Crime Stories: जानलेवा

Crime Stories: इन्क्वायरी अफसर ने अपनी जांच में पूरे भरोसे के साथ औफिस बौय रमीज को कत्ल के इल्जाम में फंसा दिया था कि असली मुलजिम यही है, लेकिन एडवोकेट मिर्जा अमजद बेग ने अपने तर्कों से उस की जांच को गलत साबित कर दिया. जो औरत मेरे सामने बैठी थी, वह चेहरे से ही काफी परेशान लग रही थी. वह 28-29 साल की गोरी सी दुबलीपतली औरत थी. शक्लसूरत से वह किसी शरीफ घराने की लग रही थी. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने दुखी

लहजे में कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर को बचा लीजिए.’’

‘‘आप के शौहर को क्या हुआ, किस से बचाना है उन्हें?’’

‘‘पुलिस उन्हें कत्ल के इल्जाम में पकड़ ले गई है.’’

‘‘आप के शौहर ने किस का कत्ल किया है?’’

‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने कोई कत्ल नहीं किया, फिर भी उन पर पुलिस माजिद निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ ले गई है. उन्हें किसी गहरी साजिश के तहत फंसाया गया है.’’

मेरे सवालों के जवाब में उस औरत ने जो बताया था, उस के अनुसार औरत का पति रमीज और माजिद निजामी एक ही कंपनी में काम करते थे. कंपनी का नाम खान ट्रेडर्स था, जो एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम करती थी. निजामी उस कंपनी में जनरल मैनेजर था, जबकि रमीज औफिस बौय था. उसे चपरासी भी कह सकते हैं. रमीज सीधासादा, लड़ाईझगड़े से दूर रहने वाला ठंडे मिजाज का आदमी था. उस से औफिस का हर आदमी खुश रहता था.

इतना जान लेने के बाद मैं ने उस औरत, जिस का नाम सानिया था, से पूछा, ‘‘जब तुम्हारे शौहर के सब से इतने अच्छे संबंध थे तो फिर उन्हें पुलिस क्यों पकड़ ले गई?’’

उस ने उदासी से कहा, ‘‘यह मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘यह कब और कहां की बात है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘माजिद निजामी को कल शाम औफिस के उस के कमरे में कत्ल किया गया था और मेरे शौहर को आज सुबह 9-10 बजे घर से गिरफ्तार किया गया. उस समय वह औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे.’’

‘‘गिरफ्तार करते समय पुलिस ने क्या कहा था?’’

‘‘कोई सवाल किए बगैर पुलिस ने सीधे उन पर निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ लिया था. परेशान हो कर मैं भागीभागी थाने पहुंची तो वहां सिर्फ इतना पता चला कि रमीज ने औफिस के मैनेजर निजामी का कत्ल कर दिया है. इस के बाद मैं उन के औफिस गई तो बाकी बातें वहां से पता चलीं.’’

‘‘आप को इस केस से संबंधित छोटीबड़ी जो भी बातें औफिस से पता चली हों, मुझे विस्तार से बताओ. उस के बाद ही मैं आप के शौहर की कुछ मदद कर सकूंगा.’’

सानिया ने मुझे जो कुछ बताया था, वह इस प्रकार था. खान ट्रैडर्स का औफिस एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में था, जो बलोच कालोनी के पास थी. उस बिल्डिंग में खान ट्रैडर्स का औफिस तीसरी मंजिल पर था. वहां एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम होता था. रमीज को वहां काम करते 6 साल हो गए थे. वह भले ही कम पढ़ालिखा था, लेकिन चपरासी का अपना काम बहुत अच्छे से करता था, जैसे फाइलें इधर से उधर पहुंचाना, चाय बनाना, पिलाना, लंच करवाना और औफिस की सफाई आदि अपनी निगरानी में करवाना. बैंक के काम भी वही करता था.

सईद खान बड़ा बिजनैसमैन था. एक अरसे से वह यह कंपनी चला रहा था. शहर में उस का नाम था. वह डिफैंस इलाके में रहता था. अन्य स्टाफ में महमूद खान, जो एकाउंट देखता था, नादिरा अलवी कंपनी की डायरेक्टर थीं. मकतूल निजामी जनरल मैनेजर था. लुबना अली रिसैप्शनिस्ट थीं, जो फोन औपरेटर का भी काम करती थीं. खान ट्रैडर्स के औफिस का समय 10 बजे से 6 बजे था. एक रमीज को छोड़ कर बाकी सभी लोग 11 बजे तक आते थे. वह जल्दी इसलिए आ जाता था, क्योंकि उसे औफिस खोल कर साफसफाई करवानी होती थी. उस दिन वह औफिस जाने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था.

मकतूल निजामी समनाबाद में अपनी बीवीबच्चों के साथ रहता था. वह कर्मठ और ईमानदार आदमी था. औफिस में वह काफी देर तक काम करता था, जिस से रात 9 बजे तक घर पहुंचता था. लेकिन उस दिन जब वह 10 बजे तक भी घर नहीं पहुंचा तो उस की बीवी शाइस्ता ने औफिस फोन किया. औफिस में किसी ने फोन नहीं उठाया तो उसे लगा कि वह औफिस से निकल चुके हैं. उस ने थोड़ी देर और राह देखी. जब काफी देर हो गई तो उस ने असिस्टैंट को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘आ जाएंगे, कहीं फंस गए होंगे.’’

लेकिन शाइस्ता की परेशानी बढ़ती जा रही थी, क्योंकि निजामी का कुछ अतापता नहीं चल रहा था. असिस्टैंट ने बताया था कि जब वह औफिस से निकला था तो निजामी काम कर रहे थे. रमीज भी था. उस ने यह भी बताया कि जब एकाउंटैंट महमूद औफिस से निकला था तो उन के पास कोई मिलने वाला बैठा था. जब कहीं से कुछ पता नहीं चला तो रात साढ़े 11 बजे शाइस्ता ने अपने बड़े बेटे इमरान को मोटरसाइकिल से औफिस भेजा. घर से औफिस काफी दूर था, इसलिए वह वहां देर रात पहुंचा. वह मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए पार्किंग में गया तो यह देख कर चौंका कि उस के पापा की कार वहां खड़ी थी. इस का मतलब पापा अभी औफिस में ही थे.

उस ने एक बार फिर औफिस में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. वह बड़बड़ाया, ‘अगर पापा अंदर हैं तो फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं?’

उस ने चौकीदार के पास जा कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जब मैं ने औफिस बंद किया था तो वहां कोई नहीं था.’’

चौकीदार भी सोच में पड़ गया कि आखिर निजामी साहब कहां चले गए? इमरान ने पूछा, ‘‘क्या तुम ने उन्हें जाते हुए देखा था?’’

‘‘नहीं, मैं उस समय गेट पर मौजूद नहीं था.’’

‘‘जब उन की गाड़ी यहां खड़ी है तो वह कैसे चले गए?’’

‘‘हो सकता है गाड़ी खराब हो गई हो, इसलिए यहीं छोड़ गए हों.’’

‘‘वह कभी इस तरह गाड़ी छोड़ कर नहीं जा सकते. चलो मान लेते हैं कि उन्होंने गाड़ी छोड़ दी, लेकिन उन्हें घर तो पहुंचना चाहिए. तुम मेरे साथ ऊपर चलो, हम वहां देखते हैं.’’

चौकीदार इमरान के साथ चल पड़ा. ऊपर जाते हुए चौकीदार ने पूछा, ‘‘आप ने औफिस के अन्य लोगों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था?’’

‘‘हां, उन के असिस्टैंट और दोस्तों से पूछा था, कहीं से कुछ पता नहीं चला. रिश्तेदारों से भी पूछा था.’’

चौकीदार ने सोचते हुए कहा, ‘‘एक उलझन है. जब कोई औफिस में गाड़ी छोड़ कर जाता है तो मुझे जरूर बताता है, पर निजामी साहब ने कुछ नहीं कहा था.’’

ऊपर पहुंच कर चौकीदार ने निजामी के कमरे के दरवाजे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखिए, दरवाजा बंद है.’’

लेकिन जब इमरान ने दरवाजे के हैंडल को घुमा कर हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. इस का दरवाजा लौक नहीं था. चौकीदार बड़बड़ाया, ‘‘मैं ने तो सारे दरवाजों के हैंडल घुमा कर देखे थे, पता नहीं यह कैसे खुला रह गया?’’

दोनों कमरे के अंदर घुसे. कमरे में लाइट जल रही थी. पंखा भी चला रहा था. सामने एक दहशतनाक मंजर था, निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था, उस की गरदन और सिर टेबल पर बेढंगे अंदाज में रखा था. चेहरे का बायां हिस्सा बाएं कान के बल पर टेबल पर टिका था और दाईं ओर से उस की गरदन कान से जरा नीचे और आगे से पीछे तक कटी हुई नजर आ रही थी. किसी बहुत तेज धार वाले हथियार से गरदन इस तरह काटी गई थी कि आधी से अधिक कट गई थी. यह खतरनाक काम उस समय किया गया था, जब निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था.

गरदन काटने के बाद उस का सिर झटके से टेबल पर आ टिका था. वार इतना घातक था कि उसे मरने में जरा भी देर नहीं लगी. उस की गरदन से निकला खून औफिस में बिछे कालीन को दागदार कर गया था. इमरान बाप की लाश देख कर बुरी तरह घबरा गया. उस ने मां को फोन किया. चौकीदार ने कंपनी के मालिक सईद खान और अन्य लोगों को फोन किया. करीब 4 बजे सुबह तक सईद खान, महमूद, नादिरा और लुबना आदि पहुंच गए. रमीज के घर फोन नहीं था, इसलिए उसे खबर नहीं दी जा सकी. जल्दी ही पुलिस भी पहुंच गई.

इंसपेक्टर कादरबख्श अपने 2 साथियों के साथ आया था. जांचपड़ताल और पूछताछ शुरू हुई. चौकीदार से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस का शक रमीज पर गया. पुलिस को उसी पर क्यों शक हुआ, यह आप को अदालत की काररवाई के दौरान पता चलेगा. सानिया की विपदा सुन कर मैं ने यह केस ले लिया था. अगले दिन पुलिस ने रमीज को अदालत में पेश किया. उस पर निजामी का बेदर्दी से कत्ल करने का इल्जाम था. हालात और मौके की स्थिति भी कुछ यही कह रही थी. अदालत ने थोड़ी काररवाही के बाद मुलजिम रमीज को 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया.

अदालत के बाहर सानिया 5 साल की बेटी को लिए परेशान खड़ी थी. मैं ने उसे तसल्ली दे कर कहा, ‘‘यह कत्ल का केस है, अभी जमानत का सवाल ही नहीं उठता. चिंता मत करो, अगर तुम्हारा शौहर बेगुनाह है तो वह जरूर छूट जाएगा.’’

रमीज से मुलाकात होने पर कई बातें और पता चलीं. औफिस के हालात, आपस के ताल्लुक और वहां की हर छोटीबड़ी बात मैं ने उस से पूछी. मैं ने उस से कहा, ‘‘सारी सच्चाई सुन कर साफ लगता है कि तुम्हें फंसाया गया है, पर इस का ठोस सबूत ढूंढना जरूरी है. तुम्हारा औफिस में कोई ऐसा हमदर्द है, जो तुम्हारी मदद कर सकता है.’’

‘‘हां, लुबना मैम औफिस की राजनीति में नहीं रहतीं. वह मेरी हमदर्द भी हैं. वह आप को बहुत कुछ बता सकती हैं, क्योंकि उन्हें काफी कुछ पता है.’’

‘‘मैं लुबना से बात करूंगा. क्या औफिस के बाहर भी तुम्हारा ऐसा कोई दोस्त है, जो मेरे लिए जानकारियां जुटा सकता है?’’

‘‘हां, मेरा एक अच्छा दोस्त है बाबर अली, वह प्रूफ रीडिंग करता है, समझदार और पढ़ालिखा भी है.’’

रमीज ने उस का फोन नंबर मुझे दे दिया था. मैं ने लुबना से फोन पर बात की तो उस ने कहा, ‘‘यहां मैं कुछ नहीं कह सकती. आप के औफिस आ कर बात करूंगी.’’

अगले दिन शाम को वह मेरे औफिस आई. मुझे उस से काफी उपयोगी जानकारियां मिलीं. पर इस शर्त के साथ कि बीच में उस का नाम नहीं आना चाहिए. इस के बाद मैं ने बाबर अली से मुलाकात की. वह बड़े काम का आदमी निकला. मैं ने उसे केस से संबंधित कुछ जानकारियां जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी थीं, उस ने बड़ी मेहनत तथा फुरती से काम शुरू कर दिया और कई बातें मालूम कर लीं. वे जानकारियां रमीज को बरी करवाने में बड़ी उपयोगी साबित हुईं.

रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भी रमीज की जमानत नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक माजिद निजामी की मौत 11 जुलाई की रात 6 से 8 के बीच हुई थी. तेज धार वाले हथियार से उसे मौत के घाट उतार गया था. पुलिस ने वहीं से हथियार को बरामद भी कर लिया था. वह तेज धार की बड़ी छुरी थी. उस के लंबे फल पर लगे खून के नमूने को लेबौरेटरी भेजा गया था, वहां से पता चला कि उसी से कत्ल किया गया था. 2 महीने बाद मुकदमे की बाकायदा सुनवाई शुरू हुई. जज ने मुलजिम के अपराध की रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई. मेरे मुवक्किल ने कत्ल से साफ इनकार कर दिया. सरकारी वकील ने रमीज से कुछ सवाल किए. जिस का मतलब कुछ इस तरह निकलता था.

वह 6 सालों से खान ट्रैडर्स में मेहनत, लगन और ईमानदारी से काम कर रहा था. उस से सब खुश थे, घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से वह अकसर कंपनी से लोन या एडवांस लेता रहता था. पिछले 6 सालों में वह 9 बार एडवांस ले चुका था. सरकारी वकील ने इसी बात को मुद्दा बना कर उसे उलझाना चाहा, ‘‘रमीज, तुम ने दसवीं बार औफिस से एडवांस मांगा था. इस की क्या वजह थी और इस का क्या नतीजा निकला था?’’

‘‘मैं एक बड़ी मुसीबत में फंस गया था. मेरे एक बड़े ही अजीज दोस्त ने मुझ से 10 हजार रुपए मांगे थे, जो मेरे पास नहीं थे. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. मैं ने जो एडवांस ले रखा था, उस की सिर्फ 2 किश्तें बाकी थीं. इसलिए मैं एडवांस नहीं ले सकता था. मैं ने एक सूदखोर से एक महीने के लिए 10 हजार रुपए उधार ले कर अपने उस दोस्त को दे दिए थे.

‘‘उस ने एक महीने में लौटाने का वादा किया था. मैं ने उसे बता दिया था कि ये रुपए 1 हजार रुपए महीने के ब्याज पर ले कर दे रहा हूं, जिसे हर हाल में अगले महीने लौटाना है. पर मेरी बदनसीबी कि मेरा वह दोस्त मेरे रुपए ले कर दुबई चला गया और मैं फंस गया. 2 महीने ब्याज भरने के बाद औफिस का एडवांस पूरा हो गया तो मैं ने औफिस से एडवांस मांगा, पर कंपनी ने एडवांस देने से साफ मना कर दिया.’’

‘‘एडवांस न मिलने पर तुम्हें जनरल मैनेजर पर सख्त गुस्सा आया होगा. तुम्हें लगा होगा कि उसे किसी ने तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया है.’’

‘‘मैं मुश्किल में था, इसलिए गुस्सा आना लाजिमी था. इस से पहले हर बार मुझे एडवांस मिल गया था. इसलिए मुझे यह शक भी हुआ.’’

‘‘इसी बात को ले कर तुम एकाउंटैंट महमूद के पास भी गए थे. उस ने तुम से हमदर्दी तो जताई, पर जनरल मैनेजर के आदेश के बगैर वह तुम्हें एडवांस नहीं दे सकता था. तुम ने महमूद के सामने कहा था, ‘जी चाहता है कि जनरल मैनेजर को चाय में जहर मिला कर पिला दूं.’ क्या यह सच है?’’

‘‘हां, उस दिन मैं बहुत परेशान था. तब गुस्से में मैं ने ऐसा कह दिया था, पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था.’’

‘‘और तुम ने बदला लेने के लिए जहर के बजाय निजामी का छुरी से कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठ है, मेरे खिलाफ कोई साजिश रची गई है.’’

‘‘क्या तुम इस बात से इनकार करोगे कि वारदात वाले दिन मृतक का कोई दोस्त उस से मिलने आया था?’’

‘‘जी हां, आए थे. उन का नाम तौसीफ अहमद था.’’

‘‘मृतक ने उस के लिए तुम से चाय लाने को कहा था?’’

‘‘जी हां, चाय लाने के लिए कहा था. लेकिन उस दिन दूध खत्म हो गया था, तब मैं चाय लेने नजदीक के होटल चला गया था.’’

‘‘तुम ने चाय लाने में इतनी देर कर दी कि दोस्त ही नहीं, औफिस के सभी कर्मचारी तक चले गए. आखिर क्यों देर की? देर होने पर उन्होंने तुम्हें डाटा होगा. उस के बाद तुम ने गुस्से में उन का कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठा इल्जाम है. कत्ल से मेरा कोई वास्ता नहीं है. होटल में लड़ाई हो रही थी, इसलिए मुझे आने में देर हो गई थी. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, मैं ने कत्ल नहीं किया.’’

इस के बाद सरकारी वकील की जिरह खत्म हो गई. मैं ने जज से इन्क्वायरी अफसर से कुछ सवाल पूछने की इजाजत मांगी. इजाजत मिलने पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘इंसपेक्टर कादरबख्श साहब, अभी सरकारी वकील से पता चला कि जब मेरा मुवक्किल चाय ले कर आया तो जनरल मैनेजर का दोस्त और दूसरे लोग जा चुके थे. मुलजिम ने अच्छा मौका देख कर उस का कत्ल कर दिया. आप इस बात को साबित कैसे करेंगे? जबकि मेरा मुवक्किल इस इल्जाम से मना कर रहा है. आप के पास इस वारदात का कोई गवाह भी नहीं है.’’

‘‘जिस समय मृतक का दोस्त आया था, मुलजिम के अलावा एकाउंटैंट महमूद भी मौजूद था. जब मुलजिम को चाय लेने भेजा गया था, तब तीनों थे. लेकिन जब वह लौट कर आया तो महमूद और तौसीफ जा चुके थे. इस के बाद यह काम कौन कर सकता है सिवाय रमीज के? यह उसी का काम हो सकता है?’’ इन्क्वायरी अफसर ने कहा.

‘‘वाह जनाब, क्या थ्यौरी है. जरा सी डांट पड़ने पर मुलजिम कत्ल कर के आराम से घर चला गया और उस ने दरवाजा तक बंद नहीं किया. एक बात बताइए, क्या आप ने छुरी से फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘जी हां, फिंगरप्रिंट्स उठाए थे.’’

‘‘क्या छुरी पर मुलजिम की अंगुलियों के निशान मिले थे?’’

‘‘नहीं, उस पर निशान नहीं मिले, साफ कर दिए होंगे.’’

‘‘मैं आप से जो सवाल करने जा रहा हूं, जरा उस का सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा. क्या आप ने मकतूल की लाश और कमरे की ध्यान से जांच कर के कमरे का नक्शा तैयार किया था?’’

‘‘जी हां, सब बहुत ध्यान और सावधानी से किया था.’’

मैं ने भी कमरे और लाश की स्थिति के बारे में पता किया था. इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘आप की तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक मृतक को तेज धार वाली छुरी से मारा गया था. उस की आधी से ज्यादा गरदन कट गई थी. जब वार किया गया था, वह अपनी कुरसी पर बैठा था. गरदन कटने के बाद सिर टेबल पर आ टिका था. गरदन का कटा हुआ हिस्सा ऊपर और सुरक्षित हिस्सा नीचे टेबल पर टिका था, मैं गलत तो नहीं कह रहा इंसपेक्टर साहब?’’

‘‘नहीं, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’

‘‘अब मैं घटनास्थल की बात करता हूं. उस कमरे में 2 दरवाजे हैं, एक अंदर जाने का और दूसरा वौशरूम का. मृतक की टेबल 3 बाई 5 फुट की है, जिस के आगे आने वालों के लिए कुर्सियां रखी हैं. मृतक के बाएं हाथ की ओर एक साइड टेबल रखी है, इसलिए वह दाईं ओर से अपनी कुरसी तक जाता था. फर्श पर ब्लू कालीन बिछा है, सफेद परदे लगे हैं, ठीक है न?’’

मैं ने घटनास्थल का ऐसा नक्शा खींचा कि इन्क्वायरी अफसर हैरान हो कर बोला, ‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन एक बात मेरी समझ में यह नहीं आई कि यह सब बता कर आप साबित क्या करना चाहते हैं?’’

सरकारी वकील ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘मिर्जा साहब को इस तरह की बेमतलब की बातें कर के मुकदमे को उलझाने की आदत है. जनाबेआली इन्हें रोका जाए.’’

जज ने मेरी ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘आप का इस बारे में क्या कहना है बेग साहब?’’

‘‘जनाबेआली, मैं ने यह सारी मेहनत ऐसे ही नहीं की है. इस का इस मुकदमे से गहरा संबंध है, जिस का खुलासा आगे होगा. पहले इस मामले के गवाह मि. महमूद और मि. तौसीफ अहमद के बयान हो जाएं. जो कुछ मैं ने इन्क्वायरी अफसर से पूछा है, उस का ताल्लुक मेरे मुवक्किल की बेगुनाही से है.

‘‘मुझे पूरा यकीन है कि उसे साजिश कर के फंसाया गया है, वह बेकसूर है. कातिल कोई और है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार निजामी की मौत 6 से 8 बजे के बीच हुई थी. 6 बजे औफिस के अन्य लोग जा चुके थे. एकाउंटैंट 6 बजे औफिस से निकला था.

‘‘मुलजिम, मृतक और मृतक का दोस्त औफिस में मौजूद था. अगर पुलिस का यह दावा है कि कत्ल मेरे मुवक्किल ने किया है तो मैं भी दावा कर सकता हूं कि कत्ल तौसीफ अहमद या महमूद ने किया है या इस के अलावा बाहर का भी कोई आदमी हो सकता है. खैर, कातिल जो भी है, जल्दी ही सामने आ जाएगा. यह सारी मेहनत मैं ने इसीलिए की है.’’

‘‘ओके इट्स ओके, क्या अब आप मुलजिम से कुछ सवाल पूछना चाहते हैं?’’

‘‘जनाबेआली, मैं मुलजिम से 2-4 सवाल जरूर पूछूंगा, जिस से अगली सुनवाई में आसानी रहे.’’

जज ने मुझे इजाजत दे दी.

मैं ने रमीज से पूछा, ‘‘तुम बता सकते हो कि वारदात वाले दिन मृतक का दोस्त तौसीफ अहमद उस से मिलने कितने बजे औफिस पहुंचा था?’’

‘‘जी मुझे बिलकुल याद है. वह साढ़े 5 या पौने 6 बजे आए थे.’’

‘‘एक जवाब चाहिए.’’

‘‘करीब 5:40 पर आए थे.’’

‘‘जब तौसीफ अहमद आए थे, तब औफिस में कौनकौन था?’’

‘‘सिर्फ एकाउंटैंट महमूद साहब थे, बाकी सभी लोग जा चुके थे.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’

‘‘मेहमान से चाय के लिए पूछना मेरी ड्यूटी थी. जब मैं ने निजामी साहब से पूछा तो उन के दोस्त ने कहा, ‘अच्छी सी चाय पिलवाओ.’

‘‘हमारी बिल्डिंग के पास ही एक होटल है. मैं वहीं चाय लेने चला गया था.’’

‘‘तुम चाय लेने होटल क्यों गए, जबकि खान ट्रैडर्स में चाय बनाने और खाना गरम करने के लिए किचन है.’’ मैं ने थोड़ा तेज लहजे में पूछा.

‘‘वकील साहब, आप की बात सही है. पर उस दिन दूध खत्म हो गया था, इसलिए मुझे चाय लाने के लिए बाहर जाना पड़ा. मैं ने निजामी साहब को इंटरकौम पर बता दिया था कि औफिस में दूध खत्म हो गया है, चाय लेने के लिए बाहर जाना पड़ेगा. उन्होंने इजाजत दे दी थी, लेकिन जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘पुलिस जांच के अनुसार, जब तुम चाय ले कर लौटे तो मृतक निजामी का दोस्त तौसीफ अहमद जा चुका था. लेट होने पर मृतक ने तुम्हें डांटा और चाय पीने से मना कर दिया तो तुम ने गुस्से में किचन में जा कर चाय की केतली पटकी और डबलरोटी काटने वाली छुरी पीछे छिपा कर मृतक के कमरे में गए. एडवांस न मिलने से तुम उन से पहले से ही नाराज थे. उन की डांट ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया, जिस से तैश में आ कर तुम ने जनरल मैनेजर माजिद निजामी का कत्ल कर दिया. क्या सब कुछ ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘नहीं, वकील साहब, यह सब झूठ है. मैं चाय लेने गया था, सिर्फ यह सच है.’’

‘‘सच क्या है, विस्तार से बताओ?’’

‘‘मैं चाय लेने होटल गया तो वहां होटल के मालिक की एक आदमी से लड़ाई हो रही थी, जिस से चाय बनने में इतनी देर लग गई कि मैं ऊपर औफिस जाने के बजाय नीचे से ही घर चला गया था.’’

‘‘तुम नीचे से ही घर क्यों चले गए थे?’’ मैं ने यह बात जानबूझ कर पूछी, ‘‘तुम्हें तो चाय लेने भेजा गया था.’’

‘‘हां, मुझे चाय लेने भेजा गया था, लेकिन चाय तैयार होती, उस के पहले ही मैनेजर साहब अपने दोस्त के साथ चले गए थे. जिन के लिए मुझे चाय लानी थी, वे चले गए तो मैं ऊपर औफिस में जा कर क्या करता.’’ रमीज ने आत्मविश्वास के साथ बताया.

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि निजामी साहब अपने दोस्त के साथ चले गए हैं? तुम तो उस समय चाय के लिए होटल में खड़े थे?’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘यह बात मुझे महमूद साहब ने बताई थी.’’

‘‘पर महमूद साहब को तो तुम औफिस में बैठा छोड़ कर गए थे?’’

‘‘यह सच है कि जब मैं चाय के लिए जा रहा था तो महमूद साहब औफिस में बैठे थे. मैं ने उन से भी चाय के लिए पूछा था. तब उन्होंने मना कर दिया था. लेकिन जब मैं चाय के लिए होटल में खड़ा था और चाय तैयार होने वाली थी तो मैं ने महमूद साहब को अपनी ओर आते देखा. करीब आ कर उन्होंने मुझ से कहा, ‘माजिद निजामी चाय का इंतजार कर के अपने दोस्त तौसीफ अहमद के साथ निकल गए हैं. अब चाय ले जाने की जरूरत नहीं है. तुम भी अपने घर चले जाओ.’’

मैं ने कहा, ‘‘अगर वह चले गए हैं तो मुझे औफिस बंद करना होगा. मैं ऊपर जा कर औफिस बंद कर देता हूं.’’

‘‘औफिस मैं ने बंद कर दिया है. मुझे एक जगह जाना है, इसलिए तुम्हारा इंतजार किए बिना ही मैं चला आया. औफिस भी मैं ने बंद कर दिया है.’’

‘‘निजामी साहब से जब इंटरकौम पर बात हुई थी, तब उन्होंने जल्दी आने को कहा था, क्योंकि उन का दोस्त ज्यादा देर रुकने वाला नहीं था. लेकिन लड़ाई की वजह से देर हो गई. महमूद साहब ने बताया कि मेहमान चले गए हैं तो मैं ने सोचा कि मैं औफिस जा कर क्या करूंगा. बहुत होगा, अगले दिन निजामी साहब डाटेंगे तो डांट सुन लूंगा. फिलहाल घर जाना ही बेहतर समझा. मुझे सोचते देख कर महमूद साहब बोले, ‘क्या तुम्हें ऊपर औफिस में कोई काम है क्या?’

‘‘मैं ने कहा, ‘नहीं, मुझे कोई काम नहीं है. आप कह रहे हैं तो मैं घर चला जाता हूं.’ कह कर मैं घर चला गया. अगले दिन मैं औफिस आने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने मुझे कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया.’’

मैं ने आखिरी सवाल पूछा, ‘‘पुलिस जांच के अनुसार मृतक की कार औफिस की बिल्डिंग के नीचे पार्किंग में खड़ी थी, तुम्हारी नजर उस पर नहीं पड़ी?’’

‘‘जनाब, चाय का होटल बाईं ओर जरा अंदर की तरफ है. मैं वहीं से सीधे घर चला गया था. इसलिए गाड़ी मुझे नहीं दिखाई दी. वैसे भी महमूद साहब के कहने पर मुझे उन के जाने का यकीन हो गया था.’’

इस के बाद अदालत का समय खत्म हो गया. अगली पेशी पर 3 गवाहों को अदालत में लाया गया. 2 गवाहों की गवाही में कोई खास बात नहीं थी, तीसरे गवाह का नाम तौसीफ अहमद था, वह 50 साल का अच्छाभला सेहतमंद आदमी था. वह बड़े सुकून और इत्मीनान से विटनैसबौक्स में खड़ा था. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘तौसीफ साहब, आप की मृतक से काफी गहरी दोस्ती थी, उन की मौत का मुझे भी अफसोस है. आप कितने बजे निजामी साहब के औफिस पहुंचे थे?’’

‘‘मैं करीब पौने 6 बजे उन के औफिस पहुंचा था.’’

‘‘उस वक्त वहां कौनकौन था?’’

‘‘निजामी साहब, उन का एकाउंटैंट महमूद और औफिस बौय रमीज. एकाउंटैंट का जिक्र निजामी साहब ने ही किया था.’’

‘‘क्या निजामी साहब ने आप के सामने मुलजिम रमीज को चाय लाने भेजा था?’’

‘‘जी हां, औफिस में दूध खत्म हो गया था. इस के बाद उन्होंने होटल से जल्दी चाय लाने के लिए कहा था, क्योंकि मुझे जरा जल्दी जाना था.’’

‘‘क्या मुलजिम जल्दी चाय ले कर आ गया था?’’

‘‘जल्दी क्या, वह गया तो लौट कर आया ही नहीं.’’

मैं ने नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि उस दिन आप बिना चाय पिए ही चले गए थे, कितने बजे गए थे आप?’’

‘‘मैं करीब साढ़े 6 बजे वहां से निकला था.’’

‘‘जब आप निकले थे, तब तक मुलजिम नहीं आया था?’’

‘‘जी हां, तब तक नहीं आया था, निजामी साहब को बड़ा गुस्सा आया था. अगर वह आ जाता तो चाय उस के मुंह पर फेंक देते, लेकिन वह आया ही नहीं.’’

‘‘अफसोस कि वह सीधे घर चला गया था. उस के बाद उसे औफिस आने का मौका ही नहीं मिला. तौसीफ साहब जब आप साढे़ 6 बजे जाने के लिए औफिस से निकले थे तो क्या निजामी साहब भी आप के साथ निकले थे? जब आप निकल रहे थे तो एकाउंटैंट महमूद अपने कमरे में मौजूद था?’’

‘‘निजामी साहब मेरे साथ नहीं गए थे. उन्हें कुछ काम निपटाने थे. महमूद का मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं निजामी साहब के पास से उठ कर इधरउधर देखे बगैर, सीधे बाहर निकल गया था.’’

‘‘थैंक्यू तौसीफ साहब, आप ने एकदम सटीक जवाब दिए हैं. बस अब आप को एक टेस्ट देना बाकी है. यही टेस्ट निजामी साहब के असली कातिल तक पहुंचाएगा. इस टेस्ट में वही लोग शामिल होंगे, जो 6 बजे से 8 बजे तक औफिस में मौजूद थे.’’

तौसीफ अहमद उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे. सरकारी वकील ने कहा, ‘‘बेग साहब, आप कैसे टेस्ट की बात कर रहे हैं?’’

‘‘यह ऐसा टेस्ट है, जो असली कातिल को सामने ले आएगा.’’ मैं ने जज की ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

जज ने पूछा, ‘‘बेग साहब, अभी आप कितने लोगों का टेस्ट लेंगे और यह कैसा टेस्ट है?’’

‘‘जनाबेआली, यह टेस्ट उन लोगों का लिया जाएगा, जो वारदात के समय वहां मौजूद थे. निजामी साहब तो रहे नहीं, मुलजिम रमीज, गवाह तौसीफ अहमद और कंपनी के एकाउंटैंट महमूद साहब का टेस्ट लेना है. मृतक की गरदन जिस अंदाज में कटी थी, वह खुदकुशी नहीं, यकीनन कत्ल था. फिंगरप्रिंट्स मिले नहीं, इसलिए टेस्ट से ही सच्चाई पता चल सकती है. यह एक साधारण टेस्ट है.’’

मैं ने तौसीफ अहमद से पूछा, ‘‘आप टेस्ट के लिए तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, मैं तो तैयार हूं.’’

मैं गवाह तौसीफ अहमद को जज साहब के पास ले गया. एक पैड और कलम देते हुए बोला, ‘‘आप जज साहब के सामने इस पैड पर लिखें कि मैं ने निजामी साहब का कत्ल नहीं किया है.’’

उन्होंने मेरे कहे अनुसार लिख दिया.

‘‘शुक्रिया अहमद साहब, अब आप जा सकते हैं.’’

जज ने सवालिया नजरों से मेरी ओर देखा तो मैं ने कहा, ‘‘जनाबेआली, मुझे इस टेस्ट से यह साबित करना है कि गवाह तौसीफ बहमद राइट हैंड से काम करने का आदी है.’’

जज साहब ओके, कह कर कागज देखने लगे. फिर वही टेस्ट मैं ने मुलजिम रमीज से करवाया, दोनों कागज जज की टेबल पर रख कर कहा, ‘‘जनाब, मैं यह साबित करना चाहता था कि ये दोनों सीधे हाथ से काम करने के आदी हैं.’’

सरकारी वकील बड़ी उलझन में था. उस ने पूछा, ‘‘जनाबेआली, यह क्या हो रहा है?’’

जज ने कागज देखते हुए कहा, ‘‘बेग साहब यह साबित करना चाहते थे कि ये दोनों राइट हैंडेड हैं. नतीजे के बारे में तो यही बताएंगे.’’

अदालत में बैठे लोग सन्न मारे सारी काररवाही देख रहे थे. मैं ने आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘जैसा कि जज साहब ने बताया है, तौसीफ अहमद और मुलजिम रमीज राइट हैंड से काम करने के आदी हैं. घटनास्थल का नक्शा, कमरे और टेबल की सिचुएशन, लाश की स्थिति इस बात की गवाह है कि माजिद निजामी का कत्ल किसी ऐसे आदमी ने किया है, जो बाएं हाथ से काम करने का आदी है. यानी लैफ्ट हैंडेड है. इसलिए तौसीफ अहमद और रमीज दोनों में से कोई भी कातिल नहीं हो सकता.’’

इन्क्वायरी अफसर जो बड़े ध्यान से सारी काररवाही देख रहा था, एकदम बोल पड़ा, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं बेग साहब?’’

मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘कादरबख्श साहब, आप ने बड़ी बारीकी से लाश की जांच की थी और बड़ी सावधानी से कमरे का नक्शा बनाया था. यह पौइंट आप की समझ में आना चाहिए था.’’

उस के चेहरे पर घबराहट नजर आने लगी. अब मैं ने जज की ओर देख कर कहा, ‘‘जनाबेआली, मैं ने पिछली पेशी में इस से लंबी जिरह जिस मकसद से की थी, उस का मकसद यही था. अब मौका है कि मैं अपने मुवक्किल को बेगुनाह साबित करूं.’’

जज गहरी दिलचस्पी से मेरी बातें सुन रहे थे. अदालत में सन्नाटा छा गया था. सभी का ध्यान मेरी ओर था. मैं अपनी दलीलें आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘जनाबेआली, मृतक की कुरसी उस के कमरे में इस कोण से ऐसी पोजीशन में रखी थी कि दाएं हाथ से काम करने वाले के लिए उस पर, खास तौर पर उस की गरदन पर ऐसा हमला करना नामुमकिन था.

‘‘कमरे की दीवार और मृतक की गरदन के बीच इतना फासला नहीं था कि लंबे फल वाली छुरी को आजादी से घुमा कर गरदन पर भरपूर वार किया जा सकता. अगर इत्तफाक से ऐसा हो भी जाता तो उस स्थिति में गरदन को बाएं तरफ से कान के नीचे से कटना चाहिए था.

‘‘लेकिन हकीकत में मृतक की गरदन दाईं ओर से कान के नीचे से कटी थी. इस का मतलब यह कि किसी लेफ्ट हैंडेड आदमी ने निजामी पर कातिलाना हमला किया था, जो बहुत घातक साबित हुआ. मृतक पलक झपकते ही मर गया.’’

‘‘मेरा तो इस तरफ ध्यान ही नहीं गया. सचमुच यह तो बहुत खास पौइंट है.’’ इन्क्वायरी अफसर ने शर्मिंदा होने वाले लहजे में कहा.

‘‘आप का इस ओर ध्यान नहीं गया, कोई बात नहीं. मैं आप का ध्यान इस तरफ दिला रहा हूं. आप घटनास्थल के नक्शे को दिमाग में ताजा करें और पूरी ईमानदारी से बताएं कि माजिद निजामी का कातिल कौन हो सकता है. लेफ्ट हैंडेड या राइट हैंडेड? यह आप की समझबूझ का टेस्ट है.’’

इन्क्वायरी अफसर ने फौरन दृढ़ता से जवाब दिया, ‘‘कातिल ने वह खतरनाक वार बाएं हाथ से ही किया था. कातिल लेफ्ट हैंडेड था.’’

‘‘और मेरा मुवक्किल एक सौ एक प्रतिशत राइट हैंडेड है.’’ मैं ने जज की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जनाबेआली, आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि मुलजिम दाएं हाथ से काम करने का आदी है. जबकि इन्क्वायरी अफसर भी कह रहे हैं कि कातिल यकीनन लेफ्ट हैंडेड था. इसलिए मेरी आप से दरख्वास्त है कि मेरा मुवक्किल बेगुनाह है, इसलिए उसे बाइज्जत बरी किया जाए.’’

जज ने घूर कर इन्क्वायरी अफसर की ओर देखा और नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि पूरी विवेचना ही गलत है.’’

इन्क्वायरी अफसर घबरा कर बोला, ‘‘जनाबेआली, यह लेफ्टराइट की गलती तो मुझ से हो गई है.’’

‘‘आप की यह लेफ्टराइट की गलती एक बेगुनाह इंसान को गुनहगार बना देती. यह अदालत आप को हुक्म देती है कि 7 दिनों के अंदर नया चालान पेश करें और अब लेफ्टराइट की गलती नहीं होनी चाहिए.’’

उसी वक्त सरकारी वकील की हैरतभरी आवाज गूंजी, ‘यह लेफ्ट हैंडेड व्यक्ति कौन हो सकता है, जिस ने निजामी का कत्ल किया है?’

‘‘मेरे दोस्त अब लेफ्ट हैंडेड कातिल को तलाशना जरूरी है, क्योंकि पहले लापरवाही की गई. अगर कमरे और टेबल की सिचुएशन व नक्शे को बारीकी व सावधानी से देखा जाता तो यह बात पहले ही पता चल जाती कि कातिल लेफ्ट हैंडेड है, क्योंकि जिस तरफ से राइट हैंड उपयोग में आ सकता था, वहां इतनी जगह ही नहीं थी कि खुल कर छुरी का वार किया जा सकता. मैं आप को इतनी हिंट दे सकता हूं कि लेफ्ट हैंड कातिल को इस्तगासा के गवाहों में ही ढूंढ़े, जो 6 से 8 बजे के बीच औफिस में मौजूद थे. एक इशारा और कर दूं, मैं ने अभी तक कातिल का अदालती टेस्ट नहीं लिया है.’’ मैं ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘ऐसा तो सिर्फ एक ही आदमी है, खान ट्रैडर्स का एकाउंटैंट महमूद.’’ उस ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा. इंसपेक्टर साहब, वैसे अक्लमंद को इशारा काफी है.’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. इस के साथ ही अदालत का वक्त खत्म हो गया. अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया. इन्क्वायरी अफसर ने खुद को अक्लमंद साबित करते हुए एकाउंटैंट महमूद को अदालत के सामने पेश कर दिया. महमूद ने पुलिस कस्टडी में ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

वह लेफ्ट हैंडेड था. उसी ने कंपनी के जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतारा था. अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए वारदात के दिन औफिस बौय रमीज को कुरबानी के बकरे की तरह इस्तेमाल किया था. उस से झूठ बोल कर उसे औफिस आने देने के बजाय उसे घर भेज दिया, ताकि अगले दिन जब वह औफिस आए तो फौरन ही उस के कत्ल के इल्जाम में धर लिया जाए. उस के प्लान के मुताबिक ऐसा ही हुआ. औफिस से मिली जानकारी के मुताबिक जनरल मैनेजर निजामी एक बेहद ईमानदार और उसूल वाला आदमी था, जब से उस ने यह कंपनी संभाली थी. उन लोगों को बड़ी तकलीफ थी, जो कंपनी को नुकसान कर के खुद का घर भर रहे थे. बेईमानी करने में सब से ऊपर नाम महमूद का था.

वारदात से करीब 3 महीने पहले मृतक ने एकाउंटैंट का एक संगीन फ्रौड पकड़ लिया था, जिस की वजह से महमूद को बौस के सामने बुरी तरह से अपमानित होना पड़ा था और बौस ने अगली बार उसे निकाल बाहर करने की धमकी दी थी. इस से औफिस में उस की बदनामी और थूथू हुई थी. अपनी बदनामी और अपमान का बदला लेने के लिए वह मौके की ताक में था. उस के दिल में बदले की आग दहक रही थी. रमीज को जनरल मैनेजर ने एडवांस देने से मना कर दिया. रमीज अपनी दिल की भड़ास महमूद के सामने निकालता. निजामी को बुराभला कहता और लोगों के सामने भी उस के खिलाफ बकबक करता.

महमूद को रमीज की शक्ल में एक कुरबानी का बकरा मिल गया. उस ने फैसला कर लिया कि वह जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतार देगा और इस कत्ल का इल्जाम रमीज के सिर पर डाल देगा. ऐसी बातें करेगा, जिस से सब का शक रमीज की तरफ चला जाए. जो लोग उसूल परस्त और ईमानदार होते हैं, उन्हें कदमकदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और कभीकभी ईमानदारी जानलेवा भी साबित होती है, जैसा कि माजिद निजामी के साथ हुआ. पर महमूद भी अपने बदले की आग में खुद जल गया. Crime Stories

 

Karnataka News: बच्चा न होने पर पत्नी का मर्डर

Karnataka News: एक बेहद शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक पति ने पत्नी को सिर्फ इस वजह से मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उसे संतान नहीं हो रही थी. इसी कारण आरोपी ने पत्नी का गला घोंटकर उस की जान ले ली. सवाल यह है कि क्या वाकई बच्चे की चाह में पति हत्यारा बना या इस वारदात के पीछे कोई और सच्चाई छिपी है. आइए जानते हैं इस सनसनीखेज क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो हर किसी को झकझोर कर रख देगी.

यह शर्मनाक घटना कर्नाटक के बेलगावी जिले से सामने आई है. यहां पति फकीरप्पा गिलक्कनवर ने बच्चा न होने के कारण अपनी पत्नी राजेश्वरी की गला घोंटकर हत्या कर दी. वारदात के बाद फकीरप्पा ने झूठी कहानी सुनाई और कहा कि राजेश्वरी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है. उसने रिश्तेदारों को बुलाकर यही बात दोहराई.

सूचना मिलने के बाद राजेश्वरी के पेरेंट्स बेटी के अंतिम संस्कार में पहुंचे तो शव देखकर लगा कि बेटी की मौत दिल के दौरे से नहीं हुई, बल्कि इसे मारा गया है. क्योंकि राजेश्वरी के गले पर मौजूद निशान थे. इस के बाद हन्होंने तुरंत बैलहोंगल पुलिस स्टेशन पुलिस को पूरे मामले की जानकारी दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की. जांच के दौरान हत्या का सच सामने आ गया.

पुलिस ने आरोपी फकीरप्पा गिलक्कनवर को तुरंत हिरासत में ले कर थाने पहुंचाया. राजेश्वरी के शव को पोस्टमार्टम के लिए बेलगावी बीआईएमएस भेजा गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटकर हत्या की पुष्टि हुई. पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी फकीरप्पा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Karnataka News

Delhi News: पार्क में युवक की गोली मारकर हत्या

Delhi News: एक शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक युवक की पार्क में गोली मारकर हत्या कर दी गई. आखिर कौन थे वे अपराधी, जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया. पूरा सच जानने के लिए पढ़िए पूरी स्टोरी विस्तार से.

यह घटना देश की राजधानी दिल्ली से सामने आई है. गणतंत्र दिवस की सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद दिल्ली में बदमाशों के हौसले बुलंद नजर आ रहे हैं. शास्त्री पार्क इलाके में देर रात समीर उर्फ मुस्तकीम उर्फ कमू पहलवान नामक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई. पुलिस को रात करीब 11 बजकर 24 मिनट पर बुलंद मसजिद इलाके में गोली चलने की सूचना मिली थी. मौके पर पहुंची पुलिस को पता चला कि घायल समीर उर्फ मुस्तकीम उर्फ कमू पहलवान को उस के फेमिली वाले पहले ही जेपीसी अस्पताल ले जा चुके थे. जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल की जांच की और वहां से अहम सबूत जुटाए. शास्त्री पार्क थाने में इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कई टीमें गठित की हैं. यह घटना दिल्ली की कानून व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े करती है. पुलिस हर एंगल से मामले की जांच कर रही है.

पुलिस आरोपियों की पहचान कर उन्हें पकड़ने के लिए पूरी तरह जुटी हुई है. इस के लिए आसपास के इलाकों, संदिग्ध ठिकानों और तकनीकी सर्विलांस की मदद ली जा रही है. पुलिस मृतक समीर के फेमिली वालों और अन्य लोगों से भी पूछताछ कर रही है, ताकि कोई ठोस सुराग मिल सके. पुलिस का कहना है कि वे हर पहलू से जांच कर रहे हैं और जल्द ही इस मामले का खुलासा किया जाएगा. Delhi News

Crime News: खुद को बचाने के लिए मार दिया दोस्त को

Crime News: कंधे पर बैग टांग कर घर से निकलते हुए राजा ने मां से कहा कि वह 2 दिनों के लिए बाहर जा रहा है तो मां ने पूछा, ‘‘अरे कहां जा रहा है, यह तो बताए जा.’’ लेकिन जब बिना कुछ बताए ही राजा चला गया तो माधुरी ने झुंझला कर कहा, ‘‘अजीब लड़का है, यह भी नहीं बताया कि कहां जा रहा है?’’

यह 19 अक्तूबर, 2016 की बात है. मीरजापुर की कोतवाली कटरा के मोहल्ला पुरानी दशमी में अशोक कुमार का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी माधुरी के अलावा 4 बेटों में राजन उर्फ राजा सब से छोटा था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. अशोक कुमार के परिवार का गुजरबसर रेलवे स्टेशन पर चलने वाले खानपान के स्टाल से होता था. अशोक कुमार के 2 बेटे उन के साथ ही काम करते थे, जबकि 2 बेटे गोपाल और राजा मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर स्थित होटल जननिहार में काम करते थे. चूंकि मीरजापुर और मुगलसराय स्टेशन के बीच बराबर गाडि़यां चलती रहती हैं, इसलिए उन्हें आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी.

राजा 2 दिनों के लिए कह कर घर से गया था, जब वह तीसरे दिन भी नहीं लौटा तो घर वालों ने सोचा कि किसी काम में लग गया होगा, इसलिए नहीं आ पाया. लेकिन जब चौथे दिन भी वह नहीं आया तो घर वालों को चिंता हुई. दरअसल इस बीच उस का एक भी फोन नहीं आया था. घर वालों ने फोन किया तो राजा का फोन बंद था. जब राजा से बात नहीं हो सकी तो उस की मां माधुरी ने उस के सब से खास दोस्त रवि को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘राजा दिल्ली गया है. मैं भी इस समय बाहर हूं.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था. राजा का फोन बंद था, इसलिए उस से बात नहीं हो सकती थी. उस के दोस्त रवि से जब भी राजा के बारे में पूछा जाता, वह खुद को शहर से बाहर होने की बात कह कर राजा के बारे में कभी कहता कि इलाहाबाद में है तो कभी कहता फतेहपुर में है. अंत में उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया.

जब राजा का कहीं पता नहीं चला तो परेशान अशोक कुमार मोहल्ले के कुछ लोगों को साथ ले कर कोतवाली कटरा पहुंचे और राजा के गायब होने की तहरीर दे कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. कोतवाली पुलिस ने गुमशुदगी तो दर्ज कर ली, लेकिन काररवाई कोई नहीं की. इस के बाद अशोक कुमार 26 अक्तूबर को समाजवादी पार्टी के युवा नेता और सभासद लवकुश प्रजापति के अलावा मोहल्ले के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को साथ ले कर मीरजापुर के एसपी अरविंद सेन से मिले और उन्हें अपनी परेशानी बताई.

अशोक कुमार की बात सुन अरविंद सेन ने तत्काल कटरा कोतवाली पुलिस को काररवाई का आदेश दिया. कोतवाली पुलिस ने राजा के बारे में पता करने के लिए उस के दोस्त रवि से पूछताछ करनी चाही, लेकिन वह घर से गायब मिला. अब तक राजा को गायब हुए 10 दिन हो गए थे. रवि घर पर नहीं मिला तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया, क्योंकि उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.

पुलिस की लापरवाही से तंग आ कर बेटे के बारे में पता करने के लिए अशोक कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. मामला न्यायालय तक पहुंचा तो पुलिस ने तेजी दिखानी शुरू की. 28 अक्तूबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि और उस के पिता को एसपी औफिस के पास एक मिठाई की दुकान से पकड़ कर कोतवाली लाया गया. लेकिन उन से की गई पूछताछ में कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इसी तरह अगले दिन भी हुआ.

संयोग से उसी बीच एसपी अरविंद सेन ही नहीं, कोतवाली प्रभारी का भी तबादला हो गया. मीरजापुर जिले के नए एसपी कलानिधि नैथानी आए. दूसरी ओर कटरा कोतवाली प्रभारी की जिम्मेदारी इंसपेक्टर अजय श्रीवास्तव को सौंपी गई. अशोक कुमार 9 नवंबर को नए एसपी कलानिधि नैथानी से मिले. एसपी साहब ने तुरंत इस मामले में काररवाई करने का आदेश दिया. उन्हीं के आदेश पर कोतवाली प्रभारी ने अपराध संख्या 1232/2016 पर भादंवि की धारा 364 के तहत मुकदमा दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी.

इस घटना को चुनौती के रूप में लेते हुए एसपी कलानिधि नैथानी ने कोतवाली प्रभारी कटरा, प्रभारी क्राइम ब्रांच स्वाट टीम एवं सर्विलांस को ले कर एक टीम गठित कर दी. इस टीम ने मुखबिरों द्वारा जो सूचना एकत्र की, उसी के आधार पर 14 नवंबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि कुमार को मीरजापुर के नटवां तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस से राजा के बारे में पूछा गया तो उस ने उस के गायब होने के पीछे की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस वाले जहां हैरान रह गए, वहीं रवि के पकड़े जाने की खबर सुन कर कोतवाली आए राजा के घर वाले रो पड़े. क्योंकि उस ने राजा की हत्या कर दी थी.

उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के थाना नरसैना के गांव रूखी के रहने वाले नरेश कुमार पीएसी में होने की वजह से मीरजापुर में परिवार के साथ रहते हैं. वह पीएसी की 39वीं वाहिनी में स्वीपर हैं. रवि कुमार उन्हीं का बेटा था. उस की दोस्ती राजा से हो गई थी, इसलिए कभी वह उस से मिलने मुगलसराय तो कभी उस के घर आ जाया करता था. दोनों में पक्की दोस्ती थी.

रवि का एक चचेरा भाई दीपेश उर्फ दीपू फिरोजाबाद के टुंडला की सरस्वती कालोनी में किराए का कमरा ले कर पत्नी के साथ रहता था. वह वहां दर्शनपाल उर्फ जेपी की गाड़ी चलाता था. जेपी की बहन राजमिस्त्री का काम करने वाले प्रवीण कुमार से प्यार करती थी. यह जेपी को पसंद नहीं था. उस ने बहन को समझाया . बहन नहीं मानी तो प्रेमी से उसे जुदा करने के लिए उस ने प्रवीण कुमार को ठिकाने लगाने का मन बना लिया.

यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने ड्राइवर दीपेश उर्फ दीपू को साथ मिलाया और 13 अक्तूबर, 2016 को बहन के प्रेमी प्रवीण कुमार को अगवा कर लिया. दोनों उसे शहर से बाहर ले गए और गोली मार कर हत्या कर दी. दोनों के खिलाफ इस हत्या का मुकदमा थाना टुंडला में दर्ज हुआ. चूंकि इस मुकदमे में एससी/एसटी एक्ट भी लगा था, इसलिए पुलिस दोनों के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. दर्शनपाल उर्फ जेपी तो गिरफ्तार हो गया, लेकिन दीपेश उर्फ दीपू फरार चल रहा था.

पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए जगहजगह छापे मार रही थी. पुलिस दीपेश को तेजी से खोज रही थी. इस स्थिति में पुलिस से बचने के लिए वह मीरजापुर आ गया था. टुंडला में घटी घटना के बारे में उस ने चचेरे भाई रवि को बता कर कहा, ‘‘रवि, मैं बुरी तरह फंस गया हूं. अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं बच सकता हूं.’’

इस के बाद राजा और दीपेश ने योजना बनाई कि किसी ऐसे आदमी को खोजा जाए, जिसे टुंडला ले जा कर हत्या कर के उस की लाश को जला दिया जाए और लाश के पास दीपेश अपनी कोई पहचान छोड़ दे, जिस से पुलिस समझे कि लाश दीपेश की है और उस की हत्या हो चुकी है. इस के बाद पुलिस उस का पीछा करना बंद कर देगी.

जब ऐसे आदमी की तलाश की बात आई तो रवि को अपने दोस्त राजा उर्फ राजन की याद आई. क्योंकि राजा का हुलिया दीपेश से काफी मिलताजुलता था. फिर क्या था, दोनों ने राजा को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली, उसी योजना के तहत उस ने 18 अक्तूबर को राजा को फोन कर के कहा, ‘‘राजा, हम लोगों ने किराए पर एक गाड़ी की है, जिस से कल यानी 19 अक्तूबर को दिल्ली घूमने चलेंगे. मेरा चचेरा भाई दीपेश भी आया हुआ है, वह भी साथ चलेगा. मैं चाहता हूं कि तुम भी चलो.’’

राजा तैयार हो गया तो रवि ने 19 अक्तूबर, 2016 को पीएसी कालोनी के एक परिचित की गाड़ी बुक कराई और राजा को साथ ले कर दिल्ली के लिए चल पड़ा. योजना के अनुसार रास्ते में पैट्रोल खरीद लिया गया. इस के बाद उन्होंने बीयर खरीदी और राजा को जम कर पिलाई. वह नशे में हो गया तो रात 11 बजे के करीब फिरोजाबाद के थाना पचोखरा के गांव सराय नूरमहल और गढ़ी निर्भय के बीच सुनसान स्थान पर पेशाब करने के बहाने गाड़ी रुकवाई और राजा को उतार कर मारपीट कर पहले उसे बेहोश किया, उस के बाद पैट्रोल डाल कर जला दिया.

जब उन्हें विश्वास हो गया कि राजा मर गया है तो पहचान के लिए दीपेश ने अपना जूता राजा की लाश के पास रख दिया, जिस से बाद में उस लाश की पहचान उस की लाश के रूप में हो. इस के बाद दीपेश ने फिरोजाबाद पुलिस को मोबाइल से फोन कर के कहा, ‘‘मैं दीपेश उर्फ बाबू बोल रहा हूं. 3-4 बदमाश मेरा पीछा कर रहे हैं. मुझे बचा लीजिए अन्यथा ये मुझे मार डालेंगे.’’

जिस जगह पर रवि और दीपेश ने राजा को जलाया था, दीपेश का घर वहां से करीब 8 किलोमीटर दूर था. दीपेश ने इस जगह को यह सोच कर चुना था, जिस से पुलिस को लगे कि वह चोरीछिपे अपने गांव आया था. बदमाशों को पता चल गया तो उन्होंने उसे मार डाला. पुलिस को फोन कर के रवि और दीपेश फरार हो गए. जबकि पुलिस सर्विलांस के माध्यम से लोकेशन के आधार पर उन की तलाश में मीरजापुर से फिरोजाबाद तक उन के पीछे लगी थी. दीपेश तो फरार हो गया, लेकिन रवि मीरजापुर तो कभी सोनभद्र तो कभी सिगरौली जा कर छिपा रहा. आखिर ज्यादा दिनों तक वह पुलिस की नजरों से बच नहीं पाया और 14 नवंबर को उसे पकड़ लिया गया.

पूछताछ के बाद रवि की निशानदेही पर पुलिस ने पैट्रोल का डिब्बा, वह गाड़ी जेस्ट कार संख्या यूपी 63जेड 8586, जिस से वे राजा को ले गए थे, बरामद कर ली. इस के बाद उसे उस स्थान पर भी ले जाया गया, जहां उस ने दीपेश के साथ मिल कर राजा को जलाया था. राजा के पिता अशोक कुमार भी साथ थे, इसलिए उन्होंने राजा के अधजले कपड़ों को पहचान लिया था. पुलिस ने रवि को प्रैसवार्ता में पेश किया, जहां उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के हत्या की सारी कहानी सुना दी.

घटना का खुलासा होने के बाद कोतवाली पुलिस ने राजा उर्फ राजन की गुमशुदगी हत्या में तब्दील कर आरोपी रवि को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. दीपेश उर्फ दीपू की तलाश में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापे मारने शुरू कर दिए तो दबाव में आ कर उस ने फिरोजाबाद की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. अदालत ने उसे जेल भेज दिया था. Crime News

Emotional Story: मजा, जो बन गया सजा

Emotional Story: न्यू आगरा के रहने वाले रामप्रसाद ने मंजू की शादी कर के यही सोचा था कि वह बेटी से मुक्ति पा गए हैं. लेकिन मंजू को न पति अच्छा लगा था, न उस के घर वाले. यही वजह थी कि एक बेटी पैदा होने के बाद भी वह ससुराल में मन नहीं लगा पाई और एक दिन बेटी को ले कर बाप के घर आ गई.

बेटी ससुराल वालों से लड़ाईझगड़ा कर के हमेशा के लिए मायके आ गई है, यह बात न तो रामप्रसाद को अच्छी लगी थी और न उन की पत्नी को. उन्होंने मंजू को ऊंचनीच समझा कर ससुराल भेजना चाहा तो उस ने साफ कह दिया कि उन्हें उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह कहीं नौकरी कर के अपना और बेटी का गुजारा कर लेगी.

मंजू ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि कोशिश कर के नौकरी कर भी ली. उसे एक कंपनी में चपरासी की नौकरी मिल गई थी. इस के बाद वह निश्चिंत हो गई, क्योंकि उसे वहां से गुजारे लायक वेतन मिल जाता था. रहने के लिए पिता का घर था ही.

मंजू अपनी नौकरी पर औटो से आतीजाती थी. इसी आनेजाने में कभी मंजू की मुलाकात औटोचालक करन शर्मा से हुई तो दोनों में जल्दी ही जानपहचान हो गई.

करन अकसर मंजू को अपने औटो से लाने ले जाने लगा तो धीरेधीरे उन की यह जानपहचान दोस्ती में बदल गई. उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यहां परेशानी यह थी कि दोनों ही शादीशुदा नहीं, बच्चे वाले थे.

मंजू तो खैर पति को छोड़ कर आ गई थी, लेकिन करन शर्मा तो पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था. इस के बावजूद वह मजा लेने के चक्कर में मंजू से प्यार कर बैठा.

करीब 7 साल पहले करन की शादी भावना से हुई थी. उस के 2 बच्चे थे  बेटा ललित और बेटी आयुषि. भावना अपने इस छोटे से परिवार में खुश थी. प्यार करने वाला पति था तो सुंदर से 2 बच्चे. इन्हीं सब की देखभाल में उस का समय बीत जाता था.

society

लेकिन अचानक मंजू ने उस के प्यार में सेंध लगा दी थी. मंजू के ही चक्कर में पड़ कर करन देर से घर आने लगा. वह भावना को घर का खर्च भी कम देने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह अपनी कमाई का एक हिस्सा मंजू पर खर्च करने लगा था.

कुछ दिनों तक तो भावना की समझ में ही नहीं आया कि पति में यह बदलाव कैसे आ गया? लेकिन जब उस ने देखा कि करन देर रात तक न जाने किस से फोन पर बातें करता रहता है तो उसे संदेह हुआ. उस ने पूछा भी कि इतनी रात तक वह किस से बातें करता रहता है? करन ने लापरवाही से कह दिया कि उस का एक दोस्त है, उसी से वह बातें करता है.

आखिर बहाना कब तक चलता. भावना को लगा कि पति झूठ बोल रहा है तो उसे डर लगा कि पति कहीं किसी गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है. भावना का डर गलत भी नहीं था.

उधर मंजू के दबाव में करन ने उस से नोटरी के यहां शादी कर ली थी. शादी के बाद मंजू मायके में नहीं रहना चाहती थी, इसलिए करन ने थाना सिकंदरा की राधागली में किराए पर एक कमरा ले लिया और उसी में दोनों पतिपत्नी के रूप में रहने लगे. मंजू की बेटी इच्छा भी उसी के साथ रह रही थी.

मंजू को लगता था कि वह करन को अपने प्यार की डोर में इस तरह से बांध लेगी कि वह अपनी ब्याहता पत्नी को भूल जाएगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि करन 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह मंजू से इस तरह मिल रहा था कि भावना को पता न चले, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे पता चल गया तो घर में तूफान आ जाएगा.

यही वजह थी कि करन रात में मंजू के यहां जाता तो कोई न कोई बहाना बना कर जाता था. लेकिन पति के बदले हावभाव से परेशान हो कर भावना ने उस की शिकायत ससुर से कर दी. राधेश्याम ने बेटे को डांटफटकार कर तरीके से रहने को कहा. भावना ने भी धमकी दी कि अगर वह ढंग से नहीं रहा तो वह बच्चों को छोड़ कर मायके चली जाएगी.

पत्नी की इस धमकी से करन डर गया, क्योंकि अगर पत्नी घर छोड़ कर चली जाती तो वह बच्चों को कैसे संभालता? आखिर पत्नी की धमकी के आगे करन ने सरेंडर कर दिया और मंजू से मिलनाजुलना कम कर दिया. उस के इस व्यवहार से मंजू को लगा कि वह परेशानी में फंस गई है, क्योंकि करन से शादी करने के बाद वह नौकरी भी छोड़ चुकी थी. अब वह पूरी तरह से करन पर ही निर्भर थी. मकान के किराए के अलावा घर के खर्चे की भी चिंता थी.

एक दिन ऐसा भी आया, जब करन का मोबाइल फोन बंद हो गया. मंजू परेशान हो उठी. करन के बिना वह कैसे रह सकती थी? वह मायके भी नहीं जा सकती थी. करन के घर का पता भी उस के पास नहीं था. आखिर औटो वालों की मदद से उस ने करन को खोज निकाला.

मंजू करन के घर पहुंच गई. उस ने करन से साथ चलने को कहा तो भावना भड़क उठी. मंजू को भलाबुरा कहते हुए भावना ने कहा कि करन उसे छोड़ कर कैसे जा सकता है. उस ने उस से ब्याह किया है. उस से उस के 2 बच्चे हैं.

society

मंजू और भावना में लड़ाई होने लगी. शोर सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. किसी ने थाना पुलिस को फोन कर दिया. सूचना पा कर थाना सिकंदरा के थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय करन के घर पहुंच गए. वह करन, मंजू और भावना को थाने ले आए.

तीनों की बातें सुन कर ब्रजेश पांडेय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? एक आदमी ने मौजमस्ती के लिए 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया था. करन को न मंजू छोड़ रही थी और न भावना. छोड़ती भी कैसे, दोनों का भविष्य अब उसी पर टिका था. इस परेशानी को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय ने कहा कि करन एक महीने मंजू के साथ रहेगा और एक महीने भावना के साथ. जब तक वह जिस के साथ रहेगा, उस की कमाई पर उसी का हक होगा.

मंजू को यह समझौता कतई मंजूर नहीं था, क्योंकि उस का रिश्ता तो रेत की दीवार की तरह था, जो कभी भी ढह सकती थी. लेकिन भावना इस समझौते पर राजी थी. मंजू ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि एक दिन करन उस के साथ रहेगा और एक दिन भावना के साथ.

हालांकि इस समझौते का कोई कानूनी मूल्य नहीं था, फिर भी ब्रजेश पांडेय ने एक कागज पर लिखवा कर दोनों औरतों और करन के दस्तखत करवा लिए. इस समझौते से जहां मंजू ने राहत की सांस ली, वहीं भावना को मजबूरी में सौतन के लिए अपने पति का बंटवारा करना पड़ा.

society

करन ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी होगा, इसलिए अब वह परेशान था. उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उस ने जो गलती की थी, अब उस का खामियाजा तो उसे भोगना ही था.

थानाप्रभारी ने जो समझौता कराया था, करन के घर वालों ने उस का सख्ती से विरोध किया. जब इस समझौते की खबर अखबारों में छपी तो सभी हैरान थे कि एक पुलिस अधिकारी ने ऐसा समझौता कैसे करा दिया? बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो कोई बवाल होता, उस के पहले ही इंसपेक्टर ब्रजेश पांडेय का तबादला कर दिया गया.

कुछ भी हो, मंजू को लग रहा है कि उस की अपनी गृहस्थी बस गई है. करन अब एक दिन उस के साथ रहता है तो अगले दिन भावना के साथ. उस दिन वह जो कमाता है, उसे देता है जिस के साथ रहता है. लेकिन करन का लगाव भावना और अपने बच्चों के प्रति अधिक था, इसलिए अब वह मंजू पर उतना ध्यान नहीं देता, जितना देना चाहिए. इस से आए दिन उस का मंजू से झगड़ा होता रहता है.

करन ने जो गलती की है, अब वह उस का खामियाजा भोग रहा है. उसे भी कहां सुख मिल रहा है. कभी वह मंजू की ओर भागता है तो कभी भावना की ओर. परेशानी की बात तो यह है कि अभी इस समझौते को हुए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, खींचतान शुरू हो गई है. आगे क्या होगा, कौन जानता है.

आखिर एक आदमी की गलती से 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. उस का भी क्या होगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. यह समझौता भी कितने दिनों तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. Emotional Story

Social Story: बहू भी कराती है हत्या

Social Story: आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था.

तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये.

इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.

Crime Story: ये है असली ‘शोले’, शौहर ही बन गया ‘गब्बर’

Crime Story: मनोज ने बांहों में जोर से कस कर अपनी बीवी फूलकुमारी को जकड़ लिया और भाभी सविता देवी ने उस के जिस्म पर गरम सलाखों से मारना शुरू कर दिया. बीचबीच में मनोज का बड़ा भाई सरोज उसे उकसाता रहा. फूलकुमारी रोतीचिल्लाती, तो उसे फिल्म ‘शोले’ की हीरोइन बसंती की तरह नाचने के लिए कहा जाता. जब वह नाचने से इनकार करती, तो गरम सलाखों से दागा जाता. दर्द से तड़पती फूलकुमारी नाचने की कोशिश करती, पर गश खा कर जमीन पर गिर पड़ती थी. चेहरे पर पानी डाल कर उसे होश में लाया जाता और उस के बाद फिर से उसे नाचने का फरमान सुना दिया जाता. फिल्म ‘शोले’ के खतरनाक विलेन गब्बर सिंह की हैवानियत को भी फूलकुमारी के पति और ससुराल वालों ने मात दे दी थी.

फूलकुमारी के बेटी को जन्म देने के साथ ही परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया था और उस की शादीशुदा और पारिवारिक जिंदगी लगातार खराब होती गई थी.

बेटी को जनने वाली फूलकुमारी पर उस के सास, ससुर, भैसुर, गोतनी और उस के पति का जोरजुल्म शुरू हो गया. फूलकुमारी और उस के मांबाप को परेशान करने के लिए मनोज ने यह रट लगानी शुरू कर दी कि उसे दहेज में मोटरसाइकिल नहीं मिली है. वह फूलकुमारी पर दबाव बनाने लगा कि वह अपने मांबाप से मोटरसाइकिल दिलाए, नहीं तो तलाक के लिए तैयार हो जाए.

मनोज की इस कारिस्तानी में गांव का ही रामानंद केवट भी बढ़चढ़ कर मदद करने लगा. रामानंद केवट पर औरतों को सताने के पहले से कई मुकदमे दर्ज हैं. उस ने अपने बड़ी बहू को इस कदर तंग किया था कि उस ने फांसी लगा कर अपनी जिंदगी ही खत्म कर ली थी. वह छोटी बहू को भी डराधमका कर रखता है और कहीं बाहर आनेजाने भी नहीं देता है. फूलकुमारी देवी बताती है कि मनोज ने मायके वालों से फोन पर बात करने पर भी पाबंदी लगा दी. 4 जून, 2016 को उसे घर के एक कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया गया और सास मुन्नी देवी पहरेदार के रूप में बाहर डंडा ले कर बैठी रहती थीं.

24 मई, 2014 को बिहार की राजधानी पटना के दीघा थाने की बिंद टोली में काफी धूमधाम से मनोज और फूलकुमारी की शादी हुई थी. भोजपुर जिले के आरा शहर के रघु टोला में रहने वाले किसान रामदयाल केवट और मुन्नी देवी के बेटे मनोज के साथ फूलकुमारी आरा आ गई.

इस बीच मनोज के बड़े भाई धनोज की बीवी रिंकू ने 6 मार्च, 2015 को बेटी को जन्म दिया. घर में खुशियां मनाई गईं और जम कर पार्टी हुई. उस के बाद जनवरी, 2016 को धनोज और रिंकू मुंबई चले गए. धनोज मुंबई में गरम मसाले का कारोबार करता है. उस के बाद मनोज और फूलकुमारी देवी के घर भी 27 अक्तूबर, 2015 को बेटी का जन्म हुआ. फूलकुमारी के बेटी होने के बाद पूरे घर में कुहराम मच गया.

जब फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो को अपनी बेटी की दर्दभरी कहानी का पता चला, तो वे बेटी की ससुराल आरा पहुंचे. उन्हें बेटी से नहीं मिलने दिया गया और बेइज्जत कर के घर से भगा दिया गया. उस के बाद रवींद्र महतो महिला थाने पहुंचे और इंचार्ज पूनम कुमारी से मिल कर पूरी घटना की जानकारी दी.

रवींद्र ने जब एफआईआर दर्ज करने की गुजारिश की, तो थाना इंचार्ज ने उन से कहा कि आप लोग पटना के दीघा थाना इलाके में रहते हैं, इसलिए आरा में एफआईआर दर्ज करने से आप लोगों को बारबार पटना से आरा आनेजाने में काफी पैसा और समय बरबाद होगा. आरा के सभी मामले पटना में ही रैफर कर दिए जाते हैं, इसलिए दीघा थाने जा कर एफआईआर दर्ज कराएं, तो अच्छा रहेगा.

थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने कहा कि दीघा थाने के थानाध्यक्ष के पास जा कर मामला दर्ज कराएं. पूनम कुमारी ने यह भी भरोसा दिलाया कि अगर दीघा थानाध्यक्ष मामला दर्ज नहीं करेंगे, तो उन से उन की बात करा देना. महिला थाने से निराशा हाथ लगने के बाद रवींद्र महतो पटना के दीघा थाने गए. वहां पर पुलिस वालों को बेटी के साथ हुए अत्याचार की कहानी सुनाई और एफआईआर दर्ज करने की गुहार लगाई.

रवींद्र की बातों को सुनने के बाद पुलिस वालों ने साफतौर पर कहा कि यह मामला तो भोजपुर जिले के आरा शहर का है, इसलिए यहां तो किसी भी हालत में एफआईआर दर्ज नहीं होगी. आरा में जा कर ही मामला दर्ज कराएं. इस के बाद फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो थाने में ही बैठ कर रोने लगे और बेटी को इंसाफ दिलाने की रट लगाने लगे. इस के बाद भी पुलिस वालों ने उन की मदद नहीं की.

पटना पुलिस हैडक्वार्टर के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, 9 जून, 2016 को दोपहर में महिला थाने की थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने रिपोर्ट में कहा था कि घायल के परिजन खुद ही इंजरी रिपोर्ट और एफआईआर दर्ज नहीं कराना चाह रहे थे. उन का कहना था कि पटना में एफआईआर दर्ज करेंगे. इस से यह साफ हो जाता है कि महिला थानों में भी औरतों के मामले को ले कर किस कदर लापरवाही बरती जाती है. Crime Story

Hindi Stories: एक औरत की खता

Hindi Stories: रिजवाना खूबसूरत महिला थी. उस की खूबसूरती के जाल में उलझ कर नूर हसन ने मर्यादाओं को तोड़ दिया. लेकिन तलाक के डर से उस ने प्रेमी नहीं पति का साथ दिया. घर तो बचा लिया, लेकिन जेल जाने से नहीं बच सकी. एक रात नूर हसन जब अचानक लापता हो गया तो उस के घर वालों की परेशानी बढ़ गई. वह घर वालों के साथ ही सोया था,

सुबह देखा तो वह बिस्तर से गायब था. वह कहां चला गया? कोई नहीं जानता था. घर वालों को भी उस ने कुछ नहीं बताया था. हैरानी की बात यह थी कि उस का मोबाइल भी स्विच औफ आ रहा था. घर वालों ने अपने हिसाब से उस की खूब खोजबीन की. लेकिन जब उस का कुछ पता नहीं चला तो उस के चाचा अब्दुल हमीद ने थाना डोईवाला में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

38 वर्षीय नूर हसन उत्तराखंड के डोईवाला कस्बे के गांव कुडकावाला निवासी दिवंगत सकी जान का बेटा था. वह घर के पास ही परचून की दुकान चलाता था. उस के परिवार में पत्नी शबनम के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में एक 2 साल की बेटी और दूसरा 6 माह का दुधमुंहा बेटा था.

नूर हसन 6 अगस्त की देर रात लापता हुआ था. उस की गुमशुदगी दर्ज कर के थानाप्रभारी संदीप नेगी ने इस मामले की जांच में  एसएसआई प्रदीप चौहान व अन्य को लगा दिया था. पुलिस को लग रहा था कि नूर हसन शायद पत्नी से नाराज हो कर कहीं चला गया होगा, इसलिए पुलिस ने शबनम से पूछताछ की. पुलिस को उस ने बताया था कि वे दोनों हंसीखुशी से रहते थे. नाराजगी जैसी उन के बीच बिलकुल बात नहीं थी. वह लगभग 9 बजे बच्चों के साथ सो गई थी. सुबह नूर हसन गायब था और घर का दरवाजा खुला हुआ था. सुबह उस ने सोचा कि वह टहलने गए होंगे.

लेकिन जब 11 बजे तक वह नहीं आए, तो उस ने उन का मोबाइल नंबर मिलाया. मोबाइल स्विच औफ होने से उसे फिक्र हुई और उस ने अपने घर वालों को यह बात बताई. पूछताछ में एक बात बिलकुल साफ हो गई थी कि नूर हसन घर से अपनी मरजी से गया था. आखिर ऐसी क्या वजह थी, जो उस ने पत्नी को भी नहीं बताई. पुलिस ने जांच के लिए उस का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. मोबाइल की काल डिटेल्स के लिए कंपनी को लिख दिया गया.

पुलिस नूर हसन का कुछ पता लगा पाती, उस से पहले ही 3 दिनों बाद यानी 11 अगस्त, 2015 को लोगों ने इस्तेमाल में न आने वाले कुएं में एक शव देखा. कुएं से बदबू फैलने के बाद लोगों ने उस में देखा था. इस की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना पा कर थानाप्रभारी संदीप नेगी मय पुलिस बल के मौके पर पहुंच गए थे. कुआं गहरा था और उस में पानी के साथ गंदगी भी अटी पड़ी थी. ऐसे कुएं में जहरीली गैसें होती हैं, यह पुलिस जानती थी, इसलिए आक्सीजन सिलेंडर किट के जरिए अग्निशमन दल के कांस्टेबल दीपक थपलियाल को उस में उतारा गया.

अंतत: कड़ी मशक्कत के बाद शव को बाहर निकाल लिया गया. शव सड़ने लगा था. कुएं से शव मिलने की सूचना से गांव में सनसनी फैल गई थी. थोड़ी देर में वहां लोगों की भीड़ जमा हो गई. कुएं से जो शव बरागद हुआ था, उस की शिनाख्त नूर हसन के रूप में हो गई. नूर हसन की कनपटी और सिर में पीछे की तरफ चोट के निशान थे. मामला सीधेसीधे हत्या का था. पुलिस का अनुमान था, किसी बहाने से उसे कुएं तक बुलाया गया था और वहीं उस की हत्या कर के शव कुएं में फेंक दिया गया था. सूचना पा कर एसपी (देहात) जी.सी. ध्यानी व पुलिस उपाधीक्षक अरुण पांडे ने भी मौका मुआयना किया था.

पुलिस ने लिखापढ़ी कर के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के साथ ही अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस की विवेचना एसएसआई प्रदीप चौहान को सौंप दी गई. एसएसपी पुष्पक ज्योति ने इस मामलें में अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. नूरहसन की हत्या के खुलासे के लिए थानाप्रभारी संदीप नेगी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में एसएसआई प्रदीप चौहान, एसआई संजीत कुमार, कांस्टेबल मनोज कुमार, विपिन सैनी, सुरेश रमोलसा , नवनीत, धन सिंह व महिला कांस्टेबल सुलेखा को शामिल किया गया.

इस बीच मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में मृत्यु की वजह सिर में किसी भारी वस्तु से लगी चोट से हुआ ब्रेन हैमरेज व पानी में डूबना बताया गया था. एक दिन बाद मृतक की काल डिटेल्स भी पुलिस को मिल गई थी. पुलिस ने काल डिटेल्स की जांच की तो पाया कि लापता होने वाली रात नूर हसन की 1:33 और 1:38 बजे एक नंबर पर बात हुई थी. पुलिस समझ गई कि हत्या का राज उसी नंबर में छिपा है, जिस ने फोन किया था. पुलिस को लगा कि संदिग्ध नंबर के मालिक तक पहुंचते ही केस का खुलासा हो जाएगा.

पुलिस ने उस नंबर का कंपनी से पता हासिल किया तो वह चौंकी, क्योंकि वह नंबर भी नूर हसन के नाम पर ही था. उस नंबर से केवल नूर हसन से ही बात की जाती थी. लापता होने वाली रात से दोनों ही नंबर बंद थे. दूसरा नंबर या तो नूर हसन  के परिवार में होना चाहिए था या किसी ऐसे खास शख्स के पास, जो उस के बेहद नजदीक था. ऐसा भी संभव था कि उस ने दूसरा नंबर अपनी पत्नी को दिया हो. पुलिस ने उस की पत्नी से पूछताछ की तो उस ने उस नंबर के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया. उस ने यह भी बताया कि नंबर कौन इस्तेमाल कर रहा था, वह यह भी नहीं जानती. इस से हत्या की गुत्थी सुलझाने के बजाय और उलझ गई. देखतेदेखते कई दिन बीत गए.

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस मोबाइल में वह संदिग्ध नंबर इस्तेमाल किया गया था, उस में 2 सिमकार्ड इस्तेमाल होते थे. पुलिस ने दूसरे सिमकार्ड का नंबर हासिल कर के उस के मालिक का पता लगाया तो वह कुडकावाला के ही फिरोज के नाम निकला. इस से हत्या का मामला सुलझता नजर आया. 19 अगस्त को पुलिस उस के पास पहुंची तो पता चला कि वह मोबाइल उस की पत्नी रिजवाना इस्तेमाल करती थी. रिजवाना खूबसूरत महिला थी. पुलिस को सामने देख पतिपत्नी, दोनों बुरी तरह घबरा गए. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने ऐसा सनसनीखेज खुलासा किया कि पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई.

नूर हसन रिजवाना के हुस्न में उलझा हुआ था. यही हुस्न उसे बड़ी खामोशी और चालाकी से मौत की दहलीज तक ले गया. विस्तृत पूछताछ में चौंकाने वाली जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. रिजवाना देहरादून के महूवाला क्षेत्र की रहने वाली थी. करीब 10 साल पहले उस का निकाह फिरोज के साथ हुआ था. रिजवाना तेजतर्रार खूबसूरत युवती थी. उसे पा कर फिरोज खुशी से फूला नहीं समाया था. समय के साथ रिजवाना 2 बच्चों की मां बनी. फिरोज गांव में ही छोटा सा हेयरकटिंग सैलून चलाता था. उस का छोटा सा परिवार हर तरह की खुशिया समेटे हुए था. रिजवाना उन युवतियां में थी, जो अपनी खूबसूरती पर नाज करती हैं.

रिजवाना के पड़ोस में ही नूर हसन रहता था. वह पहले शहर में वेल्डिंग का काम करता था, लेकिन यह काम उसे रास नहीं आया तो एक साल पहले उस ने गांव आ कर परचून की दुकान खोल ली. एक दिन रिजवाना नूर हसन की दुकान पर आई तो वह उसे देखता रह गया. एक ही मोहल्ले का होने के कारण दोनों एकदूसरे को पहले से ही जानते थे, लेकिन उस दिन नूर हसन की नजरें उस पर अटक गई थीं. उस का मन किया कि रिजवाना के हुस्न की तारीफ करे, लेकिन वह यह सोच कर खामोश रहा कि कहीं वह बुरा न मान जाए. जिन हसरत भरी निगाहों से उस ने रिजवाना को देखा था, उस से रिजवाना को अपनी खूबसूरती पर और भी नाज हो गया था.

कहते हैं कि मर्द की नजरों को पहचानने में औरत का कोई सानी नहीं होता. दूसरे शब्दों में यह कुदरती हुनर होता है. अगले कुछ दिनों में रिजवाना की समझ में आ गया कि कुछ तो है, जो नूर हसन के दिल में चल रहा है. तभी वह उसे ऐसी नजरों से देखता है. यूं तो नूर हसन खुद भी 2 बच्चों का पिता था, परंतु रिजवाना की खूबसूरती उसे लुभा रही थी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह कभी मौका मिलने पर उस की खूबसूरती की तारीफ जरूर करेगा. एक दिन रिजवाना फिर उस की दुकान पर आई तो वह तारीफ करते हुए बोला,‘‘आप बुरा न माने तो एक बात कहूं भाभीजान?’’

‘‘हां कहो?’’ रिजवाना बोली.

‘‘पहले वादा कीजिए कि आप नाराज नहीं होंगी. इस से मुझे जो दर्द होगा, मैं खुद को कभी माफ नहीं कर सकूंगा.’’ यह बात उस ने इतने गंभीर लहजे में कही कि रिजवाना के मन में जिज्ञासा जाग गई और वह भी गंभीर हो गई, ‘‘ऐसी क्या बात है, जो तुम कहना चाहते हो?’’

‘‘बस यही कहना था कि आप बहुत खूबसूरत हैं. जो हुस्न आप ने पाया है, वह सब को नहीं मिलता. फिरोज खुशनसीब है, जो उसे आप जैसी शरीकेहयात मिली है.’’

तारीफ के अल्फाज हर किसी को खुश कर देते हैं. रिजवाना के साथ भी ऐसा ही हुआ. अपनी तारीफ सुन कर वह अंदर ही अंदर बहुत खुश हुई. वेसे भी नूर हसन की हसरतपूर्ण निगाहों ने उस के दिल में पहले ही जगह बना ली थी. इस के बाद जब दोनों मिलते, बातें कर लिया करते. एकाध बार ऐसा भी हुआ, जब नूर हसन फिरोज की अनुपस्थिति में किसी काम के बहाने उस के घर गया. रिजवाना कोई नादान नहीं थी. वह समझ गई कि नूर हसन उसे चाहता है. अब तक नूर हसन उसे भी अच्छा लगने लगा था. दोनों के दिलों में जो पनप रहा था, उसे एक दिन प्यार का नाम दे कर दोनों ने इजहार कर दिया.

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया और अकसर बातें करने लगे. कुछ समय ऐसे ही चलता रहा. इस के बाद दोनों एकदूसरे से मिलने का बहाना तलाशने लगे. रिजवाना सामान लेने के बहाने उस की दुकान पर आती तो वह भी किसी न किसी बहाने उस के घर पहुंच जाता. जमाने से उन्होंने अपने दिलों में पनपते प्यार को छिपाया हुआ था. रिजवाना ऐसी गलती कर चुकी थी, जो उसे नहीं करनी चाहिए थी. रिजवाना के मोबाइल में अकसर बैलेंस कम होने लगा तो फिरोज उस से सवालजवाब करने लगा. इस से उसे शक हो सकता था.

रिजवाना सतर्क हो गई. उस ने यह बात नूर हसन को बताई तो उस ने अपने नामपते से एक नया सिम कार्ड खरीदा और उसे रिजवाना को दे दिया, साथ ही ताकीद भी कर दी कि इस नंबर से वह सिर्फ उस से ही बात करेगी. रिजवाना के पास ड्यूल सिमकार्ड वाला मोबाइल था. उस के बाद वह नूर हसन से सिर्फ उसी नंबर से बात करने लगी. वह भी उसी नंबर पर बात करता था. दूसरी ओर फिरोज को पता भी नहीं था कि उस की बीवी क्या गुल खिला रही है. खुफिया मुलाकातों के दौर में एक दिन रिजवाना व नूर हसन ने मर्यादाओं की दीवार को गिरा दिया. दोनों शादीशुदा थे, नैतिक व सामाजिक नजरिए से यह गलत था, लेकिन दिल के हाथों की मजबूरी बहाना बन गई.

पतन की दलदल ऐसी होती है, जो इस में एक बार गिरता है, वह गिरता ही जाता है. उन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. उन के रिश्ते अकसर बनने लगे. वह पकड़े जा सकते थे. इस का रास्ता भी दोनों ने खोज निकाला. रिजवाना को जिस रात नूर हसन के आगोश में समाना होता था, उस रात वह॒॒फिरोज को खाने में नींद की गोलियां दे दिया करती थी. जब वह गहरी नींद में हो जाता था तो वह नूर हसन को फोन कर के बुला लेती थी. दोनों के बीच यह आए दिन का सिलसिला बन गया था. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. दोनों को ले कर लोगों में चर्चाएं होने लगीं. फिरोज को पता चल गया कि दिन में नूर हसन उस के घर जाता है. उस ने रिजवाना को डांटाफटकारा.

कुछ दिन तो रिजवाना सही रास्ते पर रही, लेकिन बहुत जल्द उस ने पुराना ढर्रा अपना लिया. फिरोज को किसी ने बताया था कि नूर हसन रात में भी उस की पत्नी से चोरीछिपे मिलता है. रिजवाना की गतिविधियों पर उसे शक तो हो ही गया था, इस तरह की बातों ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया. एक दिन उस ने नूर हसन को अपने घर से निकलते हुए देख लिया. वह घर के अंदर दाखिल हुआ तो रिजवाना चौंक गई. फिरोज उस की हालत देख कर समझ गया कि वह गलत डगर पर है. फिरोज गुस्से वाला युवक था. उस का खून खौल उठा. उस ने रिजवाना की जम कर पिटाई की और तलाक की धमकी दे डाली.

रिजवाना को अपना घर टूटता नजर आया तो वह त्रियाचरित्र पर उतर आई. उस ने रोरो कर बताया कि नूर हसन ने उसे अपने जाल में उलझा लिया था और उसे बदनाम करने की धमकी देता था, इसलिए वह खामोशी से अपने साथ होने वाले जुल्मों को सहती रही. फिरोज को उस के नाटक और आंसुओं पर भरोसा हो गया. उस ने रिजवाना को तो माफ कर दिया, लेकिन उसी दिन मन में ठान लिया कि वह नूर हसन को सबक सिखा कर रहेगा.

रिजवाना समझ गई थी कि घर टूटने से बेहतर अपने कदम संभालने में ही भलाई है. उस ने नूर हसन से बातें करनी बंद कर दीं. फिरोज अपमान की आग में झुलस रहा था. उस ने रिजवाना से कह दिया कि वह नूर हसन को जिंदा नहीं छोड़ेगा. वह जानता था कि रिजवाना के माध्यम से ही वह नूर हसन को उलझा सकता है. दोनों ने उसे मारने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 6 अगस्त की शाम रिजवाना ने उसे फोन कर के कहा, ‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’’

‘‘कह दो इस में सोचने की क्या बात है?’’ नूर हसन ने कहा.

रिजवाना राजदराना अंदाज में बोली, ‘‘मैं फोन पर नहीं कह सकती.’’

‘‘तो आज रात आ जाता हूं.’’ नूर हसन ने कहा तो वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘नहीं, तुम्हारा घर आना ठीक नहीं है. एक गड़बड़ हो गई है. मैं रात को मौका देख कर फोन करूंगी. तुम कुएं पर आ जाना, हम वहीं मिल लेंगे.’’

‘‘ठीक है.’’ नूर हसन ने कहा.

कई दिनों से दोनों के बीच रिश्ते नहीं बने थे. नूर हसन के मन में मिलने की तड़प थी. वह उस पर पूरा भरोसा करता था. रात में वह उस के फोन का बेसब्री से इंतजार करने लगा. उस की पत्नी व बच्चे सो चुके थे. देर रात एक बजे के बाद रिजवाना का फोन आया और उस ने उसे कुएं पर आने के लिए कहा. नूर हसन को ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि रिजवाना आज उसे मौत का पैगाम दे रही है. वह चुपके से घर से निकल गया.

उधर नूर हसन को फोन कर के फिरोज व रिजवाना कुएं पर पहुंच गए. रात के गहरे सन्नाटे में वहां कोई नहीं था. फिरोज छिप कर खड़ा हो गया, जबकि रिजवाना उस का इंतजार करने लगी. कुछ ही मिनटों में नूर हसन वहां आ गया. रिजवाना को अकेली पा कर उसे सुकून मिला. रिजवाना ने उसे बातों में  उलझा लिया, तभी फिरोज ने एक पत्थर उठाया और तेजी से उस के सिर व कनपटी पर वार कर दिए. अचानक हुए वार को नूर हसन सह नहीं पाया. वह बेहोश हो कर नीचे गिर गया. फिरोज ने रिजवाना की मदद से उसे उठाया और कुएं में डाल कर घर चले आए. बाद में नूर हसन का शव मिलने पर फिरोज न सिर्फ कुएं पर गया, बल्कि उस के परिवार के गम में भी शरीक हुआ. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि पुलिस कभी उन तक पहुंच पाएगी, लेकिन उन की यह सोच गलत साबित हुई और वह गिरफ्त में आ गए.

पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी पुष्पक ज्योति ने ढाई हजार रुपए का इनाम देने की घोषण भी की.

नूर हसन ने दूसरे की बीवी से रिश्ते बना कर विश्वास न किया होता और रिजवाना ने गलती कर के त्रियाचरित्र न दिखाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. अब उन के बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया है. कथा लिखे जाने दोनों हत्यारोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी और पुलिस उन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. Hindi Stories

True Crime Story: फिल्मी स्टाइल में सवा करोड़ की लूट

True Crime Story: कार ड्राइवर सुनील ने मालिक की सवा करोड़ की रकम लूटने के लिए जिस तरह योजना बनाई थी, वह थी तो बड़ी सटीक, लेकिन पुलिस उस से भी आगे निकली. लूट की रकम खर्च करने के पहले ही उसे साथियों के साथ पकड़ लिया.

8 सितंबर, 2015 को दोपहर करीब 2 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से एक डस्टर कार तेज गति से दौड़ पड़ी. कार में ड्राइवर सुनील के अलावा 5 लोग थे. कार थौमसन रोड पर कुछ दूर ही चली थी कि मंदिर के पास अचानक एक पल्सर मोटरसाइकिल सवार ने ओवरटेक कर के उस कार को रोक ली. अचानक मोटरसाइकिल के सामने आने पर डस्टर कार के ड्राइवर ने तेजी से ब्रेक लगाए, जिस से कार डिवाइडर से टकरातेटकराते बची. मोटरसाइकिल सवार एक सिख था, जो पुलिस वरदी में था. उस के साथ वाला व्यक्ति सफारी सूट पहने था. उस के पास वायरलैस था. वह मोटरसाइकिल खड़ी कर के सिख ड्राइवर की ओर आया और गेट खोल कर ड्राइवर से बोला, ‘‘खिसको.’’

इस से पहले कि कार ड्राइवर कुछ कहता, सिख ने ड्राइवर को जबरदस्ती खिसका कर ड्राइविंग सीट पर कब्जा कर लिया.

सिख के ड्राइविंग सीट संभालते ही डस्टर कार के पास एक आल्टो कार आ कर रुकी. उस में से 6 लोग उतरे, जिन में से 3 लोग डस्टर कार की पिछली सीट पर बैठ गए. पिछली सीट पर बैठे एक आदमी ने हड़बड़ा कर पूछा, ‘‘कौन हैं आप लोग?’’

तीनों में से एक आदमी ने रिवौल्वर तान कर डांटते हुए कहा, ‘‘दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच.’’

‘‘लेकिन आप का बर्ताव पुलिस जैसा नहीं है?’’ ड्राइवर बोला.

यह सुन कर आल्टो कार से आए लोग ठहाका लगा कर हंसे. सिख ने हंसते हुए कहा, ‘‘लगता है, इन का वास्ता पुलिस से कभी नहीं पड़ा, इसलिए ये पुलिस का बर्ताव नहीं जानते. संदीप जरा इन्हें पुलिस का बर्ताव तो दिखाओ.’’

संदीप ने रिवौल्वर लहराते हुए कहा, ‘‘इस में 7 गोलियां हैं और तुम लोग हो 4. हिसाब लगा लो, 3 के हिस्से में 2-2 गोलियां आएंगी और एक के हिस्से में एक गोली. अब अगर तुम में से किसी की भी जुबान से एक लफ्ज भी निकला तो मुझे ट्रिगर दबाने में वक्त नहीं लगेगा.’’

उस आदमी की बात सुन कर सभी डर गए.

डस्टर कार को सिख चला रहा था. डस्टर के पीछेपीछे आल्टो कार भी आ रही थी. संदीप की धमकी के बाद कार में एकदम खामोशी थी.

उस खामोशी को तोड़ते हुए संदीप ने कहा, ‘‘सामान डिक्की में ही रखा है न?’’

‘‘क…कैसा सामान?’’ डस्टर कार के ड्राइवर, जिसे सिख ने ड्राइविंग सीट से खिसकाया था, ने हड़बड़ा कर पूछा.

संदीप ने उस के सिर पर एक मुक्का मार कर कहा, ‘‘होशियारी दिखाता है, मैं उस सामान के बारे में पूछ रहा हूं, जिसे ये लोग झारखंड से लाए हैं. 2 सूटकेस और एक बड़ा गत्ते का डिब्बा, जिस में एक करोड़ से ज्यादा रुपए रखे हैं.’’

‘‘रुपए?’’ तीनों चौंके. उन में से एक ने कहा, ‘‘उस में रुपए नहीं, दूसरा कीमती सामान है. सामान क्या है, यह हमें भी नहीं पता.’’

‘‘तुम्हें नहीं पता तो कोई बात नहीं, लेकिन हमें पता है. उस में एक करोड़ से ज्यादा रुपए हैं.’’ संदीप ने कहा, ‘‘तुम लोग हवाला करोबार से जुड़े हो. बेखौफ हो कर इतनी बड़ी रकम ले कर आए हो. रास्ते में तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो… तुम्हें जहां जाना है, हम सुरक्षित पहुंचा देंगे.’’

सिख कार को गीता कालोनी की ओर जाने वाली सुनसान सड़क पर ले जाने लगा तो ड्राइवर ने कहा, ‘‘आप इधर कहां जा रहे हैं, हमें तो गुड़गांव जाना है. आप शायद रास्ता भूल गए हैं?’’

सिख ने उस की पसलियों पर कोहनी मार कर कहा, ‘‘तू हमें रास्ता बताएगा? चुपचाप बैठा रह, वरना कार से बाहर फेंक दूंगा.’’

सिख की इस धमकी से ड्राइवर की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. कुछ देर बाद सिख ने कार सुनसान जगह पर रोक दी, जहां जंगल था. आल्टो कार भी आ कर वहीं रुक गई.

सिख ने सभी को कार से बाहर उतारा और उन में से 3 को हड़काते हुए जंगल में ले गया. उन्हें धमका कर बोला, ‘‘जब तक मैं न कहूं, सिर झुकाए यहीं बैठे रहना. जांच में खलल डाला तो यहीं ढेर कर दूंगा.’’

उन लोगों को वहीं छोड़ कर सिख कार के पास आ गया. डर की वजह से तीनों सिर झुकाए वहीं बैठे रहे.

काफी देर बाद भी जब सिख ने उन्हें जंगल से बाहर आने को नहीं कहा तो उन्हें शंका हुई. वे डरतेडरते कार के पास पहुंचे तो वहां ड्राइवर सुनील सड़क पर पड़ा कराह रहा था. उस के कपड़े फटे हुए थे.

सुनील ने कराहते हुए बताया, ‘‘वे लोग कार की डिक्की में रखे दोनों सूटकेस और गत्ते का डिब्बा ले कर अपनी कार से भाग गए हैं. मैं ने उन्हें रोका तो उन्होंने मेरी पिटाई कर के मेरे कपड़े फाड़ दिए. मैं ने कार का नंबर पढ़ने की कोशिश की, मगर नंबर प्लेट पर काला पेंट लगा था, इसलिए नंबर नहीं पढ़ सका.’’

दरअसल, झारखंड के जिला रांची के रहने वाले प्रभय महतो और लक्ष्मी सिंह जिला रायगढ़ स्थित आलोक स्टील कंपनी के एकाउंट डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे. 5 सितंबर, 2015 को कंपनी के मालिक आलोक संगता ने दोनों से कहा कि उन्हें 7 सितंबर, 2015 को कुछ जरूरी सामान ले कर गुड़गांव स्थित कंपनी के औफिस जाना है. कंपनी की ओर से प्रभय महतो और लक्ष्मी सिंह का रिजर्वेशन गरीबरथ एक्सप्रैस में रायगढ़ के बरकाना रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली तक का करा दिया गया था. आलोक संगता ने दोनों को 2 सूटकेस और एक गत्ते का डिब्बा दे कर कंपनी की कार से बरकाना रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया था.

शाम 7 बजे ट्रेन बरकाना रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली के लिए चली और सुबह 11 बजे गाजियाबाद स्टेशन पर पहुंची. तभी कंपनी के गुड़गांव औफिस के ब्रजेश पांडेय ने प्रभय महतो को फोन कर के पूछा, ‘‘आप लोग इस समय कहां हैं?’’

प्रभय महतो ने बताया कि ट्रेन गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से चल चुकी है. ट्रेन आनंद विहार रेलवे स्टेशन पहुंची तो ब्रजेश पांडेय ने फिर फोन कर के उन की लोकेशन पूछी. टे्रन करीब पौने 2 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफौर्म नंबर 7 पर पहुंची तो प्रभय महतो और लक्ष्मी सिंह अपने साथ लाए सामान को ले कर उतरे. ट्रेन के गेट पर ही उन्हें गुड़गांव औफिस के ब्रजेश पांडेय, विजय मिश्रा और ड्राइवर सुनील मिले. तीनों ने सूटकेस और गत्ते का डिब्बा उठा लिए. इस के बाद सभी स्टेशन से बाहर कार पार्किंग में गए, जहां उन्होंने अपनी डस्टर कार खड़ी कर रखी थी. सामान कार की डिक्की में रख कर सभी कार में बैठ गए. सुनील ड्राइविंग सीट पर बैठा तो उसी के बराबर में अगली सीट पर ब्रजेश बैठ गया.

बाकी के तीनों पिछली सीट पर बैठ गए. सुनील कार चला कर कुछ ही दूर पहुंचा था कि लूट की यह वारदात हो गई. लक्ष्मी सिंह और प्रभय महतो को नहीं मालूम था कि सूटकेसों एवं गत्ते के डिब्बे में कौन सा कीमती सामान था? यह बात तो उन्हें अब पता चली कि उन में एक करोड़ से ज्यादा रुपए रखे थे. कंपनी के मालिक आलोक संगता तो इसी तरह कीमती सामान कह कर अकसर रायगढ़ स्थित कंपनी औफिस से उन्हें गुड़गांव भेजते रहते थे. बस हर बार वह कर्मचारी बदल दिया करते थे. लेकिन नई दिल्ली स्टेशन पर से वह सामान लेने के लिए ब्रजेश पांडेय, विजय मिश्रा और ड्राइवर सुनील ही आते थे.

लूट कितने की हुई थी, यह ब्रजेश और उस के साथियों को भी पता नहीं थी. लुटेरे उन के मोबाइल भी अपने साथ ले गए थे, इसलिए वे लूट की खबर भी अपने मालिक और पुलिस को नहीं दे सके. वे कार से गुड़गांव औफिस जाना चाहते थे, लेकिन सुनील ने जब डस्टर कार स्टार्ट करनी चाही तो वह स्टार्ट नहीं हुई. शायद जाते समय लुटेरे कार में कुछ गड़बड़ी कर गए थे, जिस से कार स्टार्ट नहीं हो रही थी. वे बस द्वारा आईएसबीटी पहुंचे और वहां से औटो ले कर गुड़गांव औफिस पहुंचे.

गुड़गांव औफिस पहुंच कर प्रभय महतो ने कंपनी के मालिक आलोक संगता को फोन द्वारा वारदात की सूचना दी. संगता ने प्रभय महतो से कह दिया कि वह तुरंत पुलिस को फोन न करे. उन्होंने कहा कि वह अपने बड़े भाई अभिषेक संगता से सलाह ले कर उन्हें सूचना देते हैं. जब इस लूट की खबर अभिषेक संगता को बताई गई तो उन्होंने प्रभय महतो को पटियाला हाउस कोर्ट के एक वकील का पता बताते हुए उन से मिलने को कहा. प्रभय महतो अपने साथियों के साथ पटियाला हाउस पहुंचा और अभिषेक संगता द्वारा बताए वकील से मिला. वकील के कहने पर प्रभय महतो ने पुलिस कंट्रोल रूम को लूट की सूचना दी.

यह इलाका थाना कमला मार्केट थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम की कार के अलावा थाना कमला मार्केट के भी 2 पुलिसकर्मी उस स्थान पर पहुंच गए, जहां यह घटना घटी थी. थानाप्रभारी यशवीर सिंह भी घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने एक करोड़ से अधिक रुपए की लूट की सूचना डीसीपी परमादित्य को दी तो वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए और दिल्ली के समस्त थानों को वायरलैस द्वारा सूचना प्रसारित करा दी, ताकि नाकाबंदी कर बदमाशों की तलाश की जा सके.

पुलिस अधिकारियों को जब पता चला कि लुटेरों में एक सरदार भी था और वह पुलिस वरदी में था तो वे हैरान रह गए. डीसीपी के निर्देश पर थानाप्रभारी ने प्रभय महतो की ओर से अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंवि की धारा 365/392/397/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. दिनदहाड़े एक करोड़ से ज्यादा की लूट की वारदात ने पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए थे. पुलिस के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती थी. इसलिए डीसीपी परमादित्य ने इस केस के खुलासे के लिए जिले के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों की अगुवाई में पुलिस की 3 टीमें बनाईं.

पहली टीम कमला मार्केट के थानाप्रभारी यशवीर सिंह, दूसरी हौजकाजी के थानाप्रभारी जरनैल सिंह और तीसरी चांदनी महल के थानाप्रभारी अनिल शर्मा के नेतृत्व में बनाई. स्पैशल स्टाफ के प्रभारी को भी टीमों के साथ लगा दिया गया. तीनों टीमों का नेतृत्व एसीपी अनिल कपूर कर रहे थे. पुलिस कमिश्नर के आदेश पर क्राइम ब्रांच भी इस केस की छानबीन में जुट गई. पुलिस की तीनों टीमों ने घटनास्थल का मुआयना किया और ब्रजेश पांडेय, विजय मिश्रा, सुनील, प्रभय महतो एवं लक्ष्मी सिंह से विस्तृत पूछताछ की. उन्होंने डस्टर कार की जांच की तो पता चला कि उस में सैंटर लौकिंग सिस्टम था.

पूछताछ में ड्राइवर सुनील के हावभाव और जवाब देने का अंदाज देख कर थानाप्रभारी यशवीर सिंह को उस पर शक हुआ. सुनील पर शक करने के लिए यशवीर सिंह के दिमाग में 4 बातें थीं. पहला सुनील का वेतन 14 हजार रुपए प्रति महीना था, जबकि वह अमीरों की तरह रहता था. उस के गले में सोने की मोटी चेन, हाथों की अंगुलियों में सोने की अंगूठियां, महंगी जींस, टीशर्ट, कीमती घड़ी थी.

दूसरा कारण यह था कि जब डस्टर कार में कीमती सामान था तो उस ने कार को ओवरटेक करने वाले मोटरसाइकिल सवार सिख को देखते ही कार क्यों रोकी थी? तीसरी वजह डस्टर कार में सेंटर लौकिंग सिस्टम था तो सिख ने कार का गेट कैसे खोल लिया? इस से साफ जाहिर था कि सुनील ने सेंटर लौकिंग सिस्टम को पहले से ही खोल रखा था. चौथा कारण सुनील के पास 5 मोबाइल थे, जबकि उस ने पुलिस को एक ही फोन होना बताया था. बहरहाल थानाप्रभारी यशवीर सिंह ने सुनील से कहा कुछ नहीं. उन्होंने उस की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सबइंसपेक्टर मंगेश सिंह को सादा लिबास में लगा दिया. पता चला कि सुनील दिल्ली में किराए के मकान में रहता था, जो मोतीबाग के नजदीक था. एसआई योगेश सिंह उस पर नजर रखने लगे.

जिस जगह पर डस्टर कार रोक कर उस में लुटेरे सवार हुए थे, थानाप्रभारी जरनैल सिंह की टीम ने वहां एक जगह पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग फुटेज निकलवाई. फुटेज में एक सिख युवक दिखाई दिया, जो पुलिस वरदी में था. फुटेज में 1-2 औटो भी दिखाई दिए, जिन नंबरों के आधार पर थानाप्रभारी जरनैल सिंह की टीम उन के चालकों तक पहुंच गई. पुलिस ने उन चालकों से उस लूट के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने लूट की वारदात से तो अनभिज्ञ बताया, लेकिन फुटेज में दिखे सिख युवक को पहचान लिया. उन्होंने बताया कि इस का नाम बेअंत सिंह है और यह दिल्ली कैंट इलाके में रहता है. उन्होंने यह भी बताया कि पहले यह औटो चलाता था, लेकिन अब उस के कई औटो किराए पर चल रहे हैं. इसी वजह से वे उसे जानते हैं.

इंसपेक्टर जरनैल सिंह के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. इस के बाद डीसीपी की सलाह पर उन्होंने बेअंत सिंह के घर की निगरानी पर एसआई दीपक कुमार व हेडकांस्टेबल जगदेव सिंह सिद्धू को लगा दिया. ड्राइवर सुनील की गतिविधियों पर नजर रख रहे एसआई मंगेश सिंह ने 10 सितंबर, 2015 की शाम 5 बजे देखा, सुनील बनठन कर औटो पर सवार हो कर चल पड़ा. मंगेश सिंह भी उस के पीछे लग गए. काफी देर बाद औटो दिल्ली कैंट स्थित एक मकान के बाहर रुका. औटोचालक को पैसा देने के बाद सुनील एक मकान के बाहर खड़े हो कर मोबाइल से बात करने लगा. कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो सुनील अंदर चला गया. उस के बाद दरवाजा बंद हो गया.

एसआई मंगेश सिंह ने उसी मकान के पास सादा लिबास पहने थाना हौजकाजी के एसआई दीपक कुमार और हेडकांस्टेबल जगदेव सिंह सिद्धू को खड़े देखा तो वह उन के पास पहुंच गए. वहां पर एक आल्टो कार भी खड़ी थी. लूट की वारदात में भी आल्टो कार का प्रयोग हुआ था. इस से उन्हें लगा कि लुटेरों का इस मकान से जरूर कोई संबंध है. लगभग 5 मिनट बाद 2 युवक उसी मकान के सामने रुके. एक ने फोन किया तो दरवाजा खुला. दोनों के अंदर घुसते ही दवाजा बंद हो गया. लगभग 5 मिनट बाद औटो से 3 युवक उतरे. उन में से एक ने फोन किया तो दरवाजा खुला. उन तीनों के अंदर जाते ही दवाजा बंद हो गया.

‘‘क्या चक्कर है? लूट की वारदात में 7 लोग शामिल थे और यहां भी 7 इकट्ठे हो गए हैं,’’ हेडकांस्टेबल सिद्धू ने कहा तो मंगेश सिंह बोले, ‘‘लूट की कामयाबी का जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए होंगे.’’

एसआई दीपक कुमार मुसकराते हुए बोले, ‘‘शायद इन लोगों को पता नहीं कि तिहाड़ जेल में इन का स्वागत होने वाला है.’’

लगभग आधे घंटे बाद सुनील और बेअंत सिंह के साथ 5 युवक उस मकान से बाहर आए और मकान के सामने खड़ी आल्टो कार में बैठ गए. बेअंत सिंह कार ड्राइव करने लगा. एसआई मंगेश सिंह, दीपक कुमार, हेडकांस्टेबल जगदेव सिंह सिद्धू कार के पीछे लग गए. आल्टो कार कनाट प्लेस स्थित एक वाइन शौप के सामने रुकी. एक युवक उतरा और उस दुकान से व्हिस्की की 2 बोतलें खरीद कर पास ही स्थित एक होटल में चला गया. अन्य लोग भी कार से उतर कर उसी होटल में घुस गए.  नशे में अकसर लोग डींगें हांकने लगते हैं. वे सातों क्या डींगें हाकेंगे, यह जानने के लिए उन का पीछा कर रहे पुलिसकर्मी भी उसी होटल में पहुंच गए और बातें सुनने के लिए उन्हीं के इर्दगिर्द बैठ गए. यह सारी जानकारी उन्होंने एसीपी अनिल कपूर को दे दी थी.

सातों एक ही मेज के इर्दगिर्द रखी कुर्सियों पर बैठ कर शराब पीने लगे, साथ ही वे मुर्गे की टांगें भी खींच रहे थे. हेडकांस्टेबल सिद्धू उन के पास एक खाली कुर्सी पर जा कर बैठ गए. उन्होंने वेटर को गोभी परांठा और कौफी का और्डर दे दिया. सातों 2 घंटे वहां बैठ कर सारी शराब पी गए, लेकिन लूट के बारे में कोई बात नहीं की. इधरउधर की फालतू बातें करते रहे. शराब पी कर सभी होटल से बाहर निकले तो सुनील और बेअंत सिंह तो कार में बैठ गए, जबकि बाकी के पांचों युवक अलगअलग रूट की बसों से कहीं चले गए.

एसआई दीपक कुमार कार का पीछा करने लगे. बेअंत सिंह ने कार पूसा रोड के पास रोकी तो सुनील कार से उतर कर 755 नंबर की बस में बैठ गया. इस के बाद बेअंत सिंह अपने घर चला गया. उधर बस से सुनील भी अपने घर चला गया था. पलपल की जानकारी एसीपी अनिल कपूर को मिल रही थी. उन्होंने थानाप्रभारी यशवीर सिंह की टीम से सुनील को हिरासत में ले कर पूछताछ करने को कहा तो पुलिस टीम सुनील को हिरासत में ले कर थाना कमला मार्केट ले आई. एसीपी अनिल कपूर की मौजूदगी में यशवीर सिंह ने जब सुनील से सख्ती से पूछताछ की तो वह ज्यादा देर तक झूठ की बैसाखियों पर खड़ा नहीं रह सका और सच उगल दिया. उस ने लूट में शामिल सभी साथियों के नाम बता दिए.

इस के बाद थाना चांदनी महल के थानाप्रभारी अनिल शर्मा की टीम ने दिल्ली कैंट, आनंद निकेतन, ग्रेटर कैलाश, फतेहपुर बेरी, रानापुर खुर्द में ताबड़तोड़ छापे मार कर बेअंत सिंह और उस के साथियों, श्रद्धा, सुदेश, अशोक, नरेश उर्फ दीपक, संदीप को गिरफ्तार कर लिया. ये सभी लूट की वारदात में शामिल थे. डीसीपी परमादित्य की उपस्थिति में सभी से पूछताछ की गई तो सहजता से सभी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और लूट की वारदात की पृष्ठभूमि में छिपी कहानी बयां कर दी.

ड्राइवर सुनील पहले दिल्ली में औटो चलाता था. वह असम का रहने वाला था. 4 साल पहले उस ने औटो चलाना बंद कर के रायगढ़ (झारखंड) स्थित आलोक स्टील कंपनी प्रा. लि. के गुड़गांव स्थित औफिस की कार चलाने लगा. कंपनी के मालिक आलोक संगता गुड़गांव एवं नोएडा में रियल एस्टेट का भी कारोबार करते थे. आलोक संगता हर 2-3 महीने में रायगढ़ से अपने कर्मचारियों के जरिए सूटकेसों व गत्ते डिब्बों में करोड़ों रुपए की रकम गुड़गांव औफिस भेजा करते थे. किसी भी कर्मचारी को इस बात की भनक नहीं होती थी कि सूटकेसों व गत्ते के डिब्बे में करोड़ों रुपए की रकम होती है. यह बात सिर्फ आलोक संगता के सब से खासमखास ब्रजेश पांडेय को पता होती थी.

करीब 7 महीने पहले ब्रजेश पांडेय ने शराब के नशे में सुनील को यह बात बताई तो उस के दिमाग में लालच आ गया और वह लूट की वारदात कराने का खाका बनाने लगा. सेना से निकाले गए बेअंत सिंह से सुनील की अच्छी जानपहचान थी. बेअंत सिंह के पास कई औटो थे, जिन पर उस ने ड्राइवर रख रखे थे. सुनील भी पहले बेअंत सिंह का औटो चलाता था. सुनील ने कंपनी की रकम की लूट की बात बेअंत सिंह को बता कर योजना भी बता दी. बेअंत सिंह लूट की वारदात को अंजाम देने के लिए तैयार हो गया.

बेअंत सिंह ने अपने ही औटोचालक श्रद्धा (27 वर्ष), सुदेश (33 वर्ष), अशोक (29 वर्ष), नरेश उर्फ दीपक (31 वर्ष), संदीप उर्फ बिट्टू (35 वर्ष) को लूट की योजना में शामिल कर लिया. 7 सितंबर, 2015 की सुबह ब्रजेश पांडेय ने सुनील से कहा, ‘‘कल दोपहर को कंपनी से 2 कर्मचारी कंपनी का कीमती सामान ले कर आएंगे. उन्हें लेने के लिए हमें नई दिल्ली स्टेशन जाना है. ट्रेन 2 बजे के आसपास आएगी. उस वक्त तुम औफिस में ही रहना.’’

सुनील को जिस मौके का इंतजार था, वह मौका 8 सितंबर को खत्म होने वाला था. 7 सितंबर, 2015 की शाम को वह बेअंत सिंह के घर गया और पूरी बात बता दी. बेअंत सिंह ने योजना में शामिल औटो चालकों को फौरन अपने घर बुला लिया. इस के बाद योजना के एकएक पहलू पर बात हुई. बेअंत सिंह ने हरिनगर के एक दरजी से सिपाही की वरदी सिलवा ली थी, एक देसी तमंचे का भी इंतजाम कर लिया था. 8 तिसंबर, 2015 की सुबह 8 से 10 बजे तक सभी ने, जिस जगह लूट करनी थी, वहां लूट का कई बार ट्रायल किया.

दोपहर 1 बजे बेअंत सिंह अपनी लाइसैंसी रिवौल्वर, पुलिस वरदी, देशी तमंचा ले कर अपनी आल्टो कार से पूसा रोड पहुंचा. वहीं सभी एकत्र हुए. वहीं पर बेअंत सिंह ने वरदी पहनी. सुनील ने अपनी पलसर मोटरसाइकिल श्रद्धा को दे रखी थी. अब उन्हें ड्राइवर सुनील के सिग्नल मिलने का इंतजार था. उन का इंतजार खत्म हुआ दोपहर 2 बजे. जब सुनील ने बेअंत सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘भाईसाहब, आप तैयार रहना, आज नाइट शो देखने जरूर चलेंगे.’’

यह बेअंत सिंह के लिए कोड वर्ड में इशारा था. यह सुन कर बेअंत सिंह मोटर साइकिल पर सवार हुआ और पांचों औटोचालक उस की आल्टो कार में सवार हुए. सभी थौमसन रोड पर खड़े हो कर मौके का इंतजार करने लगे. कुछ देर बाद डस्टर कार आती नजर आई तो सभी अलर्ट हो गए. बेअंत सिंह ने मोटरसाइकिल से कार को ओवरटेक कर के उस के आगे खड़ी कर दी. सुनील ने कार का सेंट्रल लौकिंग सिस्टम पहले ही खुला रखा था. बेअंत सिंह दरवाजा खोल कर सुनील को धकेल कर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया.

आल्टो कार भी वहीं आ कर रुक गई तो बेअंत सिंह ने अगली सीट पर बैठे ब्रजेश पांडेय को उतार कर आल्टो कार में बैठा दिया. इस के बाद योजनाबद्ध तरीके से उन्होंने लूट की इस बड़ी वारदात को अंजाम दिया. पुलिस ने अभियुक्तों की निशानदेही पर लूट की वारदात में प्रयुक्त आल्टो कार, पलसर मोटरसाइकिल, पुलिस वरदी, बेअंत सिंह का लाइसैंसी रिवौल्वर, देसी तमंचा के अलावा लूटे गए 1 करोड़ 25 लाख रुपए बरामद कर लिए.

सातों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें तीसहजारी कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अपने मालिक की रकम पर सुनील के मन में लालच नहीं आता तो वह और उस के 6 साथी आज सलाखों के पीछे नहीं होते. लालच उसे ही नहीं, उस के साथियों को भी ले डूबा. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: बहनों से छेड़छाड़, भाइयों की मुसीबत

Crime News: साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाला राजा नामक नौजवान दिल्ली से लगे नोएडा के एक कार गैराज में नौकरी करता था. उसे घायल हालत में अस्पताल में भरती कराया गया. 3 दिन जिंदगी और मौत से जूझने के बाद राजा की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट गई. वह मारपीट में बुरी तरह से घायल हुआ था. उस के सिर व बदन के दूसरे हिस्सों पर चोटों के निशान थे.

उस की मौत ने न सिर्फ उस के परिवार, बल्कि उस के जानकारों को भी हिला कर रख दिया. राजा की गलती महज इतनी थी कि वह अपनी बहन के साथ आएदिन होने वाली छेड़छाड़ का विरोध करता था. किसी ने सोचा भी नहीं था कि विरोध करने पर मनचला अपने साथियों के साथ उसे इस तरह निशाना बना लेगा. एक भाई के लिए यह जरूरी भी हो जाता है कि जब कोई सिरफिरा शोहदा उस की बहन को छेड़े, तो वह विरोध करे, लेकिन मनचलों के हौसले बुलंद होते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसे विरोध से उन की तौहीन हो गई है और वे सीनाजोरी कर के मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं.

दरअसल, राजा की बहन को एक शोहदा वसीम अकसर ही परेशान किया करता था. मौका लगने पर छेड़छाड़ और फब्तियां कसता था. राजा ने इस बात का कई बार विरोध किया, लेकिन उस की हरकतें बंद नहीं हुईं. एक दिन वसीम ने अपने साथियों के साथ मिल कर राजा की जम कर पिटाई कर दी. गंभीर चोटों के बाद उस की मौत हो गई. पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. कानून ने अपना काम किया, लेकिन बात सिर्फ इतने पर खत्म नहीं हो जाती. सवाल है कि किसी सभ्य समाज में क्या एक भाई को यह सब सहना चाहिए?

समाज में इस तरह की वारदातों में इजाफा हो रहा है. हर छोटेबड़े शहर में शोहदे हैं. हर मिनट कोई लड़की आहत हो कर खून का घूंट पी रही होती है और शोहदे कौलर तान कर निकल जाते हैं. विरोध करने पर सिरफुटौव्वल होती है. बहन के साथ होने वाली छेड़छाड़ के विरोध की कीमत चुकाने वाला राजा कोई एक अकेला नौजवान नहीं था. उत्तर प्रदेश के बरेली में तो बहन से छेड़छाड़ करने पर दबंगों ने एक भाई की सरेआम हत्या कर दी. दरअसल, संजय नगर इलाके में एक लड़की सावित्री घर के बाहर खड़े हो कर अपने भाई नन्हे से बात कर रही थी. इसी बीच मोटरसाइकिल सवार एक लड़के ने उसे हलकी टक्कर मार दी.

सावित्री ने विरोध किया, तो उस ने दबंगई दिखा कर छेड़छाड़ कर दी. गुस्से में आए भाई ने उस लड़के को पीट दिया. वह लड़का तब तो चला गया, लेकिन कुछ देर बाद वह अपने दोस्तों के साथ आया और भाई से मारपीट कर दी. उन्होंने उस के सिर पर फरसे से वार किए. तेज वार से नन्हे लहूलुहान हो कर गिर गया और उस की मौत हो गई. मामला किसी छोटी जाति की लड़की का हो, तो दबंग उस पर अपना हक समझते हैं कि वह बिना नानुकर किए उन की बात मान ले.

सुलतानपुर का मामला कुछ ऐसा ही है. कादीपुर कोतवाली क्षेत्र में पिछड़ी जाति के निषाद की बेटी रीना (बदला नाम) खेत पर गई थी, तभी 3 दबंगों ने छेड़छाड़ करते हुए उसे दबोच लिया. इसी बीच रीना का भाई उधर पहुंच गया. बहन की चीखपुकार सुन कर उस की आबरू बचाने के लिए वह दबंगों से भिड़ गया. उन्होंने उसे मारपीट कर अधमरा कर दिया. बाद में अस्पताल में उस की मौत हो गई. गांवदेहात में कमजोर लोगों की बहूबेटियों पर दबंगों की गंदी नजरें मंडराती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. विरोध करने पर उन्हें तरहतरह से सताया जाता है.

हापुड़ के हरसांव गांव का रहने वाला एक लड़का अपनी बहन के साथ जा रहा था, तभी रास्ते में एक मनचले ने उस की बहन का हाथ पकड़ लिया. भाई ने विरोध किया, तो उस के साथ मारपीट कर मनचला मौके से फरार हो गया. छेड़छाड़ करने वाले सड़कों, महल्लों से ले कर स्कूलकालेजों के बाहर तक मंडराते हैं. गाजियाबाद शहर के एक कालेज के बाहर 10वीं जमात की एक छात्रा के साथ मनचले अकसर छेड़छाड़ किया करते थे. उस ने इस की शिकायत अपने भाई से की.

एक दिन उस छात्रा का भाई छुट्टी के वक्त पहुंच गया. मनचलों ने वही हरकत दोहराई, तो भाई ने विरोध किया. मनचलों को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने भाई को दौड़ादौड़ा कर इतना पीटा कि उसे आईसीयू में भरती कराना पड़ा. हालांकि बाद में पुलिस ने मनचलों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. इसी तरह कानपुर शहर में एक वारदात हुई. 12वीं जमात की एक छात्रा के साथ एक मनचला अकसर छेड़खानी किया करता था. एक दिन वह घर से कोचिंग क्लास के लिए निकली, तो मनचले ने रास्ता घेर कर उसे रोक लिया और उसे जबरन मोटरसाइकिल पर बैठाने की कोशिश की.

घर पहुंच कर उस लड़की ने अपने भाई को जानकारी दी. गुस्साया भाई अपने एक दोस्त के साथ मनचले के घर शिकायत करने पहुंचा. मनचले ने उलटा उन पर हमला बोल दिया. बैल्ट व डंडों से पीट कर उन दोनों को घायल कर दिया. मेरठ शहर के सदर इलाके में भी एक नौजवान को अपनी बहन के साथ हुई छेड़छाड़ का विरोध करना भारी पड़ गया. हुआ यों कि एक लड़की अपने घर के बाहर खड़ी थी. इसी दौरान 2 दोस्तों के साथ जा रहे एक लड़के ने लड़की पर फब्तियां कसीं और उस का मोबाइल नंबर पूछा.

इसी बीच घर से बाहर निकले भाई ने उन लड़कों की इस हरकत का विरोध किया, तो उन्होंने उस के साथ मारपीट कर दी. मौके पर खड़ी भीड़ तमाशा देखती रही. पुलिस के पहुंचने तक हमलावर फरार हो गए. छेड़छाड़ करने वाले ज्यादातर मनचले इस सोच के मारे होते हैं कि वे कुछ भी हासिल कर सकते हैं. जो लड़की के पक्ष में आता है, उसे गुंडई कर के सबक भी सिखाते हैं. ऐसे मनचले लड़कियों को गंदे इशारे करते हैं, उन्हें छू कर निकलते हैं, वासना भरी नजरों से घूरते हैं और सीटी बजाते हैं.

अमूमन हर रोज ऐसी हरकतों को सहा जाता है. जब कोई भाई अपनी बहन को छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश करता है, तो उसे बहुतकुछ सहना पड़ता है. मामला मारपीट और पुलिस तक जाए, तो समाज कई बार लड़की को ही गलत नजर से देखता है. उस का घर से निकलना तक बंद हो जाता है. मनचलों को कानून का डर नहीं होता. छेड़छाड़ के मामले में शायद ही कभी किसी को सजा हुई हो. वकील सुदेश त्यागी बताते हैं कि पुलिस ऐसे मामलों में छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ धारा-294 के तहत कार्यवाही करती है. इस में ज्यादा से ज्यादा 3 महीने की सजा या जुर्माने का प्रावधान है. ऐसे में अपराध अदालत के सामने साबित भी करना होता है.

समाज में बढ़ती छेड़छाड़ की बीमारी से उन भाइयों की हालत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है, जो अपनी बहन की आबरू को ले कर फिक्रमंद रहते हैं. वे गलत हरकत का विरोध करते हैं, तो उन्हें तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है, रंजिशें पनपती हैं और हत्याएं तक हो जाती हैं. पुलिस अफसर नरेंद्र प्रताप कहते हैं कि इस तरह के मामलों में तुरंत पुलिस को सूचित करना चाहिए. औरतों के लिए अलग से भी हैल्पलाइन नंबर हैं. उन पर भी सूचना दी जा सकती है.

दुखी हो कर बने कातिल

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले का रहने वाला संतराम भी ऐसा ही एक भाई है, जिसे छेड़छाड़ से तंग आ कर हत्या तक करनी पड़ गई. दरअसल, राजीव नामक दबंग लड़का संतराम की बहन पर बुरी नजर रखता था. वह अकसर उस के साथ छेड़छाड़ करता था. बारबार समझाने पर भी जब वह नहीं माना, तो संतराम ने दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया. एक दिन संतराम ने अपने साथी के साथ मिल कर राजीव को बुलाया. पहले उसे शराब पिलाई, फिर डंडे से सिर पर वार कर के उस की हत्या कर दी. तफतीश में मामला खुला, तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

हरियाणा के करनाल शहर का मामला भी कुछ ऐसा ही रहा. 5 नौजवानों ने चाकुओं से गोद कर बसस्टैंड इलाके में एक लड़के विजय राणा की हत्या कर दी. गिरफ्तारी के बाद पता चला कि विजय राणा आरोपियों में से एक की बहन के साथ छेड़छाड़ व पीछा किया करता था. इसी बात से गुस्साए भाई ने अपने साथियों के साथ मिल कर उस की हत्या कर डाली. Crime News