Hindi stories: तवायफ का प्यार

Hindi stories: समाज की यही सोच है कि तवायफ सिर्फ पैसों से प्यार करती है, लेकिन कजरी अपने प्रेमी जावेद के बेटे को जिस तरह पालपोस कर बड़ा कर रही है, उस से साफ साबित होता है कि तवायफ के अंदर भी दिल होता है, जो किसी से प्यार भी कर सकता है.

शहर के बीच बने उस प्रमुख बाजार में काफी रौनक थी. सड़क किनारे दोनों ओर दुकानें बनी थीं तो उन के ऊपर रहने के लिए मकान बने थे. उन मकानों पर जाने के लिए दुकानों के बराबर सीढि़यां बनी थीं. यह बात अलग थी कि उन पर चढ़ने से ज्यादातर लोग कतराते थे. मकानों की रैलिंग और खिड़कियों पर रंगबिरंगी भड़काऊ पोशाक व चेहरोें पर गाढ़ा मेकअप पोते लड़कियां खड़ी रहती थीं. सड़क पर आनेजाने वाले लोग कनखियों से उन की ओर देखते तो आंखों व हाथों को नचा कर इशारे कर दिया करती थीं. जहां वे रह रही थीं, वहां की भाषा में वे तवायफों के कोठे थे.

नीचे जो बाजार थी, वहां कपड़े, राशन, हार्डवेयर, चाय आदि की दुकानें थीं. ये कोठे अंगरेजों के जमाने से भी पहले से आबाद थे. लोग समाज से नजरें चुराने की नाकाम कोशिश करते हुए सीढि़यां चढ़ जाया करते थे और उसी अंदाज में तेजी से उतर कर बाजार की भीड़ का हिस्सा बन कर ओझल हो जाया करते थे. मुद्दतों से यही सिलसिला चला आ रहा था. सीढि़यों से कोठे तक न जाने कितनी यादें, किस्से और कद्रदानों के राज दफन थे. उन कोठों की चारदीवारियों ने कई तवायफों की इठलाती जवानी और उन की रेशमी जुल्फों में बड़ेछोटे धन्नासेठों को उलझते देखा था. जिन चेहरों का आकर्षण लोगों को अपनी तरफ खींचता था, उन्हें वक्त के साथ बेरौनक होते हुए भी देखा था.

ऐसी जगहों की खास बात यह होती है कि जब सूरज अपनी रेशमी लालिमा बिखेरता है, तब एकदम उलट सुबह वहां अलसाई हुई होती है, लेकिन रातें इस तरह आबाद होती हैं, जैसे वहां सुबह का आगाज हुआ हो. शाम का धुंधलका जैसे ही दस्तक देता है, वैसे ही घुंघरुओं और सुरताल की आवाज फिजा में बहनी शुरू हो जाती है. तवायफों के नृत्य और उन के इर्दगिर्द दायरा बनाने के शौकीन खुदबखुद अपनीअपनी पसंद के कोठे पर चले जाते थे. ऐसे शौकीनों में रानी मौसी के कोठे पर कजरी का नाम खूब मशहूर था. जब वह खूबसूरत लिबास में आ कर महफिल में अपने चांद से चेहरे से घूंघट उठाती तो लोगों की सांसें थम जाया करती थीं.

वह बला की सुंदर थी. खूबसूरती के साथ वह सुरताल व नृत्य की कला के संगम में पूरी तरह पारंगत थी. वह नाचनागाना शुरू करती तो कद्रदानों की फरमाइशें बढ़ जाया करती थीं. इतना ही नहीं, वे खुश हो कर उस पर नोटों की जैसे बरसात करते थे. जितने भी नोट उस पर लुटाए जाते, वे उस की मौसी की थैली में समा जाते थे. यह बात उसे अखरती नहीं थी, क्योंकि रानी से उस का खून का रिश्ता था. वह उस की सगी मौसी थी. उस शाम भी साफसफाई के बाद कोठे के बरामदेनुमा कमरे को लड़कियों ने करीने से सामान लगा कर सजा दिया था. जगहजगह इत्र भी लगा दिया था, जिस की भीनीभीनी खुशबू पूरे कमरे में फैल रही थी. हारमोनियम वादक और तबला, ढोलक उस्ताद तयशुदा जगह पर बैठ कर रियाज में मशगूल हो गए थे.

कद्रदानों के बैठने के लिए सोफा था और नीचे सलीके से मैरून रंग का खूबसूरत कालीन बिछा दिया गया था. कमर व हाथ टिकाने के लिए सिरहाने पर मसनद लगा दिए गए थे. धीरेधीरे लोगों का आना शुरू हुआ तो रानी ने दिलकश मुसकान से उन का स्वागत किया.

‘‘तशरीफ लाइए, हुजूर.’’ रानी अपने पुराने चाहने वालों को ज्यादा तवज्जो दिया करती थी. इस की खास वजह भी थी. वे उस की आमदनी का बड़ा जरिया थे. ऐसे लोग शानोशौकत दिखा कर पैसे तो लुटाते ही थे, साथ ही खुश हो कर अलग से भी कुछ पैसे दे जाया करते थे. महफिल की तैयारी पूरी हो चुकी थी. एक पुराना कद्रदान रानी से मुखातिब हुआ, ‘‘कजरी को बुलाइए मौसी, सच पूछिए तो हम उसी के दीदार के लिए आते हैं.’’

‘‘मेहरबानी आप की. ऊपर वाला आप की हसरतों को बरकरार रखे.’’ मौसी ने शोखी से कहा और एक लड़की को इशारे से कजरी को बुलाने के लिए कह दिया.

कमरे में सरगोशियां थीं. कुछ लम्हों के बाद कजरी दाखिल हुई तो खामोशी पसरी और सभी की निगाहें उसी पर टिक गईं. कजरी ने लाल रंग का सुर्ख रेशमी लिबास पहना हुआ था. कमरे में जल रहीं लाइटों की रौशनी में उस के लिबास पर टांके गए सफेद, पीले व गुलाबी रंग के सितारे जगमगा रहे थे. धीरेधीरे चल कर कजरी बीच में आ कर खड़ी हो गई. एक लड़की ने आगे बढ़ कर पीतल के घुंघरुओं का जोड़ा उस के पैरों में बांध दिया. कजरी ने अपनी गोरी कलाइयों में कोहनी से आधा नीचे तक रंगबिरंगी चमकीली चूडि़यां पहनी हुई थीं.

अगले लम्हों में कजरी ने मोर की तरह पंख फैलाने के अंदाज में कलाइयों को आगे बढ़ा कर उन में कंपन कर के चूडि़यों को खनकाया तो एक पुरानी गजल के साथ सुरताल शुरू हो गई. सभी एकटक उसे ही निहार रहे थे. शबाबनुमा महफिल के आगाज से मौसी खुश थी, लेकिन चंद मिनटों में ही उस की खुशी मायूसी में बदल गई. क्योंकि पारखी मौसी ने यह बात पकड़ ली कि उस दिन कजरी की थिरकन में वह बात नहीं थी, जो और दिनों में हुआ करती थी. ढोलक व तबले की ताल तो बराबर थी, लेकिन कजरी के कदमों के साथ घुंघरुओं की खनक बदली सी लग रही थी.

उस की आवाज में भी उदासी थी. मौसी ने कद्रदानों के चेहरों पर गौर किया, वे भी उतने खुश नहीं थे. साफ लग रहा था कि कजरी का मन उस समय कहीं और था. गजल का दौर खत्म हुआ तो कजरी ने नए मेहमानों की तरफ रुख कर के दोनों हाथों से घूंघट पलट दिया. उस दिन उस का चेहरा बेनूर था. मानो सारे जहां की उदासी वहां सिमट आई थी. जल्दी से मेहमानों को सलाम कर के वह अपने कमरे में चली गई. अन्य लड़कियों ने भी नृत्य दिखाए, लेकिन उस दिन की महफिल बेरौनक ही रही. मेहमान नाखुशी से गए. मेहमानों की बेरुखी देख कर मौसी भी नाखुश थी. उस दिन पहली मर्तबा कजरी ने सभी को निराश किया था.

मेहमानों के रुखसत होते ही मौसी सीधे कजरी के कमरे में पहुंची. वह बिस्तर पर उदास बैठी नींद के आगोश में समाए मासूम बच्चे को निहार रही थी. मौसी उस के बराबर में बैठ कर बोली, ‘‘खुद को दर्द से उबार ले कजरी, तेरी वजह से आज पहली बार महफिल वीरान सी रही है.’’

‘‘कोशिश तो कर रही हूं मौसी.’’ कजरी ने उदासी से कहा.

‘‘जरा सोच इस तरह जिंदगी कैसे कटेगी? तू जो आज कमा लेगी, वह कल तेरे ही बुढ़ापे में काम आएगा.’’ मौसी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने जमाना देखा है कजरी. तवायफ की जवानी तो सुंदर बगीचे जैसी होती है, जिस पर भंवरे दूरदूर से आ कर मंडराते हैं, लेकिन बुढ़ापा तो उजड़ा चमन किसी दोजख की तरह होता है.’’

‘‘मैं क्या करूं मौसी? जावेद की याद मेरे दिल से नहीं निकलती.’’ कजरी बोली.

‘‘बेटा, यादें जाने के लिए नहीं होतीं. फिर इस का मतलब यह भी तो नहीं कि हम अतीत को याद करकर के खुद को ही परेशान कर लें. जावेद की मोहब्बत की निशानी तो तेरे पास है.’’ मौसी ने फिर समझाया.

‘‘यही तो सहारा है मौसी.’’ कहते हुए कजरी ने बच्चे को उठा कर अपने सीने से चिपका लिया.

‘‘अपने लिए न सही, कम से कम इस बच्चे की खातिर तो दर्द से निकल जा. इसे पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बना. जिस दिन यह काबिल हो जाएगा, तू अपनी मोहब्बत पर नाज करेगी,’’ मौसी बोली, ‘‘अब तू आराम कर. इस बारे में हम कल सुबह बात करेंगे. इस के बाद कजरी उस 4 महीने के बच्चे के साथ सो गई.’’

अगले दिन दोपहर के वक्त कजरी रोजमर्रा की भांति खिड़की पर बैठी थी, लेकिन उसे बाजार सूना लग रहा था. जावेद को वह बाजार की भीड़ में दूर से पहचान लेती थी. उस के लिए निगाहों में बेकरारी होती थी. यादों के साए मंडराए तो उस ने खिड़की के कपाट बंद कर दिए और सिसकियां भरने लगी.

मौसी ने नजदीक आ कर उस के आंसू पौंछे और प्यार से गले लगा कर समझाया, ‘‘कब तक गम मनाएगी पगली. जाने वाले कभी लौट कर नहीं आया करते.’’ मौसी की बातें उस के दिल पर फाहा रख देती थीं, ‘‘हम तवायफें हैं बेटा. दर्द से हमारा करीब कर रिश्ता होता है. अब तू काम में मन लगा कर बच्चे की परवरिश की सोच.’’

मौसी की बातें ठीक थीं. चंद रोज में ही कजरी का उस बच्चे से गहरा रिश्ता हो गया था. उस का नाम अकरम था. वह हर तरह से उस का खयाल रखती और अपने से चिपकाए रखती. अकरम उस की मोहब्बत की निशानी था. कजरी ने सोच लिया था कि अब वह उस के लिए मां का हर फर्ज निभाएगी.  4 महीने का अकरम उस की मोहब्बत की निशानी तो था, लेकिन वह उस की अपनी औलाद नहीं था. वह बिन ब्याही मां भी नहीं थी. बावजूद इस के मां होने के सभी अहसास से वह रूबरू हो गई थी. वक्त की अजीब चाल से वह जिस किरदार में पहुंची थी, उस के पीछे भी एक रोचक कहानी थी—

दरअसल, कजरी खानदानी तवायफ थी. 15 साल पहले उस के घर वालों ने उसे उत्तर प्रदेश के एक बड़े शहर में उस की मौसी रानी के पास भेज दिया था. रानी का अपना कोठा था. किसी तवायफ का अपना कोठा होना बिरादरी में बड़ी बात होती है. पूरे तवायफ बाजार में रानी का रुतबा था. कजरी को वह बेटी की तरह मानती थी. रानी के चाहने पर ही कजरी को उस के पास भेजा गया था. कुछ ही दिनों में कजरी वहां के माहौल में रचबस गई थी. रानी के कोठे पर यूं तो और लड़कियां भी थीं, लेकिन कजरी उन में सब से ज्यादा खूबसूरत और नाचगाने की कला में पारंगत थी.

कुछ ही दिनों में कजरी कोठे के सारे तौरतरीके जान गई. जल्दी ही कजरी का जादू रानी के कोठे पर आने वाले लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा. तवायफों की सच्ची मोहब्बत दौलत होती है. कजरी आई तो रानी की झोली में नोटों की जैसे बारिश होने लगी. कजरी उस की सगी बहन की बेटी थी, इसलिए पैसे का बंटवारा भी नहीं होता था. मौसी ने कह दिया था कि उस के कोठे की उत्तराधिकारी कजरी ही होगी. कजरी के चर्चे ऐसे हुए कि कद्रदान भी वहां आने लगे.

कजरी अपने पेशे की हकीकत जानती थी. ऐसा नहीं था कि वहां आने वाले सभी लोग नाचगाने के ही शौकीन होते थे. बहुतों की ख्वाहिश उस से आगे होती थी. तब मोटी रकम के बदले मौसी उन के कदमों को बढ़ा देती थी. कजरी जानती थी कि आज नहीं तो कल, उसे यह सब अपनाना ही पड़ेगा, क्योंकि यह उस के खानदान की परंपरा रही थी. रानी मौसी उसे अपने खानदान में नानी के जमाने तक के रोमांचक किस्से भी सुनाया करती थी.

रानी का ताल्लुक जिस जाति से था, वहां तवायफ होना कोई बुरी बात नहीं थी. वह बताती थी कि किस तरह धन्नासेठों से ले कर बड़े जमींदार तक उस के मुरीद थे. दरअसल उस की मां रेशमाबाई का ऐसा नाम था, जिन की महफिल में 5 सौ मील से भी लोग चल कर आते थे. उन्हें विशेष मौकों पर अपने यहां इज्जत से बुलाया जाता था. उन के लिए बैलगाड़ी या घोड़ाबग्गी भेजी जाती थी. उस जमाने में रईस लोगों के पास यातायात का यही साधन होता था. जिस के पास बैलों की जोडि़यां होती थीं, दूरदूर के गांवों तक उन का नाम होता था.

रेशमा के पास तबला व हारमोनियम वाले अपने उस्ताद थे. उन की उंगलियों की थिरकन से निकलने वाला संगीत महफिल में चारचांद लगा दिया करता था. मशालों, लालटेन व मिट्टी के तेल वाले हंडों की रौशनी में महफिल पूरे अदब से सजती थी. नक्काशीदार सुराहियों में मदिरा भर कर मेहमानों को पीतल के बेलुओं व कटोरों में परोसा जाता था. रेशमाबाई जब लहरा कर नाचती थी तो रात जैसे जवान हो जाती थी. लोगों के दिलों में चटक कर जैसे कलियां सी खिलती थीं. हर कोई बेसाख्ता कह उठता था, ‘‘वाह, रेशमाबाई, कमाल कर दिया तुम ने.’’

महफिल में फिर नाचगाने की फरमाइश होती तो रेशमा पानी पी कर फिर नए सुरताल पर थिरकने लगती. रेशमा ने जमाना देखा था. उन्होंने अपने सामने जवानों को बूढ़ा व बच्चों को जवान होते देखा था. दोनों ही पीढि़यां उन की कला की कद्रदान थी. रेशमा महफिलों से अशर्फियां ले कर निकलती थीं. खास बात यह थी कि इस तरह के चंद अवसरों को छोड़ कर महफिल में फूहड़ता नहीं होती थी. इस की वजह यह थी कि रईस लोग अमीराना तरीके से अदब से रहते थे. तवायफ होने का मतलब उन्हें बेइज्जत करना नहीं था. रेशमाबाई ने कला के दम पर ही दौलत और शोहरत कमाई थी. दरजनों तवायफों ने उन्हें अपनी उस्ताद मान कर कला के हुनर सीखे थे.

घुंघरू बांध कर तबले पर थिरक देना भर ही उन के लिए कला नहीं थी. कितनी थाप पर कितनी बार पैरों, कमर, गरदन व कलाइयों में थिरकन हो, इस तक का हिसाब पारखी नजरों व उंगलियों पर रखा जाता था. जरा सी गलती होने पर वह टोक देती थीं, ‘‘अपने कदमों को ताल से मिलाओ बेटियों, वरना मेरा नाम भी खराब कर दोगी. लोग कहेंगे कि रेशमा जैसी उस्ताद की चेलियां बढि़या नहीं नाचतीं.’’

वह समझाती थीं कि हुस्न के साथ कला भी जरूरी है. जो कला के फन में माहिर होता है वह कभी भूखा नहीं मरता. कुदरत कला को तब और भी निखार देती है, जब कोई उस के लिए दिल से जिए. बारबार गलती करने पर सजा भी दी जाती थी. दरअसल जिसे उस्ताद समझा जाता था, उसे बहुत इज्जत बख्शी जाती थी. दूसरे शब्दों में मातापिता से भी ज्यादा अधिकार उस्ताद या गुरु के पास होते थे. उस्ताद के कहे शब्द पत्थर की लकीर हुआ करते थे. उस के खिलाफ जाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था.

रेशमा अपने साथ एक पानदान जरूर रखती थी. वह कांसे का बना था. उस पर खूबसूरत नक्काशी के साथ मूंगे भी जड़े थे, जिस में अलगअलग आकार के खाने बने थे. उस में पका कर फेंटा गया सुर्ख कत्था, छाली (सुपारी), खुशबूदार इलायची और गीले कपड़े में गोलाई से बांध कर पान रखे होते थे. जो लड़की नानी को उस्ताद मानती थीं, वे उस में साफ सुपारियां सरौते से कतर कर रख दिया करती थीं.

वह बताती थी कि पानदान उन की मां के जमाने का था. दूर कस्बे का एक पंसारी नानी की कला का मुरीद था. एक पोटली में वह ताजा सुपारियां दे जाया करता था. वह कहता था, ‘‘रेशमा तुम्हारे लिए ताजा सुपारियों के ढेर से ये नगीने निकाल कर लाता हूं. मैं ने अपने तिजारती को बोला हुआ है कि मुझे माल एकदम बेहतरीन चाहिए.’’

तब रेशमा खुश हो कर कहतीं, ‘‘हां, हां खूब समझती हूं. रेह लाए हो या नहीं?’’

‘‘गुस्ताखी माफ, वह तो भूल ही गया. अगली बार आऊंगा तो ले आऊंगा.’’ रेह दरअसल कपड़े धोने वाली मिट्टी थी. पहले साबुन नहीं था और देहात के इलाकों में लोग कपड़े धोने में इसी मिट्टी का इस्तेमाल किया करते थे.

रेशमा नामी पंसारी के आने का मकसद खूब समझती थी. वह ऐसे वक्त ही आता था, जब वह लड़कियों को कला सिखा रही होती थी. कुछ देर बैठ कर वह चला जाता था. तब के बड़े दुकानदार, तिजारत करने वाले सूदखोर भी हुआ करते थे, जो अपने बहीखातों में न जाने कितनों की मजबूरियां कैद किए रखते थे. रेशमा के पास आने वाले उस पंसारी की पहचान सूदखोर के रूप में भी थी. जातेजाते एक दिन उस ने कहा, ‘‘रेशमा, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताना.’’

‘‘सेवा तो है पंसारी बाबू.’’ रेशमा ने झट से कह दिया.

उस ने एकदम अधीर हो कर पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘तुम जितनी बार यहां आया करो, उतनी बार अपने बहीखाते से किसी गरीब की मजबूरियों को आजाद कर दिया करो.’’ रेशमा के इतना कहने पर उस व्यापारी को मानो झटका सा लगा. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरा पेशा ही ऐसा है तो क्या करूं.’’

‘‘पेशा तो हमारा भी है, लेकिन लोगों की दुआएं भी ले लिया करो. बुरे वक्त में काम आया करती हैं.’’ यह सुनते ही खिन्नतापूर्ण मौन धारण कर के वह चला गया था.

शादियों के मौकों पर रेशमा की व्यस्तता बढ़ जाती थी. दरअसल शादियां पहले महज एक रात या दिन की नहीं होती थीं. बारातें एकएक सप्ताह रुका करती थीं. इस दौरान उन की खूब आवभगत हुआ करती थी. खाना ढाक के चौड़े सूखे पत्तों से बनी पत्तलों पर परोसा जाता था. चावलकढ़ी के साथ मोटे अनाज की बनी रोटियों का चलन था. चावल के साथ गन्ने के रस से बनी शक्कर व खांड भी होती थी. उड़द की धुलवां दाल व गेहूं की रोटियां तो बिरले ही बनाते थे. एक तो उन की पैदाइश कम थी, दूसरे महंगे भी होते थे. मीठे  में बूंदी के लड्डू, गन्ने के रस की खीर, कलाकंद और हलवा बनता था. खाने के साथ मट्ठे के सन्नाटे (रायते) का भी खूब चलन था.

बड़ा हो या छोटा, सभी लोग जमीन पर बैठ कर खाना खाते थे. उस जगह को पहले झाड़ू से बुहारा जाता था. फिर पानी के छींटे मार कर सूत या जूट से बुनी हुई पट्टियां बिछाई जाती थीं. कतारबद्ध बैठ कर खाना खाने वाले लोगों के इस समूह को पंगत कहते थे. सभी खाना एक साथ शुरू करते थे और एक साथ उठते थे. कोई अपना खाना खा कर बीच में ही उठ जाए तो इसे अच्छा नहीं माना जाता था. एक पंगत के उठने के बाद फिर से झाड़ू लगा कर पानी का छिड़काव किया जाता. फिर पट्टियों को झाड़ कर बिछाया जाता था. मिट्टी के मटकों, शहतूत की टहनियों (शाखाओं) से बने टोकरों व कागज की रद्दी से बनी पल्लियों (बड़ेछोटे आकार के बरतन का रूप) से खाना परोसा जाता था. खाना भट्ठियों पर तांबे, पीतल के बरतनों व लोहे की कड़ाहियों में पकता था.

उस जमाने की सादगी में लोगों में इतना मेलजोल था कि सभी एकदूसरे के मेहमानों की सेवा में जुट जाते थे. पड़ोसियों के बीच मनमुटाव या कोई भेदभाव नहीं होता था. छलकपट से दूर लोगों में आपसी प्रेम बहुत होता था. बड़ेबुजुर्गों को इतनी इज्जत बख्शी जाती थी कि धमाचौकड़ी मचाते व गलती करते बच्चे छिप जाया करते थे या एकदम शरीफ बन कर दुआसलाम करते थे. उन्हें डांटे जाने व घर पर शिकायत होने का डर होता था. यदि कोई जना बच्चे की गलती की शिकायत उस के मांबाप से करता था तो मातापिता नाराज नहीं होते थे, बल्कि खुश होते थे कि कोई अपना ही बच्चों की गलतियां बता रहा है.

मेहमानों के मनोरंजन के लिए महफिलें सजाई जाती थीं. अपनीअपनी हैसियत के अनुसार तवायफों को बुलाया जाता था. रेशमा ऐसी ही महफिलों में व्यस्त हो जाती थी. समय के साथ नानी के कदम बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे थे. अब वह सिर्फ एक उस्ताद बन कर रह गई थीं. उन्होंने अपना पंसदीदा फूलों के छापे वाला चूड़ीदार लहंगा, जिस में रंगबिरंगे गोटे लगे थे, कोटी (कमर के ऊपर का ब्लाउजनुमा कपड़ा) व ओढ़नी (दुपट्टे का रूप) पुराने संदूक में सहेज कर रख दिया था. बरसात के बाद सीलन दूर करने के लिए वह उन्हें धूप दिखा दिया करती थीं. आभूषणों में कंठा, हार, कड़े, पायल, माथे का टीका व तगड़ी भी उन के पास थी. तगडि़यां अधिकांश चांदी की होती थीं, जिन्हें लहंगे के ऊपर कमर पर सजाते हुए पहना जाता था. अपनी बेटियों को उन्होंने कला सिखा दी थी. रानी मौसी भी उन में से एक थी.

कजरी नाचगाना बचपन से ही सीखती आई थी. वह जवानी की दहलीज पर पहुंची तो उसे मौसी के पास भेज दिया गया था. तवायफों को एक सबक यह भी दिया जाता था कि मोहब्बत जैसी गिरफ्त से दूर रहो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि उन में दिल या नाजुक भावनाएं नहीं होती. यह बात अलग थी कि कजरी के दिल पर अब तक किसी ने दस्तक नहीं दी थी. जिंदगी के किसी मोड़ पर किस को किस से मोहब्बत हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कोठे पर आने वाले नए कद्रदानों में एक कद्रदान से उस की भी नजरें चार हो गईं. उस का नाम जावेद था. नौजवान जावेद उसी शहर का बाशिंदा था. एक दिन वह कजरी से बोला, ‘‘मेरे पास इतनी दौलत तो नहीं है, जो तुम्हें उस से खुश रखूं, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए चाहत है.’’

कजरी ने उस की बात हंसते हुए एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी थी.

जावेद का कोठे पर आने का सिलसिला शुरू हो गया. कजरी समझ गई कि वह उस पर डोरे डालने की कोशिश कर रहा है. उस की आंखों में एक अजीब सी कशिश होती थी. इसी कशिश ने ताकीदों के बावजूद कजरी के दिल पर दस्तक दे दी. यह सोच कर परेशान भी थी कि तवायफों से लोग इस तरह तो दिली रिश्ता कायम नहीं करते. वह पैसा फेंक कर तमाशा देख कर चले जाते हैं. वह तवायफ थी. उस की शख्शियत किसी को इस कदर प्रभावित कर रही थी. यह अजीब सी ही बात थी. उलझन तब वाकई बहुत बढ़ जाती थी, जब आप को पता हो कि सामने वाला जान कर भी अंजान बन रहा है. कजरी ने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की.

दूसरी तरफ जावेद ने सोचा कि कभी तो कजरी उस की चाहत कबूल कर लेगी. उस के पास जाते समय उस के दिल में उम्मीद का एक दीया रौशन होता था, लेकिन वापसी तक दिल में अंधेरा ही होता था. रौशनी और अंधेरे का यह खेल कई दिनों तक चलता रहा. जावेद के इस जुनून को देख कर कजरी उस से बातें कर लिया करती थी. बातों से ही उसे पता चला कि जावेद शादीशुदा है. यह बात साफगोई से जावेद ने उसे खुद बताई थी. कजरी ने उसे समझाया जरूर कि वह उस के ज्यादा चक्कर में न पड़े, लेकिन जावेद की भावनाओं ने उस पर ऐसा असर डाला कि वह भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी.

हालांकि वह यह भी जानती थी कि उस की मोहब्बत किसी मुकाम पर नहीं पहुंचेगी, क्योंकि न तो वह अपना पेशा छोड़ सकती थी और न जावेद समाज में उसे अपना सकता था. फिर भी वह जावेद को अपने दिल से नहीं निकाल पा रही थी. दिलों में उठते अरमानों का सिलसिला चाहत के दरख्त के अंतिम छोर पर पहुंचा तो जावेद ने एक दिन उसे दिल की बात बताने का फैसला कर लिया.

एक दिन वह कजरी के पास आया. कुछ देर बातचीत कर के वह जाने लगी तो वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘कजरी मेरी बात सुनो.’’

‘‘फरमाइए?’’ कजरी ने अदा के साथ कहा.

‘‘मैं तुम से दिली मोहब्बत करता हूं.’’ जावेद ने एक ही बार में मन की बात कह दी.

कजरी ने नजाकत के साथ अपने होंठों पर प्यारी मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘यह तो हम बहुत पहले से जानते हैं. हम इसे कबूल कर लेते हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ वह आश्चर्य से उस का चेहरा देखते हुए बोला.

‘‘तुम निकाहशुदा शख्स हो.’’ कजरी बोली.

‘‘वह ठीक, लेकिन यकीन मानो मैं इस मोहब्बत की खातिर अपनी बीवी का दिल नहीं दिखाऊंगा.’’ जावेद ने साफसाफ बता दिया.

कजरी जानती थी, जावेद दिल से नेक इंसान है. वह उसे समझा कर भी थक चुकी थी. न जाने कौन से पल थे, जो सारी बातें जानने के बावजूद उस की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई थी. कोई रास्ता न देख उस ने मोहब्बत कबूल कर ली थी.

इस के बावजूद उस ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘तवायफ के कोठे पर आते हो, जानते हो जमाना क्या कहेगा?’’

जावेद आशिकाना अंदाज में अपने सीने पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जमाना चाहे कुछ भी कहे, मुझे इस की चिंता नहीं.’’ वह मुसकरा कर बोला, ‘‘एक और बात कहूं कजरी?’’

‘‘बिलकुल.’’ लंबी सांस लेते हुए कजरी ने कहा.

‘‘मैं अपनी मोहब्बत को ताजिंदगी आबाद रखूंगा.’’

उस की बातें सुन कर कजरी के पास कहने को कुछ नहीं रहा. क्योंकि जावेद की मोहब्बत में कोई स्वार्थ नहीं था. इसी तरह उन की मोहब्बत आगे बढ़ती रही. मोहब्बत के पक्षी की उड़ान कितनी ऊंची होती है, आज तक कोई नहीं जान पाया. वैसे तो जावेद रोजाना ही कजरी से मिलने आता था, पर एक बार कई दिनों तक वह उस के पास नहीं आया तो उसे चिंता सताने लगी. जावेद के इंतजार में वह हर रोज खिड़की के सामने बैठ जाया करती. सड़क पर आनेजाने वाले लोगों में उस की नजरें जावेद को तलाशती थीं. लेकिन उस की आंखें थक जाती थीं. वह दिखाई नहीं देता.

वह एक अजीब कशमकश के दौर से गुजर रही थी. उसे यह तक नहीं पता था कि जावेद रहता कहां है. उस ने अपने दिल को समझाया कि यदि पता भी होता तो भी वह शायद उस की दहलीज पर नहीं जा पाती. इस से उस की बीवी की नजरों में छिपा रिश्ता उजागर होने से तूफान खड़ा हो सकता था. तकरीबन 15 दिनों बाद उसे जावेद आता दिखाई दिया तो उस की आंखों को जैसे करार मिला. वह ऊपर आया तो वह अपनेपन से शिकायत लहजे में बोली, ‘‘कहां थे इतने दिन? मुझे कितनी फिक्र हो रही थी.’’

‘‘मेरी तबीयत खराब थी कजरी. तुम से मिलने की बेकरारी मुझे भी बेचैन करती थी, लेकिन बुखार ने जैसे शरीर की जान ही निकाल ली थी.अब चलने के काबिल हुआ तो चला आया.’’

‘‘पता है जावेद, मैं ने कभी किसी के लिए इतनी तड़प महसूस नहीं की, जो तुम्हारे लिए की है.’’

जावेद को उस की नरगिसी आंखों में बेपनाह मोहब्बत का दरिया तैरता नजर आ रहा था. वक्त के साथ उन की मोहब्बत का सिलसिला चलता रहा. एक दिन जावेद उस के पास आया तो दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं. जावेद ने मोहब्बत से कजरी को अपनी बांहों के दायरे में ले लिया. कजरी का सारा शरीर रोमांचित हो गया. मोहब्बत की पनाह में सिर रखा तो जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में खो गई. जावेद के प्यार की कशिश दिनबदिन उसे उस के नजदीक ले जा रही थी.

उस की मोहब्बत का किस्सा मौसी से छिपा नहीं रहा. वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘ऐसे चक्कर में ना पड़ कजरी.’’

तब कजरी सफाई देती, ‘‘मौसी वह दिल का अच्छा है और वाकई मुझ से मोहब्बत करता है.’’

इस पर मौसी ने हंस कर कहा, ‘‘देख बेटी, हम ठहरीं तवायफें. हमारे लिए दिल से की गई मोहब्बत किसी ग्रहण की तरह होती है. तुम यह ग्रहण अपनी जिंदगी में क्यों लगा रही हो. हमारे नसीब में पाक मोहब्बत नहीं होती.’’ मौसी इतने पर ही नहीं रुकी, ‘‘पहले मोहब्बत फिर शादी. अरे पगली हम सदा सुहागनें होती हैं. शादियां नहीं करतीं, लेकिन सोलह शृंगार करती हैं. वह इसलिए कि हमारे कद्रदान खुश रहें. हमारे पास आते रहें.’’

जावेद की मोहब्बत पा कर कजरी बेहद खुश थी. ऊपर वाले ने उसे जैसे खुशियों से नवाज दिया था. खुशियों के बीच कभीकभी अंधेरे साए भी मंडरा जाया करते हैं. अनहोनी जैसे शिद्दत से उन के पीछे आ रही थी. एक दिन कजरी को एक आदमी ने आ कर बताया, ‘‘जावेद का ऐक्सीडैंट हो गया है. अस्पताल में उस की हालत नाजुक है और तुम्हें अपने पास बुलाया है.’’

यह सुन कर एक लम्हे के लिए कजरी के हवास उड़ गए. उस का कलेजा धक्क से रह गया. उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था. उस ने रानी मौसी को साथ लिया और बताए गए अस्पताल पहुंच गई. पता चला कि जावेद अपनी बीवी और 4 महीने के फूल से बेटे के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था, तभी दुर्घटना का शिकार हो गया था. जावेद और उस की बीवी बुरी तरह घायल थे, जबकि बेटा सहीसलामत था. यह हालत देख कर कजरी की आंखों में आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था. जावेद की हालत बिगड़ती जा रही थी.

वह लगातार कजरी को निहारे जा रहा था. कुछ इस तरह जैसे अलविदा कहने से पहले कोई किसी को जी भर कर निहार लेना चाहता था. उस ने कजरी से कहा, ‘‘कजरी, मैं शायद न बच पाऊं, लेकिन तुम मुझ से एक वादा करो.’’

‘‘क्या?’’ कजरी ने पूछा.

‘‘मेरा अपना तो कोई नहीं है. मुझे व मेरी बीवी को यदि कुछ हो जाए तो तुम मेरे बेटे अकरम की हमारे मजहब के हिसाब से बेहतर परवरिश कर देना.’’

कजरी के लिए सब कुछ बुरे ख्वाब जैसा था. वक्त जैसे थम सा गया था. कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुछ देर बाद जावेद और उस की बीवी ने दम तोड़ दिया. जावेद की इस तरह हुई मौत कजरी पर बिजली बन कर गिरी थी. मौसी के शब्द भी जैसे कानों में गूंज रहे थे कि तवायफों के नसीब में पाक मोहब्बत नहीं हुआ करती. जावेद के दूरदराज के रिश्तेदार थे. खबर मिलने पर वे भी आ गए थे. उन्होंने ही जावेद और उस की बीवी को नमाज ए जनाजा के बाद सुपुर्द ए खाक कर दिया. जावेद ने जो आखिरी ख्वाहिश जाहिर की थी, उस पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं था.

कजरी ने अकरम को अपना लिया. जावेद की जुदाई के गम में ही वह आंसू बहाती थी. और तभी से रात की महफिल में घुंघरुओं की खनक जाती रही. गम दिलोदिमाग पर काबिज था, इसलिए महफिल बेरौनक हो गई थी. मौसी ने उसे समझाने की भरसक कोशिश की. कजरी ने किसी तरह खुद को संभाल लिया. इस के बाद उस के दिल में किसी शख्स के लिए मोहब्बत की धड़कन जैसे हमेशा के लिए बंद हो गई. कजरी तवायफ थी. यह उस का खानदानी पेशा था. उस के हिसाब से उसे छोड़ा नहीं जा सकता था और वह छोड़ना भी नहीं चाहती थी.

क्योंकि उस के पास कमाई का और कोई जरिया नहीं था. हालांकि वह नहीं चाहती थी कि कोठे के माहौल में अकरम की परवरिश हो. वह उसे पढ़ाना चाहती थी. इसलिए जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो कजरी ने उस का दाखिला शहर के एक नामी स्कूल में करा दिया. स्कूल में हौस्टल भी था, जहां दूरदूर से आए बच्चे रह कर पढ़ते थे. अपने माहौल से दूर रखने के लिए उस ने अकरम को हौस्टल में रख दिया. उस की मां के रूप में अपना नाम लिखाया. कजरी हफ्तापंद्रह दिन में अकरम से मिलने जाया करती थी. वह उसे घुमाने भी ले जाती थी.

वह उस की परवरिश मुसलिम रीतिरिवाज से कर रही थी. बाजारों की रौनक ईद की नजदीकी का ऐलान करती तो वह अकरम को बाजार भी घुमाती. अकरम की खुशियों में ही उस की खुशियों की दुनिया सिमटी हुई थी. अकरम के मनपसंद के कपड़े सिलवाए जाते और ईद पर सिवइयां बना कर मुंह मीठा कराया जाता. मुसलिम रस्मोरिवाज को अकरम अच्छे से समझ सके, इसलिए वह बीचबीच में उसे मदरसे में तालीम भी दिलाती. ईद पर ईदगाह पर अकरम कजरी के साथ ही नमाज अदा करने जाया करता.

समय अपनी गति से चलता रहा. वह अपने पेशे से जो कमाती, उसी से बेटे की फीस भरती और उस के बाकी खर्चे उठाती. समाज से वह यह राज छिपाने की कोशिश करती रही कि उस की मोहब्बत की निशानी नामी स्कूल में पढ़ रहा है. वह नहीं चहती थी कि अकरम की पढ़ाई में उस की वजह से कोई परेशानी आए. अकरम बड़ा हो गया था. वह सीबीएसई बोर्ड में पढ़ाई करते हुए हाईस्कूल में आ गया था.

अकरम का वार्षिक परीक्षाफल आया तो पता चला कि उस ने अपनी कक्षा में टौप किया है. बेटे की इस उड़ान से कजरी बेहद खुश थी. बेटा उस की उम्मीदों पर खरा उतरा था. खुशियों और नाखुशियों की दस्तक वक्त के हाथ में होती है. इंसान कठपुतली बनता है और वक्त सब तय कर देता है. कजरी भी वक्त की इस चाल का शिकार हुई. अकरम के स्कूल में कोई नहीं जानता था कि अकरम की मां कजरी का पेशा क्या है? लेकिन एक दिन यह राज बेपर्दा हुआ तो कजरी के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

दरअसल, वह अकरम का रिजल्ट लेने उस के स्कूल गई थी. वहां छात्रों की भीड़ थी. अकरम टौपर छात्र था. उस की फोटो के साथ कब कजरी का फोटो भी खिंच गया. यह उसे पता ही नहीं चला. वह फोटो अखबार में छपा तो रात के अंधेरे में मुंह छिपा कर कजरी के कोठे पर जाने वाले उजले चेहरे वालों ने उसे पहचान लिया. बस, यहीं से जैसे कयामत की बुनियाद रख दी गई. लोगों की फितरत होती है, वह इस तरह की बातों को सामने लाने में पूरी जान लगा देते हैं. मनोविज्ञान के हिसाब से यह एक बीमारी है. यह बात स्कूल प्रबंधन तक पहुंचा दी गई.

कथित सभ्य समाज के लोगों के तर्क थे कि इस से उन के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. वह किसी तवायफ के बेटे के साथ अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकते. यह बात अलग थी कि ऐसी तवायफों के पहलू में ही हजारोंलाखों कथित सभ्य लोग समाज में मुंह छिपा कर अपने गम मिटाया करते हैं. नोटों की खनक पर उन्हें एक रात की दुलहन बना कर मोहब्बत बरसाते हैं.

कायदे से तो कजरी की तारीफ होनी चाहिए थी कि उस ने गलीच समझे जाने वाले ऐसे पेशे में रह कर भी बेटे की जिंदगी को रोशन कर दिया था. परंतु हुआ इस का उलटा. स्कूल प्रबंधन ने कजरी को स्कूल बुला कर कहा, ‘‘माफ करना, हमें आप के बेटे को स्कूल से निकालना होगा.’’

‘‘ऐसा मत कीजिए. मेरा बच्चा तो नर्सरी से आप के यहां पढ़ रहा है. वह होनहार है.’’ आहत कजरी ने हाथ जोड़ लिए.

‘‘तब हमें पता नहीं था.’’

कजरी की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘क्या मैं इंसान नहीं हूं या मेरा बेटा इंसान नहीं है? कौन कहता है कि तवायफ के बेटे को पढ़ने का हक नहीं है? मैं उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती हूं. मैं तो पहले ही अपने कलेजे के टुकड़े को दूर रखे हुए हूं. ऊपर से आप इस तरह की बात कह रहे हैं.’’

कजरी की बातें अपनी जगह ठीक थीं, लेकिन उन्हें मानने को कोई तैयार नहीं था. स्कूल प्रबंधन ने उस की एक न सुनी.

‘‘मुझे थोड़ा वक्त दीजिए.’’ कह कर कजरी वहां से चली आई. उस का अपमान हुआ था, लेकिन वह जिस पेशे में थी, उस में मानअपमान के उस के लिए कोई मायने नहीं थे. कजरी एक सामाजिक संस्था की संचालक को जानती थी. कजरी की वह बहुत इज्जत करती थी. अकरम के दाखिले में भी उन्होंने ही भूमिका निभाई थी. कजरी ने नई मुसीबत उन्हें बताई.

कजरी की समस्या बड़ी जटिल थी. फिर भी उन्होंने वादा किया कि उस का बेटा उसी स्कूल में पढ़ेगा. कोई भी उसे जबरदस्ती नहीं निकाल सकेगा. सामाजिक संस्था संचालिका स्कूल गई. तर्कवितर्क के बीच उन की स्कूल प्रबंधन के साथ हंगामा हुआ. स्कूल के पास टौपर छात्र को निकालने की कोई मजबूत वजह नहीं थी. एनजीओ की दखल के बाद उन्हें अपना निर्णय बदलना पड़ा. अकरम हौस्टल में ही रहा.

उम्र और वक्त ने अकरम को भी समझदार बना दिया था. उस ने कजरी से कभी अपने पिता का नाम नहीं पूछा. शायद उसे अंदाज हो गया था कि तवायफों के बच्चों के पिता नहीं हुआ करते. समय चक्र और स्कूल में हुई बेरुखी की घटना से आहत अकरम जान चुका था कि उस की मां का पेशा इज्जत का नहीं है. एक दिन वह कजरी की गोद में सिर रख कर बोला, ‘‘आप को पता है कि मैं काबिल बन कर सब से पहला क्या काम करूंगा.’’

‘‘क्या?’’ कजरी आश्चर्य से बोली.

‘‘आप को इस माहौल से निकालूंगा.’’

उस की बात और प्यार से कजरी की आंखें नम हो गईं, ‘‘मैं अपने हालात से खुश हूं अकरम. बस, तू कामयाब हो जा.’’

कजरी अकरम की हर वह ख्वाहिश पूरी करती है, जिस का वह तलबगार होता है. वह मातापिता दोनों का प्यार उसे दे रही है. उस की जिंदगी का एक ही बड़ा मकसद है कि अकरम बड़ा हो कर एक अच्छा इंसान बने. कजरी का किरदार वाकई बहुत ऊंचा है, लेकिन उस के पेशे की पहचान उसे आगे नहीं आने दे रही. वह जानती है कि समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा. बेटे के भविष्य की फिक्र भी उस के कदमों को थामे रखती है. वह असल जिंदगी में मां नहीं बनी, लेकिन उस में एक मां का अहसास है. दिल में प्यार है और समर्पण भी.

कजरी अकरम को बताना नहीं चाहती कि वह उस की असल मां नहीं है. वह नहीं चाहती कि उस के बेटे का दिल टूटे. ढोलक की थाप और घुंघरुओं के शोर में जिम्मेदारी और मोहब्बत का वादा उस के कानों में गूंजता है. कजरी ने अपनी मोहब्बत और मां के फर्ज के लिए जो कर दिया, वह वाकई प्रशंसनीय है. जो लोग कजरी की इस हकीकत को जानते हैं, वे उस की दिल से इज्जत करते हैं. Hindi stories

—कथा सच्ची घटना पर आधारित, पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.    (सभी फोटो: मौडलिंग)

 

True Crime Story: तेजाब की आंच से ताउम्र झुलसेंगे आरोपी

True Crime Story:अपनी प्रेमिका लावण्या को पाने के लिए हरदीप ने दोस्त के साथ मिल कर तेजाब कांड को अंजाम दिया. इस कांड के बाद उसे प्रेमिका तो नहीं मिली, लेकिन अदालत से ऐसी सजा जरूर मिल गई कि ताउम्र वह प्रेमिका से नहीं मिल सकेगा.

राकेश रेखी पंजाब पुलिस के रिटायर्ड एसपी देशराज के बेटे थे. मोहाली की फेज-1 मार्केट में रुद्राक्ष ग्रुप इमीग्रेशन नाम से उन की एक कंपनी थी. उन के दफ्तर में कई युवकयुवतियां काम करते थे. धार्मिक विचारों के राकेश जब भी माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाते, अपने औफिस के कुछ कर्मचारियों को भी साथ ले जाते थे. पहली सितंबर, 2011 को भी एक कार्यक्रम बना कर अपनी फोर्ड आईकान कार नंबर सीएच03जे 2042 से माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर के लिए निकले. इस बार भी वह अपने साथ औफिस से 4 जनों को ले गए थे. कार वह खुद चला रहे थे.

स्टाफ की 25 वर्षीया स्वातिका उन के बगल वाली सीट पर बैठी थी, जबकि 24 वर्षीया शिवालिका कार की पिछली सीट पर थी. स्टाफ के 2 लोग शेर खान और नवनीत इन के पीछे दूसरी गाड़ी में आ रहे थे. राकेश को अपनी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना था, इसलिए वह राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर मोहाली और खरड़ के बीच स्थित एक पैट्रोल पंप पर चले गए. उस समय शाम के करीब 5 बजे थे, वह अकसर उसी पैट्रोल पंप पर कार में पैट्रोल भरवाने जाते थे. पैट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद पेमेंट करने के लिए उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे किया कि तभी उन के ऊपर जैसे कहर बरपा गया.

विपरीत दिशा से 2 बाइक सवार उन की कार के पास पहुंचे. आगे वाले ने हैलमेट लगा रखा था, जबकि दूसरा बिना हैलमेट के था. उस के हाथ में 5 लीटर की कैन थी, जिस का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ था. जो शख्स कैन पकड़े था, वह राकेश के एकदम पास आ गया. राकेश को यह सब अजीब सा लगा. वह उस से कुछ बोलने को हुए, तभी उस युवक ने कैन में भरा तरल पदार्थ कार के अंदर बैठी युवतियों पर फेंक दिया. तरल पदार्थ फेंक कर वह युवक उसी बाइक से फरार हो गया. इस के बाद तो कार के भीतर चीखपुकार मच गई.

राकेश भी कराह उठे. कार का दरवाजा खोल कर वह बाहर आ गिरे थे. वह दर्द से तड़प रहे थे. कार के अंदर बैठी दोनों युवतियां भी चीखतीचिल्लाती हुई कार से बाहर निकल आई थीं. जरा सी देर में बात साफ हो गई कि बाइक सवारों द्वारा उन पर जो तरल पदार्थ डाला गया था, वह तेजाब था. उन का मुख्य निशाना वह लड़की थी, जो राकेश के बगल वाली सीट पर बैठी थी. वही तेजाब से सब से ज्यादा झुलसी थी. इस घटना के बाद पैट्रोल पंप पर भी अफरातफरी मच गई. कार में से बह कर तेजाब फर्श पर फैलने लगा था, जिस पर पैट्रोल पंप कर्मियों ने फोम डाल दी, ताकि अफरातफरी में वहां कोई फिसल कर न गिरे. पैट्रोल पंप कर्मियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी और तीनों घायलों को पीजीआई अस्पताल ले गए.

सूचना मिलते ही थाना बलौंगी के थानाप्रभारी भूपेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. बाद में खरड़ के डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क और मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद राकेश के कर्मचारी शेर खान और पैट्रोल पंप कर्मियों से घटना के बारे में पूछताछ की. घायलों से मिलने के लिए पुलिस अधिकारी पीजीआई अस्पताल भी गए और शेर खान की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली. एसपी ने इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई.

पुलिस ने पैट्रोल पंप पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच शुरू की. इस में बाइक और उस पर सवार 2 लोग दिखाई तो दे रहे थे, मगर न तो बाइक का नंबर साफ पढ़ने में आ रहा था और न ही उस पर बैठे लड़के किसी की पहचान में आ रहे थे. घटना की सूचना पा कर राकेश की कंपनी के कई कर्मचारी अस्पताल और थाने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई तो उन्होंने बताया कि तेजाब फेंकने वाला युवक उन के औफिस में काम करने वाली स्वातिका का बौयफ्रैंड हो सकता है. इस वारदात में स्वातिका भी झुलस चुकी थी, इसलिए पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि शायद उस लड़के ने प्यार में नाकाम होने पर स्वातिका को निशाना बनाया होगा.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि स्वातिका का वह कथित बौयफ्रैंड पहले गुड़गांव में काम करता था, बाद में वह डेरा बस्ती की किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. लेकिन इन दिनों उस के चंडीगढ़ में काम करने की जानकारी मिली. बिना नामपते के उस के पास पहुंचना आसान नहीं था. पुलिस ने स्वातिका की सहेलियों से इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि स्वातिका की उस लड़के से बोलचाल थी, वह उसे प्रपोज भी करने लगा था लेकिन स्वातिका उसे खास पसंद नहीं करती थी. फिर वह अकसर उसे परेशान करने लगा था. स्वातिका ने जब उस के प्रति अपना रुख सख्त किया तो वह उसे देख लेने की धमकियां भी देने लगा था.

पुलिस ने उन सभी सहेलियों से कहा कि वह उस के कथित बौयफ्रैंड का नामपता जुटाने में पुलिस का सहयोग करें. संदर्भवश बता दें कि 80 के दशक में सर्वथा पहली बार यह तेजाबकांड सुर्खियों में तब आया था, जब मध्यप्रदेश के जिला जबलपुर में एक सिरफिरे ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब उड़ेला था. उसे अपनी प्रेमिका पर शक था कि उस के संबंध किसी और से हैं. हालांकि उस समय निजी न्यूज चैनल नहीं थे, इस के बावजूद भी इस घटना से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद तो देश भर में इस तरह की घटनाएं जैसे आम हो गईं. मजबूरन सरकार को तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

खैर, इस ताजा केस में तेजाब के हमले से 3 लोग घायल हो गए. स्वातिका 80 प्रतिशत, शिवालिका 10 प्रतिशत और राकेश रेखी 40 प्रतिशत झुलस चुके थे. तीनों पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में भरती थे. पुलिस अभी तक उन के बयान नहीं ले पाई थी. फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा था कि यह एकतरफा प्यार का मामला है. साफ नजर आ रहा था कि स्वातिका के उन्मादी प्रेमी का निशाना वही थी, बाकी दोनों तो उस के साथ बैठे होने की वजह से लपेटे में आ गए थे. स्वातिका के कथित प्रेमी का पता लगाने को पुलिस ने अपने मुखबिर भी सक्रिय कर दिए थे. मुखबिरों से ही पता लग गया कि जिस शख्स ने तेजाब फेंका था, उस का नाम भावेश है और वह चंडीगढ़ के सेक्टर-49 का रहने वाला है.

एसएसपी के आदेश पर सीआईए इंसपेक्टर गुरचरन सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम भावेश की तलाश में उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर सीआईए टीम ने भावेश को चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. रातभर उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पता चला कि वह भारतीय जीवन बीमा निगम में एजेंट था. डेढ़ साल पहले स्वातिका भी एलआईसी की उसी शाखा में एजेंट थी. एक ही जगह काम करने की वजह से दोनों की आपस में मुलाकात होती रहती थी.

उसी दौरान भावेश ने स्वातिका से प्यार का इजहार कर दिया. स्वातिका ने साफ कह दिया कि वह प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर, अपने संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती है. लेकिन भावेश तो जैसे उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. तब स्वातिका ने परेशान हो कर एलआईसी का काम ही करना बंद कर दिया. इस के बाद वह राकेश रेखी के यहां नौकरी करने लगी. भावेश को जब पता चला तो वह उस का वहां भी पीछा करने लगा. अपनी एकतरफा प्यार की कहानी तो भावेश ने तमाम शिद्दत से सुना दी. लेकिन पुलिस द्वारा अपने सभी तरीकों से पूछताछ कर लेने पर भी वह यही दोहराता रहा कि स्वातिका पर तेजाब फेंकने में उस का कोई हाथ नहीं है.

उस ने भावुक हो कर कहा था, ‘‘सर, स्वातिका को मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं. उसे नुकसान पहुंचाने की तो मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस के साथ ऐसी दुश्मनी निभाने की हिमाकत किस ने की.’’

गहन पूछताछ कर के इंसपेक्टर गुरचरन सिंह को वह बेकुसूर लगा तो उन्होंने हिदायत दे कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने जिस एंगल से जांच करनी शुरू की थी, वहां से कोई सफलता नहीं मिल पाई. पुलिस ने स्वातिका के घर वालों से भी बात की, लेकिन वहां से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से एक खास जानकारी मिली. उस सूचना पर पुलिस ने काम किया तो 16 सितंबर, 2011 को 2 ऐसे आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिन्होंने पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही इस तेजाब कांड को अंजाम दिया था.

उन्होंने बताया कि उन का निशाना कोई और न हो कर राकेश रेखी था. दोनों लड़कियां तो राकेश के साथ कार में बैठी होने की वजह से लपेटे में आ गई थी, जिस का उन्हें भारी अफसोस हुआ. उन दोनों से की गई पूछताछ से जो खुलासा हुआ वह इस तरह से था कि गांव देसूमाजरा के रहने वाले हरदीप सिंह उर्फ दीपा और जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू आपस में गहरे दोस्त थे. बिट्टू अपना निजी कारोबार करता था और दीपा मोहाली के कस्बे कुराली में अपना नशामुक्ति केंद्र चलाता था. एक बार एक औरत अपने शराबी पति के साथ उस की शराब छुड़ाने की दरकार को ले कर दीपा के नशामुक्ति केंद्र आई. वह औरत इतनी खूबसूरत थी कि पहली ही नजर में हरदीप उर्फ दीपा का उस पर दिल आ गया. खूबसूरती के अनुरूप उस का नाम भी निहायत खूबसूरत था— लावण्या.

हरदीप अभी कुंवारा था और लावण्या शादीशुदा थी. उस से बात करने के बाद हरदीप अपने दिल पर काबू नहीं रख सका. लावण्या तो जैसे सीधे उस के दिल में उतर कर उस के तनमन को सराबोर कर गई थी.  उस के पति को हरदीप ने अपने नशामुक्ति केंद्र में भरती कर लिया. इस के बाद वह लावण्या से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा. उसे विश्वास में लेने के लिए उस ने उसे यह गारंटी दे दी थी कि आने वाले चंद महीनों में वह उस के पति में इतना सुधार कर देगा कि वह कभी शराब को हाथ नहीं लगाएगा. हरदीप की बात सुन कर लावण्या बहुत खुश हुई. बाद में वह 4-5 दिन पर पति के हालचाल जानने के लिए उस के नशामुक्ति केंद्र आने लगी. बीच में भी वह फोन कर के हरदीप से पति की जानकारी लेती रहती थी.

इस तरह लावण्या और हरदीप एकदूसरे के करीब आते गए. नशेड़ी पति के बजाय उस का झुकाव हरदीप की तरफ बढ़ता गया. लावण्या राकेश लेखी की कंपनी में काम करती थी. लावण्या का पति पुराना नशेड़ी था. इसलिए उस का नशा इतनी जल्दी नहीं छूट सकता था. इसलिए हरदीप को भरोसा था कि इस बीच वह लावण्या को अपने प्रेमजाल में फांस कर उस के पति से तलाक दिलवा कर उसे अपनी बना लेगा. इस तरह दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. लावण्या ने एक दफा हरदीप को मुलाकात का समय दे दिया. हरदीप निश्चित जगह पर उस का इंतजार करने लगा. काफी देर इंतजार के बाद भी वह उस से मिलने नहीं आई. हरदीप ने जब उसे फोन किया तो उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. इस से हरदीप को गुस्सा आ गया.

अगले दिन लावण्या ने ही हरदीप को फोन कर के मुलाकात न हो पाने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि उस का बौस राकेश रेखी मां चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाता है तो कंपनी के कुछ कर्मियों को अपने साथ ले जाता है. इस के लिए कोई इनकार नहीं करता. इस दफा उस ने एकदम अंतिम समय पर उसे साथ चलने को कहा. वह उसे मना नहीं कर पाई और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर उस के साथ चली गई. अभी तक तो हरदीप को अपनी प्रेमिका लावण्या पर नाराजगी थी. पर जब उसे पता चला कि इस में गलती लावण्या की नहीं, बल्कि उस के बौस राकेश रेखी की है तो उस का खून खौल उठा. राकेश जब भी कहीं बाहर जाते तो लावण्या को अपने साथ जरूर ले जाते थे.

इस से हरदीप राकेश को अपना जानी दुश्मन समझने लगा. मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. इस बारे में अपने खास दोस्त जगवंत सिंह बिट्टू से बात की तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. दोनों ने राकेश को सबक सिखाने के लिए एक फूलपू्रफ योजना बना ली. हरदीप ने मोहाली की एक दुकान से तेजाब खरीदा. फिर उसे ऊपर से कटी हुई कैन में डाल लिया, ताकि वह आसानी से डाला जा सके. फिर योजना को अंजाम देने का मौका ढूंढने लगा. उसे पता चला कि पहली सितंबर को राकेश ने चिंतपूर्णी देवी जाने का प्रोग्राम बनाया है और इस बार वह लावण्या के बजाय अन्य लोगों को ले जा रहे हैं.

हरदीप औफिस से राकेश के निकलने का इंतजार करने लगा. वह मौका उसे पैट्रोल पंप पर उस समय मिल गया, जब राकेश ने पैट्रोल के पैसे देने के लिए खिड़की खोली. लेकिन जैसे ही उस ने राकेश को निशाना बना कर तेजाब फेंका, राकेश ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया, जिस से निशाना अगली सीट पर बैठी स्वातिका बन गई. राकेश के बजाय दोनों युवतियों के जख्मी होने का हरदीप को बहुत अफसोस हुआ. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ पूरी कर पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

उधर अस्पताल में भरती देहरादून की रहने वाली स्वातिका की हालत बिगड़ती जा रही थी. इन्फैक्शन बढ़ जाने के कारण 19 सितंबर को उस की अस्पताल में ही मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस केस में धारा 302 भी बढ़ा दी. तेजाब की वजह से राकेश रेखी की एक आंख की रोशनी चली गई और उन के जिस्म पर इतनी सर्जरी हुई कि इस की गिनती उन्हें भी नहीं मालूम. बिना सहारे के वह कहीं आजा भी नहीं सकते. 90 दिनों के भीतर पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह की अदालत में चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को तमाम तवज्जो दे कर सुना और सभी साक्ष्यों को विधिपूर्वक जांचापरखा. अभियोजन पक्ष की ओर से 48 गवाहों ने अपने बयान अदालत में दर्ज करवाए. 27 मई, 2015 को इस केस का फैसला सुना दिए जाने की उम्मीद थी. दोनों अभियुक्तों को सुबह ही अदालत में बैठा दिया गया था. उस दिन इस चर्चित केस की सुनवाई कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई. अदालत के भीतरबाहर दोनों पक्षों की हिफाजत के लिए बाऊंसरों की भरमार थी. पुलिस द्वारा भी अदालत में आनेजाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. किसी को भी बिना पर्याप्त चैकिंग व पूछताछ के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था. राकेश रेखी अभी तक भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. वह अपने वकीलों के साथ अदालत में हाजिर थे.

सक्षम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह ने उस दिन दोनों अभियुक्तों को धारा 302 एवं 307 का दोषी करार देते हुए 29 मई को सजा सुनाए जाने की बात कही. तब तक के लिए दोषियों को वापस जेल भिजवाने के आदेश दिए. 3 पुलिसकर्मी दोनों अभियुक्तों को ले कर कोर्ट रूम से बाहर निकले. वहां मीडिया के कुछ लोग खड़े थे, जिन्हें देखते ही दोनों अभियुक्तों ने पुलिस वालों से अपने हाथ छुड़वा कर मीडियाकर्मियों पर ही हमला बोल दिया. इस हमले में फोटो जर्नलिस्ट अमित वालिया की इन्होंने काफी पिटाई कर दी. बाद में इस पत्रकार ने इस संबंध में न केवल पुलिस को शिकायत दी, बल्कि अदालत को भी घटना के बारे में लिख कर दिया.

बहरहाल, 29 मई, 2015 को विद्वान एवं सक्षम जज परमिंदरपाल सिंह ने हरदीप सिंह उर्फ दीपा व जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू को उक्त केस में ताउम्र कैद की सजा के अलावा 5-5 लाख रुपयों का जुरमाना भी किया. इस राशि में 4.60 लाख रुपए मृतका के परिजनों व 4.60 लाख राकेश रेखी को अदा करने के साथ 80 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा कराने के आदेश दिए. 29 मई, 2015 को दोनों अभियुक्तों को सजा सुनाई जानी थी. उस दिन मोहाली अदालत का परिदृश्य बाकी दिनों से एकदम अलग था. चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. दोनों अभियुक्तों के परिजन व अनेक दोस्त भी वहां पहुंचे थे. राकेश की हालत दयनीय थी, इस के बावजूद भी 50 बाउंसरों के घेरे में वहां आए हुए थे. वह अदालत के फैसले से बहुत खुश हुए.

उन का कहना था कि जिस लड़ाई को वह पिछले 4 सालों से जारी रखे हुए थे, उस का परिणाम संतोषजनक निकला. जिन लोगों ने एक युवती की जान लेने के साथ उन्हें जिंदा लाश बना कर रख दिया, उसे देखते हुए ऐसी सख्त सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

लावण्या नाम परिवर्तित है.

True Crime Story: जयपुर की रेव पार्टी – बेटे के कंलक से आहत गुलाबो

True Crime Story: अपने कालबेलिया डांस से दुनिया भर में पहचान बनाने वाली गुलाबो की नृत्य कला वाकई अनूठी है. इसी के बूते पर उस ने दौलत और शोहरत अर्जित की, लेकिन उस के बेटे भवानी सिंह ने फार्महाउस पर रेव पार्टी कर के मां को शर्मसार तो किया ही, कानून के पचड़े में भी फंसा दिया.

उस दिन तारीख थी 31 अगस्त. रात काफी गहरा गई थी. घड़ी की सूइयों ने कुछ ही देर पहले 12 बजाए थे. कैलेंडर के हिसाब से 1 सितंबर की तारीख शुरू हो चुकी थी. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास राव अपने सरकारी आवास पर बैडरूम में लेटे सोने की तैयारी कर रहे थे. दिन भर की भागदौड़ और औफिस में लंबी सिटिंग से वह बुरी तरह थक चुके थे. बैडरूम की दीवार पर लगे टीवी पर दिन भर की खबरें चल रही थीं. उस समय करीब सभी चैनलों पर सब से ज्यादा चर्चित शीना मर्डर केस और इंद्राणी की खबरें आ रही थीं. हालांकि शीना मर्डर केस 2-3 दिनों से मीडिया में हौट बना हुआ था. उस दिन नई बात यह थी कि इंद्राणी कोर्ट में बेहोश हो गई थीं.

सीनियर आईपीएस औफिसर होने के नाते जंगा के दिमाग में इंद्राणी केस को ले कर कई तरह के सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. साथ ही वह आजकल के सामाजिक पतन के बारे में भी सोच रहे थे. उन की सोच का दायरा उन हाईप्रोफाइल लोगों के इर्दगिर्द सिमटा था, जो धनदौलत, अय्याशी और शोहरत के लिए अपने खून के रिश्तों को भी तारतार करने में पीछे नहीं रहते.

टीवी बंद कर के राव बिस्तर पर लेट गए और आंखें मूंद कर सोने का प्रयास करने लगे. तभी उन के मोबाइल पर एक काल आई. नंबर अनजाना था. फिर भी उन्होंने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘पुलिस कमिश्नर साहब बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हां, मैं पुलिस कमिश्नर बोल रहा हूं.’’ राव ने शालीनता से कहा.

‘‘सर, जयपुर में एक नामी महिला के फार्महाउस पर रेव पार्टी हो रही है, जिस में विदेशी महिलाएं भी आई हुई हैं. उन के साथ कई युवक हैं, सब के सब पैसे वालों की बिगड़ी औलादें.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘आप कौन बोल रहे हैं और यह पार्टी हो कहां रही है?’’ पुलिस कमिश्नर ने फोन करने वाले से पूछा.

‘‘सर, मुझे अपना शुभचिंतक समझ लीजिए. नाम बताने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि आप के पास मेरा मोबाइल नंबर आ गया है. मैं जानता हूं, आप को झूठी सूचना दूंगा तो मुझे हवालात जाना पड़ेगा.’’ फोन करने वाले ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘सर, आप जगह पूछ रहे हैं, जो बताना जरूरी है. यह रेव पार्टी हरमाड़ा में सीकर रोड से निकलने वाली नींदड़ जयरामपुरा रोड पर हो रही है. वहां कई गाडि़यां भी खड़ी हैं.’’ कह कर सूचना देने वाले ने फोन काट दिया.

जंगा श्रीनिवास राव अनुभवी पुलिस औफिसर थे. वे फोन करने वाले की विश्वासपूर्वक कही गई बातों से ही समझ गए कि सूचना गलत नहीं है. फोन करने वाले ने केवल अपना नाम छिपाया था, नंबर नहीं इसलिए विश्वास किया जा सकता था कि सूचना सही है. नवधनाढ्य वर्ग में आजकल तरहतरह की नैतिकअनैतिक पार्टियों का चलन बढ़ रहा है. जयपुर राजस्थान का महानगर है, देश भर में हीरेजवाहरात का सब से बड़ा कारोबार जयपुर में ही होता है. कालेसफेद धंधों से अथाह पैसा कमाने वालों की संख्या रोजाना बढ़ रही है. जयपुर के चारों ओर छोटेबड़े तमाम फार्महाउस हैं.

राजनेताओं से ले कर आला अफसरों, बड़े व्यापारियों और कारोबारियों के फार्महाउसों पर आए दिन छोटीमोटी पार्टियां होती रहती हैं. लेकिन जयपुर में रेव पार्टी का आयोजन कभीकभार ही सुनने में आता है. इसलिए रेव पार्टी की सूचना पर राव ने तुरंत काररवाई करने का फैसला कर लिया. उन्होंने अपने अधीनस्थ 5 अधिकारियों को शौर्ट नोटिस पर अपने घर बुला लिया. रात करीब डेढ़ बजे तक पांचों अधिकारी पुलिस कमिश्नर के बंगले पर पहुंच गए. जंगा ने उन अधिकारियों को मोबाइल पर मिली सूचना के बारे में बताते हुए कहा कि तुरंत काररवाई करनी है.

अगर गैरकानूनी रूप से कोई पार्टी हो रही है तो कोई कितना भी बड़ा आदमी हो, उसे पकड़ने में हमें जरा भी नहीं झिझकना है. इसी के साथ पुलिस कमिश्नर ने पांचों अधिकारियों को अलगअलग थानों से 70-75 जवानों की टीम बना कर छापा मारने के निर्देश दिए. पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर पांचों अधिकारियों ने फोन कर के अपने अधीनस्थ थानाप्रभारियों को तुरंत एकएक पुलिस टीम बनाने को कहा. साथ ही उन्हें यह भी निर्देश दिए कि वह हरमाड़ा थाना इलाके में नींदड़-जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास पहुंच जाएं. कुछ ही देर में जयपुर के विभिन्न थानों से अलगअलग टीमों के साथ पुलिस की गाडि़यां दौड़ पड़ीं. दूसरी ओर पुलिस कमिश्नर के बंगले से निकल कर पांचों अधिकारी भी गणेश मंदिर के पास पहुंच गए. उस समय तक रात के लगभग 3 बज चुके थे.

जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास कई फार्महाउस बने हुए हैं. एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) करण शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की टीमें गणेश मंदिर के आसपास के फार्महाउसों की टोह लेती हुई आगे बढ़ने लगीं. कुछ ही देर में पुलिस को सड़क किनारे एक फार्महाउस के अंदर कई गाडि़यां खड़ी नजर आईं. फार्महाउस में बाहर ज्यादा रोशनी नहीं थी. अंदर की ओर केवल एक बल्ब जल रहा था, लेकिन अंदर से तेज धूमधड़ाके की आवाजें आ रही थीं. पुलिस दल ने अपनी गाडि़यां कुछ दूर रोक दीं और फार्महाउस का बाहर से जायजा लिया. मेनगेट अंदर से बंद था. पुलिस दल को 2-3 लोग अंदर अंधेरे में पेड़ों के आसपास खड़े नजर आए. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि अंदर जरूर कोई न कोई पार्टी चल रही है और ये लोग बाहर की निगरानी के लिए खड़े हैं.

एडिशनल डीसीपी ने अपने साथी अधिकारियों और जवानों से तुरंत एक्शन लेने को कहा. देखते ही देखते 70 से ज्यादा पुलिस जवानों ने फार्महाउस को घेर लिया. कुछ जवान गेट फांद कर अंदर दाखिल हो गए. उन्होंने सब से पहले अंधेरे में निगरानी कर रहे लोगों को दबोचा. इस के बाद उन्होंने मेनगेट खोल कर अधिकारियों को अंदर बुला लिया. पुलिस अफसर जब फार्महाउस के अंदर एक विशाल हाल में पहुंचे तो दंग रह गए. वहां तमाम युवक डीजे की धुन पर झूम रहे थे. तेज आवाज में अंगरेजी संगीत बज रहा था. डांस के नाम पर झूमने वाले सभी युवक नशे में थे.

शराब की बोतलें खुली हुई थीं. वहां मौजूद सभी युवक बरमूडा टीशर्ट पहने हुए थे और पूरी मस्ती के मूड में थे. उन के साथ एक विदेशी युवती भी मौजूद थी. उस समय पार्टी पूरे शबाब पर थी. सारे युवा अपनेअपने तरीके से मौजमस्ती कर रहे थे. उन में से कई तो मदमस्त हो कर थिरक रहे थे. पुलिस को देखते ही पार्टी में भगदड़ मच गई. नशे में झूमते युवा इधरउधर भागने लगे. पुलिस ने भागदौड़ कर के 26 युवकों को पकड़ लिया. साथ ही पार्टी में शामिल फिनलैंड की एक युवती भी पकड़ी गई. पुलिस ने मौके से महंगी शराब की बोतलें, चरस, गांजा, एनर्जी ड्रिंक्स, शक्तिवर्धक दवाएं और आपत्तिजनक सामान के अलावा कार तथा 13 हाईपावर बाइकें जब्त कीं. पुलिस की इस काररवाई के  दौरान पार्टी में एंजौय कर रहे कई युवा अंधेरे का फायदा उठा कर इधरउधर भाग कर आसपास के फार्महाउसों में उगी फसलों में छिप गए.

फार्महाउस से पकड़े गए सभी लोगों को पुलिस हरमाड़ा थाने ले आई. वहां एडिशनल डीसीपी ने पकड़े गए युवकों से पूछताछ शुरू की तो उन्हें बड़ा झटका लगा. यह फार्महाउस अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना गुलाबो का था. दुनिया भर में अपने कालबेलिया डांस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली वही गुलाबो, दौलत और शोहरत जिस के कदम चूमती थी. स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी जिसे अपनी बहन मानते थे. कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी जिसे ननद मानती हैं. पकड़े गए युवाओं में गुलाबो का बेटा भवानी सिंह भी था.

पूछताछ में पता चला कि फिनलैंड की रहने वाली 24 वर्षीया युवती तरू आरियो नेपाल में अपने पुरुष मित्र के पास आई थी. तरू ने नेपाली मित्र से भारत घूमने की इच्छा जताई तो उस ने अपनी व्यस्तता के बारे में बता कर तरू आरियो को अपने एक नेपाली साथी के साथ भारत भेज दिया. तरू टूरिस्ट वीजा पर हिमाचल होते हुए राजस्थान आई थी. राजस्थान में कई जगह घूमने के बाद वह पुष्कर पहुंची थी. पुष्कर से उसे वही नेपाली युवक इस रेव पार्टी में जयपुर ले आया था. पुलिस ने पकड़े गए युवाओं की मैडिकल जांच कराई, ताकि यह पता चल सके कि उन्होंने नशे के लिए कौनकौन से ड्रग लिए थे?

आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने हर्षित कौशिक, ऋषि कौशिक, सुनील मोतियानी, आकाश रोचवानी, भवानी सपेरा, अभिमन्यु, उवेश करणी, चिराग मीणा, हर्ष शेखावत, विजय प्रकाश, आलविन, राजेंद्र सैनी, पूर्व सिंह राठौड़, मुकेश धानका, कदीर, अक्षत स्थापक, आशीष भावन, प्रखर मिश्रा, श्रेय वर्मा, विशाल चंदानी, गौरव, राज शर्मा, सर्वोत्तम शर्मा, हर्ष को एनडीपीएस एक्ट में और फिनलैंड निवासी युवती तरू ओरियो को शांतिभंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए युवकों में कई निजी कालेजों के छात्र भी थे. पुलिस ने हरमाड़ा थाने में मुकदमा दर्ज कर के उस में गुलाबो को भी नामजद किया. पुलिस ने 1 सितंबर को सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया.

अदालत ने 25 युवकों को जेल भेज दिया, जबकि विदेशी युवती को जमानती मुचलके पर छोड़ दिया गया. गुलाबो के बेटे भवानी सपेरे का पुलिस ने 2 दिनों का रिमांड लिया, ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. बाद में उसे भी जेल भेज दिया गया. पुलिस को गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि रेव पार्टी का आयोजन गुलाबो के बेटे भवानी ने किया था. यह पार्टी भवानी के दोस्त ऋषि कौशिक ने अपने जन्मदिन की आड़ में आयोजित की थी. पकड़े गए युवक भवानी और ऋषि के जानकार थे. पुलिस के सामने यह बात भी आई कि पार्टी में आए युवाओं को भवानी ने ही स्मैक, गांजा सहित अन्य नशीले पदार्थ उपलब्ध कराए थे. पुलिस को इस फार्महाउस पर पहले भी इस तरह की पार्टियां आयोजित होने की बातें पता चली है.

भवानी की गिरफ्तारी पर पुलिस ने पुष्टि करने के लिए गुलाबो को फोन किया. गुलाबो ने पुलिस को बताया कि वह अपने भाई को राखी बांधने के लिए पुष्कर गई थी. इसी दौरान उस के बेटे भवानी का फोन आया था. उस ने कहा था कि वह रात को अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में जाएगा. इस पर गुलाबो ने भवानी को रात में जल्दी घर पहुंचने की ताकीद की थी. गुलाबो का कहना है कि भवानी ने उस से झूठ बोला और गलत गतिविधि में पकड़ा गया. अगर उस ने गलती की है तो उसे सजा मिलनी चाहिए.

बेटे भवानी के इस तरह अपने ही फार्महाउस पर आयोजित रेव पार्टी में पकड़े जाने से गुलाबो को बड़ा झटका लगा. झटका इसलिए कि उस ने जीवन भर अपनी कला और मेहनत के बल पर दुनिया में जो नाम और शोहरत हासिल की थी, वह सब बेटे भवानी ने एक ही दिन में मिट्टी में मिला दी थी. बेटे की करतूतों पर गुलाबो की परेशानी स्वाभाविक ही थी. राजस्थान के कालबेलिया समुदाय में सन 1960 में जन्मी गुलाबो अपने मातापिता की सातवीं संतान थी. गुलाबो का असली नाम धनवंतरि है. गुलाबो नाम उस के पिता ने दिया था. जन्म के एक घंटे बाद ही परिजनों ने उसे दुत्कार दिया था, लेकिन परिवार की ही एक बेऔलाद आंटी ने उसे गोद ले लिया था. गुलाबो का बचपन मातापिता की उपेक्षा और आर्थिक तंगी में गुजरा.

सपेरा परिवार से होने के कारण गुलाबो सांपों के बीच खेलतीकूदती हुई बड़ी हुई. कई बार उस ने सांपों का जूठा दूध पी कर अपनी भूख मिटाई. घरपरिवार में सांप व बीन रहती थी, इसलिए वह 2 साल की उम्र से ही बीन की धुन पर डांस करने लगी थी. जैसेजैसे वह बड़ी होती गई, उस के सपेरा नृत्य में निखार आता गया. डांस में अपने शारीरिक लोच के कारण वह बचपन से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगी थी. 12 साल की उम्र में गुलाबो ने अजमेर जिले के पुष्कर में आयोजित ऊंट महोत्सव में पहली बार हजारों देसीविदेशी पर्यटकों के सामने कालबेलिया नृत्य की अपनी कला का प्रदर्शन किया.

राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से किए गए काफी प्रयासों के बाद गुलाबो के घर वालों ने उसे स्टेज पर परफौरमेंस की अनुमति दी थी. गुलाबो के घर वालों का कहना था कि कालबेलिया समाज के लोग स्टेज पर परफौरमेंस नहीं करते. गुलाबो ने पुष्कर में अपनी नृत्यकला दिखाने के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वह पुष्कर से जयपुर, फिर दिल्ली और इस के बाद दुनिया के तमाम बड़े देशों में अपने डांस का जादू बिखेरती चली गई. इसी दौरान सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने विदेशों में भारत की अच्छी छवि बनाने के लिए फेस्टिवल औफ इंडिया सीरीज शुरू कराई.

इसी सीरीज में अपने नृत्य के बल पर गुलाबो ने राजीव गांधी और सोनिया गांधी का दिल जीत लिया. इस के बाद से राजीव गांधी गुलाबो को अपनी बहन मानने लगे थे. राजीव गांधी की अकाल मौत के बाद सोनिया गांधी ने भी गुलाबो पर स्नेह बनाए रखा. इसी दौरान गुलाबो की शादी सोहन नाथ से हो गई. सोहननाथ कालबेलिया समुदाय से नहीं था, लेकिन बाद में वह कालबेलिया समाज में कनवर्ट हो गया. शादी के बाद गुलाबो जयपुर आ कर शास्त्रीनगर में मकान बना कर रहने लगी.  दुनिया भर में डांस की परफौरमेंस से गुलाबो के पास शोहरत के साथ पैसा भी आया.

पैसा आया तो गुलाबो ने जयपुर में सीकर रोड स्थित नींदड़-जयरामपुरा रोड पर एक जमीन खरीद ली. बाद में इस जमीन को उस ने फार्महाउस के रूप में विकसित कर लिया. कालांतर में गुलाबो के 5 बच्चे हुए. गुलाबो रियलिटी शो बिग बौस के पांचवें सत्र की प्रतिभागी भी रह चुकी है. फिल्म अभिनेता संजय दत्त की मेजबानी वाला यह सीजन 2 अक्तूबर, 2011 से 7 जनवरी, 2012 तक प्रसारित किया गया था. इस सीजन के दिवाली स्पैशल एपिसोड की शुरुआत अभिनेता सलमान खान की मेजबानी से हुई थी. इस सत्र की विजेता अभिनेत्री जूही परमार रही थीं.

गुलाबो आज राजस्थान ही नहीं, भारतीय कला संस्कृति की रोल मौडल है. वह इंटरनेशनल कल्चर एवं म्यूजिक सर्किट का एक हिस्सा है. इतना ही नहीं, वह कई फिल्मों में मशहूर अभिनेताओं के साथ अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन भी कर चुकी है. पिछले दिनों गुलाबो ने राजस्थान के चर्चित भंवरी केस पर बनी फिल्म में एक आइटम नंबर भी किया था. इस आइटम नंबर में गुलाबो के साथ उस की 3 बेटियों ने भी अपनी नृत्य कला दिखाई है. गुलाबो हर साल डेनमार्क के कोपेनहेगन में बच्चों को डांस का प्रशिक्षण देने जाती है.

गुलाबो के डांस में बिजली जैसी तेजी और शरीर में गजब की लचक है. सलमासितारों से जड़े काले लहंगे पर कांचली कुर्ती और ओढ़नी ओढ़ कर गुलाबो जब संगीत की धुन पर फिरकी की तरह तेजी से घूमते हुए कालबेलिया डांस करती है तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. गुलाबो कालबेलिया डांस का प्रशिक्षण स्कूल खोलना चाहती है, लेकिन फिलहाल बेटे भवानी की करतूत से उसे गहरा झटका लगा है. इस से उबरने में उसे समय लगेगा. True Crime Story

Crime Story: बड़े लोगों के बड़े बडें राज

Crime Story: शीना बोरा के कत्ल की कहानी तमाम रहस्यों में उलझी हुई है. कुछ रहस्य सुलझ गए हैं तो कुछ सुलझ जाएंगे. लेकिन यह रहस्य शायद ही सुलझ पाए कि इतने धनाढ्य और नामीगिरामी परिवार की होते हुए भी इंद्राणी मुखर्जी ने ऐसा क्यों किया? दौलत के लिए तो यह हो नहीं सकता, क्योंकि दौलत तो उन के कदम चूमती थी. फिर क्या रहस्य था शीना की हत्या का?

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया को मुंबई में अवैध हथियारों की खरीदफरोख्त से जुड़ी एक गुप्त सूचना मिली थी. इस संबंध में अपराधियों की धरपकड़ करतेकरते एक ऐसा कार ड्राइवर पुलिस के हत्थे चढ़ा, जिस से 7.66 एमएम की एक पिस्टल बरामद हुई. बरामद पिस्टल की मिल्कीयत की बाबत वह कोई सबूत पेश नहीं कर सका, न ही उस के पास हथियार रखने का कोई लाइसेंस था. उस का कहना था कि वह पिस्टल उसे एक जगह लावारिस पड़ा मिला था. पुलिस ने उस से सघन पूछताछ की. इस पूछताछ में की गई सख्ती उस से बरदाश्त नहीं हुई तो उस ने एक ऐसे सनसनीखेज अपराध का खुलासा कर दिया, जिस के बारे में सुनते ही पुलिस वालों के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

उस ड्राइवर का नाम था श्यामवर राय. पुलिस द्वारा उस के अन्य अपराधों के बारे में पूछे जाने पर श्यामवर राय ने बताया कि उस ने कभी कोई अपराध नहीं किया. अलबत्ता कत्ल के एक मामले में अपनी मालकिन को सहयोग जरूर दिया था. श्यामवर राय ने पूछताछ में जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिस दुविधा में पड़ गई, वजह यह थी कि वह एक निहायत संगीन अपराध था और एक जानीमानी हस्ती से जुड़ा था. वह जिस कत्ल के बारे में पुलिस को बता रहा था, उस में मुख्य रूप से एक ऐसी औरत का हाथ था, जो न केवल मीडिया जगत की जानीमानी हस्ती थी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खासा रुतबा रखती थी.

सन 2008 में उस का नाम दुनिया की 50 पावरफुल महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था. इस के अलावा भी उस के नाम के साथ अन्य कई उपाधियां जुड़ी थीं. पूछताछ में ड्राइवर श्यामवर राय ने सीधेसीधे बताया कि उस महिला ने एक अन्य आदमी के साथ मिल कर अपनी छोटी बहन को मौत के घाट उतारा था और उस का शव रायगढ़ के जंगल में ले जा कर जला दिया था. बाद में उसे वहीं दफन कर दिया गया था. लेकिन बिना पर्याप्त सबूतों के उस महिला पर हाथ डालना आसान नहीं था. वैसे भी यह बात 3 साल से ज्यादा पुरानी थी.

महाराष्ट्र पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी राकेश मारिया अपनी योग्यता और आपराधिक केसों को प्रोफेशनल तरीके से हल कर के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए जाने जाते रहे हैं. इस का एक कारण यह भी रहा कि कोई भी आपराधिक मामला हल करने में उन्होंने कभी हड़बड़ी या जल्दबाजी नहीं की. वांछित अपराधी पर भी उन्होंने तभी हाथ डाला, जब उस के खिलाफ पर्याप्त सबूत हाथों में आ गए. इस केस में तो आरोपी का कद इतना बड़ा था कि बिना सही सबूतों के उस पर हाथ डालने का मतलब था, अपनी नौकरी से हाथ धोना. इसलिए राकेश मारिया ने एकएक कदम फूंकफूंक कर रखने का फैसला किया.

राकेश मारिया 30 सितंबर, 2015 को पुलिस कमिश्नर पद से मुक्त होने जा रहे थे. इसलिए वह चाहते थे कि मुंबई पुलिस कमिश्नर पद के बचेखुचे दिन बिना किसी दागधब्बे के अमनचैन से निकल जाएं. यह केस फूलप्रूफ तरीके से हल करने के लिए मारिया ने डीसीपी धनंजय कुलकर्णी के अलावा कुछ अन्य काबिल अफसरों और पुलिस कर्मचारियों की टीम बनाई. यह टीम मामले की तह में जा कर दोषियों के खिलाफ सबूत जुटाने में जुट गई. मारिया पलपल की खबर रख रहे थे. इस काम में उन्हें 3 महीने तो लगे, लेकिन उन्होंने कत्ल का केस हल करने के लिए वांछित सबूत जुटा लिए.

मीडिया जगत की जानीमानी हस्ती पीटर मुखर्जी ने सन 1993 से 2007 तक स्टार इंडिया के साथ काम किया था. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘सास भी कभी बहू थी’ जैसे सीरियल को अस्तित्व में लाने का श्रेय उन्हें भी दिया गया था. यह केस पीटर मुखर्जी की पत्नी इंद्राणी मुखर्जी से ही जुड़ा था. दरअसल, इंद्राणी बोरा पहले मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज में बतौर एचआर कंसल्टेंट काम करती थी. वह निहायत ही खूबसूरत औरत थी. कहते हैं कि एक कौकटेल पार्टी में किसी ने पीटर और इंद्राणी का परिचय करवाया तो इंद्राणी ने बेतकल्लुफी से पीटर के गले लगते हुए कहा कि वह उन्हें न केवल पहले से जानती है, बल्कि एक सफल आदमी के रूप में उन्हें पसंद भी करती है.

इंद्राणी के बात करने के खुले लहजे और उस की खूबसूरती ने पीटर का मन कुछ इस तरह मोह लिया कि वह उसे पाने के लिए लालायित हो उठे. पीटर किसी अन्य औरत के साथ पार्टी में आए थे, जिसे वहीं छोड़ कर वह इंद्राणी के साथ चले गए. इस के बाद तो जैसे दोनों लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे. बाद में नवंबर, 2002 में दोनों ने शादी कर ली. उस समय पीटर 46 साल के तलाकशुदा अधेड़ थे, जबकि इंद्राणी 30 साल की थी यानी पीटर से 16 साल छोटी.

इंद्राणी ने पीटर से खुद को सिंगल मदर बता कर कहा था कि उस ने अपने आत्मसम्मान की वजह से अपने अभिभावकों से रिश्ता तोड़ रखा है. पीटर के कहने पर इंद्राणी अपनी 5 साल की बेटी विधि को भी घर में ले आई, जिसे पीटर ने विधिवत अपनी दत्तक पुत्री बना लिया. सन 2007 में जब पीटर ने स्टार को छोड़ा तो यह कंपनी स्टार इंडिया, स्टार ग्रुप और स्टार एंटरटेन इंडिया नाम की 3 कंपनियों में बंट गई. पीटर मुखर्जी को स्टार ग्रुप का सीईओ बनाया गया और एंटरटेन इंडिया का सीईओ बनाया गया समीर नायर को. इस बीच पीटर व इंद्राणी ने मिल कर आईएनएक्स मीडिया कंपनी की स्थापना कर ली थी. दरअसल यह कदम इंद्राणी के लिए ही उठाया गया था.

हकीकत में शादी के बाद धीरेधीरे इंद्राणी ने पीटर मुखर्जी की जिंदगी पर पूरी तरह कब्जा कर लिया था. उस की जिस्मानी मादकता में खोए पीटर भी उसी के इशारों पर नाच रहे थे. पीटर के स्टार ग्रुप छोड़ने से 1 साल पहले ही इंद्राणी ने विधिवत आईएनएक्स कंपनी की चेयरपरसन का काम संभाल लिया था. साथ ही उस ने अन्य कई चैनल भी लांच करने की योजना बनानी शुरू कर दी थी. पीटर और इंद्राणी ने आईएनएक्स कंपनी को बड़े पैमाने पर लांच करने की बात कह कर देशविदेश की विज्ञापन कंपनियों से अपार धन एकत्र किया. देखतेदेखते ये लोग 800 करोड़ की संपत्ति के मालिक बन गए. मीडिया जगत में दोनों का खूब रुतबा तो था ही.

चेयरपरसन होने के नाते चूंकि इंद्राणी ही कंपनी का सारा काम देख रही थी, इसलिए उसे तमाम अवार्ड भी मिले और उस की पर्सनैलिटी पर लेखफीचर भी छपने लगे. कई बार टीवी पर भी उस के इंटरव्यू आए. इंद्राणी कुछ तो कुदरतन खूबसूरत थी, कुछ वह खूब बनठन कर रहा करती थी. फलस्वरूप पार्टियों में उस के व्यक्तित्व का अलग ही आकर्षण होता था. वह सब से खुल कर बातें करने में भी परहेज नहीं करती थी. साथ ही वह डांस भी बहुत अच्छा किया करती थी. यहां तक कि कभीकभी वह गीत वगैरह सुना कर भी महफिल में रंग जमा देती थी.

इत्तफाकन अगर वह किसी पार्टी में न पहुंच पाती तो अन्य लोग सब से ज्यादा उसी के बारे में पूछताछ करते थे. वैसे भी उस के बारे में यह बात मशहूर थी कि जिंदगी को सही मायनों में जीना है तो इस का गुर इंद्राणी मुखर्जी से सीखो. मुखर्जी परिवार संपन्न परिवार था. उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. पैसा तो जैसे इस परिवार के आंगन में बरसता था. सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था. तभी अचानक एक दिन एक लड़की शीना बोरा और लड़का मिखाइल पूछतेपूछते मुखर्जी परिवार के घर आ पहुंचे. उन दोनों को देख कर इंद्राणी पहले तो चौंकी, फिर उस ने पीटर को बताया कि ये दोनों उस के छोटे भाईबहन हैं.

यह जान कर पीटर ने उन दोनों की काफी आवभगत की और उन्हें अपने साथ ही रहने को कहा. इंद्राणी ने उन के रहने की अलग व्यवस्था करवा दी. सन 2010 में पीटर व इंद्राणी कुछ समय के लिए इंग्लैंड चले गए. वापस लौट कर वे फिर से अपनी खुशहाल जिंदगी में रम गए. इंद्राणी ने अपने भाईबहन की बात करना पहले ही बंद कर दिया था. पीटर मुखर्जी ने एकाध बार पूछा तो उस ने बताया कि मिखाइल अपना कारोबार जमाने में व्यस्त हो गया है, जबकि शीना को अमेरिका में अच्छी नौकरी मिल गई है. पीटर पत्नी की हर बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे. इस बार भी उन्हें इंद्राणी की बात पर कोई संदेह नहीं हुआ.

वक्त अपनी रफ्तार से गुजर रहा था कि अचानक एक रोज…

उस दिन अगस्त, 2015 की 26 तारीख थी. पीटर मुखर्जी अपनी पत्नी इंद्राणी के साथ वरली स्थित अपने निवास पर थे. सुबह का वक्त था. डोरबेल बजने पर घर के नौकर ने दरवाजा खोला तो सामने मुंबई पुलिस खड़ी थी. इंद्राणी को बुला कर एक महिला सबइंसपेक्टर ने आगे आ कर कहा, ‘‘मैडम, हमारे अफसरों को किसी केस के सिलसिले में आप से बात करनी है. कृपया आप हमारे साथ अभी थाने चलें.’’

इंद्राणी मुखर्जी मीडिया जगत से जुड़ी एक बड़ी हस्ती थी. वह पता नहीं कितने पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों से अकसर मिला करती थी. वे तमाम लोग उसे निजी रूप से जानते थे. इसलिए इंद्राणी के लिए आम लोगों की तरह पुलिस से भयभीत होने जैसा कुछ नहीं था. वह बेझिझक बेपरवाह पुलिस की गाड़ी में बैठ कर उन के साथ चली गई. थाना खार में पहुंच कर उसे बताया गया कि उसे उस की बहन शीना बोरा के कत्ल और उस की लाश को खुर्दबुर्द करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. इस संबंध में उस के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 (हत्या) व 201 (सबूत नष्ट करने) के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया जा चुका है.

इस के साथ ही पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के बारे में उस के पति पीटर मुखर्जी को भी सूचित कर दिया. पीटर मुखर्जी यह सुन कर अचंभित रह गए कि शीना का कत्ल कर दिया गया है और इस का इलजाम इंद्राणी पर है. उन्होंने कहा कि इंद्राणी ने अगर वाकई ऐसा किया है तो उस ने निहायत ही घिनौना काम किया है. इस के बावजूद उन्होंने पत्नी की मदद के लिए वकीलों का इंतजाम कर दिया.  पुलिस थाना खार में थोड़ीबहुत मनोवैज्ञानिक पूछताछ करने के बाद उसी रोज कस्टडी रिमांड के लिए इंद्राणी को बांद्रा स्थित मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया.

इंद्राणी की ओर से महानगर के 2 जानेमाने वकीलों ने उस के बचाव में अदालत में पेश हो कर कहा कि उन की मुवक्किला को झूठे केस में फंसाया जा रहा है. किसी ने अगर शीना का कत्ल कर दिया था तो इस में इंद्राणी मुखर्जी का क्या कसूर? वकीलों का कहना था कि इस मामले में पुलिस के पास उन की संलिप्तता का कोई प्रमाण नहीं है. वैसे भी वह मीडिया जगत की एक सम्मानित महिला हैं न कि कोई पेशेवर अपराधी. इसलिए अदालत को उसे पुलिस रिमांड में न दे कर तुरंत जमानत पर रिहा कर देना चाहिए.

माननीय दंडाधिकारी ने इंद्राणी के वकीलों की दलील सुनने के साथसाथ पुलिस का पक्ष भी सुना और उन के द्वारा पेश किए गए तथ्यों को भी जांचापरखा. इस के बाद अदालत ने पुलिस को इंद्राणी का रिमांड दे दिया. पुलिस ने इंद्राणी मुखर्जी को 5 दिनों तक कस्टडी रिमांड में रख कर शीना बोरा की हत्या के बारे में पूछताछ की. लेकिन इंद्राणी भी कम नहीं थी. पुलिस के तमाम हथकंडों के आगे न तो वह झुकी और न ही डरी. अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को मानने से उस ने साफ इनकार कर दिया. वह पुलिस को यही समझाने का प्रयास करती रही कि शीना मरी नहीं, अमेरिका में नौकरी कर रही है. हां, पिछले कुछ अरसे से वह उस के संपर्क में नहीं है, न ही उस के पास उस का कौंटेक्ट नंबर या पता वगैरह है.

इंद्राणी द्वारा पुलिस को बताए अनुसार, किसी बात पर शीना से उस की बहस हो गई थी, जिस से नाराज हो कर वह 3 साल पहले अमेरिका चली गई थी. वहीं से उस ने एक बार फोन कर के बताया था कि अमेरिका में उसे बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है, इसलिए अब वह दोबारा कभी उस के पास इंडिया नहीं आएगी. इंद्राणी आसानी से काबू में नहीं आ रही थी. वह एक ही रट लगाए हुए थी कि इस केस में उस के किसी दुश्मन के कहने पर उसे गलत तरीके से फंसाया जा रहा है. इंद्राणी से उस का अपराध कबूल करवाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था.

दूसरा कोई चारा न देख पुलिस ने ड्राइवर श्यामवर राय को ला कर उस के सामने खड़ा कर दिया. वह पहले ही से कस्टडी रिमांड में चल रहा था. उसे सामने देख इंद्राणी को कंपकंपी छूट गई. पुलिस के मुताबिक इस के बाद इंद्राणी ने शीना की हत्या करने की बात कबूल करते हुए कई राज खोले. पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने उसी दिन पत्रकारों को बताया कि शीना असलियत में इंद्राणी की बहन न हो कर बेटी थी. जुलाई, 2012 में जब वह 22 वर्ष की थी, उस की हत्या कर दी गई. अपनी ही बेटी के कत्ल का तानाबाना इंद्राणी ने खुद ही बुना था. शीना को ब्रांदा से सूमो गाड़ी पर अपहृत कर के मुंबई के दूरवर्ती इलाके रायगढ़ में एक सुनसान जगह पर ले जाया गया.

गाड़ी में शीना और इंद्राणी के अलावा ड्राइवर श्यामवर राय व संजीव खन्ना नामक शख्स थे. ड्राइवर ने इंद्राणी मुखर्जी के मुंह से इस शख्स का नाम सुन लिया था, मगर उसे यह नहीं मालूम हो पाया था कि दोनों का आपस में रिश्ता क्या था. बकौल पुलिस आयुक्त मारिया इंद्राणी ने पूछताछ में बताया कि उस ने शीना को रायगढ़ के फार्महाउस में होने वाली पार्टी में शामिल होने के बहाने से बुलाया था. शीना की हत्या मुंबई से दूर खोपोली सड़क मार्ग पर एक सुनसान जगह पर गला दबा कर की गई, फिर रायगढ़ के जंगल में पैट्रोल छिड़क कर शव को न केवल जलाया गया, बल्कि उसे वहीं गड्ढा खोद कर दफन भी कर दिया गया.

पुलिस कमिश्नर का यह बयान मीडिया के जरिए लोगों के सामने आया तो पूरे देश की नजरें इसी खबर पर टिक गईं. यह मुंबई महानगर का हाईप्रोफाइल केस था, जो अनैतिक संबंध, रिश्तों में धोखे और पैसों के लालच में उलझी किसी थ्रिलर स्टोरी की तरह सामने आता दिखाई दे रहा था. 27 अगस्त को पुलिस ने संजीव खन्ना को गिरफ्तार कर लिया. पता चला वह इंद्राणी का पूर्व पति था. खन्ना से की गई पूछताछ में पता चला कि उस की और इंद्राणी की मुलाकात 1980 के दशक में मेघालय की राजधानी शिलांग में तब हुई थी, जब इंद्राणी हायर एजुकेशन के सिलसिले में वहां रह रही थी.

पूछताछ में संजीव खन्ना ने पुलिस को बताया कि इंद्राणी के पिता एक बड़े कारोबारी थे. उस से उन का परिचय गुवाहाटी में अपना कारोबार जमाते समय हुआ था. इस संबंध में उन्होंने खन्ना की काफी मदद की थी. उन की बेटी इंद्राणी से खन्ना का इस से पहले ही परिचय हो चुका था, जो वक्त के साथ प्रेम में बदल गया था. बाद में दोनों ने आपस में शादी कर ली थी. इसी बीच मिखाइल ने पुलिस को यह बयान दे कर चौंका दिया कि वह इंद्राणी मुखर्जी का भाई नहीं, बल्कि बेटा है. अलबत्ता वह अपने पिता का नाम नहीं बता पाया. फिर भी उस ने यह बात पूरा जोर दे कर कही कि निश्चित रूप से उस की बहन शीना की हत्या हुई है, लेकिन इस संबंध में कुछ सनसनीखेज खुलासे वह तब करेगा, जब मुंबई पुलिस इस केस की अपनी छानबीन पूरी कर लेगी.

पुलिस के हवाले से यह बात भी सामने आई कि शीना के संबंध पीटर मुखर्जी की पहली पत्नी शबनम से पैदा बेटे राहुल मुखर्जी के साथ थे और दोनों शादी करना चाहते थे. यह बात सामने आने पर पीटर मुखर्जी ने अफसोस जाहिर करते हुए केवल इतना ही कहा कि वह सोच भी नहीं सकते थे कि उन के परिवार में इतना कुछ घट जाएगा और उन्हें पता भी नहीं चलेगा. इंद्राणी के बारे में भी अब तक यह तथ्य सामने आ गया था कि उस ने खुद को सिंगल मदर बता कर जब पीटर मुखर्जी से शादी की थी तो एक नहीं, कई झूठ बोले थे. उन में सब से बड़ा झूठ तो यही था कि उस ने अपनी औलादों मिखाइल व शीना को बेटाबेटी की जगह अपना भाईबहन बताया था.

अब यह बात भी सामने आई कि पीटर मुखर्जी से पहले भी इंद्राणी 2 शादियां कर चुकी थी. उस के पहले पति का नाम था सिद्धार्थ दास, जबकि संजीव खन्ना उस का दूसरा पति था. सिद्धार्थ से उसे बेटी शीना व बेटा मिखाइल पैदा हुए थे और संजीव खन्ना से बेटी विधि, जिसे पीटर मुखर्जी ने दत्तक पुत्री बना लिया था. रहस्यों से भरी किसी फिल्म की तरह पीटर के सामने नईनई बातें आ रही थीं. मीडिया के लोग उन से असलियत जानने को उन के घर के चक्कर लगाने लगे. आखिर परेशान हो कर पीटर को अपना बयान जारी करना पड़ा, ‘मैं पूरी तरह सदमे में हूं. अब तक मैं शीना को इंद्राणी की बहन मानता आया था और मिखाइल को उस का भाई. अब पता चल रहा है कि दोनों उस की अपनी औलाद थे.

‘शीना जब भारत नहीं आ रही थी तो मेरे बेटे राहुल ने मुझ से कहा था कि पापा कुछ गड़बड़ है. उस ने एक बार मुझे यह बताने की कोशिश भी की थी कि शीना असल में इंद्राणी की बेटी हो सकती है. लेकिन मैं ने उस की बात को खारिज कर दिया था. दूसरों की जिंदगी से जुड़ी सनसनीखेज कहानियां सुनना और पढ़ना जितना खुशगवार लगता है, उतना ही मुश्किल होता है अपने जीवन में इस तरह की कहानी से रूबरू होना.’

इस बीच पुलिस ने श्यामवर की निशानदेही पर रायगढ़ के जंगल से बरामद शीना की हड्डियों को मुंबई के जेजे अस्पताल में सुरक्षित रखवा दिया था. श्यामवर राय के अनुसार शीना की हत्या के बाद इंद्राणी मुखर्जी व संजीव खन्ना ने उसे चुप रहने के लिए बहुत बुरी तरह से धमकाया था, साथ ही मुंह बंद रखने के लिए उसे 50 हजार रुपए भी दिए थे.

पुलिस प्रवक्ता के अनुसार, श्यामवर राय इस अपराध में सीधे तौर पर शामिल नहीं था. इंद्राणी मुखर्जी का वह निजी ड्राइवर था. वह उस के दबंग स्वभाव से अच्छी तरह परिचित था. साथ ही वह यह भी जानता था कि इंद्राणी के बहुत ऊंचे संबंध थे, जिन के चलते वह किसी के खिलाफ कुछ भी करवा सकती थी. उस ने पुलिस को बताया कि उस की मालकिन अपने पति पीटर मुखर्जी को भी जूती की नोक पर रखती थी और उन्हें जराजरा सी बात पर बुरी तरह लताड़ देती थी. घर में एक तरह से इंद्राणी मुखर्जी का ही एकछत्र राज था. इन्हीं वजहों से श्यामवर राय अपनी मालकिन से बहुत डरता था. हालांकि शीना की हत्या के बाद उस का कई बार मन हुआ कि वह इस बारे में पुलिस को बता दे.

लेकिन वह इंद्राणी मुखर्जी के खिलाफ जाने का साहस कभी नहीं जुटा पाया. अब जबकि इंद्राणी मुखर्जी व संजीव खन्ना खुद सलाखों के पीछे हैं तो श्यामवर पुलिस संरक्षण में पूरी तरह इन के खिलाफ खड़ा हो गया था. वैसे भी उन के खिलाफ खड़े होने में ही उस की भलाई थी. संजीव खन्ना कोलकाता में केबल नेटवर्क का कारोबार करता था. उस के पास फाइनैंस का ज्यादा इंतजाम नहीं था और उस का बिजनैस भी घाटे में जा रहा था. 24 अप्रैल, 2012 को शीना के मर्डर के बाद एकदम से उस के खाते में इतनी बड़ी रकम आ गई थी कि रातोंरात उस ने अपने डूबते कारोबार को संभाल लिया था.

इस के साथ ही उस ने कोलकाता के चौरंगी लेन क्षेत्र में 1500 वर्गफुट के एरिया में  ‘1658 बार ऐंड किचन’ नाम से नया काम भी शुरू कर दिया था. इस काम में उस का एक पार्टनर भी था अजय रावला, जो उस की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत हो गया था. इस के अलावा भी खन्ना ने पश्चिम बंगाल के बावाली शहर में अपना एक हेरिटेज रिजौर्ट बना रखा था. हालांकि यह बात पूरी तरह साफ थी कि खन्ना के पास अचानक इतनी बड़ी धनराशि कहां से आ गई थी कि उस ने अपना डूबता हुआ कारोबार संभालने के साथसाथ नए काम भी शुरू कर दिए थे. लेकिन पुलिस इस बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थी. सिवाय इस के कि शीना की हत्या में संजीव खन्ना भी उतना ही कसूरवार था, जितना कि इंद्राणी मुखर्जी.

शीना मर्डर केस की जांच आगे तो बढ़ रही थी, लेकिन बुरी तरह उलझीउलझी सी स्थिति में. यहां तक कि हत्या का मकसद तक साफ रूप से सामने नहीं आ रहा था. सही परिणाम सामने आते न देख 27 अगस्त, 2015 को पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने इस केस की जांच का जिम्मा पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने थाने में बैठ कर केस के तीनों अभियुक्तों से खुद पूछताछ की. साथ ही उन्होंने इंद्राणी मुखर्जी के सौतेले बेटे राहुल मुखर्जी को भी वहां बुलवा लिया था. उस से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में संजीव खन्ना ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि जब अपराध हुआ, तब वह अपने किसी काम से मुंबई आया था. यहां आ कर वह इंद्राणी के कहने पर उस की कार में बैठ गया था और कार चलते ही वह सो गया था. उसे नहीं मालूम कि उस की नींद के दौरान कार में या कार के बाहर क्या हुआ.

संजीव खन्ना ने पुलिस कमिश्नर मारिया को बताया, ‘‘सर, मेरी व इंद्राणी की बेटी विधि अमेरिका में पढ़ रही है. विधि को पीटर मुखर्जी ने गोद ले रखा है. शीना का पीटर के बेटे राहुल से अफेयर था. दोनों लिवइन रिलेशनशिप में भी रहे थे. इसे ले कर इंद्राणी शीना से बहुत नाराज थी. सो उस ने अपने ड्राइवर से मिल कर शीना की हत्या कर दी.’’

लेकिन पुलिस के थोड़ा सख्ती करते ही उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने मकसद के बारे में बताया कि विधि इंद्राणी की बेटी थी और शीना भी उसी की बेटी निकल आई थी. ऐसी स्थिति में उस के न रहने से इंद्राणी की प्रौपर्टी में उस का हिस्सा विधि को मिल जाता. राहुल मुखर्जी से एक घंटा पूछताछ करने के बाद उसे वापस घर भेज दिया गया था. 12 घंटे बाद उसे फिर से पूछताछ के लिए थाना खार में बुलवाया गया. पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने उस से खुद सवाल किए. दरअसल वह जानना चाहते थे कि एक बरस से अधिक तक शीना के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद वह एकाएक उस की ओर से बेफिक्र क्यों हो गया था? उस ने इस संबंध में पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई?

राहुल को वरली व खार के उन फ्लैटों में भी ले जाया गया, जहां शीना और वह साथसाथ रहे थे. शीना का भाई मिखाइल अभी तक चुप था, अब उस ने भी टीवी पर आ कर सीधेसीधे साफ कहना शुरू कर दिया कि उस के पास ऐसे पक्के सबूत हैं, जो इंद्राणी मुखर्जी को शीना का कातिल करार देने के लिए काफी हैं. मिखाइल गुवाहाटी में रहता था. पुलिस ने वहां पहुंच कर उस से पूछताछ की. उस ने कुछ टेप व फोटो वगैरह पुलिस को दिए. साथ ही अपना बयान दर्ज करवाने के अलावा यह भी बताया कि शीना के साथसाथ इंद्राणी उसे भी मार देना चाहती थी. इतना ही नहीं, अभी भी उसे उस की ओर से जान का खतरा है.

मिखाइल ने पुलिस को शीना का बर्थ सर्टिफिकेट भी दिया, जिस पर उस के मातापिता के नाम वाले कौलम में उस के नानानानी उपेंद्र कुमार बोरा व दुर्गारानी बोरा का नाम दर्ज था. शीना की जन्मतिथि थी 11 फरवरी, 1989. मिखाइल उस से बड़ा था, उस के अभिभावक भी उस के नानानानी ही थे. बरसों पहले शीना को जन्म देने के बाद इंद्राणी ने शीना और मिखाइल को अपने मातापिता के पास छोड़ कर सिद्धार्थ दास से शादी कर ली थी. अभी तक सब को यही पता था कि पीटर मुखर्जी ही इंद्राणी के पति थे. अब यह बात सामने आई कि पीटर से पहले उस ने संजीव खन्ना से शादी की थी, जिस से शादी के बाद उस ने बेटी विधि को जन्म दिया था. संजीव से पहले उस ने सिद्धार्थ दास से शादी की थी.

इंद्राणी का आचरण बेहद उलझा हुआ था, पुलिस ने फिलहाल इसी को खंगालने की सोची. देखा जाए तो इंद्राणी का पूरा जीवन अय्याशी, मक्कारी और झूठी महत्त्वाकांक्षाओं से भरा था. वह जिंदगी में सब कुछ हासिल करने के लिए ऊंची से ऊंची उड़ान भरना चाहती थी, जिस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहती थी. जहां जरा सा फायदा नजर आया, वहां उस ने अपना जिस्म दांव पर लगाने में भी झिझक नहीं की.  वैसे इंद्राणी का मूल नाम था परी. अपने मांबाप की एकलौती संतान थी वह. परी के पिता का पहले अच्छाभला कारोबार था, जिस के घाटे में चले जाने की वजह से वह कुंठित हो गए थे. पत्नी से भी अनबन रहने लगी थी.

औलाद के रूप में उन के यहां एक बेटी ही थी परी, जिस पर गुस्सा उतारने के लिए वह उसे जराजरा सी बात पर पीटने लगते थे. कई बार तो उसे मारपीट कर कमरे में बंद कर दिया जाता था. एक बार परेशानी की हालत में वह घर से भाग गई. लेकिन स्टेशन पर गाड़ी में बैठने से पहले ही वह पिता द्वारा पकड़ ली गई. उस रोज उस की इतनी पिटाई हुई कि वह 2 बार तो बेहोश हो गई. बहरहाल, जैसेतैसे परी ने स्कूली शिक्षा पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए उसे शिलांग भेज दिया गया, जहां उस के कदम बहके और 1988 में उस ने महज 17 साल की उम्र में कुंवारी मां के रूप में मिखाइल को जन्म दिया. फिर 1989 में शीना पैदा हो गई. इस के बाद दोनों बच्चों को अपने मांबाप की गोद में डाल कर वह अपनी खुद की बनाई राह पर निकल पड़ी. इस नई राह पर उस ने अपना नाम रखा इंद्राणी.

इंद्राणी ने सब से पहले शादी की अपने से दोगुनी उम्र के वकील से, जो ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई. इस के बाद शिलांग में उस की मुलाकात सिद्धार्थ दास से हुई. दोनों ने विवाह भी किया, लेकिन कुछ ही दिनों में दोनों का तलाक हो गया. फिर वापस गुवाहाटी पहुंच कर उस ने साहिल नाम के लड़के से प्रेम विवाह किया. उस के साथ भी इंद्राणी का रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया. उस ने मामूली सी अनबन पर उसे भी तलाक दे दिया. तदनंतर गुवाहाटी से कोलकाता आ कर इंद्राणी ने एक निजी फर्म में काम किया, जहां उस की मुलाकात कारोबारी संजीव खन्ना से हुई. खन्ना को अपने प्रेमजाल में फंसा कर इंद्राणी ने उस से शादी कर ली, जिस से उसे बेटी विधि पैदा हुई.

खन्ना के साथ भी उस की शादी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई. अंतत: उस ने संजीव खन्ना को भी तलाक दे दिया और नन्हीं विधि को ले कर मुंबई चली आई. मुंबई में इंद्राणी को अच्छी नौकरी मिली तो नए पति के रूप में पीटर मुखर्जी भी मिल गए. अब उस के लिए आसमान को छूने के रास्ते खुल गए थे. स्टार पति के साथ वह खुद भी स्टार बन गई थी. हालांकि इंद्राणी की कारगुजारियों के चलते पीटर भी बदनाम होने लगे थे. खैर, पुलिस की निरंतर पूछताछ अभी भी जारी थी. इस बार की पूछताछ में इस बात का सनसनीखेज खुलासा हुआ कि कत्ल किए जाते वक्त शीना 2 माह की गर्भवती थी. इस संबंध में राहुल मुखर्जी के मामा शालीन सिंह ने देहरादून में पत्रकारों को बताया कि राहुल व शीना के रिश्ते को उन की बहन शबनम व मां सीमा सिंह ने भी मंजूरी दे दी थी.

पीटर मुखर्जी की पहली ससुराल देहरादून के बदीपुर इलाके में है, जहां उन की पहली पत्नी शबनम का गुलएशबनम नाम से फार्महाउस है. इस से कुछ ही दूरी पर उन की मां सीमा सिंह का शंकर सदन नाम से बंगला है. बकौल शालीन सिंह सन 2011 में राहुल के साथ शीना जब शबनम के फार्महाउस पर आई थी तो राहुल ने अपनी मां के सामने उस से शादी की बात रखी थी. इस पर शबनम ने अपनी मां और उन्हें सलाहमशविरे के लिए वहां बुला लिया था. शालीन सिंह के अनुसार, शीना सभी को बहुत पसंद आई थी. वैसे भी वह और राहुल पतिपत्नी की तरह रह रहे थे. इसलिए उन सब ने इस शादी के  लिए हामी भर दी थी. अगले दिन राहुल शीना को ले कर मुंबई चला गया. इस के बाद उस की कोई खबर नहीं आई थी.

पुलिस हिरासत में अपना गुनाह कबूल करते हुए संजीव खन्ना ने पुलिस से पूरा सहयोग करने की बात कहते हुए घटनास्थल पर जा कर शीना की कुछ हड्डियां बरामद करवा दीं. यहां से उस का एक दांत भी मिला. देहरादून से पुलिस ने शीना का पासपोर्ट भी बरामद कर लिया था. पुलिस ने हड्डियां, खोपड़ी व दांत वगैरह डीएनए परीक्षण के लिए सुरक्षित रख लिए थे. दरअसल इस केस में दोषियों को सजा दिलवाने के लिए अहम भूमिका फोरैंसिक प्रमाण ही निभा सकते थे. 29 अगस्त को पुलिस ने वह कार भी बरामद कर ली, जिस का इस्तेमाल शीना के मर्डर में हुआ था.

इस के बावजूद इस केस में कोई भी बात पूरी तरह खुल कर सामने नहीं आ रही थी. यही वजह थी कि लोगों को पुलिस की तफ्तीश पर जरा भी विश्वास नहीं हो पा रहा था. इसे ले कर पुलिस की किरकिरी भी हो रही थी. इसी बीच रायगढ़ के तत्कालीन एसपी आर.डी. शिंदे संदेह के घेरे में आ गए. महाराष्ट्र के डीजीपी संजीव दयाल ने बताया कि 2012 में शीना का शव मिलने पर लापरवाही बरतने वाले किसी भी पुलिसकर्मी अथवा अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा. उल्लेखनीय है कि तब रायगढ़ पुलिस ने जंगल से जला हुआ शव और सूटकेस मिलने पर न तो हत्या का कोई केस दर्ज किया था और न ही जले हुए शव का पोस्टमार्टम करवाया था.

30 अगस्त को इंद्राणी के गैरेज से ठीक वैसा ही सूटकेस मिला, जैसा कि शीना के शव के टुकड़े रखने के लिए इस्तेमाल किया गया था. पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस सूटकेस में मिखाइल की हत्या कर के उस के शव के टुकड़े रखे जाने थे. बताते चलें कि मिखाइल पहले ही यह दावा कर चुका था कि शीना से भी पहले इंद्राणी की योजना उस की हत्या करने की थी. 31 अगस्त को पुलिस रिमांड खत्म हो रहा था. अभी तक की पूछताछ से पुलिस खुद भी संतुष्ट नहीं थी. रिमांड बढ़ाने के अनुरोध के साथ इंद्राणी, संजीव व श्यामवर को फिर से बांद्रा मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पेश किया गया तो पुलिस रिमांड की अवधि 5 सितंबर, 2015 तक के लिए बढ़ा दी गई.

इस केस में हर दिन नएनए खुलासे हो रहे थे. 2 सितंबर को सिद्धार्थ दास ने कोलकाता में कुछ पत्रकारों से संपर्क कर के कहा, ‘‘शीना मर्डर केस के बारे में अखबारों और टीवी चैनलों से पता चला तो मैं सच्चाई पर पड़ा परदा उठाने को मजबूर हुआ हूं. इंद्राणी से न तो मेरी कानूनी तौर पर और न ही किसी मंदिर में शादी हुई थी. हम दोनों 1986 से 1989 तक लिवइन रिलेशनशिप में पतिपत्नी की तरह जरूर रहे थे. इसी दौरान हमारे 2 बच्चे मिखाइल और शीना पैदा हुए थे. मैं ही इन दोनों का जैविक पिता हूं. हां, इंद्राणी ने वाकई अगर शीना की हत्या की है तो निश्चित ही उसे फांसी की सजा होनी चाहिए. मैं डीएनए टेस्ट करवा कर पुलिस की हर तरह की मदद करने को तैयार हूं.’’

इसी दिन पीटर को भी पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया, जहां उन्हें देखते ही इंद्राणी रोने लगी. इन दोनों को आमनेसामने बिठा कर पुलिस ने पीटर से उन की फाइनैंशियल ट्रांजेक्शंस की जानकारी मांगी, जो उन्होंने विस्तारपूर्वक दे दी. पीटर से पुलिस ने निरंतर 12 घंटों तक पूछताछ की. पीटर के सामने इंद्राणी ने एक बार फिर हत्या का अपना जुर्म स्वीकार किया. इसी दौरान शीना की एक डायरी भी सामने आई, जिस का हर पन्ना भावुकता से भरा था. इंद्राणी के बारे में उस ने एक जगह लिखा था, ‘मुझे नहीं पता कि मां मुझे याद करती है या नहीं, लेकिन वह मेरी मां है, मैं उन्हें चाहती हूं. वह दुनिया की सब से हसीन औरत हैं, एकदम फिल्मी हीरोहन लगती हैं. लेकिन उन की फितरत ऐसी है कि मैं उन्हें डायन कहना पसंद करूंगी.’

4 सितंबर को इस केस में बड़ा खुलासा यह हुआ कि रायगढ़ से मिली खोपड़ी का मिलान शीना के फेशियल रीकंस्ट्रक्शन से हो गया. 5 तारीख को रिमांड समाप्ति पर इंद्राणी, संजीव व श्यामवर को फिर से अदालत में पेश कर के 7 सितंबर तक इन का कस्टडी रिमांड बढ़वा लिया गया. रिमांड की इस अवधि में पुलिस ने कुछ ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल किया कि शीना मर्डर केस की सारी सच्चाई पूरी तरह खुल कर सामने आ गई: दरअसल, इंद्राणी के लिए हर रिश्ता एक सीढ़ी था, जिस के सहारे वह आसमान की ऊंचाइयां छूना चाहती थी. सामने वाले को धोखा देना उस की फितरत में शुमार था.

दिल से तो वह किसी को भी पसंद नहीं करती थी, न अपने किसी प्रेमी या पति को और न ही अपनी औलादों को. उसे तो अपना मतलब निकालना आता था, इस के लिए सामने वाला उस के जिस्म को भले ही किसी भी तरह से क्यों न रौंद जाए. शायद इसीलिए संजीव खन्ना को तलाक दे दिए जाने के बावजूद उस ने उस से रिश्ता खत्म नहीं किया था. इंद्राणी द्वारा पुलिस को बताए अनुसार, वह अगर तेजतर्रार थी तो शीना भी कम नहीं थी. दोनों जब भी मिलतीं, दोनों का आपस में खूब झगड़ा होता था. मिखाइल भी हमेशा अपनी बहन का ही साथ देता था.

इंद्राणी ने पुलिस को बताया, ‘‘दरअसल, शीना मेरे कई राज जानती थी, जिन के आधार पर वह मुझे ब्लैकमेल किया करती थी. इस के बदले वह मुझ से एक बड़ा फ्लैट चाहती थी. मैं चूंकि उस से नफरत करती थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने की सोचने लगी थी. यह नफरत तब और बढ़ गई, जब शीना ने पीटर के बेटे राहुल से ताल्लुकात बढ़ा कर उस से शादी की घोषणा कर दी. जबकि एक तरह से वह उस का भाई था. यह जान कर मैं उस के प्रति नफरत से भर उठी. राहुल से उसे गर्भ भी ठहर गया था.’’

बकौल इंद्राणी उस ने शीना को खत्म करने की सोची. फिर उस के दिमाग में आया कि इस सूरत में मिखाइल आसमान सिर पर उठा लेगा. अत: इंद्राणी ने उसे भी मौत की नींद सुलाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने संजीव खन्ना को बुलवा कर उस से मिल कर अपनी खूनी योजना तैयार की. पीटर मुखर्जी उन दिनों विदेश गए हुए थे. योजना बना कर इन लोगों ने मिखाइल को इंद्राणी के वरली वाले फ्लैट पर बुला कर उसे अपने साथ एक पार्टी में चलने को कहा. साथ ही बताया कि रास्ते में शीना के कालेज से उसे भी साथ ले चलेंगे.

इस बीच इंद्राणी ने जहर मिला कोल्डड्रिंक का गिलास मिखाइल के सामने रखते हुए उसे पी लेने को कहा. मिखाइल को चूंकि इंद्राणी पर पहले ही संदेह था, अत: उस ने कहा कि वह वहीं बैठ कर आराम से कोल्डड्रिंक पीता है, तब तक वे लोग जा कर शीना को ले आएं. पार्टी में जाने को उसे तैयार होने में समय भी तो लगेगा. इंद्राणी व संजीव उस की बातों में आ कर शीना को लेने चले गए. उन के जाने के बाद मिखाइल चुपचाप वहां से निकल गया. शीना को घर ला कर इन्होंने पहले वही जहर मिला कोल्डड्रिंक पिलाया, फिर उस का गला घोंट दिया. बाद में उस के शव को अच्छे कपड़े पहना कर उस का मेकअप कर दिया. इंद्राणी ने उस के होंठों पर चटकीली लाल लिपस्टिक लगा कर आंखों पर गहरे रंग का चश्मा चढ़ा दिया.

इस के बाद कार की पीछे वाली सीट पर बैठ कर इंद्राणी ने अपनी बगल वाली सीट पर शीना के शव को बैठी अवस्था में रखते हुए उस का सिर अपने कंधे पर इस तरह टिका लिया, मानो वह थक कर सो गई हो. उस के दूसरी तरफ संजीव खन्ना बैठा. ड्राइवर श्यामवर राय को बाद में बुलाया गया. इस तरह पूरे फिल्मी अंदाज में इन लोगों ने मुंबई से 85 किलोमीटर दूर रायगढ़ के जंगलों में जा कर शीना के शव के टुकड़े किए. तत्पश्चात उन टुकड़ों को अपने साथ लाई खाली अटैची में भर कर एक गड्ढे में डाला और जला दिया. इस के बाद इन लोगों की इसी तरह मिखाइल को मारने की योजना भी थी.

पीटर से भी अब तक लगातार पूछताछ होती रही थी, मगर जब ये बातें प्रमाणों के साथ सामने आईं तो उन्हें क्लीनचिट दे दी गई. 7 सितंबर को पुलिस रिमांड की समाप्ति पर तीनों अभियुक्तों को फिर से अदालत पर पेश कर के 21 सितंबर, 2015 तक के लिए न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इस बीच शीना की हड्डियों का डीएनए इंद्राणी और मिखाइल से मैच होने की रिपोर्ट आ गई थी. जब इस बात को ले कर विवाद बढ़ा कि राकेश मारिया को शीना मर्डर केस की जांच से हटाने के लिए उन्हें डीजी होमगार्ड्स बनाया गया है तो महाराष्ट्र सरकार ने इस की जांच सीबीआई को सौंप दी है. Crime Story

 

Crime Stories: सीरियल किलर बलदेव

Crime Stories: मांबाप की उपेक्षा का शिकार बलदेव सिंह लोगों की सेवा कर के पैसा कमाना चाहता था, लेकिन सेवा से पैसा नहीं मिला तो उस ने 2 लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद तो उस ने हत्याओं का ऐसा सिलसिला चलाया कि…

कुछ दिनों पहले देश के प्रमुख अखबारों में एक समाचार प्रमुखता से छपा था कि देश में एक ऐसा सीरियल किलर गिरोह सक्रिय है, जो अब तक सौ से भी ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार चुका है. आगे भी न जाने कितने लोगों की हत्याएं कर सकता है. गिरोह में कितने सदस्य हैं, इस की किसी को खबर नहीं थी. वे हत्याएं क्यों कर रहे थे, इस का भी कुछ पता नहीं चल रहा था. कहीं लगता था कि हत्या लूटपाट के लिए की गई है तो कहीं कुछ और ही नजर आ रहा था. कत्ल करने का तरीका जरूर पता चल गया था. पहले वे मारने वाले को विश्वास में लेते थे, उस के बाद उसे एकांत में ले जा कर उस का टेंटुआ दबा कर मौत के घाट उतार देते थे.

मजे की बात यह थी कि हत्यारों ने कहीं कोई सुराग नहीं छोड़ा था. उन्हें हत्या करते भी किसी ने नहीं देखा था. कहीं कैमरे में भी उन का यह कारनामा नहीं कैद हुआ था. मुंबई में इस गिरोह के एक सदस्य के पकड़े जाने की जानकारी जरूर मिली थी, लेकिन उस से भी विस्तार से कुछ पता नहीं चला था. शायद मुंबई पुलिस गिरोह के सभी सदस्यों को गिरफ्तार करने के बाद ही इस अमानवीय कांड के रहस्य से परदा हटाना चाहती थी. मुंबई पुलिस अपने हिसाब से मामले की जांच कर रही थी कि पंजाब की एक घटना ने अचानक इस पूरे रहस्य से परदा हटा दिया.

4 जून, 2015 को लुधियाना के थाना डिवीजन नंबर 6 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर कंवरजीत सिंह को उन के मुखबिर से सूचना मिली कि कलगीधर रोड पर शिमलापुरी की गली नंबर 17 के मकान नंबर 5740 में रहने वाले बलवीर सिंह का बेटा इंदर सिंह देखने में तो सीधासादा साइकिल रिपेयर करने वाला गुरसिख है. लेकिन असलियत में वह बहुत खतरनाक अपराधी है. संदेह है कि वह कई हत्याओं में शामिल रहा है. मुखबिर की इस सूचना पर कंवरजीत सिंह को याद आया कि उस आदमी को तो उन्होंने कई बार थाने बुला कर उस से थोड़ीबहुत पूछताछ की थी.

इस पूछताछ में उन्हें कभी नहीं लगा था कि वह किसी हत्या में शामिल रहा होगा. धरमकरम की बातें करने वाले उस आदमी से जो छोटेमोटे अपराध हो गए थे, उस के लिए उस ने अफसोस जाहिर करते हुए यही कहा था कि अब उस ने अपनी जिंदगी वाहेगुरु को समर्पित कर दी है. किसी भी तरह का अपराध करने की कौन कहे, अब वह किसी का मन दुखाने की भी नहीं सोचता. वह सच्चाई की राह पर चलना चाहता है. कुछ भी था, मुखबिर की सूचना को न एकदम से झुठलाया जा सकता था और न ही इस बात को हलके में लिया जा सकता था. इसलिए कंवरजीत सिंह ने एसआई राजविंदर सिंह को भेज कर उस आदमी को थाने बुलवा लिया. वह आसानी से चला भी आया.

थाने में इंदर सिंह से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह पुलिस को बहकाता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया तो अचानक उस ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘साहब, जब किसी आदमी का बुरा वक्त आता है तो उस के हाथों ऐसेऐसे काम हो जाते हैं, जिन्हें करने के बारे में उस ने कभी सोचा भी नहीं होता.’’

‘‘तो तुम्हारे हाथों ऐसे कौन से गलत काम हो गए, जिन्हें करने के बारे में तुम ने कभी सोचा भी नहीं था?’’ एसआई राजविंदर सिंह ने पूछा.

इंदर सिंह की इन बातों से राजविंदर सिंह को थोड़ी हैरानी हुई थी. उस समय वह 2 सिपाहियों के साथ उस से सहज रूप से बात कर रहे थे. शुरुआती पूछताछ चल रही थी.

इसी शुरुआती पूछताछ में राजविंदर सिंह उसे बातों में उलझा कर धीरेधीरे मनोवैज्ञानिक ढंग से मुद्दे की बात पर इस तरह ले आए कि उस ने ऐसा अपराध स्वीकार कर लिया कि सुन कर दोनों सिपाहियों सहित राजविंदर सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजविंदर सिंह के सवालों के जवाब में इंदर सिंह ने कहा था, ‘‘गलत तो गलत ही है साहब, हम आदमी पर आदमी मारते गए, जो भी हत्थे चढ़ा, टेंटुआ दबा कर उसे ऊपर पहुंचा दिया. कभी हिसाब लगाने की कोशिश ही नहीं की कि हम ने कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया है.’’

इंदर सिंह के इस अपराध स्वीकारोक्ति के बाद राजविंदर सिंह उसे सिपाहियों की निगरानी में छोड़ कर सीधे थानाप्रभारी के पास पहुंचे. राजविंदर की बात सुन कर कंवरजीत सिंह भी सकते में आ गए. इस का मतलब मुखबिर की सूचना एकदम सही थी. उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी लुधियाना के डीसीपी नवीन सिंगला को दे कर उन से दिशानिर्देश मांगे. नवीन सिंगला ने कहा, ‘‘इस तरह की बातें करने वाले का या तो दिमाग हिला होता है या फिर वह बहुत शातिर किस्म का होता है. इसलिए उस आदमी से ज्यादा सख्ती करने के बजाय मनोवैज्ञानिक तरीके से ही पूछताछ जारी रखो. अगर वह लुधियाना के किसी हत्या के मामले के बारे में बताए तो उसे विधिवत गिरफ्तार कर लो.’’

कंवरजीत सिंह राजविंदर के साथ इंदर सिंह से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में इंदर सिंह ने जो बताया, उस से उस की कहानी इस तरह से सामने आई: इंदर सिंह, जिस ने अपना असली नाम बलदेव सिंह बताया, जिला लुधियाना की तहसील जगराओं की चुंगी नंबर 5 के पास स्थित मोहल्ला अगवाड़गुजरां का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हरभजन सिंह था. उस के मांबाप ने उस का नाम बलदेव सिंह रखा था. 4 भाइयों में बलदेव दूसरे नंबर पर था. बड़े भाई निहाल सिंह और उस से छोटे डिंपल सिंह का विवाह हो चुका था. लेकिन उस की और सब से छोटे जस्सा सिंह की शादी नहीं हुई थी.

सातवीं पास करने के बाद बलदेव ने वैल्डिंग का काम सीखा और एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. जब तक वह बाहर रहता, खुश रहता. लेकिन घर आते ही उस की खुशी गायब हो जाती. इसलिए उस का मन घर में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि उस के पिता जराजरा सी बात पर उस की मां की पिटाई करते रहते थे, जो उस से बरदाश्त नहीं होता था. पिता ने घर में इस तरह अपना दबदबा बना रखा था कि घर में उस से कुछ कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी. कह तो बलदेव सिंह भी कुछ नहीं पाता था, लेकिन उसे यह बात खलती बहुत थी. एक दिन उस के पिता किसी बात पर उस की मां को मारनेपीटने लगे तो उस से बरदाश्त नहीं हुआ और उस ने आगे बढ़ कर पिता का हाथ पकड़ लिया.

इस बात पर पिता ने तो उसे मारापीटा ही, मां ने भी उसे ही डांट कर उस की गलती निकाली. यही नहीं, पिता ने घर से निकल जाने को कहा तो उस के इस फैसले में मां ने भी उसी का साथ दिया. इस के बाद उस घर में रहना बलदेव सिंह को ठीक नहीं लगा और उस ने हमेशा के लिए अपना घर छोड़ दिया. इधरउधर भटकता हुआ एक दिन वह हिमाचल प्रदेश के सुप्रसिद्ध मणिकर्ण गुरुद्वारा पहुंचा. वहां रहते हुए संगतसेवा में उस का मन कुछ इस कदर रमा कि उस ने वहीं रहने का मन बना लिया. उसे वहां रहते हुए धीरेधीरे 6 साल बीत गए.

एक बार वहां इस तरह का एक ऐसा धार्मिक जत्था आया, जो देश के सभी धर्मस्थलों की यात्रा पर निकला था. मणिकर्ण में रहते हुए बलदेव सिंह को काफी अरसा गुजर गया था, इसलिए अन्य धर्मस्थलों को देखने की चाह में वह उस जत्थे के साथ आगरा चला गया. वहां गुरु का ताज गुरुद्वारा उसे इस कदर पसंद आया कि वह वहीं रुक गया और संगतों की सेवा करने लगा. यहां मुंबई का रहने वाला एक लंगड़ा एक अन्य लड़के के साथ गुरुद्वारा के जानवरों की सेवा करता था. रोजरोज मिलने से बलदेव की उन से दोस्ती हो गई. कुछ ही दिनों में उन की यह दोस्ती घनिष्ठता में बदल गई. इस की वजह यह थी कि तीनों की पारिवारिक स्थितियां करीबकरीब एक जैसी थीं.

बलदेव की तरह उन दोनों के घरों में भी उन के मांबाप के बीच झगड़ा रहता था. इन्हीं झगड़ों से परेशान हो कर वे भी घर से भाग आए थे. एक दिन तीनों ने सलाह की कि क्यों न वे मिल कर शहर में एक कमरा ले लें, जहां से आराम से सो सकें. इस के बाद उन्होंने आगरा शहर में वाजिब किराए पर एक कमरा ले लिया. इस के बाद वे दिन भर गुरुद्वारा में सेवाकार्य करते और खापी कर रात में अपने कमरे पर आ कर आराम से सो जाते. उन के पास जो थोडे़बहुत पैसे थे, उन से उन्होंने कमरे का पहले महीने का किराया दे दिया था. आगे के लिए उन के पास पैसे नहीं थे. गुरुद्वारा में उन की सेवा के बदले मुफ्त में खाने और ठहरने की सुविधा थी. इस के अलावा उन्हें वहां से कोई तनख्वाह वगैरह नहीं मिलती थी.

एक तरह से किराए का कमरा ले कर उन्होंने बेकार ही अपना खर्च बढ़ा लिया था. पैसों की दिक्कत आई तो सलाहमशविरा कर के उन्होंने उस का भी हल निकाल लिया. दरअसल, दिन भर तो गुरुद्वारा में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती ही थी, रात में भी बाहर से आए लोगों की अच्छीखासी संख्या वहां ठहरा करती थी. इसलिए वहां के सभी कमरे प्राय: भरे रहते थे. ऐसे में बलदेव और उस के दोस्तों को अक्सर गुरुद्वारा के प्रांगण में फर्श पर सोना पड़ता था. इसी वजह से उन्होंने शहर में किराए का कमरा लिया था. पैसे की दिक्कत हल करने के लिए उन्होंने योजना यह बनाई कि रात में गुरुद्वारा से चलते समय वह ऐसे 2-3 लोगों को अपने साथ कमरे पर ले आएंगे, जिन्हें वहां कमरा नहीं मिला हुआ होगा. कमरे पर ला कर वे उन की खूब सेवा करेंगे, जिस के बदले में वे उन से कुछ बख्शीश मांग लिया करेंगे.

इस के बाद उन्होंने एक दंपति को अपने साथ ले जाने के लिए राजी कर लिया. उन्होंने उन्हें अपने कमरे पर ला कर उन की खूब सेवा की. उस दंपति ने भी अपना हक मानते हुए उन से सेवा तो खूब करवाई, लेकिन सुबह चलते समय बख्शीश के नाम पर उन्हें कुछ नहीं दिया. जबकि उन के पास पैसों की कमी नहीं है, इस बात का अंदाजा बलदेव और उस के साथियों को हो गया था. दंपति के इस रवैए पर उन्हें गुस्सा आ गया. परिणामस्वरूप उन्होंने पतिपत्नी को पकड़ कर उन के टेंटुए दबा दिए. दोनों को मौत के घाट उतार कर उन का सारा पैसा और अन्य कीमती सामान ले लिया.

बिना किसी योजना के अचानक उन लोगों ने 2 कत्ल कर दिए थे. परेशान होना लाजिमी था. पुलिस पकड़ कर जेल में डाल देती. पुलिस से बचने के लिए लाशों को कमरे में बंद कर के उन्होंने बाहर से ताला लगाया और बस से मथुरा चले गए. वहां से पीलीभीत जाने के लिए उन्होंने बसअड्डे से एक टैक्सी की. अब तक कत्ल करने की उन की घबराहट पूरी तरह खत्म हो चुकी थी. अब उन्हें लगने लगा था कि पैसा कमाने का यह बढि़या और आसान तरीका है. टैक्सी में लंगड़ा आगे ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा था. बलदेव और दूसरा साथी पीछे वाली सीट पर बैठे थे.

तीनों में दोस्ती जरूर थी, लेकिन अभी तक वे एकदूसरे के निजी जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. सही बात तो यह थी कि अभी उन्हें एकदूसरे के नाम तक पता नहीं थे. वे एकदूसरे को बाबाजी कह कर पुकारते थे. हालांकि बाद में बलदेव को एक का नाम बलजिंदर मालूम हो गया था. मथुरा के बसअड्डे से चल कर टैक्सी करीब एक किलोमीटर गई होगी कि तीनों ने एकदूसरे को आंखों का इशारा किया और टैक्सी रुकवा ली. बलजिंदर ड्राइवर के ठीक पीछे बैठा था. टैक्सी के रुकते ही उस ने ड्राइवर के गले में रस्सी डाली और कसना शुरू कर दिया. लंगड़े और बलदेव ने ड्राइवर को तब तक पकड़े रखा, जब तक वह मर नहीं गया. उस की तलाशी में उस के पास उन्हें मात्र 8 सौ रुपए मिले.

सुनसान जगह पर लाश को फेंक कर टैक्सी लंगड़ा चलाने लगा. कोई 7-8 किलोमीटर दूर जाने पर एक टै्रक्टर ट्रौली से कार का एक्सीडेंट हो गया. तब कार को वहीं छोड़ कर वे बस से अमरियां की ओर चल पड़े. अमरियां से करीब 20 किलोमीटर दूर एक कस्बे में बस रुकी तो उन्होंने बस छोड़ दी और एक टैक्सी किराए पर ले ली. इस के ड्राइवर को भी पहले की तरह रास्ते में मार कर लाश गड्डे में फेंक दी और कार ले कर चले गए. इस ड्राइवर की जेब से उन्हें मात्र 3 सौ रुपए मिले थे.अमरियां शहर में इन्होंने खायापिया. ये किसी छोटी जगह पर रुकना चाहते थे. अमरियां से थोड़ा आगे बढ़े होंगे कि टैक्सी का बोनट झटके से खुल गया और उस की विंडस्क्रीन टूट कर बिखर गई.

टैक्सी को उसी हालत में वहीं छोड़ कर वे एक ट्रक से अमरियां लौट आए और वहां से पीलीभीत की ओर चले गए. वहां से इन्हें कारसेवा वालों की बस मिल गई, जिस से ये पंजाब चले गए. पंजाब पहुंच कर लंगडे के कहने पर उसे मोरिंडा फतेहगढ़ रोड पर स्थित रेलवे फाटक पार करते ही खुले में पड़ने वाले संतों के एक डेरे पर उतार दिया गया. जबकि बलजिंदर और बलदेव पहले लुधियाना गए और फिर वहां से अमृतसर चले गए. अमृतसर में दोनों हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा में सेवा करते हुए अपना समय बिताने लगे. यहां एक दिन उन की मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई, जो उन दिनों मणिकर्ण गुरुद्वारे में सेवा किया करता था, जब ये भी वहां सेवा कर रहे थे.

वह आदमी पेशे से पेंटर था, शहर में उस की अपनी दुकान थी. एक दिन वह बलदेव और बलजिंदर को अपनी दुकान पर ले गया, जहां उन्होंने उसे लूटने की नीयत से उस का टेंटुआ दबा दिया. मारने के बाद उस की सोने की चेन, अंगूठियां और नकदी लूट कर उसी के स्कूटर से वे लुधियाना आ गए. यहां गिल चौक इलाके के एक आदमी को बलजिंदर ने वह स्कूटर बेच दिया, साथ ही यहीं पर रहने का तय कर लिया. लुधियाना के कोटमंगलसिंह इलाके में उन्होंने किराए पर कमरा ले लिया. मकान मालिक बुजुर्ग औरत थी. एक दिन उन्हें मौका मिला तो उन्होंने गला घोंट कर उसे भी मार दिया.

यहां लूटपाट करने के बाद दोनों एक संत के डेरे पर जा कर वहां आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा करने लगे. लुधियाना में ही बलदेव की एक दूर की रिश्तेदार रहती थीं. 15 दिनों बाद वह बलजिंदर को साथ ले कर उस से मिलने चला गया. पहले भी वह उन के यहां जाता रहता था. लेकिन तब उस की सोच इस तरह की नहीं थी. जिंदगी के प्रति अब उस का नजरिया बदल चुका था. बलदेव की उस रिश्तेदार देविंदर कौर के गले में पहनी सोने की मोटी चेन और कानों में लटकते कीमती झुमके देख कर बलजिंदर के हाथों में खुजली होने लगी. उस ने आव देखा न ताव, गले में डाल रखे दुपट्टे से ही देविंदर कौर का काम तमाम कर दिया. इस के बाद बलदेव ने उस के सारे गहने उतार लिए.

यहां से भाग कर दोनों हुजूर साहिब चले गए, जहां उन्हें पुराना सेवादार गुलजार सिंह मिल गया. इस के बाद तीनों एकसाथ मुंबई चले गए. वहां वे चूडि़यां बनाने वाली फैक्ट्री में काम करने लगे. एक महीने बाद बलदेव अकेला दिल्ली आ गया और फर्नीचर का काम करने लगा. दिल्ली में उसे किसी अखबार से पता चला कि मुंबई में बलजिंदर एक फैक्ट्री मालिक की हत्या के आरोप में गोरेगांव पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है. उस में छपे समाचार में यह भी लिखा था कि पुलिस की पूछताछ में उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर 105 लोगों से अधिक की हत्याएं करने की बात कबूली है. इस से बलदेव सिंह को यह सोच कर घबराहट होने लगी कि बलजिंदर ने कहीं उस का नाम तो नहीं ले लिया.

डर की वजह से वह गुरुद्वारा शीशगंज में जा कर रहने लगा. कुछ दिनों बाद उसे वहां एक ऐसा बुजुर्ग जोड़ा मिला, जिन का जवान बेटा कई सालों पहले उन से नाराज हो कर कहीं चला गया था. उस की तलाश में वे मारेमारे फिर रहे थे. आंखों से भी उन्हें कम दिखाई देने लगा था. कुदरत का खेल देखो कि बलदेव की शक्लसूरत और कदकाठी उन के बेटे से हूबहू मेल खा रही थी. उसे देखते ही उन्होंने जिद पकड़ ली कि वही उन का खोया बेटा है. पतिपत्नी बलदेव से मिन्नत करने लगे कि वह गुस्सा थूक दे और उन के साथ घर लौट चले. इस बुजुर्ग दंपति का नाम था बलबीर कौर और सरदार बलबीर सिंह. ये लुधियाना के कलगीधर रोड पर शिमलापुरी की गली नंबर 17 के म.नं. 5740 के रहने वाले थे. उन के बेटे का नाम था इंदर सिंह.

बलदेव सिंह उन्हें बिलकुल नहीं जानता था. लेकिन उसे लगा कि कुदरत ऐसा खेल खेल कर शायद उसे बचाना चाहती है. वह उस बुजुर्ग दंपति के साथ उन का बेटा इंदर सिंह बन कर लुधियाना आ गया. उस ने तय कर लिया था कि अब वह कभी कोई अपराध नहीं करेगा. यहां भी दुर्भाग्य ने उस का साथ नहीं छोड़ा. इंदर सिंह भी छोटेमोटे अपराधों में पुलिस में वांछित था. इसी डर से वह भगौड़ा हुआ था. उस के मांबाप के मन में न जाने कैसे यह बात बैठ गई थी कि वह उन की किसी बात पर खफा हो कर घर छोड़ कर चला गया था.

पुलिस को जब उस के घर आने की खबर मिली तो उसे थाने में बुलाया जाने लगा. इस बात का पुलिस को कभी अंदाजा नहीं था कि वह इंदर सिंह न हो कर उस का हमशक्ल है. चूंकि उस के खिलाफ दर्ज मामले ज्यादा गंभीर नहीं थे, इसलिए पुलिस उसे थाने बुला कर थोड़ीबहुत पूछताछ कर के समझाबुझा कर घर भेज देती थी. लेकिन जब उस के सीरियल किलर होने की जानकारी मिली तो पुलिस ने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से विस्तृत पूछताछ की. तब उस ने अपना अपराध स्वीकार करने में देर नहीं लगाई. इस पूछताछ से लुधियाना में हुए 2 कत्ल के मामले भी हल हो गए. जहां तक 105 से अधिक कत्ल करने संबंधी छपे समाचार का सवाल था तो इस बारे में उस ने पुलिस को यही बताया कि इस के विधिवत खुलासा बलजिंदर ही कर सकता है.

लुधियाना में हुए कत्ल के मामलों में बलजिंदर भी वांछित था, इसलिए पुलिस ने 22 अगस्त, 2015 को उसे ट्रांजिट रिमांड पर लुधियाना ले आने का प्रयास किया. लेकिन मुंबई पुलिस का कहना है कि इस बारे में जब तक महाराष्ट्र सरकार की अनुमति नहीं मिल जाती, इतने खौफनाक अपराधी को मुंबई से बाहर नहीं भेजा जा सकता. इस दौरान बलदेव सिंह को 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर रख कर गहन पूछताछ की गई. उस के बाद लुधियाना पुलिस ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से अन्य जगहों की पुलिस उस के द्वारा अपने यहां किए गए अपराध संबंधी पूछताछ करने के लिए ट्रांजिट रिमांड पर ले जा रही है.

पंजाब पुलिस बलदेव सिंह का डोजियर देश के अन्य तमाम राज्यों को भेज कर उन के यहां उस के बताए तरीके से हुई हत्याओं की सूची तैयार कर रही है. पुलिस का कहना है कि बलदेव सिंह ने जितने कत्ल किए हैं, उन सब का ब्यौरा सिलसिलेवार बताना, उस के लिए संभव नहीं है. वैसे उस का कहना है कि वह जिस भी शहर में गया है, वहां उस ने कम से कम 5-7 हत्याएं तो की ही हैं. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Crime Story: बाप बना निशाना – जब बेटा ही बन गया पिता का हत्यारा

Crime Story: ससुर पिता के समान होता है, लेकिन शैल कुमार पटेल इतनी घटिया सोच वाला था कि वह अपनी बहू रति के साथ जबरदस्ती करने पर आमादा था. एक दिन शैल के बेटे प्रमोद ने पिता की हरकतें खुद देख लीं. इस के बाद जो हुआ, वह इतना भयावह था कि…

28 मार्च, 2021 को होली का त्यौहार था. जगहजगह होलिका दहन की तैयारियां चल रही थीं. जबलपुर जिले के बरगी पुलिस थाने के टीआई शिवराज सिंह क्षेत्र में होने वाले होलिका दहन के सुरक्षा इंतजाम में लगे थे. दोपहर का वक्त था, तभी उन के मोबाइल की घंटी बजी. काल रिसीव करते ही दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘सर, मैं वन विभाग से सीनियर बीट गार्ड अमित त्रिपाठी बोल रहा हूं. वन विभाग की टीम ने गढ़ गोरखपुर के पास बरगी-घंसौर रोड के किनारे एक अधजली लाश पड़ी देखी है.’’

टीआई शिवराज सिंह ने बीट गार्ड अमित त्रिपाठी को निर्देश दिया, ‘‘आप वहीं रुकिए, मैं थोड़ी देर में पहुंचता हूं.’’

टीआई ने इस घटना की जानकारी एसपी और एएसपी को दी और अपनी टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. बरगी थाना से घटनास्थल की दूरी करीब 30 किलोमीटर थी. पुलिस टीम को वहां पहुंचने में करीब घंटे भर का समय लग गया. इस बीच यह खबर सोशल मीडिया पर फैल चुकी थी. युवक की अधजली लाश मिलने की खबर पा कर एफएसएल टीम के साथ एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा व एएसपी शिवेश सिंह बघेल भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

टीआई ने लाश का निरीक्षण किया. लाश अधेड़ उम्र के किसी व्यक्ति की थी और लाश झुलसी हुई थी. लग रहा था कि हत्यारे ने उस की पहचान मिटाने के लिए उस के शरीर पर सागौन के पत्ते और लकडि़यां डाल कर जलाया था. पूरा शरीर जलने से काला पड़ गया था. मृतक के पेट की अंतडि़यां बाहर निकल आई थीं. वह नीले रंग का अंडरवियर पहने था, वह भी आधा जल चुका था. उस के एक पैर के अंगूठे में लोहे का छल्ला, बाएं हाथ की 2 अंगुलियों में लोहे और तांबे का छल्ला और गले में मोतियों की माला थी.

जिस कच्चे रास्ते के किनारे शव पड़ा था, वह गढ़ गोरखपुर को जाता था. यह इलाका सिवनी जिले के घंसौर से करीब 10 किलोमीटर दूर था, परंतु जबलपुर जिले की सीमा में आता था. टीआई शिवराज सिंह, सीएसपी (बरगी) रवि सिंह चौहान व बरगी नगर चौकी के एसआई कुलदीप पटेल ने वहां मौजूद लोगों से मृतक के संबंध में पूछताछ की, मगर लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई. तब पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

चूंकि लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई थी, इसलिए पोस्टमार्टम के बाद उसे कब्र खोद कर दबा दिया गया. एसपी के निर्देश पर जबलपुर जिले के आसपास के सिवनी, मंडला जिलों को भी मृतक की अधजली लाश और बरामद सामान की फोटो भेजी गई. साथ ही अपनेअपने जिलों के गुमशुदा मामलों की तस्दीक करने को कहा गया. इतना ही नहीं, एसपी ने मामले के खुलासे पर 10 हजार का ईनाम भी घोषित कर दिया. पुलिस मामले की जांच में जुट गई.

वापस नहीं लौटा शैल

मध्य प्रदेश के सिवनी और जबलपुर जिले की सीमाओं पर सघन वनों से आच्छादित घंसौर तहसील का एक छोटा सा गांव है बरोदा माल. 52 साल के शैल कुमार पटेल उर्फ शिल्लू का परिवार बरोदा माल में ही रहता था. अपनी जमीन पर खेतीबाड़ी करने वाला शैल आसपास के इलाके में दूध बेचने का काम भी करता था. उस के परिवार में पत्नी रमाबाई, एक अविवाहित बेटी और 26 साल का बेटा प्रमोद, उस की पत्नी और उस की 2 महीने की बेटी थे. प्रमोद ने घर पर ही एक छोटी सी किराना दुकान खोल रखी थी.

इस के 3 दिन बाद यानी 31 मार्च, 2021 को बरोदा माल गांव की रहने वाली रमाबाई अपने चचेरे भाई जोध सिंह के साथ सिवनी जिले के घंसौर थाने में अपने पति शैल कुमार पटेल उर्फ शिल्लू की गुमशुदगी दर्ज कराने पहुंची. उस ने पुलिस को बताया कि 26 मार्च को उस का पति खेत पर जाने की बोल कर गया था. इस के बाद घर नहीं लौटा.

घंसौर पुलिस ने रमाबाई और जोधसिंह को 28 मार्च को जबलपुर के बरगी थाना क्षेत्र में मिले शव के बारे में बताया और उस लाश के फोटो भी दिखाए. मृतक के गले की माला और पैर में पहने लोहे के कड़े को देख कर रमाबाई की आंखें फटी रह गईं. ये सभी चीजें उस के पति शैल की ही थीं. घंसौर पुलिस द्वारा बरगी पुलिस थाने को इस बात की जानकारी दी गई तो पहली अप्रैल को रमाबाई और उस के घर वाले जबलपुर के बरगी थाने गए. बरगी पुलिस ने जबलपुर के एसडीएम से अनुमति ले कर तहसीलदार की मौजूदगी में दफनाई गई लाश कब्र से बाहर निकलवाई.

लाश की शिनाख्त रमाबाई ने अपने पति शैल पटेल के रूप में कर ली. लाश का पंचनामा कर उस के घर वालों को सौंप कर पुलिस जांच में जुट गई. शैल कुमार पटेल के अंतिम संस्कार के समय बरगी पुलिस की एक टीम गांव में मौजूद थी. उसी समय पूछताछ में शैल की पत्नी रमाबाई ने पुलिस को बताया कि 26 मार्च को उस के पति को गांव के 2 लड़के आयुष शर्मा और मनोज बैगा अपनी बाइक पर बैठा कर ले गए थे, जिस के बाद से वह घर वापस नहीं लौटा था.

आयुष शर्मा उस वक्त श्मशान घाट पर शैल के अंतिम संस्कार की रस्म में शामिल था. पुलिस टीम ने आयुष से उसी समय पूछताछ की तो पहले तो वह अंजान बना रहा, लेकिन जब पुलिस टीम ने उसे वहीं से अपनी गाड़ी में ले जा कर सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारा राज खोल दिया. उस ने बताया कि वह बाइक पर शैल को बिठा कर घंसौर तक ले गया था. वहां से शैल को मनोज बैगा उर्फ पंडा, राहुल नेमा और राहुल यादव कार में बिठा कर ले गए थे. उन लोगों ने ही हत्या कर शव को जलाया.

आयुष से मिली जानकारी के आधार पर घंसौर में मौजूद पुलिस टीम ने तीनों को पकड़ लिया. फिर आखिर में मृतक के बेटे प्रमोद को भी हिरासत में लिया. सभी को थाने ले कर जब पूछताछ की गई तो पता चला कि शैल कुमार की हत्या का षडयंत्र उस के बेटे प्रमोद ने अपने दोस्तों के साथ रचा था.

बेटे ने कराई हत्या

प्रमोद ने अपने पिता की हत्या के लिए अपने दोस्त राहुल नेमा और उस के ड्राइवर राहुल यादव को सुपारी दी थी. हिरासत में लिए गए पांचों आरोपियों द्वारा बताई गई कहानी को सुन कर यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि बेटा ही अपने पिता का कातिल होगा. पुलिस पूछताछ में शैल कुमार की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह मानवीय रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली थी.

शैल कुमार पटेल के बेटे प्रमोद की पहली पत्नी शादी के कुछ समय बाद ही अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी. करीब डेढ़ साल पहले प्रमोद ने दूसरी शादी रति (परिवर्तित नाम) से की थी, जिस से सवा महीने की एक बेटी है. 21 साल की नवयौवना रति की खूबसूरती को देख कर सभी उस की तारीफ करते थे. प्रमोद की दूसरी शादी के कुछ ही महिनों बाद उस का पिता रति पर बुरी नजर रखने लगा.

रति ने जब इस की शिकायत प्रमोद से की तो उसे भरोसा नहीं हुआ. उस ने पत्नी को समझाया कि बापू गांजे के नशे में खोए रहते हैं, हो सकता है गलती से उन्होंने कुछ हरकत कर दी हो. शैल गांजे का नशा करता था. प्रमोद ने तो पत्नी को समझा दिया, लेकिन शैल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. उसे जब भी मौका मिलता वह उस की पत्नी से छेड़छाड़ करने लगता. शैल अपनी पोती को गोद में लेने के बहाने रति के अंगों को बुरी नीयत से छूता था.

वह रति के साथ जबरदस्ती करना चाहता था. मगर रति के सख्त व्यवहार के कारण वह सफल नहीं हो पा रहा था. रति भी अपने परिवार की बदनामी के डर से इस बात का जिक्र किसी से नहीं कर पा रही थी.

होली के हफ्ते भर पहले की बात है. रति अर्द्धनग्न अवस्था में गुसलखाने से नहा कर निकली थी कि ताक में बैठे शैल ने रति को अपनी बांहों में भर लिया और उस के गालों को चूमने लगा. रति बदहवास सी ससुर के आगोश से छूटने का प्रयास कर रही थी. तभी अचानक प्रमोद आ गया. प्रमोद ने जब यह नजारा देखा तो क्रोध के मारे वह चीख उठा. उस ने पिता को भलाबुरा कहा.

बेटे ने देखी पिता की करतूत

प्रमोद की चीख सुन कर शैल रति को छोड़ कर घर से बाहर निकल गया. उस दिन प्रमोद को यकीन हो गया कि उस की पत्नी बापू के व्यवहार के बारे में जो शिकायत करती थी, वह झूठी नहीं थी. अब बापू प्रमोद की नजर में खटकने लगा था. उस के दिल में अपने बाप के प्रति इस कदर नफरत पैदा हो गई थी कि वह उस की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करता था. रात दिन वह इसी चिंता में खोया रहता.

प्रमोद की दोस्ती गांव के राहुल नेमा से थी. राहुल नेमा के पिता जिला पंचायत के नेता थे और राहुल जबलपुर के प्रतिष्ठित दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ा था. इस कारण गांव में उस की इज्जत ज्यादा थी. राहुल दिन भर कार में सवार हो आवारागर्दी करता घूमता था. दोस्तों के बीच उस का काफी रुतबा था.

प्रमोद ने जब राहुल को अपनी परेशानी बताई तो राहुल ने प्रमोद को उस के बाप की हत्या के लिए उकसा दिया. राहुल ने प्रमोद से कहा,  ‘‘तुम पैसे खर्च करो तो तुम्हारे बापू को हमेशा के लिए ही रास्ते से हटा देंगे.’’

प्रमोद बापू के कारनामों से छुटकारा चाहता था, इसलिए उस ने राहुल का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. प्रमोद ने राहुल के सामने इस काम को अंजाम देने के लिए 50 हजार रुपयों की पेशकश की. राहुल महंगे मोबाइल रखने और खानेपीने का शौकीन था. अपने इन्हीं शौक और फिजूलखर्ची की वजह से एक बार उस ने अपने घर का ट्रैक्टर तक बेच दिया था और पुलिस थाने में ट्रैक्टर चोरी की झूठी शिकायत दर्ज करा दी थी.

प्रमोद ने राहुल को जब 50 हजार रुपए देने का औफर दिया तो पैसों की खातिर उस ने प्रमोद के पिता की हत्या की सुपारी ले ली. इस काम के लिए राहुल ने अपने ड्राइवर राहुल यादव को भी साथ मिला लिया. 50 हजार रुपए में से 15 हजार रुपए प्रमोद ने राहुल नेमा को एडवांस दिए, जबकि 35 हजार रुपए काम होने के बाद देने का वादा किया. ड्राइवर राहुल यादव ने गांव के आयुष शर्मा और मनोज बैगा से बात की और दोनों को साजिश में शामिल कर लिया.

चूंकि शैल गांजा पीने का शौकीन था, इसलिए गांव के दूसरे नशेडि़यों के साथ उस का उठनाबैठना था. योजना के मुताबिक, 28 मार्च, 2021 को आयुष शर्मा एवं मनोज बैगा शाम लगभग 7 बजे शैल पटेल को अपनी बाइक पर गांजा पिलाने के बहाने घंसौर तिराहा ले गए, जहां पर राहुल नेमा अपनी कार ले कर ड्राइवर राहुल यादव के साथ पहले से ही मौजूद था. तिराहे पर बैठ कर सभी ने गांजा पीया.

आयुष शर्मा एवं मनोज बैगा ने अपनी बाइक घंसौर तिराहे पर ही छोड़ दी और शैल पटेल को राहुल नेमा की कार में बैठा कर घंसौर की तरफ चले गए. चलती कार के अंदर ही सभी ने शैल पटेल के साथ मारपीट शुरू कर दी और कार में पहले से पड़ी रस्सी से उस का गला घोंट कर हत्या कर दी.

चारों आरोपी शैल का शव ले कर घंसौर से 10 किलोमीटर दूर जबलपुर के गढ़ गोरखपुर के पास पहुंच गए. रोड किनारे जंगल में कार खड़ी कर शव को जंगल में फेंक कर सूखी पत्तियों से ढंक कर आग लगा दी.

रमाबाई हो रही थी परेशान

जब देर रात तक शैल घर नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता हुई. शैल की पत्नी रमाबाई ने बेटे प्रमोद से कहा, ‘‘आज तेरे बापू अभी तक घर नहीं लौटे.’’

प्रमोद ने मां की बात पर ध्यान न देते हुए कहा, ‘‘मां, इस में चिंता की कोई बात नहीं है बापू कहीं नशे के अड्डे पर चिलम पीने बैठ गए होंगे, आ जाएंगे. तुम खाना खा कर सो जाओ.’’

रमा को लगा कि होलिका दहन देखने की वजह से शैल घर आने में लेट हो गया होगा. यही सोच कर उस रात रमा चुपचाप सो गई. जब सुबह तक भी शैल घर नहीं पहुंचा तो उस की चिंता बढ़ गई. रमाबाई हर रोज बेटे प्रमोद से अपने बापू की खोजखबर लेने की बात करती रही, लेकिन वह मां को गोलमोल जबाब दे कर चुप करा देता. धीरेधीरे शैल को घर से गायब हुए 4 दिन बीत चुके थे.

रमाबाई प्रमोद से उस के पिता की गुमशुदगी पुलिस थाने में दर्ज कराने की बात कहती रही, परंतु प्रमोद अपने पिता को आसपास के इलाकों में खोजने का नाटक करता रहा. आखिर में रमाबाई खुद 70 साल के चचेरे भाई जोधसिंह पटेल के साथ थाने पहुंची और पति की गुमशुदगी दर्ज करा दी. आरोपियों ने यह सोच कर इस काम को अंजाम दिया था कि दूसरा जिला होने की वजह से शव की पहचान नहीं हो पाएगी और किसी को शक भी नहीं होगा.

लेकिन पुलिस की नजरों से वे ज्यादा दिन नहीं बच सके.

पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 302, 201, 364 और 120(बी) के तहत मामला दर्ज कर मृतक के 26 वर्षीय बेटे प्रमोद पटेल, के अलावा राहुल नेमा, राहुल यादव, मनोज बैगा उर्फ पंडा और आयुष शर्मा को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल की गई बाइक और कार सहित 2 मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए हैं.

अपनी बहू से नाजायज संबंध बनाने की ख्वाहिश रखने वाले ससुर को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और बेटे को अपनी नामसझी की वजह से अपने बीवीबच्चों से दूर जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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Crime Kahani: प्रेमिका का एसिड अटैक – सोनम ने की प्रेम की हद पार

Crime Kahani: पहली मंजिल पर रह रहे किराएदार के कमरे से सुबहसुबह तेज चीखने की आवाज भूतल पर रह रहे मकान मालिक सुरेशचंद्र की पत्नी ने सुनी. आवाज सुन कर एक बार तो वह सोच में पड़ गईं. लेकिन दूसरे ही पल लगातार आ रही चीखों को सुन कर वह एक ही सांस में सीढि़यां चढ़ कर किराएदार नर्स सोनम पांडेय के कमरे में पहुंच गईं. क्योंकि चीख उसी के कमरे से आ रही थी. वहां का दृश्य देख कर उन की आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं. पीछेपीछे मकान मालिक सुरेशचंद्र भी वहां पहुंच गए.

कमरे के फर्श पर सोनम और देवेंद्र झुलसे हुए पड़े थे. वहीं पर एक स्टील का डब्बा पड़ा था. कमरे में तेजाब की तेज दुर्गंध आ रही थी. दोनों ही तेजाब की जलन और दर्द से तड़प रहे थे. उस समय सुबह के यही कोई 7 बज रहे थे. इसी बीच झुलसी हालत में ही देवेंद्र ने अपने दोस्त शिवम को फोन किया.

कुछ ही देर में शिवम आटो ले कर वहां पहुंच गया. वह आननफानन में घायल देवेंद्र को आटो में ले कर अस्पताल जाने लगा. इस पर मकान मालिक सुरेशचंद्र ने उस से कहा कि वह घायल सोनम को भी साथ ले जाए. क्योंकि इलाज की उसे भी जरूरत है. तब शिवम ने कहा, ‘‘मैं पहले देवेंद्र को अस्पताल में भरती करा दूं वह ज्यादा झुलस गया है. इस के बाद सोनम को ले जाऊंगा.’’ इस तरह वह देवेंद्र को वहां से ले कर चला गया.

जब शिवम सोनम को काफी देर तक लेने नहीं आया तो सुरेशचंद्र ने इस की सूचना थाना हरीपर्वत के थानाप्रभारी अरविंद कुमार को दे दी. थानाप्रभारी सूचना मिलते ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने तेजाब से झुलसी सोनम को एक निजी अस्पताल में भरती कराया. वहीं अस्पताल में भरती 80 फीसदी झुलसे देवेंद्र की उपचार के दौरान दोपहर करीब ढाई बजे मौत हो गई.

पुलिस ने मरने से पहले देवेंद्र के मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज करा लिए थे. उस ने अपने बयान में सोनम पांडेय को एसिड अटैक के लिए जिम्मेदार बताया था. देवेंद्र के घर वालों को जब यह जानकारी उस के दोस्त शिवम ने दी तो उस के घर में रोना शुरू हो गया. वह 5 बहनों के बीच अकेला भाई था, रोतेरोते मां और बहनों की हालत बिगड़ गई. दरअसल, यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा शहर के थाना हरीपर्वत क्षेत्र स्थित शास्त्रीनगर का है.

देवेंद्र ने अपने बयान में बताया था कि 25 मार्च, 2021 की सुबह सोनम ने उसे अपने कमरे में लगे पंखे को ठीक करने के लिए बुलाया था. जैसे ही देवेंद्र कमरे में आया तो सोनम ने स्टील के डब्बे में रखा तेजाब उस के ऊपर उड़ेल दिया. अचानक हुए इस हमले से वह खुद को बचा नहीं सका. एसिड अटैक के दौरान नर्स सोनम पर भी तेजाब गिर गया था, जिस से वह भी झुलस गई थी. अब प्रश्न यह था कि सोनम ने देवेंद्र के ऊपर एसिड अटैक क्यों किया?

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पुलिस ने मकान मालिक सुरेशचंद्र से बात की तो उन्होंने पुलिस को बताया कि सोनम पहले शास्त्रीनगर में ही स्थित किसी दूसरे मकान में रहती थी. 5 महीने से वह उन के मकान में किराए पर रह रही थी. देवेंद्र को वह अपना पति बताती थी. वह कमरे पर उस के पास 10-12 दिनों में आता और 1-2  दिन रुक कर चला जाता था. उस का कहना था कि पति बाहर काम करते हैं.

वहीं सूचना पा कर अस्पताल पहुंचे देवेंद्र के घर वालों ने इन सब बातों से अनभिज्ञता जताई. उन का कहना था कि  सोनम के देवेंद्र से संबंध होने की उन्हें जानकारी नहीं थी. उन्होंने बताया कि देवेंद्र अविवाहित था और उस की 28 अप्रैल को शादी होने वाली थी. देवेंद्र की मां कुसुमा ने सोनम पांडेय पर बेटे की हत्या का आरोप लगाया. सोनम के कमरे की तलाशी के दौरान पुलिस ने स्टील का एक डब्बा बरामद किया. संभवत: इस एक लीटर वाले डब्बे में दूध लाया जाता होगा. इस में ही तेजाब रखा हुआ था. इस डब्बे की तली में तेजाब भी मिला. वहीं कमरे से देवेंद्र के जले हुए कपड़े व जूते भी मिले. पुलिस ने इन साक्ष्यों को जब्त कर जरूरी काररवाई के बाद फोरैंसिक लैब भेज दिया.

घटना की जानकारी मिलने पर एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे ने घटनास्थल का निरीक्षण किया व अस्पताल भी गए. उन्होंने पत्रकारों को बताया कि सोनम और देवेंद्र के बीच प्रेम संबंध थे. आरोपी युवती को गिरफ्तार कर लिया गया है. चूंकि वह भी एसिड की चपेट में आ कर झुलसी है, इसलिए इलाज के लिए उसे अस्पताल में भरती कराया गया है.

पुलिस ने जरूरी काररवाई करने के बाद देवेंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. पुलिस ने मामले की गहनता से जांच की. जांच में पता चला कि सोनम पांडेय मूलरूप से उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के भागूपुर की रहने वाली शादीशुदा युवती है. सोनम की शादी करीब 10 साल पहले गुजरात में हुई थी. शादी के कुछ दिनों बाद ही पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा रहने लगा. इस दौरान वह एक बेटे की मां भी बन गई. शादी के 2 साल बाद ही वह अपने बेटे को ले कर अपने मायके आ गई.

कुछ समय बाद वह आगरा आ कर नर्स की नौकरी करने लगी थी. वह सिकंदरा बाईपास स्थित एक अस्पताल में नर्स थी. बेटा ननिहाल में ही रह रहा था. सोनम ने अब तक अपने पति से तलाक नहीं लिया था. उस ने अपने साथी कर्मचारियों को भी अपने शादीशुदा होने के बारे में नहीं बताया था. 28 वर्षीय देवेंद्र राजपूत मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के सहावर क्षेत्र के गांव बाहपुर का रहने वाला था. देवेंद्र चिकित्सा क्षेत्र में बचपन से ही रुचि रखता था. इसलिए उस ने लैब टैक्नीशियन का कोर्स किया था.

सुनहरे भविष्य की तलाश में वह आगरा आ गया था और पिछले 8 साल से लाल पैथ लैब में सहायक के पद पर काम कर रहा था. वह आगरा के ही खंदारी इलाके में किराए पर रहता था. चूंकि सोनम और देवेंद्र एक ही फील्ड से जुड़े थे, एक दिन काम के दौरान दोनों की जानपहचान हो गई. साथसाथ काम करते पहले दोनों में दोस्ती हुई, जो बाद में प्यार में बदल गई.

पिछले 3 सालों से दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. सोनम ने अपने मकान मालिक को बता रखा था कि देवेंद्र उस का पति है. इस तरह देवेंद्र का जब मन होता, वह सोनम से मिलने उस के कमरे पर चला जाता था. इसी बीच सोनम को पता चला कि देवेंद्र की शादी कहीं और तय हो गई है. इस जानकारी से सोनम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. क्योंकि वह देवेंद्र पर शादी करने का दबाव बना रही थी. सोनम ने घटना से कुछ दिन पहले देवेंद्र से कहा, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं और तुम से शादी करना चाहती हूं.’’

देवेंद्र को सोनम के बारे में पता चल चुका था कि वह शादीशुदा है और उस के एक बच्चा भी है. देवेंद्र तो सोनम के साथ पिछले 3 साल से केवल टाइम पास कर रहा था. देवेंद्र ने उसे समझाते हुए कहा,‘‘सोनम तुम शादीशुदा हो. तुम्हारे एक बेटा भी है. और तुम ने अब तक अपने पति से तलाक भी नहीं लिया है. ऐसे में हम शादी कैसे कर सकते हैं? ऐसी स्थिति में मेरे घर वाले भी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे. फिर मेरी भी शादी तय हो चुकी है.’’

देवेंद्र की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया. सोनम अपना आपा खो बैठी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह अपने प्रेमी को किसी और का हरगिज नहीं होने देगी. अपने खतरनाक मंसूबे की भनक उस ने देवेंद्र को नहीं लगने दी. इस बीच देवेंद्र ने सोनम के कमरे और उस से मिलनाजुलना भी बंद कर दिया. अपनी योजना को अंजाम देने के लिए सोनम ने 25 मार्च, 2021 की सुबह देवेंद्र को फोन कर कमरे का पंखा ठीक करने के बहाने अपने पास बुलाया था.

देवेंद्र सोनम के कमरे पर पहुंचा तो उन दोनों के बीच शादी की बात को ले कर गरमागरमी हुई. इस के बाद सोनम ने स्टील के डब्बे में पहले से लाए तेजाब से देवेंद्र पर अटैक कर दिया, जिस से वह गंभीर रूप से सिर से पैर तक झुलस गया. जानकारी मिलने पर घटना के दूसरे दिन सोनम के पिता आगरा आ गए. उन्होंने घायल बेटी को एस.एन. मैडिकल कालेज में भरती कराया. वहां उपचार होने से उस की हालत में सुधार हुआ. हालांकि उस समय तक उस के बयान दर्ज नहीं हो सके थे.

प्रेमिका के तेजाबी हमले ने एक साथ 3 परिवारों के अरमानों को झुलसा दिया. 5 बहनों में इकलौता भाई और एक मां से उस का घर का चिराग छीन लिया. मां और बहनें देवेंद्र के सिर पर सेहरा बांधने की तैयारी में जुटी थीं. शादी के कार्ड भी छप गए थे.

शादी में बुलाने वालों को कार्ड भेजने की तैयारी चल रही थी. वहीं कासगंज की रहने वाली जिस युवती से देवेंद्र का रिश्ता तय हो गया था और एक महीने बाद दोनों को फेरे लेने थे, उस के अरमानों को भी तेजाब से हमेशा के लिए झुलसा दिया. पोस्टमार्टम के बाद देवेंद्र का शव रात 9 बजे जब घर पहुंचा तो बेटे का शव देख कर मां बेहोश हो गईं. वहीं पांचों बहनें अपने छोटे भाई के शव से लिपट कर रोने लगीं. पूरे गांव में शोक का माहौल था. उधर जिस घर में देवेंद्र की बारात जानी थी वहां उस की मौत की खबर पहुंचने से कोहराम मच गया.

दूसरे दिन शुक्रवार की सुबह देवेंद्र का शोकपूर्ण माहौल में अंतिम संस्कार किया गया. सभी का कहना था कि देवेंद्र की हत्यारोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. कहानी लिखे जाने तक प्रेमिका का इलाज चल रहा था. ठीक होने पर उसे जेल जाना पड़ेगा. देश भर में हर साल एसिड अटैक की तमाम घटनाएं होती हैं, वह भी तेजाब पर बैन लगाए जाने के बाद. एसिड अटैक एक खतरनाक अपराध है, जो महिला हो या पुरुष सभी की जिंदगी तबाह कर देता है. सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बाद भी देश में गैरकानूनी रूप से होने वाली एसिड की बिक्री पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.

एसिड बिक्री को ले कर जो कानून हैं, उन्हें सख्ती के साथ जमीन पर उतारा जाना बेहद जरूरी है. एसिड अटैक से पीडि़त व्यक्ति के निजी, सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक जीवन पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है. Crime Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: औनलाइन चलता सेक्स रैकेट

Crime Story: 22 जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने  बताया कि मानसी तो काफी देर  पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है.

जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली.

डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करते करते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला.

करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी.

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जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे.

उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली. 12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे.

जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.

आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Story

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)

Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

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44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: अधूरी औरत

Hindi Stories: मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछली तरफ शीशम के पेड़ के नीचे बैठी देखा था…

स्वा स्थ्य विभाग ने मेरी बदली नसीरपुर कर दी. मुझे पता चला कि 3 घंटे का सफर बस से, और आगे एक घंटा तांगे से जाना होगा. मैं ने अपने आने की खबर भिजवा दी और कोई 2 बजे के करीब बस में सवार हो गया. मेरा खयाल था कि शाम तक गांव पहुंच जाऊंगा, मगर यह सब गलत हो गया. जिस बस में मैं सवार था, वह इतनी भरी हुई थी कि बाद में चढ़ने वाले लोगों को खड़े होने की भी मुश्किल से जगह मिली थी.

बरसात का मौसम था. मैं ने किताब निकाली और पढ़ने लगा. किताब में मैं इस कदर खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि बस कहांकहां रुकी. जब बस एक जगह अचानक झटके खाने के बाद रुक गई तो मुसाफिरों में खलबली सी मची और शोर होने लगा. तब मैं ने चौंक कर पूछा कि क्या मामला है? मालूम हुआ कि बस में खराबी आ गई है. क्लीनर खराब हुए पुर्जे को ठीक कराने के लिए वापस 6 मील ले जाएगा. मुसाफिरों में काफी बेदिली फैली, मगर अब इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं था. मुसाफिर बस से उतर कर इधरउधर टहलने लगे. मैं भी वक्त गुजारने के लिए इधरउधर घूमता रहा.

क्लीनर साहब की वापसी रात 9 बजे के करीब हुई और 10 बजे के करीब बस ने दोबारा सफर शुरू किया. जब बस बसअड्डे पर पहुंची तो वहां कोई तांगा मौजूद नहीं था. अब मेरे पास कस्बे तक पैदल मार्च करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने सामान कंधे पर डाला और पैदल ही चल पड़ा. अब तक देर इतनी हो गई थी कि बारबार यह खयाल आ रहा था कि कहीं चौकीदार क्लीनिक में इंतजार कर के चला न गया हो. उस वक्त मौसम अचानक खुशगवार हो गया था. ठंडी हवा चलने लगी, कभीकभी बिजली भी चमक उठती. बारिश किसी भी वक्त शुरू हो सकती थी.

मैं तेजतेज कदम उठाने लगा. जैसे ही कस्बा नजर आया, बूंदाबांदी शुरू हो गई. क्लीनिक कस्बे से बाहर पक्की इमारत में था. मैं तकरीबन दौड़ता हुआ क्लीनिक पहुंचा, मगर वही हुआ, जिस का डर था. चौकीदार इंतजार कर के जा चुका था. शायद उसे अब मेरे आने की उम्मीद नहीं रही होगी. मैं बरामदे में खड़ा हो कर सोचने लगा. थोड़े फासले पर एक हवेली नजर आई. बाकी मकान ज्यादातर कच्चे थे. अब तक बारिश काफी तेज हो गई थी. इस तरह बरामदे में खड़े हो कर रात गुजारना मुश्किल था. मैं ने सोचा, क्यों न हवेली में रात बिताई जाए.

मैं बारिश में भीगता हुआ हवेली पर जा पहुंचा और जोरजोर से गेट खटखटाने लगा. काफी देर तक किसी ने गेट नहीं खोला. दरअसल गेट से काफी आगे जा कर कमरे थे. इसलिए शायद आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी. मैं बारिश में भीग गया था. मैं हवेली के पीछे चला गया. वहां जानवर बंधे थे. मैं उन के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ने लगा. अचानक मेरी नजर एक औरत पर पड़ी. वह अर्धनग्न अवस्था में शीशम के पेड़ के नीचे बैठी थी. आंखें उस ने बंद कर रखी थीं और होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदा रही थी. औरत जवान और खूबसूरत थी. मैं ने फौरन अपनी निगाहें फेर लीं और वापस हो लिया.

मैं सख्त हैरान था कि आधी रात के वक्त वह दरख्त के नीचे क्या कर रही थी. भूतप्रेत पर मुझे यकीन नहीं था. उस वक्त मैं ने मुनासिब नहीं समझा कि आगे बढ़ कर उस औरत से कुछ पूछूं. मैं वापस क्लीनिक पर आ गया. वह रात मैं ने बरामदे में बैठ कर बिता दी. इस बीच मेरे दिमाग पर उस औरत के बारे में जानने का भूत सवार हो गया. गांव नसीरपुर की जिंदगी किसी ऐसे गरम मकान में रहने की तरह थी, जिस की दीवारें नजर नहीं आतीं. ऐसा महसूस होता था, जैसे वह हुकूमत की भूलीबिसरी बस्ती हो. गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित था. मच्छर इस कदर थे कि चाहे कितनी भी मात्रा में कुनैन का इस्तेमाल क्यों न कर लो, बुखार जरूर हो जाता था. बुखार भी ऐसा, जो आदमी की सारी ताकत खत्म कर देता था.

शुरू में इक्कादुक्का मरीज बुखार की शिकायत ले कर आते रहे. क्योंकि ज्यादातर लोग डाक्टरी इलाज को मानते ही नहीं थे. इसी दौरान गांव की मसजिद के मौलवी साहब बहुत सख्त बीमार हो गए. उन की टांग पर एक पुराना जख्म था, जिस की वजह से उन्हें बुखार रहने लगा. सब लोग जहरबाद समझते रहे. मैं ने मौलवी साहब का इलाज किया. पहले एक छोटा सा औपरेशन किया, फिर इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए. मौलवी साहब की सेहत बहाल होने लगी. गांव से हो कर मेरी चर्चा आसपास के गांवों तक जा फैली तो दूरदूर से लोग आने लगे. इस से पहले गांव वालों का इलाज काका करता था.

काका गांव का नाई था. वह जर्राह भी था. यह सब कुछ उस ने अपने बाप से सीखा था. जर्राह से ज्यादा वह मुझे मालिशिया लगता था, क्योंकि वह ज्यादातर लोगों का इलाज मालिश से किया करता था. सिरदर्द में सिर की मालिश, पेट के दर्द में भी वह मरीज को लिटा कर तेल से पेट की मालिश करता था. चोट की हालत में भी मालिश करता. गांव वालों के इसरार पर उस ने दांत भी उखाड़ने शुरू कर दिए थे. जब 2-3 आदमियों के दांत उस ने गलत उखाड़ दिए तो मैं ने उस को जा कर समझाया कि अब बस कर दे.

एक वक्त में इतने ज्यादा काम तो शहर के डाक्टर भी नहीं करते. वहां भी अब हर बीमारी का स्पैशलिस्ट होता है. यही बड़े डाक्टर की पहचान है. उस ने दांत का डाक्टर बनने का खयाल छोड़ दिया और सिर्फ हड्डियों और जर्राही का स्पैशलिस्ट बनने पर संतोष कर लिया. उस गांव के चौधरी मलिक अल्लाहबख्श थे. गांव वालों का कहना था कि वह बहुत नेक इंसान थे. उस गांव के लोग ही नहीं, आसपास के गांव वाले भी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन की उम्र कोई 70 बरस के करीब थी. अब वह अक्सर बीमार रहते थे. 1-2 बार इलाज के सिलसिले में मुझे उन की खिदमत में हाजिर होना पड़ा था. वह मेरी बड़ी इज्जत करते थे. कभीकभी वैसे भी गपशप के लिए हवेली में बुला लेते थे.

हवेली में उन के बेटे से भी मुलाकात हुई. उस का नाम था मलिक असद. वह 30-35 बरस का मजबूत कदकाठी का आदमी था. उस के बाल घुंघराले और आंखें स्याह थीं. रंग सांवला था. चेहरा सख्त था. वह तबीयत का भी बड़ा जालिम था. मैं ने खुद उसे 1-2 बार हवेली में मजदूरों की पिटाई करते देखा था. गांव के लोग उस से डरते थे और उसे बुरा कहते थे. एक दिन बड़े चौधरी साहब ने बुला भेजा. नौकर ने मुझे एक बड़े से कमरे में ले जा कर बिठाया. उस कमरे में बहुत सी कुर्सियां और मोढ़े रखे थे. जब भी गांव का कोई मसला खड़ा होता, चौधरी वहीं सब को इकट्ठा करते थे. चौधरी साहब आए और बेंत से बनी आरामकुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर वह कुछ सोचते रहे, फिर बड़ी राजदारी से बोले, ‘‘डाक्टर पुत्तर, मेरी बहू बीमार है. अजीब सी बीमारी है. उसे कुछ पता नहीं चलता. कभी तो वह बिलकुल ठीक होती है, कभी वह पूरापूरा दिन कमरे में सोई पड़ी रहती है. जब जागती है तो सब से झगड़ने लगती है. मैं उस की वजह से बहुत परेशान हूं. मेरा दिल कहता है, तुम उस का इलाज कर सकते हो.’’

‘‘चौधरी साहब, आप अल्लाह पर भरोसा रखें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा. आप मुझे मरीज दिखाएं.’’

मैं वाकई दिल से बड़े चौधरी की इज्जत करता था. चौधरी साहब मुझे पहली बार हवेली के अंदर ले गए. वह एक बैडरूम था. कमरे में एक दीवान और 2-3 कुर्सियां पड़ी थीं. एक बैड था, जिस पर एक औरत लेटी थी. जैसे ही चौधरी साहब ने उसे सीधी किया, मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछवाड़े पेड़ के नीचे देखा था. मैं ने अपने आप पर काबू पाया और सोचने लगा कि यह औरत चौधरी की बहू है यानी मलिक असद की बीवी है. यह उस रात क्या कर रही थी? मेरी दिलचस्पी, जाहिर है, अपनी चिंता को पहुंच गई थी.

औरत बेसुध पड़ी थी. मैं ने और चौधरी साहब ने उसे जगाने की पूरी कोशिश की, मगर वह नहीं जागी. जाहिर तौर पर उसे कोई बीमारी नजर नहीं आ रही थी. बुखार भी नहीं था. मैं ने सुई चुभो कर देखी तो वह तकलीफ महसूस कर रही थी. ब्लडप्रेशर कुछ कम था, मगर उस की सूजी हुई आंखें मुझे शक में डाल रही थीं. मैं ने उस के खून का नमूना ले कर चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप फिक्र न करें. मैं खून टेस्ट करने के बाद ही आप को बता सकूंगा कि इन्हें क्या तकलीफ है. आप इस दौरान इन्हें कोई दवा न दें. खास ध्यान रखें कि यह कोई भी चीज न खाएं. सुबह इन को क्लीनिक भेज दें, तब तक ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट मेरे सामने होगी.’’

चौधरी साहब की हवेली से निकलने के बाद मेरे जेहन में यही बात बारबार आ रही थी कि यह औरत नशा जरूर करती है. मैं ने क्लीनिक आते ही खून टेस्ट करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं खुद उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था. खून की रिपोर्ट से जाहिर हो गया कि चौधरी की बहू को नशे की लत पड़ चुकी थी. यह जान कर मुझे खुद भी अफसोस होने लगा. बहरहाल मैं खुद को कल के लिए तैयार कर चुका था. अगले दिन मैं शाम तक इंतजार करता रहा, मगर चौधरी की बहू क्लीनिक पर नहीं आई. इस का मतलब साफ था कि वह खुद आना नहीं चाहती थी और उसे अपनी इस आदत के जाहिर होने का अंदेशा था. लेकिन उस नशे से वह मौत के मुंह में जा सकती थी.

शाम को मैं चौधरी साहब से मिलने गया. उन्हें बताया कि मरीजा क्लीनिक पर नहीं आई तो वह बहुत हैरान हुए. उन्होंने नौकरानी को बुला कर बुराभला कहा और फिर खुद जा कर बहू को लिवा लाए. उस वक्त वह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थी. उस के रखरखाव में एक खास शान थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं, जिन में एक खास किस्म की वहशत और गुस्सा था. उस के खुश्क होंठ एकदूसरे से जुडे़ थे. वह अपने चेहरे पर आई जुल्फों की लट सिर के झटके से बारबार पीछे की तरफ लौटाती रही. वह खामोश बैठी रही, जैसे किसी से बात करना ही न चाहती हो.

मैं ने जरा हौसले के साथ उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, ‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’

उस ने अपनी पलकें उठाईं और मेरी तरफ देखा. मैं आज तक उन आंखों को नहीं भूल सका. उस की आंखों में एक अजीब सी मस्ती थी, जैसे इंद्रधनुष आंखों में उतर आया हो. उस ने बड़ी अदा से कहा, ‘‘मेरी तबीयत पहले से बेहतर हो रही है. मुझे किसी दवा की जरूरत नहीं.’’

यह कह कर वह उठी और तेजी के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. मैं ने हैरत से चौधरी साहब की तरफ देखा. वह भी मेरी तरफ देख रहे थे. उन के चेहरे पर गुस्से और शर्मिंदगी के आसार साफ नजर आ रहे थे. मैं चूंकि सूरतेहाल को समझने लगा था, इसलिए मैं ने चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप की बहू को कोई घरेलू परेशानी है. है तो यह आप के घर का मसला, लेकिन डाक्टर के लिए यह सब जानना बहुत जरूरी होता है. आप जब तक मुझे सब कुछ बताएंगे नहीं, मेरे लिए उन का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.’’

पहले तो चौधरी साहब परेशान नजर आने लगे. जोरजोर से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, जैसे किसी फैसले पर पहुंच रहे हों. फिर उन्होंने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मेरी बहू दरअसल बांझ है. 5 साल शादी को हो गए हैं, मगर औलाद नहीं हुई. बेचारी बड़ी परेशान रहती है. जब से मलिक असद की दूसरी शादी की तैयारी की बात सुनी है, बहुत चिड़चिड़ी हो गई है. बातबात पर लड़तीझगड़ती है. कमरा बंद कर के दिन भर पड़ी रहती है.’’

‘‘चौधरी साहब, आप की बहू कोई दवा इस्तेमाल कर रही है, जो अगर जल्दी बंद न की गई तो बहुत देर हो जाएगी. इस से उस की जिंदगी को भी खतरा हो सकता है. आप पता कराएं कि वह क्या चीज खा रही है. घर के किसी न किसी शख्स को तो पता ही होगा. आखिर वह दवा या कोई और चीज कहीं से तो खरीदी जाती है.’’

मेरी बात सुन कर चौधरी साहब ने जोरजोर से ‘रज्जो…रज्जो…’ पुकारना शुरू कर दिया. एक लड़की भागीभागी दरवाजे से दाखिल हुई. रज्जो चौधरी साहब की नौकरानी का नाम था. वह घबराई हुई चौधरी साहब को देखने लगी. मैं ने उसे संभलने का मौका दिए बगैर जोर से कहा, ‘‘रज्जो, जो दवा तुम बीबीजी को ला कर देती हो, वह शीशी ले कर आओ.’’

वह बौखला कर बोली, ‘‘जी…नहीं, मैं नहीं ला कर देती. वह खुद मेरे साथ जा कर मलंग बाबा से लाती हैं. कसम कुरान की, मलंग बाबा पुडि़या पर दम कर के बीबी जी को देते हैं.’’

मेरा चलाया हुआ तीर निशाने पर सीधा जा लगा था. मैं ने नरम पड़ते हुए कहा, ‘‘जाओ, एक पुडि़या ला कर मुझे दिखाओ. खबरदार, बीबीजी को पता न लगे.’’

रज्जो ने चौधरी साहब की तरफ देखा. चौधरी साहब ने इशारा किया तो वह चली गई. कोई एक घंटे बाद रज्जो ने हमें वह पुडि़या लाकर दी. मैं उस पुडि़या को ले कर क्लीनिक आ गया. वह अफीम की पुडि़या थी. उस से साफ जाहिर था कि मलंग बाबा कोई धोखेबाज था और चौधरी की बहू को नशे की आदी बना रहा था. मैं उसी वक्त हवेली वापस आया, क्योंकि मलंग बाबा का अड्डा बंद कराना न सिर्फ नेकी का काम था, बल्कि लोगों को मौत के मुंह से निकालना भी था.

चौधरी साहब को जैसे ही सूरतेहाल मालूम हुई, उन्होंने तांगे का बंदोबस्त किया और हम पुलिस चौकी चल दिए. पुलिस चौकी कस्बे से 3 मील के फासले पर थी. चौकी का इंचार्ज चौधरी से परिचित था. उसे हालात बताए गए तो उस ने फौरन एक छापामार पार्टी के साथ रात को मलंग बाबा के अड्डे पर धावा बोल दिया.  मलंग बाबा और उस के 2 नौजवान साथी गिरफ्तार हुए. उन के अड्डे से अफीम बरामद हुई. अगले दिन पुलिस से पता चला कि मलंग बाबा जेल से भागा हुआ फरार कैदी था. एक साल से वह भेष बदल कर यह धंधा कर रहा था. गांव के लोगों को ताबीज के बहाने अफीम दे कर बेवकूफ बना रहा था. चौधरी की बहू से तो वह खूब रकम हथिया रहा था.

जैसे ही चौधरी की बहू की अफीम की खुराक बंद हुई, उस का सारा बदन टूटने लगा. बुखार में जिस्म तपने लगा. उस की आंखों में खौफ छा गया. वह मेरे पांव पड़ती कि मैं उस को अफीम दे दूं या मौत का टीका लगा दूं. उस के शरीर की दुर्दशा देख कर और बुखार की तपिश को कम करने के लिए मैं कभीकभी उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता, मगर जब वह जागती तो फिर वैसे ही तड़पने लगती. मैं ने और बड़े चौधरी साहब ने कई रातें उस के बिस्तर के पास बैठ कर गुजार दीं. इस बीच मैं ने देखा कि चौधरी का बेटा मलिक असद न तो उस की परवाह करता था और न ही उस के पास ठहरता था. यह मेरे लिए बड़ी हैरत की बात थी.

मेरे दिल में उस के लिए नफरत के जज्बात उभरने लगे. उन दिनों चौधरी साहब तख्तपोश पर बैठे रहते और मैं मरीजा के सिरहाने बेबस हो कर बैठा रहता. मेरे हाथ चौधरी साहब ने वैसे ही बांध रखे थे. मैं उसे अस्पताल नहीं ले जा सकता था, जहां उसे बचाने की कोशिश की जाती. मैं बाहर से किसी मदद का इंतजाम भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह चौधरी की इज्जत का मामला था. मैं सिर्फ अपनी जानकारी के मुताबिक इलाज करता रहा, मगर शायद अल्लाह ने चौधरी साहब की दुआएं सुन ली थीं. 10 दिनों के बाद उन की बहू की हालत में तब्दीली आनी शुरू हो गई. वह संभलने लगी. अब वह न तो जिद करती और न ही उठउठ कर भागती और न शोर मचाती. उसे सुकून आना शुरू हो गया.

अब उस ने मेरी तरफ बड़ी एहसानमंद निगाहों से देखना शुरू कर दिया. उस की हालत को पूरी तरह संभलने में 3 महीने लग गए. इस दौरान मैं हर रात चौधरी साहब की हवेली में जाता रहा. मैं ने महसूस किया कि छोटा चौधरी कईकई दिनों और रातों को घर से गायब रहता था. एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों से फारिग हुआ ही था कि चौधरी साहब की बहू अपनी नौकरानी के साथ क्लीनिक में तशरीफ ले आई. पहले तो वह कुछ देर खामोश बैठी रही, फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आपने मुझे दोबारा जिंदगी दी है, लेकिन आप ने ऐसा क्यों किया? मैं तो खुद अपनी जिंदगी खत्म करना चाहती थी. आप ने मुझे बचा कर मेरे दुख के सफर को और लंबा कर दिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप को अपना मसीहा कहूं या दुश्मन?’’

मिसेज मलिक असद की बातें सुन कर पहले तो मैं एक लम्हे के लिए चुप रह गया. लेकिन मैं ने बाद में हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिसेज मलिक, मेरा कोई कमाल नहीं. कुदरत को यही मंजूर था. अल्लाह ने आप को दोबारा जिंदगी दी है. वही इस के भेद जानता है. वैसे आप इतनी मायूस क्यों हैं?’’

मिसेज मलिक ने मेरी तरफ देख कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने मुझे मौत के मुंह से निकाला है तो मैं आप को बताना चाहती हूं कि कई बार आदमी उन हालात से दोचार हो जाता है, जहां आगे कोई रास्ता नहीं होता. वह जीना नहीं चाहता. मैं किस के लिए जीऊं? आप को पता है कि औरत मां बन कर ही पूरी औरत बनती है.’’

मैं चाहता था कि वह अपने दिल का दर्द खुल कर कह दे. एक तो उस के अंदर का गुबार निकल जाएगा, दूसरे शयद इस मामले में मैं कोई मदद कर सकूं. मैं ने बात बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप बताएं आप को क्या दुख है? अल्लाह ने आप को सेहत बख्शी है तो आप की दूसरी तकलीफें भी रफा कर देगा.’’

मेरी बातों का यह असर हुआ कि उस ने बिलखबिलख कर रोना शुरू कर दिया. फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आज से 5 साल पहले बडे़ चौधरी साहब ने बड़े अरमानों से मुझे अपनी बहू बनाया था. मगर आज सोचती हूं कि काश, मेरी शादी न हुई होती. एक साल तो हंसीखुशी से गुजर गया, लेकिन उस के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. चौधरी के तमाम रिश्तेदार और गांव के तमाम लोगों की नजरें मुझे तीर की तरह चुभने लगीं.

‘‘जो लोग मेरे आगेपीछे फिरते थे, वही मुझे ताना देने लगे कि मैं बांझ हूं. पहले छोटा चौधरी, फिर घर वाले और जब बड़े चौधरी ने भी आंखें फेर लीं तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. मैं ने कोई पीरफकीर न छोड़ा. दूरदूर तक तावीज करवाए, मगर मेरे यहां बच्चा न हुआ.

‘‘फिर उस मलंग बाबा ने मुझे अफीम पर लगा दिया. मुझे भी नशे में रहना अच्छा लगने लगा. अब आप ने मुझ से वह भी छीन लिया. खुदा के लिए मुझे जहर ही दे दें. अगले माह छोटे चौधरी की दूसरी शादी होने वाली है. मैं इस से पहले अपने आप को खत्म करना चाहती हूं. अब आप खुद बताएं, मैं आप को हमदर्द कहूं या दुश्मन?’’

चौधरी की बहू की बातें सुन कर मेरे दिल में भी उस के बारे में हमदर्दी के जज्बात उभरने लगे. अगर खुदा ने उस को औलाद की दौलत नहीं दी तो इस में उस बेचारी का क्या कसूर? इस के बावजूद मैं ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप मायूस क्यों होती हैं? अल्लाह बड़ा कारसाज है. आप ने इस सिलसिले में कोई इलाज करवाया है? अब तो जमाना बहुत तरक्की कर गया है. आप शहर जा कर इलाज करवाएं. सब ठीक हो जाएगा इंशाअल्लाह.’’

मेरी बातें सुन कर मिसेज मलिक ने बड़ी उदासी से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब क्या फायदा? अब तो उस के दिन भी तय होने वाले हैं.’’

‘‘आप ऐसा करें कि शहर में एक तजुर्बेकार लेडी डाक्टर मेरी परिचित हैं. आप उन से जांच करवाएं और रिपोर्ट मुझे ला कर दें. आप इस काम के लिए फौरन, बल्कि कल ही शहर चली जाएं.’’

पहले तो मिसेज मलिक टालमटोल से काम लेती रहीं, मगर मेरे मजबूर करने पर उन्होंने वादा कर लिया.

तीसरे दिन मिसेज मलिक बड़ी खुशखुश मेरे क्लीनिक में आईं और लिफाफा मेरे हाथ में दे कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब बताएं कि मैं क्या करूं?’’

मैं ने लिफाफा खोला और रिपोर्ट पढ़ने लगा. साथसाथ मेरी हैरत में इजाफा होता चला गया, क्योंकि रिपोर्ट में डाक्टर ने लिखा था कि मिसेज मलिक में किसी किस्म का कोई नुक्स नहीं है. अगर औलाद नहीं हो रही है तो उन के शौहर की जांच करवाई जाए. इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद हम दोनों एकदूसरे की तरफ हैरत से देख रहे थे. मिसेज मलिक की आंखों में आंसू थे और मैं सोचने लगा था कि यह औरत नासमझी में अपने आप को कितनी बड़ी सजा दे रही थी, बल्कि अपनी जान तक देने पर तैयार थी. मैं ने मिसेज मलिक को तसल्ली दी.

अगले दिन मैं हवेली गया. मैं छोटे चौधरी से तनहाई में बात करना चाहता था, मगर पता चला कि वह हवेली में मौजूद नहीं था. मैं पैगाम दे कर लौट आया कि जब छोटे चौधरी आएं तो मुझे खबर भेज दें.

रात को छोटे चौधरी से मुलाकात हुई. मैं ने बड़ी नरमी से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप के यहां औलाद नहीं हुई. आप को इस बारे में पता है कि इस की क्या वजह है?’’

यह सुनते ही चौधरी के तेवर बदलने लगे. उस के चेहरे की लकीरें गहरी होने लगीं और वह बड़े गुस्से से बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है, मेरी बीवी बांझ है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘नहीं चौधरी साहब, आप को यही तो गलतफहमी है. आप की बीवी बिलकुल ठीक है. वह बच्चा पैदा करने की पूरी खूबी रखती है. आप को अपना इलाज करवाना होगा.’’

मेरे यह कहने की देर थी कि चौधरी आगबबूला हो गया, ‘‘डाक्टर, यह बात अब दोबारा नहीं कहना, नहीं तो तुम्हारी लाश किसी को नहीं मिलेगी. और दित्तू, डाक्टर को हवेली से बाहर निकाल दे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, 2 आदमियों ने मुझे बांहों से घसीट कर हवेली से बाहर कर दिया. मैं चौधरी की बेवकूफी पर अफसोस करता हुआ क्लीनिक वापस आ गया. सारी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं सोचता रहा कि ये लोग कितने बेवकूफ हैं. इन के भले की बात भी इन को बुरी लगती है. अगले दिन मैं ने मिसेज असद मलिक से उन लोगों का पता पूछा, जहां चौधरी असद मलिक की शादी हो रही थी. वह कस्बा नसीरपुर गांव से 15 मील दूर था. लड़की का वालिद नंबरदार था. उम्र 60 साल थी. बीवी की मौत हो गई थी. 1 बेटी और 2 बेटों की शादी हो गई थी. सिर्फ 1 ही बेटी रह गई थी. मैं ने नंबरदार यूसुफ को अपना परिचय दिया तो वह बड़ी भलमनसाहत से पेश आया.

मैं ने नंबरदार से अर्ज की, ‘‘आप की बेटी की शादी मलिक असद से तय हो गई है और जल्दी ही शादी भी होने वाली है. आप की जानकारी में यह बात भी जरूर होगी कि चूंकि मलिक असद की पहली बीवी से औलाद नहीं है, इसीलिए वह दूसरी शादी कर रहे हैं. मगर मैं डाक्टर होने के नाते अपना फर्ज समझता हूं कि आप को सच्चाई से आगाह कर दूं. मलिक असद की बीवी बांझ नहीं है. वह पूरी तरह सेहतमंद है और औलाद पैदा करने के काबिल है. मेरे पास इस का सबूत मौजूद है. अगर आप इस बात को बुनियाद बना कर शादी कर रहे हैं तो अपनी बेटी की जिंदगी में कांटे बो रहे हैं. आप मेरी बात समझ गए होंगे. मैं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है. अब आप जैसा मुनासिब समझें, फैसला करें.’’

मेरी बातें सुन कर नंबरदार परेशान हो गया. काफी देर चुपाचाप हुक्का पीता रहा. फिर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आप के कहने का मतलब है कि मलिक असद ही औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है?’’

‘‘मेरा मतलब है कि मलिक असद को इलाज की जरूरत है. अगर वह इलाज करवा ले तो उस की पहली बीवी से औलाद हो सकती है. अगर दूसरी शादी सिर्फ औलाद की खातिर हो रही है तो आप पहले छानबीन कर लें.’’

नंबरदार सिर झुका कर सोचता रहा. फिर कहने लगा, ‘‘ठीक है डाक्टर साहब, मैं ने आप की बात सुन ली है. आप की मेहरबानी कि आप ने ये बातें बता दीं. मैं सोच कर जवाब दूंगा.’’

मैं नंबरदार को सलाम कर के खुशखुश वापस आ गया. दूसरे दिन जब मैं ने मिसेज मलिक को सारी बातें बताईं तो वह भी बहुत खुश हुई और उस की आंखों में मेरे लिए शुक्रगुजारी के आंसू आ गए. मैं ने उसे समझाया कि बात अभी खत्म नहीं हुई. उसे बड़ी समझदारी और खिदमत से अपने शौहर का दिल जीतना होगा. उस के दिल में अपने लिए जगह बनानी होगी और उसे इलाज पर राजी करना होगा.

2 ही दिन गुजरे थे. मैं शाम के वक्त खेतों में सैर कर रहा था. शाम के वक्त मैं रोज गांव से बाहर निकल जाता था. हलकीहलकी ताजी हवा और पत्तों की सरसराहट से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था. मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एकदम मेरे सामने मलिक असद आ खड़ा हुआ. उस के साथ 2 आदमी और थे. दोनों आदमियों के हाथों में लाठियां थीं. मलिक असद की आंखों में गुस्सा भरा था—‘‘डाक्टर, मैं ने तुम्हें समझाया था कि यह बात दोबारा न करना, वरना तुम्हारी लाश नहीं मिलेगी. अब तैयार हो जाओ. तुम्हें मैं दूसरी दुनिया में पहुंचा दूंगा. तुम्हें मलिक असद का पता नहीं है.’’

उस ने अपने आदमियों को इशारा किया. बस मुझे इतना याद है कि एक लाठी मेरे सिर पर लगी. उस के बाद मुझे होश नहीं रहा. जब होश आया तो मैं अस्पताल के कमरे में एक बैड पर लेटा था. मेरे पास कमरे में बड़े चौधरी और उन की बहू थी. मुझे होश में आते देख कर बड़े चौधरी ने मेरे पांव पकड़ लिए और मिसेज मलिक असद सजदे में गिर गईं. चौधरी साहब कहने लगे, ‘‘पुत्तर डाक्टर, मुझे माफ कर दो. मैं बहुत शर्मिंदा हूं. तुम चाहो तो मेरे बेटे को पुलिस के हवाले कर दो. मगर यकीन करो, अगर मुझे इस का पता होता तो मैं अपने बेटे की जान ले लेता और तुम्हें नुकसान न पहुंचने देता.’’

इस दौरान मिसेज असद भी सजदे से उठ गई थीं. मेरी एक टांग पर पलस्तर चढ़ा था. मैं ने फाइल पढ़ी तो पता चला कि सिर के जख्म पर 10 टांके लगे थे और बाईं टांग टूट गई थी. इस के बावजूद मैं मुसकरा रहा था, ‘‘चौधरी साहब, आप का इस में कोई कसूर नहीं. मैं इस वाकये की कोई रिपोर्ट नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ छोटे चौधरी से मिलना चाहता हूं.’’

मेरी बात सुन कर बड़े चौधरी की आंखों में आंसू आ गए. वह अपने आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर चले गए. मिसेज मलिक ने मुझे बताया, ‘‘आप से लड़ाई की इस घटना से पहले नंबरदार और उस के भाई हवेली में आए थे और मलिक असद के सामने बड़े चौधरी से कहने लगे थे, ‘आप के बेटे में नुक्स है. वह औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है. आप ने हम से गलतबयानी की है, बल्कि हमें धोखा दिया है. हम यह रिश्ता तोड़ने आए हैं.’

‘‘यह सुन कर मलिक असद उन से झगड़ पड़ा. अगर बड़े चौधरी न होते तो वे लोग भी जख्मी हो जाते. बडे़े चौधरी ने हालात को संभाला और उन से कहने लगे कि आप लोगों से मैं ने कोई झूठ नहीं बोला है, आप लोगों को यह बात किस ने बताई है?

‘‘जब नंबरदार ने आप का नाम बताया तो बड़े चौधरी चुप रह गए. इसी दौरान मलिक असद गुस्से में बाहर निकल गया. मुझे शक हुआ. मैं ने अपनी नौकरानी से कहा कि वह मलिक असद का पीछा करे. उस ने मुझे आ कर बताया कि उन लोगों ने आप को जख्मी कर दिया है.

‘‘मैं ने फौरन बड़े चौधरी को बताया और हम अपने आदमियों के साथ वहां पहुंचे तो आप की हालत काफी खराब थी. फौरन तांगा मंगवाया और सड़क पर आ कर गाड़ी का बंदोबस्त किया. यहां अस्पताल में आ कर भी हम बहुत परेशान रहे. आप को पूरे 6 दिनों बाद होश आया है. इस दौरान पुलिस भी हमें परेशान करती रही.’’

मैं मिसेज मलिक की बातें सुन कर मुसकराता रहा. मुझे पूरे 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान मलिक असद को बड़े चौधरी लिवा लाए. वह भी अपने किए पर शर्मिंदा था. मैं उस से बहुत प्यार से मिला. मैं ने जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने मुझ पर बहुत ज्यादती की है. इस का यह असर हुआ कि वह दिनरात मेरे पास रहने लगा. मैं ने इस दौरान डाक्टर राशिद से उस की मुलाकात कराई और उन से सिफारिश की कि वह उस का इलाज करें. मैं ठीक हो कर गांव आ गया और अपने काम में खो गया. इस वाकए का यह असर हुआ कि मुझे चौधरी की हवेली में ही रहने के लिए जाना पड़ा. खानापीना भी वहीं होने लगा.

मलिक असद और उस की बीवी बड़ी खुशगवार जिंदगी बिताते रहे. मैं जब तक उस गांव में तैनात रहा, मिसेज मलिक ने मुझे सगी बहन का प्यार दिया. 2 सालों बाद मुझे पता चला कि मलिक असद के घर एक फूल सी बच्ची पैदा हुई है तो उस वक्त की मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं. Hindi Stories

लेखक – डा. फरहान