प्रेमी ने प्रेमिका को बाहों में भर कर घोंटा गला

शादीशुदा होने के बावजूद साथ काम करने वाली प्रभावती पर तेजभान का दिल आया तो कोशिश कर के उस ने उस से संबंध बना लिए. फिर इस संबंध का भी वैसा ही अंत हुआ, जैसा अकसर होता आया हैप्रभावती को गौर से देखते हुए प्लाईवुड फैक्ट्री के मैनेजर ने कहा, ‘‘इस उम्र में तुम नौकरी करोगी, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? मुझे लगता है तुम 15-16 साल की होओगी? यह उम्र तो खेलनेखाने की होती है.’’

‘‘साहब, आप मेरी उम्र पर मत जाइए. मुझे काम दे दीजिए. आप मुझे जो भी काम देंगे, मैं मेहनत से करूंगी. मेरे परिवार की हालत ठीक नहीं है. भाईबहनों की शादी हो गई है. बहनें ससुराल चली गई हैं तो भाई अपनीअपनी पत्नियों को ले कर अलग हो गए हैं. मांबाप की देखभाल करने वाला कोई नहीं है. पिता बीमार रहते हैं. इसलिए मैं नौकरी कर के उन की देखभाल करना चाहती हूं.’’ प्रभावती ने कहा. रायबरेली की मिल एरिया में आसपास के गांवों से तमाम लोग काम करने आते थे. प्लाईवुड फैक्ट्री में भी आसपास के गांवों के तमाम लोग नौकरी करते थे. लेकिन उतनी छोटी लड़की कभी उस फैक्ट्री में नौकरी मांगने नहीं आई थी.

प्रभावती ने मैनेजर से जिस तरह अपनी बात कही थी, उस ने सोच लिया कि इस लड़की को वह अपने यहां नौकरी जरूर देगा. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम कल समय पर जाना. और हां, मेहनत से काम करना. मैं तुम्हें दूसरों से ज्यादा वेतन दूंगा.’’ ‘‘ठीक है साहब, आप की बहुतबहुत मेहरबानी, जो आप ने मेरी मजबूरी समझ कर अपने यहां नौकरी दे दी. मैं कभी कोई ऐसा काम नहीं करूंगी, जिस से आप को कुछ कहने का मौका मिले.’’ कह कर प्रभावती चली गई. अगले दिन से प्रभावती काम पर जाने लगी. उस के काम को देख कर मैनेजर ने उस का वेतन 3 हजार रुपए तय किया. 15 साल की उम्र में ही मातापिता की जिम्मेदारी उठाने के लिए प्रभावती ने यह नौकरी कर ली थी.

उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के शहर से कस्बातहसील लालगंज को जाने वाली मुख्य सड़क पर शहर से 10 किलोमीटर की दूरी पर बसा है कस्बा दरीबा. कभी यह गांव हुआ करता था. लेकिन रायबरेली से कानपुर जाने के लिए सड़क बनी तो इस गांव ने खूब तरक्की की. लोगों को तरहतरह के रोजगार मिल गए. सड़क के किनारे तमाम दुकानें खुल गईं. लेकिन जो परिवार सड़क के किनारे नहीं पाए, उन की हालत में खास सुधार नहीं हुआ. ऐसा ही एक परिवार महादेव का भी था. उस के परिवार में पत्नी रामदेई के अलावा 2 बेटे फूलचंद, रामसेवक तथा 4 बेटियां, कुसुम, लक्ष्मी, सविता और प्रभावती थीं. प्रभावती सब से छोटी थी. छोटी होने की वजह से परिवार में वह सब की लाडली थी. महादेव की 3 बेटियों की शादी हो गई तो वे ससुराल चली गईं. बेटे भी शादी के बाद अलग हो गए

अंत में महादेव और रामदेई के साथ रह गई उन की छोटी बेटी प्रभावती. भाइयों ने मांबाप के साथ जो किया था, उस से वह काफी दुखी और परेशान रहती थी. यही वजह थी कि उस ने उतनी कम उम्र में ही नौकरी कर ली थी. प्रभावती को जब काम के बदले फैक्ट्री से पहला वेतन मिला तो उस ने पूरा का पूरा ला कर पिता के हाथों पर रख दिया. बेटी के इस कार्य से महादेव इतना खुश हुआ कि उस की आंखों में आंसू भर आए. उस ने कहा, ‘‘मेरी सभी औलादों में तुम्हीं सब से समझदार हो. जहां बुढ़ापे में मेरे बेटे मुझे छोड़ कर चले गए, वहीं बेटी हो कर तुम मेरा सहारा बन गईं. तुम जुगजुग जियो, सभी को तुम्हारी जैसी औलाद मिले.’’

‘‘बापू, आप केवल अपनी तबीयत की चिंता कीजिए, बाकी मैं सब संभाल लूंगी. मुझे बढि़या नौकरी मिल गई है, इसलिए अब आप को चिंता करने की जरूरत नहीं है.’’ प्रभावती ने कहा. बदलते समय में आज लड़कियां लड़कों से ज्यादा समझदार हो गई हैं. यही वजह है, वे बेटों से ज्यादा मांबाप की फिक्र करती हैं. प्रभावती के इस काम से महादेव और उन की पत्नी रामदेई ही खुश नहीं थे, बल्कि गांव के अन्य लोग भी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे. उस की मिसालें दी जाने लगी थींसमय बीतता रहा और प्रभावती अपनी जिम्मेदारी निभाती रही. प्रभावती जिस फैक्ट्री में नौकरी करती थी, उसी में बंगाल का रहने वाला एक कारीगर था मनोज बंगाली. वह प्रभावती की हर तरह से मदद करता था, इसलिए प्रभावती उस से काफी प्रभावित थी.

मनोज उस से उम्र में थोड़ा बड़ा जरूर था, लेकिन धरीरेधीरे प्रभावती उस के नजदीक आने लगी थी. जब यह बात फैक्ट्री में फैली तो एक दिन प्रभावती ने कहा, ‘‘मनोज, हमारे संबंधों को ले कर लोग तरहतरह की बातें करने लगे हैं. यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

 ‘‘लोग क्या कहते हैं, इस की परवाह करने की जरूरत नहीं है. तुम मुझे प्यार करती हो और मैं तुम्हें प्यार करता हूं. बस यही जानने की जरूरत है.’’ इतना कह कर मनोज ने प्रभावती को सीने से लगा लिया.

 ‘‘मनोज, तुम मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लेते. जब भी कुछ कहती हूं, इधरउधर की बातें कर के मेरी बातों को हवा में उड़ा देते हो. अगर तुम ने जल्दी कोई फैसला नहीं लिया तो मैं तुम से मिलनाजुलना बंद कर दूंगी.’’ प्रभावती ने धमकी दी तो मनोज ने कहा, ‘‘अच्छा, तुम चाहती क्या हो?’’

 ‘‘हम दोनों को ले कर फैक्ट्री में चर्चा हो रही है तो एक दिन बात हमारे गांव और फिर घर तक पहुंच जाएगी. जब इस बात की जानकारी मेरे मातापिता को होगी तो वे किसी को क्या जवाब देंगे. मैं उन की बहुत इज्जत करती हूं, इसलिए मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती, जिस से उन के मानसम्मान को ठेस लगे. उन्हें पता चलने से पहले हमें शादी कर लेनी चाहिए. उस के बाद हम चल कर उन्हें सारी बात बता देंगे.’’ प्रभावती ने कहा.

‘‘शादी करना आसान तो नहीं है, फिर भी मैं वह सब करने को तैयार हूं, जो तुम चाहती हो. बताओ मुझे क्या करना है?’’ मनोज ने पूछा.

 ‘‘मैं तुम से शादी करना चाहती हूं. मेरे मातापिता मुझे बहुत प्यार करते हैं. वह मेरी किसी भी बात का बुरा नहीं मानेंगे. मैं चाहती हूं कि हम किसी दिन शहर के मंशा देवी मंदिर में चल कर शादी कर लें. इस के बाद मैं अपने घर वालों को बता दूंगी. फिर मैं तुम्हारी हो जाऊंगी, केवल तुम्हारी.’’ प्रभावती ने कहा. प्रभावती की ये बातें सुन कर मनोज की खुशियां दोगुनी हो गईं. उस ने जब से प्रभावती को देखा था, तभी से उसे पाने के सपने देखने लगा था. लेकिन प्रभावती उस के लिए शराब के उस प्याले की तरह थी, जो केवल दिखाई तो देता था, लेकिन उस पर वह होंठ नहीं लगा पा रहा था. प्रभावती जो अभी कली थी, वह उसे फूल बनाने को बेचैन था.

रायबरेली का मंशा देवी मंदिर रेलवे स्टेशन के पास ही है. करीब 5 साल पहले सितंबर महीने के पहले रविवार को प्रभावती मनोज के साथ वहां गई. दोनों ने मंदिर में मंशा देवी के सामने एकदूसरे को पतिपत्नी मानते हुए जिंदगी भर साथ निभाने का वादा किया. इस के बाद एकदूसरे के गले में फूलों की जयमाल डाल कर दांपत्य बंधन में बंध गए

मंदिर में शादी कर के मनोज प्रभावती को अपने कमरे पर ले गया. मनोज को इसी दिन का बेताबी से इंतजार था. वह प्रभावती के यौवन का सुख पाना चाहता था. अब इस में कोई रुकावट नहीं रह गई थी, क्योंकि प्रभावती ने उसे अपना जीवनसाथी मान लिया था. इसलिए अब उस की हर चीज पर उस का पूरा अधिकार हो गया था. मनोज को प्रभावती किसी परी की तरह लग रही थी. छरहरी काया में उस की बोलती आंखें, मासूम चेहरा किसी को भी बहकने पर मजबूर कर सकता था. प्रभावती में वह सब कुछ था, जो मनोज को दीवाना बना रहा था. मनोज के लिए अब इंतजार करना मुश्किल हो रहा था.

वह प्रभावती को ले कर सुहागरात मनाने के लिए कमरे में पहुंचा. प्रभावती को भी अब उस से कोई शिकायत नहीं थी. मन तो वह पहले ही सौंप चुकी थी, उस दिन तन भी सौंप दिया. इस तरह प्रभावती की विवाहित जीवन की कल्पना साकार हो गई थी. यह बात प्रभावती ने अपने मातापिता को बताई तो उन्होंने बुरा नहीं माना. कुछ दिनों तक रायबरेली में साथ रहने के बाद वह मनोज के साथ उस के घर बंगाल चली गई. मनोज बंगाल के हुगली शहर के रेल बाजार का रहने वाला था. लेकिन मनोज अपने घर जा कर कोलकाता की एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा और वहीं मकान ले कर प्रभावती के साथ रहने लगा. साल भर बाद प्रभावती ने वहीं एक बेटे को जन्म दिया. मनोज नौकरी करता था तो प्रभावती घर और बेटे को संभाल रही थी. दोनों मिलजुल कर आराम से रह रहे थे.

मनोज बेटे और प्रभावती के साथ खुश था. लेकिन वह प्रभावती को अपने घर नहीं ले जा रहा था. प्रभावती कभी ले चलने को कहती तो वह कोई कोई बहाना कर के टाल जाता. कोलकाता में रहते हुए काफी समय हो गया तो प्रभावती को मांबाप की याद आने लगी. एक दिन उस ने मनोज से रायबरेली चलने को कहा तो मनोज ने कहा, ‘‘यहां हमें रायबरेली से ज्यादा वेतन मिल रहा है, इसलिए अब मैं वहां नहीं जाना चाहता. अगर तुम चाहो तो जा कर अपने घर वालों से मिल आओ. वहां से आने के बाद मैं तुम्हें अपने घर ले चलूंगा.’’

मातापिता से मिलने के लिए प्रभावती रायबरेली गई. कुछ दिनों बाद वह मनोज के पास कोलकाता पहुंची तो पता चला कि मनोज तो पहले से ही शादीशुदा है. क्योंकि प्रभावती के रायबरेली जाते ही मनोज अपनी पत्नी सीमा को ले आया था. उस की पत्नी ने उसे घर में घुसने नहीं दिया. उसे धमकाते हुए सीमा ने कहा, ‘‘तुम जैसी औरतें मर्दों को फंसाने में माहिर होती हैं. जवानी के लटकेझटके दिखा कर पैसों के लिए किसी भी मर्द को फांस लेती हैं. अब यहां कभी दिखाई मत देना. अगर यहां फिर आई तो ठीक नहीं होगा.’’ सीमा की बातें सुन कर प्रभावती के पास वापस आने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. उसे जलालत पसंद नहीं थी.

वह एक बार मनोज से मिल कर रिश्ते की सच्चाई के बारे में जानना चाहती थी. लेकिन लाख कोशिश के बाद भी तो मनोज उस के सामने आया और उस ने फोन पर बात की. उस से मिलने के चक्कर में प्रभावती कुछ दिन वहां रुकी रही. लेकिन जब वह उस से मिलने को तैयार नहीं हुआ तो वह परेशान हो कर रायबरेली वापस चली आई. जिस मनोज को उस ने पति मान कर अपना सब कुछ सौंप दिया था, वह बेवफा निकल गया था. प्रभावती का दिल टूट चुका था. वापस आने पर उस की परेशानियां और भी बढ़ गईं. अब मातापिता की जिम्मेदारी के साथसाथ बेटे की भी जिम्मेदारी थी. गुजरबसर के लिए प्रभावती फिर से काम करने लगी. बदनामी के डर से वह प्लाईवुड फैक्ट्री में नहीं गई. थोड़ी दौड़धूप करने पर उसे रायबरेली शहर में दूसरा काम मिल गया था.

जीवन फिर से पटरी पर आने लगा था. शादी के बाद प्रभावती की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार गया था. दूसरी जगह काम करते हुए उस की मुलाकात तेजभान से हुई. तेजभान उसी की जाति का था. प्रभावती रोजाना अपने काम पर साइकिल से रायबरेली आतीजाती थी. कभी कोई परेशानी होती या देर हो जाती तो तेजभान उसे अपनी मोटरसाइकिल से उस के घर पहुंचा देता था. लगातार मिलनेजुलने से दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने लगी. तेजभान के साथ प्रभावती को खुश देख कर उस के मांबाप भी खुश थे. तेजभान रायबरेली के ही डीह गांव का रहने वाला था.

एक दिन प्रभावती को कुछ ज्यादा देर हो गई तो तेजभान ने उस से अपने कमरे पर ही रुक जाने को कहा. थोड़ी नानुकुर के बाद प्रभावती तेजभान के कमरे पर रुक गई. मनोज से संबंध टूटने के बाद शारीरिक सुख से वंचित प्रभावती एकांत में तेजभान का साथ पाते ही पिघलने लगी. उस की शारीरिक सुख की कामना जाग उठी थी. तेजभान तो उस से भी ज्यादा बेचैन था. उम्र में बड़ा होने के बावजूद तेजभान का जिस्म मजबूत और गठा हुआ था. उस की कदकाठी मनोज से काफी मिलतीजुलती थी. वह मनोज जैसा सुंदर तो नहीं दिखता था, लेकिन बातें उसी की तरह प्यारभरी करता था. प्रभावती की सोई कामना को उस ने अंगुलियों से जगाना शुरू किया तो वह उस के करीब गई. इस के बाद दोनों के बीच वह सब हो गया जो पतिपत्नी के बीच होता है.

तेजभान और प्रभावती के बीच रिश्ते काफी प्रगाढ़ हो गए थे. वह प्रभावती के घर तो पहले से ही आताजाता था, लेकिन अब उस के घर रात में रुकने भी लगा था. प्रभावती के मातापिता से भी वह बहुत ही प्यार और सलीके से पेश आता था. इस के चलते वे भी उस पर भरोसा करने लगे थे. तेजभान के पास जो मोटरसाइकिल थी, वह पुरानी हो चुकी थी. वह उसे बेच कर नई मोटरसाइकिल खरीदना चाहता था. लेकिन इस के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. अपने मन की बात उस ने प्रभावती से कही तो उस ने उसे 10 हजार रुपए दे कर नई मोटरसाइकिल खरीदवा दी. तेजभान का प्यार और साथ पा कर वह मनोज को भूलने लगी थी. तेजभान में सब तो ठीक था, लेकिन वह थोड़ा शंकालु स्वभाव का था.

वह प्रभावती को कभी किसी हमउम्र से बातें करते देख लेता तो उसे बहुत बुरा लगता. वह नहीं चाहता था कि प्रभावती किसी दूसरे से बात करे. इसलिए वह हमेशा उसे टोकता रहता था. प्रभावती को ही नहीं, उस के घर वालों को भी पता चल गया था कि तेजभान शादीशुदा है. एक शादीशुदा आदमी के साथ जिंदगी नहीं पार हो सकती थी, इसलिए प्रभावती की बड़ी बहन सविता ने अपनी ससुराल लोहारपुर में उस के लिए एक लड़का देखा. वह उस के साथ प्रभावती की शादी कराना चाहती थी. लड़के को देखने और बातचीत करने के लिए उस ने प्रभावती को अपनी ससुराल बुला लिया

जब इस बात की जानकारी तेजभान को हुई तो वह भी लोहारपुर पहुंच गया. जब उस ने देखा कि वहां एक लड़के के साथ प्रभावती बात कर रही है तो उसे गुस्सा गया. उस ने प्रभावती का हाथ पकड़ कर उस लड़के को 2-4 थप्पड़ लगाते हुए कहा, ‘‘तूने अपनी शकल देखी है जो इस से शादी करेगा.’’ प्रभावती के घर वाले उस की शादी जल्द से जल्द करना चाहते थे. लेकिन तेजभान टांग अड़ा रहा था. वह उस से खुद तो शादी कर नहीं सकता था लेकिन वह उस की शादी किसी ऐसे आदमी से कराना चाहता था, जो शादी के बाद भी उसे प्रभावती से मिलने से रोके. क्योंकि वह प्रभावती को खुद से दूर नहीं जाने देना चाहता था. इसीलिए तेजभान ने अपने एक रिश्तेदार प्रदीप को तैयार किया.

वह रिश्ते में उस का मामा लगता था. तेजभान को पूरा विश्वास था कि प्रदीप से शादी होने के बाद भी उसे प्रभावती से मिलनेजुलने में कोई परेशानी नहीं होगी. प्रदीप उम्र में तेजभान से काफी बड़ा था. प्रभावती का भरोसा जीतने के लिए उस ने उस की एक जीवनबीमा पौलिसी भी करा दी थी. प्रदीप से बात कर के तेजभान ने प्रभावती से कहा, ‘‘अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारी शादी प्रदीप से करा दूं. वह अच्छा आदमी है. खातेपीते घर का भी है.’’ प्रभावती ने तेजभान की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. 2 दिनों बाद तेजभान प्रदीप को साथ ले कर प्रभावती से मिला. तीनों ने साथ खायापिया. प्रदीप चला गया तो तेजभान ने कहा, ‘‘प्रभावती, प्रदीप तुम्हें कैसा लगा? मैं इसी से तुम्हारी कराना चाहता हूं.’’

एक तो प्रदीप शक्लसूरत से ठीक नहीं था, दूसरे उस की उम्र उस से दोगुनी थी. वह शराब भी पीता था, इसलिए प्रभावती ने कहा, ‘‘इस बूढ़े के साथ तुम मेरी शादी कराना चाहते हो?’’

‘‘यह बहुत अच्छा आदमी है. उस से शादी के बाद भी हमें मिलने में कोई परेशानी नहीं होगी. दूसरी जगह शादी करोगी तो हमारा मिलनाजुलना नहीं हो पाएगा.’’

‘‘उस दिन मारपीट कर के तुम ने मेरी शादी तुड़वा दी थी. मैं उस बूढ़े से हरगिज शादी नहीं कर सकती. अब मैं तुम्हीं से शादी करूंगी. तुम्हें ही मुझे अपने घर में रखना पड़ेगा.’’ प्रभावती ने गुस्से में कहा.

प्रभावती अब तेजभान के लिए मुसीबत बन गई. वह उस से पीछा छुड़ाने की कोशिश करने लगा. तब प्रभावती उस से अपने वे पैसे मांगने लगी, जो उस ने उसे मोटरसाइकिल खरीदने के लिए दिए थे. दोनों के बीच टकराव होने लगा. तेजभान के साथ शादी कर के घर बसाने का प्रभावती का सपना तेजभान के लिए गले की हड्डी बन गयाप्रभावती ने कह भी दिया कि जब तक वह शादी नहीं कर लेता, तब तक वह उसे अपने पास फटकने नहीं देगी. वह प्रभावती से शादी तो करना चाहता था, लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि वह पहले से ही शादीशुदा था. उस की पत्नी को प्रभावती और उस के संबंधों के बारे में पता भी चल चुका था.

तेजभान को प्रभावती से पीछा छुड़ाने की कोई राह नहीं सूझी तो उस ने उसे रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद 7 दिसंबर, 2013 की शाम प्रभावती को समझाबुझा कर वह पूरे मौकी मजरा जगदीशपुर चलने के लिए राजी कर लिया. प्रभावती तैयार हो गई तो वह उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर चल पड़ा. परशदेपुर गांव के पास वह नइया नाला पर रुक गया. मोटरसाइकिल सड़क पर खड़ी कर के वह बहाने से प्रभावती को सड़क के नीचे पतावर के जंगल में ले गया. सुनसान जगह पर प्यार करने के बहाने उस ने प्रभावती को बांहों में समेटा और फिर उस का गला घोंट कर मार दिया.

प्रभावती को मार कर उस की लाश उस ने नाले के किनारे पतावर में इस तरह छिपा दिया कि वह सड़गल जाए. इस के बाद उस का मोबाइल फोन और अन्य सामान ले कर वह अपने गांव डीह चला गया. प्रभावती अपने घर नहीं पहुंची तो घर वालों को चिंता हुई. उन्होंने तेजभान को फोन किया तो उस ने कहा कि वह प्रभावती से कई दिनों से नहीं मिला है. उसी दिन प्रभावती के घर जा कर उस ने उस के घर वालों को प्रभावती के बारे में पता करने का आश्वासन दिया. प्रभावती के घर वालों ने पुलिस को सूचना देने की बात कही तो ऐसा करने से उस ने उन्हें रोक दिया. उस का सोचना था कि कुछ दिन बीत जाने पर प्रभावती की लाश सड़गल जाएगी तो वैसे ही उस का पता नहीं चलेगा.

प्रभावती की तलाश करने के बहाने वह रोज उस के घर जाता रहा. 4-5 दिनों बाद जब उसे लगा कि अब प्रभावती की लाश नहीं मिलेगी तो वह अपने काम पर जाने लगा. उस ने अपने साथियों से भी कह दिया था कि अगर उन से कोई प्रभावती के बारे में पूछे तो वे कह देंगे कि उन्होंने 10-15 दिनों से उसे नहीं देखा है. 11 दिसंबर, 2013 की सुबह चौकीदार छिटई को गांव वालों से पता चला कि नइया नाला के पास पतावर के बीच एक लड़की की लाश पड़ी है, जिस की उम्र 23-24 साल होगी. चौकीदार ने यह सूचना थाना डीह पुलिस को दी. उस दिन थानाप्रभारी बी.के. यादव छुट्टी पर थे. इसलिए सबइंसपेक्टर आर.के. कटियार सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. शव की पहचान नहीं हो पाई

घटना की सूचना पा कर पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार पांडेय और क्षेत्राधिकारी महमूद आलम सिद्दीकी भी पहुंच गए थे. उस समय जोरदार ठंड पड़ रही थी. चारों ओर घना कोहरा छाया था. निरीक्षण के दौरान देखा गया कि लड़की के हाथ परआई लव यूलिखा है. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार पांडेय ने थाना डीह पुलिस को हत्यारे को जल्द से जल्द पकड़ने का आदेश दिया था. वह इस की रोज रिपोर्ट भी लेने लगे थे. पुलिस ने लड़की के कपड़े और उस के पास से मिले सामान को थाने में रख लिया था. 13 दिसंबर को जब इस घटना के बारे में अखबारों में छपा तो खबर पढ़ कर प्रभावती के घर वाले थाना डीह पहुंचे. उन्हें पूरा विश्वास था कि वह 6 दिनों पहले गायब हुई प्रभावती की ही लाश होगी.

थाने कर प्रभावती के भाई फूलचंद और पिता महादेव ने लाश से मिला सामान देखा तो उन्होंने बताया कि वह सारा सामान प्रभावती का है. अब तक थानाप्रभारी बी.के. यादव वापस चुके थे. शव की शिनाख्त होते ही उन्होंने जांच आगे बढ़ा दी. प्रभावती के घर वालों से पूछताछ के बाद पुलिस की नजरें तेजभान पर टिक गईं. प्रभावती के गायब होने के कुछ दिनों बाद तक तो वह प्रभावती के घर जाता रहा था, लेकिन 2 दिनों से वह नहीं गया था. 15 दिसंबर को 2 बजे के आसपास तेजभान डीह के रेलवे मोड़ पर मिल गया तो थानाप्रभारी बी.के. यादव ने उसे पकड़ लिया.

शुरूशुरू में तो तेजभान प्रभावती के संबंध में कोई भी जानकारी देने से मना करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उस के और प्रभावती के संबंधों के बारे में बताना शुरू किया तो मजबूर हो कर उसे सारी सच्चाई उगलनी पड़ी. प्रभावती की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, वह बहुत मतलबी और चालू औरत थी. मेरे अलावा भी उस के कई लोगों से संबंध थे. मैं ने उसे मना किया तो वह मुझ से शादी के लिए कहने लगी. उस ने मुझे जो पैसे दिए थे, उस से मैं ने उस का बीमा करा दिया था. फिर भी वह मुझ से अपने पैसे मांग रही थी. परेशान हो कर मैं ने उसे मार दिया.’’

पुलिस ने तेजभान के पास रखा प्रभावती का सामान भी बरामद कर लिया था. इस के तेजभान के खिलाफ प्रभावती की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बहू ने ससुर के साथ संबंध बनाकर गला घोंटा

अय्याश प्रवृत्ति के परमानंद ने गीता पर डोरे डालते समय तो उम्र का लिहाज किया, रिश्ते का. ऐसे संबंधों का परिणाम बुरा ही होता है, इस में भी कुछ ऐसा ही हुआ. ससुर जान से गया, बहू सलाखों के पीछे है गीता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना बहेड़ी के गांव फरीदपुर के रहने वाले गंगाराम की दूसरे नंबर की बेटी थी. गंगाराम की गिनती गांव के संपन्न किसानों में होती थी. उन की 3 शादियां हुई थीं. पहली पत्नी रमा की बीमारी से मौत हो गई तो उन्होंने सुधा से शादी की. पारिवारिक कलह की वजह से उस ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली तो उन्होंने तीसरी शादी रेशमा से की

रेशमा से ही उन्हें 4 बेटियां और 2 बेटे थे. बड़ी बेटी ललिता की उन्होंने उम्र होने पर शादी कर दी थी. उस से छोटी गीता का 8वीं पास करने के बाद पढ़ाई में मन नहीं लगा तो उस ने पढ़ाई छोड़ दी. गीता जिस उम्र में थी, अगर उस उम्र ध्यान दिया जाए तो बच्चों को बहकते देर नहीं लगती. वे सहीगलत के फर्क को समझ नहीं पाते. ऐसा ही कुछ गीता के साथ भी हुआगीता गंगाराम के अन्य बच्चों से थोड़ा अलग हट कर थी. वह जिद्दी थी, इसलिए उस के मन में जो आता था, वह हर हाल में वही करती थी. उसे लड़कों की तरह रहना, उन्हीं की तरह दोस्ती करना और बिंदास घूमते हुए मस्ती करना कुछ ज्यादा ही अच्छा लगता था. इसलिए वह लड़कों की तरह कपड़े तो पहनती ही थी, अपने बाल भी लड़कों की ही तरह कटवा रखे थे.

वह अकसर गांव के लड़कों के साथ घूमती रहती थी. उम्र के साथ उस के बदन में ही नहीं, सुंदरता में भी निखार गया था. गंगाराम के पास ट्रैक्टर भी था और मोटरसाइकिल भी. गीता दोनों ही चीजें चला लेती थी. इसलिए उस का जब मन होता, वह मोटरसाइकिल ले कर घूमने निकल जाती. उसे लड़कों से कोई परहेज नहीं था, इसलिए गांव के लड़के उस के आसपास मंडराते रहते थे. गीता नादान तो थी नहीं कि उन लड़कों की मंशा समझती, इसलिए अपने बिंदासपन से वह उन्हें अंगुलियों पर नचाती रहती थी. लेकिन उन लड़कों को इस का फायदा भी मिलता था. वे लड़के गीता से जो चाहते थे, वह उन्हें मिला भी.

फिर तो गांव में गीता को ले कर तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस सब की जानकारी गीता के पिता गंगाराम को हुई तो उस ने गीता पर बंदिशें लगाईं. लेकिन गीता अब काबू में आने वाली कहां थी. कोई कोई बहाना बना कर वह घर से निकल जाती. कोई ऊंचनीच हो जाए, इस डर से गंगाराम गीता के लिए लड़के की तलाश करने लगा. जल्दी ही उस की यह तलाश खत्म हुई और उसे बरेली के ही थाना नवाबगंज के गांव लावाखेड़ा निवासी परमानंद का बेटा मनोज मिल गयापरमानंद भी किसान थे. उस के पास भी ठीकठाक खेती थी, जिस की वजह से उस के यहां भी गांवदेहात के हिसाब से किसी चीज की कमी नहीं थी. उस के परिवार में पत्नी उर्मिला के अलावा 3 बेटियां और 2 बेटे मनोज तथा चैतन्य स्वरूप थे. बेटियों का वह विवाह कर चुका था. अब मनोज का नंबर था

यही वजह थी कि जब गंगाराम उस के यहां अपने किसी रिश्तेदार के माध्यम से रिश्ता ले कर पहुंचा तो बात बन गई. इस के बाद सारे रस्मोरिवाज पूरे कर के मनोज और गीता को शादी के गठबंधन में बांध दिया गया. यह शादी फरवरी, 2009 में हुई थी. गीता सुंदर तो थी ही, साथ ही उस में वे सारे गुण विद्यमान थे, जो पुरुषों को दीवाना बना देते हैं. यही वजह थी कि गीता ने अपनी अदाओं से पहली ही रात में मनोज को अपना दीवाना बना दिया था. गीता पहली ही रात में समझ गई कि उसे पति उस के मनमाफिक मिला है. वह जैसा सीधासादा, अंगुलियों पर नाचने वाला पति चाहती थी, मनोज ठीक वैसा ही निकला था.

2-4 दिनों में ही मनोज गीता के हुस्न में इस कदर खो गया कि हर पल, हर जगह उसे गीता ही गीता नजर आने लगी. उस का गीता को छोड़ कर कहीं जाने का मन ही होता. खेतों पर भी उस का मन लगता. लेकिन जिम्मेदारी ऐसी चीज है, जो पत्नी तो क्या, मांबाप से भी दूर होने को मजबूर कर देती है. यही हाल मनोज का भी हुआ. साल भर बाद वह एक बेटे का बाप बना तो खर्च बढ़ते ही उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास होने लगाइस जिम्मेदारी को निभाने के लिए मनोज को कमानाधमाना जरूरी था, जिस के लिए वह ऊधमसिंहनगर चला गया. वहां उसे टाटा मैजिक के लिए पुर्जे बनाने वाली अल्ट्राटेक कंपनी में नौकरी मिल गई. रहने के लिए उस ने शांति कालोनी रोड स्थित बधईपुरा में जागरलाल के मकान में किराए पर कमरा ले लिया.

कमाईधमाई के लिए मनोज खुद तो ऊधमसिंहनगर चला गया था, लेकिन घरवालों की देखरेख के लिए गीता को गांव में ही मांबाप के पास छोड़ गया था. उस ने एक बार भी नहीं सोचा कि उस के बिना गीता का मन गांव में कैसे लगेगा. शायद उसे लग रहा था कि जिस तरह वह पत्नीबच्चे और परिवार के लिए त्याग कर रहा है, उसी तरह गीता भी कर लेगी. लेकिन मनोज की यह सोच गलत साबित हुई. क्योंकि गीता को तो शारीरिक संबंधों का चस्का पहले से ही लगा हुआ था. ऐसे में वह बिना पति के कैसे रह सकती थी. उस का दिन तो घर के कामधाम और बच्चे में कट जाता था, लेकिन रातें काटे नहीं कटती थीं. बेचैनी से वह पूरी रात करवटें बदलती रहती थी. शारीरिक सुख के बिना वह बुझीबुझी सी रहती थी.

उस की इस बेचैनी और परेशानी को घर का कोई दूसरा सदस्य भले ही नहीं समझ सका, लेकिन पितातुल्य ससुर परमानंद ने जरूर समझ लिया था. इस की वजह यह थी कि परमानंद लंगोट का कच्चा था. उस के लिए रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण स्त्री का शरीर था. शायद यही वजह थी कि गीता को उस ने देखते ही पसंद कर लिया था. परमानंद अपनी बहू पर शुरू से ही फिदा था. लेकिन बेटे के रहते वह बहू के करीब नहीं जा पा रहा था. बहू के नजदीक जाने के लिए ही उस ने बेटे को जिम्मेदारी का अहसास दिला कर उसे घर से बाहर भेज दिया था

मनोज के जाने के बाद गीता की बेचैनी बढ़ी तो परमानंद गीता के नजदीक जाने की कोशिश करने लगा. वह उस से बातें करने के बहाने ढूंढ़ने लगा. गीता उस से बातें करती तो वह अकसर बातें करतेकरते अपनी सीमाएं लांघ जाता. वह उसे कोई सामान पकड़ाती तो सामान पकड़ने के बहाने वह उसे छूने की कोशिश करता. ससुर की इन हरकतों से अनुभवी गीता को समझते देर नहीं लगी कि वह उस से क्या चाहता है. गीता शक तो पहले से ही था, लेकिन जब निगाहें बदलीं और परमानंद बातबात में हंसीमजाक करने लगा तो उस का शक यकीन में बदल गया.

परमानंद देखने में ही जवान नहीं था, बल्कि शरीर से भी हृष्टपुष्ट था. इस की वजह यह थी कि वह अपने शरीर और खानपान का विशेष ध्यान रखता था. बच्चे सयाने हो गए हैं, यह कह कर पत्नी उर्मिला उसे पास नहीं फटकने देती थी. जबकि परमानंद अभी खुद को जवान समझता था और स्त्रीसुख की लालसा रखता थापरमानंद को इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि गीता उस की बेटी की उम्र की तो है ही, उस की बहू भी है. वह वासना में इस कदर अंधा हो गया था कि मर्यादा ही नहीं, रिश्तेनाते भी भूल गया. गीता अब उसे सिर्फ एक औरत नजर रही थी, जो उस की शारीरिक भूख शांत कर सकती थी. यहां परमानंद ही नहीं, गीता भी अपनी मर्यादा भुला चुकी थी.

यही वजह थी कि वह परमानंद की किसी अशोभनीय हरकत का विरोध नहीं कर रही थी, जिस से उस की हिम्मत और हसरतें बढ़ती जा रही थीं. फिर तो एक स्थिति यह गई कि परमानंद की रात की नींद गायब हो गई. अब वह मौके की तलाश में रहने लगा. आखिर उसे एक दिन तब मौका मिल गया, जब पत्नी मायके गई हुई थी. गरमी के दिन होने की वजह से बाकी बच्चे अंदर सो रहे थे. गीता घर के काम निपटा कर बाहर दालान में आई तो ससुर को बेचैन हालत में करवट बदलते देखा. उसे लगा ससुर की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए उस ने उस के पास कर पूछा, ‘‘लगता है, आप की तबीयत ठीक नहीं है?’’

परमानंद हसरत भरी निगाहों से गीता को ताकते हुए बोला, ‘‘तुम इतनी दूरदूर रहोगी तो तबीयत ठीक कैसे रहेगी.’’ गीता को परमानंद की बीमारी का पहले से ही पता था. बीमार तो वह खुद भी थी. इसीलिए तो मौका देख कर उस के पास आई थी. उस ने चाहतभरी नजरों से परमानंद को ताकते हुए कहा, ‘‘यह आप का भ्रम है. मैं आप से दूर कहां हूं बाबूजी. आप के आगेपीछे ही तो घूमती रहती हूं.’’

अब गीता इस से ज्यादा क्या कहती. परमानंद ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो वह खुद ही उस के ऊपर गिर पड़ी. इस तरह एक बार मर्यादा की दीवार गिरी तो उस पर रोजरोज वासना की इमारत खड़ी होने लगी. गीता का तो मर्यादा से कभी कोई नाता ही नहीं रहा था, उसी में उस ने ससुर को भी शामिल कर लिया. परमानंद की संगत में कर वह शराब भी पीने लगी. अब वह शराब पी कर ससुर के साथ आनंद उठाने लगी. कुछ दिनों बाद उस ने अपने चचिया ससुर से भी संबंध बना लिए.

ये ऐसा रिश्ता है, जिसे कितना भी छिपाया जाए, छिपता नहीं है. किसी दिन उर्मिला ने गीता को परमानंद के साथ रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. लेकिन उन दोनों पर इस का कोई असर नहीं पड़ा. जब घर का मुखिया ही पतन के रास्ते पर चल रहा हो तो घर के अन्य लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते. उर्मिला भी जब ससुरबहू के इस मिलन को नहीं रोक पाई तो उस ने यह बात अपने बेटे मनोज को बताई. मनोज जानता था कि उस का बाप और पत्नी बरबादी की राह पर चल रहे हैं, इसलिए वह भाग कर गांव आया. बाप से वह कुछ कह नहीं सकता था, उस ने गीता को समझाने की कोशिश की. लेकिन गीता अब कहां मानने वाली थी. हार कर मनोज उसे अपने साथ ले गया.

मनोज का विचार था कि गीता साथ रहेगी तो ठीक रहेगी. लेकिन जिस की आदत बिगड़ चुकी हो, वह कैसे सुधर सकती है. बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे, जो ऐसे मामलों में सुधरने के बारे में सोचते हैं. मनोज के नौकरी पर जाते ही गीता आजाद हो जाती. वह कमरे में ताला डाल कर घूमने निकल जाती. उस ने वहां भी अपने रंगढ़ंग दिखाने शुरू किए तो वहां भी रंगीनमिजाज लोग उस के पीछे पड़ गए. उन्हीं में रुद्रपुर की आदर्श कालोनी का रहने वाला शेखर और जगतपुरा का रहने वाला मनोज भटनागर भी थागीता के दोनों से ही प्रेमसंबंध बन गए. शेखर ने बातें करने के लिए गीता को एक मोबाइल फोन भी खरीद कर दे दिया था. यही नहीं, दोनों गीता की हर जरूरत पूरी करने को तैयार रहते थे. गीता उन के साथ घूमतीफिरती, सिनेमा देखती, होटलों और रेस्तरांओं में खाना खाती. बदले में वह उन्हें खुश करती और खुद भी खुश रहती.

मनोज जागरलाल के जिस मकान में किराए पर रहता था, उसी में उस के बगल वाले कमरे में रामचंद्र मौर्य रहता था. वह जिला बरेली के थाना मीरगंज के अंतर्गत आने वाले गांव गौनेरा का रहने वाला था. था तो वह शादीशुदा, लेकिन वहां वह अकेला ही रहता था. वह वहां एक फैक्ट्री में ठेकेदारी करता था. अगलबगल रहने की वजह से मनोज और रामचंद्र के बीच परिचय हुआ तो दोनों एक ही जिले के रहने वाले थे, इसलिए उन में आपस में खास लगाव हो गया था. जल्दी ही रामचंद्र गीता के बारे में सब कुछ जान गया था. मनोज के काम पर जाते ही वह उस के कमरे पर पहुंच जाता और गीता से घंटों बातें करता रहता.

पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने में माहिर गीता समझ गई कि रामचंद्र उस के कमरे पर क्यों आता है. वह जान गई कि पत्नी से दूर औरत सुख के लिए बेचैन रामचंद्र उसी के लिए उस के आगेपीछे घूमता है. रामचंद्र गीता से दोगुनी उम्र का था. लेकिन गीता के लिए इस का कोई मतलब नहीं था. उसे मतलब था तो सिर्फ देहसुख और पैसों से, जो चाहने वाले उस पर लुटा रहे थे. तरहतरह के मर्दों के साथ मजा लेने वाली गीता को रामचंद्र का आना अच्छा ही लगा. इसलिए गीता उस का मुसकरा कर स्वागत करने लगी

फिर तो रामचंद्र को उस के करीब आने में देर नहीं लगी. जल्दी ही दोनों के मन ही नहीं, तन भी एक हो गए. लेकिन जितनी जल्दी वे एक हुए, उतनी ही जल्दी उन की पोल भी खुल गई. एक दिन मनोज फैक्ट्री से जल्दी गया तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो गीता ने दरवाजा काफी देर बाद खोला. वह मनोज को देख कर चौंकी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे, इसलिए मनोज को लगा, वह सो रही थी. गीता ने सहमे स्वर में पूछा, ‘‘आज तुम इतनी जल्दी कैसे गए?’’

‘‘फैक्ट्री का जनरेटर खराब था, इसलिए काम नहीं हुआ.’’ कह कर मनोज कमरे में दाखिल हुआ तो सामने पलंग पर रामचंद्र को बैठे देख कर उसे माजरा समझते देर नहीं लगी. मनोज को देख कर वह तेजी बाहर निकल गया. मनोज ने गुस्से से पूछा, ‘‘यह यहां क्या कर रहा था?’’

‘‘पानी पीने आया था.’’ गीता ने हकलाते हुए कहा.

‘‘कमरा बंद कर के पानी पिला रही थी या उस के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी?’’

‘‘तुम्हें यह कहते शरम नहीं आती?’’ गीता चीखी.

‘‘शरम तो तुम्हें आनी चाहिए, जो एक के बाद एक गलत हरकतें करती रही हो. अपने मर्द के होते हुए पराए मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो. तुम्हें तो शरम से डूब मरना चाहिए.’’

‘‘तुम में है ही क्या? तुम तो पत्नी को संतुष्ट कर सकते हो, ही उस के खर्चे उठा सकते हो. अगर तुम को इस सब से परेशानी हो रही है तो मुझे छोड़ दो.’’ गीता ने अपना फैसला सुना दिया.

‘‘तू तो चाहती ही है कि मैं तुझे छोड़ दूं तो तू घूमघूम कर गुलछर्रे उड़ाए. तुझे तो अपनी इज्जत की पड़ी नहीं है, लेकिन मुझे तो अपनी इज्जत की फिक्र है. इसलिए सामान बांध लो और अब हम गांव चलते हैं.’’

अगले दिन मनोज ने नौकरी छोड़ दी और हिसाबकिताब ले कर गांव गया. कुछ दिनों गांव में रह कर मनोज अकेला ही दिल्ली चला गया, जहां किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी करने लगा. उस के जाते ही गीता फिर आजाद हो गई. अब वह वही करने लगी, जो उस के मन में आताशेखर और मनोज उस से मिलने उस की ससुराल भी आने लगे. मनोज के पास मोटरसाइकिल थी, गीता का जब मन होता, मोटरसाइकिल ले कर अकेली ही बरेली से रुद्रपुर चली जाती और अपने प्रेमियों से मिल कर वापस जाती.

रामचंद्र से गीता को विशेष लगाव था. वह उसी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताती थी. जब इस सब की जानकारी परमानंद को हुई तो उस ने गीता को रोका. लेकिन वह मानने वाली कहां थी. उस ने एक दिन गीता को रामचंद्र के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो उस ने सरेआम रामचंद्र की पिटाई कर दी. रामचंद्र को यह बुरा तो बहुत लगा, लेकिन वह उस समय कुछ करने की स्थिति में नहीं था. गीता को भी ससुर की यह हरकत पसंद नहीं आई. क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे अपनी जागीर समझे और उस की बेलगाम जिंदगी पर अंकुश लगाए. जब उस ने अपने पति मनोज की बात नहीं मानी तो परमानंद की बात कैसे मानती.

यही वजह थी कि परमानंद बारबार उस के रास्ते में रोड़ा बनने लगा तो उस ने इस रोड़े को हमेशा के लिए हटाने की तैयारी कर ली. इस के लिए उस ने रामचंद्र को भी राजी कर लिया. वह राजी भी हो गया, क्योंकि वह भी उस से अपनी बेइज्जती का बदला लेना चाहता था. गीता ने ससुर को ठिकाने लगाने की जो योजना बनाई थी, उसी के अनुसार 27 जुलाई को वह परमानंद को मोटरसाइकिल से रुद्रपुर रामचंद्र के कमरे पर ले गई. देर रात तक गीता, रामचंद्र और परमानंद बैठ कर शराब पीते रहे. गीता और रामचंद्र ने तो खुद कम पी, जबकि परमानंद को जम कर पिलाई. यही नहीं, उस की शराब में नींद की गोलियां भी मिला दी थीं, जिस से कुछ ही देर में वह बेहोश हो कर लुढ़क गया. उस के बाद गीता और रामचंद्र ने उसी के अंगौछे से उस का गला घोंट दिया.

इस के बाद गीता ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तो रामचंद परमानंद की लाश को बीच में बैठा कर पीछे स्वयं बैठ गया. गीता मोटरसाइकिल ले कर काला डूंगी रोड पर भाखड़ा नदी के किनारे पहुंची, जहां दोनों ने परमानंद की लाश को बोरी में कुछ ईंटों के साथ डाल कर नदी के पानी में फेंक दिया. इस के बाद गीता रुद्रपुर में ही रामचंद्र के कमरे पर कई दिनों तक रुकी रही. 11 अगस्त को गीता मोटरसाइकिल से अपनी ससुराल लावाखेड़ा पहुंची तो परमानंद के छोटे बेटे चैतन्य स्वरूप ने पिता के बारे में पूछा. तब गीता ने किसी रिश्तेदारी में जाने की बात कह कर बात खत्म कर दी. 2 दिन ससुराल में रह कर गीता फिर चली गई. गीता के जाने के बाद कई दिनों तक परमानंद नहीं लौटा तो घर वालों को चिंता हुई

उन्हें गीता पर शक हुआ कि कहीं उस ने अपने प्रेमियों शेखर और मनोज के साथ मिल कर उस की हत्या तो नहीं करा दी. चैतन्य स्वरूप ने कोतवाली नवाबगंज जा कर अपने पिता के गायब होने की सूचना दी. उस समय इंसपेक्टर अशोक कुमार के पास कोतवाली का भी चार्ज था. उन्हें लगा कि बहू ससुर को क्यों गायब करेगी? यही सोच कर उन्होंने चैतन्य को लौटा दिया. परमानंद का परिवार उस की तलाश में लगा रहा. उसी बीच 21 अगस्त को इंसपेक्टर अशोक कुमार का तबादला हो गया तो उन की जगह आए इंसपेक्टर जे.पी. तिवारी. चैतन्य स्वरूप उन से मिला तो उन्होंने उस से तहरीर ले कर शेखर और मनोज भटनागर के खिलाफ अपराध संख्या-827/13 पर भादंवि की धारा 364 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर गीता के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया

सर्विलांस सेल के पुलिसकर्मियों की गीता से कई बार बात हुई. गीता उन से कभी गुजरात में होने की बात कहती तो कभी हरियाणा में होने की बात बताती, जबकि उस की लोकेशन बरेली के आसपास की ही थी. पुलिस समझ गई कि गीता बहुत ही शातिर है. गीता के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि वह सब से अधिक अपनी बड़ी बहन ललिता से बात करती थी. इंसपेक्टर जे.पी. तिवारी ने ललिता और उस के पति प्रमोद को थाने ला कर पूछताछ की तो उन्होंने गीता का ठिकाना बता दिया. गीता उस समय बरेली के थाना मीरगंज के सामने राजेंद्र सेठ के मकान में किराए का कमरा ले कर रह रही थी. उसी के साथ रामचंद्र मौर्य भी था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. यह 23 दिसंबर, 2013 की बात है.

पूछताछ में गीता और रामचंद्र ने परमानंद की हत्या का अपराध स्वीकार कर के उस की हत्या की पूरी कहानी सिलसिलेवार बता दी. पुलिस ने दोनों को रुद्रपुर ले जा कर उन की निशानदेही पर भाखड़ा नदी से परमानंद की लाश बरामद करने की कोशिश की, लेकिन लाश बरामद नहीं हो सकी. इस के बाद पुलिस ने दोनों को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. लाश की बरामदगी के लिए एक बार फिर पुलिस दोनों को रिमांड पर लेने का प्रयास कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक दोनों का रिमांड मिला नहीं था.

    — कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित  

तांत्रिक ने चढ़ाई बीमार बेटे की मां की बलि

कलावती गुप्ता अपने बेटे की बीमारी ठीक कराने के लिए तांत्रिक सर्वजीत कहार के पास जाती थी. उसे क्या पता था कि तांत्रिक और उस के पास आने वाले लोग एक दिन उसी की बलि चढ़ा देंगे. ठाणे जिले के अंतर्गत आता है वसई का धानीव बाग गांव. 17 नवंबर, 2013 को यहां से सोपारा फाटा की तरफ जानेवाले रास्ते के किनारे झाडि़यों में एक अंजान महिला की लाश पड़ी मिली. इस सिरविहीन लाश के पास एक गाउन और एक गद्दी पड़ी हुई थी. धानीव गांव के लोगों को जब झाडि़यों में बिना सिर वाली लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो तमाम गांव वाले वहां पहुंच गए. गांव वालों ने यह जानकारी मुखिया अविनाश पाटिल को दी तो वह भी वहां गए.

गांव का मुखिया होने के नाते अविनाश पाटिल ने फोन कर के महिला की लाश मिलने की जानकारी थाना वालीव पुलिस को दे दी. सुबहसुबह खबर मिलते ही वालीव के वरिष्ठ पुलिस इंसपेक्टर राजेंद्र मोहिते पुलिस टीम के साथ मुखिया द्वारा बताई उस जगह पर पहुंच गए, जिस जगह पर लाश पड़ी थी. राजेंद्र मोहिते ने वहां का बारीकी से निरीक्षण किया तो वहां काफी मात्रा में खून फैला हुआ था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. वहीं पर एक चौकी के पास पूजा का कुछ सामान भी रखा था. इस से उन्होंने अनुमान लगाया कि किसी तांत्रिक वगैरह ने सिद्धि साधना या अन्य काम के लिए महिला की बलि चढ़ाई होगी.

हिला की गरदन को उन्होंने आसपास काफी तलाशा, लेकिन वह नहीं मिली. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने अपर पुलिस अधिक्षक संग्राम सिंह निशाणदार और उपविभागीय अधिकारी प्रशांत देशपांडे को फोन द्वारा इस की जानकारी दी. उक्त दोनों अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गएचूंकि मृतका का सिर नहीं मिल पा रहा था, इसलिए घटनास्थल पर मौजूद लोगों में से कोई भी उस अधेड़ उम्र की शिनाख्त नहीं कर सका. बहरहाल, पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को जे.जे. अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दिया और उच्चाधिकारियों के निर्देश पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या और अन्य धाराओं के तहत रिपोर्ट दर्ज कर जरूरी काररवाई शुरू कर दी.

महिला की हत्या क्यों और किस ने की, यह पता लगाने के लिए उस की शिनाख्त होनी जरूरी थी. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजेंद्र मोहिते के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में सहायक पुलिस इंसपेक्टर आव्हाड तायडे, सहायक सबइंसपेक्टर प्रकाश सावंत, हवलदार सुभाष गोइलकर, पुलिस नायक अशोक चव्हाण, कांस्टेबल अनवर, मनोज चव्हाण, शिवा पाटिल, 2 महिला कांस्टेबल फड और पाटिल को शामिल किया गया

पुलिस टीम लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश में लग गई. सब से पहले टीम ने सिरविहीन महिला की लाश के फोटो मुंबई के समस्त थानों में भेज कर यह जानने की कोशिश की कि कहीं किसी थाने में इस कदकाठी की महिला की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. इस के अलावा उन्होंने पूरे जिले में सार्वजनिक जगहों पर महिला की शिनाख्त के संबंध में पैंफ्लेट भी चिपकवा दिए. पुलिस टीम को इस केस पर काम करते हुए करीब 3 हफ्ते बीत गए, लेकिन लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी.

8 दिसंबर, 2013 को उदय गुप्ता नाम का एक व्यक्ति भिवंडी के शांतीनगर थाने पहुंचा. उस ने बताया कि उस की मां कलावती गुप्ता पिछले महीने की 17 तारीख से लापता है. शांति नगर थाने के नोटिस बोर्ड पर वालीव थाना क्षेत्र में मिली एक अज्ञात महिला की सिरविहीन लाश की फोटो लगी हुई थी. इसलिए थानाप्रभारी ने उदय गुप्ता से कहा, ‘‘पिछले महीने वालीव थाना क्षेत्र में एक अज्ञात महिला की लाश मिली थी, जिस का फोटो नोटिस बोर्ड पर लगा हुआ है. आप उस फोटो को देख लीजिए.’’

उदय गुप्ता तुरंत नोटिस बोर्ड के पास गया और वहां लगे फोटो को देखने लगा. उन में एक फोटो पर उस की नजर पड़ी. उस फोटो को देख कर उदय गुप्ता रुआंसा हो गया. क्योंकि उस की मां फोटो में दिखाई दे रही महिला की कद काठी से मिलतीजुलती थी और वैसे ही कपड़े पहने हुए थी. उस तसवीर के नीचे वालीव थाने का फोन नंबर लिखा था. उदय गुप्ता तुरंत वालीव थाने जा कर वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजेंद्र मोहिते से मिला और अपनी मां के गायब होने की बात बताई. राजेंद्र मोहिते उदय गुप्ता को जे.जे. अस्पताल ले गए

मोर्चरी में रखी लाश और उस के कपड़े जब उदय गुप्ता को दिखाए गए तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस ने लाश की पहचान अपनी मां कलावती गुप्ता के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस का अगला काम हत्यारों तक पहुंचना था. उदय गुप्ता ने यह सूचना अपने पिता रामआसरे गुप्ता को दे दी थी. खबर मिलते ही वह वालीव थाने पहुंच गए थे. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजेंद्र मोहिते ने घर वालों से पूछा कि कलावती गुप्ता जब घर से निकली थी तो उस के साथ कौन था. उदय ने बताया, ‘‘उस दिन मां एक परिचित रामधनी यादव के साथ गई थी. उस के बाद वह वापस नहीं लौटी. हम ने रामधनी से पूछा भी था, लेकिन उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था.’’

रामधनी यादव सांताकु्रज क्षेत्र स्थित गांव देवी में रहता था. पुलिस टीम ने पूछताछ के लिए रामधनी यादव को उठा लिया. उस से कलावती गुप्ता की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि कलावती गुप्ता की बलि चढ़ाई गई थी और इस में कई और लोग शामिल थे. उस से की गई पूछताछ में कलावती गुप्ता की बलि चढ़ाए जाने की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी. 55 वर्षीया कलावती गुप्ता मुंबई के सांताकु्रज (पूर्व) के वाकोला पाइप लाइन के पास गांवदेवी में रहती थी. उस के 2 बेटे थे उदय गुप्ता और राधेश्याम गुप्ता. राधेश्याम विकलांग था और अकसर बीमार रहता था. बेटे की वजह से कलावती काफी चिंतित रहती थी. एक दिन पास के ही रहने वाले रामधनी ने उसे सांताकु्रज की एअर इंडिया कालोनी क्षेत्र के कालिना में रहने वाले ओझा सर्वजीत कहार के बारे में बताया.

बेटा ठीक हो जाए, इसलिए वह रामधनी के साथ ओझा के पास गई. इस के बाद तो वह हर मंगलवार और रविवार को रामधनी के साथ उस तांत्रिक के पास जाने लगी. सिर्फ कलावती का बेटा ही नहीं, बल्कि रामधनी की बीवी भी बीमार रहती थी. रामधनी उसे भी उस तांत्रिक के पास ले जाता था. रामधनी का एक भाई था गुलाब शंकर यादव. गुलाब की बीवी बहुत तेजतर्रार थी. वह किसी किसी बात को ले कर अकसर उस से झगड़ती रहती थी. जिस से घर में क्लेश रहता था. घर का क्लेश किसी तरह खत्म हो जाए, इस के लिए गुलाब भी उस तांत्रिक के पास जाता था.

एक दिन तांत्रिक सर्वजीत कहार ने रामधनी और गुलाब को सलाह दी कि अगर वह किसी इंसान की बलि चढ़ा देंगे तो सारी मुसीबतें हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी. दोनों भाई अपने घर में सुखशांति चाहते थे, लेकिन बलि किस की चढ़ाएं, यह बात उन की समझ में नहीं रही थी. इसी बीच उन के दिमाग में विचार आया कि कलावती की ही बलि क्यों चढ़ा दी जाए. कलावती सीधीसादी औरत थी, साथ ही वह खुद भी तांत्रिक के पास जाती थी. इसलिए वह उन्हें आसान शिकार लगी. यह बात उन लोगों ने तांत्रिक से बताई. चूंकि बलि देना तांत्रिक के बस की बात नहीं थी, इसलिए उस ने अपने फुफेरे भाई सत्यनारायण, उस के बेटे पंकज नारायण और श्यामसुंदर से बात की तो वे यह काम करने के लिए तैयार हो गए.

15 नवंबर, 2013 को सांताकु्रज के वाकोला इलाके में रहने वाले गुलाब शंकर यादव के घर तांत्रिक सर्वजीत कहार, श्यामसुंदर, सत्यनारायण, पंकज और रामधनी ने एक मीटिंग कर के योजना बनाई कि कलावती की कब और कहां बलि देनी है. उन्होंने बलि चढ़ाने के लिए मुंबई से काफी दूर नालासोपारा के वसई इलाके में स्थित मातामंदिर को चुना. इसी के साथ तांत्रिक ने रामधनी को पूजा के सामान की लिस्ट भी बनवा दी.

अगले दिन 16 नवंबर, 2013 को रामधनी कलावती गुप्ता के घर पहुंच गया. उस ने उस से कहा कि अगर उसे अपने बेटे की तबीयत हमेशा के लिए ठीक करनी है तो आज नालासोपारा स्थित माता के मंदिर में होने वाली पूजा में शामिल होना पड़ेगा. यह पूजा तांत्रिक सर्वजीत ही कर रहे हैं. बेटे की खातिर कलावती तुरंत रामधनी के साथ चलने को तैयार हो गई. रामधनी कलावती को ले कर पहले अपने भाई गुलाब यादव के घर गया.

वहां योजना में शामिल अन्य लोग भी बैठे थे. कलावती को देख कर वे लोग खुश हो गए और पूजा का सामान और कलावती को ले कर सीधे नालासोपारा स्थित मंदिर पहुंच गए. वहां पहुंच कर ओझा ने एक गद्दी डाल कर उस पर पूजा का सारा सामान रख कर मां काली की पूजा करनी शुरू कर दी. उस ने कलावती के हाथ में भी एक सुलगती हुई अगरबत्ती दे दी तो वह भी पूजा करने लगीथोड़ी देर में तांत्रिक इस तरह से नाटक करने लगा, जैसे उस के अंदर देवी का आगमन हो गया हो. वहां मौजूद अन्य लोग तांत्रिक के सामने हाथ जोड़ कर अपनीअपनी तकलीफें दूर करने को कहने लगे. रामधनी ने कलावती से कहा कि वह भी सिर झुका कर देवी से अपनी परेशानी दूर करने को कहे. भोलीभाली कलावती को क्या पता था कि सिर झुकाने के बहाने उस की बलि चढ़ाई जाएगी

उस ने जैसे ही तांत्रिक के चरणों में सिर झुकाया, श्यामसुंदर गुप्ता ने पीछे से उस के बाल कस कर पकड़ते हुए चाकू से उस की गरदन पर वार कर दिया. चाकू लगते ही कलावती खून से लथपथ हो कर तड़पने लगी. वहां मौजूद अन्य लोगों ने उसे कस कर दबोच लिया और उसी चाकू से उस की गरदन काट कर धड़ से अलग कर दी. कलावती की बलि चढ़ा कर रामधनी और उस का भाई खुश हो रहे थे कि अब उन के यहां की सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी. वे कलावती की कटी गरदन को वहां से दूर डालना चाहते थे, ताकि उस की लाश की शिनाख्त हो सके. उन लोगों ने उस की गरदन को अपने साथ लाई गई काले रंग की प्लास्टिक की थैली में रख लिया. तत्पश्चात वह थैली मुंबई अहमदाबाद राजमार्ग पर स्थित वासाडया ब्रिज से नीचे पानी में फेंक दी.

रामधनी से पूछताछ के बाद पुलिस ने कलावती गुप्ता की हत्या में शामिल रहे अन्य अभियुक्तों, तांत्रिक सर्वजीत कहार, श्यामसुंदर जवाहर गुप्ता, सत्यनारायण और पंकज को भी गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर कलावती का सिर, हत्या में प्रयुक्त चाकू और अन्य सुबूत बरामद कर लिए. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. ढोंगी तांत्रिक, पाखंडी आए दिन लोगों को अपने चंगुल में फांसते रहते हैं. इन के चंगुल में फंस कर अनेक परिवार बर्बाद हो चुके हैं. ऐसे तांत्रिकों, पाखंडियों पर शिकंजा कसने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने जादूटोना प्रतिबंध विधेयक पारित किया था

यह विधेयक पिछले 18 सालों से विवादों से घिरा हुआ था. लेकिन इस बिल को पारित हुए एक दिन भी नहीं बीता था कि 55 वर्षीय कलावती गुप्ता की बलि चढ़ा दी गई. सरकार को चाहिए कि इस बिल को सख्ती के साथ अमल में लाए, ताकि तांत्रिकों, पाखंडियों पर अंकुश लग सके.

 

सुनंदा पुष्‍कर और श‍श‍ि थरूर के बीच क्‍या हुआ था उस रात

सुनंदा पुष्कर ऐसी महिला थीं, जिन्होंने जिंदगी को पूरी आजादी के साथ अपनी शर्तों पर जिया और हाईप्रोफाइल लोगों में अपनी जगह और पहचान खुद बनाई. आशिक मिजाज शशि थरूर को तीसरे पति के रूप में स्वीकार करना क्या उन की भूल थी? क्या यही वजह उन की मौत का कारण बनी?

16-17 जनवरी की रात सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर के बीच क्या हुआ था, पक्के तौर पर कोई नहीं जानता. अलबत्ता, यह जरूर है कि दोनों के बीच कुछ कुछ हुआ जरूर था. और शायद यही सुनंदा पुष्कर की मौत की वजह भी थी. लेकिन उस वजह को ढूंढ पाना इस मामले की जांच करने वाली क्राइम ब्रांच के वश में नहीं है. क्योंकि एक तो मामला हाईप्रोफाइल है, दूसरे जरूरत भर के सुबूत नहीं हैं. कुछ साइंटिफिक सुबूत हैं भी तो उन से साफसाफ कुछ पता नहीं चल सकता.

घटना वाले दिन यानी 17 जनवरी को शशि थरूर सुबह साढ़े 6 बजे ही होटल लीला पैलेस से निकल गए थे, क्योंकि उन्हें कांग्रेस कार्यकारिणी की एक जरूरी मीटिंग में शामिल होना था. सुनंदा पुष्कर दिन भर होटल में रहीं. दिन में उन्होंने क्याक्या किया, यह कोई नहीं जानता. होटल स्टाफ के लोगों और सुनंदा के नौकर नारायण को थोड़ीबहुत जो जानकारी थी, वह उन्होंने पुलिस को बता दी. लेकिन उस में ऐसा कुछ नहीं था, जिस से कोई अनुमान लगाया जा सकता. सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से भी इतना ही पता चल सका कि मैडम 3 बज कर 22 मिनट पर अपने कमरे में आई थीं और उस के बाद कोई भी उन के कमरे की ओर नहीं आया था.

सुनंदा पुष्कर की मौत का पता तब चला, जब देर शाम साढ़े 8 बजे शशि थरूर होटल लीला पैलेस स्थित अपने कमरा नंबर 345 में पहुंचे. उस समय उन की पत्नी बेड पर लिहाफ ओढ़े लेटी थीं. कमरे का दरवाजा चूंकि लौक नहीं था, इसलिए शशि थरूर को अंदर जाने में कोई परेशानी नहीं हुई. थरूर ने अंदर जा कर देखा तो सुनंदा निश्चल पड़ी थीं. उन के शरीर में किसी तरह की कोई हलचल नहीं थी. यह कर देख शशि थरूर ने होटल के स्टाफ और डाक्टर को बुलाया. साथ ही अपने पीए अभिनव को भी.

चंद मिनटों में ही यह बात साफ हो गई कि सुनंदा मर चुकी हैं. शशि थरूर सुबह साढ़े 6 बजे जब होटल से निकले थे तो सब ठीक था. फिर दिन में ऐसा क्या हुआ कि सुनंदा की मौत हो गई. खबर सुन कर अभिनव भी होटल गए और उन्होंने ही सुनंदा पुष्कर की रहस्यमय मृत्यु की खबर पुलिस को दी. चूंकि यह हाईप्रोफाइल मामला था, सो पुलिस के बडे़बडे़ अधिकारी और पूरा मीडिया होटल लीला पैलेस पहुंच गया. पुलिस ने विशेषज्ञों को बुला कर डेडबौडी की जांच कराई, लेकिन सुनंदा के चेहरे और हाथों पर छोटीछोटी 12 चोटों के अलावा कोई ऐसा लक्षण नहीं पाया गया, जिसे उन की मौत की वजह माना जा सकता. वैसे भी उन की बौडी रजाई से इस तरह ढकी हुई थी, जिसे देख कर लग रहा था जैसे सोते समय उन की मौत हुई हो.

कमरे की तलाशी में भी कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली. हां, सुनंदा पुष्कर के बैग से एल्प्रैक्स के 2 रैपर जरूर मिले, जिन से 15 टैबलेट गायब थीं. इस से त्वरित तौर पर यही अनुमान लगाया गया कि उन्होंने नींद की दवा खा कर आत्महत्या की होगी. कश्मीरी सेबों के लिए प्रसिद्ध सोपोर क्षेत्र के छोटे से गांव बोमई में 27 जून, 1962 को जन्मी सुनंदा का संबंध एक जमींदार परिवार से था. उन के पिता पुष्करनाथ दास सेना में कर्नल थे, जो 1983 में रिटायर हो गए थे. उन के 2 भाई हैं, जिन में से एक बैंक औफिसर हैं और दूसरे सैन्य अधिकारी. 1990 में आतंकवादियों द्वारा घर जलाए जाने के बाद यह कश्मीरी पंडित परिवार जम्मू कर बस गया था. लेकिन सुनंदा इस से पहले ही गांवघर छोड़ चुकी थीं

1984 में जब वह श्रीनगर के मौलाना आजाद रोड, लाल चौक स्थित गवर्नमेंट कालेज औफ वीमन में इकोनौमिक्स की छात्रा थीं, तभी उन्हें डल लेक पर बने सरकारी होटल सेंटौर के लेक व्यू रेस्तरां में पार्टटाइम होस्टेस की नौकरी मिल गई थी. उन दिनों वहां के असिस्टेंट मैनेजर संजय रैना थे. तब तक सुनंदा का पूरा नाम सुनंदा दास था. सेंटौर होटल में ही सुनंदा और संजय रैना की मुलाकात हुई. पहले दोनों की आंखें लड़ीं, फिर प्यार हुआ. इसी के चलते सुनंदा ने अपने परिवार से विद्रोह कर के सन 1986 में संजय रैना से शादी कर ली थी. शादी के बाद दोनों दिल्ली चले आए थे.

दिल्ली में सुनंदा ने साउथ एक्सटेंशन के एक फैशन इंस्टीट्यूट से फैशन टैक्नोलौजी का डिप्लोमा किया. इस बीच संजय रैना नौकरी करते रहे. लेकिन तब तक दोनों के बीच कई तरह के मतभेद पैदा हो गए थे, जिस की वजह से दूरियां बढ़ती जा रही थीं. आगे चल कर ये मतभेद इतने बढ़े कि दोनों का रिश्ता टूट गयासुनंदा और संजय तलाक ले कर अलग हो गए. सुनंदा ने अपने परिवार से विद्रोह कर के विवाह किया था, वह भी टूट गया. इस से उन्हें काफी दुख पहुंचा था. इस दुख को कम करने और अपने परिवार से अपनी पहचान जोड़े रखने के लिए सुनंदा ने अपने नाम के आगे से दास हटा कर पिता का नाम पुष्कर जोड़ लिया. इस के बाद वह सुनंदा पुष्कर के नाम से जानी जाने लगीं.

संजय रैना से तलाक ले कर सुनंदा ने अपनी राहें अलग कर लीं. तलाक के कुछ समय बाद 1988 में वह दुबई चली गईं. वहां उन्हें दुबई की टेकौम इन्वेस्टमेंट कंपनी में सेल्स मैनेजर की नौकरी मिल गई. इस के 2 साल बाद 1991 में सुनंदा ने मलयाली बिजनैसमैन सुजीत मेनन से दूसरी शादी कर ली. मेनन संजय रैना के ही दोस्त थे और काफी पहले उन्हीं के माध्यम से सुनंदा के संपर्क में आए थे. सुनंदा पुष्कर ने टेकौम इन्वेस्टमेंट कंपनी में नौकरी, अनुभव प्राप्त करने और दुबई में जड़ें जमाने के लिए की थी. जब स्थितियां मनोनुकूल बन गईं तो उन्होंने दुबई में एक्सप्रेशंस नाम से अपनी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी खोल ली. पंख फैला कर खुले आसमान में उड़ने की चाहत रखने वाली सुनंदा की यह पहली मनचाही उड़ान थी

अपनी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के माध्यम से सुनंदा फैशन शो वगैरह आयोजित करने लगीं. इस के चलते उन के संपर्क बड़ेबड़े फैशन डिजाइनर्स और मौडल्स से बन गए. दुबई में रहते हुए ही सन 1992 में सुनंदा एक बेटे की मां बनीं. सुनंदा पुष्कर और सुजीत मेनन करीब 6 साल साथ रहे. सन 1997 में सुजीत मेनन की दिल्ली के करोलबाग क्षेत्र में एक रोड एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई. कहा जाता है कि वह अवसादग्रस्त रहने लगे थे. उन का एक्सीडेंट भी उसी मनोस्थिति में हुआ था. बहरहाल पति की मौत के बाद सुनंदा ने खुद को भी संभाला और बेटे को भी. पिता की मौत के बाद शिव को बोलने संबंधी कोई समस्या हो गई थी, जिस के इलाज के लिए सुनंदा को टोरंटो, कनाडा जाना पड़ा.

सुनंदा काफी दिनों तक कनाडा में रहीं और उन्होंने वहीं की नागरिकता ले ली. इस बीच उन का इंवेट मैनेजमेंट का काम चलता रहा. दुबई उन का आनाजाना लगा रहता थादुबई और कनाडा में रहते हुए सुनंदा पुष्कर कुछ ही सालों में बिलकुल बदल गईं. चालढाल, रंगरूप ही नहीं, उन का हर अंदाज बदल गया. इस बीच वह दुबई और कनाडा के संभ्रांत वर्ग में इतनी मशहूर हो गईं कि वहां की हर बड़ी पार्टी में नजर आने लगीं. चूंकि दिल्ली और मुंबई के बड़ेबड़े फैशन डिजाइनर उन के संपर्क में रहते थे, इसलिए वह मुंबई और दिल्ली के भी चक्कर लगाती रहती थीं. इवेंट मैनेजमेंट के बिजनैस में सुनंदा ने काफी पैसा कमाया. उन्होंने अपना ज्यादातर पैसा दुबई के रियल एस्टेट कारोबार में इनवैस्ट कर दिया था.

सुनंदा की तरह ही शशि थरूर की वैवाहिक जिंदगी में भी काफी उतारचढ़ाव रहे थे. यह अलग बात है कि बड़े लोगों की जिंदगी के उतारचढ़ाव भी उन की तरह ही बड़े होते हैं. केरल के इलावचेरी, पलक्कड़ में जन्मे शशि थरूर ने मुंबई के चैंपियन स्कूल और कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से शिक्षा हासिल करने के बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कालेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी. उन्हें फ्लेचर स्कूल औफ ला ऐंड डिप्लोमेसी से स्कौलरशिप भी मिली थी. 3 सालों के अंदर 2 विषयों में मास्टर डिग्री हासिल कर के उन्होंने महज 22 साल की उम्र में पीएचडी की थी. फ्लेचर स्कूल औफ ला ऐंड डिप्लोमेसी में उन के अलावा आज तक किसी ने इतनी कमउम्र में पीएचडी पूरी नहीं की. इस के बाद वह अमेरिका चले गए थे, जहां उन की नियुक्ति संयुक्त राष्ट्र के उपसचिव पद पर हो गई.

शशि थरूर जब कोलकाता के सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ रहे थे, तभी उन की मुलाकात मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू की नातिन तिलोत्तमा मुखोपाध्याय से हुई थी. वह भी शशि की तरह ही इंटेलेक्चुअल थीं. दोनों में पहले दोस्ती हुई, फिर प्रेम विवाह. तिलोत्तमा शशि के 2 जुड़वां बच्चों की मां भी बनीं, लेकिन पतिपत्नी में ज्यादा दिन नहीं निभ सकी और दोनों का तलाक हो गया. शशि थरूर जब अमेरिका में यूएनओ में कार्यरत थे, तभी उन का परिचय क्रिस्टा गाइल्स से हुआ जो वहीं संयुक्त राष्ट्र निरस्तीकरण आयोग की उपसचिव थीं. क्रिस्टा हैंडसम शशि की विद्वता, बौद्धिकता और खूबसूरती से इतनी प्रभावित हुईं कि उन से प्यार करने लगीं. शशि भी क्रिस्टा के प्यार में पागल थे.

चूंकि दोनों की चाह एक ही थी, इसलिए सन 2007 में दोनों ने शादी कर ली. हालांकि क्रिस्टा के घर वाले कतई नहीं चाहते थे कि वह एक दिलफेंक भारतीय से शादी करें. कह सकते हैं, क्रिस्टा गाइल्स ने अपने परिवार की मरजी के खिलाफ जा कर शशि थरूर से शादी की थी. अगले 3 सालों तक थरूर और क्रिस्टा गाइल्स के बीच सब कुछ ठीकठाक चला. इसी बीच शशि थरूर यूएनओ की नौकरी छोड़ कर राजनीति में किस्मत आजमाने के लिए भारत गए थेक्रिस्टा भी अपना सब कुछ छोड़छाड़ कर उन के साथ गईं. शशि के लिए उन्होंने अपनी नौकरी तक छोड़ दी और उन के साथसाथ उन के परिवार को भी अपना लिया.

राष्ट्र संघ में उच्च पद पर रहने के कारण शशि थरूर के नेहरूगांधी परिवार से करीबी रिश्ते बन गए थे. उन्हें इस का लाभ मिला. सन 2009 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर केरल से लोकसभा का चुनाव लड़ा. उस समय क्रिस्टा केवल उन के साथ थीं, बल्कि उन्होंने थरूर का चुनाव प्रचार भी किया. शशि थरूर चुनाव जीत गए. सोनिया गांधी से नजदीकियां होने के कारण उन्हें विदेश राज्यमंत्री बनाया गया. पहली बार चुनाव लड़ कर जीतने के बाद सांसद बनना और फिर मंत्री पद मिल जाना आसान नहीं होता. लेकिन आला कमान की नेक नजर की वजह से शशि थरूर के लिए सब कुछ आसान हो गया था.

विदेश राज्यमंत्री रहते ही सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर की पहली मुलाकात दुबई की एक पार्टी में तब हुई, जब वह एक सरकारी दौरे पर वहां गए थे. सुनंदा आकर्षक व्यक्तित्व की खूबसूरत महिला थीं. रसिया स्वभाव के थरूर सुनंदा पुष्कर की खूबसूरती और अदाओं से बहुत प्रभावित हुए. इस के कुछ समय बाद सन 2010 में शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की दूसरी मुलाकात दिवंगत नेता जितेंद्र प्रसाद के बेटे और कांग्रेस सांसद जितिन प्रसाद की दिल्ली में हुई शादी की रिसैप्शन पार्टी में हुई. तब तक आशिकमिजाज थरूर के दिलोदिमाग से क्रिस्टा गाइल्स के प्यार का खुमार उतरने लगा था

फलस्वरूप वह खूबसूरत सुनंदा पुष्कर की ओर आकर्षित हो कर उन से नजदीकियां बनाने लगे. सुनंदा भी उन केप्रभावशाली व्यक्तित्व और विदेश राज्यमंत्री जैसे ऊंचे ओहदे से प्रभावित हुए बिना रह सकीं. रिसैप्शन पार्टी में लंबी बातचीत के बाद दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए. सुनंदा होटल मौर्या शेरेटन में ठहरी थीं. दोनों के बीच उसी शाम मोबाइल पर लंबी बात हुई और फिर अगले ही दिन दोनों की होटल मौर्या शेरेटन में अकेले में पहली मुलाकात हुई.

इस के बाद दोनों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. दोनों अकसर होटल सम्राट, हयात रिजेंसी, अशोका जैसे 5 सितारा होटलों में लंच और कैंडल लाइट डिनर पर मिलने लगे. पति की मौत के बाद से सुनंदा अकेली थीं. उन्हें एक सशक्त व्यक्ति के सहारे की जरूरत थी. शशि थरूर विदेश राज्य मंत्री थे सुंदर और दर्शनीय व्यक्तित्व वाले. सुनंदा उन में अपना सहारा ढूंढने लगीं. रसिया स्वभाव के शशि थरूर यही चाहते थे. सो दोनों ने एक दूसरे के सामने अपने प्यार का इजहार कर दिया. सुनंदा पुष्कर की खूबसूरती के मोहपाश में बंध कर वह अपनी पत्नी क्रिस्टा गाइल्स को भूल गए

इसी बीच शिलांग में एक सरकारी समारोह हुआ तो शशि थरूर सुनंदा के साथ केवल इस समारोह में शामिल हुए, बल्कि एक 5 सितारा होटल के प्रेसीडेंशियल सुइट में साथसाथ ठहरे भी. तब तक दोनों केवल खुद को एकदूसरे को सौंप चुके थे, बल्कि दोनों ने अपने भविष्य की राह भी तय कर ली थी. इस के बाद उच्च वर्ग और राजनीतिक गलियारों में शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की नजदीकियों की चरचा आम हो गई थी.

क्रिस्टा गाइल्स ने अपने सुनहरे भविष्य को दांव पर लगा कर शशि थरूर से प्रेम विवाह किया था. जब उन्हें थरूर के इस नए इश्क और बेवफाई का पता चला तो उन्होंने शशि थरूर से अलग हो कर स्वदेश लौटने का फैसला कर लिया. अमेरिका लौटने से पहले क्रिस्टा ने शशि थरूर के नए प्रेम प्रकरण का जिक्र करते हुए उन के नाम एक भावुक पत्र लिखा, जिस में उन्होंने अपना संबंध खत्म करने की बात कही. उन्होंने पत्र में इस बात का भी जिक्र किया था कि वह जब चाहे तलाक के पेपर भेज दें, वह साइन कर देगी. इस पत्र की एक कौपी उन्होंने सोनिया गांधी को भी भेजी थी. लेकिन इसे शशि थरूर का निजी मामला समझ कर किसी ने टांग नहीं अड़ाई. बस इस के बाद सुनंदा और शशि थरूर की मोहब्बत रंग लाने लगी.

दोनों को अकसर साथसाथ देखा जाने लगा. ऐसा लगता था कि दोनों ने साथसाथ रहने का फैसला कर लिया था. शिलांग के एक 5 सितारा होटल के प्रेसीडेंशियल सुइट में साथसाथ रात गुजारने के बाद शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की प्रेमकहानी खुल कर सामने गई थी. थरूर ने अपने पद की मर्यादा के मद्देनजर उस वक्त इस बात को भले ही स्वीकार नहीं किया, लेकिन सुनंदा ने यह कहना जरूर शुरू कर दिया था कि क्रिस्टा गाइल्स से तलाक होते ही वह और शशि शादी कर लेंगे. इस के बाद सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर अकसर अखबारों की सुर्खियों में रहने लगे थे. लेकिन वह शादी कर पाते इस से पहले ही आईपीएल का विवाद सामने गया

आईपीएल के निलंबित कमिश्नर ललित मोदी ने ट्वीट कर के आरोप लगाया था कि शशि थरूर ने अपने प्रभाव का नाजायज इस्तेमाल कर के कोच्चि टीम खरीदने में रांदेवू स्पोर्ट्स की मदद की, जिस के बदले में इस टीम का 19 प्रतिशत हिस्सा (लगभग 75 करोड़) उन की गर्लफ्रैंड सुनंदा पुष्कर के खाते में गया. इस बात को ले कर नरेंद्र मोदी ने उस वक्त सुनंदा पुष्कर को 50 करोड़ की गर्लफ्रैंड कहा था, जिस के जवाब में शशि थरूर ने ट्वीट कर के जवाब दिया था कि सुनंदा प्राइसलेस हैं. बहरहाल अपनी ओर से सफाई दिए जाने के बाद भी इस विवाद के चलते शशि थरूर को अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा.

इस विवाद के 4 महीने बाद शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर ने अगस्त, 2010 में केरल स्थित पलक्कड़ के इलावचेरी में शादी कर ली. यह शादी थरूर के पुश्तैनी घर पर उन के परिवार वालों के बीच पारंपरिक तरीके से हुई. इस शादी में सुनंदा पुष्कर का परिवार भले ही शामिल नहीं हुआ, लेकिन तब तक अपने परिवार से उन के रिश्ते सामान्य हो गए थे. शादी के बाद सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर ज्यादातर साथसाथ देखे जाते थे. यह अलग बात है कि बड़े लोगों की तरह दोनों की कुछ अलगअलग राहें भी थीं. मसलन शशि थरूर अपनी राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहते थे और सुनंदा पुष्कर उच्चवर्ग की महिलाओं और दिल्ली, मुंबई और दुबई में देर रात तक चलने वाली पार्टियों में.

थरूर अपनी राजनैतिक छवि को साफसुथरा बनाए रखने के लिए ऐसी पार्टियों में जाने से बचते थे. बहरहाल थरूर की जिंदगी में आने के बाद सुनंदा का रुतबा तो बढ़ ही गया था, वह खुद को मानसिक और सामाजिक स्तर पर सुरक्षित भी समझने लगी थीं. नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनैतिक बयानबाजी में सुनंदा पुष्कर को भले ही 50 करोड़ की गर्लफ्रैंड बताया था, लेकिन हकीकत में सुनंदा स्वयं करीब 113 करोड़ रुपए की चलअचल संपत्ति की मालकिन थीं, जिस का शशि थरूर से कोई लेनादेना नहीं था. दुबई में उन के 12 अपार्टमेंट और एक स्पा तो था ही, उन्होंने कनाडा में भी एक शानदार अपार्टमेंट खरीद रखा था. जम्मू में भी उन की काफी जमीनजायदाद थी. इस के अलावा उन के पास 7 करोड़ रुपए की ज्वैलरी और डिजाइनर घडि़यों के साथसाथ करीब इतनी ही नकद रकम बैंकों में जमा थी

सुनंदा पुष्कर अपने बेटे शिव मेनन का भविष्य मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में बनाना चाहती थीं. इस के लिए उन्होंने शिव को अनुपम खेर के ऐक्टिंग स्कूल में दाखिला भी दिला दिया था. मुंबई की पेज-3 पार्टियों में शामिल होते रहने की वजह से वह बड़ेबड़े निर्मातानिर्देशकों और हीरोहीरोइनों को जानती थीं, इसलिए बेटे को फिल्मों में काम दिलाना उन के लिए मुश्किल नहीं थाशशि थरूर और सुनंदा पुष्कर की जिंदगी में सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. दोनों की अपनीअपनी रंगीन लाइफ थी. तभी अचानक इन दोनों की जिंदगी में एक त्रिकोण गया. उन की प्रेमकहानी का तीसरा कोण बनी मेहर तरार

दरअसल, शशि थरूर शुरू से ही रसिया स्वभाव के रहे थे, ट्विटर के शौकीन भी. कहा जाता है, उन का ज्यादातर खाली समय ट्विटर पर बीतता था. इसी के चलते उन के संपर्क में आईं 45 वर्षीया पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार. पाकिस्तानी मीडिया में खूबसूरती के लिए जानी जाने वाली मेहर तरार का संबंध पाकिस्तान के एक संभ्रांत परिवार से है. उन्होंने वेस्ट वर्जीनिया यूनिवसिर्टी से जर्नलिस्ट की डिग्री लेने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था. उन्होंने बहरीन बेस्ड एक बड़े बिजनैसमैन से शादी की थी. फिलहाल वह पति से कुछ मतभेदों के चलते अपने 13 वर्षीय बेटे के साथ पाकिस्तान में अकेली रह रही हैं और एक बिजनैस न्यूज चैनल से जुड़ी हैं.

ट्विटर के जरिए संपर्क में आई मेहर तरार से थरूर का संपर्क बढ़ा तो वह 7 अप्रैल, 2013 को भारत आईं. मकसद था शशि थरूर का इंटरव्यू. इंटरव्यू सुनंदा पुष्कर के सामने ही हुआ. लेकिन कुछ कारणों से उन्हें शशि और मेहर का घुलमिल कर बातें करना अच्छा नहीं लगा. उसी दौरान मेहर ने शशि थरूर के सामने यह इच्छा भी जाहिर की कि वह केरल पर एक किताब लिखना चाहती हैं. इस के बाद शशि थरूर और मेहर तरार की अगली मुलाकात जून, 2013 में दुबई की एक पार्टी में हुई. सुनंदा उस समय भी साथ थीं. मेहर ने अपने कौलम में भी और वैसे भी शशि थरूर की कुछ ज्यादा ही तारीफ की थी, इसलिए सुनंदा ने उन्हें पसंद नहीं किया था और पूरी कोशिश की थी कि दोनों दूरदूर रहें. लेकिन ऐसा नहीं हो सका और शशि थरूर और मेहर तरार ट्विटर और मोबाइल फोन के जरिए एकदूसरे से बराबर संपर्क बनाए रहे.

हालांकि सुनंदा पुष्कर जुलाई, 2013 से ही इस का विरोध कर रही थीं. जब शशि थरूर और मेहर तरार ट्विटर पर जुडे़ रहे तो सुनंदा पुष्कर को गहरी ठेस पहुंची. वह तनावग्रस्त रहने लगीं. दरअसल वह अपने पति के रसिया स्वभाव को अच्छी तरह जानती थीं. इसलिए उन्हें लग रहा था कि जिस आदमी के लिए उन्होंने हर तरह के समझौते किए, सामाजिक आलोचनाएं झेलीं, वह उन से बेवफाई कर रहा है. इसी बात को ले कर शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर के बीच मतभेद रहने लगे. इसी के चलते उन्होंने ट्विटर पर शशि थरूर और मेहर तरार की पोल खोलनी शुरू कर दी. फलस्वरूप बात बढ़ती गई. इसे ले कर शशि थरूर और सुनंदा के बीच बात काफी बढ़ गई थी.

जब यह बात मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो गई तो शशि थरूर परेशान हुए. उन्होंने सुनंदा को कैसे मनाया, यह तो वही जानें, लेकिन उस वक्त वह मान गई थीं. चूंकि शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर दोनों ही उस वर्ग से थे, जिस की एकएक गतिविधि पर निगाह रखी जाती है. इसलिए दोनों को संयुक्त रूप से बयान देना पड़ा कि उन के दांपत्यजीवन में सब कुछ ठीक है. शशि थरूर निस्संदेह विद्वान व्यक्ति हैं. उन्होंने कई किताबें लिखी हैं, ह्यूमन राइट्स पर दिए गए उन के भाषणों को खूब सराहा गया था. लेकिन पिछले 2-3 सालों में उन की सारी विद्वता ट्विटर के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई थी. उन के 20 लाख से भी अधिक फालोअर्स थे. ट्विटर प्रेम के आगे उन्हें अपनी पत्नी सुनंदा पुष्कर भी महत्त्वहीन लगती थीं. शायद इसीलिए सुनंदा ने एक टीवी चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में कहा था कि ट्विटर उन की सौतन है.

उन के पति उस वक्त भी ट्वीट करते रहते हैं, जब उन्हें उन के प्यार में डूबा होना चाहिए. सुनंदा पुष्कर ट्विटर को ज्यादा पसंद नहीं करती थीं. इस के बावजूद जब उन्हें लगा कि पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार ट्विटर और मोबाइल के माध्यम से शशि के वजूद पर हावी होने की कोशिश कर रही हैं तो उन्होंने ट्विटर का सहारा लिया. इसी दौरान उन्होंने मेहर तरार पर कई आरोप लगाए. सुनंदा द्वारा बारबार चेतावनी देने के बावजूद जब ट्विटर के माध्यम से मेहर और शशि थरूर की नजदीकियां बढ़ती गईं तो सुनंदा पुष्कर खुद को असुरक्षित महसूस करने लगीं.

सुनंदा पिछले कुछ समय से बीमार चल रही थीं. बताया जाता है कि वह पेट की टीबी और लुपस नाम के औटो इम्यून डिसौर्डर से पीडि़त थीं. इस के इलाज के लिए वह 1-2 बार विदेश भी गई थीं. इन बीमारियों के सिलसिले में केरल इंस्टीट्यूट औफ मैडिकल कालेज में उन के कई टेस्ट भी हुए थे और फिलहाल तिरुवनंतपुरम के किंग्स जौर्ज हौस्पिटल में उन का इलाज चल रहा था. लेकिन बताया जाता है कि उन की ये बीमारियां ज्यादा गंभीर नहीं थीं. 15 जनवरी को शशि और सुनंदा जब हवाईजहाज से तिरुवनंतपुरम से दिल्ली लौट रहे थे तो सफर के दौरान दोनों का खूब झगड़ा हुआ था. वजह यह बताई जाती है कि शशि थरूर ने सुनंदा की चेतावनी के बावजूद अपने मोबाइल में हरीश नाम से मेहर तरार का नंबर सेव कर रखा था, जो सुनंदा ने देख लिया था.

यह उन्हें सरासर बेवफाई लगी थी और इस से वह बुरी तरह टूट गई थीं. दोनों के इस झगड़े की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर कर सुनंदा वाशरूम चली गई थीं और आधे घंटे तक बाहर नहीं आई थीं. काफी देर इंतजार के बाद शशि थरूर गुस्से में अकेले ही अपने लोधी एस्टेट वाले बंगले पर चले गए थे. जबकि सुनंदा आधा घंटा बाद वाशरूम से बाहर आईं और चाणक्यपुरी स्थित होटल लीला पैलेस चली गईं, जहां शशि थरूर ने सुइट बुक करा रखा था. लीला पैलेस में सुइट बुक कराए जाने की वजह यह बताई जाती है कि थरूर के लोधी एस्टेट के बंगले में व्हाइट वाश चल रहा था और सुनंदा पुष्कर को इस से एलर्जी थी.

उसी दिन सुनंदा ने पति का ट्विटर एकाउंट हैक किया और मेहर तरार को खूब खरीखोटी सुनाई. यहां तक कि उन्होंने मेहर तरार को आईएसआई का एजेंट तक बताया. उस रोज उन दोनों के बीच अच्छाभला ट्विटर वार चला. बाद में शशि थरूर भी लीला पैलेस गए थे. उन्हें जब इस की जानकारी हुई तो उन्होंने ट्वीट कर के सफाई दी कि उन का एकाउंट हैक कर लिया गया था. इस के बाद शायद पतिपत्नी में समझौता हो गया था, क्योंकि अगले दिन यानी 16 जनवरी को दोनों ने संयुक्त बयान जारी कर के कहा कि उन के दांपत्य जीवन में सब कुछ ठीक है. 17 जनवरी को शशि थरूर सुबह साढ़े 6 बजे ही होटल से निकल गए थे. बताया जाता है कि उस रात सुनंदा और शशि के बीच खूब झगड़ा हुआ था जो रात साढ़े 4 बजे तक चला था.

इस झगड़े के बाद शशि थरूर को सोफे पर सोना पड़ा था. जबकि सुनंदा बेड पर सोई थीं. अनुमान है कि सुनंदा के हाथों और मुंह पर चोटें इसी झगड़े के दौरान हाथापाई में आई थीं. अगली सुबह यानी 17 जनवरी को शशि थरूर सुबह साढ़े 6 बजे ही होटल से निकल गए थे. उसी रात लगभग साढ़े 8 बजे सुनंदा पुष्कर होटल लीला पैलेस के अपने कमरा नंबर 345 में मृत पाई गईं. उन की मौत का पता तब चला जब सुबह साढ़े 6 बजे होटल से निकले शशि थरूर रात को लगभग साढ़े 8 बजे वापस लौटे. उस वक्त कमरे का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. दरवाजा खोल कर शशि थरूर अंदर पहुंचे तो सुनंदा बेड पर मरी पड़ी थीं. उस वक्त वह रजाई ओढ़े थीं और दोनों हाथ रजाई के अंदर थे.

कह सकते हैं, वह सामान्य स्थिति में सोई हुई लग रही थीं. उन की स्थिति देख कर थरूर को होटल के स्टाफ को बुलाना पड़ा. प्राथमिक जांच के बाद सुनंदा का शव पोस्टमार्टम के लिए एम्स भेज दिया गया. अगले दिन वीडियोग्राफी के साथ 3 डाक्टरों के पैनल ने सुनंदा के शव का पोस्टमार्टम किया. पता चला सुनंदा पुष्कर की मौत अप्राकृतिक और आकस्मिक थी, जो दवा के ओवरडोज की वजह से हुई थी. उन के शरीर पर चोटों के जो 10 निशान पाए गए, वह संभवत: घरेलू झगड़े की वजह से आए थे, जिन का उन की मौत से कोई संबंध नहीं था. इन में से एक हाथ की हथेली में दांत से काटने का गहरा निशान था, जिस की फोरेंसिक जांच के लिए उस जगह की चमड़ी सुरक्षित रख ली गई. इस के साथ ही सुनंदा के पेट का विसरा भी जांच के लिए रखा गया. पोस्टमार्टम के बाद उसी दिन लोदी रोड श्मशान घाट पर उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर की शादी को चूंकि अभी 7 साल पूरे नहीं हुए थे, इसलिए सीआरपीसी की धारा 176 के तहत इस मामले की जांच वसंत विहार के एसडीएम आलोक शर्मा को सौंपी गई. उन्होंने इस सिलसिले में सीनियर जर्नलिस्ट नलिनी सिंह, सुनंदा के भाई कर्नल राजेश, बेटे शिव मेनन, शशि थरूर, उन के पर्सनल सेक्रैटरी अभिनव और होटल के 2 अटेंडेंट आदि 8 लोगों के बयान लिए. उन्हें शशि थरूर के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला था. नलिनी सिंह का बयान इसलिए लिया गया, क्योंकि उन से सुनंदा की काफी लंबी बात हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट और बया%A

दूसरी पत्नी ने कहा पहली पत्नी का गला काटो, तब आऊंगी सुसराल

इंसान अपने स्वाथो के चलते कभीकभी इतना वहशी दरिंदा बन जाता है कि स्वाथो के आगउसे इंसान की जान सस्ती लगती है. इस दोहरे हत्याकांड में भी ऐसा ही कुछ हुआ. ममता और उस का बेटा तो मारे ही गए, बचा वाहिद भी…  

18 मार्च, 2018 को सुबह के यही कोई 10 बजे थे. चिमियावली गांव के निकट गेहूं के खेत में गांव वालों ने एक महिला उस के 100 मीटर दूर एक बच्चे की नग्न अवस्था में सिर कटी लाश पड़ी देखीं. यह गांव उत्तर प्रदेश के जिला संभल के थाना कोतवाली के अंतर्गत आता है. गांव वालों ने यह बात गांव के चौकीदार रामरतन को बताई. चौकीदार रामरतन तुरंत उस खेत में पहुंच गया जहां लाशें पड़ी थीं. 2-2 लाशें देख कर वह भी चौंक गया. उस ने फोन द्वारा इस की सूचना थानाप्रभारी अनिल समानिया को दे दी. 2 लाशों की खबर मिलते ही अनिल समानिया पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए

उन्होंने दोनों लाशों का निरीक्षण किया तो वहां पड़े खून से लग रहा था कि उन की हत्याएं वहीं पर ही की गई थीं. दोनों के सिर धड़ से गायब थे. साथ में उन के ऊपर कोई कपड़ा भी नहीं था. मृत महिला के एक हाथ की खाल भी कुछ जगह से गायब थी. इस से यह अनुमान लगाया कि उस महिला के हाथ पर उस का नाम या पहचान की कोई चीज गुदी हुई होगी. महिला की पहचान हो सके, इसलिए हत्यारे ने हाथ के उतने हिस्से की खाल ही काट दी थी. अपने उच्चाधिकारियों को इस लोमहर्षक मामले की जानकारी देने के बाद थानाप्रभारी आसपास के क्षेत्र में दोनों मृतकों के सिर तलाशने लगे

इस काम में गांव वाले भी उन का साथ दे रहे थे. काफी खोजबीन के बाद भी उन के सिर नहीं मिल सके. लेकिन वहां पर मृतकों के कपड़े और चप्पलें जरूर मिल गईं, 2 जोड़ी चप्पलों के अलावा वहां छोटे बच्चे की एक जोड़ी चप्पलें और मिली. जब मरने वाले 2 लोग हैं तो यह तीसरी जोड़ी चप्पल किस बच्चे की है, यह बात पुलिस नहीं समझ सकी. बिना सिर के लाशों की शिनाख्त करना आसान नहीं था. थानाप्रभारी द्वारा सिरविहीन 2 लाशों की सूचना एसपी रविशंकर छवि और एएसपी पंकज कुमार पांडे को दे दी गई. कुछ देर में दोनों पुलिस अधिकारी भी चिमियावली गांव के उस गेहूं के खेत में पहुंच गए, जहां दोनों लाशें पड़ी थीं

अधिकारियों ने मौका मुआयना करने के बाद गांवों वालों से लाशों की शिनाख्त के लिए बात की उन्हें मृतकों के कपड़े दिखाए. लेकिन कोई भी उन्हें नहीं पहचान सका. मौके पर फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया गया. घटनास्थल पर मिले सारे सबूतों को पुलिस ने जब्त कर लिया. घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने दोनों लाशों को सुरक्षित रखवाने के लिए जिला चिकित्सालय भेज दिया और चौकीदार रामरतन की तरफ से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

सिर विहीन 2 लाशें मिलने की खबर कुछ ही देर में पूरे शहर में फैल गई. सभी लोग आपस में यही चर्चा कर रहे थे कि पता नहीं शव किस के हैं. मालूम मृतक कहां के रहने वाले थे. उधर थानाप्रभारी भी इस बात को ले कर परेशान थे कि इन लाशों की शिनाख्त कैसे कराई जाए. शिनाख्त के बाद ही हत्यारों तक पहुंचा जा सकता था. लिहाजा शिनाख्त के लिए जिले के समस्त थानों में वायरलैस द्वारा इन अज्ञात लाशों के मिलने की सूचना प्रसारित कर यह जानकारी जाननी चाही कि कहीं किसी थाने में एक महिला और बच्चे की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. पर पुलिस की इन कोशिशों से भी कोई सफलता नहीं मिली. आखिर पुलिस ने दोनों शवों का पोस्टमार्टम करा कर  उन का अंतिम संस्कार करा दिया.

8-10 दिन बीत गए लेकिन मृतकों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. थानाप्रभारी के दिमाग में यह बात भी आई कि कहीं दोनों मृतक किसी दूसरे जिले के रहने वाले तो नहीं हैं. इस के बाद एसपी के माध्यम से सिरविहीन 2 लाशों के बरामद करने की सूचना सीमावर्ती जिलों के थानों में भी भेज दी गई. इसी बीच पहली अप्रैल, 2018 को थानाप्रभारी को चिमियावली गांव के पास बहने वाली सोन नदी के किनारे एक महिला का सिर पड़े होने की जानकारी मिली तो वह वहां पहुंच गए और सिर को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. वह सिर 18 मार्च को बरामद हुई सिरविहीन महिला की लाश का है या नहीं, इस की पुष्टि डीएनए जांच के बाद ही हो सकती थी

इस के 8 दिन बाद यानी 8 अप्रैल को पुलिस ने मोहम्मदपुर मालनी गांव के जंगल से एक बच्चे का सिर बरामद कर लिया. उस का मांस जंगली जानवर खा चुके थे. अब इस बात की आशंका प्रबल हो गई कि यह दोनों सिर पूर्व में बरामद की गई दोनों लाशों के ही होंगे. मुरादाबाद बरेली परिक्षेत्र के एडीजी प्रेमप्रकाश को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने मुरादाबाद रेंज के आईजी विनोद कुमार से बात कर इस मामले को गंभीरता से लेने को कहा. एडीजी प्रेमप्रकाश बहुत सुलझे हुए अफसर थे. जब वह मुरादाबाद के एसएसपी थे तो उन्होंने चर्चित किडनी कांड को सुलझा कर डा. अमित को सलाखों के पीछे पहुंचाया था. इस के अलावा उन्होंने बावन खेड़ी में एक ही परिवार के 7 लोगों की निर्मम तरीके से की गई हत्या के मामले को सुलझा कर शबनम और उस के प्रेमी को जेल भिजवाया था. एडीजी की इस दोहरे मर्डर पर भी निगाह बनी हुई थी.

एडीजी प्रेमप्रकाश का निर्देश मिलते ही आईजी विनोद कुमार ने संभल के एसपी रविशंकर छवि और एएसपी पंकज कुमार पांडे के साथ मीटिंग कर इस केस को जल्द से जल्द खोलने के लिए कहा. इस के बाद तो थानाप्रभारी अनिल समानिया के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम इस केस को खोलने में जुट गई. उन्होंने मुखबिरों को भी लगा दिया. 14 अप्रैल को चिमियावली गांव के चौकीदार रामरतन ने थानाप्रभारी अनिल समानिया को सटीक सूचना देते हुए कहा कि गांव के हिस्ट्रीशीटर कलुआ के घर 3-4 साल की एक लड़की आई हुई है. वह लड़की बारबार रोरो कर कहती है कि मुझे मेरी मम्मी से मिलवाओ. यह बात मुझे गांव की औरतों ने बताई है. उन औरतों में भी इस बात की चर्चा है कि कलुआ के परिवार में यह लड़की पता नहीं कहां से गई.

इतना सुनते ही थानाप्रभारी का माथा ठनका. उन के दिमाग में एक बात घूम गई कि उन दोनों के शवों के पास भी पुलिस को 1 छोटे बच्चे की एक जोड़ी चप्पलें मिली थीं. अनिल समानिया ने बगैर देर किए गांव चिमियावली का रुख किया. वह कलुआ के घर पहुंच गए. उन्हें वहां 4 साल की बच्ची दिखी. बच्ची के बारे में उन्होंने पूछा तो कलुआ ने बताया, ‘‘यह बच्ची मेरी खाला की लड़की है.’’

‘‘यह तुम्हारे पास क्यों है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, यह मेरी लड़की अरमाना के साथ गई है. कुछ दिन यहां रह कर अपने घर चली जाएगी.’’

कलुआ पहले बदमाश था. अब वह करीब 80 साल का बुजुर्ग था. उन्होंने सोचा कि शायद यह सच बोल रहा होगा. क्योंकि जवानी में चाहे कितना भी बड़ा अपराधी रहा हो, उम्र की इस ढलान पर आदमी सीधा सच ही चलता हैथानाप्रभारी ने घटनास्थल से जो छोटे बच्चे की चप्पलें बरामद की थीं उन्हें वह अपने साथ लाए थे. वह कार में रखी थीं. एसआई वीरेंद्र सिंह से उन्होंने चप्पलें मंगा कर उस बच्ची को दिखाईं तो वह उन चप्पलों को देख कर खुश हो गई. उस ने कहा, ‘‘यह चप्पलें तो मेरी है.’’ बच्ची फिर बोली, ‘‘मेरी मम्मी कहां हैं.’’

‘‘मम्मी गई, बाहर है.’’ अनिल समानिया ने कहा तो वह बच्ची अपनी मां को देखने के लिए बाहर की तरफ भागी. इस के बाद अनिल समानिया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वह कलुआ से बोले, ‘‘मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इस उम्र में भी…’’ इतना सुनते ही कलुआ ने नजरें नीची कर लींवह बोला, ‘‘साहब, मजबूरी ऐसी गई थी कि मैं बेबस हो गया था. क्या बताऊं साहब यह सब करतूत मेरे दामाद वाहिद की है. यदि उस ने मेरी बेटी को धोखा दिया होता तो मुझे इस उम्र में यह सब करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता.’’ 

उस ने इस दोहरे हत्याकांड का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने बताया मरने वाली महिला का नाम ममता था और दूसरा उस का 10 साल का बेटा करनपाल था. ममता उस के दामाद वाहिद की पहली पत्नी थी. इस बहुचर्चित केस के खुलने पर अनिल समानिया ने राहत की सांस ली और इस की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी. केस खुलने की सूचना मिलते ही एसपी रविशंकर छवि थाने पहुंच गए. उन के सामने कलुआ से पूछताछ की गई तो पता चला कि ममता और उस के बेटे की हत्या में कलुआ के अलावा उस की पत्नी सूफिया, बेटी अरमाना, दामाद वाहिद और दामाद का भाई गुड्डू शामिल थे

पुलिस ने दबिश दी तो गुड्डू के अलावा सारे आरोपी गिरफ्त में गए. इन सभी से पूछताछ करने के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई वह दिल दहला देने वाली थी. ममता मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर के गांव लहराबल की मूल निवासी थी. उस के पिता अखबारों के हौकर थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा ममता एकलौती बेटी थी. उन की घरगृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. लेकिन उसी दौरान वह हत्या के एक मामले में जेल चले गए. उसी दौरान उन की पत्नी का भी देहांत हो गया. ऐसे में ममता बेसहारा हो गई तब नातेरिश्तेदारों ने उस की देखभाल की.

ममता के पिता जब जमानत पर जेल से बाहर आए तो वह शाहजहांपुर से बेटी के साथ गाजियाबाद गए. यह बात करीब 12 साल पहले की है. पिता ने किराए का मकान ले कर मेहनतमजदूरी की. ममता भी जवान हो चुकी थी. इसी दौरान सुनील नाम के एक युवक से ममता की आंखें लड़ गईं. वक्त के साथ दोनों के प्यार के दरिया में बहुत आगे तक तैर चुके थे. बाद में उन्होंने शादी कर ली. सुनील टैक्सी ड्राइवर था. ममता के पिता इस शादी के खिलाफ थे. पर ममता ने उन की भावनाओं की कद्र नहीं की. सुनील के साथ गृहस्थी बसा कर वह खुश थी. वह 2 बच्चों की मां भी बन गई. जिस में बड़ा बेटा करनपाल था और छोटी बेटी मंजू.

बेटी के फैसले से पिता इतने आहत हुए कि उन का भी देहांत हो गया. ममता के पति सुनील में भी बदलाव गया. वह शराब पीने लगा. ममता उसे पीने से मना करती तो वह उस से झगड़ा करता और पिटाई भी कर देता था. अब वह ममता पर शक करने लगा कि उस का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. पति के इस व्यवहार पर ममता भी तनाव में रहने लगी. फिर एक दिन ममता पर ऐसी विपत्ति आन पड़ी, जिस की उस ने कल्पना तक नहीं की थी. जिस सुनील के लिए ममता ने अपने पिता तक को त्याग दिया था, एक दिन वही सुनील ममता और उस के दोनों बच्चों को छोड़ कर कहीं चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया.

ममता बेसहारा हो गई थी. अकेली औरत का वैसे भी लोग जीना मुश्किल कर देते हैं. ममता के पास तो 2 बच्चे भी थे. वह घर का खर्चा कहां से और कैसे चलाती. इस मोड़ पर फंस कर वह कई लोगों द्वारा छली गई. ममता ने भी हालात से समझौता कर लिया था. इसी बीच वह मेरठ में रहने वाले कलुआ नाम के औटो ड्राइवर के संपर्क में आईकलुआ के बराबर वाले मकान में वाहिद नाम का युवक रहता था. वाहिद भी आटो चलाता था. वह अविवाहित था इसलिए ममता ने उस के साथ ही गृहस्थी बसाने की सोच ली. वाहिद भी ममता को प्यार करता था. वह उस के साथ निकाह करने को तैयार हो गया

वाहिद ममता और उस के दोनों बच्चों को ले कर मेरठ से नोएडा गया. वहीं पर इसलाम धर्म के रीतिरिवाज से वाहिद ने ममता से निकाह कर लिया. इस से पहले ममता का नाम बदल कर शाहीन रख दिया गया था. बड़े बेटे करनपाल का नाम बदल कर समीर लड़की मंजू का नाम जैनब रख दिया था.  लवाहिद का भाई गुड्डू ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में रहता था, जो वेल्डिंग का काम करता था. वाहिद, ममता और उस के बच्चे को ले कर वहीं पर पहुंच गया. वह सब रहने लगे. वाहिद आटो चलाने गाजियाबाद चला जाता था, जबकि ममता ग्रेटर नोएडा के फ्लैटों में साफसफाई का काम करने निकल जाती थी. दोनों की कमाई से घर ठीकठाक चल रहा था

वाहिद और ममता की शादी की बात सिर्फ गुड्डू ही जानता था. इस के अलावा वाहिद के घर के किसी भी सदस्य को पता नहीं था कि वाहिद ने 2 बच्चों की मां से शादी कर ली है. वाहिद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की तहसील बिसौली के गांव भमौरी का रहने वाला था. वाहिद  ने उस का नाम शाहीन जरूर रख दिया था, लेकिन वह उसे ममता के नाम से ही बुलाता था. एक दिन वाहिद ने ममता उर्फ शाहीन से कहा, ‘‘ममता यहां ग्रेटर नोएडा में महंगाई ज्यादा है. ऐसा करते हैं कि हम लोग उधर ही चलते हैं. वहां गांव में मेरा अपना घर है, जमीनजायदाद भी है, मैं वहीं आटो चला लूंगा.’’

ममता उर्फ शाहीन ने पति वाहिद की बात पर कोई एतराज नहीं किया. इस पर वाहिद ममता और दोनों बच्चों को ले कर बिसौली के नजदीक चंदौसी शहर पहुंच गया. चंदौसी के मोहल्ला वारिश नगर में उस ने एक मकान किराए पर ले लिया. यह करीब 6 महीने पहले की बात है. चूंकि चंदौसी से उस का गांव भी नजदीक ही था, इसलिए वह अकेला अपने मांबाप से मिलने गांव भी जाता रहता था. उसी दौरान वाहिद के घर वालों ने संभल जिले के गांव चिमियावली के रहने वाले कलुआ की बेटी अरमाना से उस का रिश्ता तय कर दिया. उस समय वाहिद ने घर वालों को यह तक बताने की हिम्मत नहीं की थी कि उस ने शादी कर रखी है. रिश्ता तय होने के बाद वह कईकई दिन अपने गांव में रुक कर आता

ममता ने इस बात पर कभी चर्चा तक नहीं की कि वह इतने दिन गांव में क्यों रुकता है. ही उसे उस की शादी तय होने की कोई भनक लगी. वह तो उस पर अटूट विश्वास करती थी. आननफानन में वाहिद का अरमाना से निकाह भी हो गया. इस के बावजूद ममता अनभिज्ञ बनी रही. जब वाहिद हफ्ता दो हफ्ता बाद ममता के पास लौटता तो वह कह देता कि वह मुरादाबाद में रह कर आटो चला रहा है, इसलिए वहीं रुक जाता है. वह ममता को खर्च के पैसे देता रहता थाएक दिन ममता अचानक ही अपने दोनों बच्चों को ले कर वाहिद के गांव भमौरी पहुंच गई. भमौरी गांव चंदौसी के पास ही थी. वहां पर ममता को पता चला कि उस के पति ने उसे धोखे में रख कर संभल की एक लड़की से निकाह कर लिया है

यह जानकारी मिलते ही ममता आगबबूला हो गई. उस ने गांव में हंगामा करना शुरू कर दिया. उस ने पूरे गांव वालों को बताया कि मैं वाहिद की निकाह की हुई बीवी हूं. ससुराल में पहला हक मेरा बनता है. मुझ से तलाक लिए बगैर उस ने दूसरी शादी कैसे कर ली. इतना ही नहीं ममता ने पुलिस से शिकायत करने की धमकी भी दी. उस के हंगामे से पूरा गांव जमा हो गया. इस मामले में गलती वाहिद की ही थी पर ममता के थाने जाने के बाद बात बढ़ने की संभावना थी. इसलिए परिवार वालों ने गांव वालों के सहयोग से ममता को समझाना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि वाहिद की दूसरी पत्नी के साथ वह भी रह सकती है. उसे घर में रहने के लिए जगह दे दी जाएगी

गांवदेहात में जानवरों के बांधने और उन का चारा रखने की जगह को घेर कहते हैं. ममता को अपना और बच्चों का पेट भरना था, इसलिए वह घेर में रहने के लिए तैयार हो गई. वह वहीं रहने लगी पर वाहिद की दूसरी पत्नी अरमाना को ममता का वहां रहना नागवार लगता था. वह ममता को एक पल भी देखना पसंद नहीं करती थी. जिस की वजह से वाहिद और अरमाना में झगड़ा रहने लगा. रोजाना के झगड़ों से तंग कर अरमाना अपने मायके चिमियावली चली गई. वाहिद कई बार अरमाना को लाने के लिए अपनी ससुराल गया लेकिन अरमाना उस के घर वालों ने साफ मना कर दिया था कि जब तक ममता वहां रहेगी अरमाना यहां से नहीं जाएगी.

वाहिद ने कहा कि ठीक है, वह ममता को चंदौसी में किराए पर लिए कमरे पर पहुंचा देगा. वैसे भी ममता उस से कह भी रही थी कि उसे यहां तबेले में रहना अच्छा नहीं लगता. लेकिन अरमाना इस के लिए भी तैयार नहीं हुई. उस ने पति वाहिद से साफ कह दिया था कि जब तक ममता और उस के बच्चे जीवित रहेंगे वह ससुराल नहीं जाएगी. उसे उन तीनों के मरने का सबूत भी चाहिए. यानी जिस दिन वह उन के कटे हुए सिर उसे दिखा देगा वह उस के साथ चली चलेगी. पत्नी की इस जिद पर वाहिद परेशान हो गया. तब उस के ससुर कलुआ और सास सूफिया ने उसे समझाते हुए कहा कि यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है. थोड़े दिमाग से काम लोगे तो बड़ी आसानी से हो जाएगा. तुम किसी तरह ममता और उस के बच्चों को यहां लाओ, बाकी काम हम देख लेंगे.

उस के बाद वाहिद अपने गांव भमौरी लौट आया. वह ममता को ठिकाने लगाने का प्लान बनाने लगा. अपने प्लान में उस ने अपने भाई गुड्डू को भी शामिल कर लिया था. अपनी योजना से उस ने अपने ससुर कलुआ को भी  अवगत करा दिया. वाहिद की सास सूफिया ने इस के लिए बड़े छुरे का इंतजाम कर लियायोजना के मुताबिक 17 मार्च, 2018 की शाम वाहिद ममता और उस के बच्चों को ले कर भमौरी से बस द्वारा संभल पहुंच गया. गुड्डू भी उस के साथ था. वाहिद ने ममता को बताया था कि उस के दोस्त के यहां दावत है. संभल से वह लोग आटो में चिमियावली गांव के लिए बैठे. रास्ते में वाहिद ममता और बच्चों के साथ आटो से उतर गया और कहा कि अब शौर्टकट से पैदल चलते हैं, जल्दी पहुंच जाएंगे. ममता उस की साजिश से अनजान थी. वह गेहूं के खेत के किनारे के संकरे रास्ते से चलने लगा

पैदल चलने पर ममता के पेट में दर्द हुआ तो वाहिद ने पहले से अपने साथ लाई नशे की गोलियों में से एक गोली ममता को खिला दी. कुछ देर में जब ममता बेहोशी की हालत में गई तो वाहिद ने अपने ससुर कलुआ को आवाज दे कर बुला लिया. कलुआ खेत में छिपा बैठा था. जब ममता निढाल हो कर जमीन पर गिर गई तो गुड्डू, कलुआ और वाहिद ने मिल कर ममता का गला काट कर धड़ से सिर अलग कर दिया. उस समय उस का 10 वर्षीय बेटा करन वहीं खड़ा था. वह डर की वजह से वहां से भागा तो वाहिद ने उसे पकड़ लिया. उन लोगों ने उस बच्चे का भी गला काट कर सिर धड़ से अलग कर दिया. ममता के हाथ पर उस का नाम गुदा हुआ था. पहचान मिटाने के लिए वाहिद ने हाथ की वह खाल ही काट कर अलग कर दी जहां नाम लिखा था

उसी दौरान ममता की 4 वर्षीय बेटी मंजू वाहिद की टांगों से चिपकी खड़ी थी. वह कह रही थी कि पापा चलो भूख लग रही है. पापा मुझे टौफी दिलवाओ. वैसे भी वाहिद रोजाना मंजू के लिए टौफी ले कर आता था. वाहिद सब से ज्यादा प्यार मंजू को ही करता था. वाहिद जब मंजू को भी मारने चला तो कलुआ ने कहा, नहीं यह नासमझ है. इस को हम लोग पाल लेंगे. इस ने क्या बिगाड़ा है. वाहिद ने जेब से बड़ी पालिथिन थैली निकाल कर दोनों के सिर उस में रख लिए और अपनी ससुराल चिमियावली गया. वहां पर वाहिद ने अपनी सास सूफिया पत्नी अरमाना को कटे सिर दिखाए. सिर देखने पर उन्हें उन के मरने का यकीन हुआ. इस के बाद वह उन दोनों सिरों को गांव के नजदीक बहने वाली सोत नदी के किनारे रेत में अलगअलग दबा आया

पुलिस ने वाहिद, कलुआ, अरमाना, सूफिया को गिरफ्तार कर लिया. अभियुक्तों की गिरफ्तारी की सूचना पर एडीजी प्रेमप्रकाश भी बरेली से संभल पहुंच गए. प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित कर उन्होंने इस सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड का खुलासा कर पत्रकारों को जानकारी दी. बाद में पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक गुड्डू की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी.

   —कथा पुलिस सूत्रों आधारित

पार्लर की आड़ में चल रहा था जिस्मफरोशी का धंधा

राजनैतिक दलों के रसूखदार लोगों का फायदा उठा कर मोहन श्रीवास्तव गया नगर निगम का डिप्टी मेयर बन गया था. वह राजनीति में मुकम्मल मुकाम हासिल करना चाहता था लेकिन वह शबाब में ऐसा फिसला कि पहुंच गया जेल  पटना के एसएसपी मनु महाराज देर रात औफिस में बैठ कर अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग कर रहे थे, तभी उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि बिहार के मोतिहारी जिले से 2 नाबालिग लड़कियां बाहुबलियों द्वारा अपहृत कर के पटना लाई गई हैं. समय रहते अगर खोजबीन की जाए तो लड़कियां बरामद की जा सकती हैं.

सूचना चौंकाने वाली थी क्योंकि पटना में पिछले साल कई जगहों पर सैक्स रैकेट का पुलिस द्वारा भंडाफोड़ कर के आरोपियों को जेल भेजा गया था. रैकेट में ज्यादातर लड़कियां पटना से बाहर की ही रहने वाली थीं. मुखबिर की सूचना से उन्होंने अनुमान लगाया कि उन लड़कियों को भी जरूर किसी खास मकसद से पटना लाया गया होगा. पटना कोई छोटीमोटी जगह तो थी नहीं जिस से उन लड़कियों को आसानी से ढूंढा जा सकता. एसएसपी ने उसी समय सभी थानों को वायरलैस द्वारा मैसेज प्रसारित करा दिया कि 2 नाबालिग लड़कियां किसी के साथ संदिग्धावस्था में या होटल, या ढाबे में मिलें तो उन से पूछताछ की जाए और उस की सूचना तुरंत उन के औफिस में दी जाएं.

इस के अलावा उन्होंने शहर कोतवाली के कुछ पुलिसकर्मियों की टीम बना कर बस अड्डा, रेलवे स्टेशनों, होटलों आदि जगहों पर भेज दीं. कप्तान साहब का आदेश मिलते ही पुलिस टीम ने बस अड्डा और पटना के रेलवे स्टेशनों पर संदिग्ध लड़कियों को खोजना शुरू किया, लेकिन वहां ऐसा कोई संदिग्ध नहीं मिला. इस के बाद पुलिस टीम ने शहर के होटलों, गेस्ट हाउसों की तलाशी शुरू की. इसी क्रम में पुलिस फ्रेजर रोड पर स्थित एक मारवाड़ी आवासगृह में पहुंची. पुलिस ने उस आवासगृह के कमरों की तलाशी लेनी शुरू की तो कमरा नंबर एस-3 में 2 नाबालिग लड़कियां 2 अधेड़ पुरुषों के साथ आपत्तिजनक हालत में मिलीं. पुलिस ने उन्हें तुरंत हिरासत में ले लिया

पुलिस ने जब उस कमरे की तलाशी ली तो वहां भारी मात्रा में कंडोम, कामोत्तेजक दवाएं, शराब की बोतलें आदि मिलीं. दोनों आदमियों से नाम पूछे गए तो उन्होंने अपने नाम अखौरी ओंकारनाथ उर्फ मोहन श्रीवास्तव और अजय कुमार बताए. मोहन श्रीवास्तव गया नगर निगम का डिप्टी मेयर था. पूछताछ में पता चला कि बरामद लड़कियां 14 साल की जया और 15 साल की रूपा थीं. उन लड़कियों ने पुलिस को यह जानकारी दी कि उन लोगों के साथ 5 अन्य लोग भी हैं. उन्हें मोतिहारी हास्पिटल के पास रहने वाली अनीता देवी के सहयोग से जबरिया गाड़ी में बैठा कर लाए हैं और सभी ने उन के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया है. उन्होंने खुद को गोपालगंज के मांझीगढ़ की रहने वाली बताया था.

लड़कियों ने जिन 5 लोगों के बारे में बताया, पुलिस ने उन के बारे में ओंकारनाथ और अजय से मालूमात की तो पता चला कि वे फ्रेजर रोड पर स्थित होटल सम्राट के कमरा नंबर 507 में ठहरे हुए हैं. चूंकि होटल कांग्रेस के एक कद्दावर पूर्व एमएलसी का था, इसलिए पुलिस हर तरह से ठोंकबजा कर वहां रेड डालना चाह रही थी. बात डीजीपी अभयानंद के कानों में डाली गई तो उन्होंने रात में ही प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की. वहां से हरी झंडी मिलने के बाद एसपी (सिटी) जयतकांत, डीएसपी ममता कल्याणी और अमन कुमार की टीम ने होटल सम्राट में छापेमारी कर वहां से 5 लोगों को हिरासत में ले लिया

दोनों लड़कियों ने उन की शिनाख्त कर दी. गिरफ्तार लोगों ने अपने नाम क्रमश: विनोद कुमार मंडल, जितेंद्र कुमार वर्मा, पिंटू कुमार, मनोज कुमार और जितेंद्र प्रसाद बताए. इन में से विनोद कुमार और जितेंद्र कुमार गया के पार्षद थे. जितेंद्र कुमार के कमरे से भी कंडोम, कामोत्तेजक दवाएं, शराब की खाली बोतलों सहित अन्य सामग्री बरामद हुई थी. अभियुक्तों की गिरफ्तारी पर एसएसपी मनु महाराज भी कोतवाली पहुंच गए. उन के सामने दोनों लड़कियों ने बताया कि अनीता नाम की एक महिला ने उन्हें नौकरी दिलाने के लिए बुलाया था और बाद में इन लोगों के साथ कार में बैठा दिया था. रास्ते भर सभी लोगों ने उन के साथ छेड़छाड़ की.

पुलिस ने जया और रूपा के बयानों के आधार पर डिप्टी मेयर अखौरी ओंकारनाथ उर्फ मोहन श्रीवास्तव और अन्य सभी लोगों के खिलाफ अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म के अलावा अनैतिक देह व्यापार अधिनियम की धारा 3, 4 5 के तहत मामला दर्ज कर लिया. यह बात 6 जनवरी, 2014 की है. पूछताछ के दौरान एसएसपी को जो जानकारी मिली, उस से वह हैरान रह गए, क्योंकि गिरफ्तार किए गए लोगों में अखौरी ओंकारनाथ उर्फ मोहन श्रीवास्तव गया नगर निगम का डिप्टी मेयर और 2 निगम पार्षद तथा एक महिला पार्षद का पति भी था. पटना पुलिस ने जब डिप्टीमेयर मोहन श्रीवास्तव के बारे में और जानकारी पाने के लिए गया जिले की पुलिस से संपर्क किया तो उस के साथसाथ उस की पत्नी मनीषा श्रीवास्तव की भी चौंकाने वाली बातें सामने आईं.

42 वर्षीय अखौरी ओंकारनाथ उर्फ मोहन श्रीवास्तव पहले एक साफसुथरी छवि वाला सामाजिक व्यक्ति था. उस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत गया के सांसद रहे राजेश कुमार और पूर्व मंत्री सुरेंद्र यादव के प्राइवेट सेके्रटरी के रूप में की थी. लेकिन राजनीति में जोड़तोड़ का माहिर मोहन श्रीवास्तव दिल्ली से गया में कर बस गया. दिल्ली से गया आने के बाद उस ने अपना व्यक्तित्व उभारने के कई प्रयास किए. लेकिन सन 2003 में अतुल प्रकाश अपहरण कांड में उस का नाम जुड़ने से वह पहली बार विवादित हो गया. इस के बाद वह सन 2010 में गया के शहरी विधानसभा क्षेत्र से कांगे्रस (आई) का टिकट पाने में सफल हो गया, लेकिन चुनाव हार जाने की वजह से वह हाशिए पर गया. मोहन श्रीवास्तव ने हार नहीं मानी. वह राजनीति में अपना वर्चस्व बनाने के लिए जीतोड़ कोशिश करने लगा.

जब निकाय चुनाव हुए तो उस ने पार्षद का चुनाव लड़ा. वह चुनाव जीत गया. इस के बाद वह जोड़तोड़ की राजनीति कर के नगर निगम के डिप्टी मेयर के पद पर पहुंच गया. मोहन श्रीवास्तव की नेतागिरि फिर से चमकने लगी थी. लेकिन 25 दिसंबर, 2013 को एक मामले ने उस की छवि को फिर धूमिल कर दिया. हुआ यह कि मोहन श्रीवास्तव की पत्नी मनीषा श्रीवास्तव का गया में ही चौक रोड पर एक मकान था. उस ने वह मकान अपने एक पड़ोसी रिश्तेदार को किराए पर दे रखा था. वह रिश्तेदार उस मकान मेंस्वर्ग लोकजेंट्स मसाज पार्लर की आड़ में सैक्स रैकेट चलाता था. डीएसपी सोनू कुमार राय के नेतृत्व में गठित एक पुलिस टीम ने 25 दिसंबर, 2013 को इस मसाज पार्लर में छापा मारकर 3 लड़कियों सहित एक को धर दबोचा.

राजनीतिक विरोधियों ने मोहन श्रीवास्तव का नाम भी इस मामले में खूब उछाला. उन्होंने सड़क पर प्रदर्शन कर के और उस का पुतला फूंक कर उस के खिलाफ भी कानूनी काररवाई  की मांग की. पटना के मारवाड़ी आवासगृह में रंगे हाथों गिरफ्तार होने के बाद भी मोहन श्रीवास्तव अपनी ऊंची पहुंच देख लेने की धमकी एसएसपी को देता रहा, लेकिन एसएसपी उस की बंदर घुड़की में नहीं आए. पुलिस ने मोहन श्रीवास्तव के मोबाइल फोन की जांच की तो उस में अनेक अश्लील एसएमएस और महिलाओं की तसवीरें थीं. पटना पुलिस गया पुलिस के माध्यम से अश्लील एसएमएस भेजने वालों और उन महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाने में लग गई, जिन के फोटो मोबाइल में मिले थे.

अभियुक्तों से पूछताछ में मोतीहारी की रहने वाली अनीता नाम की महिला का नाम सामने आया. अनीता को तलाशने के लिए पटना से एक पुलिस टीम 7 जनवरी, 2014 को मोतिहारी रवाना हो गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिली. फिर एक गुप्त सूचना पर पुलिस ने उसे उसी दिन मोतिहारी में डिस्ट्रिक हास्पिटल के पास से गिरफ्तार कर लिया. स्थानीय न्यायालय में अनीता को पेश करने के बाद पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर पटना ले आई. पटना पुलिस ने 21 वर्षीया अनीता से पूछताछ की तो उस की शादी होने से ले कर कालगर्ल्स सप्लायर करने की जो कहानी सामने आई वह बड़ी दिलचस्प निकली.

अनीता मोतिहारी जिले के नगर थानाक्षेत्र में स्थित अगरवा मोहल्ले की रहने वाली थी. वह एक गरीब परिवार से थी. इसलिए यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही मोहल्ले के अनेक युवकों की ललचाई नजरें उस पर पड़ीं. जिस से वह भी बहक गई. मात्र 14 साल की उम्र में ही कई लड़कों से उस के अवैध संबंध हो गए. घर की आर्थिक हालत खस्ता होने की वजह से उस ने एक महिला के साथ दाई का काम करना शुरू कर दिया. बाद में उस महिला के बेटे विपिन से उस के अवैध संबंध बन गए. विपिन अनीता को आर्थिक सहयोग भी करता था.अनीता से मन भर जाने के बाद विपिन ने बाद में उसे अपने दोस्तों के पास भी भेजना शुरू कर दिया. अनीता ने सोचा कि जब लोग उस के जिस्म को नोच ही रहे हैं तो क्यों वह इसी जिस्म के सहारे पैसा कमाए. इस के बाद अनीता ने अब अपने जिस्म से पैसे कमाने शुरू कर दिए.

करीब एक साल में ही अनीता ने देहव्यापार से काफी रुपए कमाए. वह देहव्यापार के धंधे में एक माहिर खिलाड़ी बन चुकी थी. अपने धंधे को बढ़ाने के लिए वह गरीब और पैसे की जरूरतमंद लड़कियों को अपने जाल में फंसा कर उन से देहव्यापार कराने लगी. करीब 2 साल पहले अनीता की शादी हरियाणा के रहने वाले एक युवक से हुई थी. लेकिन किसी वजह से उस की पति से अनबन रहने लगी. जिस से उन के बीच अकसर झगड़ा होता रहता था. फिर वह एक दिन पति को छोड़ कर मायके चली आई. मायके में खाली पड़े उस का मन नहीं लगता था. एक स्वयंसेवी संस्था बना कर वह एड्स के प्रति लोगों को जागरूक करने लगी. इस काम में उसे कोई खास कमाई नहीं होती थी. इसलिए शादी से पहले वह जिस धंधे को करती थी, उस ने उसी धंधे को फिर से करने की ठानी

उस की संस्था में दूरदराज क्षेत्रों की अनेक लड़कियां भी काम करती थीं. लिहाजा उस ने उन लड़कियों को मोटी कमाई और अच्छी जिंदगी जीने के सब्जबाग दिखा कर जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया. इस तरह अनीता फिर से जिस्मफरोशी का धंधा कर मोटी कमाई करने लगी. अनीता के ज्यादातर ग्राहक अपने जिले से बाहर के थे. इस कारण वह लड़कियों को नेपाल भी भेजती थी. बिहार के अलावा देह व्यापार में जुड़ी अन्य प्रदेशों की महिलाओं से भी उस के संबंध हो गए थे. जया और रूपा ने पुलिस को बताया कि वे नौकरी की तलाश में अनीता के पास गई थीं. अनीता ने दोनों को अपनी संस्था में परिचायिका का काम देने को कहा था. 6 जनवरी, 2014 की सुबह ही अनीता ने डिप्टी मेयर मोहन श्रीवास्तव को अपनी संस्था का अधिकारी बताते हुए यह बताया कि वे उन के साथ जाएं. संस्था में उन्हें क्याक्या काम करना है यह समझा कर मोहन श्रीवास्तव उन्हें वापस यहीं छोड़ देंगे.

इस के बाद अनीता ने जया और रूपा को मोहन श्रीवास्तव की गाड़ी में बैठा दिया. उस गाड़ी में कई और लोग भी बैठ गए. मोहन श्रीवास्तव दोनों लड़कियों को ले कर पटना की तरफ चल दिया. वह रास्ते भर दोनों लड़कियों से छेड़खानी करता रहा. विरोध करने पर उन को जान से मारने की धमकी देता. वे दोनों उस से इतना डर गई थीं कि विरोध तक कर सकीं. वह लड़कियों को ले कर पटना के एक मारवाड़ी आवासगृह में गया और उन लड़कियों को अपना रिश्तेदार बता कर एक कमरा लिया. वहां डिप्टी मेयर सहित उस के साथ आए सभी लोगों ने बारीबारी से उन के साथ बलात्कार किया. बाद में डिप्टी मेयर मोहन श्रीवास्तव के साथ आए अन्य लोगों ने सम्राट होटल में कमरा बुक करा लिया. लेकिन मुखबिर की सूचना पर पटना पुलिस ने छापा मार कर सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया.

अनीता से विस्तार से पूछताछ के बाद पटना कोतवाली पुलिस ने उसे 10 जनवरी को पटना के सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे बेऊर जेल भेज दिया. इधर होटल में पकड़ी गई दोनों नाबालिग लड़कियों जया और रूपा को पटना पुलिस ने प्रयास भारती नामक एक सामाजिक संस्था के हवाले कर दिया, जहां से उन के घर वाले 13 जनवरी को घर ले गए. उधर गया के कोतवाली निरीक्षक ने भी मनीषा श्रीवास्तव के जिस घर में 25 दिसंबर को सेक्स रैकेट पकड़ा गया था, उस घर को कुर्क करने के लिए गया के सदर एसडीओ कोर्ट में आवेदन किया. इस पर एसडीओ सदर मकसूद आलम ने वह संपत्ति कुर्क तो नहीं की, लेकिन उन्होंने आदेश दिया कि भविष्य में उस मकान को किराए पर देने से पहले न्यायालय की अनुमति लेनी अनिवार्य होगी. साथ ही मनीषा श्रीवास्तव के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें नोटिस जारी कर दिया.

अगले दिन पुलिस ने डिप्टी मेयर मोहन श्रीवास्तव और होटल से पकड़े अन्य 6 अभियुक्तों को पूछताछ के बाद सीजेएम की कोर्ट में पेश कर बेऊर जेल भेज दिया. मनीषा श्रीवास्तव की तलाश में उस के नया गोदाम स्थित आवास पर दविश दी, लेकिन वह नहीं मिली. जांच के बाद एसएसपी निशांत कुमार तिवारी को पता लग गया कि मोहन श्रीवास्तव के मकान में स्वर्ग लोक जेंट्स और फेस टू फेस पार्लर की आड़ में जिस्मफरोशी का जो धंधा चल रहा था, उस की जानकारी कोतवाली पुलिस को थी. हर महीने मोटा चढ़ावा चढ़ने की वजह से स्थानीय पुलिस चंद गज दूरी पर चल रहे इस धंधे में दखल नहीं दे रही थी. एसएसपी ने कोतवाली प्रभारी शशिभूषण सिंह को दोषी मानते हुए निलंबित कर दिया और डीएसपी सोनू कुमार राय को भी जांच से अलग कर दिया

डिप्टी मेयर मोहन श्रीवास्तव और पार्षदों की गिरफ्तारी के बाद गया का सियासी तापमान सर्दी के बावजूद गरम हो गया. विरोधी पार्टियों के नेताओं ने इस पर खुशी जाहिर की. जबकि बिहार कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्व विधायक जय कुमार पालित ने मोहन श्रीवास्तव की गिरफ्तारी कर उन्हें तुरंत कांगे्रस पार्टी से निष्कासित करने की मांग की. अब पुलिस मोहन श्रीवास्तव, उस की पत्नी मनीषा श्रीवास्तव, अनीता आदि के फोन नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन कर रही है. लोग कयास लगा रहे हैं कि जांच में और भी कई सफेदपोशों के नाम उजागर हो सकते हैं.

 

एनिवर्सरी पर पत्नी ने पति को बालकनी से फेंका

प्रेमिका सोफिया के लिए डिसिल्वा अपनी पैसे वाली पत्नी मैरी को जिस तरह मारना चाहता था, ठीक उसी तरह मैरी ने उसे ही ठिकाने लगा कर शिकारी को ही शिकार बना डाला सुबह नहाधो कर मैरी बाथरूम से निकली तो उस की दमकती काया देख कर डिसिल्वा खुद को रोक नहीं पाया और लपक कर उसे बांहों में भर कर बेतहाशा चूमने लगा. मैरी ने मोहब्बत भरी अदा के साथ खुद को उस के बंधन से आजाद किया और कमर मटकाते हुए किचन की ओर बढ़ गई. उस के होंठों पर शोख मुसमान थी. थोड़ी देर में वह किचन से बाहर आई तो उस के हाथों में कौफी से भरे 2 मग थे. एक मग डिसिल्वा को थमा कर वह उस के सामने पड़े सोफे पर बैठ गई

डिसिल्वा कौफी का आनंद लेते हुए अखबार पढ़ने लगा. उस की नजर अखबार में छपी हत्या की एक खबर पर पढ़ी तो तुरंत उस के दिमाग यह बात कौंधी कि वह अपनी बीवी मैरी की हत्या किस तरह करे कि कानून उस का कुछ बिगाड़ सके. वह ऐसा क्या करे कि मैरी मर जाए और वह साफ बच जाए. वह उस कहावत के हिसाब से यह काम करना चाहता था कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे. डिसिल्वा ने 2 साल पहले ही मैरी से प्रेमविवाह किया था. अब उसे लगने लगा था कि मैरी ने उस पर जो दौलत खर्च की है, उस के बदले उस ने उस से अपने एकएक पाई की कीमत वसूल कर ली है. अब उसे अपनी सारी दौलत उस के लिए छोड़ कर मर जाना चाहिए, क्योंकि उस की प्रेमिका सोफिया अब उस का और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती. वह खुद भी उस से ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह सकता.

लेकिन यह कमबख्त मैरी रास्ते का रोड़ा बनी हुई है. इस रोड़े को हटाए बगैर सोफिया उस की कभी नहीं हो सकेगी. लेकिन इस रोड़े को हटाया कैसे जाए? डिसिल्वा मैरी को ठिकाने लगाने के बारे में सोचते हुए इस तरह डूब गया कि कौफी पीना ही भूल गया. डिसिल्वा को सोच में डूबा देख कर मैरी बोली, ‘‘तुम कहां खोए हो कि कौफी पीना भी भूल गए. तुम्हारी कौफी ठंडी हो रही है. और हां, हमारी बालकनी के एकदम नीचे एक गुलाब खिल रहा है. जरा देखो तो सही, कितना खूबसूरत और दिलकश लग रहा है. शाम तक वह पूरी तरह खिल जाएगा. सोच रही हूं, आज शाम की पार्टी में उसे ही अपने बालों में लगाऊं. डार्लिंग, आज हमारी मैरिज एनवरसरी है, तुम्हें याद है ना?’’

‘‘बिलकुल याद है. और हां, गुलाब कहां खिल रहा है?’’ डिसिल्वा ने मैरी की आंखों में शरारत से झांकते हुए हैरानी से पूछा.

‘‘बालकनी के ठीक नीचे जो गमला रखा है, उसी में खिल रहा है.’’ मैरी ने कहा.

बालकनी के ठीक नीचे गुलाब खिलने की बात सुन कर डिसिल्वा के दिमाग में तुरंत मैरी को खत्म करने की योजना गई. उस ने सोचा, शाम को वह गुलाब दिखाने के बहाने मैरी को बालकनी तक ले जाएगा और उसे नीचे खिले गुलाब को देखने के लिए कहेगा. मैरी जैसे ही झुकेगी, वह जोर से धक्का देगा. बस, सब कुछ खत्म. मैरी बालकनी से नीचे गमलों और रंगीन छतरियों के बीच गठरी बनी पड़ी होगी. इस के बाद वह एक जवान गमजदा पति की तरह रोरो कर कहेगा, ‘हाय, मेरी प्यारी बीवी, बालकनी से इस खूबसूरत गुलाब को देखने के लिए झुकी होगी और खुद को संभाल पाने की वजह से नीचे गई.’

अपनी इस योजना पर डिसिल्वा मन ही मन मुसकराया. उसे पता था कि शक उसी पर किया जाएगा, क्योंकि बीवी की इस अकूत दौलत का वही अकेला वारिस होगा. लेकिन उसे अपनी बीवी का धकेलते हुए कोई देख नहीं सकेगा, इसलिए यह शक बेबुनियाद साबित होगा. सड़क से दिखाई नहीं देगा कि हुआ क्या था? जब कोई गवाह ही नहीं होगा तो वह कानून की गिरफ्त में कतई नहीं सकेगा. इस के बाद पीठ पीछे कौन क्या सोचता है, क्या कहता है, उसे कोई परवाह नहीं है. डिसिल्वा इस बात को ले कर काफी परेशान रहता था कि सोफिया एक सस्ते रिहाइशी इलाके में रहती थी. वैसे तो उस की बीवी मैरी बहुत ही खुले दिल की थी. वह उस की सभी जरूरतें बिना किसी रोकटोक के पूरी करती थी. तोहफे देने के मामले में भी वह कंजूस नहीं थी, लेकिन जेब खर्च देने में जरूर आनाकानी करती थी. इसीलिए वह अपनी प्रेमिका सोफिया पर खुले दिल से खर्च नहीं कर पाता था

सोफिया का नाम दिमाग में आते ही उसे याद आया कि 11 बजे सोफिया से मिलने जाना है. उस ने वादा किया था, इसलिए वह उस का इंतजार कर रही होगी. अब उसे जाना चाहिए, लेकिन घर से बाहर निकलने के लिए वह मैरी से बहाना क्या करे? बहाना तो कोई भी किया जा सकता है, हेयर ड्रेसर के यहां जाना है या शौपिंग के लिए जाना है. वैसे शौपिंग का बहाना ज्यादा ठीक रहेगा. आज उस की शादी की सालगिरह भी है. इस मौके पर उसे मैरी को कोई तोहफा भी देना होगा. वह मैरी से यही बात कहने वाला था कि मैरी खुद ही बोल पड़ी, ‘‘इस समय अगर तुम्हें कहीं जाना है तो आराम से जा सकते हो, क्योंकि मैं होटल डाआर डांसिंग क्लास में जा रही हूं. आज मैं लंच में भी नहीं सकूंगी, क्योंकि आज डांस का क्लास देर तक चलेगा.’’

‘‘तुम और यह तुम्हारी डांसिंग क्लासमुझे सब पता है.’’ डिसिल्वा ने मैरी को छेड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है, तुम उस खूबसूरत डांसर पैरी से प्यार करने लगी हो, आजकल तुम उसी के साथ डांस करती हो ?’’

‘‘डियर, मैं तो तुम्हारे साथ डांस करती थी और तुम्हारे साथ डांस करना मुझे पसंद भी था. लेकिन शादी के बाद तो तुम ने डांस करना ही छोड़ दिया.’’ मैरी ने कहा.

‘‘आह! वे भी क्या दिन थे.’’ आह भरते हुए डिसिल्वा ने छत की ओर देखा. फिर मैरी की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘तुम्हें जुआन के यहां वाली वह रात याद है , जब हम ने ब्लू डेनूब की धुन पर एक साथ डांस किया था?’’ 

डिसिल्वा ने यह बात मैरी से उसे जज्बाती होने के लिए कही थी. क्योंकि उस ने तय कर लिया था कि अब वह उस के साथ ज्यादा वक्त रहने वाली नहीं है. इसलिए थोड़ा जज्बाती होने में उसे कोई हर्ज नहीं लग रहा था.

‘‘मैं वह रात कैसे भूल सकती हूं. मुझे यह भी याद है कि उस रात तुम ने अपना इनाम लेने से मना कर दिया था. तुम ने कहा था, ‘हम अपने बीच रुपए की कौन कहे, उस का ख्याल भी बरदाश्त नहीं कर सकते.’ तुम्हारी इस बात पर खुश हो कर मैं ने तुम्हारा वह घाटा पूरा करने के लिए तुम्हें सोने की एक घड़ी दी थी, याद है तुम्हें?’’

‘‘इतना बड़ा तोहफा भला कोई कैसे भूल सकता है.’’ डिसिल्वा ने कहा. इस के बाद डिसिल्वा सोफिया से मिलने चला गया तो मैरी अपने डांस क्लास में चली गई. डिसिल्वा सोफिया के यहां पहुंचा. चाय पीने के बाद आराम कुर्सी पर सोफिया को गोद में बिठा कर डिसिल्वा ने उसे अपनी योजना बताई. सोफिया ने उस के गालों पर एक चुंबन जड़ते हुए कहा, ‘‘डार्लिंग, आप का भी जवाब नहीं. बस आज भर की बात है, कल से हम एक साथ रहेंगे.’’

दूसरी ओर होटल डाआर में मैरी पैरी की बांहों में सिमटी मस्ती में झूम रही थी. वह अपने पीले रंग के बालों वाले सिर को म्यूजिक के साथ हिलाते हुए बेढं़गे सुरों में पैरी के कानों में गुनगुना रही थी. पैरी ने उस की कमर को अपनी बांहों में कस कर कहा, ‘‘शरीफ बच्ची, इधरउधर के बजाए अपना ध्यान कदमों पर रखो. म्यूजिक की परवाह करने के बजाए बस अपने पैरों के स्टेप के बारे में सोचो.’’

‘‘मैं तुम्हारे साथ डांस कर रही होऊं तो तुम मुझ से इस तरह की उम्मीद कैसे कर सकते हो? फिर यह क्या मूर्खता है, तुम मुझे बच्ची क्यों कह रहे हो?’’

‘‘बच्ची नहीं तो और क्या हो तुम?’’ पैरी ने कहा, ‘‘एक छोटी सी शरीफ, चंचल लड़की, जो अपने अभ्यास पर ध्यान देने के बजाए कहीं और ही खोई रहती है. अच्छा आओ, अब बैठ कर यह बताओ कि रात की बात का तुम ने बुरा तो नहीं माना? रात को मैं ने तुम्हारे पैसे लेने से मना कर दिया था ना. इस की वजह यह थी कि मैं इस खयाल से भी नफरत करता हूं कि हमारी दोस्ती के बीच पैसा आए.’’

‘‘मैं ने बिलकुल बुरा नहीं माना. उसी कसर को पूरा करने के लिए मैं तुम्हारे लिए यह प्लैटिनम की घड़ी लाई हूं, साथ में चुंबनों की बौछार…’’ कह कर मैरी पैरी के चेहरे को अपने चेहरे से ढक कर चुंबनों की बौछार करने लगी. डिसिल्वा ने मैरी को तोहफे में देने के लिए हीरे की एक खूबसूरत, मगर सेकेंड हैंड क्लिप खरीदी थी. उस के लिए इतने पैसे खर्च करना मुश्किल था, लेकिन उस ने हिम्मत कर ही डाली थी. क्योंकि बीवी के लिए उस का यह आखिरी तोहफा था. फिर मैरी की मौत के बाद यह तोहफा सोफिया को मिलने वाला था. जो आदमी अपनी बीवी की शादी की सालगिरह पर इतना कीमती तोहफा दे सकता है, उस  पर अपनी बीवी को कत्ल करने का शक भला कौन करेगा?

डिसिल्वा ने हीरे की क्लिप मैरी को दी तो वाकई वह बहुत खुश हुई. वह  नीचे पार्टी में जाने को तैयार थी. उस ने डिसिल्वा का हाथ पकड कर बालकनी की ओर ले जाते हुए कहा, ‘‘आओ डार्लिंग, तुम भी देखो वह गुलाब कितना खूबसूरत लग रहा है. ऐसा लग रहा है, कुदरत ने उसे इसीलिए खिलाया है कि मैं उसे अपने बालों में सजा कर सालगिरह की पार्टी में शिरकत करूं.’’ डिसिल्वा के दिल की धड़कन बढ़ गई. उसे लगा, कुदरत आज उस पर पूरी तरह मेहरबान है. मैरी खुद ही उसे बालकनी की ओर ले जा रही है. सब कुछ उस की योजना के मुताबिक हो रहा है. किसी की हत्या करना वाकई दुनिया का सब से आसान काम है.

डिसिल्वा मैरी के साथ बालकनी पर पहुंचा. उस ने झुक कर नीचे देखा. उसे झटका सा लगा. उस के मुंह से चीख निकली. वह हवा में गोते लगा रहा था. तभी एक भयानक चीख के साथ सब कुछ  खत्म. वह नीचे छोटीछोटी छतरियों के बीच गठरी सा पड़ा था. उस के आसपास भीड़ लग गई थी. लोग आपस में कह रहे थे, ‘‘ओह माई गौड, कितना भयानक हादसा है. पुलिस को सूचित करो, ऐंबुलेंस मंगाओ. लाश के ऊपर कोई कपड़ा डाल दो.’’ थोड़ी देर में पुलिस गई.

दूसरी ओर फ्लैट के अंदर सोफे पर हैरानपरेशान उलझे बालों और भींची मुट्ठियां लिए, तेजी से आंसू बहाते हुए मैरी आसपास जमा भीड़ को देख रही थी. लोगों ने उसे दिलासा देते हुए इस खौफनाक हादसे के बारे में पूछा तो मैरी ने रोते हुए कहा, ‘‘मेरे खयाल से वह गुलाब देखने के लिए बालकनी से झुके होंगे, तभी…’’ कह कर मैरी फफक फफक कर रोने लगी.

 

एकतरफा प्रेमी ने प्रेमिका के पति को छत से फेंका

सतनाम सिंह प्रतिभा से एकतरफा प्यार करता था. उस का यह सिरफिरापन प्रतिभा की शादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ. जिस के चलते प्रतिभा के पति उदयवीर की हत्या हो गई और सतनाम को उम्रकैद. बेचारी प्रतिभा…   

त्ल का मुकदमा चल रहा हो तो उस का फैसला जानने के लिए काफी लोग उत्सुक रहते हैं. 12 मार्च, 2018 को चंडीगढ़ के सेशन जज बलबीर सिंह की अदालत के भीतरबाहर तमाम लोग एकत्र थे. वजह यह थी कि उन की अदालत में चल रहा कत्ल का एक मुकदमा अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंचा था. लोग इस केस का फैसला सुनने को बेकरार थे. इस केस की शुरुआत कुछ यूं हुई थी. उस दिन किसी केस की छानबीन के सिलसिले में चंडीगढ़ के थाना सेक्टर-31 की महिला एसएचओ जसविंदर कौर अपने औफिस में मौजूद थीं. रात में ही करीब 45 वर्षीय शख्स ने कर उन से कहा, ‘‘मैडम, मेरा नाम दुर्गपाल है और मैं रामदरबार इलाके के फेज-2 के मकान नंबर 2133 में रहता हूं.’’

‘‘जी बताइए, थाने में कैसे आना हुआ, वह भी इस वक्त?’’ इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने उस व्यक्ति को गौर से देखते हुए पूछा.

‘‘ऐसा है मैडमजी,’’ खुद को दुर्गपाल कहने वाले शख्स ने बताना शुरू किया, ‘‘हम 4 भाई हैं और मैं सब से बड़ा हूं. मेरी मां शारदा देवी मेरे से छोटे भाई राजबीर के साथ ग्राउंड फ्लोर पर रहती हैं. फर्स्ट फ्लोर पर मेरा सब से छोटा भाई विजय रहता है. मैं और तीसरे नंबर का भाई उदयवीर अपनीअपनी फैमिली के साथ टौप फ्लोर पर रहते हैं.’’

‘‘ठीक है, आप समस्या बताइए.’’

‘‘मैडम, हमारे घर के टौप फ्लोर पर 4 कमरे हैं. वहां सीढि़यों की तरफ वाले 2 कमरे मेरे पास हैं और उस के आगे वाले 2 कमरे मेरे भाई उदयवीर के पास.’’

‘‘आप के मकान और कमरों की बात तो हो गई, वह बताइए जिस के लिए आप को थाने आना पड़ा?’’ थानाप्रभारी जसविंदर कौर ने अपना लहजा थोड़ा बदला. लेकिन उस शख्स ने जैसे कुछ सुना ही नहीं.

उस ने अपनी बात बेझिझक जारी रखी, ‘‘मेरा भाई उदयबीर अपनी पत्नी प्रतिभा के साथ रहता था. दोनों की शादी को अभी कुल डेढ़ साल हुआ है. 10 जून, 2017 को मेरे पिता जंडियाल सिंह की मौत हो गई थी. कल मैं और मेरे तीनों भाई कुछ रिश्तेदारों के साथ हरिद्वार में पिताजी की अस्थियों का विसर्जन कर के रात करीब साढ़े 8 बजे घर लौटे थे.’’

‘‘आगे बताइए,’’ अब इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने दुर्गपाल की बात में रुचि लेते हुए कहा.

‘‘हम लोग थकेहारे थे. घर कर खाना खाने के बाद सो गए थे. मैं घर के टौप फ्लोर पर बने कमरों के आगे गैलरी में सो रहा था. रात के एक बजे जब मैं गहरी नींद में था, तभी शोरशराबा सुन कर अचानक मेरी आंखें खुल…’’ दुर्गपाल की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया. दरअसल, थानाप्रभारी के लिए कंट्रोलरूम से फोन आया था. इंसपेक्टर जसविंदर ने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से पीसीआर कांस्टेबल ओमप्रकाश था.

उस ने कहना शुरू किया, ‘‘मैडम, रामदरबार इलाके से किसी के छत से गिराने की काल आई है. मौके पर पहुंच कर पता चला कि छत से गिरने वाले को अस्पताल ले जाया चुका था, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसे गिराने वाला फरार है. शुरुआती छानबीन में ही मामला कत्ल का लग रहा है, जिस के पीछे की वजह इश्क हो सकती है. केस आप के ही इलाके का है.’’

‘‘मरने वाले और मारने वाले के नाम वगैरह के बारे में पता चला?’’ इंसपेक्टर जसविंदर ने पूछा.

‘‘जी मैडम, सब पता कर लिया है. मरने वाले का नाम उदयवीर है और उसे छत से गिरा कर मारा है उस की पत्नी के कथित प्रेमी सतनाम ने.’’

‘‘ओके, तुम लोग अभी वहीं रुको, मैं पहुंचती हूं वहां.’’ कहते हुए इंसपेक्टर जसविंदर ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. उन्होंने सामने बैठे दुर्गपाल की ओर देख कर पूछा, ‘‘आप के भाई उदयवीर को सतनाम नामक शख्स ने छत से नीचे गिरा कर मार दिया और आप…’’

‘‘जी मैडम.’’ इंसपेक्टर जसविंदर की बात पूरी होने से पहले ही दुर्गपाल ने कहा.

‘‘तुम वहां रुकने के बजाय थाने चले आए?’’

‘‘मैडम, मैं ने तुरंत 100 नंबर पर फोन कर के घटना के बारे में बता दिया था. साथ ही आटोरिक्शा से भाई को सेक्टर-32 के सरकारी अस्पताल में पहुंचा भी दिया था. फिर यह सोच कर कि इस तरीके से पुलिस पता नहीं कब पहुंचेगी, मैं अपने दूसरे भाइयों को वहीं रुके रहने को बोल कर थाने चला आया.’’

‘‘कोई बात नहीं, पुलिस ने वहां पहुंच कर अपनी काररवाई शुरू कर दी है. तुम भी चलो हमारे साथ.’’

इस के बाद इंसपेक्टर जसविंदर कौर सबइंसपेक्टर राजवीर सिंह और सिपाही प्रमोद नवीन के अलावा दुर्गपाल सिंह को साथ ले कर सरकारी गाड़ी से रामदरबार की ओर रवाना हो गईं. घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र थी. पीसीआर वाले भी वहीं थे. उन से जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्हें वहां से रुखसत कर दिया गया. साथ ही सिपाही नवीन को वहां तैनात कर के इंसपेक्टर जसविंदर कौर अन्य लोगों के साथ सेक्टर-32 के सिविल अस्पताल चली गईं. वहां उदयवीर को पहले ही मृत घोषित किया जा चुका था. थाना पुलिस ने अपनी आगे की काररवाई शुरू कर दी. एसआई राजबीर सिंह शव का पंचनामा बनाने लगे और जसविंदर कौर ने दुर्गपाल से उस की तहरीर ले कर एफआईआर दर्ज करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी.

दुर्गपाल ने अपनी तहरीर के शुरुआती हिस्से में वही सब दोहराया, जो वह पहले ही थाने में थानाप्रभारी जसविंदर कौर को बता चुका था. आगे उस ने जो कुछ बताया, वह कुछ इस तरह था

शोरशराबा सुन कर जब मेरी आंखें खुलीं तो मैं ने देखा कि बहलाना में रहने वाला एक लड़का सतनाम सिंह अपने हाथ में बेसबाल बैट पकड़े मेरे भाई उदयवीर से लड़ता हुआ छत पर जा पहुंचा थावह उदयवीर से मारपीट करते हुए उसे घसीट कर छत पर ले गया था. बीचबीच में उदयवीर भी उस का मुकाबला करने का प्रयास करते हुए उस पर हाथपैर से वार कर रहा था. यह सब देख मैं भी तेजी से उन के पीछे छत पर चला गया. तब तक वे दोनों लड़ते हुए कौर्नर के मकानों की छत पर जा पहुंचे थे. ऐसा इसलिए था कि हमारी लाइन के मकानों बैकसाइड वाले मकानों की छतें आपस में मिली हुई हैं

जिस वक्त वे दोनों लड़ते हुए मकान नंबर 2088 की छत पर पहुंचे तो मैं भी उन्हें छुड़ाने के लिए वहां जा पहुंचा. अभी मैं उन से थोड़े फासले पर था, जब मेरे कानों में सतनाम की आवाज पड़ी. वह मेरे भाई से कह रहा था कि प्रतिभा हमेशा से उस की प्रेमिका रही है, उसे मजबूरी में उस से शादी करनी पड़ी थी. अब वह उसे आजाद कर दे, वरना वह उस की (मेरे भाई उदयवीर की) जान ले लेगा. इस से पहले कि मैं भाई की मदद के लिए उस के पास पहुंच पाता, वह दीवार के एक कोने की तरफ हुआ और तभी सतनाम ने मौका देख कर उसे धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. सतनाम सिंह ने मेरे भाई की पत्नी प्रतिभा के साथ लव अफेयर के चलते मेरे भाई को रास्ते से हटाने के लिए जान से मार दिया. उस के खिलाफ मामला दर्ज कर के सख्त काररवाई की जाए.

उसी रोज यह प्रकरण थाना सेक्टर-31 में भादंवि की धाराओं 302 एवं 456 के तहत दर्ज हो गया. यह 14 जून, 2017 की बात है. मौके की अन्य काररवाइयां पूरी कर के थाने लौटने के बाद पुलिस ने सतनाम सिंह को काबू करने की योजनाएं बनानी शुरू कीं. वारदात को अंजाम देने के बाद वह मौके से फरार होने में सफल हो गया था. लेकिन अपराध कर के भागने के 8 घंटे के भीतर ही पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन अदालत से उस का कस्टडी रिमांड हासिल कर के उस से विस्तार से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह चंडीगढ़ के गांव बहलाना के मकान नंबर 74 का रहने वाला था. यहीं की रहने वाली लड़की प्रतिभा से उसे प्यार हो गया था. मगर यह एकतरफा प्यार था, जिस में प्रतिभा ने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई थी.

सतनाम सिंह ने उसे अपनी प्रेमिका घोषित करते हुए उस का पीछा नहीं छोड़ा था. इस से प्रतिभा खुद तो परेशान थी ही, उस के घर वाले भी फिक्रमंद होने लगे थे. उन के मन में यह भय समा गया था कि कहीं सतनाम उन की बेटी को उठा ले जाए. इस की वजह यह भी थी कि सतनाम अपराधी किस्म का लड़का था. आखिर प्रतिभा के घर वालों ने रामदरबार के रहने वाले उदयवीर से उस की शादी कर दी. सतनाम के बताए अनुसार प्रतिभा के घर वालों का डर एकदम सही निकला. वह वाकई उन की लड़की को अपहृत करने के प्रयास में था. यह अलग बात है कि अभी तक उसे सफलता नहीं मिल पाई थी. प्रतिभा की शादी के बाद तो उस के लिए यह काम और भी मुश्किल हो गया था.

देखतेदेखते इस शादी को डेढ़ साल गुजर गया. लेकिन सतनाम इस बीच प्रतिभा को भूल नहीं पाया. इस बीच उस ने एक दुस्साहस भरा काम यह भी किया कि उदयवीर से मिल कर उस से सीधे ही कह दिया, ‘‘प्रतिभा मेरी प्रेमिका थी और हमेशा रहेगी. तुम ने उस की मजबूरी का फायदा उठा कर उस की इच्छा के विरुद्ध शादी की है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि उस से तलाक ले कर उसे मेरे हवाले कर दो, वरना मुझे तुम्हारा खून करना पड़ेगा.’’

उदयवीर ने इस बारे में अपने भाइयों को भी बताया और प्रतिभा से भी बात की. प्रतिभा ने पति को समझाया कि उस का सतनाम से प्रेमप्यार जैसा कभी कोई रिश्ता नहीं था. वह उस के पीछे पड़ कर नाहक उसे परेशान करता था. इस पर उदयवीर ने सतनाम को फोन कर के उसे लताड़ दिया. बकौल सतनाम उस ने भी तय कर लिया कि आगे उसे कुछ भी करना पड़े, वह प्रतिभा को उठा ले जाएगा. बस, मौका मिलने भर की देर थी. यह मौका भी उसे जल्दी ही मिल गया. उदयवीर के पिता का देहांत हो गया और उन की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने उसे अपने भाइयों परिजनों के साथ हरिद्वार जाना पड़ा.

सतनाम ने पुलिस को बताया कि उसे 13 जून, 2017 की रात में प्रतिभा के घर पर अकेली होने की जानकारी मिली. आधी रात के बाद वह घर के पिछवाड़े से उस के पास जा पहुंचा. वहां जा कर देखा तो उस का पति भी उस की बगल में लेटा था. लेकिन सतनाम ने परवाह नहीं की और प्रतिभा के मुंह पर हाथ रख कर उसे कंधे पर लाद लिया. जब वह प्रतिभा को ले जाने लगा तो उदयवीर की आंखें खुल गईं. वह सतनाम पर झपटा तो प्रतिभा उस की पकड़ से छूट गई. इस के बाद सतनाम और उदयवीर गुत्थमगुत्था हो गए. संभव था कि उदयवीर सतनाम पर हावी हो जाता और इस बीच उस के परिजन भी उस की मदद को जाते. लेकिन पता नहीं कैसे वहां पड़ा बेसबाल बैट सतनाम के हाथ लग गया और वह उसी से उदयवीर को पीटते हुए छत पर ले गया. वहां से सतनाम ने उसे नीचे गिरा दिया. वह मुंह के बल कर गिरा था.

सेक्टर-32 के सिविल अस्पताल के डा. मंडर रामचंद सने डा. गौरव कुमार ने उदयवीर के शव का पोस्टमार्टम किया. उन्होंने उस के जिस्म पर छोटीबड़ी 10 चोटों का उल्लेख करते हुए मौत का कारण मानसिक आघात और फेफड़ों का बायां हिस्सा नष्ट होना बताया. खैर, कस्टडी रिमांड की अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सतनाम को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया. इस के बाद समयावधि के भीतर उस के विरुद्ध आरोपपत्र तैयार कर 8 गवाहों की सूची के साथ प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी गीतांजलि गोयल की अदालत में पेश कर दिया. इस के बाद यह केस सेशन कमिट हो कर चंडीगढ़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बलवीर सिंह की अदालत में विधिवत रूप से चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को गौर से सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जांच करने के बाद बचावपक्ष के वकील पब्लिक प्रौसीक्यूटर के बीच हुई बहस के मुद्दों पर भी पूरा ध्यान दिया. बहस के दौरान पब्लिक प्रौसीक्यूटर राजेंद्र सिंह ने दूसरे की औरत को अपना बनाने की एवज में उस के पति का कत्ल करने को ले कर जहां इसे अमानवीय एवं घिनौना अपराध बताया, वहीं बचावपक्ष के वकील यादविंदर सिंह संधू ने अपनी दलील से अभियोजन पक्ष का रुख पलटने का प्रयास किया. वकील संधू का कहना था कि मृतक के पिता की मौत के बाद संपत्ति विवाद को ले कर उस का अपने भाइयों से झगड़ा हो गया था. उन्होंने ही उसे छत से गिरा कर मौत के घाट उतारा है. सतनाम सिंह को इस केस में नाहक फंसा दिया है.

लेकिन एक अलग बात यह भी रही कि जहां अभियोजन पक्ष की ओर से 8 गवाह अदालत में पेश हुए, वहीं बचावपक्ष एक गवाह भी पेश नहीं कर पाया. बहरहाल, माननीय न्यायाधीश बलवीर सिंह ने 12 मार्च, 2018 को अभियुक्त सतनाम सिंह को भादंवि की धाराओं 302 एवं 456 का दोषी करार देते हुए अपना फैसला सुना दिया. इस केस में दी जाने वाली सजा की घोषणा 14 मार्च, 2018 को की गई. 14 मार्च को दोषी को सजा सुनाए जाने से पहले सजा के मुद्दे को सुना गया. दोषी ने बताया कि उस की मां की मौत हो चुकी है और अपने वृद्ध पिता हरबंस सिंह का वही अकेला सहारा है. वैसे भी वह अपनी बीए की पढ़ाई कर रहा था, जो पूरी कर के उसे नौकरी की तलाश करनी थी. इसलिए उसे कम से कम सजा सुनाई जाए.

जज साहब ने यह सब शांति से सुना, मगर उसी दिन दोपहर बाद अपना 27 पृष्ठ का फैसला सुनाते हुए दोषी सतनाम सिंह को धारा 302 के तहत उम्रकैद 5 हजार रुपए जुरमाने और धारा 456 के अंतर्गत एक साल कैद की सजा सुनाई. दोषी ने जुरमाना भरने में अपने को असमर्थ बताया तो उस की कैद की सजा में 6 महीने की बढ़ोत्तरी कर दी गई. जिस दिन सतनाम सिंह को न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेजा गया था, तब से वह चंडीगढ़ की बुड़ैल जेल में ही बंद था. उस की जमानत नहीं हो पाई थी. अब उसे अदालत के फैसले के बाद फिर से उसी जेल में भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों एवं अदालत के फैसले पर आधारित

 

दिल्ली में गला घोंटू गैंग सहम जाएंगे आतंक से

Intro : एक ऐसा गैंग जो छिप कर आता है, पहले गला दबाता है फिर शख्स को लूट कर फरार हो जाता है…

देश की राजधानी दिल्ली में इन दिनों एक बेहद खतरनाक और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने दिल्ली के लोगों में भय का माहौल बना दिया है. दरअसल, यहां एक ऐसा अपराधी गैंग सक्रिय हो गया है जो सुनसान रातों में अकेले व्यक्तियों को निशाना बनाता है। पेशेवर तरीके से देता है लूट को अंजामइस गैंग के लोग अपने शिकार का पहले गला घोंट कर उसे बेहोश करते हैं फिर उस की जेबें खाली कर उस का बैग, मोबाइल और कीमती चीजें लूट कर रफूचक्कर हो जाते हैं. यह गैंग 4 से 6 लोगों का समूह होता है और वे सुनसान सङकों, गलियों में अकेले व्यक्तियों, महिलाओं को टारगेट करते हैं.

सिर्फ ₹400 के लिए लूट

पिछले 1 अक्तूबर, 2024 को एक ऐसा ही मामला दिल्ली के पालम इलाके में देखा गया है. यहां रात को एक व्यक्ति सुनसान गली से फोन पर बात करते हुए जा रहा था कि तभी यह गैंग उस के पीछे चलने लगा. जैसे ही पीङित व्यक्ति एक सुनसान गली में पहुंचा, एक अपराधी ने अचानक उस व्यक्ति का गला पीछे से दबा लिया. वह कुछ कहने या चिल्लाने का भी मौका नहीं पा सका. गैंग के कुछ और सदस्यों ने उस के पैर पकड़ दबोच लिए और सब ने मिल कर उसे गली के अंदर खींच लिया. गैंग के लोगों ने उस व्यक्ति को बेहोश कर दिया और उस के बैग की तलाशी ली, जिस में मात्र ₹400 थे. इन लोगों ने इस पैसे को भी लूट लिया.

सीसीटीवी में कैद हुई घटना

हालांकि यह सब पूरा मामला एक सीसीटीवी कैमरे में रिकौर्ड हो रहा था. इस पूरे अपराध को अंजाम देने के बाद गैंग के सदस्य गली से निकलने लगे. जब उस सुनसान गली से रोज जाने वाली गाड़ियां गुजरने लगीं, तो गैंग के लोग बेहद शांत तरीके से खड़े हो गए ताकि किसी को उन पर शक न हो. 1-1 कर वे लोग भी गली से बाहर निकल गए जैसे कुछ हुआ ही न हो.

इस घटना में सब से हैरान करने वाली बात यह रही कि अपराधियों ने उस व्यक्ति का चश्मा, जो घटना के दौरान गिर गया था, उसे उठा कर उसे वापस दे दिया. इस गैंग के लोग इतने चालाक हैं कि किसी को भी उन के इरादों पर शक नहीं होता है। ये लोग झुंड में रहने के बजाय अलगअलग रह कर अपने टारगेट को फौलो करते हैं. इस के बाद अपने काम को स्टैप बाय स्टैप तरीके से अंजाम देते हैं, जैसे पहले पकड़ना, फिर बेहोश करना, फिर हाथपैर पकड़ कर गली में खींचना और लूटना.

दहशत में लोग

इस घटना ने पूरे दिल्ली में डर और दहशत का माहौल फैला दिया है और लोग अब रात को अकेले बाहर निकलने से डरने लगे हैं. जब दिल्ली पुलिस को इस गैंग के बारे में पता चला तो वह हैरान थी क्योंकि इस तरह के गैंग का मामला पहले कभी सामने नहीं आया था. दिल्ली पुलिस को समझ आया कि यह कोई नया गैंग है. पुलिस इस मामले की जांच में जुटी तो जल्दी ही 4-5 अपराधियों को पकड़ लिया गया, जिस में 2 अपराधी बालिग और 2 नाबालिग हैं. पुलिस इन चारों अपराधियों से गहरी पूछताछ में लगी हुई है.

अगर आप भी रात को सुनसान सङकों, गलियों से हो कर गुजर रहे हों, तो सतर्क रहें। संदिग्ध पर शक हो तो तुरंत पुलिस को सूचित करें. यह गैंग हालांकि पुलिस के गिरफ्त में है और तफ्तीश जारी है, मगर हो सकता है कि इस गैंग के बाकी बचे अपराधी अभी भी अपराध करने के फिराक में हों। इसलिए सतर्क रहें और सुनसान रास्तों पर चलने से बचें।

पति से छुटकारा पाने के लिए पत्नी ने छिपकली डालकर दिया खाना

बबली परिवार के बजाए शारीरिक जरूरतों को ज्यादा महत्त्व देती थी तभी तो 3 बच्चों की मां बनने के बावजूद कई युवकों से उस के अवैध संबंध हो गए थे. अपने एक प्रेमी के साथ हमेशा के लिए रहने को उस ने ऐसी चाल चली कि… 

खुशबू और अंशिका रोज की तरह 5 दिसंबर, 2013 को भी स्कूल गई थीं. वैसे वे दोपहर 2 बजे तब स्कूल से घर लौट आती थीं लेकिन जब ढाई बजे तक घर नहीं पहुंचीं तो मां बबली बेचैन हो गई. उस के बच्चों की क्लास में मोहल्ले के कुछ और बच्चे भी पढ़ते थे. उस ने उन बच्चों के घर पहुंच कर अपने बच्चों के बारे में पूछा तो बच्चों ने बताया कि खुशबू और अंशिका आज स्कूल आई ही नहीं थीं. बच्चों की बात सुन कर बबली हैरान रह गई क्योंकि उस ने दोनों बेटियों को स्कूल भेजा था तो वे कहां चली गईं. बदहवास बबली ने अपने पिता गुलाबचंद और भाइयों को सारी बात बताते हुए जल्दी से बेटियों का पता लगाने को कह कर रोनेबिलखने लगी.

उस के पिता और भाई भी नहीं समझ पा रहे थे कि जब दोनों बहनें स्कूल गई थीं तो वे स्कूल पहुंच कर कहां चली गईं? बबली को सांत्वना दे कर वे सब अपने स्तर से दोनों बच्चियों को ढूंढ़ने में जुट गए. काफी खोजबीन के बाद भी उन का पता नहीं लग सका. दोनों बच्चे रहस्यमय तरीके से कहां लापता हो गए, इस बात से पूरा परिवार परेशान था. मोहल्ले के कुछ लोग कहने लगे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण कर लिया हो. लेकिन इस की उम्मीद कम थी क्योंकि बबली या उस के घर वालों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे कोई फिरौती दे सकें. बबली की अपने पति जितेंद्र से कुछ अनबन चल रही थी, तभी तो वह तीनों बेटियों के साथ मायके में रह रही थी. घर वालों को इसी बात का शक हो रहा था कि बच्चियों को उन का पिता जितेंद्र या फिर दादा बृजनारायण पांडेय ही फुसला कर अपने साथ ले गए होंगे.

संभावित स्थानों पर तलाश के बाद जब खुशबू और अंशिका के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो उन के नाना गुलाबचंद थाना नगरा पहुंचे और थानाप्रभारी एस.पी. चौधरी से मिल कर बच्चियों के गायब होने की बात बताई. उन्होंने अपने दामाद जितेंद्र और समधी बृजनारायण पर बच्चियों को गायब करने का अंदेशा जाहिर किया. गुलाबचंद की तहरीर पर 5 दिसंबर, 2013 को अपहरण का मुकदमा दर्ज करवा कर मामले की विवेचना सबइंसपेक्टर उमेशचंद्र यादव को करने के निर्देश दिए. साथ ही उन्होंने दोनों बच्चियों के गायब होने की सूचना से अपर पुलिस अधीक्षक के.सी. गोस्वामी और पुलिस अधीक्षक अरविंद सेन को अवगत करा दिया.

सबइंसपेक्टर उमेशचंद्र यादव मामले की छानबीन करने में जुट गए. चूंकि गुलाबचंद ने अपने दामाद और समधी पर बच्चियों को गायब करने का शक जाहिर किया था. लिहाजा पुलिस बलिया के सिकंदरपुर थाने के गांव उचवार में रहने वाले जितेंद्र के घर पहुंच गई और वहां से उसे उस के 80 वर्षीय बुजुर्ग पिता बृजनारायण पांडेय को पूछताछ के लिए थाने ले आई. उन्होंने दोनों से अलगअलग तरीके से पूछताछ की. उन की बातों से जांच अधिकारी को लगा कि बच्चों के गायब होने में उन का कोई हाथ नहीं है. बल्कि अपने दोनों बच्चों के गायब होने की जानकारी पाकर जितेंद्र परेशान हो गया था.

इन दोनों से पूछताछ के दौरान उन्हें यह पता चल गया था कि बबली एक बदचलन औरत है. एसआई उमेशचंद्र यादव के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. उन्होंने जितेंद्र और उस के पिता को घर भेज दिया और खुद गोपनीय रूप से यह पता लगाने में जुट गए कि बबली के संबंध किन लोगों से हैं. इस काम में उन्हें सफलता मिल गई और पता चला कि उस के संबंध औरैया जिले के हीरनगर गांव के रहने वाले कुलदीप से हैं और वह दिल्ली में नौकरी करता है. एसआई उमेशचंद्र ने इस जानकारी से थानाप्रभारी को अवगत करा दिया. इस के बाद उन्होंने कुलदीप की तलाश शुरू कर दी और उस का पता लगाने के लिए मुखबिरों को भी लगा दिया

उधर खुद पर बच्चों के अपहरण का आरोप लगने पर जितेंद्र को बहुत दुख हुआ. उस ने अपहरण के आरोप लगाए जाने पर अपने बचने के लिए एसपी अरविंद सेन को तहरीर दे कर कहा कि उसे और उस के पिता को झूठा फंसाया जा रहा है. न्याय की गुहार लगाते हुए उस ने बच्चों को जल्द तलाशने की मांग की. 13 दिसंबर, 2013 की शाम को एसआई उमेशचंद्र को मुखबिर ने एक खास सूचना दी. जानकारी मिलते ही वह महिला कांस्टेबल निकुंबला, कांस्टेबल रामबहादुर यादव आदि के साथ बिल्थरा रोड रेलवे स्टेशन पहुंच गए. अपने साथ वह जितेंद्र को भी ले गए थे ताकि वह अपनी बेटियों को पहचान सके. मुखबिर ने जिस व्यक्ति के बारे में उन्हें सूचना दी थी वह उसे इधरउधर तलाशने लगे. कुछ देर बाद उन्हें प्लेटफार्म पर एक युवक आता दिखाई दिया. उस के साथ 2 बच्चियां भी थीं.

जितेंद्र ने बच्चियों को पहचानते हुए कहा, ‘‘सर, यही मेरी बेटियां हैं.’’ उधर उस युवक ने स्टेशन पर पुलिस को देखा तो वह तेज कदमों से दूसरी ओर चल दिया. लेकिन पुलिस ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और बच्चियों को भी अपने कब्जे में ले लिया. बच्चियों को सकुशल बरामद कर पुलिस खुश थी. जिस युवक को पुलिस ने हिरासत में लिया था उस ने अपना नाम कुलदीप बताया. उसे हिरासत में ले कर पुलिस थाने गई.

पूछताछ करने पर उस ने बताया कि वह बबली से प्यार करता है और बच्चों का अपहरण उस ने उसी के कहने पर ही किया था. उस की बात सुन कर पुलिस भी चौंक गई कि क्या एक मां ही अपने बच्चों का अपहरण करा सकती है. लेकिन कुलदीप ने खुशबू और अंशिका के अपहरण के पीछे की जो कहानी बताई, सभी को चौंका देने वाली निकली. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित और बिहार प्रांत से सटा एक जिला है बलिया. इस जिले के नगरा थाना क्षेत्र के देवरहीं गांव के रहने वाले गुलाबचंद के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां और 3 बेटे थे. बबली उन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह बहुत खूबसूरत थी. लेकिन जब उस ने लड़कपन के पड़ाव को पार कर जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उस की सुंदरता में और भी निखार गया.

वह जवान हुई तो घर वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी. वे उस के लिए सही लड़का तलाशने लगे. जल्द ही उन की मेहनत रंग लाई और बलिया जिले के ही सिकंदरपुर थाना क्षेत्र के उचवार गांव में रहने वाले बृजनारायण पांडेय के बेटे जितेंद्र से उस की शादी तय कर दी और सामाजिक रीतिरिवाज से 2003 में दोनों का विवाह हो गया. बबली जब अपनी ससुराल पहुंची तो अपने व्यवहार और काम से उस ने सभी का दिल जीत लिया. ससुराल में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. परिवार भी बड़ा नहीं था. इसलिए गृहस्थी की गाड़ी ठीक तरह से चल पड़ी. शादी के साल भर बाद बबली ने एक बेटी को जन्म दिया. उस का नाम रखा गया खुशबू.

परिवार बढ़ा तो घर का खर्च भी बढ़ गया. जितेंद्र अपने बीवीबच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखना चाहता था. लिहाजा वह काम की तलाश में दिल्ली चला गया. जल्द ही दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में उस की नौकरी लग गई. उन की जिंदगी की गाड़ी फिर से पटरी पर गई. इस दौरान जितेंद्र साल में 1-2 बार ही बीवीबच्चों से मिलने अपने गांव पाता और कुछ दिन घर रहने के बाद दिल्ली चला जाता था. वक्त यूं ही हंसीखुशी से गुजरता रहा. 3 साल बाद बबली एक और बच्ची की मां बन गई. उस का नाम अंशिका रखा. ज्यादा दिनों तक पति से दूर रहने की कमी बबली को खलने लगी थी. उस ने 1-2 बार पति से कहा भी कि वह हर महीने घर आ जाया करें. यदि हर महीने न भी आ सकेंतो 2 महीने में तो आ ही जाया करें, बच्चे बहुत याद करते हैं. लेकिन कुलदीप ने बारबार आने पर किराए में पैसे खर्च होने की बात बताई. जल्दजल्द घर आने में उस ने असमर्थता जता दी. 

लिहाजा अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बबली ने पड़ोस के एक युवक से नजदीकियां बढ़ा लीं. फिर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन गए. इस दौरान बबली एक और बेटी की मां बन गई. बबली ने घरवालों और जमाने से अपनी मोहब्बत की कहानी को छिपाने की बहुत कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सकी और जल्दी ही उन के प्रेमप्रसंग की खबर घर वालों को लग गई. फिर क्या था परिवार में खलबली सी मच गई और बबली को अपने प्रेमी से मिलने पर रोक लगा दी गई. इस के बाद तो उस की हालत पिंजरे में उस बंद पंछी की तरह हो कर रह गई जो सिर्फ फड़फड़ा सकता है लेकिन कोशिश करने पर भी उड़ नहीं सकता.

अपनी आजादी पर घर वालों द्वारा पहरे लगाए जाने से बबली चिढ़ गई. लगभग 2 साल पहले एक दिन अपने पिता की तबीयत खराब होने का बहाना बना कर वह मायके गई. वहीं पड़ोस में एक लड़का रहता था, जो दिल्ली में नौकरी करता था. वह जितेंद्र को जानता था और उसे यह भी पता था कि जितेंद्र कहां रहता है. बबली को पति के बिना सब सूनासूना सा लग रहा था. इसलिए वह उस लड़के के साथ पति के पास दिल्ली चली गई. पत्नी के अचानक दिल्ली जाने पर जितेंद्र चौंक गया. पत्नी के साथ रहना उसे अच्छा तो लग रहा था लेकिन पत्नी और बच्चों के आने पर उस का खर्च बढ़ गया जिस से घर चलाने में परेशानी होने लगी. परेशानी देखते हुए बबली ने भी कोई काम कर घर के खर्चे में हाथ बंटाने की बात कही तो जितेंद्र मान गया.

फिर वह अपने आसपास रहने वाली महिलाओं के सहयोग से काम तलाशने लगी. कुछ दिनों बाद उसे एक प्राइवेट कंपनी में काम मिल गया. जब दोनों ही काम करने लगे तो घर का खर्च ठीक से चलने लगा. बबली खुले विचारों की थी. रूपयौवन से परिपूर्ण बबली की देहयष्टि इतनी आकर्षक थी कि किसी को भी पहली नजर में लुभा लेती थी. फिर अलग काम करने से उसे मनमानी करने का पूरा मौका भी मिल रहा था. इस मौके का लाभ उठा कर बबली ने अपने साथ काम करने वाले कुलदीप से अवैध संबंध बना लिए.मूलरूप से औरैया जिले के फफूंद थाना क्षेत्र के हीरनगर गांव के निवासी रविशंकर का बेटा कुलदीप दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करता था. कुलदीप से एक बार संबंध बने तो बबली जैसे उस की दीवानी हो गई.

फिर तो उन का वासना का खेल चलने लगा. लेकिन एक दिन वह कुलदीप के साथ अपने कमरे में आपत्तिजनक स्थिति में थी तभी मकान मालिक की नजर उस पर पड़ी. उस ने उस समय तो उस से कुछ नहीं कहा, लेकिन जितेंद्र को बात बताते हुए उस से कमरा खाली करा लिया. फिर जितेंद्र ने पास में ही दूसरा कमरा किराए पर ले लिया. जितेंद्र बहुत ही शांत स्वभाव का था. पत्नी की करतूत का पता चल जाने के बावजूद भी उस ने उस से कोई सख्ती नहीं की बल्कि समझाने के बाद उस ने पत्नी को चेतावनी दे दी थी. लेकिन बबली ने उस की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया. बबली ने पास में ही रहने वाले एक और युवक से अवैध संबंध बना लिए. दोनों चोरीछिपे रंगरलियां मनाने लगे. उसी समय जितेंद्र ने पत्नी की नौकरी छुड़वा दी.

कुछ समय तक सब कुछ गुपचुप चलता रहा. लेकिन धीरेधीरे लोगों को उन दोनों के संबंधों के बारे में पता चल गया. फिर बात जितेंद्र के कानों तक भी पहुंची. पत्नी को सही रास्ते पर लाने के लिए उस ने उसे डांटा. बबली ने इस का विरोध किया. फिर क्या था इसी बात को ले कर उन के बीच झगड़े शुरू हो गए. एक दिन झगड़ा इतना बढ़ा कि बबली ने पुलिस से शिकायत कर पति को पिटवा दिया. पत्नी के बदले हुए रुख से जितेंद्र डर गया. उस ने तय कर लिया कि पत्नी चाहे कुछ भी करे, उस के काम में वह दखल नहीं करेगा. यानी उस ने एकदम से अपना मुंह बंद कर लिया. फिर तो बबली ने कुलदीप को भी अपने साथ रख लिया और खुल कर उस के साथ रंगरलियां मनाने लगी. सब कुछ देखते हुए भी डर के कारण जितेंद्र चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता था. बल्कि उसे बबली से अपनी जान का भी खतरा महसूस होने लगा था.

इस का कारण यह था कि एक दिन बबली ने जितेंद्र के खाने में छिपकली मार कर डाल दी थी. संयोग से उस दिन जितेंद्र ने लंच कंपनी की कैंटीन में कर लिया था. बाद में जब उस ने लंच में पत्नी द्वारा दी गई आलू की भुजिया देखी तो उस का रंग बदला हुआ था. उसे लगा कि इस में जहर है तो उस ने सब्जी फेंक दी. घर आ कर जब उस ने पत्नी से इस बारे में पूछा तो उस ने बहाना बनाते हुए कह दिया कि खाना बनाते हुए कुछ गिर गया होगा. इस हादसे से जितेंद्र एकदम से डर गया था. जान का खतरा महसूस होने पर जितेंद्र 13 जुलाई, 2013 को बबली और बच्चों को दिल्ली में ही छोड़ कर बलिया चला आया और उस ने वाराणसी में ही काम तलाश लिया. पति के वापस गांव चले जाने पर बबली आजाद हो गई और खुल कर कुलदीप के साथ मौजमस्ती करने लगी. कुलदीप बबली के साथ उस के बच्चों को भी बहुत प्यार करता था. कुल मिला कर दोनों का समय हंसीखुशी बीतने लगा.

इधर बबली के मायके वालों को जब पता चला कि झगड़ा होने के बाद जितेंद्र बबली को दिल्ली में छोड़ कर वापस गया है तो उस के पिता गुलाबचंद दिल्ली पहुंच गए और बबली तथा उस के बच्चों को घर लिवा लाए. तब से वह मायके में रहने लगी. बबली ने भी पिता से कह दिया था कि अब वह जितेंद्र के यहां नहीं जाएगी. तब गुलाबचंद ने बच्चों का नाम गांव के ही स्कूल में लिखवा दिया. ननिहाल में बच्चे तो खुश थे लेकिन बबली का मन अपने आशिक कुलदीप के बिना नहीं लगता था. वह मोबाइल से कुलदीप से बात कर अपना मन बहला लेती थी, लेकिन जब कुलदीप की जुदाई उसे अधिक खलने लगी तो मायके वालों को बिना कुछ बताए वह एक दिन अकेले ही दिल्ली चली गई और कुलदीप के साथ रहने लगी. मायके वालों को जब पता लगा कि वह दिल्ली चली गई है तो उन्हें बहुत बुरा लगा. तब बबली का भाई प्रीतम दिल्ली जा कर उसे वापस ले आया.

वक्त गुजरता रहा. बबली पति जितेंद्र को भूल चुकी थी. उस ने तय कर लिया था कि जीवन भर कुलदीप के साथ ही रहेगी. इसलिए वह कुलदीप को हमेशा के लिए पाने के बारे में सोचने लगी. उसे कुलदीप के बिना एक पल भी गुजार पाना नामुमकिन लगने लगा तो उस ने उस के पास जाने के लिए एक प्लान बनाया. प्लान के अनुसार 4 दिसंबर, 13 को बबली ने दिल्ली फोन कर के कुलदीप को अपने गांव के पास परसिया चट्टी पर बुलाया. तय समय के अनुसार कुलदीप परसिया चट्टी पहुंच गया. इधर रोज की तरह 8 वर्षीय खुशबू और 6 वर्षीय अंशिका स्कूल जाने के लिए घर से निकलीं तो रास्ते में बबली मिली. वह दोनों बच्चों को ले कर परसिया चट्टी पहुंची.

चूंकि कुलदीप उन्हें खूब प्यार करता था इसलिए उसे देख कर दोनों बच्चियां खुश हो गईं. बबली ने खुशबू और अंशिका को यह समझाते हुए उस के साथ दिल्ली भेज दिया कि 10 दिन के अंदर वह भी दिल्ली आ जाएगी. मां के कहने पर दोनों बहनें कुलदीप के साथ दिल्ली चली गईं. इस प्लान के पीछे बबली की यह सोच थी कि जब बेटियों के लापता होने पर घर के लोगों का सारा ध्यान उस ओर चला जाएगा तो वह आसानी से अपनी 3 साल की छोटी बेटी साक्षी को ले कर कुलदीप के पास चली जाएगी. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. कुलदीप से पूछताछ के बाद पुलिस ने इस केस की नायिका बबली को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने कुलदीप को अपहरण और बबली को साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर के अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया तथा दोनों बच्चियों को उस के पिता जितेंद्र के संरक्षण में दे दिया गया.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित