Love Marriage Case : 10 साल बाद

Love Marriage Case. सीमा ने 10 साल पहले भाग कर दूसरी जाति के रामू से प्रेम विवाह कर लिया था. वह उस के साथ सुखी तो थी ही, उस के 2 बच्चों की मां भी बन गई थी. लेकिन इतने दिनों बाद भी घर वाले उस के इस प्रेम विवाह को बरदाश्त नहीं कर सके और…

अमित ने जीजा के पैर छूते हुए उन का उखड़ा मूड देख कर पूछा, क्या बात है जीजाजी, आज आप कुछ नाराज से लग रहे हैं? नाराजगी की वजह तुम अच्छी तरह जानते हो अमित. 10 साल से हम जिस आग में जल रहे हैं, वह तुम्हें बताने की जरूरत नहीं है. अमित ने बहनोई को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, जीजाजी, बात काफी पुरानी हो चुकी है, इसलिए अब हमें उसे भूल जाना चाहिए. लेकिन जगदीश उस बात को भुलाना नहीं चाहता था, इसलिए उस ने कहा, अगर तुम्हारी जगह मैं होता तो परिवार की उस बेइज्जती का बदला ले कर रहता.

जगदीश की इस बात से अमित सोच में पड़ गया. उस की बहन सीमा ने जो किया था, क्या वह इतना बड़ा अपराध था कि उस के लिए जीजाजी जो कह रहे हैं, क्या वह उचित है? अमित उर्फ भूरा 23 साल का हो गया था. जब उस की बहन सीमा ने दूसरे जाति के लड़के से शादी कर के घर छोड़ा था, तब वह 10-11 साल का था.

खटीक जाति का गंगा सिंह एटा जिले के थाना रिजोर के गांव इब्राहीमपुर में रहता था. उसी का बेटा था अमित. उस के अलावा गंगा सिंह की 4 बेटियां थीं ममता, यशोदा, रमा और सीमा. परिवार बकरियों की खरीदफरोख्त का काम करता था. इस धंधे में उस की इतनी कमाई हो जाती थी कि जिंदगी मजे से कट रही थी.

गंगा सिंह के घर से कुछ दूरी पर कुम्हार जाति का काशीराम रहता था. उस के 2 बेटे थे रामू और पुष्पेंद्र. पुष्पेंद्र की शादी रीना से हो गई थी, जबकि रामू अविवाहित था. पड़ोसी होने के नाते गंगा सिंह और काशीराम का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. इसी आनेजाने में गंगा सिंह की बेटी सीमा और काशीराम का बेटा रामू एकदूसरे को दिल दे बैठे.

सीमा खूबसूरत और हमेशा खुश रहने वाली लड़की थी तो रामू जवान और कामकाजी लड़का था. सीमा उसी जैसे पति के सपने देखती थी. इसीलिए वह जब भी रामू को देखती, उस का दिल धड़क उठता. रामू पढ़ालिखा भी था, जबकि सीमा की जाति में पढ़ेलिखे लड़के कम ही मिलते थे. इस तरह सीमा मन ही मन उसे चाहने लगी थी.

सीमा गांव की अन्य लड़कियों से थोड़ा अलग थी, इसलिए वह लड़कों में आकर्षण का केंद्र थी. लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कोई उसे कुछ कह देता. एक दिन सीमा खेतों में बकरियों का चारा लेने गई थी. वह चारे का बोझ उठाने के लिए इधरउधर देख रही थी, तभी रामू न जाने कहां से आ गया. सीमा ने उसे इशारे से बुलाया तो उस ने पास आ कर कहा, सीमा, तुम इतना बड़ा बोझ उठा ले जाओगी? सीमा ने तिरछी नजरों से उसे देखते हुए कहा, अब तुम आ गए हो तो इसे संभालोगे नहीं?

रामू ने सीमा की आंखों में झांका तो उन में उसे जो कुछ ऐसा दिखाई दिया, वह उसे अपनी ओर खींच रहा था. उस ने मुसकराते हुए कहा, इस बोझ को तो मैं हंसतेहंसते जीवन भर संभालने को तैयार हूं. अच्छा, तुम्हें खुद पर इतना गुमान है? अगर एक अच्छी सूरत मेरे ऊपर इस तरह मेहरबान है तो मुझे गुमान होगा ही. कह कर रामू ने बोझ उठा लिया. सीमा ने हैरानी से कहा, लाओ, बोझ मुझे दे दो, गांव के किसी आदमी ने देख लिया तो बिना मतलब की बातें होंगी. पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो और कौन करेगा? रामू ने कहा. रामू, बहुत दिनों से मैं तुम से एक बात कहना चाहती थी. तो आज कह दो. तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो. क्या मैं भी तुम्हें अच्छी लगती हूं?

रामू सोच में पड़ गया. अच्छे लगने का मतलब वह अच्छी तरह से समझता था. उस के दिमाग में तुरंत आया कि अगर इस बात की जानकारी खटीकों को हो गई तो बवाल हो जाएगा. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सीमा ने अपना हाथ बढ़ा कर कहा, मेरा हाथ थाम लो रामू, मैं सिर्फ तुम्हारी हूं.

रामू की रगों में जवानी का खून था. वह भी सीमा को पसंद करता था. सीमा के स्पर्श से वह आवेश में आ गया. उस ने सीमा का हाथ थाम कर कहा, लो थाम लिया हाथ, अब तुम मेरी हो. वादा करता हूं, मैं जीवन भर तुम्हारा यह हाथ नहीं छोड़ूंगा. इस के लिए मुझे चाहे जो भी करना पड़े. उस दिन दोनों ने एकदूसरे को मन और वचन से अपना तो लिया, लेकिन उन्हें पता था कि उन के प्यार की राह में जाति एक ऐसी बाधा है, जिसे पार करना आसान नहीं होगा. इस के बावजूद उन्होंने प्यार ही नहीं किया, उसे आजीवन निभाने का निर्णय भी ले लिया.

रामू को पता था कि शादी के लिए न तो उस के घर वाले राजी होंगे और न सीमा के. इसलिए वह पैसे इकट्ठे करने लगा कि अगर सीमा के साथ उसे घर छोड़ना पड़े तो उस के पास इतने पैसे होने चाहिए कि वह कहीं भी व्यवस्थित हो सके. अगर हाथ में पैसा रहेगा तो वह कहीं भी रह लेगा.

सीमा की 3 तीनों बड़ी बहनों की शादियां हो चुकी थीं. सब से बड़ी बहन ममता डुड़ला में जगदीश के साथ ब्याही थी. वह फूल बेचने का काम करता था. सीमा के घर वालों को उस के और रामू के प्यार का पता नहीं चल पाया, लेकिन न जाने कहां से उस के जीजा जगदीश को इस बात की जानकारी हो गई.

उस ने ससुराल आ कर सासससुर को खूब खरीखोटी सुनाते हुए कहा, तुम लोग एक लड़की नहीं संभाल सके. दूसरे गांव में रह कर मुझे पता चल गया कि सीमा रामू कुम्हार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है और तुम लोग हो कि आंखें मूंदे बैठे हो. दामाद की बात पर गंगा सिंह के कान खड़े हो गए. उस ने सीमा से पूछा तो उस ने मना करते हुए कहा कि जीजाजी उस पर झूठा इल्जाम लगा रहे हैं, वह रामू से बाहर कभी नहीं मिली.

दामाद की बात को गंगा सिंह और निर्मला ने भले ही गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन उन की समझ में यह बात जरूर आ गई थी कि बेटी जवान हो चुकी है, अब इस का ब्याह कर देना चाहिए. उस के लिए लड़के की खोज तो शुरू ही हो गई, उस पर नजर भी रखी जाने लगी.

जबकि जगदीश ने यह दांव चल कर कुछ दूसरा ही सोचा था. वह सीमा की शादी अपने छोटे भाई से करवाना चाहता था. अब उसे सीमा की ऐसी कमजोरी मिल गई थी, जिस की बदौलत वह सासससुर को बदनामी का डर दिखा कर मौके का फायदा उठाना चाहता था.

दरअसल, उस का भाई शराबी और जुआरी तो था ही, कोई कामधंधा भी नहीं करता था. इसलिए सीमा के घर वाले इस रिश्ते के लिए जल्दी तैयार नहीं होते. मौके का फायदा उठाने के लिए एक दिन जगदीश ससुराल आया और सासससुर से बदनामी की बात कह कर उस ने सीमा की शादी अपने भाई से करने को कहा. उस की बातें सुन कर सीमा ने गुस्से में कहा, जीजाजी, तुम ने सोच कैसे लिया कि मैं तुम्हारे उस आवारा भाई से शादी कर लूंगी.

गंगा सिंह और निर्मला सन्न रह गए. रामू और सीमा के मिलनेजुलने की बात भले ही उन्हें बरदाश्त नहीं थी, लेकिन वे सीमा की शादी जगदीश के भाई से भी नहीं करना चाहते. उन्होंने दामाद को यह कह कर चुप करा दिया कि इस मामले पर फिर कभी बात करेंगे. सीमा सब कुछ समझ चुकी थी. वह रामू से मिली और उस से साफसाफ कह दिया कि जो भी करना है, जल्दी करो, वरना किसी दिन जगदीश अपने भाई से उस की शादी करा देगा.

गांव में रहते रामू और सीमा की शादी हो नहीं सकती थी. इसलिए एक दिन रामू ने सीमा के साथ गांव छोड़ दिया. पैसे उस ने जमा ही कर रखे थे. वह सीमा को ले कर हरियाणा के शहर पानीपत आ गया और कमरा किराए पर ले कर सीमा के साथ रहने लगा. उस ने सीमा के साथ मंदिर में शादी भी कर ली. गुजरबसर के लिए उस ने एक फैक्ट्री में नौकरी भी कर ली. इस तरह रामू और सीमा ने जातिबिरादरी के पचड़ों से दूर आ कर अपनी अलग दुनिया बसा ली.

लेकिन दूसरी ओर वे जिस दुनिया को छोड़ आए थे, वहां आग लग चुकी थी. सब से ज्यादा नाराज जगदीश था. उस ने पहले तो सासससुर की खूब लानतमलानत की, उस के बाद ससुर को साथ ले कर थाना रिजोर पहुंचा और रामू के खिलाफ सीमा को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस से जितना हो सकता था, रामू के घर वालों को परेशान तो किया ही, कुरकी तक कर डाली, पर रामू और सीमा का कुछ पता नहीं चला. पता चलता भी कैसे, रामू ने घर छोड़ने के बाद उधर झांका ही नहीं था.

सब कुछ भुला कर रामू और सीमा अपनी दुनिया में खुश थे. उन्होंने घर वालों से पूरी तरह संबंध तोड़ लिए थे. सीमा ने देव को जन्म दिया तो दोनों बेटे के साथ अपनी दुनिया में मस्त हो गए. लेकिन सीमा के घर वाले उस की इस हरकत को पचा नहीं पा रहे थे. इस की एक वजह यह थी कि बिरादरी वाले सीमा के घर वालों को अपमानित करते रहते थे.

सीमा जब घर से भागी थी, तब अमित काफी छोटा था. लेकिन जब वह बड़ा हुआ और बहन के भागने की बात समझ में आई तो उसे लगा कि बहन ने दूसरी जाति के लड़के के साथ भाग कर अच्छा नहीं किया. रहीसही कसर जगदीश ताने मार कर पूरी कर देता था.

एक दिन अचानक गांव में यह बात फैल गई कि रामू, सीमा और बच्चे के साथ फिरोजाबाद में रह रहा है. अमित की नफरत भड़क उठी, लेकिन गंगा सिंह और निर्मला ने उसे समझाया कि जब सीमा रामू के साथ खुश है तो अब उन्हें सब कुछ भुला देना चाहिए. मांबाप के समझाने पर अमित रामू से मिलने गया तो रामू ने उसे गले लगा लिया. इस से अमित को लगा कि रामू इतना बुरा नहीं है, जितना जगदीश उसे बताता रहता है.

इस के बाद सीमा की बहनें भी उस के यहां आनेजाने लगीं. लेकिन रामू ने कभी किसी पर विश्वास नहीं किया. यही वजह थी कि वह सीमा और बेटे को ले कर कभी गांव नहीं गया. उसी बीच बेटी तनु पैदा हुई. अब उन के 2 बच्चे हो गए थे. सब ठीक हो गया था, लेकिन जगदीश के कलेजे की आग अभी तक ठंडी नहीं हुई थी. वह रामू को खत्म कर के सीमा की शादी अपने भाई से करवा कर अपनी उस आग को ठंडी करना चाहता था. इस के लिए वह अमित को अपने साथ मिलाना चाहता था. यही वजह थी कि मौका मिलने पर वह उसे भड़काता रहता था.

एक दिन जगदीश भी सीमा के घर जा पहुंचा. जीजा का आना सीमा को अच्छा नहीं लगा, लेकिन घर आए मेहमान को वह भगा भी नहीं सकती थी. बातचीत में जगदीश ने जब कहा कि उस की वजह से समाज में उन की बड़ी बदनामी हुई है, अगर वह चाहे तो अभी भी सब ठीक हो सकता है.

इस पर सीमा ने पूछा कि वह कैसे तो जगदीश ने कहा, हम रामू को ठिकाने लगा कर तुम्हारी शादी अपने भाई से करवा देंगे. इस तरह तुम्हारा घर भी बस जाएगा और समाज में हमारी इज्जत भी वापस आ जाएगी.

तो अभी तक तुम्हारे भाई की शादी नहीं हुई? वैसे भी उस आवारा से शादी करेगा ही कौन? जीजाजी, अच्छा यही होगा कि अब तुम चुपचाप यहां से निकल लो, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. एक बात और, अगर किसी ने मेरे पति पर बुरी नजर डाली तो मैं उसे छोड़ूंगी नहीं. जगदीश साली से बेइज्जत हो कर चला तो आया, लेकिन उस ने तय कर लिया कि वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. इस के बाद उस ने रामू को कई बार ठिकाने लगाने की कोशिश की, लेकिन हर बार रामू बच गया.

अब सीमा उस के निशाने पर थी. उस ने सीमा के मौसेरे भाई अशोक और अमित को भड़काना शुरू किया. उस की बातों में आ कर अमित को भी लगने लगा कि सीमा ने जो किया है, उस से उस के परिवार की बड़ी बेइज्जती हुई है, इसलिए उसे जिंदा रहने का हक नहीं.

आखिर सब ने मिल कर सीमा के नाम मौत का फरमान जारी कर दिया. रामू फिरोजाबाद के किशननगर में वीरपाल यादव के मकान में किराए पर रहता था. 10 अक्तूबर, 2015 की शाम 4 बजे सीमा ने मकान मालकिन राजबेदी से कहा कि भाई का फोन आया है कि मां की तबीयत बहुत खराब है, इसलिए वह आसफाबाद चौराहे पर उस का इंतजार कर रहा है. वह उस के साथ मां को देखने अस्पताल जा रही है. इस के बाद सीमा अपने 8 साल के बेटे देव और 4 साल की बेटी तनु को ले कर चली गई.

आसफाबाद चौराहे पर अमित थ्रीव्हीलर लिए खड़ा था. वह सीमा और बच्चों को उस पर बैठा कर इधरउधर घुमाने लगा. शाम होने लगी तो सीमा ने कहा, जल्दी करो, मुझे घर भी जाना है. अमित ने किसी को फोन किया तो थोड़ी ही देर में एक कार उस के पास आ कर रुकी. उस में से जगदीश और अशोक उतरे तो सीमा को शक हुआ. उस ने बच्चों के साथ भागना चाहा तो तीनों ने मारपीट कर बच्चों के साथ उसे कार में बैठाया और जंगल की ओर चल पड़े.

अगले दिन थाना नारखी के उमरगढ़ से कुतुबपुर जाने वाले रास्ते पर खेतों के बीच पड़ने वाले एक कुएं में कुछ बच्चों ने एक महिला और 2 बच्चों की लाशें देखीं. शाम का समय था, लोग पंचायत चुनाव में वोट डाल कर लौट रहे थे. बच्चों ने उन्हें कुएं में 3 लाशें पड़ी होने की बात बताई तो वे कुएं के पास पहुंचे. पुलिस को सूचना दे कर 2 लोग कुएं में उतर गए. नीचे जाने पर पता चला कि औरत और लड़की तो मर चुकी थी, जबकि लड़के की सासें चल रही थीं. उन्होंने लड़के को बाहर निकाला. तब तक पुलिस भी पहुंच गई थी.

इंसपेक्टर श्रवण कुमार राणा ने बच्चे को तुरंत जिला अस्पताल भिजवाया. इस के बाद उन्होंने लाशें निकलवाईं. लाशों की शिनाख्त नहीं हो सकी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि मृतक यहां के रहने वाले नहीं थे. दूसरी ओर शाम को रामू घर पहुंचा तो जब मकान मालकिन ने बताया कि सीमा के भाई का फोन आया था और वह बच्चों को ले कर अपनी मां को देखने अस्पताल गई है तो वह सिर थाम कर बैठ गया.

उस ने सीमा को फोन किया तो उस का फोन बंद था. उस ने भाई को फोन किया तो पता चला कि गंगा सिंह के घर में ताला लगा है. रामू समझ गया कि कुछ अनहोनी हो गई है. 13 अक्तूबर के अखबार में जब 2 लाशें और एक बेहोश बच्चे के कुएं में मिलने की खबर छपी तो खबर पढ़ कर रामू के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह जिला अस्पताल पहुंचा तो बेटे को देख कर सन्न रह गया. उस ने रोरो कर पुलिस को बताया कि बेहोश बच्चा उस का बेटा है.

इस के बाद पोस्टमार्टम के लिए रखी महिला और बच्ची की लाश की शिनाख्त उस ने अपनी पत्नी और बेटी के रूप में कर दी. रामू की दुनिया लुट चुकी थी. देव को होश आया तो उस ने सारी बात बता दी. उस के बाद अपराध संख्या 958/15 पर भादंवि की धारा 302, 307, 201 के तहत जगदीश, अशोक और अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. जगदीश को उसी दिन उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उस की गिरफ्तारी की खबर पा कर अमित और अशोक गांव छोड़ कर भाग गए.

9 जनवरी को नए थानाप्रभारी जसपाल सिंह पंवार ने अमित को दिल्ली के गोविंदपुरी से गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अशोक कथा लिखे जाने तक पकड़ा नहीं जा सका था. अमित और जगदीश अपने किए की भले ही सजा पा जाएं, लेकिन उस से रामू की उजड़ी दुनिया तो अब बस नहीं सकती.

अमित का कहना था कि उसे अपनी बहन और उस के बच्चों को मारने का जरा सा भी अफसोस नहीं है, क्योंकि उस की वजह से गांव में उन लोगों की जो बदनामी हुई थी, उस के लिए यही उचित था. Love Marriage Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extramarital Affair Murder : सुख की तलाश में सुनीता 

Extramarital Affair Murder : घरपरिवार से दुखी सुनीता ने सुख की खातिर विकास को अपना बनाया था. लेकिन विकास का अपना घरपरिवार था. वह सुनीता को कैसे अपनी बना सकता था. जब सुनीता उस के लिए गले की हड्डी बनी तो उस ने उसे दूर तो कर दिया, लेकिन…

प्रकाश आहिरे अपने परिवार के साथ महानगर मुंबई के उपनगर घाटकोपर (पश्चिम) में भीमनगर वी.वी.एस. पवार की चाल में रहता था. उस के परिवार में पत्नी सुनीता, 2 बेटियां और एक बेटा था. प्रकाश एक नंबर का शराबी था. अधिक शराब पीने की ही वजह से उसे टीबी हो गई थी. इसलिए परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी सुनीता पर आ गई थी.

सुनीता के लिए इस से भी ज्यादा दुख की बात यह थी कि बेटा भी बाप की राह पर चल पड़ा था. वह जो भी कमाता था, शराब पी जाता था. परिवार के भूखों मरने की नौबत आ गई तो सुनीता को कमाने की जरूरत महसूस हुई. उस ने जानपहचान वालों से कहीं नौकरी दिलाने की बात की तो किसी ने उसे दादर स्थित एक नल की टोंटी बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी दिला दी.

सुनीता को वहां वेतन तो कोई ज्यादा नहीं मिल रहा था, फिर भी इतना मिल जाता था कि पेट को रोटी और तन को कपड़ा मिल जाता था. जैसेतैसे दिन बीत रहे थे, लेकिन समय कब बदल जाए, कोई नहीं जानता. अचानक सुनीता एक बार फिर आर्थिक संकट में घिर गई.

वह जिस नल की टोंटी बनाने वाली फैक्ट्री में काम करती थी, वह एकाएक बंद हो गई थी. इस के बाद सुनीता ही नहीं, वहां काम करने वाले सभी लोग बेरोजगार हो गए थे. इस तरह सुनीता के सामने एक बार फिर वही समस्या खड़ी हो गई, जो पहले थी. वह नौकरी के लिए फिर भटकने लगी.

उसी बीच उस की मुलाकात प्रवीण धाड़ी से हुई. प्रवीण सुनीता के साथ दादर की नल की टोंटी बनाने वाली कंपनी में काम करता था. दोनों में पटती भी थी, इसलिए सुनीता ने जब उसे घर की स्थिति बता कर नौकरी के बारे में कहा तो उस ने उसे नौकरी दिलाने का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि दिला भी दी.

प्रवीण का एक दोस्त था विकास म्हात्रे, जिस की थाणे के कल्याण के पास दिवा में प्लास्टिक के तार बनाने की एक छोटी सी फैक्ट्री थी. उसे एक ईमानदार मेहनती महिला कर्मचारी की जरूरत थी. सुनीता को उस ने वेतन 4 हजार रुपए देने की ही बात कही थी. लेकिन मरता क्या न करता. सुनीता ने विकास म्हात्रे के यहां नौकरी कर ली थी.

वह सुबह लोकल ट्रेन से दिवा तक जाती तो रात 8 बजे तक घर लौटती थी. काम ज्यादा होने पर कभीकभी देर भी हो जाती थी. उसे विकास म्हात्रे के यहां काम करते कुछ ही महीने हुए थे कि एक दिन अचानक वह गायब हो गई. उस के इस तरह अचानक गायब होने से घर में मातम छा गया, क्योंकि उसी की वजह से घर चल रहा था.

सुनीता के भाई देवीदास और बेटी श्रद्धा ने सुनीता को काफी खोजा, जब वह कहीं नहीं मिली तो घाटकोपर जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. यह 10 जून, 2015 की बात थी. थाना घाटकोपर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर व्यंकटेश पाटील ने अधिकारियों तथा पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे कर मामले की जांच शुरू कर दी.

सुनीता विकास म्हात्रे की फैक्ट्री में नौकरी करती थी और सुबह वहीं जाने की बात कह कर घर से निकली थी, इसलिए पुलिस का ध्यान उसी पर जम गया था. उसे थाने बुला कर पूछताछ की गई तो उस ने खुद को सुनीता के मामले में एकदम अनभिज्ञ बताया. जब इस से कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर ले कर उसे छोड़ दिया.

22 जून, 2015 को नवी मुंबई के निलजे गांव की लोढा हैवन इमारत के रहने वाले एलआईसी एजेंट संतोष व्हटकर किसी काम से नवी मुंबई महापे जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें पेशाब लगी. महापे रोड के टीवीएमटी नाले के पास मोटरसाइकिल रोक कर वह पेशाब करने नाले के किनारे गए तो वहां लगे मिट्टी के ढेर पर महिला की लाश देख कर उन के होश उड़ गए. वह पेशाब करना भूल गए और मोटरसाइकिल उठा कर सीधे महापे टोल नाका पहुंचे, जहां ड्यूटी पर तैनात पुलिस वालों को लाश के बारे में बताया.

पुलिस वालों ने इस की जानकारी थाना एमआईडीसी पुलिस को दी तो थानाप्रभारी इंसपेक्टर चंद्रसेन देशमुख अपने साथ इंसपेक्टर चंद्रकांत काटकर, अरुण पवार, प्रवीण शेडके, एसआई प्रदीप श्राफ, हैडकांस्टेबल आशीष महाडिक, दिगंबर आंजे, प्रकाश सालुके और दीपक कांबले को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

बरसात की वजह से लाश फूल गई थी. लाश पर जो नाइटी थी, वह जगहजगह से फटी हुई थी. उस के हाथ पीछे की तरफ मजबूत रस्सी से बंधे थे. साफ लग रहा था कि हत्या कर के लाश यहां सुनसान में ला कर फेंकी गई थी. लाश फेंकने वाले ने यह सोच कर लाश यहां फेंकी थी कि बरसात में लाश बह कर दूर निकल जाएगी.

चंद्रसेन देशमुख ने लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. जांच में सब से बड़ी समस्या शिनाख्त की थी, बिना शिनाख्त के जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी.

इस के लिए पुलिस ने नवी मुंबई, थाणे, रायगढ़, पालघर और कोंकण के सभी थानों से संपर्क किया. इस के अलावा लाश के फोटो दैनिक अखबारों में छपवाए गए. जब इस सब से भी कोई लाभ नहीं हुआ तो लाश के पैंफ्लेट छपवा कर पूरे शहर में चस्पा करवाए गए. लेकिन पुलिस को इस का भी कोई लाभ नहीं मिला. जब लाश की शिनाख्त ही नहीं हो सकी तो जांच कैसे आगे बढ़ती?

धीरेधीरे 4 महीने बीत गए. 27 सितंबर, 2015 को थाना घाटकोपर के सिपाही रावत और पानसरे किसी काम से तुर्दे गए तो वहां उन्होंने कई जगहों पर सुनीता की लाश के पैंफ्लेट लगे देखे. वे जिस गुमशुदा महिला की तलाश 4 महीने से कर रहे थे, उस की तो हत्या हो चुकी थी. उन्होंने यह बात तुरंत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बताई और थाना एमआईडीसी जा कर सुनीता की लाश मिलने के बारे में जानकारी जुटाई.

इस के बाद उन्होंने वह लाश सुनीता की ही थी, इस की पुष्टि के लिए उस के घर वालों को वहीं बुला लिया. घर वालों को जब थाने में रखे सुनीता के सामान और फोटो दिखाए गए तो सुनीता के भाई देवीदास और बेटी श्रद्धा ने बताया कि फोटो और सामान सुनीता के ही हैं.

चूंकि थाना घाटकोपर पुलिस की नजर में विकास म्हात्रे संदिग्ध था, इसलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ मे इस बार भी वह पहले की ही तरह नाटक करता रहा. पुलिस उस के साथ सख्ती न कर सके, इस के लिए वह कभी बेहोश हो जाता तो कभी दीवार पर सिर पटकने लगता, साथ ही धमकी देता कि अगर उसे परेशान किया गया तो वह आत्महत्या कर लेगा.

विकास को रास्ते पर आते न देख चंद्रसेन देशमुख ने वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के उस से सच्चाई उगलवाने की एक नई युक्ति निकाली. संयोग से उन की वह युक्ति सफल भी हो गई. उसी युक्ति से विकास ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

18 जनवरी, 2016 को चंद्रसेन देशमुख ने अपने एक तेजतर्रार पुलिस अधिकारी को वकील के रूप में विकास के पास भेजा. उस अधिकारी ने विकास से कहा कि उसे उस की पत्नी ने उस के पास भेजा है. उसे पूरा भरोसा है कि वह उसे बचा लेगा. लेकिन वह उसे तभी बचा सकेगा, जब वह शुरू से ले कर अंत तक की पूरी कहानी उसे बता दे. आखिर विकास उस के झांसे में आ गया और सुनीता की हत्या का सारा सच उगल दिया. उस ने सुनीता की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

42 वर्षीय विकास म्हात्रे महानगर मुंबई के उपनगर अंधेरी (पूर्व) में करीम की चाल में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बेटियां थीं. उस की प्लास्टिक के तार बनाने की छोटी सी फैक्ट्री थी. शुरू में वह अपना यह काम घर से ही करता था. लेकिन कुछ दिनों बाद उस ने अपनी तार बनाने वाली मशीन मुंबई से दूर थाणे के दिवा के गांव दानीवाली की चाल में लगा ली थी.

काम अच्छा चलने लगा तो विकास को सहयोगी की जरूरत महसूस हुई. उस की नजर में पुरुष की अपेक्षा महिला सहयोगी ज्यादा अच्छी लगी. उसे लगता था कि औरतें कम पैसे में भी मेहनत और ईमानदारी से काम करती हैं. इस बारे में उस ने अपने दोस्त प्रवीण धाड़ी से बात की तो उस ने सुनीता की नौकरी उस के यहां लगवा दी. सुनीता को नौकरी की जरूरत थी ही, इसलिए कम वेतन पर भी उस ने विकास के यहां नौकरी कर ली.

इस तरह सुनीता विकास को एक सहयोगी के रूप में मिल गई. विकास सुनीता का काफी ध्यान रखता था. उस का ध्यान रखना सुनीता को अच्छा भी लगता था. परिणामस्वरूप वह विकास के करीब आती गई. उस के करीब आने के बाद सुनीता बीमार पति, शराबी बेटे और अविवाहित बेटी तथा घर के झंझटों से मुक्त रहने लगी.

सुनीता का अपनी ओर झुकाव देख कर विकास भी सुनीता के करीब आने की कोशिश करने लगा. एक दिन सुनीता के दिल की बात भांपने के लिए उस ने कहा, पता नहीं क्यों, आज मेरा काम में मन नहीं लग रहा है. सुनीता ने हंसते हुए कहा, लगता है, पत्नी की याद आ रही है. पत्नी को याद करने सेक्या फायदा? मेरी पत्नी बीमारी की वजह से इतनी कमजोर है कि वह मेरे किसी काम की नहीं है. विकास ने ठंडी सांस लेते हुए कहा. तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं. सुनीता विकास की आंखों में आंखें डाल कर बोली. विकास सुनीता से क्या चाहता है, इस बात से वह अंजान नहीं थी. इसीलिए उस ने उस से इस तरह कहा था.

इस मामले में तुम मेरी क्या मदद कर सकती हो? विकास ने पूछा. तुम मुझे 5 सौ रुपए दो. उस के बाद देखो मैं तुम्हारी कैसे मदद करती हूं. सुनीता ने हंस कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.

विकास ने जेब से 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर सुनीता के हाथ पर रख दिया. उस ने नोट को मुट्ठी में दबाया और बाथरूम में चली गई. कुछ देर बाद जब वह बाहर आई तो उस के बदले रूप को देख कर विकास दंग रह गया.

सुनीता के बदन पर सिर्फ पेटीकोट ब्लाऊज था. विकास जो चाहता था, सुनीता उस के लिए तैयार थी. वहां उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था, इसलिए मर्यादा तोड़ कर उन दोनों ने एक नया रिश्ता कायम कर लिया. एक बार मर्यादा टूटी तो उन का जब मन करता, वे एक हो जाते. जब से सुनीता का विकास से संबंध बना था, वह खुश रहने लगी थी. अब उस का मन घर में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि उस के घर का जो माहौल था, उस में उस का दम घुटता था.

इसीलिए उस का घर से मोह भंग हो गया था. अब उसे विकास ज्यादा अच्छा लगने लगा था. शायद यही वजह थी कि वह उस के साथ विवाह कर के साथ रहने का सपना देखने लगी थी. जबकि विकास के मन में ऐसा कुछ नहीं था. उस का अपना घरपरिवार था. वह अपने परिवार के साथ खुश भी था.

सन 2015 के जून महीने के पहले सप्ताह में एक दिन सुनीता बिना किसी को कुछ बताए अपना सारा सामान ले कर विकास की फैक्ट्री में हमेशाहमेशा के लिए आ गई. उस ने विकास पर शादी के लिए जोर डाला तो दोनों में जम कर झगड़ा हुआ.

विकास ने उसे कंपनी से बाहर जाने के लिए कहा तो उस ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘अगर तुम ने मुझे यहां से निकाला तो मैं सीधे थाने जा कर तुम्हारे खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करवा दूंगी. उस के बाद तुम जेल तो जाओगे ही, तुम्हारी बदनामी भी खूब होगी.’’

सुनीता की इस धमकी से विकास बुरी तरह डर गया. उस ने सोचा कि अगर सुनीता ने सचमुच ऐसा कर दिया तो वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा. अब वह उस से छुटकारा पाने के उपाय सोचने लगा. काफी सोचनेविचारने के बाद उसे लगा कि अब सुनीता से छुटकारा मार कर ही मिल सकता है. बस उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

सुनीता किसी भी तरह अपने घर जाने को तैयार नहीं हुई तो विकास और उस में कहासुनी होने लगी. इसी कहासुनी के बीच विकास को गुस्सा आ गया तो उस ने सुनीता को धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और प्लास्टिक की थैलियों से उस का मुंह और नाक दबा दिया. जब उस की मौत हो गई तो तसल्ली के लिए उस ने लाश को 2-3 बार उठा कर पटका.

जब उसे पूरा विश्वास हो गया कि सुनीता मर चुकी है तो उस ने उस के दोनों हाथों को पीछे कर के रस्सी से बांध दिए और उसे उठा कर ड्रम में डाल दिया. इस के बाद उसे ऊपर से सीमेंट डाल कर पैक कर दिया और उसे उठा कर बाथरूम में रख दिया. यह 4 जून, 2015 की बात थी.

सुनीता को ठिकाने लगा कर विकास परिवार के साथ शिर्डी चला गया. दूसरी ओर सुनीता घर लौट कर नहीं आई तो उस के घर वाले उस की तलाश करने लगे. 10 जून, 2015 को विकास घूमफिर कर लौटा तो उसे सुनीता की लाश की चिंता हुई. लाश को ठिकाने लगाना बहुत जरूरी था. ड्रम को उठा कर वह दानीवाली नाका ले आया और वहां से टैंपो द्वारा महापे रोड ले गया. उस समय तक रात के 11 बज चुके थे. उस समय तक सड़क सूनी हो चुकी थी.

उस ने टीवीएमटी नाले के पास टैंपो रुकवा कर ड्रम को उतारा और उसे तोड़ कर लाश को बाहर निकाला. इस के बाद लाश को नाले में ले जा कर फेंक दिया और अपने घर आ कर आराम से सो गया. लेकिन वह सुबह उठा तो पुलिस उस के सामने खड़ी थी.

सुनीता की हत्या की पूरी कहानी सुना कर विकास ने वकील के कागज पर दस्तखत कर दिए. अगले दिन जब उसे पता चला कि वह उस की पत्नी द्वारा भेजा गया कोई वकील नहीं, पुलिस अधिकारी था तो उस ने अपना सिर पीट लिया. लेकिन अब क्या हो सकता था. उस ने तो अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.  Extramarital Affair Murder

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधा

Domestic Violence Murder : शक ने लगाया गृहस्थी पर ग्रहण

Domestic Violence Murder. मंटू पत्नी को प्यार तो बहुत करता था, लेकिन किसी मर्द से बातें करते देख उसे शक हो जाता था कि उस का इस मर्द से जरूर संबंध है. बस इसी शक ने उस से पत्नी का खून करवा दिया. 

घर में कदम रखते ही मंटू कुमार ने कोहराम मचा दिया था. मारे गुस्से के उस का चेहरा तमतमा रहा था. खाने का टिफिन फैंक कर वह आराधना की ओर झपटा. आराधना उस समय आईने के सामने खड़ी अपने बाल संवार रही थी.

गुस्से से लालपीले हुए मंटू ने आराधना के बालों को पकड़ कर घसीटते हुए बैड पर पटक दिया. इस के बाद गला दबाते हुए बोला, जब मैं ने मना किया था कि इस घर में अब राजू को मत आने देना तो तू ने उसे क्यों आने दिया, वह तेरा खसम लगता है क्या? मैं उसे क्यों बुलाने लगी? घायल शेरनी की तरह उठ कर आराधना चिल्लाई,  इस घर में मैं उसे लाई थी क्या? तुम्हीं तो उसे लाए थे, अपना दोस्त बना कर. जब उस के साथ शराब और चिकन उड़ाते थे, तब वह अच्छा लगता था. आखिर अब क्यों बुरा लगने लगा?

चुप बेशर्म. मंटू ने एक थप्पड़ आराधना के गाल पर मारते हुए कहा, मैं लाया था तो अब मैं ही मना कर रहा हूं. अब उसे यहां मत आने देना. न मैं उसे बुलाने जाती हूं और न रोकूंगी. अगर उस का आना इतना ही बुरा लगता है तो तुम खुद ही उसे मना कर दो कि वह यहां न आया करे. इस का मतलब तुम मेरा कहना नहीं मानोगी? कह कर मंटू ने आराधना को जोर से धक्का दिया तो वह बैड पर गिर पड़ी. इस के बाद वह उस की लातघूंसों से पिटाई करने लगा.

मंटू और आराधना के बीच यह रोज का काम था. इस की वजह थी मंटू का आराधना पर शक करना. शक एक ऐसी बीमारी है, जो जिस किसी को लग जाती है, बरबाद कर के ही छोड़ती है. क्योंकि इस का कोई इलाज नहीं है. मंटू को भी यह बीमारी लग चुकी थी. जबकि आराधना न तो चरित्रहीन थी और न ही उस का राजू से संबंध था. सही बात तो यह थी कि वह मंटू को अपनी जान से अधिक चाहती थी.

मंटू भी आराधना को जान से ज्यादा प्यार करता था, लेकिन उस के मन के किसी कोने में यह डर समाया था कि कहीं आराधना उसे छोड़ कर किसी और के साथ न चली जाए. वह उसे खोने से बहुत डरता था और उस की जुदाई मात्र की कल्पना से कांप उठता था.

इस की वजह यह थी कि सजनेधजने के बाद आराधना किसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थी. उसे अच्छे कपड़े पहनना और बनसंवर कर रहना अच्छा लगता था. वह मन की नेक और साफदिल थी. चंचल स्वभाव के कारण वह हर किसी से हंसबोल लेती थी और जल्दी ही घुलमिल जाया करती थी.

मंटू को यही सब अच्छा नहीं लगता था. आए दिन इसी बात को ले कर दोनों के बीच झगड़ा होता रहता था. कभीकभी यह झगड़ा इतना बढ़ जाता था कि कईकई दिनों तक उन के घर चूल्हा नहीं जलता था. ऐसे में आराधना की भाभी किरण आ कर दोनों को समझाती थी और उन के खानेपीने की व्यवस्था करती थी.

22 साल के मंटू की शादी 3 साल पहले सन 2012 में आराधना से हुई थी. मंटू के पिता सिपाही सिंह मूलत: बिहार के जिला कटिहार के थाना फलका के गांव समेली के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी ललिता के अलावा 2 बेटे थे. बड़ा बेटा गांव में ही पिता के साथ खेती कराता था तो मंटू लुधियाना के थाना साहनेवाल के कंगनवाल स्थित एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. 5 साल पहले मंटू कुमार नौकरी के लिए लुधियाना आया था.

आराधना के पिता छेदीलाल मूलरूप से बिहार के जिला नालंदा के गांव निचाचगंज खरज्जमा के रहने वाले थे. उन के 2 बेटे अवधेश, दिनेश तथा एक बेटी आराधना थी. आराधना दोनों भाइयों से छोटी थी, जिस से वह सब की लाडली थी. गांव में ज्यादा जमीन न होने के कारण 7-8 साल पहले दोनों भाई काम की तलाश में लुधियाना चले आए थे.

दिनेश को कंगनवाल स्थित मैट्रो टायर फैक्ट्री में काम मिल गया था तो अवधेश को साइकिल बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी. दोनों का कामधाम जम गया तो पिता ने उन की शादियां कर दीं. अवधेश की पत्नी का नाम किरण और दिनेश की पत्नी का नाम कमला था. शादी के बाद पिता की मर्जी से दोनों भाई अपनीअपनी पत्नियों को भी लुधियाना ले आए थे.

समय तेजी से गुजर रहा था. देखतेदेखते छोटी बहन आराधना शादी लायक हुई तो उस के लिए वर की तलाश शुरू हुई. छेदीलाल को गांव के ही किसी आदमी से पता चला कि बिहार के ही कटिहार जिले का एक लड़का लुधियाना के कंगनवाल में काम करता है.

दिनेश और अवधेश लुधियाना में ही रहते थे. उन्होंने मंटू को देखा तो पहली ही नजर में वह उन्हें भा गया. मंटू मेहनती था और अच्छा कमाता भी था. इस के बाद शुभ मुहूर्त देख कर आराधना का ब्याह मंटू से कर दिया गया.अवधेश और दिनेश की तरह मंटू भी लुधियाना के कंगनवाल में गर्ग फैक्ट्री के निकट नीलू लाला के बेहड़े में किराए का कमरा ले कर रहता था. शादी के बाद वह भी आराधना को लुधियाना ले आया.

मंटू जिस नीलू लाला के बेहड़े में रहता था, उस में 50-60 कमरे थे, जिन में उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल आदि राज्यों से आए ज्यादातर मजदूर अकेले ही रहते थे. ऐसे में आराधना का पड़ोसियों से बातचीत करना स्वाभाविक था. हालांकि उस की भाभी किरण अक्सर उस के पास आ कर बैठ जाती थीं, ताकि वह अकेलापन न महसूस करे.

लेकिन मंटू के काम पर जाने के बाद वह अकेली चुपचाप तो बैठी नहीं रह सकती थी. खाली समय में वह किसी न किसी से बातें करने लगती थी. यही बात मंटू को नागवार गुजरती थी. वह आराधना को इस बात के लिए डांटता था, क्योंकि किसी पुरुष से उसे हंसतेबोलते देख उसे शक हो जाता था. उस ने इस के लिए कई बार सख्ती से कहा था कि वह किसी से भी बातें न करे.

लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका था. न तो आराधना कैदी की भांति कमरे में बंद हो कर रह सकती थी और ना ही मंटू पत्नी पर विश्वास कर पाया था. नतीजा यह निकला कि आए दिन दोनों के बीच झगड़ा, मारपीट आम बात हो गई.  मंटू और आराधना के बीच जब भी झगड़ा होता, आराधना के भाईभाभी आ कर दोनों को समझाते. एक दिन तो हद ही हो गई. अवधेश के गांव का दूर का रिश्तेदार गोपाल उन के घर मिलने चला आया. दरअसल गोपाल काम के सिलसिले में गांव से लुधियाना अवधेश के पास आया था.

जब उसे पता चला कि आराधना भी यहीं पास में ही रहती है तो गांव के नाते वह उस से मिलने चला गया. आराधना ने उसे चायनाश्ता कराया और मांबाप तथा गांव वालों का हालचाल पूछने लगी. बातों में वह इतनी मगन हो गई कि उसे पता ही नहीं चला कि मंटू काम से लौट कर आ गया है.

मंटू को देख कर अराधना घबरा गई. डरते हुए उस ने गोपाल से मंटू का परिचय कराया.  कुछ देर बाद गोपाल चला गया तो मंटू ने आराधना से खूब झगड़ा और मारपीट की. किरण और अवधेश को जब दोनों के झगड़े का पता चला तो हर बार की तरह आ कर उन्होंने दोनों को समझाबुझा कर मामला शांत कराया. यह 30 नवंबर, 2015 की शाम की बात थी.

झगड़ा शांत कराने के बाद अवधेश और किरण ने कहा कि रात का खाना यहीं बना कर खा लिया जाए. आराधना और उस की भाभी किरण ने मिल कर खाना बनाया और चारों ने खाया. इस के बाद अवधेश और किरण अपने कमरे पर चले गए तो मंटू और आराधना अपने कमरे में सो गए. रात 3 बजे के करीब मंटू और आराधना के लड़ाईझगड़े के शोर से बेहड़े के लोग जाग गए. चूंकि उन का यह रोज का काम था, इसलिए किसी पड़ोसी ने उन के इस लड़ाईझगड़े पर ध्यान नहीं दिया.

लड़ाईझगड़े का शोर आराधना के भाई अवधेश और भाभी किरण ने भी सुना था, लेकिन वे भी उठ कर नहीं आए. सोचा, सुबह जा कर दोनों को समझा देंगे. सुबह किरण और अवधेश सो कर उठे भी नहीं थे कि बगल के कमरे में रहने वाले तिवारी ने उन का दरवाजा खटखटा कर बताया कि मंटू के कमरे से जोरजोर से रोने की आवाज आ रही है.

पतिपत्नी तेजी से मंटू के कमरे की ओर भागे. मंटू के कमरे पर पहले से ही कई पड़ोसी जमा थे. उन्होंने भीतर जा कर देखा तो सन्न रह गए. मंटू आराधना का सिर गोद में लिए फर्श पर बैठा जोरजोर से रोते हुए कह रहा था, तुम ने यह क्या किया, आखिर ऐसा करने की क्या जरूरत थी? आराधना, अगर तुम ने मेरी बात मानी होती तो मुझे आज यह दिन न देखना पड़ता.

देखने से ही लग रहा था कि अराधना मर चुकी है. उस का सिर गोद में लिए मंटू जिस तरह रो रहा था, साफ लग रहा था कि वह रोने का नाटक कर रहा है. पूछने पर उस ने बताया कि रात को सोते समय दोनों में झगड़ा हुआ था. आराधना उल्टासीधा कहने लगी तो उस ने उसे डांट कर सुला दिया और खुद भी सो गया. सुबह उठा तो देखा अराधना गले में दुपट्टा बांधे पंखे से झूल रही थी. उस ने उसे नीचे उतार कर देखा तो वह मर चुकी थी, इस के बाद वह उस का सिर गोद में रख कर रोने लगा.

मंटू की इन बातों पर अवधेश और किरण को विश्वास नहीं हुआ. उन्हें ही नहीं, कोई भी पड़ोसी उस की इस बात को मानने को तैयार नहीं था, क्योंकि आराधना इतनी कमजोर नहीं थी कि वह इस तरह कायरों की तरह आत्महत्या कर लेती. यह अलग बात थी कि पतिपत्नी के बीच झगड़ा जरूर होता रहता था, पर दोनों एकदूसरे को प्यार भी बहुत करते थे. ऐसे में आराधना आत्महत्या क्यों करेगी, किसी को विश्वास नहीं हो रहा था. यही सब सोच कर अवधेश ने फोन द्वारा घटना की सूचना पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थाना साहनेवाल के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अनिल भनोट चौकी कंगनवाल के चौकीप्रभारी एसआई संतराम सिंह, एएसआई सतनाम सिंह, हैडकांस्टेबल सोहनलाल के साथ बेहड़े पर पहुंच गए. लेकिन उसी बीच मंटू वहां मौजूद लोगों की नजरें बचा कर फरार हो गया.

अनिल भनोट एसआई संतराम सिंह और एएसआई सतनाम सिंह का जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. संतराम सिंह ने क्राइम टीम को घटना की सूचना दे कर बुला लिया था. इस के बाद उन्होंने अवधेश से जरूरी पूछताछ कर के घटनास्थल का मुआयना किया. पूछताछ में अवधेश और किरण ने मंटू और आराधना के बीच होने वाले झगड़े के बारे में विस्तार से बता कर संदेह व्यक्त किया कि मंटू ने ही आराधना की हत्या की है. आत्महत्या वाली बात झूठी है.

घटनास्थल के निरीक्षण के दौरान संतराम सिंह और सतनाम सिंह को कोई ऐसा सबूत नहीं मिला, जिस से लगता कि आराधना ने आत्महत्या की है. मंटू का कहना था कि जब वह सो हर उठा तो आराधना गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से लटकी हुई मिली थी. उसी ने अराधना को पंखे से नीचे उतारा था.

संतराम सिंह ने पूरा कमरा छान मारा था, पर न कहीं कोई रस्सी मिली थी और न ही कोई दुपट्टा. साफ लग रहा था कि मंटू ने अराधना की हत्या कर के उसे आत्महत्या दिखाने की असफल कोशिश की थी. सब से बड़ी बात तो यह थी कि आराधना के गले पर ऐसा कोई निशान नहीं था, जिस तरह का निशान फंदा लगाने से पड़ता है. जब लाश का निरीक्षण गौर से किया गया तो पता चला कि उस के गालों पर थप्पड़ मारने के निशान थे. पैर के अंगूठे पर चोट का निशान था और नाखून भी टूटा हुआ था. वहां से खून भी निकला था.

संतराम सिंह ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर अवधेश के बयान के आधार पर अराधना की हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर मंटू की तलाश शुरू कर दी. मंटू की तलाश में उन्होंने एएसआई सतनाम सिंह और हैडकांस्टेबल सोहनलाल की देखरेख में एक पुलिस टीम बना कर लगा दी, साथ ही मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया.

1 दिसंबर, 2015 को मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने ढंडारी स्टेशन के पास से मंटू को गिरफतार कर लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो पहले तो उस ने पुलिस से भी यही कहा कि आराधना ने आत्महत्या की है. लेकिन पुलिस ने उस से वह दुपट्टा मांगा, जिस से वह आराधना द्वारा आत्महत्या करने की बात कर रहा था.

जब आराधना ने दुपट्टे से आत्महत्या ही नहीं की थी तो वह दुपट्टा कहां से लाता? मजबूरन उसे अपना अपराध स्वीकार करना पड़ा. उस ने बताया कि उसी ने उस की गला दबा कर हत्या की थी, क्योंकि वह उस की बात नहीं मान रही थी.  मंटू का कहना था कि वह मना करता था कि किसी गैरमर्द से बातें न करे, जबकि वह जब देखो तब हर किसी से हंसहंस कर बातें करती रहती थी. यही नहीं, उस के कई लोगों से संबंध भी थे.

मंटू आराधना से बहुत प्यार करता था, यही वजह है कि पत्नी की हत्या करने के बाद अब उसे पछतावा हो रहा है. हत्या करने के तुरंत बाद उस ने इस बात की सूचना फोन द्वारा गांव में रहने वाले अपने मातापिता को दे दी थी.

पूछताछ के बाद संतराम हिंस ने मंटू को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. संदेह में मंटू ने जो किया, शायद अब उस का पछतावा जीवन भर रहेगा. अगर उस ने सोचविचार कर काम किया होता तो आज जेल के बजाय घर में पत्नी के साथ सुख से रहा होता. Domestic Violence Murder

—कथा पुलिस सूत्रों पर

Delhi Contract Killing : होटल मालिक ने दी अफसर को सजा ए मौत

Delhi Contract Killing : मोहम्मद मोइन खान ईमानदार व्यक्ति थे और ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभा रहे थे. उन की यह ईमानदारी होटल व्यवसायी रमेश कक्कड़ के हितों के विरुद्ध जा रही थी. उस ने पहले तो मोइन खान को मोटी रकम दे कर खरीदने की कोशिश की, लेकिन जब वह इस में असफल रहा तो उस ने…

मोहम्मद मोइन खान नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में एस्टेट औफिसर थे. वह दक्षिणपूर्वी दिल्ली के जामियानगर के जौहरी फार्म इलाके में पत्नी और 3 बेटियों के साथ रहते थे. घर से ड्यूटी के लिए वह अपनी स्विफ्ट डिजायर कार से निकलते थे. 16 मई, 2016 सोमवार को भी वह रोजाना की तरह ड्यूटी के लिए कार से ही निकले थे.

ड्यूटी करने के बाद शाम को करीब साढ़े 7 बजे जैसे ही वह अपने घर के बाहर कार खड़ी कर रहे थे, तभी एक युवक उन के नजदीक आया. मोइन खान उस युवक के इरादों से अनभिज्ञ थे. इस से पहले कि वह कार का दरवाजा खोल कर बाहर निकलते, उस युवक ने बड़ी फुरती से अपनी अंटी से तमंचा निकाल कर उस की बट से कार का शीशा तोड़ दिया और उन पर गोली चला दी.

गोली मार कर वह भाग गया. गोली मोइन खान के सीने पर लगी थी. वह सीट पर लुढ़क गए. गोली की आवाज सुन कर उधर से गुजर रहे लोग इकट्ठा हो गए. जब लोगों को पता चला कि एडवोकेट मोइन खान को गोली मार दी गई है तो किसी ने उन के घर खबर कर दी.

खबर सुनते ही उन की पत्नी निशात खान और तीनों बेटियां घर से बाहर आ गईं. पति को लहूलुहान देख कर निशात खान बिलखबिलख कर रोने लगीं. पिता की हालत देख कर बेटियां भी जोरजोर से रो रही थीं. गंभीर रूप से घायल हो चुके मोइन खान को लोग पास के होली फैमिली अस्पताल ले गए. अस्पताल ले जाने तक वह बेहोश हो चुके थे. डाक्टरों ने उन का चैकअप किया तो पता चला कि उन की मौत हो चुकी है.

एडवोकेट मोइन खान एक जानीमानी शख्सियत थे. जामियानगर इलाके में उन की बहुत अच्छी छवि थी, इसलिए उन की मौत की खबर पाते ही क्षेत्र के सैकड़ों लोग होली फैमिली अस्पताल के बाहर जमा हो गए. सभी इस बात से हैरान थे कि इतने सज्जन आदमी की हत्या किस ने की? वह ऐसे शख्स थे कि किसी से झगड़ना तो दूर, तेज आवाज में बात तक नहीं करते थे.

उधर जैसे ही जामियानगर के थानाप्रभारी मंगेश त्यागी को घटना की जानकारी मिली, वह टीम के साथ होली फैमिली अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने मोइन खान की लाश को कब्जे में लिया और यह जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

डीसीपी एम.एस. रंधावा को जब जानकारी मिली कि होली फैमिली अस्पताल के बाहर सैकड़ों लोग जमा हैं तो उन्होंने हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए आसपास के थानाक्षेत्र की पुलिस फोर्स वहां भेज दी. कुछ ही देर में इलाका छावनी बन गया. खुद डीसीपी एम.एस. रंधावा, एडिशनल डीसीपी विजय कुमार, एसीपी निधिन वल्सन और एसीपी अनिल यादव भी वहां पहुंच गए.

जिस कार में मोइन खान को गोली मारी गई थी, उस की जांच के लिए क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम और फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को भी बुलवा लिया गया. दोनों ही टीमों ने वहां से सबूत इकट्ठे किए. पुलिस अधिकारियों ने मृतक की पत्नी के अलावा क्षेत्र के ही प्रतिष्ठित लोगों से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में पता लगा कि वकील साहब बेहद शरीफ आदमी थे. नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में इतने बड़े पद पर नौकरी करने के बावजूद भी उन के अंदर घमंड नाम की कोई चीज नहीं थी.

पुलिस ने लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भेज दिया. उस समय तक रात हो चुकी थी, इसलिए पोस्टमार्टम अगले दिन 17 मई को होना था. तब तक के लिए उन की लाश मोर्चरी में रखवा दी. जामियानगर इलाके में शांति व्यवस्था बनी रहे, इस के लिए डीसीपी ने वहां भारी मात्रा में पुलिस तैनात करा दी.

उधर पुलिस आयुक्त आलोक कुमार वर्मा ने इस मामले को गंभीरता से लिया. विशेष आयुक्त कानून व्यवस्था (दक्षिणी) पी. कामराज, डीसीपी एम.एस. रंधावा, एसीपी निधिन वल्सन, अनिल यादव और जामियानगर के थानाप्रभारी मंगेश त्यागी को अपने औफिस बुला कर इस विषय पर बात की, साथ ही डीसीपी से कहा कि वह इस केस को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए जरूरी काररवाई करें.

पुलिस आयुक्त के निर्देश पर डीसीपी एम.एस. रंधावा ने एडिशनल डीसीपी विजय कुमार के नेतृत्व में 6 पुलिस टीमें बनाईं. पहली टीम का निर्देशन जामियानगर के थानाप्रभारी मंगेश त्यागी, दूसरी का न्यू फ्रैंड्स कालोनी के थानाप्रभारी कुलदीप यादव, तीसरी का सरिता विहार के थानाप्रभारी मनिंदर सिंह, चौथी टीम का ओखला के थानाप्रभारी अतुल वर्मा, पांचवीं का स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर नरेश कुमार और छठीं टीम का निर्देशन इंसपेक्टर ऐशवीर सिंह कर रहे थे.

सभी पुलिस टीमें अलगअलग बिंदुओं पर काम करने लगीं. पुलिस ने इस बारे में सब से पहले मरहूम मोइन खान की पत्नी निशात खान से उन के दिवंगत पति के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वह सन 1999 से एनडीएमसी में नौकरी कर रहे थे. वह वहां असिस्टैंट लीगल एडवाइजर थे. वर्तमान में वह कनाटप्लेस स्थित होटल कनाट के 140 करोड़ रुपए का केस देख रहे थे.

इस केस को निपटाने के लिए माननीय हाइकोर्ट ने उन के पति को एस्टेट औफिसर नियुक्त किया था. निशात खान ने पुलिस को यह भी बताया कि होटल कनाट के मालिक रमेश कक्कड़ ने फैसला अपने पक्ष में करने के लिए उन के पति को 3 करोड़ रुपए रिश्वत के रूप में देने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने उस की पेशकश ठुकरा दी थी.

निशात खान की बात सुनने के बाद होटल कनाट का मालिक रमेश कक्कड़ पुलिस के शक के दायरे में आ गया. रमेश कक्कड़ दक्षिणी दिल्ली के सफदरजंग डेवलपमेंट एरिया में रहता था. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. पुलिस की एक टीम मृतक मोइन खान के औफिस में काम करने वाले ऐसे लोगों से पूछताछ कर रही थी, जो उन के संपर्क में ज्यादा रहते थे.

जौहरी फार्म में जिस जगह पर मोइन खान को गोली मारी गई थी, पुलिस ने उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग देखी. एक कैमरे की रिकौर्डिंग में एक मोटरसाइकिल ऐसी दिखी, जो उन की गाड़ी का पीछा करती हुई जौहरी फार्म तक आई थी और घटना के बाद वहां से चली गई थी. उस मोटरसाइकिल का नंबर सीसीटीवी की फुटेज में साफ दिखाई दे रहा था. वह मोटरसाइकिल जामियानगर इलाके के ही चिराग नाम के युवक की थी.

पुलिस ने चिराग से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की मोटरसाइकिल बटला हाउस का रहने वाला उस का दोस्त बिलाल मांग कर ले गया था. चिराग को साथ ले कर पुलिस बिलाल के घर पहुंची, लेकिन वह घर पर नहीं मिला.

17 मई को एम्स में मोइन खान की लाश का पोस्टमार्टम होना था. चूंकि वह एक वकील थे, इसलिए सैकड़ों की संख्या में वकील और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग वहां इकट्ठा हो गए. सभी लोग आक्रोश में थे. वकीलों ने पुलिस को चेतावनी दी कि 2 दिनों के अंदर घटना का परदाफाश नहीं किया गया तो वे आंदोलन करेंगे. इस से पुलिस भी तनाव में थी. बहरहाल पुलिस ने उन सभी को जैसेतैसे समझाया.

पुलिस ने कनाट होटल के मालिक रमेश कक्कड़ के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि घटना वाले दिन और उस के बाद उस की रामफूल नाम के एक शख्स से कई बार बात हुई थी. रमेश कक्कड़ से रामफूल के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह उस का बौडीगार्ड है. पुलिस की सभी टीमें अलगअलग तरीके से केस को खोलने में लगी थीं. पुलिस पेशेवर शूटरों की भी धरपकड़ कर रही थी. उन से की गई पूछताछ में भी मोइन खान के हत्यारों का कोई क्लू नहीं मिल रहा था.

उसी दौरान जामियानगर क्षेत्र का रहने वाला एक बदमाश थानाप्रभारी मंगेश त्यागी के पास पहुंचा. अचानक उस बदमाश को अपने कक्ष में देख कर थानाप्रभारी चौंके. उन्होंने उस से थाने में आने की वजह पूछी तो वह बोला, ‘‘सर, मोइन खान की हत्या के बारे में रामफूल नाम के एक बाउंसर ने मुझ से बात की थी. चूंकि मोइन खान एक वकील के अलावा सरकारी अधिकारी थे, इसलिए मैं ने उन की हत्या की सुपारी लेने से मना कर दिया था. जब मुझे पता चला कि पुलिस इस केस के बारे में बदमाशों को उठा कर उन से पूछताछ कर रही है तो पिटाई से बचने के लिए मैं खुद ही थाने चला आया.’’

उस बदमाश ने रामफूल का नाम बताया था, जो रमेश कक्कड़ का बौडीगार्ड था. ये दोनों व्यक्ति संदेह के दायरे में पहले से ही थे. थानाप्रभारी मंगेश त्यागी ने इस महत्त्वपूर्ण सूचना के बारे में डीसीपी एम.एस. रंधावा को अवगत करा दिया. उन्होंने तुरंत रामफूल को उठाने के निर्देश दिए.

पुलिस रमेश कक्कड़ की निशानदेही पर रामफूल को उस के घर से थाने ले आई. रमेश कक्कड़ पहले से ही पुलिस की हिरासत में था. अपने मालिक को पुलिस कस्टडी में देख कर उस के होश उड़ गए. वह घबरा गया. उसे लगा कि रमेश कक्कड़ ने पुलिस को सब कुछ बता दिया होगा.

इसलिए पुलिस ने जब उस से मोइन खान की हत्या के बारे में पूछा तो पिटाई के डर से उस ने स्वीकार कर लिया कि मोइन खान की हत्या उस ने रमेश कक्कड़ के कहने पर भाड़े के हत्यारों से कराई थी. हत्या में जोजो लोग शामिल थे, उस ने उन के नाम भी बता दिए. हत्यारे कहीं फरार न हो जाएं, पुलिस टीमों ने उसी दिन संगम विहार क्षेत्र में तिगड़ी के रहने वाले इसराइल, जैतपुर के रहने वाले इसराइल के चचेरे भाई सलीम खान, बटला हाउस निवासी आमिर अल्वी और बटला हाउस के ही अनवर ओमैस को उन के ठिकानों से गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस के गले की फांस बने इस संवेदनशील केस के हल होने की जानकारी मिलते ही डीसीपी रंधावा, एडिशनल डीसीपी विजय कुमार भी थाना जामियानगर पहुंच गए. उन की मौजूदगी में थानाप्रभारी मंगेश त्यागी ने अभियुक्तों से पूछताछ की तो मोइन खान की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह होटल कनाट की लीज फाइल से जुड़ी पाई गई.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ के कस्बा कुंडा के रहने वाले मोइन खान ने एलएलबी की थी. उन्हें सन 1999 में नई दिल्ली नगर पालिका परिषद में असिस्टैंट लीगल एडवाइजर के पद पर नौकरी मिल गई थी. उन के परिवार में पत्नी निशात खान के अलावा 3 बेटियां थीं. अपने परिवार के साथ वह दक्षिणपूर्वी दिल्ली के जामियानगर थाने के अंतर्गत आने वाले जौहरीफार्म में रहते थे. नई दिल्ली नगर पालिका परिषद का होटल कनाट को ले कर रमेश कक्कड़ से विवाद चल रहा था. उस विवाद को एनडीएमसी की तरफ से मोहम्मद मोइन खान ही देख रहे थे.

दरअसल, एनडीएमसी ने दिल्ली के कनाटप्लेस क्षेत्र में चार सितारा होटल कनाट बनवाया था. करीब 15 साल पहले एनडीएमसी ने यह होटल रमेश कक्कड़ के पिता हरिराम कक्कड़ को लीज पर दे दिया था. लीज की शर्त यह थी कि होटल संचालक पूरी कमाई से 21 लाख रुपए सालाना एनडीएमसी को देगा और यदि होटल से सालाना कमाई तय रकम से ज्यादा होती है तो वह उस कमाई का 21 प्रतिशत एनडीएमसी में जमा करेगा.

यह होटल कनाटप्लेस इलाके में स्थित होने की वजह से काफी चलता था, इसलिए इस से जो कमाई होती थी, वह तय रकम से अधिक थी. बाद में इस होटल को हरिराम कक्कड़ के बेटे रमेश कक्कड़ ने संभाल लिया था.

लीज की शर्तों के मुताबिक होटल संचालक को इस की आमदनी का 21 प्रतिशत एनडीएमसी के खाते में जमा करना चाहिए था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. एनडीएमसी ने इस के लिए नोटिस भेजा, पर रमेश कक्कड़ ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. तब एनडीएमसी ने रमेश कक्कड़ पर 140 करोड़ रुपए की पेनल्टी लगाई और उस की लीज खत्म करने की काररवाई शुरू कर दी. यह बात सन 2003 की है.

रमेश किसी भी हाल में होटल को छोड़ना नहीं चाहता था, इसलिए वह कोर्ट चला गया. मगर कोर्ट में भी रमेश कक्कड़ को राहत नहीं मिली. निचली अदालत ने फैसला एनडीएमसी के पक्ष में दिया. इस फैसले के खिलाफ रमेश कक्कड़ दिल्ली हाइकोर्ट गया. कई सालों तक यह मामला दिल्ली हाइकोर्ट में चलता रहा. दिल्ली हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस जे.आर. मिधा ने 21 जुलाई, 2015 को एनडीएमसी को आदेश दिया कि इस मामले में जो भी और्डर करना है, वह 6 महीने के अंदर करे, जिस से केस को निपटाया जा सके.

इतना ही नहीं, इस केस में उचित निर्णय लेने के लिए असिस्टैंट लीगल एडवाइजर मोइन खान को एस्टेट औफिसर नियुक्त कर दिया. यह पद अहम माना जाता है. एस्टेट औफिसर नियुक्त होने के बाद मोइन खान के अधिकार क्षेत्र में वृद्धि हो गई. होटल कनाट की फाइल उन के पास थी ही. उन्होंने रमेश कक्कड़ को औफिस बुला कर उस का स्टेटमेंट लिया. इस के अलावा उन्होंने होटल कनाट के और भी कई कर्मचारियों से बात की.

जांच करने के बाद एस्टेट औफिसर मोइन खान ने 14 मई, 2016 को एक रिपोर्ट तैयार करनी थी. यह रिपोर्ट 17 मई, 2016 को दिल्ली उच्च न्यायालय में पेश करनी थी. रमेश कक्कड़ को पूरा विश्वास था कि मोइन खान ने जो रिपोर्ट तैयार की है, वह उस के खिलाफ ही जाएगी. और उस रिपोर्ट के आधार पर ही उच्च न्यायालय का फैसला भी उस के खिलाफ जाएगा. फैसला खिलाफ जाने की वजह से फोर स्टार होटल कनाट भी उस के हाथ से चला जाएगा. इस बात को ले कर वह परेशान रहने लगा.

रमेश कक्कड़ को परेशान देख कर उस के बौडीगार्ड रामफूल ने उस से परेशानी की वजह पूछी. रामफूल रमेश का विश्वासपात्र था. रमेश कक्कड़ का दिल्ली के ग्रेटर कैलाश पार्ट-1 में एक बार था, जो किसी वजह से 4-5 साल पहले बंद हो गया था. रामफूल उसी बार में बाउंसर था. बार बंद होने के बाद रमेश ने उसे अपना बौडीगार्ड बना लिया था.

रमेश ने रामफूल से कहा, तुम्हें तो पता ही है कि इस होटल का एनडीएमसी से केस चल रहा है और मोइन खान किसी भी तरह मेरी बात नहीं सुन रहा है. 17 मई को हाईकोर्ट में तारीख है. मुझे लगता है कि वह कोर्ट में हमारे खिलाफ ही जाएगा. मान लो, इस होटल से हमारा कौंट्रैक्ट निरस्त हो गया तो यह होटल तो हमारे हाथ से चला ही जाएगा, साथ ही तुम लोग भी बेरोजगार होे जाओगे. मैं चाहता हूं कि किसी भी तरह मोइन खान को कोर्ट जाने से रोका जाए.सर, आप बताइए कि इस में मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं. मैं आप के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं. रामफूल ने जोश में कहा.

मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास है, तभी तो मैं ने अपने मन की बात तुम से कह रहा हूं. रामफूल, इस मोइन खान ने मेरा जीना हराम कर रखा है. यह तो मुझे सड़क पर ला देगा. इसलिए मैं चाहता हूं कि इस का काम तमाम कर दिया जाए. तुम यह काम करा दो. इस में जो भी खर्च होगा, मैं दे दूंगा. रमेश कक्कड़ बोला. सर, आप चिंता न करें. मैं यह काम करा दूंगा. रामफूल ने रमेश को विश्वास दिलाया.

रामफूल ने यह काम कराने के लिए जामियानगर क्षेत्र के ही रहने वाले एक बदमाश से बात की. उस बदमाश को जब बताया गया कि मोइन खान नाम के जिस आदमी को ठिकाने लगाना है, वह वकील होने के साथसाथ एक सरकारी अफसर भी है तो उस बदमाश ने मोइन खान के नाम की सुपारी लेने से मना कर दिया.

रामफूल का एक दोस्त था इसराइल, जो उस के साथ रमेश के ही बार में बाउंसर था. वह संगम विहार के तिगड़ी में रहता था. रामफूल ने उस से बात की. इसराइल का एक चचेरा भाई था सलीम खान. वह दबंग था और बदरपुर के पास जैतपुर में रहता था. उस का जामियानगर इलाके में माइक्रोफाइनैंस का धंधा था. इसराइल ने सलीम से कहा कि वह ऐसे शूटरों का इंतजाम कर दे, जो आसानी से काम कर दें.

सलीम जामियानगर के ही रहने वाले आमिर अल्वी को जानता था. वह इलाके का बदमाश था. सलीम ने उस से बात की तो आमिर अल्वी ने अपने ही 2 चेलों बिलाल और अनवर ओमैस को टारगेट पूरा करने की जिम्मेदारी दे दी. ये दोनों बटला हाउस इलाके में ही रहते थे.

काम को कैसे अंजाम देना है, इस बारे में सभी ने बैठ कर योजना बनाई. रामफूल ने सभी साथियों को मोइन खान का घर और औफिस दोनों दिखा दिए. पता चला कि वह स्विफ्ट डिजायर कार नंबर डीएल2सी एपी4036 से औफिस जाते हैं. फिर सभी ने मोइन खान की रैकी कर के यह पता लगा लिया कि वह घर से औफिस के लिए कितने बजे निकलते हैं और औफिस से घर किनकिन रास्तों से हो कर जाते हैं. रैकी करने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि वे घटना को अंजाम ऐसी जगह पर देंगे, जहां से वे आसानी से भाग सकें.

उन्होंने मोइन खान के शाम को औफिस से घर लौटते समय मारने की योजना बनाई. 16 मई, 2016 को योजना के मुताबिक रामफूल, इसराइल मोइन खान के औफिस के पास चैरी कलर की वैगनआर कार नंबर डीएल6सी एन1764 में जा कर बैठ गए. यह कार रामफूल की थी. ये लोग मोइन खान के औफिस से निकलने का इंतजार करने लगे.

जैसे ही मोइन खान अपनी स्विफ्ट डिजायर कार ले कर औफिस से निकले, रामफूल और इसराइल उन का पीछा करने लगे. उधर अनवर ओमैस और बिलाल जामियानगर इलाके में एक निर्धारित स्थान पर मोटरसाइकिल लिए खड़े थे. मोटरसाइकिल बिलाल के दोस्त चिराग की थी. बिलाल उस से किसी काम के बहाने मोटरसाइकिल मांग कर लाया था. इसराइल की इन दोनों से फोन पर बात चल रही थी. इसराइल इन्हें फोन कर के जानकारी दे रहा था कि वे लोग अब कहां पहुंचे हैं.

मोइन खान इस बात से अनजान थे कि मौत उन का पीछा कर रही है. साजिशों से अनभिज्ञ रहते हुए वह अपने घर की तरफ चले आ रहे थे. तभी रास्ते में ही उन्हें ध्यान आया कि उन्हें अपनी पत्नी के लिए शुगर स्ट्रिप ले जानी हैं. उन की पत्नी निशात खान शुगर पेशेंट हैं. स्ट्रिप लाने के लिए उन्होंने अपनी कार सफदरजंग अस्पताल की तरफ मोड़ दी. उसी अस्पताल के बाहर उन के एक जानकार का मैडिकल स्टोर था.

कार सड़क किनारे खड़ी कर के वह उस मैडिकल स्टोर पर गए. उन का पीछा कर रहे रामफूल और इसराइल ने भी कुछ दूरी पर अपनी कार रोक दी. कार में ही बैठेबैठे वे उन पर निगाहें जमाए हुए थे. मोइन खान उस मैडिकल स्टोर वाले से काफी देर तक बातचीत करते रहे. यह देख इसराइल ने बिलाल को फोन कर के सफदरजंग अस्पताल आने को कहा. बिलाल अनवर ओमैस को ले कर सफदरजंग अस्पताल के पास चला गया. उस समय शाम के करीब 6 बज रहे थे.

कुछ देर बाद मोइन खान वहां से चले तो बिलाल और अनवर ने मोटरसाइकिल से उन की कार का पीछा करना शुरू कर दिया. जबकि रामफूल और इसराइल वहीं रह गए. मोटरसाइकिल बिलाल चला रहा था. बिलाल को रास्ते में काम को अंजाम देने का मौका नहीं मिला. वह उन की गाड़ी के पीछे लगा रहा.

जैसे ही मोइन खान जौहरी फार्म स्थित अपने घर के बाहर पहुंचे तो उन की गाड़ी के रुकते ही अनवर मोटरसाइकिल से उतर कर उन की कार के पास जा पहुंचा. उस ने जल्दी से अपने तमंचे की बट से कार का शीशा तोड़ कर मोइन खान को गोली मार दी. गोली उन के सीने पर लगी, जिस से कुछ ही देर में उन की मौत हो गई.

गोली मारने के बाद अनवर झट से बिलाल की मोटरसाइकिल पर बैठ गया और दोनों वहां से भाग गए. मोइन खान को ठिकाने लगाने की जानकारी बिलाल ने इसराइल को दे दी. इस के बाद इसराइल रामफूल के पास पहुंच गया. काम पूरा हो चुका था, इस के बदले में रमेश कक्कड़ से पैसे भी लेने थे. इसलिए रामफूल और इसराइल रमेश कक्कड़ के घर पहुंच गए. रमेश को जब पता चला कि रास्ते का कांटा हट गया है तो वह बहुत खुश हुआ. उस ने उसी समय 50 हजार रुपए रामफूल को देते हुए कहा कि बाकी के डेढ़ लाख रुपए 1-2 दिनों में दे देगा. उन 50 हजार रुपयों में से एक हजार रुपए रामफूल और इसराइल ने शराब आदि पर खर्च कर दिए. 49 हजार रुपए उस ने बिलाल और अनवर को दे दिए.

अभियुक्तों से पूछताछ के बाद पुलिस ने अनवर की निशानदेही पर बिलाल को भी गिरफ्तार कर लिया. सभी अभियुक्तों को 19 मई को साकेत कोर्ट में ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 2 दिनों का पुलिस रिमांड लिया गया. रिमांड अवधि में अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा, वैगनआर कार, मोटरसाइकिल, मोबाइल फोन और 49 हजार रुपए भी बरामद कर लिए गए. फिर अभियुक्तों को 21 मई को पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मृतक मोइन खान के घर जा कर उन की पत्नी निशात खान और बच्चों से मुलाकात कर घटना पर दुख जताया, साथ ही उन्हें एक करोड़ रुपए की सहायता राशि देने व उन के पति को शहीद का दरजा दिए जाने की घोषणा की. वहीं केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी उन्हें 25 लाख रुपए की सहायता राशि देने का ऐलान किया.

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद के भी 7 हजार कर्मचारियों ने मृतक के परिवार को एकएक दिन की सैलरी दी है. इतना ही नहीं, परिषद ने मृतक की पत्नी निशात खान को उन के पति के ग्रेड बी पर ही नौकरी देने का भरोसा दिया है, साथ ही उन्हें टाइप-3 का एक सरकारी आवास भी अलौट कर दिया है.

अब भले ही निशात खान के परिवार को कितना ही पैसा या सुविधाएं मिलें, पर इस से उन के पति वापस तो नहीं आ सकते. उन का तो घरौंदा उजड़ ही गया है. केस की तफ्तीश इंसपेक्टर सुहैब फारुखी कर रहे हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Triangle Murder : एक औरत के लिए

Love Triangle Murder: हरिओम शर्मा चाहते थे कि उन की प्रेमिका प्रेमा सिंह एक बार फिर उन के पास वापस आ जाए, लेकिन अब वह डा. रामावत को छोड़ने को तैयार नहीं थी. फलस्वरूप डा. रामावत मारे गए.

13 मई, 2016 रात के 9 बज चुके थे. पालम गांव दिल्ली के हीरो चौक स्थित रामावत डेंटल क्लीनिक के बाहर सन्नाटा पसर चुका था. उसी समय एक मोटरसाइकिल क्लिनिक के सामने आ कर रुकी. बाइक पर 2 लोग सवार थे. उन में से एक मोटरसाइकिल स्टार्ट किए उसी पर बैठा रहा, जबकि दूसरा उतर कर क्लिनिक के अंदर चला गया.

क्लिनिक में काम करने वाले कर्मचारी अपनेअपने घर जाने की तैयारी कर रहे थे. डा. भगवान सिंह रामावत भी घर जाने के लिए अपना बैग तैयार कर रहे थे. तभी मोटरसाइकिल से उतर कर आए व्यक्ति उन की केबिन में दाखिल हुआ. डा. रामावत उस से अपरिचित थे, इसलिए उन्होंने उसे घूरते हुए कहा, क्लिनिक बंद होने का वक्त हो गया है, आप सुबह 9 बजे आइए.

उन की बात सुन कर उस व्यक्ति के चेहरे पर पाशविकता झलकने लगी. उस ने होंठों पर धूर्त मुसकान ला कर अजीब से लहजे में कहा, अब आप को सुबह का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. मैं भी सुबह का इंतजार नहीं कर सकता. डाक्टर साहब, अब आप वहां जाने की तैयारी कर लीजिए, जहां से आए हैं.

यह क्या बकवास है. डा. रामावत ने थोड़े ऊंचे स्वर में कहा. मैं ने कहा न, सुबह आना. अभी क्लिनिक बंद हो रहा है. कुछ कहने के बजाय उस व्यक्ति ने जल्दी से देखी कट्टा निकाला और डा. रामावत पर तान दिया. एकाएक उस के हाथ में तमंचा देख कर डा. रामावत बुरी तरह डर गए. उस व्यक्ति ने ढीठता से कहा, मैं इलाज कराने नहीं, आप का काम तमाम करने आया हूं.

तुम्हारी मुझ से क्या दुश्मनी है, मुझे क्यों मारना चाहते हो? बुरी तरह खौफजदा डा. रामावत ने पूछा तो वह लापरवाही से बोला,हम लोगों की किसी से कोई दुश्मनी नहीं होती. इस के साथ ही उस ने निशाना साध कर फायर कर दिया. गोली डा. रामावत के गले में लगी. खून का फौव्वारा छूटा और रामावत फर्श पर गिर कर तड़पने लगे. कुछ देर तड़पने के बाद उन का शरीर शांत हो गया. इस के बाद युवक तमंचा अपनी जींस के पिछले हिस्से में खोंस कर बाहर चला गया. क्लिनिक में काम करने वाले तीनों कर्मचारी भयभीत खड़े रह गए.

वह व्यक्ति बड़े ही इत्मीनान से कांच का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया और बाहर स्टार्ट खड़ी मोटरसाइकिल पर जा बैठा. उस के बैठते ही मोटरसाइकिल तेज रफ्तार से आगे बढ़ गई. ‘रामावत डेंटल क्लिनिक’ में काम करने वाले एक कर्मचारी भूपेश ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के इस वारदात की सूचना दी. लगभग एक घंटे बाद बीट औफिसर एएसआई राजेंद्र सिंह 2 सिपाहियों के साथ जिप्सी से घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने मौकाएवारदात की स्थिति देखने के बाद उन्होंने इस घटना की सूचना पुलिस स्टेशन पालम विलेज को दे दी. थाना पालम विलेज के थानाप्रभारी अखिलेश मिश्रा पुलिस टीम के साथ करीब 11 बजे घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने घटनास्थल और डा. भगवान सिंह रामावत का निरीक्षण किया. उन्हें लगा कि डा. रामावत के शरीर में अभी जान है. उन्होंने तुरंत उन्हें दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल भिजवा दिया. लेकिन वहां के डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

यह घटना पालम गांव के हीरो चौक स्थित जैन भवन, मकान नंबर डब्ल्यू जेड 462 के ग्राउंड फ्लोर पर बने रामावत डेंटल क्लिनिक में घटी थी. डा. रामावत इसी मकान के फर्स्ट फ्लोर पर रहते थे. उन के साथ एक महिला रहती थी, जिस का नाम प्रेमा सिंह था. डा. रामावत की हत्या की खबर सुन कर उस मकान में रहने वाले अन्य किराएदार तो घटनास्थल पर आ गए थे, लेकिन प्रेमा सिंह नहीं आई थी.

अखिलेश मिश्रा ने एक सिपाही को इस निर्देश के साथ फर्स्ट फ्लोर पर भेजा कि वह प्रेमा सिंह को बुला लाए. सिपाही ने वापस आ कर बताया कि फर्स्ट फ्लोर पर कोई नहीं है. जबकि मकान में ताला भी नहीं लगा है. इस से अखिलेश मिश्रा को लगा कि डा. रामावत के मर्डर में प्रेमासिंह का किसी न किसी रूप में जरूर हाथ है. इसीलिए वह पुलिस के डर से भाग गई है.

बहरहाल, अखिलेश मिश्रा ने घटनास्थल की कानूनी काररवाई पूरी की और दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल जा कर डा. रामावत का शव सील मोहर करा कर पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल की मोर्चरी भिजवा दिया. जब इस मामले की जानकारी डीसीपी सुरेंद्र कुमार को मिली तो उन्होंने इस आपराधिक वारदात का खुलासा करने और हत्यारे को पकड़ने की जिम्मेदारी स्पेशल स्टाफ के एसीपी जगजीत सागवान को सौंप दी.

एसीपी जगजीत सागवान ने तत्काल एक जांच टीम गठित की, जिस में स्पैशल स्टाफ के इंसपेक्टर रमेश कुमार, संजीव कुमार, नवीन कुमार, एएसआई विजेंद्र, हैडकांस्टेबल जयवीर, ओम, पवन, कुलदीप, हंसकुमार, कांस्टेबल अशोक, राजेंद्र, अश्विनी तथा एटीओ वीएस गुलिया को शामिल किया गया. अखिलेश मिश्रा और महिला इंसपेक्टर मीना सिंह को स्पेशल स्टाफ की टीम की मदद करने को कहा गया. आननफानन में सभी लोग इस हत्याकांड की परतें उधेड़ने में लग गए.

पुलिस टीम ने सब से पहले प्रेमा सिंह की खोज की. उसे खोजने में पुलिस को कोई भागदौड़ नहीं करनी पड़ी. वह डा. भगवान सिंह के किराए के उसी फ्लैट में मिल गई. मिलने पर टीम ने उस से पूछा, डाक्टर की हत्या की खबर मिलते ही तुम भाग क्यों गई थीं? उस दिन मैं यहां थी ही नहीं. दरअसल 2007 में मेरा मेरे पति से तलाक हो गया था. कारण यह था कि मैं ब्यूटीपार्लर चलाती थी. पति को मेरा यह काम पसंद नहीं था. वह चाहते थे कि मैं हाउसवाइफ बन कर रहूं. प्रेमा सिंह ने कहा.

प्रेमा सिंह का जब पति से तलाक हुआ था. उस का 18 साल का एक बेटा और 16 साल की एक बेटी थी. दोनों बच्चे उस के पति के साथ ही रहते थे.  पति एयरफोर्स में था और पालम में ही एयरफोर्स कालोनी में रहता था. वह 10-15 दिनों में बच्चों से मिलने जाती रहती थी. वह उन्हें अपने साथ घुमाने भी ले जाती थी.

13 मई को भी वह बच्चों के साथ घूमने निकली थी. उसी बीच उस ने बच्चों के साथ लक्ष्मीनगर स्थित एक मौल में 6 से 9 बजे के शो में फिल्म जंगलबुक देखी थी. इस के बाद उस ने बच्चों को एक कैब में बैठा कर घर भेज दिया और खुद लक्ष्मीनगर में रहने वाली अपनी बहन के घर जा कर सो गई थी. अगले दिन सुबह वह लौटी तो उस ने डा. रामावत की हत्या की खबर सुनी. प्रेमा सिंह ने पुलिस को फिल्म के 3 टिकट भी दिखाए थे. पुलिस टीम उस के दोनों बच्चों से मिली तो उन्होंने भी यही बात बताई.

पुलिस ने लक्ष्मीनगर में रहने वाली प्रेमा सिंह की बहन तथा उस के परिवार से मिल कर पूछताछ की तो उन्होंने भी बताया कि 13 मई की रात प्रेमा सिंह उन्हीं के साथ थी और 14 मई की सुबह करीब 11 बजे नाश्ता कर के पालम गांव चली गई थी.

इन बातों से साफ हो गया कि डा. भगवान सिंह रामावत की हत्या में प्रेमा सिंह का हाथ नहीं था. प्रेमा सिंह ने यह बात भी खुल कर बता दी थी कि 55 वर्षीय डा. रामावत से उस के प्रेमिल संबंध थे. वही उस का सारा खर्च उठाते थे.

स्पैशल स्टाफ की टीम ने डा. रामावत और प्रेमा सिंह के मोबाइल फोन और जैन भवन में लगे सीसीटीवी की फुटेज भी खंगाला. लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ. टीम ने एक बार फिर प्रेमा सिंह से मिल कर पूछा कि क्या उसे किसी ऐसे शख्स की जानकारी है, जो किसी वजह से डा. रामावत से रंजिश रखता रहा हो.

कुछ देर सोचने के बाद प्रेमा सिंह ने कहा, डा. रामावत बहुत ही अच्छे इंसान थे. उन की किसी से कोई रंजिश नहीं थी. हां, हरिओम शर्मा उन से जरूर खार खाता था. उस ने एक बार मेरे सामने कहा था कि वह उस की जान ले लेगा, जो मेरी मदद कर रहा है. यह हरिओम शर्मा कौन है? प्रौपर्टी डीलर है. वह मुझ पर गंदी नीयत रखता था. मैं ने थाना सागरपुर में उस के खिलाफ जान से मारने की धमकी देने और छेड़छाड़ करने का केस भी दर्ज कराया था.

प्रेमा सिंह से हरिओम का पता ले कर पुलिस टीम ने पूछताछ के लिए उसे उस के औफिस से हिरासत में ले लिया. वह महावीर एन्क्लेव में रहता था और वहीं अपना प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस खोल रखा था. पुलिस टीम ने उस पर अंधेरे में तीर चला कर सच उगलवा लिया. टीम ने उस से कहा, तुम ने जिस डा. रामावत के मर्डर की सुपारी दी थी, वह तो बहुत ही फट्टू टाइप का निकला. दस डंडे भी नहीं झेल सका और सारी कहानी बक डाली.

यह सुनते ही हरिओम शर्मा सुबकने लगा. इस के बाद उस ने डा. रामावत की हत्या कराने की बात स्वीकार कर के सारी हकीकत बयान कर दी. 42 वर्षीया प्रेमा सिंह अपने पति रुद्रप्रताप के साथ एयरफोर्स कालोनी में रहती थी. उस का एक बेटा था और एक बेटी. प्रेमा सिंह ने एमए किया था. वह आधुनिकता के रंग में रंगी फैशनपरस्त, बिंदास महिला थी. उसे पुरुषों से दोस्ती करना और उन के साथ घूमनाफिरना अच्छा लगता था.

जबकि रुद्रप्रताप संस्कारी और धार्मिक प्रवृत्ति का था. उसे प्रेमा सिंह का आधुनिक व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं लगता था. ऊपर से प्रेमा ने महावीर एन्क्लेव में ब्यूटीपार्लर खोला हुआ था, जिसे ले कर रुद्रप्रताप से उस का अकसर झगड़ा होता रहता था. एक दिन दोनों में कहासुनी इस हद तक बढ़ी कि प्रेमा सिंह को घर छोड़ना पड़ा.

पति से अलग हो कर वह महावीर एन्क्लेव में किराए के मकान में रहने लगी. इस से नाराज हो कर रुद्रप्रताप ने कोर्ट में तलाक का मुकदमा दायर कर दिया. 3 सालों बाद दोनों का तलाक हो गया.

महावीर एन्क्लेव के जिस मकान में प्रेमा सिंह रहती थी, उसी मकान के सामने वाले मकान में 32 वर्षीय हरिओम शर्मा रहता था. वह प्रौपर्टी डीलर था और बड़े ठाठबाट से रहता था. प्रेमा सिंह हालांकि 2 बच्चों की मां थी, लेकिन अभी भी वह नवयौवना जैसी दिखती थी. उस के मांसल जिस्म को देख कर हरिओम शर्मा दीवाना हो गया.

एक दिन दोनों की मुलाकात हुई तो दोनों ही एकदूसरे के इतना करीब आ गए कि उन के बीच मधुर संबंध बन गए. अनुभवी प्रेमा सिंह की देह के कटाव देख कर हरिओम शर्मा पूरी तरह उस का मुरीद बन गया. वह प्रेमा पर अपनी दौलत लुटाने लगा. वह चाहता था कि प्रेम उसे अपनी खूबसूरत देह के समंदर में डुबो कर प्रेम रस पिलाती रहे. ऐसा ही हुआ भी. 2007 से 2013 तक दोनों के मधुर संबंध बने रहे.

इसी दौरान हरिओम शर्मा को अपने प्रौपर्टी डीलिंग के काम में लाखों का घाटा हो गया. थोड़ी तंगी आई तो प्रेमा ने भी उस से मुंह मोड़ लिया. उस ने डा. भगवान सिंह रामावत से मधुर संबंध बना लिए.

डा. रामावत के पिता नादर सिंह मकान नंबर 6-266 नसीरपुर, दिल्ली में सपरिवार रहते थे. नादर सिंह को जमीनदारी विरातस में मिली थी. इलाके में उन का काफी रुतबा था और वह इलाके के अमीर आदमियों में शुमार होते थे. डा. भगवान सिंह उन के एकलौते बेटे थे. नादर सिंह ने बेटे पर खूब खर्च किया, जिस के चलते भगवान सिंह डाक्टर बन गए. उन्होंने पालम गांव में अपना क्लिनिक खोल लिया.

प्रेमा सिंह से उन के नजदीकी रिश्ते बने तो उन्होंने उसे साथ रखने के लिए उसी मकान में एक हिस्सा किराए पर ले लिया, जिस में उन का क्लिनिक था.

जब हरिओम शर्मा को रामावत से प्रेमा के रिश्तों का पता चला तो वह अंदर ही अंदर झुलस उठा. वह प्रेमा सिंह से अपने 5 लाख रुपए मांगने लगा. इस पर प्रेमा सिंह ने उसे 5 लाख का चेक दे दिया, साथ ही थाना सागरपुर में हरिओम के खिलाफ छेड़छाड़ की रिपोर्ट लिखा दी. जमानत पर छूटने के बाद हरिओम ने प्रेमा सिंह का दिया चेक बैंक में डाला तो वह बाउंस हो गया. हरिओम ने प्रेमा सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

हरिओम शर्मा की पहली शादी सन 2010 में पलवल की शांति से हुई थी, दूसरी शादी वजीराबाद की रेनु से सन 2014 में हुई. देनों ही पत्नियां उसे छोड़ कर चली गई थीं. इस के पीछे प्रेमा सिंह का ही हाथ था. उस ने हरिओम की पत्नियों पर यह राज खोल दिया था कि हरिओम से उस के जिस्मानी रिश्ते हैं.

इस सब के बावजूद हरिओम चाहता था कि प्रेमा सिंह उसी की हो कर रहे. उस ने एक दिन उस से मिल कर इस बाबत बात की. लेकिन वह रामावत से अलग होने को राजी नहीं हुई. तो गुस्से में हरिओम ने कहा, तुम रामावत से अलग न हुई तो मैं रामावत को जान से मार दूंगा.

हरिओम को जब भी प्रेमा सिंह के साथ बिताए एकांत के वे क्षण याद आते तो वह तड़प उठता. वह अच्छी तरह समझ गया था कि जब तक रामावत जीवित रहेगा, प्रेमा सिंह उस के पास नहीं आएगी. इसलिए उस ने रामावत की हत्या करने का फैसला कर लिया. हरिओम ने इस बारे में अपने एक दोस्त विक्रांत से बात की. विक्रांत भी प्रौपर्टी डीलर था. रामावत की हत्या की सुपारी विक्रांत ने 2 लाख में फाइनल की. विक्रांत ने इस के लिए जलबोर्ड का टैंकर चलाने वाले अंगद कुमार से बात की.

अंगद ने अपने दोस्त सोनू को भी इस साजिश में शामिल कर लिया. सोनू और अंगद दोनों, मैनपुरी के रहने वाले थे. अंगद के कहने पर सोनू मैनपुरी से एक देसी कट्टा और 2 कारतूस खरीद लाया. दोनों ने पहले डा. रामावत की तथा उन के क्लिनिक की रेकी की. इस से उन्हें लगा कि वारदात अंजाम देने के लिए रात 9-10 बजे का समय उचित है. 13 मई की रात लगभग 9 बजे अंगद और सोनू हरिनगर से चुराई मोटरसाइकिल से डा. रामावत के क्लिनिक के बाहर जा पहुंचे. सोनू मोटरसाइकिल स्टार्ट किए क्लिनिक के बाहर ही खड़ा रहा, जबकि अंगद क्लिनिक में घुसा और रामावत को गोली मार कर बाहर आ गया. इस के बाद दोनों मोटरसाइकिल से फरार हो गए.

पुलिस ने हरिओम शर्मा की निशानदेही पर विक्रांत, अंगद व सोनू को गिरफ्तार कर लिया. अंगद ने हत्या में प्रयुक्त कट्टा अपने घर से तथा चोरी की मोटरसाइकिल मैनपुरी से बरामद करा दी. पुलिस ने हरिओम, विक्रांत, अंगद और सोनू के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 और 25 आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज कर अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. Love Triangle Murder

Love Crime Story : बेवफाई का ऐसा सिला

Love Crime Story . शिवप्रसाद सचमुच अर्शली को बहुत प्यार करता था. यही वजह थी कि उस ने उस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर दी थी. यही नहीं, अपनी सारी कमाई भी उस पर लुटा दी थी. इस के बावजूद जब अर्शली ने उस से किनारा कर लिया तो प्रेमिका की यह बेवफाई उस से बरदाश्त नहीं हुई और…

सपना 22 वर्षीया अर्शली लौरेंस उर्फ जैनी उर्फ छोटी को बेटी की तरह मानती थी. जब वह उसे 2 दिनों सेदिखाई नहीं दी तो उसे चिंता हुई. अर्शली की मां सोफिया भी नजर नहीं आ रही थी. उन के कमरे में बाहर से ताला बंद था. उन की स्कूटी भी गैलरी में नहीं थी. उन का फोन भी बंद था.

सपना की समझ में नहीं आ रहा था कि मांबेटी बिना बताए कहां चली गईं. जबकि इस से पहले वे जब भी कहीं बाहर जाती थीं, बता कर जाती थीं. यही नहीं, घर की चाबी दे कर सारी जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप जाती थीं.

सपना किन्नर थी और अपनी साथी बौबी के साथ सोफिया के मकान की पहली मंजिल पर किराए पर रहती थी. वह सुबह निकलती थी तो शाम को ही घर आती थी. 3 अप्रैल की दोपहर सपना घर से निकलने लगी तो सोफिया के कमरे से उसे दुर्गंध सी आती महसूस हुई. उस ने खिड़की के पास खड़ी हो कर लंबी सांस ली तो उसे लगा कमरे से मांस के सड़ने की दुर्गंध आ रही है.

उस की समझ में नहीं आया कि सोफिया के कमरे से इस तरह की दुर्गंध क्यों आ रही है? चूंकि मांबेटी 3 दिनों से गायब थीं, इसलिए सपना को किसी अनहोनी की आशंका हुई. इस के बाद उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया.

चूंकि यह इलाका थानाकोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने इस की सूचना थानाकोतवाली शाहपुर पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही कोतवाली  प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला एसआई विमलेंद्र कुमार, देवेंद्र कुमार सिंह, सिपाही मनीष सिंह, राजीव शुक्ला, रामविनय, रामनिहाल, संतोष कुमार और शिवानंद उपाध्याय को साथ ले कर बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा स्थित सोफिया लौरेंस के घर पहुंच गए.

चूंकि मोहल्ले वालों को अभी तक कुछ पता नहीं था, इसलिए एकाएक इतने पुलिस वालों को देख कर सब हैरान रह गए. सभी अपनेअपने घरों से निकल कर बाहर आ गए. सपना घर के बाहर ही खड़ी थी. पुलिस वालों ने उस से बात की तो उस ने जो आशंका व्यक्त की, सुन कर पुलिस वालों को भी किसी अनहोनी की आशंका हुई.

दरवाजे पर ताला लगा था. आनंद प्रकाश शुक्ला ने दरवाजा खोलने से पहले घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो थोड़ी ही देर में सीओ अभय कुमार मिश्र, एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, एसएसपी अनंतदेव के अलावा कई थानों के थानाप्रभारी भी पुलिस बल के साथ वहां आ गए. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आ गई थी.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सोफिया के कमरे के दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ कर दरवाजा खोला गया तो तेज दुर्गंध बाहर निकली. दरवाजे के पास खड़े पुलिस अधिकारी पीछे हट गए. थोड़ी देर में दुर्गंध थोड़ी कम हुई तो नाक पर रूमाल रख कर पुलिस अधिकारी कमरे में घुसे.

सामने ही बैड पर 2 महिलाओं की लाशें कंबल से ढकी पड़ी थीं. दोनों ही लाशें बुरी तरह से सड़ चुकी थीं. कमरे का सामान यथावत था. बिस्तर पर खून बहा था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों महिलाओं की हत्या की गई थी.

लाशें बुरी तरह सड़ चुकी थीं, इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हत्याएं कैसे की गई थीं. पूछने पर पता चला कि मरने वाली दोनों महिलाएं मांबेटी थीं. उस समय उन का वहां अपना कोई नहीं था. इसलिए पुलिस ने किराएदार सपना की उपस्थिति में घर की तलाशी ली.

घर के आंगन के एक कोने में शराब और बीयर की तमाम बोतलें पड़ी थीं. पूछने पर पता चला कि मांबेटी दोनों शराब और बीयर पीती थीं. चूंकि वे क्रिश्चियन थीं, इसलिए पुलिस के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पुलिस ने कमरे में मांबेटी के मोबाइल फोन तलाशे तो वे गायब मिले. इस के अलावा सपना ने बताया था कि उन की स्कूटी थी, जो गैलरी में खड़ी रहती थी, वह भी नहीं थी. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा दोनों के मोबाइल फोन के अलावा स्कूटी भी ले गया था.

फोरैंसिक टीम ने अपना काम निबटा लिया तो पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. उस समय वहां मृतका सोफिया और उस की बेटी अर्शली के बारे में बताने वाला उन का कोई नहीं था.

सोफिया की सास मरियम 3 महीने पहले बड़ी पोती एलिना की हत्या हो जाने के बाद अपनी बेटी सन्नो के पास जौनपुर चली गई थीं. इसलिए इन दोनों हत्याओं की रिपोर्ट किराएदार किन्नर सपना की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई.

मामला गंभीर था, इसलिए इस के खुलासे के लिए एसएसपी अनंतदेव ने अपने औफिस में एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, सीओ अभय कुमार मिश्र, कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला और क्राइम ब्रांच की एक मीटिंग बुलाई.

मीटिंग में उन्होंने हेमराज मीणा के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस ने सीओ अभय कुमार मिश्र की देखरेख में मामले की जांच शुरू की. जांच के लिए पुलिस टीम घटनास्थल पर दोबारा पहुंची तो पता चला कि मकान के भूतल पर सोफिया लौरेंस अपनी बेटी अर्शली के साथ रह रही थीं, जबकि पहली मंजिल के 2 कमरों में एक में किन्नर सपना और बौबी रहती थीं तो दूसरे कमरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी.

इन किराएदारों को सोफिया की सास मरियम लौरेंस ने रखा था. जबकि इस समय मरियम जौनपुर में अपनी बेटी सन्नो लौरेंस के पास थीं. यह भी पता चला कि मरियम लौरेंस की बड़ी पोती यानी मृतका सोफिया की बड़ी बेटी एलिना लौरेंस की 7-8 दिसंबर, 2015 की रात संदिग्ध परिस्थितियों में जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गई थी. वह मोहल्ले के ही अभिषेक मधई से 7 सालों से प्रेम करती आ रही थी.

अभिषेक भी उसे प्यार करता था. मरने से 3 महीने पहले वह अभिषेक के साथ लिवइन रिलेशन में रहने उस के घर चली गई थी. यह बात अभिषेक के पिता मोटीन मधई और मां अर्चना लौरेन को पसंद नहीं थी. इसलिए वे बेटे अभिषेक और एलिना को ताने मारते रहते थे.

7 दिसंबर, 2015 की रात अभिषेक और एलिना रात 9 बजे के करीब घर लौटे तो उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे शराब पिए हुए हैं. रात के 3 बजे के करीब अभिषेक के कमरे में किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई तो अर्चना की नींद टूट गई. भाग कर वह अभिषेक के कमरे में पहुंची तो वह बैड पर औंधे मुंह पड़ा उल्टियां कर रहा था, जबकि एलिना फर्श पर निढाल पड़ी थी. पूछने पर अभिषेक ने बताया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खा लिया है.

बेटे की बात सुन कर अर्चना बुरी तरह डर गईं. उस ने पति को जगा कर सारी बात बताई. पतिपत्नी ने तड़पती एलिना को वहीं छोड़ दिया और बेटे को ले कर अस्पताल चले गए. डाक्टरों ने अभिषेक को तो बचा लिया, लेकिन घर में पड़ी एलिना ने दम तोड़ दिया.

एलिना की मौत की खबर मरियम और सोफिया को मिली तो वे सन्न रह गईं. पोती की आकस्मिक मौत से मरियम लौरेंस को गहरा सदमा लगा. सोफिया और मरियम ने कोतवाली शाहपुर में मुकदमा दर्ज कराया कि अभिषेक के घर वालों ने एलिना की हत्या की है. मुकदमा दर्ज होने के बाद कोतवाली पुलिस ने एलिना की हत्या के जुर्म में अभिषेक को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

इस के बाद पुलिस यह पता लगाने लगी कि सोफिया के घर किनकिन लोगों का आनाजाना था. इसी बात की जानकारी जुटाने में पुलिस को पता चला कि मोहल्ले के रहने वाले मिंटू के दोस्त शिवप्रसाद का उस के घर काफी आनाजाना था. लोगों का यह भी कहना था कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे.

पुलिस ने मिंटू से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. हत्याएं उस ने की हैं या किसी और ने, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता. पुलिस मिंटू को साथ ले कर आम बाजार स्थित शिवप्रसाद के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया.

पुलिस वालों को देख कर जहां शिवप्रसाद के घर वाले हैरान थे, वहीं उस ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि आप लोग जल्दी ही मेरे घर आने वाले हैं. इसीलिए मैं घर छोड़ कर कहीं गया नहीं. क्योंकि अगर मैं घर छोड़ कर कहीं भाग जाता तो आप लोग मेरे घर वालों को परेशान करते. आप लोगों को बता दूं कि मैं ने ही सोफिया और अर्शली की हत्या की है.’’

शिवप्रसाद की बातें हैरान करने वाली थीं. पुलिस को लगा, कहीं यह पागल तो नहीं है. इसलिए उन्हें उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पुलिस को उस की बातों पर यकीन तब हुआ, जब उस ने अर्शली की स्कूटी, सोफिया तथा अर्शली के मोबाइल फोन और लोहे की वह रौड तथा धारधार रेडियम वाला चाकू बरामद करा दिया, जिस से अर्शली और सोफिया की हत्या की गई थी.

आम लोगों के लिए यह हैरान करने वाली ही बात थी. शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई कातिल घर में बैठ कर पुलिस के आने का इंतजार कर रहा था. आनंद प्रकाश शुक्ल शिवप्रसाद और बरामद सामान ले कर कोतवाली आ गए और हत्यारे की गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी.

अधिकारियों की उपस्थिति में शिवप्रसाद ने अर्शली और सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह प्रेम में धोखा खाने के बाद बदला लेने की कहानी थी.

अगले दिन 4 अप्रैल को एसएसपी अनंतदेव ने पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में पत्रकारवार्ता आयोजित कर शिवप्रसाद को पत्रकारों के सामने पेश किया तो प्रेमिका की बेवफाई की जो कहानी उस ने पुलिस को बताई थी, वही कहानी पत्रकारों को भी सुना दी. सीधेसादे शिवप्रसाद ने हालात और परिस्थितियों के हाथों मजबूर हो कर प्रेमिका अर्शली और उस की मां सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की थानाकोतवाली शाहपुर के बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा में ज्यादातर ईसाई रहते हैं. इसी मोहल्ले में मरियम लौरेंस भी रहती थी. उन की 2 संतानें थीं, बेटा एलिसिएंस लौरेंस उर्फ पन्नो तथा बेटी सन्नो. मरियम लौरेंस रेलवे अस्पताल में नर्स थीं. उन के पति की बहुत पहले मौत हो चुकी थी. पति की मौत के बाद उन्होंने ही बेटे और बेटी को पालपोस कर बड़ा किया था.

पन्नो बड़ा हुआ और उस में दुनियादारी की समझ आई तो उस ने परिवार का सहारा बनना चाहा. मरियम ने अपनी मेहनत की बदौलत काफी चलअचल संपत्ति जुटा रखी थी. पन्नो ने नौकरी करने के बजाय घर के सामने पड़ी अपनी खाली जमीन पर आटा चक्की लगा ली. उस की मेहनत रंग लाई और उस की आटा चक्की चल निकली.

लेकिन जब पन्नो के पास पैसे आए तो एकाएक उस के दोस्तों की संख्या बढ़ गई. इन्हीं दोस्तों की वजह से उसे शराब पीने की बुरी लत लग गई. जब इस की जानकारी मरियम को हुई तो बेटे को लाइन पर लाने के लिए उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी. पर पन्नो पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ. धीरेधीरे पन्नो की लत बढ़ती गई और उस की आटा चक्की की सारी कमाई शराब में उड़ने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि आटा चक्की बंद हो गई.

मरियम बेटे की आदत से परेशान रहने लगी थीं. उसे सुधारने की उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. आखिर में उन्हें एक रास्ता उस की शादी कर देना नजर आया. मरियम ने खूब सोचसमझ कर उस की शादी सोफिया लौरेंस से कर दी. इस के बाद बेटी सन्नो की शादी जौनपुर में कर के वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं.

शादी के बाद पन्नो पर गृहस्थी का बोझ पड़ा तो उस ने आटा चक्की की जगह जनरल स्टोर खोल लिया. उस की दुकान चल निकली और ठीकठाक कमाई होने लगी. पन्नो को सोफिया से 2 बेटियां हुई एलिना और अर्शली. इस तरह भरापूरा परिवार हो गया. पोतियों के साथ मरियम का भी समय आराम से कटने लगा.

चूंकि एलिना पहली संतान थी, इसलिए मरियम उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करती थीं. अर्शली छोटी थी, इसलिए वह मांबाप को ज्यादा प्यारी थी. वे उसे प्यार से जैनी कहते थे. एलिना और अर्शली बड़ी हुईं तो उन की खूबसूरती में निखार आ गया. दोनों बहनें थीं भी बला की खूबसूरत. पन्नो की बेटियां बड़ी हो रही थीं, जिस से घर का खर्च बढ़ रहा था, लेकिन उस की कमाई घटती जा रही थी.

इस की सब से बड़ी वजह थी पन्नो की शराब पीने की आदत. अब तो उस के साथ सोफिया भी बीयर पीने लगी थी. रोजाना शाम को पतिपत्नी शराब और बीयर की बोतलें ले कर बैठ जाते, इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे दुकान की पूजी शराब में उड़ती गई.

मरियम पोतियों का वास्ता दे कर बेटेबहू को समझातीं तो वे उन की बात समझने के बजाय डांट कर उन्हें ही चुप करा देते. जब उन्होंने देखा कि उन की बातों का बेटे और बहू पर कोई असर नहीं हो रहा है तो चुप रहने में ही वह अपनी भलाई समझने लगीं. बेटेबहू के व्यवहार से वह बहुत दुखी रहती थीं.

पन्नो की कमाई का एक मात्र जरिया दुकान थी. धीरेधीरे दुकान खाली हो गई. इस तरह कमाई का रास्ता बंद हो गया. बेटियां बड़ी हो रही थीं, उन के भी खर्चे थे. पन्नो और सोफिया को चिंता सताने लगी कि परिवार का खर्च कैसे चलेगा. सोचविचार कर पन्नो ने एक औटो खरीद लिया और उसे चलाने लगा.

उसी बीच एलिना अपने घर के पीछे रहने वाले अभिषेक मधई को दिल दे बैठी. उस समय एलिना 17 साल की थी. दोनों छिपछिप कर मिलने लगे. उन के इस प्यार की जानकारी सिर्फ अर्शली को थी. सोफिया के मकान के बगल में मिंटू रहता था. चूंकि मिंटू सोफिया का पड़ोसी था, इसलिए वह उस के घर भी आताजाता था. मिंटू का दोस्त था शिवप्रसाद, जो कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आने वाले आम बाजार के रहने वाले रामप्रसाद का बेटा था.

रामप्रसाद रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, लेकिन नौकरी से रिटायर हो चुके थे, इसलिए घर खर्च चलाने के लिए शिवप्रसाद औटो चलाता था. उस के परिवार में पिता और 2 बहनें थीं.

मिंटू के यहां आनेजाने में शिवप्रसाद की नजर खूबसूरत अर्शली पर पड़ी तो वह उसे भा गई. उस ने उस के बारे में मिंटू से पूछा तो उस ने उस के बारे में उसे सब कुछ बता दिया. अर्शली शिवप्रसाद को इतनी पसंद आ गई कि ईसाई होने के बावजूद वह उसे दिल दे बैठा.

मिंटू के जरिए दोनों का परिचय हुआ तो जल्दी ही उन में दोस्ती हो गई. उन की यह दोस्ती प्यार में बदली तो उन का यह प्यार जुनूनी हो गया. हालत यह हो गई कि दोनों ही रातदिन एकदूसरे के खयालों में खोए रहने लगे. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

उसी बीच सोफिया पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. शराब पीने से खोखले हो चुके पन्नो की अचानक मौत हो गई. पति की मौत से जहां सोफिया टूट गई, वहीं अर्शली को भी पिता की मौत का गहरा सदमा लगा था. लेकिन दुख की इस घड़ी में शिवप्रसाद साया की तरह हर घड़ी उस के साथ खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि हर तरह से उस की मदद भी की.

उन्हीं दिनों शिवप्रसाद का मकान बन रहा था. उस के पिता रामप्रसाद ने मकान बनवाने के लिए उसे ढाई लाख रुपए दिए थे. अर्शली के प्यार में पागल शिवप्रसाद ने सारे रुपए उस पर लुटा दिए. इन पैसों को ले कर बापबेटे में खूब झगड़ा भी हुआ, लेकिन रामप्रसाद कर ही क्या सकते थे. एकलौती औलाद थी, घर से भी तो नहीं निकाल सकते थे.

शिवप्रसाद औटो से जो कमाता था, अर्शली पर खर्च करता था. पिता की मौत के बाद अर्शली की पढ़ाई छूट गई थी. शिवप्रसाद ने उस का दाखिला कराया, इस साल उस ने 12वीं की परीक्षा दी थी, परीक्षा का परिणाम अभी आया नहीं था.

पन्नो की मौत के बाद कमाई का कोई जरिया नहीं रहा तो मरियम ने अपने मकान की पहली मंजिल पर बने 2 कमरों को किराए पर उठा दिया, जिस से सोफिया और अर्शली का खर्च निकल सके. एक कमरे में किन्नर सपना और बौबी रहती थी, जबकि दूसरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी. इसी किराए और मरियम की पेंशन से घर का खर्च चल रहा था.

एलिना और अभिषेक का प्रेमप्रसंग पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया था. इस की वजह यह थी कि बिना ब्याह के ही एलिना प्रेमी के घर रहने चली गई थी, लेकिन 3 महीने बाद ही प्रेमी के घर जहर खाने से एलिना की मौत हो गई. सोफिया ने बेटी की हत्या का आरोप लगा कर अभिषेक को जेल भिजवा दिया.

एलिना की मौत से मरियम को ऐसा आघात लगा कि वह बीमार रहने लगीं. उन की हालत दिन पर दिन बिगड़ती गई तो मां की हालत देख कर सन्नो उन्हें अपने साथ जौनपुर ले गई. मरियम के जाने के बाद घर में सोफिया और अर्शली ही रह गईं.

सोफिया को अर्शली और शिवप्रसाद के रिश्ते की जानकारी थी. एलिना की मौत के बाद वह डर गई कि अर्शली के साथ भी कहीं वैसा ही हो गया तो उस का एकमात्र सहारा छिन जाएगा. इस के बाद उस ने एलिना का उदाहरण दे कर अर्शली को समझा कर कहा कि अब उस की शादी उस के पसंद के लड़के के साथ होगी.

अर्शली ने मां की भावना का आदर करते हुए वादा किया कि अब वह उन की मर्जी के खिलाफ कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें परेशानी हो. मां से किए वादे के अनुसार अर्शली ने शिवप्रसाद से अचानक बातचीत बंद कर दी.

उस ने उस से कह भी दिया कि वह उस का पीछा करना छोड़ दे. अगर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा तो वह उस की शिकायत पुलिस से कर देगी. अब वह वहीं शादी करेगी, जहां मां कहेंगी.

अचानक अर्शली में आए इस बदलाव से शिवप्रसाद हैरान रह गया. उस की समझ में नहीं आया कि अर्शली ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया? वह जब भी उस से बात करने की कोशिश करता, अर्शली पुलिस की धमकी दे कर उसे चुप करा देती. अर्शली की यह बेवफाई शिवप्रसाद को शूल बन कर चुभने लगी.

शिवप्रसाद ने अर्शली से प्यार ही नहीं किया था, बल्कि उस पर लाखों रुपए खर्च भी किए थे. एक तरह से उस ने अर्शली के लिए खुद को बरबाद कर लिया था.

घरपरिवार से उस के लिए बगावत की थी. ऐसे में भला वह कैसे चाहता कि अर्शली किसी और की हो जाए. शायद यही सोच कर शिवप्रसाद ने तय कर लिया कि अर्शली अगर उस की नहीं तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. सोफिया ने अर्शली को उस से दूर किया था, इसलिए शिवप्रसाद की नजरों में असली गुनहगार वही थी.

अर्शली को पाने के लिए शिवप्रसाद पागल था. एक दिन वह बहुत बेचैन हुआ तो ‘रौकी हैंडसम’ फिल्म देखने चला गया. फिल्म में हत्या का एक सीन दिखाया गया था, जिस में रेडियम (चमकदार) चाकू से अंधेरे में हत्या की गई थी. फिर क्या था, शिवप्रसाद ने उसी वक्त तय कर लिया था कि उसे क्या करना है.

उस रात वह बिना कुछ खाएपिए ही सो गया. अगले दिन वह कोतवाली शाहपुर के असुरन चौक की एक दुकान से रेडियम वाला चाकू खरीद लाया. 29 मार्च की रात 11 बजे वह अर्शली के घर के पिछवाड़े से छत पर जा कर छिप गया. चूंकि तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए उसे छत पर चढ़ते किसी ने नहीं देखा था.

सोफिया और अर्शली रात में सोने से पहले बीयर पीती थीं. उस रात भी मांबेटी ने बीयर पी और खाना खा कर एक ही बैड पर सो गईं. यह बात शिवप्रसाद को पता थी. शिवप्रसाद रात गहराने की प्रतीक्षा करता रहा. रात 3 बजे वह दबे पांव सीढि़यों से नीचे उतरा और सीधे सोफिया के कमरे में जा पहुंचा.

मांबेटी को एक ही बैड पर सोई देख कर उस ने कमरे के एक कोने में रखी लोहे की रौड उठाई और सोफिया के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. सोफिया चीखी तो अर्शली उठ कर बैठ गई और चिल्लाने लगी. शिवप्रसाद डर गया और उस ने अपने बचाव के लिए चाकू से अर्शली के पेट में ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

अर्शली तड़पने लगी तो उस ने खून सने हाथों से उस का गला दबा दिया. मांबेटी मर चुकीं थीं. उन के ऊपर कंबल डाल कर उस ने बैड पर रखे दोनों के मोबाइल फोन उठा कर जेब में डाल लिए.

शिवप्रसाद ने गैलरी में रखी स्कूटी बाहर निकाली और दरवाजे पर ताला बंद कर के उसी स्कूटी से अपने घर चला गया. वह करीब 4 बजे अपने घर पहुंचा और इत्मीनान से सो गया. वह सुबह उठा तो भी घर छोड़ कर कहीं नहीं गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शिवप्रसाद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस तरह पुलिस ने 12 घंटे में ही हत्यारोपी शिवप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया था. इस के लिए एसएसपी अनंतदेव ने शिवप्रसाद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

शिवप्रसाद ने जो किया, शायद अब उसे पछतावा हो रहा होगा. लेकिन अब वह कर ही क्या सकता है. उस की अब बाकी की जिंदगी तो जेल में ही बीतनी है. दुख की बात तो यह है कि सोफिया और अर्शली का अंतिम संस्कार भी करने वाला कोई नहीं था. उन का अंतिम संस्कार पुलिस ने किया था. Love Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : कातिल की बेसब्री

Love Crime: सविता का पति देहसुख देने लायक तो था नहीं, जो कमाता था उसे भी शराब में उड़ा देता था. सविता भला ऐसे पति का क्या करती, जो उस की भी कमाई छीन लेता था. 

घनश्याम गोलपानी ऐसे लोगों में था, जिन के लिए जिंदगी का कोई खास मकसद नहीं होता. ऐसे लोग उतना ही कमाते हैं, जितने में उन की जरूरतें पूरी हो जाएं. अगर पैसा ज्यादा आ गया तो वे उसे नशापत्ती या फिजूलखर्ची में उड़ा देते हैं. 38 साल का घनश्याम भोपाल के गौतमनगर के नारियलखेड़ा में चाय का ठेला लगाता था, जिस से वह 2-3 सौ रुपए रोज कमा लेता था. लेकिन इस में से वह पत्नी को एक भी पैसा घर खर्च के लिए नहीं देता था.

आमतौर पर रोज कमानेखाने वालों को शाम को काम खत्म होने के बाद घर पहुंचने की जल्दी होती है, लेकिन घनश्याम इस का अपवाद था. वजह यह थी कि उसे अपनी खूबसूरत जवान बीवी से कोई खास मतलब नहीं था. दरअसल उस में कमी यह थी कि वह पत्नी को जिस्मानी सुख नहीं दे पाता था. शादी हुए 10 साल से ज्यादा बीत जाने के बाद भी वह पत्नी को संतानसुख नहीं दे सका था. इस की वजह थी उस का नपुंसक होना. इस पर अगर पति का साथ और प्यार न मिले तो पत्नी को तकलीफ होगी ही, यही हाल सविता का भी था.

पिछले कुछ दिनों से घनश्याम ने घर में पैसे देने बिलकुल बंद कर दिए थे. पति से पैसा न मिलने पर घर चलाने के लिए सविता को खुद मेहनतमजदूरी करनी पड़ रही थी. पहले उस ने पापड़ और बड़ी बेचनी शुरू की, इस में आमदनी भले कम हो रही थी, लेकिन उस का काम चल रहा था. उसे परेशानी तब होने लगी, जब उस की इस कमाई पर भी घनश्याम की बुरी नजर पड़ने लगी.

सविता की कमजोरी का फायदा उठा कर घनश्याम उस से पैसे छीन लेता. पति की इस हरकत पर सविता का तिलमिलाना स्वाभाविक था. उस ने विरोध किया तो घनश्याम ने उस के साथ मारपीट शुरू कर दी. बच्चों की किलकारियां और घरगृहस्थी के दूसरे सुखचैन तो नसीब में थे नहीं, उस पर पति का यह बरताव, भला सविता कैसे बरदाश्त करती?

इस पर रात को शरीर की मांगें सिर उठातीं तो वह बेचैनी से करवटें बदलने लगती. खर्राटे मारते चैन की नींद सो रहे घनश्याम की तरफ देखती तो उसे उस हालत में देख कर वह खीझ उठती. कभी उस पर दया भी आती कि जब कमजोरी कुदरती है तो इस में इस का क्या दोष. पता चला कि शादी के बाद सिर्फ एक बार ही घनश्याम उस से शारीरिक संबंध बना पाया था.

लेकिन इधर घनश्याम बेलगाम हो कर पूरी तरह से अपनी पर उतारु हो चुका था. कुछ दिनों पहले ही उस ने पैसों के लिए 6 हजार रुपए में अपना स्कूटर बेच दिया था. पति की हरकतों से सविता को जो जिंदगी अब तक भार लग रही थी, वह बेकार लगने लगी थी. वह दिन भर मेहनत करे, पैसे कमाए, घर चलाए और जब मन हो, निकम्मा मारपीट कर छुड़ा ले, बातबात में जलील करे. आखिर उस के होने, न होने से फायदा क्या?

यह सोच कर सविता का सिर चकराने लगता. पति सुख और औलाद नहीं दे सकता, यहां तक तो उस ने समझौता कर लिया था, लेकिन रोजरोज की कलह और मारपीट से वह तंग आ चुकी थी. ऐसे वह क्या करे, उस की समझ नहीं आ रहा था. लेकिन कुछ दिनों की कशमकश के बाद उस की समझ में जो आया, वह बेहद खतरनाक था. सविता को विश्वास हो गया था कि अब घनश्याम रास्ते पर आने वाला नहीं है. लिहाजा उस से छुटकारा पाने से बेहतर रास्ता कोई दूसरा नहीं है. उसे रास्ते से हटा देना ही उस के लिए अच्छा है.

इस के लिए उस ने सहारा लिया रविशंकर का. उस से उस की जानपहचान पहले से थी. सविता की यह दूसरी शादी थी, जिस से वह घनश्याम का एहसान मानते हुए 14 सालों तक उस से दबी रही. लेकिन अब उसे लगने लगा था कि अपने किए एहसान की कीमत वह वसूल चुका है, इसलिए उस ने रवि की तरफ प्यार की पींगे बढ़ाना शुरू कर दिया था.

कमानेखाने, लालच और निठल्लेपन के मामले में रवि घनश्याम से भी 2 कदम आगे था. सविता यह बात जानती थी, इसीलिए उस ने उसे दाना डालना शुरू किया था. बैरसिया के नजदीक बड़ौरी गांव का रहने वाला रवि मजदूरी करता था. मजदूरी की ही वजह से वह भोपाल आताजाता था. नारियलखेड़ा में मजदूरी करने के दौरान ही उस की जानपहचान सविता से हुई थी.

पापड़बड़ी के साथसाथ सविता कभीकभी गैस सिलेंडर की कालाबाजारी भी कर लेती थी, इस में एक सिलेंडर पर उसे ढाई, 3 सौ रुपए मिल जाते थे. लेकिन यह काम वह छोटे स्तर पर बहुत एहतियात बरतते हुए करती थी. क्योंकि डर लगता था कि कहीं वह पकड़ी न जाए.

कल तक कामचलाऊ बातचीत कर के टरका देने वाली खूबसूरत सविता अचानक उस पर क्यों मेहरबान हो रही है, यह बात रवि एकदम से समझ नहीं सका. लेकिन जब एक दिन सविता ने उसे प्यार से समझाया तो वह पशोपेश में पड़ गया कि क्या करे? एक तरफ पकड़े जाने का डर था तो दूसरी तरफ सविता के हुस्न के साथसाथ एक लाख रुपए नकद का लालच भी था.

सविता ने उस से साफ कहा था कि अगर वह घनश्याम की हत्या में उस का साथ देता है तो उस का शरीर तो हमेशाहमेशा के लिए उस का हो ही जाएगा, उस ने एक लाख रुपए जो बचा रखे हैं, वे भी उसे मिल जाएंगे. यह एक तरह से तन और धन की सुपारी थी. कुछ दिनों तक तो रवि सोचता रहा. लेकिन देह और एक लाख रुपए के लालच ने उसे डिगा दिया. रवि को पूरी तरह से वश में करने के लिए सविता ने उसे एकाध बार शारीरिक सुख भी दे दिया. जिस से रवि की भूख और भड़क उठी. लेकिन अब इसे बुझाने की शर्त घनश्याम का कत्ल था, जिसे वह करने को तैयार हो गया था. इस के बाद दोनों ने 27 मार्च को इस काम को अंजाम देने की योजना बना डाली.

दूसरी ओर दुनियाजहान से बेपरवाह और घरगृहस्थी से लापरवाह घनश्याम को भनक तक नहीं लगी कि सविता ने खुद को विधवा करने का इंतजाम कर लिया है. सविता की समझ में आ गया था कि इस दुनिया में अब उस का कोई नहीं है. अगर वह घनश्याम को छोड़ती तो लोग उसे ही दोष देते कि खोट उसी में है, जबकि ऐसा करने और कहने वाले लोग उस के लिए कुछ नहीं कर रहे थे. ऐसा नहीं था कि इस बात पर सविता ने गौर नहीं किया था. उस ने देखा था कि लोग कुछ करने के बजाय उस की बरबादी और बेचारगी का तमाशा भर देख रहे थे. गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता और जो होते हैं, वे दूर से ही दुआसलाम कर के चले जाते हैं.

खुदगर्ज और मतलबपरस्त दुनिया का असली रूप देख चुकी सविता का झुकाव अगर छोटी जाति के रवि की तरफ हुआ था तो शायद इस की एक वजह उस का यह सोचना भी था कि रवि भले ही घनश्याम की तरह निकम्मा सही, पर नामर्द तो नहीं है. अगर घर में बैठा कर कमा कर ही उसे खिलाना है तो घनश्याम से रवि लाख अच्छा है, जो उसे कम से कम शारीरिक सुख तो देगा. और रही बात बातें करने वालों की तो उन की परवाह करने से अब कोई फायदा नहीं है.

27 मार्च की शाम सविता ने घनश्याम से कहा कि उस का एक जानपहचान वाला बैरसिया में एक लाख रुपए उधार दिलवाने को तैयार है.  पैसों के चक्कर में घनश्याम बगैर सोचेसमझे पत्नी के साथ चलने को तैयार हो गया. निकम्मों पर लालच कितना भारी पड़ता है, यह अंदाजा इन दोनों मर्दों की सोच से आसानी से लगाया जा सकता कि पैसों के लिए एक मरने को तो दूसरा मारने को तैयार था.

सविता और घनश्याम अगले दिन बैरसिया के लिए स्कूटर से निकले तो भोपाल के ही लांबाखेड़ा में तय योजना के मुताबिक उन्हें रवि मिल गया. सविता ने घनश्याम से कहा कि यही वह जानपहचान वाला है, जो हमें पैसे दिलाने ले जा रहा है. घनश्याम ने रवि को भी स्कूटर पर बैठा लिया. इस के बाद तीनों बैरसिया की ओर चल पड़े.

भोपाल और बैरसिया के बीच घने जंगलों की भरमार है और उजाड़ पड़ी जमीनों की भी कमी नहीं है. रात 8 बजे के लगभग जब ये लोग हर्राखेड़ा गांव पहुंचे तो पुराना स्कूटर दगा दे गया. स्कूटर भले ही खराब हो गया, लेकिन सविता और रवि ने अपनी योजना नहीं खराब होने दी. लांबाखेड़ा में इन से मिलने से पहले रवि ने नायलौन की रस्सी खरीद कर जेब में रख ली थी.

स्कूटर किनारे खड़ा कर के सविता और रवि घनश्याम को बातों में लगा कर पैदल ही चलने लगे. उसी दौरान सुनसान जगह देख कर दोनों ने घनश्याम को पकड़ लिया. रवि ने पीछे से उस के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कसा तो घनश्याम ने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन सविता ने उस के पांव पकड़ लिए तो वह बेबस हो गया. इस के बाद रवि ने फंदा कसा तो कुछ देर छटपटा कर घनश्याम ने दम तोड़ दिया.

पति की हत्या इतनी आसानी से हो जाएगी, सविता को भरोसा नहीं था. काम हो गया तो दोनों ने लाश को घसीट कर झाडि़यों में छिपा दिया, जिस से आनेजाने वालों की नजर जल्दी से उस पर न पड़े. सविता को अंदाजा था कि जल्दी किसी की नजर घनश्याम की लाश पर नहीं पड़ेगी. इस बीच वह सड़ जाएगी या जंगली जानवर और चीलकौवे खा जाएंगे. अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरतते हुए उस ने भोपाल लौट कर थाना गौतमनगर में पति की गुमशुदगी दर्ज करा दी, जिस से अगर लाश मिल भी जाए तो कोई उस पर शक न करे और पुलिस हत्यारे को ढूंढती रह जाए.

30 मार्च की सुबह बैरसिया के थाना गुनगा की पुलिस चौकी इमला के चौकीइंचार्ज रमेश शर्मा को किसी अज्ञात व्यक्ति ने केशुखेड़ी गांव के पास झाडि़यों में एक लाश पड़ी होने की सूचना दी. घटनास्थल के लिए रवाना होने से पहले रमेश शर्मा ने इस की सूचना थानाप्रभारी नरेंद्र कुलस्ते और बैरसिया की एसडीओपी सुश्री बीना सिंह को दे दी थी.

पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो लाश सड़ने लगी थी. लेकिन इतनी भी नहीं सड़ी थी कि उस की शिनाख्त न हो सके. फिर भी दिक्कत यह थी कि लाश मिलने की खबर से आसपास के गांवों के लोग बड़ी संख्या में जुट तो गए थे, पर कोई लाश की शिनाख्त नहीं कर सका था. इस से अंदाजा लगाया गया कि मृतक इस इलाके का नहीं था. उसे यहां ला कर उस की हत्या की गई थी या फिर हत्या कहीं और कर के लाश को यहां ला कर फेंकी गई थी.

लाश की पहचान नहीं हो सकी और घटनास्थल पर किसी तरह का कोई सबूत नहीं मिला तो पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने की तैयारी करने लगी. तभी एकाएक एक महिला भीड़ को चीरती हुई आई और लाश को देख कर कहने लगी कि यह तो उस के पति की लाश है, जिस की गुमशुदगी उस ने 3 दिन पहले भोपाल के थाना गौतमनगर में दर्ज करा रखी है.

शव की शिनाख्त हो जाने से पुलिस की सिरदर्दी थोड़ी कम हो गई. हत्यारा कौन है, यह पहेली अभी नहीं सुलझी थी. एसडीओपी बीना सिंह ने अपनी नौकरी के दौरान ऐसे दर्जनों मामले देखे थे. इसलिए उन का शक सविता पर ही गया. इस की वजह यह थी कि सविता किस जादू के जोर से घटनास्थल पर पहुंच गई थी. सब्र से काम लेते हुए उन्होंने घनश्याम की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर रिपोर्ट का इंतजार करना बेहतर समझा.

शुरुआती पूछताछ में सविता ने बताया था कि एक बाबा ने उसे बताया था कि उस का पति पूर्व दिशा की ओर हो सकता है, इसलिए वह घनश्याम को ढूंढ़तेढूंढ़ते यहां तक चली आई थी. यहां स्कूटर खड़ा देख कर वह उसे ढूंढ़ने लगी. तभी उसे पता चला कि यहां घनश्याम नहीं, उस की लाश है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि घनश्याम की मौत गला घोंटने से हुई थी. इस के बाद बीना सिंह ने सविता से पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की तो वह उम्मीद से कम वक्त में ही टूट गई. इस के बाद उस ने सारी कहानी उगल दी. रवि को पकड़ने में भी पुलिस वालों को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. वह भोपाल के निशातपुरा इलाके में रेलवे लाइन के पास आवारा घूमता मिल गया.

प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या की इस वारदात में दिलचस्प और अनूठी बात पत्नी का खुद 30 किलोमीटर दूर घटनास्थल पर पहुंच जाना था. दरअसल पति की लाश समय पर न मिलने से सविता बेचैन थी. उस की यही बेसब्री उस पर भारी पड़ गई. जबकि सही बात यह थी कि पुलिस का उस तक पहुंचना चुनौती वाला तो नहीं, पर मुश्किल काम जरूर था. सविता को एक डर यह भी था कि पति की लाश अगर बरामद नहीं होती तो वह जल्दी रवि से शादी नहीं कर सकती थी, क्योंकि ऐसी हालत में घनश्याम गुमशुदा ही कहलाता, जबकि वह घोषित तौर पर विधवा हो जाना चाहती थी.

सविता की ग्लानि भी हो सकती थी, जो हत्या के 3 दिनों बाद पति के मरने की तसल्ली होने के बाद उसे आखिरी बार देखने जा पहुंची थी. इत्तफाक से वह उस वक्त वहां पहुंची, जब खासी भीड़ जमा हो चुकी थी. जेल में बैठी सविता को लगता होगा कि जिंदगी से उसे कभी कुछ नहीं मिला. पहले पति के साथ वह 2 साल रही. इस बीच उसे शारीरिक सुख तो मिला, पर उस से अनबन रहने लगी. दूसरे पति से न शारीरिक सुख मिला, न अनबन दूर हुई. तीसरा महज प्रेमी बन कर रह गया, जिसे करार के मुताबिक न पैसा मिला और न देहसुख.   Love Crime

Honor Killing : इज्ज़त के लिए बेटी की बलि

Honor Killing: लालाराम ने बेटी प्रीति की 2 शादियां कीं, लेकिन कोई न कोई खामी बता कर उस ने दोनों पतियों को छोड़ दिया. अपनी पसंद के विक्रम के साथ उस ने अपनी दुनिया बसानी चाही तो…

कानपुर के थाना शिवराजपुर पुलिस को पुलिस कंट्रोल रूम से संदेश मिला कि वाकरगंज गांव के पास गड्ढे में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी माणिकचंद्र पटेल एसआई आर.के. सिंह, सतीशचंद्र तथा कुछ सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. लाश पानी भरे गड्ढे में पड़ी थी. माणिकचंद ने गांव वालों की मदद से लाश बाहर निकलवाई.

वह लाश 27-28 साल की महिला की थी. वह काले रंग की सलवार और गुलाबी रंग का कुर्ता पहने थी. गले में दुपट्टा लिपटा था, जिसे देख कर ही लग रहा था कि उसी दुपटटे से महिला का गला घोंटा गया है. लाश से कुछ दूरी पर एक जोड़ी लेडीज चप्पलें तथा एक रूमाल पड़ा था. पुलिस ने यह सारा सामान सुरक्षित कर लिया.

लाश और घटनास्थल का मुआयना करने के बाद माणिकचंद पटेल ने वायरलेस से इस घटना की सूचना एसपी (देहात) सुरेंद्रनाथ तिवारी तथा सीओ (बिल्हौर) रमेशचंद्र दुबे को दे दी थी.   फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट और डौग स्क्वायड की टीम भी आ गई. इन लोगों ने घटना की जांच की, लेकिन काफी प्रयास के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला. खोजी कुत्ता लाश सूंघ कर कुछ दूर तक गया और फिर लौट आया. इस से अनुमान लगाया गया कि लाश गड्ढे में फेंकने के बाद हत्यारे किसी वाहन से गए होंगे.

काफी कोशिश के बाद भी लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी. एसपी (देहात) सुरेंद्रनाथ तिवारी और सीओ रमेशचंद्र दुबे भी घटनास्थल पर आ गए थे. रमेशचंद्र दुबे के निर्देश पर महिला सिपाही सरिता सिंह ने लाश की तलाशी ली तो उस के ब्लाउज के अंदर से एक छोटा सा पर्स निकला, जिस के अंदर एक कागज का टुकड़ा मिला. उस कागज के टुकड़े पर एक मोबाइल नंबर तथा ‘मौसाजी’ लिखा था. शायद इस नंबर से लाश की शिनाख्त हो जाए, यह सोच कर माणिकचंद्र पटेल ने उसे संभाल कर रख लिया.

इस के बाद लाश को लाला लाजपत राय चिकित्सालय स्थित मुर्दाघर में 72 घंटे के लिए सुरक्षित रखवा दिया गया, ताकि अगर इस बीच लाश की शिनाख्त के लिए कोई आ जाए तो लाश को दिखाया जा सके. घटनास्थल से लौट कर थाना शिवराजपुर में अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मामला दर्ज कर के जांच शुरू कर दी गई.

आखिर वही हुआ, जिस की माणिकचंद्र पटेल को उम्मीद थी. मृतका के पर्स से बरामद कागज के टुकड़े पर लिखा नंबर मिलाया गया तो फोन रिसीव करने वाले ने पूछा, आप कौन? मैं थाना शिवराजपुर से थानाप्रभारी माणिकचंद्र पटेल बोल रहा हूं. आप कहां से और कौन बोल रहे हैं? सर, मैं तो मोहनखेड़ा (उन्नाव) से छोटेलाल बोल रहा हूं. आप ने मुझे क्यों फोन किया? छोटेलाल ने पूछा. तुम थाने आ जाओ. बहुत जरूरी काम है.  थानाप्रभारी ने कहा.

छोटेलाल 3 घंटे बाद मोटरसाइकिल से थाना शिवराजपुर पहुंच गया. सामने कुरसी पर बैठा कर माणिकचंद्र पटेल ने कहा, छोटेलाल, हमारे थाने में एक युवती की लाश मिली है. उस की जामातलाशी में मिले एक कागज पर तुम्हारा मोबाइल नंबर लिखा था. उसी नंबर के आधार पर मैं ने तुम्हें यहां बुलाया है. लाश पोस्टमार्टम हाउस में सुरक्षित रखी है. उसी की शिनाख्त करनी है.  इस के बाद छोटेलाल को मोर्चरी हाउस ले जाया गया तो उस ने लाश देख कर कहा, सर यह तो प्रीति की लाश है. यह प्रीति कौन है? माणिकचंद्र ने पूछा. सर, प्रीति हमारे साढ़ू लालाराम की बेटी है. लालाराम बांगरमऊ (उन्नाव) के गांव शादीपुर में रहता है. ‘क्या तुम बता सकते हो कि इस की हत्या किस ने की होगी? माणिकचंद्र ने पूछा तो उस ने कहा, सर, यह मैं नहीं जानता. यह सब तो इस के घर वाले ही बता सकते हैं.

उस के हावभाव से माणिकचंद्र पटेल समझ गए कि छोटेलाल हत्या का राज छिपा रहा है. इसलिए उन्होंने प्रीति के पिता लालाराम के घर दबिश दी. वह घर पर ही मिल गया. उसे थाने लाया गया. लालाराम ने थाने में छोटेलाल को देखा तो उसे लगा कि उस ने पुलिस को सब कुछ बता दिया है. इसलिए जब उस से प्रीति की हत्या के बारे में पूछा गया तो उस ने बेटी की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि प्रीति की हत्या उसी ने अपने साले बनवारी, विनोद और बहनोई मन्नालाल की मदद से कर के लाश को वाकरगंज गांव के नजदीक गड्ढे में फेंक दिया था.

इस के बाद माणिकचंद्र पटेल ने छापा मार कर सफीपुर (उन्नाव) से बनवारी और विनोद तथा बांगरमऊ निवासी मन्नालाल को गिरफ्तार कर लिया. इसी के साथ हत्या में प्रयुक्त विनोद की बोलेरो जीप भी बरामद कर ली गई. इस के बाद छोटेलाल को छोड़ दिया गया.   अभियुक्तों से की गई पूछताछ में प्रीति की मौत की जो सनसनीखेज कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश उन्नाव जिले की तहसील पुरवा का एक गांव है शादीपुर. इसी गांव में लालाराम अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी पूनम के अलावा 3 बेटियां प्रीति, सरिता और स्मिता थीं. लालाराम के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह गुजरबसर कर रहा था.

लालाराम की तीनों बेटियों में बड़ी बेटी प्रीति काफी सुंदर थी. उम्र का सोलहवां बसंत पार करते ही उस की सुंदरता में जो निखार आया, वह देखते ही बनता था. प्रीति को जल्दी ही इस बात की जानकारी हो गई कि उस में ऐसा कुछ खास है, जो लोगों को लुभाता है. प्रीति जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही चंचल, स्वच्छंद और महत्त्वाकांक्षी भी. उसे पिंजरे में बंद रहना पसंद नहीं था. वह खूब घूमतीफिरती और बनठन कर रहती थी.

घूमनेफिरने में ही उस के कई युवकों से मधुर संबंध बन गए. जब इस बात की जानकारी लालाराम को हुई तो वह परेशान रहने लगा. वह बेटी को समझाने की कोशिश करता, लेकिन वह पिता की बात को इस कान से सुनती और उस कान से निकाल देती. बेलगाम बेटी इज्जत पर दाग न लगा बैठे, यह सोच कर लालाराम ने प्रीति के हाथ पीले करने का निश्चय किया. वह बेटी के लिए लड़का खोजने लगा. उस ने कई लड़के देखे, लेकिन कहीं बात नहीं बनी. इस की वजह यह थी कि प्रीति की अच्छाइयों की जगह बुराइयां पहले पहुंच जाती थीं. जिस से रिश्ता टूट जाता था.

लालाराम के बहनोई मन्नालाल ने एक लड़का थाना बांगरमऊ के गांव दुवाइन पुरवा में बताया. लड़के का नाम था अनुज. अनुज के पिता रामपाल एक किसान थे. अनुज भी पिता के साथ खेती करता था. अनुजपाल देखने में ठीकठाक था, उस की माली हालत भी अच्छी थी, इसलिए लालाराम ने प्रीति के लिए उसे पसंद कर लिया. इस के बाद जून, 2011 में प्रीति की शादी अनुज से हो गई.

प्रीति जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर अनुज खुश था. लेकिन प्रीति को ससुराल रास नहीं आई. कच्चापक्का सीलन भरा मकान उसे फूटी आंख नहीं सुहाया था. परदे में रहना उसे कतई पसंद नहीं था. इस बात को ले कर पूरे घर में कानाफूसी होने लगी. घर में होने वाले दकियानूसी रीतिरिवाजों से भी उसे चिढ़ थी. इसलिए नई बहू को ले कर घर में चिकचिक शुरू हो गई थी. प्रीति पति से भी संतुष्ट नहीं थी. वह शरीर से तो हृष्टपुष्ट था, लेकिन बिस्तर पर उस का साथ नहीं दे पाता था.

जैसेतैसे वह एक महीने ससुराल में रही उस के बाद पिता के साथ मायके आई तो मां पूनम से बोली, मैं तुम लोगों पर बोझ थी क्या, जो न घर देखा न वर, ब्याह कर दिया. न पति सुख देता है और न घर वाले मेरी सुखसुविधा का ध्यान रखते हैं. वह ससुराल नहीं जेल है. ऐसी ससुराल मैं नहीं जाऊंगी.   प्रीति की बात सुन कर पूनम परेशान हो उठी. उस ने बेटी को समझाया कि ससुराल में हर लड़की को शुरूशुरू में परेशानी होती है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाता है. लड़की का असली घर ससुराल ही होता है. उस ने बेटी को बहुतेरा समझाया, लेकिन उस ने मां की बात को इस कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया.

प्रीति को मायके आए महीना भर ही हुआ था कि अनुज उसे लिवाने आ पहुंचा. लेकिन प्रीति ने उस के साथ जाने से साफ मना कर दिया. अनुज प्रीति को मनाने और उस की हर शर्त मानने को तैयार था. लेकिन प्रीति टस से मस नहीं हुई. अनुज बिना पत्नी के घर पहुंचा तो घर में कोहराम मच गया. 2-4 दिन तक तो वह बात दबाए रहा, लेकिन धीरेधीरे बात गांव में फैल गई कि उस की पत्नी ने ससुराल आने से मना कर दिया है. बहू के न आने से रामपाल की बेइज्जती हुई तो वह बेटे की ससुराल जा पहुंचा. उस ने नतमस्तक हो कर लालाराम से प्रीति को ससुराल भेजने को कहा. इस के बाद प्रीति सशर्त ससुराल आने को राजी हुई.

प्रीति दोबारा ससुराल आई तो उस ने कुछ ही समय में पूरे परिवार को अपनी मुट्ठी में कर लिया. वह जिस चीज की डिमांड करती, पति और सासससुर पूरी करते. इस के बावजूद घर में कलह होती रहती. कलह का पहला कारण था प्रीति का बेपरदा हो कर पासपड़ोस के घरों में जाना और लड़कों से हंसीठिठोली करना. गंवई गांवों में अब भी परदा चलता है. सास प्रीति को टोकती तो वह घर में कलह करती और फिर रूठ कर मायके आ जाती.  कलह का दूसरा कारण था पति की नामर्दी. अनुज प्रीति की शारीरिक भूख जगा तो देता था, लेकिन शांत नहीं कर पाता. इस पर प्रीति खीझ उठती और उस की पिटाई कर देती. अनुज अपनी कमजोरी जानता था, इसलिए विरोध नहीं कर पाता. प्रीति ने कई बार अनुज से कहा कि वह शहर के किसी अच्छे डाक्टर से अपना इलाज कराए, लेकिन शर्म के मारे अनुज डाक्टर के पास नहीं जा रहा था.

इसी तरह 3 साल बीत गए, प्रीति पति की नामर्दगी से आजिज आ कर मायके आ गई. इस बार प्रीति ने साफ कह दिया कि पहले वह इलाज करा कर मर्द बने, उस के बाद उसे घर ले जाए. अनुज और उस के घर वाले प्रीति के व्यवहार से दुखी थे, इसलिए उन्होंने उसे छोड़ देना ही उचित समझा. प्रीति मायके में आ कर रहने लगी तो वह स्वच्छंद हो कर घूमने लगी. लालाराम ने उस पर अंकुश लगाने की कोशिश की तो वह भड़क उठी. आजिज आ कर उन्होंने प्रीति की दूसरी शादी उन्नाव के फत्तेपुर चौरासी निवासी मटरू से कर दी. मटरू खेतीकिसानी के साथ गल्ले का व्यवसाय करता था. कुल मिला कर उस की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत थी.

मटरू और प्रीति का विवाह बेमेल था. मटरू नाटे कद का सांवला था. उस की उम्र भी प्रीति से अधिक थी. जबकि प्रीति का शरीर सांचे में ढला था. प्रीति ने प्रथम मिलन में ही मटरू को नकार दिया. उस ने साफ कह दिया कि वह उस के साथ जीवन नहीं बिता सकती. प्रीति मात्र 3 महीने मटरू के साथ रही, उस के बाद मायके आ गई तो दोबारा नहीं गई. मायके में रहने के दौरान ही प्रीति की मुलाकात शादीपुर के बाजार में विक्रम से हुई. विक्रम पड़ोसी गांव मुसकाबाद का रहने वाला था. दोनों एक ही स्कूल में पढ़े थे. हाईस्कूल की परीक्षा दोनों ने साथसाथ पास की थी. पढ़ाई के दौरान दोनों में दोस्ती थी. कई सालों बाद जब दोनों मिले तो उन का प्यार उमड़ पड़ा. विक्रम ने जब प्रीति का हालचाल पूछा तो वह सिसक पड़ी. 2 शादियां होने के बाद भी नसीब में मनमाफिक घरवर न मिलने का उस ने दुखड़ा रोया तो विक्रम ने उसे धैर्य बंधा कर सब कुछ ठीक हो जाने की बात कही.

इस के बाद प्रीति और विक्रम की मुलाकातें होने लगीं. धीरेधीरे ये मुलाकातें प्यार में बदल गईं. विक्रम ने प्रीति से कहा कि अगर वह चाहे तो वह जीवन भर उस का साथ निभा सकता है. लेकिन दोनों के बीच जाति की ऊंची दीवार थी. प्रीति गड़रिया थी तो विक्रम पासी. इसलिए प्रीति के घर वाले कभी उस का हाथ विक्रम को नहीं दे सकते थे. प्रीति विक्रम के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. इसलिए उस ने कहा, विक्रम, जातिपांत की दीवार हम तोड़ेंगे. घर वाले साथ नहीं देंगे तो क्या हुआ, मैं तुम्हारे साथ भाग कर शादी कर लूंगी.

इस के बाद दोनों ने घर छोड़ने का निश्चय कर लिया.  3 जनवरी, 2016 को प्रीति घर वालों को बिना बताए विक्रम के साथ भाग गई. विक्रम चंडीगढ़ में नौकरी करता था. वह उसे ले कर चंडीगढ़ चला गया, वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे.  लालाराम को जब पता चला कि प्रीति पासी के लड़के के साथ भाग गई है तो उस ने सिर पीट लिया. उस ने प्रीति को खोजने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली. प्रीति का न अतीत अच्छा था न वर्तमान, इसलिए बदनामी की वजह से पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई.

21 मार्च, 2016 को प्रीति अचानक घर वापस आ गई. उसे देख कर गांव में तरहतरह की बातें होने लगीं. गड़रियों में आक्रोश फैल गया और वे लालाराम की थूथू करने लगे. लालाराम ने प्रीति पर दबाव बनाया कि वह पति मटरू के साथ ससुराल चली जाए, लेकिन प्रीति ने मटरू के साथ जाने से मना कर दिया. इस के बाद 27 मार्च को लालाराम प्रीति को बहाने से उस की ननिहाल सफीपुर (उन्नाव) ले गया, जहां उस ने प्रीति के फूफा मन्नालाल, मौसा छोटेलाल और मामा बनवारी तथा विनोद को बुलवा लिया.  इस के बाद प्रीति पर दबाव बनाया कि वह विक्रम को छोड़ कर पति मटरू के साथ चली जाए.  लेकिन प्रीति जिद पर अड़ी रही कि वह विक्रम को नहीं छोड़ सकती. अंत में प्रीति के मौसा छोटेलाल ने उसे समझाया और अपना मोबाइल नंबर नोट करा कर कहा कि वह सोचविचार कर अपने निर्णय से 1-2 दिन में उसे अवगत करा दे. इस के बाद वह अपने गांव चले गए.

उस के जाने के बाद प्रीति विक्रम पासी के साथ जाने की जिद करने लगी तो लालाराम को गुस्सा आ गया. उस ने अपने साले विनोद, बनवारी और बहनोई मन्नालाल से सलाह कर के इज्जत के लिए बेटी की हत्या की योजना बना डाली. रात 10 बजे प्रीति जब कमरे में सोने गई तो बनवारी और विनोद ने प्रीति को पकड़ लिया तो लालाराम ने दुपट्टे से प्रीति का गला घोंट दिया. वह मर गई तो विनोद ने अपनी बोलेरो जीप में शव को रखा और सब ने उसे ले जा कर शिवराजपुर के गांव वाकरगंज के बाहर पानी भरे गड्ढे में फेंक दिया.

लालाराम से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के भाई छोटेलाल को बेकसूर मान कर छोड़ दिया तथा अन्य अभियुक्तों मन्नालाल, बनवारी और विनोद को भी गिरफ्तार कर के उन से पूछताछ की तो उन्होंने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने चारों अभियुक्तों को 2 अप्रैल, 2016 को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Honor Killing

—कथा पुलिस सूत्रो

Social Crime: रेप करने के बाद न्यूड फोटो खींचता निर्मल बाबा

Social Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक ढोंगी बाबा ने महिलाओं के साथ रेप किया और उस के बाद उन की न्यूड फोटो खींच लीं. चलिए जानते हैं आखिर कौन था यह ढोंगी बाबा जिस ने महिलाओं की इज्जत के साथ खेला था. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से, जिस से आप होंगे ऐसी घटनाओं के प्रति सजग और सचेत.

यह घटना छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले से सामने आई है. यहां एक महिला निर्मल बाबा के पास शरीर का दर्द ठीक कराने के लिए आई हुई थी. इस के बाद बाबा ने महिला के शरीर का दर्द ठीक करने का वायदा किया. महिला को इस तथाकथित बाबा ने मैहर के एक होटल में बुलाया. बाबा ने महिला को प्रसाद खिलाया. प्रसाद खा कर जब महिला बेहोश हो गई तो उस ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म करने के बाद उस ने महिला के न्यूड फोटो खींच लिए थे. महिला ने जब इस का विरोध किया तो उस ने अश्लील फोटो इंस्टाग्राम पर वायरल कर दिए.

पुलिस के अनुसार, यह मामला 11 अप्रैल, 2026 को पामगढ़ थाने में आया है, जहां एक पीड़ित महिला ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. महिला ने पुलिस को बताया कि निर्मल बाबा चैत्र नवरात्रि में पदयात्रा करते हुए आया था. निर्मल बाबा ने खुद को एक चमत्कारी बाबा बताया और कहा कि वह सारी समस्याएं दूर कर देता है. इस के बाद महिला अपने शरीर के दर्द की बीमारी को ठीक कराने के लिए अपनी सहेली के साथ बाबा के पास गई थी. इस के बाद बाबा ने उस का नंबर ले लिया.

महिला ने पुलिस को बताया कि इस के बाद बाबा ने कौल करके मार्केट बुलाया और प्रसाद का झांसा दिया और कहा इस से सब ठीक हो जाएगा. फिर वह उसे अपने साथ बिलासपुर ले गया, फिर ट्रेन से मध्य प्रदेश पहुंचा, जहां उसे एक होटल में ठहराया गया. वहां उस ने उस के साथ कई बार दुष्कर्म किया और अश्लील फोटो खींचीं और उसे छोड़कर भाग निकला.

बाबा महिला को बारबार कौल करके परेशान करने लगा, जिस से महिला ने परेशान हो कर उसे ब्लौक कर दिया. फिर बाबा ने महिला के नाम से एक इंस्टाग्राम आईडी बनाई और अश्लील फोटो वायरल कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

एसपी उमेश कश्यप के मार्गदर्शन और एसडीओपी (अकलतरा) प्रदीप कुमार सोरी ने बाबा की लोकेशन ट्रेस की. इस के बाद आरोपी को पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया.

बाबा के खिलाफ बीएन्स की धारा 64(2)(एम) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया गया है और उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
अगर आप भी ऐसे ढोंगी बाबाओं से सावधान रहना चाहते हैं, जो झूठी कहानियां सुनाकर लोगों को ठग लेते हैं तो इन घटनाओं को जरूर पढ़ें. मनोहर कहानियां आप को ऐसी घटनाओं के प्रति सचेत और जागरूक बनाती है, ताकि आप हर तरह की धोखाधड़ी और ठगी से खुद को बचा सकें. Social Crime

Social Crime Story: बदले की आग

Social Crime Story: इकबाल को इस बात का अहसास था कि उसी की गलती से पत्नी और बेटी हुस्न के बाजार में पहुंची हैं. शायद इसी वजह से वह उन्हें वापस घर ले जाने आया था. लेकिन वे नहीं मानीं. इस के बाद जो हुआ, वह बहुत बुरा था.

पूरा प्लेटफार्म रोशनी में नहाया हुआ था. कराची एक्सप्रेस अभीअभी आई थी, जो यात्रियों को उतार कर आगे बढ़ गई थी. प्लेटफार्म पर कुछ यात्रियों और स्टेशन स्टाफ के अलावा काली चादर में लिपटी अपनी 10 वर्षीया बेटी और 8 वर्षीय बेटे के साथ एक जवान औरत भी थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किसी की प्रतीक्षा कर रही हो. अक्की अकबर उर्फ अक्को कुली उस के पास से दूसरी बार उन्हें देखते हुए उधर से गुजरा तो उस महिला ने उसे इशारा कर के अपने पास बुलाया.

अक्को मुड़ा और उस के पास जा कर मीठे स्वर में पूछा, ‘‘जी, आप को कौन सी गाड़ी से जाना है?’’

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना, मैं ने तो केवल यह पूछने के लिए बुलाया है कि यहां चाय और खाने के लिए कुछ मिल जाएगा?’’

‘‘जी, बिलकुल मिल जाएगा, केक, रस, बिस्किट वगैरह सब कुछ मिल जाएगा.’’ अक्को ने उस महिला की ओर ध्यान से देखते हुए कहा.

गोरेचिट्टे रंग और मोटीमोटी आंखों वाली वह महिला ढेर सारे गहने और अच्छे कपड़े पहने थी. वह किसी अच्छे घर की लग रही थी. दोनों उस से लिपटे हुए थे. महिला के हाथ से सौ रुपए का नोट ले कर वह बाहर की ओर चला गया. कुछ देर में वह चाय और खानेपीने का सामान ले कर आ गया. चाय पी कर महिला बोली, ‘‘यहां ठहरने के लिए कोई सुरक्षित मकान मिल जाएगा?’’

महिला की जुबान से ये शब्द सुन कर अक्को को लगा, जैसे किसी ने उछाल कर उसे रेल की पटरी पर डाल दिया हो. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘जी, मैं कुछ समझा नहीं?’’

‘‘मैं अपने घर से दोनों बच्चों को ले कर हमेशा के लिए यहां आ गई हूं.’’ उस ने दोनों बच्चों को खुद से सटाते हुए कहा.

‘‘आप को यहां ऐसा कोई ठिकाना नहीं मिल सकता. हां, अगर आप चाहें तो मेरा घर है, वहां आप को वह सब कुछ मिल जाएगा, जो एक गरीब के घर में होता है.’’ अक्को ने कुछ सोचते हुए अपने घर का औफर दिया.

महिला कुछ देर सोचती रही, फिर अचानक उस ने चलने के लिए कह दिया. अक्को ने उस की अटैची तथा दोनों बैग उठाए और उन लोगों को अपने पीछे आने को कह कर चल दिया. मालगोदाम वाला गेट टिकिट घर के पीछे था, जहां लोगों का कम ही आनाजाना होता था. महिला को उधर ले जाते हुए उसे कोई नहीं देख सकता था. अक्को ने वही रास्ता पकड़ा. बाहर आ कर उस ने एक औटो में सामान रखा और महिला के बेटे को अपनी गोद में ले कर अगली सीट पर बैठ गया.

औटो चल पड़ा. रेलवे फाटक पार कर के अक्को ने औटो वाले से टैक्सी वाली गली में चलने को कहा. उस गली में कुछ दूर चल कर रास्ता खराब था, जिस की वजह से औटो वाले ने हाथ खड़े कर दिए. अक्को सामान उठा कर पैदल ही उन सब को अपने घर ले गया. दरवाजे पर पहुंच कर उस ने आवाज लगाई, ‘‘अम्मा.’’

अंदर से कमजोर सी आवाज आई, ‘‘आई बेटा.’’

मां ने दरवाजा खोला. पहले उस ने अपने बेटे को देखा, उस के बाद हैरानी भरी निगाह उन तीनों पर जम गई. अक्को सामान ले कर अंदर चला गया. वह एक छोटा सा 2 कमरों का पुराने ढंग का मकान था. इस घर में मांबेटे ही रह रहे थे. बहन की शादी हो चुकी थी, पिता गुजर गए थे. बाप कुली था, इसलिए बाप के मरने के बाद बेटे ने लाल पगड़ी पहन ली थी और स्टेशन पर कुलीगिरी करने लगा था. मां ने महिला और उस के दोनों बच्चों के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और अक्को की ओर देखने लगी.

अक्को ने कहा, ‘‘मां, ये लोग कुछ दिन हमारे घर मेहमान बन कर रहेंगे.’’

मां उन लोगों की ओर देख कर बोली, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, मेहमानों के आने से तो घर में रौनक आ जाती है.’’

सुबह हो चुकी थी, अक्को ने मां से कहा, ‘‘अम्मा, तुम चाय बनाओ, मैं नाश्ते का सामान ले आता हूं.’’

कुछ देर में वह सामान ले आया. मां, बेटे और बेटी ने नाश्ता किया. अक्को ने अपना कमरा मेहमानों को दे दिया और खुद अम्मा के कमरे में चला गया. नाश्ते के बाद तीनों सो गए.

मां ने अक्को को अलग ले जा कर पूछा, ‘‘बेटा, ये लोग कौन हैं, इन का नाम क्या है?’’

उस ने जवाब दिया, ‘‘मां, मुझे खुद इन का नाम नहीं मालूम. ये लोग कौन हैं, यह भी पता नहीं. ये स्टेशन पर परेशान बैठे थे. छोटे बच्चों के साथ अकेली औरत कहीं किसी मुसीबत में न फंस जाए, इसलिए मैं इन्हें घर ले आया. अम्मा तुम्हें तो स्टेशन का पता ही है, कैसेकैसे लोग आते हैं. किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता.’’

‘‘बेटे, तुम ने यह बहुत अच्छा किया, जो इन्हें यहां ले आए. खाने के बाद इन से पूछेंगे.’’

दोपहर ढलने के बाद वे जागे. कमरे की छत पर बाथरूम था, तीनों बारीबारी से नहाए और कपड़े बदल कर नीचे आ गए. मां ने खाना लगा दिया. आज काफी दिनों बाद उन के घर में रौनक आई थी. सब ने मिल कर खाना खाया. खाने के बाद महिला ने मां से कहा, ‘‘मेरा नाम सुरैया है, बेटे का नाम शावेज और बेटी का शाहिदा. हम बहावलपुर के रहने वाले हैं. मेरे पति का नाम मोहम्मद इकबाल है. वह सरकारी दफ्तर में अफसर हैं.’’ कह कर सुरैया मां के साथ बरतन साफ करने लगी. इस के बाद उस ने खुद ही चाय बनाई और चाय पीते हुए बोली, ‘‘आप की बड़ी मेहरबानी, जो हमें रहने का ठिकाना दे दिया.’’

मां ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटी, जिस ने पैदा किया है, वह रहने का भी इंतजाम करता है और खाने का भी. लेकिन यह बताओ बेटी कि इतना बड़ा कदम तुम ने उठाया किस लिए?’’

‘‘मां जी, मेरे साथ जो भी हुआ, वह वक्त का फेर था. मेरे साथसाथ बच्चे भी घर से बेघर हो गए. मेरे पति और मैं ने शादी अपनी मरजी से की थी. मेरे मांबाप मेरी मरजी के आगे कुछ नहीं बोल सके. शादी के कुछ सालों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरेधीरे पति का रवैया बदलता गया.’’

थोड़ा रुक कर वह आगे बोली, ‘‘शाहिदा के बाद शावेज पैदा हुआ. इस के जन्म के कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि इकबाल ने दूसरी शादी कर ली है. मैं ने एक दिन उन से कहा, ‘तुम ने दूसरी शादी कर ली है तो उसे घर ले आओ. हम दोनों बहनें बन कर रह लेंगे. तुम 2-2 दिन घर नहीं आते तो बच्चे पूछते हैं, मैं इन्हें क्या जवाब दूं?’

‘‘उस ने कुछ कहने के बजाए मेरे मुंह पर थप्पड़ मारने शुरू कर दिए. उस के बाद बोला, ‘मैं ने तुम्हें इतनी इजाजत नहीं दी है कि तुम मेरी निजी जिंदगी में दखल दो. और हां, कान खोल कर सुन लो, तुम अपने आप को अपने बच्चों तक सीमित रखो, नहीं तो अपने बच्चों को साथ लो और मायके चली जाओ.’

‘‘इस के बाद इकबाल अपना सामान ले कर चला गया और कई दिनों तक नहीं आया. फोन भी नहीं उठाता था. एकदो बार औफिस का चपरासी आ कर कुछ पैसे दे गया. काफी छानबीन के बाद मैं ने पता लगा लिया कि उन की दूसरी बीवी कहां रहती है. बच्चों को स्कूल भेज कर मैं उस के फ्लैट पर पहुंच गई.

‘‘कालबैल बजाने के थोड़ी देर बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला. मैं ने अनुमान लगा लिया कि यही वह लड़की है, जिस ने मेरे जीवन में जहर घोला है. वह भी समझ गई कि मैं इकबाल की पत्नी हूं. उस ने मुझे अंदर आने को कहा. मैं अंदर गई, कमरे में सामने इकबाल की बड़ी सी फोटो लगी थी, उसे देखते ही मेरे शरीर में आग सी लग गई.

‘आपी, मैं ने उन से कई बार कहा कि वह अपने बच्चों के पास जा कर रहें, लेकिन वह मुझे डांट कर चुप करा देते हैं.’ उस ने कहा. इस के बाद उस ने मुझे पीने के लिए कोक दी.

‘‘मैं ने उस के पहनावे पर ध्यान दिया, वह काफी महंगा सूट पहने थी और सोने से लदी थी. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि इकबाल उस पर दिल खोल कर खर्च कर रहे हैं. जबकि हमें केवल गुजारे के लिए ही पैसे देते हैं. उस ने अपना नाम नाहिदा बताया.

मैं ने कहा, ‘देखो नाहिदा, तुम इकबाल को समझाओ कि वह तुम्हें ले कर घर में आ कर रहें. हम सब साथसाथ रहेंगे. बच्चों को उन की बहुत जरूरत है. उस ने कहा, ‘आपी, मैं उन्हें समझाऊंगी.’

‘‘उस से बात कर के मैं घर आ गई. जो आंसू मैं ने रोक रखे थे, वह घर आ कर बहने लगे. शाम को इकबाल का फोन आया. उन्होंने मुझे बहुत गालियां दीं, साथ ही कहा कि मेरी हिम्मत कैसे हुई उन का पीछा करने की. मैं ने 2-3 बार उन्हें फोन किया, उन्होंने केवल इतना ही कहा कि उन्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं है. बच्चों के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें शक है कि ये उन के बच्चे नहीं हैं. फिर मैं ने सोच लिया कि अब मुझे उन के साथ नहीं रहना. वह पत्थर हो चुके हैं.’’

इतना कह कर सुरैया सिसकियां भरभर कर रो पड़ी. अक्को और उस की मां ने कहा, ‘‘आप रोएं नहीं, जब तक आप का दिल चाहे, आप यहां रहें, आप को किसी चीज की कमी नहीं रहेगी.’’

जिस आबादी में अक्को कुली का घर था, उस के आखिरी छोर पर नई आबादी थी. वह रेडलाइट एरिया था. गरमियों के दिन थे, छत पर चारपाइयां लगा दी जातीं. सब लोग छत पर ही सोते थे. शाम होते ही नई आबादी में रोशनी हो जाती, संगीत और घुंघरुओं की आवाज पर सुरैया बुरी तरह चौंकी. अक्को ने बताया कि ये रेडलाइट एरिया है, यहां शाम होते ही नाचगाना शुरू हो जाता है. मोहल्ले वालों ने बहुत कोशिश की कि रेडलाइट एरिया यहां से खत्म हो जाए, लेकिन किसी की नहीं सुनी गई. अब हमारे कान तो इस के आदी हो गए हैं.

ऊपर छत पर खड़ेखड़े बाजार में बैठी वेश्याएं और आतेजाते लोग दिखाई देते थे. शाहिदा ने वहां का नजारा देख कर एक दिन अपने भाई शावेज से पूछा, ‘‘भाई, इन दरवाजों के बाहर कुरसी पर जो औरतें बैठी हैं, वे क्या करती हैं? कभी दरवाजा बंद कर लेती हैं तो थोड़ी देर बाद खोल देती हैं. फिर किसी दूसरे के साथ अंदर जाती हैं और फिर दरवाजा बंद कर लेती हैं.’’

शावेज ने जवाब दिया, ‘‘मुझे क्या पता, होगा कोई उन के घर का मामला.’’

उस समय शावेज भी खुलते बंद होते दरवाजों को देख रहा था. सुरैया भी यह सब रोजाना देखती थी, कुछ इस नजरिए से मानो कोई फैसला करना चाहती हो. जो पैसे वह अपने साथ लाई थी, धीरेधीरे वे खत्म हो रहे थे. बस कुछ जेवरात बाकी थे, जिन में से एक लौकेट और चेन बिक चुकी थी.

एक दिन अक्को कुली और सुरैया छत पर बैठे दीवार के दूसरी ओर उन दरवाजों को खुलता और बंद होते देख रहे थे. तभी सुरैया ने पूछा, ‘‘अक्को, धंधा करने वाली इन औरतों को पुलिस नहीं पकड़ती?’’

अक्को ने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से धंधा करने का लाइसेंस दिया गया है. उन्हें लाइसेंस की शर्तों पर ही काम करना होता है.

सुरैया ने पूछा, ‘‘अक्को, क्या तुम कभी उधर गए हो?’’

‘‘एकआध बार अनजाने में उधर चला गया था, लेकिन तुम यह सब क्यों पूछ रही हो?’’ अक्को ने आश्चर्य से पूछा.

सुरैया कहने लगी, ‘‘मेरे अंतरमन में एक अजीब सी लड़ाई चल रही है. मैं इकबाल को यह बताना चाहती हूं कि औरत जब बदला लेने पर आ जाए तो सभी सीमाएं लांघ सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं?’’ अक्को चौंका.

‘‘मैं इस बाजार की शोभा बनना चाहती हूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है?’’ अक्को ने साधिकार उसे डांटते हुए कहा.

‘‘अक्को तुम मेरे जीवन के उतारचढ़ाव को नहीं जानते. मैं ने इकबाल के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया. उस की खूब सेवा भी की और इज्जत भी बना कर रखी. लेकिन उस ने मुझे क्या दिया?’’ सुरैया की आवाज भर्रा गई.

अक्को ने उसे सांत्वना दे कर पूछा, ‘‘तुम अपनी सोच बताओ, फिर मैं तुम्हें कोई सलाह दूंगा.’’

वह कुछ सोच कर बोली, ‘‘मैं शाहिदा को नाचनागाना सिखाना चाहती हूं.’’

अक्को कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘अच्छा, मैं इस बाजार के चौधरी दारा से बात करूंगा.’’

अगले दिन उस ने दारा से बात कर के सुरैया को उस से मिलवा दिया. शाहिदा के भोलेपन, सुंदरता और सुरैया की भरपूर जवानी ने दारा के दिल पर भरपूर वार किया. उस ने चालाकी से अपना घर उन के लिए पेश कर दिया और थाने जा कर सुरैया और शाहिदा का वेश्या बनने का प्रार्थना पत्र जमा कर दिया. कुछ ही दिनों में मांबेटी ने उस इलाके के जानेमाने उस्तादों से नाचनेगाने की ट्रेनिंग ले ली. पहली बार मांबेटी सजधज कर कोठे पर बैठीं तो लोगों की भीड़ लग गई.

शाहिदा की आवाज में जादू था, फिर पूरे बाजार में यह बात मशहूर हो गई कि यह किसी बड़े घर की शरीफ लड़की है, जिस ने अपनी इच्छा से वेश्या बनना पंसद किया है. दारा चूंकि शाहिदा को अपनी बेटी बना कर कोठे पर लाया था, इसलिए दोनों की इज्जत थी. पूरे शहर में शाहिदा के हुस्न के चर्चे थे. देखतेदेखते बड़ेबड़े रईसजादे उस की जुल्फों में गिरफ्तार हो गए. जब शाहिदा अपनी आवाज का जादू चला तो नोटों के ढेर लग जाते. उस के एक ठुमके पर नोट उछलउछल कर दीवारों से टकरा कर गिरने लगते.

शाहिदा के भाई शावेज के खून में बेइज्जती तो आ गई थी, लेकिन जब कभी उस के शरीर में खानदानी खून जोश मारने लगता तो वह अपनी मांबहन से झगड़ने लगता. लेकिन वे दोनों उस की एक भी नहीं चलने देती थीं. शाहिदा की नथ उतराई की रस्म शहर के बहुत बड़े रईस असलम के हाथों हुई, जिस के एवज में लाखों की रकम हाथ लगी. असलम जब आता, ढेरों सामान ले कर आता. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. असलम शहर का बदमाश भी था. बातबात पर वह रिवौल्वर निकाल लेता था, लेकिन वही असलम शाहिदा के पैरों की मिट्टी चाटने लगता था.

एक दिन दबी जुबान से असलम ने उस की मां से शाहिदा को कोठे पर मुजरा न करने के लिए कहा तो उस की मां ने कहा, ‘‘उतर जाओ इस कोठे से, तुम से बढ़ कर सैकड़ों धनवान है मेरी शाहिदा के चाहने वाले. अब कभी इस कोठे पर आने की हिम्मत भी न करना.’’

असलम ने माफी भी मांगी, लेकिन सुरैया नरम नहीं पड़ी. असलम चला गया. सुरैया अक्को कुली को कुछ न कुछ देती रहती थी, क्योंकि उसी की वजह से वह इस कोठे पर बैठी थी. पूरे शहर में शाहिदा और असलम के चरचे थे. मांबेटी बनठन कर रोज शाम को तांगे में बैठ कर निकलतीं तो लोग उन्हें देखते रह जाते. तांगे पर उन का इस तरह निकलना कारोबारी होता था, इस से वे रोज कोई न कोई नया पंछी फांस लेती थीं.

एक दिन शावेज अपनी बहन शाहिदा और मां से उलझ गया. बात हाथापाई तक पहुंच गई. उस ने शाहिदा के मुंह पर इतनी जोरों से थप्पड़ मारा कि उस के गाल पर निशान पड़ गया. सुरैया को गुस्सा आया तो उस ने उसे डांटडपट कर घर से निकाल दिया. शावेज गालियां देता हुआ घर से निकल गया और एक हकीम की दुकान पर जा बैठा. वहां वह अकसर बैठा करता था. उस की मां को वहां बैठने पर आपत्ति थी, क्योंकि उसे लगता था कि वही हकीम उसे उन के खिलाफ भड़काता है. शावेज ने असलम और एकदो ग्राहकों से भी अभद्र व्यवहार किया था.

वेश्या बाजार के वातावरण ने शावेज को नशे का आदी बना दिया था, वह जुआ भी खेलने लगा था. उस के खरचे बढ़ रहे थे, लेकिन उस की मां उसे खरचे भर के ही पैसे देती थी. वह जानबूझ कर लोगों से लड़ाईझगड़ा मोल लेता था. इसी चक्कर में वह कई बार थाने की यात्रा भी कर आया था, जिस की वजह से उस के मन से पुलिस का डर निकल गया था. रात गए तक शावेज हकीम की दुकान के आगे बैठा रहा. जब बाजार बंद हुआ तो सुरैया को शावेज की चिंता हुई. मांबेटी उसे देखने आईं तो वह हकीम की दुकान पर बैठा मिला. दोनों उसे मना कर कोठे पर ले गई.

उधर इकबाल को पता चला कि उस की बीवी और बेटी हुस्न के बाजार में बैठ कर उस की इज्जत का जनाजा निकाल रही हैं तो अपनी इज्जत बचाने के लिए वह परेशान हो उठा. उस ने अपनी पत्नी सुरैया और बच्चों के घर से जाने की खबर पुलिस को नहीं दी थी. 8 सालों बाद एक दिन उस के एक जानने वाले ने सुरैया और उस की बेटी को कोठे पर बैठे देखा तो यह बात उसे बताई थी. इकबाल चाहता तो पुलिस को सूचना दे कर उन्हें अपने साथ ले जा सकता था. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. हुस्न का बाजार जनरल बसस्टैंड के पास था. इकबाल ने वहां पास के एक होटल में कमरा लिया और शाम होने का इंतजार करने लगा.

शाम होते ही वेश्या बाजार सज गया. इकबाल ने कमरा लौक किया और रेडलाइट एरिया में आ गया. उसे सुरैया बेगम का कोठा ढूंढने में कोई परेशानी नहीं हुई. मांबेटी दोनों सजसंवर कर ग्राहकों के इंतजार में बैठी थीं. इकबाल को देख कर दोनों पत्थर की मूर्ति बन गईं. दोनों उठीं और इकबाल को कमरे के अंदर आने के लिए इशारा किया. इकबाल उन के पीछे कमरे में अंदर गया तो देखा शावेज टीवी देख रहा था. पिता को देख कर वह खड़ा हो गया. चारों एकदूसरे को देख रहे थे.

इकबाल ने कहा, ‘‘सुरैया, तुम ने इतनी छोटी गलती के लिए मुझे इतनी बड़ी सजा दी. तुम्हारे घर से निकलने के बाद मैं ने तुम्हारे लिए अपनी दूसरी पत्नी को भी छोड़ दिया. कहांकहां नहीं ढूंढा तुम्हें. शायद मैं यह दिन देखने के लिए जिंदा था. काश, मैं पहले ही मर गया होता.’’

इकबाल की आंखों से आंसू निकलने लगे. सुरैया के मन में पति का प्रेम उमड़ पड़ा. वह उस के आंसू पोंछने पास गई और गुजरी स्थितियों के बारे में बताने लगी. दोनों बच्चे भी अपने पिता से लिपट कर रो पड़े. उन सब को रोता देख चौधरी दारा अंदर आया तो इकबाल को देख कर ठिठक गया. सुरैया ने बताया कि यह उस के पति हैं. जब सब रो चुके तो इकबाल ने सुरैया से घर चलने को कहा. लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि अब वे शरीफ लोगों में नहीं जा सकते. हां, अगर शावेज जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हो.

इकबाल अपनी बेटी शाहिदा से चलने को कहा तो उस ने मां के स्वर में स्वर मिलाया, ‘‘अब्बू, अम्मी ठीक कह रही हैं, मैं आप के साथ नहीं जा सकती.’’

जबकि शावेज ने अपने पिता से कहा, ‘‘अब्बू चलिए, मैं आप के साथ चलूंगा.’’

दोनों कमरे से निकल कर चले गए और होटल के कमरे पर आ गए. शावेज अपने पिता के साथ अपने आप को बहुत सुरक्षित महसूस कर रहा था. बापबेटे अपनीअपनी कहानी सुनातेसुनाते सो गए. सुबह नाश्ता करने के बाद शावेज अपने पिता से इजाजत ले कर अपनी मां और बहन को समझा कर लाने के लिए चला गया. सुरैया ने शावेज को देख कर कहा, ‘‘एक रात भी नहीं काट सका अपने बाप के साथ?’’

इस पर शावेज बोला, ‘‘नहीं मां, यह बात नहीं है. तुम्हें इस सच्चाई का पता है कि यह सब तुम्हारा ही कियाधरा है. तुम ने ही हमें शराफत की दुनिया से निकाल कर इस गंदगी के ढेर पर ला पटका है.’’

शाहिदा ने गुस्से से फुफकारते हुए कहा, ‘‘यह भाषण देना बंद कर. अगर यहां रहना है तो शराफत से रह, नहीं तो अपना बोरियाबिस्तर उठा और जा यहां से.’’

‘‘तू अपनी बकवास बंद कर, मैं अम्मा से बात कर रहा हूं.’’

‘‘यह ठीक कह रही है शावेज, अगर तुझे यहां रहना है तो रह, नहीं तो मेरी भी सलाह यही है कि यहां से चला जा,’’ सुरैया ने कहा.

‘‘मां इतनी पत्थर दिल न बनो, अब्बू अपनी गलती पर बहुत शर्मिंदा हैं. अब वह भी तुम्हें ले जाने के लिए तैयार हैं. इस गंदगी से निकलो और मेरे साथ चलो.’’

इस पर शाहिदा बिफर पड़ी और चिल्ला कर उसे वहां से बाहर निकल जाने को कहा. शावेज उस के इस व्यवहार से इतना दुखी हुआ कि वह तेजी से ऊपर वाले कमरे की ओर दौड़ा. वह वापस लौटा तो हाथ में चमकीली कटार लिए हुए था. सुरैया कुछ बोलती, इस से पहले ही उस ने कटार शाहिदा के पेट में भोंक दी. मां बचाने आई तो उस ने दूसरा वार मां पर कर दिया. दोनों फर्श पर गिर कर तड़पने लगीं, वह तब तक वहां खड़ा रहा, जब तक वे ठंडी नहीं हो गईं. जब उसे यकीन हो गया कि दोनों जीवन की बाजी हार चुकी हैं तो कटार हाथ में लिए वह बाहर निकल गया. उस पर जिस की भी नजर पड़ी, वह इधरउधर छिप गया.

बाहर आ कर शावेज ने तांगा रोका और उस में बैठ कर सीधा थाने पहुंचा. वहां इंसपेक्टर मौजूद था. शावेज ने खूनसनी कटार इंसपेक्टर की मेज पर रख कर अपनी मां और बहन की हत्या के बारे में बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद इकबाल मांबेटी की लाशों को अपने घर ले गया और अपने बेटे के खिलाफ थाने में हत्या की तहरीर लिख कर दे दी. इस तरह एक व्यक्ति की गलती की वजह से हंसताखेलता पूरा परिवार बरबाद हो गया. Social Crime Story