख्स की तरह है. छोटेछोटे बाल, चार्ली चैपलिन स्टाइल की मूंछें, छोटी कदकाठी (5 फीट 2 इंच). फिर भी अपने प्रोफेशनल चार्म के चलते उस ने कई इंडिपेंडेंट महिलाओं को अपने जाल में फांस लिया था.

उस की चिकनीचुपड़ी बातों में आने वाली महिलाओं में सुप्रीम कोर्ट की वकील, केरल प्रशासनिक सेवा की एक अधिकारी, एक चार्टर्ड एकाउंटेंट, आईटीबीपी की एक अधिकारी, एक बीमा कंपनी की वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी और डाक्टर शामिल थी. उस से पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह बेहद चौंकाने वाली थी.

रमेश की गिरफ्तारी पूरे 38 सालों बाद हुई थी. पुलिस में दर्ज रिकौर्ड के अनुसार उस ने 10 राज्यों की अकेले जीवनयापन करने वाली महिलाओं (विधवा, तलाकशुदा या फिर विवाह की उम्र गुजर चुकी 40 पार की महिलाओं) को अपना शिकार बनाया था. उन को सच्चे लाइफ पार्टनर के नाम पर बेवकूफ बनाया था और उन से लाखों रुपए की ठगी की थी.

इस धोखाधड़ी के अलावा वह और भी दूसरी तरह की ठगी में शामिल रह चुका था. भुवनेश्वर के डीसीपी उमा शंकर दास के मुताबिक स्वैन 2006 में एक बैंक फ्रौड के सिलसिले में भी गिरफ्तार किया गया था. इस के बाद 2010 में मैडिकल कालेजों में दाखिले के नाम पर उसे स्टूडेंट्स से 2 करोड़ रुपए की ठगी करने पर हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

रमेश की पहली शादी साल 1979 में हुई थी. उस से उस के 2 बेटे और एक बेटी है. बाद में पत्नी उस से अलग रहने लगी थी. बताते हैं कि उस ने दूसरी शादी झारखंड की एक डाक्टर से की थी. उसे जब स्वैन के पकड़े जाने की सूचना मिली तब उन्होंने इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की.

2018 के बाद उसने कई मैट्रिमोनियल साइट्स पर अपने अकाउंट बनाए. वह अधिकतर 40 साल से अधिक उम्र वाली ऐसी महिलाओं को निशाना बनाता था, जिन पर शादी का दबाव रहता है. उस ने अलगअलग प्रोफाइल में खुद को डाक्टर और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में कार्यरत अधिकारी के रूप में बताया है.

बदनामी के डर से पीडि़त महिलाएं नहीं आईं सामने

जिन से शादी की, उन में अधिकांश अविवाहित या विधवा थीं. उन की नजर में वह केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में स्वास्थ्य शिक्षा और प्रशिक्षण के उपमहानिदेशक था. ऐसा बताने पर अधिकतर महिलाएं बिना किसी संदेह के उस के साथ शादी के बंधन में बंध गई थीं. इस सिलसिले में पुलिस ने स्वैन द्वारा बरगलाई गई करीब 90 महिलाओं से संपर्क किया, लेकिन उन में से कोई भी समाज में बदनामी के डर से जांच का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हुईं.

मात्र दसवीं तक पढ़ा हुआ रमेश चंद्र स्वैन ओडिशा और झारखंड की कई क्षेत्रीय भाषाओं के अलावा हिंदी और अंग्रेजी धाराप्रवाह बोलता था. उस की इस धोखाधड़ी के बारे में जानकारी उस के परिवार के दूसरे सदस्यों को टीवी की खबरों से मिली.

शादी के लिए झांसा देने के सिलसिले में वह अपनी उम्र 1971 की जन्म तिथि के अनुसार बताता था. जबकि वह वास्तव में 1958 में पैदा हुआ था. इस के लिए पहले वह वैवाहिक वेबसाइट पर अपनी प्रोफाइल अपलोड करता था. उस के बाद संपर्क करने वाली महिलाओं से संपर्क कर सीधा उसी से या फिर उस के परिवार से मिलता था. उन्हें विश्वास में ले कर बताता था कि वह केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में एक बड़ा अधिकारी है. प्रमाण के लिए वह कुछ फरजी दस्तावेज दिखा देता था.

इस के अलावा खुद को प्रभावशाली व्यक्ति बताने के लिए अपने कार्यालय से मिलने वाला पत्र भी दिखाता था, जिस में ‘छुट्टी का अस्वीकार प्रार्थनापत्र’ होता था. यह कहते हुए बताता था कि वह औफिस के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है, इसलिए उस की छुट्टी जल्दी मंजूर नहीं होती है. इस तर्क के सहारे वह अपनी पत्नी से लंबे समय तक दूर रहता था.

पुलिस ने दिल्ली की टीचर वाइफ से स्वैन पर भरोसा करने के संबंध में भी पूछताछ की. इस पर उस ने बताया, ‘‘जब मैं पहली बार स्वैन से मिली थी, तब बातचीत में बेहद ही सज्जन पुरुष जैसा लगा. चूंकि मेरा कोई अभिभावक नहीं था और मैं अकेली रह रही थी. खुद के बारे में मुझे ही निर्णय लेने थे. इसलिए मैं उस की पिछली जिंदगी के बारे में जांच नहीं कर सकी. हां, उस के ईमेल आईडी सरकारी अधिकारियों की तरह असली लगा और मैं ने हामी भर दी. मेरा बचपन ओडिशा में बीता था, और मेरा मानना था कि ओडिशा के पुरुष कभी धोखा नहीं देंगे.’’

इस घटना के बाद उस ने उन अन्य महिलाओं से संपर्क किया, जिन से स्वैन ने अपने फोन का उपयोग कर शादी की थी, और उन के साथ संपर्क में रही थी. ऐसा कर उस ने अन्य महिलाओं को भी सतर्क कर दिया, जो वैवाहिक वेबसाइटों पर उस की प्रोफाइल के प्रभाव में आ कर उस से संपर्क करेंगी.

पुलिस ने पाया कि उस ने 2018 में दिल्ली की शिक्षका से शादी के बाद करीब 25 महिलाओं से संपर्क किया. उन में एक गुवाहाटी की डाक्टर भी थी, जिस ने स्वैन द्वारा आश्वस्त होने के बाद शादी के पंजीकरण के लिए अपने परिवार के साथ सड़क मार्ग से गुवाहाटी की यात्रा की. वह वहां शादी के बाद कुछ महीनों तक उस के साथ रही. ऐसी ओडिशा में 5 महिलाएं थीं, जिन में से 3 शिक्षिकाएं थीं. शिक्षिकाओं में एक विधवा थी, जिस की बड़ी बेटी थी.

इन के अलावा एक अन्य सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं, जिस ने अब अपनी शादी को रद््द करने के लिए निचली अदालत में एक याचिका दायर कर दी है. मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सामाजिक बदनामी के कारण कई महिलाएं औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे नहीं आ रही हैं. पुलिस ने यह भी कहा कि स्वैन ने स्पष्ट रूप से महिलाओं को उन के अंतरंग वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी दी थी.

बहरहाल, कथा लिखे जाने तक स्वैन न्यायिक हिरासत में था.

   —कथा में अवंतिका परिवर्तित नाम है

रिश्तों की कब्र खोदने वाला क्रूर हत्यारा – भाग 4

मांबाप के कत्ल की ठीक तारीख तो उदयन नहीं बता पाया, पर उस ने बताया कि यह कोई 5-6 साल पहले की बात है. उस दिन बारिश हो रही थी. पापा चिकन लेने बाजार गए थे और मम्मी कमरे में अलमारी में कपड़े रख रही थीं. हत्या के 2 हफ्ते पहले उस ने एक इंगलिश चैनल पर ‘वाकिंग डैथ’ नामक सीरियल देख कर मातापिता की हत्या की योजना बनाई थी. हत्या के दिन उदयन ने सुंदरनगर के ही गायत्री मैडिकल स्टोर्स से नींद की गोलियां खरीद ली थीं.

अलमारी में कपड़े सहेज कर रखती इंद्राणी को उदयन ने धक्का दे कर पलंग पर ढकेल दिया. इंद्राणी की बूढ़ी हड्डियों में दम नहीं था, वह अपने हट्टेकट्टे बेटे का ज्यादा विरोध नहीं कर पाईं. कुछ ही देर में उदयन ने उन का गला घोंट दिया.

लगभग आधे घंटे बाद बी.के. दास चिकन ले कर घर आए और इंद्राणी के बारे में पूछा तो उदयन ने सहज भाव से उन्हें बताया कि मां ऊपर कपड़े रख रही हैं. इस बात से संतुष्ट हो कर उन्होंने उदयन से चाय बनाने को कहा तो वह चाय बना लाया और उन के कप में नींद की 5 गोलियां मिला दीं.

चाय पीने के बाद बी.के. दास नींद की आगोश में चले गए तो उदयन ने उन की गला घोंट कर हत्या कर दी. अब समस्या लाशों को ठिकाने लगाने की थी. उन दिनों सुंदरनगर इलाके में कंस्ट्रक्शन का काम जोरों पर चल रहा था. उदयन ने बगल में काम करने वाले एक मजदूर को बुलाया और लौन के दोनों कोनों में गड्ढे खुदवा लिए. देर रात उस ने अपने जन्मदाताओं की लाशें घसीट कर गड्डों में डालीं और उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया.

इस के बाद किसी ने बी.के. दास और उन की पत्नी इंद्राणी दास को नहीं देखा और न ही उन के बारे में कोई पूछने वाला था. उदयन की मौसी प्रिया चटर्जी ने जरूर एकाध बार उस के घर आ कर पूछा तो उदयन ने उन्हें टरकाऊ जवाब दे दिया.

भोपाल पुलिस उदयन को ले कर राजधानी एक्सप्रैस से 6 फरवरी को करीब 11 बजे रायपुर पहुंची और सुंदरनगर जा कर उस लौन की खुदाई शुरू करवा दी, जहां उदयन ने अपने मांबाप की कब्र बनाई थी. 3 घंटे की खुदाई के बाद लगभग 6 फुट नीचे से दोनों की खोपडि़यां निकलीं. साथ ही इंद्राणी के कपड़े, सोने की 4 चूडि़यां, चेन, एक ताबीज और बी.के. दास की पैंटशर्ट, बेल्ट और ताबीज भी कब्रों से मिले.

इस बंगले के मौजूदा मालिक हरीश पांडेय हैं, जो खुदाई होते वक्त वहां मौजूद थे. उन्होंने यह मकान उदयन से सुरेंद्र दुआ नाम के ब्रोकर के जरिए खरीदा था. 1800 वर्गफीट पर बने इस मकान का सौदा 30 लाख रुपए में हुआ था जोकि उन्हें सस्ता लगा था. हरीश ने जब यह मकान खरीदा था तब यहां बगीचा नहीं था, बल्कि खाली जमीन थी, जिस पर उन्होंने काली मिट्टी डाल कर गार्डन बनवा लिया था. उस वक्त उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उदयन के मांबाप की कब्रें यहां बनी हुई हैं.

दोपहर ढाई बजे तक खुदाई का काम पूरा हो गया और सारे सबूत मिल गए. रायपुर पुलिस ने उदयन के खिलाफ मांबाप की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. उदयन अब चर्चा के साथसाथ शोध का भी विषय बन गया था. 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या, अपहरण व धोखाधड़ी जैसे दरजन भर मामले दर्ज किए हैं. रायपुर से उसे बांकुरा पुलिस बंगाल ले गई, फिर उसे वापस रायपुर लाया गया. जाहिर है, सब कुछ साफ होने तक उदयन रिमांड पर भोपाल, रायपुर और कोलकाता के बीच झूलता रहेगा.

7 फरवरी को जब उसे बांकुरा पुलिस ने सीजेएम अरुण कुमार नंदी की अदालत में पेश किया गया तो वहां गणतंत्र समनाधिकार नारी मुक्ति ने विरोध प्रदर्शन करते हुए उस पर पत्थर बरसाए. उदयन की कहानी खत्म सी हो गई है, पर जिज्ञासाएं और सवाल अभी भी बाकी हैं, जिन में से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के मिलना शेष हैं.

अपनी मां इंद्राणी का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उस ने 8 फरवरी, 2013 को इटारसी नगर पालिका में रजिस्ट्रेशन फार्म भरा था. इस में उस ने मां की मौत 3 फरवरी, 2013 को 66 वर्ष की उम्र में होना लिखा था. इंद्राणी का स्थाई पता उस ने रायपुर का ही लिखाया था और अस्थाई पता द्वारा हेलिना दास, गांधीनगर, इटारसी लिखवाया था. इस आधार पर उसे इंद्राणी का डेथ सर्टिफिकेट मिल गया था जबकि पिता बी.के. दास का मृत्यु प्रमाणपत्र उस ने इंदौर जा कर बनवाया था.

जल्द ही साबित हो गया कि उदयन अव्वल दरजे का खुराफाती और चालाक शख्स भी था जो संयुक्त खाते से अपनी मां की पेंशन निकाल रहा था. इस बारे में फेडरल बैंक के कुछ अधिकारी शक के दायरे में हैं. इंद्राणी पेंशनभोगी कर्मचारी थीं. हर पेंशनभोगी को साल में एक बार अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को देना होता है. आमतौर पर पेंशनधारी खुद बैंक जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण दे कर आते हैं.

अस्वस्थता, नि:शक्तता या किसी दूसरी वजह से बैंक जाने में असमर्थ पेंशनर्स को डाक्टरी हेल्थ सर्टिफिकेट देना पड़ता है. कैसे हर साल उदयन अपनी मां के जीवित होने का प्रमाणपत्र बैंक को दे रहा था, यह गुत्थी अभी पूरी तरह नहीं सुलझी है. लेकिन साफ दिख रहा है कि उदयन से किसी बैंक कर्मचारी की मिलीभगत थी.

हालांकि जनवरी 2012 में उस ने मां के जीवित होने का प्रमाण पत्र डिफेंस कालोनी, दिल्ली के डाक्टर एस.के. सूरी से लिया था, जिस की जांच ये पंक्तियां लिखे जाने तक चल रही थीं. अगर शुरू में ही फेडरल बैंक कर्मचारियों ने सख्ती बरती होती तो इंद्राणी की मौत का राज वक्त रहते खुल जाता.

सब कुछ साफ होने के बाद यह भी उजागर हुआ कि उदयन मांबाप की हत्या के बाद अय्याश हो गया था. नशे के साथसाथ उसे अलगअलग लड़कियों से सैक्स करने की लत भी लग गई थी. अपनी हवस बुझाने के लिए वह कालगर्ल्स के पास भी जाता था या फिर उन्हें होटलों में बुला कर ऐश करता था. फेसबुक पर उस के सौ से भी ज्यादा एकाउंट थे, जिन की प्रोफाइल में खुद को वह बड़ा कारोबारी बता कर लड़कियों को फांसता था.

उदयन की एकदो नहीं, बल्कि 40 गर्लफ्रैंड थीं जो उस की हवस पूरी करने के काम आती थीं. इन में कई अच्छे घरों की लड़कियां भी शामिल थीं. उदयन का प्यार दिखावा भर होता था. साल छह महीने में ही एक लड़की से उस का जी भर जाता था और उसे वह बासी लगने लगती थी. फिर किसी न किसी बहाने वह उसे छोड़ देता था. अभी तक 14 ऐसी लड़कियों की पहचान हो चुकी है, जिन के उदयन के साथ अंतरंग संबंध थे. 2 गायब युवतियों को पुलिस ढूंढ रही है, शक यह है कि कहीं उदयन ने इसी तर्ज पर और भी कत्ल तो नहीं किए.

शराब और ड्रग्स के आदी उदयन ने मांबाप का पैसा जम कर अय्याशियों में उड़ाया. ऐसा मामला पहले न मनोवैज्ञानिकों ने देखा है, न ही वकीलों ने और न ही उन पुलिस वालों ने जिन का वास्ता कई अनूठे अपराधियों से पड़ता है. सब के सब उदयन दास की हकीकत जान कर हैरान हैं.

दास दंपति ने हाड़तोड़ मेहनत कर के जो पैसा कमाया था. शायद यह सोच कर कि बुढ़ापा आराम से बेटेबहू और पोते के साथ गुजरेगा. लेकिन उसी बेटे ने उन का बेरहमी से अर्पणतर्पण कर डाला और उन की अस्थियां तक लेने से मना कर दिया.

उदयन की परवरिश का मामला एक गंभीर विषय है जिस पर काफी सोचसमझ कर बोलने और सोचने की जरूरत है, क्योंकि हत्या जैसे संगीन जुर्म की वजह बचपन के एकाकीपन, किशोरावस्था की हिंसा और युवावस्था की क्रूरता को नहीं ठहराया जा सकता.