दोस्त के प्यार पर डाका – भाग 2

22 वर्षीय हरिहर कृष्णा मूलरूप से वेरांगल जिले का रहने वाला था. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ा था. उस के पिता एक बिजनैसमैन थे. बेटे की पढ़ाई पर वह खूब पैसे खर्च कर रहे थे. उन का सपना था कि बेटा पढ़लिख कर इंजीनियर बने तो उन का जीवन सार्थक हो जाए. भले ही उस की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च आए, इस की कोई चिंता नहीं. उन का सोचना था कि जब हरिहर का जीवन संवर जाएगा तो बाकी दोनों बच्चों का भी भविष्य बन जाएगा.

नवीन और हरिहर कृष्णा एक ही कालेज और एक ही कक्षा में पढ़ते थे. इन दोनों के साथ ही हैदराबाद के हस्तिनापुरम की रहने वाली नंदिनी भी पढ़ती थी.

नंदिनी इकहरी बदन की दुबलीपतली और छरहरी लडक़ी थी. उस में कोई खास आकर्षण भी नहीं था, लेकिन न जाने क्यों नवीन उस की ओर चुंबक की तरह खिंचता चला जा रहा था. शायद नवीन को उस से प्यार हो गया था. तभी तो उस ने अपने दिल का दरवाजा नंदिनी के लिए खोल दिया था.

उस के दीदार के लिए हर घड़ी पलकें बिछाए रहता था. ऐसा नहीं था यह एकतरफा प्यार हो, नंदिनी भी नवीन को बेहद चाहती थी. अपने कोरे दिल पर अपने सपनों के राजकुमार के रूप में नवीन का नाम लिख दिया था. यह बात घटना से करीब 3 साल पहले 2020 की थी.

नंदिनी नवीन का पहला प्यार थी और नवीन भी उस का पहला प्यार. इन दोनों का प्यार ठीक उसी तरह था जैसे बाती बिन दीया नहीं, चांदनी बिन चांद नहीं और तपिश बिन सूरज नहीं. बेपनाह प्यार था दोनों के दिलों में एकदूसरे के लिए.

नंदिनी और नवीन ने एकदूजे को ले कर अपने भविष्य की कुछ सपने देखे थे. साथसाथ रहने की, साथसाथ जीवन के सुनहरे पल बिताने की. पते की बात तो ये थी कि नवीन अपने प्यार की पलपल की स्टोरी अपने अजीज दोस्त हरिहर कृष्णा को बताए बिना नहीं रहता था. इस से एकएक बात शेयर करता था.

हरिहर ने डाला दोस्त के प्यार पर डाका

हरिहर कृष्णा चटखारे ले कर मजे से दोनों की प्रेम कहानी सुनता था. दोनों की प्रेम कहानी सुनतेसुनते भी उस के दिल में दोस्त की प्रेमिका के लिए खास जगह बनने लगी थी. धीरेधीरे वह उस के प्रति आकर्षित होता चला गया था. जबकि हरिहर कृष्णा जानता था कि नंदिनी से उस का दोस्त प्यार करता था. किसी के प्यार को छीनना गलत है, लेकिन उस ने इस बात की परवाह किए बिना ही प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है वाली नीति अपनाते हुए उसी ओर अपना कदम बढ़ा दिया था.

सीधासादा नवीन दोस्त हरिहर कृष्णा के मन में क्या चल रहा है, जान ही नहीं सका. वह समझ ही नहीं सका कि वह उस के प्यार पर डाका डालने के लिए कुंडली मार कर बैठा है. उसे अगर तनिक भी अंदेशा होता तो शायद अपने प्यार को दोस्त से कभी भी न तो शेयर करता और न ही उसे कुछ बताता. लेकिन हरिहर कृष्णा के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

नंदिनी को पाने के लिए हरिहर कृष्णा के मन में हसरतें जिंदा हो चुकी थीं. उसे किसी भी तरह हासिल करने की उस ने सौगंध ले ली थी. लेकिन उसे हासिल करे तो करे कैसे, इस जुगत में दिनरात परेशान रहा करता था. आखिरकार दोनों को अलग करने की उस ने तरकीब निकाल ही ली.

शातिर दिमाग वाले हरिहर कृष्णा ने दोनों को अलग करने के लिए उन में इस तरीके से फूट डाल दी थी कि बरसों का प्यार पल भर में रेत के मकान की तरह ढह गया था. एक दिन मौका देख कर हरिहर कृष्णा ने नंदिनी को भडक़ाया, “जानती हो नंदिनी, तुम जितनी भोली हो, नवीन उतना ही कमीना है.”

“तुम्हें शर्म नहीं आती अपने अजीज दोस्त के खिलाफ ऐसी बातें करते हुए.” प्रेमी की बुराई सुन कर नंदिनी गुस्सा हो गई थी.

“तभी तो कहता हूं नंदिनी तुम बहुत भोली हो. दोस्त के दोहरे चेहरे को तुम देख नहीं सकती.” हरिहर कृष्णा ने भडक़ाया.

“क्या मतलब है तुम्हारा, मैं अंधी हूं मुझे कुछ दिखता नहीं है?”

“नाराज क्यों होती हो यार, तुम्हें अपना समझ कर दोस्त की सच्चाई बता रहा हूं. तुम हो कि मेरी बात सुनने के बजाय मुझ पर ही नाराज हो रही हो. पता नहीं क्यों मुझ से तुम्हारे साथ हो रहा धोखा देखा नहीं जा रहा है.” इस बार हरिहर कृष्णा ने तीर निशाने पर लगाया था.

“कौन धोखा दे रहा है मुझे?” नंदिनी ने सवाल किया.

“तुम्हारा प्यार, नवीन. वही तुम्हें धोखा दे रहा है.”

“इसे मैं कतई मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि नवीन मुझे कभी धोखा दे सकता है. वो मुझ से बहुत प्यार करता है, अंधा प्यार.”

“इसी बात का तो रोना है. उस ने तुम से अंधे प्यार वाली बात कर दी और तुम भी उसी तरह अंधी हो गई. पर इस में कोई सच्चाई नहीं है कि वो तुम से अंधा प्यार करता है.”

“तो फिर?”

“कई लड़कियों से उस के नाजायज संबंध हैं.”

“क्या?” नंदिनी उस की बात सुन कर बुरी तरह उछली.

“क्या कहते हो तुम? नवीन और कई लड़कियां? मैं और मेरा दिल इसे कभी मानने के लिए तैयार नहीं होगा कि मुझे छोड़ कर वह किसी और लडक़ी से प्यार करता है. नो…नेवर.”

“इसी बात का तो रोना है, तुम मेरी किसी बात को सीरियसली लेती नहीं हो. यह सब तुम्हें बता कर मुझे क्या बेनिफिट होने वाला, जरा सोचो.” इतना कह कर हरिहर कृष्णा ने नंदिनी के चेहरे पर अपनी शातिर नजरें गड़ा दी थीं और उस के हावभाव को पढऩे की कोशिश करने लगा था, जिस से उसे पता चल सके कि अब वह क्या सोच रही है.

कुछ पल के लिए वह गंभीर हुई, फिर कुछ सोच कर उस ने कहा, “पता नहीं क्यों मेरा दिल इसे मानने को तैयार नहीं हो रहा है कि नवीन के और लड़कियों से संबंध होंगे? लेकिन तुम कहते हो तो…”

“मेरा काम तुम्हें एलर्ट करना था, सो मैं ने कर दिया नंदिनी. बाकी मानना, न  मानना तुम्हारा काम. अच्छा चलता हूं. एक सच्चा दोस्त होने का फर्ज निभाया है मैं ने. बाकी सब ऊपर वाले के हाथ में…” कहते हुए वह आगे बढ़ गया.

बहुत हुआ अब और नहीं

जब पुलिस की जीप एक ढाबे के आगे आ कर रुकी, तो अब्दुल रहीम चौंक गया. पिछले 20-22 सालों से वह इस ढाबे को चला रहा था, पर पुलिस कभी नहीं आई थी. सो, डर से वह सहम गया. उसे और हैरानी हुई, जब जीप से एक बड़ी पुलिस अफसर उतरीं.

‘शायद कहीं का रास्ता पूछ रही होंगी’, यह सोचते हुए अब्दुल रहीम अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया कि साथ आए थानेदार ने पूछा, ‘‘अब्दुल रहीम आप का ही नाम है? हमारी साहब को आप से कुछ पूछताछ करनी है. वे किसी एकांत जगह बैठना चाहती हैं.’’

अब्दुल रहीम उन्हें ले कर ढाबे के कमरे की तरफ बढ़ गया. पुलिस अफसर की मंदमंद मुसकान ने उस की झिझक और डर दूर कर दिया था.

‘‘आइए मैडम, आप यहां बैठें. क्या मैं आप के लिए चाय मंगवाऊं?

‘‘मैडम, क्या आप नई सिटी एसपी कल्पना तो नहीं हैं? मैं ने अखबार में आप की तसवीर देखी थी…’’ अब्दुल रहीम ने उन्हें बिठाते हुए पूछा.

‘‘हां,’’ छोटा सा जवाब दे कर वे आसपास का मुआयना कर रही थीं.

एक लंबी चुप्पी के बाद कल्पना ने अब्दुल रहीम से पूछा, ‘‘क्या आप को ठीक 10 साल पहले की वह होली याद है, जब एक 15 साला लड़की का बलात्कार आप के इस ढाबे के ठीक पीछे वाली दीवार के पास किया गया था? उसे चादर आप ने ही ओढ़ाई थी और गोद में उठा उस के घर पहुंचाया था?’’

अब चौंकने की बारी अब्दुल रहीम की थी. पसीने की एक लड़ी कनपटी से बहते हुए पीठ तक जा पहुंची. थोड़ी देर तक सिर झुकाए मानो विचारों में गुम रहने के बाद उस ने सिर ऊपर उठाया. उस की पलकें भीगी हुई थीं. अब्दुल रहीम देर तक आसमान में घूरता रहा. मन सालों पहले पहुंच गया. होली की वह मनहूस दोपहर थी, सड़क पर रंग खेलने वाले कम हो चले थे. इक्कादुक्का मोटरसाइकिल पर लड़के शोर मचाते हुए आतेजाते दिख रहे थे.

अब्दुल रहीम ने उस दिन भी ढाबा खोल रखा था. वैसे, ग्राहक न के बराबर आए थे. होली का दिन जो था. दोपहर होती देख अब्दुल रहीम ने भी ढाबा बंद कर घर जाने की सोची कि पिछवाड़े से आती आवाजों ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया. 4 लड़के नशे में चूर थे, पर… पर, यह क्या… वे एक लड़की को दबोचे हुए थे. छोटी बच्ची थी, शायद 14-15 साल की.

अब्दुल रहीम उन चारों लड़कों को पहचानता था. सब निठल्ले और आवारा थे. एक पिछड़े वर्ग के नेता के साथ लगे थे और इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था. वे यहीं आसपास के थे. चारों छोटेमोटे जुर्म कर अंदर बाहर होते रहते थे.

रहीम जोरशोर से चिल्लाया, पर लड़कों ने उस की कोई परवाह नहीं की, बल्कि एक लड़के ने ईंट का एक टुकड़ा ऐसा चलाया कि सीधे उस के सिर पर आ कर लगा और वह बेहोश हो गया. आंखें खुलीं तो अंधेरा हो चुका था. अचानक उसे बच्ची का ध्यान आया. उन लड़कों ने तो उस का ऐसा हाल किया था कि शायद गिद्ध भी शर्मिंदा हो जाएं. बच्ची शायद मर चुकी थी.

अब्दुल रहीम दौड़ कर मेज पर ढका एक कपड़ा खींच लाया और उसे उस में लपेटा. पानी के छींटें मारमार कर कोशिश करने लगा कि शायद कहीं जिंदा हो. चेहरा साफ होते ही वह पहचान गया कि यह लड़की गली के आखिरी छोर पर रहती थी. उसे नाम तो मालूम नहीं था, पर घर का अंदाजा था. रोज ही तो वह अपनी सहेलियों के संग उस के ढाबे के सामने से स्कूल जाती थी.

बच्ची की लाश को कपड़े में लपेटे अब्दुल रहीम उस के घर की तरफ बढ़ चला. रात गहरा गई थी. लोग होली खेल कर अपनेअपने घरों में घुस गए थे, पर वहां बच्ची के घर के आगे भीड़ जैसी दिख रही थी. शायद लोग खोज रहे होंगे कि उन की बेटी किधर गई.

अब्दुल रहीम के लिए एकएक कदम चलना भारी हो गया. वह दरवाजे तक पहुंचा कि उस से पहले लोग दौड़ते हुए उस की तरफ आ गए. कांपते हाथों से उस ने लाश को एक जोड़ी हाथों में थमाया और वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा. वहां चीखपुकार मच गई.

‘मैं ने देखा है, किस ने किया है.

मैं गवाही दूंगा कि कौन थे वे लोग…’ रहीम कहता रहा, पर किसी ने भी उसे नहीं सुना.

मेज पर हुई थपकी की आवाज से अब्दुल रहीम यादों से बाहर आया.

‘‘देखिए, उस केस को दाखिल करने का आर्डर आया है,’’ कल्पना ने बताया.

‘‘पर, इस बात को तो सालों बीत गए हैं मैडम. रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी. उस बच्ची के मातापिता शायद उस के गम को बरदाश्त नहीं कर पाए थे और उन्होंने शहर छोड़ दिया था,’’ अब्दुल रहीम ने हैरानी से कहा.

‘मुझे बताया गया है कि आप उस वारदात के चश्मदीद गवाह थे. उस वक्त आप उन बलात्कारियों की पहचान करने के लिए तैयार भी थे,’’ कल्पना की इस बात को सुन कर अब्दुल रहीम उलझन में पड़ गया.

‘‘अगर आप उन्हें सजा दिलाना नहीं चाहते हैं, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. बस, उस बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई, उस से सिर्फ वह ही नहीं तबाह हुई, बल्कि उस के मातापिता की भी जिंदगी बदतर हो गई,’’ सिटी एसपी कल्पना ने समझाते हुए कहा.

‘‘2 चाय ले कर आना,’’ अब्दुल रहीम ने आवाज लगाई, ‘‘जीप में बैठे लोगों को भी चाय पिलाना.’’

चाय आ गई. अब्दुल रहीम पूरे वक्त सिर झुकाए चिंता में चाय सुड़कता रहा.

‘‘आप तो ऐसे परेशान हो रहे हैं, जैसे आप ने ही गुनाह किया हो. मेरा इरादा आप को तंग करने का बिलकुल नहीं था. बस, उस परिवार के लिए इंसाफ की उम्मीद है.’’

अब्दुल रहीम ने कहा, ‘‘हां मैडम, मैं ने अपनी आंखों से देखा था उस दिन. पर मैं उस बच्ची को बचा नहीं सका. इस का मलाल मुझेआज तक है. इस के लिए मैं खुद को भी गुनाहगार समझता हूं.

‘‘कई दिनों तक तो मैं अपने आपे में भी नहीं था. एक महीने बाद मैं फिर गया था उस के घर, पर ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों को भी कुछ नहीं पता था.

‘‘जानती हैं मैडम, उस वक्त के अखबारों में इस खबर ने कोई जगह नहीं पाई थी. दलितों की बेटियों का तो अकसर उस तरह बलात्कार होता था, पर यह घर थोड़ा ठीकठाक था, क्योंकि लड़की के पिता सरकारी नौकरी में थेऔर गुनाहगार हमेशा आजाद घूमते रहे.

‘‘मैं ने भी इस डर से किसी को यह बात बताई भी नहीं. इसी शहर में होंगे सब. उस वक्त सब 20 से 25 साल के थे. मुझे सब के बाप के नामपते मालूम हैं. मैं आप को उन सब के बारे में बताने के लिए तैयार हूं.’’

अब्दुल रहीम को लगा कि चश्मे के पीछे कल्पना मैडम की आंखें भी नम हो गई थीं.

‘‘उस वक्त भले ही गुनाहगार बच गए होंगे. लड़की के मातापिता ने बदनामी से बचने के लिए मामला दर्ज ही नहीं किया, पर आने वाले दिनों में उन चारों पापियों की करतूत फोटो समेत हर अखबार की सुर्खी बनने वाली है.

‘‘आप तैयार रहें, एक लंबी कानूनी जंग में आप एक अहम किरदार रहेंगे,’’ कहते हुए कल्पना मैडम उठ खड़ी हुईं और काउंटर पर चाय के पैसे रखते हुए जीप में बैठ कर चली गईं.

‘‘आज पहली बार किसी पुलिस वाले को चाय के पैसे देते देखा है,’’ छोटू टेबल साफ करते हुए कह रहा था और अब्दुल रहीम को लग रहा था कि सालों से सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो गया था.

इस मुलाकात के बाद वक्त बहुत तेजी से बीता. वे चारों लड़के, जो अब अधेड़ हो चले थे, उन के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. अब्दुल रहीम ने भी अपना बयान रेकौर्ड करा दिया. मीडिया वाले इस खबर के पीछे पड़ गए थे. पर उन के हाथ कुछ खास खबर लग नहीं पाई थी.

अब्दुल रहीम को भी कई धमकी भरे फोन आने लगे थे. सो, उन्हें पूरी तरह पुलिस सिक्योरिटी में रखा जा रहा था. सब से बढ़ कर कल्पना मैडम खुद इस केस में दिलचस्पी ले रही थीं और हर पेशी के वक्त मौजूद रहती थीं. कुछ उत्साही पत्रकारों ने उस परिवार के पड़ोसियों को खोज निकाला था, जिन्होंने बताया था कि होली के कुछ दिन बाद ही वे लोग चुपचाप बिना किसी से मिले कहीं चले गए थे, पर बात किसी से नहीं हो पाई थी.

कोर्ट की तारीखें जल्दीजल्दी पड़ रही थीं, जैसे कोर्ट भी इस मामले को जल्दी अंजाम तक पहुंचाना चाहता था. ऐसी ही एक पेशी में अब्दुल रहीम ने सालभर बाद बच्ची के पिता को देखा था. मिलते ही दोनों की आंखें नम हो गईं.

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था. बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी के साथ आया हुआ मालूम दे रहा था. उस की दलीलों के आगे केस अपना रुख मोड़ने लगा था. सभी कानून की खामियों के सामने बेबस से दिखने लगे थे.

‘‘जनाब, सिर्फ एक अब्दुल रहीम की गवाही को ही कैसे सच माना जाए? मानता हूं कि बलात्कार हुआ होगा, पर क्या यह जरूरी है कि चारों ये ही थे? हो सकता है कि अब्दुल रहीम अपनी कोई पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहे हों? क्या पता इन्होंने ही बलात्कार किया हो और फिर लाश पहुंचा दी हो?’’ धूर्त वकील ने ऐसा पासा फेंका कि मामला ही बदल गया.

लंच की छुट्टी हो गई थी. उस के बाद फैसला आने की उम्मीद थी. चारों आरोपी मूंछों पर ताव देते हुए अपने वकील को गले लगा कर जश्न सा मना रहे थे. लंच की छुट्टी के बाद जज साहब कुछ पहले ही आ कर सीट पर बैठ गए थे. उन के सख्त होते जा रहे हावभाव से माहौल भारी बनता जा रहा था.

‘‘क्या आप के पास कोई और गवाह है, जो इन चारों की पहचान कर सके,’’ जज साहब ने वकील से पूछा, तो वह बेचारा बगलें झांकनें लगा.

पीछे से कुछ लोग ‘हायहाय’ का नारा लगाने लगे. चारों आरोपियों के चेहरे दमकने लगे थे. तभी एक आवाज आई, ‘‘हां, मैं हूं. चश्मदीद ही नहीं भुक्तभोगी भी. मुझे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए.’’

सब की नजरें आवाज की दिशा की ओर हो गईं. जज साहब के ‘इजाजत है’ बोलने के साथ ही लोगों ने देखा कि उन की शहर की एसपी कल्पना कठघरे की ओर जा रही हैं. पूरे माहौल में सनसनी मच गई.

‘‘हां, मैं ही हूं वह लड़की, जिसे 10 साल पहले होली की दोपहर में इन चारों ने बड़ी ही बेरहमी से कुचला था, इस ने…

‘‘जी हां, इसी ने मुझे मेरे घर के आगे से उठा लिया था, जब मैं गेट के आगे कुत्ते को रोटी देने निकली थी. मेरे मुंह को इस ने अपनी हथेलियों से दबा दिया था और कार में डाल दिया था.

‘‘भीतर पहले से ये तीनों बैठे हुए थे. इन्होंने पास के एक ढाबे के पीछे वाली दीवार की तरफ कार रोक कर मुझे घसीटते हुए उतारा था.

‘‘इस ने मेरे दोनों हाथ पकड़े थे और इस ने मेरी जांघें. कपड़े इस ने फाड़े थे. सब से पहले इस ने मेरा बलात्कार किया था… फिर इस ने… मुझे सब के चेहरे याद हैं.’’

सिटी एसपी कल्पना बोले जा रही थीं. अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए उन की करतूतों को उजागर करती जा रही थीं. कल्पना के पिता ने उठ कर 10 साल पुराने हुए मैडिकल जांच के कागजात कोर्ट को सौंपे, जिस में बलात्कार की पुष्टि थी. रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कल्पना को जान से मारने की कोशिश की गई थी.

कल्पना अभी कठघरे में ही थीं कि एक आरोपी की पत्नी अपनी बेटी को ले कर आई और सीधे अपने पति के मुंह पर तमाचा जड़ दिया.

दूसरे आरोपी की पत्नी उठ कर बाहर चली गई. वहीं एक आरोपी की बहन अपनी जगह खड़ी हो कर चिल्लाने लगी, ‘‘शर्म है… लानत है, एक भाई होते हुए तुम ने ऐसा कैसे किया था?’’

‘‘जज साहब, मैं बिलकुल मरने की हालत में ही थी. होली की उसी रात मेरे पापा मुझे तुरंत अस्पताल ले कर गए थे, जहां मैं जिंदगी और मौत के बीच कई दिनों तक झूलती  रही थी. मुझे दौरे आते थे. इन पापियों का चेहरा मुझे हर वक्त डराता रहता था.’’

अब केस आईने की तरह साफ था. अब्दुल रहीम की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. कल्पना उन के पास जा कर उन के कदमों में गिर पड़ी.

‘‘अगर आप न होते, तो शायद मैं जिंदा न रहती.’’

मीडिया वाले कल्पना से मिलने को उतावले थे. वे मुसकराते हुए उन की तरफ बढ़ गई.

‘‘अब्दुल रहीम ने जब आप को कपड़े में लपेटा था, तब मरा हुआ ही समझा था. मेज के उस कपड़े से पुलिस की वरदी तक के अपने सफर के बारे में कुछ बताएं?’’ एक पत्रकार ने पूछा, जो शायद सभी का सवाल था.

‘‘उस वारदात के बाद मेरे मातापिता बेहद दुखी थे और शर्मिंदा भी थे. शहर में वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे थे. मेरे पिताजी ने अपना तबादला इलाहाबाद करवा लिया था.

‘‘सालों तक मैं घर से बाहर जाने से डरती रही थी. आगे की पढ़ाई मैं ने प्राइवेट की. मैं अपने मातापिता को हर दिन थोड़ा थोड़ा मरते देख रही थी.

‘‘उस दिन मैं ने सोचा था कि बहुत हुआ अब और नहीं. मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा की तैयारी करने लगी. आरक्षण के कारण मुझे फायदा हुआ और मनचाही नौकरी मिल गई. मैं ने अपनी इच्छा से इस राज्य को चुना. फिर मौका मिला इस शहर में आने का.

‘‘बहुत कुछ हमारा यहीं रह गया था. शहर को हमारा कर्ज चुकाना था. हमारी इज्जत लौटानी थी.’’

‘‘आप दूसरी लड़कियों और उन के मातापिता को क्या संदेश देना चाहेंगी?’’ किसी ने सवाल किया.

‘‘इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि बलात्कार की शिकार लड़की और उस के परिवार वाले शर्मिंदा हों. गुनाहगार चोर होता है, न कि जिस का सामान चोरी जाता है वह.

‘‘हां, जब तक बलात्कारियों को सजा नहीं होगी, तब तक उन के हौसले बुलंद रहेंगे. मेरे मातापिता ने गलती की थी, जो कुसूरवार को सजा दिलाने की जगह खुद सजा भुगतते रहे.’’

कल्पना बोल रही थीं, तभी उन की मां ने एक पुडि़या अबीर निकाला और उसे आसमान में उड़ा दिया. सालों पहले एक होली ने उन की जिंदगी को बेरंग कर दिया था, उसे फिर से जीने की इच्छा मानो जाग गई थी.

पत्नी का प्रेमी : क्यों मारा गया किशोर? – भाग 3

पूछताछ में बालकराम ने पुलिस को बताया था कि घर से निकलते समय किशोर ने अपने किसी घनश्याम नाम के दोस्त से मिलने की बात कही थी. पुलिस ने तुरंत घनश्याम के बारे में पता किया. पता चला वह घर में नहीं है. पुलिस ने घरवालों से उस का मोबाइल नंबर ले लिया. जब उस के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई गई तो पता चला कि उस के फोन की भी लोकेशन उस स्थान की थी, जहां किशोर की हत्या हुई थी.

इस के अलावा जहांजहां की नाई के फोन की लोकेशन थी, वहांवहां घनश्याम उर्फ साहेब के फोन की भी लोकेशन थी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. साफ हो गया था कि घनश्याम ही किशोर का हत्यारा है. किशोर की कुछ ही दिनों पहले उस से दोस्ती हुई थी.

अभी जल्दी ही किशोर की शादी बाराबंकी में हुई थी. घनश्याम बाराबंकी का था, इस से पुलिस को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किशोर की पत्नी घनश्याम को जानती हो. उस का घनश्याम से प्रेमप्रसंग रहा हो, जिस की वजह से किशोर मारा गया हो.

इंसपेक्टर विजयमल यादव ने किशोर की नवब्याहता रिशा से पूछताछ की तो उस ने घनश्याम से अपने प्रेमप्रसंग की बात स्वीकार कर ली. उस ने यह भी बताया कि घनश्याम ने उस से कहा भी था कि वह किशोर को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगा.

इस के बाद 21 मार्च को इंसपेक्टर विजयमल यादव ने टीम के साथ बाराबंकी जा कर घनश्याम उर्फ साहेब को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर उस के घर से पुलिस ने किशोर का मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया था.

कोतवाली ला कर घनश्याम से पूछताछ की गई तो उस ने किशोर की हत्या का अपराध स्वीकार कर के उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

रिशा की शादी हो जाने से घनश्याम उर्फ साहेब काफी बौखलाया हुआ था. क्योंकि वह रिशा से दूरी किसी भी हाल में बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. जब साहेब को पता चला कि रिशा मायके आई है तो वह उस से मिलने को बेताब हो उठा. उसे रिशा से अपने सवालों के जवाब लेने के साथ अपना फैसला भी सुनाना था.

रिशा को पता चला तो वह साहेब से मिली. तब साहेब ने उस की आंखों में आंखें डाल कर बेचैनी से पूछा, ‘‘रिशा, जब तुम प्यार मुझ से करती थी तो शादी दूसरे से क्यों कर ली?’’

‘‘मैं एक लड़की हूं, इसलिए घर वालों का विरोध नहीं कर सकी. अगर शादी से मना करती तो पापा मुझे जिंदा नहीं छोड़ते. तब मैं तुम से बहुत दूर चली जाती. हमारे मिलन का सपना अधूरा ही रह जाता.’’

‘‘वैसे भी हमारा मिलन कहां हो रहा है?’’ निराश साहेब ने कहा.

‘‘होगा, जरूर होगा. शादी होने के बावजूद मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगी. हम दोनों के संबंध पहले की ही तरह चलते रहेंगे.’’ रिशा ने समझाया.

‘‘नहीं रिशा, तुम मेरी हो और सिर्फ मेरी ही रहोगी. मैं तुम्हें किसी और की बांहों में नहीं देख सकता. इसलिए मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘नहीं साहेब, उस के साथ कुछ मत करना. उस का इस में क्या दोष है?’’ रिशा ने कहा.

लेकिन साहेब ने उस की बात पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उस ने तो ठान लिया था कि वह अपने और रिशा के बीच किसी को नहीं आने देगा. यही वजह थी कि उस ने किशोर की हत्या की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत उस ने किशोर से दोस्ती गांठ ली. दोस्ती होने के बाद दोनों की शराब की महफिलें जमने लगीं.किशोर को घनश्याम के बारे में कुछ पता तो था नहीं, इसलिए वह उस पर एक दोस्त की तरह ही विश्वास करने लगा था.

14 मार्च को साहेब नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया तो काउंटर पर रखे नाई के मोबाइल को देख कर उस की नीयत खराब हो गई. उसे इस तरह के एक मोबाइल की जरूरत भी थी, जिस से फोन कर के वह किशोर को कहीं एकांत में बुला सकें.

क्योंकि वह जानता था कि अगर उस ने अपने मोबाइल से फोन किया तो पकड़ा जाएगा. उस ने नाई को कुछ खरीदने के बहाने बाहर भेज दिया और उस के जाते ही उस का मोबाइल ले कर निकल आया. यह मोबाइल किशोर की हत्या की योजना का एक अहम हिस्सा था.

18 मार्च की दोपहर एक बजे साहेब ने चोरी के मोबाइल से किशोर को फोन कर के पौलिटेक्निक चौराहे पर बुलाया. उस से मिलने के लिए घर से निकलते समय किशोर ने मां को बता दिया था कि वह अपने दोस्त घनश्याम से मिलने जा रहा है. वह पौलिटेक्निक चौराहे पर पहुंचा तो घनश्याम वहां उस का इंतजार करता मिला. घनश्याम उसे साथ ले कर सिटी बस से चिनहट आ गया.

घनश्याम ने शराब की एक दुकान से किशोर के लिए शराब और अपने लिए बीयर खरीदी. घनश्याम उसे छोटा भरवारा मल्हौर रेलवे क्रासिंग के पास ले गया और वहां एक खाली पड़े प्लौट में बैठ गया. घनश्याम ने किशोर को शराब पिलाई, जबकि खुद बीयर पी. शराब पिलाने के बाद उस ने किशोर को साथ लाई भांग भी खिला दी. इस के बाद नशे की अधिकता की वजह से किशोर की आंखें मुंदने लगीं.

घनश्याम ने कहा, ‘‘लगता है, नशा ज्यादा हो गया है. ऐसा करो, लेट कर कुछ देर सो लो. नशा कम हो जाए तो घर चले जाना.’’

किशोर वहीं घास पर लेट गया और कुछ ही देर में बेसुध हो गया. इस के बाद घनश्याम ने वहीं पडे़ भारी पत्थर को उठाया और किशोर के चेहरे पर पटक दिया. इस के बाद उस ने कई बार ऐसा किया. ऐसा करने से किशोर की मौत हो गई. इस तरह किशोर की हत्या कर वह वहां से चला गया.

बाराबंकी जाते हुए घनश्याम ने रास्ते से किशोर के पिता बालकराम को फोन कर के किशोर की लाश के बारे में बता कर उसे वहां से लाने के लिए कह दिया था. इस के बाद उस ने चोरी किए गए मोबाइल से सिम निकाल कर तोड़ दिया और उस के साथ मोबाइल को फेंक दिया.

घनश्याम ने किशोर की हत्या में होशियारी तो बहुत दिखाई, लेकिन उस ने जो होशियारी दिखाई थी, उसी की वजह से पकड़ा गया. उस ने चोरी के मोबाइल के साथ अपना निजी मोबाइल भी साथ रखा था, जिस का उस ने स्विच औफ नहीं किया था. यही गलती उसे भारी पड़ गई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने घनश्याम उर्फ साहेब को सीजेएम आनंद कुमार की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एहसान के बदले मिली मौत – भाग 3

डर के मारे वह ऊपर की ओर भागे. कमरे में रखी बड़ी सी कुरसी पर 5-6 कंबल ओढ़ कर छिप गए. कदमों की आहट उन्हें साफ सुनाई दे रही थी, जो उन्हीं की ओर बढ़ रहे थे.

सन्नाटे को चीरती हुई एक मर्दाना आवाज गूंजी, ‘‘डा. फेंज गनीमत इसी में है कि तुम जहां भी छिपे हो निकल आओ वरना हम तो तुम्हें ढूंढ ही लेंगे.’’

यह आवाज थमी नहीं कि दूसरी आवाज उभरी, ‘‘आज बच नहीं पाओगे डा. फेंज.’’

खौफ से डा. फेंज की नसों का खून जम सा गया. वह सांस खींचे दुबके रहे. तभी पहले वाली आवाज फिर गूंजी, ‘‘डा. फेंज, हमें बता दो कि तुम ने नकद राशि कहां छिपा रखी है? हम तुम्हारी जान बख्श देंगे.’’

कंबलों में हलचल सी हुई. डा. फेंज में जाने कहां से हिम्मत आ गई कि वह झटके से बाहर आ गए. 2 लोग उन्हें खोज रहे थे. उन्होंने फुर्ती से एक युवक का सिर पकड़ कर खिड़की की चौखट से दे मारा. चीख के साथ उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. दूसरा उन की ओर लपका. उस ने डा. फेंज की कलाई पकड़ कर फर्श पर गिरा दिया.

इस के बाद घसीटता हुआ दीवार तक ले गया और उन का सिर पकड़ कर जोर से दीवार से मारा. इसी के साथ उस के घायल साथी ने डा. फेंज पर कुल्हाड़ी से जोरदार वार सिर पर किया. बस, एक ही वार में हलकी सी चीख के साथ वह बेहोश हो गए. इस के बाद भी दोनों युवकों ने ताबड़तोड़ कई वार उन के सिर और सीने पर किए. उन्हें लगा कि डा. फेंज खत्म हो गए हैं, लेकिन यह उन का भ्रम था.

डा. फेंज की सांसें चल रही थीं. दोनों का अगला निशाना वहां रखी अलमारी थी. अलमारी के दरवाजे को कुल्हाड़ी से तोड़ कर उसे खंगाला तो उस में 5 हजार यूरो मिले, जिन्हें ले कर दोनों भाग खड़े हुए. उन के जाने के बाद घिसटघिसट कर डा. फेंज उस टेबल तक आए, जहां फोन रखा था. किसी तरह नंबर मिला कर उन्होंने पुलिस को कराहती आवाज में घटना की सूचना दी.

10 मिनट में टौप एक्शन पुलिस फोर्स वहां पहुंच गई. गंभीर रूप से घायल डा. फेंज को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. 11 सप्ताह तक जिंदगी और मौत से जूझते हुए डा. फेंज ने आखिर 26 मार्च, 2008 को दम तोड़ दिया.

पुलिस जांच में मिले सुबूत डा. फेंज की पत्नी ततजाना के दोषी होने का इशारा कर रहे थे. ततजाना को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई. वह खुद को बेकुसूर बताती रही. उस का तर्क था कि एक साल से डा. फेंज से उस का कोई संबंध नहीं था. वह अपने प्रेमी हीलमुट बेकर के साथ रह रही थी. मगर उस की कोई भी दलील काम नहीं आई. मई, 2008 में अदालत के आदेश पर उसे डा. फेंज की हत्या और चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया.

16 महीने बर्लिन कोर्ट में यह मुकदमा चला. लेकिन सुबूतों और गवाहों के अभाव में अक्तूबर, 2009 को कोर्ट ने ततजाना को बेगुनाह करार देते हुए जेल से रिहा करने का आदेश दे दिया.

कहा जाता है कि ततजाना को अपनी बदसूरती के चलते पहले जीवन से खास लगाव नहीं रहा था. लेकिन जब डा. फेंज ने 20 औपरेशन कर के उसे खूबसूरती का तोहफा दिया तो उस के अंदर की दम तोड़ चुकी महत्त्वाकांक्षाएं और हसरतें फिर से उमंगे भरने लगी थीं. इसी के चलते उस ने अपने से 44 साल बड़े डा. फेंज के प्यार को स्वीकार कर के शादी कर ली थी, क्योंकि डा. फेंज के पास अरबों डौलर की दौलत थी.

पुलिस के अनुसार शादी के बाद 9 सालों तक ततजाना ने ऐश की जिंदगी बसर करते हुए अपने सभी अरमान पूरे कर लिए. इस के बाद उस का मन डा. फेंज से भर गया तो वह कार व्यापारी हीलमुट बेकर के पहलू में जा गिरी. वह उस के साथ एक साल रही, लेकिन डा. फेंज को उस ने तलाक नहीं दिया. शायद उस की निगाह डा. फेंज की बेशुमार दौलत पर थी. उस पर उस का कब्जा डा. फेंज की मौत के बाद ही हो सकता था. इसी वजह से उस ने डा. फेंज की हत्या पेशेवर हत्यारों से करवा दी थी. लेकिन सुबूतों के अभाव में वह निर्दोष मानी गई.

खैर, सच्चाई चाहे जो भी रही हो, जेल से रिहा होने के बाद ततजाना डा. फेंज की बेवा होने के नाते उस की 11 मिलियन यू.एस. डौलर की एकलौती वारिस हो गई. उस की जिंदगी फिर उसी पुराने ढर्रे पर चल पड़ी. पार्टीक्लबों में रात रंगीन करना, पुरुष मित्रों की बांहों में बांहें डाल कर डांस करना, महंगी कारों में घूमना और भोग विलास भरा जीवन उस की दिनचर्या में शुमार हो गया.

एक हाईफाई पार्टी में ही ततजाना की मुलाकात नवंबर, 2011 में जर्मनी के सेक्सोनिया राज्य के आखिरी राजा 68 वर्षीय प्रिंस वौन हौमजोर्लन से हुई तो वह उस से दिल लगा बैठी. प्रिंस वौन भी उस की खूबसूरती और जवानी के ऐसे दीवाने हुए कि बस उसी के हो कर रह गए. दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन प्रिंस वौन की पत्नी और बच्चों के रहते यह संभव नहीं था.

मिसकाल बनी काल – भाग 3

सुवेश सचिन का अच्छा दोस्त था. उस की परेशानी समझ कर उस ने कहा, ‘‘मेरा एक दोस्त है अजय. उस का घर रुचिखंड में है. उस के मकान का ऊपर वाला हिस्सा खाली है. मैं उस से बात करता हूं. अगर अजय तैयार हो गया तो तुम्हें कमरा मिल जाएगा. वह 2 हजार रुपए कमरे का किराया लेगा. साथ ही एक महीने का एडवांस देना होगा.’’

सचिन इस के लिए तैयार हो गया. सुवेश ने अजय से बात की और अजय ने अपने पिता से. अजय का कोई दोस्त अपनी पत्नी के साथ रहेगा यह जान कर अजय के पिता गुलाबचंद राजी हो गए. सचिन ने कमरा देख कर एडवांस किराया दे दिया. इस के बाद उस ने 8 दिसंबर को सोफिया को फोन कर के कहा, ‘‘सोफिया, मैं तुम्हें लखनऊ बुलाना चाहता हूं. मैं 10 तारीख को तुम्हें अजगैन में मिलूंगा. हम 1-2 महीने अकेले रहेंगे. इस बीच मैं अपने घर वालों को राजी कर लूंगा और फिर तुम्हें अपने घर ले जाऊंगा.’’

सोफिया यही चाहती थी. वह पहले से ही सचिन के साथ जिंदगी जीने के सपने देख रही थी. योजनानुसार सोफिया 10 दिसंबर की सुबह अपने घर से निकली तो उस की मां ने पूछा, ‘‘आज स्कूल नहीं जाएगी क्या?’’

‘‘नहीं मां, आज दादी की दवा लेनी है, वही लेने जा रही हूं. थोड़ी देर में लौट आऊंगी.’’ कह कर सोफिया घर से निकल गई. उस ने घर से 10 हजार रुपए और चांदी की एक जोड़ी पायल भी साथ ले ली थी. अपने गांव से वह सीधी अजगैन पहुंची. सचिन उसे तयशुदा जगह पर मिल गया. उस से मिलने की खुशी में 17 साल की सोफिया अपने मांबाप की इज्जतआबरू, मानसम्मान, प्यार और विश्वास सब भूल गई. वहां से दोनों लखनऊ आ गए. सचिन सोफिया को अपने कमरे पर ले गया. खाना वगैरह दोनों ने बाहर ही खा लिया था.

कमरे पर पहुंचते ही सोफिया सचिन से शादी की बात करने लगी. सचिन ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘मुझ पर भरोसा रखो. हम जल्द ही शादी भी कर लेंगे. मैं तुम्हें सारी बातें पहले ही बता चुका हूं.’’

दरअसल सचिन किसी भी तरह जल्द से जल्द सोफिया को हासिल कर लेना चाहता था. गहराती रात के साथ सचिन की जवानी हिलोरें मारने लगी तो वह सोफिया के न चाहते हुए भी अकेलेपन का लाभ उठा कर उसे हासिल करने की कोशिश करने लगा. सोफिया ने काफी हद तक खुद को बचाने की कोशिश की. लेकिन धीरेधीरे उस का विरोध कम हो गया और सचिन मनमानी करने में सफल रहा. सोफिया खुद को यह दिलासा दे रही थी कि आज न सही कल शादी तो होनी ही है. जो शादी के बाद होना था वह पहले ही सही.

अगले दिन सोफिया सचिन से शादी करने की जिद करने लगी. जबकि सचिन चाहता था कि वह किसी तरह अपने घर वापस चली जाए. उस ने बहानेबाजी कर के उसे लौट जाने को कहा तो सोफिया बोली, ‘‘घर से भाग कर आने वाली लड़की के लिए घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. मैं अब वापस नहीं लौट सकती.’’

सचिन और सोफिया का वह पूरा दिन प्यार और मनुहार के बीच गुजरा. रात गहरा गई तो सोफिया खाना खा कर सो गई. जबकि सचिन जाग रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि सोफिया से कैसे पीछा छुड़ाए.

उस के मन में खयाल आया कि क्यों न वह गला दबा कर सोफिया को मार डाले. लेकिन उसे लगा कि इस से उस की अंगुलियों के निशान सोफिया के गले पर आ जाएंगे और वह पकड़ा जाएगा. आखिरकार काफी सोचविचार कर उस ने अपने हाथों पर पौलीथिन लपेट ली और सोती हुई सोफिया का गला दबाने लगा.

इस से सोफिया जाग गई और अपना बचाव करने का प्रयास करने लगी. सचिन जवान था और सोफिया से ताकतवर भी. वैसे भी वह योजना बना कर उस की हत्या कर रहा था. सोफिया एक तो शरीर से कमजोर थी, दूसरे उसे सचिन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. इस के बावजूद वह पूरा जोर लगा कर बचने की कोशिश करने लगी. इस पर सचिन ने उस के सिर पर जोरो से वार किया. इस से वह बेहोश हो गई. सचिन को मौका मिला तो उस ने सोफिया का गला दबा कर उसे मार डाला.

सोफिया के मरने के बाद सचिन के हाथपांव फूल गए. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. रात भर वह सोफिया की लाश के पास बैठा रोता रहा. काफी सोचने के बाद जब उसे लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो वह सुबह 4 बजे आशियाना थाने जा पहुंचा. उस ने अपने बचाव के लिए झूठी कहानी भी गढ़ी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सीओ बबीता सिंह के सामने उस का झूठ टिक नहीं सका.

पुलिस ने मामले की जानकारी सोफिया के घर वालों को दी तो वे लखनऊ आ गए. उन लोगों ने बताया कि सोफिया किसी लड़के के साथ भाग आई थी. उन्हें सोफिया का शव सौंप दिया गया. लंबी पूछताछ के बाद सचिन के बयान की पुष्टि के लिए पुलिस ने मकान मालिक गुलाबचंद और उन के बेटे अजय व उस के दोस्त सुवेश से भी पूछताछ की.

आशियाना पुलिस ने सचिन के खिलाफ भादंवि की धारा 363, 376, 302 और पोक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रन फ्राम सैक्सुअल आफेंसेज एक्ट) की धारा 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया.

इस में कोई दो राय नहीं कि सचिन के पास बचने के तमाम रास्ते थे. वह सोफिया को कहीं बाजार में अकेला छोड़ कर भाग सकता था. उसे उस के घर पहुंचा सकता था. सोफिया नादान और नासमझ थी. वह 2 माह पुरानी मोबाइल की दोस्ती पर इतना भरोसा कर बैठी कि परिवार छोड़ कर लखनऊ आ गई. उस ने जिस पर भरोसा किया, वही उस का कातिल बन गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में सोफिया नाम परिवर्तित है.

दोस्त के प्यार पर डाका – भाग 1

हरिहर कृष्णा की नफरत की इंतहा यहीं खत्म नहीं हुई थी, उस ने उसी चाकू से नवीन का पेट फाड़ कर दिल बाहर निकाल दिया और नफरत व गुस्से से कहा, “ये दिल मेरी नंदिनी के लिए धडक़ता था न?” चाकू से दिल के कई टुकड़े कर डाले. 

फिर उस ने कहा, “इन्हीं अंगुलियों से तू मेरी नंदिनी को मैसेज भेजता था न?” फिर उस ने दोनों हाथों की दसों अंगुलियों को काट कर अलग कर दिया. 

फिर उस ने कहा, “तू मेरी नंदिनी के साथ शादी कर बच्चे पैदा करना चाहता था न?” उस के बाद उस ने उस के प्राइवेट पार्ट को भी काट कर अलग कर दिया और सबूत के तौर पर फोटो मोबाइल में उतार कर प्रेमिका के वाट्सऐप पर भेज दिया.

उस समय सुबह के 7 बज रहे थे, जब नवीन हौस्टल में अपने दोस्त प्रदीप के साथ बैठा गप्पें लड़ा रहा था. तभी उस के मोबाइल की घंटी घनघना उठी. मोबाइल फोन उठाते हुए स्क्रीन पर डिसप्ले हो रहे नंबर को ध्यान से देखा. वह नंबर उस के पुराने दोस्त हरिहर कृष्णा का था. झट से काल रिसीव करते हुए नवीन ने कहा, “हैलो कृष्णा, कैसे हाल हैं?”

“बेटर हूं, मस्त हूं मेरे दोस्त,” गर्मजोशी के साथ हरिहर कृष्ण ने उत्तर दिया, “और बता तू कैसा है? अच्छा यह बता, आज शाम क्या कर रहा है?”

“एकदम फर्स्ट क्लास. रही बात शाम की तो शाम में फ्री हूं.” नवीन बोला.

“तो आ जाओ, चल मस्ती वस्ती करते हैं. मेरी तरफ से पार्टी. पार्टी में मैं रहूंगा, तू रहेगा. बड़े मजे होंगे. आ रहा है न मेरे यार.”

“हूंऽऽ अभी फिलहाल पार्टी सार्टी में जाने का मेरा मूड नहीं है, लेकिन जहां बात यार की हो तो मैं… तैयार हूं. बता, कहां मिलना है?”

“ऐसा कर तू पेड्डा अंबरपेट आ जा. तुझे मैं वहीं से रिसीव कर लूंगा और फिर मैं तुझे बाइक से ले कर पिकनिक प्लेस चल दूंगा, जहां पार्टी करनी है.”

“ठीक है भाई, आ रहा हूं मैं. तू बाइक ले कर वहां पहुंच. ..और हां, वापस लौटते समय मेरे को हौस्टल छोडऩा होगा.”

“बस इतनी सी बात?” हरिहर कृष्णा ने आगे कहा, “तेरे लिए तो मेरी जान हाजिर है. गर जान मांगी होती तो वो भी देने के लिए तैयार था. रही बात हौस्टल पहुंचाने की तो निश्चिन्त रह, वापस लौटते हुए तुझे हौस्टल छोड़ते हुए ही घर जाऊंगा.”

“तो फिर ठीक है, कपड़े चेंज कर मैं निकल रहा हूं, तू भी निकल.”

“ओके भाई, मैं भी बाइक ले कर निकल रहा हूं.”

“ओके,” नवीन ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया था. फिर उस ने अपने रूममेट प्रदीप को बता दिया कि दोस्त कृष्णा का फोन आया था. उस ने मुझे पार्टी पर बुलाया है, मैं वहीं जा रहा हूं, मेरा खाना उसी के साथ है. कमरे पर लौटने में देर हो सकती है. ऐसा करना, तुम खाना बना कर खा लेना, मेरा बिलकुल भी इंतजार मत करना. देर रात तक कमरे पर लौट आऊंगा.उस के बाद नवीन हौस्टल से दोस्त हरिहर कृष्ण से मिलने नेलगोंडा से हैदराबाद रवाना हो गया.

रात के करीब 11 बज चुके थे. नवीन अब तक न तो हौस्टल लौटा था और न ही उस का फोन ही काम कर रहा था. काल करने पर वह स्विच औफ आ रहा था. यह देख कर प्रदीप घबरा गया था.

दरअसल, नवीन बीटेक का छात्र था और उस ने नेलगोंडा जिले के महात्मा गांधी इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला लिया था और उसी कालेज के छात्रावास में क्लासमेट प्रदीप के साथ रहता था.  नवीन मूलरूप से नगरकुरनूल जिले के सीरिसन गैंड का रहने वाला था. वह एक बिजनेसमैन का बेटा था.

नेलगोंडा थाने में करा दी रिपोर्ट

बहरहाल, नवीन जब घर नहीं लौटा और उस का सेलफोन भी बंद मिला तो वह बुरी तरह परेशान हो गया था. उस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि वह क्या करे और कहां जा कर उसे ढूंढे? रात भी पूरे शबाब पर थी. उसे जब कुछ नहीं सूझा तो उस ने उसी रात नवीन के पापा शंकराय को फोन किया और उन से पूरी बात बता दी.

प्रदीप के मुंह से बेटे के बारे में सुन कर शंकराय बुरी तरह चौंक गए और तब उन्हें पता चला कि वह हरिहर कृष्णा से मिलने हैदराबाद गया था.

नवीन और कृष्णा बचपन के दोस्त थे, दोनों के बीच दांत काटी रोटी जैसे यारी भी थी. एक ही कालेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों अलगअलग शहर में जा बसे थे और अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में जुट गए थे. लेकिन इन दिनों किसी बात को ले कर दोनों के बीच में मनमुटाव चल रहा था.

इसी बात को ले कर नवीन के पापा शंकराय बुरी तरह डर गए थे. उन्होंने भी अपने स्तर से बेटे के बारे में जानकारी जुटाने और बेटे से मिलने की कोशिश की थी, लेकिन वह भी अपने मकसद में नाकामयाब रहे.

अगले दिन यानी 18 फरवरी, 2023 को शंकराय नेलगोंडा जिले के नारकेत पल्ली थाने पहुंचे और उन्होंने बेटे की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. एसएचओ आर. श्रीनिवास रेड्डी ने नवीन की गुमशुदगी दर्ज कर उन्हें आवश्यक काररवाई करने का आश्वासन दे कर घर भेज दिया था. घर वापस लौटने से पहले वह बेटे के गुम होने में उस के बचपन के दोस्त हरिहर कृष्णा की ओर इशारा कर गए थे.

गुमशुदगी दर्ज करने के बाद एसएचओ रेड्डी ने गुमशुदा नवीन के दोस्त हरिहर कृष्णा को टारगेट पर लेते हुए आगे की जांच बढ़ाई. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि नवीन की गुमशुदगी के बाद से हरिहर कृष्णा भी लापता है. इस के बाद पुलिस का शक उस पर गहरा गया और पुलिस उस की तलाश में जुट गई. उस के संभावित ठिकानों पर ताबड़तोड़ दबिश देने लगी थी, लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बहुत दूर था.

इधर पुलिस के साथसाथ नवीन के घर वाले भी उस की तलाश में जुट गए. उधर पुलिस नवीन और उस के दोस्त हरिहर कृष्णा के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर अध्ययन में जुटी हुई थी. काल डिटेल्स के अध्ययन से पता चल गया था कि आखिरी बार नवीन से हरिहर कृष्णा की 17 फरवरी, 2023 को सुबह 7 बजे बात हुई थी. उस के बाद कोई बातचीत नहीं हुई थी.

पुलिस ने जब हरिहर कृष्णा के मोबाइल नंबर को खंगालना शुरू की तो एक बेहद हैरानपरेशान कर देने वाली जानकारी मिली, जिसे जान कर पुलिस चौंक गई. जानकारी यह थी कि 18 फरवरी को कृष्णा के एकाउंट में किसी ने 1500 रुपए ट्रांसफर किए थे.

पुलिस इस की तह में अंदर तक घुस गई थी. काफी मशक्कत के बाद आखिरकार पुलिस ने पता लगा ही लिया कि वह पैसे हैदराबाद से उस के खाते में ट्रांसफर किए गए थे.

हरिहर कृष्णा ने थाने में किया सरेंडर

कुल मिला कर पुलिस इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि जो कुछ भी हुआ था, हैदराबाद में ही हुआ है. अपराध केंद्र हैदराबाद ही है. जब तक हरिहर कृष्णा पकड़ा नहीं जाता है, तब तक नवीन के बारे में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचना संभव नहीं था, इसलिए हरिहर कृष्णा का पकड़ा जाना हर हाल में जरूरी था.

हरिहर कृष्णा के ऊपर पुलिस ने चारों ओर से ऐसा जबरदस्त शिकंजा कस दिया था कि वह किसी भी बिल में छिपा हो, बाहर आने के लिए विवश हो जाएगा. पुलिस का यह फारमूला कामयाब भी हो गया और 24 फरवरी, 2023 की दोपहर हरिहर कृष्णा ने नारकेतपल्ली थाने में खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया.

उस ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कुबूल कर लिया कि उस ने दोस्त नवीन की 17/18 फरवरी, 2023 की रात को हत्या कर दी थी. नवीन की हत्या करने का उसे तनिक भी मलाल नहीं था.  इस के बाद वह पूरी घटना को विस्तार से बताता चला गया. मानवता के दुश्मन हरिहर कृष्णा का बयान सुन कर पुलिस वाले भी हैरान रह गए.

बहरहाल, आरोपी हरिहर कृष्णा के आत्मसमर्पण के बाद उसी के बयान के आधार पर हत्या का राज छिपाने और उसे पनाह देने के आरोप में उस की प्रेमिका नंदिनी और दोस्त हसन भी 10 दिनों बाद यानी 6 मार्च, 2023 को गिरफ्तार कर लिए गए थे. दोनों आरोपियों ने भी अपनेअपने जुर्म कुबूल कर लिए थे.

इस तरह 7 दिनों से रहस्य बने नवीन कांड का पुलिस ने खुलासा कर दिया था और यह साबित हो चुका था कि अब नवीन इस दुनिया में नहीं है.

कैसे एक जिगरी यार ने अपने बचपन के यार के खून से होली खेली और मोहब्बत के कैनवास पर अपने प्यार की दास्तान लिखी? पुलिस पूछताछ में सनसनीखेज कहानी कुछ इस तरह से सामने आई है.

नवीन और नंदिनी एकदूसरे को करते थे प्यार

22 वर्षीय नवीन मूलरूप से तेलंगाना राज्य के नगरकुरनुल जिले के चेरागोंडा मंडल थानाक्षेत्र के सीरिसनगैंड का रहने वाला था. शंकराय का वह इकलौता बेटा था. पापा शंकराय उस पर बेहद नाज करते थे.हंसमुख स्वभाव का नवीन अपनी बातों से किसी को भी अनायास अपनी ओर खींच लेता था. और हर कोई उस का मुरीद हो जाता था.

उन में से एक नाम था हरिहर कृष्णा का. हरिहर जो उस का दोस्त बन गया था और आगे चल कर दोनों की यह दोस्ती दांत काटी रोटी जैसी पक्की हो गई थी और घरबाहर से ले कर स्कूल कालेज तक सभी उन की दोस्ती का गुणगान किए बिना नहीं रह सकते थे.

होली पर मंगेतर को मौत का अबीर

पत्नी का प्रेमी : क्यों मारा गया किशोर? – भाग 2

तनहाई, 2 जवां दिल और किसी के आने का कोई डर न हो तो बहकने में देर नहीं लगती. कभीकभी रिशा और साहेब के भी दिल बहकने लगते, लेकिन रिशा जल्द ही संभल जाती. इस के बाद वह साहेब को भी बहकने से रोक लेती.

लेकिन संभलते संभलते भी उस रोज ठंड में न चाहते हुए भी रिशा बहक गई थी. इस के बाद तो रिशा को इस आनंद का चस्का सा लग गया था. उस आनंद को पाने के लिए वह हर वक्त उतावली रहने लगी थी. साहेब भी यही चाहता था.

जब दोनों तनहाई का ज्यादा ही फायदा उठाने लगे तो उन के इस मिलन की खुशबू फैलने लगी. पहले यह खुशबू पड़ोस वालों तक पहुंची. इस के बाद उन्होंने ही इसे मुंशी रावत तक पहुंचा दिया. वह तो सन्न रह गए.

मुंशी रावत दोनों पर नजर रखने लगे तो एक दिन उन्हें प्यार भरी बातें करते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया. उन्हें देख कर साहेब तो चुपचाप खिसक गया, लेकिन रिशा की जम कर पिटाई हुई. मारपीट कर मुंशी ने उसे सख्त हिदायत दी, ‘‘आज के बाद साहेब अगर इस घर में आया या तू ने उस से कोई वास्ता रखा तो मैं तेरी जान ले लूंगा.’’

मुंशी की क्रोध से जलती आंखों को देख कर रिशा कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकी थी. डर के मारे उस ने अपनी आंखें मूंद ली थीं. मुंशी पैर पटकता हुआ चला गया था. बाप के जाने के बाद ही रिशा की जान में जान आई थी. अब उस पर कड़ी नजर रखी जाने लगी थी. जिस की वजह से रिशा और साहेब का मिलना असंभव हो गया था.

मुंशी रिशा की शादी साहेब से बिलकुल नहीं करना चाहता, इसलिए उस के लिए लड़के की तलाश में लग गया. क्योंकि अब इस के अलावा उस के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था.

बाराबंकी के ही थाना रामसनेही घाट के गांव मुरारपुर के रहने वाला बालकराम रावत लखनऊ के थाना गाजीपुर के इंदिरानगर के बी ब्लाक में सपरिवार रहता था. वह लखनऊ विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय पर्यावरण केंद्र में चपरासी था. उस के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और 2 बेटे किशोर कुमार तथा सुमित कुमार थे.

किशोर विद्यांत कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. किशोर भले ही अभी पढ़ रहा था, लेकिन बालकराम उस की शादी कर देना चाहते थे. उस के लिए रिश्ते भी आ रहे थे. जब उस के बारे में मुंशी रावत को पता चला तो रिशा की शादी के लिए वह भी बालकराम के यहां जा पहुंचा. रिशा सुंदर तो थी ही, बालकराम को पसंद आ गई. उस ने शादी के लिए हामी भर दी.

4 फरवरी, 2014 को रिशा और किशोर कुमार का विवाह धूमधाम से हो गया. कुछ दिन ससुराल में रह कर रिशा मायके आ गई. अब उस की विदाई अप्रैल में नवरात्र में होनी थी. पिता के डर से रिशा शादी का विरोध नहीं कर पाई थी, और किशोर से शादी कर ली थी. लेकिन अभी भी उस के मन में साहेब ही था.

वैसे भी वह मात्र 3 दिन ही ससुराल में रही थी. इतने दिनों में वह पति को जितना समझ पाई थी, उस से उस ने यही अंदाजा लगाया था कि वह बहुत ही सीधासादा है. इसलिए रिशा को लगा कि पति से उसे कोई परेशानी नहीं होगी.

18 मार्च की शाम साढ़े 5 बजे के करीब बालकराम रावत के मोबाइल पर किसी अनजान ने फोन कर के कहा, ‘‘तुम अपने बेटे किशोर को ढूंढ रहे हो न? तुम्हारे बेटे की लाश चिनहट में मल्हौर रेलवे क्रासिंग के पास एक खाली प्लौट में पड़ी है, जा कर उसे ले आओ.’’

इतना कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया था.

उस ने बालकराम को कुछ कहने का मौका नहीं दिया था, इसलिए उस ने कई बार वह नंबर मिलाया. लेकिन फोन बंद होने की वजह से फोन नहीं मिला.

किशोर के बारे में बालकराम को कुछ पता नहीं था, इसलिए उस ने तुरंत बेटे को फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद था. फोन बंद होने से वह घबरा गया. उस ने पत्नी से पूछा कि किशोर कहां है तो पत्नी ने कहा, ‘‘किशोर एक बजे के करीब अपने किसी दोस्त घनश्याम से मिलने की बात कह कर घर से निकला था. उस के बाद से उस का कुछ पता नहीं है.’’

किसी अनहोनी की आशंका से बालकराम का दिल धड़क उठा. किशोर का फोन भी नहीं मिल रहा था कि वह उस से संपर्क करता. कोई रास्ता न देख वह तुरंत थाना कोतवाली चिनहट जा पहुंचा. इंसपेक्टर विजयमल सिंह यादव को पूरी बात बताई तो वह एसएसआई राजेश दीक्षित और कुछ सिपाहियों को साथ ले कर किशोर की तलाश में निकल पड़े.

मल्हौर क्रासिंग के पास एक खाली प्लौट में सचमुच किशोर की लाश पड़ी थी. किशोर का चेहरा बुरी तरह कुचला हुआ था. पास ही खून से सना एक भारी पत्थर पड़ा था. हत्यारे ने उसी पत्थर से उस के चेहरे पर प्रहार कर के उस की हत्या की थी. लाश के पास ही शराब और बीयर की बोतलें एवं प्लास्टिक के 2 गिलास पड़े थे. इस का मतलब था कि हत्यारे ने पहले किशोर को शराब पिलाई थी, साथ में खुद बीयर पी थी.

किशोर नशे में बेसुध हो गया होगा तो हत्यारे ने उसी भारी पत्थर से किशोर की हत्या कर दी थी. जवान बेटे की लाश देख कर बालकराम का बुरा हाल था. पुलिस वालों ने किसी तरह उन्हें संभाला और अपनी काररवाई आगे बढ़ाई.

निरीक्षण के बाद पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा दिया. रंक्तरंजित पत्थर ही नहीं, वहां पड़ी सारी सामग्री पुलिस ने कब्जे में ले ली थी. इस के बाद कोतवाली चिनहट में बालकराम की ओर से अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया था.

इंसपेक्टर विजयमल सिंह यादव ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया, जिस से बालकराम को फोन कर के किशोर की लाश पड़ी होने की सूचना दी गई थी. इस के साथ ही उस की काल डिटेल्स और लोकेशन भी निकलवाई गई. उस फोन की आईडी निकलवाई गई तो पता चला कि वह फोन बाराबंकी के थाना असंद्रा के गांव देवीगंज सूरजपुर के रहने वाले एक नाई का था.

पुलिस ने वहां जा कर नाई से पूछताछ की तो उस ने बताया कि जिस दिन की घटना है, उसी दिन उस का मोबाइल चोरी हो गया था. पुलिस ने आसपास वालों से पूछताछ की तो उन लोगों ने बताया कि नाई सच बोल रहा है. मोबाइल चोरी होने के बाद उस ने तमाम लोगों से यह बात बताई थी. फिर वह दुकान छोड़ कर कहीं गया भी नहीं था.

अब तक यह साफ हो चुका था कि किशोर की हत्या उसी आदमी ने की थी, जिस ने नाई का मोबाइल फोन चुराया था. यह निश्चित था कि नाई का मोबाइल वहीं के किसी आदमी ने चुराया होगा. पुलिस ने नाई से पूछताछ की तो उस ने कई नामों पर शक व्यक्त किया. उन्हीं में एक नाम घनश्याम उर्फ साहेब का भी था.

एहसान के बदले मिली मौत – भाग 2

सन 1992 तक बीसों औपरेशन के बाद ततजाना का कायाकल्ल्प हो गया. इस बीच ततजाना का इलाज करते करते डा. फेंज कब उस की चाहत के मरीज बन गए, वह जान नहीं पाए. वह खुद हैरान थे, ऐसा कैसे हो गया. वह हजारों युवतियों की सर्जरी कर चुके थे, लेकिन जो निखार ततजाना के शरीर में आया था, ऐसा किसी अन्य युवती के शरीर में उन्होंने अनुभव नहीं किया था.

अपनी सुंदरता देख कर ततजाना बेहद खुश थी. इस के बावजूद वह आईने का सामना करने से कतरा रही थी. इस दौरान डा. फेंज ने अनुभव किया था कि बदसूरती से उपजी हीनभावना की शिकार ततजाना आईने से न केवल डरती है, बल्कि उस से नफरत करती है. इसीलिए इलाज के बाद वह उसे आदमकद आईने के सामने ले गए थे. ततजाना चाह कर भी आईने के सामने आंख नहीं खोल पा रही थी. खोलती भी कैसे, आखिर कितनी टीस दी थी इस आईने ने.

डा. फेंज ने आगे बढ़ कर ततजाना का माथा चूमते हुए कहा, ‘‘पलकें उठा कर तो देखो, आईना खुद शरमा रहा है तुम्हारी खूबसूरती को देख कर. देखो, यह कह भी रहा है, ‘मेरा जवाब तू है, तेरा जवाब कोई नहीं.’’’

डरते हुए ततजाना ने नजरें उठा कर देखा, वाकई वह हैरान रह गई थी. उस के अंधेरे अतीत की परछाई भी नहीं थी उस के चेहरे पर. उसे विश्वास नहीं हो रहा था. उस ने चेहरे को छू कर देखा. उस की नजरों में डा. फेंज के लिए एहसान और दिल में आदर तथा प्यार की तह सी जमी थी. वह अंजान तो नहीं थी. उसे अहसास हो गया था कि डा. फेंज के दिल में उस के लिए मोहब्बत का अंकुर फूट चुका है. लेकिन उस ने दिल की बात जुबान पर नहीं आने दी.

वह ऐसा समय था, जब डा. फेंज अपनी शादीशुदा जिंदगी के नाजुक दौर से गुजर रहे थे. आखिर वह समय आ ही गया, जब पत्नी उन्हें तलाक दे कर अपने एकलौते बच्चे को ले कर सदा के लिए उन की जिंदगी से दूर चली गई.

तनहाई के इस आलम में उन्हें ततजाना के प्यार के सहारे की जरूरत थी. लेकिन वह इजहार नहीं कर रहे थे. इसी तरह साल गुजर गया. दरअसल डा. फेंज जहां उम्र के ढलान पर थे, वहीं ततजाना यौवन की दहलीज पर कदम रख रही थी.

वह 66 साल के थे, जबकि ततजाना मात्र 23 साल की थी. लेकिन यह भी सच है कि प्यार न सीमा देखता है न मजहब और न ही उम्र. एक दिन फेंज और ततजाना साथ बैठे कौफी पी रहे थे, तभी डा. फेंज ने कहा, ‘‘ततजाना, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. तुम्हारी इस खूबसूरती ने मुझे दीवाना बना दिया है.’’

‘‘यह खूबसूरती आप की ही दी हुई तो है. एक नई जिंदगी दी है आप ने मुझे. इसलिए इस पर पहला हक आप का ही बनता है.’’ ततजाना बोली.

‘‘नहीं ततजाना, मैं हक नहीं जताना चाहता. अगर दिल से स्वीकार करोगी, तभी मुझे स्वीकार होगा. मैं एहसानों का बदला लेने वालों में से नहीं हूं.’’ डा. फेंज ने कहा.

‘‘मैं इस बात को कैसे भूल सकती हूं कि आप ने मेरी अंधेरी जिंदगी को रोशनी से सराबोर किया है. आप की तनहाई में साथ छोड़ दूं, यह कैसे हो सकता है. इस तनहाई में आप मुझे तनमन से अपने नजदीक पाएंगे. आप यह न समझें कि मैं यह बात एहसान का कर्ज अदा करने की गरज से नहीं, दिल से कह रही हूं.’’

सन 1999 में डा. फेंज से ततजाना ने विवाह कर लिया. शादी के बाद जहां डा. फेंज की तनहा जिंदगी में फिर से बहारें आ गईं, वहीं ततजाना भी एक काबिल और अरबपति पति की संगिनी बन कर खुद पर इतराने लगी.

अब सब कुछ था उस के पास. रहने को आलीशान महल, महंगी कारें, सोने हीरों के गहने और कीमती लिबास. जिंदगी के मायने ही बदल गए थे उस के. अब वह बेशुमार दौलत की मालकिन थी. हाई सोसाइटियों में उसे तवज्जो मिल रही थी, जिस की उस ने कभी कल्पना तक नहीं की थी.

ततजाना अपने जीवन की रंगीनियों में इस कद्र डूब गई कि अतीत की परछाई भी उस के पास नहीं फटक रही थी. डा. फेंज भी उस की खूबसूरती में खोए रहते थे. दोनों का 9 साल का दांपत्यजीवन कैसे गुजर गया, उन्हें पता ही नहीं चला. अचानक इस रिश्ते में तब दरार पड़ने लगी, जब ततजाना को तनहा छोड़ कर डा. फेंज अपने मरीजों में व्यस्त रहने लगे. बस यहीं से ततजाना के कदमों का रुख बदल गया.

उसी दौरान एक पार्टी में ततजाना की मुलाकात कारों के व्यापारी 60 वर्षीय हीलमुट बेकर से हुई. उस ने उस की आंखों में अपने प्रति चाहत देखी तो उस की ओर झुक गई. बेकर का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि ततजाना उस की ओर झुकती चली गई. मुलाकातों का दौर शुरू हुआ तो दोनों पर मोहब्बत का रंग चढ़ने लगा. जिस्मों के मिलन के बाद वह और निखर आया. अब ततजाना का अधिकतम समय बेकर की बांहों में गुजरने लगा. हद तो तब होने लगी, जब ततजाना डा. फेंज को अनदेखा कर के रातें भी बेकर के बिस्तर पर गुजारने लगी.

डा. फेंज सोच रहे थे कि ततजाना नादान है, राह भूल गई है. समझाने पर मान जाएगी. मगर ऐसा हुआ नहीं. एक रात डा. फेंज बेसब्री से ततजाना का इंतजार कर रहे थे. सारी रात बीत गई, ततजाना लौट कर नहीं आई. डा. फेंज ने कई संदेश भिजवाए लेकिन जवाब में बेरुखी ही मिली.

इसी तरह एक साल गुजर गया. डा. फेंज ने यह तनहाई कैसे काटी, इस का सुबूत था उन का बिगड़ा दिमागी संतुलन. अगर हवा से खिड़कियों के परदे भी हिलते तो उन्हें लगता कि यह ततजाना के कदमों की आहट है. वह आ गई है.

डा. फेंज 5 जनवरी, 2005 की सुबह अपनी क्लीनिक में अकेले ही खयालों में खोए बैठे थे. वह सोच रहे थे कि काश ततजाना आ जाती. अचानक खिड़की के शीशे जोर से खड़खड़ाए. शीशा टूट कर बाहर की तरफ गिर गया. घबरा कर उन्होंने उधर देखा तो 2 मानव आकृतियां दिखाई दीं. उन्होंने अपने चेहरे ढक रखे थे. डरेसहमे डा. फेंज ने ततजाना को फोन किया. घंटी बजती रही, पर किसी ने फोन नहीं उठाया. तभी लगा, किसी ने खिड़की को ही उखाड़ दिया है.

मिसकाल बनी काल – भाग 2

12 दिसंबर, 2013 की सुबह के 4 बजे का समय था. लखनऊ की सब से पौश कालोनी आशियाना स्थित थाना आशियाना में सन्नाटा पसरा हुआ था. थाने में पहरे पर तैनात सिपाही और अंदर बैठे दीवान के अलावा कोई नजर नहीं आ रहा था. तभी साधारण सी एक जैकेट पहने 25 साल का एक युवक थाने में आया.

पहरे पर तैनात सिपाही से इजाजत ले कर वह ड्यूटी पर तैनात दीवान के सामने जा खड़ा हुआ. पूछने पर उस ने बताया, ‘‘दीवान साहब, मैं यहां से 2 किलोमीटर दूर किला चौराहे के पास आशियाना कालोनी में किराए के मकान में रहता हूं. मेरी बीवी मर गई है, थानेदार साहब से मिलने आया हूं.’’

सुबहसुबह ऐसी खबरें किसी भी पुलिस वाले को अच्छी नहीं लगतीं. दीवान को भी अच्छा नहीं लगा. वह उस युवक से ज्यादा पूछताछ करने के बजाए उसे बैठा कर यह बात थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह को बताने चला गया. सुधीर कुमार सिंह को कच्ची नींद में ही उठ कर आना पड़ा. उन्होंने थाने में आते ही युवक से पूछा, ‘‘हां भाई, बता क्या बात है?’’

बुरी तरह घबराए युवक ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सचिन है और मैं रुचिखंड के मकान नंबर ईडब्ल्यूएस 2/341 में किराए के कमरे में रहता हूं. यह मकान पीडब्ल्यूडी कर्मचारी गुलाबचंद सिंह का है. उन का बेटा अजय मेरा दोस्त है. जिस कमरे में मैं रहता हूं, वह मकान के ऊपर बना हुआ है. मेरी पत्नी ने मुझे दवा लेने के लिए भेजा था, जब मैं दवा ले कर वापस आया तो देखा, मेरी पत्नी छत के कुंडे से लटकी हुई थी. मैं ने घबरा कर उसे हाथ लगाया तो वह नीचे गिर गई. वह मर चुकी है.’’

‘‘घटना कब घटी?’’ सुधीर कुमार सिंह ने पूछा तो सचिन ने बताया, ‘‘रात 10 बजे.’’

‘‘तब से अब तक क्या कर रहे थे?’’ यह पूछने पर सचिन बोला, ‘‘रात भर उस की लाश के पास बैठा रोता रहा. सुबह हुई तो आप के पास चला आया.’’

सचिन ने आगे बताया कि वह यासीनगंज के मोअज्जमनगर का रहने वाला है और एक निजी कंपनी में नौकरी करता है. उस के पिता का नाम रमेश कुमार है. सचिन की बातों में एसओ सुधीर कुमार सिंह को सच्चाई नजर आ रही थी.

मामला चूंकि संदिग्ध लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस मामले की सूचना क्षेत्राधिकारी कैंट बबीता सिंह को दी और सचिन को ले कर पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने जब उस के कमरे का दरवाजा खोला तो फर्श पर एक कमउम्र लड़की की लाश पड़ी थी. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह शादीशुदा रही होगी.

इसी बीच सीओ कैंट बबीता सिंह भी वहां पहुंच गई थीं. सचिन की पूरी बात सुनने के बाद उन्होंने लड़की की लाश को गौर से देखा. उन्हें यह आत्महत्या का मामला नहीं लगा. बहरहाल, घटनास्थल की प्राथमिक काररवाई निपटा कर पुलिस ने मृतका की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और सचिन को थाने ले आई. कुछ पुलिस वालों का कहना था कि सचिन की बात सच है. लेकिन बबीता सिंह यह मानने को तैयार नहीं थीं. उन्होंने मृतका के गले पर निशान देखे थे और उन का कहना था कि संभवत: उस का गला घोंटा गया है.

कुछ पुलिस वालों का कहना था कि अगर सचिन ने ऐसा किया होता तो वह खुद थाने क्यों आता? अगर उस ने हत्या की होती तो वह भाग जाता. इस तर्क का सीओ बबीता सिंह के पास कोई जवाब नहीं था. बहरहाल, हकीकत पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकती थी.

सावधानी के तौर पर पुलिस ने सचिन को थाने में ही बिठाए रखा. इस बीच सचिन पुलिस को बारबार अलगअलग कहानी सुनाता रहा. देर शाम जब पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो इस मामले से परदा उठा. पता चला, मृतका की मौत दम घुटने से हुई थी और उसे गला घोंट कर मारा गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद पुलिस ने सचिन से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने मुंह खोल दिया. सचिन ने जो कुछ बताया, वह एक किशोरी द्वारा अविवेक में उठाए कदम और वासना के रंग में रंगे एक युवक की ऐसी कहानी थी, जो प्यार के नाम पर दुखद परिणति तक पहुंच गई थी. मृतका सोफिया थी.

मिसकाल से शुरू हुई सचिन और सोफिया की प्रेमकहानी काफी आगे बढ़ चुकी थी. फोन पर होने वाली बातचीत के बाद दोनों के मन में एकदूसरे से मिलने की इच्छा बलवती होने लगी थी. तभी एक दिन सचिन ने कहा, ‘‘सोफिया, हमें आपस में बात करते 2 महीने बीत चुके हैं. अब तुम से मिलने का मन हो रहा है.’’

‘‘सचिन, चाहती तो मैं भी यही हूं. लेकिन कैसे मिलूं, समझ में नहीं आता. मैं अभी तक कभी अजगैन से बाहर नहीं गई हूं. ऐसे में लखनऊ कैसे आ पाऊंगी?’’ सोफिया ने कहा तो सचिन सोफिया की नादानी और भावुकता का लाभ उठाते हुए बोला, ‘‘इस का मतलब तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं. अगर प्यार करतीं तो ऐसा नहीं कहतीं. प्यार इंसान को कहीं से कहीं ले जाता है.’’

‘‘ऐसा मत सोचो सचिन. तुम कहो तो मैं अपना सब कुछ छोड़ कर तुम्हारे पास चली आऊं?’’ सोफिया ने भावुकता में कहा.

‘‘ठीक है, तुम 1-2 दिन इंतजार करो, तब तक मैं कुछ करता हूं.’’  कह कर सचिन ने बात खत्म कर दी.

दरअसल वह किसी भी कीमत पर सोफिया को हासिल करना चाहता था. इस के लिए वह मन ही मन आगे की योजना बनाने लगा. सचिन का एक दोस्त था सुवेश. सचिन ने उस से कोई कमरा किराए पर दिलाने को कहा.

सुवेश को कोई शक न हो, इसलिए सचिन ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘दरअसल मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और मैं ने उस से शादी करने का फैसला कर लिया है. चूंकि मेरे घर वाले अभी उसे घर में नहीं रखेंगे, इसलिए तुम किसी का मकान किराए पर दिला दो तो बड़ी मेहरबानी होगी. बाद में जब घर के लोग राजी हो जाएंगे तो मैं उसे ले कर अपने घर चला जाऊंगा.’’

अगले अंक में पढ़िए कैसे पहुंचाया सचिन ने सोफ़िया को मौत की कगार पर?