Crime Stories: जानलेवा

Crime Stories: इन्क्वायरी अफसर ने अपनी जांच में पूरे भरोसे के साथ औफिस बौय रमीज को कत्ल के इल्जाम में फंसा दिया था कि असली मुलजिम यही है, लेकिन एडवोकेट मिर्जा अमजद बेग ने अपने तर्कों से उस की जांच को गलत साबित कर दिया. जो औरत मेरे सामने बैठी थी, वह चेहरे से ही काफी परेशान लग रही थी. वह 28-29 साल की गोरी सी दुबलीपतली औरत थी. शक्लसूरत से वह किसी शरीफ घराने की लग रही थी. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने दुखी

लहजे में कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर को बचा लीजिए.’’

‘‘आप के शौहर को क्या हुआ, किस से बचाना है उन्हें?’’

‘‘पुलिस उन्हें कत्ल के इल्जाम में पकड़ ले गई है.’’

‘‘आप के शौहर ने किस का कत्ल किया है?’’

‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने कोई कत्ल नहीं किया, फिर भी उन पर पुलिस माजिद निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ ले गई है. उन्हें किसी गहरी साजिश के तहत फंसाया गया है.’’

मेरे सवालों के जवाब में उस औरत ने जो बताया था, उस के अनुसार औरत का पति रमीज और माजिद निजामी एक ही कंपनी में काम करते थे. कंपनी का नाम खान ट्रेडर्स था, जो एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम करती थी. निजामी उस कंपनी में जनरल मैनेजर था, जबकि रमीज औफिस बौय था. उसे चपरासी भी कह सकते हैं. रमीज सीधासादा, लड़ाईझगड़े से दूर रहने वाला ठंडे मिजाज का आदमी था. उस से औफिस का हर आदमी खुश रहता था.

इतना जान लेने के बाद मैं ने उस औरत, जिस का नाम सानिया था, से पूछा, ‘‘जब तुम्हारे शौहर के सब से इतने अच्छे संबंध थे तो फिर उन्हें पुलिस क्यों पकड़ ले गई?’’

उस ने उदासी से कहा, ‘‘यह मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘यह कब और कहां की बात है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘माजिद निजामी को कल शाम औफिस के उस के कमरे में कत्ल किया गया था और मेरे शौहर को आज सुबह 9-10 बजे घर से गिरफ्तार किया गया. उस समय वह औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे.’’

‘‘गिरफ्तार करते समय पुलिस ने क्या कहा था?’’

‘‘कोई सवाल किए बगैर पुलिस ने सीधे उन पर निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ लिया था. परेशान हो कर मैं भागीभागी थाने पहुंची तो वहां सिर्फ इतना पता चला कि रमीज ने औफिस के मैनेजर निजामी का कत्ल कर दिया है. इस के बाद मैं उन के औफिस गई तो बाकी बातें वहां से पता चलीं.’’

‘‘आप को इस केस से संबंधित छोटीबड़ी जो भी बातें औफिस से पता चली हों, मुझे विस्तार से बताओ. उस के बाद ही मैं आप के शौहर की कुछ मदद कर सकूंगा.’’

सानिया ने मुझे जो कुछ बताया था, वह इस प्रकार था. खान ट्रैडर्स का औफिस एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में था, जो बलोच कालोनी के पास थी. उस बिल्डिंग में खान ट्रैडर्स का औफिस तीसरी मंजिल पर था. वहां एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम होता था. रमीज को वहां काम करते 6 साल हो गए थे. वह भले ही कम पढ़ालिखा था, लेकिन चपरासी का अपना काम बहुत अच्छे से करता था, जैसे फाइलें इधर से उधर पहुंचाना, चाय बनाना, पिलाना, लंच करवाना और औफिस की सफाई आदि अपनी निगरानी में करवाना. बैंक के काम भी वही करता था.

सईद खान बड़ा बिजनैसमैन था. एक अरसे से वह यह कंपनी चला रहा था. शहर में उस का नाम था. वह डिफैंस इलाके में रहता था. अन्य स्टाफ में महमूद खान, जो एकाउंट देखता था, नादिरा अलवी कंपनी की डायरेक्टर थीं. मकतूल निजामी जनरल मैनेजर था. लुबना अली रिसैप्शनिस्ट थीं, जो फोन औपरेटर का भी काम करती थीं. खान ट्रैडर्स के औफिस का समय 10 बजे से 6 बजे था. एक रमीज को छोड़ कर बाकी सभी लोग 11 बजे तक आते थे. वह जल्दी इसलिए आ जाता था, क्योंकि उसे औफिस खोल कर साफसफाई करवानी होती थी. उस दिन वह औफिस जाने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था.

मकतूल निजामी समनाबाद में अपनी बीवीबच्चों के साथ रहता था. वह कर्मठ और ईमानदार आदमी था. औफिस में वह काफी देर तक काम करता था, जिस से रात 9 बजे तक घर पहुंचता था. लेकिन उस दिन जब वह 10 बजे तक भी घर नहीं पहुंचा तो उस की बीवी शाइस्ता ने औफिस फोन किया. औफिस में किसी ने फोन नहीं उठाया तो उसे लगा कि वह औफिस से निकल चुके हैं. उस ने थोड़ी देर और राह देखी. जब काफी देर हो गई तो उस ने असिस्टैंट को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘आ जाएंगे, कहीं फंस गए होंगे.’’

लेकिन शाइस्ता की परेशानी बढ़ती जा रही थी, क्योंकि निजामी का कुछ अतापता नहीं चल रहा था. असिस्टैंट ने बताया था कि जब वह औफिस से निकला था तो निजामी काम कर रहे थे. रमीज भी था. उस ने यह भी बताया कि जब एकाउंटैंट महमूद औफिस से निकला था तो उन के पास कोई मिलने वाला बैठा था. जब कहीं से कुछ पता नहीं चला तो रात साढ़े 11 बजे शाइस्ता ने अपने बड़े बेटे इमरान को मोटरसाइकिल से औफिस भेजा. घर से औफिस काफी दूर था, इसलिए वह वहां देर रात पहुंचा. वह मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए पार्किंग में गया तो यह देख कर चौंका कि उस के पापा की कार वहां खड़ी थी. इस का मतलब पापा अभी औफिस में ही थे.

उस ने एक बार फिर औफिस में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. वह बड़बड़ाया, ‘अगर पापा अंदर हैं तो फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं?’

उस ने चौकीदार के पास जा कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जब मैं ने औफिस बंद किया था तो वहां कोई नहीं था.’’

चौकीदार भी सोच में पड़ गया कि आखिर निजामी साहब कहां चले गए? इमरान ने पूछा, ‘‘क्या तुम ने उन्हें जाते हुए देखा था?’’

‘‘नहीं, मैं उस समय गेट पर मौजूद नहीं था.’’

‘‘जब उन की गाड़ी यहां खड़ी है तो वह कैसे चले गए?’’

‘‘हो सकता है गाड़ी खराब हो गई हो, इसलिए यहीं छोड़ गए हों.’’

‘‘वह कभी इस तरह गाड़ी छोड़ कर नहीं जा सकते. चलो मान लेते हैं कि उन्होंने गाड़ी छोड़ दी, लेकिन उन्हें घर तो पहुंचना चाहिए. तुम मेरे साथ ऊपर चलो, हम वहां देखते हैं.’’

चौकीदार इमरान के साथ चल पड़ा. ऊपर जाते हुए चौकीदार ने पूछा, ‘‘आप ने औफिस के अन्य लोगों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था?’’

‘‘हां, उन के असिस्टैंट और दोस्तों से पूछा था, कहीं से कुछ पता नहीं चला. रिश्तेदारों से भी पूछा था.’’

चौकीदार ने सोचते हुए कहा, ‘‘एक उलझन है. जब कोई औफिस में गाड़ी छोड़ कर जाता है तो मुझे जरूर बताता है, पर निजामी साहब ने कुछ नहीं कहा था.’’

ऊपर पहुंच कर चौकीदार ने निजामी के कमरे के दरवाजे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखिए, दरवाजा बंद है.’’

लेकिन जब इमरान ने दरवाजे के हैंडल को घुमा कर हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. इस का दरवाजा लौक नहीं था. चौकीदार बड़बड़ाया, ‘‘मैं ने तो सारे दरवाजों के हैंडल घुमा कर देखे थे, पता नहीं यह कैसे खुला रह गया?’’

दोनों कमरे के अंदर घुसे. कमरे में लाइट जल रही थी. पंखा भी चला रहा था. सामने एक दहशतनाक मंजर था, निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था, उस की गरदन और सिर टेबल पर बेढंगे अंदाज में रखा था. चेहरे का बायां हिस्सा बाएं कान के बल पर टेबल पर टिका था और दाईं ओर से उस की गरदन कान से जरा नीचे और आगे से पीछे तक कटी हुई नजर आ रही थी. किसी बहुत तेज धार वाले हथियार से गरदन इस तरह काटी गई थी कि आधी से अधिक कट गई थी. यह खतरनाक काम उस समय किया गया था, जब निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था.

गरदन काटने के बाद उस का सिर झटके से टेबल पर आ टिका था. वार इतना घातक था कि उसे मरने में जरा भी देर नहीं लगी. उस की गरदन से निकला खून औफिस में बिछे कालीन को दागदार कर गया था. इमरान बाप की लाश देख कर बुरी तरह घबरा गया. उस ने मां को फोन किया. चौकीदार ने कंपनी के मालिक सईद खान और अन्य लोगों को फोन किया. करीब 4 बजे सुबह तक सईद खान, महमूद, नादिरा और लुबना आदि पहुंच गए. रमीज के घर फोन नहीं था, इसलिए उसे खबर नहीं दी जा सकी. जल्दी ही पुलिस भी पहुंच गई.

इंसपेक्टर कादरबख्श अपने 2 साथियों के साथ आया था. जांचपड़ताल और पूछताछ शुरू हुई. चौकीदार से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस का शक रमीज पर गया. पुलिस को उसी पर क्यों शक हुआ, यह आप को अदालत की काररवाई के दौरान पता चलेगा. सानिया की विपदा सुन कर मैं ने यह केस ले लिया था. अगले दिन पुलिस ने रमीज को अदालत में पेश किया. उस पर निजामी का बेदर्दी से कत्ल करने का इल्जाम था. हालात और मौके की स्थिति भी कुछ यही कह रही थी. अदालत ने थोड़ी काररवाही के बाद मुलजिम रमीज को 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया.

अदालत के बाहर सानिया 5 साल की बेटी को लिए परेशान खड़ी थी. मैं ने उसे तसल्ली दे कर कहा, ‘‘यह कत्ल का केस है, अभी जमानत का सवाल ही नहीं उठता. चिंता मत करो, अगर तुम्हारा शौहर बेगुनाह है तो वह जरूर छूट जाएगा.’’

रमीज से मुलाकात होने पर कई बातें और पता चलीं. औफिस के हालात, आपस के ताल्लुक और वहां की हर छोटीबड़ी बात मैं ने उस से पूछी. मैं ने उस से कहा, ‘‘सारी सच्चाई सुन कर साफ लगता है कि तुम्हें फंसाया गया है, पर इस का ठोस सबूत ढूंढना जरूरी है. तुम्हारा औफिस में कोई ऐसा हमदर्द है, जो तुम्हारी मदद कर सकता है.’’

‘‘हां, लुबना मैम औफिस की राजनीति में नहीं रहतीं. वह मेरी हमदर्द भी हैं. वह आप को बहुत कुछ बता सकती हैं, क्योंकि उन्हें काफी कुछ पता है.’’

‘‘मैं लुबना से बात करूंगा. क्या औफिस के बाहर भी तुम्हारा ऐसा कोई दोस्त है, जो मेरे लिए जानकारियां जुटा सकता है?’’

‘‘हां, मेरा एक अच्छा दोस्त है बाबर अली, वह प्रूफ रीडिंग करता है, समझदार और पढ़ालिखा भी है.’’

रमीज ने उस का फोन नंबर मुझे दे दिया था. मैं ने लुबना से फोन पर बात की तो उस ने कहा, ‘‘यहां मैं कुछ नहीं कह सकती. आप के औफिस आ कर बात करूंगी.’’

अगले दिन शाम को वह मेरे औफिस आई. मुझे उस से काफी उपयोगी जानकारियां मिलीं. पर इस शर्त के साथ कि बीच में उस का नाम नहीं आना चाहिए. इस के बाद मैं ने बाबर अली से मुलाकात की. वह बड़े काम का आदमी निकला. मैं ने उसे केस से संबंधित कुछ जानकारियां जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी थीं, उस ने बड़ी मेहनत तथा फुरती से काम शुरू कर दिया और कई बातें मालूम कर लीं. वे जानकारियां रमीज को बरी करवाने में बड़ी उपयोगी साबित हुईं.

रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भी रमीज की जमानत नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक माजिद निजामी की मौत 11 जुलाई की रात 6 से 8 के बीच हुई थी. तेज धार वाले हथियार से उसे मौत के घाट उतार गया था. पुलिस ने वहीं से हथियार को बरामद भी कर लिया था. वह तेज धार की बड़ी छुरी थी. उस के लंबे फल पर लगे खून के नमूने को लेबौरेटरी भेजा गया था, वहां से पता चला कि उसी से कत्ल किया गया था. 2 महीने बाद मुकदमे की बाकायदा सुनवाई शुरू हुई. जज ने मुलजिम के अपराध की रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई. मेरे मुवक्किल ने कत्ल से साफ इनकार कर दिया. सरकारी वकील ने रमीज से कुछ सवाल किए. जिस का मतलब कुछ इस तरह निकलता था.

वह 6 सालों से खान ट्रैडर्स में मेहनत, लगन और ईमानदारी से काम कर रहा था. उस से सब खुश थे, घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से वह अकसर कंपनी से लोन या एडवांस लेता रहता था. पिछले 6 सालों में वह 9 बार एडवांस ले चुका था. सरकारी वकील ने इसी बात को मुद्दा बना कर उसे उलझाना चाहा, ‘‘रमीज, तुम ने दसवीं बार औफिस से एडवांस मांगा था. इस की क्या वजह थी और इस का क्या नतीजा निकला था?’’

‘‘मैं एक बड़ी मुसीबत में फंस गया था. मेरे एक बड़े ही अजीज दोस्त ने मुझ से 10 हजार रुपए मांगे थे, जो मेरे पास नहीं थे. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. मैं ने जो एडवांस ले रखा था, उस की सिर्फ 2 किश्तें बाकी थीं. इसलिए मैं एडवांस नहीं ले सकता था. मैं ने एक सूदखोर से एक महीने के लिए 10 हजार रुपए उधार ले कर अपने उस दोस्त को दे दिए थे.

‘‘उस ने एक महीने में लौटाने का वादा किया था. मैं ने उसे बता दिया था कि ये रुपए 1 हजार रुपए महीने के ब्याज पर ले कर दे रहा हूं, जिसे हर हाल में अगले महीने लौटाना है. पर मेरी बदनसीबी कि मेरा वह दोस्त मेरे रुपए ले कर दुबई चला गया और मैं फंस गया. 2 महीने ब्याज भरने के बाद औफिस का एडवांस पूरा हो गया तो मैं ने औफिस से एडवांस मांगा, पर कंपनी ने एडवांस देने से साफ मना कर दिया.’’

‘‘एडवांस न मिलने पर तुम्हें जनरल मैनेजर पर सख्त गुस्सा आया होगा. तुम्हें लगा होगा कि उसे किसी ने तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया है.’’

‘‘मैं मुश्किल में था, इसलिए गुस्सा आना लाजिमी था. इस से पहले हर बार मुझे एडवांस मिल गया था. इसलिए मुझे यह शक भी हुआ.’’

‘‘इसी बात को ले कर तुम एकाउंटैंट महमूद के पास भी गए थे. उस ने तुम से हमदर्दी तो जताई, पर जनरल मैनेजर के आदेश के बगैर वह तुम्हें एडवांस नहीं दे सकता था. तुम ने महमूद के सामने कहा था, ‘जी चाहता है कि जनरल मैनेजर को चाय में जहर मिला कर पिला दूं.’ क्या यह सच है?’’

‘‘हां, उस दिन मैं बहुत परेशान था. तब गुस्से में मैं ने ऐसा कह दिया था, पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था.’’

‘‘और तुम ने बदला लेने के लिए जहर के बजाय निजामी का छुरी से कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठ है, मेरे खिलाफ कोई साजिश रची गई है.’’

‘‘क्या तुम इस बात से इनकार करोगे कि वारदात वाले दिन मृतक का कोई दोस्त उस से मिलने आया था?’’

‘‘जी हां, आए थे. उन का नाम तौसीफ अहमद था.’’

‘‘मृतक ने उस के लिए तुम से चाय लाने को कहा था?’’

‘‘जी हां, चाय लाने के लिए कहा था. लेकिन उस दिन दूध खत्म हो गया था, तब मैं चाय लेने नजदीक के होटल चला गया था.’’

‘‘तुम ने चाय लाने में इतनी देर कर दी कि दोस्त ही नहीं, औफिस के सभी कर्मचारी तक चले गए. आखिर क्यों देर की? देर होने पर उन्होंने तुम्हें डाटा होगा. उस के बाद तुम ने गुस्से में उन का कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठा इल्जाम है. कत्ल से मेरा कोई वास्ता नहीं है. होटल में लड़ाई हो रही थी, इसलिए मुझे आने में देर हो गई थी. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, मैं ने कत्ल नहीं किया.’’

इस के बाद सरकारी वकील की जिरह खत्म हो गई. मैं ने जज से इन्क्वायरी अफसर से कुछ सवाल पूछने की इजाजत मांगी. इजाजत मिलने पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘इंसपेक्टर कादरबख्श साहब, अभी सरकारी वकील से पता चला कि जब मेरा मुवक्किल चाय ले कर आया तो जनरल मैनेजर का दोस्त और दूसरे लोग जा चुके थे. मुलजिम ने अच्छा मौका देख कर उस का कत्ल कर दिया. आप इस बात को साबित कैसे करेंगे? जबकि मेरा मुवक्किल इस इल्जाम से मना कर रहा है. आप के पास इस वारदात का कोई गवाह भी नहीं है.’’

‘‘जिस समय मृतक का दोस्त आया था, मुलजिम के अलावा एकाउंटैंट महमूद भी मौजूद था. जब मुलजिम को चाय लेने भेजा गया था, तब तीनों थे. लेकिन जब वह लौट कर आया तो महमूद और तौसीफ जा चुके थे. इस के बाद यह काम कौन कर सकता है सिवाय रमीज के? यह उसी का काम हो सकता है?’’ इन्क्वायरी अफसर ने कहा.

‘‘वाह जनाब, क्या थ्यौरी है. जरा सी डांट पड़ने पर मुलजिम कत्ल कर के आराम से घर चला गया और उस ने दरवाजा तक बंद नहीं किया. एक बात बताइए, क्या आप ने छुरी से फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘जी हां, फिंगरप्रिंट्स उठाए थे.’’

‘‘क्या छुरी पर मुलजिम की अंगुलियों के निशान मिले थे?’’

‘‘नहीं, उस पर निशान नहीं मिले, साफ कर दिए होंगे.’’

‘‘मैं आप से जो सवाल करने जा रहा हूं, जरा उस का सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा. क्या आप ने मकतूल की लाश और कमरे की ध्यान से जांच कर के कमरे का नक्शा तैयार किया था?’’

‘‘जी हां, सब बहुत ध्यान और सावधानी से किया था.’’

मैं ने भी कमरे और लाश की स्थिति के बारे में पता किया था. इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘आप की तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक मृतक को तेज धार वाली छुरी से मारा गया था. उस की आधी से ज्यादा गरदन कट गई थी. जब वार किया गया था, वह अपनी कुरसी पर बैठा था. गरदन कटने के बाद सिर टेबल पर आ टिका था. गरदन का कटा हुआ हिस्सा ऊपर और सुरक्षित हिस्सा नीचे टेबल पर टिका था, मैं गलत तो नहीं कह रहा इंसपेक्टर साहब?’’

‘‘नहीं, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’

‘‘अब मैं घटनास्थल की बात करता हूं. उस कमरे में 2 दरवाजे हैं, एक अंदर जाने का और दूसरा वौशरूम का. मृतक की टेबल 3 बाई 5 फुट की है, जिस के आगे आने वालों के लिए कुर्सियां रखी हैं. मृतक के बाएं हाथ की ओर एक साइड टेबल रखी है, इसलिए वह दाईं ओर से अपनी कुरसी तक जाता था. फर्श पर ब्लू कालीन बिछा है, सफेद परदे लगे हैं, ठीक है न?’’

मैं ने घटनास्थल का ऐसा नक्शा खींचा कि इन्क्वायरी अफसर हैरान हो कर बोला, ‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन एक बात मेरी समझ में यह नहीं आई कि यह सब बता कर आप साबित क्या करना चाहते हैं?’’

सरकारी वकील ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘मिर्जा साहब को इस तरह की बेमतलब की बातें कर के मुकदमे को उलझाने की आदत है. जनाबेआली इन्हें रोका जाए.’’

जज ने मेरी ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘आप का इस बारे में क्या कहना है बेग साहब?’’

‘‘जनाबेआली, मैं ने यह सारी मेहनत ऐसे ही नहीं की है. इस का इस मुकदमे से गहरा संबंध है, जिस का खुलासा आगे होगा. पहले इस मामले के गवाह मि. महमूद और मि. तौसीफ अहमद के बयान हो जाएं. जो कुछ मैं ने इन्क्वायरी अफसर से पूछा है, उस का ताल्लुक मेरे मुवक्किल की बेगुनाही से है.

‘‘मुझे पूरा यकीन है कि उसे साजिश कर के फंसाया गया है, वह बेकसूर है. कातिल कोई और है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार निजामी की मौत 6 से 8 बजे के बीच हुई थी. 6 बजे औफिस के अन्य लोग जा चुके थे. एकाउंटैंट 6 बजे औफिस से निकला था.

‘‘मुलजिम, मृतक और मृतक का दोस्त औफिस में मौजूद था. अगर पुलिस का यह दावा है कि कत्ल मेरे मुवक्किल ने किया है तो मैं भी दावा कर सकता हूं कि कत्ल तौसीफ अहमद या महमूद ने किया है या इस के अलावा बाहर का भी कोई आदमी हो सकता है. खैर, कातिल जो भी है, जल्दी ही सामने आ जाएगा. यह सारी मेहनत मैं ने इसीलिए की है.’’

‘‘ओके इट्स ओके, क्या अब आप मुलजिम से कुछ सवाल पूछना चाहते हैं?’’

‘‘जनाबेआली, मैं मुलजिम से 2-4 सवाल जरूर पूछूंगा, जिस से अगली सुनवाई में आसानी रहे.’’

जज ने मुझे इजाजत दे दी.

मैं ने रमीज से पूछा, ‘‘तुम बता सकते हो कि वारदात वाले दिन मृतक का दोस्त तौसीफ अहमद उस से मिलने कितने बजे औफिस पहुंचा था?’’

‘‘जी मुझे बिलकुल याद है. वह साढ़े 5 या पौने 6 बजे आए थे.’’

‘‘एक जवाब चाहिए.’’

‘‘करीब 5:40 पर आए थे.’’

‘‘जब तौसीफ अहमद आए थे, तब औफिस में कौनकौन था?’’

‘‘सिर्फ एकाउंटैंट महमूद साहब थे, बाकी सभी लोग जा चुके थे.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’

‘‘मेहमान से चाय के लिए पूछना मेरी ड्यूटी थी. जब मैं ने निजामी साहब से पूछा तो उन के दोस्त ने कहा, ‘अच्छी सी चाय पिलवाओ.’

‘‘हमारी बिल्डिंग के पास ही एक होटल है. मैं वहीं चाय लेने चला गया था.’’

‘‘तुम चाय लेने होटल क्यों गए, जबकि खान ट्रैडर्स में चाय बनाने और खाना गरम करने के लिए किचन है.’’ मैं ने थोड़ा तेज लहजे में पूछा.

‘‘वकील साहब, आप की बात सही है. पर उस दिन दूध खत्म हो गया था, इसलिए मुझे चाय लाने के लिए बाहर जाना पड़ा. मैं ने निजामी साहब को इंटरकौम पर बता दिया था कि औफिस में दूध खत्म हो गया है, चाय लेने के लिए बाहर जाना पड़ेगा. उन्होंने इजाजत दे दी थी, लेकिन जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘पुलिस जांच के अनुसार, जब तुम चाय ले कर लौटे तो मृतक निजामी का दोस्त तौसीफ अहमद जा चुका था. लेट होने पर मृतक ने तुम्हें डांटा और चाय पीने से मना कर दिया तो तुम ने गुस्से में किचन में जा कर चाय की केतली पटकी और डबलरोटी काटने वाली छुरी पीछे छिपा कर मृतक के कमरे में गए. एडवांस न मिलने से तुम उन से पहले से ही नाराज थे. उन की डांट ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया, जिस से तैश में आ कर तुम ने जनरल मैनेजर माजिद निजामी का कत्ल कर दिया. क्या सब कुछ ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘नहीं, वकील साहब, यह सब झूठ है. मैं चाय लेने गया था, सिर्फ यह सच है.’’

‘‘सच क्या है, विस्तार से बताओ?’’

‘‘मैं चाय लेने होटल गया तो वहां होटल के मालिक की एक आदमी से लड़ाई हो रही थी, जिस से चाय बनने में इतनी देर लग गई कि मैं ऊपर औफिस जाने के बजाय नीचे से ही घर चला गया था.’’

‘‘तुम नीचे से ही घर क्यों चले गए थे?’’ मैं ने यह बात जानबूझ कर पूछी, ‘‘तुम्हें तो चाय लेने भेजा गया था.’’

‘‘हां, मुझे चाय लेने भेजा गया था, लेकिन चाय तैयार होती, उस के पहले ही मैनेजर साहब अपने दोस्त के साथ चले गए थे. जिन के लिए मुझे चाय लानी थी, वे चले गए तो मैं ऊपर औफिस में जा कर क्या करता.’’ रमीज ने आत्मविश्वास के साथ बताया.

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि निजामी साहब अपने दोस्त के साथ चले गए हैं? तुम तो उस समय चाय के लिए होटल में खड़े थे?’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘यह बात मुझे महमूद साहब ने बताई थी.’’

‘‘पर महमूद साहब को तो तुम औफिस में बैठा छोड़ कर गए थे?’’

‘‘यह सच है कि जब मैं चाय के लिए जा रहा था तो महमूद साहब औफिस में बैठे थे. मैं ने उन से भी चाय के लिए पूछा था. तब उन्होंने मना कर दिया था. लेकिन जब मैं चाय के लिए होटल में खड़ा था और चाय तैयार होने वाली थी तो मैं ने महमूद साहब को अपनी ओर आते देखा. करीब आ कर उन्होंने मुझ से कहा, ‘माजिद निजामी चाय का इंतजार कर के अपने दोस्त तौसीफ अहमद के साथ निकल गए हैं. अब चाय ले जाने की जरूरत नहीं है. तुम भी अपने घर चले जाओ.’’

मैं ने कहा, ‘‘अगर वह चले गए हैं तो मुझे औफिस बंद करना होगा. मैं ऊपर जा कर औफिस बंद कर देता हूं.’’

‘‘औफिस मैं ने बंद कर दिया है. मुझे एक जगह जाना है, इसलिए तुम्हारा इंतजार किए बिना ही मैं चला आया. औफिस भी मैं ने बंद कर दिया है.’’

‘‘निजामी साहब से जब इंटरकौम पर बात हुई थी, तब उन्होंने जल्दी आने को कहा था, क्योंकि उन का दोस्त ज्यादा देर रुकने वाला नहीं था. लेकिन लड़ाई की वजह से देर हो गई. महमूद साहब ने बताया कि मेहमान चले गए हैं तो मैं ने सोचा कि मैं औफिस जा कर क्या करूंगा. बहुत होगा, अगले दिन निजामी साहब डाटेंगे तो डांट सुन लूंगा. फिलहाल घर जाना ही बेहतर समझा. मुझे सोचते देख कर महमूद साहब बोले, ‘क्या तुम्हें ऊपर औफिस में कोई काम है क्या?’

‘‘मैं ने कहा, ‘नहीं, मुझे कोई काम नहीं है. आप कह रहे हैं तो मैं घर चला जाता हूं.’ कह कर मैं घर चला गया. अगले दिन मैं औफिस आने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने मुझे कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया.’’

मैं ने आखिरी सवाल पूछा, ‘‘पुलिस जांच के अनुसार मृतक की कार औफिस की बिल्डिंग के नीचे पार्किंग में खड़ी थी, तुम्हारी नजर उस पर नहीं पड़ी?’’

‘‘जनाब, चाय का होटल बाईं ओर जरा अंदर की तरफ है. मैं वहीं से सीधे घर चला गया था. इसलिए गाड़ी मुझे नहीं दिखाई दी. वैसे भी महमूद साहब के कहने पर मुझे उन के जाने का यकीन हो गया था.’’

इस के बाद अदालत का समय खत्म हो गया. अगली पेशी पर 3 गवाहों को अदालत में लाया गया. 2 गवाहों की गवाही में कोई खास बात नहीं थी, तीसरे गवाह का नाम तौसीफ अहमद था, वह 50 साल का अच्छाभला सेहतमंद आदमी था. वह बड़े सुकून और इत्मीनान से विटनैसबौक्स में खड़ा था. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘तौसीफ साहब, आप की मृतक से काफी गहरी दोस्ती थी, उन की मौत का मुझे भी अफसोस है. आप कितने बजे निजामी साहब के औफिस पहुंचे थे?’’

‘‘मैं करीब पौने 6 बजे उन के औफिस पहुंचा था.’’

‘‘उस वक्त वहां कौनकौन था?’’

‘‘निजामी साहब, उन का एकाउंटैंट महमूद और औफिस बौय रमीज. एकाउंटैंट का जिक्र निजामी साहब ने ही किया था.’’

‘‘क्या निजामी साहब ने आप के सामने मुलजिम रमीज को चाय लाने भेजा था?’’

‘‘जी हां, औफिस में दूध खत्म हो गया था. इस के बाद उन्होंने होटल से जल्दी चाय लाने के लिए कहा था, क्योंकि मुझे जरा जल्दी जाना था.’’

‘‘क्या मुलजिम जल्दी चाय ले कर आ गया था?’’

‘‘जल्दी क्या, वह गया तो लौट कर आया ही नहीं.’’

मैं ने नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि उस दिन आप बिना चाय पिए ही चले गए थे, कितने बजे गए थे आप?’’

‘‘मैं करीब साढ़े 6 बजे वहां से निकला था.’’

‘‘जब आप निकले थे, तब तक मुलजिम नहीं आया था?’’

‘‘जी हां, तब तक नहीं आया था, निजामी साहब को बड़ा गुस्सा आया था. अगर वह आ जाता तो चाय उस के मुंह पर फेंक देते, लेकिन वह आया ही नहीं.’’

‘‘अफसोस कि वह सीधे घर चला गया था. उस के बाद उसे औफिस आने का मौका ही नहीं मिला. तौसीफ साहब जब आप साढे़ 6 बजे जाने के लिए औफिस से निकले थे तो क्या निजामी साहब भी आप के साथ निकले थे? जब आप निकल रहे थे तो एकाउंटैंट महमूद अपने कमरे में मौजूद था?’’

‘‘निजामी साहब मेरे साथ नहीं गए थे. उन्हें कुछ काम निपटाने थे. महमूद का मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं निजामी साहब के पास से उठ कर इधरउधर देखे बगैर, सीधे बाहर निकल गया था.’’

‘‘थैंक्यू तौसीफ साहब, आप ने एकदम सटीक जवाब दिए हैं. बस अब आप को एक टेस्ट देना बाकी है. यही टेस्ट निजामी साहब के असली कातिल तक पहुंचाएगा. इस टेस्ट में वही लोग शामिल होंगे, जो 6 बजे से 8 बजे तक औफिस में मौजूद थे.’’

तौसीफ अहमद उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे. सरकारी वकील ने कहा, ‘‘बेग साहब, आप कैसे टेस्ट की बात कर रहे हैं?’’

‘‘यह ऐसा टेस्ट है, जो असली कातिल को सामने ले आएगा.’’ मैं ने जज की ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

जज ने पूछा, ‘‘बेग साहब, अभी आप कितने लोगों का टेस्ट लेंगे और यह कैसा टेस्ट है?’’

‘‘जनाबेआली, यह टेस्ट उन लोगों का लिया जाएगा, जो वारदात के समय वहां मौजूद थे. निजामी साहब तो रहे नहीं, मुलजिम रमीज, गवाह तौसीफ अहमद और कंपनी के एकाउंटैंट महमूद साहब का टेस्ट लेना है. मृतक की गरदन जिस अंदाज में कटी थी, वह खुदकुशी नहीं, यकीनन कत्ल था. फिंगरप्रिंट्स मिले नहीं, इसलिए टेस्ट से ही सच्चाई पता चल सकती है. यह एक साधारण टेस्ट है.’’

मैं ने तौसीफ अहमद से पूछा, ‘‘आप टेस्ट के लिए तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, मैं तो तैयार हूं.’’

मैं गवाह तौसीफ अहमद को जज साहब के पास ले गया. एक पैड और कलम देते हुए बोला, ‘‘आप जज साहब के सामने इस पैड पर लिखें कि मैं ने निजामी साहब का कत्ल नहीं किया है.’’

उन्होंने मेरे कहे अनुसार लिख दिया.

‘‘शुक्रिया अहमद साहब, अब आप जा सकते हैं.’’

जज ने सवालिया नजरों से मेरी ओर देखा तो मैं ने कहा, ‘‘जनाबेआली, मुझे इस टेस्ट से यह साबित करना है कि गवाह तौसीफ बहमद राइट हैंड से काम करने का आदी है.’’

जज साहब ओके, कह कर कागज देखने लगे. फिर वही टेस्ट मैं ने मुलजिम रमीज से करवाया, दोनों कागज जज की टेबल पर रख कर कहा, ‘‘जनाब, मैं यह साबित करना चाहता था कि ये दोनों सीधे हाथ से काम करने के आदी हैं.’’

सरकारी वकील बड़ी उलझन में था. उस ने पूछा, ‘‘जनाबेआली, यह क्या हो रहा है?’’

जज ने कागज देखते हुए कहा, ‘‘बेग साहब यह साबित करना चाहते थे कि ये दोनों राइट हैंडेड हैं. नतीजे के बारे में तो यही बताएंगे.’’

अदालत में बैठे लोग सन्न मारे सारी काररवाही देख रहे थे. मैं ने आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘जैसा कि जज साहब ने बताया है, तौसीफ अहमद और मुलजिम रमीज राइट हैंड से काम करने के आदी हैं. घटनास्थल का नक्शा, कमरे और टेबल की सिचुएशन, लाश की स्थिति इस बात की गवाह है कि माजिद निजामी का कत्ल किसी ऐसे आदमी ने किया है, जो बाएं हाथ से काम करने का आदी है. यानी लैफ्ट हैंडेड है. इसलिए तौसीफ अहमद और रमीज दोनों में से कोई भी कातिल नहीं हो सकता.’’

इन्क्वायरी अफसर जो बड़े ध्यान से सारी काररवाही देख रहा था, एकदम बोल पड़ा, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं बेग साहब?’’

मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘कादरबख्श साहब, आप ने बड़ी बारीकी से लाश की जांच की थी और बड़ी सावधानी से कमरे का नक्शा बनाया था. यह पौइंट आप की समझ में आना चाहिए था.’’

उस के चेहरे पर घबराहट नजर आने लगी. अब मैं ने जज की ओर देख कर कहा, ‘‘जनाबेआली, मैं ने पिछली पेशी में इस से लंबी जिरह जिस मकसद से की थी, उस का मकसद यही था. अब मौका है कि मैं अपने मुवक्किल को बेगुनाह साबित करूं.’’

जज गहरी दिलचस्पी से मेरी बातें सुन रहे थे. अदालत में सन्नाटा छा गया था. सभी का ध्यान मेरी ओर था. मैं अपनी दलीलें आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘जनाबेआली, मृतक की कुरसी उस के कमरे में इस कोण से ऐसी पोजीशन में रखी थी कि दाएं हाथ से काम करने वाले के लिए उस पर, खास तौर पर उस की गरदन पर ऐसा हमला करना नामुमकिन था.

‘‘कमरे की दीवार और मृतक की गरदन के बीच इतना फासला नहीं था कि लंबे फल वाली छुरी को आजादी से घुमा कर गरदन पर भरपूर वार किया जा सकता. अगर इत्तफाक से ऐसा हो भी जाता तो उस स्थिति में गरदन को बाएं तरफ से कान के नीचे से कटना चाहिए था.

‘‘लेकिन हकीकत में मृतक की गरदन दाईं ओर से कान के नीचे से कटी थी. इस का मतलब यह कि किसी लेफ्ट हैंडेड आदमी ने निजामी पर कातिलाना हमला किया था, जो बहुत घातक साबित हुआ. मृतक पलक झपकते ही मर गया.’’

‘‘मेरा तो इस तरफ ध्यान ही नहीं गया. सचमुच यह तो बहुत खास पौइंट है.’’ इन्क्वायरी अफसर ने शर्मिंदा होने वाले लहजे में कहा.

‘‘आप का इस ओर ध्यान नहीं गया, कोई बात नहीं. मैं आप का ध्यान इस तरफ दिला रहा हूं. आप घटनास्थल के नक्शे को दिमाग में ताजा करें और पूरी ईमानदारी से बताएं कि माजिद निजामी का कातिल कौन हो सकता है. लेफ्ट हैंडेड या राइट हैंडेड? यह आप की समझबूझ का टेस्ट है.’’

इन्क्वायरी अफसर ने फौरन दृढ़ता से जवाब दिया, ‘‘कातिल ने वह खतरनाक वार बाएं हाथ से ही किया था. कातिल लेफ्ट हैंडेड था.’’

‘‘और मेरा मुवक्किल एक सौ एक प्रतिशत राइट हैंडेड है.’’ मैं ने जज की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जनाबेआली, आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि मुलजिम दाएं हाथ से काम करने का आदी है. जबकि इन्क्वायरी अफसर भी कह रहे हैं कि कातिल यकीनन लेफ्ट हैंडेड था. इसलिए मेरी आप से दरख्वास्त है कि मेरा मुवक्किल बेगुनाह है, इसलिए उसे बाइज्जत बरी किया जाए.’’

जज ने घूर कर इन्क्वायरी अफसर की ओर देखा और नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि पूरी विवेचना ही गलत है.’’

इन्क्वायरी अफसर घबरा कर बोला, ‘‘जनाबेआली, यह लेफ्टराइट की गलती तो मुझ से हो गई है.’’

‘‘आप की यह लेफ्टराइट की गलती एक बेगुनाह इंसान को गुनहगार बना देती. यह अदालत आप को हुक्म देती है कि 7 दिनों के अंदर नया चालान पेश करें और अब लेफ्टराइट की गलती नहीं होनी चाहिए.’’

उसी वक्त सरकारी वकील की हैरतभरी आवाज गूंजी, ‘यह लेफ्ट हैंडेड व्यक्ति कौन हो सकता है, जिस ने निजामी का कत्ल किया है?’

‘‘मेरे दोस्त अब लेफ्ट हैंडेड कातिल को तलाशना जरूरी है, क्योंकि पहले लापरवाही की गई. अगर कमरे और टेबल की सिचुएशन व नक्शे को बारीकी व सावधानी से देखा जाता तो यह बात पहले ही पता चल जाती कि कातिल लेफ्ट हैंडेड है, क्योंकि जिस तरफ से राइट हैंड उपयोग में आ सकता था, वहां इतनी जगह ही नहीं थी कि खुल कर छुरी का वार किया जा सकता. मैं आप को इतनी हिंट दे सकता हूं कि लेफ्ट हैंड कातिल को इस्तगासा के गवाहों में ही ढूंढ़े, जो 6 से 8 बजे के बीच औफिस में मौजूद थे. एक इशारा और कर दूं, मैं ने अभी तक कातिल का अदालती टेस्ट नहीं लिया है.’’ मैं ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘ऐसा तो सिर्फ एक ही आदमी है, खान ट्रैडर्स का एकाउंटैंट महमूद.’’ उस ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा. इंसपेक्टर साहब, वैसे अक्लमंद को इशारा काफी है.’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. इस के साथ ही अदालत का वक्त खत्म हो गया. अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया. इन्क्वायरी अफसर ने खुद को अक्लमंद साबित करते हुए एकाउंटैंट महमूद को अदालत के सामने पेश कर दिया. महमूद ने पुलिस कस्टडी में ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

वह लेफ्ट हैंडेड था. उसी ने कंपनी के जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतारा था. अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए वारदात के दिन औफिस बौय रमीज को कुरबानी के बकरे की तरह इस्तेमाल किया था. उस से झूठ बोल कर उसे औफिस आने देने के बजाय उसे घर भेज दिया, ताकि अगले दिन जब वह औफिस आए तो फौरन ही उस के कत्ल के इल्जाम में धर लिया जाए. उस के प्लान के मुताबिक ऐसा ही हुआ. औफिस से मिली जानकारी के मुताबिक जनरल मैनेजर निजामी एक बेहद ईमानदार और उसूल वाला आदमी था, जब से उस ने यह कंपनी संभाली थी. उन लोगों को बड़ी तकलीफ थी, जो कंपनी को नुकसान कर के खुद का घर भर रहे थे. बेईमानी करने में सब से ऊपर नाम महमूद का था.

वारदात से करीब 3 महीने पहले मृतक ने एकाउंटैंट का एक संगीन फ्रौड पकड़ लिया था, जिस की वजह से महमूद को बौस के सामने बुरी तरह से अपमानित होना पड़ा था और बौस ने अगली बार उसे निकाल बाहर करने की धमकी दी थी. इस से औफिस में उस की बदनामी और थूथू हुई थी. अपनी बदनामी और अपमान का बदला लेने के लिए वह मौके की ताक में था. उस के दिल में बदले की आग दहक रही थी. रमीज को जनरल मैनेजर ने एडवांस देने से मना कर दिया. रमीज अपनी दिल की भड़ास महमूद के सामने निकालता. निजामी को बुराभला कहता और लोगों के सामने भी उस के खिलाफ बकबक करता.

महमूद को रमीज की शक्ल में एक कुरबानी का बकरा मिल गया. उस ने फैसला कर लिया कि वह जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतार देगा और इस कत्ल का इल्जाम रमीज के सिर पर डाल देगा. ऐसी बातें करेगा, जिस से सब का शक रमीज की तरफ चला जाए. जो लोग उसूल परस्त और ईमानदार होते हैं, उन्हें कदमकदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और कभीकभी ईमानदारी जानलेवा भी साबित होती है, जैसा कि माजिद निजामी के साथ हुआ. पर महमूद भी अपने बदले की आग में खुद जल गया. Crime Stories

 

Hindi Stories: खून सने इश्क की टेढीं राहें

Hindi Stories: तेजिंदर और हिम्मत सिंह को पतिपत्नी के रूप में देख कर एक वरिष्ठ वकील होते हुए भी मैं चकरा गया, इस की वजह यह थी कि उस ने हिम्मत और उस के जीजा को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली थी. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की अदालतों में मैं ने 50 हजार से भी अधिक क्रिमिनल मुकदमे लड़े हैं. इन में कुछ ऐसे भी मुकदमे थे, जिन की चर्चा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी.

आज मैं जिस मुकदमे की बात करने जा रहा हूं, उस तरह का रोचक और अनूठा मुकदमा मेरे पास दोबारा नहीं आया. अपनी तरह का वह एक ऐसा अनोखा मुकदमा था, जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया. वह इतवार का दिन था. 6 दिनों के काम की थकान उतारने को मैं बिस्तर पर अधलेटा चाय की चुस्कियां लेते हुए टीवी देख रहा था. उस समय दिन के साढ़े 11 बज रहे थे. घर के किसी सदस्य ने आ कर बताया कि मुझ से मिलने के लिए हिम्मत सिंह नाम का कोई आदमी कोठी के गेट पर खड़ा है. हिम्मत एक कत्ल के मुकदमे में फंसा था, जिस की पैरवी मैं ने की थी. उस मुकदमे में वह बरी हो गया था. मुझे तुरंत वह सब याद आ गया. लगा, शुक्रिया अदा करने आया होगा. मैं ने उसे भीतर बुला कर ड्राइंगरूम में बैठाने के लिए कह दिया.

कुछ देर बाद मैं सहज रूप से ड्राइंगरूम में पहुंचा तो वहां का दृश्य चौंकाने वाला था. मेरे ठीक सामने वाले सोफे पर तेजिंदर शादी के लाल सुर्ख जोड़े में बैठी थी और उस की बगल में हिम्मत सिंह बैठा था. वह भी खूब बनठन कर आया था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों ने शादी कर ली है. हिम्मत सिंह के हाथ में बड़ा सा मिठाई का डिब्बा था. उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उस के साथ बैठी औरत उस की पत्नी है. इस का मतलब तेजिंदर ने उस से शादी कर ली थी.

मेरे लिए यह अविश्वसनीय एवं विचित्र बात थी. मैं असमंजस में फंस गया था. इसलिए बिना किसी संबोधन के मैं ने सीधे पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’

हिम्मत सिंह के बजाय जवाब तेजिंदर ने दिया, ‘‘जी हां वकील साहब, कल हम ने शादी कर ली. आज आप से आशीर्वाद लेने आए हैं. आप बहुत ही नेक इंसान हैं. आप हम दोनों को हमेशा सुखी रहने का आशीर्वाद दीजिए. मेरी जीत में आप का बहुत बड़ा योगदान है.’’

‘‘सचमुच तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ मैं ने हिम्मत सिंह की ओर देखते हुए वही सवाल इस तरह दोबारा किया, जैसे तेजिंदर की बात पर मुझे विश्वास न हुआ हो.

तेजिंदर मेरी बात का आशय शायद समझ गई, इसलिए फटाक से बोली, ‘‘जी वकील साहब, मैं ने हिम्मत से सचमुच शादी कर ली है.’’

मुझ से रहा नहीं गया. आशीर्वाद की बात भूल कर मैं ने हिम्मत से पूछा, ‘‘क्यों भई, तुम ने उसी से शादी कर ली, जिस ने तुम्हें फांसी पर चढ़वाने का पूरा इंतजाम कर दिया था? यह सब क्या रहस्य है, मेरी कुछ समझ में नहीं आया?’’

‘‘इस के बारे में तो मैं यही कह सकता हूं वकील साहब कि औरत को समझ पाना दुनिया में किसी के वश का नहीं है. तेजिंदर ने न केवल मुझे फांसी के फंदे से बचाया, बल्कि अपने प्यार के फर्ज को निभाते हुए मेरा उजड़ा हुआ घर भी बसा दिया.’’ हिम्मत ने तेजिंदर की ओर देखते हुए कहा. हिम्मत की यह बात मुझे और ज्यादा हैरान करने वाली लगी. इतने दिनों से वकालत के पेशे में रहने के बावजूद मैं उस की बातों का एकदम से कोई मतलब नहीं निकाल सका. फिलहाल मैं ने दोनों को आशीर्वाद दे कर विदा कर दिया. उन के जाने के बाद मैं उन के बारे में गहराई से सोचने लगा.

लुधियाना की तहसील खन्ना में अपने पति बलवान सिंह के साथ रहती थी तेजिंदर कौर. जब वह मेरे पास आई थी तो उस पर 2 साथियों के साथ मिल कर अपने पति का कत्ल करने का आरोप था. उस समय उस ने मुझे जो बताया था, वह सब कुछ इस तरह था. तेजिंदर का पति बलवान सिंह खन्ना के किसी सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह सीधासादा आदमी था. तेजिंदर को पत्नी के रूप में पा कर वह जितना खुश था, उसी तरह उसे भी खुश रखने की कोशिश करता था. पत्नी की एकएक बात का खयाल रखता था. रात में भी वह उसे भरपूर प्यार देने की कोशिश करता.

इतना सब करने के बावजूद भी बलवान के खजाने में शायद किसी रत्न की कमी थी. भले ही वह पत्नी को हर सुख देने की कोशिश करता था, लेकिन तेजिंदर औरत थी. उसे जरूरत थी उस परमसुख की, जिस की चाह में औरतें किसी पर भी अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं. अफसोस की बात यह थी कि वह अनमोल सुख उसे बलावान सिंह से नहीं मिल पा रहा था. यही वजह थी कि इतना प्यार करने के बावजूद बलवान सिंह पत्नी का मन जीत लेना तो दूर, दिन पर दिन वह उस की उपेक्षा एवं नफरत का शिकार होता गया.

फिर एक समय ऐसा भी आ गया, जब तेजिंदर को बलवान से हद से ज्यादा नफरत हो गई. वह हर रात उसे नई उमंग एवं नए उत्साह से अपनी बांहों में समेटता और भरपूर प्यार करने की कोशिश करता, लेकिन अंत में तेजिंदर तड़पती और छटपटाती रह जाती. वह खर्राटे भरने लगता. ऐसे में तेजिंदर की उस के प्रति नफरत बढ़ती ही गई. वह उसे छोड़ कर कहीं और जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी. उन्हीं दिनों उन के बीच एक तीसरा आदमी आ टपका, जो बलवान सिंह का दोस्त हिम्मत सिंह था. कुछ दिनों पहले उस की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी. इसी के बाद उस ने कहीं भी आनाजाना बंद कर दिया था.

एक दिन बलवान जबरदस्ती उसे अपने घर ले आया और उस का दुख कम करने की कोशिश करने लगा. इस कोशिश में उस ने तेजिंदर को भी शामिल कर लिया था. तेजिंदर लगातर उस के साथ रहती थी. उन की बातों से हिम्मत को काफी हौसला और हिम्मत आई. वह सोचने लगा कि अब वह पिछले गम को भुला कर सहज जिंदगी जिएगा. इस के बाद हिम्मत सिंह अकसर बलवान के घर जाने लगा. कभी ऐसा भी मौका आता, जब बलवान सिंह घर पर नहीं होता. ऐसे में अपना फर्ज निभाते हुए तेजिंदर उस की खूब आवभगत करती और पत्नी की मौत का गम भुलाने वाली बातें करती.

ऐसे में ही एक दिन जब हिम्मत उस के यहां आया तो कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद हिम्मत ने तेजिंदर का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘जब से रानो वाहेगुरु को प्यारी हुई है भाभी, मेरा इस दुनिया से जी भर गया था. सुबह उठ कर ऊपर वाले से यही दुआ करता था कि रानो की तरह मुझे भी अपने पास बुला ले. लेकिन अब तुम्हारी यह मनमोहिनी सूरत मेरे मन में ऐसी बस गई है कि मैं इस सूरत का गुलाम बन कर रह गया हूं. सच कहूं भाभी, तुम से ज्यादा खूबसूरत औरत इस दुनिया में दूसरी कोई नहीं हो सकती.’’

तेजिंदर को किसी पराए मर्द से इस तरह अपनी तारीफ सुनना अच्छा तो लगा, लेकिन इस मामले में समझ से काम लेना जरूरी था. जरा सी भूल उस की जिंदगी तबाह कर सकती थी. इस के बावजूद हिम्मत के मुंह से अपनी तारीफें सुनसुन कर वह उस की ओर खिंचने लगी. उस का मन करता कि वह हमेशा उस के पास बैठा उस की खूबसूरती की तारीफें करता रहे. दूसरी ओर हिम्मत जब तेजिंदर की तारीफें करता, उस वक्त उस की आंखों में एक निमंत्रण दिखाई देता था. तेजिंदर को यही लगता था कि अगर उस ने हिम्मत कर के हिम्मत के आगे आत्मसमर्पण कर दिया तो निश्चित ही वह उस की हर इच्छा पूरी कर देगा.

फिर एक दिन ऐसा हो भी गया. उस रात हिम्मत और बलवान ने घर पर महफिल जमा रखी थी. खातेपीते आधी रात हो गई तो बलवान ने हिम्मत को वहीं सो जाने को कहा. उसे बैडरूम में सुला कर बलवान पत्नी को साथ ले कर छत पर सोने चला गया. अप्रैल का महीना था, ठंडीठंडी हवा चल रही थी. जरा ही देर में बलवान और तेजिंदर गहरी नींद सो गए. रात को तेजिंदर को लगा, उसे कोई उठाने की कोशिश कर रहा है. जैसे ही उस की आंखें खुलीं, उठाने वाले ने फटाक से उस का मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया. उस के बाद कान में धीरे से बोला, ‘‘भाभी, आज अपना प्यार दे दो या फिर जहर दे कर मुझे मेरी रानो के पास भेज दो.’’

तेजिंदर ने आवाज पहचान ली थी. लेटेलेटे उस ने तिरछी नजरों से बलवान को देखा. वह गहरी नींद सो रहा था. उस ने मुंह पर रखा हिम्मत कर हाथ हटा कर प्यार से कहा, ‘‘तुम नीचे चल कर अपने बिस्तर पर लेटो, मैं वहीं आ कर तुम से बात करती हूं.’’

हिम्मत चला लेकिन उस ने तेजिंदर के जिस्म को जैसे झकझोर कर रख दिया था. इस के बाद बिना आगेपीछे की सोचे वह हिम्मत के पीछेपीछे आ कर उस के बगल लेट गई. इस के बाद हिम्मत ने रानो की कमी तेजिंदर से पूरी कर ली. दूसरी ओर तेजिंदर को हिम्मत से जो सुख मिला, उस ने जीवन के प्रति उस का नजरिया ही बदल दिया. शादी के बाद उस ने पहली बार महसूस किया था कि जिंदगी इस तरह भी रंगीन हुआ करती है. अपनी इस नई सोच के साथ वह छत पर पहुंची तो बलवान सिंह पहले की ही तरह गहरी नींद में सो रहा था. एक बार झिझक मिटी तो सिलसिला शुरू हो गया. हिम्मत और तेजिंदर को जब भी मौका मिला, दोनों ने उस का फायदा उठा लिया.

कहते हैं, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. बलवान सिंह को भी किसी तरह पत्नी और हिम्मत के संबंधों की भनक लग गई. पहले तो उस ने समाज की ऊंचनीच बता कर तेजिंदर को समझाया. कोई असर न होते देख उस ने तेजिंदर पर सख्ती करनी शुरू कर दी. लेकिन बलवान की ऐसी किसी भी कोशिश का तेजिंदर पर कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि अब तक वह हिम्मत के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. वह पति के सामने ही हिम्मत के साथ के अपने संबंधों को स्वीकार करने लगी थी. इस स्थिति में कोई भी होता, आपा खो बैठता. बलवान भी अब और सख्त हो गया और भूत की तरह पत्नी के आगेपीछे घूमने लगा.

तेजिंदर के लिए यह बरदाश्त के बाहर की बात हो गई थी. आखिर एक दिन उस ने इस बारे में हिम्मत से बात की तो हिम्मत ने कहा, ‘‘पागल है साला, सारी सच्चाई जानता है, फिर भी अपना मुंह काला करवाने पर तुला है. मैं तो कहता हूं कि तुम अपने हिसाब से रहो. अगर ज्यादा चूंचपड़ करे तो झिड़क दिया करो.’’

‘‘हां, यह भी ठीक है. अब ऐसा ही करूंगी.’’ तेजिंदर ने कहा.

दूसरी ओर बलवान सिंह ने दूसरा ही इरादा बना रखा था. उस ने पत्नी को सही राह पर लाने के लिए और अधिक सख्ती शुरू कर दी. एकाध बार उस ने उस की पिटाई भी कर दी.

इस से तेजिंदर को उस से और ज्यादा नफरत हो गई. अगली मुलाकात में उस ने हिम्मत से साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘अगर तुम मुझे हमेशा के लिए अपनी बना कर रखना चाहते हो तो इस आदमी को हमेशा के लिए मेरी जिंदगी से निकाल दो.’’

‘‘उस से तलाक दिलवा दूं?’’ हिम्मत ने मन की बात जानने के लिए हंस कर पूछा.

‘‘मेरी बातों को हंसी से मत टालो. मैं पूरी तरह से गंभीर हूं. वह इस जनम में मुझे तलाक दे नहीं सकता. मेरी मानो तो उसे इस दुनिया से ही विदा कर दो. इस में मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी.’’

‘‘अरे तुम ने तो बहुत दूर तक सोच लिया. उसे मरवा कर खुद भी जेल जाओगी और मुझे भी भिजवाओगी.’’

‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर इस का कुछ नहीं किया गया तो वह निश्चित मुझे मार डालेगा. वह पागल होता जा रहा है. उस के अंदर का जानवर जाग उठा है.’’ कह कर तेजिंदर फूटफूट कर रोने लगी.

हिम्मत को उस के रोने के पीछे कोई बनावट नजर नहीं आई. उस के रोने में भय और मजबूरी साफ झलक रही थी. इसलिए उस की आंखों में खून उतर आया. वह तैश में आ कर बोला, ‘‘वह ऐसावैसा कुछ करे, उस के पहले ही मैं उस का टेंटुआ दबा दूंगा. तू चिंता मत कर, मैं आज ही गांव से अपने जीजा कुलवंत को बुलाए लेता हूं. इस के बाद हम दोनों बलवान की सारी पहलवानी निकाल देंगे. बस आज रात 9 बजे तुम किसी बहाने उसे रेलवे लाइन पर ले जाना.’’

‘‘ठीक है,’’ तेजिंदर ने खुश हो कर कहा, ‘‘ऐसा ही करूंगी. बस तुम तैयार रहना. और हां, तुम्हें यह काम बड़ी होशियारी से करना होगा. यह कांटा निकल गया तो जिंदगी भर मैं तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूंगी.’’

इतना कह कर तेजिंदर ने हिम्मत का हाथ पकड़ लिया तो उस का हाथ अपने सीने पर रख कर हिम्मत ने कहा, ‘‘तुम अपने इस यार पर भरोसा रखो, यारी की है तो मरते दम तक निभाऊंगा भी.’’

यह 11 मई, 1979 की बात थी. घर पहुंच कर आगे की योजना और स्थितियों से निबटने के लिए तेजिंदर विचार करने लगी. इस के बाद सजधज कर बलवान सिंह का इंतजार करने लगी. शाम को ठीक साढ़े 5 बजे बलवान सिंह घर लौटा तो पत्नी को इस तरह सजीधजी देख कर उसे हैरानी हुई. इस से भी ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि आते ही उस की आवभगत में लग गई. उसे चाय दे कर उस से बड़े प्यार से बातें भी करने लगी.

बलवान उस में आए इस बदलाव के बारे में कुछ पूछता, उस ने खुद ही कहा, ‘‘मेरा बदला हुआ रूप देख कर तुम्हें हैरानी हो रही होगी न? दरअसल आज एक साधु बाबा आए थे. मुझे दुखी देख कर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा अपने पति से झगड़ा रहता है न?’

‘‘यह बात उस ने कही या तुम ने खुद ही उस की बातों में आ कर कही?’’

‘‘भला मैं क्यों कहने लगी. फिर हमारा झगड़ा ही कहां है, मैं तो तुम्हारे दोस्त पर तरस खा कर उस से थोड़ा हंसबोल लेती थी, बस इतनी सी बात पर तुम मेरे चरित्र पर लांछन लगा कर मुझे परेशान करने लगे. जान से मारने की धमकियां देने लगे.’’

‘‘देखो तेजिंदर अब तुम बिना मतलब…’’

‘‘आप फिर बनाबनाया मूड खराब करने लगे. आज साधु बाबा जो कुछ मुझ से कह गए हैं, उस से हमारे बीच का झगड़ा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. बाबा ने कहा कि मैं हमेशा तुम्हारा सहयोग करूं, हमेशा तुम्हारी आवभगत करूं. उन्होंने कहा है कि अब हमारा बुरा वक्त टल गया है, जल्दी ही मुझे सारी खुशियां मिल जाएंगीं. अब आप रोजाना मेरा ऐसा ही रूप देखेंगे.’’

तेजिंदर ने ये बातें कुछ इस तरह कहीं कि बलवान को ताज्जुब होने के बावजूद उस का प्यार करने का यह अंदाज बहुत अच्छा लगा. वह खुशी से झूम उठा. तेजिंदर कौन सा षडयंत्र रच रही है, इस बात का उसे जरा भी अंदाजा नहीं हो सका. शाम को दोनों मुख्य बाजार की ओर घूमने भी गए.  खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे फिर से टहलने निकले. घर से थोड़ी दूर जाने पर तेजिंदर ने बलवान का हाथ पकड़ लिया और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ी. उस की प्यारीप्यारी बातों में खोया बलवान यंत्रचालित सा उस के साथ आगे बढ़ता गया. उस समय चारों ओर गहन अंधेरा छाया था. बलवान घर लौटना चाहता था, लेकिन तेजिंदर ने चालाकी से उसे प्यार भरी बातों में उलझाए रखा. तभी उन्हें गुरु सिंह मिल गया.

वह पंजाब पुलिस में सिपाही था और उसी मकान में किराए पर रहता था, जिस में बलवान सिंह रहता था. उतनी रात को सुनसान जगह में उन्हें घूमते देख कर उस ने पूछा, ‘‘इतनी रात को आप लोग रेलवे लाइन की ओर क्या करने जा रहे हैं?’’

‘‘बस, ऐसे ही तेजिंदर का मन हो आया, इसलिए इधर चला आया. और क्या हालचाल है, ड्यूटी कर के आ रहे हो क्या?’’ बलवान ने पूछा.

लेकिन उस की बात का उत्तर दिए बगैर मुसकराता हुआ गुरु सिंह आगे बढ़ गया. तेजिंदर और बलवान बातें करते हुए थोड़ा और आगे बढ़ गए. उस समय दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले रेलवे लाइन के बीचोबीच चल रहे थे. तेजिंदर ने देखा कि हिम्मत सिंह अपने जीजा कुलवंत के साथ रेलवे लाइन के दाईं ओर कच्चे रास्ते से चला आ रहा है. बलवान की नजर हिम्मत और कुलवंत पर पड़ती, उस के पहले ही वे उस के सामने आ कर खड़े हो गए. उन्हें देखते ही उस ने उन के इरादे भांप लिए. उसे तेजिंदर पर भी संदेह हो गया, इसलिए झटके से हाथ छुड़ा कर वह रतनहेड़ी गांव की ओर भागा.

लेकिन हिम्मत ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उस के बाएं पैर पर गड़ासे से वार कर दिया. इस के बावजूद बलवान रेलवे लाइन पार करने में कामयाब हो गया. वह लंगड़ाता हुआ भागने लगा. वह भाग पाता, कुलवंत ने दौड़ कर उस के पेट में तलवार घुसेड़ दी. खून का फव्वारा फूट पड़ा. इस के बाद वह जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. इस के बाद हिम्मत ने गंडासे से उस पर 4-5 वार कर दिए तो थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया. हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए हिम्मत और कुलवंत ने बलवान की लाश को उठा कर रेलवे लाइन के बीचोबीच रख दिया. उन का सोचना था कि रात में ट्रेन गुजरेगी तो उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े हो जाएंगे. तब लोग यही समझेंगे कि उस ने ट्रेन के नीचे आ कर आत्महत्या कर ली है.

तीनों वहां से लौट रहे थे तो मुख्य सड़क पर बलवान सिंह का ममेरा भाई नेगा सिंह मिल गया. उतनी रात को तेजिंदर को 2 गैरमर्दों के साथ घूमने के बारे में उस ने पूछा तो तेजिंदर ने उसे इस तरह झिड़क दिया कि वह अपना सा मुंह ले कर चला गया. इस के बाद हिम्मत और कुलवंत सलौदी की ओर चले गए तो तेजिंदर अपने घर आ गई. अगले दिन यानी 12 मई, 1979 की सुबह खन्नानगर में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि बलवान सिंह रेलगाड़ी के नीचे कट कर मर गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई दुर्घटना कह रहा था तो कोई आत्महत्या मान रहा था. घटनास्थल पर भीड़ लग गई थी.

किसी ने बलवान सिंह की मौत के बारे में तेजिंदर को बताया तो रोतीबिलखती वह लाश के पास पहुंची. उस के वहां पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर एक सबइंसपेक्टर और 3 सिपाही आ चुके थे. आते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले कर अपनी कानूनी काररवाई शुरू कर दी थी. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर के तमाम जानकारी भी जुटा ली थी. इसलिए तेजिंदर जब लाश से लिपट कर रोने का नाटक करने लगी तो वहां मौजूद सबइंसपेक्टर ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि रात में तेजिंदर को मिले सिपाही गुरु सिंह ने पहले ही सब बता दिया था.

इसलिए सबइंसपेक्टर को उसी पर शक था. वह उसे थाने ले जाना चाहते थे. उसे थाने ले जाने के लिए उन्होंने बहाना बनाया कि उन्हें उस से कुछ कागजों पर दस्तखत करवाने हैं, जिस से बलवान के बाद उसे सरकारी नौकरी आसानी से मिल सके. तेजिंदर कभी थाने तो गई नहीं थी. उसे यह भी मालूम नहीं था कि थाने में पुलिस अपराधियों से किस तरह से पेश आती है? इसलिए पुलिस के रौद्ररूप के आगे वह ज्यादा देर टिक नहीं सकी और बलवान की हत्या का अपना अपराध उस ने स्वीकार कर के हिम्मत और कुलवंत के बारे में भी बता दिया.

हिम्मत को अपनी गिरफ्तारी की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सबइंसपेक्टर ने कुलवंत और हिम्मत को तेजिंदर के सामने खड़े कर पूछताछ शुरू की तो पुलिस की परवाह किए बगैर वह एकदम से तेजिंदर पर टूट पड़ा. 4 सिपाहियों ने मिल किसी तरह तेजिंदर को उस के चंगुल से छुड़ाया. तेजिंदर को मारते समय वह कह रहा था, ‘‘तेजिंदर, तू ने जो तिरिया चरित्तर दिखाया है न, वह तुझे बहुत महंगा पड़ेगा. तू ने ही मुझ से कह कर अपना आदमी मरवाया और अब पुलिस को मेरा नाम भी बता दिया.’’

बहरहाल, शुरुआती पूछताछ में ही तेजिंदर वादामाफ गवाह बन गई. अदालत में चालान पेश हुआ तो उस ने हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ अपना बयान इस तरह दिया, जैसे किसी फिल्म की पटकथा सुना रही हो. बलवान सिंह पर किस ने किस तरह किस हथियार से वार किए थे, फटाफट बकती चली गई.  लुधियाना की सेशनकोर्ट में जब मुकदमा चला तो मैं हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह के वकील की हैसियत से अदालत में पेश हुआ. हर वकील अपने मुवक्किल को बचाना चाहता है. मैं ने भी दोनों को बचाने के लिए कानून के खूब तर्क दिए.

29 फरवरी, 1980 को सैशन जज ने इस मुकदमे का जो फैसला सुनाया, वह इस तरह से था :‘श्रीमती तेजिंदर कौर जाति की जाट है, जबकि उस का प्रेमी हिम्मत सिंह हरिजन. तेजिंदर कौर का कहना कि उस के हिम्मत सिंह से अवैधसंबंध हो गए थे, जिस की जानकारी उस के पति बलवान सिंह को हो गई थी, यह विश्वसनीय नहीं लगता. पंजाब का जाट अपनी पत्नी का अवैधसंबंध किसी और जाति के साथ होने की बात को बड़ी गंभीरता से लेता है.

‘अगर बलवान सिंह को इस की जानकारी होती तो वह और उस के रिश्तेदार पहले ही तेजिंदर कौर अथवा उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार चुके होते. तेजिंदर कौर ने अपने बयान में एक जगह कहा है कि एक बार वह और उस का प्रेमी पतिपत्नी के अंदाज में थे, तभी उस के पति ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया था, लेकिन तब थोड़ाबहुत झगड़ा करने के अलावा और कुछ नहीं हुआ था, यह भी अविश्वसनीय सा लगता है.

‘अपने बयान में तेजिंदर कौर ने यह भी कहा है कि हिम्मत और कुलवंत सिंह ने बलवान की मौत निश्चित हो जाने के बाद भी उस पर तलवार से अनगिनत वार किए, यह सब भी झूठ लगता है. तेजिंदर कौर के बयानों को सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वादामाफ गवाह के रूप में उस का बयान अविश्वसनीय है.

‘उस ने हिम्मत और कुलवंत सिंह को फंसाने के लिए इस जघन्य हत्या की ऐसी कहानी गढ़ी है, जिस से उन दोनों को फांसी हो जाए. कहानी में पर्याप्त दम नहीं है और अभियोगपक्ष भी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप साबित करने में असफल रहा है. लिहाजा हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बलवान सिंह की हत्या के आरोप से दोनों को बरी किया जाता है.’ फैसला आए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि हिम्मत सिंह और तेजिंदर कौर पतिपत्नी के रूप में मेरे सामने आ खड़े हुए थे. ऐसा कैसे संभव हुआ, यह फिलहाल मेरी समझ में नहीं आ रहा था. काफी प्रयास के बाद भी जब मैं इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं ढूंढ सका तो मैं ने 2 दिनों बाद अपने मुंशी को खन्ना भेज कर तेजिंदर को बुलवा लिया.

इस बार भी तेजिंदर हिम्मत सिंह के साथ ही आई. मेरे पूछने पर उस ने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था :

पुलिस ने थाने में जब तेजिंदर से पूछताछ की तो वह पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. लेकिन एक बात उस के हक में यह रही कि हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद भी उस का मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ा. उसी का नतीजा था कि जब पुलिस ने उसे वादामाफ गवाह बना कर उसे अपने ही साथियों के खिलाफ गवाही देने को कहा तो उस ने मन ही मन तय कर लिया कि अदालत में वह हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ इतना बढ़चढ़ कर बोलेगी कि उस के बयान पर जज साहब को यकीन नहीं होगा. तब शायद वह उस के बयान पर यकीन न कर के उन लोगों को बरी कर दें.

थाने में हिम्मत ने जब गालीगलौज करते हुए उस पर हमला किया था, तब उसे क्या पता था कि वह अपना त्रियाचरित्र दिखा रही थी, वह उसे बचाने की जबरदस्त योजना बना रही थी. आखिर वही सब हुआ, जैसा उस ने सोचा था. उस ने अदालत में जो बयान दिया था, जज साहब को सचमुच यकीन नहीं हुआ. संदेह का लाभ पा कर हिम्मत सिंह अपने जीजा के साथ बरी हो गया. उस समय भी दोनों उस से खफा थे. लेकिन जब उन के घर जा कर तेजिंदर ने असलियत बताई तो दोनों ने उस की तारीफ की. इस के बाद जब हिम्मत को उस पर विश्वास हो गया तो उस ने उस से शादी कर ली.

तेजिंदर की दास्तान सुन कर एक वरिष्ठ वकील होने के बावजूद एकबारगी मेरी बुद्धि चकरा गई. फिलहाल वह 2 नौजवान लड़कों की मां है, जिन में से एक की हाल ही में शादी हुई है. अपने परिवार के साथ वह खूब मजे का जीवन बसर कर रही है. वह नहीं चाहती कि अब कोई उस के पुराने जीवन के बारे में पूछे. Hindi Stories

—कथा में प्रमुख पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

 

 

Crime Story: हत्या जिन के लिए खेल है

Crime Story: किसी का भी खून करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लोग खून देख कर ही घबरा जाते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें किसी को भी मार देना खेल लगता है. यह कहानी ऐसे ही लोगों की है.

लुधियाना न्यू कोर्ट का माहौल उस दिन बड़ा रहस्यमयी लग रहा था. गेट से ले कर अंदर तक चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन अदालत लुधियाना के बहुचर्चित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला हत्याकांड का फैसला सुनाने वाली थी. हत्यारे कितने खतरनाक और खूंखार थे, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें जेल से अदालत तक लाने के लिए 60 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रिया सूद की अदालत को सुरक्षा की दृष्टि से पुलिसकर्मियों ने पूरी तरह से घेर रखा था. क्योंकि उन्हीं की अदालत में फैसला सुनाया जाने वाला था.

राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला की 1 फरवरी, 2012 की रात बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. इस दोहरे हत्याकांड को 6 लोगों, उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ पिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू, हसनजीत सिंह उर्फ जीता, दविंदरपाल सिंह उर्फ लाडी और रविंदर सिंह उर्फ रिंकू ने मिल कर अंजाम दिया था. पंजाब पुलिस ने इन लोगों को बड़ी मेहनत से पकाड़ा था. डीएसपी बलराज गिल की तैनाती उन दिनों जिला मोगा में डीएसपी हैडक्वार्टर के रूप में थी. चुनाव की वजह से पिछले एक महीने से वह काफी व्यस्त थे. ठीकठाक चुनाव संपन्न हो गए तो उन्होंने चैन की सांस ली थी और 1 फरवरी को छुट्टी ले कर लुधियाना स्थित अपने घर आ गए थे.

बलराज गिल सरदार कश्मीरा सिंह की एकलौती संतान थे. कश्मीरा सिंह बीएसएफ में कमांडेट थे और रिटायर्ड होने के बाद घर पर ही रह रहे थे. घर पहुंच कर बलराज गिल ने कुछ देर आराम किया, उस के बाद शाम को सत्संग सुनने चले गए. चुनाव की वजह से वह कई दिनों से सत्संग सुनने नहीं जा सके थे. सत्संग सुनने के बाद बलराज गिल कुछ देर अपने सत्संगी मित्रों के पास बैठ कर बातें करते रहे, उस के बाद घर चले गए. 7 बजे के करीब उन के फोन पर किसी का फोन आया तो पत्नी से 10 मिनट में आने की बात कह कर वह अपनी सफेद रंग की ओपट्रा कार से मौडल टाउन स्थित इश्मीत चौक के पास प्रिंटिंग प्रैस चलाने वाले अपने दोस्त मनिंदरपाल सिंह के पास जा पहुंचे.

वहीं पर बलराज और मनिंदर के क्लासमेट अनमोल सिंह मिल गए. तीनों दोस्त चाय पीते हुए बातें कर रहे थे कि तभी बलराज के फोन पर किसी का फोन आया, जिसे सुनने के बाद वह अपनी कार छोड़ कर मनिंदर की कार ले कर चले गए. जाते समय वह दोस्तों से कह गए कि थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे. लेकिन वह गए तो लौट कर ही नहीं आए. जब काफी देर हो गई तो दोस्तों को चिंता हुई. उन्होंने बलराज को फोन किए, पर उन के दोनों फोन बंद मिले. रात 10 बजे उन्होंने बलराज के घर फोन किया तो उन के पिता कश्मीरा सिंह ने बताया कि बलराज अभी तक घर भी नहीं पहुंचे हैं.

इस के बाद मनिंदरपाल और अनमोल ने कई जगह फोन कर के बलराज के बारे में पूछा, लेकिन कहीं से उन के बारे में कुछ पता नहीं चला. रात 12 बजे तक स्पष्ट हो गया कि बलराज गिल के साथ या तो कोई हादसा हो गया है या फिर उन का अपहरण आदि कर लिया गया है. चिंता की बात यह थी कि बलराज अपना सर्विस रिवौल्वर और सुरक्षा गार्डों को साथ नहीं ले गए थे. वह निहत्थे और अकेले ही गए थे. वैसे तो बलराज गिल जांबाज पुलिस अफसर थे, बड़ेबड़े खूंखार अपराधियों को काबू कर के उन्होंने सलाखों के पीछे पहुंचाया था. लेकिन निहत्थे और अकेले होने की वजह से सभी चिंतित थे.

बहरहाल, जब स्पष्ट हो गया कि बलराज लापता हो गए हैं तो क्षेत्रीय पुलिस और उन की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी उन की तलाश में लग गए. शहर का चप्पाचप्पा छान मारा गया, लेकिन बलराज गिल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला. अगले दिन हंबड़ा रोड स्थित गोल्फ लिंक क्षेत्र में बने एक फार्महाउस से बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका की लाश मिली. उन की कारें कई दिनों बाद शहर से दूर सुनसान जगह से पुलिस ने बरामद की थीं. दोनों कारों की नंबर प्लेटें बदली हुई थीं. बलराज और मोनिका की हत्या की बात सुन कर पूरे शहर में भय का माहौल बन गया था. जब यह खबर बलराल के घर पर पहुंची थी तो वहां कोहराम मच गया.

पिता कश्मीरा सिंह ने तो जैसेतैसे खुद को संभाल लिया था, लेकिन मां गुरदीप कौर का बुरा हाल था. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन का शेर जैसा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा. बलराज गिल सचमुच सुंदरस्वस्थ और लंबेचौड़े जवान थे. उन का ऐसा शरीर था कि वह 4-5 लोगों पर भारी पड़ सकते थे. उन की पत्नी हरिंदर कौर गिल कुंदनपुरी के सरकारी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल थीं. पति की हत्या की बात सुन कर वह बेहोश हो गई थीं. बेटे गुरमन सिंह और बहन गुरशरण कौर का भी रोरो कर बुरा हाल था. लुधियाना के अलावा अन्य जिलों जालंधर, पटियाला, मोगा के भी पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. आईजी, डीआईजी एवं एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

शिनाख्त के बाद बलराज और मोनिका की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था. इस के बाद कश्मीरा सिंह की तहरीर पर थाना हैबोवाल में 2 फरवरी, 2012 को भादंवि की धारा 302, 404, 201, 465, 468, 471 व 120बी के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के युद्ध स्तर पर हत्यारों की तलाश शुरू कर दी गई थी. फार्महाउस के हालात बता रहे थे कि इस हत्याकांड को लगभग आधा दर्जन लोगों ने अंजाम दिया था. फार्महाउस के कई गमले टूटे हुए थे. कमरों के अंदर और बाहर खून ही खून फैला था. क्राईम टीम और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञों की टीम ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल से हाथोंपैरों के निशान उठाए थे. मृतक बलराज गिल की मुट्ठी में कुछ बाल मिले थे.

मोनिका की लाश बाथरूम के पास मिली थी. बाथरूम की दीवार पर खून और उन के सिर के बाल चिपके हुए थे. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए घटनास्थल के 33 फोटो खींचे थे और 2 वीडियो बनाई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार बलराज गिल के सिर और गरदन पर तेज धार हथियार से वार किए गए थे. मोनिका के सिर, बाजू और पीठ के अलावा शरीर के अन्य अंगों पर भी तेज धार हथियार के घाव पाए गए थे. बलराज के सिर और गरदन पर किए गए वार उन की मौत का कारण बने थे. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के अनुसार मरने से पहले बलराज गिल ने हत्यारों से जम कर संघर्ष किया था.

बहरहाल, इस हाईप्रोफाइल दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए डीजीपी के निर्देश पर लुधियाना पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह और एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो की देखरेख में एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम बनाई गई थी, जिस में एसीपी परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी साहनेवाल जसविंदर सिंह, एसीपी क्राईम और सीआईए स्टौफ के तेजतर्रार प्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह गिल, एडीशनल थानाप्रभारी, एसआई अजायब सिंह के अलावा अन्य एसीपी और इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सुरेंद्र मोहन को शामिल किया गया था. इस मामले की जांच में अन्य एजेंसियों को भी टीम की मदद के लिए लगा दिया गया था.

स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम और एसआईटी ने हंबड़ा रोड और आसपास के गांवों से लगभग 2 हजार संदिग्ध युवकों को पूछताछ के लिए उठा लिया था. पुलिस की इस काररवाई से लोगों में रोष पैदा हो गया था. गांवों के प्रधानों और हिरासत में लिए लोगों के घर वालों ने डीजीपी और मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पुलिस हत्यारों को पकड़ने के बजाय उन लोगों को परेशान कर रही है, जो बरसों पहले गलत राह छोड़ कर शराफत की जिंदगी जी रहे हैं. हत्याएं सुनसान इलाके में हुई थीं और हत्यारे ऐसा कोई सबूत नहीं छोड़ गए थे, जिस से जांच आगे बढ़ पाती. जांच आगे न बढ़ते देख डीजीपी पंजाब के आदेश पर दिल्ली की स्पैशल टैक्निकल टीम के विशेषज्ञों को बुलाया गया था. साइबर क्राइम यूनिट और टैक्निकल सपोर्ट इंचार्ज इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से जांच शुरू की गई.

घटनास्थल के आसपास ज्यादा सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, फिर भी दिल्ली से आई साइबर टीम ने 5 किलोमीटर के क्षेत्र में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चेक की. इन में एक कैमरे से इनोवा और ओपट्रा कार की फुटेज मिली, जिस में इनोवा आगे जा रही थी और ओपट्रा उस के पीछे चल रही थी. लेकिन उन कारों में सवार लोगों के चेहरे नहीं दिखाई दे रहे थे. तब दिल्ली पुलिस ने लेटेस्ट टैक्नोलौजी का सहारा लिया. एक स्पैशल पीसी असैंबल कर इस हत्याकांड से पहले से ले कर हत्याकांड के बाद का सारा डाटा इकट्ठा कर सर्च किया तो पता चला कि हत्यारों में से एक हत्यारा मृतक बलराज का मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है.

उस की अंतिम लोकेशन नरपुर बेर के टावर की मिली थी. उस के बाद फोन बंद हो गया था. उस फोन में चलने वाले नंबर की काल डिटेल्स से मिले नंबरों में एक नंबर गोल्फ लिंक वाले क्षेत्र में चल रहा था. उस के साथ 2 अन्य लोगों की भी लोकेशन मिल रही थी. अब तक की जांच से एसआईटी टीम, साइबर टीम और सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह को हत्यारों से जुड़े कुछ अहम सुराग मिल चुके थे. 2 फरवरी से 5 अप्रैल, 2012 तक पुलिस और हत्यारों के बीच आंखमिचौली का खेल चलता रहा. पुलिस को हत्यारों की लोकेशन तो मिल रही थी, लेकिन वे उन के हाथ नहीं लग रहे थे. जबकि पुलिस को यहां तक पता चल चुका था कि इस हत्या में 6 लोग शामिल थे. हत्या के बाद 3-3 लोग अलगअलग जगहों पर घूम रहे थे.

3 आरोपियों ने मोनिका की इनोवा कार पर फर्जी नंबर प्लेट लगा कर जगराओ और गुरदासपुर में बेचने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह बिकी नहीं. तब उन्होंने उसे लुधियाना के लोधी क्लब के पीछे खड़ी कर दी थी. 3 आरोपी हिमाचल प्रदेश में घूम रहे थे, जहां वे नयना देवी मंदिर भी गए थे. बहरहाल, पुलिस ने अपना घेरा तंग कर के इस हाईप्रोफाइल डबल मर्डर मामले के 3 आरोपियों हरविंदर उर्फ बिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू तथा उमेश कारड़ा को गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने की थी. इस के बाद बाकी 3 अभियुक्तों को गिरफ्ताल करने के लिए इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने उन के घर छापा मारा तो वे घर से फरार मिले.

लेकिन 7 अप्रैल को वार्ड नंबर 31 के प्रधान जसपाल सिंह ने उन तीनों आरोपियों रविंदर सिंह, दविंदरपाल सिंह और हसनजीत सिंह को सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह के समक्ष पेश कर दिया था. इस तरह सभी अभियुक्तों के पकड़े जाने के बाद पुलिस उच्चाधिकारियों ने जब सब से पूछताछ की गई तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त डकैती और लूटपाट करते थे. इन का निशाना अधिकतर सुनसान इलाके के फार्महाउस या वे कोठियां होती थीं, जिन में 2-4 लोग रहते थे. 1 फरवरी की रात लगभग 8 बजे ये सभी हंबड़ा रोड पर स्थित संजय अग्निहोत्री के फार्महाउस के पास लूटमार करने के इरादे से इकट्ठा हुए थे. सभी बैठे योजना बना रहे थे कि कहां धावा बोला जाए? उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि सामने वाला फार्महाउस किस का है और यहां कौन आने वाला है?

वे शराब पीते हुए लूटपाट की बातें कर रहे थे कि तभी वहां डीएसपी बलराज गिल अपने मित्र मनिंदरपाल सिंह की ओपट्रा कार से पहुंचे. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद उन की महिला मित्र मोनिका कपिला अपनी इनोवा कार से पहुंचीं. बाहर बैठे लूट की योजना बना रहे लुटेरों ने उन्हें आते देखा तो उन्हें लगा कि फार्महाउस पर इस समय ये दोनों ही हैं. उन्हें लगा कि दोनों के पास कुछ न कुछ माल तो होगा ही और अगर कुछ भी न हुआ तो 2 लग्जरी कारें तो हैं ही. यहीं हाथ मारा जाए. इस तरह आननफानन में लूट की योजना बन गई. लुटेरों के हिसाब से फार्महाऊस में 2 लोग यानी एक औरत और एक मर्द है, जबकि वे 6 थे. 2 लोगों को वे आसानी से काबू कर सकते थे.

यही सोच कर 2 लुटेरे फार्महाऊस की दीवार फांद कर अंदर आए और अंदर से लीवर घुमा कर मुख्य गेट खोल दिया. इस के बाद बाकी 4 लुटेरे भी अंदर आ गए. फार्महाऊस के कमरे में बैठे बलराज और मोनिका बातें कर रहे थे कि तभी बलराज ने पदचाप की आवाज सुनी. बाहर कौन है, यह देखने के लिए वह बाहर लौन में आए तो लुटेरों ने उन्हें दबोच लिया. अचानक हुए इस हमले से वह विचलित तो हुए, लेकिन जल्दी ही खुद को संभाल कर लुटेरों से भिड़ गए. काफी देर तक लुटेरों और बलराज के बीच हाथापाई होती रही. अंत में लुटेरों ने तेजधार हथियारों से उन पर हमला कर के उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया.

वह जमीन पर गिर पड़े तो लुटेरे उन्हें घसीट कर कमरे के अंदर ले गए और सोफे पर पटक दिया. मोनिका ने जब बलराज की हालत देखी तो अपनी जान बचाने के लिए वह कमरे से लगे बाथरूम की ओर भागीं. 2 लुटेरे मोनिका के पीछे भागे. लुटेरों को मोनिका का पीछा करते देख बलराज एक बार फिर उठे. लेकिन बाकी के 4 लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर हथियारों से उन पर फिर से वार कर दिए, जिस से उन की मौत हो गई. मोनिका का पीछा कर लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर उन का सिर बाथरूम की दीवार से टकरा दिया, जिस से उन का सिर फट गया और दीवार पर खून और सिर के बाल चिपक गए. इस के बाद मोनिका की भी उन्होंने हथियारों से वार कर के हत्या कर दी.

दोनों को मार कर लुटेरे उन के पास से नकदी, गहने, मोबाइल तथा दोनों कारें लूट कर फार्महाऊस से चले गए. जाते हुए उन्होंने फार्महाऊस का गेट बाहर से बंद कर दिया था.  इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने सभी छहों अभियुक्तों की निशानदेही पर अभियुक्त हरविंदर से बलराज गिल का सैमसंग का मोबाइल फोन, पर्स और ओपट्रा कार की चाबी बरामद की, प्रितपाल के कब्जे से एप्पल का फोन और बलराज की कलाई घड़ी बरामद की, उमेश के कब्जे से नोकिया फोन तथा इनोवा कार की चाबी बरामद की. पूछताछ एवं बरामदगी के बाद 2 मई, 2012 को सभी छहों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने समय से अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस द्वारा तैयार किए गए आरोपपत्र में 65 गवाहों को शामिल किया गया था, लेकिन अदालत में केवल 44 गवाहों के ही बयान हो सके. अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में घटनास्थल की वीडियो की 4 सीडीज और 85 फोटोग्राफ्स पेश किए गए थे. इसी बीच 4 नवंबर को अभियुक्त उमेश कारड़ा ने साथियों सहित जेल से भागने की कोशिश भी की. इस के बाद इन पर जेल से भागने का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. 1 जनवरी, 2013 को यह मुकदमा लोअर कोर्ट से एडिशनल सैशन जज प्रिया सूद की अदालत में भेज दिया गया. उसी दिन सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम किया गया.

2 फरवरी, 2013 को रविंदर और हसनजीत ने अदालत में जमानत याचिका दायर की, जिसे 11 फरवरी को खाजिर कर दिया गया. अदालत की काररवाई के दौरान 20 अगस्त, 2013 को आरोपी हरविंदर सिंह पर एक गवाह को धमकाने का मामला दर्ज हुआ. हरविंदर सिंह ने गवाह जसपाल सिंह को गवाही देने के लिए अदालत में जान से मारने की धमकी दी थी. अभियुक्त दविंदरपाल ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जो जनवरी, 2014 में मंजूर कर ली गई. अब अदालत में गवाहियां शुरू हो गई थीं.

अभियोजन पक्ष की ओर से चीफ पब्लिक प्रौसीक्यूटर सुखचैन सिंह गिल पैरवी कर रहे थे. मृतक बलराज गिल के पिता कश्मीरा सिंह की ओर से एडवोकेट हरप्रीत संधु मुकदमा लड़ रहे थे. बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट अशोक लखनपाल और नगेंद्र सिंह गोरा पेश हुए थे. 41 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने इस केस को किसी और अदालत में चलाने की याचिका दायर की, जिसे सैशन जज ने यह कह खारिज कर दिया कि अदालत बदले जाने से केस की सुनवाई में देर होगी और सुनवाई प्रभावित होगी.

गवाहियां समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद अतिरिक्त सैशन जज प्रिया सूद ने फैसला सुनाने की तारीख 9 सितंबर तय कर दी, लेकिन उस दिन वह फैसला नहीं सुना सकीं. जबकि उन्होंने सभी छहों आरोपियों को हत्याओं का दोषी करार दे दिया था. फैसला सुनाने के लिए उन्होंने 11 सितंबर की तारीख दी. दोषी करार देने के बाद जमानत पर चल रहे दोषी दविंदरपाल सिंह को तत्काल पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. माननीय जज प्रिया सूद ने 11 सितंबर 2015 को इस दोहरे हाईप्रोफाइल हत्याकांड में अभियुक्त उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ बिंदर तथा प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू को हत्याएं करने, सामान चोरी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने, सबूत खुर्दबुर्द करने तथा साजिश रचने के अपराध में दोषी करार देते हुए दोहरी उम्रकैद यानी 42 साल की कैद तथा 1-1 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

जुरमाना अदा न करने पर सजा 1-1 साल और बढ़ा दी जाएगी. रविंदर सिंह उर्फ रिंकू तथा दविंदरपाल सिंह को सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने और जाली दस्तावेज तैयार करने का दोषी करार देते हुए 3-3 साल की सजा और 5-5 हजार रुपए जुरमाने की तथा हसनजीत सिंह उर्फ हसन को साजिश रचने, सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने का दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सजा और 20 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. सजा सुनाने से पहले अभियोजन पक्ष के वकीलों ने अभियुक्तों को फांसी की सजा की मांग की थी. लेकिन अदालत ने उन की यह मांग नहीं स्वीकार की थी.

मजे की बाज यह थी कि सजा सुनने के बाद भी दोषियों के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी. 9 सितंबर को अदालत द्वारा दोषी करार देने के बाद अभियुक्त जब जेल पहुंचे थे तो उन्होंने झगड़ा कर के 3 विचाराधीन कैदियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था. हत्यारों की मानसिकता का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें सजा होने पर जब घर वाले रोने लगे तो उन्होंने कहा, ‘‘आप लोग क्यों परेशान होते हैं, सजा तो शेरों को होती है.’’ Crime Story

 

Crime Story: शैतानी दिमाग की साजिश

Crime Story: 10 सितंबर, 2018 को लुधियाना के जिला एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ की अदालत में अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा भीड़ थी. वजह यह थी कि उस दिन लुधियाना शहर के एक ऐसे दोहरे मर्डर केस का फैसला सुनाया जाना था, जिस ने पूरे शहर में सनसनी फैला दी थी. इस में हतप्रभ कर देने वाली बात यह थी कि आरोपी रिशु ग्रोवर मृतकों के परिवार का ही सदस्य था और उस परिवार की हर तरह से देखरेख करता था.

इस के बावजूद उस ने मां और बेटी की इतनी वीभत्स तरीके से हत्या की थी कि उन की लाशें देख कर पुलिस तक का कलेजा कांप उठा था. यह केस लगभग 5 सालों तक न्यायालय में चला, जिस में 23 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए. इन गवाहों में एक गवाह ऐसा भी था, जिस ने आरोपी को घटनास्थल से फरार होते देखा था. अभियोजन पक्ष ने इस केस में पुलिस वालों, फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट एक्सर्ट्स, पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों आदि के बयान भी अदालत में दर्ज कराए थे.

निर्धारित समय पर जिला एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ के अदालत में बैठने के बाद जिला अटौर्नी रविंदर कुमार अबरोल ने कहा कि आरोपी रिशु ग्रोवर ने अपनी ताई और उन की बेटी की खंजर से बेहद क्रूरतम तरीके से हत्या की थी. लिहाजा ऐसे आरोपी को फांसी की सजा मिलनी चाहिए. वहीं बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि ये दोनों मर्डर किसी और ने किए हैं. हत्याएं करने के बाद हत्यारा खून से दीवार पर एक नाम भी लिख कर गया था.

खून से दीवार पर जिस का नाम लिखा गया था, पुलिस को उस शख्स से सख्ती से पूछताछ करनी चाहिए थी. लेकिन पुलिस ने उस शख्स को बचा कर सीधेसादे रिशु ग्रोवर को फंसा कर जेल में डाल दिया. रिशु पर लगाए गए सारे आरोप निराधार हैं. लिहाजा उसे इस केस से बाइज्जत बरी किया जाना चाहिए. जिला एडिशनल सेशन जज ने तमाम गवाहों के बयान, सबूतों और वकीलों की जिरह के बाद आरोपी रिशु ग्रोवर को दोषी करार दिया और सजा सुनाने के लिए 13 सितंबर, 2018 का दिन नियत कर दिया.

आखिर ऐसा क्या हुआ था कि इस हत्याकांड के फैसले पर लुधियाना के लोगों के अलावा वकीलों और मीडिया तक की निगाहें जमी थीं. सनसनी फैला देने वाले इस केस को समझने के लिए हमें घटना की पृष्ठभूमि में जाना होगा. लुधियाना के बाबा थानसिंह चौक के निकट मोहल्ला फतेहगंज में बलदेव राज अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी ऊषा के अलावा 2 बेटियां आशना व हिना एक बेटा राहुल था. बड़ी बेटी आशना की वह शादी कर चुके थे. शादी के लिए 2 बच्चे और बचे थे. वह उन की शादी की भी तैयारी कर रहे थे, लेकिन इस से पहले ही उन की मृत्यु हो गई.

बलदेव राज की मृत्यु के बाद घर की जिम्मेदारी ऊषा के ऊपर आ गई थी. खेती की जमीन से वह परिवार की गुजरबसर करने लगीं. पंजाब के तमाम लोग विदेशों में काम कर के अच्छा पैसा कमा रहे हैं. ज्यादा पैसे कमाने की चाह में राहुल भी अपने एक जानकार की मदद से आस्ट्रेलिया चला गया. वहां उसे अच्छा काम मिल गया था. राहुल के आस्ट्रेलिया जाने के बाद लुधियाना में उस के घर में 55 वर्षीय मां ऊषा और 21 वर्षीय बहन हिना ही रह गई थीं. राहुल ने अपनी बहन आशना और बहनोई विकास मल्होत्रा का खयाल रखने को कह दिया था. इस के अलावा उस ने अपने चाचा के बेटे रिशु ग्रोवर से भी मांबहन का ध्यान रखने को कहा था.

रिशु टिब्बा रोड के इकबाल नगर में रहता था. वैसे भी ऊषा का घर बाबा थानसिंह चौक पर ऐसी जगह रास्ते में था कि रिशु आतेजाते अपनी ताई ऊषा का हालचाल जान लिया करता था. जब रिशु ऊषा के यहां आनेजाने लगा तो ऊषा उस से घर के छोटेमोटे काम कराने लगीं. इस में रिशु के मातापिता को भी कोई ऐतराज नहीं था. कुछ समय और बीता तो ताई के कहने पर रिशु कभीकभी रात को भी उन के घर रुकने लगा.

इसी बीच एक यह परेशानी सामने आई कि बाबू नाम का एक लड़का हिना के पीछे पड़ गया. बाबू का सेनेटरी का काम था. हिना जब भी घर से बाहर निकलती, बाबू उस का रास्ता रोक कर उस से छेड़छाड़ करता था. इस से परेशान हो कर हिना ने इस की शिकायत पहले रिशु से की और बाद में यह बात अपनी बहन और जीजा को भी बता दी. रिशु ने अपने तरीके से बाबू को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना. कोई हल न निकलता देख हिना के बहनोई विकास ने इस की शिकायत थाना डिवीजन नंबर-3 में कर दी. पुलिस ने बाबू को थाने बुला कर धमका दिया. इस के बावजूद वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. यह सन 2012 की बात है.

इस बीच राहुल आस्ट्रेलिया से लुधियाना लौटा तो यह बात उसे भी पता चली. लगभग 2 महीने लुधियाना में रहने के बाद जब वह वापस आस्ट्रेलिया लौटा तो अपनी मां ऊषा और बहन हिना की जिम्मेदारी फिर से रिशु को सौंप गया. आगे चल कर यही राहुल की सब से बड़ी भूल साबित हुई. रिशु एक आवारा, बदचलन और बेहद गिरा हुआ इंसान था. सिगरेट, शराब, जुए से ले कर कोई ऐसा गलत ऐब नहीं बचा था, जो रिशु में नहीं था. ऊषा और हिना का ध्यान रखने की आड़ में वह ऊषा के घर पर ही अपना डेरा जमा कर बैठ गया. दरअसल, रिशु के खुराफाती दिमाग में एक भयानक षड्यंत्र ने जन्म ले लिया था. उस का सीधा निशाना हिना थी जो इस बात से बिलकुल अनजान थी.

नाजायज रिश्ते, नाजायज तरीके. कब किसी इंसान को गुनाह के रास्ते पर ला कर खड़ा कर दें, कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. जिस भाई को राहुल मां और बहन की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप गया था, उसी भाई के मन में एक अपराध ने जन्म ले लिया था. अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए रिशु ने अपनी ताई की बेटी हिना को अपने जाल में फंसाना शुरू कर दिया. जल्दी ही वह अपने मकसद में कामयाब भी हो गया. उस ने हिना के साथ नाजायज रिश्ता कायम कर लिया. बाद में वह इसी नाजायज रिश्ते की आड़ ले कर उसे ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने लगा. उस से मिले पैसों का इस्तेमाल वह अपने सपने पूरे करने में खर्च करता था.

ताज्जुब की बात यह थी कि उसी घर में रहते हुए भी ऊषा को इस सब की भनक तक नहीं लग पाई थी. इस की वजह यह थी कि रिशु अपनी ताई को खाने में नींद की गोलियां दे देता था. गोलियों के नशे को ऊषा अपनी उम्र का रोग समझती थीं. शुरूशुरू में तो हिना रिशु के आकर्षण में फंस गई थी पर जब तक उसे उस की नीयत का पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लेकिन अब पछताने से कोई फायदा नहीं था. क्योंकि वह सिर से ले कर पांव तक रिशु के चंगुल में फंसी हुई थी, जहां से अकेले बाहर निकलना उस के बूते की बात नहीं थी.

अंत में हार कर हिना ने अपने भाई राहुल को आस्ट्रेलिया फोन कर के यह बात बता दी. यहां हिना ने एक बार फिर बड़ी गलती की. वह राहुल से अपने और रिशु के शारीरिक संबंधों और रिशु द्वारा ब्लैकमेल करने की बात छिपा गई थी. यह बात फरवरी 2013 की है. अपनी बहन की बात सुन राहुल आस्ट्रेलिया से लुधियाना आया और उस ने रिशु को आड़े हाथों लिया. रिशु के मातापिता ने भी उस की अच्छी खबर ली. आखिर अपनी करनी से शर्मिंदा हो कर रिशु ने राहुल के अलावा अन्य सभी रिश्तेदारों से माफी मांग ली.

बात तो यहीं खत्म हो गई थी पर राहुल कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. उस ने हिना की शादी करने के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी. लड़का मिल भी गया. राहुल ने लुधियाना के पखोवाल रोड निवासी सौरव के साथ हिना की मंगनी कर के शादी पक्की कर दी. शादी की तारीख 20 नवंबर, 2013 तय हुई. इस बार राहुल ने बहन की शादी की जिम्मेदारी अपनी बहन आशमाऔर जीजा विकास मल्होत्रा को सौंपी. यह सब कर के वह 24 अप्रैल, 2013 को आस्ट्रेलिया लौट गया. आस्ट्रेलिया जा कर उस ने वहां से 4 लाख रुपए और करीब 100 डौलर अपनी मां को भेजे. मां ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी थीं. राहुल समयसमय पर अपनी मां को फोन कर के बात करता रहता था.

21 मई, 2013 को राहुल ने आस्ट्रेलिया से अपनी मां को फोन कर के हालचाल पूछना चाहा तो मां का फोन बंद मिला. उस ने 2-3 बार मां को फोन मिलाया, पर हर बार फोन बंद ही मिला. उस ने 22 मई को फिर से मां को फोन किया. उस दिन भी उन का फोन स्विच्ड औफ था. बहन हिना का फोन भी बंद था. राहुल परेशान था कि दोनों के फोन क्यों नहीं मिल रहे. फिर उस ने अपने जीजा विकास मल्होत्रा को फोन कर कहा, ‘‘जीजाजी, पता नहीं क्यों मां और हिना का फोन नहीं मिल रहा है. मैं कल से कोशिश कर रहा हूं. आप वहां जा कर पता तो करें, क्या बात है?’’

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं है. मैं और आशमा कल रात को वहीं थे. हो सकता है वे लोग सो रहे हों या कोई सामान खरीदने बाजार गए हों. फिर भी मैं जा कर देखता हूं.’’ विकास ने कहा. उस के बाद विकास अपनी पत्नी आशमा को ले कर ससुराल गया.

दोनों ने वहां जा कर देखा तो मकान का मुख्य दरवाजा बंद जरूर था पर उस में कुंडी नहीं लगी थी. असमंजस की हालत में विकास ने अंदर जा कर देखा तो नीचे वाले कमरे में बैड पर सास ऊषा की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. मां की लाश देख कर आशमा की चीख निकल गई. विकास भी घबरा गया और सोचने लगा कि हिना कहां है. इस के बाद उस ने ऊपर के फ्लोर पर जा कर देखा तो बाथरूम के बाहर हिना की भी खून सनी लाश पड़ी थी. उस की लाश के पास दीवार पर खून से ‘बाब’ लिखा हुआ था. बाब यानी बाबू.

विकास को यह समझते देर नहीं लगी थी कि ये दोनों हत्याएं बाबू सेनेटरी वाले ने ही की है. क्योंकि वह हिना को अकसर परेशान करता था. विकास ने इस की सूचना थाना डिवीजन-3 को दे दी. साथ ही उस ने फोन द्वारा राहुल को भी बता दिया. सूचना मिलते ही इंसपेक्टर बृजमोहन, एसआई प्रीतपाल सिंह, एएसआई राजवंत पाल, हवलदार वरिंदर पाल सिंह, सरजीत सिंह और सिपाही राजिंदर सिंह के साथ बताए गए पते की तरफ रवाना हो गए.

घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने लाशों का मुआयना किया तो पता चला कि उन की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई थी. मौके पर उन्होंने क्राइम टीम को बुलवाया. कई जगह से फिंगरप्रिंट और खून के सैंपल लिए और दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया. प्राथमिक पूछताछ में विकास मल्होत्रा से यह बात भी पता चली थी कि वारदात को अंजाम देने के बाद हत्यारे घर में रखे 4 लाख रुपए, 100 डौलर और सोने की एक चेन भी ले गए थे. विकास के बयानों के आधार पर पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा आईपीसी की धारा 302, 460 के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू कर दी.

विकास ने इस हत्याकांड का शक बाबू पर जाहिर किया था और दीवार पर भी खून से ‘बाब’ लिखा हुआ था, इसलिए इंसपेक्टर बृजमोहन ने बाबू को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी.सख्ती से पूछताछ करने पर भी बाबू इस हत्याकांड के बारे में कुछ नहीं बता पाया था. उस का कहना था कि वह हिना का पीछा जरूर करता था पर इन हत्याओं में दूरदूर तक भी उस का कोई हाथ नहीं है. अचानक पुलिस को शक हुआ कि कहीं पैसों के लालच में विकास ने ही तो इस घटना को अंजाम नहीं दिया क्योंकि उसे भी पता था कि घर में इतना कैश रखा है. फोरेंसिक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि घटनास्थल से मिले खून के सैंपल के साथ एक किसी तीसरे आदमी का भी खून था, जो शायद हत्यारे का था.

इन्हीं आशंकाओं को देखते हुए पुलिस ने विकास से पूछताछ की. विकास ने भी खुद को बेकसूर बताया. उस से की गई पूछताछ के बाद भी पुलिस को हत्यारों से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. संभावनाओं का पिटारा पुलिस के सामने खुला हुआ था. लेकिन अभी तक कोई ठोस लीड नहीं मिल रही थी. तफ्तीश के दौरान पुलिस को एक ऐसा शख्स मिला, जिस ने हत्यारे को घर से निकलते देखा था और वह उसे अच्छी तरह से पहचानता भी था.

इस के बाद पुलिस ने अन्य सबूत जुटाने के लिए हिना के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर खंगाली. उस में कई संदिग्ध नंबर थे. उन सभी नंबरों में एक नंबर ऐसा भी था जिस पर हिना की सब से ज्यादा बातें होती थीं. वह नंबर हिना के चचेरे भाई रिशु ग्रोवर का था. इस हत्याकांड के 2 दिन बाद राहुल भी आस्ट्रेलिया से आ गया. 25 मई को ही वह इंसपेक्टर बृजमोहन से मिला. राहुल ने बताया कि रिशु ने उस की बहन हिना से नाजायज संबंध बना लिए थे. इतना ही नहीं वह हिना को ब्लैकमेल कर उस से पैसे भी ऐंठता रहता था.

राहुल के बयानों ने इस केस का पासा पलट दिया और कातिल सामने आ गया. पता चला कि हिना और ऊषा का हत्यारा कोई और नहीं बल्कि रिशु ग्रोवर था. पुलिस ने रिशु को हिरासत में ले लिया. रिशु के खून की जांच कराई गई तो वह उसी खून से मैच कर गया जो घटनास्थल पर मृतकों के अलावा मिला था. रिशु से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस की निशानदेही पर इंसपेक्टर बृजमोहन ने नाले से हत्या में इस्तेमाल खंजर, प्लास्टिक के दस्ताने और एक रूमाल बरामद किया. पुलिस ने हत्या के बाद लूटे हुए पैसों में से 2 लाख 11 हजार रुपए और 100 डौलर भी बरामद कर लिए. काररवाई पूरी करने के बाद रिशु को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था.

तफ्तीश पूरी करने के बाद इंसपेक्टर बृजमोहन ने एक महीने बाद इस केस की चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी थी. पुलिस ने अदालत में तमाम गवाह पेश किए. उन में एक ऐसी महिला गवाह थी जिस ने इस हत्याकांड को अंजाम देने के बाद रिशु को घटनास्थल से फरार होते देखा था. दरअसल वह महिला रोज तड़के ढाई बजे सेवा करने के लिए गुरुद्वारा साहिब जाती थी. उसी समय उस ने रिशु को ऊषा के घर से निकलते देखा था. अदालत ने उस महिला की गवाही को अहम माना. तमाम गवाहों और सबूतों के आधार पर एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ ने रिशु ग्रोवर को दोषी ठहराया.

रिशु को दोषी ठहराने के बाद लोगों के जेहन में एक ही सवाल घूम रहा था कि पता नहीं 13 सितंबर को जज साहब उसे कौन सी सजा सुनाएंगे. लोगों के 3 दिन इसी ऊहापोह की स्थिति में गुजरे. आखिर वो दिन भी आ गया जो माननीय जज ने सजा सुनाने के लिए मुकर्रर किया था. 13 सितंबर को तमाम लोग बड़ी बेताबी के साथ कोर्टरूम में पहुंच गए थे. सुबह ठीक 10 बजे माननीय जज अदालत में बैठे. उन्होंने केस फाइल पर नजर डालते हुए कहा कि जिला अटौर्नी रविंदर कुमार अबरोल की दलीलों, गवाहों के बयानों और मौके पर मिले अन्य साक्ष्यों से यह बात पूरी तरह साबित हो जाती है कि रिशु ग्रोवर ने अपनी ताई और हिना को खंजर से ताबड़तोड़ वार कर के बेरहमी से मार डाला था.

रिशु चचेरी बहन से अवैध संबंध बना कर उसे ब्लैकमेल कर पैसे वसूलता था, जबकि 6 महीने बाद उस की शादी होनी थी. लिहाजा ब्लैकमेलिंग का धंधा व पैसा मिलना बंद होने की रंजिश में उस ने ही दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया था और हिना की शादी के लिए घर में रखा सारा पैसा लूट लिया था. रिशु इतना शातिरदिमाग था कि दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद उस ने पुलिस को गुमराह करने के लिए घर में रखे गहने व कैश भी गायब कर दिए थे. साथ ही दीवार पर खून से ‘बाब’ लिख दिया था, जिस से पुलिस उस तक न पहुंच सके.

दोषी की घृणित मानसिकता से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि उस ने जघन्यतम अपराध किया है. ऐसे आदमी को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है. अभियोजन पक्ष ने अपनी चार्जशीट में आरोपी पर जो आरोप लगाए हैं, वह उन्हें पूरी तरह से साबित करने में सक्षम रहा है. आरोपी का दोष पूरी तरह से साबित होता है, लिहाजा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत दोषी रिशु ग्रोवर को अदालत मृत्युदंड की सजा सुनाती है. अपना फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश अरुणवीर वशिष्ठ ने अपनी कलम की निब तोड़ दी और उठ कर अपने चैंबर में चले गए. रिशु ग्रोवर को फांसी की सजा सुनाए जाने पर आशमा और उस के पति विकास ने संतोष व्यक्त किया. Crime Story

Aarushi Murder case : तलवार दंपति पर क्यों हुआ बेटी की हत्या का शक

अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को आधार मान कर भारत की सब से बड़ी मर्डर मिस्ट्री माने जाने वाले आरुषि और हेमराज मर्डर केस में डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार को सजा तो सुना दी है, लेकिन अभी भी कई सवाल ऐसे हैं जिन का जवाब किसी के पास नहीं है.

25 नवंबर, 2013 को गाजियाबाद की कचहरी में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. अदालत के बाहर और अंदर भारी संख्या में पुलिस तैनात की गई थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन कचहरी परिसर स्थित सीबीआई की विशेष अदालत में देश के सब से चर्चित आरुषि मर्डर केस का फैसला सुनाया जाना था. यह ऐसा मामला था, जिस पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई थीं. आरुषि मर्डर केस विशेष सीबीआई अदालत के विशेष न्यायाधीश श्याम लाल की अदालत में चल रहा था. उन की अदालत के बाहर भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. वकीलों और आरोपी तलवार दंपति के परिजनों के अलावा किसी अन्य को विशेष सीबीआई कोर्ट में नहीं जाने दिया जा रहा था. मीडियाकर्मियों को भी अदालत में जाने की मनाही थी. फिर भी अदालत खचाखच भरी थी. माननीय न्यायाधीश श्याम लाल जब अदालत में आ कर अपनी कुरसी पर बैठे तो माहौल एकदम शांत हो गया.

इस अदालत में आरुषि मर्डर केस की सुनवाई 5 साल 6 महीने 10 दिन चली थी और केस की 212 तारीखें पड़ी थीं. केस से जुड़े 46 लोगों ने कोर्ट में पेश हो कर गवाहियां दी थीं, जिस में 7 गवाहियां बचाव पक्ष की थीं. सीबीआई ने कोर्ट में जो चार्जशीट दाखिल की थी, उस में आरुषि की हत्या का इशारा डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी नूपुर तलवार की ओर था. कोर्ट में अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष के वकीलों की जिरह पूरी होने के बाद माननीय न्यायाधीश ने 25 नवंबर को केस का फैसला सुनाने का दिन मुकर्रर किया. अदालत में मौजूद सभी लोगों की निगाहें जज साहब की तरफ लगी हुई थीं. अदालत में मौजूद आरोपी डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार भी थे. माननीय न्यायाधीश श्याम लाल ने जब फैसला सुनाना शुरू किया तो लोगों की उत्सुकता और भी बढ़ गई.

माननीय न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि मांबाप अपने बच्चों के सब से बड़े रक्षक होते हैं. किसी की जिंदगी से किसी को भी खिलवाड़ करने का हक नहीं है. सीबीआई की जांच और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह साबित हो चुका है कि तलवार दंपति ने ही अपनी उस बेटी की जिंदगी छीन ली, जिस ने बमुश्किल 14 बसंत देखे थे. इतना ही नहीं, उन्होंने नौकर को भी मार डाला. ऐसा कर के इन्होंने धर्म और कानून दोनों का उल्लंघन किया है. माननीय न्यायाधीश ने 204 पेज के अपने आदेश में डा. तलवार दंपति को दोषी ठहराने की 26 वजहें बताई थीं. उन्होंने धर्मग्रंथों का भी जिक्र किया. कुरान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अल्लाह ने जो पवित्र जिंदगी बख्शी है, उसे छीना नहीं जाना चाहिए. अगर हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा. इसी तरह अगर हम कानून की हिफाजत करेंगे तो कानून हमारी हिफाजत करेगा. दोनों ही आरोपियों ने देश के कानून का उल्लंघन किया है.

जज ने डा. राजेश और नूपुर को अपनी बेटी और नौकर हेमराज की हत्या के साथसाथ सुबूत नष्ट करने का भी दोषी माना. पतिपत्नी को दोषी करार देने के बाद उन्होंने सजा सुनाने के लिए अगला दिन यानी 26 नवंबर तय कर दिया. फैसला सुनते ही अदालत में मौजूद डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार के चेहरों पर मुर्दनी छा गई. डा. नूपुर की आंखों में आंसू छलक आए. कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने डा. राजेश और डा. नूपुर को हिरासत में ले लिया. दोपहर बाद 3 बज कर 25 मिनट पर जज द्वारा सुनाए गए फैसले की खबर न्यूज चैनलों पर प्रसारित होने लगी. जरा सी देर में पूरी दुनिया को पता चल गया कि डा. तलवार दंपति ने ही अपनी एकलौती बेटी आरुषि और नौकर हेमराज की हत्या की थी.

आरुषि की हत्या के बाद से ही इस केस में कई उतारचढ़ाव आए थे. उत्तर प्रदेश पुलिस से जांच सीबीआई तक पहुंची. कई जांच अधिकारी बदले. आरुषि मर्डर केस आखिर शुरू से ही इतना पेचीदा क्यों रहा, यह जानने के लिए इस केस की थोड़ी पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है. उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर (नोएडा) के सेक्टर-25, जलवायु विहार के फ्लैट नंबर एल-32 में रहने वाले डा. राजेश तलवार के परिवार में पत्नी डा. नूपुर तलवार के अलवा एक ही बेटी थी आरुषि. तलवार दंपति जानेमाने दंत चिकित्सक थे. आरुषि उन की शादी के 8 साल बाद 24 मई, 1993 को टेस्टट्यूब तकनीक से पैदा हुई थी, इसलिए वह मांबाप की बहुत लाडली थी.

दिल्ली पब्लिक स्कूल की छात्रा आरुषि का जन्मदिन हालांकि 24 मई को था, लेकिन वह अपना जन्मदिन 15 मई को मनाती थी. इस की वजह यह थी कि 15 मई को उस के स्कूल की गरमी की छुट्टियां शुरू हो जाती थीं और उस के ज्यादातर दोस्त जन्मदिन के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ जाते थे. सन 2008 में आरुषि के स्कूल की छुट्टियां 16 मई से हुईं तो उस ने डा. तलवार से 16 मई को ही जन्मदिन मनाने की बात कही. वह इस के लिए तैयार हो गए. डा. तलवार जन्मदिन के मौके पर बेटी को कोई न कोई महंगा गिफ्ट जरूर देते थे. जिज्ञासावश आरुषि ने इस बारे में उन से पूछा तो उन्होंने एक डिजिटल कैमरा दिखाते हुए कहा कि यही तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट है.

कैमरा देख कर आरुषि बहुत खुश हुई. उस ने उसी समय उस से कई फोटो खींचे. डा. राजेश तलवार ने भी उसी कैमरे से आरुषि के कई फोटो लिए. 15 मई, 2008 की देर शाम बर्थडे कार्यक्रम की प्लानिंग के बाद डा. राजेश तलवार अपने कमरे में चले गए. आरुषि भी अपने कमरे में जा कर सो गई. अगले दिन 16 मई की सुबह डा. तलवार दंपति को पता लगा कि उन की 14 साल की बेटी आरुषि की हत्या हो गई है. डा. राजेश तलवार ने बेटी की हत्या की खबर पड़ोसियों को दी तो वे हैरान रह गए. पौश कालोनी में फ्लैट के अंदर हत्या हो जाना चौंकाने वाली बात थी. तलवार दंपति का रोरो कर बुरा हाल था. लोग उन्हें ढांढस बंधा रहे थे. बहरहाल, डा. राजेश तलवार ने थाना सैक्टर-20 को फोन कर के बेटी की हत्या की खबर दी. उस समय थानाप्रभारी दाताराम नौनेरिया थे.

डा. राजेश तलवार का फ्लैट सेकेंड फ्लोर पर था. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची तो देखा आरुषि की लाश कमरे में उस के बेड पर पड़ी थी. उस का गला किसी तेज धारदार हथियार से कटा हुआ था. साथ ही उस के सिर पर भी गहरा घाव था. आरुषि के बगल वाले कमरे में डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार सोते थे. जबकि दूसरे कमरे में नौकर हेमराज सोता था. तलवार दंपति ने बताया कि उन्हें बेटी के चीखने की कोई आवाज नहीं सुनाई दी. हेमराज अपने कमरे में नहीं था. उस के कमरे में बीयर की खाली बोतल और 3 गिलास रखे थे. जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि फ्लैट के अंदर एंट्री जबरदस्ती नहीं हुई थी. वैसे भी किसी बाहरी व्यक्ति को आरुषि के कमरे तक पहुंचने के लिए 3 दरवाजों से गुजरना पड़ता. फ्लैट में आरुषि, उस के मातापिता के अलावा नौकर हेमराज रहता था.

जबकि डा. तलवार के अनुसार हेमराज फरार था. फरार होने की वजह से उस पर शक स्वाभाविक ही था. वैसे भी वह डा. तलवार के यहां 6-7 महीने से ही काम कर रहा था. शक की एक वजह यह भी थी कि दिल्ली और एनसीआर में घरेलू नौकरों द्वारा तमाम घटनाओं को अंजाम दिया गया था. घर का सारा सामान अपनी जगह था अलावा आरुषि के मोबाइल फोन के. हेमराज ने सिर्फ मोबाइल के लिए कत्ल किया होगा, यह बात गले उतरने वाली नहीं थी. हत्या की दूसरी वजह क्या हो सकती है, यह बात पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल सकती थी. इस बीच मौके पर जिले के सभी बड़े पुलिस अधिकारी पहुंच गए थे. आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने आरुषि की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

डा. राजेश तलवार ने हेमराज के खिलाफ आरुषि की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराते हुए कहा कि वह मर्डर कर के नेपाल भाग गया है. उस की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम नेपाल रवाना हो गई. इस के अलावा संभावित स्थानों पर भी उस की खोज की जाने लगी. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी पर 20 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया था. चूंकि डा. राजेश तलवार मैडिकल क्षेत्र से थे, इसलिए उन्होंने अपने ताल्लुकात का फायदा उठाते हुए 16 मई को दोपहर 12 बजे ही डा. सुनील डोगरे से लाश का पोस्टमार्टम करा कर आरुषि का अंतिम संस्कार करा दिया और अगले दिन अस्थियां विसर्जित करने के लिए हरिद्वार चले गए. उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व उपाधीक्षक के.के. गौतम नोएडा में ही रहते थे. वह डा. राजेश तलवार के भाई डा. दिनेश तलवार के मित्र थे. 17 मई, 2008 को वह भी डा. राजेश तलवार के यहां पहुंचे तो अचानक उन की नजर जीने पर पड़ी.

वहां उन्हें कुछ खून के धब्बे दिखाई दिए तो उन्होंने जीने के पास आ कर देखा. खून के धब्बे उन्हें ऊपर तक दिखाई दिए. लेकिन जीने के दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. के. के. गौतम तेजतर्रार पुलिस अधिकारी रहे थे. उन का पुलिसिया दिमाग घूमने लगा. वहां नोएडा पुलिस भी थी. पुलिस ने डा. नूपुर तलवार से जीने का दरवाजा खोलने को कहा तो उन्होंने बताया कि उन के पास चाबी नहीं है. जब काफी खोजने के बाद भी जीने की चाबी नहीं मिली तो पुलिस ने दरवाजे पर लगा ताला तोड़ दिया. पुलिस छत पर पहुंची तो वहां भी खून के धब्बे मिले. खोजबीन में पुलिस की नजर कूलर के पास पहुंची तो वहां एक आदमी की लाश पड़ी थी. उस के ऊपर कूलर की जाली रखी हुई थी. डा. नूपुर तलवार से जब उस लाश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. बाद में दूसरे लोगों ने लाश की शिनाख्त तलवार दंपति के नौकर हेमराज के रूप में की.

आरुषि की तरह हेमराज की हत्या भी सांस की नली काट कर की गई थी. पुलिस ने डा. राजेश तलवार को हेमराज की हत्या की सूचना दे कर जल्द लौटने को कहा. उस समय वह हरिद्वार के रास्ते में थे. पुलिस के बुलाने के बाद भी वह वापस नहीं लौटे. हेमराज की लाश मिलने से आरुषि की हत्या के मामले ने नया मोड़ ले लिया. हेमराज की लाश चूंकि दूसरे दिन मिली थी, इसलिए पुलिस पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक था. इस की गाज गिरी इस केस के जांच अधिकारी दाताराम नौनेरिया और एसपी सिटी महेश कुमार मिश्रा पर. 18 मई, 2008 को दोनों का तबादला कर दिया गया.

दाताराम की जगह नए थानाप्रभारी संतराम यादव ने इस दोहरे हत्याकांड की जांच करनी शुरू की. आरुषि की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि उस का गला सर्जिकल इक्विपमेंट से काटा गया था. उस के सिर पर भी किसी नुकीली चीज का जख्म था. रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि उस की हत्या करीब 12 घंटे पहले हुई थी. इस का मतलब यह था कि आरुषि का कत्ल 15-16 मई की रात को 12-1 बजे के बीच हुआ था. रिपोर्ट में दुष्कर्म की बात से इनकार किया गया था. हेमराज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि उस की हत्या भी सांस की नली काट कर की गई थी. उस के सिर पर भी पीछे से किसी भारी चीज से वार किया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह बात साफ हो गई थी कि आरुषि और हेमराज की हत्या एक ही तरीके से की गई थी और हत्यारा भी संभवत: एक ही था.

जांच अधिकारी ने डा. राजेश तलवार से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वह सोते समय आरुषि के कमरे में बाहर से ताला लगा कर अपने कमरे में सोते थे, लेकिन 15 मई की रात को वह ताला लगाना भूल गए थे. वहीं उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार ने बताया कि बेटी की लाश देखने के बाद वह सीधे हेमराज के कमरे में गईं. जब वह कमरे में नहीं मिला तो उन्होंने घर के लैंडलाइन फोन से उस के मोबाइल का नंबर ट्राई किया. उस समय सुबह को 6 बज रहे थे. फोन किसी ने रिसीव तो किया, पर बात किए बिना ही काट दिया. पुलिस ने हेमराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो वास्तव में 16 मई को सुबह 6 बज कर 3 मिनट पर काल रिसीव हुई थी और उस समय उस का फोन जलवायु विहार स्थित मोबाइल फोन टावर के संपर्क में था. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि जब हेमराज की हत्या हो गई थी तो उस का फोन किस ने रिसीव किया?

पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हत्यारा चाहे जो भी रहा हो, वह तलवार परिवार का करीबी रहा होगा. पुलिस ने डा. राजेश तलवार के कंपाउंडर किशन उर्फ कृष्णा से पूछताछ की और उस के मोबाइल की काल डिटेल्स भी निकलवाई. लेकिन कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ. तलवार दंपति के यहां 4 लोग रहते थे. उन में से 2 का मर्डर हो गया था. वह भी उस स्थिति में जबकि कोई बाहरी आदमी फ्लैट में नहीं आया था. ऐसी स्थिति में पुलिस को डा. तलवार दंपति पर ही शक हो रहा था. इसी बीच इस केस की जांच संतराम यादव की जगह थाना सेक्टर-20 के इंचार्ज जगवीर सिंह को सौंप दी गई. उन्होंने केस की फाइल का अध्ययन करने के बाद घटनास्थल का मुआयना किया. केवल शक के आधार पर डा. राजेश तलवार को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था, इसलिए पुलिस उन के खिलाफ सुबूत जुटाने की कोशिश करने लगी. इस के लिए पुलिस ने उन के क्लीनिक, फ्लैट, कार, गैरेज आदि की जांच की, लेकिन कोई सुबूत नहीं मिला.

पुलिस ने डा. राजेश तलवार का मोबाइल फोन भी इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस पर लगा दिया, ताकि फोन पर होने वाली उन की बात सुनी जा सके. पुलिस द्वारा बारबार पूछताछ के बाद डा. राजेश तलवार को लगने लगा था कि पुलिस हत्या के आरोप में कहीं उन्हें ही गिरफ्तार न कर ले. इसलिए उन्होंने अपने दोस्त वकील को फोन कर के अपनी अग्रिम जमानत के बारे में बात की. पुलिस डा. राजेश तलवार की फोन पर हो रही बातचीत को सुन रही थी. अग्रिम जमानत की बात सुन कर पुलिस को यकीन हो गया कि दोनों की हत्या में डा. राजेश तलवार का हाथ रहा होगा, इसलिए उन्होंने अपनी अग्रिम जमानत के बारे में बात की. फिर क्या था, पुलिस ने आननफानन में डा. राजेश तलवार को उठा लिया.

उन से पूछताछ करने के बाद मेरठ जोन के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक ने एक प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर खुलासा किया कि आरुषि और हेमराज की हत्या और किसी ने नहीं, बल्कि डा. राजेश तलवार ने ही की थी. वजह थी आरुषि और हेमराज के बीच अवैध संबंध. डा. राजेश तलवार ने उन्हें आपत्तिजनक हालत में देख लिया था. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने डा. राजेश तलवार को दोहरे मर्डर केस में गिरफ्तार कर के कोर्ट में पेश किया और 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. लेकिन रिमांड की अवधि में नोएडा पुलिस डा. राजेश तलवार से कत्ल में इस्तेमाल किए गए हथियार, खून सने कपड़े व आरुषि और हेमराज के मोबाइल फोन वगैरह बरामद नहीं कर सकी. पुलिस यह भी पता नहीं लगा सकी कि जीने पर खून के जो धब्बे मिले थे, वे कैसे लगे थे.

डा. राजेश तलवार चीखचीख कर कह रहे थे कि उन्होंने आरुषि और हेमराज की हत्याएं नहीं कीं, लेकिन नोएडा पुलिस ने उन की एक नहीं सुनी. उन के परिवार वाले भी उन की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे. उन का कहना था कि पुलिस ने डा. राजेश तलवार को झूठा फंसाया है. इसलिए वह इस मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रहे थे. चूंकि पुलिस ने हत्या से संबंधित एक भी सुबूत बरामद नहीं किया था, इसलिए कई राजनैतिक पार्टियों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने भी पुलिस के खुलासे पर अंगुली उठानी शुरू कर दी थी. वे भी सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे. यह आवाज प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के कानों तक पहुंची तो उन्होंने इस दोहरे हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश कर दी.

इस के अलावा उन्होंने मेरठ जोन के पुलिस महानिरीक्षक गुरुदर्शन सिंह, पुलिस उपमहानिरीक्षक पी.सी. मीणा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ए. सतीश गणेश के भी ट्रांसफर के आदेश दिए, ताकि वे जांच को प्रभावित न कर सकें. 1 जून, 2008 को जांच का आदेश मिलते ही सीबीआई जांच में जुट गई. सीबीआई की 25 सदस्यीय टीम फोरेंसिक एक्सपर्ट्स के साथ जलवायु विहार पहुंच गई. चूंकि सब से पहले घटनास्थल पर पहुंची नोएडा पुलिस ने वहां से सुबूत इकट्ठे नहीं किए थे, इसलिए तब तक सारे सुबूत नष्ट हो चुके थे. सीबीआई टीम ने आरुषि की मां डा. नूपुर तलवार, डा. राजेश तलवार के कंपाउंडर कृष्णा, डा. अनीता दुर्रानी, हेमराज के दामाद जीवन शर्मा, डा. दुर्रानी के नौकर राजकुमार, एक अन्य नौकर विजय मंडल, ट्रांसफर हुए एसपी सिटी महेश मिश्रा, पूर्व डीएसपी के.के. गौतम, डा. तलवार की नौकरानी भारती के अलावा सब्जी बेचने वालों, गार्डों और पड़ोसियों तक से पूछताछ की.

फोरेंसिक टीम ने इन्फ्रारेड कैमिकल इमेजिंग के जरिए खून के कुछ नमूने भी उठाए.  इन्फ्रारेड कैमिकल इमेजिंग एक ऐसी तकनीक है, जिस से किसी जगह या कपड़े पर पड़ा खून का पुराने से पुराना धब्बा भी खोजा जा सकता है. सीबीआई टीम ने छत पर जा कर भी कई बार जांच की. सीबीआई ने डा. राजेश तलवार का 2 बार लाई डिटेक्टर टेस्ट, साइको एनालिसिस टेस्ट व नारको एनालिसिस टेस्ट कराया. इस के अलावा उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार का भी लाई डिटेक्टर टेस्ट व साइको एनालिसिस टेस्ट कराया गया. इस के अलावा सीबीआई ने डा. दुर्रानी के नौकर राजकुमार और डा. राजेश तलवार के पड़ोस में काम करने वाले नौकर विजय मंडल के भी पौलीग्राफिक टेस्ट कराए. इन सब टेस्ट रिपोर्टों और तफ्तीश के बाद सीबीआई ने कहा कि आरुषि और नौकर हेमराज की हत्या डा. राजेश तलवार ने नहीं, बल्कि उन के कंपाउंडर किशन उर्फ कृष्णा, डा. अनीता दुर्रानी के नौकर राजकुमार और एक अन्य नौकर विजय मंडल ने मिल कर की थी. सीबीआई के खुलासे के बाद डा. राजेश तलवार के परिजन और समर्थक खुश हुए.

सीबीआई की जांच ने नोएडा पुलिस द्वारा किए गए खुलासे की हवा निकाल दी थी और 50 दिन डासना जेल में रहने के बाद डा. राजेश तलवार घर आ गए थे. एक तरह से सीबीआई ने उन के ऊपर लगे हत्या के दाग को धो दिया था. लेकिन सीबीआई की यह थ्यौरी और पेश किए गए सुबूत अदालत के सामने टिक नहीं सके और गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने तीनों नौकरों, कृष्णा, राजकुमार और विजय मंडल को 12 सितंबर, 2008 को रिहा करने के आदेश दे दिए. नौकरों की रिहाई के बाद मीडिया में इस हत्याकांड को ले कर फिर से सवाल उठने लगे. न्यूज चैनलों पर फिर से इस मर्डर मिस्ट्री की कथाएं प्रसारित की जाने लगीं. जनमानस के भीतर फिर वही सवाल हिलोरें मारने लगा कि आखिर आरुषि और हेमराज का हत्यारा कौन है?

कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने फिर से मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर, फोरेंसिक जांच रिपोर्ट देने वाले अधिकारियों आदि के अलावा डा. तलवार दंपति से फिर से पूछताछ की गई. घूमफिर कर जांच एजेंसी को तलवार दंपति पर ही शक हो रहा था, लेकिन हत्या का कोई सुबूत नहीं मिल रहा था. जांच में जब कोई नतीजा नहीं निकला तो सीबीआई ने 29 दिसंबर, 2010 को विशेष सीबीआई अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा, ‘‘अब तक की जांच के बाद आरुषि और हेमराज की हत्या का पूरा शक डा. राजेश तलवार और डा. नूपुर तलवार पर ही जाता है. लेकिन उन के खिलाफ हमारे पास पर्याप्त और पुख्ता सुबूत नहीं हैं. लिहाजा इस केस को बंद करने की अनुमति दी जाए.’’

लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार करने के बजाए क्लोजर रिपोर्ट को ही चार्जशीट मान कर तलवार दंपति को इस हत्याकांड में आरोपी बनाया. इस के बाद 9 फरवरी, 2011 से इस मामले की फिर से सुनवाई शुरू हो गई. इस मामले के विवेचनाधिकारी ए.जी.एल. कौल ने अपनी गवाही में कोर्ट के सामने साफ तौर पर कहा कि डा. राजेश तलवार हेमराज और आरुषि को आपत्तिजनक स्थिति में देख कर आपा खो बैठे थे और उन्होंने अपनी गोल्फ स्टिक से उन की हत्या कर दी थी. जबकि बचाव पक्ष ने दुनिया के जानेमाने डीएनए विशेष डा. आंद्रे सेमीखोस्की के अलावा एम्स के पूर्व फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. आर.के. शर्मा सहित 7 लोगों की गवाही कराई. डा. सेमीखोस्की ने सीबीआई द्वारा पेश डीएनए रिपोर्ट को आधाअधूरा बताते हुए डीएनए जांच रिपोर्ट का रा डाटा मांगा.

उन्होंने कहा कि खुखरी और दीवार के टुकड़े जिस पर सीबीआई ने खून के दाग बरामद किए, उन की लंदन में दोबारा डीएनए जांच होनी चाहिए. लेकिन अदालत ने उन की इस मांग को खारिज कर दिया. अप्रैल, 2013 में सीबीआई की तरफ से इंस्टीट्यूट औफ फोरेंसिक साइंस के उपनिदेशक महेंद्र दहिया को कोर्ट में बतौर गवाह पेश किया गया. डा. दहिया ने अदालत से कहा कि आरुषि और हेमराज दोनों पर हमला आरुषि के कमरे में ही हुआ था. दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया गया था. हेमराज की लाश को हत्या के बाद छत पर ले जाया गया था. उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि 9 अक्तूबर, 2009 को वह सीबीआई की टीम के साथ घटनास्थल पर गए थे तो फ्लैट का नजारा देख कर लग रहा था कि उस वक्त फ्लैट की पुताई कर दी गई थी.

मकान की स्थिति देख कर जांच में पता चला कि आरुषि-हेमराज की हत्या एक ही समय पर और एक ही जगह पर की गई थी. उन की हत्या में डा. राजेश तलवार ने अपनी गोल्फ स्टिक का इस्तेमाल किया था. बाद में दोनों के गले सर्जिकल औजार से काटे गए थे. उन्होंने आगे बताया कि जांच में यह भी पता चला कि हेमराज को मारने के बाद लाश को छत पर ले जाया गया. उस का गला छत पर ही काटा गया था. हत्यारे का पैर जीने के दरवाजे के पास पडे़ पाइप में उलझ गया था, इसलिए उस का खूनी पंजा दीवार पर लग गया था. दोनों के गले एक कान से दूसरे कान तक काटे गए थे और यह काम उन के लेटे होने की अवस्था में किया गया था. आरुषि के सिर में प्रेशर से चोट पहुंचाई गई थी, इसलिए उस के खून के छींटे दीवार पर आए. सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए डा. दहिया ने स्पष्ट किया था कि घटना में कोई बाहरी व्यक्ति शामिल नहीं था.

तमाम गवाहों और परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर विद्वान न्यायाधीश श्याम लाल ने 25 नवंबर, 2013 को सुनाए गए 204 पेज के अपने आदेश में डा. राजेश तलवार और उन की पत्नी डा. नूपुर तलवार को आरुषि और हेमराज की हत्या का दोषी ठहराया. सजा के लिए उन्होंने 26 नवंबर का दिन मुकर्रर कर दिया. चूंकि अदालत ने डा. तलवार दंपति को दोहरे हत्याकांड का दोषी ठहराया गया था, इसलिए लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी थी कि उन्हें फांसी दी जाएगी या फिर उम्रकैद. 26 नवंबर को दोपहर 2 बज कर 20 मिनट पर सीबीआई के वकील आर.के. सैनी व बी.के. सिंह और बचाव पक्ष के वकील तनवीर अहमद, मनोज सिसौदिया व सत्यकेतु सिंह के बीच सजा के बिंदु पर 10 मिनट तक बहस हुई. सीबीआई के वकीलों ने हत्याकांड को रेयरेस्ट औफ रेयर करार देते हुए दोनों दोषियों को सजाएमौत देने की मांग की. जबकि बचाव पक्ष के वकीलों ने कहा कि दोनों ही चिकित्सक हैं, इन का कोई पुराना आपराधिक रिकौर्ड भी नहीं है, लिहाजा उन्हें कम से कम सजा दी जाए.

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद न्यायाधीश ने डा. राजेश तलवार व डा. नूपुर तलवार पर आईपीसी की धारा 302, 201 (समान मकसद से हत्या करने) पर आजीवन कारावास और 10 हजार रुपए का जुर्माना, आईपीसी की धारा 201 (साक्ष्यों को मिटाना) पर 5 साल की सजा और 5 हजार रुपए का जुर्माना तथा डा. राजेश तलवार पर आईपीसी की धारा 203 (झूठी रिपोर्ट दर्ज करा कर पुलिस को गुमराह करना) पर 1 साल की सजा और 2 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. उन्होंने यह भी आदेश दिया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी. सजा सुनने के बाद डा. तलवार दंपति को डासना जेल भेज दिया गया. अब जेल में डा. नूपुर तलवार का नया पता कैदी नंबर 9343 और बैरक नंबर 13 है, जबकि डा. राजेश तलवार को बैरक नंबर 11 के कैदी नंबर 9342 के रूप में जाना जाएगा.

हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आरुषि-हेमराज हत्याकांड मामले में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में सीबीआई की विशेष अदालत का निर्णय रद्द करते हुए राजेश राजेश तलवार और नुपुर तलवार को निर्दोष करार दिया. अदालत ने इस तरह से दोनों अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए विशेष सीबीआई अदालत का 26 नवंबर, 2013 का फैसला निरस्त कर दिया.  अदालत ने तलवार दंपति की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया