Social Crime: रेप करने के बाद न्यूड फोटो खींचता निर्मल बाबा

Social Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक ढोंगी बाबा ने महिलाओं के साथ रेप किया और उस के बाद उन की न्यूड फोटो खींच लीं. चलिए जानते हैं आखिर कौन था यह ढोंगी बाबा जिस ने महिलाओं की इज्जत के साथ खेला था. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से, जिस से आप होंगे ऐसी घटनाओं के प्रति सजग और सचेत.

यह घटना छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले से सामने आई है. यहां एक महिला निर्मल बाबा के पास शरीर का दर्द ठीक कराने के लिए आई हुई थी. इस के बाद बाबा ने महिला के शरीर का दर्द ठीक करने का वायदा किया. महिला को इस तथाकथित बाबा ने मैहर के एक होटल में बुलाया. बाबा ने महिला को प्रसाद खिलाया. प्रसाद खा कर जब महिला बेहोश हो गई तो उस ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म करने के बाद उस ने महिला के न्यूड फोटो खींच लिए थे. महिला ने जब इस का विरोध किया तो उस ने अश्लील फोटो इंस्टाग्राम पर वायरल कर दिए.

पुलिस के अनुसार, यह मामला 11 अप्रैल, 2026 को पामगढ़ थाने में आया है, जहां एक पीड़ित महिला ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. महिला ने पुलिस को बताया कि निर्मल बाबा चैत्र नवरात्रि में पदयात्रा करते हुए आया था. निर्मल बाबा ने खुद को एक चमत्कारी बाबा बताया और कहा कि वह सारी समस्याएं दूर कर देता है. इस के बाद महिला अपने शरीर के दर्द की बीमारी को ठीक कराने के लिए अपनी सहेली के साथ बाबा के पास गई थी. इस के बाद बाबा ने उस का नंबर ले लिया.

महिला ने पुलिस को बताया कि इस के बाद बाबा ने कौल करके मार्केट बुलाया और प्रसाद का झांसा दिया और कहा इस से सब ठीक हो जाएगा. फिर वह उसे अपने साथ बिलासपुर ले गया, फिर ट्रेन से मध्य प्रदेश पहुंचा, जहां उसे एक होटल में ठहराया गया. वहां उस ने उस के साथ कई बार दुष्कर्म किया और अश्लील फोटो खींचीं और उसे छोड़कर भाग निकला.

बाबा महिला को बारबार कौल करके परेशान करने लगा, जिस से महिला ने परेशान हो कर उसे ब्लौक कर दिया. फिर बाबा ने महिला के नाम से एक इंस्टाग्राम आईडी बनाई और अश्लील फोटो वायरल कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

एसपी उमेश कश्यप के मार्गदर्शन और एसडीओपी (अकलतरा) प्रदीप कुमार सोरी ने बाबा की लोकेशन ट्रेस की. इस के बाद आरोपी को पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया.

बाबा के खिलाफ बीएन्स की धारा 64(2)(एम) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया गया है और उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
अगर आप भी ऐसे ढोंगी बाबाओं से सावधान रहना चाहते हैं, जो झूठी कहानियां सुनाकर लोगों को ठग लेते हैं तो इन घटनाओं को जरूर पढ़ें. मनोहर कहानियां आप को ऐसी घटनाओं के प्रति सचेत और जागरूक बनाती है, ताकि आप हर तरह की धोखाधड़ी और ठगी से खुद को बचा सकें. Social Crime

Social Crime Story: बदले की आग

Social Crime Story: इकबाल को इस बात का अहसास था कि उसी की गलती से पत्नी और बेटी हुस्न के बाजार में पहुंची हैं. शायद इसी वजह से वह उन्हें वापस घर ले जाने आया था. लेकिन वे नहीं मानीं. इस के बाद जो हुआ, वह बहुत बुरा था.

पूरा प्लेटफार्म रोशनी में नहाया हुआ था. कराची एक्सप्रेस अभीअभी आई थी, जो यात्रियों को उतार कर आगे बढ़ गई थी. प्लेटफार्म पर कुछ यात्रियों और स्टेशन स्टाफ के अलावा काली चादर में लिपटी अपनी 10 वर्षीया बेटी और 8 वर्षीय बेटे के साथ एक जवान औरत भी थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किसी की प्रतीक्षा कर रही हो. अक्की अकबर उर्फ अक्को कुली उस के पास से दूसरी बार उन्हें देखते हुए उधर से गुजरा तो उस महिला ने उसे इशारा कर के अपने पास बुलाया.

अक्को मुड़ा और उस के पास जा कर मीठे स्वर में पूछा, ‘‘जी, आप को कौन सी गाड़ी से जाना है?’’

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना, मैं ने तो केवल यह पूछने के लिए बुलाया है कि यहां चाय और खाने के लिए कुछ मिल जाएगा?’’

‘‘जी, बिलकुल मिल जाएगा, केक, रस, बिस्किट वगैरह सब कुछ मिल जाएगा.’’ अक्को ने उस महिला की ओर ध्यान से देखते हुए कहा.

गोरेचिट्टे रंग और मोटीमोटी आंखों वाली वह महिला ढेर सारे गहने और अच्छे कपड़े पहने थी. वह किसी अच्छे घर की लग रही थी. दोनों उस से लिपटे हुए थे. महिला के हाथ से सौ रुपए का नोट ले कर वह बाहर की ओर चला गया. कुछ देर में वह चाय और खानेपीने का सामान ले कर आ गया. चाय पी कर महिला बोली, ‘‘यहां ठहरने के लिए कोई सुरक्षित मकान मिल जाएगा?’’

महिला की जुबान से ये शब्द सुन कर अक्को को लगा, जैसे किसी ने उछाल कर उसे रेल की पटरी पर डाल दिया हो. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘जी, मैं कुछ समझा नहीं?’’

‘‘मैं अपने घर से दोनों बच्चों को ले कर हमेशा के लिए यहां आ गई हूं.’’ उस ने दोनों बच्चों को खुद से सटाते हुए कहा.

‘‘आप को यहां ऐसा कोई ठिकाना नहीं मिल सकता. हां, अगर आप चाहें तो मेरा घर है, वहां आप को वह सब कुछ मिल जाएगा, जो एक गरीब के घर में होता है.’’ अक्को ने कुछ सोचते हुए अपने घर का औफर दिया.

महिला कुछ देर सोचती रही, फिर अचानक उस ने चलने के लिए कह दिया. अक्को ने उस की अटैची तथा दोनों बैग उठाए और उन लोगों को अपने पीछे आने को कह कर चल दिया. मालगोदाम वाला गेट टिकिट घर के पीछे था, जहां लोगों का कम ही आनाजाना होता था. महिला को उधर ले जाते हुए उसे कोई नहीं देख सकता था. अक्को ने वही रास्ता पकड़ा. बाहर आ कर उस ने एक औटो में सामान रखा और महिला के बेटे को अपनी गोद में ले कर अगली सीट पर बैठ गया.

औटो चल पड़ा. रेलवे फाटक पार कर के अक्को ने औटो वाले से टैक्सी वाली गली में चलने को कहा. उस गली में कुछ दूर चल कर रास्ता खराब था, जिस की वजह से औटो वाले ने हाथ खड़े कर दिए. अक्को सामान उठा कर पैदल ही उन सब को अपने घर ले गया. दरवाजे पर पहुंच कर उस ने आवाज लगाई, ‘‘अम्मा.’’

अंदर से कमजोर सी आवाज आई, ‘‘आई बेटा.’’

मां ने दरवाजा खोला. पहले उस ने अपने बेटे को देखा, उस के बाद हैरानी भरी निगाह उन तीनों पर जम गई. अक्को सामान ले कर अंदर चला गया. वह एक छोटा सा 2 कमरों का पुराने ढंग का मकान था. इस घर में मांबेटे ही रह रहे थे. बहन की शादी हो चुकी थी, पिता गुजर गए थे. बाप कुली था, इसलिए बाप के मरने के बाद बेटे ने लाल पगड़ी पहन ली थी और स्टेशन पर कुलीगिरी करने लगा था. मां ने महिला और उस के दोनों बच्चों के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और अक्को की ओर देखने लगी.

अक्को ने कहा, ‘‘मां, ये लोग कुछ दिन हमारे घर मेहमान बन कर रहेंगे.’’

मां उन लोगों की ओर देख कर बोली, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, मेहमानों के आने से तो घर में रौनक आ जाती है.’’

सुबह हो चुकी थी, अक्को ने मां से कहा, ‘‘अम्मा, तुम चाय बनाओ, मैं नाश्ते का सामान ले आता हूं.’’

कुछ देर में वह सामान ले आया. मां, बेटे और बेटी ने नाश्ता किया. अक्को ने अपना कमरा मेहमानों को दे दिया और खुद अम्मा के कमरे में चला गया. नाश्ते के बाद तीनों सो गए.

मां ने अक्को को अलग ले जा कर पूछा, ‘‘बेटा, ये लोग कौन हैं, इन का नाम क्या है?’’

उस ने जवाब दिया, ‘‘मां, मुझे खुद इन का नाम नहीं मालूम. ये लोग कौन हैं, यह भी पता नहीं. ये स्टेशन पर परेशान बैठे थे. छोटे बच्चों के साथ अकेली औरत कहीं किसी मुसीबत में न फंस जाए, इसलिए मैं इन्हें घर ले आया. अम्मा तुम्हें तो स्टेशन का पता ही है, कैसेकैसे लोग आते हैं. किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता.’’

‘‘बेटे, तुम ने यह बहुत अच्छा किया, जो इन्हें यहां ले आए. खाने के बाद इन से पूछेंगे.’’

दोपहर ढलने के बाद वे जागे. कमरे की छत पर बाथरूम था, तीनों बारीबारी से नहाए और कपड़े बदल कर नीचे आ गए. मां ने खाना लगा दिया. आज काफी दिनों बाद उन के घर में रौनक आई थी. सब ने मिल कर खाना खाया. खाने के बाद महिला ने मां से कहा, ‘‘मेरा नाम सुरैया है, बेटे का नाम शावेज और बेटी का शाहिदा. हम बहावलपुर के रहने वाले हैं. मेरे पति का नाम मोहम्मद इकबाल है. वह सरकारी दफ्तर में अफसर हैं.’’ कह कर सुरैया मां के साथ बरतन साफ करने लगी. इस के बाद उस ने खुद ही चाय बनाई और चाय पीते हुए बोली, ‘‘आप की बड़ी मेहरबानी, जो हमें रहने का ठिकाना दे दिया.’’

मां ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटी, जिस ने पैदा किया है, वह रहने का भी इंतजाम करता है और खाने का भी. लेकिन यह बताओ बेटी कि इतना बड़ा कदम तुम ने उठाया किस लिए?’’

‘‘मां जी, मेरे साथ जो भी हुआ, वह वक्त का फेर था. मेरे साथसाथ बच्चे भी घर से बेघर हो गए. मेरे पति और मैं ने शादी अपनी मरजी से की थी. मेरे मांबाप मेरी मरजी के आगे कुछ नहीं बोल सके. शादी के कुछ सालों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन धीरेधीरे पति का रवैया बदलता गया.’’

थोड़ा रुक कर वह आगे बोली, ‘‘शाहिदा के बाद शावेज पैदा हुआ. इस के जन्म के कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि इकबाल ने दूसरी शादी कर ली है. मैं ने एक दिन उन से कहा, ‘तुम ने दूसरी शादी कर ली है तो उसे घर ले आओ. हम दोनों बहनें बन कर रह लेंगे. तुम 2-2 दिन घर नहीं आते तो बच्चे पूछते हैं, मैं इन्हें क्या जवाब दूं?’

‘‘उस ने कुछ कहने के बजाए मेरे मुंह पर थप्पड़ मारने शुरू कर दिए. उस के बाद बोला, ‘मैं ने तुम्हें इतनी इजाजत नहीं दी है कि तुम मेरी निजी जिंदगी में दखल दो. और हां, कान खोल कर सुन लो, तुम अपने आप को अपने बच्चों तक सीमित रखो, नहीं तो अपने बच्चों को साथ लो और मायके चली जाओ.’

‘‘इस के बाद इकबाल अपना सामान ले कर चला गया और कई दिनों तक नहीं आया. फोन भी नहीं उठाता था. एकदो बार औफिस का चपरासी आ कर कुछ पैसे दे गया. काफी छानबीन के बाद मैं ने पता लगा लिया कि उन की दूसरी बीवी कहां रहती है. बच्चों को स्कूल भेज कर मैं उस के फ्लैट पर पहुंच गई.

‘‘कालबैल बजाने के थोड़ी देर बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला. मैं ने अनुमान लगा लिया कि यही वह लड़की है, जिस ने मेरे जीवन में जहर घोला है. वह भी समझ गई कि मैं इकबाल की पत्नी हूं. उस ने मुझे अंदर आने को कहा. मैं अंदर गई, कमरे में सामने इकबाल की बड़ी सी फोटो लगी थी, उसे देखते ही मेरे शरीर में आग सी लग गई.

‘आपी, मैं ने उन से कई बार कहा कि वह अपने बच्चों के पास जा कर रहें, लेकिन वह मुझे डांट कर चुप करा देते हैं.’ उस ने कहा. इस के बाद उस ने मुझे पीने के लिए कोक दी.

‘‘मैं ने उस के पहनावे पर ध्यान दिया, वह काफी महंगा सूट पहने थी और सोने से लदी थी. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि इकबाल उस पर दिल खोल कर खर्च कर रहे हैं. जबकि हमें केवल गुजारे के लिए ही पैसे देते हैं. उस ने अपना नाम नाहिदा बताया.

मैं ने कहा, ‘देखो नाहिदा, तुम इकबाल को समझाओ कि वह तुम्हें ले कर घर में आ कर रहें. हम सब साथसाथ रहेंगे. बच्चों को उन की बहुत जरूरत है. उस ने कहा, ‘आपी, मैं उन्हें समझाऊंगी.’

‘‘उस से बात कर के मैं घर आ गई. जो आंसू मैं ने रोक रखे थे, वह घर आ कर बहने लगे. शाम को इकबाल का फोन आया. उन्होंने मुझे बहुत गालियां दीं, साथ ही कहा कि मेरी हिम्मत कैसे हुई उन का पीछा करने की. मैं ने 2-3 बार उन्हें फोन किया, उन्होंने केवल इतना ही कहा कि उन्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं है. बच्चों के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें शक है कि ये उन के बच्चे नहीं हैं. फिर मैं ने सोच लिया कि अब मुझे उन के साथ नहीं रहना. वह पत्थर हो चुके हैं.’’

इतना कह कर सुरैया सिसकियां भरभर कर रो पड़ी. अक्को और उस की मां ने कहा, ‘‘आप रोएं नहीं, जब तक आप का दिल चाहे, आप यहां रहें, आप को किसी चीज की कमी नहीं रहेगी.’’

जिस आबादी में अक्को कुली का घर था, उस के आखिरी छोर पर नई आबादी थी. वह रेडलाइट एरिया था. गरमियों के दिन थे, छत पर चारपाइयां लगा दी जातीं. सब लोग छत पर ही सोते थे. शाम होते ही नई आबादी में रोशनी हो जाती, संगीत और घुंघरुओं की आवाज पर सुरैया बुरी तरह चौंकी. अक्को ने बताया कि ये रेडलाइट एरिया है, यहां शाम होते ही नाचगाना शुरू हो जाता है. मोहल्ले वालों ने बहुत कोशिश की कि रेडलाइट एरिया यहां से खत्म हो जाए, लेकिन किसी की नहीं सुनी गई. अब हमारे कान तो इस के आदी हो गए हैं.

ऊपर छत पर खड़ेखड़े बाजार में बैठी वेश्याएं और आतेजाते लोग दिखाई देते थे. शाहिदा ने वहां का नजारा देख कर एक दिन अपने भाई शावेज से पूछा, ‘‘भाई, इन दरवाजों के बाहर कुरसी पर जो औरतें बैठी हैं, वे क्या करती हैं? कभी दरवाजा बंद कर लेती हैं तो थोड़ी देर बाद खोल देती हैं. फिर किसी दूसरे के साथ अंदर जाती हैं और फिर दरवाजा बंद कर लेती हैं.’’

शावेज ने जवाब दिया, ‘‘मुझे क्या पता, होगा कोई उन के घर का मामला.’’

उस समय शावेज भी खुलते बंद होते दरवाजों को देख रहा था. सुरैया भी यह सब रोजाना देखती थी, कुछ इस नजरिए से मानो कोई फैसला करना चाहती हो. जो पैसे वह अपने साथ लाई थी, धीरेधीरे वे खत्म हो रहे थे. बस कुछ जेवरात बाकी थे, जिन में से एक लौकेट और चेन बिक चुकी थी.

एक दिन अक्को कुली और सुरैया छत पर बैठे दीवार के दूसरी ओर उन दरवाजों को खुलता और बंद होते देख रहे थे. तभी सुरैया ने पूछा, ‘‘अक्को, धंधा करने वाली इन औरतों को पुलिस नहीं पकड़ती?’’

अक्को ने बताया कि उन्हें सरकार की ओर से धंधा करने का लाइसेंस दिया गया है. उन्हें लाइसेंस की शर्तों पर ही काम करना होता है.

सुरैया ने पूछा, ‘‘अक्को, क्या तुम कभी उधर गए हो?’’

‘‘एकआध बार अनजाने में उधर चला गया था, लेकिन तुम यह सब क्यों पूछ रही हो?’’ अक्को ने आश्चर्य से पूछा.

सुरैया कहने लगी, ‘‘मेरे अंतरमन में एक अजीब सी लड़ाई चल रही है. मैं इकबाल को यह बताना चाहती हूं कि औरत जब बदला लेने पर आ जाए तो सभी सीमाएं लांघ सकती है.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं?’’ अक्को चौंका.

‘‘मैं इस बाजार की शोभा बनना चाहती हूं.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है?’’ अक्को ने साधिकार उसे डांटते हुए कहा.

‘‘अक्को तुम मेरे जीवन के उतारचढ़ाव को नहीं जानते. मैं ने इकबाल के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया. उस की खूब सेवा भी की और इज्जत भी बना कर रखी. लेकिन उस ने मुझे क्या दिया?’’ सुरैया की आवाज भर्रा गई.

अक्को ने उसे सांत्वना दे कर पूछा, ‘‘तुम अपनी सोच बताओ, फिर मैं तुम्हें कोई सलाह दूंगा.’’

वह कुछ सोच कर बोली, ‘‘मैं शाहिदा को नाचनागाना सिखाना चाहती हूं.’’

अक्को कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘अच्छा, मैं इस बाजार के चौधरी दारा से बात करूंगा.’’

अगले दिन उस ने दारा से बात कर के सुरैया को उस से मिलवा दिया. शाहिदा के भोलेपन, सुंदरता और सुरैया की भरपूर जवानी ने दारा के दिल पर भरपूर वार किया. उस ने चालाकी से अपना घर उन के लिए पेश कर दिया और थाने जा कर सुरैया और शाहिदा का वेश्या बनने का प्रार्थना पत्र जमा कर दिया. कुछ ही दिनों में मांबेटी ने उस इलाके के जानेमाने उस्तादों से नाचनेगाने की ट्रेनिंग ले ली. पहली बार मांबेटी सजधज कर कोठे पर बैठीं तो लोगों की भीड़ लग गई.

शाहिदा की आवाज में जादू था, फिर पूरे बाजार में यह बात मशहूर हो गई कि यह किसी बड़े घर की शरीफ लड़की है, जिस ने अपनी इच्छा से वेश्या बनना पंसद किया है. दारा चूंकि शाहिदा को अपनी बेटी बना कर कोठे पर लाया था, इसलिए दोनों की इज्जत थी. पूरे शहर में शाहिदा के हुस्न के चर्चे थे. देखतेदेखते बड़ेबड़े रईसजादे उस की जुल्फों में गिरफ्तार हो गए. जब शाहिदा अपनी आवाज का जादू चला तो नोटों के ढेर लग जाते. उस के एक ठुमके पर नोट उछलउछल कर दीवारों से टकरा कर गिरने लगते.

शाहिदा के भाई शावेज के खून में बेइज्जती तो आ गई थी, लेकिन जब कभी उस के शरीर में खानदानी खून जोश मारने लगता तो वह अपनी मांबहन से झगड़ने लगता. लेकिन वे दोनों उस की एक भी नहीं चलने देती थीं. शाहिदा की नथ उतराई की रस्म शहर के बहुत बड़े रईस असलम के हाथों हुई, जिस के एवज में लाखों की रकम हाथ लगी. असलम जब आता, ढेरों सामान ले कर आता. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. असलम शहर का बदमाश भी था. बातबात पर वह रिवौल्वर निकाल लेता था, लेकिन वही असलम शाहिदा के पैरों की मिट्टी चाटने लगता था.

एक दिन दबी जुबान से असलम ने उस की मां से शाहिदा को कोठे पर मुजरा न करने के लिए कहा तो उस की मां ने कहा, ‘‘उतर जाओ इस कोठे से, तुम से बढ़ कर सैकड़ों धनवान है मेरी शाहिदा के चाहने वाले. अब कभी इस कोठे पर आने की हिम्मत भी न करना.’’

असलम ने माफी भी मांगी, लेकिन सुरैया नरम नहीं पड़ी. असलम चला गया. सुरैया अक्को कुली को कुछ न कुछ देती रहती थी, क्योंकि उसी की वजह से वह इस कोठे पर बैठी थी. पूरे शहर में शाहिदा और असलम के चरचे थे. मांबेटी बनठन कर रोज शाम को तांगे में बैठ कर निकलतीं तो लोग उन्हें देखते रह जाते. तांगे पर उन का इस तरह निकलना कारोबारी होता था, इस से वे रोज कोई न कोई नया पंछी फांस लेती थीं.

एक दिन शावेज अपनी बहन शाहिदा और मां से उलझ गया. बात हाथापाई तक पहुंच गई. उस ने शाहिदा के मुंह पर इतनी जोरों से थप्पड़ मारा कि उस के गाल पर निशान पड़ गया. सुरैया को गुस्सा आया तो उस ने उसे डांटडपट कर घर से निकाल दिया. शावेज गालियां देता हुआ घर से निकल गया और एक हकीम की दुकान पर जा बैठा. वहां वह अकसर बैठा करता था. उस की मां को वहां बैठने पर आपत्ति थी, क्योंकि उसे लगता था कि वही हकीम उसे उन के खिलाफ भड़काता है. शावेज ने असलम और एकदो ग्राहकों से भी अभद्र व्यवहार किया था.

वेश्या बाजार के वातावरण ने शावेज को नशे का आदी बना दिया था, वह जुआ भी खेलने लगा था. उस के खरचे बढ़ रहे थे, लेकिन उस की मां उसे खरचे भर के ही पैसे देती थी. वह जानबूझ कर लोगों से लड़ाईझगड़ा मोल लेता था. इसी चक्कर में वह कई बार थाने की यात्रा भी कर आया था, जिस की वजह से उस के मन से पुलिस का डर निकल गया था. रात गए तक शावेज हकीम की दुकान के आगे बैठा रहा. जब बाजार बंद हुआ तो सुरैया को शावेज की चिंता हुई. मांबेटी उसे देखने आईं तो वह हकीम की दुकान पर बैठा मिला. दोनों उसे मना कर कोठे पर ले गई.

उधर इकबाल को पता चला कि उस की बीवी और बेटी हुस्न के बाजार में बैठ कर उस की इज्जत का जनाजा निकाल रही हैं तो अपनी इज्जत बचाने के लिए वह परेशान हो उठा. उस ने अपनी पत्नी सुरैया और बच्चों के घर से जाने की खबर पुलिस को नहीं दी थी. 8 सालों बाद एक दिन उस के एक जानने वाले ने सुरैया और उस की बेटी को कोठे पर बैठे देखा तो यह बात उसे बताई थी. इकबाल चाहता तो पुलिस को सूचना दे कर उन्हें अपने साथ ले जा सकता था. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. हुस्न का बाजार जनरल बसस्टैंड के पास था. इकबाल ने वहां पास के एक होटल में कमरा लिया और शाम होने का इंतजार करने लगा.

शाम होते ही वेश्या बाजार सज गया. इकबाल ने कमरा लौक किया और रेडलाइट एरिया में आ गया. उसे सुरैया बेगम का कोठा ढूंढने में कोई परेशानी नहीं हुई. मांबेटी दोनों सजसंवर कर ग्राहकों के इंतजार में बैठी थीं. इकबाल को देख कर दोनों पत्थर की मूर्ति बन गईं. दोनों उठीं और इकबाल को कमरे के अंदर आने के लिए इशारा किया. इकबाल उन के पीछे कमरे में अंदर गया तो देखा शावेज टीवी देख रहा था. पिता को देख कर वह खड़ा हो गया. चारों एकदूसरे को देख रहे थे.

इकबाल ने कहा, ‘‘सुरैया, तुम ने इतनी छोटी गलती के लिए मुझे इतनी बड़ी सजा दी. तुम्हारे घर से निकलने के बाद मैं ने तुम्हारे लिए अपनी दूसरी पत्नी को भी छोड़ दिया. कहांकहां नहीं ढूंढा तुम्हें. शायद मैं यह दिन देखने के लिए जिंदा था. काश, मैं पहले ही मर गया होता.’’

इकबाल की आंखों से आंसू निकलने लगे. सुरैया के मन में पति का प्रेम उमड़ पड़ा. वह उस के आंसू पोंछने पास गई और गुजरी स्थितियों के बारे में बताने लगी. दोनों बच्चे भी अपने पिता से लिपट कर रो पड़े. उन सब को रोता देख चौधरी दारा अंदर आया तो इकबाल को देख कर ठिठक गया. सुरैया ने बताया कि यह उस के पति हैं. जब सब रो चुके तो इकबाल ने सुरैया से घर चलने को कहा. लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि अब वे शरीफ लोगों में नहीं जा सकते. हां, अगर शावेज जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हो.

इकबाल अपनी बेटी शाहिदा से चलने को कहा तो उस ने मां के स्वर में स्वर मिलाया, ‘‘अब्बू, अम्मी ठीक कह रही हैं, मैं आप के साथ नहीं जा सकती.’’

जबकि शावेज ने अपने पिता से कहा, ‘‘अब्बू चलिए, मैं आप के साथ चलूंगा.’’

दोनों कमरे से निकल कर चले गए और होटल के कमरे पर आ गए. शावेज अपने पिता के साथ अपने आप को बहुत सुरक्षित महसूस कर रहा था. बापबेटे अपनीअपनी कहानी सुनातेसुनाते सो गए. सुबह नाश्ता करने के बाद शावेज अपने पिता से इजाजत ले कर अपनी मां और बहन को समझा कर लाने के लिए चला गया. सुरैया ने शावेज को देख कर कहा, ‘‘एक रात भी नहीं काट सका अपने बाप के साथ?’’

इस पर शावेज बोला, ‘‘नहीं मां, यह बात नहीं है. तुम्हें इस सच्चाई का पता है कि यह सब तुम्हारा ही कियाधरा है. तुम ने ही हमें शराफत की दुनिया से निकाल कर इस गंदगी के ढेर पर ला पटका है.’’

शाहिदा ने गुस्से से फुफकारते हुए कहा, ‘‘यह भाषण देना बंद कर. अगर यहां रहना है तो शराफत से रह, नहीं तो अपना बोरियाबिस्तर उठा और जा यहां से.’’

‘‘तू अपनी बकवास बंद कर, मैं अम्मा से बात कर रहा हूं.’’

‘‘यह ठीक कह रही है शावेज, अगर तुझे यहां रहना है तो रह, नहीं तो मेरी भी सलाह यही है कि यहां से चला जा,’’ सुरैया ने कहा.

‘‘मां इतनी पत्थर दिल न बनो, अब्बू अपनी गलती पर बहुत शर्मिंदा हैं. अब वह भी तुम्हें ले जाने के लिए तैयार हैं. इस गंदगी से निकलो और मेरे साथ चलो.’’

इस पर शाहिदा बिफर पड़ी और चिल्ला कर उसे वहां से बाहर निकल जाने को कहा. शावेज उस के इस व्यवहार से इतना दुखी हुआ कि वह तेजी से ऊपर वाले कमरे की ओर दौड़ा. वह वापस लौटा तो हाथ में चमकीली कटार लिए हुए था. सुरैया कुछ बोलती, इस से पहले ही उस ने कटार शाहिदा के पेट में भोंक दी. मां बचाने आई तो उस ने दूसरा वार मां पर कर दिया. दोनों फर्श पर गिर कर तड़पने लगीं, वह तब तक वहां खड़ा रहा, जब तक वे ठंडी नहीं हो गईं. जब उसे यकीन हो गया कि दोनों जीवन की बाजी हार चुकी हैं तो कटार हाथ में लिए वह बाहर निकल गया. उस पर जिस की भी नजर पड़ी, वह इधरउधर छिप गया.

बाहर आ कर शावेज ने तांगा रोका और उस में बैठ कर सीधा थाने पहुंचा. वहां इंसपेक्टर मौजूद था. शावेज ने खूनसनी कटार इंसपेक्टर की मेज पर रख कर अपनी मां और बहन की हत्या के बारे में बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद इकबाल मांबेटी की लाशों को अपने घर ले गया और अपने बेटे के खिलाफ थाने में हत्या की तहरीर लिख कर दे दी. इस तरह एक व्यक्ति की गलती की वजह से हंसताखेलता पूरा परिवार बरबाद हो गया. Social Crime Story

Love Crime: 10 साल बाद

Love Crime: सीमा ने 10 साल पहले भाग कर दूसरी जाति के रामू के साथ प्रेम विवाह कर लिया था. वह उस के साथ सुखी तो थी ही, उस के 2 बच्चों की मां भी बन गई थी. इतने दिनों बाद भी घर वाले उस के इस प्रेम को बरदाश्त नहीं कर सके और…

अमित ने जीजा के पैर छूते हुए उन का उखड़ा मूड देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है जीजाजी, आजआप कुछ नाराज से लग रहे हैं?’’

‘‘नाराजगी की वजह तुम अच्छी तरह जानते हो अमित. 10 साल से हम जिस आग में जल रहे हैं, वह तुम्हें बताने की जरूरत नहीं है.’’

अमित ने बहनोई को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, बात काफी पुरानी हो चुकी है, इसलिए अब तो उसे भूल जाना चाहिए.’’

लेकिन जगदीश उस बात को भुलाना नहीं चाहता था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी जगह मैं होता तो परिवार की उस बेइज्जती का बदला ले कर रहता.’’

जगदीश की इस बात से अमित सोच में पड़ गया. उस की बहन सीमा ने जो किया था, क्या वह इतना बड़ा अपराध था कि उस के लिए जीजाजी जो कह रहे हैं, क्या वह उचित है? अमित उर्फ भूरा 23 साल का हो गया था. जब उस की बहन सीमा ने दूसरे जाति के लड़के से शादी कर के घर छोड़ा था, तब वह 10-11 साल का था. खटीक जाति का गंगा सिंह एटा जिले के थाना रिजोर के गांव इब्राहीमपुर में रहता था. उसी का बेटा था अमित. उस के अलावा गंगा सिंह की 4 बेटियां थीं ममता, यशोदा, रमा और सीमा. परिवार बकरियों की खरीदफरोख्त का काम करता था. इस धंधे में इतनी कमाई हो जाती थी कि जिंदगी मजे से चल रही थी.

गंगा सिंह के घर से कुछ ही दूरी पर कुम्हार जाति का काशीराम रहता था. उस के 2 बेटे थे रामू और पुष्पेंद्र. पुष्पेंद्र की शादी रीना से हो गई थी, जबकि रामू अविवाहित था. पड़ोसी होने के नाते गंगा सिंह और काशीराम का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. इसी आनेजाने में गंगा सिंह की बेटी सीमा और काशीराम का बेटा रामू एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

सीमा खूबसूरत और हमेशा खुश रहने वाली लड़की थी तो रामू जवान और कामकाजी लड़का था. सीमा उसी जैसे पति के सपने देखती थी. इसीलिए वह जब भी रामू को देखती, उस का दिल धड़क उठता. रामू पढ़ालिखा भी था, जबकि सीमा की जाति में पढ़ेलिखे लड़के कम ही मिलते थे. इस तरह सीमा मन ही मन उसे चाहने लगी थी.

सीमा गांव की अन्य लड़कियों से थोड़ा अलग थी, इसलिए वह लड़कों में आकर्षण का केंद्र थी. लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कोई उसे कुछ कह दे. एक दिन सीमा खेतों में बकरियों का चारा लेने गई. वह चारे का बोझ उठाने के लिए इधरउधर देख रही थी. तभी रामू न जाने कहां से आ गया. सीमा ने उसे इशारे से बुलाया तो उस ने पास आ कर कहा, ‘‘सीमा, तुम इतना बड़ा बोझ उठा ले जाओगी?’’

सीमा ने तिरछी नजरों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘अब तुम आ गए हो तो इसे संभालोगे नहीं?’’

रामू ने सीमा की आंखों में झांका तो उन में उसे कुछ ऐसा दिखाई दिया, जो उसे अपनी ओर खींच रहा था. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘इस बोझ को तो मैं हंसतेहंसते जीवन भर संभालने को तैयार हूं.’’

‘‘अच्छा, तुम्हें खुद पर इतना गुमान है?’’

‘‘अगर अच्छी सूरत मेरे ऊपर इस तरह मेहरबान है तो मुझे गुमान होगा ही.’’ कह कर रामू ने बोझ उठा लिया.

सीमा ने हैरानी से कहा, ‘‘लाओ, बोझ मुझे दे दो, गांव के किसी ने देख लिया तो बिना मतलब की बातें होंगी.’’

‘‘पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो और कौन करेगा?’’ रामू ने कहा.

‘‘रामू, बहुत दिनों से मैं तुम से एक बात कहना चाहती हूं.’’

‘‘तो आज कह डालो.’’

‘‘तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो. क्या मैं भी तुम्हें अच्छी लगती हूं?’’

रामू सोच में पड़ गया. अच्छे लगने का मतलब वह अच्छी तरह से समझता था. उस के दिमाग में तुरंत आया कि अगर इस बात की जानकारी खटीकों को हो गई तो बवाल हो जाएगा. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सीमा ने अपना हाथ बढ़ा कर कहा, ‘‘मेरा हाथ थाम लो रामू, मैं सिर्फ तुम्हारी हूं.’’

रामू की रगों में जवानी का खून था. वह भी सीमा को पसंद करता था. सीमा के स्पर्श से वह आवेश में आ गया. उस ने सीमा का हाथ थाम कर कहा, ‘‘लो हाथ थाम लिया, अब तुम मेरी हो. मैं जीवन भर तुम्हारा यह हाथ नहीं छोड़ूंगा. इस के लिए मुझे चाहे जो भी करना पड़े.’’

उस दिन दोनों ने एकदूसरे को मन और वचन से अपना तो लिया, लेकिन उन्हें पता था कि उन के प्यार की राह में जाति एक ऐसी बाधा है, जिसे पार करना आसान नहीं होगा. इस के बावजूद उन्होंने प्यार ही नहीं किया, उसे आजीवन निभाने का निर्णय भी ले लिया. रामू को पता था कि शादी के लिए न तो उस के घर वाले राजी होंगे और न सीमा के. इसलिए वह पैसे इकट्ठे करने लगा कि अगर सीमा के साथ उसे घर छोड़ना पड़े तो उस के पास इतने पैसे होने चाहिए कि वह कहीं भी व्यवस्थित हो सके. अगर हाथ में पैसा रहेगा तो वह कहीं भी रह लेगा.

सीमा की 3 तीनों बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थीं. सब से बड़ी बहन ममता डुड़ला में जगदीश के साथ ब्याही थी. वह फूल बेचने का काम करता था. सीमा के घर वालों को उस के और रामू के प्यार का पता नहीं चल पाया, लेकिन न जाने कहां से उस के जीजा जगदीश को इस बात की जानकारी हो गई. उस ने ससुराल आ कर सासससुर को खूब खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुम लोग एक लड़की नहीं संभाल सके. दूसरे गांव में रह कर मुझे पता चल गया कि सीमा रामू कुम्हार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है और तुम लोग हो कि आंखें मूंदे बैठे हो.’’

दामाद की बात पर गंगा सिंह के कान खड़े हो गए. उस ने सीमा से पूछा तो उस ने मना करते हुए कहा कि जीजाजी उस पर झूठा इल्जाम लगा रहे हैं, वह रामू से बाहर कभी नहीं मिली. दामाद की बात को गंगा सिंह और निर्मला ने भले ही गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन उन की समझ में यह बात जरूर आ गई थी कि बेटी जवान हो चुकी है, अब इस का ब्याह कर देना चाहिए. उस के लिए लड़के की खोज तो शुरू ही हो गई, उस पर नजर भी रखी जाने लगी.

जबकि जगदीश ने यह दांव चल कर कुछ दूसरा ही सोचा था. वह सीमा की शादी अपने छोटे भाई से करवाना चाहता था. उसे सीमा की ऐसी कमी मिल गई थी, जिस की बदौलत वह सासससुर को बदनामी का डर दिखा कर मौके का फायदा उठाना चाहता था. दरअसल, उस का भाई शराबी और जुआरी तो था ही, कोई कामधंधा भी नहीं करता था. इसलिए सीमा के घर वाले इस रिश्ते के लिए जल्दी तैयार नहीं होते.

मौके का फायदा उठाने के लिए एक दिन जगदीश ससुराल आया और सासससुर से बदनामी की बात कह कर उस ने सीमा की शादी अपने भाई से करने को कहा तो उस की बातें सुन कर सीमा ने गुस्से में कहा, ‘‘जीजा, तुम ने सोच कैसे लिया कि मैं तुम्हारे उस आवारा भाई से शादी कर लूंगी.’’

गंगा सिंह और निर्मला सन्न रह गए. रामू और सीमा के मिलनेजुलने की बात भले ही उन्हें बरदाश्त नहीं थीं, लेकिन वे सीमा की शादी जगदीश के भाई से भी नहीं करना चाहते. उन्होंने दामाद को यह कह कर चुप करा दिया कि इस मामले पर फिर कभी बात करेंगे. सीमा सब कुछ समझ चुकी थी. वह रामू से मिली और उस से साफसाफ कह दिया कि जो भी करना है, जल्दी करो, वरना किसी दिन जगदीश अपने भाई से उस की शादी करा देगा.

गांव में रहते रामू और सीमा की शादी हो नहीं सकती थी. इसलिए एक दिन रामू ने सीमा के साथ गांव छोड़ दिया. पैसे उस ने जमा ही कर रखे थे. वह सीमा को ले कर हरियाणा के शहर पानीपत आ गया और कमरा किराए पर ले कर सीमा के साथ रहने लगा. उस ने सीमा के साथ मंदिर में शादी भी कर ली थी. गुजरबसर के लिए उस ने एक फैक्ट्री में नौकरी भी कर ली थी. इस तरह रामू और सीमा ने जातिबिरादरी के पचड़ों से दूर आ कर अपनी अलग दुनिया बसा ली थी.

लेकिन दूसरी ओर वे जिस दुनिया को छोड़ आए थे, वहां आग लग चुकी थी. सब से ज्यादा नाराज जगदीश था. उस ने पहले तो सासससुर की खूब लानतमलानत की, उस के बाद ससुर को साथ ले कर थाना रिजोर पहुंचा और रामू के खिलाफ सीमा को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने जितना हो सकता था, रामू के घर वालों को तो परेशान किया ही, कुरकी तक कर डाली, पर रामू और सीमा का कुछ पता नहीं चला. पता चलता भी कैसे, रामू ने घर छोड़ने के बाद उधर झांका ही नहीं. सब कुछ भुला कर रामू और सीमा अपनी दुनिया में खुश थे. उन्होंने घर वालों से पूरी तरह संबंध तोड़ लिए थे. सीमा ने देव को जन्म दिया तो दोनों बेटे के साथ अपनी दुनिया में मस्त हो गई.

लेकिन सीमा के घर वाले उस की इस हरकत को पचा नहीं पा रहे थे. इस की एक वजह यह थी कि बिरादरी वाले सीमा के घर वालों को अपमानित करते रहते थे. सीमा जब घर से भागी थी, तब अमित काफी छोटा था. लेकिन जब वह बड़ा हुआ और बहन के भागने की बात समझ में आई तो उसे लगा कि बहन ने दूसरी जाति के लड़के ताने मार कर के साथ भाग कर अच्छा नहीं किया. रहीसही कसर जगदीश पूरी कर देता था.

एक दिन अचानक गांव में यह बात फैल गई कि रामू, सीमा और बच्चे के साथ फिरोजाबाद में रह रहा है. अमित की नफरत भड़क उठी, लेकिन गंगा सिंह और निर्मला ने उसे समझाया कि जब सीमा रामू के साथ खुश है तो अब उन्हें सब कुछ भुला देना चाहिए. मांबाप के समझाने पर अमित रामू से मिलने गया तो रामू ने उसे गले लगा लिया. इस से अमित को लगा कि रामू इतना बुरा नहीं है, जितना जगदीश उसे बताता रहा है.

इस के बाद सीमा की बहनें भी उस के यहां आनेजाने लगीं. लेकिन रामू ने कभी किसी पर विश्वास नहीं किया. यही वजह थी कि वह सीमा और बेटे को ले कर कभी गांव नहीं गया. उसी बीच बेटी तनु पैदा हुई. अब उन के 2 बच्चे हो गए थे. सब ठीक हो गया था, लेकिन जगदीश के कलेजे की आग अभी तक ठंडी नहीं हुई थी. वह रामू को खत्म कर के सीमा की शादी अपने भाई से करवा कर अपनी उस आग को ठंडी करना चाहता था. इस के लिए वह अमित को अपने साथ मिलाना चाहता था. यही वजह थी कि मौका मिलने पर वह उसे भड़काता रहता था.

एक दिन जगदीश भी सीमा के घर जा पहुंचा. जीजा का आना सीमा को अच्छा नहीं लगा, लेकिन घर आए मेहमान को वह भगा भी नहीं सकती थी. बातचीत में जगदीश ने जब कहा कि उस की वजह से समाज में उन की बड़ी बदनामी हुई है, अगर वह चाहे तो अभी भी सब ठीक हो सकता है. इस पर सीमा ने पूछा कि वह कैसे तो जगदीश ने कहा, ‘‘हम रामू को ठिकाने लगा कर तुम्हारी शादी अपने भाई से करवा देंगे. इस तरह तुम्हारा घर भी बस जाएगा और समाज में हमारी इज्जत भी वापस आ जाएगी.’’

‘‘तो अभी तक तुम्हारे भाई की शादी नहीं हुई? वैसे भी उस आवारा से शादी करेगा ही कौन? जीजाजी, अच्छा यही होगा कि अब तुम चुपचाप यहां से निकल लो, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. एक बात और, अगर किसी ने मेरे पति पर बुरी नजर डाली तो मैं उसे छोड़ूंगी नहीं.’’

जगदीश साली से बेइज्जत हो कर चला तो आया, लेकिन उस ने तय कर लिया कि वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. इस के बाद उस ने रामू को कई बार ठिकाने लगाने की कोशिश की, लेकिन हर बार रामू बच गया.

अब सीमा उस के निशाने पर थी. उस ने सीमा के मौसेरे भाई अशोक और अमित को भड़काना शुरू किया. उस की बातों में आ कर अमित को भी लगने लगा कि सीमा ने जो किया है, उस से उस के परिवार की बड़ी बेइज्जती हुई है, इसलिए उसे जिंदा रहने का हक नहीं. आखिर सब ने मिल कर सीमा के नाम मोत का फरमान जारी कर दिया. रामू फिरोजाबाद के किशननगर में वीरपाल यादव के मकान में किराए पर रहता था.

10 अक्तूबर, 2015 की शाम 4 बजे सीमा ने मकान मालकिन राजबेदी से कहा कि भाई का फोन आया है कि मां की तबीयत बहुत खराब है, इसलिए वह आसफाबाद चौराहे पर उस का इंतजार कर रहा है. वह उस के साथ मां को देखने अस्पताल जा रही है. इस के बाद सीमा अपने 8 साल के बेटे देव और 4 साल की बेटी तनु को ले कर चली गई. आसफाबाद चौराहे पर अमित थ्री व्हीलर लिए खड़ा था. वह सीमा और बच्चों को उस पर बैठा कर इधरउधर घुमाने और लगा. शाम होने लगी तो सीमा ने कहा, ‘‘जल्दी करो, मुझे घर भी जाना है.’’

अमित ने किसी को फोन किया तो थोड़ी ही देर में एक कार उस के पास आ कर रुकी. उस में से जगदीश और अशोक उतरे तो सीमा को शक हुआ. उस ने बच्चों के साथ भागना चाहा तो तीनों ने मारपीट कर बच्चों के साथ उसे कार में बैठाया और जंगल की ओर चल पड़े. अगले दिन थाना नारखी के उमरगढ़ से कुतुबपुर जाने वाले रास्ते पर खेतों के बीच पड़ने वाले एक कुएं में कुछ बच्चों ने एक महिला और 2 बच्चों की लाशें देखीं. शाम का समय था, लोग पंचायत चुनाव में वोट डाल कर लौट रहे थे.

बच्चों ने उन्हें कुएं में 3 लाशें पड़ी होने की बात बताई तो वे कुएं के पास पहुंचे. पुलिस को सूचना दे कर 2 लोग कुएं में उतर गए. नीचे जाने पर पता चला कि औरत और लड़की तो मर चुकी थी, जबकि लड़के की सासें चल रही थीं. उन्होंने लड़के को बाहर निकाला. तब तक पुलिस भी पहुंच गई थी. इंसपेक्टर श्रवण कुमार राणा ने बच्चे को तुरंत जिला अस्पताल भिजवाया. उस के बाद उन्होंने लाशें निकलवाईं. लाशों की शिनाख्त नहीं हो सकी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि मृतक यहां के रहने वाले नहीं थे.

दूसरी ओर शाम को रामू घर पहुंचा तो जब मकान मालकिन ने बताया कि सीमा के भाई का फोन आया था और वह बच्चों को ले कर अपनी मां को देखने अस्पताल गई है तो वह सिर थाम कर बैठ गया. उस ने सीमा को फोन किया तो उस का फोन बंद था. उस ने भाई को फोन किया तो पता चला कि गंगा सिंह के घर में ताला लगा है. रामू समझ गया कि कुछ अनहोनी हो गई है. 13 अक्तूबर के अखबार में जब 2 लाशें और एक बेहोश बच्चे के कुएं में मिलने की खबर छपी तो खबर पढ़ कर रामू के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह जिला अस्पताल पहुंचा तो बेटे को देख कर सन्न रह गया. उस ने रोरो कर पुलिस को बताया कि बेहोश बच्चा उस का बेटा है.

इस के बाद पोस्टमार्टम में रखी महिला और बच्ची की लाशों की शिनाख्त उस ने अपनी पत्नी और बेटी के रूप में कर दी. रामू की दुनिया लुट चुकी थी. देव को होश आया तो उस ने सारी बात बता दी. उस के बाद अपराध संख्या 958/15 पर भादंवि की धारा 302, 307, 201 के तहत जगदीश, अशोक और अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

जगदीश को उसी दिन उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उस की गिरफ्तारी की खबर पा कर अमित और अशोक गांव छोड़ कर भाग गए. 9 जनवरी को नए थानाप्रभारी जसपाल सिंह पंवार ने अमित को दिल्ली के गोविंदपुरी से गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अशोक कथा लिखे जाने तक पकड़ा नहीं जा सका था. अमिल और जगदीश अपने किए की भले ही सजा पा जाएं, लेकिन उस से रामू की उजड़ी दुनिया तो अब बस नहीं सकती.

अमित का कहना था कि उसे अपनी बहन और उस के बच्चों को मारने का जरा सा भी अफसोस नहीं है, क्योंकि उस की वजह से गांव में उन लोगों की जो बदनामी हुई थी, उस के लिए यही उचित था. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: नामो नामो और भेड़िया

Crime Stories: नामो मर्द का बच्चा था, उस ने गांव में ललकार कर कहा था कि वह अपनी एक टांग के बदले में दुश्मनों की एक लाश जरूर गिराएगा. वह तो ऐसा नहीं कर सका, पर…

एक दिन मैं अपने क्वार्टर में नाश्ता कर रहा था कि थाने से एक कांस्टेबल आया. उस ने आते ही बताया कि थाने से 2 ढाई मील दूर के एक गांव में हत्या हो गई है. मैं चाहता तो अपने हिसाब से आराम से जाता, लेकिन तब थानेदारों की ऐसी आदत नहीं थी. दूसरे अंगरेजों का जमाना था, जो ऐसे मामलों में लापरवाही बरदाश्त नहीं करते थे. इस के अलावा जल्दी पहुंचने का एक फायदा यह होता था कि घटनास्थल पर पैरों के निशान और दूसरे तमाम सबूत आराम से मिल जाते थे.

तैयार हो कर मैं सिपाही के साथ थाने पहुंचा तो वहां 3 आदमी मेरे इंतजार में बैठे थे. उन में से एक को मैं जानता था. वह उस गांव का नंबरदार था, जहां घटना घटी थी. दूसरे 2 लोगों में एक मृतक का भाई था. बातचीत से वह किसी सम्मानित परिवार का लगता था. उस ने अपना नाम मुख्तार बताया था और मरने वाले का नाम बख्तियार.

मुख्तार के बताए अनुसार, घटना कुछ इस तरह घटी थी. बख्तियार अपने खलिहान में सोया हुआ था. वहां सोने की वजह यह थी कि गेहूं की कटी फसल खेत में पड़ी थी. बख्तियार के बारे में उस ने बताया कि वह फौज का रिटायर हवलदार था. उस के पास सिंगल बैरल बंदूक थी, जिसे वह अपने पास रख कर सोता था. सुबह गांव का एक आदमी उधर से गुजरा तो उस ने देखा कि बख्तियार के धड़ का निचला हिस्सा चारपाई पर है और अगला हिस्सा चारपाई से नीचे गिरा पड़ा है.

बख्तियार को उस हालत में देख कर वह आदमी उस के पास तक गया तो उस ने देखा, चारपाई के नीचे खून जमा है. वह आदमी भाग कर मुख्तार के पास आया और उस ने यह बात मुख्तार को बताई तो वह गांव के नंबरदार को साथ ले कर खलिहान पहुंचा. बख्तियार मर चुका था, इसलिए दोनों बख्तियार के लड़के को साथ ले कर थाने आ गए. जब मैं सिपाहियों के साथ मौकाएवारदात पर पहुंचा, वहां काफी लोग इकट्ठा हो चुके थे. हमें देख कर लोग इधरउधर हो गए. मैं ने आगे बढ़ कर लाश का निरीक्षण किया. मृतक चारपाई से आधा लटका हुआ था, उस के दोनों हाथ आगे की ओर कुछ इस तरह फैले थे, जैसे मरने से पहले उस ने किसी चीज को पकड़ने की कोशिश की हो.

उस का चेहरा मिट्टी से लिथड़ा हुआ था. लाश से कुछ दूरी पर एक सिंगल बैरल बंदूक पड़ी थी. मृतक की आंखें खुली थीं. वह सुंदर पट्ठा जवान था. चेहरे से ही लगता था कि वह दबदबे वाला आदमी था. मेरे कहने पर 2 सिपाहियों ने लाश को सीधा कर के चारपाई पर लिटा दिया. मृतक के सीने और पेट पर खून जमा था. चाकू के 2 घाव सीने पर और एक लंबा घाव पेट पर था. सीने के घाव दिल के पास थे. मैं ने अंदाजा लगाया कि चाकू से दिल कट गया होगा, जिस से उस की मौत हो गई है.

सारी बातें नोट कर के मैं आसपास का निरीक्षण करने लगा. मैं ने हर चीज को बहुत बारीकी से देखी, लेकिन मुझे वहां कोई सबूत नहीं मिला. इस के बाद मैं ने पैरों के निशानों पर गौर किया तो एक ओर से एक आदमी के पैरों के निशान चारपाई की ओर आए थे. वे केवल आने के निशान थे, जाने के नहीं. इस से मैं ने अनुमान लगाया कि ये निशान मृतक के होंगे. मैं ने चारपाई की ओर घूम कर देखा तो सिरहाने की ओर मुझे एक जूते का निशान दिखाई दिया. वह दाएं जूते का निशान था. इस का मतलब यह था कि हत्यारा मृतक के सिरहाने की ओर से खेत से हो कर आया था. मैं आगे बढ़ा तो मुझे यह देख कर हैरानी हुई कि केवल दाएं पैर के जूते के निशान थे, बाएं पैर के जूते का कोई निशान नहीं था.

मैं ने बैठ कर ध्यान से देखा तो दाएं पैर के जूते के बराबर एक गोल सा निशान था, जो उस निशान के साथ चल रहा था. यह लाठी या बैसाखी का निशान हो सकता था. इस का मतलब हत्यारा बाईं टांग से लंगड़ा था, जो लाठी या बैसाखी के सहारे चलता था. मैं ने चारपाई के आसपास की जमीन को देखा, इन निशानों के अलावा वहां कोई और निशान नहीं था. इस का मतलब हत्यारा अकेला था. मैं ने कागजी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतक के बड़े भाई मुख्तार को नंबरदार के घर बुलवा लिया. नंबरदार ने बताया कि मृतक अंग्रेजी फौज में हवलदार था. लड़ाई खत्म होने के 3 महीने बाद वह रिटायर हो कर घर आ गया था. वह दबंग आदमी था और गांव में दबदबा रखता था.

संपन्न घराने का बख्तियार फौज में पैसों के लिए नहीं, बल्कि मिलिट्रीमैन कहलाने के लिए भरती हुआ था. मैं नंबरदार से बात कर ही रहा था कि मृतक का बड़ा भाई मुख्तार आ गया. मैं ने नंबरदार को बाहर भेज कर उसे अंदर बुलाया. दुख जताने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘मृतक की किसी से दुश्मनी तो नहीं थी या इधर किसी से उस का झगड़ा तो नहीं हुआ था?’’

मुख्तार ने जवाब दिया, ‘‘हम दुश्मनी रखने वाले लोग हैं जी, हमारे यहां छोटेमोटे लड़ाईझगड़े तो होते ही रहते हैं. असल लड़ाई नहर पार के एक परिवार से है. उन के साथ कई बार लाठीडंडे चल चुके हैं.’’

‘‘क्या यह दुश्मनी इस हद तक है कि हत्या की नौबत आ जाए? क्या उन लोगों में इतनी हिम्मत है कि तुम्हारे घर में आ कर वे हत्या कर सकें?’’ मैं ने पूछा.

उस ने कहा, ‘‘दुश्मनी तो ऐसी ही है जी, वे लोग मारनेमरने से नहीं डरते.’’

‘‘दुश्मनी की वजह?’’

‘‘वास्तव में गलती हमारे ही आदमी की है. हम ने माफी भी मांगी, लेकिन उन लोगों का रवैया इतना बेइज्जती वाला था कि न चाहते हुए भी बात बढ़ गई और लाठियांडंडे और कुल्हाडि़यां तक चल गईं, जिस में कुछ उन के आदमी घायल हुए, कुछ हमारे.’’

‘‘थाने तक बात पहुंची थी?’’ मैं ने यह बात सोच कर पूछी थी कि थाने में उस लड़ाई का रिकौर्ड होगा.

मुख्तार ने बताया कि दोनों पक्षों में से कोई थाने नहीं गया था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या उन लोगों में कोई ऐसा आदमी है, जिस की बाईं टांग कटी हुई हो या बाईं टांग से लंगड़ाता हो.’’

‘‘बिलकुल है मलिकजी, लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?’’ उस ने कहा.

‘‘मौकाएवारदात से पैरों के जो निशान मिले हैं, उन में दाईं टांग के जूते के निशान हैं, जबकि बाईं टांग के जूते की जगह बैसाखी या लाठी के निशान हैं.’’

मुख्तार ने बताया, ‘‘उस लंगड़े का नाम इनामुल्लाह है और वह नामो के नाम से मशहूर है. मुझे यकीन है कि हत्यारा वही है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘यह बात तुम इतने यकीन से पैरों के निशान की वजह से कह रहे हो?’’

‘‘यह बात नहीं है. इस की वजह यह है कि नामो की टांग हमारे साथ हुई लड़ाई में ही कटी थी,’’ मुख्तार ने कहा, ‘‘बड़ा ही जीवट वाला लड़का है, लड़ाई में हमारे किसी आदमी की कुल्हाड़ी उस की टांग में ऐसी लगी कि टांग की हड्डी कट गई. पहले तो वह गांव के झोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराता रहा, जब टांग ठीक नहीं हुई तो शहर के अस्पताल गया. तब तक टांग में जहर फैल गया था. मजबूरी में डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गांव लौट कर उस ने कहा था कि दुश्मनों के एक आदमी को मार कर वह इस का बदला लेगा.’’

मुख्तार, जब्बार और बख्तियार, तीनों भाई संपन्न जमींदार थे. गांव में उन का दबदबा था. मुख्तार सब से बड़ा था, उस से छोटा जब्बार और बख्तियार सब से छोटा. मुख्तार का एक बेटा और 3 बेटियां थीं, जबकि जब्बार का एक बेटा था. जब वह 10 साल का था, तभी जब्बार हैजे से मर गया था. उस के बेटे को दोनों भाइयों ने मिल कर पाला था. उस का नाम गुलाम हुसैन था, लेकिन सब उसे गामो कहते थे, गामो एकदम स्वस्थ और काफी सुंदर था. गामो को शुरू से ही पहलवानी का शौक था. वह गांव की कबड्डी की टीम का लीडर था. आसपास के गांवों में उस की धूम थी. उस की कबड्डी की टीम दूसरे गांवों में भी खेलने जाया करती थी.

नहर पार वालों से उन का कांटेदार मुकाबला होता था. गामो के कारण उस के गांव की टीम का पलड़ा भारी रहता था. एक बार गामो की टीम नहर पार वाले गांव में कबड्डी खेलने गई और मैच जीत लिया. रास्ते में मालटा का एक बाग पड़ता था. जब वे बाग के पास से गुजर रहे थे तो उन्हें बाग की ओर से एक अधेड़ औरत आती दिखाई दी. उस औरत ने गामो के पास आ कर कहा कि वह उस से अकेले में बात करना चाहती है.

वह औरत उसे मालटा के बाग में ले गई. बाग में गहरा अंधेरा था. गामो को एक पेड़ के नीचे कोई खड़ा दिखाई दिया. अंधेरे की वजह से दूर से यह पता नहीं चला कि वह मर्द है या औरत. जब वह पास पहुंचा तो उस ने देखा कि वह एक सुंदर लड़की थी. गामो ने पीछे मुड़ कर उस औरत को देखा तो वह गायब थी.

‘‘तुम्हें मैं ने ही बुलाया है, बुरा तो नहीं लगा?’’ लड़की ने पूछा.

गामो ने कहा, ‘‘बुरा तो नहीं लगा, लेकिन मुझे यहां क्यों बुलाया है?’’

‘‘मेरा नाम फातिमा है, दिल के हाथों मजबूर हो कर मैं तुम से मिलना चाहती थी.’’

गामो ने उसे समझाया कि इस तरह वह बदनाम हो जाएगी, इसलिए वह उस का खयाल दिल से निकाल दे और वापस चली जाए.

‘‘औरत हो कर मैं ने इतना बड़ा कदम उठा लिया और तुम मर्द हो कर भी डर रहे हो. चाहो तो साफसाफ कह दो कि मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगी. इस के बाद मैं कभी तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी.’’ फातिमा ने कहा.

गामो ने कहा, ‘‘तुम बहुत सुंदर हो फातिमा, मुझे अच्छी भी लगती हो, लेकिन तुम अपनी इज्जत का खयाल करो और वापस चली जाओ.’’

‘‘मुझे गलत मत समझना गामो, मैं तुम से सच्चा प्रेम करती हूं. मैं इस शर्त पर वापस जाऊंगी कि तुम मुझ से दोबारा मिलने का वादा करो, वरना मैं तुम्हारे पीछेपीछे तुम्हारे घर तक पहुंच जाऊंगी.’’

गामों ने उस से मिलने का वादा कर लिया. इस के बाद दोनों रोज मालटा के उसी बाग में मिलने लगे. गामो घोड़ी पर बैठ कर नहर पार से आ कर फातिमा से मिलता था. उन के मिलने की यह बात ज्यादा दिनों तक परदे में नहीं रह सकी. गामो और फातिमा के प्रेम के चर्चे पूरे गांव में फैल गए. जब इस बात की जानकारी फातिमा के घर वालों को हुई तो वे मरनेमारने को तैयार हो गए. उन्होंने फातिमा का घर से निकलना बंद कर दिया. इस के बावजूद फातिमा किसी न किसी तरह गामो से मिलने पहुंच जाती थी. फातिमा के बाप और भाइयों ने उस की पिटाई भी की, लेकिन वह नहीं मानी.

फातिमा की बिरादरी वालों ने ऐलान कर दिया कि अगर गामो उन के गांव के पास भी दिखाई दिया तो वे उस के हाथपांव तोड़ कर उसे हमेशा के लिए अपाहिज बना देंगे. इस पूरे मामले की जानकारी गामो के ताऊ और चाचा को हुई तो उन्होंने उसे समझाया कि वह यह चक्कर छोड़ दे. वह न तो पार वाले गांव में जाए और न ही फातिमा से मिलने की कोशिश करे. उस ने कहा कि अगर उस का रिश्ता फातिमा के घर भेजा जाए तो वह उन की बात मान लेगा.

लेकिन दोनों परिवार एक ही टक्कर के थे, इसलिए गामो की बात नहीं मानी गई. उन्हीं दिनों में बख्तियार फौज से आया था. उस के भाई मुख्तार ने कुछ आदमियों को तैयार कर के उस से कहा कि वह पार के गांव में जा कर गामो के लिए फातिमा के रिश्ते की बात करे. बख्तियार उन लोगों के साथ नहर पार कर के गांव पहुंचा तो गांव वालों ने उन की आवभगत की. सभी ने पूरे मामले पर बात कर के गामो के ताऊ मुख्तार की ओर से माफी मांगी. लेकिन जैसे ही इन लोगों ने फातिमा के रिश्ते की बात की, वे एकदम से बिगड़ गए. फातिमा की बिरादरी वालों ने कहा कि वे फातिमा का नाम भी न लें. सभी वापस आ गए. यह सुन कर गामो ने कहा कि कुछ भी हो, वह फातिमा को हासिल कर के रहेगा. उस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े.

कुछ दिनों बाद गामो गांव से गायब हो गया. उसे सब जगह तलाशा गया, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. 2 दिन बीत गए तो गामो के घर वालों को लगा कि गामो नहर पार वालों के हत्थे चढ़ गया है. उन्होंने 2 लोगों को नहर पार के गांव भेजा कि चुपके से पता करें कि गामो वहां तो नहीं पहुंचा. उन्होंने वापस आ कर बताया कि वह वहां नहीं है. अब उन के लिए गामो चिंता का विषय बन गया.

चौथे दिन फातिमा के गांव के लोग कुल्हाड़ी, भाले, लाठी और दूसरे हथियार ले कर गामो के गांव आ पहुंचे. उन का कहना था कि गामो को उन के हवाले करो. कुछ मिनटों में गामो की बिरादरी वाले भी हथियार ले कर मैदान में आ गए. बात खुली तो पता चला कि फातिमा रात के किसी वक्त घर से गायब हो गई थी. उन्हें पूरा यकीन था कि फातिमा गामो के साथ ही गई है. मुख्तार ने उन लोगों को बताया कि गामो तो 3 दिनों से गायब है, वे खुद ही उसे तलाश रहे हैं. फातिमा के घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे. उन का कहना था कि गामो गांव में ही कहीं छिपा है और फातिमा उसी के साथ है.

बात बढ़ कर मारपीट तक जा पहुंची तो दोनों ओर के 5-6 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. इसी लड़ाई में नामो की टांग पर कुल्हाड़ी लग गई थी, जिस की वजह उसे टांग से हाथ धोना पड़ा था. यहीं से दोनों परिवारों में दुश्मनी हो गई थी. मैं ने इस पर चिंतन किया तो लगा कि हत्या का कारण संभवत: यही है. मैं ने मुख्तार से 2-4 बातें और पूछीं, जो तफ्तीश के लिए जरूरी थीं. मुख्तार ने फातिमा की बिरादरी के एकएक आदमी का नाम ले कर हत्या का शक जताया. मैं ने उस का पूरा बयान लिख लिया. मेरे लिए यह आसान हो गया कि अब इधरउधर देखने के बजाय तफ्तीश एक ओर करनी थी.

कागजी काररवाई पूरी कर के मैं फातिमा के गांव पहुंचा और उस गांव के नंबरदार को ले कर नामो के घर गया. वहां हमें एक बैठक में बिठाया गया. कुछ देर बाद एक आदमी बैसाखी के सहारे चलता हुआ अंदर आया. उसे देख कर ही मैं समझ गया कि यही नामो है. वह बड़ा सुंदर और सजीला जवान था. ऐसे जवान को बैसाखी के सहारे चलते देख मुझे दुख हुआ.

मैं ने कहा, ‘‘सचमुच तुम मर्द हो, तुम ने अपना वचन पूरा कर के दिखा दिया.’’

‘‘कौन सा वचन?’’ उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप किस वचन की बात कर रहे हैं जी?’’

मैं ने कहा, ‘‘याद करो नामो, जब तुम्हारी एक टांग कटी थी तो तुम ने रोनेधोने के बजाय ललकारते हुए कहा था कि अपनी एक टांग के बदले दुश्मन की एक लाश गिराओगे.’’

उस ने अपनी कनपटी पर अंगुली मारते हुए कहा, ‘‘ओह हां, वह तो मैं ने गुस्से में कह दिया था. लड़ाईझगड़े में घाव तो आते ही रहते हैं. मेरी टांग तो मेरी गलती के कारण कटी थी. शहरी डाक्टर ने कहा था कि अगर गांव के किसी झोलाछाप को न दिखा कर सीधे शहर आ जाते तो टांग ठीक हो सकती थी.’’

‘‘तो तुम ने अपनी टांग का बदला ले ही लिया?’’ मैं ने उस की बात को नजरअंदाज कर के कहा.

‘‘कैसा बदला जी,’’ उस ने परेशान होते हुए कहा, ‘‘मैं ने किस से बदला ले लिया?’’

‘‘इतना परेशान क्यों होते हो नामो, एक टांग वाला होते हुए भी तुम ने दुश्मन के घर में जा कर उस पर वार किया.’’ मैं ने कहा.

नामो की हालत देखने वाली थी. वह आंखें फाड़फाड़ कर मेरी ओर देख रहा था. अगर 2 टांग वाला होता तो शायद एकदम से उठ कर खड़ा हो जाता, लेकिन एक टांग का होने की वजह से वह कुरसी पर बैठेबैठे इधरउधर हिल रहा था.

‘‘आप क्या कह रहे हैं.’’ उस ने सिटपिटा कर कहा, ‘‘मैं ने किसी दुश्मन पर वार नहीं किया. आप किस दुश्नम की बात कर रहे हैं?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो मैं किस दुश्मन की बात कर रहा हूं.’’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘गामो को भूल गए, रात को गामो के चाचा की हत्या कर दी गई है. यह बताओ कि यह काम तुम ने अकेले किया या तुम्हारे साथ कोई और भी था?’’

मुझे उम्मीद थी कि मेरी बात सुन कर नामो उछल पड़ेगा और जोरशोर से मना करेगा. लेकिन उस ने कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. उस ने कहा, ‘‘मैं गामो के चाचा की हत्या क्यों करने लगा? लेकिन हां, अगर कभी गामो सामने आ गया तो उस की हत्या जरूर करूंगा. और हां, हत्या कर के छिपाऊंगा भी नहीं, सीधा आप के पास चला आऊंगा.’’

‘‘अगर तुम मुझे साफसाफ बता दो तो मैं तुम्हारे बचाव के लिए रास्ता निकाल लूंगा. अगर नहीं मानोगे तो फिर मैं खुद ही साबित कर दूंगा कि यह हत्या तुम ने ही की है. उस के बाद मुझ से किसी भलाई की उम्मीद न रखना.’’

अभी मैं नामो से पूछताछ कर रहा था कि कांस्टेबल ने बताया कि नामो की बिरादरी के कुछ लोग मुझ से मिलना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी किसी को भी अंदर मत आने दो. मैं अपराधी को उस समय कोई छूट नहीं देना चाहता था.

‘‘घटनास्थल पर तुम्हारे पैरों के निशान देखे गए हैं.’’ मैं ने उस के पैरों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘इस तरह के निशान और किसी के हो ही नहीं सकते, दाएं जूते का निशान और बाएं जूते की जगह बैसाखी का निशान. अब भी मना करोगे कि हत्या तुम ने नहीं की?’’

मेरी बात के जवाब में नामो कसम खाखा कर खुद को निर्दोष बताने लगा. लेकिन मैं उस की कोई बात मानने को तैयार नहीं था. पुलिस वाले अगर कसमों पर ऐतबार करने लगें और रोनेधोने से डर जाएं तो अपराधी जेल जा ही नहीं सकते. मैं ने घटनास्थल से मिलने वाले निशानों के मोल्ड बनवा लिए थे. वहां जमीन नर्म थी, निशान बिलकुल साफ दिखाई दे रहे थे. वे देसी जूते के निशान थे, जो देहात में ज्यादातर लोग पहनते थे. अब मुझे नामो के निशान से घटनास्थल पर पाए गए निशानों का मिलान करना था.

‘‘हत्या करने वाला हथियार कहां है, खुद दे दोगे तो ठीक रहेगा, नहीं तो घर की तलाशी ले कर मैं खुद बरामद कर लूंगा.’’

‘‘जब मैं ने हत्या ही नहीं की तो हथियार कहां से बरामद कराऊं.’’ नामो ने लगभग रोनी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘अगर तलाशी लेने का ही शौक है तो ले लो.’’

इस से मैं ने अनुमान लगाया कि हथियार घर में नहीं है. हत्या करने के बाद या तो इस ने नहर में फेंक दिया है या कहीं दबा दिया है. फिर भी मैं ने तलाशी लेने का फैसला किया. मैं ने कांस्टेबल को बुला कर कहा कि नामो के रिश्तेदारों को अंदर भेज दे. 3 आदमी अंदर आए, जो सम्मानित लग रहे थे. उन में से एक फातिमा का पिता था, दूसरा जो उम्र में सब से बड़ा था, वह नामो का पिता था. तीसरा नामो का ससुर था. मैं ने उन्हें पूरी जानकारी दे कर कहा कि वे नामो से कह दें कि वह अपना अपराध स्वीकार कर ले और हत्या का हथियार बरामद करा दे.

नामो ने अपराध स्वीकार करने से मना कर दिया. मैं ने उस के घर की तलाशी लेने के लिए 2 कांस्टेबल लगा दिए. नामो अपने मातापिता से अलग रहता था. एक गली छोड़ कर दूसरी गली में उस के मातापिता का घर था. इस से भी मैं ने अनुमान लगाया कि नामो का बाप झूठ बोल रहा है कि नामो सारा दिन अपने घर से नहीं निकला था. दोनों के घरों में काफी दूरी थी. मैं ने नामो को गिरफ्तार कर लिया, उस के घर की बारीकी से तलाशी ली गई. टीन के एक संदूक से एक बड़ा चाकू निकला, जो एक कपड़े में लपेट कर रखा था. यह कमानीदार चाकू था, जो उन दिनों अपराधी लोग रखा करते थे.

इस के अलावा एक बरछे का फल निकला, जो जरूरत पड़ने पर बांस में लगाया जा सकता था. मैं ने दोनों हथियार अपने कब्जे में ले लिए. मैं नामो को ले कर थाने आ गया. अब मुझे पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. नामो की काररवाई कर के मैं दूसरे केसों में उलझ गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में हत्या का समय रात ढाई बजे के करीब लिखा था. मौत का कारण वही था, जो मैं ऊपर लिख चुका हूं. चाकू या कटार के वार से मृतक का दिल 2 जगह से कट गया था. पेट में गहरा घाव था, जिस से पेट की आंतें कट गई थीं.

मैं ने चाकू और बरछी मैडिकल टेस्ट के लिए भेज दीं, ताकि पता लग सके कि उन हथियारों पर खून के धब्बे तो नहीं थे. शाम तक रिपोर्ट आ गई, जिसे देख कर मैं चकरा गया. लिखा था कि दोनों हथियारों पर खून का कोई निशान नहीं मिला. शाम तक मृतक की लाश भी आ गई, जो कानूनी काररवाई कर के मृतक के घर वालों को सौंप दी गई. मैं समझ गया कि नामो ने हत्या कर के हथियार कहीं फेंक दिया है. अब उस से उगलवाना था कि हथियार कहां फेंका है? मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वह नामो को हवालात से निकाल कर मेरे पास ले आए. अचानक मुझे मौकाएवारदात पर पाए गए निशानों का खयाल आ गया. कांस्टेबल उसे ले कर आ गया.

मैं ने कांस्टेबल को समझाया कि वह नामो को थाने के सहन में ले जा कर 10 कदम चलवाए और उस के बाद हवालात में बंद कर दे. कांस्टेबल मेरी बात समझ गया. उस ने उस के पैरों के निशान ले लिए और मुझे आ कर बता दिए. घटनास्थल पर मिले जूते के निशानों में जूते की तली में एड़ी की ओर ऐसा निशान उभरा था, जैसे जूता घिस गया हो और वहां चमड़े का टुकड़ा लगवाया गया हो. मैं ने नामो के खुरों के निशान देखे तो वे घटनास्थल पर पाए जाने वाले खुरों से बिलकुल अलग थे. मैं ने बैसाखी के निशान देखे तो वे भी अलग लगे. मैं ने अपने कमरे में जा कर कांस्टेबल को बुला कर कहा कि वह नामो को मेरे पास ले आए. वह उसे ले आया.

‘‘मैं तुम पर कोई दबाव नहीं बनाऊंगा, लेकिन तुम हत्या करना स्वीकार कर लो तो फायदे में रहोगे. एक बात याद रखो, यह आखिरी मौका है, इस के बाद मुझ से कोई उम्मीद मत रखना. घटनास्थल पर तुम्हारे खुरे मौजूद हैं, हत्या का कारण भी साफ है. तुम्हारे खिलाफ सबूत भी मजबूत हैं, बोलो बयान दोगे या नहीं?’’

‘‘मेरा बयान वही है, जो पहले दिया था. जब मैं ने हत्या की ही नहीं तो क्या बयान दूं. अगर मैं ने हत्या की होती तो मैं खुद थाने आ कर पेश हो जाता. अल्लाह गवाह है, वह मेरी मदद जरूर करेगा.’’

मुझे उस की बात में सच्चाई दिखाई दे रही थी. झूठा आदमी बयान देता है तो पता चल जाता है और सच बोलने वाले का चेहरा अलग ही पहचाना जाता है. मैं अपना शक दूर किए बिना नामो को छोड़ना नहीं चाहता था. मैं ने सोचा कि जरूरी नहीं कि नामो ने हत्या के समय यही जूते पहने हों. मैं ने एक कांस्टेबल से कहा कि वही नामो के घर जा कर उस के सारे जूते ले आए. साढ़े 11 बजे का समय. मुझ से एक कांस्टेबल ने कहा कि नामो का ससुर और बाप मिलना चाहता है. उन्होंने मेरे पास आ कर कहा कि वे नामो से मिल कर मुझ से बात करना चाहते हैं. मैं ने कहा कि अभी तफ्तीश चल रही है, इसलिए वे उस से नहीं मिल सकते.

नामो के बाप ने मेरे आगे हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘नामो पर दया करें मलिकजी. आप जो कहेंगे, आप की सेवा कर देंगे. अल्लाह ने हमें बहुत कुछ दिया है.’’

‘‘सेवा जरूर बताऊंगा, पहले मैं काम पूरा कर लूं. आप ऐसा करें, नामो से कहें मुझे सब कुछ सचसच बता दे. फिर मैं आप को सेवा बताऊंगा.’’

मेरी बात सुन कर वे एकदूसरे का मुंह देखने लगे. इतने में वह कांस्टेबल आ गया, जिसे मैं ने नामो के घर भेजा था. उस ने मुझे इशारे से बताया कि वह काम कर लाया है. मैं ने नामो के बाप और ससुर से कहा कि वे अच्छी तरह सोच लें, उस के बाद बताएं. उस के बाद मैं ने उन्हें भेज दिया. कांस्टेबल एक थैले में डाल कर 5 जोड़ी जूते ले आया था. उन में एक को छोड़ कर सभी जूते नए थे. पुराने जूते की तली में एक तला लगा हुआ था. मैं कांस्टेबल को ले कर उस जगह गया, जहां नामो के जूते के निशान थे. मैं ने कांस्टेबल से कहा कि वह नामो के दाएं पैर का जूता पहन कर कच्ची जमीन पर चले.

वह 8-10 कदम चला. मैं ने उन निशानों को ध्यान से देखा तो वे भी उन निशानों से थोड़े अलग थे. इस से मैं समझ गया कि नामो निर्दोष है. उस के अपराधी न निकलने से मेरी सारी मेहनत बेकार जा रही थी. मैं ने मुखबिरों को बुला कर आसपास के गांवों में ऐसे आदमी को ढूंढ़ने को कहा, जिस का बायां पैर कटा हुआ हो या फिर बाएं पैर की जगह वह बैसाखी के सहारे चलता हो. इस सारी काररवाई के बाद मैं ने नामो को छोड़ दिया. लेकिन उस से कह दिया था कि वह गांव से बाहर न जाए. अगर कहीं जाना हो तो थाने में बता कर जाए. अब मैं मुखबिरों के सहारे था. ऐसे आदमी को ढूंढ़ना कोई मुश्किल काम नहीं था.

मुखबिरों की कोशिश के बावजूद आसपास के गांवों में ऐसा कोई आदमी नहीं मिला. इस तरह 5 दिन बीत गए और मेरी तफ्तीश एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी. मैं हताश हो चला था. मैं अपने एसआई महेंद्र को नामो को लाने के लिए भेजने की सोच ही रहा था कि एक मुखबिर थाने आ गया. वह एक आदमी को साथ लाया था. मुखबिर ने बताया कि यह आदमी साथ वाले गांव में रहता है. जिस रात बख्तियार की हत्या हुई थी, उस की दूसरी सुबह यह एक शादी में गया था. रात को जब यह वापस आया तो इसे बख्तियार की हत्या की खबर मिली.

उसे यह भी पता चला कि पुलिस को एक ऐसे आदमी की तलाश है, जो बाईं टांग से लंगड़ा हो. इस आदमी ने बताया कि उस ने इस तरह का लंगड़ा आदमी घटना से एक दिन पहले देखा था. यह बात मुखबिर के कान में पड़ी तो वह उसे मेरे पास ले आया. मैं ने उस से पूरी बात बताने के लिए कहा. उस का नाम रूपकुमार था. उस के बताए अनुसार, वह घटनास्थल वाले गांव के साथ वाले गांव में रहता था. घटना से एक दिन पहले वह गांव के एक सिरे पर स्थित परचून की दुकान से कुछ सामान लेने गया था. वह दुकान एक रिटायर्ड फौजी की थी, जो विश्वयुद्ध में बर्मा के एक युद्ध क्षेत्र में घायल हो गया था. उस के घाव कुछ इस तरह के थे कि उस का दायां बाजू बेकार हो गया था. सब लोग उसे फौजी दुकानदार कहते थे.

रूपकुमार जब सौदा ले कर दुकान से निकलने लगा तो अचानक फौजी के घर का दरवाजा खुला. एक आदमी बैसाखी के सहारे घर से निकला और रूपकुमार को देख कर तुरंत अंदर चला गया. रूपकुमार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया. उस से अगले दिन रूपकुमार अपने एक रिश्तेदार की शादी में चला गया. जब वह शादी से लौट कर आया तो उसे पता चला कि पास वाले गांव में एक आदमी की हत्या हो गई है. उस ने जब यह सुना कि पुलिस को एक लंगड़े हत्यारे की तलाश है तो उसे उस फौजी दुकानदार के घर से निकलने वाले लंगड़े की याद आ गई. उस ने लोगों से उस के बारे में बताया. बात फैलतेफैलते मेरे मुखबिर के कान तक पहुंची और वह उसे मेरे पास ले आया.

मैं ने रूपकुमार से कहा, ‘‘अगर वह लंगड़ा तुम्हारे सामने आ जाए तो क्या तुम उसे पहचान लोगे?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं ने एक पल के लिए देखा था. लेकिन मैं उसे पहचान लूंगा, क्योंकि उस के चेहरे पर एक लंबा घाव का निशान था.’’

‘‘क्या तुम पूरे विश्वास से कह सकते हो कि उस की बाईं टांग नहीं थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं जी,’’ वह कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मुझे ऐसा शक है कि वह अपनी दाईं टांग पर खड़ा था और उस की बैसाखी बाईं ओर थी. मैं ने एसआई महेंद्र को बुला कर कहा कि वह फौजी दुकानदार को अपने साथ ले आए.

2 घंटे बाद महेंद्र सिंह फौजी को ले आया. उस का नाम प्रकाश नारायण था, लेकिन लोग उसे फौजी कहते थे. वह मेरे कमरे में आया. सांवले रंग का वह साधारण सा आदमी था. शक्ल से गरीब घराने का लगता था. वह कुछ घबराया हुआ लग रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर मुझे प्रणाम किया और एक ओर खड़ा हो गया. मैं ने उसे बैठने के लिए कहा. वह बैठ गया तो उस से इधरउधर की बातें करने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘वह लंगड़ा कहां है?’’

मेरा सवाल सुन कर प्रकाश ऐसा बिदका जैसे किसी ने सुई चुभो दी हो. वह हैरानी से मेरा मुंह देखने लगा. मैं ने सोच लिया कि उसे संभलने का मौका नहीं दूंगा.

उस ने कहा, ‘‘आप किस लंगड़े की बात कर रहे हैं, मैं समझा नहीं?’’

‘‘वही लंगड़ा, जिस के साथ मिल कर तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है.’’

यह सुनते ही प्रकाश ऐसे उछला, जैसे मैं ने उस पर बम फेंक दिया हो.

‘‘मेरे सामने झूठ बोलने की कोशिश मत करना प्रकाश, मेरे पास ऐसे कई गवाह हैं, जिन्होंने उस लंगड़े को तुम्हारे घर आतेजाते देखा है. अगर तुम ने झूठ बोला तो मैं तुम्हारा क्या हाल बनाऊंगा, सोच भी नहीं सकते. तुम्हारा एक हाथ तो बेकार है ही, दूसरा भी तोड़ दूंगा. फिर भीख मांगते फिरोगे.’’

वह हकला कर बोला, ‘‘मैं ने हत्या नहीं की है सर.’’

‘तो फिर किस ने की है?’’

‘‘जी, गुल्लू ने की है.’’ प्रकाश ने बड़ी मुश्किल से कहा.

‘‘यह गुल्लू कौन है, सीधी तरह उस का नाम बताओ?’’ मैं ने सख्ती से कहा.

‘‘उस का नाम गुलजार है, उसी को लंगड़ा गुल्लू कहते हैं.’’

‘‘हत्या के समय तुम उस के साथ थे?’’ मैं ने यह बात इसलिए कही कि वह मौके का गवाह हो सकता था..

‘‘नहीं सर,’’ उस ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘आप मुझ से चाहे जैसी कसम ले लें, हत्या के वक्त मैं उस के साथ नहीं था. वह अकेला ही था.’’

मैं ने प्रकाश से पूछा, ‘‘गुल्लू की बख्तियार से क्या दुश्मनी थी?’’

‘‘पुरानी बात है सर, गुल्लू ने अपना बदला लिया है. हवलदार की ही वजह से उस की टांग कटी थी.’’

प्रकाश ने जो बात बताई, उस के अनुसार, गुल्लू भी फौज में था और वह बख्तियार के साथ युद्ध में अगले मोरचे पर तैनात था. गुल्लू हवलदार के अधीनस्थ था. उस जमाने में हवलदार के अधीन 5 जवान हुआ करते थे. जंग जोरों पर थी. प्रकाश गुल्लू और 3 सिपाही बख्तियार के अधीन थे. एक दिन जापानियों का जोरदार हमला हो रहा था, बम बारिश की तरह बरस रहे थे. हवलदार बख्तियार ने गुल्लू को कोई काम बता कर कहा कि वह जा कर उस काम को करे. गुल्लू ने कहा कि हमले का जोर कम हो जाएगा तो वह उस काम को कर देगा.

हवलदार बहुत सख्त फौजी था, अनुशासन में रह कर काम करता था, अपनी बात मनवाने का आदी था. उस ने कहा, ‘‘यह काम अभी करो, मेरा आदेश है, नहीं तो तुम्हारे विरुद्ध काररवाई की जाएगी.’’

गुल्लू न चाहते हुए भी मोर्चे से बाहर चला गया. वह अभी कुछ दूर ही गया होगा कि एक गोला उस के पास आ कर फटा, जिस का एक छोटा टुकड़ा उस के मुंह पर लगा और दूसरा उस के घुटने पर. घाव इतना गहरा था कि डाक्टरों को उस की टांग काटनी पड़ी. गुल्लू को फौज से रिटायर कर दिया गया. इस घटना के लिए गुल्लू बख्तियार को ही जिम्मेदार मानता था. उस ने तभी प्रण कर लिया था कि वह उस से इस का बदला जरूर लेगा. कुछ दिनों बाद प्रकाश भी घायल हो कर गांव आ गया. गुल्लू को पता था कि प्रकाश हवलदार के साथ वाले गांव में रहता है.

प्रकाश और गुल्लू के पत्र के माध्यम से संबंध बने हुए थे. गुल्लू ने उस से कह रखा था कि बख्तियार जब भी गांव आए, उसे सूचित कर दे. जिन दिनों हवलदार बख्तियार गांव आया हुआ था. प्रकाश किसी काम से उस के गांव गया तो उसे पता चला कि वह गांव आया हुआ है. उस ने चिट्ठी लिख कर गुल्लू को हवलदार के गांव आने के बारे में बता दिया. गुल्लू प्रकाश के गांव आ गया और उस के घर में छिप गया. वह इतनी दूर से घोड़ी पर आया था. घटना वाली रात गुल्लू ने प्रकाश को बताया कि वह हवलदार का काम तमाम करने जा रहा है और वहीं से अपने गांव चला जाएगा.

गुल्लू अपनी घोड़ी पर बैठ कर रात को ही चला गया, अगले दिन प्रकाश को पता चला कि बख्तियार की हत्या हो गई है. मैं ने प्रकाश से गुल्लू के गांव का पता पूछा. उस ने जो पता बताया, वह मेरे थाने से 6-7 मील दूर था और मेरे इलाके में नहीं आता था. मैं ने प्रकाश का पूरा बयान लिखा और उसे गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दिया.

मैं समय नष्ट करना नहीं चाहता था. मैं ने 2 कांस्टेबलों को साथ लिया और गुल्लू को गिरफ्तार करने चल दिया. मैं उस इलाके के थानेदार से मिला. वह एक सिख था. उस का नाम गजेंद्र सिंह था, उस ने मेरी बड़ी आवभगत की. मैं ने उसे अपने आने के बारे में बताया.

‘‘आप जलपान करें मलिकजी, आप का मुलजिम आप को मिल जाएगा.’’ कह कर उस ने एक हैडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों को इस आदेश के साथ गुल्लू के गांव भेज दिया कि वे उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आएं.

आधे घंटे बाद हैडकांस्टेबल और सिपाही एक आदमी को ले आए. मैं उसे देखते ही समझ गया कि यही गुल्लू है. वह दाईं टांग से बैसाखी पर चल रहा था. वे लोग उसे तांगे पर बिठा कर लाए थे. मैं ने देखा कि उस के चेहरे पर गहरे लंबे घाव का निशान था. गुल्लू ने वैसी ही जूती पहनी हुई थी. मैं ने उस की जूती उतरवा कर देखी तो उस के नीचे तला लगा हुआ था. गजेंद्र सिंह ने कानूनी काररवाई पूरी कर के अपराधी मेरे हवाले कर दिया. मैं उसे ले कर अपने थाने लौट आया.

रात को मैं ने गुल्लू को अपने कमने में बुलाया तो हैडकांस्टेबल ने उसे मेरे सामने ला कर खड़ा कर दिया. उस की आंखें नींद से भारी हो रही थीं. मैं ने हैडकांस्टेबल को इशारा किया कि इसे सोने मत देना. जैसे ही उसे झपकी आती, वह उस के बाल पकड़ कर जोरदार झटका देता. मैं ने उसे खड़ा रखने को कहा.

‘‘तुम अपनी गिरफ्तारी का कारण समझ गए हो गुल्लू,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें ऐसे ही गिरफ्तार नहीं किया, मेरे पास तुम्हारे खिलाफ पक्के सबूत हैं और गवाह भी. तुम ने हवलदार बख्तियार की हत्या की है, मौकाएवारदात पर तुम्हारी जूतियों के निशान मिले हैं. इस के अलावा तुम्हारे दोस्त प्रकाश ने सब कुछ उगल दिया है और हत्या का कारण भी बता दिया है. अब तुम्हारे पास हत्या की बात स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.’’

‘‘हां, उस भेडि़ए की हत्या मैं ने ही की है.’’ उस ने नींद से पीछा छुड़ाने के लिए अपने सिर को झटका देते हुए कहा, ‘‘मैं ने उस से बदला ले लिया है. अब मैं जिंदा नहीं रहना चाहता. पूछो, क्या पूछते हो?’’

मैं ने उसे अपने सामने कुरसी पर बिठा दिया. उस ने अपना काफी लंबा बयान दिया, जिसे मैं यहां छोटा कर के बता रहा हूं.

बात उन दिनों की थी, जब विश्वयुद्ध जोरों पर था. जो भी हृष्टपुष्ट जवान दिखाई देते थे, उसे भरती कर लिया जाता था. गरीब घर का गुल्लू जवान था. उस का बाप दूसरों की जमीन ले कर बटाई पर खेती करता था. गुल्लू को यह काम पसंद नहीं था. गुल्लू भी फौज में भर्ती हो गया. उस ने सोचा कि साल, 2 साल में पैसा इकट्ठा हो जाएगा तो शादी कर लेगा. गुल्लू के 2 बड़े भाई थे, जो विवाहित थे. जब लड़ाई ने जोर पकड़ा तो गुल्लू की यूनिट को अगले मोर्चे पर जाने का आदेश मिला. वह बर्मा का मोर्चा था.

जापानी फौज तेजी से आगे बढ़ती हुई बर्मा तक पहुंच गई थी. प्रकाश भी इसी यूनिट में था. गुल्लू और प्रकाश में दोस्ती हो गई थी. बख्तियार इस यूनिट का हवलदार था. प्रकाश और गुल्लू उस के अधीन सिपाही थे. हवलदार बख्तियार बहुत सख्त था. जब वह गुस्से से बात करता था तो उस की आवाज ऐसी निकलती थी, जैसे कोई भेडि़या गुर्रा रहा हो.

प्रकाश और गुल्लू अकसर उस की सख्ती का निशाना बनते थे. गुल्लू तो उस से इतना तंग आ चुका था कि एक दिन उस ने प्रकाश से कहा कि किसी दिन गोलाबारी के बीच वह इस भेडि़ए को गोली मार देगा. लेकिन उसे इस का मौका कभी नहीं मिला. उस के बाद वह घटना घट गई, जिस में उस की टांग चली गई. गुल्लू बेकार हो कर घर आ गया. लंगड़ा होने के साथसाथ चेहरे पर जो घाव आए थे, उस से वह बदसूरत हो गया था. उस की हालत देख कर उस की बूआ ने उस से रिश्ता तोड़ने के लिए कह दिया. गुल्लू को इस का बहुत दुख हुआ. इतना ही नहीं, उस की मंगेतर ने भी कह दिया कि एक लंगड़े और बदसूरत आदमी के साथ वह पूरा जीवन नहीं गुजार सकती.

गुल्लू इस सब का जिम्मेदार बख्तियार को मानता था. वह उस से इतनी अधिक घृणा करने लगा कि अगर उस का बस चलता तो जंग में ही उसे गोली मार देता. उस के एक महीने बाद प्रकाश भी घायल हो कर घर आ गया. दोनों में पक्की दोस्ती हो गई. खतोखिताबत होने लगी. गुल्लू को पता था कि बख्तियार प्रकाश के साथ वाले गांव में रहता है. उस ने प्रकाश से कह रखा था कि जब भी बख्तियार घर आए, उसे जरूर सूचना दे दे. युद्ध समाप्त हो गया तो हवलदार बख्तियार रिटायर हो कर अपने गांव आ गया. प्रकाश को पता चला तो उस ने गुल्लू को पत्र द्वारा सूचना दे दी.

सूचना मिलते ही गुल्लू एक घोड़ी पर सवार हो कर प्रकाश के घर आ गया. घर से चलते समय उस ने एक लंबा तेज धार वाला चाकू अपने पास रख लिया था. दिन के समय प्रकाश और गुल्लू घोडि़यों पर सवार हो कर बख्तियार के गांव चले गए. वे गांव के अंदर न जा कर बाहर से चक्कर काट कर खेतों की ओर चले गए. प्रकाश ने यह पता कर लिया था कि बख्तियार रात को खेतों में सोता है और उस के पास एक बंदूक भी है, जिसे वह अपने पास रखता है.

प्रकाश ने दूर से गुल्लू को वह खेत दिखा दिए, जहां बख्तियार सोता था. गुल्लू को जगह दिखा कर वह वापस आ गया. अब गुल्लू बेचैनी से रात का इंतजार करने लगा. आधी रात के समय वह प्रकाश के घर से निकला. दोनों के बीच यह तय हुआ था कि अगर गुल्लू हवलदार की हत्या करने में कामयाब हो गया तो वापस नहीं आएगा और अगर कामयाब नहीं हुआ तो फिर प्रकाश के घर आ जाएगा. आधी रात का समय था. जब गुल्लू बख्तियार के गांव के बाहर होता हुआ खेतों की तरफ पहुंचा. उस ने दूर से देखा तो हवलदार एक चारपाई पर सोता दिखाई दिया. वह अपनी घोड़ी को धीरेधीरे चला कर खेत के किनारे पहुंच गया. वहां से वह हवलदार की ओर बढ़ा. हवलदार उस वक्त गहरी नींद सोया हुआ था.

गुल्लू किसी तरह की आहट किए बिना हलवदार के सिर की ओर पहुंच गया. सिर की ओर इसलिए कि अगर उस की आंख खुल भी जाए तो वह दिखाई न दे. उस ने बैसाखी जमीन पर रखी और चाकू निकाल कर हवलदार के सीने में भोंक दिया. चाकू लगने पर हवलदार एक झटके के साथ उठा और उस के मुंह से भयानक चीख निकली. उस ने बाएं हाथ से बंदूक पकड़ी, लेकिन तब तक गुल्लू ने चाकू का दूसरा वार कर दिया. बंदूक हवालादार के हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी. गुल्लू उस समय बदले की भावना से पागल हो गया था. उस ने तीसरा वार हवलदार के पेट पर कर के पेट फाड़ दिया.

हवलदार मुंह के बल आधा चारपाई से नीचे गिर गया, जबकि उस का आधा धड़ चारपाई पर ही रहा. इस से उस की जान निकल गई. गुल्लू ने खून से सना चाकू हवलदार के कपड़ों से साफ कर के अपनी जेब में रख लिया. फिर बैसाखी उठाई और घोड़ी पर सवार हो कर अपने गांव चला गया. मैं ने उस से पूछा कि वह चाकू कहां है, जिस से हवलदार की हत्या की थी? उस ने बताया कि घर में मचान पर फेंक दिया था. मैं ने उस का पूरा बयान लिख कर उस के हस्ताक्षर करा लिए और उसे ले कर चाकू बरामद करने चला गया. उस के गांव पहुंच कर नंबरदार और 2 सम्मानित व्यक्तियों को साथ ले कर गुल्लू के घर गया, जहां गुल्लू ने मचान से चाकू बरामद करा दिया.

मैं ने गुल्लू को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के उस का बयान करा दिया. गुल्लू ने वही बयान मजिस्ट्रैट के सामने भी दिया. मौके का कोई गवाह नहीं था. अगर गुल्लू अपने बयान से पलट जाता तो बच जाता. लेकिन उसे अब जिंदा रहने में कोई रुचि नहीं थी. उस ने बताया कि अपंग होने के कारण उस के भाई और भाभियां उसे बोझ समझते हैं. सेशन जज ने गुल्लू को मृत्युदंड दिया, जबकि प्रकाश को उस का साथ देने के लिए 5 साल के कारावास की सजा दी. हाईकोर्ट में गुल्लू के बाप ने अपील की, जहां उस के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया. गुल्लू की जान बचने पर उस के बाप को खुशी हुई, लेकिन गुल्लू को कोई खुशी नहीं हुई थी. Crime Stories

 

Jaipur Crime: पैसे के खेल में मिली जेल

Jaipur Crime: जयपुर स्थित पुलिस चौकी रेनवाल मांजी के इंचार्ज सत्यपाल ने करीब डेढ़ लाख के इनामी बदमाश नंदू और उस के साथियों को 10 लाख रुपए ले कर छोड़ दिया होता तो पुलिस का एक दूसरा चेहरा कभी सामने न आता, लेकिन पुलिस ने सत्यप्रकाश का गेम ऐसा बिगाड़ा कि बदमाश तो जेल गए ही, मोटी रकम का सपना देखने वाले 3 पुलिस वाले भी नप गए.

29 अप्रैल की दोपहर को यही कोई डेढ़-पौने 2 बज रहे थे. गरमी ऐसी जैसे आसमान से आग बरस रही हो. ऊपर से लू चल रही थी. भयानक गरमी और लू के बावजूद गुड़गांव पुलिस जयपुर के भांकरोटा-जयसिंहपुरा रोड पर दिल्ली के नंबर वाली एक फौर्च्युनर गाड़ी का पीछा कर रही थी. पुलिस की गाड़ी में 4-5 लोग सवार थे, जबकि दिल्ली के नंबर की जिस गाड़ी का वे पीछा कर रहे थे, उस में 3 लोग सवार थे.

गुड़गांव पुलिस आगे वाली उस गाड़ी का पीछा करते हुए भांकरोटा चौराहे से करीब आधा किलोमीटर दूर जयसिंहपुरा के पास उस गाड़ी के एकदम करीब पहुंच गई. इस से फौर्च्युनर में सवार लोगों को लगा कि वे घिर गए हैं. अपने आप को घिरा देख उन्होंने गाड़ी रोक दी और पीछा कर रही गुड़गांव पुलिस की गाड़ी पर फायरिंग करनी शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी 8-10 राउंड गोलियां चलाईं. फिल्मी स्टाइल में दिनदहाड़े सरेआम मेनरोड पर गोलियां चलने से उधर से वाहनों से गुजर रहे लोग और राहगीर दहशत में आ गए. ट्रैफिक रुक गया और लोग जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे.

इस बीच गुड़गांव पुलिस ने फायरिंग करने वाले बदमाशों में से एक को पहचान लिया था. वह दिल्ली का नंबर वन मोस्टवांटेड अपराधी कपिल सांगवान उर्फ नंदू था. उस पर करीब डेढ़ लाख रुपए का इनाम घोषित था. उस की दिल्ली पुलिस के साथसाथ हरियाणा पुलिस को भी तलाश थी. सड़क पर मची भगदड़ का फायदा उठाते हुए बदमाश अपनी गाड़ी में सवार हो कर सड़क के किनारे खड़े एक टैंपो को टक्कर मारते हुए भाग निकले. गुड़गांव पुलिस उन का पीछा करने के लिए गाड़ी मोड़ ही रही थी कि तभी एक ट्रक उन की गाड़ी के सामने आ गया. ट्रक निकल गया तो गुड़गांव पुलिस ने फिर से बदमाशों की गाड़ी का पीछा किया.

पुलिस को बदमाशों की गाड़ी भांकरोटा से मुहाना जाने वाले समानांतर रास्ते पर 2-3 सौ मीटर दूर दिखाई दी, लेकिन कुछ दूर जाने के बाद बदमाशों की गाड़ी जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास पुलिस की आंखों से ओझल हो गई. गुड़गांव पुलिस ने कुछ देर तक इधरउधर घूम कर बदमाशों की तलाश की, लेकिन उन का कोई पता नहीं चला.

थकहार कर गुड़गांव पुलिस ने इस बात की सूचना आला अधिकारियों को देने के साथ यह भी बता दिया कि मोस्टवांटेड अपराधी नंदू भी उन में शामिल था. इस के बाद गुड़गांव पुलिस के अधिकारियों ने तुरंत जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल से फोन पर बात की. बातचीत से पता चला कि गुड़गांव पुलिस ने बदमाशों की तलाश में अपने आने की सूचना जयपुर पुलिस को नहीं दी थी. खैर, जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने दिल्ली और हरियाणा के कुख्यात अपराधी नंदू के जयपुर में होने और बदमाशों द्वारा फायरिंग किए जाने की घटना को गंभीरता से लिया. उन्होंने तुरंत पूरे जयपुर में कड़ी नाकेबंदी करवा दी.

भांकरोटा, जयसिंहपुरा, नेवटा सहित आसपास के इलाकों में जयपुर पुलिस की क्यूआरटी व एटीएस के अलावा कई थानों की पुलिस ने पूरे शहर की घेराबंदी कर ली. राजस्थान की राजधानी जयपुर से बाहर जाने वाले सभी रास्तों पर पुलिस ने कड़ी निगरानी शुरू कर दी. खासतौर से दिल्ली रोड और सीकर रोड पर बदमाशों के भागने की आशंका को देखते हुए पुलिस की विशेष टीमें लगाई गईं. जयपुर पुलिस उस दिन दोपहर से ले कर रात तक सड़कों पर डटी रही, साथ ही भांकरोटा, जयसिंहपुरा व मुहाना आदि इलाकों में गश्त भी करती रही, लेकिन फायरिंग कर के भागने वाले बदमाशों के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

हालांकि यह गुड़गांव पुलिस का मामला था, लेकिन दिल्ली और हरियाणा के कुख्यात अपराधी नंदू और उस के साथियों के जयपुर में होने और पुलिस पर फायरिंग कर के भागने की घटना से जयपुर पुलिस कमिश्नर चिंतित हो उठे थे. चिंता की एक खास वजह यह भी थी कि करीब सवा महीने पहले 21 मार्च को राजस्थान के कुख्यात अपराधी और मोस्टवांटेड आनंदपाल तथा उस के गुर्गे नागौर में पुलिस पर गोलियां बरसा कर भाग निकले थे. इस घटना से राजस्थान पुलिस की काफी छीछालेदर हुई थी. इसलिए जयपुर पुलिस नंदू के मामले में किसी तरह की लापरवाही नहीं बरतना चाहती थी.

दरअसल, गुड़गांव पुलिस ने इस घटना से 1-2 दिन पहले लूट के आरोप में 2 बदमाशों को गिरफ्तार किया था. उन से पूछताछ में पता चला था कि नंदू अपने कुछ साथियों के साथ जयपुर में है. इसी सूचना के आधार पर गुड़गांव पुलिस की क्राइम ब्रांच के सबइंसपेक्टर सुरेंद्र और सतीश कुमार के साथ उन की टीम 29 अप्रैल को जयपुर आई थी. गुड़गांव पुलिस को कपिल सांगवान उर्फ नंदू की एक लग्जरी कार की लूट के मामले तलाश में थी.

मोस्टवांटेड नंदू की इस कहानी में उसी दिन एक नया मोड़ आ गया. भांकरोटा चौराहे के पास जयसिंहपुरा रोड पर गुड़गांव पुलिस से मुठभेड़ के बाद नंदू अपने दोनों साथियों के साथ फौर्च्युनर गाड़ी से भाग रहा था, तभी डिग्गी रोड पर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी के सामने वाली सड़क पर उन की गाड़ी का एक टायर फट गया. टायर फटने के बावजूद बदमाश अपनी गाड़ी को तेजी से भगा कर ले जा रहे थे. टायर फटने से उछलती हुई दौड़ रही गाड़ी को देख कर एक टायर पंक्चर बनाने वाले युवक को शक हुआ. उस ने यह बात पुलिस चौकी के पास स्थित पैट्रोल पंप के मालिक कैलाश चौधरी को बताई तो वह अपने पैट्रोल पंप के केबिन से बाहर निकल आए. बाहर आ कर उन्होंने देखा, कार रोक कर उस में 3 लड़के उतरे और अपने बैग ले कर तेजी से भागने लगे.

उन लड़कों के भागने से आसपास के लोगों को शक हुआ तो कुछ लोगों ने उन्हें थोड़ी दूर दौड़ा कर धांधो की ढाणी के पास पकड़ लिया. इस बीच, वहीं चाय की दुकान करने वाले एक आदमी ने रेनवाल मांजी पुलिस चौकी को इस मामले की सूचना दे दी. लोगों ने जिस जगह तीनों युवकों को पकड़ा था, वह जगह पुलिस चौकी से करीब आधा किलोमीटर दूर थी, इसलिए 5 मिनट में ही चौकी से 2 सिपाही निर्मल और कालूराम मोटरसाइकिल से वहां आ पहुंचे. दोनों सिपाही उन लड़कों के हावभाव देख कर ही समझ गए कि ये कोई भले आदमी नहीं हैं. सिपाहियों ने वहां मौजूद लोगों से कहा कि इन्होंने जयपुर में एक्सीडेंट किया है, इसीलिए इन की गाड़ी का बंपर टूट गया है और टायर भी फट गया है. उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, पुलिस इन से पूछताछ कर के भागने के कारणों का पता लगा लेगी.

इस तरह वहां जमा लोगों को भरोसा दे कर दोनों सिपाही तीनों युवकों को रेनवाल मांजी पुलिस चौकी ले गए. यह दोपहर करीब 3 बजे की बात है. सिपाही निर्मल और कालूराम तीनों युवकों को ले कर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी पहुंचे तो चौकीप्रभारी एएसआई सत्यप्रकाश वहां मौजूद थे. यह चौकी जयपुर ग्रामीण जिला पुलिस के थाना फागी के अंतर्गत आती है. चौकीप्रभारी सत्यप्रकाश ने तीनों युवकों के बैगों की तलाशी ली तो उन में से पिस्तौल और कारतूस के अलावा कुछ रकम भी मिली. पिस्तौल और कारतूस देख कर सत्यप्रकाश समझ गए कि ये तीनों वही अपराधी हैं, जिन के लिए जयपुर पुलिस ने नाकेबंदी कर रखी है.

जयपुर पुलिस का वायरलैस मैसेज पहले ही चौकी पर पहुंच चुका था, जिस में कहा गया था कि दिल्ली और हरियाणा का मोस्टवांटेड नंदू गुड़गांव पुलिस पर फायरिंग कर के अपने 2 साथियों के साथ एक फौर्च्युनर गाड़ी में भागा है. नंदू की तलाश में कड़ी नाकेबंदी की जाए. चौकीप्रभारी ने एक क्रेन बुलवा कर तीनों युवकों की फटे टायर वाली फौर्च्युनर गाड़ी खिंचवा कर चौकी पर मंगवा ली थी. सत्यप्रकाश ने तीनों के नामपते पूछे तो उन में एक ने अपना नाम नवीन राठी तो दूसरे ने हिमांशु छिल्लर और तीसरे ने सचिन छिंकारा बताया. हथियारों के बारे में वे कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए. सत्यप्रकाश को पता चल चुका था कि ये युवक और कोई नहीं, नंदू और उस के साथी हैं.

इस बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने थोड़ी सख्ती की तो तीनों युवकों में से एक स्मार्ट से युवक ने सत्यप्रकाश से सीधेसीधे कहा, ‘‘देखो साहब, मेरा नाम नवीन राठी नहीं, बल्कि नंदू है. ये दोनों मेरे साथी हैं. हरियाणा का एक गैंग हमारे पीछे पड़ा है. वे लोग हमें मार देंगे. आप हमें छोड़ दो, बोलो कितना पैसा चाहिए? इस के अलावा हम तीनों को जयपुर पुलिस भी तलाश रही है. यह नाकेबंदी हमारे लिए ही हो रही है.’’

वह गांव की पुलिस चौकी थी. चौकीप्रभारी सत्यप्रकाश खेलाखाया पुलिस वाला था. उसे पता था कि तीनों ही मोटी मुर्गियां हैं, इसलिए उस ने नंदू की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘ठीक है, हम तुम को बचा लेंगे. लेकिन इस के लिए तुम्हें 30 लाख रुपए देने होंगे.’’

‘‘इंचार्ज साहब, कभी 30 लाख रुपए गिने भी हैं या सिर्फ जुबान से कह दिया?’’ नंदू ने कुटिलता से कहा, ‘‘2-4 लाख की बात हो तो कहो, वरना 5-7 दिन जेल में रह लेंगे. उस के बाद जमानत हो जाएगी. हमारे लिए जेल आनाजाना कोई नई बात नहीं है.’’

सत्यप्रकाश समझ गए कि तीनों बदमाश पैसे तो दे देंगे, लेकिन सौदेबाजी करनी पड़ेगी. उन्होंने पुलिसिया भाषा में सौदेबाजी की तो नंदू 10 लाख रुपए देने पर राजी हो गया. चौकी पर सत्यप्रकाश के अलावा 2 सिपाही निर्मल और कालूराम भी थे. उन्हें भी सारी बातें पता थीं. सत्यप्रकाश ने दोनों सिपाहियों को अपने विश्वास में ले कर उन्हें 3-3 लाख रुपए में राजी कर लिया. इतनी रकम के लिए दोनों सिपाही अपनी जुबान बंद रखने को तैयार हो गए.

सत्यप्रकाश और नंदू के बीच सौदेबाजी हो गई तो नंदू ने गुड़गांव के अपने एक साथी को फोन कर के कहा, ‘‘मैं जयपुर से बोल रहा हूं. यहां जयपुर पुलिस ने हमें पकड़ लिया है. 10 लाख रुपए ले कर आ जाओ, नहीं तो ये लोग हमें गिरफ्तार कर लेंगे.’’

इसी के साथ नंदू ने उसे यह भी बता दिया कि किस आदमी से 10 लाख रुपए मिलेंगे. साथ ही यह भी बता दिया कि 10 लाख रुपए ले कर रेनवाल मांजी पुलिस चौकी आना है. पुलिस से सौदा होने के बाद नंदू और उस के साथियों की चिंता और तनाव थोड़ा कम हुआ. खुद को रिलैक्स महसूस करते हुए उन्होंने सोचा कि जान बची तो लाखों पाए. सौदेबाजी के बाद नंदू और उस के साथियों की चौकीइंचार्ज और दोनों सिपाहियों से दूरियां खत्म हो गईं. नंदू ने सत्यप्रकाश से कह कर चायनाश्ता मंगवाया. तीनों बदमाश चौकी में ही मेहमान की तरह कुर्सियों पर आराम करने लगे.

सत्यप्रकाश के कहने पर पुलिस चौकी के रसोइए मानसिंह ने उन तीनों के लिए रात का खाना बनाया तो उन्होंने रात करीब साढ़े 8 बजे डिनर किया. इस के बाद तीनों पुलिस चौकी में बने इंचार्ज के रेस्टरूम में आराम करने लगे. बीचबीच में वे अपने साथियों से मोबाइल पर बात भी कर रहे थे. चौकी का एक सिपाही कमरे के बाहर पहरा दे रहा था. दूसरी ओर एडिशनल सीपी (क्राइम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देश और डीसीपी (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में गठित जयपुर पुलिस की विशेष टीमें हरियाणा पुलिस पर फायरिंग कर के भागे तीनों बदमाशों की तलाश में जुटी थीं.

इन्हीं पुलिस टीमों में से एक को जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास मल्टीस्टोरी फ्लैट्स में हरियाणा के कुछ युवकों के रहने और दिल्ली के नंबरों की गाडि़यों के आनेजाने की जानकारी मिली. इस जानकारी के आधार पर पुलिस टीम ने रात करीब साढ़े 7 बजे एक फ्लैट पर छापा मारा. फ्लैट की तलाशी में सिम का रैपर, मोबाइल का खाली डिब्बा और कई ऐसे दस्तावेज मिले, जिन से पता चला कि इस फ्लैट में कपिल सांगवान उर्फ नंदू रहता था.

रैपर से पुलिस को मोबाइल का नंबर मिल गया. उस नंबर को पुलिस ने सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन रेनवाल के आसपास आ रही थी. इस के बाद पुलिस की एक टीम रेनवाल इलाके में नंदू और उस के साथियों की तलाश में लग गई. इस पुलिस टीम ने रेनवाल मांजी चौकी के भी 2-3 चक्कर लगाए, पर न तो वहां कोई फौर्च्युनर गाड़ी नजर आई और न ही नंदू और उस के साथी.

इस पुलिस टीम ने रेनवाल मांजी पुलिस चौकी में जाने की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की क्योंकि अगर कोई संदिग्ध बदमाश पकड़े जाते तो अब तक पूरे जयपुर में वायरलैस गूंज रहे होते और वहां तमाम आला अफसरों का जमावड़ा लग गया होता. दूसरा कारण यह था कि चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश ने नंदू और उस के साथियों की फौर्च्युनर गाड़ी को झाडि़यों में इस तरह छिपा दिया था कि बाहर से देखने पर वह किसी को नजर नहीं आ रही थी.

नंदू का मोबाइल सर्विलांस पर लगा होने की वजह से पुलिस को यह पता चल गया कि गुड़गांव से कुछ लोग 10 लाख रुपए ले कर जयपुर आ रहे हैं. साथ ही यह भी कि पैसा लाने वालों में से एक का नाम गजराज सिंह है. पुलिस ने उन के फोन टेप करने शुरू किए. गुड़गांव से आ रहे लोगों की लोकेशन जयपुर-दिल्ली रोड की आ रही थी.

इस जानकारी के आधार पर जयपुर पुलिस ने दिल्ली रोड पर लगी नाकेबंदी सख्त करवा दी, साथ ही दिल्ली और हरियाणा के नंबर वाली गाडि़यों की तलाशी सख्ती से ली जाने लगी. नाकेबंदी के दौरान क्राइम ब्रांच एवं दक्षिणी जिले की स्पैशल पुलिस टीम ने जयपुर के पास थाना मुहाना की टीलावाला चौकी के पास एक गाड़ी रोकी. उस गाड़ी में 3 लोग सवार थे. गाड़ी की तलाशी में एक बैग मिला, जिस में 10 लाख रुपए भरे थे. पुलिस ने गाड़ी में सवार तीनों लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम गजराज सिंह, परमजीत सिंह और पंकज बताए.

इन तीनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो जयपुर ग्रामीण जिले की रेनवाल मांजी पुलिस का भांडा फूट गया और पुलिस का एक दूसरा ही चेहरा सामने आ गया. उन तीनों ने बताया कि नंदू और उस के साथियों को जयपुर ग्रामीण जिले की पुलिस ने पकड़ रखा है और उन्हें छोड़ने के लिए 10 लाख रुपए मांगे हैं. नंदू ने ही उन्हें फोन कर के 10 लाख रुपए लाने को कहा था. ये रुपए ले कर वे रेनवाल मांजी पुलिस चौकी जा रहे थे. उन्होंने यह भी बताया कि नंदू और उस के साथी रेनवाल पुलिस चौकी पर ही हैं.

जांच में लगी पुलिस टीमों ने यह बात अपने उच्चाधिकारियों को बताई. अब जयपुर पुलिस को बेहद सावधानी बरतनी थी, क्योंकि मामले में पुलिस का दूसरा चेहरा सामने आ गया था, साथ ही रेनवाल मांजी चौकी पुलिस को पता चलने पर नंदू और उस के साथियों की जान का खतरा भी हो सकता था. इस के अलावा नंदू की गुड़गांव से आए उस के साथियों से मोबाइल पर बातचीत जारी रखवानी थी, ताकि नंदू या रेनवाल मांजी चौकी पुलिस को यह शक न हो कि 10 लाख रुपए ला रहे उस के साथियों को पुलिस ने पकड़ लिया है.

जब इस बात की जानकारी जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को हुई तो उन्होंने रणनीति बना कर रेनमाल मांजी पुलिस चौकी पर छापा मारा. इस के लिए पुलिस टीम ने रात के 12 बजे का समय चुना था. नंदू और उस के दोनों साथी इंचार्ज के कमरे में आराम करते मिल गए. चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाही निर्मल और कालूराम भी वहीं थे. पुलिस ने नंदू और उस के साथियों को तो पकड़ा ही, साथ ही चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों को भी हिरासत में ले लिया.

जयपुर पुलिस द्वारा आधी रात को मारे गए छापे से नंदू और उस के साथियों के अलावा चौकी के तीनों पुलिसकर्मी भी हैरान थे कि यह सब अचानक कैसे हो गया? जब जयपुर पुलिस ने बाहर गाड़ी में बैठे गुड़गांव से आ रहे गजराज सिंह, परमजीत सिंह और पंकज को बाहर निकाला तो उन की समझ में आ गया कि इन्हीं लोगों से पुलिस को उन के रेनवाल मांजी चौकी में होने की जानकारी मिली होगी. एक ही दिन में नंदू के आपराधिक जीवन में यह तीसरा मोड़ आया था.

इस बीच एक और घटना घट गई. हुआ यह कि शुरुआती पूछताछ के बाद जयपुर पुलिस ने 30 अप्रैल को रेनवाल मांजी चौकीइंचार्ज सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों निर्मल और कालूराम को भांकरोटा थाना पुलिस के हवाले कर दिया. तीनों आरोपी भी उसी थाने में थे. हालांकि एक तरह से वे अपराधी थे, लेकिन उन्हें हवालात में नहीं रखा गया था. इसलिए तीनों पुलिस की नजरों के बीच थाने में इधरउधर घूम रहे थे.

इस का फायदा उठा कर एएसआई सत्यप्रकाश टहलतेटहलते शाम को थाने से बाहर निकल कर फरार हो गया. उसे भागने का मौका भी मिला तो उस वक्त जब जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल कमिश्नर औफिस में नंदू और उस के साथियों के पकड़े जाने की जानकारी देने के लिए प्रैस कौन्फ्रैंस कर रहे थे. उस समय थाना भांकरोटा के थानाप्रभारी हेमेंद्र शर्मा कमिश्नर औफिस में ही थे. कहा जाता है कि सत्यप्रकाश किसी परिचित की कार से भागा था, लेकिन पुलिस ने सत्यप्रकाश को 20 घंटे बाद अगले दिन एक मई को बीकानेर से पकड़ लिया. इस से जयपुर पुलिस की लाज बच गई.

अपराधियों से मिलीभगत करने के आरोप में जयपुर आईजी हेमंत प्रियदर्शी ने एएसआई सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों निर्मल और कालूराम को निलंबित कर दिया. यह अलग बात है कि अगर सत्यप्रकाश, निर्मल और कालूराम अपराधियों को छोड़ने के एवज में सौदेबाजी न करते तो उन्हें प्रमोशन तो मिलता ही, नंदू और उस के साथी बदमाशों पर पुलिस की ओर से घोषित करीब 2 लाख रुपए की इनाम की राशि भी मिल सकती थी.

नंदू के जीवन में एक ही दिन में 3 मोड़ आने के बाद भी उस की परेशानी खत्म नहीं हुई थी. पहले हरियाणा पुलिस से मुठभेड़ हुई. उस में बचा तो ग्रामीणों ने पुलिस को सौंप दिया. पुलिस से सौदेबाजी की तो भी किस्मत धोखा दे गई. खुद के साथ उस के साथी भी पकड़े गए. गुड़गांव से मंगाए 10 लाख रुपए भी गए और रुपए लाने वाले भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. दिल्ली और हरियाणा में गैंग के लोगों को जब पता चला कि नंदू सहित उन के 6 साथियों को जयपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है तो गिरोह के 4 लोग उन की जमानत के लिए 5 लाख रुपए ले कर 1 मई को जयपुर पहुंचे. नंदू की किस्मत यहां भी धोखा दे गई. वे चारों भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

पुलिस ने उन्हें दौलतपुरा टोल के पास नाकेबंदी के दौरान पकड़ लिया. वे हरियाणा के नंबर की टाटा सफारी में सवार थे. उन की गाड़ी में बिना लाइसैंसी रिवौल्वर, 10 जिंदा कारतूस और 5 लाख रुपए नकद मिले. पकडे़ गए आरोपियों में अजय कुमार जाट, संदीप जाट, राजन जाट और सतपाल जाट शामिल थे. ये चारों हरियाणा के झज्जर के रहने वाले थे. इन में सतपाल उस गजराज सिंह का भाई था, जो गुड़गांव से नंदू को छुड़वाने के लिए 10 लाख रुपए ले कर जयपुर जा रहा था.

नंदू गिरोह के हौसले इतने बुलंद थे कि जयपुर पुलिस द्वारा 6 साथियों के पकड़े जाने के बाद भी सतपाल ने पकड़ने वाले पुलिस इंसपेक्टर से कहा, ‘‘हमें तो गजराज और उस के साथियों की जमानत करानी है. इस में मदद कर के जो चाहो, मिल जाएगा.’’

जयपुर पुलिस ने हरियाणा पुलिस पर फायरिंग कर के भागे नंदू और उस के दोनों साथियों सचिन छिंकारा व गुलशन उर्फ हिमांशु छिल्लर से पूछताछ की और 1 मई को उन्हें मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर के 3 मई तक पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि पूरी होने पर थाना भांकरोटा पुलिस ने 3 मई को उन्हें फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेजने का आदेश दिया गया. बाद में दिल्ली पुलिस की अर्जी पर अदालत ने तीनों को प्रोडक्शन वारंट पर दिल्ली पुलिस को सौंप दिया.

जयपुर पुलिस ने रेनवाल मांजी चौकी के गिरफ्तार एएसआई सत्यप्रकाश तथा सिपाही निर्मल और कालूराम को भी न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. नंदू के गिरोह के उन 7 लोगों को भी जेल भेज दिया गया, जो 10 लाख रुपए और 5 लाख रुपए ले कर आए थे. रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में नंदू और उस के साथियों के अपराधों के साथ जयपुर को अपनी शरणस्थली बनाने का जो खुलासा हुआ, वह इस प्रकार था.

कपिल सांगवान उर्फ नंदू दिल्ली के 10 मोस्टवांटेड अपराधियों में नंबर वन है. मूलरूप से हरियाणा स्थित महेंद्रगढ़ जिले के नांगल चौधरी पुलिस थानाक्षेत्र के नांगल वाली गांव के रहने वाले सूरजभान के बेटे नंदू का दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड में स्थाई पता आरजेड-81बी, नंदा एन्कलेव, नजफगढ़, दिल्ली दर्ज है. 20 वर्षीय नंदू पर दिल्ली पुलिस की ओर से करीब डेढ़ लाख रुपए का इनाम घोषित है.

नंदू के खिलाफ दिल्ली के विभिन्न पुलिस थानों में हत्या, हत्या के प्रयास, लूट और एक्सटौर्शन आदि के 10 मुकदमे दर्ज हैं. इन के अलावा हरियाणा के जींद सिटी व गुड़गांव में भी उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज हैं. नंदू और उस के साथियों पर विभिन्न थानों में 8 हत्याओं के मामले दर्ज हैं. वह बीए औनर्स का छात्र है और पिछले 3 सालों से आपराधिक वारदातें कर रहा है. नंदू का बड़ा भाई ज्योति सांगवान उर्फ बाबा भी कुख्यात अपराधी है. उस के खिलाफ दिल्ली एवं अन्य राज्यों में हत्या सहित कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. उस के साथी सचिन छिंकारा पर भी दिल्ली पुलिस की ओर से 50 हजार रुपए का इनाम घोषित है.

मासूम सा दिखने वाला नंदू इतना खूंखार है कि गोली चलाना और किसी की हत्या कर देना, उसे तमाशा लगता है. वह अपने दुश्मनों से ज्यादा उन के परिवार के लिए खतरनाक है. नंदू ने अपने गिरोह के साथ 20 दिसंबर, 2015 की रात ढाई बजे के करीब दिल्ली में नजफगढ़ के पास छावला इलाके में कुख्यात अपराधी मंजीत महाल के गैंग के सदस्य और घुम्मनहेड़ा के रहने वाले नफे सिंह उर्फ मंत्री के पिता हरिकिशन, मां कमला और पत्नी शर्मिला को गोलियां मार कर उन की हत्या का प्रयास किया था. इन में से हरिकिशन की मौत हो गई थी, जबकि दोनों महिलाएं गंभीर रूप से घायल हो गई थीं. हरिकिशन दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड हैडकांस्टेबल थे.

इस मामले में नंदू के साथ गुलशन और सचिन भी थे. दरअसल मंजीत महाल गैंग के नफे सिंह उर्फ मंत्री व अन्य लोगों ने उसी रात दीनपुर इलाके में 11 बजे के करीब सुर्रखपुर निवासी नंदू के जीजा सुनील उर्फ डाक्टर की गोली मार कर हत्या कर दी थी. जीजा की हत्या की सूचना मिलते ही उसी रात नंदू ने बदला लेने के लिए आरोपी नफे सिंह के पिता की हत्या कर दी थी.

नफे सिंह के पिता हरिकिशन सिंह की हत्या करने के अगले दिन नंदू अपने साथियों गुलशन और सचिन के साथ जयपुर आ गया था. जयपुर के एक होटल में उन्होंने पार्टी कर के अपने दुश्मन के बाप की हत्या का जश्न मनाया और फिर जयपुर में ही अपना ठिकाना बना लिया. यहां रहने के लिए उस ने वैशालीनगर में थाने के पीछे की गली में किराए का फ्लैट लिया. यहां रहते हुए वह दिल्ली और हरियाणा भी जाता रहा. उस के साथी भी उस से मिलने जयपुर आते रहे. जयपुर में नंदू नवीन राठी के नाम से रहता था, जबकि गुलशन ने अपना नाम हिमांशु छिल्लर रख लिया था. दोनों ने इन्हीं नामों की आईडी की भी व्यवस्था कर ली थी.

इसी साल 11 जनवरी के दूसरे सप्ताह में नंदू अपने साथियों के साथ दिल्ली गया. उस ने शिकारपुर गांव के रहने वाले 45 वर्षीय विनोद और 19 वर्षीय उस के बेटे कमल की उन के घर में ही हत्या कर दी. पुलिस जांच में पता चला कि विनोद उस धर्मेंद्र उर्फ माडू के पिता थे, जो 20 दिसंबर की रात नंदू के जीजा सुनील उर्फ डाक्टर की हत्या के समय हत्यारों के साथ था. कमल धर्मेंद्र का छोटा भाई था. नंदू और उस के साथियों के हाथों मारे गए विनोद और कमल न तो किसी आपराधिक गैंग में शामिल थे और न ही उन के खिलाफ कोई मामला दर्ज था. कहा जाता है कि नंदू घर में मौजूद 2 बच्चों को भी मारना चाहता था, लेकिन साथियों ने उसे ऐसा करने से मना कर दिया था. सुनील उर्फ डाक्टर की हत्या में शामिल आरोपी धर्मेंद्र को क्राइम ब्रांच ने 31 दिसंबर, 2015 को गिरफ्तार कर लिया था.

विनोद और उस के बेटे कमल की हत्या के बाद नंदू और उस के साथी जयपुर आ कर वैशालीनगर वाले फ्लैट में रहने लगे थे. शक होने पर मकान मालिक ने उन से अपना फ्लैट खाली करा लिया तो उस ने जयपुर के मुहाना के जयसिंहपुरा स्थित ओमेगा रेजीडेंसी अपार्टमेंट में 203 नंबर का फ्लैट किराए पर ले लिया था. उस के साथ 2-3 साथी भी वहां रहते थे. नंदू व उस के साथियों ने फ्लैट मालिक से खुद को स्टूडेंट बताया था.

अपार्टमेंट के गार्ड ने पुलिस को बताया कि नंदू उर्फ नवीन और उस के साथी 2-3 दिन में एक बार फ्लैट से निकलते थे. खानेपीने का सामान ये लोग रात को लाते थे. इन से मिलने के लिए हरियाणा व दिल्ली नंबरों के गाडि़यों में लड़के आते थे. नंदू ज्यादातर खुद ही खाना बनाता था. वे फ्लैट की साफसफाई भी खुद ही करते थे. फ्लैट मालिक ने इन का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था. बाद में भेद खुलने पर जयपुर की थाना मुहाना पुलिस ने जयसिंहपुरा निवासी केदार शर्मा को गिरफ्तार कर लिया था. यह फ्लैट तेलंगाना निवासी रिटायर्ड कर्नल शिशिर कुमार का था. कर्नल ने फ्लैट की देखभाल की जिम्मेदारी केदार शर्मा को सौंप रखी थी. केदार ने इन किराएदारों का पुलिस सत्यापन नहीं कराया था.

जयपुर में रहने के दौरान नंदू और उस के साथियों का कोई आपराधिक मामला पुलिस के सामने नहीं आया है. इस बारे में नंदू और उस के साथियों ने पुलिस को बताया कि दिल्ली और हरियाणा पुलिस उन के खिलाफ तेजी से काररवाई कर रही थी, जिस से बचने के लिए उन्होंने जयपुर को अपना ठिकाना बना लिया था. वे जयपुर में कोई अपराध कर के पुलिस की नजरों में नहीं आना चाहते थे. पुलिस को फ्लैट की तलाशी में कुछ ऐसा सामान मिला है, जिस से लगता है कि फ्लैट में युवतियों का भी आनाजाना था. नंदू और उस के साथियों ने अय्याशी के लिए लड़कियां लाने की बात कबूल की है.

मुठभेड़ की इस घटना के 5 दिनों पहले 24 अप्रैल को संस्कृत यूनिवर्सिटी के पास नंदू के किराए के फ्लैट से करीब 400 मीटर दूरी पर 20-21 साल की एक युवती का अधजला शव मिला था. इस लाश की शिनाख्त नहीं हुई है. थाना मुहाना पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. पुलिस ने नंदू और उस के साथियों से युवती के अधजले शव के बारे में भी पूछताछ की है, लेकिन अभी खुलासा नहीं हुआ है. पुलिस को शक है कि यह लाश नंदू और उस के साथियों की महिला मित्र की हो सकती है.

हालांकि नंदू और उस के साथियों ने इस बात से इनकार किया है. पूछताछ में नंदू के जयपुर की एक युवती से संबंध होने की बात सामने आई है. नंदू की उस युवती से सोशल साइट के माध्यम से बातचीत होती रहती थी. पुलिस उस युवती के बारे में जानकारी जुटा रही है.

पुलिस जांच में पता चला है कि बड़े भाई ज्योति सांगवान उर्फ बाबा के अपराधी होने की वजह से ही कपिल सांगवान उर्फ नंदू अपराध की दुनिया में आया था. कुछ समय पहले बड़ा भाई हत्या के एक मामले में भोंडसी जेल चला गया तो नंदू ने गिरोह की कमान संभाल ली. इस गिरोह का दिल्ली, हरियाणा में उगाही और नशीले ड्रग्स का काम है. हरियाणा पुलिस से मुठभेड़ के दौरान जिस फौर्च्युनर कार से नंदू और उस के साथी भागे थे, वह कार गुड़गांव से लूटी गई थी.

हरियाणा पुलिस इसी कार लूट के मामले में जयपुर आई थी. नंदू और उस के साथी दिल्ली और हरियाणा में हाईवे पर लग्जरी गाडि़यां भी लूटते थे. नंदू पर 7 गाडि़यां लूटने का आरोप है. गिरोह द्वारा लूटी गई एक एसयूवी कार की सड़क दुर्घटना हो गई तो ये उसे छोड़ कर भाग गए थे. कोई बड़ी वारदात करने के बाद भी ये लोग गाडि़यों को लावारिस छोड़ कर भाग जाते थे. नंदू का सब से विश्वासपात्र गुलशन उर्फ हिमांशु छिल्लर है. वह कार भगाने में माहिर है. गुलशन की वजह से ही नंदू और उस के साथी कई बार पुलिस की पकड़ से बच निकले थे. सचिन छिंकारा भी नंदू का खास है. अधिकांश बड़ी वारदातों में वह नंदू के साथ रहा है.

पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल के अनुसार, 30 अप्रैल को पकड़े गए 6 अपराधियों (नंदू और उस के दोनों साथियों के अलावा इन्हें छुड़ाने आए 3 लोग) से एक पिस्तौल, 6 कारतूस, पौइंट 38 स्मिथ ऐंड वेसन रिवौल्वर, 6 कारतूस, एक लाइसैंसी और्डिनेंसी रिवौल्वर और 10 लाख रुपए जब्त किए गए हैं. इस के बाद इन अपराधियों की जमानत कराने के लिए आ रहे लोगों से एक अवैध रिवौल्वर, 10 कारतूसों के अलावा 5 लाख रुपए जब्त किए गए हैं.

रिवौल्वर, कारतूस और रकम झज्जर निवासी अजय कुमार उर्फ अजय खत्री से बरामद हुई है. अजय के 3 साथियों झज्जर निवासी संदीप उर्फ नगड़, सतपाल उर्फ डिल्लुआ और राजन को काररवाई के दौरान उत्पात मचाने के आरोप में धारा 151 सीआरपीसी के तहत गिरफ्तार किया गया है. संदीप उर्फ नगड़ नंदू और उस के साथियों को छुड़ाने के लिए 10 लाख रुपए लाते समय पकड़े गए गजराज का सगा भाई है. हरियाणा पुलिस पर फायरिंग के सिलसिले में भी इन लोगों पर भांकरोटा थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है.

नंदू और उस के साथियों को छोड़ने के लिए 10 लाख रुपए में सौदा करने वाले एएसआई सत्यप्रकाश एवं सिपाही निर्मल और कालूराम को पुलिस की सेवा से बर्खास्त करने की काररवाई शुरू कर दी गई है. पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट ने उन के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए हैं. विभागीय जांच इसलिए की जा रही है, ताकि वे अदालत में अरजी लगा कर बिना जांच किए बर्खास्त करने का हवाला दे कर फिर बहाल न हो सकें.

इस पूरे मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों सत्यप्रकाश और दोनों सिपाहियों का कहना है कि उन्होंने गैलेंट्रीवार्ड लेने के लिए नंदू और उस के साथियों को छिपा दिया था. वे इन के पूरे गिरोह को पकड़ना चाहते थे, इसीलिए जयपुर पुलिस को इस की सूचना नहीं दी थी. हालांकि इस के उलट जयपुर पुलिस का कहना है कि सर्विलांस के दौरान टेप किए गए अपराधियों के मोबाइल पर हुई बातों में 10 लाख रुपए दे कर छोड़ने की बात साफ सुनाई दे रही है. बहरहाल, नंदू और उस के साथियों की गिरफ्तारी से जयपुरवासियों और दिल्ली तथा हरियाणा पुलिस को भले ही राहत मिली है, लेकिन इस से पुलिस और अपराधियों के चेहरे भी बेनकाब हो गए हैं, साथ ही चिंता की यह बात भी सामने आई है कि जयपुर और आसपास के इलाके कुख्यात अपराधियों की शरणगाह बनते जा रहे हैं.

राजस्थान पुलिस का कहना है कि नंदू कुख्यात अपराधी आनंदपाल से भी ज्यादा खूंखार है. आनंदपाल ने राजस्थान पुलिस को परेशान कर रखा है. 3 सितंबर, 2015 को नागौर पेशी से अजमेर लौटते समय कुख्यात आनंदपाल पुलिस की मिलीभगत से भाग निकला था. उस के बाद 21 मार्च को नागौर में पुलिस की आनंदपाल से मुठभेड़ हुई, जिस में एक जवान की मौत हो गई थी. इस के बाद भी वह पुलिस को चकमा दे गया था. उस ने राजस्थान पुलिस का चैन छीन रखा है. Jaipur Crime

 

Contract Killing Story: मास्टर माइंड – औरत की हत्या

Contract Killing Story: कहा जाता है कि महेशचंद की पत्नी और तीनों बेटियों की हत्या आशा शर्मा ने कराई थी, लेकिन सबूतों के अभाव में 3 साल बाद वह जेल से छूट गई. आश्चर्य की बात यह है कि 7 साल बाद आशा शर्मा की उसी 16 अप्रैल को हत्या हो गई, जिस 16 अप्रैल को उस ने 4 लाशें बिछवाई थीं.

आशा शर्मा के कत्ल की कीमत एक लाख रुपए तय हुई थी. 20 हजार रुपए मदन को एडवांस दे दिए गए थे, बाकी काम हो जाने पर दिए जाने थे. एडवांस की रकम ले कर मदन जैसे ही अपनी दुकान पर पहुंचा, उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नंबर देखा तो चौंका. फोन आशा शर्मा का था. वही आशा शर्मा, जिस के कत्ल की वह सुपारी ले कर आया था. पहले तो उस ने सोचा फोन रिसीव ही न करे, लेकिन वह जानता था कि जब तक फोन नहीं उठाएगा तब तक वह बारबार फोन करती रहेगी. आखिर मन मार कर उस ने फोन रिसीव कर के ‘हैलो’ कहा.

वह आगे कुछ बोलता, इस से पहले ही दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हाय हैंडसम, ले आए मुझे मारने की सुपारी? तुम्हें शर्म नहीं आई, मेरी जान की कीमत 1 लाख रुपए लगाते हुए. एडवांस भी कुल 20 हजार. अरे 5-10 लाख लिए होते तो मुझे भी खुशी होती.’’

आशा शर्मा की बात सुन कर मदन घबरा गया. घबराने की बात थी भी. अभीअभी सौदा हुआ था और आशा को पता चल गया था. मदन के चेहरे पर घबराहट के चिह्न साफ नजर आ रहे थे, मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे. उसे चुप देख कर दूसरी ओर से आशा ने ही कहा, ‘‘घबराओ मत, मैं किसी से नहीं कहूंगी. बस तुम एक घंटे के अंदरअंदर मेरे शास्त्रीनगर वाले घर पर आ जाओ. और हां, अगर तुम नहीं आए तो महेश और उस की बीवी मुन्नी के साथ थाने में खड़े नजर आओगे.’’

मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोले. उसे चुप देख आशा गुर्राने जैसी आवाज में बोली, ‘‘मेरी आवाज सुन कर तेरी पैंट गीली हो गई क्या? घबरा मत, मैं घर पर अकेली हूं. जल्दी आना, मुझे ज्यादा इंतजार करने की आदत नहीं है.’’

अपनी बात कह कर आशा शर्मा ने झटके से फोन काट दिया. मदन की समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे. न तो वह आशा शर्मा से अंजान था और न आशा शर्मा उस से. दोनों एकदूसरे की नसनस को जानते थे. कुछ नहीं सूझा तो मदन दुकान को भूल कर अपने दोस्त बौबी के घर जा पहुंचा. उस ने बौबी को पूरी बात बता कर सलाह मांगी. बौबी भी आशा शर्मा से अंजान नहीं था. रायमशविरे के बाद तय हुआ कि दोनों दोस्त साथसाथ आशा के घर जाएंगे.

मदन और बौबी आशा के शास्त्रीनगर स्थित घर जा पहुंचे. उन्हें देखते ही आशा शर्मा के होठों पर विजयी मुसकान फैल गई. वह फिल्म शोले के गब्बर सिंह वाले स्टाइल में बोली, ‘‘आओ महारथी, आओ. कौन सा हथियार लाए हो मेरी जान लेने के लिए?’’

कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी, फिर भी मदन ने हिम्मत जुटा कर लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘‘आप को मारने की हिम्मत कौन कर सकता है? हवाई घोड़े दौड़ाना अलग बात है और किसी की जान लेना अलग बात.’’

‘‘जानती हूं, तुम्हें भी और मेरी जान की सुपारी देने वाली को भी.’’ आशा सोफे की ओर इशारा कर के बोली, ‘‘बैठ जाओ, फिर बात करेंगे. मुझे कोई जल्दी नहीं है, न मरने की न मारने की. और हां, डरो मत. मैं बिलकुल अकेली हूं. चाहो तो घर में घूम कर देख लो. चुहिया की जात तक नहीं है यहां.’’

मदन और बौबी बिना बोले सोफे पर बैठ गए. आशा ने दोनों के चेहरों को गौर से देखा फिर बोली, ‘‘मुन्नी ने मेरे कत्ल की कीमत सिर्फ 1 लाख लगाई है, यह मेरी बेइज्जती है, नाकाबिलेबर्दाश्त. मैं इस गेम को बदलना चाहती हूं. मैं तुम लोगों को 50 लाख रुपए दूंगी, लेकिन इस के बदले में तुम्हें मुन्नी और उस की तीनों बेटियों की हत्या करनी होगी. बोलो, क्या कहते हो?’’

मदन और बौबी दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि वे क्या जवाब दें. उन्हें चुप देख कर आशा शर्मा ने ही कहा, ‘‘यही सोच रहे हो न कि मैं 50 लाख कहां से लाऊंगी? अरे बड़ा सीधा सा गणित है, मुन्नी और उन की बेटियों के मरते ही मैं महेश की पत्नी बन जाऊंगी, करोड़ों की मालकिन. उस के बाद 50 लाख या 1-2 करोड़ रुपए की कीमत क्या रह जाएगी मेरे लिए.’’

मदन और बौबी इस के बाद भी कुछ नहीं बोले तो आशा शर्मा ने एक और दांव खेला. वह अपने दोनों पांव सेंट्रल टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘काम हो जाने के बाद हमारा पैसे का लेनदेन तो खत्म हो जाएगा लेकिन मैं तुम्हारे लिए हाजिर रहूंगी.’’

सेंट्रल टेबल पर पैर रखने से आशा शर्मा की साड़ी घुटनों तक खिसक गई थी. उस के खुले दूधिया पैर इशारा समझने के लिए काफी थे. डरेसहमे मदन और बौबी की निगाहें उस के पैरों पर ही जमी थीं. आशा शर्मा ने कुछ इस अंदाज में बात की थी कि जरा सी देर में माहौल सामान्य हो गया. आशा ने मदन और बौबी के सामने ऐसा चारा डाला कि वे उस की बात मानने को तैयार हो गए. मोटी रकम और अपने जिस्म का लालच दे कर उस औरत ने पूरी बाजी ही पलट दी.

जब मदन और बौबी आशा के घर से निकले तो उन की नजरों के सामने निशाने के रूप में मुन्नी देवी और उस की तीनों बेटियों के चेहरे घूम रहे थे. उन्होंने सोच लिया था कि उन्हें क्या करना है. और इस के ठीक चौथे दिन मुन्नी और उस की तीनों बेटियों का कत्ल हो गया. उस दिन तारीख थी 16 अप्रैल, 2009. इस चौहरे हत्याकांड की तह तक जाने से पहले आप को बताते चलें कि इस घटना के 7 साल बाद 16 अप्रैल, 2016 को आशा शर्मा का भी कत्ल हो गया. कातिल था उस का अपना पति सुनील शर्मा. खास बात यह कि मृतका के पति सुनील ने ही अपने घर का पता बता कर पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी थी. वहां से इस की जानकारी थाना गांधी पार्क को दी गई थी.

अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बता कर थानाप्रभारी संजय पांडेय अपनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सुनील शर्मा का घर गली नंबर 3, शास्त्रीनगर, नौरंगाबाद में था. चूंकि उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को अपना पता बता दिया था, इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. वहां पहले ही तमाम लोग एकत्र हो गए थे. हत्या मकान के फर्स्ट फ्लोर पर हुई थी. पुलिस ऊपर पहुंची तो वहां एक कमरे में 40 साल की एक महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस का हत्यारा सुनील शर्मा वहीं खड़ा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. लाश के पास ही 17 साल की एक लड़की और 12 साल का लड़का खड़ा रो रहा था. ये दोनों मृतका और सुनील के बच्चे थे.

पूछताछ में उन्होंने बताया कि मम्मी 3 साल जेल में रह कर आई थीं. जब से वह जेल से लौटी थीं, तभी से पापा उन के साथ कलह करते थे. दोनों की छोटीछोटी बातों पर लड़ाई होती थी. आज मम्मी को अकेला पा कर उन्होंने उन की हत्या कर दी. इस बीच खबर पा कर एसपी (सिटी) अंशुल गुप्ता और सीओ (द्वितीय) सोमदत्त भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. लोहे की जिस रौड से सुनील ने आशा के सिर पर वार किए थे, वह वहीं पड़ी थी. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था.

पुलिस ने प्राथमिक काररवाई के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए सुनील शर्मा को थाने भेज दिया गया. उसी दिन मृतका की 17 वर्षीया बेटी प्रियंका की ओर से पिता के खिलाफ मां की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया. अगले दिन सुनील को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पोस्टमार्टम के बाद आशा की लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. इस मामले की जांच की जिम्मेदारी खुद थानाप्रभारी संजय पांडेय ने ली.

आशा और सुनील शर्मा की शादी सन 1998 में हुई थी. आशा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही शोख और चंचल भी. सुनील जितना कमाता था, उस से गुजरबसर तो हो जाता था, लेकिन आशा के फैशन और शौक शृंगार के लिए पैसे नहीं बचते थे. कालांतर में जब घर में एक बेटी और बेटा आ गए तो घर का खर्चा बढ़ गया. पति को समझानेबुझाने के बाद आशा ने खुद घर से बाहर निकलने का फैसला किया, ताकि परिवार के बढ़े खर्चों को साधने के लिए कोई काम ढूंढ़ सके.

नौकरी के लिए इधरउधर धक्के खाने के बजाय आशा ने एलआईसी एजेंट बनने का फैसला किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो वह अपनी खूबसूरती के बूते पर लोगों को प्रभावित कर के उन्हें एलआईसी की पालिसियां बेच सकती थी, दूसरे चूंकि यह फुलटाइम जौब नहीं था, इसलिए अपने बच्चों के लिए भी समय निकाल सकती थी. अपनी इसी सोच के चलते वह एलआईसी एजेंट बन गई. बहरहाल अपने रूपयौवन और अदाओं के बूते पर उस ने काफी लोगों को एलआईसी की पालिसियां बेचीं, जिस की वजह से उसे अच्छा कमीशन मिलने लगा.

जून, 2007 में आशा की मुलाकात अलीगढ़ के थाना गांधी पार्क के मोहल्ला गांधीनगर निवासी एक्सपोर्टर महेशचंद से हुई. उन से वह एलआईसी की पालिसी के चक्कर में मिली थी. आशा खूबसूरत भी थी और जवान भी. ऊपर से उस की कातिल अदाएं. महेशचंद पहली ही मुलाकात में उस के दीवाने हो गए.

मर्दों की नजरों को बखूबी पहचानने वाली आशा ने जल्दी ही उन्हें शीशे में उतार लिया. महेशचंद उस के प्रति थोड़े उदार दिखाई दिए तो आशा ने उन्हें मोटी रकम की पालिसी कराने के लिए राजी कर लिया. इस के लिए महेशचंद ने उसे अगले दिन नौरंगाबाद स्थित अपनी फैक्ट्री में बुलाया. उन्होंने आशा से कहा, ‘‘फार्म भर लाना, मैं साइन कर के चैक दे दूंगा. और हां, लंच हमारे साथ ही करना.’’

जातेजाते आशा ने अनौपचारिक होते हुए अपनी तरफ से पहल की, ‘‘सिर्फ लंच, हम ने तो सोचा था कि आप डिनर भी कराएंगे.’’

‘‘माफ करें आशाजी, यह हमारी गलती है.’’ महेशचंद हंसते हुए बोले, ‘‘भला ऐसा कौन होगा जो आप के साथ डिनर नहीं करना चाहेगा. हम तो चाहते हैं, आप हमारे साथ हर रोज डिनर करें.’’

आशा हंसते हुए जाने लगी तो महेशचंद ने पूछा, ‘‘तो डिनर का न्यौता मंजूर है?’’

‘‘बिलकुल मंजूर है.’’ आशा बोली, ‘‘आप बुलाएं और हम न आएं, ऐसे तो हालात नहीं हैं.’’

आशा चली गई. महेशचंद सोच रहे थे कि उन्होंने चिडि़या को फंसाने के लिए जो दाना डाला, वह उस ने चुग लिया है. उधर आशा सोच रही थी कि यहां तो मुर्गा खुद ही अपनी गर्दन पर छुरी चलवाने के लिए तैयार हो गया है.

लंच भी हुआ, डिनर भी और पालिसी भी हो गई. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. महेशचंद ने उसे घर बुला कर अपनी पत्नी और बच्चों से न केवल मिलवाया, बल्कि उन की भी पालिसियां करवा दीं. इस के बाद आशा शर्मा का उन के परिवार में आनाजाना हो गया. महेशचंद के बच्चे उसे आंटी कहते थे. आशा भी उन्हें खूब लाड़ लड़ाती थी. धीरेधीरे वह उन के परिवार की सदस्य जैसी बन गई. इस बीच महेशचंद और आशा के अवैध संबंध बन गए थे.

हार्डवेयर कारोबारी महेशचंद का एक्सपोर्ट का भी काम था. उन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह आशा को ले कर होटलों में जाने लगे. वहां एंट्री रजिस्टर में वह आशा को पत्नी लिखते थे. इतना ही नहीं, उन्होंने आशा के लिए थाना क्वारसी के नंगला तिकोना की संगम विहार कालोनी में एक शानदार मकान भी खरीद दिया था. इस मकान में सारी सुखसुविधाएं मौजूद थीं. इस के बाद महेशचंद का ज्यादातर समय पत्नी और परिवार की जगह आशा के साथ गुजरने लगा. महेशचंद की सीधीसादी पत्नी को अपने पति और आशा के संबंधों पर तब शक हुआ, जब आशा महेशचंद के बेटे गौरव की शादी में अपनी मनमरजी चलाने लगी और महेशचंद उस की हां में हां मिलाते रहे.

कोठी की रंगाईपुताई किस रंग की हो, कपड़ेजेवर कैसे खरीदे जाएं, रिसैप्शन के मेन्यू में क्याक्या खास चीजें जरूरी हैं, सब जगह आशा की चल रही थी. हद तो तब हो गई, जब शादी वाले दिन रस्मोरिवाज में मां की जगह आशा ने पूरे रौब के साथ दखलअंदाजी की. मुन्नी देवी का शक तब विश्वास में बदल गया, जब शादी में आए फोटोग्राफर एवं वीडियोग्राफर मदन ने मुन्नी देवी के सामने एक अलग ही हकीकत बयान की. उस ने बताया कि महेशचंद ने आशा को संगम विहार में एक मकान खरीद कर दे रखा है, जहां दोनों अकसर साथसाथ रहते हैं.

मुन्नी के अनुरोध पर मदन ने वह मकान दिखा भी दिया. मुन्नी ने पासपड़ोस के लोगों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वहां एक पतिपत्नी रहते हैं, पति कहीं बिजनैस करता है, जबकि पत्नी बनीठनी घूमती है. मुन्नी ने उन लोगों को महेशचंद और आशा के फोटो दिखाए तो उन्होंने इस बात की तसदीक कर दी कि उस मकान में वह दोनों रहते हैं.

फोटोग्राफर मदन भी रसिया स्वभाव का था. पहले आशा शर्मा उस के पास आती रहती थी, लेकिन जब से वह महेशचंद के संपर्क में आई थी, तब से उस ने मदन को भाव देना बंद कर दिया था. मदन ने उस पर धौंस जमाने की कोशिश की तो आशा ने उसे सीधेसीधे धमकी दे दी. इसी बात को ले कर महेश उस से खार खाता था. यही कारण था, जिस की वजह से उस ने मुन्नी के सामने महेशचंद और आशा शर्मा की हकीकत का भंडाफोड़ किया था.

बाद में मदन ने ही मुन्नी देवी को आशा शर्मा को अपने रास्ते से हटाने का सुझाव दिया था. इस के लिए उस ने एक लाख का खर्चा बताया. मुन्नी तैयार हो गई तो उस ने 20 हजार रुपए एडवांस भी ले लिए. मुन्नी को यह पता नहीं था कि आशा ने उस के घर में भी अपने जासूस लगा रखे हैं. जब मुन्नी और मदन के बीच आशा की हत्या की सौदेबाजी हो रही थी, तभी पड़ोस में ही रहने वाली मुन्नी की देवरानी मधु ने दोनों की बातें सुन ली थीं. उसी ने फोन कर के यह बात आशा शर्मा को बता दी थी. आशा और मधु के संबंध गौरव की शादी में गहराए थे. बाद में वह महेशचंद के घर का हर राज आशा शर्मा को बताने लगी थी.

आशा शर्मा को मुन्नी देवी और मदन के षडयंत्र का पता चला तो उस ने फोन कर के मदन को अपने शास्त्रीनगर वाले घर पर बुलाया. मदन को आशा शर्मा की धमकी याद थी. वैसे भी वह खतरनाक औरत थी. ऊपर से उस के पीछे की शह थी. मदन की उस के पास जाने की हिम्मत न हुई तो वह अपने दोस्त बौबी को साथ ले कर उस के पास पहुंचा. वे दोनों आशा के पास पहुंचे तो आशा ने अपने रूपयौवन के बूते पर पल भर में पूरी बाजी पलट दी.

16 अप्रैल, 2009 को एक्सपोर्टर महेशचंद शर्मा की गांधीनगर स्थित कोठी में मुन्नी देवी और उन की 3 बेटियों की हत्या कर दी गई. तीनों अविवाहित बेटियों में पूनम 22 साल की थी, ममता 20 साल की और कीर्ति 17 साल की. जब ये हत्याएं हुईं, तब महेशचंद और उन का बेटा गौरव इंगलैंड गए हुए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पूनम और कीर्ति के साथ बलात्कार की भी पुष्टि हुई, जांच में हत्याओं का कारण लूटपाट बताया गया.

थाना गांधीनगर में यह मामला भादंवि की धारा 394, 302, 120बी और 376 के तहत दर्ज हुआ. इस संबंध में पुलिस ने महेशचंद को संदेह के दायरे में रखते हुए इस केस की मास्टरमाइंड आशा शर्मा के अलावा मदन, बौबी, मुन्नी देवी की देवरानी मधु, मनोज और अजीत को गिरफ्तार किया. लेकिन बाद में पुलिस ने महेशचंद को क्लीन चिट दे दी. इस मामले में 3 सालों तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी. बताया जाता है कि क्लीनचिट मिलने के बाद महेशचंद प्रेयसी आशा को छुड़ाने की कोशिश में लग गए.

इस मामले का फैसला आया 21 सितंबर, 2012 को. चूंकि एक ही परिवार के 4 लोगों की नृशंस हत्या हुई थी, इसलिए लोगों को उम्मीद थी कि इस मामले में कम से कम आशा शर्मा को सजाएमौत जरूर मिलेगी. चूंकि यह चर्चित मामला था, इसलिए उस दिन अलीगढ़ कोर्ट में तमाम लोग मौजूद थे. मीडियाकर्मी भी आए हुए थे. एडीजे (तृतीय) इंद्रप्रीत सिंह जोश ने अपने फैसले में मदन, मधु, बौबी, मनोज और अजीत को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. जबकि सबूतों के अभाव में आशा शर्मा को बरी कर दिया गया. न्यायाधीश महोदय ने जांच अधिकारी नवाब सिंह की जांच पर भी सवाल उठाए.

बहरहाल, आशा शर्मा का न्याय खुद ब खुद हो गया. 7 सालों बाद उसी 16 अप्रैल को उस के ही पति ने उस की हत्या कर दी. थाना गांधी पार्क में उस की बेटी प्रियंका ने अपने पिता सुनील कुमार शर्मा पर मां की हत्या का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया. सुनील ने चूंकि खुद ही पुलिस को सूचना दी थी, सो गिरफ्तारी के बाद उस ने अपना जुर्म कबूलने में भी देरी नहीं लगाई. पुलिस ने उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. आश्चर्य की बात यह थी कि जिस तरह मुन्नी देवी और उस की बेटियों की हत्याएं की गईं थीं, वैसे ही आशा शर्मा की हत्या भी हुई. वैसी ही जघन्यता के साथ.

लेखक -कुंवर शैलेश बिट्टन            

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspicious Death Case: दिल्ली मेट्रो के लेडीज वाशरूम में मिला शव, मची सनसनी

Suspicious Death Case: एक हैरान कर देने वाली घटना ने दिल्ली में सनसनी फैला दी है. मेट्रो स्टेशन के एक लेडीज वाशरूम से एक संदिग्ध हालात में शव मिलने की खबर ने हर किसी को चौंका दिया. सूचना मिलते ही लोगों में डर और जिज्ञासा दोनों फैल गए. आखिर यह व्यक्ति कौन था और वह वहां कैसे पहुंचा, यह सवाल सभी के मन में उठने लगे. आइए जानते हैं इस पूरे मामले की पूरी कहानी विस्तार से.

मामला दिल्ली के इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन का है, जहां शनिवार की शाम अचानक हलचल बढ़ गई. स्टेशन के भीतर स्थित लेडीज वाशरूम से एक व्यक्ति का शव बरामद होने की जानकारी सामने आई.
इस घटना के बाद पूरे मेट्रो परिसर में अफरातफरी का माहौल बन गया. मौके पर पहुंची मेट्रो पुलिस ने स्थिति को संभालते हुए जांच प्रक्रिया शुरू कर दी.

पुलिस के अनुसार, 25 अप्रैल, 2026 की शाम लगभग साढ़े 5 बजे मेट्रो थाना नेताजी सुभाष प्लेस (एनएसपी) को एक कौल प्राप्त हुई. कौल करने वाले ने बताया कि इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के वाशरूम का दरवाजा काफी समय से अंदर से बंद है और वहां से तेज बदबू आ रही है. सूचना मिलते ही पुलिस की टीम बिना देर किए मौके पर पहुंच गई और स्थिति का जायजा लिया. जब पुलिस ने जांच की तो पाया कि वाशरूम अंदर से बंद था. काफी प्रयासों के बावजूद दरवाजा नहीं खुला, जिस के बाद उसे तोड़ना पड़ा.

दरवाजा खुलते ही अंदर का दृश्य देखकर सभी सन्न रह गए. करीब 40 साल के एक व्यक्ति का शव फंदे से लटका हुआ पाया गया, जो बेहद चौंकाने वाला था.
शुरुआती जांच में यह बात सामने आई कि मृतक शायद उसी टायलेट कौंप्लेक्स में काम करने वाला केयरटेकर था.

एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि उस ने उसे आखिरी बार करीब 2 दिन पहले देखा था. इस के बाद से वह नजर नहीं आया था, जिस से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि शव 2 दिन पुराना हो सकता है. मामले की गंभीरता को देखते हुए क्राइम टीम को भी जांच के लिए बुलाया गया.
फिलहाल पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर दिल्ली के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर हौस्पिटल की मोर्चरी में 72 घंटे के लिए सुरक्षित रखवा दिया है.

मेट्रो प्रशासन की मदद से मृतक की पहचान की कोशिश जारी है. पुलिस ने भारतीय नागरिक संहिता (BNS) की धारा 194 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि यह आत्महत्या का मामला है या इस के पीछे कोई और रहस्य छिपा हुआ है. Suspicious Death Case

Delhi Crime News: 2 लाख के विवाद में खूनी खेल – टेंट कारोबारी के हाथ काट डाले

Delhi Crime News: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है. मामूली पैसों के विवाद इतनी खतरनाक हो गया कि एक मेहनतकश कारोबारी की जिंदगी खतरे में पड़ गई. सवाल यही है कि क्या यह हमला सिर्फ बकाया रकम का नतीजा था या इस के पीछे कोई और गहरी रंजिश छिपी हुई है? यह कहानी न सिर्फ डराती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि छोटे विवाद कब खतरनाक मोड़ ले सकते हैं.

यह घटना दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के द्वारका क्षेत्र के डाबड़ी स्थित विजय एन्क्लेव की है, जहां 32 वर्षीय टेंट और हलवाई का काम करने वाले लोकेश गुप्ता पर जानलेवा हमला किया गया. आरोप है कि पैसे मांगने पहुंचे लोकेश पर इतनी बेरहमी दिखाई गई कि उन के हाथ तक काट दिए गए. गंभीर हालत में उन्हें पहले पास के अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए एम्स में भरती कराया गया, जहां उन की हालत नाजुक बनी हुई है.

पुलिस के मुताबिक, 24 अप्रैल, 2026 की रात करीब साढ़े 8 बजे पीसीआर कौल के जरिए घटना की जानकारी मिली. मौके पर पहुंची टीम ने लोकेश को लहूलुहान हालत में पाया. शुरुआती जांच में सामने आया कि अजय पाल नाम के व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी के लिए लोकेश से टेंट का काम कराया था, जिस की कुल रकम करीब ढाई लाख रुपए तय हुई थी. आरोप है कि इस में से करीब 2 लाख रुपए अब भी बाकी थे, जिन्हें लेने के लिए लोकेश आरोपी के घर पहुंचे था.

बताया जा रहा है कि पैसों को ले कर दोनों पक्षों में बहस शुरू हुई, जो देखते ही देखते हिंसक झगड़े में बदल गई. इसी दौरान अजय पाल और उस के साथियों ने मिलकर लोकेश पर हमला कर दिया और धारदार मशीन (ग्राइंडर) से उस के हाथ काट दिए.

पुलिस ने मौके से सबूत जुटाकर मामला दर्ज कर लिया है और आरोपियों की तलाश जारी है. इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है और आगे की जांच जारी है. Delhi Crime News

Love Story: जब दंपति में बढ़ जाए ‘वो’ का शक

Love Story: 20 वर्षीय पूजा और 22 साल का सरफराज भले ही अलगअलग धर्मों के थे, लेकिन दोनों ही एकदूसरे को दिली मोहब्बत करते थे. तभी तो दोनों ने अपनी फेमिली वालों को बताए बिना लव मैरिज कर ली थी. हंसीखुशी से जिंदगी बिता रहे इस दंपति के बीच ‘वो’ के शक ने ऐसी एंट्री की कि…

सरफराज अपनी 20 वर्षीय बीवी पूजा की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं था. उस का शक धीरेधीरे उस के दिमाग पर हावी हो चुका था. इस की वजह नरेश था. नरेश भी उसी चाल में रहता था. वह पूजा का पुराना परिचित था. काम के ही सिलसिले में दोनों में जानपहचान हुई थी. 22 वर्षीय सरफराज को  शक था कि पूजा और नरेश के बीच जरूर कोई चक्कर चल रहा है. इसलिए पतिपत्नी के रिश्ते में ऐसी कड़वाहट घुल चुकी थी, जो बढ़ती ही जा रही थी.

नरेश भी कैटरिंग का काम करता था. कभीकभार कैटरिंग के काम में नरेश पूजा की मदद लेता था. इसलिए दोनों में अच्छी पटती थी. दोनों अकसर आमनेसामने तो बात करते ही थे, फोन पर भी बातें करते थे. पूजा नरेश को भाई मानती थी, इसलिए उस से हंसहंस कर बिना किसी संकोच के बातें करती थी. पूजा और नरेश के बीच कुछ भी गलत नहीं था, लेकिन सरफराज के लिए यह नाम खतरा बन गया था.

उसे लगता कि पूजा और नरेश के बीच कुछ चल रहा है, क्योंकि नरेश अकेला ही रहता था. अकेले आदमी पर हर कोई शक करता है. सरफराज नरेश पर भी शक करता था, इसलिए अब हर झगड़े में नरेश का नाम आने लगा. 17 मार्च, 2026 मंगलवार को सुबह से ही पूजा के घर का माहौल ठीक नहीं था. फोन पर होने वाली बातचीत को ले कर पूजा और सरफराज के बीच झगड़ा शुरू हुआ. धीरेधीरे आवाजें ऊंची होने लगीं. गुस्सा बढ़ता गया. उसी गुस्से में आखिरकार पूजा घर छोड़ कर चली गई. वह सीधे नरेश के कमरे पर चली गई. शायद शांति की तलाश में या खुद को बचाने के लिए, क्योंकि सरफराज बहुत गुस्से में था. लगता था कि वह कुछ भी कर बैठेगा.

लेकिन पूजा का घर छोड़ कर जाने का ही फैसला उस की जिंदगी का आखिरी फैसला बन गया. एक तो पूजा का घर छोड़ कर जाना, दूसरे नरेश के यहां जाना, उस के लिए खतरा बन गया. पूजा के ऐसा करने से सरफराज का गुस्सा अब बेकाबू हो गया था. उसे जब पता चला कि पूजा नरेश के घर गई है तो उस का शक यकीन में बदल गया. उस ने बिना सोचेसमझे चाकू उठाया और नरेश के घर की ओर चल पड़ा. उस समय उस के दिमाग में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि उस के साथ धोखा हो रहा है. वह पूजा की तलाश में नरेश के घर पहुंच गया.

दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा खुला. घर के अंदर पूजा और नरेश थे. सरफराज ने जैसे ही दोनों को साथ देखा, उस का गुस्सा फट पड़ा. दोनों के बीच तेज बहस शुरू हो गई, तीखी और खतरनाक. सरफराज कुछ और ही सोच कर आया था. इसलिए पूजा के लाख समझाने की कोशिश करने पर भी सरफराज कुछ समझने को तैयार नही था. नरेश बीचबचाव कर रहा था, लेकिन सरफराज अब कुछ सुनने की स्थिति में नहीं था. गुस्से में अंधे हो चुके सरफराज ने चाकू निकाला और पूजा पर हमला बोल दिया. एक बार फिर दूसरा फिर तीसरा कमरे में पूजा की चीखें गूंजने लगीं. खून बहने लगा.

शोर सुन कर नरेश के घर लोग इकट्ठा होने लगे. लोगों को देख कर सरफराज घबराया. वार करने बंद कर दिए, लेकिन लोगों के आने तक वह इतने वार कर चुका था कि पूजा फर्श पर गिर चुकी थी. लोगों ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी. झटपट पूजा को उठाया और अस्पताल पहुंचाया. डौक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन सरफराज ने पूजा के सीने पर इतने घातक वार किए थे कि काफी कोशिश के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका. कुछ ही देर में डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस तरह एक जिंदगी खत्म हो चुकी थी, इसी के साथ प्यार और भरोसा भी. यह 18 मार्च, 2026 की सुबह की बात है.

पूजा कुमारी ने सरफराज से शादी की थी, लेकिन नरेश नाम के ‘वो’ ने उन की जिंदगी में जहर घोल दिया.

थाना रांदेर पुलिस को सूचना दी जा चुकी थी. सूचना पा कर थाना रांदेर पुलिस तुरंत मौके पर आ पहुंची. सरफराज वहीं खड़ा था हक्काबक्का, शांत, जैसे उसे खुद ही समझ में नहीं आ रहा था कि उस ने गुस्से में यह क्या कर दिया. पुलिस ने सरफराज को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में वह अपराध से इनकार कैसे कर सकता था. उस ने जो भी किया था, लोगों के सामने किया था. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ के बाद पूजा की हत्या के पीछे की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

सूरत के हीरे की चमक और साडिय़ों की रंगीनियत दुनिया भर में मशहूर है. सूरत मेहनतकश लोगों के सपनों का शहर है. दिनभर भागते लोग, रात में जागती गलियां, क्योंकि औद्योगिक नगर होने की वजह से रातदिन कारखाने चलते रहते हैं. लेकिन ऐसे ही व्यस्त शहर की वह सुबह ऐसी थी, जिस ने हर चेहरे पर खामोशी की चादर डाल दी थी. जिस ने भी उस घटना के बारे में सुना, भागता हुआ घटनास्थल पर जा पहुंचा.

सूरत के थाना रांदेर इलाके में वह सुबह बाकी दिनों से पूरी तरह अलग थी. सवेरा होते ही लोगों की भीड़ एक छोटे से घर के बाहर जमा हो चुकी थी. कुछ लोग फुसफुसा रहे थे, तो लोग कुछ सहमे हुए खड़े थे तो कुछ लोग बस स्तब्ध खड़े थे. खोली के अंदर जमीन पर एक औरत खून से लथपथ पड़ी थी. जिस का नाम पूजा कुमारी था. वह खून से सराबोर थी, लेकिन सांसें चल रही थीं.

पति सरफराज खान ने ही उस पर चाकू से हमला किया था. उस ने पूरी ताकत से पूजा के सीने पर कई वार किए थे. वह भी चाकू लिए वहीं उस के पास खड़ा था. उस की आंखों में अभी भी गुस्सा और पछतावा साफ झलक रहा था. उस ने पूजा को जान से मारने की कोशिश की थी. लेकिन पूजा के शोर मचाने से आसपड़ोस के लोग आ गए थे और उसे पकड़ लिया था. सही बात तो यह थी कि यह सिर्फ एक हत्या की कोशिश नहीं थी, बल्कि यह एक रिश्ते के अंत की कोशिश थी. यह शक, गुस्सा और टूटते भरोसे की कहानी थी.

पूजा बिहार के एक छोटे से गांव की रहने वाली थी. उस का परिवार भले साधारण था, लेकिन वह सपने बड़े देखने वाली थी. इस की वजह यह थी कि वह मेहनती थी. वह अपने सपने पूरे करने के लिए कोई भी काम करने को तैयार रहती थी. वह आत्मनिर्भर बनना चाहती थी. यही सपना उसे सूरत ले आया था. वह अपने एक परिचित के साथ सूरत आ गई थी, क्योंकि उस ने देख लिया था कि गांव में रह कर उस के सपने कभी पूरे नहीं हो सकते.

सूरत आ कर उस ने कैटरिंग का काम शुरू किया. शादीब्याह, छोटेमोटे कार्यक्रम, जन्मदिन, मैरिज एनीवर्सरी आदि मौकों पर लोगों के यहां खाना बनाने जाने लगी. वह हर जगह और हर अवसर पर काम करने जाती थी. फिर वह खाना भी अच्छा और साफसुथरा बनाती थी. इसलिए उस के पास काम की कमी नहीं होती थी. दिन भर की भागदौड़ और काम की थकान होने के बावजूद वह हमेशा मुसकराती रहती थी और अपनी मेहनत से ग्राहक को खुश रखती थी.

पूजा जगहजगह काम करने जाती रहती थी. ऐसे में ही उस की मुलाकात सरफराज खान से हुई. सरफराज भी बिहार का ही रहने वाला था. वह भी अपने सपने पूरे करने सूरत आया था. सूरत में वह भी मजदूरी करता था. कभी किसी फैक्ट्री में काम करता तो कभी किसी निर्माण स्थल पर. कोई परमानेंट नौकरी नहीं थी. घाटघाट का पानी पीने से जिंदगी ने उसे सख्त बना दिया था, लेकिन दिल से वह भी एक कोमल और अकेला था.

पुलिस हिरासत में हत्यारोपी सरफराज

अपने गांवदेश से दूर रहते हुए जब कोई अपने क्षेत्र का मिलता है तो वह अपना सा ही लगता है. बिहार से हजारों किलोमीटर दूर जब अपनी ही भाषा बोलने वाला सरफराज मिला तो पूजा ने पूछा, ”कहां के रहने वाले हो?’’

”बिहार का.’’ सरफराज ने कहा.

”बिहार में कहां से यानी आप का जिला कौन सा है?’’ पूजा ने सवाल किया.

सरफराज ने जब अपना जिला और गांव बताया तो पूजा भी उसी जिले की ही नहीं, उसी के बगल के गांव की रहने वाली थी. इस तरह दोनों में जानपहचान हो गई. दोनों रहते भी एक ही चाल में थे, जिस से दोनों की अकसर मुलाकात होने लगी. दोनों की जानपहचान हो ही गई थी. लगातार मिलने और आसपास के गांव के होने की वजह से दोस्ती भी हो गई. दोस्ती होने के बाद दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना शुरू हो गया. यही नहीं, कभीकभार साथसाथ खाना भी हो जाता. जिस की वजह से धीरेधीरे उन की यह दोस्ती प्यार में बदल गई. क्योंकि दोनों ही अकेले थे.

पूजा और सरफराज को जब प्यार हुआ तो घरपरिवार की परवाह किए बिना दोनों ने शादी कर ली. उन के लिए यह एक नई शुरुआत थी. जब कि दोनों अलगअलग धर्मों से थे, लेकिन इस की परवाह न पूजा ने की और न सरफराज ने. शुरुआत में सब कुछ अच्छा चल रहा था. एक छोटा सा कमरा, सीमित कमाई, लेकिन साथ था और प्यार भी. यही उन के लिए सब से बड़ी खुशी थी. दोनों खुश थे. पूजा सुबह काम पर निकलती. उस के जाने के बाद सरफराज भी अपने काम पर चला जाता. शाम को दोनों लौटते और जो भी रूखासूखा बनता, साथ बैठ कर खाते तो उन्हें लगता कि दुनिया में इस से बड़ा सुख दूसरा नहीं है. खाते हुए हंसते, बातें करते और दिन भर की कहानियां यानी आपबीती सुनाते हुए अपनी थकान उतारते.

लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई. धीरेधीरे सरफराज का स्वभाव बदलने लगा. पूजा खूबसूरत थी और चुलबुली भी. वह हर किसी से मिलजुल कर रहने वाली थी और हंस कर बातें करने वाली भी. हर किसी के सुखदुख में खड़ी रहती थी. यही वजह थी कि सरफराज पूजा पर शक करने लगा. छोटीछोटी बातों पर सवाल उठाने लगा कि आज देर क्यों हुई? किस से बातें कर रही थी? फोन किस का था?

शुरुआत में पूजा ने इन बातों को नजरअंदाज किया. उसे लगा कि यह प्यार है. चाहने वाले को अपने प्यार की थोड़ी चिंता होती ही है, लेकिन धीरेधीरे यह चिंता बढ़ती ही गई और पूजा पर प्रतिबंध लगाए जाने लगे कि जल्दी समय पर घर आओ. फलां से बात मत करो. वह आदमी ठीक नहीं है. उस के घर मत जाओ. इस के बाद न वह सवाल रहे और न प्रतिबंध. पूजा पर आरोप लगाए जाने लगे थे. वह तुम्हारा कौन है? उस से बातें क्यों करती हो? उस से बात मत करो. आरोपों और प्रतिबंध की वजह से उन के घर में हंसी की जगह बहस ने ले ली थी. सरफराज रोकताटोकता तो पूजा सवाल करने लगती कि ऐसा क्यों? वह सरफराज के हर सवाल का, हर प्रतिबंध का जवाब चाहती.

नरेश के घर के बाहर जमा भीड़

सरफराज जो जवाब देता, उसी पर बहस हो जाती, क्योंकि पूजा वैसी थी नहीं. इसलिए रोजाना दोनों के बीच किसी न किसी बात को ले कर विवाद होने लगा. कभी काम को ले कर, तो कभी पैसों को ले कर और मुख्य विवाद तो शक को ले कर था. पूजा सरफराज को बारबार समझाने की कोशिश करती कि वह जैसा कहता और सोचता है, वैसा कुछ भी नहीं है. वह बेवजह उस पर शक करता है और उल्टासीधा सोचता है. फिर एक दिन उस ने चाकू से वार कर पूजा की हत्या कर दी.

पुलिस ने वह चाकू बरामद कर लिया, जिस से पूजा की हत्या हुई थी. यह सिर्फ एक तरह का अपराध नहीं था, बल्कि यह उस मानसिकता की कहानी थी, जहां भरोसे की जगह शक ले लेता है. जहां प्यार की जगह अधिकार और नियंत्रण आ जाता है. जहां संवाद खत्म हो जाता है और हिंसा शुरू हो जाती है. पूजा अब इस दुनिया में नहीं रही. उस के सपने, उस की मेहनत, उस की जिंदगी सब खत्म हो चुकी है. अब वह सिर्फ एक समाचार या कहानी बन कर रह गई है, लेकिन उस के पीछे रह गईं कई अनकही बातें कि क्या वह सच में दोषी थी या फिर वह सिर्फ गलतफहमी का शिकार हो गई?

डीसीपी एस. एस. झाला

पूछताछ के बाद पुलिस ने सरफराज को अदालत में पेश कर दिया था, जहां से उसे जेल भेज दिया गया था. अब वह जेल में है. उस का गुस्सा ठंडा हो चुका है. अब उस के पास सिर्फ पछतावा बचा है. जिसे वह अपना समझता था, उसी को उस ने खो दिया, अपने ही हाथों. सवाल यह है कि क्या शक का इलाज सिर्फ हिंसा है? क्या रिश्तों में संवाद खत्म हो गया है? क्या हम अपने गुस्से पर काबू नहीं पा सकते? लगता है, जहां प्यार है, भरोसा नहीं. साथ तो है, लेकिन समझ नहीं. क्योंकि जब भरोसा टूटता है तो सिर्फ रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि जिंदगी टूट जाती है. Love Story

 

One Sided Love: एकतरफा प्यार का दुखत अंत

One Sided Love: प्यार ऐसी चीज नहीं है, जिसे जबरदस्ती हासिल किया जा सके यह तो दिल से पैदा होता है. लेकिन पीयूष अपनी साथी टीचर नीलम का प्यार जबरदस्ती पाना चाहता था. इसी जिद में वह एक खौफनाक गुनाह कर बैठा.

एक युवक सड़क पर भागा जा रहा था, जिस की उम्र 24-25 साल थी. उस के हाथ में चाकू था, जो खून से सना था. उस के हाथ भी खून से सने थे.

भागते हुए वह चीख रहा था, ‘‘मैं ने उसे मार दिया.’’

उस युवक को उस तरह भागते देख कर लोग हैरान जरूर थे, पर माजरा किसी की समझ में नहीं आ रहा था. लोग एकदूसरे से पूछने लगे, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था. बदहवासी की हालत में भागते उस युवक ने एक प्राइवेट स्कूल में घुसने की कोशिश की, लेकिन स्कूल के स्टाफ और अन्य लोगों ने उसे अंदर नहीं घुसने दिया. चीखताचिल्लाता वह युवक कुछ देर बाजार में भागता रहा. इस के बाद अपने घर के पास जा कर उस ने हाथ में पकड़ा चाकू एक तरफ सड़क पर फेंक दिया और घर में घुस गया.

यह घटना 28 अप्रैल, 2016 की है. सुबह के यही कोई सवा 8 बजे का वक्त था. राजस्थान में झीलों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध उदयपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है ऋषभदेव. यह कस्बा धार्मिक नगरी के नाम से भी जाना जाता है. इस कस्बे में ऋषभदेव का दर्शनीय मंदिर है. जहां रोजाना सैकड़ों की संख्या में देशविदेश के पर्यटक दर्शन के लिए आते हैं. इस के अलावा ग्रीन मार्बल की खानों के लिए भी ऋषभदेव प्रसिद्ध है. घटना इसी ऋषभदेव कस्बे की है.

इसी कस्बे के लोहरवाड़ा मोहल्ले में रहने वाले रमनलाल पांचाल की बेटी नीलम रोज की तरह उस दिन भी सुबह करीब साढ़े 5-6 बजे उठ गई थी. उस के जागने के साथ उस का बेटा रिद्धिश भी जाग गया. 3 साल का रिद्धिश उठते ही मां से लिपट कर बोला, ‘‘मम्मा, आज मुझे घुमाने ले चलोगी ना?’’

नीलम ने उस का माथा चूम कर दुलारते हुए कहा, ‘‘आज शाम को हम अपने राजा बेटा को जरूर घुमाने ले चलेंगे, नानी भी साथ चलेंगी, वहां आइसक्रीम भी खाएंगे.’’

रिद्धिश बोला, ‘‘मम्मी, मैं बैलून भी लूंगा.’’

‘‘हां, राजा बेटा को बैलून भी दिलाऊंगी.’’ नीलम ने उसे प्यार करते हुए कहा.

उसी बीच नीलम की मां ने आ कर कहा, ‘‘रिचु बेटे, सुबहसुबह मम्मी को परेशान मत करो. मम्मी को फ्रेश होना है, फिर नहानाधोना भी है. इस के बाद स्कूल जाना है. तुम इस तरह करते रहोगे तो मम्मी स्कूल के लिए लेट हो जाएगी. मम्मी लेट हो गईं तो उस के सर उसे डाटेंगे.’’

यह कहते हुए नीलम की मां ने नवासे रिचु को गोद में उठा लिया और उसे घर के बाहर ले आईं. सुबहसुबह ठंडी सुहानी हवा चल रही थी. रिचु नानी की गोद में खेलने लगा. रिद्धिश को घर में प्यार से सब रिचु कहते थे. रिचु खेलने लगा तो नीलम फ्रेश होने चली गई. इस के बाद उस ने ब्रश किया और तौलिया और अन्य कपड़े ले कर नहाने के लिए बाथरूम में जाने लगी तो रिचु वहां आ गया. वह मचलते हुए बोला, ‘‘मम्मी, मैं भी आप के साथ नहाऊंगा’’

नीलम उसे कैसे मना करती. रोजाना तो नहीं, लेकिन जब भी मौका मिलता था वह मम्मा के साथ ही नहाता था. जब मम्मा के साथ नहीं नहा पाता था तो नानी उसे नहलाती थी.

रिचु को जिद करते देख नीलम ने उस के कपड़े निकाले और उसे भी अपने साथ बाथरूम में ले गई. नीलम ने पहले बेटे को नहलाया, उस के बाद जल्दीजल्दी खुद भी नहाया. बाथरूम से निकल कर रिचु को अपनी मां को सौंपते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप इसे तैयार कर देना. मैं तैयार करने लगी तो स्कूल पहुंचने में लेट हो जाऊंगी.’’

नीलम की मां स्थिति को जानतीसमझती थीं, इसलिए बोलीं, ‘‘बेटी, तू चिंता मत कर, मैं इसे संभाल लूंगी. तू फटाफट तैयार हो जा.’’

नीलम ने जल्दीजल्दी खुद को तैयार किया और शीशे में निहारा तो उसे लगा कि आज वह रोज से ज्यादा खूबसूरत लग रही है. खूबसूरत तो वह थी ही, सुबह की उमंग और हलके मेकअप ने उस की खूबसूरती और बढ़ा दी थी. अपनी खूबसूरती पर वह हलके से मुसकरा दी. तभी मां ने आवाज दी, ‘‘बेटी, नाश्ता तैयार है, फटाफट नाश्ता कर लो. रिचु भी दूध पीने को मचल रहा है.’’

चेहरे पर आई बालों की लटों को संवारते हुए एक बार फिर शीशे में खुद को निहारने के बाद नीलम ने दीवार घड़ी की ओर देखा. घड़ी में पौने 8 बज रहे थे. वह कमरे से बाहर आते हुए बोली, ‘‘मम्मी, आज तो वाकई देर हो रही है. मुझे जल्दी से एक परांठा दे दो. रिचु का दूध गर्म हो गया हो तो वह भी दे दो, मैं उसे दूध भी पिला देती हूं.’’

नीलम की मां परांठे की प्लेट और दूध का गिलास उसे देते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, जल्दी करो.’’

नीलम ने पहले रिचु को दूध को पिलाया, उस के बाद खुद नाश्ता किया. इस के बाद बेटे को गोद में ले कर कहा, ‘‘राजा बेटा, अब आप की मम्मा स्कूल जा रही हैं. आओ एक पप्पी दो. और हां, नानी को परेशान मत करना. अगर नानी को परेशान किया तो घुमाने नहीं ले जाऊंगी.’’

‘‘आप नानी से पूछ लो, मैं कोई शैतानी नहीं करता. शाम को घुमाने का प्रौमिस है ना?’’ रिचु ने भोलेपन से कहा.

‘‘हां बेटा, शाम को घुमाने का प्रौमिस,’’ नीलम ने कहा, ‘‘चलो राजा बेटा, अब मम्मा को एक पप्पी दो.’’

रिचु ने मम्मा को पप्पी दी तो नीलम ने उसे गोद से उतार दिया. दीवार घड़ी पर नजर डाली तो 8 बजने में कुछ मिनट शेष थे. नीलम ने पर्स कंधे पर डाला और मां तथा बेटे को बायबाय कहते हुए तेजी से घर से बाहर निकल गई. नीलम बेटे के बारे में सोचते हुए तेजी से पैदल ही क्लासिक पब्लिक स्कूल की तरफ चली जा रही थी. छुट्टी के दिन को छोड़ कर उस का रोज का लगभग यही नियम था. स्कूल ज्यादा दूर नहीं था. सुबह 8 बजने से कुछ पहले वह घर से निकलती थी और पैदल ही 10-15 मिनट में स्कूल पहुंच जाती थी.

नीलम अपने विचारों में खोई चली जा रही थी कि आज 28 तारीख है. अगले सप्ताह स्कूल से तनख्वाह मिल जाएगी तो कुछ पैसे मम्मी को दे कर बाकी बचे पैसों से वह अपने लिए एक नई डिजाइन की साड़ी और रिचु के लिए कुछ कपड़े खरीदेगी. आधे से ज्यादा रास्ता तय कर के नीलम होली चौक से आगे प्रैस गली स्थित मशानिया महादेव मंदिर के पास पहुंची थी कि घात लगा कर बैठा पीयूष भंडारी एकाएक उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. उस के हाथ में एक बड़ा सा चाकू चमक रहा था. नीलम कुछ समझ पाती, उस ने उस के गले, सीने व पीठ पर उसी चाकू से तबातोड़ कई वार कर दिए. इस के बाद उस ने उसी चाकू से अपने हाथ की नस काट ली.

नीलम पहले चिल्लाई, उस के बाद बेसुध हो कर गिर पड़ी. उस की चीख सुन कर आसपास के लोग उस की ओर बढ़े तो पीयूष भाग निकला. भागता हुआ वह शिल्पी मोहल्ले स्थित अपने घर पहुंचा और घर में घुस कर दरवाजा बंद कर लिया. नीलम सड़क पर बेहोश पड़ी थी. जहांजहां चाकू घोंपा गया था, वहां से खून बह रहा था. वहां रहने वाले सभी लोग नीलम को जानते थे, इसलिए किसी ने इस घटना की जानकारी नीलम के घर वालों को दे दी. कस्बे में रिक्शा या औटो जल्दी नहीं मिलते. कोई साधन नहीं मिला तो कुछ लोग नीलम को चार पहिए वाली ठेली पर लाद कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए. कस्बे के उस अस्पताल में इलाज की खास व्यवस्था नहीं थी, इसलिए प्राथमिक उपचार के बाद डाक्टर ने नीलम को उदयपुर रैफर कर दिया.

घर के तथा कस्बे के कुछ लोग नीलम को उदयपुर के एमबी अस्पताल ले गए, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. काफी मात्रा में खून बह जाने की वजह से नीलम की मौत हो गई. इस के बाद पुलिस ने अपनी औपचारिक काररवाई कर के नीलम की लाश का पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उस के शरीर पर चाकू के 6 घाव मिले थे. नीलम की मौत के बाद ऋषभदेव कस्बे में आक्रोश फैल गया था. बाजार बंद हो गया. कुछ लोग पाटुना चौक पर पहुंच गए तो कुछ लोग पुलिस थाने पर पहुंच कर नारे लगाने लगे. वहीं कुछ लोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंच कर अव्यवस्थाओं को ले कर आक्रोश जताते हुए अस्पताल को बंद करवाने लगे.

सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए. कस्बे में तनाव की स्थिति को देखते हुए आसपास के पुलिस थानों खैरवाड़ा, बावलवाड़ा, पहाड़ा व सराड़ा से अतिरिक्त पुलिस बुला ली गई. अधिकारियों ने लोगों को समझाबुझा कर शांत किया और आरोपी को गिरफ्तार कर के कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन दिया. उधर पोस्टमार्टम के बाद घर वाले नीलम का शव एंबुलैंस से ऋषभदेव ले आए और सीधे शिल्पी मोहल्ले में रहने वाले नीलम के हत्यारे पीयूष भंडारी के घर पहुंच गए. पीयूष के घर ताला लटक रहा था. नाराज घर वालों ने पीयूष के घर का दरवाजा तोड़ दिया और नीलम की लाश घर के अंदर रख दी.

वे पीयूष के घर को आग लगाने जा रहा रहे थे कि तभी सूचना पा कर पुलिस अधिकारी वहां पहुंच गए. आक्रोश में भरे लोग अधिकारियों से नीलम की मौत पर मुआवजा दिलाने की मांग करने लगे. पुलिस ने आरोपी को पकड़े जाने की जानकारी देते हुए उस के खिलाफ कड़ी से कड़ी काररवाई करने का आश्वासन दिया. इस के बावजूद लोगों का गुस्सा शांत नहीं हुआ. इस के बाद अधिकारियों ने कानून का हवाला दे कर लोगों को समझाना शुरू किया. वहां काफी देर तक चले हंगामे के बाद लोग शांत हो कर नीलम का शव ले जाने पर सहमत हुए. इस के बाद घर वाले नीलम का शव अपने घर ले गए और उसी दिन शाम को उस की अंत्येष्टि कर दी.

वारदात की जानकारी मिलते ही पुलिस ने आरोपी पीयूष भंडारी को उस के घर से पकड़ लिया था. वारदात कर के वह अपने घर में जा कर छिप गया था. हाथ की नसें काट लेने से उस के शरीर से भी काफी खून बह गया था. पुलिस ने पहले ऋषभदेव के अस्पताल ले जा कर उस का प्राथमिक उपचार कराया, उस के बाद उसे उदयपुर रैफर कर दिया गया.

इलाज के बाद 30 अप्रैल को पुलिस ने पीयूष भंडारी को न्यायालय में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. पुलिस ने पीयूष की निशानदेही पर वह चाकू बरामद कर लिया, जिस से उस ने नीलम का खून किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने उसे दोबारा अदालत में पेश किया, जहां अदालत के आदेश पर उसे डूंगरपुर जेल भेज दिया गया. सीआई ज्ञानेंद्र सिंह इस मामले की जांच कर रहे हैं.

एक मई की रात को नीलम की याद में कस्बे के लोगों ने ऋषभदेव मंदिर से पाटुना चौक तक कैंडल मार्च निकाला. इस में सैकड़ों  लोगों ने भाग लिया. उसी दिन नीलम के घर वाले और पांचाल समाज के लोग विधायक नानालाल अहारी के नेतृत्व में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया से मिले. उन्होंने गृहमंत्री से न्याय दिलाने की मांग की. कहानी तो हालांकि यहीं पर खत्म हो जाती है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि आखिर पीयूष ने नीलम को क्यों मार डाला?

लोहरवाड़ा मोहल्ले के रहने वाले रमनलाल पांचाल ने पहले कुछ सालों तक कुवैत में काम किया था. वहां से लौट कर उन्होंने ऋषभदेव में मनिहारी की दुकान खोल ली थी. दुकान अच्छी चलती थी. उन के 3 बच्चे थे, 2 बेटियां और एक बेटा. इन में सब से बड़ी नीलम थी. वह काफी खूबसूरत थी. उस ने उदयपुर की मोहनलाल सुखाडि़या यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रैजुएशन किया था. उस की शादी करीब 4 साल पहले राजस्थान के जिला डूंगरपुर के रठौड़ा निवासी हरीश पांचाल से हुई थी.

शादी के बाद नीलम ससुराल चली गई. ससुराल में वह खुश थी. उस का पति हरीश अहमदाबाद में बिजनैस करता था. घर में उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. नीलम गर्भवती हुई तो अचानक पतिपत्नी या ससुराल में ऐसा न जाने क्या हुआ कि उन में मनमुटाव हो गया. शादी के करीब साल भर बाद ही नीलम मायके आ गई तो लौट कर नहीं गई. पिता के घर ही उस ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रखा रिद्धिश उर्फ रिचु. घर में खुशियां छा गईं. बेटे ने उस का खालीपन दूर कर दिया. धीरेधीरे रिचु बड़ा होने लगा. रिचु के पैदा होने से नानानानी को भी एक खिलौना मिल गया था. मामा और मौसी भी रिचु को अपनी आंखों से दूर नहीं जाने देते थे.

नीलम पढ़ीलिखी थी. पिता के घर में हालांकि किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में पड़ेपड़े वह बोर होने लगी थी. उस ने नौकरी करने का मन बनाया. ऋषभदेव कस्बा ही तो है, वहां महिलाओं के लिए नौकरी के अवसर बहुत कम हैं. नीलम अपने पति से अलग मायके में रह रही थी. उसे नौकरी देने पर कई तरह की बातें हो सकती थीं. सारी स्थितियों पर विचार करने के बाद नीलम ने किसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का मन बनाया.

उसे बच्चों को पढ़ाने में रुचि भी थी. उस ने कुछ स्कूलों में बात की तो क्लासिक पब्लिक स्कूल में बात बन गई. कस्बे के प्राइवेट स्कूलों में तनख्वाह ज्यादा नहीं मिलती, लेकिन नीलम ने यह सोच कर यह नौकरी स्वीकार कर ली कि इस से उस का समय तो पास हो जाएगा. अपने खर्च के लिए एक बंधीबंधाई रकम हर महीने हाथ में आ जाएगी. समस्या बेटे रिचु की थी, जिसे नीलम की मां ने संभालने की जिम्मेदारी ले ली. स्कूलों में आमतौर पर 6 घंटे की नौकरी होती है, इसलिए उस ने सोचा कि दोपहर में तो वह घर आ ही जाया करेगी. इस बीच रिचु नानी के पास रह लेगा.

करीब एक साल पहले नीलम ने स्कूल की नौकरी जौइन कर ली थी. इसी स्कूल में कस्बे के ही शिल्पी मोहल्ले के रहने वाले प्रभाष भंडारी का बेटा पीयूष भंडारी कई सालों से पढ़ा रहा था. वह भी ग्रैजुएट था. वह करीब 25 साल का था, अभी उस की शादी नहीं हुई थी. स्कूल में आई नई टीचर नीलम को देख कर वह उस पर फिदा हो गया. वह मन ही मन उसे प्यार करने लगा. एकदो बार बातचीत में उस ने नीलम से अपने प्यार का इजहार भी किया, लेकिन नीलम ने उसे फटकार दिया. इस से वह निराश नहीं हुआ. वह किसी न किसी तरीके से नीलम का प्यार हासिल करने की कोशिश में लगा रहा.

लेकिन नीलम ने कभी उसे तवज्जो नहीं दी. जब भी उस ने कोशिश की, नीलम ने उसे झिड़क दिया. पीयूष की हरकतों से तंग आ कर नीलम उस से दूर रहने लगी. उस की हरकतों को अनदेखी करते हुए कभी उस ने अपने घर वालों से उस के बारे में नहीं बताया, लेकिन स्कूल में उस की हरकतों की चर्चा जरूर होने लगी. तब स्कूल की बदनामी के डर से स्कूल प्रबंधक ने उसे नौकरी से निकाल दिया. यह कुछ महीने पहले की बात है.

स्कूल से नौकरी छूटने के बाद पीयूष नीलम को रोजरोज देख नहीं पाता था. एकाध बार पीयूष ने स्कूल से लौटते समय नीलम से बात करने की कोशिश की, लेकिन नीलम ने उसे कोई भाव नहीं दिया. पीयूष से यह बरदाश्त नहीं हुआ. वह तड़प उठा. वह उसे सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने तय कर लिया कि अगर नीलम उस की नहीं हुई तो वह किसी और के लिए उसे जीने नहीं देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और मौके का इंतजार करने लगा.

27 अप्रैल की रात पीयूष को नींद नहीं आ रही थी. वह नीलम के बारे में ही सोचता रहा. बारबार वह उस के जेहन में आ रही थी. हर बार वह उसे इग्नोर करते हुए फटकार रही थी. नीलम की दीवानगी ने उसे पागल कर दिया था. वह उस से एकतरफा प्यार करता था. आखिर उस ने रात में ही तय कर लिया कि सुबह वह नीलम को उस की फटकार का जवाब दे देगा.

28 अप्रैल की सुबह तैयार हो कर पीयूष घर से निकल गया. उस ने चाकू अपने कपड़ों में छिपा रखा था. वह प्रैस गली स्थित मशानिया महादेव मंदिर के पास जा कर बैठ गया. उसे पता था कि नीलम रोज 8 बजे के करीब इसी रास्ते से स्कूल जाती है. नीलम को आते देख वह अपना आपा खो बैठा और पास आते ही उस पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर के उस की जान ले ली. पीयूष की इस सनक ने उस की विधवा मां का भी आसरा छीन लिया है. पीयूष के पिता प्रभाष भंडारी नल फिटिंग का काम करते थे. कुछ साल पहले उन की मौत हो गई थी. उस के बाद परिवार में पीयूष, उस का बड़ा भाई और मां ही रह गई थी. पीयूष अब जेल चला गया है.

एकतरफा प्यार की इस कहानी का ऐसा दुखद अंत होगा, किसी ने सोचा भी नहीं था. पीयूष को तो कानून सजा देगा. लेकिन नीलम के घर वाले पूछते हैं कि आखिर इस में नीलम की क्या गलती थी? पीयूष की सनक ने रिचु से उस की मां का प्यार छीन लिया. पिता का प्यार उसे मिला ही नहीं. जबकि रिचु अपनी मां की मौत से अनजान है. उसे मम्मी के स्कूल से लौटने का इंतजार है. वह अकसर अपनी नानी से पूछता है, ‘नानी, मम्मा स्कूल से कब आएगी?’ One Sided Love

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित