देश की सब से उलझी मर्डर मिस्ट्री : हड्डी के स्क्रू से खुला राज – भाग 4

सुजित के दोस्त सुरेश पर कसा शिकंजा

आखिर कुछ दिनों बाद एक छोटा सा सुराग टौम के हाथ लग गया. सुजित के दोस्तों के बारे में पता करते करते उन के सामने एक नाम आया सुरेश का. वह सुजित का खास दोस्त था. वह आटो चलाता था. पता चला था कि जिन दिनों शकुंतला गुम हुई थीं, उन दिनों वह शकुंतला के घर 2-3 बार दिखाई दिया था. एक बार तो रात 2 बजे वह शकुंतला के घर के पास आटो ले कर जाते हुए दिखाई दिया था और उस समय उस के आटो में कोई बड़ा सामान भी था.

टौम के लिए इतनी जानकारी पर्याप्त थी. उन्होंने तत्काल सुरेश को उठा लिया और थाने ला कर पूछताछ शुरू कर दी, “सुरेश, तुम सुजित को पहचानते थे?”

“जी, वह मेरा दोस्त था. बहुत भला आदमी था. बेचारा चला गया.” सुरेश ने जवाब में कहा.

“वह भला था या बुरा, यह मैं तय कर लूंगा. तुम सिर्फ उसी बात का जवाब दो, जो मैं पूछूं और दूसरी बात यह कि अब सुजित जीवित नहीं है, इसलिए उस के सभी गुनाहों की सजा तुझे अकेले ही भोगनी है, यह सोच कर जवाब देना. सच बोलोगे तो सजा कम हो सकती है, वरना भोगोगे.”

सुरेश को पसीना आ गया. टौम ने पूछा, “तुम शकुंतला को जानते थे?”

“नहीं. कौन शकुंतला?” सुरेश ने कहा.

इसी के साथ उस के बाएं गाल पर 2 तमाचे पड़े. तमाचे इतने जोरदार थे कि उस की आंखों के सामने सितारे नाचने लगे तो कानों में भंवरे गुनगुनाने लगे. टौम ने कहा, “अभी तो सिर्फ भंवरे ही गुनगुना रहे हैं. सच नहीं बोला तो शेर और बाघ की गर्जना सुनाई देगी. मैं उस शकुंतला की बात कर रहा हूं, तुम आटो ले कर जिस के घर के चक्कर लगा रहे थे. जिसे तुम ने और सुजित ने मिल कर मार डाला. उस के बाद सीमेंट और कंक्रीट के साथ भर कर सरोवर में फेंक दिया. याद आया… हत्यारा कहीं का.”

टौम की आवाज डराने वाली थी. सुरेश घबरा गया. उस ने कहा, “साहब, हत्या मैं ने नहीं की है. हत्या सुजित ने की है.”

टौम नीचे बैठ कर बोले, “ठीक है, जो भी है सचसच और विस्तार से बताओ.”

इस के बाद सुरेश ने जो बताया, वह इस प्रकार था.

सुजित अस्वती को धोखा दे रहा था. वह शादीशुदा था, फिर भी खुद को कुंवारा बता कर अस्वती के घर में उस के साथ रह रहा था. शकुंतला को इस बात की जानकारी हो गई थी. पर यह बात वह बेटी को बता कर उस का दिल नहीं तोडऩा चाहती थी. इसलिए उस ने सुजित को समझाया कि वह उस की बेटी के जीवन से चला जाए, पर सुजित नहीं माना.

सुरेश ने उगल दिया सारा राज

शकुंतला को लगा कि सुजित सीधे नहीं मानने वाला तो उस ने उसे धमकाया कि अगर उस ने अस्वती को नहीं छोड़ा तो वह सारी हकीकत अस्वती को बता देगी. शकुंतला की इस धमकी से सुजित घबरा गया. उस ने अस्वती को मां के खिलाफ भडक़ाना शुरू कर दिया, दूसरी ओर साथ ही साथ शकुंतला की हत्या की योजना भी बनाता रहा.

एक्सीडेंट के बाद शकुंतला को चिकन पौक्स हो गया. अस्वती बच्चों को ले कर लौज में रहने चली गई तो सुजित को शकुंतला की हत्या करने के मौका मिल गया. उस ने सुरेश से बात कर के मदद मांगी. सुरेश ने हत्या करने के अलावा दूसरी अन्य मदद का आश्वासन दिया.

इस के बाद 22 सितंबर, 2016 को दोनों बाजार से एक ड्रम, सीमेंट, कंक्रीट, रस्सी आदि खरीद कर ले आए. यह सारा सामान सुरेश शकुंतला के घर पहुंचा कर चला गया. यह सारा सामान देख कर शकुंतला ने उस से पूछा भी, पर बिना कुछ बोले ही वह चला गया था. उसी रात सुजित शकुंतला के घर गया और गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया. उस के बाद लाश को ड्रम में डाल कर ऊपर से सीमेंट और कंक्रीट भर कर पैक कर दिया. इस के बाद रात को सुरेश को फोन किया.

सुरेश आटो ले कर शकुंतला के घर आया तो ड्रम को आटो में रख कर दोनों पनंगद सरोवर पर ले गए और ड्रम को पानी के अंदर डुबो कर अपनेअपने घर चले गए.

इतनी बात बता कर सुरेश ने कहा, “साहब, इतनी भर बात है. इस के आगे मैं कुछ नहीं जानता. मैं ने हत्या करने में कोई मदद नहीं की थी.”

टौम ने कहा, “हत्या में मदद नहीं की, पर अपराध को छिपाने और लाश को ठिकाने लगाने का तो अपराध किया है.” कह कर मार्च 2023 में सुरेश को गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद उस का वह आटो भी जब्त कर लिया गया, जिस से उस ने लाश को ठिकाने लगाया था. सारे सबूत जुटाने के बाद सुरेश को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

आखिर इंसपेक्टर सी.बी. टौम ने एक ऐसा केस हल कर दिया था, जिस में न मरने वाले का पता था, न कोई सबूत था, फिर भी अपराधी पकड़ा गया था. इस तरह का काम सी.बी. टौम जैसे होशियार पुलिस वाले ही कर सकते हैं.

देश की सब से उलझी मर्डर मिस्ट्री : हड्डी के स्क्रू से खुला राज – भाग 3

सुजित अच्छा आदमी नहीं था. उस ने अस्वती को धोखा दिया था. सागिर नाम की लडक़ी के साथ उस का विवाह हो गया था और उस से उसे एक बच्चा भी था, लेकिन अस्वती को उस ने यह सब नहीं बताया था. उसे बेवकूफ बना कर उस से प्यार कर लिया था और खुद को कुंवारा बता कर उस के साथ रह रहा था.

उस ने अस्वती से कहा था कि कुछ दिनों में अपने मांबाप से बात कर के वह उस से विवाह कर लेगा. तब तक वह अपनी मां के घर में उसे रहने दे. अस्वती मान गई थी. शकुंतला के न चाहते हुए भी अस्वती और सुजित घर में पतिपत्नी की तरह रहने लगे थे. सुजित सप्ताह में 3 दिन अस्वती के साथ रात में रुकता था और घर के सदस्य की तरह रहता था.

इस के बाद फिर अस्वती से पूछताछ हुई. इस बार इंसपेक्टर टौम ने थोड़ी सख्त आवाज में कहा, “अस्वती, अब हमारे पास समय कम है, इसलिए मेरा टेंपरेचर हाई हो रहा है. तुम ने पहले भी हम से बहुत कुछ छिपाया है. लेकिन इस बार सब कुछ सचसच बताओ. और हां, एक बात बता दूं. तुम्हारी मां शकुंतला का मर्डर हो गया है और उस ड्रम में जो हड्डियां मिली थीं, वे तुम्हारी मां की थीं.”

अस्वती के प्रेम प्रसंग से खुले नए राज

टौम के रुख से अस्वती को लगा कि अब अगर उस ने सही जवाब नहीं दिया तो पुलिस सख्ती कर सकती है. इसलिए उस ने कहा, “साहब, हत्या वत्या के बारे में तो मैं कुछ नहीं जानती, पर अंतिम दिनों में जो हुआ था, वह मैं बताए देती हूं. मैं अपने प्रेमी सुजित के साथ अपनी मां के घर में रहती थी. वह सप्ताह में 3 दिन मेरे साथ रहता था, उस के बाद अपने मांबाप के पास चला जाता था. मेरे बच्चों का भी वह खूब खयाल रखता था.

“उसी बीच पहली सितंबर, 2016 को मां का एक्सीडेंट हो गया तो उन्हें वीकेएम अस्पताल में भरती कराया. बाएं पैर में फ्रैक्चर होने की वजह से स्क्रू लगाना पड़ा. 15 दिनों तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा. 15 सितंबर, 2016 को अस्पताल से छुट्टी होने के बाद वह घर आईं. इस के बाद हम सभी मां के घर में ही रहते रहे. 19 सितंबर, 2016 को मां को चिकन पौक्स हो गया. इस के अलावा भी अन्य इंफेक्शन थे, जिस की वजह से मैं बच्चों को ले कर एक स्थानीय लौज में रहने चली गई थी और सुजित अपने मांबाप के पास चला गया था.”

थोड़ी देर रुक कर अस्वती ने आगे कहा, “एक सप्ताह बाद 26 सितंबर, 2016 को मैं मां के घर वापस आई तो सुजित वहीं था. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ तो मैं ने उस से पूछा. उस ने कहा कि वह अपना कुछ सामान भूल गया था, उसे लेने आया था. उस ने यह भी बताया कि वह 2 दिन पहले यहां आया था. तब मेरी मां शकुंतला किसी मिशनरी की नर्स के साथ दिल्ली चली गई हैं और वह यह कह कर गई हैं कि अब वह उसी के साथ वहीं रहेंगी.”

इतना कह कर अस्वती रुकी. उस ने इंसपेक्टर टौम की ओर देखा और एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, “साहब, आप को लग रहा होगा कि मैं ने उस की बात पर विश्वास कैसे कर लिया? सच कहूं साहब, मेरी मां मेरे और सुजित के संबंधों को ले कर बहुत किचकिच करती थीं. इसलिए वह चली गईं, यह जान कर मैं बहुत खुश हुई. मैं ने सुजित से ज्यादा पूछताछ नहीं की और न ही पुलिस में केस किया.”

“तुम्हें पता नहीं है अस्वती कि तुम्हारी मां किचकिच क्यों करती थी?” टौम ने कहा, “क्योंकि सुजित तुम्हें धोखा दे रहा था. वह शादीशुदा था. उस की पत्नी ही नहीं, एक बच्चा भी था. वह तुम्हें छोड़ कर बाकी के दिनों में मांबाप के पास नहीं, पत्नी के पास रहता था.”

अस्वती के प्रेमी सुजित के सुसाइड से उलझी गुत्थी

इंसपेक्टर टौम के इस खुलासे से अस्वती के पैरों तले से जमीन खिसक गई. टौम ने हंसते हुए कहा, “अब मैं जो कहने जा रहा हूं अस्वती, उसे सुन कर तुम्हें बहुत बड़ा सदमा लगेगा. तुम्हारी मां की हत्या किसी और ने नहीं, सुजित ने ही की है. कुछ समय बाद मैं सारे सबूत के साथ फिर आऊंगा.”

इतना कह कर केरल के शरलौक होम्स इंसपेक्टर टौम चले गए. टौम को पूरा शक था कि सुजित ने ही शकुंतला को मारा है. पर किस तरह और क्यों मारा, यह उन की समझ में नहीं आ रहा था. इस मामले में सब से बड़ी दिक्कत यह थी कि सुजित मर चुका था. 7 जनवरी, 2018 को सीमेंट और कंक्रीट से भरे ड्रम से शकुंतला की हड्डियां, 5 सौ और सौ के नोट के साथ कुछ अन्य सामान मिला था. उस के 2 दिन बाद ही 9 जनवरी, 2018 को सुजित ने आत्महत्या कर ली थी.

जिस पर शक था, वह मर चुका था और जिस की हत्या हुई थी, उस की लाश भी नहीं मिली थी. टौम को शक था कि शायद ड्रम मिल गया था, इसलिए अपनी पोल खुल जाने के डर से सुजित ने भी मौत को गले लगा लिया था, पर टौम मामले की सच्चाई तक पहुंचना चाहते थे. इसलिए उन्होंने तय कर लिया था कि सुजित भले जीवित नहीं है, पर उस ने ही शकुंतला की हत्या की है, यह बात वह साबित कर के रहेंगे. उन्होंने फिर से पूरे तनमन से इनवैस्टीगेशन शुरू कर दी.

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अस्वती 19 सितंबर, 2016 को शकुंतला को छोड़ कर लौज में रहने गई थी और 26 सितंबर को वापस आई तो मां नहीं थी. सुजित था और उसी ने बताया था कि मां दिल्ली चली गई हैं और अब वह वहीं रहेंगी. इस से टौम को लगा कि जो कुछ भी हुआ है, वह 19 सितंबर और 25 सितंबर के बीच हुआ है.

शक की सुई सुजित पर टिकी थी. इसलिए इंसपेक्टर टौम ने जांच की शुरुआत वहां से की, जहां सुजित नौकरी करता था और उस के दोस्तों से. पूछताछ का दौर चल पड़ा. सुजित के दोस्तों और पड़ोसियों के बारे में पता किया गया, साथ ही यह भी पता किया जा रहा था कि जिस ड्रम से हड्डियां मिली थीं, वह कहां से खरीदा गया था.

देश की सब से उलझी मर्डर मिस्ट्री : हड्डी के स्क्रू से खुला राज – भाग 2

यह जानकारी जुटाने के लिए टौम के नेतृत्व में 5 बड़ी टीमें बनाई गई थीं. पांचों टीमें रातदिन पता करने में लग गईं. आखिर केरल के वीकेएम अस्पताल में जिन रोगियों को ये 6 स्क्रू लगाए गए थे, उन छह के छहों रोगियों की जानकारी मिल गई.

पैर में स्क्रू लगवाने वाली मरीज शकुंतला मिली लापता

उन 6 में से 5 रोगियों का पता तो चल गया, वे पांचों सहीसलामत थे. अब छठें रोगी के घर जाना बाकी था. वह 54 साल की महिला रोगी थी, जिस का नाम था शकुंतला. उस का पता नहीं चल रहा था. पुलिस एक बार फिर अस्पताल पहुंची, जहां शकुंतला का औपरेशन हुआ था.

सारा डाटा खंगाला गया, लेकिन उस में शकुंतला के नाम के अलावा और कोई जानकारी नहीं मिली. तब पुलिस ने विजिटर्स की लिस्ट देखी. उस में एक नाम कई बार दिखाई दिया, जो शकुंतला से मिलने आती रहती थी. उस का नाम था अस्वती दामोदरन. विजिटर्स लिस्ट से उस का पता भी मिल गया.

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पुलिस को लगने लगा कि अब जल्दी ही वह कातिल और कत्ल के मोटिव तक पहुंच सकेगी. पर यह सब इतना आसान नहीं था, जितना पुलिस ने सोच लिया था. अभी रहस्य से परदा उठाने के लिए पुलिस को बहुत मेहनत करनी थी. पुलिस अस्वती के घर पहुंची.

पुलिस ने जब अस्वती से शकुंतला के बारे में पूछा तो उस ने कहा, “साहब, मुझे मेरी मां शकुंतला को देखे तो 2 साल हो गए हैं. वह गायब हैं. मुझे उन के बारे में कुछ नहीं पता.”

अस्वती की बात सुन कर पुलिस हैरान रह गई. इंसपेक्टर टौम ने कहा, “बेकार की बातें मत करो. सब कुछ विस्तार से बताओ. क्या उन का कोई एक्सीडेंट हुआ था या वह गिर गई थीं. तुम उन्हें अस्पताल ले गई थी?”

अस्वती ने थोड़ा घबरा कर कहा, “साहब, मेरी मां और मुझ में पटती नहीं थी. अपनी शादी के बाद मैं उन के साथ रहती थी. एक सितंबर, 2016 को मैं उन के साथ स्कूटी से जा रही थी तो ट्रक वाले ने टक्कर मार दी थी, जिस में उन के बाएं पैर में फ्रैक्चर हो गया था. मैं उन्हें वीकेएम अस्पताल ले गई थी. वहां उन के पैर में स्क्रू लगाया गया था.

इलाज के बाद 19 सितंबर, 2016 को उन से मिलने गई थी. लेकिन इस के बाद उन से मिलने गई तो वह नहीं मिलीं. मुझे पता चला कि वह किसी काम से दिल्ली गई हैं. उस के बाद से मेरी उन से मुलाकात नहीं हुई है.”

इंसपेक्टर टौम ने कहा, “तुम्हारी सगी मां गायब हो गई और तुम ने पुलिस में शिकायत भी नहीं की?”

“नहीं साहब, पुलिस में शिकायत नहीं की. क्योंकि हम दोनों में बिलकुल नहीं बनती थी. मुझे लगा कि हमारे झगड़ों से परेशान हो कर वह कहीं चली गई हैं. वह कहीं भी रहें, मुझ से क्या मतलब? इसलिए मैं ने शिकायत नहीं की थी.” अस्वती ने कहा.

इंसपेक्टर टौम और उन के साथी मन ही मन हंस रहे थे. क्योंकि उन्हें पता था कि अस्वती एकदम अधूरी जानकारी दे रही थी. उस के जवाब से अनेक सवाल खड़े हो रहे थे. पर पुलिस के लिए तो इस समय यह जानकारी पर्याप्त थी कि ड्रम में मिली हड्डियों में जो स्क्रू मिला था, वह शकुंतला के पैर की हड्डी में जो लगा था, वही था. इस के लिए पुलिस ने अस्वती का डीएनए टेस्ट भी कराया, जो मैच कर गया था. इस का मतलब शकुंतला मर चुकी थी. इस से यह निश्चित हो गया था कि ड्रम में मिली हड्डियां शकुंतला की ही थीं.

अब सवाल यह था कि शकुंतला को मारा किस ने? क्यों और किसलिए मारा? उस का बेटी से ऐसा क्या झगड़ा था कि मां चली जाए तो बेटी 2-2 साल तक उस के बारे में पता भी न करे? सवाल अनेक थे और जवाब शून्य थे. इन सवालों के जवाब पाने के लिए इंसपेक्टर टौम ने शकुंतला और अस्वती के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की.

शकुंतला की बेटी से हुई पूछताछ

अस्वती की कर्म कुंडली खंगालने पर असली कहानी सामने आ गई. अस्वती सुधी नाम के एक लडक़े से प्यार करती थी, जबकि शकुंतला को उस का उस लडक़े से प्यार करना पसंद नहीं था. इसलिए अस्वती ने भाग कर सुधी से विवाह कर लिया था. पर उस का यह प्रेमविवाह ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सका.

2 साल बाद 2016 में जनवरी महीने के आसपास अस्वती सुधी को छोड़ कर मां के साथ रहने के लिए कोच्चि आ गई. शकुंतला पति से अलग रहती थी और लौटरी के टिकट बेच कर गुजारा करती थी.

उसी दौरान अस्वती की मुलाकात टी.एम. सुजित नाम के एक व्यक्ति से हुई. सुजित ‘सोसायटी फार प्रिवेंशन औफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स’ (एसपीसीए) नाम की संस्था में नौकरी करता था. दोनों में प्यार हो गया तो सुजित अस्वती की मां के घर में ही उस के साथ रहने लगा.

अस्वती ने पुलिस को यह बात नहीं बताई थी. यह जानकारी मिलने के बाद एक बार फिर पुलिस अस्वती से पूछताछ करने उस के घर पहुंची. अस्वती के सामने आते ही इंसपेक्टर टौम ने पूछा, “अस्वती, तुम्हारा प्रेमी सुजित कहां है? तुम ने अपने पहले विवाह के बारे में भी मुझ से कुछ नहीं बताया था.”

इंसपेक्टर टौम की ये बातें सुन कर अस्वती रो पड़ी. रोते हुए उस ने कहा, “साहब, सुजित की तो 20 दिन पहले मौत हो गई है. 9 जनवरी, 2018 को किसी कारणवश उस ने आत्महत्या कर ली और हम सभी को छोड़ कर चला गया.”

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यह जानकारी पुलिस के लिए चौंकाने वाली थी. क्योंकि 7 जनवरी, 2018 को पुलिस को पनंगद सरोवर के किनारे वह ड्रम मिला था, जिस में शकुंतला की हड्डियां थीं. इस के 2 दिन बाद जब यह समाचार अखबारों में सनसनी मचाए था तो 9 जनवरी को सुजित ने आत्महत्या कर ली थी. अब सवाल यह था कि यह इत्तफाक था या इस में कोई रहस्य था. यह घटना संदेह पैदा करने वाली थी.

अब पुलिस सुजित की कुंडली खंगालने लगी. उस की कहानी बड़ी ही पेचीदा निकली.

देश की सब से उलझी मर्डर मिस्ट्री : हड्डी के स्क्रू से खुला राज – भाग 1

यह कहानी है केरल के अर्नाकुलम जिले के कोच्चि शहर की. इस शहर से जुड़े कुंबलम में पनंगद नाम का एक सुंदर सरोवर है. एक दिन इसी सरोवर के किनारे एक ड्रम दिखाई दिया. 2-3 दिनों तक किसी ने उस ड्रम की ओर ध्यान नहीं दिया. पर इस के बाद में लोगों को लगा कि ड्रम से दुर्गंध आ रही है. इसलिए 7 जनवरी, 2018 को मछली पकडऩे वाले और कुछ दुकानदारों ने मिल कर इस बात की सूचना स्थानीय पुलिस को दी.

स्थानीय पुलिस ने आ कर उस ड्रम को देखा. ड्रम सीमेंट और कंक्रीट से पैक था. दुर्गंध का पता लगाने के लिए पुलिस ने ड्रम को  तोडऩे का आदेश दिया. पहले प्लास्टिक का ड्रम तोड़ा गया. उस के बाद छेनी और हथौड़ी से जम गई सीमेंट और कंक्रीट को तोड़ा जाने लगा. लोगों को यही लग रहा था कि इस में शायद कोई लाश हो. पर ऐसा कुछ भी नहीं निकला. उस में से मानव हड्डियों के केवल कुछ टुकड़े निकले, वे बचेखुचे और टूटेफूटे थे. इस में जबड़ों के अलावा पैर की हड्डियों के एकदो टुकड़े थे तो एकाध हाथ के तो एकदो मानव जबड़े के थे.

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इस के साथ उस ड्रम से जो मिला था, वह हैरान करने वाला था. उस में से कपड़ों के चिथड़े, बालों का गुच्छा, रस्सी के टुकड़े और 3 करंसी नोट निकले थे. इन 3 नोटों में एक सौ का नोट था और 2 पांच सौ के. पुलिस ने ये सभी चीजें जब्त कर लीं और जांच के लिए भेज दिया.

अगले दिन यानी 8 जनवरी, 2018 को यह समाचार तमाम स्थानीय अखबारों में छपा और शहर में चर्चा का विषय बन गया. पुलिस के लिए यह केस काफी उलझा हुआ और पेचीदा था, क्योंकि न तो लाश थी और न कोई चेहरा मोहरा. यह भी पता नहीं चल रहा था कि मरने वाला स्त्री था या पुरुष?

प्राथमिक जांच में ही पुलिस को पता चल गया था कि यह केस बहुत ही रहस्यमय है. इसलिए उन्होंने इस मामले को अर्नाकुलम (साउथ) पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर कर दिया और इस की जांच की जिम्मेदारी विशेषकर सर्कल इंसपेक्टर सी.बी. टौम को सौंप दी गई थी.

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सी.बी. टौम नाम इनवैस्टीगेशन की दुनिया में केरल का जानामाना नाम है. वह केरल में शरलौक होम्स के रूप में जाने जाते हैं और लोग उन्हें ‘टौम्स’ कहते भी हैं. जब उन के पास जांच के लिए यह मामला आया तो वह भी रोमांचित हो उठे और इस मामले की इनवैस्टीगेशन में लग गए. उन के साथ उन्हीं की तरह एक अन्य होशियार इनवैस्टीगेशन और मैडिकल अफसर हैं, जिस का नाम है डा. एन.के. उन्मेश.

मानव शरीर की उन हड्डियों का पोस्टमार्टम हुआ. इस के अलावा अन्य जांचें भी हुईं. केवल हड्डियों के कुछ टुकड़ों से हत्यारे तक पहुंच पाना आसान नहीं था. हकीकत में यह इनवैस्टीगेशन काफी मुश्किल थी. 3 दिनों की जांच के बाद इंसपेक्टर सी.बी. टौम, उन के साथी डा. एन.के. उन्मेश और पुलिस के अन्य अधिकारियों ने एक मीटिंग की.

कंकाल में पाए गए स्क्रू से शुरू हुई जांच

इस मीटिंग में सी.बी. टौम ने कहा, “यह केस बहुत ही पेचीदा है. इस में अनेक लेयर निकलेंगी. मरने वाले की पहचान तो दूर की बात रही, अभी तो यह भी पता नहीं है कि मरने वाला पुरुष है या स्त्री. हां, इस में से एक बाल का गुच्छा जरूर मिला है.”

“पर बाल की लंबाई से यह साबित नहीं किया जा सकता कि मरने वाला पुरुष था या स्त्री.” मीटिंग में बैठे एक अन्य पुलिस अधिकारी ने कहा.

“आप का कहना अपनी जगह सही है.” टौम ने कहा, “वह बाल 50 सेंटीमीटर लंबे हैं. जनरली महिलाओं के ही बाल लंबे होते हैं. पर आजकल तो लडक़े भी इस तरह बाल रखते हैं. इसलिए निश्चित रूप से कुछ भी कहना मुश्किल है,” टौम ने कहा.

“अभी तो यह भी पता नहीं है कि हत्या कब हुई थी?”

“अभी हड्डियों की पूरी तरह जांच नहीं हो पाई है. पर मेरा अनुभव जो कहता है, उस के अनुसार यह मर्डर 8 नवंबर, 2016 के पहले हुआ होगा.” डा. एन.के. उन्मेश ने कहा.

“आप अपने अनुभव से ऐसा कैसे कह सकते हैं?” एक पुलिस अधिकारी ने हैरानी से पूछा.

तब सी.बी. टौम ने शरलौक होम्स की अदा में जवाब दिया, “सर, ड्रम से 3 करंसी नोट मिले हैं, जिन में 2 पांच सौ के हैं और एक सौ का है. हम जानते हैं कि भारत में 8 नवंबर, 2016 की रात से नोटबंदी लागू हुई थी, जिस में पांच सौ के नोट बंद हो गए थे. मरने वाले के पास ये नोट थे, जो ड्रम में मिले हैं. इसलिए हत्या 8 नवंबर के पहले ही की गई होगी.”

टौम की बात सभी को सही लगी. पर 2 साल पहले गायब हुए व्यक्ति की तलाश करना पुलिस को मुश्किल लग रहा था. क्योंकि यह भी पता नहीं था कि गायब होने वाला स्त्री है या पुरुष? यह भी पता नहीं था कि वह गायब कहां से हुआ था? गायब होने वाले की उम्र कितनी थी और वह गायब कब हुआ था?

3 दिन बीत गए थे. 11 जनवरी, 2018 को डा. एन.के. उन्मेश हड्डियों की जांच कर रहे थे, तभी उन्हें हड्डियों के टुकड़ों से एक ‘स्क्रू’ और एक ‘वाशर’ मिला. वह स्क्रू 6.6 सेंटीमीटर लंबा और 2.5 सेंटीमीटर चौड़ा था. जिस हड्डी के टुकड़े से वह मिला था, वह हड्डी का टुकड़ा मरने वाले के बाएं पैर की एड़ी के हिस्से का था और स्क्रू उसी में लगा था.

शायद वह स्क्रू काफी समय पहले लगाया गया था, इसलिए कंपनी वगैरह का नाम आसानी से पढऩे में नहीं आ रहा था. डा. एन.के. उन्मेश ने तुरंत इस बात की जानकारी इंसपेक्टर टौम को देते हुए कहा, “मुझे हड्डियों से एक स्क्रू मिला है. यह बहुत बड़ा सुराग बन सकता था, पर अफसोस की बात यह है कि इस पर कंपनी वगैरह का नाम काफी धुंधला हो गया है, जो पढऩे में नहीं आ रहा है.”

यह सुन कर इंसपेक्टर टौम उछल पड़े, “समझ लीजिए भाई, सुराग मिल गया. तुम जल्दी से वह स्क्रू ले कर यहां आ जाओ.”

थोड़ी देर में डा. उन्मेश उन के पास पहुंच गए. इस के बाद इंसपेक्टर टौम ने अपने हाई रेजुलेशन कैमरे से स्क्रू की फोटोग्राफी शुरू कर दी. कई घंटे की मेहनत के बाद उन्हें एक छोटा सा, पर महत्त्वपूर्ण सुराग उन के हाथ लग गया. उस स्क्रू के टौप पर धुंधला हो चुका कंपनी का नाम पढऩे में आ गया.

जिन मरीजों के स्क्रू लगाए, उन की की गई जांच

वह नाम था PITKAR. टौम ने तुरंत इस नाम को कंप्यूटर पर सर्च किया. पता चला कि यह पुणे की एक कंपनी है, जो पूरे देश में इस तरह के स्क्रू की सप्लाई करती है. इस स्क्रू का उपयोग सर्जरी में किया जाता है.

अब यह पता करना था कि इस तरह के स्क्रू का उपयोग अर्नाकुलम जिले में किसकिस अस्पताल में होता है? इस स्क्रू का उपयोग किस रोगी के लिए किया गया था? लेकिन इन दोनों सवालों का जवाब तलाशना किसी चुनौती से कम नहीं था. एक पूरा जिला, उस में अनेक इलाके और कस्बे और उन में हजारों अस्पताल. उन में लाखों रोगियों में किसी एक रोगी पर इस तरह की सर्जरी हुई होगी. इतना सब पता करना था, उस में भी निश्चित समय का पता नहीं था.

टौम ने कहा, “टास्क बड़ा है तो हम भी कम नहीं हैं. हम अलगअलग टीमें बना कर 2016 से पता लगाने की शुरुआत करते हैं कि उस साल इस कंपनी ने किसकिस अस्पताल में यह स्क्रू भेजे गए थे.”

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इस के बाद कंपनी से संपर्क किया गया. कंपनी ने बिक्री के आधार पर जानकारी दी कि साल 2016 में कुल 161 स्क्रू सप्लाई किए गए थे, जिस में 155 तो गुजरात और महाराष्ट्र में भेजे गए थे और 6 केरल में सप्लाई किए गए थे. इस के बाद यह पता किया गया कि केरल में कहां और किस रोगी को यह स्क्रू लगाया गया था.

कर्नल का इश्क बना रिस्क – भाग 4

कहते हैं जिस्म बेचने वाली को कितना भी प्यार और इज्जत दो, लेकिन उस के भीतर की असलियत खत्म नहीं होती. श्रेया भी समझ गई थी कि रामेंदु उपाध्याय ने उसे अपनी रखैल बना कर रख लिया है. अगर वह उसे पत्नी का दरजा नहीं देगा तो उसे पत्नी की तरह उसे तमाम सुख देने होंगे. इसलिए वह उस से अपनी हर फरमाइश पूरी करवाने लगी. उसे पीने के लिए शराब की जरूरत होती, खाना बनाना श्रेया को आता नहीं था, इसलिए या तो वह होटल से खाना मंगाती या रामेंदु ही उस के लिए खाना बनाता. इस तरह रामेंदु का लगभग रोज फ्लैट में आनाजाना होता था.

श्रेया अब उस से लगातार दुर्व्यवहार भी करने लगी थी और इतना ही नहीं शराब पी कर वह रामेंदु को गालियां तक देती और कहती, “तुम ने मेरी लाइफ खराब कर दी है मुझे रखैल की तरह रखा हुआ है. या तो मुझ से शादी कर लो नहीं तो…”

लेकिन रामेंदु के घर में एक डेढ़ साल का बेटा और पत्नी थी. ऐसे में वह इस के लिए बिलकुल राजी नहीं था. इस तरह के झगड़े होना आम बात हो गई थी. लेकिन अपनी अय्याशी की लत के कारण अब वह लाचार हो गया था और अपने पाप को छिपाए रखने के लिए सब कुछ सहने पर मजबूर था.  लेकिन 2-2 जिंदगी जीते हुए रामेंदु इस बात से अंजान था कि उस की पत्नी सविता को एक बार फिर उस के चालचलन पर शक हो गया था.

श्रेया की जिद ले गई उसे मौत के मुहाने

2 सितंबर, 2023 को सविता अपने पति का पीछा करते हुए उस की रखैल श्रेया के घर पहुंच ही गई. उस दिन रामेंदु की जिंदगी में कोहराम मच गया. पत्नी प्रेमिका दोनों में जम कर झगड़ा हुआ. श्रेया ने पत्नी से साफ कह दिया कि रामेंदु ने 3 साल से उसे रखैल बना कर रखा है या तो वह उस के साथ शादी करे नहीं तो वह उस का पीछा नहीं छोड़ेगी.

पत्नी सविता और श्रेया के बीच लड़ाई होने से रामेंदु को पहली बार बहुत बुरा लगा था. वह पहली बार असमंजस की स्थिति में आ गया कि वह क्या करे क्या न करे. वह बहुत परेशान हो गया था. एक तरफ उस की पत्नी को उस के अवैध संबंधों का पता चल गया था. वहीं गर्लफ्रेंड पत्नी की तरह हक मांगने लगी थी. घर जाने पर पत्नी के ताने और क्लेश ने उस की जिंदगी को नासूर बना दिया था.

पत्नी सविता और श्रेया के बीच झगड़े के अगले दिन रामेंदु श्रेया को जुडियो के एक आउटलेट में ले गया, जहां उसे वही शार्ट मिडी दिलाई, जो हत्या के वक्त श्रेया ने पहनी थी. रामेंदु ने तय कर लिया कि अगर उसे  इस मुसीबत से छुटकारा पाना है तो उसे श्रेया की हत्या करनी पड़ेगी. उस ने सोचना शुरू कर दिया कि किस तरह श्रेया को रास्ते से हटाया जाए कि वह पुलिस की पकड़ में न आए.

सुनसान जगह पर कर दी श्रेया की हत्या

आखिरकार, बहुत सोचविचार कर उस ने एक फुलप्रूफ योजना तैयार कर ली. उसी योजना के तहत 9 सितंबर, 2023 को श्रेया को वह बीयर पिलाने के लिए राजपुर रोड स्थित एक क्लब ले गया. जहां पर रात को दोनों ने शराब पी. रामेंदु ने कम शराब पी, जबकि उस ने श्रेया को ज्यादा शराब पिलाई.

श्रेया जब शराब के नशे में धुत हो गई तो उस ने श्रेया से लौंग ड्राइव पर चलने के लिए कहा. उस ने अपनी किया कार में बीयर की कुछ बोतलें और शराब भी रख ली. इस के बाद समय बिताने के लिए रामेंदु गाड़ी घुमाते हुए पहले आईएसबीटी घंटाघर बल्लूपुर डोईवाला गया, फिर डोईवाला से वापस होते हुए महाराणा प्रताप चौक से थानो रोड की तरफ निकल गया.

श्रेया शराब के ज्यादा नशे में थी, लिहाजा वह रामेंदु से गाड़ी में ही सैक्स करने की जिद करने लगी और अपने कपड़े उतारने लगी. रामेंदु ने उसे किसी तरह समझाया और कहा  कि इस के लिए गाड़ी को थोड़ा एकांत में ले कर जाना पड़ेगा. तब तक रात के डेढ़ बज चुके थे. उस ने अपनी गाड़ी थानो रोड पर सोड़ा सरोली से बाईं ओर जाने वाले एक रास्ते की तरफ मोड़ दी. वहां पर जंगल जाने वाला रास्ता था.

वहां उसे श्रेया को जान से मारने का उचित मौका लगा. उस ने जैसे ही गाड़ी रोकी तो शराब के नशे में धुत श्रेया गाड़ी से उतर गई. उस के गाड़ी से उतरते ही रामेंदु ने गाड़ी की पिछली सीट पर रखा हथौड़ा निकाल कर उस के सिर पर और चेहरे पर एक के बाद एक कई प्रहार किए.  श्रेया को संभलने का मौका भी नहीं मिला. वह लहरा कर जमीन पर गिर पड़ी. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

रामेंदु ने श्रेया के मृत शरीर को उठा कर गाड़ी में डाला. उस ने नब्ज देखी तो तब तक श्रेया के प्राण निकल चुके थे. रामेंदु ने उसी दिशा में गाड़ी को थोड़ा और आगे लिया, लेकिन आगे का रास्ता बंद था. लिहाजा उस ने वहां से वापस गाड़ी बैक की और उस के बाद वापस मेन रोड पर आया और एक जगह कच्ची नाली में उस की लाश को गाड़ी से उतार कर फेंकदी. उस के बाद रामेंदु ने गाड़ी में रखा टायलेट क्लीनर वाला तेजाब निकाला और उस के मुंह पर डाल दिया, जिस से लाश की शिनाख्त न हो सके.

लेकिन शायद रामेंदु की किस्मत उस दिन खराब थी. क्योंकि जिस वक्त उस ने श्रेया की हत्या की तो उस के कुछ देर बाद ही बारिश शुरू हो गई थी. इसलिए जब उस ने पहचान मिटाने के लिए टाइलेट क्लीनर श्रेया के चेहरे पर डाला तो कुछ ही देर में बारिश के कारण वह तेजाब धुल गया और उस का चेहरा पूरी तरह बिगड़ नहीं सका.

पुलिस ने बरामद किए ठोस सबूत

श्रेया के शव को ठिकाने लगा कर रामेंदु ने हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा थानो रोड पर सड़क किनारे फेंक दिया. उस के बाद वापस आ कर गाड़ी क्लेमनटाउन के एक स्टोर में छिपा दी.  श्रेया के सामान व पहने कपड़े भी उस ने गाड़ी में छिपा कर रख  दिया. इस के बाद वह अपने घर गया और अपनी पत्नी से जा कर बता दिया कि उस ने श्रेया को वापस भेज दिया है.

पूछताछ के बाद जब पुलिस ने रामेंदु उपाध्याय की निशानदेही पर उस की क्लेमनटाउन में खड़ी हुई घटना में प्रयुक्त किया कार यूके-07 डीएक्स 5881 बरामद कर ली. कार के अंदर छिपा कर रखी श्रेया की आईडी,  उस के कपड़े,  घटना के समय रामेंदु उपाध्याय के पहने हुए खून से सने कपड़े और कार में लगे खून के निशान सबूत के तौर पर एकत्र कर लिए.

थानो रोड के जंगल से घटना में प्रयुक्त रक्तरंजित हथौड़ा भी पुलिस ने बरामद कर लिया, जिस पर रामेंदु की अंगुलियों के निशान थे. पुलिस ने बाद में राजपुर रोड के ऐंजल क्लब से श्रेया के साथ रामेंदु की सीसीटीवी फुटेज भी बरामद कर ली, जहां वह उसे शराब पिलाने के लिए ले गया था.

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आवश्यक पूछताछ व साक्ष्य एकत्र करने के बाद पुलिस ने आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल रामेंदु उपाध्याय को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. एसएसपी दलीप सिंह कुंवर ने हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 25 हजार रुपए का नकद पुरस्कार देने की घोषणा  की है.

(कथा पुलिस की जांच और आरोपी के बयान  पर आधारित)

कर्नल का इश्क बना रिस्क – भाग 3

इस कहानी की शुरुआत हुई साल 2020 में जब 39 वर्षीय रामेंदु उपाध्याय बतौर लेफ्टिनेंट कर्नल पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी में तैनात था. सेना के अफसरों के बारे में कहा जाता है कि परिवार और पत्नी सुख से दूर रहने के कारण वे अकसर जिस्मानी सुख तलाशने के लिए या तो रेड लाइट एरिया का सहारा लेते हैं या ऐसी औरतों से दोस्ती कर लेते हैं जो उन के शरीर की भूख मिटा सकें.

कुछ समय पहले ही रामेंदु की शादी हुई थी और कुछ दिन पत्नी के साथ रहने के बाद ही वह अपनी ड्यूटी पर सिलीगुड़ी आ गया.  पत्नी सुख की ऐसी लत लग चुकी थी कि रामेंदु उपाध्याय भी सिलीगुड़ी आने के बाद वहां के बार और ऐसे क्लबों में जाने लगा, जहां खूबसूरत डांसर और जिस्म बेचने वाली हसीनाएं मिल जाती थीं.

जनवरी, 2020 में एक दिन रामेंदु उपाध्याय जब सिलीगुड़ी के सिटी सेंटर माल के जिज्जी डांस बार में गया तो उस की मुलाकात नेपाली मूल की एक युवती श्रेया शर्मा उर्फ सुमित्रा से हुई.  श्रेया शर्मा 19 साल की एक ऐसी हसीन युवती थी, जिसे कोई एक बार देख ले तो चेहरे से नजर न हटे. सांचे में ढला गोरा बदन और अंगअंग से टपकती मादकता ऐसी कि पहली ही बार में रामेंदु को श्रेया इतनी पसंद आई कि वह उस का दीवाना हो गया. इस के बाद तो रामेंदु श्रेया को देखने के लिए लगभग रोज ही जिज्जी डांस बार जाने लगा.

रामेंदु डांस बार में जाता, 2-3 पैग पीता और लड़कियों खासकर श्रेया का डांस देखता और वापस आ जाता. लेकिन वह श्रेया से कभी यह नहीं कह पाता था कि वह उसे पसंद करता है और दोस्ती करना चाहता है. हां, उस ने उसे अपना नाम और पद के बारे में जरूर बता दिया था.

एक दिन रामेंदु को शराब का थोड़ा ज्यादा नशा चढ़ गया. उस दिन नशे में उस की हालत ऐसी हो गई थी कि उसे चला तक नहीं जा रहा था. उस की हालत को देखते हुए श्रेया उसे अपने साथ अपने फ्लैट पर ले आई.  रात के किसी वक्त जब रामेंदु की आंखें खुलीं तो देखा कि वह एक आरामदेह बिस्तर पर था. उस समय उस के जिस्म पर कोई कपड़ा नहीं था और बगल में उस का वो खूबसूरत ख्वाब था, जिस की चाहत में वह हर रोज जिज्जी डांस बार जाता था.

“क्या कर्नल साहब, इतना पसंद करते हो हमें तो बता क्यों नहीं दिया.” बगल में लेटी 21 वर्षीय श्रेया ने रामेंदु के सीने के बालों को अपने हाथों से सहलाते हुए कहा.

“आप हैं ही इतनी खूबसूरत कि आप से मिलने की चाहत रोज आप के पास खींच लाती है.” रामेंदु ने भी मन की बात कह डाली.

“चाहत थी तो एक बार इजहार कर देते. हमें भी तो आप जैसे दोस्त की चाहत है.”   कहते हुए श्रेया ने अपने अधर उस के होंठों पर रख दिए.

फिर क्या था, थोड़ी ही देर में दोनों जिस्म एक हो गए. उस रात रामेंदु को श्रेया ने वो चरमसुख दिया, जो रामेंदु को कभी अपनी नईनवेली पत्नी से नहीं मिला था. उस रात श्रेया और रामेंदु के बीच जो रिलेशन बने, उस के बाद तो दोनों के रिश्ते ऐसे परवान चढ़े कि पहले कुछ दिन वे एक प्रेमीप्रेमिका की तरह मिलते रहे और एकदूसरे को प्यार करते रहे, लेकिन कुछ ही महीनों में दोनों सिलीगुड़ी में एक निजी मकान ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

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श्रेया ने अब डांस बार में काम करना छोड़ दिया था. वक्त तेजी से गुजरने लगा.  हालांकि 1-2 महीने में रामेंदु देहरादून में अपनी पत्नी से मिलने जरूर जाता था, लेकिन इस दौरान उसे श्रेया हर वक्त याद रहती. ऐसा लगने लगा था कि श्रेया उस की जिंदगी है. लेकिन अचानक अगस्त 2022 में लेफ्टिनेंट कर्नल रामेंदु उपाध्याय का देहरादून के क्लेमन टाउन में ट्रांसफर हो गया. 4 अगस्त, 2022 को उस ने वहां जौइन भी कर लिया. पंडितवाड़ी में उस का घर भी था और परिवार भी था. लेकिन न जाने क्यों उस की जिंदगी में श्रेया के बिना एक अधूरापन और उदासी सी छाई थी.

कुछ रोज में ही श्रेया के बिना जिंदगी बेजान सी हो कर रह गई. लिहाजा पत्नी से काम का बहाना कर के रामेंदु सिलीगुड़ी गया और वहां से श्रेया को अपने साथ देहरादून ले आया. अभी तक रामेंदु ने सोचा नहीं था कि श्रेया को कहां और कैसे रखना है. इसलिए रामेंदु ने उसे क्लेमनटाउन के ही एक होटल में रहने के लिए कमरा दिलवा दिया.

जिंदगी एक बार फिर रंगीन हो गई. दिन में सेना की नौकरी और रात में होटल जा कर श्रेया की बाहों में वक्त गुजारना, यही रामेंदु की दिनचर्या बन गई. परिवार के पास तो वह बस नाम के लिए ही जाता था.

कर्नल की पत्नी को हुआ शक

लिहाजा उस की पत्नी सविता को शक हो गया. सविता ने पति की निगरानी और पीछा शुरू किया तो जल्द ही उस के सामने यह राज खुल गया कि होटल में रह रही एक युवती से रामेंदु के संबंध हैं. इस बात पर पतिपत्नी में झगड़ा हुआ और दबाव में आ कर रामेंदु ने समय से घर आनाजाना शुरू कर दिया.

उधर मुलाकात नहीं होने के कारण श्रेया रामेंदु से नाराज हो गई और एक दिन बोली, “अगर मुझ से मुलाकात नहीं करनी थी तो मुझे यहां लाने की क्या जरूरत थी.”

परेशान रामेंदु ने कहा, “देखो श्रेया, अभी यहां मामला कुछ गड़बड़ हो गया है इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम कुछ दिनों के लिए सिलीगुड़ी ही चली जाओ.”

“सिलीगुड़ी में क्या मेरी फैक्ट्री चल रही है जो वहां चली जाऊं. न काम है न कोई धंधा, मैं वहां क्या करूंगी और खर्चा कैसे चलेगा.” कर्नल की बात सुन कर श्रेया ने भड़कते हुए कहा.

“अरे परेशान क्यों होती हो जानू, बस कुछ ही दिन की तो बात है. जब पत्नी को थोड़ा विश्वास हो जाएगा तो मैं तुम्हें फिर ले आऊंगा और अब की बार हमेशा के लिए आओगी तुम. जहां तक खर्च और पैसे की बात है तो चिंता मत करो, तुम्हारा सारा खर्च हमेशा की तरह मैं ही उठाऊंगा,” रामेंदु ने भरोसा दिलाते हुए कहा.

इस तरह रामेंदु ने श्रेया को कुछ पैसे दे कर और फिर वापस लाने का वायदा कर वापस सिलीगुड़ी भेज दिया.  इस तरह करीब एक महीना बीत गया. रामेंदु की पत्नी सविता को भी यकीन हो गया कि उस के पति का अब किसी से कोई चक्कर नहीं है.

करीब डेढ़ महीने बाद जब उसे श्रेया की याद सताने लगी तो उस ने श्रेया को फोन कर फिर से देहरादून बुला लिया. लेकिन इस बार उस ने श्रेया को अपने घर व औफिस से दूर राजपुर रोड के एक होटल में ठहरा दिया.

श्रेया खुद को समझने लगी  कर्नल की पत्नी

अपने प्यार को समीप पा कर जिंदगी एक बार फिर ढर्रे पर आ गई. लेकिन इस प्यार की खातिर अब उस की जेब ढीली होने लगी थी. क्योंकि महंगे होटल में रहने से ले कर खाने और शराब के खर्चों के साथ श्रेया की शौपिंग के खर्चों ने रामेंदु उपाध्याय की जेब का बजट बिगाड़ दिया था.

लिहाजा कुछ दिन होटल में रखने के बाद उस ने क्लेमनटाउन में एक फ्लैट किराए पर लिया और श्रेया को वहां रख दिया. धीरेधीरे दोनों ने वहां अपनी गृहस्थी बसा ली.

कुछ दिन तो सब कुछ सही तरीके से चला. साथ रहते रहते श्रेया अब पूरी तरह खुद को रामेंदु की पत्नी मानने लगी थी. बस एक ही कमी थी कि वह पूरे समय और स्थाई उस के साथ नहीं रहता था. इसलिए श्रेया अब अकसर रामेंदु पर साथ रहने और पत्नी का दरजा देने का दबाब बनाने लगी.  शुरू में तो रामेंदु ने इसे केवल श्रेया की महत्त्वाकांक्षा समझा, लेकिन जब वह लगातार इस बात की जिद करते हुए उस के साथ झगड़ा और गालीगलौज करने लगी तो रामेंदु को उस की बातें अखरने लगीं.

कर्नल का इश्क बना रिस्क – भाग 2

दरअसल, पुलिस ने जब शव की जांच की तो देखा कि मृत युवती के शरीर पर जो ड्रेस है वह जुडियो कंपनी की ड्रेस है और काफी महंगे ब्रांड की है. इसी से लगा कि महिला कोई सामान्य परिवार की नहीं हो सकती. क्योंकि इतने महंगे ब्रांड की ड्रेस कोई साधारण परिवार की लड़की नहीं पहन सकती. जब जानकारी एकत्र की गई तो पता चला कि इस ब्रांड की ड्रेस बेचने वाले शहर में 2 ही शोरूम हैं. अगर वहां से इसे खरीदा गया होगा तो अवश्य ही कोई जानकारी मिलेगी.

पुलिस की चौथी टीम को मृतका की शिनाख्त का काम सौंपा गया.

240 वाहनों में से 18 पाए गए संदिग्ध

इधर जब पुलिस की तीसरी टीम ने जुडियो ब्रांड के शोरूम जाखन व किशन नगर से जानकारी हासिल की तो पाया गया कि उक्त  दोनों शोरूम से बिलकुल उसी तरह की 8 ड्रेस बिकी हैं. पुलिस ने उन सभी ड्रेस के खरीदारों के बिल, फोन नंबर और नामपते हासिल कर लिए तथा एकएक कर उन से जानकारी एकत्र करनी शुरू कर दी.

पुलिस की पहली टीम तो घटनास्थल के आसपास के लोगों से पूछताछ कर रही थी, उसे लगभग 300 मीटर की दूरी पर बने एक ग्रामीण के घर में पूछताछ करने पर पता चला कि घटना 9 और 10 सितंबर की रात में हुई है. उस घर में रहने वाले पंकज पटवाल ने बताया कि रात करीब 11 बजे के लगभग जब वह अपनी गाड़ी से उस रास्ते से हो कर अंदर आया था, तब तक वहां कोई लाश नहीं थी. इस का मतलब साफ था कि वारदात रात 11 बजे के बाद ही हुई है.

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लिहाजा पुलिस की दूसरी टीम ने रात 11 बजे से अलसुबह 4  बजे तक महाराणा प्रताप चौक से थानो रोड की ओर जाने वाले व थानो रोड से महाराणा प्रताप चौक की ओर आने वाले सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक करनी शुरू कर दी.

पुलिस की टीमों ने उसी दिन करीब 100 सीसीटीवी कैमरे खंगाले और थानो रोड से महाराणा प्रताप चौक की ओर रात 11 बजे से सुबह 4 बजे तक आनेजाने वाले करीब 240 वाहनों की एक लिस्ट बनाई, जो इस दौरान इस रास्ते से गुजरे. पुलिस टीम द्वारा लगातार चेक किए गए वाहनों के आनेजाने के समय का आंकलन शुरू किया तो 18 वाहन ऐसे पाए गए, जिन के समय में संदिग्धता पाई गई.

पुलिस टीम ने कड़ी मेहनत के बाद इन सभी चौपहिया वाहनों के नंबर और वाहन मालिकों के पते हासिल किए तथा उन के पते तस्दीक किए गए. वाहनों के मालिकों से एकएक कर जानकारी लेनी शुरू कर दी.

इसी जांच के दौरान पुलिस टीम को एक किया कार जिस का नंबर  यूके-07 डीएक्स 5881 था और उस का ओनर  रामेंदु उपाध्याय, निवासी प्रेमनगर पंडितवाड़ी, जनपद देहरादून था. वह पुलिस की नजरों में संदिग्ध हो गई.

दरअसल, जब पूछताछ और छानबीन की जा रही थी तो पता चला कि जिस वक्त की ये घटना है उस दौरान वाहन मालिक रामेंदु उपाध्याय का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. घटना के दौरान महाराणा प्रताप चौक से थानो चौक तक पहुंचने में जितना समय लगता है, उस की गाड़ी करीब 42 मिनट का अतिरिक्त समय लगा कर थानो चौक के आखिरी सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई थी. जबकि वहां पहुंचने के लिए काफी कम समय लगता था.

रामेंदु उपाध्याय अचानक पुलिस की जांच टीम के रडार पर आ गया. टीम ने उस की निगरानी शुरू कर दी. एक टीम उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकाल कर उस की कुंडली खंगालने लगी. मोबाइल फोन में कुछ ऐसी जानकारी थी कि पुलिस का शक यकीन में बदलने लगा कि हो न हो, मृतक महिला की मौत में कहीं न कहीं रामेंदु उपाध्याय का हाथ है.

लेकिन उस ने मृतका को क्यों मारा और मरने वाली कौन थी, इस बारे में अभी तक पुलिस के हाथ कोई ठोस सुराग नहीं लगा था सिवाय इस बात के कि मृतका के शरीर पर जुडियो ब्रांड की जो मिडी मिली थी, ठीक वैसे ही रंग और साइज की एक मिडी रामेंदु उपाध्याय ने 3 सितंबर को जुडियो के किशन नगर शोरूम से खरीदी थी और उस दिन मृतक युवती भी उस के साथ थी.

दरअसल, शोरूम के स्टाफ ने मृत महिला की फोटो उस के शरीर पर मौजूद ड्रेस और रामेंदु उपाध्याय की फोटो दिखा कर इस बात की तस्दीक कर ली थी. पुलिस के पास रामेंदु उपाध्याय के खिलाफ इतने साक्ष्य तो थे ही कि उसे हिरासत में ले कर पूछताछ की जा सके.

लेफ्टिनेंट कर्नल को किया गिरफ्तार

पुलिस टीम ने उच्चाधिकारियों के आदेश पर 11 सितंबर, 2023 की सुबह लेफ्टिनेंट कर्नल रामेंदु उपाध्याय को उस के घर प्रेमनगर पंडितवाड़ी से हिरासत में ले लिया और उस का मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में ले लिया. थाने में पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू कर दी.

शुरू में तो रामेंदु उपाध्याय इधरउधर की कहानी सुनाता रहा. उस ने पुलिस को बताया कि उस का मृतक महिला से कोई लेनादेना ही नहीं है.  लेकिन तब तक पुलिस उस के मोबाइल को खंगालने के बाद मृतका के साथ रामेंदु उपाध्याय की फोटो और मृतक के फोन की लिस्ट में एक मोबाइल नंबर जो श्रेया के नाम से दर्ज था, उस पर काल की लंबीचौड़ी लिस्ट और वाट्सऐप चैट को खंगाल चुकी थी.

जब रामेंदु उपाध्याय ने देखा कि उस की पोल खुल चुकी है तो उस ने कुबूल कर लिया कि जिस महिला की लाश पुलिस को मिली है, वह उस की प्रेमिका श्रेया थी और उस की  हत्या उसी ने की थी. एसपी (सिटी) सरिता डोभाल और सीओ अभिनव चौधरी के समक्ष एसएचओ कुंदन राम और जांच अधिकारी नवीन जोशी ने पूछताछ की तो सेना के एक अधिकारी की कामकुंठा की ऐसी कहानी सामने आई, जिस में उस ने अपनी प्रेमिका को मौत की नींद सुला दिया.

जिस युवती की हत्या हुई थी, उस की पहचान श्रेया शर्मा उर्फ सुमित्रा निवासी शिवबहादुर चौक चिसापानी, जिला तनहु, नेपाल के रूप में हुई.  जबकि रामेंदु उपाध्याय मूलरूप से उत्तराखंड के जिला देहरादून के प्रेमनगर पंडितवाड़ी का रहने वाला है.  रामेंदु साल 1999 में बतौर जवान सेना में भरती हुआ था. बाद में डिपार्टमेंटल कमीशन पा कर 2010 में वह लेफ्टिनेंट कर्नल बन गया. 2019 में उस की शादी हो गई. उस की एक बेटी है. उस की पत्नी देहरादून के पंडितवाड़ी में एक पीजी चलाती है.

कर्नल का इश्क बना रिस्क – भाग 1

“क्या कर्नल साहब, इतना पसंद करते हो हमें तो बता क्यों नहीं  दिया. “बगल में लेटी 21 वर्षीय श्रेया ने रामेंदु के सीने के बालों को अपने हाथों से सहलाते हुए कहा.

“हां, यह तो है. आप को बहुत चाहता हूं मैं. क्योंकि आप इतनी खूबसूरत हैं कि आप से मिलने की चाहत मुझे रोज आप के पास खींच लाती है.” रामेंदु ने भी अपने मन की बात  कह दी.

“चाहत थी तो एक बार इजहार कर देते. हमें भी तो आप जैसे दोस्त की चाहत है.”   कहते हुए श्रेया ने अपने अधर उस के होंठों पर रख दिए. फिर क्या था, थोड़ी ही देर में दोनों जिस्म एक हो गए.

उस रात रामेंदु को श्रेया ने वो चरमसुख दिया, जो रामेंदु को कभी अपनी नईनवेली पत्नी से नहीं मिला था. उस रात श्रेया और रामेंदु के बीच जो रिलेशन बने, उस के बाद तो दोनों के रिश्ते ऐसे परवान चढ़े कि पहले कुछ दिन वे एक प्रेमीप्रेमिका की तरह मिलते रहे और एकदूसरे को प्यार करते रहे, लेकिन कुछ ही महीनों में दोनों सिलीगुड़ी में एक निजी मकान ले कर पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

श्रेया ने अब डांस बार में काम करना छोड़ दिया था. वक्त तेजी से गुजरने लगा.

10 सितंबर, 2023 की सुबह के करीब 7 बजे का वक्त था. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में लोग ठीक से नींद से जगे भी नहीं थे. पुलिस तो वैसे भी रात भर जाग कर लोगों की सुरक्षा करने और अपराधियों को जुर्म करने से रोकने का काम करती है. लिहाजा उस की दिनचर्या तो वैसे भी थोड़ा देर से ही शुरू  होती है.  ऐसे में अगर सुबह के 7 बजे पुलिस स्टेशन में जा कर कोई किसी बड़े अपराध की सूचना दे तो पुलिस वालों के मुंह का स्वाद कसैला होना लाजिमी है.

देहरादून के रायपुर थाने में पहुंच कर सोडा सरोली गांव के प्रधान प्रवेश कुमेड़ी ने भी जब ये सूचना दी कि माल देवता रोड पर सिरवालगढ़ में एक युवती का शव संदिग्ध अवस्था में पड़ा है तो थाने के कार्यालय इंचार्ज और हैड मुंशी को ऐसा लगा कि किसी ने सुबह के वक्त उन्हें करेले का जूस पिला दिया है.

लेकिन वक्त चाहे कोई भी हो और सूचना कैसी भी हो, पुलिस को तो अपना काम हर हाल में करना ही होता है. सूचना ऐसी थी कि पुलिस जैसे महकमे में होने के कारण हैड मुंशी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ. उन्होंने थाना परिसर में बने क्वार्टर में एसएचओ कुंदन राम को जब ये जानकारी दी तो तड़के तक गश्त करने के बाद गहरी नींद से जागे एसएचओ कुंदन राम की नींद काफूर हो गई.

आननफानन में वरदी पहन कर वह अपने कार्यालय में पहुंचे और उन्होंने वहां मौजूद पुलिसकर्मियों को तत्काल एकत्र होने का संदेश भिजवाया. अगले 10 मिनट में थाने का सारा स्टाफ वहां मौजूद था.  एक दरोगा और 2-3 कांस्टेबलों को साथ ले कर वह सिरवाल गढ़ की तरफ रवाना हो गए. इसी बीच उन्होंने उच्चाधिकारियों को भी इस खबर से अवगत करा दिया था.

जिस वक्त एसएचओ घटनास्थल पर पहुंचे, मौके पर इलाके के लोगों की काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. वहां एक युवती की लहूलुहान लाश पड़ी थी. एसएचओ ने आगे की काररवाई करने से पहले फोरैंसिक व क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम स्टाफ को भी मौके पर बुलवा लिया. कुछ ही देर में ये टीमें घटनास्थल पर पहुंच कर सबूत जुटाने में लग गईं.

कुछ ही देर में देहरादून के डीआईजी/एसएसपी दलीप सिंह कुंवर, एसपी (नगर) सरिता डोभाल और सीओ (डोईवाला) अभिनय चौधरी भी मौके पर पहुंच गए. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.  जिस युवती की लाश मिली थी, उस के चेहरे और शरीर की बनावट से लग रहा था कि उस की उम्र मुश्किल से 20-22 साल के करीब रही होगी. महिला के माथे व सिर पर किसी वजनी या नुकीली चीज से किए गए वार के कारण चोटों के निशान थे. शरीर पर किसी ब्रांडेड कंपनी की मिडी थी, जिस का ऊपरी हिस्सा खून से लथपथ हो चुका था. लाश के पास में ही एक टायलेट क्लीनर (तेजाब) की बोतल पड़ी हुई थी.

मृत युवती के हाथ में एक सोने व एक चांदी की मौजूद अंगूठियां इस बात की तरफ साफ इशारा कर रही थीं कि उस की हत्या कम से कम लूटपाट के लिए तो नहीं की गई है. जिस जगह युवती की लाश मिली थी, वह सड़क किनारे बनी एक कच्ची नाली की  ऐसी जगह थी, जहां आसपास कोई सीसीटीवी कैमरा भी नहीं था. पुलिस ने आसपास के इलाकों से लोगों को बुला कर उस की पहचान कराने की कोशिश की, लेकिन 2 घंटे की मशक्कत के बाद भी इस में कोई सफलता नहीं मिली.

लाश के पास से भी कोई चीज नहीं मिली, जिस से तत्काल उस की शिनाख्त हो सके. इसलिए घटनास्थल से साक्ष्यों के संकलन और पंचनामे की काररवाई के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्तपाल भिजवा दिया गया. एसएसपी देहरादून के निर्देश पर पुलिस ने लाश की फोटो खिंचवा कर उसे मीडिया व सोशल मीडिया पर प्रसारित करवा दिया ताकि मृतका की शिनाख्त हो सके.

चूंकि यह बात साफ थी कि महिला की हत्या कहीं और करने के बाद उस की लाश वहां ला कर फेंकी गई थी. मालदेवता चौकीप्रभारी एसआई राजीव धारीवाल की शिकायत पर रायपुर थाने में अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 और साक्ष्य मिटाने की धारा 201 के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद उच्चाधिकारियों के आदेश पर विवेचना एसएसआई नवीन जोशी को सौंप दी गई.

घटना की गंभीरता को देखते हुए जिले के एसएसपी दलीप सिंह कुंवर ने एसपी (सिटी) सरिता डोभाल और सीओ (डोईवाला) अभिनय चौधरी की निगरानी में हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसएचओ कुंदन राम के नेतृत्व में 4 टीमें गठित कर दी गईं.

पुलिस की चारों टीमें जुटीं जांच में

जांच अधिकारी एसएसआई नवीन जोशी के साथ मालदेवता चौकी प्रभारी एसआई राजीव धारीवाल, बालावाला चौकी प्रभारी एसआई सुनील नेगी, एसआई रमन बिष्ट, महिला एसआई तनुजा शर्मा, हैडकांस्टेबल संतोष कुमार, दीपप्रकाश, प्रदीप सिंह, कांस्टेबल सौरभ वालिया, किशनपाल,  शाहिद जमाल, अजय कुमार, पंकज ढौंडियाल, महिला कांस्टेबल मीतू शाह आदि को शामिल किया गया.  उन के साथ फोरैंसिक टीम के कांस्टेबल अरविंद और प्रभात जुगरान, एसओजी की हैडकांस्टेबल किरन को भी इस विशेष टीम का हिस्सा बनाया गया.

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पहली टीम ने घटनास्थल के आसपास रहने वाले व्यक्तियों से गहनता से पूछताछ शुरू कर दी. दूसरी टीम ने घटनास्थल की तरफ आनेजाने वाले मार्गों पर लगे तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को चैक करना शुरू  कर दिया.

तीसरी टीम ने मृतका द्वारा पहनी जुडियो ब्रांड की नई दिख रही ड्रेस की जानकारी लेने के लिए जुडियो ब्रांड के शोरूम जाखन व किशन नगर चौक में जा कर जानकारी जुटानी शुरू कर दी कि वह किस ने खरीदा था.

एहसान के बदले मिली मौत

बहुत हुआ अब और नहीं

जब पुलिस की जीप एक ढाबे के आगे आ कर रुकी, तो अब्दुल रहीम चौंक गया. पिछले 20-22 सालों से वह इस ढाबे को चला रहा था, पर पुलिस कभी नहीं आई थी. सो, डर से वह सहम गया. उसे और हैरानी हुई, जब जीप से एक बड़ी पुलिस अफसर उतरीं.

‘शायद कहीं का रास्ता पूछ रही होंगी’, यह सोचते हुए अब्दुल रहीम अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया कि साथ आए थानेदार ने पूछा, ‘‘अब्दुल रहीम आप का ही नाम है? हमारी साहब को आप से कुछ पूछताछ करनी है. वे किसी एकांत जगह बैठना चाहती हैं.’’

अब्दुल रहीम उन्हें ले कर ढाबे के कमरे की तरफ बढ़ गया. पुलिस अफसर की मंदमंद मुसकान ने उस की झिझक और डर दूर कर दिया था.

‘‘आइए मैडम, आप यहां बैठें. क्या मैं आप के लिए चाय मंगवाऊं?

‘‘मैडम, क्या आप नई सिटी एसपी कल्पना तो नहीं हैं? मैं ने अखबार में आप की तसवीर देखी थी…’’ अब्दुल रहीम ने उन्हें बिठाते हुए पूछा.

‘‘हां,’’ छोटा सा जवाब दे कर वे आसपास का मुआयना कर रही थीं.

एक लंबी चुप्पी के बाद कल्पना ने अब्दुल रहीम से पूछा, ‘‘क्या आप को ठीक 10 साल पहले की वह होली याद है, जब एक 15 साला लड़की का बलात्कार आप के इस ढाबे के ठीक पीछे वाली दीवार के पास किया गया था? उसे चादर आप ने ही ओढ़ाई थी और गोद में उठा उस के घर पहुंचाया था?’’

अब चौंकने की बारी अब्दुल रहीम की थी. पसीने की एक लड़ी कनपटी से बहते हुए पीठ तक जा पहुंची. थोड़ी देर तक सिर झुकाए मानो विचारों में गुम रहने के बाद उस ने सिर ऊपर उठाया. उस की पलकें भीगी हुई थीं. अब्दुल रहीम देर तक आसमान में घूरता रहा. मन सालों पहले पहुंच गया. होली की वह मनहूस दोपहर थी, सड़क पर रंग खेलने वाले कम हो चले थे. इक्कादुक्का मोटरसाइकिल पर लड़के शोर मचाते हुए आतेजाते दिख रहे थे.

अब्दुल रहीम ने उस दिन भी ढाबा खोल रखा था. वैसे, ग्राहक न के बराबर आए थे. होली का दिन जो था. दोपहर होती देख अब्दुल रहीम ने भी ढाबा बंद कर घर जाने की सोची कि पिछवाड़े से आती आवाजों ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया. 4 लड़के नशे में चूर थे, पर… पर, यह क्या… वे एक लड़की को दबोचे हुए थे. छोटी बच्ची थी, शायद 14-15 साल की.

अब्दुल रहीम उन चारों लड़कों को पहचानता था. सब निठल्ले और आवारा थे. एक पिछड़े वर्ग के नेता के साथ लगे थे और इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था. वे यहीं आसपास के थे. चारों छोटेमोटे जुर्म कर अंदर बाहर होते रहते थे.

रहीम जोरशोर से चिल्लाया, पर लड़कों ने उस की कोई परवाह नहीं की, बल्कि एक लड़के ने ईंट का एक टुकड़ा ऐसा चलाया कि सीधे उस के सिर पर आ कर लगा और वह बेहोश हो गया. आंखें खुलीं तो अंधेरा हो चुका था. अचानक उसे बच्ची का ध्यान आया. उन लड़कों ने तो उस का ऐसा हाल किया था कि शायद गिद्ध भी शर्मिंदा हो जाएं. बच्ची शायद मर चुकी थी.

अब्दुल रहीम दौड़ कर मेज पर ढका एक कपड़ा खींच लाया और उसे उस में लपेटा. पानी के छींटें मारमार कर कोशिश करने लगा कि शायद कहीं जिंदा हो. चेहरा साफ होते ही वह पहचान गया कि यह लड़की गली के आखिरी छोर पर रहती थी. उसे नाम तो मालूम नहीं था, पर घर का अंदाजा था. रोज ही तो वह अपनी सहेलियों के संग उस के ढाबे के सामने से स्कूल जाती थी.

बच्ची की लाश को कपड़े में लपेटे अब्दुल रहीम उस के घर की तरफ बढ़ चला. रात गहरा गई थी. लोग होली खेल कर अपनेअपने घरों में घुस गए थे, पर वहां बच्ची के घर के आगे भीड़ जैसी दिख रही थी. शायद लोग खोज रहे होंगे कि उन की बेटी किधर गई.

अब्दुल रहीम के लिए एकएक कदम चलना भारी हो गया. वह दरवाजे तक पहुंचा कि उस से पहले लोग दौड़ते हुए उस की तरफ आ गए. कांपते हाथों से उस ने लाश को एक जोड़ी हाथों में थमाया और वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा. वहां चीखपुकार मच गई.

‘मैं ने देखा है, किस ने किया है.

मैं गवाही दूंगा कि कौन थे वे लोग…’ रहीम कहता रहा, पर किसी ने भी उसे नहीं सुना.

मेज पर हुई थपकी की आवाज से अब्दुल रहीम यादों से बाहर आया.

‘‘देखिए, उस केस को दाखिल करने का आर्डर आया है,’’ कल्पना ने बताया.

‘‘पर, इस बात को तो सालों बीत गए हैं मैडम. रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी. उस बच्ची के मातापिता शायद उस के गम को बरदाश्त नहीं कर पाए थे और उन्होंने शहर छोड़ दिया था,’’ अब्दुल रहीम ने हैरानी से कहा.

‘मुझे बताया गया है कि आप उस वारदात के चश्मदीद गवाह थे. उस वक्त आप उन बलात्कारियों की पहचान करने के लिए तैयार भी थे,’’ कल्पना की इस बात को सुन कर अब्दुल रहीम उलझन में पड़ गया.

‘‘अगर आप उन्हें सजा दिलाना नहीं चाहते हैं, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. बस, उस बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई, उस से सिर्फ वह ही नहीं तबाह हुई, बल्कि उस के मातापिता की भी जिंदगी बदतर हो गई,’’ सिटी एसपी कल्पना ने समझाते हुए कहा.

‘‘2 चाय ले कर आना,’’ अब्दुल रहीम ने आवाज लगाई, ‘‘जीप में बैठे लोगों को भी चाय पिलाना.’’

चाय आ गई. अब्दुल रहीम पूरे वक्त सिर झुकाए चिंता में चाय सुड़कता रहा.

‘‘आप तो ऐसे परेशान हो रहे हैं, जैसे आप ने ही गुनाह किया हो. मेरा इरादा आप को तंग करने का बिलकुल नहीं था. बस, उस परिवार के लिए इंसाफ की उम्मीद है.’’

अब्दुल रहीम ने कहा, ‘‘हां मैडम, मैं ने अपनी आंखों से देखा था उस दिन. पर मैं उस बच्ची को बचा नहीं सका. इस का मलाल मुझेआज तक है. इस के लिए मैं खुद को भी गुनाहगार समझता हूं.

‘‘कई दिनों तक तो मैं अपने आपे में भी नहीं था. एक महीने बाद मैं फिर गया था उस के घर, पर ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों को भी कुछ नहीं पता था.

‘‘जानती हैं मैडम, उस वक्त के अखबारों में इस खबर ने कोई जगह नहीं पाई थी. दलितों की बेटियों का तो अकसर उस तरह बलात्कार होता था, पर यह घर थोड़ा ठीकठाक था, क्योंकि लड़की के पिता सरकारी नौकरी में थेऔर गुनाहगार हमेशा आजाद घूमते रहे.

‘‘मैं ने भी इस डर से किसी को यह बात बताई भी नहीं. इसी शहर में होंगे सब. उस वक्त सब 20 से 25 साल के थे. मुझे सब के बाप के नामपते मालूम हैं. मैं आप को उन सब के बारे में बताने के लिए तैयार हूं.’’

अब्दुल रहीम को लगा कि चश्मे के पीछे कल्पना मैडम की आंखें भी नम हो गई थीं.

‘‘उस वक्त भले ही गुनाहगार बच गए होंगे. लड़की के मातापिता ने बदनामी से बचने के लिए मामला दर्ज ही नहीं किया, पर आने वाले दिनों में उन चारों पापियों की करतूत फोटो समेत हर अखबार की सुर्खी बनने वाली है.

‘‘आप तैयार रहें, एक लंबी कानूनी जंग में आप एक अहम किरदार रहेंगे,’’ कहते हुए कल्पना मैडम उठ खड़ी हुईं और काउंटर पर चाय के पैसे रखते हुए जीप में बैठ कर चली गईं.

‘‘आज पहली बार किसी पुलिस वाले को चाय के पैसे देते देखा है,’’ छोटू टेबल साफ करते हुए कह रहा था और अब्दुल रहीम को लग रहा था कि सालों से सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो गया था.

इस मुलाकात के बाद वक्त बहुत तेजी से बीता. वे चारों लड़के, जो अब अधेड़ हो चले थे, उन के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. अब्दुल रहीम ने भी अपना बयान रेकौर्ड करा दिया. मीडिया वाले इस खबर के पीछे पड़ गए थे. पर उन के हाथ कुछ खास खबर लग नहीं पाई थी.

अब्दुल रहीम को भी कई धमकी भरे फोन आने लगे थे. सो, उन्हें पूरी तरह पुलिस सिक्योरिटी में रखा जा रहा था. सब से बढ़ कर कल्पना मैडम खुद इस केस में दिलचस्पी ले रही थीं और हर पेशी के वक्त मौजूद रहती थीं. कुछ उत्साही पत्रकारों ने उस परिवार के पड़ोसियों को खोज निकाला था, जिन्होंने बताया था कि होली के कुछ दिन बाद ही वे लोग चुपचाप बिना किसी से मिले कहीं चले गए थे, पर बात किसी से नहीं हो पाई थी.

कोर्ट की तारीखें जल्दीजल्दी पड़ रही थीं, जैसे कोर्ट भी इस मामले को जल्दी अंजाम तक पहुंचाना चाहता था. ऐसी ही एक पेशी में अब्दुल रहीम ने सालभर बाद बच्ची के पिता को देखा था. मिलते ही दोनों की आंखें नम हो गईं.

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था. बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी के साथ आया हुआ मालूम दे रहा था. उस की दलीलों के आगे केस अपना रुख मोड़ने लगा था. सभी कानून की खामियों के सामने बेबस से दिखने लगे थे.

‘‘जनाब, सिर्फ एक अब्दुल रहीम की गवाही को ही कैसे सच माना जाए? मानता हूं कि बलात्कार हुआ होगा, पर क्या यह जरूरी है कि चारों ये ही थे? हो सकता है कि अब्दुल रहीम अपनी कोई पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहे हों? क्या पता इन्होंने ही बलात्कार किया हो और फिर लाश पहुंचा दी हो?’’ धूर्त वकील ने ऐसा पासा फेंका कि मामला ही बदल गया.

लंच की छुट्टी हो गई थी. उस के बाद फैसला आने की उम्मीद थी. चारों आरोपी मूंछों पर ताव देते हुए अपने वकील को गले लगा कर जश्न सा मना रहे थे. लंच की छुट्टी के बाद जज साहब कुछ पहले ही आ कर सीट पर बैठ गए थे. उन के सख्त होते जा रहे हावभाव से माहौल भारी बनता जा रहा था.

‘‘क्या आप के पास कोई और गवाह है, जो इन चारों की पहचान कर सके,’’ जज साहब ने वकील से पूछा, तो वह बेचारा बगलें झांकनें लगा.

पीछे से कुछ लोग ‘हायहाय’ का नारा लगाने लगे. चारों आरोपियों के चेहरे दमकने लगे थे. तभी एक आवाज आई, ‘‘हां, मैं हूं. चश्मदीद ही नहीं भुक्तभोगी भी. मुझे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए.’’

सब की नजरें आवाज की दिशा की ओर हो गईं. जज साहब के ‘इजाजत है’ बोलने के साथ ही लोगों ने देखा कि उन की शहर की एसपी कल्पना कठघरे की ओर जा रही हैं. पूरे माहौल में सनसनी मच गई.

‘‘हां, मैं ही हूं वह लड़की, जिसे 10 साल पहले होली की दोपहर में इन चारों ने बड़ी ही बेरहमी से कुचला था, इस ने…

‘‘जी हां, इसी ने मुझे मेरे घर के आगे से उठा लिया था, जब मैं गेट के आगे कुत्ते को रोटी देने निकली थी. मेरे मुंह को इस ने अपनी हथेलियों से दबा दिया था और कार में डाल दिया था.

‘‘भीतर पहले से ये तीनों बैठे हुए थे. इन्होंने पास के एक ढाबे के पीछे वाली दीवार की तरफ कार रोक कर मुझे घसीटते हुए उतारा था.

‘‘इस ने मेरे दोनों हाथ पकड़े थे और इस ने मेरी जांघें. कपड़े इस ने फाड़े थे. सब से पहले इस ने मेरा बलात्कार किया था… फिर इस ने… मुझे सब के चेहरे याद हैं.’’

सिटी एसपी कल्पना बोले जा रही थीं. अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए उन की करतूतों को उजागर करती जा रही थीं. कल्पना के पिता ने उठ कर 10 साल पुराने हुए मैडिकल जांच के कागजात कोर्ट को सौंपे, जिस में बलात्कार की पुष्टि थी. रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कल्पना को जान से मारने की कोशिश की गई थी.

कल्पना अभी कठघरे में ही थीं कि एक आरोपी की पत्नी अपनी बेटी को ले कर आई और सीधे अपने पति के मुंह पर तमाचा जड़ दिया.

दूसरे आरोपी की पत्नी उठ कर बाहर चली गई. वहीं एक आरोपी की बहन अपनी जगह खड़ी हो कर चिल्लाने लगी, ‘‘शर्म है… लानत है, एक भाई होते हुए तुम ने ऐसा कैसे किया था?’’

‘‘जज साहब, मैं बिलकुल मरने की हालत में ही थी. होली की उसी रात मेरे पापा मुझे तुरंत अस्पताल ले कर गए थे, जहां मैं जिंदगी और मौत के बीच कई दिनों तक झूलती  रही थी. मुझे दौरे आते थे. इन पापियों का चेहरा मुझे हर वक्त डराता रहता था.’’

अब केस आईने की तरह साफ था. अब्दुल रहीम की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. कल्पना उन के पास जा कर उन के कदमों में गिर पड़ी.

‘‘अगर आप न होते, तो शायद मैं जिंदा न रहती.’’

मीडिया वाले कल्पना से मिलने को उतावले थे. वे मुसकराते हुए उन की तरफ बढ़ गई.

‘‘अब्दुल रहीम ने जब आप को कपड़े में लपेटा था, तब मरा हुआ ही समझा था. मेज के उस कपड़े से पुलिस की वरदी तक के अपने सफर के बारे में कुछ बताएं?’’ एक पत्रकार ने पूछा, जो शायद सभी का सवाल था.

‘‘उस वारदात के बाद मेरे मातापिता बेहद दुखी थे और शर्मिंदा भी थे. शहर में वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे थे. मेरे पिताजी ने अपना तबादला इलाहाबाद करवा लिया था.

‘‘सालों तक मैं घर से बाहर जाने से डरती रही थी. आगे की पढ़ाई मैं ने प्राइवेट की. मैं अपने मातापिता को हर दिन थोड़ा थोड़ा मरते देख रही थी.

‘‘उस दिन मैं ने सोचा था कि बहुत हुआ अब और नहीं. मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा की तैयारी करने लगी. आरक्षण के कारण मुझे फायदा हुआ और मनचाही नौकरी मिल गई. मैं ने अपनी इच्छा से इस राज्य को चुना. फिर मौका मिला इस शहर में आने का.

‘‘बहुत कुछ हमारा यहीं रह गया था. शहर को हमारा कर्ज चुकाना था. हमारी इज्जत लौटानी थी.’’

‘‘आप दूसरी लड़कियों और उन के मातापिता को क्या संदेश देना चाहेंगी?’’ किसी ने सवाल किया.

‘‘इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि बलात्कार की शिकार लड़की और उस के परिवार वाले शर्मिंदा हों. गुनाहगार चोर होता है, न कि जिस का सामान चोरी जाता है वह.

‘‘हां, जब तक बलात्कारियों को सजा नहीं होगी, तब तक उन के हौसले बुलंद रहेंगे. मेरे मातापिता ने गलती की थी, जो कुसूरवार को सजा दिलाने की जगह खुद सजा भुगतते रहे.’’

कल्पना बोल रही थीं, तभी उन की मां ने एक पुडि़या अबीर निकाला और उसे आसमान में उड़ा दिया. सालों पहले एक होली ने उन की जिंदगी को बेरंग कर दिया था, उसे फिर से जीने की इच्छा मानो जाग गई थी.