Crime News: उम्र के भंवरजाल में फंसी औरत

Crime News: 2 बच्चों की मां नीरू जब जवान हुई तो उस का पति बूढ़ा हो गया. इस स्थिति में उस के कदम बहक गए. इस का दुखद अंत यह हुआ कि बीवी के कत्ल में आज पति जेल में है.

रात के 12 बज रहे थे. अभी तक नीरू उर्फ नीलम घर नहीं लौटी थी. बीते 3 दिनों से यही क्रम चल रहा था. महावीर अग्रवाल ने पत्नी की गैरहाजिरी में खाना बना कर बेटी कोमल और बेटे हर्षित को खिला कर सुला दिया था. खुद खा कर पत्नी नीरू का खाना फ्रिज में रख दिया था. 4 लोगों के इस परिवार में बीते कई सालों से यही सिलसिला चला आ रहा था. महावीर के चेहरे पर कभी शिकन तक नहीं आई थी.

घर और कपड़ों की साफसफाई से ले कर चौकाचूल्हा तक के काम में वह पत्नी की मदद करता था. नीरू की गैरहाजिरी में वह अपने दोनों बच्चों को पिता के साथसाथ मां के स्नेह से भी सराबोर कर रहा था. दोनों बच्चों के चेहरे देख कर और उन्हें लाड़प्यार कर के वह दिन भर की दौड़धूप और घर के कामकाज की थकावट को भूल जाता था. राजस्थान के जिला श्रीगंगानगर के मोहल्ला प्रेमनगर के बने एक साधारण से घर में टीवी के सामने बैठा महावीर अग्रवाल पत्नी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. रात एक बजे के करीब नीरू घर में दाखिल हुई.

अस्तव्यस्त कपड़े, बिखरे बाल और पस्त बदन देख कर महावीर का माथा ठनका. वह कुछ कहता, उस से पहले ही नीरू बोल पड़ी, ‘‘क्या करूं यार, आज 3 जगहों के और्डर थे और एक दुलहन तो पौर्लर पर ही आ गई थी. अब 4-4 दुलहनों को सजाने में देर तो हो ही जाएगी.’’

नीरू ने देर होने की वजह बता दी. महावीर ने उस की इस सफाई पर ध्यान दिए बगैर कहा, ‘‘सुबह बात करेंगे. खाना फ्रिज में रखा है, मन हो तो खा लेना.’’

इतना कह कर महावीर अपने बिस्तर पर जा कर लेट तो गया, लेकिन उस की नींद आंखों से कोसों दूर थी. दोनों बच्चों के भविष्य, खस्ताहाल दुकानदारी और नीरू के संदिग्ध चालचलन को ले कर उस के दिमाग में तूफान चल रहा था. नीरू कपड़े बदल कर दूसरे कमरे में जा कर अपने बिस्तर पर लेट गई. उस ने खाना नहीं खाया था. महावीर को लगा, संभवत: वह किसी के यहां से मनपसंद खाना खा कर आई होगी. सुबह महावीर की आंख लगी तो वह देर से सो कर उठा. कोमल और हर्षित स्कूल जा चुके थे. नाश्ता कोमल ने बनाया था.

धूप चढ़े नीरू उठी तो महावीर ने 2 कप चाय बनाई. बिस्तर पर बैठी नीरू को चाय का कप पकड़ा कर महावीर उस के सामने पड़ी कुरसी पर बैठते हुए बोला, ‘‘देखो नीरू, तुम्हारा रवैया दिनबदिन असहनीय होता जा रहा है. तुम मेरी उपेक्षा कर रही हो, इस की मुझे रत्ती भर चिंता नहीं है. लेकिन बच्चों के लिए तो सोचो.’’

‘‘मैं ने क्या कर दिया भई. ब्यूटीपौर्लर चलता हूं. इन दिनों लगनें चल रही हैं. मैं ने तो आप को रात में ही बता दिया था कि 4 दुलहनों को तैयार करना है, घर आने में देर हो जाएगी.’’ नीरू ने कहा.

महावीर को पता था कि उस दिन शादियां नहीं थीं, नीरू रटारटाया बहाना बना कर झूठ बोल रही है. वह नहीं चाहता था कि नीरू बात का बतंगड़ बना कर झगड़ा करने लगे, इसलिए उस ने बड़े धैर्य से उसे समझाने की कोशिश की. महावीर ने कहा, ‘‘देखो नीरू, मुझे पता है कि दुकानदारी से जो कमाई हो रही है, उस से घर के खर्चे पूरे नहीं हो रहे हैं. दोनों बच्चों को अच्छा खिलाड़ी बनाने के लिए कोचिंग करानी है. ठीक से आमदनी न होने की वजह से मैं काफी परेशान रहता हूं. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं. तुम मेरी सहनशीलता की परीक्षा लेना बंद कर दो. किसी भी समय मेरे सब्र का बांध टूट सकता है. जिस दिन ऐसा हुआ, अनर्थ हो जाएगा.’’

महावीर ने ये बातें जिस तरह गिड़गिड़ाते हुए कही थीं, कोई भी समझदार औरत होती तो सिर ऊपर न उठाती. लेकिन नीरू उस की बात समझने के बजाय गुस्से में बोली, ‘‘यह गीदड़ भभकी किसी और  को देना. तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का खर्च पूरा करने के लिए ही तो मैं रातदिन खटती हूं. इस बात का एहसान मानने के बजाय तुम मुझे धमकी दे रहे हो. अपने मांबाप की तरह तुम भी मुझ पर शक करते हो. तुम जैसे निखट्टू के पल्ले बंध कर मेरा तो जीवन नरक हो गया है.’’

नीरू की इन जहरबुझी बातों से महावीर को भी गुस्सा आ गया. अपने 16 साल के वैवाहिक जीवन में महावीर पहली बार आपा खो बैठा. उस ने चाय का कप लिए नीरू के गालों पर तड़ातड़ 2 थप्पड़ रसीद कर दिए. नीरू तिलमिला उठी. भद्दी सी गाली देते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम ने मेरे ऊपर हाथ उठाया है. अब देखो, मैं तुम्हें कैसा मजा चखाती हूं. मैं अभी मम्मी को फोन कर के बुलाती हूं. तुम्हारे शरीर में भूसा न भरवा दिया तो मेरा भी नाम नीरू नहीं.’’

नीरू इसी तरह बड़बड़ाती रही और महावीर घर से निकल गया. मोहल्ले के पार्क में पेड़ के नीचे लेटा महावीर भविष्य के तानेबाने बुनता रहा. उस के मोबाइल पर कई बार उस की सास चंपा देवी का फोन आया, लेकिन उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उस की नजर में यह पतिपत्नी के बीच घटी एक मामूली घटना थी. नीरू ने नमकमिर्च लगा कर मां से शिकायत कर दी होगी. इसलिए वह उसे खरीखोटी सुनाने के लिए फोन कर रही होगी.

महावीर की सास चंपा देवी नीरू से भी ज्यादा तीखी थी. नीरू ने उन से कहा था कि उस से ब्याह कर के उस का जीवन नरक हो गया है, जबकि यह सरासर झूठ था. सही बात तो यह थी कि नीरू मजे लूट रही थी और उस की वजह से उसी की नहीं, पूरे परिवार का जीवन नरक हो चुका था. अंधेरा घिरने तक महावीर पार्क में ही पड़ा रहा. अब तक उस की सास ने न जाने कितनी बार फोन कर दिया था, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया था. रात 10 बजे वह घर पहुंचे तो दोनों बच्चे खापी कर सो चुके थे. किचन में मिला खाना खा कर महावीर लेट गया. नीरू अभी पौर्लर से नहीं लौटी थी.

अगले दिन सुबह महावीर थोड़ी देर से उठा. दोनों बच्चे स्कूल चले गए थे. नीरू अपने कमरे में घोड़े बेच कर सो रही थी. घर के थोड़ेबहुत काम निपटा कर महावीर पार्क में जा पहुंचा. नीरू परिवार की ही नहीं, अपने दोनों मासूम बच्चों की भी अनदेखी कर रही थी. उसे उन की जरा भी चिंता नहीं थी. यही सब सोचसोच कर उसे नीरू से नफरत सी होती जा रही थी. उस की सहनशीलता अंतिम पड़ाव पर जा पहुंची थी. तभी उस की सास चंपा देवी का फोन आ गया. महावीर ने जैसे ही फोन रिसीव किया, दूसरी ओर से चंपा देवी उसे डांटने लगी. अंत में उस ने उसे जेल भिजवाने तक की धमकी दे डाली. महावीर जवाब में तो कुछ नहीं बोला, लेकिन जेल भिजवाने की धमकी उस के दिमाग में बैठ गई.

महावीर के दिमाग में आया, वह तो वैसे भी जेल से बदतर जीवन जी रहा है. वही क्यों, उस के दोनों बच्चे, बूढ़े मांबाप भी एक तरह से जेल से भी गयागुजरा जीवन जीने को मजबूर हैं. उस समय महावीर जिन स्थितियों से गुजर रहा था, उस में सकारात्मक सोच मिलने पर वह संत बन सकता था और नकारात्मक सोच में शैतान. महावीर और उस के परिवार का दुर्भाग्य था कि उस समय उस के दिमग पर नकारात्मक सोच भारी हो गई. अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए उस ने एक भयानक निर्णय ले लिया. उस का सोचना था कि अब उसे जेल जाना ही है, सास भिजवाए या वह स्वयं चला जाए. अंत में उस ने खुद जेल जाने का निर्णय कर लिया.

खतरनाक निर्णय लेने के बाद महावीर ने खुद को काफी हलका महसूस किया. शायद उस का दिलोदिमाग विवेकहीन हो गया था. वह पार्क से उठा और सीधा घर पहुंचा. नहाधो कर 3 दिनों से बंद पड़ी अपनी स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर पहुंचा. उसे अब दुकानदारी में कोई दिलचस्पी नहीं थी. शाम होने से पहले ही वह घर लौट आया. दोनों बच्चे घर पर ही थे. बच्चों की मनपसंद का खाना बना कर उन्हें प्यार से खिलाया और सुला दिया. इस के बाद खुद टीवी देखते हुए नीरू का इंतजार करने लगा.

देर रात नीरू घर लौटी तो महावीर ने उसे मुख्य द्वार पर ही रोक लिया. बरामदे में 2 कुरसी उस ने पहले से रख दी थी. उस ने नीरू का हाथ पकड़ कर एक कुरसी पर बिठा दिया और खुद सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया. इस के बाद उस के गाल पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘नीरू जो हो गया, अब उसे भूल जाओ. मैं अपनी गलती के लिए माफी मांगता हूं. अब इस परिवार को बचाना तुम्हारे हाथ में है. मैं तुम्हारा हर आदेश मानने को तैयार हूं. तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा. बस तुम गलत आदतें छोड़ दो.’’

महावीर की इन बातों पर गंभीर होने के बजाय नीरू खिलखिला कर हंस पड़ी. इस के बाद व्यंग्य से बोली, ‘‘इस तरह की फालतू बातें मैं सुनने की आदी नहीं.’’

नीरू इतना ही कह पाई थी कि महावीर के सब्र का बांध टूट गया. वह उस पर एकदम से पिल पड़ा. उस ने नीरू के गले में पड़े दुपट्टे को लपेट कर कसना शुरू किया तो फिर तभी छोड़ा, जब वह मर कर कुर्सी से लुढ़क गई. पत्नी को मार कर महावीर ने उस की लाश को उठा कर बरामदे के कोने में बने स्टोर रूम में ले जा कर रख दिया और अपने बिस्तर पर जा कर सो गया. अगले दिन सुबह महावीर बच्चों से पहले उठ गया. बच्चों ने मम्मी के बारे में पूछा तो कहा कि वह ब्यूटीपौर्लर का सामान लेने बाहर गई है. उसी समय सास चंपा देवी का फोन आया तो उन से भी कह दिया कि वह बाहर गई है. बच्चे स्कूल चले गए तो महावीर बाजार गया और लोहा काटने की एक आरी खरीद लाया. मुख्य दरवाजा बंद कर के वह स्टोर रूम में घुस गया.

महावरी ने उस के दोनों पैर आरी से काट कर धड़ से अलग कर दिए. इस के बाद दोनों हाथों के पंजे काटे. दब्बू पति से जल्लाद बना महावीर अब तक थक गया था. उस के दिल में नीरू के प्रति पैदा नफरत बढ़ती जा रही थी. अब वह उस की लाश से बदला ले रहा था. इस के बाद उस ने कमरे में ताला बंद कर दिया और अगले दिन तक बच्चों के साथ सामान्य ढंग से रहता रहा. दोनों बच्चे रोज की तरह स्कूल चले गए. बच्चों के जाने के बाद महावीर कमरे में घुसा तो दोनों हाथ काट कर धड़ से अलग किए. इस के बाद उस ने सिर काट कर अलग किया. इस तरह नीरू की लाश 8 टुकड़ों में बंट गई. जबकि महावीर के चेहरे पर किसी तरह की शिकन या प्रायश्चित नहीं था.

इस बीच चंपा देवी ने महावीर को कई बार फोन कर के नीरू या बच्चों से बात करवाने के लिए कह चुकी थी. लेकिन हर बार उस ने नीरू के न लौटने और बच्चों के बाहर होने की बात कह कर सास को टरका दिया था. अब तक चंपा देवी को किसी अनहोनी की आशंका हो गई थी. इसलिए उस ने श्रीगंगानगर में ही रह रहे अपने दूसरे दामाद धर्मेंद्र अग्रवाल को फोन कर के नीरू के बारे में पता लगाने को कहा. महावीर ने उसे भी टरका दिया था. थकहार कर चंपा देवी ने फाजिल्का में रह रहे अपने भाई अमित को नीरू के बारे में पता लगाने के लिए श्रीगंगानगर भेजा, इसी के साथ वह खुद भी श्रीगंगानगर के लिए रवाना हो गई.

अमित अग्रवाल श्रीगंगानगर पहुंचे तो महावीर ने उन्हें भी गोलमोल जवाब दिया. हर्षित और कोमल घर में ताला बंद होने की वजह से पड़ोसी के यहां बैठे थे. अमित तुरंत सेतिया कालोनी स्थित पुलिस चौकी पहुंचे और अपनी भांजी नीरू के संदिग्ध परिस्थितियों में लापता होने की सूचना दी, लेकिन पुलिस ने उन की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया. तब अमित ने अपने कुछ रिश्तेदारों और परिचितों को इस मामले के बारे में बता कर मदद मांगी. जब सभी लोग महावीर के घर पहुंचे तो वहां से आने वाली असहनीय दुर्गंध से उन्हें आशंका हुई. अमित के साथ आए लोगों ने तुरंत कोतवाली पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी विष्णु खत्री दलबल के साथ महावीर के घर पहुंच गए.

उन्होंने इस बात की सूचना अधिकारियों को दी तो उन की सूचना पर एएसपी (शहर) शशि डोगरा, प्रशिक्षु आईपीएस चूनाराम भी घटनास्थल पहुंच गए. महावीर के पहुंचने पर कमरा खुलवाया गया तो पुलिस अधिकारी भी नफरत की वजह से मानवीय संवेदनाओं का वहशीपन भरा हश्र देख कर भौचक्के रह गए. पुलिस अधिकारियों ने नीरू की 8 टुकड़ों में बंटी लाश को कब्जे में ले लिया. महावीर ने अपना जुर्म कबूल लिया था, इसलिए पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. पुलिस घटनास्थल की काररवाई निपटा रही थी, तभी नीरू की मां चंपा देवी भी वहां पहुंच गई थीं.

कोतवाली पुलिस ने चंपा देवी की ओर से नीरू की हत्या का मुकदमा महावीर अग्रवाल के खिलाफ दर्ज कर लिया. यह 6 अप्रैल, 2015 की बात थी. चंपा देवी के बताए अनुसार, नीरू की हत्या 2 अप्रैल की रात 2 बजे के करीब की गई थी. उस ने तो हत्या के इस मामले में महावीर के पूरे परिवार को नामजद करा दिया था, लेकिन जांच में पता चला कि परिवार के बाकी लोगों से इन लोगों का बहुत पहले ही संबंध खत्म हो चुका था, इसलिए पुलिस ने बाकी लोगों को निर्दोष मान लिया. पुलिस पूछताछ में नीरू की हत्या की जो कहानी सामने आई थी, वह इस प्रकार थी—

पंजाब प्रदेश का एक जिला है फतेहगढ़ साहिब. इसी जिले की एक प्रमुख व्यावसायिक मंडी है गोविंदगढ़. यहीं आयरन मंडी में रहते थे शिवदयाल अग्रवाल. उन की बेटी नीलम उर्फ नीरू विवाह लायक हुई तो रिश्तेदारों के बताने पर उन्होंने अबोहर निवासी खुशीराम के बेटे महावीर से नीरू का विवाह कर दिया था. खुशीराम काफी संपन्न आदमी थे. महावीर भी खूब मेहनती और मिट्टी में सोना निकालने वाला था. लेकिन नीरू और महावीर की उम्र के बीच का फासला काफी लंबा था. नीरू 18 साल की थी, जबकि महावीर 35 साल का. लेकिन धनदौलत और वैभवशाली परिवार की चकाचौंध में दोगुनी उम्र का अंतर गौण हो गया था.

महावीर और नीरू के शुरुआती दिन बड़े अच्छे गुजरे. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन के दांपत्य में खटास आने लगी. उसी बीच खुशीराम को व्यापार में घाटा हुआ तो वह परिवार के साथ अबोहर से श्रीगंगानगर आ गए. शादी के 2 सालों बाद नीरू ने बेटी कोमल और उस के बाद बेटे हर्षित को जन्म दिया. महत्वाकांक्षी और स्वछंद विचारों वाली नीरू को संयुक्त परिवार में घुटन सी होती थी. इसलिए अलग रहने के लिए उस ने क्लेश शुरू कर दिया. महावीर ने किराए पर अलग मकान ले लिया और कमाई के लिए स्पेयर पार्ट्स का खुदरा व्यवसाय शुरू कर दिया. संजनेसंवरने का शौक रखने वाली नीरू ने अपने इस शौक को व्यावसायिक उपयोग करने की गरज से ब्यूटीपौर्लर खोल लिया.

नीरू का ब्यूटीपौर्लर चल निकला. पतिपत्नी, दोनों के कमाने से परिवार में बरकत होने लगी. नीरू और महावीर की उम्र में अंतर तो था ही, अब उन के विचारों में भी जमीनआसमान का अंतर आ गया था. स्वच्छंद जीवन जीने वाली नीरू को रोकटोक बहुत कस्टदायक लगता था. जबकि महावीर को इस तरह की आजादी बिलकुल पसंद नहीं थी. इस तरह विचारों के टकराव की वजह से पतिपत्नी में कलह रहने लगी. कहा जाता है कि श्रीगंगानगर में आने के बाद खुशीराम और उन की पत्नी मनोरीदेवी ने नीरू की आजादी से नाराज हो कर उस से पूरी तरह रिश्ता खत्म कर लिया था.

खुदगर्जी का जीवन जीने वाली नीरू अपने पति और बच्चों से अलगअलग होती गई. मांबाप के बीच होने वाली कलह और खींचतान से बच्चे भी परेशान रहते थे. उन्होंने अपने ढंग से दोनों को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन नीरू और महावीर के अपनेअपने जो अहम थे, उस की वजह से बात बन नहीं पाई और बात हत्या तक पहुंच गई. हत्या के इस मामले की जांच कोतवाली प्रभारी विष्णु खत्री ने स्वयं संभाली. पूछताछ में महावीर ने बताया कि नीरू की बदचलनी की वजह से वह परेशान हो चुका था. उस की सास चंपा देवी उसे जेल भिजवाने की धमकी देती रहती थी.

अगले दिन पुलिस ने महावीर को न्यायालय में पेश कर के पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने वह आरी बरामद कर ली, जिस से नीरू की लाश के टुकड़े किए गए थे. इस के बाद अन्य औपचारिकताएं पूरी कर के महावरी को पुन: न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. लोगों का कहना है कि इस हत्या की मुख्य वजह मियांबीवी के बीच की उम्र का अंतर था. शादी के समय नीरू 18 साल की थी, जबकि महावीर 35 साल का. नीरू जब पूरी तरह जवान हुई तो महावीर को बुढ़ापा आ गया, जिस की वजह से नीरूके कदम बहके तो बहकते ही चले गए. परिणामस्वरूप उसे असमय ही मरना पड़ा.

महावीर की बेटी कोमल और बेटा हर्षित पढ़ने में तो अच्छे हैं ही, बैडमिंटन और टेबल टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हैं. अब मां का कत्ल हो गया और पापा मां के कत्ल के आरोप में जेल चले गए. दोनों बच्चों के लिए दुख की बात यह है कि उन्होंने दादादादी को मां की मौत और पिता के जेल जाने के बाद पहली बार देखा था. वहीं ननिहाल पक्ष वालों ने उन्हें अपने साथ ले जाने से साफ मना कर दिया था. ऐसे में इन होनहार बच्चों का क्या होगा?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi Crime Story: कंबल में लपेट दिया अपना रिलेशन

Delhi Crime Story: पति की हत्या के आरोप में जेल गई अनीता, जमानत पर छूटने के बाद अपनी सहेली पुष्पा के भाई शिवनंदन के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी. इसी दौरान उन दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि शिवनंदन ने लिवइन रिलेशन को कंबल में लपेट कर रख दिया.

बात पहली जून, 2015 की है. सुबह करीब साढ़े 8 बजे दिल्ली के उत्तर पश्चिमी जिले के थाना आदर्श नगर के ड्यूटी औफिसर को पुलिस नियंत्रण कक्ष द्वारा सूचना मिली कि मजलिस पार्क के मकान नंबर ए/308 से दुर्गंध आ रही है और दरवाजे पर ताला लगा है. ड्यूटी औफिसर ने इस काल के बारे में थानाप्रभारी संजय कुमार को अवगत करा दिया. बंद मकान से बदबू आने की बात सुन कर ही थानाप्रभारी समझ गए कि वहां कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. क्योंकि इस तरह की जो भी काल आती हैं, उन में से ज्यादातर मामले हत्या के ही निकलते हैं. यानी कोई किसी की हत्या कर के लाश को कमरे में छिपा कर दरवाजा बंद कर के फरार हो जाता है.

बहरहाल थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ मजलिस पार्क की तरफ निकल गए. जहां से बदबू आने की बात कही गई थी, वह पहली मंजिल पर था. पुलिस ने भी उस मकान से आती हुई दुर्गंध को महसूस किया. वहीं पर करीब 20 साल का एक युवक नीरज भी था. वह उस मकान में रहने वाले शिवनंदन का सौतेला बेटा था. नीरज ने पुलिस को बताया कि मकान की चाबी उस के पिता के पास है और वह पता नहीं कहां चले गए. तभी आसपास रहने वाले लोग भी वहां आ गए. उन्होंने भी दुर्गंध वाली बात उन्हें बताई. वहां मौजूद लोगों की मौजूदगी में पुलिस ने दरवाजे पर लगा ताला तोड़ कर जैसे ही किवाड़ खोले तो बदबू और बढ़ गई. नाक पर रुमाल रख कर पुलिस घर में घुसी और यह खोजने लगी कि यह बदबू आ कहां से रही है.

दरवाजे के पास ही एक बरामदा था. फिर एक कमरा बना था. उस के बराबर में किचन थी. किचन के पास बाथरूम था. फिर उस के बराबर में एक कमरा था. कमरे के पीछे बालकनी थी. पुलिस ने कमरे और बाथरूम को छान मारा लेकिन वहां कुछ नहीं मिला. इस के बाद पुलिस किचन में पहुंची तो वहां 2 चूहे मरे मिले. उन चूहों से तेज बदबू आ रही थी इसलिए पुलिस ने नीरज से उन चूहों को फिकवा दिया. पुलिस तो बदबू के दूसरे ही मायने लगा रही थी, लेकिन वहां मामला दूसरा ही निकला. लिहाजा थानाप्रभारी राहत की सांस ले कर वहां से चले गए. करीब साढ़े 9 बजे थानाप्रभारी के मोबाइल पर नीरज का फोन आया. उस ने उन्हें बताया कि मकान से बदबू अभी भी आ रही है. मकान का कोनाकोना छान मारा. लेकिन अब कोई मरा हुआ चूहा भी नहीं मिला. फिर भी पता नहीं बदबू कहां से आ रही है.

थानाप्रभारी एसआई प्रवीण कुमार के साथ एक बार फिर मजलिस पार्क में उसी मकान पर पहुंच गए. इस बार वहां नीरज के साथ उस का सौतेला पिता शिवनंदन भी मिल गया. बदबू महसूस होने पर पुलिस ने एक बार फिर से खोजबीन शुरू कर दी. इस बार भी बदबू किचन की तरफ से ही आ रही थी. पुलिस ने सोचा कि पहले की तरह कोई चूहा ही मरा पड़ा होगा. वह किचन में खोजबीन करने लगी. लेकिन वहां कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी पुलिस की नजर ऊपर की तरफ स्लैब पर बने लकड़ी के रैक पर गई. उस रैक को जैसे ही खोला तो बदबूदार भभका आया.  रैक में एक कंबल दिखाई दिया. देखने पर लग रहा था जैसे उस कंबल में कोई इंसान लिपटा हुआ हो.

पुलिस ने वह कंबल उतार कर खोला तो उस में एक युवती की लाश निकली उस की उम्र करीब 40 साल थी. वह महिला क्रीम कलर का सूट पहने हुए थी. जिस पर ब्राउन कलर के फूल थे. जामुनी रंग की चुन्नी भी उस के गले में थी. लाश को देखते ही नीरज चीखते हुए बोला कि यह तो मेरी मां अनीता है. शिवनंदन भी रो रहा था क्योंकि वह उसी के साथ पत्नी बन कर लिवइन रिलेशन में रह रही थी. शिवनंदन और उस के सौतेले बेटे से पुलिस ने अनीता की हत्या के बारे में पूछा तो दोनों ने बताया कि अनीता की हत्या किस ने की, इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं है. गम के माहौल में पुलिस ने उन दोनों से ज्यादा पूछताछ तो नहीं की लेकिन पुलिस के शक की सुई दोनों बापबेटों पर ही टिकी थी.

मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को बुला कर पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए जहांगीरपुरी के बाबू जगजीवनराम मेमोरियल अस्पताल भिजवा दिया. हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी संजय कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर राकेश कुमार, एसआई प्रवीण कुमार, हेडकांस्टेबल बालकिशन, राजेंद्र सिंह, अंगद सिंह, कांस्टेबल नवीन कुमार, गजेंद्र, विकास, मनोज आदि को शामिल किया गया. जिस मकान में अनीता की लाश मिली थी, उस में शिवनंदन और अनीता का बेटा नीरज भी रहता था. उन दोनोें के होते हुए कोई मकान में वारदात कर के चला जाए और इस बात की भनक उन्हें न लगे, ऐसी संभावना बहुत कम थी.

दोनों में से कोई न कोई हत्या का राज जरूर जानता होगा. ऐसा पुलिस का मानना था. लिहाजा उन दोनों से पूछताछ करने के लिए पुलिस ने उन्हें थाने बुला लिया. पूछताछ में शिवनंदन ने बताया कि वह आजादपुर मंडी में काम करता है. रोजाना सुबह जल्दी घर से निकलने के बाद देर रात को घर लौटता है. नीरज भी सब्जीमंडी में दूसरी जगह काम करता था. वह भी सुबह घर से जाने के बाद शाम को घर लौटता है.

‘‘जब तुम लोग घर से निकल जाते थे तो घर पर अनीता ही रह जाती होगी?’’ थानाप्रभारी ने उन से पूछा.

‘‘हां, घर पर वही रहती थी.’’ शिवनंदन बोला.

‘‘तो कौन से दिन वह घर पर नहीं मिली?’’ थानाप्रभारी ने जानना चाहा.

‘‘29 मई को जब हम शाम को घर आए तो वह घर से गायब मिली.’’ शिवनंदन ने बताया.

‘‘फिर तुम ने उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं, पुलिस में खबर इस वजह से नहीं की क्योंकि वह कईकई दिनों के लिए घर से गायब हो जाती थी. यही सोचा कि वह 2-4 दिनों में आ जाएगी.’’ शिवंनदन ने कहा.

‘‘बाहर…बाहर कहां और क्यों जाती थी?’’ थानाप्रभारी चौंके.

‘‘सर, पता नहीं कहां जाती थी. मगर इतना पता है कि एक बार वह जिस्मफरोशी के आरोप में चंडीगढ़ पुलिस द्वारा और नशीले पदार्थ की तस्करी के आरोप में पंचकुला पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई थी.’’ शिवनंदन ने बताया.

यह सुन कर पुलिस समझ गई कि अनीता जरूर आवारा और आपराधिक प्रवृत्ति की रही होगी. चाहे वह जैसी भी रही हो, उस का मर्डर तो हुआ ही था. एक बात तो तय थी कि उस का मर्डर बड़ी तसल्ली से उस घर में ही किया गया था. यह काम घर का कोई नजदीकी व्यक्ति ही कर सकता है. वह व्यक्ति कौन हो सकता है, जानने के लिए थानाप्रभारी ने शिवनंदन से पूछा कि उन के घर में और कौनकौन आता था?  जब शिवनंदन ने बताया कि कोई नहीं आता था तो पुलिस को शिवनंदन पर शक गहरा गया. उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अनीता की हत्या उस ने ही की थी.

अनीता ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे जिस की वजह से उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उस ने अनीता की हत्या करने के पीछे की जो कहानी बताई वह बड़ी दिलचस्प निकली. शिवनंदन मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अथर गांव के रहने वाले गयाप्रसाद का बेटा था. शिवनंदन के अलावा गया प्रसाद के एक बेटा और 5 बेटियां थीं. गयाप्रसाद खेतीबाड़ी कर के अपने परिवार का भरणपोषण कर रहे थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए वह उन की शादी करते गए. उन्होंने मंझली बेटी पुष्पा की शादी उत्तर पश्चिमी दिल्ली के मजलिस पार्क में रहने वाले रमेश चंद से की थी. रमेश आजादपुर सब्जी मंडी में काम करता था.

रमेश का काम अच्छा चल रहा था. 10 साल की उम्र में शिवनंदन भी अपने बहनोई रमेश के पास दिल्ली आ गया. रमेश ने उसे पढ़ाना चाहा लेकिन उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो रमेश उसे अपने साथ ही काम पर सब्जीमंडी में ले जाने लगा. कुछ दिनों में ही वह मंडी का काम समझ गया. इस तरह वह 14-15 साल की उम्र में ही पैसे कमाने लगा था. वह जो पैसे कमाता उन्हें अपने पिता के पास भेज देता था. इस बीच अनीता 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई थी. बताया जाता है कि शिवनंदन की बहन पुष्पा के अपने भतीजे से ही नाजायज संबंध हो गए थे. इस बात की जानकारी रमेश को हुई तो उस ने पत्नी पुष्पा को समझाया.

पुष्पा को जब लगा कि उस के अवैध संबंधों में पति बाधक है तो उस ने सन 2004 में पति की हत्या कर दी. पति की हत्या के आरोप में पुष्पा को जेल जाना पड़ा. तब शिवनंदन ने ही अपने दोनों भांजों और भांजी की परवरिश की. एक साल बाद जेल में ही पुष्पा की मुलाकात अनीता से हुई. अनीता मूलरूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली थी. उस की शादी दिल्ली के खजूरी खास क्षेत्र के रहने वाले देवेंद्र सिंह से हुई थी. बताया जाता है कि सन 2005 में उस ने भी अपने पति की हत्या कर दी थी. पति की हत्या के आरोप में उसे जेल जाना पड़ा था. अनीता के 2 बेटे थे नीरज और सूरज. उस के जेल जाने के बाद बच्चों को लक्ष्मीनगर में रहने वाली उन की मौसी ले गई थी.

पुष्पा और अनीता हमउम्र थीं इसलिए जेल में वे दोनों अच्छी दोस्त बन गई थीं. शिवनंदन जेल में अपनी बहन से मिलने जाता ही था. वहीं पर बहन ने उस की मुलाकात अनीता से कराई थी. अविवाहित शिवनंदन अनीता से मिल कर बहुत प्रभावित हुआ. वह उसे मन ही मन चाहने लगा. अनीता की वजह से वह जल्दजल्द बहन से मिलने जाने लगा. इसी बीच पुष्पा को सजा हो गई तो वह सजा पूरी कर के घर आ गई. कई साल पहले अनीता के मांबाप की मौत हो चुकी हो चुकी थी. दिल्ली के लक्ष्मीनगर में जो उस की बहन रह रही थी, वह भी ऐसी नहीं थी जो उस की जमानत करा सके. उस की जमानत कराने वाला कोई नहीं था जिस से वह जेल में ही बंद थी.

पुष्पा चाहती थी कि किसी तरह अनीता भी जेल से बाहर आ जाए. इसलिए एक दिन उस ने शिवनंदन से उस की जमानत कराने को कहा. शिवनंदन भी यही चाहता था, इसलिए उस ने सन 2010 में किसी तरह अनीता की जमानत करा दी. जमानत के बाद अनीता को पुष्पा ने अपने घर ही रख लिया. शिवनंदन की कमाई से ही घर का खर्चा चल रहा था. एक ही घर में रहने की वजह से शिवनंदन और अनीता एकदूसरे के बेहद नजदीक आ गए. पुष्पा को उन के संबंधों की भनक लग चुकी थी. उन से इस बारे में कुछ कहने के बजाय उस ने मुंह फेर लिया.

इतना ही नहीं, पुष्पा का उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में एक मकान और था. वह अपने तीनों बच्चों को ले कर बुराड़ी चली गई. मजलिस पार्क वाले मकान में शिवनंदन ही रहने लगा, मगर वह इस के बदले बहन को किराया दे देता था. शिवनंदन और अनीता ने जब महसूस किया कि उन के संबंधों पर पुष्पा को कोई आपत्ति नहीं है तो उन की हिम्मत और बढ़ गई. इस के बाद वे बिना शादी किए पतिपत्नी की तरह रहने लगे. हालांकि अनीता उस से उम्र में 15 साल बड़ी थी, इस के बाद भी दोनों के इस तरह रहने पर पुष्पा भी खुश थी. अनीता ने अपने दोनों बेटों को भी अपने पास बुला लिया. बड़ा बेटा सूरज अपने किसी जानकार के साथ नौकरी के लिए मुंबई चला गया. तब से वह मुंबई में ही है. जबकि छोटा 20 साल का नीरज मां के साथ ही रह रहा था. नीर को शिवनंदन ने आजादपुर सब्जी-मंडी में काम पर लगवा दिया.

शिवनंदन तो सुबह ही घर से मंडी के लिए निकल कर देर शाम को ही घर लौटता था. इस दौरान अनीता अकेली ही घूमने के लिए निकल जाती थी. वह कहां जाती और किस के साथ घूमती थी, यह बात वह पुष्पा को भी नहीं बताती थी. शिवनंदन को जब अनीता की इस हरकत की जानकारी मिली तो उस ने उसे समझाया लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद तो उस की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि वह कईकई दिनों तक घर से बाहर रहने लगी. इस दौरान वह अपना फोन भी स्विच्ड औफ कर लेती थी. अनीता जब अपनी मनमरजी करने लगी तो शिवनंदन ने भी उस से कहनासुनना बंद कर दिया.

शिवनंदन को पता नहीं था कि वह गलत धंधा भी करने लगी है. वह गलत धंधा क्या है इस का पता उसे तब लगा जब वह 3 साल पहले नशीले पदार्थ के साथ पंचकुला पुलिस द्वारा गिरफ्तार की गई. ड्रग की खेप वह दिल्ली से पंजाब पहुंचाने जा रही थी. पुष्पा को अनीता के गिरफ्तार होने की जानकारी मिली तो वह हैरान रह गई. उसे लगा कि अनीता शायद गलत तरह के लोगों के बीच फंस गई है और वे लोग उस से ड्रग सप्लाई करा रहे हैं. वह उस से बात कर के सच्चाई जानना चाहती थी. इसलिए वह उस से जेल में मिलने पहुंच गई. पुष्पा को देखते ही अनीता फूटफूट कर रोई. अनीता ने उसे बताया कि ड्रग सप्लाई का काम वह किसी के दबाव में कर रही थी. यानी पुष्पा जैसा सोच रही थी, बात वही निकली.

बहरहाल पुष्पा को अनीता पर दया आ गई. और उस ने भाई से कह कर उस की जमानत करा ली. वह फिर से शिवनंदन के साथ ही रहने लगी. कुछ दिनों तक तो अनीता वहां ठीक रही, बाद में वह अपने पुराने ढर्रे पर उतर आई. बिना बताए घर से निकल कर देर रात घर लौटना जैसे उस का रोज का नियम बन गया था. शिवनंदन उसे डांटता तो वह 2-4 दिन तो ठीक रहती उस के बाद वही उस का घूमनाफिरना शुरू हो जाता था. पुष्पा को कभीकभी गुस्सा आता कि वह उसे घर से निकाल दे लेकिन यह सोच कर खयाल भी आ जाता था कि इस के मांबाप तो हैं नहीं. यहां के बाद ये जाएगी कहां. इसलिए वह बारबार अनीता को समझाती ही रहती थी.

शिवनंदन को कोई परेशानी न हो इसलिए उस ने अपने घर के दरवाजे पर लगने वाले ताले की दूसरी चाबी अपने पास रख ली. करीब एक साल पहले वह अचानक घर से फिर गायब हो गई. उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. शिवनंदन और पुष्पा ने उसे संभावित जगहों पर तलाशा लेकिन वह कहीं नहीं मिली. फिर 4-5 दिनों बाद पुष्पा के मोबाइल पर चंडीगढ़ पुलिस का फोन आया. पुलिस ने बताया कि अनीता वेश्यावृत्ति के आरोप में गिरफ्तार की गई है. यह खबर मिलते ही पुष्पा चौंक गई. इस के बाद वह समझ गई कि अनीता कईकई दिनों तक बाहर क्यों रहती है. उस ने यह बात शिवनंदन को बताई तो वह भी हैरान रह गया.

अब की बार शिवनंदन ने तय कर लिया कि वह अनीता से न तो जेल में मिलने जाएगा और न ही उस की जमानत कराएगा लेकिन पुष्पा के मन में तो अब भी उस के लिए दया थी. आखिर उस ने शिवनंदन को चंडीगढ़ जाने के लिए तैयार कर लिया. दोनों ने उस से जेल में मुलाकात की. अनीता ने इस बार भी लाख सफाई दी कि उसे झूठे आरोप में फंसाया गया है, वह बेकुसूर है. लेकिन शिवनंदन को उस पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि वह उस का विश्वास पहले ही तोड़ चुकी थी. अनीता पुष्पा से इस बार और माफ करने के लिए गिड़गिड़ाने लगी. उस के आंसू देख कर पुष्पा का दिल फिर से पसीज गया. लिहाजा भाई से कहसुन कर उस ने अनीता की फिर से जमानत करा ली.

इस बार उस ने अनीता को हिदायत दी कि वह अब कोई ऐसावैसा काम न करे जिस से उन्हें परेशानी हो. अनीता ने वादा तो कर लिया लेकिन उसे निभा नहीं पाई. फिलहाल उस ने घर से बाहर निकलना तो बंद कर दिया था, पर वह घर पर ही अपने फोन से पता नहीं किसकिस से बतियाती रहती थी. शिवनंदन उस के आचरण को जान ही चुका था. इसलिए उसे इस बात का शक था कि वह अपने किसी यार से ही बात करती होगी. उस ने इस बारे में अनीता से पूछा भी पर अनीता यही कह देती कि अपनी सहेलियों से बातें करती है. 29 मई, 2015 को अनीता का बेटा नीरज सब्जीमंडी गया हुआ था. शिवनंदन घर पर ही था. अनीता उस दिन भी अपने फोन पर काफी देर से किसी से बातें कर रही थी. शिवनंदन मन ही मन कसमसा रहा था. जैसे ही अनीता की बात खत्म हुई तो शिवनंदन ने पूछा, ‘‘किस का फोन था जो इतनी लंबी बात चली?’’

‘‘तुम्हें क्यों बताऊं किस का फोन था. जब तुम किसी से बातें करते हो तो मैं क्या तुम से पूछती हूं?’’ अनीता बोली.

‘‘मैं इतनी देर तक किसी से बात भी तो नहीं करता. और यदि तुम्हारे पूछने पर मैं नहीं बताता तो कहती.’’ उस ने कहा.

‘‘देखोजी, मैं किसी से बात करूं या ना करूं इस से तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए.’’ अनीता तुनक कर बोली.

इसी बात पर अनीता और शिवनंदन के बीच कहासुनी हो गई. अनीता ने शिवनंदन पर हाथ छोड़ दिया. शिवनंदन भी आपा खो बैठा उस ने दोनों हाथों से अनीता का गला दबा दिया. कुछ ही देर में अनीता का दम घुट गया. उस के मरते ही शिवनंदन घबरा गया. उस ने गुस्से में अनीता को मार तो दिया, लेकिन अब उस के सामने समस्या यह थी कि वह उस की लाश को ठिकाने कहां लगाए. अगर वह उसे कहीं बाहर ले जाए तो उस के पकड़े जाने की संभावना थी. लिहाजा वह उसी घर में उसे ठिकाने लगाने की सोचने लगा. काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने एक कंबल में उस की लाश लपेट ली. फिर उसे किचन के ऊपर के स्लैब पर बनी लकड़ी की रैक में छिपा दिया. इस के बाद वह मकान के दरवाजे पर ताला लगा कर सब्जीमंडी चला गया.

शाम को शिवनंदन और नीरज सब्जीमंडी से लौटे तो नीरज ने घर में मां को नहीं देखा तो वह चौंका. तब शिवनंदन ने कह दिया कि वह पहले की तरह कहीं गई होगी. अनीता कईकई दिनों के लिए अचानक घर से गायब हो जाती थी, इसलिए वह कुछ नहीं बोला. उसे पता नहीं था कि उस की मां अब इस दुनिया में नहीं है. 2-3 दिनों बाद लाश सड़ने लगी तो शिवनंदन ने किचन में खाना बनाना बंद कर दिया ताकि नीरज को कोई शक न हो. वह बाजार से ही खाना मंगाने लगा. उधर अनीता की लाश से बदबू वाला तरल पदार्थ रिसने लगा. उस तरल पदार्थ को शायद किचन में गए चूहों ने पीया होगा, जिस से उन की मौत हो गई. शिवनंदन और नीरज रोजाना ही उसी घर में सोते थे. बदबू बढ़ने पर नीरज ने उस से पूछा भी लेकिन शिवनंदन ने कोई चूहा मरने की बात कह कर उस की बात टाल दी.

पहली जून को शिवनंदन और नीरज अपने काम पर निकल गए. नीरज किसी काम से घर आया तो उस से पड़ोसियों ने बदबू आने वाली बात बताई. उसी दौरान किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. फोन काल पर पुलिस वहां आई और मरे हुए चूहे निकलवा कर चली गई. एकडेढ़ घंटे बाद शिवनंदन भी वहां आ गया. उसे जब पता चला कि किचन में जाने के बावजूद भी पुलिस लाश का पता नहीं लगा पाई तो वह बहुत खुश हुआ. उस ने सोचा कि अब वह पकड़ा नहीं जाएगा. लेकिन उस की यह खुशी केवल कुछ देर तक ही रही. क्योंकि उसी दौरान बदबू आने की शिकायत पुलिस से दोबारा जो कर दी गई थी. दूसरी बार पहुंची पुलिस ने बदबू की वजह ढूंढ ही निकाली.

शिवनंदन से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे हत्या और लाश ठिकाने लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर के जिला एवं सत्र न्यायालय रोहिणी के महानगर दंडाधिकारी कपिल कुमार के समक्ष पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. शिवनंदन और पुष्पा ने अनीता को सुधरने के कई मौके दिए थे लेकिन अनीता अपनी बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के चलते गलत पर गलत काम करती रही. यदि वह सही रास्ते पर चलती तो शायद शिवनंदन के हाथों नहीं मारी जाती. बहरहाल, अनीता का बेटा सूरज मां की मौत के बाद भी मुंबई से नहीं आया. मामले की तफ्तीश इंसपेक्टर राकेश कुमार कर रहे हैं. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Delhi News : फिरौती के फेर में फना मासूम

Delhi News : प्रताप सिसोदिया और सिद्धार्थ शर्मा ने एक करोड़ रुपए की फिरौती के लिए ज्वैलर मुकेश वर्मा के बेटे उत्कर्ष का अपहरण तो कर लिया लेकिन पुलिस की सक्रियता देख कर वे घबरा गए. बच्चे से छुटकारा पाने की उन्होंने जो चाल चली, उसी चाल ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उत्कर्ष दोपहर सवा दो, ढाई बजे तक स्कूल से अपने घर लौट आता था, लेकिन 18 नवंबर को वह समय पर घर नहीं लौटा तो उस की मां ममता

सोचने लगीं कि पता नहीं उत्कर्ष अभी तक क्यों नहीं आया. अब तक तो वह आ जाता था. उन्होंने दरवाजे के बाहर झांक कर देखा. उन्हें बेटा आता हुआ नहीं दिखा तो उन्होंने कैब ड्राइवर गुरमीत को फोन किया. गुरमीत ने उन्हें बताया कि उस ने उत्कर्ष को करीब 2 बजे सत्संग रोड झील चौक पर उतार दिया था. गुरमीत उत्कर्ष को झील चौक पर छोड़ता था और वहीं से सुबह के समय स्कूल ले जाता था. वहां से करीब 100 मीटर दूर संकरी गली में उत्कर्ष का मकान था. उस गली में भीड़भाड़ रहने की वजह से कैब उस के घर तक नहीं जा सकती थी. इसलिए वह वहां से पैदल ही घर चला जाता था.

कैब ड्राइवर की बात सुन कर ममता चौंक गईं कि जब उसे झील चौक पर उतार दिया था तो वह अभी तक घर क्यों नहीं आया? वह कहां चला गया? इसी तरह के कई विचार उन के दिमाग में आए. उन्होंने कोठी में काम करने वाले एक नौकर को तुरंत बेटे को ढूंढने के लिए झील चौक की तरफ भेजा. कुछ देर बाद नौकर ने वापस आ कर जब बताया कि उत्कर्ष उधर नहीं मिला तो वह परेशान हो गईं. वह खुद भी उस जगह पर गईं जहां कैब ड्राइवर उन के बेटे को उतारता था. झील चौक से उन के घर तक व्यस्त बाजार है. गली के दुकानदार भी उत्कर्ष को पहचानते थे.

ममता ने दुकानदारों से बेटे के बारे में पूछा तो कुछ ने बताया कि उन्होंने उत्कर्ष को कैब से उतर कर घर की ओर जाते देखा था तो कुछ ने बताया कि दुकानदारी में व्यस्त होने की वजह से वह ध्यान नहीं दे पाए. यह बात कैब ड्राइवर ने भी बताई थी कि उस ने उत्कर्ष को झील चौक पर 2 बजे के करीब उतार दिया था. जिस गली के मुहाने पर उत्कर्ष को कैब से उतारा था, वह गली उन के घर पर ही खत्म होती है. अब उन की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि 13 वर्षीय उत्कर्ष गली से कहां गायब हो गया. आसपास के लोगों को जब पता चला कि उत्कर्ष को ले कर उस के घर वाले परेशान हो रहे हैं तो वे भी उसे इधरउधर ढूंढने लगे. ममता ने पति मुकेश कुमार वर्मा को फोन कर के बेटे के बारे में खबर दे दी. मुकेश कुमार वर्मा का पूर्वी दिल्ली के रघुबरपुरा क्षेत्र में एक ज्वैलरी शोरूम है.

वह उस समय अपने शोरूम पर ही थे. जैसे ही उन्हें बेटे के घर न पहुंचने खबर मिली, वह शोरूम से घर की ओर चल दिए. घर पहुंचते ही पत्नी ने सारी बात उन्हें बता दी तो वह भी अपने स्तर से बेटे को खोज ने लगे. उन्होंने तमाम लोगों से बेटे के बारे में पता किया, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि बेटा कहां और किस के साथ चला गया. उन्होंने फोन कर के कैब ड्राइवर गुरमीत को भी अपने यहां बुला लिया. गुरमीत ने फिर से बताया कि उस ने उत्कर्ष को दोपहर 2 बजे के करीब सत्संग रोड झील चौक पर उतार दिया था. उसे उतार कर वह अपने घर चला गया था. इस बात को गुरमीत भी नहीं समझ पा रहा था कि कैब से उतरने के बाद उत्कर्ष कहां चला गया.

बहरहाल घर के सभी लोग उत्कर्ष को ले कर परेशान हो रहे थे. जब कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो मुकेश वर्मा 18 नवंबर को ही शाम करीब साढ़े 4 बजे अपने शुभचिंतकों के साथ पूर्वी दिल्ली के थाना गांधीनगर चले गए. थानाप्रभारी मनोज पंत को उन्होंने बेटे के गुम होने की जानकारी दे दी. मुकेश कुमार वर्मा बडे़ ज्वैलर और शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे इसलिए थानाप्रभारी ने उन से बातचीत करने के बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ उत्कर्ष के अपहरण का मामला दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज करते ही सब से पहले उन्होंने पुलिस कंट्रोलरूम को 13 वर्षीय उत्कर्ष का हुलिया बताते हुए उस के अपहरण की जानकारी दे दी. उन्होंने डीसीपी अजय कुमार को पूरे मामले से अवगत कराया तो उन्होंने बच्चे को ढूंढने के लिए जिले के समस्त थानों को अपनी तरफ से वायरलैस से मैसेज भिजवाया. थानाप्रभारी ने वाट्सऐप द्वारा बीट के समस्त पुलिसकर्मियों को उत्कर्ष का फोटो भी भेज दिया.

मुकेश कुमार वर्मा थाना गांधीनगर के अंतर्गत राजगढ़ कालोनी में रहते थे. थानाप्रभारी मनोज पंत एसआई सुखविंदर, प्रदीप कुमार, अजय यादव आदि के साथ उन के घर पहुंच गए. उन्होंने उस जगह का निरीक्षण किया जहां पर स्कूल कैब से उत्कर्ष को उतारा गया था. उन्होंने देखा कि वह जगह बहुत भीड़भाड़ वाली थी और वहां से संकरी गली में करीब 100 मीटर दूर उत्कर्ष अपने घर पैदल ही चला जाता था. उस गली में भी दोनों तरफ दुकानें थीं इसलिए गली में भी भीड़ रहती थी.

झील चौक पर जहां उत्कर्ष कैब से उतरा था, वहां के दुकानदारों से थानाप्रभारी ने पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने कैब को यहां आते हुए तो देखा था लेकिन उस में से कोई बच्चा उतरा या नहीं, इस तरफ ध्यान नहीं दिया. वहीं गली के नुक्कड़ के एक ज्वैलर शर्मा ने बताया कि उन्होंने उत्कर्ष को कैब से उतर कर गली में जाते हुए देखा था. अब इंसपेक्टर मनोज पंत असमंजस में    पड़ गए कि जब उत्कर्ष कैब से उतर कर     गली में आया था तो गली से कहां गायब हो गया. जबकि वहां से उस का घर नजदीक ही था. उत्कर्ष आसपास के जिन बच्चों के साथ खेलता था, पुलिस ने उन से भी पूछताछ की. बच्चों ने बताया कि वे आज उत्कर्ष से नहीं मिले.

इन सब बातों से थानाप्रभारी को लगने लगा कि उत्कर्ष का किसी ने अपहरण कर लिया है. उन्हें इस बात का शक होने लगा कि अपहर्त्ता कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि ऐसा शख्स है जिसे उत्कर्ष अच्छी तरह जानता होगा. परिचित होने की वजह से उत्कर्ष उस के साथ आसानी से चला गया होगा. चूंकि भीड़भाड़ वाली गली में कार ले जाना आसान नहीं था, इसलिए अपहर्त्ता पैदल या दोपहिया वाहन पर बैठा कर उसे आसानी से ले गया होगा. उत्कर्ष का वहां से जबरदस्ती अपहरण करने की संभावना इसलिए भी नजर नहीं आ रही थी कि यदि उस के साथ जबरदस्ती की जाती तो उस के शोर मचाने पर भीड़ अपहर्त्ता को घेर लेती.

अब पुलिस को मुकेश वर्मा से बात कर के यह पता लगाना था कि ऐेसे कौनकौन लोग हैं, जिन से उत्कर्ष अच्छी तरह से परिचित था. मामले की गंभीरता को समझते हुए डीसीपी अजय कुमार ने एसीपी वाई.के. त्यागी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. जिस में थानाप्रभारी मनोज पंत, इंसपेक्टर के.जी. त्यागी, संजीव पाहवा, राकेश दीक्षित (स्पैशल स्टाफ), एसआई सुखविंदर सिंह, मुकेश कुमार, प्रदीप, अजय यादव, जयसिंह, एएसआई ओमेंद्र, हेडकांस्टेबल धर्मेंद्र, कांस्टेबल राहुल चौधरी आदि को शामिल किया गया. पुलिस अधिकारी अपनेअपने तरीके से इस केस की जांच में जुट गए.

थानाप्रभारी मनोज पंत को पहला शक कैब ड्राइवर गुरमीत पर ही हो रहा था. उन्होंने ड्राइवर गुरमीत को थाने बुला लिया. गुरमीत ने पुलिस को यही बताया कि उस ने उत्कर्ष को सत्संग रोड झील चौक पर उसी जगह उतारा था, जहां वह उसे रोजाना उतारता था और उत्कर्ष आखिरी बच्चा था. उस की बातों पर थानाप्रभारी को विश्वास नहीं हो रहा था. गुरमीत ने बताया कि उत्कर्ष को उतारने के बाद वह सीधे अपने घर चला गया था.

पुलिस की एक टीम यह जांचने में लग गई कि जिस स्थान पर उत्कर्ष को कैब से उतारा गया था, वहां और उस की गली में किनकिन लोगों ने सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं. इस जांच में पुलिस को झील चौक पर ही एक फैक्ट्री के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा दिखा. लेकिन वह कैमरा नीचे की ओर झुका हुआ था. ऐसा शायद किसी वजनदार पक्षी के उस पर बैठने की वजह से हो गया होगा. जिस गली से उत्कर्ष अपने घर जाता था, वहां एक छोटा प्राइवेट स्कूल है. उस स्कूल के बाहर भी एक सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था. उस कैमरे की रिकौर्डिंग की जांच की गई तो उस में उत्कर्ष गली में आता हुआ दिखा. इस से यह निष्कर्ष निकला कि ड्राइवर गुरमीत ने उत्कर्ष को निर्धारित जगह पर उतारा था और उस का अपहरण गली का स्कूल पार करने के बाद ही किया गया है.

पुलिस ने यह भी अंदाजा लगाया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि गुरमीत ने बच्चे को कैब से उतारने के बाद अपने साथियों से उसे उठवा लिया हो. बच्चे के अपहरण की साजिश में गुरमीत का रोल है या नहीं है, जानने के लिए पुलिस ने गुरमीत से सख्ती से पूछताछ की. गुरमीत बारबार यही कहता रहा कि उत्कर्ष के बारे में उसे जानकारी नहीं है. उत्कर्ष उस की कैब का आखिरी बच्चा था. उसे उतार कर वह सीधे अपने घर गया था. गुरमीत की बात की पुष्टि करने के लिए पुलिस गुरमीत के घर गई. वहां पता चला कि गुरमीत 3 बजे के करीब अपने घर पहुंच गया था.

गुरमीत के घर के पास सड़क किनारे एक सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था. पुलिस ने उस कैमरे की फुटेज देखी तो उस में गुरमीत घर की तरफ आता दिखाई दे रहा था. इन सब बातों से पुलिस को गुरमीत के बेकुसूर होने की पुष्टि हो गई. फिर भी पुलिस ने उसे यह हिदायत दी कि वह थाने में बताए बिना दिल्ली से बाहर न जाए. इस के बाद पुलिस ने मुकेश कुमार वर्मा से उन की कोठी पर और उन के शोरूम पर काम करने वाले नौकरों व नौकरानियों के नामपते हासिल किए. इस के अलावा पुलिस ने उन के ऐसे रिश्तेदार, दोस्तों आदि के नाम व फोन नंबर भी ले लिए, जो उन के घर अकसर आतेजाते थे.

मुकेश वर्मा ने उन्हें यह भी बताया कि उन के शोरूम में अमित वर्मा नाम का एक लड़का नौकरी करता था, 14 साल नौकरी करने के बाद अमित 6 महीने पहले ही उन के यहां से काम छोड़ कर गया था. अमित का नौकरी के दौरान मुकेश वर्मा के घर भी आनाजाना था, जिस से घर के सभी लोग उस से अच्छी तरह से परिचित थे. अमित मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद का रहने वाला था. वह अपनी मरजी से मुकेश वर्मा के यहां से नौकरी छोड़ कर गया था. नौकरी छोड़ने के बाद भी वह उन के यहां कभीकभी आता रहता था. अभी 2-4 दिन पहले भी वह दिल्ली आया था. मुकेश वर्मा ने बताया कि अमित मुरादाबाद के डीपीएस में नौकरी करता है.

अमित 2-4 दिन पहले दिल्ली आया था, इस से थानाप्रभारी के शक की सूई अमित की तरफ भी घूम गई. थानाप्रभारी ने एसआई सुखविंदर के नेतृत्व में एक पुलिस टीम मुरादाबाद के लिए रवाना कर दी. उधर बेटे को ले कर मुकेश वर्मा और उन की पत्नी ममता परेशान थीं. मुकेश वर्मा की शादीशुदा बेटी कनिका अमेरिका में रहती है. वह परेशान न हो, इसलिए उन्होंने बेटे के गुम होने की बात बेटी तक को नहीं बताई. लेकिन किसी रिश्तेदार ने कनिका को उत्कर्ष का अपहरण होने की जानकारी दी तो वह पति के साथ घर से एयरपोर्ट की तरफ निकल पड़ी. 18 नवंबर को ही शाम के समय घर के सभी लोग कमरे में बैठे थे तभी शाम 7 बज कर 22 मिनट पर ममता के फोन की घंटी बजी.

ममता ने स्क्रीन पर देखा तो अनजान नंबर था. उन्होंने जैसे ही फोन रिसीव किया, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘उत्कर्ष हमारे पास है. पैसे का इंतजाम कर के रखना. कल फिर फोन करेंगे.’’

इतना कह कर उस व्यक्ति ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.ममता ने कई बार हैलोहैलो कहा लेकिन काल डिसकनेक्ट होने की वजह से उन की बात नहीं हो सकी. बेटे के अपहरण की बात सुन कर ममता के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी. साथ ही उन की आंखों में आंसू भी छलक आए. तभी पति मुकेश वर्मा ने उन से पूछा, ‘‘किस का फोन था?’’

‘‘पता नहीं कौन था, कह रहा था कि उत्कर्ष उस के पास है. उस ने पैसों का इंतजाम करने को कहा है.’’ ममता बोलीं.

यह सुनते ही मुकेश वर्मा चौंक गए. पत्नी का मोबाइल ले कर वह उस नंबर को देखने लगे जिस नंबर से फोन आया था. वह अब उस फोन करने वाले से यह जानना चाहते थे कि उत्कर्ष कैसा है और उस के बदले में वह क्या चाहता है. उन्होंने वही नंबर रिडायल कर दिया, लेकिन वह फोन स्विच्ड औफ हो चुका था. ऐसा उन्होंने कई बार किया. हर बार फोन स्विच्ड औफ ही आया. उत्कर्ष के अपहरण की बात जान कर घर के सभी लोग परेशान हो रहे थे. सभी को चिंता हो रही थी कि पता नहीं वे लोग उत्कर्ष को किस तरह रख रहे होंगे. बेटे की कुशलता को ले कर मुकेश वर्मा और पत्नी के दिमाग में तरहतरह के विचार भी आ रहे थे.

चूंकि मुकेश वर्मा बेटे के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा चुके थे, इसलिए पत्नी के मोबाइल पर अपहर्त्ता के फोन आने की सूचना उन्होंने थानाप्रभारी को दे दी. यह खबर मिलते ही थानाप्रभारी मनोज पंत मुकेश वर्मा के घर पहुंच गए. उन्होंने सब से पहले ममता के फोन से वह नंबर हासिल किया, जिस से अपहर्त्ता ने फोन किया था. वह नंबर वोडाफोन कंपनी का था. उन्होंने उस कंपनी के अधिकारियों से उस फोन नंबर की काल डिटेल्स मांगी तो पता चला कि जिस समय अपहर्त्ता ने फोन किया था, उस की लोकेश यमुनापार के ही कैलाशनगर पुश्ते की आ रही थी.

जिस व्यक्ति के नाम से वह नंबर खरीदा गया था, पुलिस ने कंपनी से उस व्यक्ति का नामपता हासिल किया और उस के पते पर पहुंची तो उस पते पर उस नाम का कोई व्यक्ति नहीं पाया गया. इस का मतलब वह नंबर फरजी आईडी पर लिया गया था. पुलिस को जांच के आगे बढ़ने की जो उम्मीद नजर आ रही थी, वह वहीं रुक गई. मामला इतना संवेदनशील था कि जिले के एडीशनल डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार पुलिस काररवाई पर नजर रखे हुए थे. करीब सवा घंटे बाद रात 8 बज कर 43 मिनट पर मुकेश कुमार वर्मा के मोबाइल पर किसी अज्ञात नंबर से फोन आया. फोन करने वाले ने उन से कहा, ‘‘मुकेश ध्यान से बात सुन मेरी. मेरे को एक करोड़ रुपए चाहिए.’’

इतना सुनते ही मुकेश समझ गए कि फोन अपहर्त्ता का ही है. फिर भी उन्होंने पूछा, ‘‘कहां से बोल रहे हो और आप कौन हैं.’’

‘‘कहां से बोल रहा हूं, अभी बताता हूं तुझे.’’ दूसरी तरफ से कड़क आवाज आई, ‘‘बेटे को जिंदा पाना है तो ज्यादा सयाणा मत बन. मैं एक बात और बोले देता हूं कि कहीं कोई कंप्लेन की तो ध्यान रखियो. अब कल फोन करूंगा.’’ कहते ही अपहर्त्ता ने फोन काट दिया.

मुकेश हैलोहैलो करते रहे लेकिन बात नहीं हुई. वह बेटे की खैरियत के बारे में उस व्यक्ति से बात करना चाहते थे इसलिए उन्होंने उसी नंबर को कई बार रिडायल किया लेकिन वह फोन स्विच्ड औफ हो चुका था. मुकेश वर्मा ने यह बात भी थानाप्रभारी मनोज पंत को बता दी तो वह फिर मुकेश वर्मा के घर पहुंच गए. जांच में पता चला कि अपहत्ताओं ने फिरौती मांगने के लिए इस बार दूसरा फोन नंबर प्रयोग किया था. ममता के मोबाइल फोन पर पहले जो काल आई थी, वह दूसरे नंबर से आई थी. दूसरा नंबर भी वोडाफोन कंपनी का था.

पुलिस ने कंपनी से जब इस नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो उस की लोकेशन पूर्वी दिल्ली के ही गुरु अंगदनगर से कुछ दूर स्थित वी3एस मौल के नजदीक की मिली. इस नंबर की जांच की गई तो पता चला कि यह भी फरजी आईडी पर लिया गया था. पुलिस यह समझ गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं. संभावना हो रही थी कि उन्होंने फरजी आईडी पर कई सिम कार्ड खरीदे होंगे, तभी तो हर काल पर नया सिम प्रयोग कर रहे हैं. ताज्जुब की बात यह थी कि दोनों सिम अलगअलग फोन सेटों में डाल कर प्रयोग किए गए थे.

पुलिस चाह रही थी कि किसी भी तरह वह अपहर्त्ताओं के चंगुल से बच्चे को सकुशल बरामद कर ले. अपहर्त्ताओं का मकसद पता चल ही चुका था. वे बच्चे के एवज में मुकेश वर्मा से मोटी रकम वसूलना चाहते थे. बताई गई रकम कहां पहुंचानी है, यह उन्होंने बताया नहीं था. इस के लिए वे फिर से फोन करेंगे, यह निश्चित था. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए थानाप्रभारी ने उसी समय डीसीपी अजय कुमार से मुलाकात की. मामला बेहद संवेदनशील था इसलिए डीसीपी ने रात में ही स्पैशल सीपी (ला ऐंड और्डर) दीपक मिश्रा और सीपी बी.एस. बस्सी से मुलाकात कर पूरे हालात बताए. सीपी ने रात में ही दोनों फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए.

अपहर्त्ताओं ने जिन 2 नंबरों से वर्मा दंपति को फोन किए थे, सर्विलांस टीम ने उन नंबरों की जांच की लेकिन उन से ऐसा क्लू नहीं मिला जिस से जांच आगे बढ़ सके. इस के अलावा थानाप्रभारी ने वर्मा दंपति को भी समझा दिया कि अपहर्त्ताओं के फोन आने पर उन्हें किस तरह बात करनी है. रात भर पुलिस और वर्मा दंपति अपहर्त्ताओं के फोन का इंतजार करते रहे, लेकिन उन की तरफ से कोई फोन नहीं आया. अगले दिन 19 नवंबर की सुबह करीब 7 बजे लोगों ने पूर्वी दिल्ली के गीता कालोनी, रामलीला मैदान के पास नाले में एक बच्चे की लाश देखी. उस बच्चे की उम्र 12-13 साल थी और वह किसी स्कूल की ड्रैस पहने हुए था. किसी ने इस की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

वह इलाका थाना गीता कालोनी के अंतर्गत आता है इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम से वायरलैस द्वारा यह खबर थाना गीता कालोनी को दे दी गई. पुलिस कंट्रोलरूम द्वारा जिस समय यह खबर थाना गीता कालोनी को दी जा रही थी, उसी समय गांधीनगर के थानाप्रभारी मनोज पंत ने भी अपने वायरलैस सैट पर उस सूचना को सुन लिया था. सूचना सुन कर मनोज पंत के कान खड़े हो गए. क्योंकि स्कूल की ड्रैस पहने जिस 12-13 साल के बच्चे की लाश नाले में पड़े होने की बात मैसेज में बताई गई थी, उन के इलाके से गायब हुआ बच्चा उत्कर्ष भी उसी उम्र का था. बिना देर किए वह मैसेज में बताई जगह पर पहुंच गए. तब तक गीता कालोनी थाने की पुलिस वहां नहीं पहुंची थी.

नाले के किनारे कई लोग खडे़ हो कर उस बच्चे की लाश को देख रहे थे. मनोज पंत  ने देखा कि मृतक बच्चा किसी स्कूल की ड्रैस पहने था. उन्हें शक हुआ कि कहीं यह उत्कर्ष की तो नहीं है. पुष्टि के लिए उन्होंने फोन कर के मुकेश वर्मा को वहां बुला लिया. तब तक गीता कालोनी थाने की पुलिस भी मौके पर पहुंच गई. जरूरी काररवाई कर के गीता कालोनी थाने की पुलिस ने बच्चे की लाश को नाले से बाहर निकलवा लिया. इंसपेक्टर मनोज पंत की सूचना पा कर मुकेश वर्मा भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने जैसे ही बच्चे की लाश देखी, उन की चीख निकल गई और वह जोरजोर से रोने लगे. क्योंकि वह लाश उन के बेटे उत्कर्ष की ही थी. अपहरण हुए बच्चे की हत्या होने पर पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई.

उत्कर्ष की हत्या की खबर पा कर मुकेश वर्मा के परिजन, परिचित और अन्य तमाम लोग भी वहां पहुंच गए. बच्चे की मौत पर परिजन और संबंधी दुखी थे. उन का कहना था कि यदि पुलिस सक्रिय रहती तो उत्कर्ष की जान बच सकती थी. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि पुलिस कितनी तत्परता से इस केस में लगी हुई थी. पुलिस ने रात में ही फोन को सर्विलांस पर लगाने की काररवाई की थी. अपने हिसाब से पुलिस जो भी काररवाई कर रही थी,जरूरी नहीं था कि वह सब वर्मा दंपति को बताई जाती. खैर, पुलिस ने वर्मा दंपति को समझाया और भरोसा दिया कि वह जल्द ही अपहर्त्ताओं के चेहरे उजागर कर देगी. मौके की आवश्यक काररवाई पूरी करने के बाद गीता कालोनी पुलिस ने उत्कर्ष की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

उत्कर्ष की लाश बरामद होने के बाद डीसीपी अजय कुमार ने पुलिस टीम की एक मीटिंग की. मीटिंग में अधिकारी इस नतीजे पर पहुंचे कि हत्यारे जरूर नौसिखए रहे होंगे और बच्चा उन्हें पहचानता होगा. उन के पास बच्चे को छिपाने की उचित जगह नहीं होगी. यदि जगह होती तो वे बच्चे को 2-4 दिन वहां रख कर फिरौती वसूलने की कोशिश करते. अधिकारियों ने इस बात की भी संभावना जताई कि अपहर्त्ताओं में से कोई एक यमुनापार इलाके का जानकार जरूर रहा होगा. इन बातों पर चर्चा करने के साथ इस बात पर भी योजना बनाई गई कि हत्यारों तक कैसे पहुंचा जाए.

दिल्ली पुलिस के पास उस समय उत्कर्ष से बड़ा कोई केस नहीं था. सीपी बी.एस. बस्सी के निर्देश पर स्पैशल सेल के अलावा क्राइम ब्रांच, स्पैशल स्टाफ, एएटीएस और गांधीनगर सबडिवीजन के तीनों थानों की 8 टीमों को मिला कर कुल 15 टीमों के करीब 150 पुलिसकर्मी इस केस को सुलझाने में लग गए. एसआई सुखविंदर के नेतृत्व में जो पुलिस टीम मुकेश वर्मा के पूर्व नौकर अमित वर्मा की तलाश में मुरादाबाद गई थी, वह उसे मुरादाबाद से ले कर दिल्ली लौट आई. पुलिस ने अमित से पूछताछ की तो उस ने उत्कर्ष के अपहरण में खुद को बेकुसूर बताया.

उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह उत्कर्ष के अपहरण के कुछ दिनों पहले दिल्ली आया था. वह मुकेश के ज्वैलरी शोरूम के पास भी गया था और 17 नवंबर, 2014 को वह दिल्ली से वापस मुरादाबाद लौटा. इस सब से पुलिस का शक उस की तरफ हुआ. काल डिटेल्स के आधार पर उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार किया कि वह दिल्ली आया जरूर था लेकिन उस समय उस के मन में कोई गलत भावना नहीं थी. उस ने बताया कि उस की पत्नी अकसर बीमार रहती है. उस की कुछ दवाएं मुरादाबाद नहीं मिलतीं, इसलिए वह दिल्ली के भागीरथ पैलेस से दवा खरीदने आया था.

इस के अलावा उस ने मुकेश के ज्वैलरी शोरूम पर काम करने वाले एक युवक को कुछ पैसे उधार दिए थे. भागीरथ पैलेस से दवा खरीदने के बाद वह ज्वैलरी शोरूम पर उस लड़के के पास अपने पैसों का तकादा करने गया था. जो बातें अमित ने बताई थीं, पुलिस ने उन की क्रौस चैकिंग की. पुलिस उसे ले कर भागीरथ पैलेस में उस दुकानदार के पास भी गई, जहां से उस ने पत्नी की दवाएं खरीदी थीं. इस के अलावा मुकेश वर्मा के शोरूम पर काम करने वाले उस नौकर से भी पूछताछ की, जिस पर अमित के पैसे उधार थे. इन से बात करने पर पुलिस को अमित की बातों पर यकीन हो गया कि वह सच बोल रहा है. इसलिए पुलिस ने बेकुसूर समझते हुए उसे घर भेज दिया.

अब पुलिस ने उन्हीं फोन नंबरों पर जांच केंद्रित कर दी, जिन से अपहर्त्ताओं ने वर्मा दंपति से फिरौती मांगी थी. जांच में पता चला कि वे फोन नंबर पूर्वी दिल्ली के ही कृष्णानगर में स्थित बालाजी कम्युनिकेशन नाम की दुकान से खरीदे गए थे. एक पुलिस टीम उक्त स्थान पर पहुंच गई. पता चला कि वह दुकान देवेंद्र कुमार गुप्ता की है. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. देवेंद्र गुप्ता ने स्वीकार किया कि कुछ दिनों पहले उस के यहां 4-5 लोग सिम लेने आए थे. उन को उस ने पहले से एक्टिवेट किए हुए वोडाफोन कंपनी के 5 प्रीपेड सिम कार्ड दिए थे. वे सारे सिम कार्ड फरजी आईडी प्रूफ पर पहले से लिए गए थे. वे सिम उस ने कंपनी के एजेंट सुशील के जरिए एक्टिवेट कराए थे. उस ने यह भी बताया कि जिन लोगों को उस ने सिम बेचे थे, उन की उम्र 18-20 साल थी.

उधर पुलिस की एक टीम एक बार फिर कैब ड्राइवर गुरमीत के घर पहुंच गई कि कहीं बच्चे को किडनैप कराने में गुरमीत की कोई परोक्ष भूमिका तो नहीं है. देवेंद्र गुप्ता से पुलिस को पता चल ही चुका था कि उस ने 18-20 साल के लड़कों को सिम बेचे थे तो थानाप्रभारी ने गुरमीत के घर मौजूद टीम से कहा कि वह गुरमीत के घर में मौजूद इस आयुवर्ग के लड़कों के बारे में जानकारी करे. गुरमीत के 2 भतीजे भी 18-20 आयुवर्ग के थे. उस समय वे भी घर में ही मौजूद थे. पुलिस ने दोनों के फोटो खींच कर तुरंत वाट्सऐप से थानाप्रभारी को भेज दिए. वे फोटो थानाप्रभारी ने अपने पास मौजूद देवेंद्र गुप्ता को दिखाए तो उस ने उन में एक को पहचानते हुए कहा कि जो लड़के उस के पास आए थे, उन में से एक यह भी था.

इतना सुनते ही थानाप्रभारी को लगा कि अब केस खुल जाएगा. उस समय उन का तनाव कुछ कम हो गया. उन्होंने गुरमीत के दोनों भतीजों को तुरंत थाने बुलवा लिया. जिस लड़के को दुकानदार देवेंद्र ने पहचाना था, उस से पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की. वह लड़का खुद को बेकुसूर बताता रहा. उस लड़के के घर वालों और अन्य से पूछताछ करने के बाद पुलिस को भी वह लड़का बेकुसूर लगा. इस से पुलिस को विश्वास हुआ कि दुकानदार देवेंद्र झूठ बोल रहा है. पुलिस ने उन दोनों लड़कों को छोड़ कर देवेंद्र गुप्ता के खिलाफ धोखाधड़ी आदि की धाराओं में थाना कृष्णानगर में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस की जांच अब फिर वहीं आ कर ठहर गई, जहां से शुरू हुई थी. इतना तो तय था कि उस के अपहरण में कोई परिचित ही शामिल है. पुलिस को पता चला कि मुकेश वर्मा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के फक्कड़पुरा गांव के रहने वाले हैं. पुलिस को लगा कि कहीं इन के गांव के ही किसी आदमी ने दुश्मनी या अन्य किसी वजह से बच्चे का अपहरण किया हो. इसलिए पुलिस ने उन से उन के गांव के ऐसे लोगों के नाम पूछे, जिन से उन की कभी कोई दुश्मनी रही हो. मुकेश वर्मा ने गांव के किसी भी आदमी से दुश्मनी होने की बात नकार दी. इस के बावजूद भी उन के नातेरिश्तेदारों आदि के नामपते, फोन नंबर ले कर पुलिस की एक टीम गांव फक्कड़पुरा चली गई.

पुलिस टीम वहां 2-3 दिन रह कर खाली हाथ दिल्ली लौट आई. मुकेश वर्मा की कोठी के सामने एक नाई की दुकान थी. पता चला कि वह नाई उत्कर्ष से बहुत घुलामिला था. इतना ही नहीं, वह उत्कर्ष के साथ क्रिकेट भी खेलता था. पुलिस को उस नाई पर भी शक हुआ तो पुलिस ने उस से भी पूछताछ की. इस के अलावा उस की दुकान पर जो लड़के ज्यादा देर तक बैठे रहते थे, उन से भी पूछताछ की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मुकेश वर्मा के शोरूम व कोठी में जितने भी नौकरनौकरानी थे, उन सब से पुलिस ने अलगअलग पूछताछ की. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. राजगढ़ कालोनी में उत्कर्ष जिस महिला टीचर से ट्यूशन पढ़ता था, उस से भी पूछताछ की. पुलिस अब तक 50-60 लोगों से पूछताछ कर चुकी थी, लेकिन हत्यारों का पता नहीं लग पा रहा था.

मुकेश वर्मा ने राजगढ़ कालोनी में जो कोठी बनवाई थी, वह 8-10 महीने पहले ही तैयार हुई थी. वह कोठी अनिल ठाकुर नाम के एक बिल्डर से बनवाई थी. कोठी तैयार करने में जिन राजमिस्त्रियों, मजदूरों आदि ने काम किया था, उन सभी से पुलिस ने पूछताछ की. इस के अलावा बिल्डर अनिल ठाकुर को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. जांच के दौरान ही पुलिस को पता चला कि बिल्डिंग तैयार होते समय बिल्डर का बेटा प्रताप सिंह सिसोदिया भी वहां अपनी बुलेट मोटरसाइकिल से आता रहता था. प्रताप को मुकेश वर्मा के परिवार के सभी लोग जानते थे. पिता के कहने पर वह मुकेश वर्मा से काम के पैसे भी ले जाता था. घर में ज्यादा आनेजाने की वजह से मुकेश वर्मा के बच्चों से भी वह ज्यादा घुलमिल गया था.

उत्कर्ष तो प्रताप के पैर छूता था. थानाप्रभारी ने प्रताप सिसोदिया को भी पूछताछ के लिए बुलवा लिया. प्रताप ने पुलिस को बताया कि वह तो उत्कर्ष को अपना छोटा भाई मानता था. उस की मौत पर उसे बहुत दुख है. अपने छोटे भाई को भला वह क्यों मारेगा. जितने आत्मविश्वास के साथ उस ने यह बात पुलिस को बताई थी, उस से पुलिस को भी लग रहा था कि प्रताप सच बोल रहा है. पुलिस के पास शक का कोना हमेशा खाली रहता है. उसी शक को दूर करने के लिए पुलिस ने प्रताप का फोन नंबर ले कर उस की काल डिटेल्स की रिक्वेस्ट संबंधित कंपनी में भेजी.

लेकिन उस कंपनी का सर्वर डाउन होने की वजह से कालडिटेल्स आने में कई दिन लगे. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर उस में कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं. उत्कर्ष का अपहरण वाले दिन से प्रताप की एक और फोन नंबर पर खूब बातें हुई थीं.जांच में पता चला कि वह फोन नंबर राजगढ़ कालोनी की गली नंबर-4 के रहने वाले सिद्धार्थ शर्मा का था. अपहर्त्ताओं ने जिन जगहों से उत्कर्ष के घर वालों को फिरौती के फोन किए थे, उस समय सिद्धार्थ के फोन की लोकेशन भी वहीं थी. इस के अलावा जिस जगह पर उत्कर्ष की लाश मिली थी, वहां भी प्रताप और सिद्धार्थ के फोन की लोकेशन थी. इस से पुलिस को प्रताप और सिद्धार्थ पर शक हो गया.

उस काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने प्रताप सिसोदिया से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सच्चाई उगल दी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उत्कर्ष के अपहरण और हत्या में उसी का हाथ था. उस ने उत्कर्ष के अपहरण और हत्या की जो कहानी बताई, वह बड़ी ही चौंकाने वाली निकली. मुकेश कुमार वर्मा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के फक्कड़पुरा गांव के रहने वाले थे. बरसों पहले वह दिल्ली आए और उन्होंने पूर्वी दिल्ली के रघुबरपुरा में जैन मंदिर के सामने ज्वैलरी की दुकान खोली जो अब बड़ा शोरूम है.

उन के परिवार में एक बेटी कनिका और 2 बेटे थे. बेटी की वह शादी कर चुके हैं जो इस समय अमेरिका में पति के साथ रहती है. एक बेटा ऋषभ इंजीनियर है जिस की 24 जनवरी, 2015 को शादी होने वाली थी जबकि छोटा उत्कर्ष आनंद विहार स्थित विवेकानंद पब्लिक स्कूल में कक्षा-8 में पढ़ रहा था. मुकेश वर्मा का बिजनैस अच्छा चल रहा था इसलिए उन की गिनती धनाढ्य लोगों में होती थी. पहले वह अपने शोरूम के ऊपर ही रहते थे. उन्होंने गांधीनगर क्षेत्र की राजगढ़ कालोनी में एक प्लौट ले कर वहां एक आलीशान कोठी बनवाई. वह कोठी गीता कालोनी के बेवरली अपार्टमेंट में रहने वाले बिल्डर अनिल ठाकुर ने तैयार कराई थी.

कोठी बनाने के दौरान ही अनिल का बेटा प्रताप सिंह सिसोदिया वहां आताजाता था. वहां आनेजाने पर प्रताप के मुकेश के परिवार के सभी लोग अच्छी तरह से जानते थे. प्रताप एक आकर्षक कदकाठी का युवक था. पढ़ाई के दौरान ही उस पर मौडलिंग करने का भूत सवार हुआ और वह मौडलिंग करने लगा. मौडलिंग करतेकरते उस पर ऐसी सनक सवार हुई थी कि वह फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से 19 साल की उम्र में घर वालों से 10 लाख रुपए ले कर मुंबई चला गया. वह मौडल भले ही था लेकिन उसे एक्टिंग की एबीसीडी पता नहीं थी. तब वह एकता कपूर के संपर्क में आया. एक्टिंग के गुर सीखने के लिए उस ने उन की एक्टिंग एकेडमी में दाखिला ले लिया.

एक्टिंग कोर्स करने के दौरान ही मंजुला नाम की एक लड़की से उस की मुलाकात हुई. वह नागपुर की रहने वाली थी और वहां का ब्यूटी कांटेस्ट जीती हुई थी. उन की मुलाकात प्यार में बदल गई. एक्टिंग कोर्स पूरा कर के उस ने बौलीवुड में एंट्री करने के लिए काफी भागदौड़ की लेकिन उसे चांस नहीं मिला तो अपनी प्रेमिका मंजुला को ले कर दिल्ली आ गया. दिल्ली के गुरु अंगदनगर में उस ने एक फ्लैट किराए पर लिया और मंजुला के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगा.

अब प्रताप कोई काम करने की जुगत में लग गया. किसी दोस्त की सलाह पर नोएडा में किराए की बिल्डिंग ले कर वह एक कंपनी का कालसेंटर चलाने लगा. बताया जाता है कि उसे इस काम में नुकसान हुआ और वह 15 लाख रुपए का कर्जदार हो गया. उधर उस के पिता अनिल ठाकुर को भी अपने कारोबार में लाखों का नुकसान हो गया. प्रताप को अब ऐसा कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था, जहां से वह अपने कर्ज से निजात पा सके. प्रताप का दोस्त था सिद्धार्थ शर्मा. वह राजगढ़ कालोनी में रहता था. वहीं पर मोबाइल फोन एक्सेसरीज की दुकान चलाता था. प्रताप जब मुकेश वर्मा की निर्माणाधीन कोठी पर जाता था तो वहीं उस की मुलाकात सिद्धार्थ से हुई थी जो बाद में दोस्ती में बदल गई.

प्रताप ने सिद्धार्थ से अपनी तंगहाली की बात बताई. उधर सिद्धार्थ भी अपना काम बंद कर के कार एक्सेसरीज की दुकान खोलना चाहता था. उसे भी मोटे पैसों की जरूरत थी. अब दोनों दोस्तों की जरूरत एक ही थी पैसा. वह पैसा कहां से आए, इस पर दोनों काफी देर तक विचार करते थे. सिद्धार्थ ने प्रताप को स्नैचिंग करने की सलाह दी. इस के लिए प्रताप तैयार नहीं हुआ. उस ने कहा कि रोजरोज स्नैचिंग करने पर रिस्क भी है. तब प्रताप ने कहा कि एक बार में मोटा पैसा कमाने का एक ही रास्ता है और वह है अपहरण. किसी पैसे वाले के बच्चे का अपहरण करने पर एक ही बार में पौबारह हो जाएगी. प्रताप की यह योजना सिद्धार्थ की भी समझ में आ गई.

अपहरण के बाद फिरौती की रकम वसूलने के लिए उन्हें फोन की भी जरूरत पड़ेगी. अपने फोन से फिरौती मांगने पर उन का फंसना लाजिमी था. इस के लिए वे ऐसे सिम लेने की जुगत में लग गए जो किसी और की आईडी पर खरीदे गए हों. इस बारे में उन्होंने कई दुकानदारों से बात की लेकिन उन की बात नहीं बनी. इसी दौरान उन्हें कृष्णानगर में रहने वाले देवेंद्र गुप्ता के बारे में पता चला तो वे दोनों उस की दुकान पर चले गए. एक्स्ट्रा पैसों के लालच में देवेंद्र ने उन्हें वोडाफोन कंपनी के 5 ऐसे सिमकार्ड दे दिए, जो पहले से एक्टिवेट थे और वे फरजी नामपते पर लिए गए थे. उन्होंने चाइनीज कंपनी के 5 मोबाइल फोन भी खरीद लिए.

यह काम करने के बाद दोनों अब इस बात पर विचार करने लगे कि किस के बच्चे का अपहरण किया जाए. काफी सोचनेविचारने के बाद प्रताप ने दिल्ली के कृष्णानगर में रहने वाली अपनी बुआ के 8 वर्षीय बेटे विभू के अपहरण की योजना बनाई. विभू के पिता प्रौपर्टी डीलर थे, उन्हें मोटी आमदनी थी. उन्होंने योजना बनाई कि स्कूल से लौटते समय विभू का अपहरण कर लेंगे. प्रताप और सिद्धार्थ विभू के अपहरण की रेकी करने लगे. रेकी के दौरान उन्होंने देखा कि विभू को स्कूल वैन तक पहुंचाने और छुट्टी के बाद उसे लेने के लिए घर का कोई न कोई सदस्य आता था. इसलिए उन्होंने विभू के अपहरण की योजना टाल दी.

इस के बाद प्रताप के दिमाग में मुकेश वर्मा के बेटे उत्कर्ष का ध्यान आया. उत्कर्ष प्रताप को अच्छी तरह पहचानता था और उस के अपहरण पर उन्हें मोटी फिरौती भी मिलने की उम्मीद थी. इसलिए वे उत्कर्ष का अपहरण करने से पहले रेकी करने लगे कि वह कितने बजे स्कूल जाता है, कब स्कूल से लौटता है आदि. उन्होंने पाया कि कैब से उतरने के बाद उत्कर्ष अकेला ही घर जाता है. इस से उन्हें अपनी योजना सफल होने की उम्मीद लगी. उत्कर्ष अपनी स्कूल कैब से उतर कर घर जाता था तो उस समय गली में बड़ी भीड़भाड़ रहती थी. भीड़भाड़ में कार लाना संभव नहीं था. 18 नवंबर, 2014 को उन्होंने उत्कर्ष का अपहरण करने की योजना बनाई. योजना के अनुसार प्रताप अपनी बुलेट मोटरसाइकिल से और सिद्धार्थ अपनी स्कूटी से राजगढ़ की तरफ चल दिए.

राजगढ़ से कुछ दूर प्रताप ने अपनी मोटरसाइकिल सिद्धार्थ को दे दी और उस की स्कूटी ले कर वह उस गली में खड़ा हो गया जहां से कैब से उतर कर उत्कर्ष अपने घर जाता था. जबकि सिद्धार्थ कुछ दूर उस की बुलेट मोटरसाइकिल लिए खड़ा था. दोपहर 2 बजे के करीब कैब ड्राइवर गुरमीत ने उत्कर्ष को निर्धारित जगह पर उतारा और वहां से वह अपने घर चल दिया. कैब से उतर कर उत्कर्ष कुछ दूर ही चला था कि प्रताप ने उसे रोक लिया. प्रताप को देखते ही उत्कर्ष ने उस का अभिवादन करते हुए उस के पैर छुए. तभी प्रताप ने उस से कहा, ‘‘बेटा उत्कर्ष, आज आप की दादी का देहांत हो गया है इसलिए आप के घर पर कोई नहीं है. चलो, मैं तुम्हें तुम्हारी मम्मी के पास छोड़ आऊं.’’

उत्कर्ष उस पर विश्वास करता था. उसे क्या पता था कि वह मौत के मुंह में जा रहा है. भोलाभाला उत्कर्ष प्रताप के साथ स्कूटी पर बैठ गया. प्रताप उसे ले कर उसी रास्ते की तरफ गया, जहां सिद्धार्थ मोटरसाइकिल लिए खड़ा था. सिद्धार्थ ने प्रताप के पीछे बच्चे को बैठा देखा तो खुश हो गया और कुछ दूरी बना कर प्रताप के पीछे चल दिया. प्रताप उत्कर्ष को ले कर सीधे गुरु अंगदनगर स्थित अपने फ्लैट पर ले गया. उत्कर्ष को वहां अपने परिवार का कोई नहीं दिखा तो उस ने पूछा. प्रताप ने कोई बहाना बनाया तो उत्कर्ष ने उस से अपने मांबाप के पास पहुंचाने की जिद की.

प्रताप के साथ बच्चे को देख कर प्रेमिका मंजुला चौंक गई. उस ने उस से पूछा तो प्रताप ने अलग ले जा कर उस से झूठ कह दिया कि इस बच्चे को आसिफ भाई के लिए लाया हूं, इस के बदले में वह हमें मोटी रकम देंगे. मंजुला समझ गई कि प्रताप इस बच्चे का अपहरण कर के लाया है. उस ने उसे वापस पहुंचाने को कहा लेकिन प्रताप ने उस की बात नहीं मानी. तब मंजुला ने उस से कह दिया कि बच्चे को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए, इस बात का ध्यान रखना. प्रताप ने उत्कर्ष को खाना खिलाया और पहले से नशे की गोली मिली हुई कोल्डड्रिंक पीने को दी. कोल्डड्रिंक पीने के बाद उत्कर्ष बेहोश हो गया.

उधर उत्कर्ष के गायब होने के बाद मुकेश शर्मा के घर पर सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे साथ ही पुलिस के अफसर भी वहां चक्कर लगा रहे थे. फ्लैट पर पहुंचने के बाद मुकेश वर्मा के घर का जायजा लेने के लिए प्रताप   ने सिद्धार्थ को राजगढ़ कालोनी भेजा. सिद्धार्थ ने वहां भीड़भाड़ व पुलिस देखी तो यह बात उस ने प्रताप को बता दी. दोनों अपहर्त्ता अब घबराने लगे कि केस हाईप्रोफाइल होने की वजह से वे अवश्य पकड़े जाएंगे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी हालत में वे क्या करें. अगर वे उत्कर्ष को जीवित छोड़ते हैं तो वह सारी बात पुलिस को बता देगा जिस से पुलिस उन्हें पकड़ लेगी. इसलिए उन्होंने उत्कर्ष की हत्या करने का फैसला कर लिया.

बेहोश हो चुके उत्कर्ष को प्रताप ने दूसरे कमरे में सुला दिया था. शाम 7 बज कर 21 मिनट पर सिद्धार्थ ने नए चाइनीज फोन से उत्कर्ष की मां ममता के मोबाइल पर फोन कर के उत्कर्ष के अपहरण की सूचना दी. इस के बाद करीब पौने 9 बजे उस ने दूसरे फोन से उस के पिता को फोन किया. उत्कर्ष के घर वाले उस की चिंता में परेशान हो रहे थे वहीं अपहर्त्ता उत्कर्ष से निजात पाने की बाट देख रहे थे. रात को मंजुला सो गई तो प्रताप ने सोते हुए उत्कर्ष का गला दबा कर हत्या कर दी. उत्कर्ष हाथपैर न मार सके, इस के लिए सिद्धार्थ उस के पैरों पर बैठ गया था. कहीं वह जीवित न रह जाए, इसलिए वे दोनों बारीबारी से उस के गले पर खड़े हो गए.

हत्या करने के बाद वह उस की लाश ठिकाने लगाने की सोचने लगे. मंजुला को पता नहीं था कि उस के प्रेमी ने कितना बड़ा अपराध किया है. सुबह 4 बजे के करीब प्रताप और सिद्धार्थ ने 13 वर्षीय उत्कर्ष की लाश को स्कूटी पर बैठाने की पोजीशन में रख लिया. सिद्धार्थ लाश को पकड़े हुए था, जबकि प्रताप स्कूटी चला रहा था. वहां से लाश ले कर वे गीता कालोनी के ब्लौक नंबर 12 के पास रामलीला मैदान के नजदीक बह रहे नाले के किनारे पहुंच गए. मौका पाते ही उन्होंने लाश नाले में गिरा दी. उस का स्कूल बैग उन्होंने पुश्ता के किनारे की झाडि़यों में फेंक दिया तथा कुछ दूर वे मोबाइल भी फेंक दिए जिन से उन्होंने उत्कर्ष के मातापिता को फोन किए थे.

प्रताप सिसोदिया से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 25 नवंबर को ही उस के दोस्त सिद्धार्थ शर्मा को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर 26 नवंबर को कड़कड़डूमा कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी बबीता पूनिया की अदालत में पेश किया. अदालत में पेश करते समय आक्रोशित वकीलों ने उन की पिटाई कर दी. पुलिस ने बड़ी मुश्किल से उन्हें बचाया. पुलिस को अभियुक्तों से पूछताछ के अलावा उन से कुछ सुबूत हासिल करने थे, इसलिए उन का 2 दिनों का पुलिस रिमांड लिया गया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन की निशानदेही पर उत्कर्ष का स्कूल बैग, 2 मोबाइल फोन, अभियुक्तों की स्कूटी, बुलेट मोटरसाइकिल आदि बरामद किए. 28 नवंबर को उन्हें पुन: न्यायालय में पेश करने के लिए अदालत की लौकअप में बंद किया गया. वहां मौजूद बंदियों को जब पता चला कि इन दोनों ने मासूम बच्चे की हत्या की है तो उन्होंने प्रताप सिसोदिया और सिद्धार्थ की पिटाई कर दी. पुलिस ने उन्हें तुरंत अपनी सुरक्षा में लिया और न्यायालय में पेश किया. जहां से उन्हें जेल भेज दिया. इस सनसनीखेज मामले का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को स्पैशल सीपी (ला ऐंड और्डर) दीपक मिश्रा ने बधाई के साथ सवा लाख रुपए नकद देने की घोषणा की है. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी मनोज पंत कर रहे हैं. Delhi News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. मंजुला परिवर्तित नाम है.

 

Kerala Crime News : पत्नी की हत्या करने के बाद चलाया फेसबुक लाइव

Kerala Crime News : एक ऐसी दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई है, जहां एक पति ने अपनी पत्नी की बेरहमी से हत्या कर डाली. हैरानी की बात यह रही कि वारदात के बाद वह खुद थाने पहुंचा और गुनाह कुबूल कर लिया. आखिर ऐसा क्या हुआ था कि उस ने अपनी ही पत्नी की जान ले ली. इस खौफनाक मर्डर मिस्ट्री के पीछे का रहस्य क्या है? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह सनसनीखेज घटना केरल के कोल्लम जिले के कूथानाडी गांव से सामने आई है, जहां सोमवार को 42 साल के इशहाक ने अपनी पत्नी शालिनी की चाकू से बेरहमी से हत्या कर डाली. पत्नी जब नहाने गई थी, तब उस ने इस घटना को अंजाम दिया. उस ने पत्नी शालिनी  के छाती और पीठ पर जोरदार हमला किया जिस से उस की मौत हो गई.

हत्या के बाद हुआ फेसबुक लाइव

इशहाक ने हत्या के 2 मिनट बाद फेसबुक लाइव किया और कहा कि पत्नी उस पर कभी भरोसा नहीं करती थी. और उस की बातों पर हमेशा अनदेखी किया करती थी. जब कभी पतिपत्नी के बीच विवाद हो जाता तो वह मायके में अपनी मम्मी के पास जा कर रहने लग जाती. वापस आती तो घर को छोड़ने की धमकी भी दिया करती.

पुलिस के अनुसार, आरोपी का नाम इशहाक का उस की पत्नी लंबे समय से विवाद चल रहा था. मृतका हमेशा आरोपी पति के चरित्र पर शक किया करती थी. आरोपी ने बताया कि गहने गिरवी रख कर गाड़ी खरीदी थी. इस के अलावा आरोपी अपनी पत्नी की राजनीतिक बैठकों और नौकरी करने से नाराज था.

हत्या करने के बाद आरोपी पुलिस स्टेशन पहुंचा और पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. इस के बाद पुलिस तुंरत घटना स्थल पर पहुंची तो शव को देख हैरान थी. देखा कि शालिनी खून से लथपथ पड़ी हुई थी. उस के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. पुलिस के द्वारा अब विस्तार से जांच करने के लिए एक टीम गठित कर दी गई है. Kerala Crime News

Crime Story : 27 साल बाद बदले की आग में 5 हत्याएं

बचपन में जिस विक्की ने अपने मांबाप का खून होते हुए अपनी आंखों से देखा था, उसे वह चाह कर भी भुला नहीं पाया था. उस के अंदर जल रही बदले की आग 27 साल बाद जब ज्वाला बनी तो उस में 5 लोग भस्म हो गए. आखिर कौन थे वो लोग?

इस बार दीपावली के पहले 33 वर्षीय विशाल उर्फ विक्की गुप्ता अहमदाबाद से घर आया और अपनी दादी शारदा देवी से बोला, ”दादी, मैं दीवाली के दिन मम्मीपापा के हत्यारे को जिंदा नहीं छोड़ूंगा. उस दिन दीवाली के पटाखों के शोर में किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’

अपने पोते के मुंह से यह बात सुनते ही शारदा देवी चिंता में पड़ गईं. उन्होंने विक्की को पास बुलाया और उस के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे समझाते हुए बोलीं, ”देख विक्की, जो बीत गया, उसे भूल जा. वैसे ही मेरे पास बस यही एक बेटा राजेंद्र बचा है. बेटा, इस तरह का खयाल मन से निकाल दे, खूनखराबा करने से आखिर क्या हासिल होगा.’’

”दादी, आखिर मैं कैसे भूल जाऊं कि 27 साल पहले राजेंद्र ताऊ ने मेरे मम्मीपापा को किस तरह मेरे सामने गोलियों से भून दिया था और तो और, जेल से आने के बाद दादाजी को मरवा डाला था.’’ विक्की आवेश में आते हुए बोला.

”मुझे देख ले बेटा, तेरे दादाजी की मौत का गम सह कर भी मैं ने राजेंद्र को माफ कर दिया है. आखिर इतना बड़ा कारोबार संभालता कौन? दीवाली खुशियों का त्यौहार है, इसे मातम में मत बदल देना.’’ शारदा देवी उसे पुचकारते हुए बोलीं.

”आखिर हम कब तक ताऊ के टुकड़ों पर पलेंगे, हमारा भी तो हक है इस प्रौपर्टी पर. हम बेगानों की तरह इस घर में कब तक रहेंगे?’’ विक्की ने दादी से कहा.

”विक्की बेटा, थोड़ा धीरज रख, मैं तुझे प्रौपर्टी का हिस्सा भी दिला दूंगी. मगर कोई ऐसा कदम मत उठाना कि मुझे इस बुढ़ापे में बुरे दिन देखने पड़ें.’’ शारदा देवी के समझाने के बाद विक्की चला गया.

वाराणसी के भदैनी इलाके में पावर हाउस के सामने की गली में 56 साल के शराब कारोबारी राजेंद्र गुप्ता का 5 मंजिला मकान है. मकान के अगले हिस्से में पहले, दूसरे और तीसरे तल पर राजेंद्र का एकएक फ्लैट है, जबकि अन्य फ्लैट और उस से सटे टिनशेड में 40 किराएदार रहते हैं. राजेंद्र गुप्ता के साथ घर में 80 साल की मां शारदा देवी के अलावा उस की पत्नी नीतू, 24 साल का बेटा नवनेंद्र व 15 साल का सुबेंद्र और 17 साल की बेटी गौरांगी रहते थे.

विक्की राजेंद्र के भाई कृष्णा गुप्ता का बेटा था, जो तमिलनाडु के वेल्लोर से एमसीए करने के बाद अहमदाबाद में सौफ्टवेयर डेवलेपर था. अक्तूबर महीने के आखिरी हफ्ते में अपने घर वाराणसी आया हुआ था. विक्की का एक छोटा भाई प्रशांत उर्फ जुगनू और एक बहन अनुप्रिया है, जिस की शादी हो चुकी है.

उस दिन 5 नवंबर, 2024 की सुबह 11 बजे घर में काम करने वाली नौकरानी रीता जैसे ही फ्लैट में घुसी तो अम्मा ने ऊपर की मंजिल से आवाज दे कर पूछा, ”क्यों रीता, खाना बनाने वाली रेनू आई है कि नहीं?’’

”अभी तक तो नहीं आई अम्मा.’’ रीता ने नीचे से चिल्ला कर कहा.

”देख तो जरा नीतू क्या अभी तक सो कर नहीं उठी, कोई आवाज नहीं आ रही.’’ अम्मा ने पूछा.

”अम्मा, अभी दरवाजा लगा हुआ है. हो सकता है बाहर गई हों. फिर भी मैं देख कर बताती हूं.’’ रीता ने कहा.

इतना कह कर रीता ने झाड़ू उठाई और सफाई करते हुए नीतू भाभी के कमरे तक पहुंची. रीता ने प्रथम तल स्थित फ्लैट पर पहुंच कर दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई. थोड़ा इंतजार के बाद रीता ने दरवाजे पर धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर रीता ने जो दृश्य देखा तो उस की चीख निकल गई. कमरे में नीतू फर्श पर खून से लथपथ निढाल पड़ी थी. रीता चिल्लाती हुई दूसरी मंजिल की तरफ गई, जहां नीतू के बड़े बेटे नवनेंद्र का कमरा था. उस ने बाहर से ही आवाज दे कर पुकारा, ”बाबू भैया, बाबू भैया, नीचे जा कर तो देखो, मम्मी को क्या हुआ है.’’

कोई उत्तर नहीं मिलने पर उस ने अंदर जा कर देखा तो वहां एक कमरे में नवनेंद्र फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था और गौरांगी एक कोने में मृत पड़ी थी. तो सुबेंद्र का शव बाथरूम में मिला. रीता फ्लैट के नीचे आई और आसपास के लोगों को उस ने घटना की जानकारी दी. आसपास रहने वाले लोगों ने घटना की सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने इस वारदात की मौके पर पहुंच कर जांच शुरू की. सभी के सिर और सीने में एकएक गोली मारी गई थी. जबकि इतनी बड़ी वारदात के बावजूद हैरानी की बात यह थी कि घर का मुखिया राजेंद्र गुप्ता गायब था.

पुलिस जिसे कातिल समझ रही थी, उस का भी हो गया मर्डर

पूछताछ में पता चला कि राजेंद्र गुप्ता कुछ समय से पत्नी से अनबन के चलते परिवार से अलग रह रहा था. लोगों के साथ पुलिस को लगा कि शायद इन चारों कत्ल के पीछे राजेंद्र गुप्ता का ही हाथ है, जिस ने किसी वजह से अपने पूरे परिवार की जान ले ली और खुद फरार हो गया. आखिरी नतीजे पर पहुंचने से पहले पुलिस के लिए इस बात की तस्दीक जरूरी थी. जब पुलिस ने राजेंद्र गुप्ता के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रेस की तो फोन की लोकेशन मौकाएवारदात से दूर रोहनिया पुलिस थाना के मीरापुर-रामपुर गांव में मिल रही थी.

पुलिस यह सोच कर हैरान थी कि जिस के पूरे परिवार का कत्ल हो गया, वह शहर से दूर एक गांव में आखिर क्या कर रहा है? पुलिस की एक टीम फौरन मीरापुर-रामपुर गांव के लिए रवाना हुई. मोबाइल की लोकेशन के मुताबिक टीम एक अंडर कंस्ट्रक्शन मकान में पहुंची. यहां पुलिस को जो कुछ मिला, वो और भी हैरान करने वाला था. इस मकान के अंदर बिस्तर पर राजेंद्र गुप्ता की लाश पड़ी थी. ठीक अपने परिवार के बाकी लोगों की तरह उस के भी सिर और सीने में एकएक गोली लगी थी.

इस वारदात में एक बात परिवार के बाकी लोगों से अलग थी, वो थी राजेंद्र गुप्ता की लाश का बिलकुल बिना कपड़ों के होना. राजेंद्र गुप्ता की इस हाल में मिली लाश ने इस केस को मानो अचानक से पलट दिया. क्योंकि अब तक पुलिस यह मान कर चल रही थी कि राजेंद्र गुप्ता ने ही अपने पूरे परिवार की हत्या की होगी. कुछ लोग यह भी मान रहे थे कि हत्या करने के बाद उस ने खुद को भी गोली मार कर जान दे दी होगी, लेकिन वहां जिस तरह से उस के सिर और सीने में एकएक गोली लगी थी, उस से साफ था कि राजेंद्र गुप्ता ने कम से कम खुदकुशी तो नहीं की है. क्योंकि खुदकुशी करने वाला आदमी अपने सिर और सीने में एकएक कर 2 गोलियां नहीं मार सकता. और फिर जिस हथियार से खुद को गोली मारी, वह भी वहीं होना चाहिए था.

पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि आखिर कातिल कौन है? पुलिस ने घटनास्थल से मिले खोखे के आधार पर यह दावा किया कि हत्या में .32 बोर की पिस्टल का इस्तेमाल किया गया था. उत्तर प्रदेश के शहर वाराणसी के भेलूपुर थाना इलाके में हुई इस घटना से पूरे इलाके में दहशत फैल गई. काशी जोन के डीसीपी गौरव बांसवाल के निर्देश पर पुलिस ने सभी लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, राजेंद्र गुप्ता को 3 गोलियां मारी गई थीं, 2 उस के सिर पर और एक सीने पर. उस के बड़े बेटे नवनेंद्र को 4 गोलियां मारी गई थीं, जिन में 2 सिर पर और 2 सीने पर थीं.

नीतू गुप्ता को भी 4 गोलियां मारी गईं, जबकि बेटी गौरांगी और छोटे बेटे सुबेंद्र को 2-2 गोलियां मारी गईं. रिपोर्ट के अनुसार, एक ही प्रकार की पिस्टल से गोली मारी गई थी, इस से पता चलता है कि यह सुनियोजित हत्याएं थीं. 6 नवंबर को सभी 5 शवों का पोस्टमार्टम करवाने के बाद पुलिस की मौजूदगी में अंतिम संस्कार करवाया गया. जब घर से एक साथ 5 अर्थियां उठीं तो देखने वालों की आंखें नम हो गईं. वाराणसी में पिता, पत्नी और 3 बच्चों के शव हरिश्चंद्र घाट पर जैसे ही पहुंचे, वैसे ही श्मशान घाट पर लोगों का जमावड़ा लग गया. हर कोई एक साथ परिवार के सभी सदस्यों की एक साथ जलती चिताओं को देख हैरान था.

वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर भतीजे प्रशांत उर्फ जुगनू ने अपने ताऊ राजेंद्र गुप्ता, ताई नीतू, चचेरी बहन गौरांगी और चचेरे भाइयों सुबेंद्र के साथ नवनेंद्र के शवों का अंतिम संस्कार करते हुए मुखाग्नि दी. अंतिम संस्कार के बाद भतीजे जुगनू को पुलिस ने हिरासत में रखा. अंतिम संस्कार के दौरान हरिश्चंद्र घाट पर राजेंद्र गुप्ता की मां शारदा भी मौजूद रहीं और नम आंखों से अपने परिवार के सदस्यों की जलती चिताओं को देर तक निहारती रहीं.

वाराणसी पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ी और अब पुलिस ने परिवार में जिंदा बची सब से बुजुर्ग महिला राजेंद्र गुप्ता की मां शारदा देवी से पूछताछ की. शारदा देवी ने इस कत्ल को ले कर जो कहानी सुनाई, उस ने मामले को एक और ही नया मोड़ दे दिया. शारदा देवी ने शक जताया कि इस वारदात के पीछे उन का पोता और राजेंद्र का भतीजा विशाल उर्फ विक्की गुप्ता हो सकता है. असल में विक्की पहले भी राजेंद्र गुप्ता के पूरे परिवार के कत्ल की बात कह चुका था और विक्की की अपने ही ताऊ राजेंद्र गुप्ता से पुरानी दुश्मनी भी थी.

राजेंद्र ने क्यों किया था छोटे भाई व भाभी का मर्डर

फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ में नवाजुद्दीन सिद्ïदीकी का फैजल खान वाला रोल आज भी याद है. उस के डायलौग की डिलीवरी इतनी परफेक्ट थी कि वह फिल्म दर्शकों पर जादू छोड़ गई थी. विशाल गुप्ता उर्फ विक्की ने भी जब फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ देखी और नवाजुद्ïदीन सिद्ïदीकी द्वारा बोला गया डायलौग ‘बाप का, दादा का, भाई का, सब का बदला लेगा रे तेरा फैजल’ सुना तो इस डायलौग ने किसी चिंगारी की तरह सीने में पड़ी सुस्त राख में दबी बदले की आग को सुलगा दिया.

उस के मन में दबी बदले की आग फिर से ज्वाला बनने को बेताब होने लगी. आखिर उसे अपने मम्मीपापा के कत्ल का बदला जो लेना था. 27 साल पहले 1997 में विक्की केवल 5 साल का मासूम बच्चा था, लेकिन उसे याद है कि किस तरह उस के पापा कृष्णा गुप्ता और मम्मी बबीता का बेरहमी से मर्डर कर दिया गया था. मर्डर करने वाला कोई गैर नहीं, बल्कि विक्की का सगा ताऊ राजेंद्र गुप्ता था. असल में वाराणसी के भदैनी इलाके में रहने वाले राजेंद्र गुप्ता के पिता लक्ष्मी नारायण गुप्ता बनारस के बड़े कारोबारी थे. उन का प्रौपर्टी और शराब का लंबाचौड़ा काम था.

लक्ष्मी नारायण के 2 बेटे राजेंद्र गुप्ता और कृष्णा गुप्ता थे. लेकिन लक्ष्मी नारायण अपने बड़े बेटे राजेंद्र गुप्ता के लापरवाह रवैए को ले कर हमेशा नाखुश रहते थे, क्योंकि राजेंद्र कारोबार पर ध्यान देने के बजाय अय्याशी की राह पर चल पड़ा था. इस वजह से उन्होंने अपने कारोबार का ज्यादातर हिस्सा अपने छोटे बेटे कृष्णा गुप्ता के हवाले कर दिया था. इस बात को ले कर राजेंद्र का अपने पिता से झगड़ा भी होता था. इस का नतीजा यह हुआ कि गुस्से में आ कर राजेंद्र ने 1997 के नवंबर महीने में एक रोज अपने छोटे भाई कृष्णा गुप्ता और उस की पत्नी की सोते समय गोली मार कर हत्या कर दी थी.

इस घटना के बाद राजेंद्र को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, लेकिन इस वारदात से अपने बड़े बेटे राजेंद्र पर लक्ष्मी नारायण गुप्ता का गुस्सा और बढ़ गया. मांबाप का साया छिन जाने के बाद लक्ष्मी नारायण ने कृष्णा के दोनों बेटों विक्की और जुगनू को काम सिखाना शुरू कर दिया.

उधर, जेल में बंद राजेंद्र अब भी अपने पिता के रवैए से गुस्से में था. करीब 6 साल जेल में गुजारने के बाद साल 2003 में उसे जैसे ही पैरोल मिली, बाहर आ कर उस ने एक और बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया. असल में राजेंद्र अपने पिता से प्रौपर्टी और कारोबार का हिस्सा मांग रहा था, लेकिन लक्ष्मी नारायण इस के लिए तैयार नहीं थे.

राजेंद्र ने क्यों कराया पिता का मर्डर

अचानक एक रोज वाराणसी शहर के आचार्य रामचंद्र शुक्ल चौराहे के पास गुमनाम कातिलों ने लक्ष्मी नारायण गुप्ता और उन के पर्सनल सिक्योरिटी गार्ड की गोली मार कर हत्या कर दी. इस मामले में पुलिस के शक की सूई पहले ही दिन से बेटे राजेंद्र गुप्ता पर ही थी. ऐसे में जब जांच आगे बढ़ी तो पुलिस को पता चला कि राजेंद्र गुप्ता ने ही सुपारी दे कर अपने पिता और उन के सिक्योरिटी गार्ड का कत्ल करवा दिया.

राजेंद्र की पहली शादी 1995 में हुई थी, पहली पत्नी से उसे एक बेटा भी हुआ था. राजेंद्र के जिद्ïदी स्वभाव और हिंसक होने से पहली पत्नी बुरी तरह डर गई. उसे हर पल यही डर सताता कि जो शख्स अपने सगे भाई का मर्डर कर सकता है, वह उसे भी नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए राजेंद्र के जेल जाते ही पहली पत्नी अपने मायके पश्चिम बंगाल के आसनसोल चली गई. इस के बाद साल 2003 में जब राजेंद्र जेल से बाहर आया तो उस ने नीतू से दूसरी शादी की, जिस से उसे 3 बच्चे नवनेंद्र, सुबेंद्र और गौरांगी हुए. इन बच्चों के सिर पर तो खैर मांबाप का साया था, लेकिन राजेंद्र की वजह से ही कृष्णा के बच्चे कई साल अनाथ की तरह रहे.

कहने को तो विक्की, जुगनू और उन की बहन अनुप्रिया को राजेंद्र ने ही पाला था, लेकिन परवरिश के मामले में भी उस का परिवार अपने भतीजों के साथ सौतेला व्यवहार करता था. राजेंद्र हर समय अपने भतीजों के साथ गालीगलौज करता था और यह धमकी भी देता था कि उन के मम्मीपापा की तरह उन का भी कत्ल कर देगा. जैसेजैसे राजेंद्र के भतीजे बड़े हो रहे थे, वे गुस्से और बदले की आग में जल रहे थे. और अब जब ये वारदात हुई तो शक की सूई राजेंद्र के बड़े भतीजे विक्की पर ही जा कर टिक गई थी. क्योंकि पुलिस को उस के खिलाफ कई सबूत भी मिल चुके थे और वारदात के बाद से ही वह फरार भी था. राजेंद्र की बुजुर्ग मां शारदा देवी ने भी पुलिस को बताया था कि विक्की अपने चाचा से बदला लेना चाहता था.

विक्की और उस का भाई जुगनू दोनों दिल्ली एनसीआर में ही रह कर अपना काम करते थे. इस वारदात के बाद जुगनू तो बनारस पहुंच गया, लेकिन विक्की का कोई पता नहीं चला. इस बीच जब पुलिस ने विक्की के बारे में जानकारी जुटाई तो ये पता चला कि उस ने अपने करीबियों से कई बार राजेंद्र गुप्ता और उस के परिवार को जान से मार डालने की बात कही थी. पुलिस ने इस वारदात के बाद विक्की के बहनोई को नोएडा से हिरासत में लिया, जिस ने पूछताछ में इस बात पर मुहर लगाई. बहनोई ने बताया कि विक्की ने उस से कहा था कि इस बार दीवाली में वो अपने ताऊ और उस के परिवार को मार डालेगा.

पुलिस को मामले की छानबीन के दौरान मिली एक पर्सनल डायरी ने इस मौत की गुत्थी को और भी उलझा दिया. यह डायरी वारदात में मारे गए शख्स राजेंद्र गुप्ता की थी. डायरी में राजेंद्र ने किसी से उस की लड़की के साथ शादी करने की इच्छा जताई थी और खुद को एक काबिल, कर्मठ, सच्चा और संस्कारी लड़का बता रहा था.

डायरी से उजागर हुए राज

डायरी में लिखी लाइनों के साथ एक सवाल यह भी खड़ा हो गया कि क्या राजेंद्र गुप्ता तीसरी शादी करना चाहता था? क्योंकि डायरी में ये बातें जिन पन्नों पर लिखी थीं, उस के साथ वाले दूसरे पन्ने पर 6 नवंबर, 2016 की तारीख है.

जेल से बाहर आने के बाद राजेंद्र ने दूसरा प्रेम विवाह अपने ही घर के सामने रहने वाली ब्राह्मण परिवार की नीतू से किया था. हत्याकांड के बाद अब राजेंद्र गुप्ता का खुद लिखा हुआ लगभग ढाई पन्ने का हैंडनोट मिला, जो नवंबर 2016 का था. इस हैंडनोट में राजेंद्र किसी के सामने अपनी सफाई पेश कर रहा था कि वह किस तरह का निहायत सीधा और सरल इंसान है. साथ ही उस का पहली पत्नी से तलाक हो चुका है. इतना ही नहीं, डायरी में तमाम लोगों के नाम, नंबर और बनाई गई कुंडलियां पेन से कट की गई थीं.

राजेंद्र गुप्ता वर्ष 2016 में तीसरी शादी करने की फिराक में था. अधेड़ हो चुका राजेंद्र कहीं न कहीं अपने दिल में तीसरी शादी का सपना बुन रहा था. हैंडनोट में वह कथित तौर पर लड़की के पिता को अंकल कह कर संबोधित कर रहा था. ऐसे में पुलिस ने आशंका जताई कि कहीं यही बात तो उस की हत्या की वजह नहीं बन गई? शायद कातिल नहीं चाहता था कि राजेंद्र की अकूत संपत्ति का कोई नया वारिस आए या उस की जिदंगी में तीसरी औरत की एंट्री हो.

राजेंद्र के हैंडनोट में लिखा मिला, ‘नमस्ते अंकल, सौ बात की एक बात मैं आप से कहना चाहता हूं कि मुझ जैसा काबिल, कर्मठ, सच्चा, संस्कारी, चरित्रवान कुल मिला कर सर्वगुण संपन्न इंसान आप को ढूंढने से भी शायद न मिले. मैं अपने अंदर हमेशा कमी ढूंढता रहता हूं, लेकिन आज तक मुझे अपने अंदर कभी कोई कमी नहीं मिली. फोन पर थोड़ी देर बात कर के कोई भी, किसी को कितना समझ सकता है, फ्री माइंड हो कर आप से ठीक से बात नहीं कर पाया. घबराहट में शायद गलत बोल गया.’

हैंडनोट में राजेंद्र ने आगे लिखा था, ‘मेरा तलाक फाइनल हो चुका है, जो एकदम सत्य है. मेरी पत्नी ने अब दूसरी शादी कर ली है. मेरी ससुराल बहुत संपन्न है. बच्चों की पढ़ाई का मुझे कोई खर्च नहीं देना, सब हो चुका. हालांकि, बच्चों के लगाव की वजह से कुछ भेज देता हूं, इसलिए कि बच्चे नफरत न करें. बच्चे अपनी मां के साथ ही रहते हैं. मैं अकेला हूं. ‘अब आप लोग जो कहेंगे वो करूंगा. जीवनसाथी से कई फोन काल आते रहते हैं, लेकिन मुझे कुंडली मिला कर ही शादी करनी है. इसलिए सब को सौरी कहना पड़ रहा है. आप मुझे गलत मत समझिए. आप की बेटी से कुंडली मिला, तभी मैं ने इंटरेस्ट भेजा, नहीं मिलता तो नहीं भेजता.

‘कुंडली को गुरुजी को भी दिखाया, उन्होंने ओके बोल दिया. यदि आप की बेटी की शादी होती है तो मैं विश्वास दिलाता हूं कि उस को लाइफ में कोई कष्ट नहीं होने दूंगा. दुनिया की सब से बेहतरीन लाइफ उसे मिलेगी. आप एक राजा के घर शादी कर रहे हैं. मैं जानता हूं कि आप एक ऐसे पिता हैं, जिसे अपनी बेटी के भविष्य की चिंता है.’

विक्की को हर महीने 10 हजार रुपए क्यों भेजती थी ताई

विक्की भले ही अपने ताऊ से नफरत करता था और उन से बदला भी लेना चाहता था, मगर उस की ताई नीतू उस की काफी चिंता करती थी. विक्की की हर जरूरत का ध्यान नीतू रखती थी. विशाल का बैंक अकाउंट खंगालने पर चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि नीतू गुप्ता यानी विशाल की ताई (राजेंद्र गुप्ता की पत्नी) उस के खर्च के लिए हर महीने 10 हजार रुपए भेजती थी.

सालों बाद इस बार दीवाली पर जब विक्की घर आया तो यम द्वितीया पर नीतू की बेटी गौरांगी ने विशाल की लंबी उम्र की कामना करते हुए भाई दूज पर टीका लगाया था और काफी वक्त एक साथ बिताया था. इन सब के बावजूद भी पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर विशाल के हाथ अपनों पर गोली दागने से पहले कांपे क्यों नहीं?

राजेंद्र गुप्ता ने विक्की की बहन और अपनी भतीजी अनुप्रिया की शादी कपड़ा फैक्ट्री मालिक से करने के लिए झूठ बोला था. पुलिस को यह बात अनुप्रिया के पति ने बताई, जब उन से सवाल किया कि 4 हत्याओं के आरोपी के घर उस ने शादी कैसे की?

जिस पर अनुप्रिया के पति ने बताया कि राजेंद्र ने उन से झूठ बोलते हुए कहा था, ”मेरे छोटे भाई कृष्णा और उन की पत्नी बबीता की रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई. इसलिए भतीजी के मम्मीपापा मैं और मेरी पत्नी नीतू ही हैं. अनुप्रिया भी मुझ से यह बात छिपाए रही. मुझे सच्चाई की जानकारी 5 हत्याओं से संबंधित खबर मीडिया में पढऩे के बाद हो पाई.’’

राजेंद्र गुप्ता से विक्की को इतनी नफरत थी कि वह बहन अनुप्रिया की शादी में नहीं आया था. जब उसे अनुप्रिया ने फोन लगा कर कहा था कि विक्की मेरी शादी में आना है तो उस ने फोन कर के बोला था, ”दीदी तुम शादी कर लो, मेरा आना ठीक नहीं रहेगा.’’

वह महीने-2 महीने में एक बार अनुप्रिया को जरूर फोन कर के उस का हालचाल पूछ लेता था. अपनी बहन पर वह बहुत प्यार दर्शाता था. इस बार भी दीवाली की मिठाई भी उस ने औनलाइन भेजी थी.

 

दादी का लाडला था विक्की

27 साल पुरानी चली आ रही इस रंजिश की असली वजह जायदाद है. इस केस में कई चौंका देने वाले खुलासे भी हुए हैं. 5 लोगों की हत्या करने का आरोपी विक्की अपनी दादी शारदा देवी से काफी क्लोज था. इस वारदात से पहले वह उन के पास घर पर आया था. दादी ने उस के लिए खाने में रोटियां भी बनवाई थीं. इस के लिए उन्होंने राजेंद्र गुप्ता की दूसरी पत्नी नीतू से कहा था कि वो नौकरानी से 3 रोटी अधिक बनवा ले.

डीसीपी गौरव बंसवाल और उन की टीम को इस हत्याकांड में पहले यह शक हुआ था कि मर्डर की इस घटना में कई शूटर शामिल होंगे, लेकिन गहराई से हुई जांच और पूछताछ में दादी शारदा देवी ने स्पष्ट बताया कि विक्की ने मंशा जाहिर की थी कि वह पूरे परिवार को खत्म कर देगा. विक्की ने 22 अक्तूबर से ही अपना मोबाइल बंद कर लिया. उस की कोई लोकेशन भी नहीं मिली. वह बगैर फोन के ही दीवाली के समय आ कर घर में रुका भी था. डीसीपी ने आगे बताया कि वारदात वाली रात में राजेंद्र गुप्ता को सोते हालत में ही उन के रोहनिया स्थित निर्माणाधीन मकान में सिर में 2 गोलियां मारी गई थीं. उस के बाद विक्की ने भदैनी के घर पर सुबह 5-6 बजे के बीच में आ कर 4 मर्डर किए थे.

विक्की घर के हर कोने से वाकिफ था. पहले उस ने पहली मंजिल पर सो रही नीतू को गोली मारी फिर वह सेकेंड फ्लोर पर गया, जहां गौरांगी और छोटू सो रहे थे. उस ने उन दोनों को भी गोली मार दी. उन की मच्छरदानी में भी गोलियों से छेद हो गए. गौरांगी का शव फर्श पर मिला था. ऐसा लगता है कि उस ने संघर्ष किया था, जबकि दूसरे बड़े बेटे का शव बाथरूम में मिला था. ऐसे में कहा जा सकता है कि दोनों ने संघर्ष कर के अपनी जान बचाने की पूरी कोशिश की थी.

विक्की की गतिविधियों को खंगालने पर पता चला है कि अहमदाबाद में उस ने 22-24 नवंबर के बीच अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था. इस के बाद वह बनारस आया था और यहीं पर भाईदूज तक रुका था.

कथा लिखने तक पुलिस को आरोपी विशाल विक्की के बारे में कहीं से कोई सुराग नहीं मिल सका था. पुलिस उस की तलाश में जुटी थी.

—कथा मीडिया रिपोर्ट पर आधारित