Terrorism News: शूट आउट लश्करेतैयबा

Terrorism News: लश्करेतैयबा का आतंकी अबु कासिम धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को तो भटकाता ही था, खुद भी आतंकी वारदातों को अंजाम देता था. अपने आतंकी कारनामों की ही वजह से वह लश्करेतैयबा के चीफ हाफिज सईद का खास बन गया था. आखिर भारतीय सुरक्षा बलों ने उसे मार गिराया

जम्मूकश्मीर में पाकिस्तान की ओर से नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे गांवों की ओर की जाने वाली फायरिंग से भारतपाक सीमा पर हलचल बढ़ी हुई थी. पाकिस्तान कभी गोलियां दाग रहा था तो कभी मोर्टार. इस तरह पाकिस्तान द्वारा इस साल अब तक करीब 300 बार सीज फायर का उल्लंघन किया जा चुका था. इस तरह की फायरिंग के पीछे 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक बौखलाहट और दूसरी भारतीय सेना का ध्यान बंटा कर दुर्गम पहाड़ी इलाकों से हथियारों के जखीरे से लैश प्रशिक्षित आतंकवादियों को सीमा पार कराना.

भारतीय सुरक्षा बलों के लिए कुख्यात व प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्करेतैयबा के आतंकी एक बड़ी चुनौती बने हुए थे. जम्मूकश्मीर पुलिस व सेना के जवान उन का मुकाबला कर रहे थे. इस के चलते जंगलों में चलाए गए औपरेशन के तहत सुरक्षा बलों ने लश्कर के कई आतंकियों को मार गिराया था और 2 को जिंदा पकड़ने में सफलता हासिल की थी.

जम्मूकश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों की कमान लश्कर के टौप कमांडर अबु कासिम उर्फ अब्दुल रहमान के हाथों में थी. अबु शातिर और बेहद खूंखार किस्म का था. उस के दिलोदिमाग में हिंदुस्तान के प्रति नफरत का जहर भरा था. सुरक्षाबलों को चकमा देने में माहिर अबु खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों का दुश्मन नंबर वन था. वह आतंकी हमलों का न सिर्फ प्लानर था, बल्कि खुद भी हमले करने से नहीं चूकता था. पाकिस्तान की पनाह में बैठे एक करोड़ डौलर के इनामी रहे लश्कर के चीफ मोस्ट वांटेड आतंकवादी हाफिज सईद व हिज्बुल मुजाहिदीन के सुप्रीमो सैयद सलाहुद्दीन से उस का सीधा संपर्क था.

अबु कासिम धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को भड़का कर न सिर्फ ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजता था, बल्कि हिज्बुल मुजाहिदीन व अन्य आतंकी संगठनों के बीच तालमेल की भूमिका भी निभाता था. प्रशिक्षित आतंकियों को भारत की सीमा में घुसपैठ कराने में उस की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी. अबु कासिम के कारनामों के चलते उस के सिर पर नेशनल इन्वैस्टीगेशन एजेंसी (आईएनए) व जम्मूकश्मीर पुलिस ने 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित किया हुआ था. 5 सालों से आतंक का पर्याय बने 20 लाख के इनामी कासिम को सुरक्षा बलों ने घेरने की कोशिशें तो कई बार कीं, लेकिन हर बार वह अत्याधुनिक हथियारों से बारूद उगलता चकमा दे कर फरार हो गया था.

एक बात और, खुद को महफूज रखने के लिए अबु कासिम अपने इर्दगिर्द चौबीसों घंटे हथियारबंद आतंकियों की एक टीम रखता था. 28 अक्तूबर, 2015 के आखिरी सप्ताह में भारतीय खुफिया एजेंसियों को जो पुख्ता इनपुट मिलने शुरू हुए थे, वे चौंकाने वाले थे. पता चला था कि लश्कर के जेहादी आतंकी अबु कासिम के इशारे पर किसी बड़े हमले की फिराक में हैं. सूचना के अनुसार अबु कासिम अपने 7-8 साथियों के साथ उत्तरी कश्मीर के बंडीपोरा जिले से करीब 5 किलोमीटर दूर बुटु के जंगलों में छिपा था. एजेंसियों के लिए यह चिंता की बात थी.

आईएनए चीफ शरद कुमार, सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह, बीएसएफ के डाइरेक्टर जनरल शरद कुमार पाठक व सीआरपीएफ के डीजी प्रकाश मिश्रा जम्मूकश्मीर के डीजीपी के. राजेंद्र कुमार व आईजी एस.जे.एम. गिलानी ने अपने अधीनस्थों के साथ एक मीटिंग की. इस के बाद शाम 5 बजे सेना की एक बटालियन, सीआरपीएफ की 18वीं बटालियन और जम्मूकश्मीर पुलिस ने संयुक्त रूप से फूलपू्रफ प्लानिंग के साथ विशेष सर्च औपरेशन शुरू कर दिया.

पहाड़ी इलाके में घेराबंदी करनी शुरू कर दी गई. लेकिन आतंकियों को शायद इस की भनक लग गई, इसलिए उन्होंने सुरक्षा बलों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जवानों ने भी इस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए फायरिंग शुरू कर दी. फिजाओं में गोलियों की गूंज बहने लगी. सेना की 14 राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) बटालियन के जवान समोद चौधरी जांबाजी दिखा कर आतंकियों से नजदीक से लोहा ले रहे थे. भारतीय जवान का यह कदम आतंकियों पर भारी पड़ रहा था, लेकिन उसी दौरान आतंकियों की तरफ से आई कई गोलियां समोद के शरीर में समा गईं.

गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद समोद मुकाबला करते रहे. अंत में जब शरीर ने साथ नहीं दिया तो वह गिर पड़े. उन्हें तत्काल चिकित्सा के लिए ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन की सांसें थम गईं. आतंकियों की तरफ से कुछ देर के लिए गोलियों की तड़तड़ाहट बंद हो गई. सुरक्षा बल अबु कासिम की चकमा देने की फितरत से वाकिफ थे. लेकिन इस बार वह उस की चालाकियों को नाकाम कर देना चाहते थे. औपरेशन लंबा चल सकता था. धरपकड़ के लिए पैरा कमांडों, खोजी कुत्ते और हैलीकौप्टर भी लगा दिए गए थे. रात भर रहरह कर गोलियां चलती रहीं.

आतंकी गोलियां चलाते हुए आगे बढ़ रहे थे. इसी तरह वे समीपवर्ती कुलगाम के जंगलों तक पहुंच गए. वे पहाडि़यों व पेड़ों की आड़ से चकमा दे रहे थे. रुकरुक कर रातभर मुठभेड़ चलती रही. तड़के आतंकियों की तरफ से गोलियां चलनी बिल्कुल बंद हो गईं. इस के बावजूद कवरिंग फायर के बीच सुरक्षा बल आगे बढ़ते रहे. वहीं पर उन्हें एक आतंकी की लाश पड़ी मिली. उस पर नजर पड़ते ही टीम कैप्टन खुशी से चिल्ला पड़े, ‘‘वैलडन सर, औपरेशन सफल रहा.’’

उन की खुशी का मतलब था कि मारा गया आतंकवादी कोई और नहीं, अबु कासिम था. उस के साथी भाग निकले थे. कासिम लश्कर का बड़ा कमांडर था. लिहाजा उस की मौत बहुत बड़ी कामयाबी थी. इस सूचना का सुरक्षा बलों के हैडक्वार्टर तक फ्लैश कर दिया गया. कासिम की मौत लश्कर चीफ का दायां हाथ टूटने जैसी थी. उस के शव को कब्जे में ले लिया गया. सूचना मिलने पर राजधानी दिल्ली से खुफिया एजेंसियों की टीमें भी कश्मीर के लिए रवाना हो गईं. उस दिन कासिम के अन्य साथियों की तलाश में सर्चिंग औपरेशन चलाया गया, लेकिन वे हाथ नहीं आ सके.

मुठभेड़ में मारे गए अबु कासिम के गुनाहों की फेहरिश्त बहुत लंबी थी. वह दरजनों आतंकी वारदातों में शरीक होने के साथ उन का मास्टरमाइंड रहा था. पाकिस्तान के बहावलपुर का रहने वाला कासिम कई सालों पहले आतंकी संगठन लश्करेतैयबा में शामिल हुआ था और वहां से प्रशिक्षण हासिल कर के आतंक फैलाने के लिए भारत की सीमा में दाखिल हो गया था. कासिम तेजतर्रार व टीम पर नियंत्रण रखने वाला युवक था. अपनी इसी विशेषता से उस ने कश्मीर के कुछ युवकों को भी संगठन में शामिल कर लिया था. हाफिज सईद उस के कामों से खुश हो कर उस की तारीफें कर के उस के दिल में नफरत के शोले भड़काता रहता था.

अबु कासिम घुसपैठ कर के भारत आता और दोगुनी ताकत से अपने मिशन में जुट जाता. सुरक्षा बल उस के दुश्मन नंबर वन थे. वह उन पर गोलियां चलाने में जरा भी देर नहीं करता था. उस के आतंक का लंबाचौड़ा काला इतिहास है. सन 2012 में उस का नाम सुर्खियों में तब आया था, जब पंथा चौक बेमिना बाईपास पर उस ने अपने साथियों के साथ एक सैन्य काफिले पर हमला कर दिया था. इस के बाद वह ताबड़तोड़ हमले करने व कराने लगा. लश्कर चीफ हाफिज सईद यही चाहता था. उस के कारनामों से खुश हो कर सईद ने उसे कश्मीर का टौप कमांडर बना दिया था.

इस के अलावा अबु कासिम को हिज्बुल मुजाहिदीन व अन्य आतंकी संगठनों के आतंकियों के बीच तालमेल बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी थी, जिसे वह बखूबी निभा रहा था. कासिम की ताकत बढ़ी तो उस ने वारदातें भी बढ़ा दीं. साथियों के पकड़े जाने पर भारतीय खुफिया एजेंसियों तक भी उस के कमांडर बनने की खबर पहुंच गई. 24 जून, 2013 को कासिम ने साथियों के साथ श्रीनगरबारामूला हाईवे पर फिर से सेना के काफिले पर हमला किया, जिस में 8 जवान शहीद और 11 जवान घायल हो गए. कासिम ही निर्देश पर पाकिस्तानी आतंकी अबु हमजा व अबु उस्मान ने कदलबल इलाके में 18 जुलाई, 2013 को शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान, सौरा के पूर्व निदेशक डा. जलालुद्दीन व उन के अंगरक्षक की हत्या कर दी.

13 अगस्त, 2013 को कासिम के डिप्टी कमांडर अबु दुजाना ने शौकत अहमद लोन के साथ मिल कर पांपोर के गालंदर इलाके में पुलिस दल पर गोलियां चलाईं, जिस में 2 पुलिसकर्मी शहीद हो गए. आतंकी उन की एक एके-47 राइफल भी ले गए. कासिम के इशारे पर ही बड़गाम में 2 दिसबर, 2013 को आतंकी लतीफ, रियाज व अबु उमर ने चाडूरा के तत्कालीन थानाप्रभारी को मौत के घाट उतार दिया था. उस का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा था. उसी के इशारे पर लश्कर आतंकी अबु हांजुला ने 4 मार्च, 2014 को पुलवामा अदालत परिसर में कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी.

इस के बाद अबु कासिम ने 11 अगस्त, 2014 को पांपोर के निकट बीएसएफ के काफिले पर हमला कर दिया था. इस हमले में एक डिप्टी कमांडेंट समेत 6 जवान घायल हुए थे. सन 2014 में ही उस ने कैसर मौला में एक सैनिक और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी थी. कासिम के आतंकी मंसूबे बढ़ रहे थे. वह धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को भी बरगला कर आतंकवाद की टे्रनिंग के लिए लश्कर के शिविरों में भेज रहा था. उस की बढ़ती गतिविधियों के चलते एनआईए व कश्मीर पुलिस ने उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया था.

शातिर कासिम ने भी अपनी रणनीति में बदलाव कर दिया. अब वह हमलों की प्लानिंग तैयार करने लगा. प्लानिंग के तहत ही उस ने अपने साथी नावेद उस्मान उर्फ कासिम व मोमीन उर्फ मोहम्मद नौमान याकूब को सुरक्षा बल के किसी काफिले पर हमला करने के लिए तैयार किया. 5 अगस्त, 2015 को सुबह तकरीबन 7 बजे ऊधमपुर स्थित उत्तरी कमांड मुख्यालय से बीएसएफ की बस जम्मूश्रीनगर हाईवे पर जा रही थी. बस में कई जवान सवार थे. बस जैसे ही नरसू नाले के नजदीक पहुंची, सड़क किनारे घात लगाए बैठे नावेद व मोमीन अचानक सामने आ गए.

पहले उन्होंने बस के दाएं टायरा पर गोली मार कर पंक्चर किया, उस के बाद औटोमैटिक राइफल से बस पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी. पंक्चर हो जाने की वजह से बस रुक गई थी. उसी बीच उन्होंने हैंडग्रेनेड से बस पर हमला कर दिया. इस से बस के शीशे चूर हो कर हवा में बिखर गए. बस चालक घायल हो गया. इस अप्रत्याशित हमले ने सुरक्षा बलों को संभलने का मौका नहीं दिया. बस में सवार जवान रौकी के पास राइफल थी. हैंडग्रेनेड से उस के कई साथी जख्मी हो गए थे. आतंकियों के इरादे वह भांप चुका था. इसलिए तेजी से खड़े हो कर उस ने बस का दरवाजा बंद कर लिया और उस की आड़ में खिड़की से मोर्चा ले कर जवाबी फायरिंग शुरू कर दी, जिस में एक आतंकी मारा गया.

मरने वाला आतंकी मोहम्मद नौमान याकूब उर्फ मोमीन था. दूसरा आतंकी गोलियां बरसता रहा. उस की कई गोलियां रौकी के शरीर में भी धंस चुकी थीं. वह सुरक्षा बलों पर गोलियां चला जरूर रहा था, लेकिन साथी की मौत पर उस के मन में भी डर बैठ गया था, इसलिए वह गोलियां चलातेचलाते भाग गया. साहस का परिचय देते हुए रौकी ने अपने साथियों को बचा लिया था, लेकिन वह खुद और एक अन्य जवान शुभेंदु राय इस मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. आननफानन में हैडक्वार्टर व स्थानीय थाना चिनैनी को सूचना दी गई. घायल जवानों को अविलंब अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन दोनों की ही मौत हो गई.

सुरक्षा बलों ने फरार हुए आतंकी की तलाश शुरू कर दी. यह बड़ा हमला था. इस ने खुफिया एजेंसियों व सुरक्षा बलों को दहला कर रख दिया था. बीएसएफ के आईजी राकेश शर्मा, डीआईजी पुलिस सुरेंद्र गुप्ता, एसएसपी सुलेमान चौधरी समेत पुलिस प्रशासनिक व सैन्य अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए थे. विशेष कमांडो दस्ते को भी बुला लिया गया था, जो हेलीकौप्टर से फरार हुए आतंकी को खोजने लगे. आतंक नावेद गांव के रास्ते की तरफ भागा था. उस ने रास्ते में मिले 2 ग्रामीणों देशराज व रमेश को राइफल की नोक पर अपने बस में कर के कहा, ‘‘चुपचाप मुझे रास्ता दिखाओ, वरना यहीं मार डालूंगा.’’

उस की धमकी से दोनों ग्रामीण बुरी तरह डर गए थे. वे नावेद को पहाड़ी की तरफ ले जाने लगे. थोड़ा आगे पहुंच कर नावेद ने 2 और युवकों, राकेश शर्मा और विक्रमजीत शर्मा को अपने कब्जे में ले लिया. आगे चल कर एक और युवक नावेद के कब्जे में आ गया. यह नावेद की रणनीति का हिस्सा था. उस का सोचना था कि यदि उस की घेराबंदी होगी तो बंधक ग्रामीणों की आड़ उसे बचा लेगी.

तकरीबन 2 किलोमीटर चल कर नावेद अचानक रुक गया. आसमान में मंडराते हैलीकौप्टर की आवाज सुन कर उसे रुकना पड़ा. वह हैलीकौप्टर विशेष कमांडो दस्ते का था. इस बीच बंधक बने 3 लोग चकमा दे कर भाग निकले थे. इस बीच राकेश और विक्रमजीत समझ गए थे कि आतंकी के हाथ में हथियार जरूर है, लेकिन वह घबराया हुआ है. शरीर से भी वह ज्यादा ताकतवर नहीं दिखता था.

आंखों ही आंखों में दोनों ने इशारा किया और हिम्मत दिखा कर नावेद पर टूट पड़े. उस की रायफल छीन कर उन्होंने एक तरफ फेंक दी और शोर मचाना शुरू कर दिया. उन्होंने नावेद को पकड़ कर पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस के पहुंचने तक उन्होंने उसे पकड़े रखा. पुलिस ने नावेद को अपने कब्जे में ले लिया. नावेद ने ही पुलिस को बताया कि मारा गया आतंकी मोमीन पाकिस्तान के बहावलपुर निवासी मोहम्मद याकूब का बेटा था.

नावेद का जिंदा पकड़ा जाना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि थी. भारत में 26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमलों के आतंकी अजमल आमिर कसाब के बाद जिंदा पकड़ा गया दूसरा आतंकी नावेद था. बाद में नावेद को जम्मू स्थित जौइंट इंट्रोगेशन सेंटर (जेआईसी) लाया गया, जहां उस से सुरक्षा एजेंसियों व पुलिस ने हर एंगल से संयुक्त पूछताछ की. एनआईए चीफ शरद कुमार ने भी कश्मीर पहुंच कर नावेद से पूछताछ की. इस पूछताछ में सामने आया कि आतंकी नावेद भी धर्म के नाम पर भटका हुआ युवक था.

20 वर्षीय नावेद पाकिस्तान के फैसलाबाद जिले का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का युवक था. आवारगी के चलते वह कुछ युवकों के माध्यम से लश्कर में शामिल हो गया था. नावेद की उम्र कम थी. आतंकी संगठनों को जल्दी बहकावे मे आने वाले ऐसे युवकों की तलाश रहती है. नावेद को रुपएपैसे का लालच दे कर धर्म के नाम पर जुनूनी बना दिया गया. जब वह दिमागी तौर पर पूरी तरह संगठन का हिस्सा बन गया तो परिवार से नाता तोड़ कर आतंकी ट्रेनिंग कैंप में चला गया. मोमीन से उस की मुलाकात वहीं हुई. मोमीन हाफिज सईद का सुरक्षागार्ड रह चुका था. बाद में उसे युवकों को ट्रेनिंग देने का काम सौंपा गया था.

मोमीन और नावेद अन्य साथियों के साथ कश्मीर में पुंछ सेक्टर से दाखिल हुए थे और यहां आ कर कासिम के इशारे पर काम करने लगे थे. पुलिस ने नावेद से पूछताछ के बाद बुलेटपू्रफ वाहन से उसे विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस हमले का मास्टरमाइंड अबु कासिम था. वह सुरक्षा बलों के निशाने पर था. सरगरमी से उस की तलाश की जाने लगी. तमाम जांच एजेंसियां कासिम के पीछे लग गई थीं. सूचना मिल रही थी कि कुछ आतंकवादी कासिम के इशारे पर बड़ी वारदात को अंजाम देने के इरादे से सीमा में दाखिल हो चुके हैं. इस के मद्देनजर जंगलों में सघन सर्चिंग औपरेशन शुरू कर दिया गया.

इसी कड़ी में बारामूला जिले के रफियाबाद के हमाम मरकूट के जंगलों में एक बार फिर 26 अगस्त को कासिम से सुरक्षा बलों की मुठभेड़ हो गई. 20 घंटे तक चली इस भीषण मुठभेड़ में अगले दिन तक 3 आतंकवादियों को मार गिराया गया. एक आतंकवादी की गोलियां खत्म हो गईं. साथियों के शव देख कर वह घबरा गया और बचने के लिए जंगल में पहाड़ों के बीच बनी एक गुफा के अंदर छिप गया. सुरक्षा बलों के लिए अच्छी बात यह थी कि वह फिदायीन नहीं था, वरना खुद को भी गोली या बम से उड़ा सकता था. जिस गुफा में वह घुसा था, सुरक्षा बलों ने उस गुफा को घेर लिया. गुफा के दूसरी तरफ कोई रास्ता नहीं था. उसे बाहर निकालने के लिए गुफा के अंदर आंसू गैस का गोला व मिर्ची बम फेंके गए.

इन के धुंए से आंखों में तेज जलन के साथ आंसू निकलते हैं और सांस लेना मुश्किल हो जाता है. करीब 10 मिनट बाद अपने हाथ ऊपर किए सलवारकुरती पहने वह आतंकी बाहर निकल आया. उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. उसे हिरासत में ले लिया गया. मुठभेड़स्थल से 5 एके 47 राइफलें, 2 यूबीजीएल (ग्रेनेड लांचर), 2 जीपीएस, एक नक्शा और स्मार्टफोन सहित भारी मात्रा में गोलाबारूद बरामद हुआ.

लेकिन कासिम इस बार भी भाग निकला. चंद दिनों के अंदर एक और जिंदा आतंकवादी को पकड़ने की यह बड़ी कामयाबी थी. उच्च सैन्यधिकारी व उत्तरी कश्मीर के डीआईजी गरीबदास भी मौके पर पहुंचे. उस ने अपना नाम सज्जाद अहमद उर्फ अबु उबैदुल्ला उर्फ फहदुल्ला उर्फ अब्दुल्ला बताया. उस की उम्र 22 साल थी.  पूछताछ में इस आतंकी ने कई बड़े खुलासे किए. उस के अनुसार सैन्य शिविरों पर जो 3 आतंकवादी मारे गए थे, उन के नाम अबुतल्लाह, अबु कातल व अबु उस्मान थे. सज्जाद को कई दौर की पूछताछ के बाद अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. उस से भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलीं.

अबु कासिम अभी भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए सब से बड़ा खतरा बना था. राज्य पुलिस के आतंकरोधी दस्ते के होनहार इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ डार कासिम के खिलाफ चल रहे मिशन के तहत उस के मूवमैंट को ट्रैक कर रहे थे. इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ डार आतंकियों से लोहा लेने के लिए चर्चित थे.

2 महीने बाद 7 अक्तूबर को उन्हें सूचना मिली कि कासिम बांदीपोरा के जंगलों में छिपा है. वह पुलिस दल के साथ वहां पहुंच गए. उसे घेरने व जिंदा पकड़ने का प्रयास किया गया. जबरदस्त मुठभेड़ हुई, लेकिन वह चकमा देने में कामयाब रहा. इस मुठभेड़ में इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ शहीद हो गए. अल्ताफ की शहादत के बाद उस के खिलाफ सघन अभियान जारी रहा. आखिर में वह मारा गया.

अब सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि कासिम जैसे आतंकी के मारे जाने पर लश्कर गुट की कमर टूटेगी. आतंकियों के ऐसे अंजाम से युवा भी उस के बहकावे में आने से बचेंगे. जम्मू कश्मीर के डीजीपी के. राजेंद्र कुमार ने बताया कि कासिम का मारा जाना आतंकवाद पर काफी प्रभाव डालेगा. कथा लिखे जाने तक पुलिस पकड़े गए आतंकवादियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर रही थी और संयुक्त औपरेशन के जरिए अन्य आतंकियों की खोजबीन में जुटी थी. Terrorism News

—कथा पुलिस व सैन्य सूत्रों पर आध

UP News: पूरे परिवार का मर्डर फिर करंट लगा कर किया सुसाइड

UP News: एक ऐसी सनसनीखेज घटना सामने आई जिस ने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया. एक व्यक्ति ने पहले अपनी पत्नी और 3 मासूम बच्चों की हत्या की और फिर खुद बिजली का करंट लगाकर आत्महत्या कर ली. घटना के बाद गांव में सन्नाटा पसर गया. किसी को समझ नहीं आ रहा कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति बनी कि उस ने इतना खतरनाक कदम उठा लिया. आइए इस दर्दनाक घटना को विस्तार से जानते हैं, जो हमें कई गंभीर सवालों से रूबरू कराती है.

यह चौंकाने वाली वारदात उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के महावन क्षेत्र के गांव खपरपुर की है. यहां एक ही परिवार के 5 लोगों की मौत से हड़कंप मच गया. आरोपी मुकेश ने कथित तौर पर अपनी पत्नी सीमा और 3 मासूम बच्चों की हत्या करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली. एक बच्ची का शव चारपाई पर मिला, जबकि मुकेश का शव कमरे के फर्श पर पड़ा था. पूरे घर का मंजर दिल को झकझोरने वाला था.

एसएसपी (मथुरा) श्लोक कुमार ने बताया कि गांव खपरपुर में एक ही परिवार के 5 शव घर के अंदर मिले. मुकेश खेतीकिसानी करता था और उस के भाई का घर पास में ही है. सुबह जब घर में कोई हलचल नहीं दिखी तो भाई को शक हुआ. वह दीवार फांदकर अंदर पहुंचे और दरवाजा तोड़ने पर सभी शव कमरे में पड़े मिले. मौके से दीवार और कौपी पर लिखा सुसाइड नोट मिला. साथ ही मुकेश का मोबाइल फोन भी बरामद हुआ, जिस में उस ने आत्महत्या से पहले एक वीडियो बनाया था.

मनीष ने पत्नी सीमा और 3 बच्चों-पंकज, प्रियांशी व हनी की गला दबाकर हत्या कर दी. परिवार को खत्म करने के बाद खुद बिजली का करंट लगाकर आत्महत्या कर ली. पुलिस को मौके से एक सुसाइड नोट और मनीष द्वारा बनाया गया वीडियो भी मिला है.
पुलिस ने सभी शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की गहन जांच की जा रही है. UP News

Crime Story: नकली नोटों को असली बनाने की शातिर चाल

Crime Story: कोलकाता में पिछले दिनों नकली नोटों का एक बड़ा और अनोखा मामला सामने आया. गिरफ्तार चंद्रशेखर जायसवाल पुराने और सड़ेगले असली नोटों के ‘सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड’ को निकाल कर उस से नकली नोट तैयार करता था. एक और बड़ी बात यह कि चंद्रशेखर न केवल नकली भारतीय करेंसी तैयार करता था, बल्कि डौलर, यूरो समेत कई अन्य देशों की भी नकली करेंसियां उस के यहां से बरामद हुई हैं. यह तो थी एक खबर.

आइए, अब देखते हैं नकली नोटों का कारोबारी चंद्रशेखर जायसवाल अपना यह कारोबार किस तरह चला रहा था. मध्य कोलकाता के बऊबाजार में 2 लाख रुपए के नकली नोटों के साथ चंद्रशेखर जायसवाल नामक एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई. इस के बाद कांकुड़गाछी स्थित उस के घर से 10 करोड़ रुपए के नकली नोट बरामद हुए. इस से पहले नकली नोटों के ऐसे कई मामले सामने आए हैं.

इन मामलों से पता चला है कि बरामद नकली नोट की छपाई पाकिस्तान व बंगलादेश में होती है और पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल की सीमा से हमारे देश में ये नकली नोट पहुंचाए जाते हैं. लेकिन चंद्रशेखर जायसवाल का मामला कई माने में अनोखा साबित हो रहा है. चूंकि यह मामला नकली विदेशी करेंसी से भी जुड़ा है, इसीलिए जांच एजेंसी की नजर में यह मामला देश की आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है.

गिरफ्तार चंद्रशेखर जायसवाल ने कबूल किया कि सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड उसे रिजर्व बैंक की पटना शाखा के एक ठेकेदार की मारफत मिला करते थे. हावड़ा जिले के डोमजुड़ में चंद्रशेखर जायसवाल बाकायदा नकली नोटों का एक बड़ा कारखाना चलाता था. स्पैशल टास्क फोर्स ने इसी कारखाने के गोदाम में छापेमारी कर के नकली नोट बनाने के तमाम सामान बरामद किए हैं. 

टस्क फोर्स के अधिकारी अमित जावलगी के अनुसार, छापेमारी में सब से चौंकाने वाला जो सामान बरामद हुआ है वह पुराने खस्ताहाल, सड़ेगले असली पुराने नोटों की 20 बोरियां हैं. पूछताछ में चंद्रशेखर ने एजेंसी के अधिकारियों के सामने कबूल किया कि इस की आपूर्ति रिजर्व बैंक का एक ठेकेदार किया करता था. कारखाने से पुराने असली नोटों के अलावा नोट छापने वाले कागज, स्टैंप, स्याही के साथ 450 नकली नोटों की बोरियां भी बरामद हुई हैं. बरामद हुए नकली नोटों में केवल 500 और 1000 रुपए के नोट थे. 

आयरन स्क्रैप के कारोबारी चंद्रशेखर का यह कारखाना स्थानीय रूप से लोहे की कील बनाने वाले कारखाने के रूप में जाना जाता था. स्थानीय लोगों को कारखाने की चारदीवारी के उस पार लोहे के स्क्रैप का ढेर दिखता था. स्थानीय रूप से प्रचारित यही किया गया था कि कारखाने में स्क्रैप को गला कर विभिन्न साइज की कीलें तैयार की जाती हैं. लेकिन इस कारखाने में पिछले 2 साल से नकली नोट छापे जा रहे थे.

मामले की जांच कर रही स्पैशल टास्क फोर्स की जांच से खुलासा हुआ कि गिरफ्तार चंद्रशेखर के नकली नोटों का कारोबार खास कोलकाता और डोमजुड़ के बीच फलफूल रहा था. छापेमारी में इस कारखाने से न केवल नकली भारतीय नोट बरामद हुए, बल्कि डौलर और यूरो समेत टर्की, जिम्बाब्वे व अन्य कई देशों की करेंसियों के भी नकली नोट बरामद हुए. जाहिर है इस कारखाने से चंद्रशेखर विदेश में भी अपना कारोबार चला रहा था. इसीलिए इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दिया गया.

रिजर्व बैंक की सुरक्षा में सेंध

नकली नोट में सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल अपनेआप में एक अनोखा खुलासा था. चंद्रशेखर के कारखाने में तैयार नकली नोटों को ‘ग्रेड वन’ नकली नोट बताया गया. इस की वजह, नकली नोट में बाकायदा सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल है. नकली नोट की जांच का काम जितना आगे बढ़ता गया, जांच अधिकारी के आगे एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. अब तक नकली नोट तैयार करने का जितना भी खुलासा हुआ है उस में असली नोट जैसे कागज का इस्तेमाल करने, वाटर मार्क की नकल और उम्दा स्याही के इस्तेमाल की बातें सामने आई थीं.

सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल पहली बार हुआ है. इसीलिए यह रिजर्व बैंक की सुरक्षा में सेंध का मामला बन गया. टास्क फोर्स के अधिकारी बताते हैं कि नकली नोट छापने के लिए भी विशेष रूप से प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है. कारखाने में 20 कर्मचारी अत्याधुनिक मशीन पर नकली नोट छापते थे. चंद्रशेखर के पास ऐसे 3 प्रशिक्षित कर्मचारी थे, जिन्हें वह मुंबई से ले कर आया था.

चूंकि इस से पहले ऐसा कोई मामला टास्क फोर्स के सामने नहीं आया था इसीलिए टास्क फोर्स ने रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों से भी पत्र लिख कर जानना चाहा कि पुराने असली नोट के ‘सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड’ का इस्तेमाल नकली नोटों में कैसे किया जा सकता है? मजेदार बात यह कि रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों के लिए भी यह बड़ा चौंकाने वाला मामला था. रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों की राय में सिक्योरिटी थ्रेड को निकाल कर फिर से इस्तेमाल करना कोई नामुमकिन बात भी नहीं है.

दरअसल, यह सिक्योरिटी थ्रेड चांदी की पन्नी हुआ करती थी. नोट भले ही सड़ जाए, लेकिन चांदी की पन्नी को फिर भी निकाला जा सकता है. रिजर्व बैंक के अनुसार, पन्नी का फिर से इस्तेमाल पूरी तरह से भले ही नहीं किया जा सकता हो लेकिन आंशिक तौर पर किया ही जा सकता है. रिजर्व बैंक ने यह भी माना कि हर रोज कोलकाता के तमाम बैंकों से बड़े पैमाने पर नकली नोट पकड़े जा रहे हैं.

जांच में पता चला कि नकली नोट का कारोबार करने वालों में से अब तक किसी ने सिक्योरिटी थे्रड का इस्तेमाल नहीं किया है. नकली नोटों में असली सिक्योरिटी थे्रड का इस्तेमाल इतनी सफाई से किया गया था कि नकली नोटों की शिनाख्त लगभग नामुमकिन ही थी. 

कोलकाता पुलिस के इतिहास में नकली नोट का इतना बड़ा कारोबार इस से पहले कभी नहीं पकड़ा गया था. जब इस मामले का खुलासा हुआ तो सब से पहले मध्य कोलकाता के बड़ा बाजार में आतंक का माहौल देखा गया. रुपए का लेनदेन मुश्किल हो गया. गौरतलब है कि बड़ाबाजार के थोक कारोबार का एक बड़ा हिस्सा नकदी में चलता है. जांच कर रही टास्क फोर्स का कहना है कि बैंकों के जरिए नकली नोट कोे लंबे समय तक चलाते जाना इतना भी सहज नहीं है. नकली नोट का कारोबार थोक बाजार में अधिक होता है, क्योंकि थोक बाजार से ये नोट आसानी से बैंकों तक पहुंच जाते हैं.

पुराने नोट का निबटारा

रिजर्व बैंक के एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि पहले रिजर्व बैंक द्वारा पुराने, फटे, सड़ेगले नोटों को एक तय समय के बाद जला कर नष्ट कर दिया जाता था. इस के बाद कुछ वर्ष पहले पुराने नोटों को नीलाम करने का चलन शुरू हुआ. इस के लिए पहले पेपर कटर मशीन में डाल कर उस के टुकड़ेटुकड़े करना जरूरी है. इस के बाद ही इन्हें नीलाम किया जा सकता है.

नियमानुसार इन स्क्रैप नोटों को कटर मशीन में डाल कर इन में रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर समेत नोटों में वाटर मार्क और सिक्योरिटी थ्रेड वाले हिस्से कुछ इस तरह नष्ट करना जरूरी है, ताकि उन का फिर से इस्तेमाल न किया जा सके.

टास्क फोर्स अधिकारी अमित जावलगी ने बताया कि रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर, वाटर मार्क और सिक्योरिटी थ्रेड नष्ट करने के बाद ही सड़ेगले, पुराने नोटों की नीलामी होती है. नीलामी में रिजर्व बैंक में पंजीकृत कंपनी ही भाग ले सकती है. पंजीकृत कंपनी ही रिजर्व बैंक का ठेकेदार कहलाती है.

ठेकेदार कंपनी इन सड़ेगले नोटों का व्यवहार अपने तरीके से कर सकती है. पर पुराने नोट का ठेकेदार कंपनी कुछ भी करे, उस का पूरा दायित्व ठेकेदार कंपनी का होता है. लेकिन नियमानुसार रिजर्व बैंक से प्राप्त सड़ेगले नोट ठेकेदार कंपनी के मारफत किसी भी सूरत में बाहरी लोगों के हाथों तक पहुंचना गैरकानूनी है. 

रिजर्व बैंक के ऐसे ही एक ठेकेदार की मारफत चंद्रशेखर असली नोट का सिक्योरिटी थे्रड हासिल किया करता था. नीलामी से प्राप्त असली नोट से सिक्योरिटी थे्रड को निकाल कर उस का इस्तेमाल बड़ी सफाई से नकली नोटों में किया जाता था. यही कारण है कि कभीकभी असलीनकली नोट की परखने वाली मशीन भी गच्चा खा जाया करती है.

बहरहाल, ठेकेदार की शिनाख्त हो चुकी है और उस से पूछताछ में पता चला कि सिक्योरिटी थे्रड प्राप्त करने के लिए चंद्रशेखर पुराने नोट खरीदने में उस के मूल्य से दोगुना पैसा खर्च किया करता था. 50 हजार रुपए से भी कम कीमत के सड़ेगले खस्ताहाल नोटों को चंद्रशेखर 1 लाख रुपए में खरीद लेता था. कारखाने में नकली नोटों पर यह सिल्वर थ्रेड बिठा दिया जाता था. 

टास्क फोर्स के अधिकारी का कहना है कि इस से पहले पश्चिम बंगाल में जो भी नकली नोट बरामद हुए हैं, उन में से ज्यादातर पाकिस्तान व बंगलादेश में छपे थे. पाकिस्तान में छपे नोट असली नोट के काफी करीब हुआ करते हैं. डोमजुड़ से बरामद हुए नकली नोट असली भारतीय नोट के करीब तो नहीं, लेकिन पाकिस्तान में तैयार किए गए भारतीय नोट के ज्यादा करीब थे.

छोटे नोटों की किल्लत

जांच में जो तथ्य निकल कर सामने आया है वह यह कि छोटे नोटों की किल्लत के बीच नकली बड़े नोटों का बाजार चलता है. गौरतलब है कि कोई भी राज्य क्यों न हो, हर राज्य के बड़े शहरों से ले कर गांवदेहात और कसबे में 20 और 50 रुपए के नोटों की किल्लत आम है. वहीं, ज्यादातर एटीएम में 100, 500 और 1000 रुपए के ही नोट मिलते हैं. दरअसल, बड़े नोटों का छुट्टा 50-100 रुपए की खरीदारी में आसानी से हो जाता है. ये नोट दुकानदार की मारफत हाथोंहाथ हर जगह पहुंच जाते हैं.

जहां तक छोटे नोटों की किल्लत का सवाल है, राष्ट्रीयकृत बैंक सारा दोष यह कह कर रिजर्व बैंक के मत्थे मढ़ देते हैं कि वहां से पर्याप्त मात्रा में छोटे नोट नहीं आते. एक अधिकारी का कहना है कि शालबनी, देवास और नासिक से नोट रिजर्व बैंक की विभिन्न शाखाओं में पहुंचते हैं. नोट का शालबनी कारखाना रिजर्व बैंक के अधीन है, लेकिन देवास और नासिक के कारखानों पर मालिकाना हक केंद्रीय वित्त मंत्रालय का है.

रिजर्व बैंक की किसी शाखा को किस डिनौमिनेशन यानी किस मूल्य का कितना नोट भेजा जाए, वित्त वर्ष की शुरुआत में ही यह मुंबई स्थित रिजर्व बैंक के मुख्यालय में तय हो जाता है. अब इस बारे में रिजर्व बैंक के एक सूत्र का कहना है कि 50 और 20 रुपए के नोट की किल्लत के कई कारण हैं. इन का आवंटन 10 रुपए, 100 रुपए, 500 रुपए और 1000 रुपए के नोट की तुलना में महज 10 से 20 प्रतिशत होने के कारण इन की किल्लत बनी रहती है.

साल के दौरान समयसमय पर 20 और 50 रुपए का संकट बना रहता है. लेकिन इस तरह की किल्लत की समस्या हर वित्त वर्ष के अंत में अधिक देखी जाती है. इस की वजह यह है कि जिस तरह के कागज में 20 और 50 रुपए के नोटों की छपाई होती है, उस के आयात में कभीकभी दिक्कत पेश आती है.

वहीं एटीएम में 100 रुपए का नोट न मिलने के बारे में आईसीआईसीआई बैंक के एक अधिकारी का कहना है कि किसी एटीएम में रुपए स्टोर करने की जो जगह है उस में एक बार में अधिकतम 50 लाख रुपए से अधिक नहीं डाले जा सकते.  अब अगर मशीन में 100 रुपए के नोट डाले जाएं तो 50 लाख रुपए से कम राशि ही डाली जा सकेगी. यही कारण है कि ज्यादातर एटीएम में 500 और 1000 रुपए के ही नोट डाले जाते हैं. 100 रुपए के नोट भी एटीएम में डाले जाते हैं लेकिन कम संख्या में. साफ है, इन्हीं स्थितियों का लाभ उठा कर नकली नोटों का कारोबार फलताफूलता है. Crime Story

Crime Stories: ममता, मजहब और माशूक

crime stories: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली धार्मिक नगरी चित्रकूट में यों तो साल भर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन तीजत्यौहार के दिनों में भक्तों का जो रेला यहां उमड़ता है, उसे संभालने में पुलिस प्रशासन के पसीने छूट जाते हैं. ऐसे में यदि व्यवस्था में जरा सी चूक हो जाए तो पुलिस प्रशासन के लिए समस्या खड़ी कर सकती है. लिहाजा पुलिस व प्रशासन भीड़भाड़ वाले दिनों में अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि व्यवस्था और सुविधाओं में कोई कमी न रह जाए.

इस साल भी जनवरी के दूसरे सप्ताह से ही चित्रकूट में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, जिन का इंतजार पंडेपुजारियों के अलावा स्थानीय व्यापारी भी करते हैं. कहा जाता है कि मकर संक्रांति की डुबकी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक लाभ पहुंचाती है और यदि डुबकी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय लगाई जाए तो हजार गुना ज्यादा पुण्य मिलता है.

14 जनवरी, 2018 को मकर संक्रांति की डुबकी लगाने के लिए लाखों लोग चित्रकूट पहुंच चुके थे. श्रद्धालु अपनी हैसियत के मुताबिक लौज, धर्मशाला व मंदिर प्रांगणों में ठहरे हुए थे. वजह कुछ भी हो पर यह बात दिलचस्प है कि चित्रकूट आने वालों में बहुत बड़ी तादाद मामूली खातेपीते लोगों यानी गरीबों की रहती है. उन्हें जहां जगह मिल जाती है, ठहर जाते हैं और डुबकी लगा कर अपने घरों को वापस लौट जाते हैं.

चित्रकूट में दरजनों प्रसिद्ध मंदिर और घाट हैं, जिन का अपना अलगअलग महत्त्व है. हर एक मंदिर और घाट की कथा सीधे राम से जुड़ी है. कहा यह भी जाता है कि चित्रकूट में राम और तुलसीदास की मुलाकात हुई थी. इन्हीं सब बातों की वजह से यहां लगने वाले मेले में देश के दूरदराज के हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं.

मेले में आए लोग श्री कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा भी जरूर करते हैं. लगभग 7 किलोमीटर की यह पदयात्रा करीब 4 घंटे में पूरी हो जाती है. 14 जनवरी को भी श्रद्धालु श्री कामदगिरि की परिक्रमा कर रहे थे, तभी कुछ ने यूं ही जिज्ञासावश पहाड़ी के नीचे झांका तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं.

इस की वजह यह थी कि पहाड़ी के नीचे की तरफ लगे बिजली के एक खंभे पर एक लड़की की लाश लटकी थी. शोर हुआ तो देखते ही देखते परिक्रमा करने वाले लोग वहां रुक कर लाश देखने लगे.

पुलिस को बुलाने या सूचना देने के लिए किसी को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. क्योंकि भीड़ जमा होने पर परिक्रमा पथ पर तैनात पुलिस वाले खुद ही वहां पहुंच गए. पुलिस वालों ने जब खंभे पर लटकी लड़की की लाश देखी तो उन्होंने तुरंत इस की खबर आला अफसरों को दी. कुछ ही देर में थाना नयापुरा के थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस लाश उतरवाने में लग गई.

पुलिस काररवाई के चलते भीड़ यह निष्कर्ष निकाल चुकी थी कि लड़की अपने घर वालों के साथ आई होगी और खाईं में गिर गई होगी. लेकिन पुलिस ने जब खंभे से लाश उतारी तो न केवल पुलिस वाले बल्कि मौजूद भीड़ भी हैरान रह गई. क्योंकि तकरीबन 11-12 साल की लग रही उस लड़की के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था.

मुंह में कपड़ा ठूंसा होने पर मामला सीधेसीधे हत्या का लगने लगा. पुलिस भी यह मानने लगी कि हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी होगी. क्योंकि अभी तक आसपास के किसी थाने से किसी लड़की की गुमशुदगी की खबर नहीं आई थी.

चित्रकूट में लड़की की लाश मिलने की खबर आग की तरह फैली तो लोग तरहतरह की बातें करने लगे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में बताया गया कि उस लड़की की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 और 201 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

उस वक्त चित्रकूट में बाहरी लोगों की भरमार थी. इसी वजह से लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. फिर भी पुलिस कोशिश में लग गई कि शायद कोई सुराग मिल जाए. अब तक की जांच से यह स्पष्ट हो गया था कि मृतका चित्रकूट की न हो कर कहीं बाहर की रही होगी.

इस तरह के ब्लाइंड मर्डर पुलिस के लिए न केवल चुनौती बल्कि सरदर्द भी बन जाते हैं. इस मामले में भी यही हो रहा था. हत्यारों तक पहुंचने के लिए लाश की शिनाख्त जरूरी थी.

पुलिस वालों ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज देखने का फैसला लिया, लेकिन यह भी आसान काम नहीं था, क्योंकि मकर संक्रांति के वक्त चित्रकूट में सैकड़ों कैमरे लगे हुए थे. यह जरूरी नहीं था कि सभी फुटेज देखने के बाद भी इतनी भीड़भाड़ में वह लड़की दिख जाए. पर सीसीटीवी फुटेज देखने के अलावा पुलिस के पास कोई और रास्ता भी नहीं था.

चित्रकूट में इस हत्या की चर्चा तेज होने लगी तो सतना के एसपी राजेश हिंगणकर ने मामला अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने जांच में जुटी पुलिस के साथ बैठक की और कुछ दिशानिर्देश दिए. पुलिस टीम के लिए यह काम भूसे के ढेर से सुई ढूंढने जैसा था. पुलिस टीम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने में जुट गई. पुलिस की मेहनत रंग लाई.

12 जनवरी, 2018 की एक फुटेज में एक युवक और युवती के साथ वह लड़की दिखी तो पुलिस वालों की आंखें चमक उठीं.

उत्साहित हो कर पुलिस ने और फुटेज खंगालीं तो इस बात की पुष्टि हो गई कि जिस लड़की की लाश पुलिस ने बरामद की थी, वह वही थी जो फुटेज में युवकयुवती के साथ थी. यह फुटेज जानकीकुंड अस्पताल की थी, जहां युवक व युवती मरीजों वाली लाइन में लगे थे.

उस दिन स्नान के लिए वहां लाखों लोग आए थे. इसलिए यह पता लगाना आसान नहीं था कि वह युवक और युवती कहां के रहने वाले थे, इसलिए पुलिस ने ये फुटेज सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिए, जिस से उन तक जल्द से जल्द पहुंचा जा सके.

फुटेज सोशल मीडिया पर डालने के बाद भी पुलिस को उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर हत्यारे का सुराग देने पर 10 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया. इसी दौरान पुलिस वालों ने जानकीकुंड अस्पताल के रजिस्टर की जांच भी शुरू कर दी थी.

अस्पताल में आए मरीज का नामपता जरूर लिखा जाता है लेकिन हजारों की भीड़ में यह पता लगा पाना मुश्किल काम था कि जो चेहरे कैमरे में दिख रहे थे, उन के नाम क्या थे. इस के बाद भी पुलिस वाले नामपते छांटछांट कर अंदाजा लगाने में लगे रहे कि वे कौन हो सकते हैं. इस प्रक्रिया में 25 दिन निकल चुके थे और लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस के हाथ कामयाबी नहीं लग रही थी.

चित्रकूट के लोगों की दिलचस्पी भी अब मामले में बढ़ने लगी थी. उन्हें सस्पेंस इस बात को ले कर था कि देखें पुलिस कैसे हत्यारों तक पहुंचती है और पहुंच भी पाती है या नहीं.

अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज जिन नामों पर पुलिस ने शक किया और जांच की, उन में एक नाम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के विजय और उस की पत्नी आरती का भी था. एसपी के निर्देश पर एक पुलिस टीम विजय के गांव ऐंझी पहुंच गई.

विजय से सीधे पूछताछ करने के बजाय पुलिस ने पहले उस के बारे में जानकारी हासिल की तो एक जानकारी यह मिली कि उस की 10-11 साल की एक बेटी नेहा भी थी, जो लगभग एक महीने से नहीं दिख रही है.

पुलिस ने चित्रकूट से लड़की की जो लाश बरामद की थी, उस की उम्र भी 10-12 साल थी. यह समानता मिलने पर पुलिस की जिज्ञासा बढ़ गई. इस के बाद पुलिस विजय के घर पहुंच गई. उस समय उस की पत्नी आरती भी घर पर मौजूद थी. पुलिस ने जब उन दोनों से उन की बेटी नेहा के बारे में पूछा तो वह बोले कि उन की कोई बेटी नहीं थी, केवल एक बेटा ही है.

उन की बातों से लग रहा था कि वह झूठ बोल रहे हैं क्योंकि उनके पड़ोसियों ने बता दिया था कि इन की 10-11 साल की एक बेटी नेहा थी, जो पता नहीं कहां चली गई है. इसी शक के आधार पर पुलिस विजय और उस की पत्नी आरती को चित्रकूट ले आई.

थाने में उन दोनों से जब पूछताछ शुरू हुई तो दोनों साफ मुकर गए कि उन की कोई बेटी भी है. तब पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई, जिस में उन के साथ 10-11 साल की बच्ची थी. फुटेज देखते ही दोनों बगले झांकने लगे. उसी समय दोनों ने आंखों ही आंखों में कुछ बात की और चंद मिनटों में ही बेटी की हत्या का राज उगल दिया.

पुलिस वाले यह जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि आरती का असली नाम सबीना शेख है और वह मुसलमान है. सबीना की शादी सन 2006 में उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के ही निवासी जाहिद अली से हुई थी. जाहिद से उसे 2 बच्चे हुए, पहली बेटी सिमरन और दूसरा बेटा साजिद जो 5 साल का है.

सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उस के साथ उस की कभी पटरी नहीं बैठी, क्योंकि सबीना किसी और को चाहती थी.

दरअसल सबीना और विजय एकदूसरे को बचपन से चाहते थे, लेकिन सबीना की शादी घर वालों ने उस की मरजी के खिलाफ जाहिद से कर दी थी, इसलिए सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उसे वह दिल से नहीं चाहती थी.

उस ने तो अपने दिल में विजय को बसा रखा था. जब दिल नहीं मिले तो उन के बीच बातबेबात झगड़ा रहने लगा. अपनी कलह भरी जिंदगी सुकून से गुजारने की गरज से सबीना ने शादी के 9 साल बाद विजय को टटोला. उसे यह जान कर खुशी हुई कि विजय उसे आज भी पहले की तरह चाहता है और उसे बच्चों सहित अपनाने को तैयार है.

बस फिर क्या था बगैर कुछ सोचेसमझे एक दिन वह पति को बिना बताए विजय के साथ भाग गई. यह सन 2015 की बात है.  योजनाबद्ध तरीके से दोनों भाग कर ऐंझी गांव आ कर रहने लगे. सबीना अपने बच्चों को भी साथ ले आई थी, जिस पर विजय को कोई ऐतराज नहीं था.

अपने पुराने और पहले आशिक के साथ रह कर सबीना खुश थी. उधर जाहिद ने भी बीवी के गायब होने पर कोई भागदौड़ नहीं की, क्योंकि वह तो खुद सबीना से छुटकारा पाना चाहता था. सबीना अब हिंदू के साथ रह रही थी, इसलिए उस ने खुद का नाम आरती सिंह, बेटी सिमरन का नाम नेहा सिंह और बेटे साजिद का नाम बदल कर आशीष सिंह रख लिया था.

नए पति के साथ खुशीखुशी रह रही सबीना को थोड़ाबहुत डर अपने मायके वालों से लगता था कि अगर उन्हें पता चला तो वे जरूर फसाद खड़ा कर सकते हैं. साजिद उर्फ आशीष ने तो विजय को पापा कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थी. सिमरन उर्फ नेहा चूंकि 10-11 साल की हो चुकी थी, इसलिए वह दुनियाजहान को समझने लगी थी. उस का दिल और दिमाग दोनों विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थे.

आरती की बड़ी इच्छा थी कि नेहा विजय को पापा कहे. इस बाबत शुरू में तो आरती और विजय ने उसे बहुत बहलायाफुसलाया, लेकिन इस्लामिक माहौल में पली सिमरन हमेशा विजय को मामू ही कहती थी. जब इस संबोधन पर सबीना ने सख्ती से पेश आना शुरू किया तो वह सिमरन के इस मासूमियत भरे सवाल का कोई जवाब वह नहीं दे पाई कि आप ही तो कहती थीं कि ये मामू हैं, अब इन्हें पापा कैसे कह दूं. मेरे अब्बू तो दूसरे गांव में रहते हैं.

इस से विजय और सबीना की परेशानी बढ़ने लगी थी. वजह मामू और अब्बा के मुद्दे पर सिमरन बराबरी से विवाद और तर्क करने लगी थी. दोनों को डर था कि यह उजड्ड और बातूनी लड़की कभी भी उन का राज खोल सकती है क्योंकि गांव में कोई इन की असलियत नहीं जानता था. अगर गांव वाले सच जान जाएंगे तो धर्म के ठेकेदार इन का रहना और जीना मुहाल कर देते.

जब लाख समझाने और धमकाने से भी बात नहीं बनी यानी सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं हुई तो खुद सबीना ने विजय को इशारा किया कि इस से तो अच्छा है कि सिमरन का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए. विजय भी इस के लिए तैयार हो गया.

दोनों ने मकर संक्रांति पर चित्रकूट जाने की योजना बनाई और सिमरन से कहा कि वहां तुम्हारी आंखों की जांच भी करा देंगे. सिमरन जिद्दी जरूर थी, पर इतनी समझदार अभी नहीं हुई थी कि सगी मां के मन में पनप रही खतरनाक साजिश को भांप पाती.

12 जनवरी, 2018 को चित्रकूट आ कर दोनों ने जानकीकुंड अस्पताल में सिमरन उर्फ नेहा की आंखों की फ्री जांच करवाई और उस दिन उन्होंने विभिन्न मंदिरों में दर्शन किए. 13 जनवरी, 2018 को इस अंतरधर्मीय परिवार ने चित्रकूट में परिक्रमा की और रात में नरसिंह मंदिर के प्रांगण में आ कर सो गए.

2 दिन घूमनेफिरने के बाद थकेहारे दोनों बच्चे तो जल्द सो गए, लेकिन दुनिया के सामने दोहरी जिंदगी जीते विजय और आरती उर्फ सबीना की आंखों में नींद नहीं थी. रात 12 बजे के लगभग दोनों ने गहरी नींद में सोई नेहा उर्फ सिमरन का गला मफलर से घोंट डाला.

उस के मर जाने की तसल्ली होने के बाद दोनों यह सोच कर लाश को झाडि़यों में फेंक आए कि सिमरन की लाश को जल्द ही चीलकौए और जानवर नोचनोच कर खा जाएंगे और उन के जुर्म की भनक किसी को भी नहीं लगेगी. लाश खाईं में गिराने के बाद वे दोनों बेटे को ले कर गाजियाबाद भाग गए और कुछ दिन इधरउधर भटकने के बाद ऐंझी पहुंच गए.

पहाड़ी से लाश गिराते समय इत्तफाक से नेहा की लाश का बायां पांव खंभे में उलझ गया और लाश लटकी रह गई.

9 फरवरी, 2018 को जब सारे राज खुले तो हर किसी ने इसे वासना के लिए ममता का गला घोंटने वाली शर्मनाक वारदात कहा. बात सच भी थी, जिस का दूसरा पहलू सबीना और विजय की यह बेवकूफी थी कि वे नाम बदल कर चोरीछिपे रह रहे थे.

सबीना जाहिद से तलाक ले कर सीना ठोंक कर विजय से शादी करती तो शायद सिमरन भी विजय को पिता के रूप में स्वीकार कर लेती, पर इसे इन दोनों की बुजदिली ही कहा जाएगा कि धर्म और समाज के दबाव से लड़ने के बजाय उन्होंने एक मासूम की हत्या कर के अपनी जिंदगी खुशहाल बनने का ख्वाब देख डाला. कथा संकलन तक दोनों जेल में थे. Crime Stories

Rajasthan News: पुलिस वाले ने पुलिस से परेशान हो कर खुदकुशी की

Rajasthan News: राजस्थान के नागौर जिले के सुरपालिया थाने के तहत आने वाले एक गांव बाघरासर में रविवार, 21 जनवरी, 2018 की सुबह डीडवाना एएसपी दफ्तर के ड्राइवर कांस्टेबल गेनाराम मेघवाल ने अपनी पत्नी संतोष और बेटे गणपत व बेटी सुमित्रा के साथ फांसी के फंदे पर झूल कर जान दे दी.

21 जनवरी, 2018 को सुबह के 4 बजे गेनाराम के लिखे गए सुसाइड नोट को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया. उस सुसाइड नोट पर गेनाराम समेत परिवार के सभी सदस्यों के दस्तखत थे. 5 पन्नों के उस सुसाइड नोट में एक पुलिस एएसआई राधाकिशन समेत 3 पुलिस वालों पर चोरी के आरोप में फंसाने, सताने व धमकाने को ले कर यह कदम उठाने का आरोप लगाया गया था.

सुसाइड नोट में लिखा था कि मार्च, 2012 में नागौर पुलिस लाइन में रहने वाले एएसआई राधाकिशन सैनी के घर में चोरी हुई थी. राधाकिशन ने गेनाराम, उस के बेटे गणपत और बेटे के दोस्तों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. उन दिनों गेनाराम नागौर में तैनात था. इस मामले में 2 बार एफआईआर हो चुकी थी. लेकिन तीसरी बार यह मामला फिर खुलवा लिया गया. इस के बाद गेनाराम ने कोर्ट में एफआईआर रद्द करने की याचिका लगाई, मगर वह कोर्ट से खारिज हो गई थी.

गेनाराम अपने आखिरी समय में एएसपी दफ्तर, डीडवाना में तैनात था. वहां वह दफ्तर के पास बने सरकारी क्वार्टर में परिवार के साथ रहता था. जांचपड़ताल में यह भी सामने आया  कि गेनाराम और राधाकिशन के बीच गांव ताऊसर में 18 बीघा जमीन को ले कर भी झगड़ा चल रहा था. इस मामले में भी अजमेर पुलिस के अफसरों ने जांच की थी. गेनाराम और उस के परिवार के तनाव की एक खास वजह यह भी थी.

गेनाराम का पिछले कुछ सालों में कई बार तबादला हुआ था. इस के चलते भी वह परेशान था. अपने सुसाइड नोट में उस ने एएसआई राधाकिशन सैनी पर बेवजह परेशान करने का आरोप लगाया था. गेनाराम के खिलाफ चोरी के मामले की जांच कर रहे नागौर सीओ ओमप्रकाश गौतम का कहना है कि मार्च, 2012 के इस मामले की जांच पहले भी सीओ लैवल के कई अफसर कर चुके थे. 2 बार एफआईआर भी कराई गई थी, लेकिन पिछले दिनों यह मामला फिर से खुलवाया गया था.

गेनाराम ने हाईकोर्ट में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कराने के लिए भी याचिका लगाई थी, लेकिन 8 जनवरी, 2018 को कोर्ट ने उस की यह याचिका खारिज कर दी थी. अपने सुसाइड नोट में गेनाराम ने परेशान करने के लिए जिस भंवरू खां का जिक्र किया है, वह रिटायर हो चुका है. गेनाराम के परिवार वालों ने राधाकिशन, उस की पत्नी, भंवरू खां और रतनाराम समेत 3-4 दूसरे लोगों के खिलाफ खुदकुशी करने के लिए उकसाने और दलित उत्पीड़न अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज कराया था.

लोगों ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराने और ताऊसर की 18 बीघा जमीन को सीज करने की मांग की है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि राधाकिशन के घर में मार्च, 2012 में जब पुलिस लाइन, नागौर में चोरी हुई थी. तब राधाकिशन को गेनाराम की पत्नी संतोष ने ही चोरी होने की खबर दी थी. पर राधाकिशन और उस के परिवार ने गेनाराम और उस के बेटे गणपत व उस के साथियों पर ही चोरी करने का आरोप लगा दिया और मुकदमा दर्ज करा दिया.

जुर्म साबित नहीं होने के बाद भी दुराचरण रिपोर्ट भेजी गई. गेनाराम ने सुसाइड नोट में लिखा था, ‘हमारी किसी ने नहीं सुनी.’

इस मामले में तब सीओ द्वारा तलबी लैटर जारी किया गया था. दफ्तर पहुंचने पर राधाकिशन ने गेनाराम को फिर धमकाया. राधाकिशन कई सालों से एक ही दफ्तर में तैनात है. गेनाराम एएसपी दफ्तर में ड्राइवर था. नागौर जिला एसपी दफ्तर में मीटिंग होती थी, तो वही एएसपी को ले कर जाता था. एसपी दफ्तर में ही एएसआई राधाकिशन का दफ्तर था. वह गेनाराम को देखते ही धमकाता था. गेनाराम इस वजह से परेशान हो गया था.

गेनाराम और उस के बीवीबच्चे पढ़ेलिखे थे. उन्होंने क्यों नहीं कानूनी लड़ाई लड़ी? शायद उन की उम्मीद जवाब दे गई थी, तभी उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने में ही भलाई समझी और जहर पीने के बाद फांसी के फंदे पर झूल कर मौत के मुंह में जा पहुंचे. सुसाइड नोट में लिखी बातें पढ़ कर लोग हैरान रह गए कि पुलिस वाला भी पुलिस के कहर से नहीं बच सका. ऐसे पुलिस वालों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई इस तरह पूरा परिवार खत्म न हो.

गेनाराम के बेटे गणपत और बेटी सुमित्रा ने सीकर से पौलीटैक्निक का कोर्स किया था. इस के बाद से वे दोनों मातापिता के साथ डीडवाना में ही रह रहे थे. इस परिवार के बाकी सदस्यों का कहना है कि सुमित्रा की सगाई गांव धीरजदेसर में हुई थी, जबकि बेटे गणपत की सगाई गांव सोमणा में की गई थी.

कांस्टेबल गेनाराम के 10 सवाल, जो उस ने अपने सुसाइड नोट में लिखे थे, अब जवाब मांग रहे हैं :

* चोरी का सारा सामान मिल जाना और एफएसएल भी नहीं उठाना घटना का बनावटी होना जाहिर करता है.

* तांत्रिक के कहने, कांच में चेहरा देखने की बात के आधार पर अनुसंधान करना क्या सही है?

* जांच अधिकारी के सामने राधाकिशन द्वारा गणपत के साथ मारपीट की गई. गवाह होने के बाद भी एफआईआर दर्ज करा देना.

* एसपी दफ्तर में नियम विरुद्ध नौकरी करना.

* पुत्र के साथ मारपीट और बिना वारंट 2 दिन थाने में रखना सचाई पर कुठाराघात है.

* पुत्र गणपत अपराधी था तो उसे थाने में रख कर छोड़ा क्यों गया?

* अनुसंधान अधिकारी राजीनामे का दबाव बनाने में जुटे थे. मामला इसी के चलते पैंडिंग रखा गया.

* जांच में पहले पुत्र और फिर पूरे परिवार पर आरोप लगाना शक पैदा करता है.

* चोरी के सामान में मंगलसूत्र गायब बताया जो महिला हमेशा पहने रहती है.

* महिला ने मंगलसूत्र पहन रखा था तो उसे चोरी हो जाना क्यों बताया?

गेनाराम के पूरे परिवार समेत खुदकुशी करने का पता चला तो राधाकिशन, भंवरू खां और रतनाराम फरार हो गए.

कांग्रेस के संसदीय सचिव रह चुके गोविंद मेघवाल ने बताया, ‘‘दलितों पर जोरजुल्म बढ़ रहे हैं. समाज को एकजुट होना पड़ेगा. यह पुलिस और वसुंधरा सरकार की नाकामी है. हमारा समाज इस पर विचार कर रहा है.’’ Rajasthan News

Punjab Murder Case: पत्नी को गंडासे से काट डाला

Punjab Murder Case: एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया. एक पति ने शक के चलते अपनी ही पत्नी की बेरहमी से हत्या कर दी. आखिर ऐसा क्या हुआ कि बात इतनी बढ़ गई? किस वजह से एक हंसताखेलता परिवार खूनखराबे में बदल गया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली घटना की पूरी कहानी, जो रिश्तों में पनपते अविश्वास के खतरनाक परिणामों से सावधान करती है.

यह वारदात पंजाब के संगरूर जिले के पास स्थित गांव खंडेबाद की है. मंगलवार को गांव में उस समय हड़कंप मच गया जब कुलदीप सिंह ने अपनी पत्नी हरकीरत कौर उर्फ गीतू पर घर के बेडरूम में तेजधार गंडासे से ताबड़तोड़ हमला कर दिया. पत्नी के चरित्र पर संदेह को ले कर दोनों के बीच तनाव बताया जा रहा है. गुस्से में आ कर कुलदीप ने एक के बाद एक वार किए, जिस से हरकीरत की मौके पर ही मौत हो गई.

हैरानी की बात यह है कि वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी ने घटना का वीडियो भी बनाया. वीडियो में उस ने अपना जुर्म कुबूल किया और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया. इस के बाद वह खुद थाना लहरागागा पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया.

घटना की सूचना मिलते ही डीएसपी रणबीर सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे. बेडरूम का दृश्य दिल को झकझोरने वाला था. खून से लथपथ शव बिस्तर के पास जमीन पर पड़ा था, जबकि पास में ही वारदात में इस्तेमाल किया गया गंडासा भी मिला. पुलिस ने तुरंत शव और हथियार को कब्जे में ले कर आगे की काररवाई शुरू की. फोरैंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर साक्ष्य जुटाए और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुलदीप सिंह गांव के पूर्व कार्यकारी सरपंच तरसेम सिंह का बेटा है. उस की शादी हरकीरत कौर के साथ हुई थी और दोनों के 3 बच्चे हैं. 2 बेटियां और एक बेटा. शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी लंबे समय से अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करता था. इसी शक ने आखिरकार इस खौफनाक वारदात का रूप ले लिया.

फिलहाल पुलिस ने कुलदीप सिंह के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जांच जारी है. Punjab Murder Case

UP Crime News: अवैध संबंधों के चलते पति की कुल्हाड़ी से हत्या

UP Crime News: एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिस ने पारिवारिक रिश्तों को झकझोर कर रख दिया. आरोप है कि पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी. आखिर ऐसी क्या वजह बनी थी कि मामला हत्या तक पहुंच गया? इस सनसनीखेज वारदात के पीछे की पूरी कहानी क्या है? आइए जानते हैं विस्तार से, ताकि रिश्तों में पनपते अविश्वास और गलत फैसलों के खतरनाक परिणाम समझे जा सकें.

यह घटना उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से सामने आई है. जहां रात के समय पूजा ने अपने प्रेमी अर्पित के साथ मिलकर पति रनवीर सिंह यादव पर कुल्हाड़ी से हमला कर हत्या कर दी. बताया जाता है कि करीब 8 साल पहले रनवीर की शादी मथुरा निवासी पूजा से हुई थी. वैवाहिक जीवन की शुरुआत से ही दोनों के संबंध तनावपूर्ण रहे. कुछ समय बाद पूजा मायके चली गई थी. करीब 3 साल बाद रनवीर उसे समझाकर वापस अपने साथ ले आया था.

गांव में रहने वाले अर्पित, जो सर्वेश का बेटा है, का उस के घर पर आनाजाना था. इसी दौरान पूजा और अर्पित के बीच नजदीकियां बढ़ीं. पति की गैरमौजूदगी में मुलाकातें बढ़ती गईं और दोनों के संबंधों की चर्चा धीरेधीरे गांव में फैलने लगी. जब रनवीर को इन संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने इस का विरोध किया.

एएसपी (ग्रामीण) श्रीशचंद्र के अनुसार, रविवार को कथित तौर पर पूजा ने अर्पित को घर बुलाया. पहले रनवीर को शराब पिलाई गई और फिर रात करीब 8 बजे उस पर घर के भीतर कुल्हाड़ी से कई वार किए गए. हमले की गंभीरता के चलते रनवीर की मौके पर ही मौत हो गई.

सोमवार सुबह जब उस के पिता लाखन सिंह घर पहुंचे तो उन्होंने चबूतरे पर बेटे का खून से लथपथ शव पड़ा देखा. पास ही खून से सनी कुल्हाड़ी भी पड़ी थी.  घटना के बाद पूजा और अर्पित फरार हो गए थे.

मृतक के भाई प्रदीप उर्फ लालू की शिकायत पर पुलिस ने पूजा, उस के प्रेमी अर्पित और अर्पित के पिता सर्वेश के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है. आरोपियों की तलाश में 3 पुलिस टीमें गठित की गईं. मंगलवार सुबह करीब सवा 10 बजे भरथनाबिधूना रोड स्थित अहनैया नदी के पास से पूजा और अर्पित को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ के दौरान पूजा ने स्वीकार किया कि अवैध संबंधों का पति द्वारा विरोध किए जाने के कारण उस ने साजिश रचकर यह कदम उठाया. फिलहाल पुलिस मामले की विस्तार से जांच कर रही है. UP Crime News

Social stories: एक नया कौंसेप्ट भाबीजी घर पर हैं

Social stories: आजकल टीवी मनोरंजन का सब से बड़ा साधन है. लेकिन टीवी पर अच्छे मनोरंजक प्रोग्राम कभीकभी ही नजर आते हैं. ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ऐसा सीरियल है, जिसे हर दृष्टि से मनोरंजक कहा जा सकता है. साथ ही सोद्देश्य भी.

टी वी जिसे दूरदर्शन के जमाने में बुद्धू बक्सा कहा जाता था, अब बुद्धू नहीं रहा. बुद्धू इसलिए नहीं क्योंकि अब यह स्मार्ट बन कर मोटी कमाई करने लगा है. लाखों लोगों की रोजीरोटी चलाने लगा है. और हां, अच्छे पढ़ेलिखों को बेवकूफ भी बनाने लगा है. कमाई को देखते हुए अब कभी के इस बुद्धू बक्से पर दर्जनों इंटरटेनमेंट चैनल आ गए हैं. न्यूज चैनलों की तो भरमार है ही. टीवी पर तमाम प्रोग्राम बने हैं, बन रहे हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लेकिन अपनेअपने कंटेंट के हिसाब से चलते सब हैं. वैसे यह सब भी चैनल्स पर निर्भर करता है कि किस प्रोग्राम को कितने दिन चलाना है, दर्शकों पर नहीं. अब कलर्स के ‘बालिका वधू’ को ही ले लीजिए, जो एक अच्छे उद्देश्य, अच्छी कहानी और अच्छे कलाकारों के साथ शुरू हुआ था.

लोगों ने इसे पसंद भी किया लेकिन अब बोझ से लगने वाले इस सीरियल को चैनल रबर की तरह खींचे जा रहा है. टीआरपी से भी उसे कोई लेनादेना नहीं. कहानी तो मूल कहानी से भटक कर कहीं से कहीं चली ही गई, कलाकार भी वक्तवक्त पर बदलते रहते हैं. शुरू की बालिका वधू भी अब जवान हो गई.

ऐसा नहीं है कि दूरदर्शन या दूसरे चैनल्स पर अच्छे प्रोग्राम्स नहीं आते. कई यादगार सीरियल्स आए. दूरदर्शन के ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’, ‘ये जो जिंदगी’, ‘कथा सागर’ और ‘तमस’ को भला कौन भूल सकता है. जहां सवाल दूसरे इंटरटेनमेंट चैनल्स का है तो उन पर सिर्फ इंटरटेनमेंट (उन के हिसाब से) रचा जाता है. इस इंटरटेनमेंट में अगर आप समाज या परिवार के लिए कोई मैसेज ढूंढने लगें तो यह सिर्फ एक छलावा ही साबित होगा. अलबत्ता भव्यता जरूर आप को प्रभावित करेगी.

भव्यता इसलिए क्योंकि यह व्यवसाय का एक हिस्सा है. विज्ञापन देने वाली कंपनियों को अपना प्रचार कर के अपने प्रोडक्ट बेचने होते हैं. जाहिर है, सौंदर्य प्रसाधन सजीधजी महिलाओं को देख कर खरीदे जाते हैं और घरेलू प्रोडक्ट जगमगाते बड़ेबड़े घरों को देख कर पसंद किए जाते हैं. इस चक्कर में सीरियल्स की कहानी कहीं गौण हो जाती है, रह जाते हैं गोलगोल घूमते दृश्य. रियलिटी शोज और कौमेडी शोज का हाल भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन के अपने अलग दर्शक होते हैं. जहां सवाल कौमेडी शोज का है तो इन में दर्शकों को हंसाने के नाम पर ज्यादातर अश्लीलता ही परोसी जाती है. लाफ्टर चैलेंज, कौमेडी सर्कस सीरीज, कौमेडी क्लासेज, कौमेडी नाइट्स बचाओ जैसे कौमेडी शोज में ह्यूमर नाममात्र का और अश्लीलता अधिक नजर आती थी.

हां, कपिल शर्मा का ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ अपने कौंसेप्ट और कपिल की माइंड औफ प्रजेंस की वजह से कामयाब जरूर रहा. लेकिन अब इस में भी सेंस और ह्यूमर की कमी नजर आने लगी है. कह सकते हैं कि इस से भी अब दर्शकों का मोह भंग होने लगा है. इसी सब के बीच 2 मार्च, 2015 से एंड टीवी पर एक शो शुरू हुआ है, ‘भाबीजी घर पर हैं’. कौमेडी टच वाले इस शो में लंपटपन तो है लेकिन सेंस औफ ह्यूमर भी है. खास बात यह है कि इस शो में कलाकारों का चयन बहुत सोचसमझ कर किया गया है.

मसलन, शिल्पा शिंदे यानी अंगूरी सीधीसादी खूबसूरत महिला के रूप में एक अलग ही तरह का करेक्टर है, जो अंगरेजी के शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाती. जब उस का पति जगमोहन तिवारी या लंपट पड़ोसी विभूति नारायण मिश्रा उस के गलत उच्चारण को सही करते हैं तो अनायास उस के मुंह से निकल जाता है ‘सही पकड़े हैं’. सही मायनों में देखा जाए तो यही तीन शब्द अंगूरी के करेक्टर की जान हैं.

वैसे बात बोलने के अंदाज की हो, अदाओं की हो या फिर चलनेफिरने की. निस्संदेह शिल्पा शिंदे ने अपने करेक्टर के लिए बहुत मेहनत की होगी. सीरियल की दूसरी महिला यानी अनीता भाभी का करेक्टर भी भूमिका के हिसाब से कम नहीं है. ग्रूमिंग क्लास चलाने वाली यह महिला स्टाइलिश भी है और अपने निठल्ले पति विभूति को अपने कंट्रोल में भी रखती है. यह भूमिका सौम्या टंडन ने निभाई है जो पहले ही कई शो कर चुकी हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ के सब से मंझे हुए कलाकार हैं आशिफ शेख, जो करीब 65 फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं. अंगरेजी, उर्दू और हिंदी तीनों ही भाषाओं पर उन की अच्छी पकड़ है. विभूति नारायण मिश्रा की भूमिका को वह एक लंपट पति के रूप में बखूबी निभा रहे हैं. अंगूरी के पति जगमोहन तिवारी की भूमिका रोहिताश गौड़ ने निभाई है. रोहिताश भी दर्जनों फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ का कौंसेप्ट दरअसल इस अधार पर रखा गया है कि पत्नी भले ही कितनी खूबसूरत और सुशील क्यों न हो, लंपट पति पड़ोसी की पत्नी पर लाइन मारने से बाज नहीं आता. इस सीरियल में भी कुछ ऐसा ही है. विभूति नारायण मिश्रा की नजर मनमोहन तिवारी की पत्नी अंगूरी पर है और मनमोहन तिवारी की निगाह विभु की पत्नी अनीता पर. जाहिर है, दोनों ही लंपट स्वभाव के हैं, लेकिन अंदर ही अंदर संस्कारी भी हैं. इसी वजह से दोनों में से कोई भी अपने मन की बात नहीं कह पाता. दूसरी ओर दोनों महिलाएं पूरी तरह संस्कारी भी और अपनेअपने पतियों को प्यार करने वाली भी हैं. इसलिए जरूरत पड़ने पर दोनों मिल कर अपने ढंग से बिगड़े हुए पतियों को लाइन पर भी लाती हैं.

इस सीरियल का तानाबाना पड़ोसी की पत्नी पर नजर रखने वाले पतियों की पंचलाइन के साथ बुना गया है. कहानी कोई एक नहीं है. हर दूसरे तीसरे एपीसोड के बाद कहानी बदल जाती है. विषय भी सामाजिक और आम आदमी की जिंदगी से जुडे़ होते हैं, जिन्हें चंद कलाकारों के माध्यम से रोचक बनाने की कोशिश की जाती है. पृष्ठभूमि चूंकि कानपुर की रखी गई है, इसलिए ज्यादातर जगहों पर स्थानीय भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है. छोटी सी जगह, दो मामूली से घरों, चाय की दुकान और एक गली को सेट बना कर ऐसा धारावाहिक खड़ा करना जिसे सब पसंद करें, आसान नहीं है.

विभूति नारायण मिश्रा और मनमोहन तिवारी, जिस का कच्छेबनियान का बिजनैस है, एकदूसरे को कभी नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं तो कभी एकदूसरे को उस की बीवी की नजरों में गिराने की, ताकि वे एकदूसरे की बीवी की नजरों में श्रेष्ठ बन जाएं. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं मात खानी पड़ती है. कहानी को आगे बढ़ाने के लिए सीरियल में बीचबीच में दूसरे करेक्टरों को भी लाया जाता है. इन में एक करेक्टर है सक्सेना, जिस ने खुद को पागल घोषित कर रखा है और पागलपन के लिए बिजली के शाक लेता है. कोई उसे थप्पड़ मारता है तो वह ‘आई लाइक इट’ बोलता है यानी उसे पिटने से शाक मिलता है जो उसे अच्छा लगता है.

उस का बोलने का अंदाज और मासूमियत भरी हास्यप्रद बातें सहज ही प्रभावित करती हैं. दूसरा करेक्टर है दरोगा हप्पू सिंह का, जिस के माथे पर तेल वाले बालों की लटें लटकी रहती हैं. दरोगा हप्पू सिंह जब अपने 9-9 ठैंया बच्चों और प्रेग्नेंट बीवी के नाम पर न्यौछावर मांगता है तो उस के इस अंदाज में रिश्वत मांगना नहीं, बल्कि हास्य का पुट ज्यादा नजर आता है. उस के इस तरह रिश्वत मांगने पर कानूनव्यवस्था पर गुस्सा नहीं आता बल्कि हप्पू सिंह पर प्यार आता है. हप्पू सिंह का उठतेबैठते ‘अरे दादा’ बोलना भी एक अलग तरह का हास्य और चुटीलापन पैदा करता है. साथ ही अनीता को गोरी मैम कहना भी, जिसे सुन कर विभूति नारायण मिश्रा चिढ़ता है.

कहानी आगे बढ़ाने के लिए दो छिछोरों मलखान और टेका के अलावा एक सब्जी वाले को भी रखा गया है, जिन के रोल तो खास नहीं हैं, पर मन को भाते हैं. लेखक ने अपनी कल्पना का कमाल दिखाया है 2 करेक्टरों को रचने में. इन में एक है रिक्शावाला पेलू जिस के चेहरे पर कोई भाव नहीं आता, जो बोल नहीं सकता. अलबत्ता कुछ पूछने पर वह अपने कानों पर बंधे अंगोछे से कागज की परची निकाल कर देता है जिस पर कुछ न कुछ चुटीला लिखा होता है. मानो उसे पहले ही पता हो कि उस से क्याक्या पूछा जा सकता है. पेलू का करेक्टर बिना भाव, बिना कुछ बोले भी बहुत कुछ कह जाता है.

दूसरा करेक्टर है मनमोहन तिवारी की मां का जो कहीं दूर अलग रहती हैं और अपनी बहू अंगूरी को बहुत प्यार करती हैं. तिवारी मां से बहुत डरता है जबकि अंगूरी मां को ही पति के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है. तिवारी की मां भले ही एक फ्रेम में नजर आती है, पर वह उसी में ऐसा कुछ कर जाती है कि हास्य खुद उभर आता है. मसलन छज्जे पर खड़े हो कर अंगूरी से बतियाना, तिवारी को बैल कहना, बात खत्म होते ही उस के हाथ से टकरा कर कोई चीज नीचे गिरना, नीचे किसी का चिल्लाना और उस का तुरंत वहां से हट जाना, जैसी बातें अलग तरह का हास्य पैदा करती हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ में कहींकहीं तो इतने अच्छे पंच होते हैं जो मानव मन पर गहरे तक असर करते हैं. मसलन, इस सीरियल के एक एपिसोड में अनीता भाभी ब्लड डोनेशन कैंप लगाती है. उस के पति के अलावा सभी अनीता को प्रभावित करने के लिए ब्लड डोनेट करते हैं. उस का खास आशिक तिवारी तो 2 बार बेहोश हो जाने के बाद भी कई बार ब्लड डोनेट करता है.

इस मामले में दरोगा हप्पू सिंह भी पीछे नहीं रहता. वह एक कैदी का 2 बोतल खून निकलवा कर ले आता है और उसे अपना बताता है. उधर कैदी कहता है, ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, लेकिन आजकल तो लोग खून चूस कर भी आजाद नहीं करते.’

यह बात नेताओं और अफसरों के लिए बहुत सटीक है.

खास बात यह है कि दो लंपट पुरुषों और उन की पत्नियों के इर्दगिर्द बुनी गई सामाजिक सरोकार वाली इस सीरियल की कहानियों में भले ही कुछ खास न हो पर अश्लीलता बिलकुल नहीं है. हां, चुटीलापन जरूर है जो दर्शकों को बांधे रखता है. कई सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी इस में नजर आता है. किसी भी विषय को इस तरह संदेश के साथ हास्य में बांध देना हंसीखेल नहीं है. आज के समय में जब अच्छे सीरियल्स देखने को नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में यह सीरियल ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ताजे हवा के झोंके की तरह है जो मनोरंजन की प्राणवायु देता है. साथ ही यह भी बताता है कि भव्यता से इतर कम संसाधनों में भी अच्छा काम किया जा सकता है. बस करने वाला चाहिए.  Social stories

Hindi Kahani: छिताई का कन्यादान

Hindi Kahani: राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. वह दिन में अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. दोनों का प्रेम अमर था. लेकिन सुलतान अलाउद्दीन ने छिताई पर नजर डाली तो सब कुछ गड़बड़ा गया. इस के बावजूद दोनों मिल कर ही रहे.

सुलतान अलाउद्दीन खिलजी बुरी तरह फंस गया था. उसे गुमान नहीं था कि यादव राजा रामदेव की दासियां इतनी तेज हैं कि उड़ती चिडि़यों को पहचान ही नहीं लेतीं, जमीन से उन के कान भी काट लेती हैं. अलाउद्दीन अपना नाम सुन कर भागना चाहता था, मगर वह औरत जो दासी मालूम पड़ती थी, उस से अधिक फुर्तीली निकली. उस ने अपनी कमर में बंधी कमंद को भागने वाले पर निशाना लगा कर फेंका. भागने वाला कमंद में फंस कर रह गया. उस की मुश्कें कस चुकी थीं और वह अपनी कमर में एक ओर बंधे नेजे को निकाल नहीं पा रहा था.

तब तक वह औरत एकदम रूबरू आ खड़ी हुई. बोली, ‘‘कटारी मेरे पास भी है बादशाह सलामत. हथियार मत इस्तेमाल कीजिए वरना पछताइएगा. मैं जरा भी आवाज दूंगी तो हमारे सिपाही दौड़े आएंगे. आप के इस तरह पकड़े जाने पर आप की फौज को भागने का रास्ता न मिलेगा, जान लीजिए.’’

अलाउद्दीन खूब अच्छी तरह जानता था कि वह चालाक औरत एकदम सही कह रही थी. उस के पकड़े जाते ही लड़ाई का पासा पलट जाएगा. चाहे बाद में दिल्ली की फौज उसे छुड़ा ले, इस राज्य को नूस्तनाबूद कर दे, मगर उस पर जो धब्बा लग जाएगा, वह फिर न मिटेगा. यह भी हो सकता है कि राजा रामदेव उसे हाथियों से कुचलवा दें या भयानक खाई में फेंकवा दें. वह एकबारगी सिहर उठा. उस ने अपनी हेकड़ी में अकेले इधर आ कर कितनी बड़ी गलती की है. राघो (राघव) चेतन से अलाउद्दीन का प्रस्ताव सुन कर राजा रामदेव का उबल पड़ना बिलकुल वाजिब था.

राघव ने मना किया था कि वह सांप के बिल में न घुसे. मगर सुलतान को अपनी सूझबूझ और बहादुरी पर कुछ ज्यादा ही इत्मीनान हो गया था. अब वह क्या कर सकता था, सिवाय गिड़गिड़ाने के. न जाने यह शैतान की खाला क्या गुल खिलाएगी?

चापलूसी और चालाकी में अदाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप तो बेकार नाराज हो रही हैं. मैं तो शिकार करने आया था. सोचा, कोई परिंदा है. इसी वास्ते लपका था. बताइए, मैं आप की क्या खिदमत कर सकता हूं?’’

उस दासी ने, जिस का नाम मैनरूह था, जवाब दिया, ‘‘सेवा तो हमारे महाराज आप को बताएंगे. मैं क्या बताऊंगी? बस, अब आप चले चलिए चुपचाप.’’

बड़ी आजिजी से अलाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप खामखा नाराज हो रही हैं. शाम हो रही है. मुझे नमाज पढ़ना है. आप जानती हैं. मशहूर है, मैं दीन ईमान का पाबंद और मजहबी सुलतान हूं. मैं इस वक्त खजाने के साथ तो नहीं आया. मगर मेरा ईमान मेरे साथ है. मैं आप को रानी बना दूंगा. जितनी चाहिए, दौलत मैं आप को दे दूंगा. गले का हार बतौर इत्मीनान अभी दे दूंगा. बस मुझे आजाद कर दीजिए.’’

दासी मैनरूह ने सख्ती से उत्तर दिया, ‘‘सुलतान, माफ करना, जिस इंसान को जिस चीज की भूख होती है, उसे वही हर कदम पर याद आती है. आप के पास अगर सही मायने में दौलत होती तो आप मुझे यह लालच न देते. मेरे महाराज ने आज तक किसी को इस तरह का लालच नहीं दिया, क्योंकि देवगिरि देवताओं और ऋषियों का बसाया है. यहां जीने वाली ताउम्र रानी रहती है. मुझे क्या कमी है, जो आप मुझे देंगे? आप को महाराज के सामने जरूर ले जाऊंगी. वही न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन एकदम घबरा उठा. उसे यह अंदाज हो गया था कि यह दासी गरीब हो या न हो, मगर अपने मजहब में और अपने स्वामी राजा रामदेव में विश्वास रखती है. उस ने चट दूसरा पासा फेंका, ‘‘आपा जान, आप ने मेरी बात समझी नहीं. मैं आप को आप के ईमान से रत्ती भर नहीं डिगाना चाहता. आप सोचिए, एक बहन के जरिए एक सुलतान को बेबस बना कर दरबार में पेश किया जाए तो क्या उस के लिए यह डूब मरने की बात नहीं है? मैं इसी तालाब में कूद कर जान दे दूंगा, मगर अपनी शान में हरगिज बट्टा नहीं लगने दूंगा. आप मुझे जिंदगी नहीं दे सकतीं, तो क्या? आप मेरी मौत नहीं रोक सकतीं. अगर ऐसा हो गया तो आप को आप की सौगंध है, आप हमेशा अपने पाप में झुलसती रहेंगी. एक मजहबी सुलतान को आप ने बिना लड़े या चेतावनी दिए धोखे से पकड़ लिया है.’’

मैनरूह एक बार कांप गई. अगर अलाउद्ीन तालाब में कूद पड़ा, या उस ने हीरा चूस लिया या सीने में छुरी घोंप ली और मर गया तो इस का पाप किसे लगेगा? उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं नहीं, तुम हमारे महाराज का भेद लेने यहां आए थे. मैं पेश कर दूंगी. वही तुम्हारा न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन के मन में उम्मीद जगी. बोला, ‘‘अगर मुझे भेद लेने के लिए आना होता तो खुद अकेले बिना तलवार क्यों आता? मैं तो आप लोगों के ईमान को जानता हूं. आप कभी किसी निहत्थे को नहीं छुएंगे. यह आप के धरम का कौल है. भेद लेने के वास्ते मैं भेष बदल कर अपने लोगों को भेजता. मैं तो बस चिडि़यों का शिकार करता हुआ यहां आया था. आप ने देखा होगा बड़ी बी.’’

मैनरूह बोली, ‘‘मैं तो बस यही जानती हूं कि आप का न्याय अब हमारे महाराज करेंगे.’’

अलाउद्दीन ऐसे उछला, जैसे वह कमंद सहित लहराते तालाब में कूद जाएगा. कहने लगा, ‘‘बस, मैं ने जान लिया. मेरी जिंदगी आज तक की थी. मेरी मौत का पाप आप के सिर. अलविदा.’’

मैनरूह फिर घबराई. बोली, ‘‘सुलतान, आप उतावले क्यों हैं? मैं महाराज के पास ले चलती हूं.’’

अलाउद्दीन रुआंसा हो कर बोला, ‘‘अगर महाराज के सामने जा सकता तो आप से दया की भीख क्यों मांगता? आप को अपनी बहन बनाया. आप अपने बड़े भाई की इज्जत को खाक मत कीजिए. आप यही चाहती हैं कि मैं घेरा उठा लूं. मैं अपनी फौज ले कर यहां से चला जाऊंगा.’’

मैनरूह चाहती तो यही थी. खुद महाराज रामदेव भी यही चाहते थे. मगर मैनरूह महाराज की प्रजा ही नहीं थी, बल्कि राजकुमारी छिताई की दासी भी थी. सब से बढ़ कर वह एक औरत होने से उस की पीड़ा को जानती थी. उस ने रुखाई से कहा, ‘‘बहन बनाया है तो यही मेरी इच्छा नहीं है. इस से भी बड़ी इच्छा है. वह पूरी होनी हो तो बताऊं.’’

अलाउद्दीन के बहुत आग्रह करने पर उस ने कहा, ‘‘राजकुमारी छिताई मेरी बेटी की तरह है. आप भी उसे अपनी बेटी मानिए और दोस्ती कर के तब आदर से जाइए.’’

अलाउद्दीन एकदम आसमान से गिरा. छिताई ही नहीं मिली तो इस जद्दोजहद से क्या हासिल? तो भी वह आजाद तो होना ही चाहता था. उस का खून खौल रहा था. मगर किसी तरह इस खूसट औरत को टालना भी था. उस ने कहा, ‘‘जब तुम कहती हो तो इस में कौन सी मुश्किल है. मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं.’’

मैनरूह अलाउद्दीन से भी चालाक निकली. दृढ़ता से बोली, ‘‘बादशाह, इस में एतबार की तो नहीं, इत्मीनान की बात है. आप उस मसजिद की ओर रूबरू हो कर कुरान पाक की कौल ले कर कहिए कि छिताई को मैं अपनी बेटी मानता हूं. तभी मैं हुजूर को छोड़ पाऊंगी.’’

अलाउद्दीन दांत पीस कर रह गया. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. अंधेरा होता जा रहा था. चारों तरफ वे परिंदे हौसले से बोल रहे थे, जिन का शिकार करने वह आया था. लगा, जैसे वे उस की बेबसी पर कलरव कर रहे हों. क्यों वह इस शहर की चहारदीवारी में आया? उसे क्या मालूम था कि यादव राजा रामदेव तो सीधा है, मगर उस के कारकुन बाज की मानिंद चालाक हैं. वह इस एकांत बाग में चिडि़यों का शिकार खेलने लगा. शिकार के बजाय शैतान की खाला गले पड़ी, जिसे इसलाम के सब कायदेकानून मालूम हैं. अगर इस ने इस वक्त राजा रामदेव के सामने उसे खड़ा कर दिया तो बेशक वह उस के सर को कलम करा देगा.

अपनी लड़की के बारे में राघव चेतन की बात सुन तो वह बिफर रहा होगा. सुलतान ने हड़बड़ा कर मसजिद की तरफ मुंह किया और बोला, ‘‘मैं अपने रसूल व कुरान पाक की कसम उठाता हूं, मैं हमेशा छिताई को अपनी बेटी की मानिंद मानूंगा.’’

यह सुन कर मैनरूह बहुत खुश हुई. उस ने झुक कर सलाम किया और सविनय अपनी गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगते हुए सुलतान के बंधन खोल दिए. आजाद होते ही एक बार फिर अलाउद्दीन का खून खौल उठा. उस के जी में आया, कमर के नेजे को निकाल कर अभी इस औरत को मार डाले. मगर उस ने अपने को रोका. अगर यह एक बार भी चीखी तो दर्जनों लोग आ कर अलाउद्दीन को पकड़ लेंगे. अगर न भी चीख पाए तो उस के खून के कुछ धब्बे उस के कपड़ों पर पड़ेंगे, जिस से बादशाह फिर खतरे में पड़ सकता है. किले की घेरेबंदी में होने से तमाम चौकसी चारों तरफ होगी. खून का घूंट पी कर सुलतान बोला, ‘‘बड़ी बी, आप ने वही किया, जो आप का फर्ज था. अब आप मुझे महफूज बाहर निकलने में मदद कीजिए.’’

मैनरूह ने फिर क्षमा मांगी. बोली, ‘‘आप ने मुझे बहन कहा तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आप की सहायता करूं. बस आप कुछ बोलिएगा नहीं. मुझे सब पहचानते हैं. मुझे कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

मैनरूह चलने लगी. पीछे चलते सुलतान को फिर नेजे का खयाल कौंधा. मगर उस ने मन मार लिया. उल्टे उस ने एक मोती की माला निकाली और मैनरूह को नजर करनी चाही. मगर उस सजग दासी ने कान पकड़ कर कहा, ‘‘हुजूर, आप ने मुझे बहन का रिश्ता बख्शा, मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

बारबार कहने पर भी दासी ने स्वीकार नहीं किया. बोली, ‘‘जब आप दिल्ली बुलाएंगे तो ले लूंगी.’’

सचमुच मैनरूह का सब अदब कर रहे थे. उस ने गेट खुलवाया. शहर के फाटक से बाहर होते ही अलाउद्दीन जो भागा तो उस ने अपनी छावनी में जा कर ही दम लिया. वहां उस की खोज हो रही थी. उस शाम जो गुजरी, उस ने ताउम्र किसी के सामने उस का खुलासा नहीं किया. उस ने इस बात का बारबार शुक्र अदा किया कि पकड़ लिए जाने पर भी मैनरूह ने उस की बिना किसी को कानोंकान खबर हुए रिहाई करा दी थी.

जब अलाउद्दीन ने खापी लिया तो राघव चेतन लौट आया. बादशाह को बाखैरियत देख कर उस की जान में जान आई. उस की आपबीती बहुत खराब थी. राजा रामदेव आपे से बाहर हो गया था. किसी म्लेच्छ को कन्यादान करना उस की कल्पना के बाहर था. तो भी उस ने दूत के नाते राघव चेतन को जाने दिया था. दूतियां उस के बाद लौटीं. उन्होंने बताया कि औरों की तरह रामदेव के रनिवास में भी सब मरने को तैयार हैं, परंतु मुसलमानों के हाथ में पड़ने को नहीं. चित्तौड़ में पद्मिनी के जौहर और रणथंभौर में राजपूतों के बलिदान को वह भूला नहीं था. जब छिताई नहीं मिलनी है तो घेरा डालने से क्या फायदा? देवगिरि को लूटने का काम तो वह बरसों पहले ही कर चुका था. सोते समय वह सारी बातों पर विचार करने लगा.

कई साल हो गए. उस ने पहलेपहल नुसरत खां को सेनापति बना कर देवगिरि को खूब लूटा था. फिर वह राजा रामदेव को भी दोस्ती का लालच दे कर दिल्ली ले गया था. बीती बातें उस के मन में कौंध रही थीं…

पराजय की चिंता में राजा रामदेव ने दौलत देने में कसर नहीं की थी. अलाउद्दीन रामदेव को मोहरा बना कर दक्खिन की अकूत दौलत, जो दक्खिनी राजाओं के पास थी, हासिल करना चाहता था. रामदेव बूढ़ा हो रहा था, सोचता था कि अलाउद्दीन से आश्रय पा कर वह पड़ोसी राजाओं को दबा सकेगा. अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपने सिपहसालार उलूम खां को राजा के स्वागत में भेजा था और दरबार में खूब आवभगत की थी.

दरबार के स्वागतसत्कार, ठाठबाट और रागरंग में 3 साल बीत गए. रामदेव को पता ही नहीं चला. जब देवगिरि से रानी का दूत आया तो उसे होश हुआ. राजकुमारी छिताई समय के साथ सयानी होती जा रही है. राजा के अनुरोध को अलाउद्दीन मान गया. विदाई के समय राजा ने देवगिरि के राजप्रासाद को सज्जित कराने की दृष्टि से एक चित्रकार की मांग की, क्योंकि दिल्ली के महलों में चित्रकारी देख कर वह प्रफुल्लित हुआ था. सुलतान ने अपना खास चित्रकार साथ भेजा. लौट कर राजा ने जब बेटी को देखा तो चौंका. 3 साल में ही राजकुमारी कितनी यौवन संपन्न हो गई थी.

राजा ने पुराने भवनों के साथ नए प्रासाद का भी निर्माण करा कर पौराणिक ग्रंथों के विविध प्रसंगों को अपनी इच्छा से चित्रित कराया. चित्रकार नए चित्रों में नए रंग भरता तथा नई आकृतियां अंकित करता रहता था. मन में बसे चित्रों की छवि को वह तूलिका के जादू से अधिक ललित, जीवंत एवं मनोहर बना कर प्रस्तुत कर देता था. एक दिन वह तन्मय हो कर चित्र बना रहा था कि उस की दृष्टि पार्श्व के द्वार पर गई. दमकते सौंदर्य तथा छलकते यौवन की साक्षात स्वामिनी खड़ी थी. उस ने बहुत सुंदरता को सिरजा था, मगर आज विधाता की इस चपल, नवल तथा विरल सृष्टि को निहार कर चकित रह गया था. जिस तन्मयता से वह चित्र की सृष्टि में लीन था, उतना ही वह लालित्य की देवी उस क्षणक्षण संवरती कृति को निहारने में खोई थी.

जैसे ही चित्रकार का ध्यान भंग हुआ और उस ने पीछे देखा, वैसे ही वह सुंदरी जल में फिसलती मीन की तरह अंतराल में विलीन हो गई. चित्रकार के मन में उस अनुपम सौंदर्य को चित्रित करने की लालसा घर कर गई. चित्रकार को यह आभास हो गया था कि वह राजकुमारी छिताई थी. चित्रकार दरबार के साथ ही अंत:पुर में भी चित्र बना रहा था. अतएव उस ने फिर से उस दमकते सौंदर्य का दर्शन कर लिया और इस बार उस ने पूरी सजगता से चुपचाप छिताई की छवि अपनी तूलिका से उतार ली और चित्र को अपने पास रख लिया.

इस बीच राजा ने बेटी हेतु वर की तलाश जारी रखी. उस ने पुत्री का विवाह द्वारसमुद्र के राजा भगवान नारायण के पुत्र राजकुमार सौंरसी के साथ निश्चित कर दिया. चित्रांकन का कार्य समाप्त होने के पश्चात विवाह का मंडप सजाया गया और विवाह कार्य सकुशल संपन्न हो गया. राजकुमारी पति के साथ डोली में ससुराल चली गई. चित्रकार भी पुरस्कार पा कर और अपने स्वामी हेतु उपहार ले कर दिल्ली चला गया. कुछ ही दिनों बाद प्रिय पुत्री के बिना घर सूना पा कर राजा रामदेव ने छिताई को बुला लिया. छिताई और सौंरसी, दोनों देवगिरि आ गए. वैभव और दुलार की कमी न थी. युवक सौंरसी रात्रि में छिताई के साथ रमण करता और दिन में ऊबने लगता तो आखेट के लिए निकल जाता.

राजा रामदेव दामाद को अनजाने क्षेत्र में अकेले जाने से रोकते थे. मगर नवयौवन के अल्हड़पन में सौंरसी परवाह नहीं करता था. एक दिन मृग के पीछे घोड़ा दौड़ाता वह जंगल में घुस गया. मृग आश्रय पा कर एक आश्रम में घुस गया. आश्रमवासी बाहर निकल आए और दयावश राजकुमार से मृग को छोड़ देने का अनुरोध किया. राजकुमार जोश में था. उस ने हिरण को नहीं छोड़ा. तब उस आश्रमवासी ने कुपित हो कर कहा, ‘‘जैसे तुम ने मृगी को दुखी किया है, उसी प्रकार तुम जिस स्त्री के मोह में पड़े हो, वह दूसरे पुरुष के वश में पड़ेगी और तुम दुख भोगोगे.’’

सुन कर सौंरसी अवाक रह गया. उस के प्रार्थना करने पर आश्रमवासी बोले, ‘‘तुम पश्चाताप करोगे तो तुम्हारा दुख दूर होगा.’’

सौंरसी लौट तो आया मगर उस का मन शंकित रहने लगा. उस ने आखेट पर जाना एकदम बंद कर दिया. इस से छिताई और राजा प्रसन्न रहने लगे. राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. अब दिन में वह अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां भी होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. सौंरसी ने अपनी प्रणयिनी छिताई को वीणा सिखाना शुरू किया. धीरेधीरे संगीत ने उन की संगति में ऐसा माधुर्य घोल दिया कि लययुक्त स्वरलहरियां उन के एकांत की निर्विघ्न साधना बन गईं. सुख के ये सरकते दिन आनंद के नित नूतन सोपान बनते चले गए.

उधर चित्रकार जब काम पूरा कर के दिल्ली पहुंचा तो उस ने राजा रामदेव के व्यवहार की प्रशंसा करते हुए राजा के उपहार बादशाह अलाउद्दीन को दिए. अलाउद्दीन ने अपने मित्र की प्रशंसा की. एक दिन अवसर पा कर चित्रकार ने एकांत में संजो कर बनाए और रखे गए राजकुमारी छिताई के चित्र को सम्राट अलाउद्दीन को दिखाया.

बादशाह एकटक उसे निहारते हुए कल्पना के नवीन संसार में विलुप्त हो गया. उस ने तय कर लिया कि ऐसी सुकुमारी सुंदरी कन्या का भोग अवश्य करना चाहिए. वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि आक्रमण किस बहाने किया जाए क्योंकि अपनी खुशी से तो अपनी ब्याहता कन्या अथवा पत्नी न राजा रामदेव दे पाते और न सौंरसी. जब उसे पता चला कि सौंरसी और छिताई देवगिरि में हैं तो उसे लगा कि देवगिरि पर इस समय आक्रमण से जहां छिताई मिलेगी, वहीं फिर से दौलत हासिल होगी.

अत: उस ने प्रकट में बहाना बनाया कि उसे अपने मित्र राजा रामदेव को देखे बहुत दिन हो गए हैं और वह उन्हें लड़की के ब्याह पर बधाई देगा. इस बहाने के कारण उसे राजा ने बीच में रोकने का प्रयास नहीं किया. वह देवगिरि आया और राजधानी को चारों तरफ से घेर लिया. राजा कुछ समझ न सका. परंतु देवगिरि दुर्ग की दुर्गमता के आगे अलाउद्दीन की एक न चली. अत: अब अलाउद्दीन ने छिताई को उसे सौंपने पर घेराबंदी उठाने की शर्त पेश की तो राजा ही नहीं, पूरी प्रजा इस अपमान पर भड़क उठी.

परिणामस्वरूप युद्ध छिड़ गया. सौंरसी वहां फंस गया था और विशेष क्रोध में था. अत: उस के नेतृत्व में देवगिरि के वीर आतताई पर टूट पड़े. अनेक वीर मारे गए. अलाउद्दीन के साधन बड़े थे और वह दूसरे स्थानों से सेना मंगा कर क्षति को पूरी कर लेता था. इसलिए देवगिरि सेना बारबार आक्रमण कर के भी विजयी नहीं हो पाती थी. परंतु जैसे आज देवगिरि दुर्ग की रक्षा व्यवस्था 7 सौ वर्षों के बाद भी रोमांचित कर देती थी, उसी तरह उस समय भी वह अपराजेय थी. इस से अलाउद्दीन पूरी कोशिश के बावजूद जीत न सका.

महीने पर महीने बीत रहे थे. किले में रसद और सैन्य बल की प्रतिदिन कमी होती जा रही थी. अतएव राजा ने विचार प्रकट किया कि सौंरसी और छिताई को किसी तरह सुरक्षित निकाल कर और निश्चिंत हो कर अत्याचारी अलाउद्दीन पर टूट पड़ा जाए. पहले तो सौंरसी रणक्षेत्र से हटने को कतई तैयार न था. उसे उस शाप की भी याद थी कि दुर्ग से बाहर निकलते ही कहीं छिताई आक्रामकों के हाथ न पड़ जाए. परंतु जब उसे सैनिकों की कमी बताई गई तो वह इस शर्त पर अकेले बाहर जाने को तैयार हो गया कि वह अपने राज्य द्वारसमुद्र जा कर वहां की सेना लाएगा और बाहरभीतर दोनों तरफ से अलाउद्दीन पर जोरदार आक्रमण किया जाएगा.

सौंरसी को भेष बदलना पड़ा था. उस ने अपने सारे राजकीय शृंगार छिताई को सौंप दिए. तरुण पतिपत्नी एकदूसरे पर मर मिटने की कसम खाते हुए विलग हुए. जब तक नीचे उतरता हुआ सौंरसी दिखाई दिया, छिताई देखती रही. फिर सिसकते हुए उस ने अपने भी सारे आभूषण उतार दिए और तपस्विनी का जीवन जीने लगी. कई दिनों बाद जब सुलतान को सौंरसी के निकल जाने की खबर मिली तो वह आशंकित हो गया कि कहीं छिताई भी उस के साथ फुर्र न हो गई हो. अलाउद्दीन को यह भी उम्मीद बंधी कि सौंरसी के चले जाने से वृद्ध राजा लाचार हो गया होगा. अत: उसे पुरानी दोस्ती की याद दिला कर छिताई मांग ली जाए.

इस से दोस्ती स्थाई हो जाएगी. छिताई के दुर्ग में होने का सही पता करने के लिए महिला गुप्तचर भेजे गए. जब इत्मीनान हो गया तो अलाउद्दीन ने विशेष कुटनी दूतियों को छिताई के पास भेजा जो उसे सौंरसी से विमुख कर के सुलतान की तरफ ललचा सकें. लेकिन दूतियां छिताई पर कोई प्रभाव न डाल सकीं. वे यह खबर ले आईं कि छिताई प्रतिदिन राम सरोवर आती है. अलाउद्दीन को चित्तौड़ और रणथंभौर में सौंदर्य के प्रति अपनी आसक्ति को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिला था. अत: यहां वह विशेष सजग था.

सुलतान ने अपने एक ब्राह्मण दरबारी राघव चेतन को छिताई सौंपने के आग्रह के साथ राजा रामदेव को समझाने भेजा. ब्राह्मण होने से यह अंदेशा नहीं था कि दूत राघव चेतन का वध होगा. साथ ही अलाउद्दीन ने दूतियों को हिंदू साध्वी का रूप बना कर भेजा जो छिताई को फिर से राजी करें. अलाउद्दीन ने अपनी एक योजना मन में बना ली थी. उसे छिताई को देखे बिना चैन नहीं था. अतएव राघव चेतन के सेवक के रूप में वह खुद परकोटे के भीतर प्रवेश कर गया. राघव चेतन दरबार में गया. दूतियां रनिवास की ओर गईं. सुलतान रामसरोवर में छिताई के दर्शन करने आने की प्रतीक्षा करने लगा. आसपास का वातावरण रमणीय था और तरहतरह के पंछी जलक्रीड़ा कर रहे थे. सुलतान ने समय बिताने के लिए पंछियों का शिकार करना शुरू कर दिया, जिस में वह इतना रम गया कि जब छिताई सखियों सहित आई तो वह जान न सका.

पंछियों के आर्तनाद तथा बेबस कलरव से आकृष्ट हो कर छिताई तो दर्शन कर के चली गई, किंतु मैनरूह को उस ने कारण पता लगाने भेजा. मैनरूह ने सुलतान को छिताई की बेटी मानने की ईमान से कौल उठाने की बात मनवा कर मुक्त किया. सुलतान ने घेरा उठा लिया और लौटने की तैयारी करने लगा.

मैनरूह ने पूरी घटना राजा रामदेव को बता दी. वह प्रसन्न हुआ कि मुसीबत टली. उस ने दासी की खूब प्रशंसा की. जलने वाले हर दरबार में होते हैं. सौंरसी की अनुपस्थिति में जो प्रधान सेनापति थे, उन्होंने इस में भी अलाउद्दीन शासक की कोई चाल बताई. उन्होंने कहा कि दासी की बातों पर विश्वास कर के वे अलाउद्दीन की पकड़ में आ जाएंगे. उन्होंने यहां तक डींग मारी कि जब सुलतान हारने वाला है तो वह शराफत की आड़ में बचना चाहता है. उन्होंने दासी के विरुद्ध काररवाई करने को कहा. यदि वह सचमुच सुलतान था तो उसे किसी भी शर्त पर छोड़ने के बजाय पकड़ कर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए था. अत: या तो दासी झूठी है या सुलतान.

प्रधान सेनापति की बातों से लोग असमंजस में पड़ गए. सचमुच यह अजीब बात थी कि इतना बड़ा सुलतान निपट अकेले वाटिका में आए, फंसे और निकल जाए. प्रधान सेनापति चित्तौड़, गुजरात और रणथंभौर में अलाउद्दीन की मक्कारियों का विवरण देते हुए जोर देने लगे कि सुलतान की यह भी कोई जालसाजी है. अतएव देवगिरि को युद्ध करना चाहिए. अन्य दरबारी भी सशंकित थे. पुराना पापी पाप छोड़ भी दे तो शक उस का पीछा नहीं छोड़ता. सब की आशंका एवं आक्रोश से राजा को कहना पड़ा कि मैनरूह को अलाउद्दीन ने बहन कहा है तो एक बार आजमाइश की जाए. बात सही है तो उस के कहने पर अलाउद्दीन फिर से घेरा डाल दे.

दासी के माध्यम से सुलतान को खबर मिली. सेनापति की आज्ञा से देवगिरि के सैनिकों ने आक्रमण जारी रखा. इस पर सुलतान का क्रोध उबल पडा़. उस ने फिर से मोर्चे बांधे. अबकी बार लड़ाई प्रतिष्ठा की थी. अलाउद्दीन ने अपनी योजना के अनुसार शह दी. छिताई जहां दर्शन के निमित्त आती थी, वह स्थान मुख्य दुर्ग तथा उस की खाई के बाहर था. अलाउद्दीन के कमंद के सहारे उस जगह आहिस्ताआहिस्ता अपने सैनिक उतारे और उन्हें पेड़ों पर छिप कर बैठा दिया. रक्षकों का ध्यान बंटाने के लिए दुर्ग की दूसरी ओर शोरगुल के साथ आग जलवा दी.

दूसरे दिन जब छिताई आई तो अलाउद्दीन के छिपे सैनिक उस की टोली पर टूट पड़े. छिताई के साथ आई 40 दासियां मार डाली गईं. दूसरी तरफ निकटस्थ फाटक पर अलाउद्दीन के सैनिक पूरे वेग से टूट पड़े. छिताई पकड़ ली गई और सुलतान के सामने पेश की गई. छिताई एकदम भावशून्य हो गई थी. सुलतान ने उसे दिलासा दिया कि वह छिताई को बेटी की तरह रखेगा. कह तो दिया मगर छिताई के ललित सौंदर्य को सम्मुख पा कर एक बार सुलतान का चित्त चंचल हो उठा. मगर अपने कौल को याद कर के वह सहम गया.

छिताई के पीछे कुटनियां लगा दी गईं, जो उसे सजनेधजने और पथभ्रष्ट होने के लिए तैयार करें. छिताई ने उन का मर्म समझते ही आंखकान मूंद लिए. अब उस ने खाना तो दूर, पानी पीना भी छोड़ दिया. उस ने प्रतिज्ञा की कि उस विधर्मी महल में अनशन कर के वह प्राण त्याग देगी. जब यह खबर बादशाह को मिली तो वह खुद छिताई के पास आया और उसे समझाने की कोशिश की.

छिताई ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया और अपने हठ पर अडिग रही. छिताई का चेहरा बुझ गया और कंचनवत शरीर की कांति मलीन हो गई थी. सुलतान को लगा कि यदि और देर हुई तो छिताई मर जाएगी. तब उस ने छिताई को अपने विश्वस्त राघव के महल में भेज दिया. अलाउद्दीन ने उस की सुरक्षा की इस आशय से अलग व्यवस्था की कि भविष्य में समय बदलने पर उस का मन भी बदल जाए. साथ लाई उस की वीणा भी मन बहलाने के लिए भेज दी.

उधर जब सौंरसी तैयारी के साथ देवगिरि वापस पहुंचा तो उसे छिताई के अपहरण की सूचना मिली. यह आघात वह सहन न कर सका. उस ने दुर्ग, सेना, महल, राजपाट सब त्याग दिया. उस की दशा एक बार तो विक्षिप्त की भांति हो गई. वह जंगल में चला गया और उस ने वैरागी रूप धर लिया. जो मिला, खा लिया और इधरउधर घूमने लगा. वह छिताई की हर ओर खोज करने लगा. अपने असह्य वियोग की करुणा को उस ने वीणा में झंकृत करना आरंभ किया.

संगीत अन्य कलाओं की भांति साधना है जो भावातिरेक में स्वरों को चमत्कार के रूप में प्रकट करता है. भावों की गहनता कला को साधना के सोपानों से सिद्धि के शिखर का स्पर्श करा देती है. जब छिताई की अतृप्त स्मृति को सौंरसी वीणा के विराट सुरों से तृप्त करने का प्रयास करता तो प्रतीत होता जैसे अदृश्य से दृश्य हो रहा हो. एकांत में सौंरसी के वीणा वादन पर पशुपक्षी स्तब्ध हो कर मुग्ध हो जाते. पुष्प झूमने लगते. प्रकृति थिरकने लगती. वैरागी सौंरसी रुकता नहीं था, टोह लेतेलेते मंजिल की ओर बढ़ा जाता था.

वियोगी हृदयों की भी कोई अनजानी आहट होती होगी. भावी प्रेरणावश सौंरसी दिल्ली पहुंच गया. उस ने एक उपवन में डेरा डाला. प्रात: संध्या अथवा जब उस को भावोद्वेग होता, वह वीणा के तार छेड़ देता. तब बटोही थम जाते. पखेरू चित्रलिखित बन जाते और जल का निर्झर संगत करने लगता था.

उधर अलाउद्दीन ने छिताई के पास इस लालसा से वीणा भेज दी थी कि वह जब प्रकृतिस्थ होगी तो मन बहलाएगी. राघव चेतन के महल में वह कुछ संयमित तो हुई, परंतु स्वाभाविक न बन सकी. राघव चेतन की बातों तथा प्रेरक आशावादिता से वह शरीर संरक्षण हेतु कुछ खानेपीने लगी, मगर वीणा को उस ने हाथ नहीं लगाया. यह वही वीणा थी, जिस पर सौंरसी ने उसे वीणा बजाना सिखाया था. वह वीणा को छेड़ती तो न थी, परंतु उसे छोड़ती भी नहीं थी. वह वीणा उसे प्रियतम की सुधि दिलाती रहती थी.

सुलतान छिताई की वीणा सुनना चाहता था. मगर अन्यमनस्का छिताई उन तारों पर अंगुली नहीं रखती थी. अंत में बादशाह की आज्ञा से दिल्ली के प्रसिद्ध वीणावादक गोपाल नायक छिताई को वीणा झंकार की शिक्षा देने हेतु भेजे गए. सुलतान ने वादा किया कि जिस दिन छिताई वीणावादन करेगी, गोपाल नायक को मुंहमांगा ईनाम मिलेगा.

गोपाल नायक ने बारंबार चेष्टा की. गायन और वादन से छिताई में छिपे कलाकार को जगाने की चेष्टा की परंतु सफल न हुए. अलबत्ता दोनों कलाकारों ने एकदूसरे में अंतर्निहित कला को पहचान लिया. परस्पर सहानुभूति भी हुई. गोपाल नायक छिताई की यातना को समझते थे. छिताई कम से कम एक बार वीणा बजा कर उन की प्रतिष्ठा सुलतान की निगाह में बढ़ाना चाहती थी, मगर कर न सकी.

अंत में उस ने वह वीणा स्वयं गोपाल नायक को दे दी. उस ने कहा, ‘‘गुरुजी, इसे रख लीजिए. शायद कभी वे आएंगे तो देख कर पहचान तो लेंगे अपनी वीणा को. फिर वे इसे बजाएंगे अवश्य. जब उन के हाथ से वीणा बजेगी तो कितना ही शोर हो, मैं सो भी रही होऊं तो इस वीणा के सुरों को पहचान कर जान लूंगी.’’

दिल्ली में सौंरसी के वीणा वादन की अलौकिकता की ख्याति बढ़ रही थी. उस ने भी संगीतज्ञ एवं वीणावादक गोपाल की पारंगतता के विषय में सुना. सौंरसी गोपाल नायक के घर गया. गोपाल नायक ने सम्मानपूर्वक अपने कक्ष में बैठाया. वार्ता करते हुए सौंरसी ने वहां छिताई द्वारा प्रदत्त अपनी वीणा देखी तो उसे बजाने की अभिलाषा व्यक्त की. जैसे ही सौंरसी ने उस वीणा के सुर झनझनाए तो वे चिरपरिचित स्वर छिताई के कानों में गूंज उठे.

उसे प्रियतम के आगमन का आभास हो गया. वह भावातिरेक में विह्वल हो उठी. सुलतान की पाबंदियों के चलते वह अपने स्वामी से मिल नहीं सकती थी. गोपाल नायक इस कौशल से वीणा बजाने और सौंरसी के उत्साह से जान गए कि यह युवक छिताई की प्रियतम है. उन्होंने उसे राघव चेतन की मार्फत सुलतान से मिलने की सलाह दी, परंतु छिताई के विषय में कुछ नहीं बताया.

योगी वेश में सौंरसी राघव चेतन से मिला और उन से सुलतान से मिलाने की प्रार्थना की. राघव योगी की वीणा वादन कला तथा व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ. उस ने योगी की भेंट दरबार में सुलतान से कराई. योगी ने बताया कि वह दक्षिण में सिंहल से आया है और उस का सब कुछ दिल्ली के बाहर के उद्यान में छिन गया है. सुलतान को आश्चर्य हुआ, क्योंकि उद्यान में कोई आताजाता न था. फिर योगी के पास ऐसी क्या संपत्ति होगी जो कोई छीनेगा.

योगी की बातें रहस्यमय लगीं तो भी अलाउद्दीन ने उसे परखने की दृष्टि से वीणा बजाने को कहा. योगी ने सिर झुका कर अनुरोध किया कि सुलतान यदि एक बार उद्यान में दरबार लगाएं तो उसे उस का खोया सब कुछ मिल जाएगा. वहीं वह वीणा भी बजाएगा. सुलतान मुसकराया.

उद्यान के सुरम्य वातावरण में दरबार का आयोजन किया गया. सुलतान ने अनुभव किया कि योगी का वीणा वादन शुरू होते ही दिल गुलाब के फूल की तरह खिल उठा. फिजा खुशगवार होने लगी. लगा, जैसे कुदरत ने नींद से जाग कर अंगड़ाई ली हो. पशुपक्षी एकत्रित होने लगे. जब तक वीणा बजती रही, पूरा दरबार, पशुपक्षी, पेड़पौधे सब चुपचाप सुनते रहे. वीणा वादन खत्म होने पर सुलतान बोल उठा, ‘‘मरहबा! क्या खूब!’’

उसे छिताई से अपना वादा याद आया. इस वीणा पर भी यदि छिताई ने वीणा नहीं बजाई तो वह बहरी हो चुकी होगी. उस ने राघव चेतन से छिताई को वीणा सहित बुला लाने का आदेश दिया. जब तक छिताई आ नहीं जाती, उस ने योगी को वीणा बजाने का आदेश दिया. सुलतान ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी वीणा से छिताई की तकलीफ दूर हो जाए तो तुम जो मांगोगे, तुम्हें ईनाम दिया जाएगा.’’

सौंरसी तन्मय हो कर बजाने लगा. दूर से आती हुई छिताई ने जब वीणा की वह चिरपरिचित स्वरलहरी सुनी तो उस का दिल उछलने लगा. छिताई के पांव स्वचालित से उठने लगे. जब उस ने सौंरसी को देखा, तो दाढ़ीमूंछ, केश तथा जोगिया भेष के बावजूद पहचान गई. फिर तो प्रच्छन्न आह्लाद का ज्वार उमड़ आया. मुखमंडल प्रफुल्लता की आभा से दीप्त हो उठा. सारी सभा उस की इस असाधारण मन:स्थिति से प्रमुदित हो उठी.

राघव चेतन ने वीणा निकाली. गोपाल नायक ने उसे ला कर बीच सभा में छिताई के सामने वादन की स्थिति में प्रस्तुत कर दिया. आनंद की उदात्त लहरियां सौंरसी तथा छिताई के मानस में गूंज रही थीं. आंखों के मिलते ही वे एकदूसरे को पहचान ही नहीं गए, बल्कि उन में वियोग का संताप, उलाहना, यातना, सब आनंद में परिवर्तित हो गए. उस आनंद में संगीत सुख की वर्षा बन निर्झर सा फूट पड़ा.

अनजाने में छिताई ने सौंरसी की दी हुई वीणा को उठा लिया. लगा कि वह सुहाग के दिनों की पारंगतता को पुन: प्राप्त कर चुकी है. न जाने कब तक दोनों एकदूसरे की ओर अपलक निहारते हुए वीणा बजाते रहे. पशुपक्षी एकटक उन्हें देख रहे थे. संगीत के ताल पर मोर नाचने लगे. मृग थिरकने लगे. लगता था, जैसे वीणा की स्वर लहरियों से सब अलौकिक हो उठा हो.

धीरेधीरे सौंरसी ने वीणा की गति धीमी की. छिताई ने भी साथ दिया. जब उन्होंने वीणा वादन रोका तो पूरी सभा सन्नाटे से करतल ध्वनि में बदल गई. सुलतान ने छिताई को इतनी उत्फुल्ल कभी नहीं देखा था. छिताई ने वीणा ही नहीं बजाई, उस ने अपनी कला और उल्लास से पूरी सभा को आह्लादित कर दिया था. सुलतान को अपना वादा याद आया. उस ने सौंरसी से पूछा, ‘‘तुम्हारा ईनाम पक्का. बताओ, तुम्हें क्या चाहिए. आज हमें पता चला कि मौसीकी भी एक तरह की इबादत है. और छिताई, हम ने तुम्हारी बारीकियों को भी परखा. गजब का हुनर है तुम दोनों में.’’

सौंरसी बुत बना बैठा रहा. वीणा वैसे ही पकड़े रहा. एकटक सुलतान को देखता रहा. सुलतान ने फिर शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘जोगी, बताओ तुम क्या चाहते हो? तुम जो मांगोगे, वह तुम्हें मिलेगा.’’

जोगी ने अदब से सिर झुकाया, मुसकराया. फिर फरमाया, ‘‘मान्यवर, आप मुझे वचन देते हैं?’’

अलाउद्दीन की पारखी नजरों ने परख लिया था कि वे दोनों एकदूसरे के निकट रहे हैं. तुरंत उसे शक हो गया कि यही सौंरसी है. परंतु सभा के सम्मुख वह दो बार पूर्व ही वचन दे चुका था. उस ने बेसाख्ता कह दिया, ‘‘बेशक, हम अपनी बात पर कायम रहेंगे. अपना ईनाम मांगो.’’

जोगी ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘श्रीमान, मुझे छिताई को ही दान में दे दीजिए.’’

सुलतान कुछ बोले, इस के पहले ही छिताई आर्तस्वर में, जिस में संयोग का आवेग और विरह की विवशता निहित थी, सिसकती हुई अपने पति के चरणों में गिर पड़ी. सुलतान ने एक बार सभा को देखा, फिर राघव चेतन को निहारते हुए बोला, ‘‘पंडित, वो क्या कहते हैं, तुम्हारे मजहब में? हां, कन्यादान. जोगी, तुम चाहे जो भी हो, मैं छिताई को तुम्हें कन्यादान करता हूं.’’

सौंरसी ने उठ कर 3 बार बंदगी की. पूरी सभा में वाहवाह, बाखूब, वल्लाह, आमीन की आवाजें गूंज उठीं. सुलतान ने हंसते हुए फरमाया, ‘‘मगर मैं ने बेटी को तो कुछ दिया ही नहीं. छिताई, बताओ, तुम क्या चाहती हो?’’

कुछ लोग कठोर अलाउद्दीन की इस दरियादिली पर चकित थे. चित्तौड़ और रणथंभौर के किलों को पत्थर के खंडहरों में तब्दील करने वाले अलाउद्दीन ने सब के सामने छिताई को अपनी बेटी पुकारा था. सौंरसी तथा छिताई की तपस्या ने पत्थर को भी पिघला दिया था. संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था. छिताई ने सिसकते हुए, हाथ जोड़ कर भूमि पर सिर रखा. बोली, ‘‘हे सम्राट, हे पिता, मुझे आप का बस आशीर्वाद चाहिए. आप ने मुझे सब कुछ दे दिया.’’

सौंरसी ने विनयपूर्वक अपना वास्तविक परिचय तथा छिताई को अपनी परिणीता बताया. पूरी सभा इस अद्भुत जोड़ी पर स्नेह की वर्षा करने लगी. अलाउद्दीन ने शाही ढंग से छिताई और सौंरसी की विदाई की. देवगिरि पहुंचने पर दोनों का भव्य स्वागत हुआ. छिताई ने अपने धैर्य से विजय प्राप्त की थी. कुछ दिन वहां रह कर दोनों द्वारसमुद्र चले गए. कोई 5 सौ वर्ष पूर्व कवि नारायण दास ने ‘छिताई वार्ता’ प्रेम काव्य की रचना की थी, जिस का विवरण डाक्टर राजमल वोरा ने अपनी पुस्तक ‘देवगिरि के यादव राजा’ में उल्लिखित किया है. Hindi Kahani

लेखक – जगदीश जगेश   

 

UP News: खत्म हो गया खूबसूरत रिश्ता

UP News: परिवार पैसों से नहीं, प्यार से खुश रहता है, जिस के लिए संयम, विवेक, समर्पण और आपसी तालमेल जरूरी है. डा. विशाल यही नहीं कर पाए, जिस की वजह से आज वह पत्नी को प्रताडि़त कर मौत के मुंह तक पहुंचाने के आरोप में जेल में हैं.

किसी परिवार की खुशहाली का मूल आधार सिर्फ दौलत ही नहीं, त्याग, समर्पण, विश्वास, आपसी प्यार, अपनापन और भावनाओं का संगम होना जरूरी है. जहां यह सब नहीं होता, वहां खुशियां पानी के बुलबुले और कोहरे जैसी होती हैं. जिस तरह कुछ वक्त के बाद बुलबुला अपना वजूद खो देता है और कोहरा छंट जाता है, कुछ वैसा ही खुशियों के साथ होता है. दौलत की चकाचौंध से प्यार करने वालों की अन्य मामलों में झोलियां खाली ही रह जाती हैं, क्योंकि पैसा जरूरतों को तो जरूर पूरी कर देता है, लेकिन वह सब नहीं दे पाता, जो खुशहाल जिंदगी के लिए जरूरी होता है.

राजेश कौड़ा इन बातों को अच्छी तरह जानतेसमझते थे. व्यवहारकुशल राजेश के लिए उन का अपना परिवार ही पूरी दुनिया था. वह सरकारी मुलाजिम थे. हर आम आदमी की तरह वह भी चाहते थे कि उन के परिवार में खुशियों के जुगनू हमेशा रोशनी बिखेरते रहें. इसी सोच के समुद्र में उन्होंने प्यार, समर्पण और जिम्मेदारियों की किश्ती को हमेशा चलाया था. राजेश कौड़ा उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के मोहल्ला अरविंदपुरी के रहने वाले थे. परिवार के संचालन व बच्चों की संस्कारपूर्ण परवरिश में गृहणियों का बड़ा योगदान होता है. उन की पत्नी प्रेमलता ने इस काम को दिल के साथसाथ दिमाग से पूरा किया. उन की 3 बेटियां, शालिनी, सोनिया और शिवानी थीं. बच्चे मातापिता के लिए अनमोल पूंजी की तरह होते हैं, जिसे वे अपने ढंग से सहेज कर रखते हैं.

राजेश की मानसिकता ऐसी नहीं थी कि बेटियों के साथ कोई भेदभाव करते. वह इस से पूरी तरह मुक्त थे. ज्ञान की रोशनी दुनिया के हर खजाने से ज्यादा अनमोल होती है. वह इस बात को जानते और समझते थे. इसी वजह से उन्होंने बेटियों को बेटा समझा और उन्हें शिक्षा की आजादी दी. परिवार का माहौल, मातापिता के विचार, संस्कार और जिम्मेदारियां अच्छी हों तो उस का असर बच्चों पर पड़ता ही है. कोड़ा दंपत्ति की बेटियां न सिर्फ उन की उम्मीदों पर खरी उतरीं, बल्कि उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल कर के उन का नाम भी रोशन किया. उन में एमबीबीएस, एमडी की पढ़ाई करने वाली शालिनी गोल्ड मैडलिस्ट थी. तीनों बेटियां पढ़लिख कर कामयाब हुईं तो उन्होंने एकएक कर के सभी का विवाह कर दिया.

शालिनी का विवाह मेरठ शहर के ही थाना सदर बाजार के पौश इलाके थापरनगर में विशाल से हुआ था. विशाल खुद भी डाक्टर थे. उन्होंने विदेश से मैडिकल की पढ़ाई की थी. उन के पिता डा. सी.एल. आर्य की गिनती नामी डाक्टरों में होती थी. वह सादगी पसंद अच्छे स्वभाव के डाक्टर थे. कोठी के बाहरी हिस्से में ही वह ‘आर्य चेस्ट क्लीनिक’ चलाते थे. उन के परिवार में पत्नी वीना आर्य के अलावा एक बेटी थी सपना, जिस का विवाह हो चुका था. शालिनी का विवाह विशाल के साथ सन 2002 में हुआ था. विवाह और उस की खुशियां बसंत ऋतु की तरह होती हैं, जिस में हजारों रंगबिरंगे फूल एक साथ खिल कर जिंदगी को महका देते हैं. जीवन के इस पायदान पर अनोखी मादकता होती है. लगता है, वह पल ठहर जाए और खुशियों का घरौंदा आबाद रहे.

लेकिन यह सिर्फ खूबसूरत सोच भर होती है, वास्तविकता में ऐसा कतई नहीं होता. इस के पीछे आईने की तरह साफ वजह यह होती है कि एक तो वक्त अपनी चाल नहीं छोड़ता, दूसरे जिंदगी कभी घुमावदार होती है तो कभी सीधी. समय अपनी गति से चलता रहा. समय के साथ शालिनी 2 बेटियों, वर्णिका और निकिता की मां बनी. शालिनी और उस के पति विशाल भी डा. सी.एल. आर्य की क्लिनिक में ही मरीजों को देखते थे. क्लिनिक के बोर्ड पर तीनों का संयुक्त नाम था. आर्य परिवार के पास नाम, दौलत और शोहरत, सभी कुछ था. अच्छी जिंदगी के लिए यह सब खुशनसीब लोगों के पास ही होता है या यूं कहें कि इस तरह की जिंदगी के लिए न जाने कितने लोग तरसते हैं.

आधुनिकता के दौर में चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे कुछ ऐसी हकीकतें होती हैं, जो सामाजिक तौर पर प्रत्यक्ष नजर नहीं आतीं. बहुत से घरों की दीवारों की पीछे न जाने कितने तूफान चल रहे होते हैं. यानी सिर्फ दौलत और शोहरत देख कर यह अंदाजा लगाना कठिन होता है कि वहां सब खुश हैं. डा. आर्य के परिवार में भी कुछ ऐसा ही था. हंसमुख स्वभाव की शालिनी बेहद मृदुभाषी थी. उस के इस स्वभाव को न सिर्फ मरीज, बल्कि आसपास के लोग भी पसंद करते थे. उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य स्वभाव के जितने अच्छे थे, उन की पत्नी वीना ठीक इस के उतना ही विपरीत थीं. तेजतर्रार वीना हर बात पर टीकाटिप्पणी करना और परिवार को अंगुलियों पर नचाना अपना हुनर समझती थीं.

ऐसी बातों का दायरा हद से ज्यादा फैल जाए तो घर की शांति को ग्रहण लग जाता है. उन की इन बुरी आदतों का शिकार शालिनी भी हो चुकी थी. पढ़ेलिखे होने के बावजूद डा. विशाल और उन की मां वीना आर्य रूढि़वादी सोच और कुरीतियों का शिकार थीं. उन्हें शालिनी से शिकायत थी कि उस ने बेटे को जन्म नहीं दिया. इस के अलावा दहेज से ले कर छोटीछोटी बातों पर बतंगड़ बन जाना आम बात हो गई थी. ऐसी बातें खुशियों पर ग्रहण लगाने वाली होती हैं. शालिनी कभी झगड़े का तो कभी मारपीट का शिकार हो जाती थी, लेकिन पिता के घर से मिले संस्कार उसे बांधे रखते थे.

इस के अलावा एक बात यह भी थी कि डा. सी.एल. आर्य बहू शालिनी को बेटी की तरह मानते थे. वह बहू की काबलियत और व्यवहार की कद्र करते थे. सामाजिक अच्छाइयों और बुराइयों का भी उन्हें खयाल था. जब भी झगड़े के हालात उत्पन्न होते थे, डा. आर्य शालिनी की ढाल बन कर खड़े हो कर मामले को शांत करा देते थे. शालिनी की अपनी बहनों और मातापिता से बातें होती रहती थीं. इन कड़वाहटों से वे भी वाकिफ थे, लेकिन मामला चूंकि बेटी की ससुराल का था, इसलिए किसी प्रकार का वे हस्तक्षेप नहीं करते थे. बहुत सी बातों को खामोशी के धागों से शालिनी अपने होंठों को सिल लेती थी. शालिनी की परेशानी तब और बढ़ गई, जब उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य की मौत हो गई.

कौडा दंपति ने शालिनी को नाजों से पाला था. हर मातापिता चाहते हैं कि उन की बेटी ससुराल में खुश रहे. वे भी ऐसा ही चाहते थे, लेकिन शालिनी के मामले में ऐसा नहीं हो सका था. वह बेटी को समझाते हुए वैवाहिक जीवन का वास्ता दे कर परिवार को संभालने की नसीहतें दिया करते थे. उसे भी परिवार के संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का खयाल था. अब तक शालिनी की बड़ी बेटी वर्णिका नौवीं कक्षा में आ चुकी थी, जबकि उस से छोटी निकिता पांचवीं कक्षा में थी. वक्त अपनी गति से चल रहा था. बुरा वक्त किसी की जिंदगी में कब दस्तक दे दे, इस बात को कोई नहीं जानता. शालिनी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

30 अगस्त, 2015 की सुबह करीब साढ़े 11 बजे शालिनी की बेटी वर्णिका का अपनी नानी प्रेमलता के पास फोन आया तो वह चौंकीं. वजह यह थी कि उस ने बताया था कि घर में झगड़ा हो रहा है. उस के पिता और दादी मम्मी को परेशान कर रहे हैं. बेटी को ले कर पहले से ही चिंतित कौड़ा दंपति पर यह खबर बिजली बन कर गिरी. प्रेमलता ने यह बात पति को बताई तो वह मेरठ में ही रहने वाली अपनी बहन उमा और बहनोई राजकुमार को साथ ले कर कुछ ही देर में बेटी की ससुराल थापरनगर पहुंच गए.

उस वक्त घर में महाभारत छिड़ा हुआ था. उन लोगों का इस तरह अचानक आना विशाल और वीना को नागवार गुजरा. वीना उन की आवभागत करने के बजाय बेरुखी से बोली, ‘‘भाईसाहब, आप को इस तरह नहीं आना चाहिए, यह हमारे घर का मामला है.’’

राजेश हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘माफ कीजिए बहनजी, कौन पिता चाहता है कि उस की बेटी दुखी रहे. फिक्र तो सभी को होती है. आप लोग मेरी बेटी को इस तरह परेशान करते हैं, यह ठीक नहीं है. ऐसी क्या भूल हो गई हमारी बेटी से?’’

इस पर वीना हाथ नचा कर बोलीं, ‘‘हमें आप को यह बताने और समझाने की जरूरत नहीं है, आप यहां से चले जाएं तो बेहतर होगा.’’

राजेश को बेटी की ससुराल में अपने साथ इस तरह के रूखे और अपमानजनक व्यवहार की उम्मीद नहीं थी. वह शर्मिंदा हो गए. अपने सामने पिता की इस तरह बेइज्जती होते देख शालिनी की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘पापा, आप चले जाइए. यहां तो यह रोज का हाल है.’’

राजेश का दिल नहीं माना. उन्होंने विशाल से कहा, ‘‘बेटा, अपने पविर को संभाल कर रखो. बुजुर्गों ने कहा है कि रोजरोज की कलह अच्छी नहीं होती. वैसे तो यह आप के घर का मामला है, लेकिन बड़ा होने के नाते तुम्हें समझा तो सकता ही हूं.’’

राजेश का इस तरह समझाना विशाल को कांटे की तरह चुभा. वह भी बेरुखी से ही पेश आया. उस ने कहा, ‘‘हम सब संभाल लेंगे पापाजी, आप चिंता न करें. मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. प्लीज, आप यहां से चले जाइए.’’

राजेश मन मसोस कर वहां से चले आए. मातापिता बेटी को ससुराल में सुखी रहने की उम्मीद करते हैं, लेकिन वहां जो हालात थे, उन्होंने राजेश और उन की पत्नी को चिंता में डाल दिया था. हंसमुख स्वभाव की बेटी कब गंभीर हो गई थी, उन्हें पता ही नहीं चला था. उन्होंने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. उन्हें क्या पता था कि इस से भी बुरा होने वाला है. उसी रात करीब 2 बजे किसी व्यक्ति ने फोन कर के उन्हें बताया कि उन की बेटी को जहर दे दिया गया है. उसे जबरदस्ती इंजेक्शन लगा कर मारने की कोशिश की गई है. इस सूचना ने उन की नींद उड़ा दी. आननफानन में उन्होंने अपने नातेरिश्तेदारों को फोन किया और धड़कते दिल से शालिनी के घर जा पहुंचे. वहां पता चला कि शालिनी को जसवंतराय अस्पताल ले जाया गया है.

सभी लोग जसवंतराय अस्पताल पहुंचे. शालिनी की हातल गंभीर थी और उसे आईसीयू में भरती कराया गया था. डा. विशाल तब तक वहीं था, लेकिन उन लोगों को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. बातचीत में उस की ससुराल वालों से झड़प हो गई तो वह भाग निकला. घटना की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना मिलते ही थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी राजेंद्रपाल सिंह मौके पर पहुंच गए.

शालिनी का इलाज कर रहे डाक्टरों का कहना था कि उस के शरीर में सल्फास की प्रकृति का जहर है. उस के हाथ, कमर व अन्य जगहों पर चोट के भी निशान थे. इस का मतलब उस के साथ मारपीट भी की गई थी. राजेश परिवार के हालातों से वाकिफ थे. शालिनी की इस हालत के लिए उस की ससुराल वाले जिम्मेदार थे. उन्होंने हत्या का आरोप लगा कर हंगामा शुरू कर दिया. शालिनी की हालत बेहद नाजुक थी. उसे वेंटीलैटर पर रखा गया था. वह बोलने की स्थिति में नहीं थी. घर वाले परिवार के हालात और उत्पीड़न का हवाला दे कर सल्फास या जहरीला इंजेक्शन जबरन लगाने का आरोप लगा रहे थे.

एसएसपी डी.सी. दुबे को इस हाईप्रोफाइल मामले की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस को निष्पक्ष काररवाई के निर्देश दिए. इस बीच शालिनी की बेटियों को ननिहाल भेज दिया गया. अपने मरीजों के लिए संवेदनशील रहने वाली डा. शालिनी खुद मौत से लड़ रही थी. जहर उस के शरीर में पूरी तरह घुल चुका था. डाक्टर उसे बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे, लेकिन अथक प्रयास के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. करीब 28 घंटे मौत से लड़ कर शालिनी की सांसों की डोर टूट गई. इस से उस के परिवार में कोहराम मच गया. अस्पताल में पूछताछ में पता चला कि शालिनी को वहां सीने व पेट दर्द की शिकायत के बहाने भरती कराया गया था.

पुलिस ने राजेश की तहरीर पर पुलिस ने अपराध संख्या 414/15 पर भादंवि की धारा 307, 328, 504, 506 व दहेज अधिनियम की धारा 498ए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद शालिनी के शव के पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. अब तक डा. विशाल और शालिनी की सास वीना, दोनों ही कोठी में ताला लगा कर फरार हो चुके थे. शालिनी की मौत से हर कोई आहत और आक्रोशित था. पोस्टमार्टम के बाद 1 सितंबर को गमगीन माहौल में उस के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. शालिनी की बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. कभी दुलहन के रूप में बेटी को विदा करने वाले राजेश कौड़ा ने सोचा भी नहीं था कि उन्हें होनहार बेटी की अर्थी को कंधा देना पड़ेगा.

इस बीच लोगों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर जाम लगा दिया. मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक (नगर) ओमप्रकाश सिंह ने जल्द गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर जाम खुलवाया. पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया तो ये टीमें मांबेटे की तलाश में लग गईं. अगले दिन शालिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. उस की मौत शरीर में जहर घुलने से हुई थी. लीवर, किडनी से ले कर शरीर के हर अंग में जहर फैल गया था. उस के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाने का निशान था. डाक्टर ने पुलिस के कहने पर जांच के लिए बिसरा सुरक्षित रख लिया था. बाद में उसे जांच के लिए आगरा स्थित फोरैंसिंक लैब भेज दिया गया था.

उधर पुलिस ने आरोपियों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी थी, लेकिन वे हत्थे नहीं चढ़ रहे थे. विशाल विदेश भाग सकता था, इस आशंका के तहत लुकआउट नोटिस जारी करा दिया गया था. विशाल का मोबाइल स्विच औफ था. उस की काल डिटेल्स से पता चला कि उस के कई लड़कियों और महिलाओं से संबंध थे. शालिनी के घर वालों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे से भी मुलाकात की. 4 सितंबर को शालिनी की तेहरवीं की रस्म में आर्य परिवार की छोड़ो, उन का कोई रिश्तेदार तक नहीं आया था.

गिरफ्तारी न होने से शालिनी के घर वालों में गुस्सा था. आरोपियों का कुछ पता नहीं चल रहा था. शालिनी के परिजनों ने 5 सितंबर को विशाल की कोठी पर उस के और वीना के कातिल होने संबंधी पोस्टर चस्पा कर के धरना दे दिया. पुलिस ने गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर धरना खत्म कराया. पुलिस को बिसरा रिपोर्ट का इंतजार था. इस बीच पुलिस ने अदालत से दोनों आरोपियों का गैर जमानती वारंट हासिल कर लिया. देखतेदेखते कई दिन बीत गए. मामला मीडिया की सुर्खियां बना था.

शालिनी की बिसरा जांच रिपोर्ट आ गई. उस में एल्यूमिनियम फास्फाइड (सल्फास) नामक जहर के अंश पाए गए थे. उसे जहर दिया गया था या उस ने मानसिक दबाव में खुद खाया था, इस का जवाब गिरफ्तारी के बाद ही मिल सकता था. अभियुक्तों की गिरफ्तारी को ले कर लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने कैंडल मार्च निकाले और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर से भी मुलाकात की. पुलिस विशाल तक भले पहुंच नहीं पा रही थी, लेकिन अदालत से उस के घर की कुर्की का वारंट हासिल कर के चस्पा जरूर कर दिया था. पुलिस से बचने के लिए अपनी गिरफ्तारी पर स्टे हेतु विशाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अरजी लगाई, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया.

आखिर 16 सितंबर को डा. विशाल की फरारी का पटाक्षेप हो गया. उसे पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह अदालत में आत्मसमर्पण करने जा रहा था. विशाल से विस्तृत पूछताछ की गई. शालिनी के घर वालों और विशाल से पूछताछ में जो कहानी निकल कर आई, वह आर्थिक संपन्न परिवार में  घरेलू हिंसा के सामाजिक कलंक व उजले चेहरों के पीछे की चौंकाने वाली हकीकत थी. शालिनी होनहार थी. एमबीबीएस की पढ़ाई में वह अपने बैच की टौपर रही. इस के लिए उसे गोल्ड मैडल भी मिला. इस के साथ ही वह बालीबौल की भी अच्छी खिलाड़ी थी. राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले कर उस ने कई इनाम जीते थे. डाक्टर की डिग्री हासिल करने के साथ ही कौड़ा दंपति ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी थी.

शालिनी खूबसूरत होने के साथ होशियार थी, इसलिए थोड़े प्रयास के बाद 12 साल पहले उन्होंने शालिनी का रिश्ता डा. सी.एल. आर्य के एकलौते बेटे डा. विशाल में तय कर दिया. आर्थिक रूप से संपन्न डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव और आचरण के व्यक्ति थे. समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चेस्ट स्पैशलिस्ट के रूप में उन का नाम था. समाज में उन्हें इज्जत की नजरों से देखा जाता था. राजेश को लगा कि वह खुशनसीब हैं, जो उन्हें बेटी के लिए इतना अच्छा रिश्ता मिल गया. उन्होंने सोचा कि हमपेशा पति के साथ शालिनी खुश रहेगी.

रस्मी बातचीत के बाद शालिनी और विशाल ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. राजेश के परिवार को पहला झटका तब लगा, जब श्रीमती वीना आर्य ने दहेज की ख्वाहिश जाहिर की. दहेज को भले ही बुराई, कुप्रथा, कानून के खिलाफ कहा जाए, लेकिन यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि दहेज समाज में परंपरा बन गया है. शादियों में लाखोंकरोड़ों खर्च किए जाते हैं. कभी लड़के वालों की मांग पर तो कभी सामाजिक दिखावे के लिए तो कभी हैसियत के अनुसार. राजेश ने भी अपनी हैसियत के अनुसार शहर के एक बड़े फार्महाउस में 1 नवंबर, 2002 को धूमधाम से विवाह समारोह आयोजित कर के भारी मन से बेटी को विदा कर दिया. इस विवाह में उन्होंने 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए.

हर लड़की की तरह शालिनी ने भी मन में ढेरों उमंगे और सपने लिए ससुराल में पहला कदम रखा. विवाह का एक साल हंसीखुशी से बीत गया. ससुर के क्लीनिक में ही शालिनी ने प्रैक्टिस शुरू कर दी. शालिनी ने बेटी को जन्म दिया तो सास के अरमानों पर जैसे पानी फिर गया. वह बेटे की ख्वाहिश रखती थीं. बहुत जल्द उन्होंने ताने देने शुरू कर दिए तो सास की बातें शालिनी के हृदय पर तीर की तरह चुभने लगीं. इतना ही नहीं, उन्होंने नवजात बेटी के पालनपोषण से भी इंकार कर दिया. डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे. वह बहू का पक्ष लेते तो वीना उन्हें भी आड़े हाथों लेती, ‘‘यह तुम्हारी बहू है बेटी नहीं, जो इस का पक्ष लेते हो.’’

डा. आर्य समझाने की कोशिश करते, ‘‘बहू भी बेटी समान होती है वीना, तुम्हें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए.’’

डा. आर्य कहते जरूर थे, लेकिन उन की इस तरह की बातें वह एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थीं. शालिनी ने सास की आए दिन होने वाली तानेबाजियों की शिकायत पति विशाल से की. उसे उम्मीद थी कि वह उस के दिल के घावों पर सहानुभूति का फीहा रखेगा, लेकिन उस ने भी अपनी मां का समर्थन कर के उसे निराश कर दिया. वीना आर्य दानदहेज से भी नाखुश थीं. इसे ले कर भी वह ताने मारने लगीं थीं.

शालिनी एक बार मायके आई तो हमेशा खिलखिलाने वाली बेटी का बुझा चेहरा देख कर राजेश और प्रेमलता को लगा कि वह बीमार रही है. उन्होंने उस के दुखी और उदास रहने की वजह पूछी तो मातापिता के प्यारभरे बोलों से टूटी हुई शालिनी के सब्र का बांध टूट गया. कंपकंपाते होंठों से उस ने आपबीती कह सुनाई. कौड़ा दंपति ने बेटी को समझाया, विवाह के बाद बहुत कुछ सहना पड़ता है.

शालिनी ने एक बार फिर बच्चे के नवजीवन की तैयारी की तो वीना खुश हुई कि इस बार जरूर बेटा होगा. यह बात अलग थी कि उन के अरमानों पर एक बार फिर पानी फिर गया. शालिनी को दोबारा भी बेटी हुई तो उन पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाने लगा. हर रोज लगता था, जैसे पति और सास अपने दिलों की भड़ास निकालते हैं. उन के शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतरते थे. समय बीतता गया. शालिनी बेटियों को बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि वे पढ़लिख कर नाम रोशन करें. उधर बेटी का जीवन सुखद रहे, यह सोच कर राजेश कौड़ा ने कुछ रस्मी अवसरों पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार वीना आर्य को नकद रुपए भी दिए.

इस बीच डा. सी.एल. आर्य कैंसर से पीडि़त हो गए. ऐसे बुरे वक्त में विशाल ने पिता को उपेक्षित सा कर दिया. शालिनी ने एक अच्छी बहू का फर्ज निभा कर उन की खूब सेवा की. बेटे से ज्यादा उन्होंने शालिनी पर नाज किया. विशाल उन की कसौटी पर काबिल बेटे के तौर पर खरा नहीं उतरा. शालिनी को अपनी विरासत का सही उत्तराधिकारी मान कर उन्होंने अपनी करोड़ों की संपति का बड़ा हिस्सा उस के नाम कर दिया.

यह परिवार में विवाद की नई वजह बन गया. एक साल पहले डा. सी.एल. आर्य इस दुनिया से विदा हो गए. ससुर की मौत के बाद तो शालिनी के लिए प्रताड़नाओं का जैसे दौर ही शुरू हो गया. पति और सास को उस से मारपीट करने में कोई गुरेज नहीं था. शालिनी अपनी सोच सकारात्मक रखती थी. उस ने सोचा कि वक्त के साथ उन का व्यवहार सुधर जाएगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ. विशाल और वीना किसी दूसरी ही मिट्टी के बने थे. उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. शालिनी की किस्मत में शायद दुख ही दुख लिखे थे. सन 2015 में वीना और विशाल ने शालिनी से नई मांग शुरू कर दी कि वह अपने पिता से दोनों बेटियों के नाम 10-10 लाख रुपए की एफडी कराने को कहे.

राजेश कौड़ा रिटायर हो चुके थे. उन की हैसियत ऐसी नहीं थी. शालिनी इस बात को जानती थी. जब यह आए दिन की बात हो गई तो शालिनी ने दबी जबान से अपनी मां से यह बात कही. बेटी की खुशी के लिए उन्होंने किसी तरह 2 लाख रुपए नकद दे दिए. आर्थिक संपन्न होने के बावजूद वीना और विशाल के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी. वह अपनी मांग पर अड़े रहे.

शालिनी परिवार की अनेक बातों को कड़वा घूंट समझ कर पी जाती थी और मायके में नहीं बताती थी. वह नहीं चाहती थी कि मातापिता को उस के कारण कोई दुख पहुंचे. जीवन घिसटता हुआ सा चल रहा था. मानसिक प्रताड़ना झेलना जैसे शालिनी की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं. घर का माहौल अशांत हो चुका था. बातचीत भी गालीगलौज से की जाती थी. दुत्कार और उत्पीड़न हदों को लांघ रहा था. पतिपत्नी के बीच अक्सर तनाव रहता था.

उा. विशाल अक्सर अकेले ही विदेश घूमने चला जाता था. वह सिंगापुर, पेरिस, स्वीटजरलैंड और मलेशिया जाता था. वह क्यों जाता था, यह शालिनी को बताना जरूरी नहीं समझता था. एक मायने में वह पिता की दौलत पर मौज करने वाला बेटा था. काम में उस का मन कम ही लगता था. विशाल की लड़कियों से दोस्ती थी. शालिनी इस का विरोध करती तो उस की आवाज को दबाने के लिए उस के साथ मारपीट की जाती.

शालिनी सहनशील थी, लेकिन तनाव के बीच घुटघुट कर जी रही थी. बेटियों की खातिर वह अपने परिवार को किसी भी सूरत में टूटने नहीं देना चाहती थी. शालिनी उस बंधन को निभा रही थी, जो वक्त के साथ खोखला सा हो गया था. खुशियां जैसे उस से रूठ चुकी थीं. वह दर्द के दरिया में सफर कर रही थी. आसपड़ोस के लोगों को बाहरी तौर पर सब ठीक लगता था, लेकिन अंदर भूचाल चल रहा था. वह अपना दिन मरीजों में बिता देती थी. उस का स्वभाव अच्छा था. मरीजों के प्रति वह संवेदनशील रहती थी, इसलिए मरीज उसे ही दिखाना पसंद करते थे. उस की शोहरत काबिल डाक्टर के रूप में हो रही थी. डा. विशाल इस बात से बहुत चिढ़ता था. मौका मिलते ही वह अपनी इस भड़ास को निकाल भी देता था. कहते हैं कि अति का अंत कभी सुखद नहीं होता.

30 अगस्त रविवार के दिन जब झगड़ा ज्यादा बढ़ गया और शालिनी से मारपीट की जाने लगी तो उस की बेटी वर्णिका ने घबरा कर अपनी नानी को फोन कर दिया. राजेश कौड़ा वहां आए, लेकिन उन्हें अपमानित कर के वापस कर दिया गया. घर का माहौल काफी खराब हो चुका था. बात घर से बाहर न जा पाए, शालिनी को मनाने के उद्देश्य से विशाल शालिनी और बच्चों को ले कर मूवी दिखाने गया. रात में वे वापस आए तो घर में फिर विवाद हो गया. इस के बाद कुछ ऐसा हुआ कि बुरी खबर मिलने के बाद राजेश कौड़ा ने बेटी को अस्पताल में पाया. चाह कर भी वह उसे बचा नहीं सके.

पुलिस ने विशाल को साथ ले कर कोठी का मुआयना किया, लेकिन वहां सल्फास की शीशी या सीरींज नहीं मिली. पूछताछ के बाद पुलिस ने विशाल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. विशाल का कहना था कि उस ने पत्नी को नहीं मारा. वह अपनी बेटियों के लिए उसे जिंदा रखना चाहता था. शालिनी खुद भी बेटियों के लिए जिंदा रहना चाहती थी.

कथा लिखे जाने तक विशाल की जमानत नहीं हो सकी थी, जबकि पुलिस वीना आर्य की सरगरमी से तलाश कर रही थी. शालिनी की दोनों बेटियां अपने ननिहाल में रह रही थीं. डा. शालिनी को जहर दिया गया या उन्होंने खुद खाया, यह तो जांच के बाद ही स्पट होगा, लेकिन आर्थिक संपन्नता के बावजूद संबंधों की कड़वाहट से संयम, विवेक और समर्पण के अभाव में एक परिवार तो बिखर ही गया. मासूम बच्चियां भी उस की त्रासदी झेलने को विवश हो गई हैं. UP News

(कथा पात्रों से बातचीत व पुलिस सूत्रों पर आधारित)