लूट फार एडवेंचर – भाग 1

तीनों बैंकों से कुल मिला कर लगभग 65 लाख की लूट हुई थी. किसी भी बैंक में 21 लाख से कम की रकम नहीं थी, जो इन तीनों दोस्तों की कल्पना के अनुरूप ही थी. तीनों लूट के बाद एकदूसरे से अनजान अलगअलग शहर में चले गए.

दूसरे दिन देश के सभी अखबारों और न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ इस दुस्साहसी घटनाओं का ही जिक्र था. पुलिस और प्रशासन अपनी नाकामी से हाथ मल रही थी. लंबे समय तक लोगों के होंठों पर इस घटना का बखान था.

“अब हम तीनों को लूट का पैसा वापस बैंकों को लौटाना है. मैं इस बोझ के साथ मरना नहीं चाहता कि हम ने अपने स्वार्थ के लिए जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों को लूटा. आज हम तीनों स्थापित हैं और इस कंडीशन में हैं कि उन पैसों को बिना किसी आपत्ति के वापस लौटा सकते हैं.” जगन बोला.

20 दिनों के बाद तीनों दोस्त एक बार फिर गेलार्ड कैफे में पार्टी कर रहे थे. सभी न्यूजपेपर्स और चैनल्स पर उन के एडवेंचर की कहानियां सुनाई जा रही थीं.

जगन, छगन और मगन गहरे दोस्त थे. तीनों ही अच्छे खिलाड़ी थे. काफी दिनों बाद वे फुरसत में बैठे बातें कर रहे थे. उसी दौरान छगन बोला, “शहर में नया डेस्टिनेशन खुला है. जहां पर एडवेंचरस एक्टिविटीज करवाई जाती हैं. हम लोग भी चलें. काफी दिनों से कोई एडवेंचर किया भी नहीं है.”

“किस तरह की एक्टिविटीज करवाते हैं वहां पर?” मगन ने कौतूहल से पूछा.

“500 फीट ऊपर रोप क्लाइंबिंग, रौक क्लाइंबिंग, पैरासिलिंग, रिवर राफ्टिंग जैसी कई एक्टिविटीज इन्वौल्व हैं उस में.” छगन ने बताया.

“कितनी टिकट है उस की?” मगन ने फिर प्रश्न किया.

“वैसे तो एक हजार रुपए पर हैड है. लेकिन अगर हम तीनों चलते हैं तो मैं कहीं से जुगाड़ कर कुछ कम करवा सकता हूं,” छगन उत्साहित हो कर बोला.

“अरे मूर्खों, अगर अपनी जेब से पैसा खर्च कर के एडवेंचर किया तो क्या किया? एडवेंचर तो वह है, जो हम करें और उस के लिए दुनिया हमें याद करे और हमें पैसे भी मिलें.” जगन जो अब तक चुपचाप दोनों की बातें सुन रहा था, बीच में बोल पड़ा.

“क्या ऐसा हो सकता है? हमें हमारे एडवेंचर के बदले कौन मूर्ख पैसे देगा?” छगन उपहास से बोला.

“क्यों अपने आप को कमतर आंकें हम? याद रखो, हम तीनों के ही नाम के अंत में गन है. हम चाहें तो ऐसा फायर कर सकते हैं, जिस की तीव्रता की कल्पना सिर्फ सपनों में ही की जा सकती है. मैं खुद एक रेसलर हूं, मगन जूडो कराटे और छगन को ताइक्वांडो जैसे खेल में महारथ हासिल है. हम तीनों खिलाड़ी चाहें तो इतना बड़ा एडवेंचर कर सकते हैं कि दुनिया वाले दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो सकते है,” जगन बोला.

“सच है, जब हम में खुद में इतना हुनर है तो क्यों न ऐसा कोई एडवेंचर करें?” मगन बोला.

“मगर ऐसा एडवेंचर होगा क्या?” छगन ने पूछा.

“यह तो हम तीनों को मिल कर सोचना पड़ेगा,” जगन बोला.

“देखो, ऐसा कोई सा भी एडवेंचर जो खतरनाक की श्रेणी में आता हो, जिस में जान का जोखिम हो. पुलिस और प्रशासन की जानकारी के बगैर नहीं किया जा सकता है,” मगन ने जानकारी दी.

“जान हमारी है रिस्क हमारा है तो इस के लिए किसी भी अपने या पराए को जानकारी क्यों दी जाए? और जो कुछ भी होगा, इस के नतीजे के जवाबदेह भी हम ही होंगे. मजा तो तब है कि जब हम अपनी सोची हुई एडवेंचरस घटना को अंजाम दें और बरसों तक लोग उस घटना को घटना के नाम से याद करें न कि हमारे नाम से.” जगन बोला.

“तो क्या तूने ऐसा कोई कारनामा सोच रखा है, ऐसा कोई एडवेंचर करने का?” मगन ने पूछा.

“नहीं. अभी तक तो नहीं. यदि हम मिल कर सोचें तो शायद कुछ योजना बना सकें. यदि योजना सफल रही तो 50-60 लाख रुपए तो हासिल हो ही जाएंगे,” जगन बोला.

“यह कौन सा काम है? इस में लाइफ रिस्क कितना है?” छगन ने पूछा.

“अगर एडवेंचरस काम करने में जान का रिस्क न हो तो वह एडवेंचर ही कैसा? तुम लोग एडवेंचर के द्वारा ही पैसा बनाना चाहते हो न? तो मेरा आइडिया ही सब से उत्तम होगा.” जगन बोला.

“ऐसा कौन सा आइडिया सोचा है तुम ने?” मगन ने कौतूहल से पूछा.

“बिना खूनखराबा किए, बिना वास्तविक हथियार के बैंकों को लूटने का. और वह भी एक नहीं 3 बैंकों को लूटने का.” जगन बिना किसी रूपरेखा के सीधे और स्पष्ट बोला.

“क्याऽऽ.. यह कैसा एडवेंचर है? यह काम तो गैरकानूनी होगा.” मगन के चेहरे पर डर के भाव साफ दिखाई पड़ रहे थे.

एडवेंचर के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता

“अगर पकड़े गए तो जेल में बंद होंगे हम,” छगन भी मगन की बात से सहमत था.

“तुम लोगों का डर सही है. मगर एडवेंचर तो वही है जो लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दे. किसी और ने अगर वही काम तुम से पहले कर दिया तो उसे लीक पर चलना कहा जाएगा, एडवेंचर नहीं.”

“तुम्हें एडवेंचर की परिभाषा मालूम है? ऐसा कोई काम जिस में साहस, शौर्य और पराक्रम होने के साथ ही सर्वप्रथम किया हो. वही रियल एडवेंचर है.”

“हां, यह डर निश्चित ही जायज है कि अगर हम पकड़े गए तब क्या होगा. इस के परिणाम के बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है. उस समय केवल जेल ही हमारा घर होगा.

“दूसरी तरफ अगर हम सफल होते हैं तो इतिहास में एक साहसी टीम के रूप में जाने जाएंगे और लोग हमारा उदाहरण देंगे. तुम लोगों को एक मशहूर विज्ञापन की टैग लाइन तो याद ही है न? डर के आगे सिर्फ जीत है. हमें अपनी योजना भी कुछ इसी तरह बनानी है कि हम अपने डर को अपने आत्मविश्वास से समाप्त कर देंगे.” जगन दोनों को समझाता हुआ बोला.

“हां, तो समझाओ जगन, योजना क्या है.” छगन बोला.

“योजना साहसिक और विस्फोटक है. हमें एक ही दिन में 3 बैंकों में लूट की वारदात को अंजाम देना है और वह भी बिना किसी वास्तविक हथियार के.” जगन बोला.

“क्या? 3 बैंकों में एक ही दिन में लूट? वह भी बिना किसी वास्तविक हथियार के?” छगन आश्चर्य से बोला.

“हां, यही तो एडवेंचर होगा हमारी योजना का. हमें सिर्फ एक जोरदार धमाका करने वाली एयरगन चाहिए होगी, जो दूर से असली जैसी लगे. इस के अलावा हमें 3 अच्छे और मजबूत किस्म के ताले और रुपए भरने के लिए बड़ी साइज के बैग्स.” जगन ने अपनी योजना के लिए प्रारंभिक जरूरत बतलाई.

“वहां तोता मैना जैसे पक्षी होंगे, जो एयरगन के धमाके से उड़ जाएंगे और हम रुपए थैलों में भर कर टहलते हुए निकल जाएंगे,” मगन मजाक करता हुआ बोला.

“तीन बैंकों को लूटना है तो कम से कम एक व्हीकल तो चाहिए ही. ऐसे कामों में हम अपना व्यक्तिगत व्हीकल तो इस्तेमाल कर ही नहीं सकते,” छगन बोला.

“बिलकुल सही है. हम अपना व्हीकल इस्तेमाल करेंगे भी नहीं, बल्कि हम तो बैंक का ही व्हीकल उपयोग करेंगे.” जगन शांत भाव से बोला.

“बैंक का व्हीकल? वो कैसे?” छगन के स्वर में अविश्वास था.

“हमारे पास में रहने वाले रहमत एक सीएमएस वैन के ड्राइवर हैं. वह रोज शाम को काम खत्म होने के बाद गाड़ी को अपने घर के सामने ही पार्क करता है. मेरी उस से अच्छी जानपहचान है. मैं ने पिछले 3 दिनों में 3 बार उस वैन से कालोनी के चक्कर लगाए है. कल तो चालाकी से उस की वैन की चाबी का इंप्रैशन एक नरम साबुन पर ले लिया है. मोबाइल में चाबी का फोटो भी रखा हुआ है.” जगन उत्साह से बोला.

“यह लो पहले कदम पर ही गलती. रहमत तो तुम्हें जानता ही है न? वारदात को अंजाम देने के बाद तफ्तीश में रहमत तो फंसेगा ही और वह तुम्हारा ही नाम लेगा.” छगन बोला.

एक लाश ने लिया प्रतिशोध – भाग 1

स्लेड ने तय कर लिया था कि उसे किसी भी तरह स्पेल्डिंग की हत्या करनी है. क्योंकि उसे पता था कि अगर उस ने स्पेल्डिंग की हत्या नहीं की तो वह उस का कैरियर बरबाद कर देगा. एक वकील होने के नाते उसे बचाव  के लिए दलीलें देनी तो आती थीं, लेकिन हत्या किस तरह की जाए कि न तो मैडिकल साइंस पकड़ सके और न कानून. क्योंकि जब हत्या साबित ही नहीं होगी तो वह पकड़ा ही नहीं जाएगा.

स्पेल्डिंग की हत्या कैसे की जाए, इस पर वह काफी दिनों तक सोचता रहा. इस की वजह यह थी कि वह नहीं चाहता था कि हत्या जैसे अपराध में फंस कर उस का कैरियर और जिंदगी बरबाद हो. क्योंकि कैरियर और जिंदगी बचाने के लिए ही तो वह हत्या जैसा जघन्य अपराध करने पर विचार कर रहा था. लेकिन उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह स्पेल्डिंग की हत्या कैसे करे कि कानून की नजरों से साफ बच जाए.

आज की तरह तब इंटरनेट तो था नहीं कि इंटरनेट पर सर्च कर के वह हत्या की तरकीब खोज निकालता. यह ऐसा काम था, जिस के लिए किसी से सीधे सलाह भी नहीं ली जा सकती थी. स्लेड को किसी भी तरह स्पेल्डिंग की हत्या करनी थी. जब उसे कोई उपाय नहीं सूझा तो उस ने अपने दोस्त डा. मैथ्यू से हत्याओं पर चर्चा कर के कोई तरीका निकालने का विचार किया.

इस के लिए उस ने उन्हें एक शाम खाने पर बुला लिया. खाना खाते हुए स्लेड ने कहा, ‘‘आजकल अपराध कुछ ज्यादा ही होने लगे हैं. खासकर हत्या जैसे अपराधों की तो जैसे बाढ़ सी आ गई है. लगता है, पुलिस हत्यारों को पकड़ नहीं पा रही है?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है, हत्यारा कितनी भी होशियारी से हत्या करे, उस से कोई न कोई चूक हो ही जाती है. और फिर उसी चूक की वजह से वह पकड़ा जाता है. तब उस की कश्ती किनारे पर आ कर भी डूब जाती है. हत्या करने के बाद सब से कठिन काम है लाश को ठिकाने लगाना. लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता हूं.’’ डा. मैथ्यू ने कहा.

‘‘जी हां.’’ स्लेड ने कहा. लेकिन वह जानता था कि इस मामले में उसे डा. मैथ्यू से कहीं ज्यादा अनुभव है.

‘‘दरअसल यह बहुत ही खतरनाक और पेचीदा मसला है. यह इतना मुश्किल काम है कि मेरी समझ में यह नहीं आता कि लोग कत्ल करने जैसा गैरबुद्धि वाला काम करते ही क्यों हैं?’’

‘‘मेरा भी कुछ ऐसा ही खयाल है,’’ स्लेड ने कहा. लेकिन मन में वह कुछ और ही सोच रहा था. उस का खयाल था कि इस दुनिया में आदमी के लिए कोई भी काम कठिन नहीं है.

‘‘लोग सोचते हैं कि किसी को जहर दे कर मारना बहुत आसान है,’’ डा. मैथ्यू ने आगे कहा, ‘‘लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि पोस्टमार्टम में जहर का पता लग जाता है. और जब हत्या का पता चल जाएगा तो हत्यारा पकड़ा ही जाएगा. मेरा तो काम ही जहर का पता लगाना है. मैं ही क्या, जाहिल से जाहिल डाक्टर भी जहर का पता लगा सकता है.’’

‘‘मैं आप की राय से पूरा इत्तफाक रखता हूं, डाक्टर.’’ स्लेड ने कहा.

चूंकि वह स्पेल्डिंग की हत्या के लिए जहर का इस्तेमाल करने की सोच ही नहीं रहा था, इसलिए उसे इस बारे में विचार ही नहीं करना था. उस ने तो कोई और ही उपाय सोच रखा था.

‘‘अगर तुम जहर दे कर हत्या नहीं करते तो लोग यही सोचेंगे कि वह अपनी मौत मरा होगा. हत्या करने के बाद अगर हत्यारा बचना चाहता है तो वह कुछ ऐसी तिकड़म करे कि लोगों को लगे कि मृत व्यक्ति ने खुदकुशी की है. मगर मेरी तरह तुम भी जानते हो कि यह काम इतना आसान नहीं है. वैसे भी खुदकुशी के मामले में बड़ी गहराई से जांच होती है. तुम खुद वकील हो, खुदकुशी के कितने मामलों को तुम ने निपटाए हैं. तुम्हें तो पता ही है कि ऐसे मामलों में कितनी परेशानी होती है. और फिर नतीजा क्या निकलता है?’’

‘‘आप ने सही कहा,’’ स्लेड ने कहा.

उस ने इस मामले पर काफी गहराई से विचार किया था. काफी सोचविचार कर वह इस नतीजे पर पहुंचा था कि इस तरह स्पेल्डिंग की हत्या कर लाश को गायब करेगा कि उसे कोई पकड़ नहीं पाएगा. अगर स्पेल्डिंग की लाश मिल भी गई तो पुलिस यही समझेगी कि उस ने आत्महत्या की है.

‘‘हां, तो मैं उसी मसले पर फिर आता हूं. हत्यारे के लिए लाश से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है.’’ डा. मैथ्यू ने कहा.

‘‘जी हां,’’ स्लेड ने कहा, ‘‘आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’

लेकिन स्लेड को पूरा विश्वास था कि स्पेल्डिंग की लाश से वह आसानी से पीछा छुड़ा लेगा.

‘‘जानते ही हो, लाश को ठिकाने लगा कर उस से मुक्ति पाना बहुत ही कठिन काम है,’’ डा. मैथ्यू ने कहा, ‘‘कुछ लोग रासायनिक पदार्थों और तेजाब से लाश को जला गला देते हैं. लेकिन एक डाक्टर होने के नाते मैं इस तरकीब को पसंद नहीं करता.’’

‘‘वह क्यों?’’ स्लेड ने पूछा.

‘‘लाश कितनी भारी होती है. उसे उठाना, ढोना, संदूक, तहखाने या नदीनाले में छिपाते फिरना, कितना खतरनाक काम है.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. मैं ने इस के बारे में पहले कभी नहीं सोचा.’’ स्लेड ने कहा. जबकि उसे लग रहा था कि डाक्टर बिलकुल बेकार की बातें कर रहा है.

‘‘वैसे एक ऐसी तरकीब है, जिस में बचने की काफी गुंजाइश है. वकील होने के नाते तुम उस में जरूर दिलचस्पी लोगे, क्योंकि इस में एक कानूनी नुक्ता है.’’

‘‘कौन सा?’’ स्लेड ने अचकचा कर पूछा.

‘‘जब तक तुम किसी अभियुक्त को मुजरिम नहीं साबित कर देते, तब तक उसे सजा नहीं दिला सकते. और जब तक लाश नहीं मिल जाती, तब तक किसी अपराधी को पकड़ने या उस पर मुकदमा चलाने का सवाल ही नहीं उठता. किसी को हत्यारा साबित करने के लिए लाश का मिलना बहुत जरूरी है.’’

‘‘आप ने बिलकुल सही कहा. हैरानी की बात यह है कि इतनी बढि़या बात मेरे जेहन में पहले क्यों नहीं आई?’’ स्लेड ने कहा.

लेकिन अचानक उसे लगा कि उस के मुंह से यह बात निकल कैसे गई? उस ने तुरंत खुद को सहज बनाने की कोशिश की. उस ने अपने दिल की खुशी भी छिपाई, ताकि डाक्टर जान न सके कि उस के मन में क्या है.   जबकि डाक्टर ने उस की बात पर गौर ही नहीं किया था.

उस ने कहा, ‘‘मेरे खयाल से लाश को पूरी तरह से नष्ट करना आसान नहीं है. लेकिन अगर कोई अपराधी लाश गायब करने में सफल हो जाता है तो निश्चित ही वह पकड़ में नहीं आएगा. उस पर कितना भी जबरदस्त शक क्यों न हो. पुलिस बिना लाश बरामद किए उस के खिलाफ सुबूत नहीं जुटा पाएगी. इस तरह के कत्ल की कहानी सचमुच एक अनोखी कहानी होगी.’’

‘‘जरूर,’’ स्लेड ने हंसते हुए कहा. इस के बाद उस ने मन ही मन सोचा, ‘सचमुच स्पेल्डिंग के कत्ल की कोई कहानी नहीं बन सकेगी.’

‘‘अच्छा स्लेड, अब मैं चलूंगा. खाते खाते काफी बकबक कर ली. तुम्हारी इस शानदार दावत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. आज मौसम भी कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है. अब चल देना ही ठीक है.’’ डा. मैथ्यू ने उठते हुए कहा.

क्या स्लेड हत्या करने में कामयाब हो सकेगा ? जानने के लिए पढ़ें crime thriller story का अगला भाग..

मंगेतर की कब्र पर रासलीला

दगा दे गई सोशल मीडिया की गर्लफ्रैंड

प्यार की जीत : सुनीता और सुमेर की प्रेम कहानी – भाग 3

भगवानदास सोनी के पड़ोस में ही ईश्वरनाथ गोस्वामी परिवार के साथ रहते थे. उन्हीं का बेटा था सुमेरनाथ गोस्वामी. ईश्वरनाथ गोस्वामी के एक भाई पुलिस की नौकरी से रिटायर हो कर जयपुर में रहते थे. उन के बच्चे नहीं थे, इसलिए सुमेरनाथ को उन्होंने गोद ले रखा था. पढ़ाई पूरी कर के सुमेरनाथ एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगा था.

सुमेरनाथ नौकरी करने लगा तो घर वालों ने अपनी जाति की लड़की से उस की शादी कर दी थी. चली आ रही परंपरा के अनुसार सुमेरनाथ शादी के पहले पत्नी को देख नहीं सका था. इसलिए शादी के पहले वह उस के बारे में कुछ भी नहीं जान सका. शादी के बाद पत्नी घर आई तो दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर था. सुमेरनाथ जितना सीधा और सरल था, उस की पत्नी उतनी ही गरममिजाज थी. परिणामस्वरूप दोनों में निभ नहीं पाई.

सुमेरनाथ ने पत्नी को ले कर जो सपने देखे थे, कुछ ही दिनों में सब बिखर गए. पत्नी की वजह से घर में हर समय क्लेश बना रहता था. उस ने पत्नी को बहुत समझाया, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. वह किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं थी. पत्नी की वजह से सुमेर परेशान रहने लगा था.

पत्नी के दुर्व्यवहार से तंग सुमेरनाथ का झुकाव पड़ोस में रहने वाली सुनीता सोनी की ओर हो गया था. पड़ोस में रहने की वजह से वह सुनीता को बचपन से देखता आया था. लेकिन उस ने कभी उस से प्यार या शादी के बारे में नहीं सोचा था.

सुनीता सुंदर तो थी ही, इसलिए वह उसे अच्छी भी लगती थी. लेकिन एक तो दोनों की जाति अलग थी, दूसरे मोहल्ले की बात थी, इसलिए सुमेरनाथ ने उस के बारे में कभी इस तरह की बात नहीं सोची थी.

सुनीता को कभी पढ़ाई में कोई परेशानी होती तो वह मदद के लिए सुमेरनाथ के पास आ जाती थी. ऐसे में कभी सुमेरनाथ पत्नी की वजह से परेशान रहता तो वह सहानुभूति जता कर उस की परेशानी को कम करने की कोशिश करती. कभीकभी उसे सुमेरनाथ पर दया भी आती.

परेशानी में सुनीता का सहानुभूति जताना सुमेरनाथ को धीरेधीरे अच्छा लगने लगा था. इसलिए उस की सहानुभूति पाने के लिए वह अकसर उस के सामने पत्नी की व्यथा ले कर बैठ जाता. सुनीता जवान भी हो चुकी थी और खूबसूरत भी थी. बात और व्यवहार से वह समझदार लगती थी, इसलिए सुमेरनाथ उस की ओर आकर्षित होने लगा. उसे लगता, सुनीता जैसी पत्नी मिली होती तो जीवन सुधर गया होता.

मन में आकर्षण पैदा हुआ तो सुनीता के प्रति सुमेरनाथ की नजरें बदलने लगीं. नजरें बदलीं तो बातें भी बदल गईं और उन के कहने का तरीका भी. इस बदलाव को सुनीता ने भांप भी लिया. सुनीता को भी सुमेरनाथ भला आदमी लगता था. सीधासरल भी था और पढ़ालिखा भी. फिर उस के लिए उस के मन में दया और सहानुभूति भी थी.

उसी दौरान जहां सुमेरनाथ का पत्नी की सहमति से तलाक हो गया, वहीं सुनीता की शादी उस के पिता और ताऊ ने एक ऐसे लड़के से तय कर दी, जो अंगूठाछाप था. इस विरोधाभास से सुनीता के मन में घर वालों के प्रति जो विद्रोह उपजा, उस ने सुमेरनाथ के लिए उस के मन में जो सहानुभूति और दया थी, उसे चाहत में बदल दिया. जब दोनों ओर दिलों में चाहत पैदा हुई तो इजहार होने में देर नहीं लगी.

इजहार हो गया तो कभी पढ़ाई के बहाने सुनीता सुमेरनाथ से मिलने उस के घर आ जाती तो कभी किसी बहाने से कहीं बाहर मिलने चली जाती. इन मुलाकातों ने जहां प्यार को बढ़ाया, वहीं व्याकुल मन को शांत करने के लिए मुलाकातें भी बढ़ने लगीं. इन्हीं मुलाकातों ने जब लोगों के मन में संदेह पैदा किया तो लोग उन पर नजरें रखने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि लोगों को उन के प्यार की जानकारी हो गई. बात एक ही मोहल्ले और अलगअलग जाति के लड़केलड़की की थी, इसलिए दोनों को ले कर खुसुरफुसुर होने लगी.

बात दोनों के घर वालों तक पहुंची तो रोकटोक शुरू हुई. लेकिन आज मोबाइल के जमाने में रोकटोक का कोई फायदा नहीं रह गया. दूसरे सुनीता और सुमेरनाथ प्यार की राह पर अब तक इतना आगे निकल चुके थे कि घर वालों की रोकटोक या बंदिशें उस पर जरा भी असर नहीं डाल सकती थीं. क्योंकि अब उन का प्यार मंजिल पाने यानी शादी के मंसूबे तक पहुंच चुका था.

इस की वजह यह थी कि दोनों बालिग थे और अपनाअपना भलाबुरा समझते थे. इसलिए अगर वे अपनी मरजी से भी शादी कर लेते थे तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता था.  सुनीता किसी अनपढ़ से शादी कर के अपनी जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहती. इसलिए वह मांबाप की इज्जत को दांव पर लगा कर सुमेरनाथ से शादी के लिए तैयार थी.

एक औरत के दुर्व्यवहार से दुखी सुमेरनाथ भी सुनीता के व्यवहार का कायल था. इसलिए बाकी की जिंदगी वह सुनीता की जुल्फों तले खुशी से गुजारना चाहता था. उन्हें पता था कि समाज ही नहीं, घर वाले भी उन की शादी कभी नहीं होने देंगे, इसलिए उन्होंने किसी अन्य शहर में जा कर शादी करने का निर्णय लिया.

सुनीता और सुमेरनाथ ने शादी के लिए जरूरी कागजात यानी स्कूल के प्रमाणपत्र आदि सहेज कर रखने के साथ रुपएपैसों की व्यवस्था कर ली. उन्हें पता था कि वे अलगअलग जाति के हैं, इसलिए उन्हें आर्यसमाज मंदिर में शादी करनी होगी. उस के बाद अदालत से विवाह की मान्यता मिल जाएगी. पूरी तैयारी कर के उन्होंने भागने की तारीख भी 2 जुलाई तय कर ली.

योजना के अनुसार, 2 जुलाई, 2014 की रात 3 बजे अपने कपड़े लत्ते ले कर सुनीता तय जगह पर पहुंच गई. सुमेरनाथ वहां पहले ही पप्पूराम की गाड़ी ले कर पहुंच गया था. सुनीता के आते ही उस ने उसे गाड़ी में बिठाया और अपनी मंजिल पर निकल पड़ा.

अपने बयान में सुनीता ने कहा था कि वह बालिग है और उस ने खूब सोचसमझ कर सुमेरनाथ गोस्वामी से शादी की है. अब वह उसी के साथ रहना चाहती है, इसलिए पुलिस सुरक्षा में उसे सुमेरनाथ के साथ सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की कृपा की जाए.

इस के बाद मजिस्ट्रेट ने सुनीता को सुमेरनाथ के साथ भेजने का आदेश दे दिया. सुनीता अदालत से बाहर निकलने लगी तो उस की एक झलक पाने के लिए भीड़ टूट पड़ी. पुलिस ने हलका बल प्रयोग कर के भीड़ को हटाया और अपनी सुरक्षा में इस प्रेमी युगल को जयपुर पहुंचा दिया. कथा लिखे जाने तक यह दंपति जयपुर में ही था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम – भाग 3

बस, मैं खुदगर्ज हो गई. नहा कर मैं ने बढि़या कपड़े और गहने पहने, शृंगार किया. आइने के सामने खड़ी हुई तो यह बदलाव मुझे अच्छा लगा. मैं बच्चों के बारे में सोच रही थी कि मेरी सहेली नीरू आ गई. वह और उस के पति अशोक हमारे अच्छे दोस्तों में थे. नीरू ने कहा, ‘‘भई हम तुम्हें लेने आए हैं. अशोक बाहर गाड़ी में तुम्हारा और बच्चों का इंतजार कर रहे हैं. आज न्यू ईयर्स पर बच्चे घर में ही सेलीब्रेट कर रहे हैं. चलो जल्दी करो.’’

मुझे बढि़या मौका मिल गया. मैं ने बड़ी ही मोहब्बत से कहा, ‘‘नीरू, अभी तुम मेरे बच्चों को ले कर चलो. मुझे कुछ जरूरी काम है, मैं एक घंटे बाद आ जाऊंगी.’’

मेरे अंदर छिपे पाप को नीरू समझ नहीं सकी और जल्दी आने के लिए कह कर मेरे बच्चों को ले कर चली गई.

अब मेरा रास्ता साफ था. बादल घेरे हुए थे. हल्कीहल्की बूंदे पड़ रही थीं. ठंडी हवाएं मेरी जुल्फों को बिखेर रही थीं. अंदर की सारी जलन खत्म हो गई थी. मैं ने टैक्सी की और होटल ताज पैलेस पहुंच गई. असलम बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था. उस ने हौले से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे होटल के बैंक्वेट हौल में ले गया. वहां हर ओर मस्ती का आलम था.

असलम ने एक शानदार सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘बैठो.’’

मैं बैठ गई. थोड़ी खामोशी के बाद बातचीत शुरू हुई. धीरेधीरे हम बेतकल्लुफ होते गए. उसे पता चला कि मैं बेहद दुखी हूं. उस ने मेरी दुखती रग पकड़ ली. मेरी कहानी सुनने के बाद उस ने कहा, ‘‘गिरने वालों को संभाल भी कौन सकता है.’’

मैं ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘समय आने पर वह भी बता दूंगा,’’ असलम ने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रख कर कहा, ‘‘आप ने अपनी पूरी कहानी सुना दी, लेकिन नाम नहीं बताया.’’

‘‘शबनम.’’ मैं ने हंस कर कहा.

‘‘वाकई तुम शबनम की तरह पाक और खूबसूरत हो. तुम कितनी हसीन हो, शायद यह तुम्हें पता नहीं. यह हम जैसे कद्रदानों को ही पता होगा. जब से मैं ने तुम्हें देखा है, तभी से बेचैन हूं. मैं तुम्हारा दीवाना हूं.’’

उस दिन के बाद हमें जब भी मौका मिलता, हम मिल लेते. हर मुलाकात में वह कुछ ऐसा कह देता कि मेरा सोया जमीर जाग उठता. वह अकसर कहता कि अगर भीख में उजाला मिलता है तो कभी मत लेना. किसी की ज्यादती सहना भी गुनाह है. हालात कितने भी बुरे क्यों ना हों, हर मोड़ पर मंजिल की तलाश करनी चाहिए.

धीरेधीरे मैं उस के रंग में रंगती चली गई. उस ने मुझ से वादा किया कि हम अमेरिका पहुंच कर निकाह करेंगे. मैं उस के साथ ऐशोआराम के सपने देखने लगी. मुझे लगता, अगर इतना प्यार करने वाला पति हो तो पति और बच्चे क्या, मैं पूरी दुनिया को ठोकर मार दूं.

और फिर मेरी जिंदगी में वह काली रात आ गई. शायद उस रात मेरा दिल पत्थर का हो गया था. मैं ने अपने सारे गहने तथा नकदी एक अटैची में रखी और जब सभी लोग सो गए तो रात 12 बजे घर से बाहर आ गई. सुबह 3 बजे हमारी फ्लाइट थी. असलम टैक्सी लिए खड़ा था. मेरे बैठते ही टैक्सी चल दी.

पूरे रास्ते मुझे अपराधबोध सताता रहा और बेसाख्ता आंसू बहते रहे. मुझे अपने बच्चों की याद आ रही थी. क्योंकि अभी उन्हें मेरी जरूरत थी. लेकिन बच्चों की दादी उन्हें जान से भी ज्यादा चाहती थी, इसलिए यह बात जल्दी ही खयालों से निकल गई. वह उन्हें पालपोस लेगी.

सागर भी बच्चों को बहुत चाहता था. बेटी को तो वह पलकों पर रखता था. डांटता और नजरअंदाज करता था तो सिर्फ मुझे. एक कुटिल सी मुसकान मेरे होंठों पर तैर गई. मुझे लगा, मैं ने उसे अच्छा सबक सिखाया है. वहां किसी को मेरी जरूरत नहीं थी.

हम अपने मुकाम पर पहुंच गए. रास्ते भर असलम ने मेरा बहुत खयाल रखा. असलम की कोठी देख कर मैं बहुत खुश हुई. चारों तरफ बगीचे, फूलों से लदे पेड़, पिछवाड़े बहता झरना, जगहजगह लालनीलीपीली बत्तियां, फैंसी परदे, झाड़फानूस. लगा धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो बस यहीं है. काजी और कुछ लोगों की हाजिरी में हमारा निकाह हो गया. ऐसा उस ने इसलिए किया था कि मैं बहुत घबराई हुई थी. इस के अलावा निकाह के बिना मैं उस की किसी बात पर रजामंद नहीं थी.

बाद में पता चला कि वह कोठी किराए की थी. एक रात असलम काफी देर से 8-10 दोस्तों के साथ आया. वे शक्ल से मालदार, लेकिन गुंडे नजर आ रहे थे. वे एक कमरे में बैठ कर बातें करने लगे. जब मैं ने उन की बातें सुनीं तो लगा मुझे गश आ जाएगा.

वे सब के सब स्मगलर थे. उन के सारे गैरकानूनी धंधों का मुखिया असलम था. जब उसे पता चला कि मुझे उस की असलियत मालूम हो गई है तो वह मेरे सामने पूरी तरह खुल गया. अपने हर काले धंधे में मुझे शामिल करने लगा. इस तरह धीरेधीरे मैं भी गुनाहों के दलदल में धंसती चली गई. खूबसूरत लड़कियों को फंसा कर गुनाहों में शामिल करना असलम का मुख्य धंधा था.

मैं ने निकाह का हवाला दिया तो उस ने कहा, ‘‘निकाह तो एक रस्म अदायगी थी. निकाह तो मैं ने ना जाने कितने किए हैं.’’

अब मैं ऐसे अंधियारे गलियारे से गुजर रही थी, जहां रोशनी की किरणें भी रोशनी की मोहताज थीं. उस दिन मैं उस के काले धंधे में नहीं गई तो उस ने मेरी जम कर पिटाई की. उस ने कहा, ‘‘तू किसी की नहीं हो सकती. मेरे झूठे फोन पर तू सागर को छोड़ कर यहां आ गई. अब किसी और के फोन आएंगे तो तू उस के साथ भाग जाएगी. औरत का नाम ही बेवफा है.’’

‘‘क्या कहा तुम ने, वह फोन तुम करते थे? इस का मतलब मेरा सागर बेवफा नहीं था? मेरी खूबसूरती देख कर तुम ने मुझे बरगलाया? कमीने कहीं के.’’ कह कर मैं असलम पर झपटी तो उस ने मुझे धक्का दे दिया. मैं गिरी तो मेरे सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. सागर और बच्चों को याद कर के मैं रोने लगी.

मजबूर जिंदगी किसी भी बदलाव का स्वागत नहीं कर सकती. तेज आंधियां मुझे बुझाने का जतन कर रही थीं. अब तो वैसे भी अंधेरे से दोस्ती हो गई थी. इस अंधेरे के खिलाफ जेहाद करना मेरे बस में नहीं रह गया था. विश्वास की माला टूट चुकी थी और मनके बिखर चुके थे.

इतनी चोट खाने के बाद भी मैं किसी तरह उठी. असलम के जाने के पदचाप मुझे राहत दे रहे थे. आज इतने सालों बाद मैं ने अपने घर फोन किया. उधर से सागर ने फोन उठाया. घबराहट और शर्मिंदगी भरे लहजे में मैं ने कहा, ‘‘मैं शबनम…’’

‘‘कौन शबनम…? उसे मरे तो एक अरसा गुजर गया है. आज मेरी बेटी की शादी है, थोड़ा जल्दी में हूं.’’

कह कर सागर ने फोन काट दिया.

मेरी जैसी चरित्रहीन औरतों का शायद यही हश्र होता है. जबजब औरतों ने लक्ष्मण रेखा लांघी है, वह तबाही ही लाई है.

सनक में कर बैठी प्रेमी के दोस्त की हत्या

लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम- भाग 2

अब मुझे अपना घर, मांबाप और छोटा भाई याद आने लगा. उन से रिश्ते तोड़ कर इस घर को अपनाने का अब मुझे पश्चाताप होने लगा. मां मुझे कितना प्यार करती थी, वह मेरी हर जरूरत को समझती थी, इस के बावजूद मैं ने उस के प्यार को ठोकर मार दी थी.

पापा ने गुस्से में कहा था, ‘‘तू ने जो किया है, उस से हम तो सारी जिंदगी रोएंगे ही, तू भी खुश नहीं रहेगी. तू एक बदनाम और अय्यास लड़के को अपना जीवनसाथी बना रही है न, वह तुझे कभी चैन से नहीं रहने देगा. मेरी तरह तू भी सारी उम्र रोएगी.’’

इन शब्दों को सुनने के बाद मैं उन के पास कैसे जा सकती थी. एक बार, सिर्फ एक बार मैं मां की गोद में मुंह छिपा कर रोना चाहती थी. अब मुझे पता चला कि मांबाप के आशीर्वाद की क्यों जरूरत होती है. आशीर्वाद अपने आप में एक महान अर्थ लिए होता है, जिस के बिना मैं अधूरी रह गई थी.

वह रात मैं जिंदगी में कभी नहीं भूल सकती. उस तनाव में भी मैं ने सागर से वह रात अपने लिए उधार मांगी थी. 2 अक्तूबर हमारी शादी की सालगिरह थी. कई सालों बाद मैं ने उस रात मन से शृंगार किया. गुलाबी रंग का सूट पहन कर मैं सागर के साथ होटल में डिनर के लिए तैयार हो गई. सागर ने कहा था कि वह होटल जा कर वापस आ जाएगा. लेकिन गया तो लौटा नहीं.

शायद वह सोच कर गया था कि उसे वापस नहीं आना है. उस के इंतजार में मैं बाहर बगीचे में टहलती रही. चांद नाशाद था. तारे भी खामोश थे, मेरी बेबसी पर फिजाएं भी सहमीसहमी सी थीं. टहलतेटहलते मुझे लगा कि 2 आंखें मेरा पीछा कर रही हैं. सामने वाले फ्लैट की खिड़की पर खड़ा एक खूबसूरत सा युवक सिगरेट पीते हुए मेरी ओर ताक रहा था. वह काफी बुझाबुझा और परेशान लग रहा था.

सफेद कमीज और नीले कोट में वह युवक काफी दिलकश लग रहा था. बरबस मैं उस की ओर खिंचती चली गई. मैं ने कई बार उस लड़के की ओर देखा तो नीचे आ कर उस ने अपना परिचय दिया. उस ने बताया कि वह उसी दिन वहां शिफ्ट हुआ था. वह फ्लैट उस ने किराए पर लिया था. उस का नाम असलम था. बेसाख्ता मैं ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘अगर किसी भी चीज की जरूरत हो तो बिना झिझक बताइएगा.’’

इस के बाद वह रोजाना बच्चों के साथ खेलता दिखाई देने लगा. कभी उन के लिए चौकलेट लाता तो कभी गुब्बारे. अकसर उन्हें घुमाने भी ले जाता. मेरे ससुर के पास बैठ कर घंटों राजनीति पर बातें करता. जल्दी ही वह उन का अच्छा दोस्त बन गया. मांजी को अम्मी कहता तो वह निहाल हो जातीं. मांजी उसे तरहतरह की डिशेज बना कर खिलातीं.

धीरेधीरे वह सभी के दिलों में उतर गया. वह जब भी हमारे घर आता, उस की निगाहें कुछ खोजती सी रहतीं, हंसतेहंसते वह मायूस सा हो जाता. उसे क्या पता था कि 2 प्यार की प्यासी आंखें हर वक्त उस पर नजर रखती हैं. इधर कुछ दिनों से उस की बेतकल्लुफी बढ़ती जा रही थी. सागर के रात भर गायब रहने और दिन भर सोते रहने से उसे हमारे घर आने की पूरी आजादी थी.

आज भी वह मनहूस रात याद आती है तो मैं शरम से लाल हो जाती हूं. वह 31 दिसंबर की रात थी. न्यू ईयर की वजह से उस पूरी रात सागर को होटल में रहना था. मेरे सासससुर मनाली घूमने गए थे. मेरे बच्चे खापी कर सो गए थे. अचानक दरवाजे पर धीरेधीरे दस्तक हुई. मुझे लगा, मुझे वहम हो रहा है.

मगर दस्तक लगातार होती रही तो मैं ने जा कर दरवाजा खोला. बाहर असलम खड़ा था. वह पूरी तरह से भीगा हुआ था. उस ने बताया कि उस के घर की चाबी औफिस की ड्राअर में रह गई है और बारिश इतनी तेज है कि चाबी लेने जाना मुमकिन नहीं है.

मुझे उस पर रहम और प्यार दोनों आया. उसे अंदर आने के लिए कह कर मैं बगल हो गई. सागर के कपड़े दे कर मैं ने उसे कौफी बना कर दी. बिजली तड़पने के साथ तेज हवाएं बारिश को बहका रही थीं. हम दोनों कौफी पीते हुए छिपछिप कर एकदूसरे को देखते रहे.

खाना खा कर वह एक किताब ले कर पढ़ने लगा. मैं खिड़की के पास खड़ी हो कर बारिश का लुत्फ ले रही थी. उस दिन उस ने बताया कि वह अनाथ है. किसी रिश्तेदार ने भी उसे सहारा नहीं दिया. किसी तरह उस ने पढ़ाई पूरी की और अब वह एक मालदार आदमी के साथ बिजनैस करता था, जिस में उसे लाखों का फायदा होता था.

उस ने बताया था कि अमेरिका में उस की 4 बड़ीबड़ी कोठियां हैं, जिन में वह राजाओंमहाराजाओं की तरह रहता है. उस के यहां कई नौकर हैं. ऐशोआराम के सभी साधन हैं. बस उसे कमी है तो एक जीवनसाथी की.

धीरेधीरे मैं भी उस के आगे बेपर्दा होने लगी. मैं ने उसे बताया कि मांबाप के लिए अब मैं एक गुजरा वक्त हो चुकी हूं, जो कभी लौट कर नहीं आ सकता. सागर की बेवफाइयां बतातेबताते मेरी हिचकियां बंध गईं. बरसों बाद मुझे एक साथी मिला था, जिस के आगे मैं ने सारे जख्म खोल कर रख दिए. सागर की बेवफाइयां बतातेबताते मैं कितनी निरीह लग रही थी. मेरी बातें सुनतेसुनते अचानक असलम उठा और मेरे सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जिन की पहचान न हो, वही हमसफर होते हैं. तूफानों के थपेड़ों से कटकट कर ही तो इतने प्यारे साहिल बनते हैं.’’

उस के इस तरह तसल्ली देने पर रोतेरोते मैं उस के सीने से कब जा लगी, मुझे पता ही नहीं चला. वह मेरे बाल सहलाता रहा और मैं रोती रही. अचानक उस ने कहा, ‘‘अब मुझे चलना चाहिए. अगर कोई आ गया तो बिना मतलब बदनाम हो जाओगी. हां, तुम्हारी परेशानी का कोई न कोई तो हल होगा ही? परसों तुम मुझे ताज पैलेस में मिलना, वहीं विचार किया जाएगा.’’

मैं कुछ कहती, उस के पहले ही उस ने कहा, ‘‘नहीं, आज ही न्यूइयर्स है, मिल कर मनाएंगे और खूब बातें करेंगे. ठीक है ना?’’

अपनी बातों से असलम मुझे एक निहायत ही शरीफ और सुलझा हुआ आदमी लगा. उस पर भरोसा ना करने की कोई वजह नहीं थी. नाकामियों ने मुझे तोड़ कर रख दिया था. यह तल्ख हकीकत है कि हौसला छोड़ देने से नई मंजिल नहीं मिलती. जबकि अब मुझे नई मंजिल की तलाश थी.

नया साल था और पति से अलग यहां मैं अकेली थी. बड़ी इज्जत के साथ मैं बेइज्जत हो रही थी. अलसाई सी मैं उठी और एक कप चाय बना कर बगीचे में आ कर बैठ गई. सामने नजर गई तो असलम खिड़की पर खड़ा सिगरेट पी रहा था. इशारेइशारे में हमारा सलाम एकदूसरे तक पहुंचा गया.

नए साल पर सागर की डबल ड्यूटी होती थी. विदेशी युवतियों से भरा होटल सेंट्स और फूलों की महक से गमक रहा होता था. सागर मस्ती में डूबा होगा, यह खयाल मन में आते ही मैं जलन के मारे सुलग उठी. सागर से बदला लेने के लिए मन मचल उठा. आखिर कितने दिनों तक मैं अंधेरे में रहूंगी. क्या मेरी छवि को ग्रहण लग गया है. जिस तरह नदी रेगिस्तान में मिल कर रेत हो जाती है, कुछ वैसा ही हाल मेरा भी था.

पुनर्जन्म : कौन था मयंक का कातिल? – भाग 6

‘‘अपने शक के चलते बलराम तोमर ने बर्नेट अस्पताल के रजिस्टर का मुआयना किया और इंक रिमूवर के दाग ने इन के शक को पुख्ता कर दिया. हां, बलराम के शक के दायरे में सुभाषिनीजी के साथ धुरंधर ही थे. इसी वजह से इन्होंने तय कर लिया था कि मौका मिलते ही मयंक को मौत के घाट उतार देंगे और फिर सुभाषिनी और धुरंधर को भी नहीं छोड़ेंगे.

‘‘धुरंधर मयंक को बहुत प्यार करते थे और मयंक भी अकसर उन के साथ ही रहता था, रात को वह सोता भी उन के साथ ही था. इस से बलराम के शक की जड़ें और गहरी होती गईं, हालांकि यह 20 साल तक अपनी कोशिशों के बावजूद मयंक की जान लेने में नाकाम रहे. आखिर इन्होंने शिकार का प्रोग्राम बनाया और उस में घर की औरतों को भी शामिल किया, ताकि किसी को शक न हो. इस तरह उस रात इन्हें मौका मिल गया.

‘‘शक्तिशाली राइफल की गोली मयंक के माथे को चीरती हुई दूसरी ओर निकल कर कुछ दूर मौजूद एक पेड़ के तने में जा घुसी. मयंक के मुंह से चीख निकली और वह बेजान हो कर नीचे जा गिरा, जहां घात लगाए बैठा तेंदुआ उस पर टूट पड़ा.

‘‘फिर हवाई फायरों और सुरबाला तथा सुभाषिनी की चीखपुकारों से डर कर तेंदुआ भागा तो सही, पर मयंक की लाश को घसीट ले गया. उस ने मयंक की अधखाई लाश सुखनई की कगार पर तिरछे खड़े छतनार पेड़ों में छिपा दी, जहां वह कई साल लटकी रही और कल मैं ने उसे वहां से निकाला.’’

उसी समय वहां एक एंबुलेंस आई और स्ट्रेचर पर लेटे सुकुमार को अंदर लाया गया, वह होश में था. उसे देखते ही धुरंधर और सुखदेवी दौड़ कर उस से जा लिपटे.

‘‘यह भाई नहीं कसाई है.’’ धुरंधर ने घृणा भरी निगाह बलराम के ऊपर डाली, ‘‘इस ने तो हमारे वंश का ही नाश कर दिया था…’’

‘‘मैं बहुत शर्मिंदा हूं त्रिलोचनजी, यह मेरे पाप की सजा है. मैं ने न तो ठीक से मेजर साहब की वापसी का इंतजार किया और न इस आदमी को सच बताया…’’ सुभाषिनी ने रोते हुए एक नजर बलराम पर डाली, ‘‘शायद इसीलिए मेरा बेटा…’’

‘‘अब आप का बेटा लौट तो आया है.’’ विप्लव ने रजत की ओर इशारा किया.

‘‘हां त्रिलोचनजी.’’ धुरंधर तोमर त्रिलोचन के पास आ पहुंचे, ‘‘अब तो मुझे भी पुनर्जन्म पर विश्वास हो गया है. आखिर रजत ने ही तो पूर्वजन्म में हुई अपनी हत्या की सच्चाई से आप को अवगत कराया है.’’

‘‘यह पुनर्जन्म का मामला नहीं है तोमर साहब.’’ त्रिलोचन सपाट स्वर में बोले.

‘‘क्या…? आप का मतलब रजत पिछले जन्म में मयंक नहीं है?’’

‘‘जी हां, मेरा मतलब यही है.’’ त्रिलोचन ने कहा.

‘‘आप क्या कह रहे हैं डैड?’’ नीरव और विप्लव ने एकसाथ सवाल किया, ‘‘अगर यह सच है तो फिर रजत ने मयंक के परिजनों को कैसे पहचाना?’’

‘‘यह सब एक नाटक था. सारी जानकारी और घरवालों के फोटोग्राफ्स सुभाषिनी जी ने उपलब्ध कराए थे और उसी आधार पर मैं ने रजत को प्रशिक्षित किया था.’’

‘‘तो क्या आप को इस मामले को सुलझाने के लिए सुभाषिनी जी ने नियुक्त किया था?’’ अनिल ने पूछा.

‘‘जी हां, सुभाषिनीजी को शुरू से ही शक था कि उन के बेटे की हत्या हुई है. इसीलिए मैं ने यह जाल रचा. मैं जानता था कि मयंक का हत्यारा रजत की हत्या करने की कोशिश करेगा और हम उसे रंगे हाथ पकड़ लेंगे. आगे की घटनाएं आप सब को मालूम ही हैं.’’

‘‘कमाल हो गया.’’ धुरंधर की अचरज भरी निगाह रजत के ऊपर जा टिकी, ‘‘यह छुटकू तो बेजोड़ एक्टर है.’’

रजत के चेहरे पर मुसकान फैलते देर न लगी, उस के मातापिता उस से ज्यादा खुश थे, शेष लोगों के भी चेहरों पर आश्चर्य था, उन में से एक अनिल भी थे, जो अब हथकड़ी लिए बलराम तोमर की ओर बढ़ रहे थे.

त्रिलोचन अपना सामान समेट रहे थे कि धुरंधर तोमर ने पूछा, ‘‘मेरा चरित्र शक के घेरे में कैसे आ गया था त्रिलोचनजी?’’

‘‘जिस तरह से विप्लव को इस पत्रिका में आप दोनों का फोटो देख कर शक हुआ, ठीक वैसे ही बलराम के भी मन में शुबहा हुआ और जब उस ने बर्नेट अस्पताल के प्रसूति रजिस्टर का अवलोकन किया तो उस का शक यकीन में बदल गया.’’

‘‘आप बुरा न मानें तो कुछ मैं भी पूछूं?’’ सुखदेवी अपनी जगह से उठ कर त्रिलोचन के पास आ पहुंचीं.

‘‘जरूर पूछिए.’’

‘‘रजत तो पहली बार यहां आया था, वह सड़क से सीधे हमारे घर तक कैसे पहुंचा?’’

‘‘आसान काम था मिसेज तोमर. हम ने रात में सड़क से ले कर आप के घर तक गेहूं के दाने गिरवा दिए थे, रजत उन्हें देखते हुए आप के घर तक पहुंच गया और किसी को संदेह भी नहीं हुआ, क्योंकि गांवों में अनाज की ढुलाई के दौरान ऐसा होता रहता है.’’

‘‘क्या दिमाग पाया है आप ने.’’ सुखदेवी के मुंह से बरबस निकल गया और अपनी तारीफ सुन कर त्रिलोचन खुश हुए बिना न रह सके.

— कल्पना पर आधारित

जाना अनजाना सच : जुर्म का भागीदार