Crime Story: रसीली नहीं थी रशल कंवर

Crime Story: डूंगरदान पत्नी को सुखी और खुश रखने के लिए गांव से शहर ले आया था. वह जितना कमाता था, उतने में गृहस्थी आराम से चल जाती थी, लेकिन दिन भर घर में अकेली रहने वाली पत्नी रसाल कंवर ने अपना सुख खोजा पति के दोस्त मोहन सिंह राव में. इस के चलते कुछ न कुछ तो गलत होना ही था. आखिर…

रविवार 14 जुलाई, 2019 का दिन था. दोपहर का समय था. जालौर के एसपी हिम्मत अभिलाष टाक को फोन पर सूचना मिली कि बोरटा-लेदरमेर ग्रेवल सड़क के पास वन विभाग की जमीन पर एक व्यक्ति का नग्न अवस्था में शव पड़ा है.

एसपी टाक ने तत्काल भीनमाल के डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई को घटना से अवगत कराया और घटनास्थल पर जा कर काररवाई करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो गए, साथ ही उन्होंने थाना रामसीन में भी सूचना दे दी. उस दिन थाना रामसीन के थानाप्रभारी छतरसिंह देवड़ा अवकाश पर थे. इसलिए सूचना मिलते ही मौजूदा थाना इंचार्ज साबिर मोहम्मद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल पर आसपास के गांव वालों की भीड़ जमा थी. वहां वन विभाग की खाई में एक आदमी का नग्न शव पड़ा था. आधा शव रेत में दफन था. उस का चेहरा कुचला हुआ था. शव से बदबू आ रही थी, जिस से लग रहा था कि उस की हत्या शायद कई दिन पहले की गई है. वहां पड़ा शव सब से पहले एक चरवाहे ने देखा था. वह वहां सड़क किनारे बकरियां चरा रहा था. उसी चरवाहे ने यह खबर आसपास के लोगों को दी थी. कुछ लोग घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस को खबर कर दी.

मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को खाई से बाहर निकाल कर शिनाख्त कराने की कोशिश की, मगर जमा भीड़ में से कोई भी मृतक की शिनाख्त नहीं कर सका. शव से करीब 20 मीटर की दूरी पर किसी चारपहिया वाहन के टायरों के निशान मिले. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि हत्यारे शव को किसी गाड़ी में ले कर आए और यहां डाल कर चले गए. पुलिस ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. शव के पास ही खून से सनी सीमेंट की टूटी हुई ईंट भी मिली. लग रहा था कि उसी ईंट से उस के चेहरे को कुचला गया था. कुचलते समय वह ईंट भी टूट गई थी.

मौके की सारी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय चिकित्सालय की मोर्चरी भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने उस का पोस्टमार्टम किया. जब तक शव की शिनाख्त नहीं हो जाती, तब तक जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी. शव की शिनाख्त के लिए पुलिस ने मृतक के फोटो वाट्सऐप पर शेयर कर दिए. साथ ही लाश के फोटो भीनमाल, जालौर और बोरटा में तमाम लोगों को दिखाए. लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका.

सोशल मीडिया पर मृतक का फोटो वायरल हो चुका था. जालौर के थाना सिटी कोतवाली में 2 दिन पहले कालेटी गांव के शैतानदान चारण नाम के एक शख्स ने अपने रिश्तेदार डूंगरदान चारण की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. कोतवाली प्रभारी को जब थाना रामसीन क्षेत्र में एक अज्ञात लाश मिलने की जानकारी मिली तो उन्होंने लाश से संबंधित बातों पर गौर किया. उस लाश का हुलिया लापता डूंगरदान चारण के हुलिए से मिलताजुलता था. कोतवाली प्रभारी बाघ सिंह ने डीएसपी भीनमाल हुकमाराम को सारी बातें बताईं.

मारा गया व्यक्ति डूंगरदान चारण था

इस के बाद एसपी जालौर ने 2 पुलिस टीमों का गठन किया, इन में एक टीम भीनमाल थाना इंचार्ज साबिर मोहम्मद के नेतृत्व में गठित की गई, जिस में एएसआई रघुनाथ राम, हैडकांस्टेबल शहजाद खान, तेजाराम, संग्राम सिंह, कांस्टेबल विक्रम नैण, मदनलाल, ओमप्रकाश, रामलाल, भागीरथ राम, महिला कांस्टेबल ब्रह्मा शामिल थी. दूसरी पुलिस टीम में रामसीन थाने के एएसआई विरधाराम, हैडकांस्टेबल प्रेम सिंह, नरेंद्र, कांस्टेबल पारसाराम, राकेश कुमार, गिरधारी लाल, कुंपाराम, मायंगाराम, गोविंद राम और महिला कांस्टेबल धोली, ममता आदि को शामिल किया गया.

डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई दोनों पुलिस टीमों का निर्देशन कर रहे थे. जालौर के कोतवाली निरीक्षक बाघ सिंह ने उच्चाधिकारियों के आदेश पर डूंगरदान चारण की गुमशुदगी दर्ज कराने वाले उस के रिश्तेदार शैतानदान को राजदीप चिकित्सालय की मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने रिश्तेदार डूंगरदान चारण के रूप में कर दी. मृतक की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उस के परिजनों से संपर्क किया तो इस मामले में अहम जानकारी मिली. मृतक की पत्नी रसाल कंवर ने पुलिस को बताया कि उस के पति डूंगरदान 12 जुलाई, 2019 को जालौर के सरकारी अस्पताल में दवा लेने गए थे.

वहां से घर लौटने के बाद पता नहीं वे कहां लापता हो गए, जिस की थाने में सूचना भी दर्ज करा दी थी. रसाल कंवर ने पुलिस को अस्पताल की परची भी दिखाई. पुलिस टीम ने अस्पताल की परची के आधार पर जांच की. पुलिस ने राजकीय चिकित्सालय जालौर के 12 जुलाई, 2019 के सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो पता चला कि डूंगरदान को काले रंग की बोलेरो आरजे14यू बी7612 में अस्पताल तक लाया गया था. उस समय डूंगरदान के साथ उस की पत्नी रसाल कंवर के अलावा 2 व्यक्ति भी फुटेज में दिखे. उन दोनों की पहचान मोहन सिंह और मांगीलाल निवासी भीनमाल के रूप में हुई. पुलिस जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज जांच के बाद गांव के विभिन्न लोगों से पूछताछ की तो सामने आया कि मृतक डूंगरदान चारण की पत्नी रसाल कंवर से मोहन सिंह राव के अवैध संबंध थे. इस जानकारी के बाद पुलिस ने रसाल कंवर और मोहन सिंह को थाने बुला कर सख्ती से पूछताछ की. मांगीलाल फरार हो गया था. रसाल कंवर और मोहन सिंह राव ने आसानी से डूंगरदान की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया. केस का खुलासा होने की जानकारी मिलने पर पुलिस के उच्चाधिकारी भी थाने पहुंच गए. उच्चाधिकारियों के सामने आरोपियों से पूछताछ कर डूंगरदान हत्याकांड से परदा उठ गया.

पुलिस ने 16 जुलाई, 2019 को दोनों आरोपियों मृतक की पत्नी रसाल कंवर एवं उस के प्रेमी मोहन सिंह राव को कोर्ट में पेश कर 2 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान उन से विस्तार से पूछताछ की गई तो डूंगरदान चारण की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी. मृतक डूंगरदान चारण मूलरूप से राजस्थान के जालौर जिले के बागौड़ा थानान्तर्गत गांव कालेटी का निवासी था. उस के पास खेती की थोड़ी सी जमीन थी. वह उस जमीन पर खेती के अलावा दूसरी जगह मेहनतमजदूरी करता था. उस की शादी करीब एक दशक पहले जालौर की ही रसाल कंवर से हुई थी.

करीब एक साल बाद रसाल कंवर एक बेटे की मां बनी तो परिवार में खुशियां बढ़ गईं. बाद में वह एक और बेटी की मां बन गई. जब डूंगरदान के बच्चे बड़े होने लगे तो वह उन के भविष्य को ले कर चिंतित रहने लगा. गांव में अच्छी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी, लिहाजा डूंगरदान अपने बीवीबच्चों के साथ गांव कालेटी छोड़ कर भीनमाल चला गया और वहां लक्ष्मीमाता मंदिर के पास किराए का कमरा ले कर रहने लगा. भीनमाल कस्बा है. वहां डूंगरदान को मजदूरी भी मिल जाती थी. जबकि गांव में हफ्तेहफ्ते तक उसे मजदूरी नहीं मिलती थी.

डूंगरदान के पड़ोस में ही मोहन सिंह राव का आनाजाना था. मोहन सिंह राव पुराना भीनमाल के नरता रोड पर रहता था. वह अपराधी प्रवृत्ति का रसिकमिजाज व्यक्ति था. उस की नजर रसाल कंवर पर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. मोहन सिंह ने इस के लिए ही डूंगरदान से दोस्ती की थी. इस के बाद वह उस के घर आनेजाने लगा. मोहन सिंह रसाल कंवर से भी बड़ी चिकनीचुपड़ी बातें करता था. जब डूंगरदान मजदूरी करने चला जाता और उस के बच्चे स्कूल तो घर में रसाल कंवर अकेली रह जाती. ऐसे मौके पर मोहन सिंह उस के यहां आने लगा. मीठीमीठी बातों में रसाल को भी रस आने लगा. मोहन सिंह अच्छीखासी कदकाठी का युवक था.रसाल और मोहन के बीच धीरेधीरे नजदीकियां बढ़ने लगीं.

थोड़े दिनों के बाद दोनों के बीच अवैध संबंध कायम हो गए. इस के बाद रसाल कंवर उस की दीवानी हो गई. डूंगरदान हर रोज सुबह मजदूरी पर निकल जाता तो फिर शाम होने पर ही घर लौटता था. रसाल और मोहन पूरे दिन रासलीला में लगे रहते. डूंगरदान की पीठ पीछे उस की ब्याहता कुलटा बन गई थी. दिन भर का साथ उन्हें कम लगने लगा था. मोहन चाहता था कि रसाल कंवर रात में भी उसी के साथ रहे, मगर यह संभव नहीं था. क्योंकि रात में पति घर पर होता था.

ऐसे में एक दिन मोहन सिंह ने रसाल कंवर से कहा, ‘‘रसाल, जीवन भर तुम्हारा साथ तो निभाऊंगा ही, साथ ही एक प्लौट भी तुम्हें ले कर दूंगा. लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम्हारे बदन को अब मेरे सिवा और कोई न छुए. तुम्हारे तनमन पर अब सिर्फ मेरा अधिकार है.’’

‘‘मैं हर पल तुम्हारा साथ निभाऊंगी.’’ रसाल कंवर ने प्रेमी की हां में हां मिलाते हुए कहा.

रसाल के दिलोदिमाग में यह बात गहराई तक उतर गई थी कि मोहन उसे बहुत चाहता है. वह उस पर जान छिड़कता है. रसाल भी पति को दरकिनार कर पूरी तरह से मोहन के रंग में रंग गई. इसलिए दोनों ने डूंगरदान को रास्ते से हटाने का मन बना लिया. लेकिन इस से पहले ही डूंगरदान को पता चल गया कि उस की गैरमौजूदगी में मोहन सिंह दिन भर उस के घर में पत्नी के पास बैठा रहता है. यह सुनते ही उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. गुस्से से भरा डूंगरदान घर आ कर चिल्ला कर पत्नी से बोला, ‘‘मेरी गैरमौजूदगी में मोहन यहां क्यों आता है, घंटों तक यहां क्या करता है? बताओ, तुम से उस का क्या संबंध है?’’ कहते हुए उस ने पत्नी का गला पकड़ लिया.

रसाल मिमियाते हुए बोली, ‘‘वह तुम्हारा दोस्त है और तुम्हें ही पूछने आता है. मेरा उस से कोई रिश्ता नहीं है. जरूर किसी ने तुम्हारे कान भरे हैं. हमारी गृहस्थी में कोई आग लगाना चाहता है. तुम्हारी कसम खा कर कहती हूं कि मोहन सिंह से मैं कह दूंगी कि वह अब घर कभी न आए.’’

पत्नी की यह बात सुन कर डूंगरदान को लगा कि शायद रसाल सच कह रही है. कोई जानबूझ कर उन की गृहस्थी तोड़ना चाहता है. डूंगरदान शरीफ व्यक्ति था. वह बीवी पर विश्वास कर बैठा. रसाल कंवर ने अपने प्रेमी मोहन को भी सचेत कर दिया कि किसी ने उस के पति को उस के बारे में बता दिया है. इसलिए अब सावधान रहना जरूरी है. उधर डूंगरदान के मन में पत्नी को ले कर शक उत्पन्न तो हो ही गया था. इसलिए वह वक्तबेवक्त घर आने लगा. एक रोज डूंगरदान मजदूरी पर गया और 2 घंटे बाद घर लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. खटखटाने पर थोड़ी देर बाद उस की पत्नी रसाल कंवर ने दरवाजा खोला. पति को अचानक सामने देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

डूंगरदान की नजर कमरे में अंदर बैठे मोहन सिंह पर पड़ी तो वह आगबबूला हो गया. उस ने मोहन सिंह पर गालियों की बौछार कर दी. मोहन सिंह गालियां सुन कर वहां से चला गया. इस के बाद डूंगरदान ने पत्नी की लातघूंसों से खूब पिटाई की. रसाल लाख कहती रही कि मोहन सिंह 5 मिनट पहले ही आया था. मगर पति ने उस की एक न सुनी. पत्नी के पैर बहक चुके थे. डूंगरदान सोचता था कि गलत रास्ते से पत्नी को वापस कैसे लौटाया जाए. वह इसी चिंता में रहने लगा. उस का किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था. वह चिड़चिड़ा भी हो गया था. बातबात पर उस का पत्नी से झगड़ा हो जाता था.

आखिर, रसाल कंवर पति से तंग आ गई. यह दुख उस ने अपने प्रेमी के सामने जाहिर कर दिया. तब दोनों ने तय कर लिया कि डूंगरदान को जितनी जल्दी हो सके, निपटा दिया जाए. रसाल कंवर पति के खून से अपने हाथ रंगने को तैयार हो गई. मोहन सिंह ने योजना में अपने दोस्त मांगीलाल को भी शामिल कर लिया. मांगीलाल भीनमाल में ही रहता था.

साजिश के तहत रसाल और मोहन सिंह 12 जुलाई, 2019 को डूंगरदान को उपचार के बहाने बोलेरो गाड़ी में जालौर के राजकीय चिकित्सालय ले गए. मांगीलाल भी साथ था. वहां उस के नाम की परची कटाई. डाक्टर से चैकअप करवाया और वापस भीनमाल रवाना हो गए. रास्ते में मौका देख कर रसाल कंवर और मोहन सिंह ने डूंगरदान को मारपीट कर अधमरा कर दिया. फिर उस का गला दबा कर उसे मार डाला.

इस के बाद डूंगरदान की लाश को ठिकाने लगाने के लिए बोलेरो में डाल कर बोरटा से लेदरमेर जाने वाले सुनसान कच्चे रास्ते पर ले गए, जिस के बाद डूंगरदान के शरीर पर पहने हुए कपड़े पैंटशर्ट उतार कर नग्न लाश वन विभाग की खाली पड़ी जमीन पर डाल कर रेत से दबा दी. उस के बाद वे भीनमाल लौट गए. भीनमाल में रसाल कंवर ने आसपास के लोगों से कह दिया कि उस का पति जालौर अस्पताल चैकअप कराने गया था. मगर अब उस का कोई पता नहीं चल रहा. तब डूंगरदान की गुमशुदगी उस के रिश्तेदार शैतानदान चारण ने जालौर सिटी कोतवाली में दर्ज करा दी.

पुलिस पूछताछ में पता चला कि आरोपी मोहन सिंह आपराधिक प्रवृत्ति का है. उस ने अपने साले की बीवी की हत्या की थी. इन दिनों वह जमानत पर था. मोहन सिंह शादीशुदा था, मगर बीवी मायके में ही रहती थी. भीनमाल निवासी मांगीलाल उस का मित्र था. वारदात के बाद मांगीलाल फरार हो गया था. थाना रामसीन के इंचार्ज छतरसिंह देवड़ा अवकाश से ड्यूटी लौट आए थे. उन्होंने भी रिमांड पर चल रहे रसाल कंवर और मोहन सिंह राव से पूछताछ की.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने 19 जुलाई, 2019 को दोनों आरोपियों रसाल कंवर और मोहन सिंह को फिर से कोर्ट में पेश कर दोबारा 2 दिन के रिमांड पर लिया और उन से पूछताछ कर कई सबूत जुटाए. उन की निशानदेही पर मृतक के कपड़े, वारदात में प्रयुक्त बोलेरो गाड़ी नंबर आरजे14यू बी7612 बरामद की गई. मृतक डूंगरदान के कपडे़ व चप्पलें रामसीन रोड बीएड कालेज के पास रेल पटरी के पास से बरामद कर ली गईं.

पूछताछ पूरी होने पर दोनों आरोपियों को 21 जुलाई, 2019 को कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पुलिस तीसरे आरोपी मांगीलाल माली को तलाश कर रही है. Crime Story

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

MP Crime News: कातिल किलर – ब्लैकमेलिंग का हुए शिकार

MP Crime News: घटना मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की है. 17 अप्रैल, 2019 को दिन के यही कोई 3 बजे थे. उसी समय जीवाजीगंज थाना क्षेत्र के पीपलीनाका इलाके की महावीर सोसायटी में स्थित पंडित रमेश व्यास के मकान से गोलियां चलने की आवाज आईं. एक के बाद एक 2 गोलियों की आवाज सुन कर रमेश व्यास की पत्नी गीताबाई डर गई.

उस समय वह अपने 3 मंजिला मकान में भूतल पर थी. गोलियों की आवाज सुन कर गीताबाई भागीभागी ऊपर की मंजिल पर पहुंची, जहां उस का 37 वर्षीय बेटा देवकरण अपनी 27 वर्षीया पत्नी अंतिमा के साथ रहता था. गीताबाई ने जैसे ही बेटे और बहू को देखा तो उस की चीख निकल गई. क्योंकि बहूबेटा दोनों खून से लथपथ पड़े थे. गीताबाई के चीखने और रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी आ गए. उन्होंने जब देवकरण और उस की पत्नी को देखा तो वे भी हैरान रह गए कि ऐसा कैसे हो गया.

उन दोनों की मौत हो चुकी थी. थोड़ी देर में मोहल्ले के तमाम लोग इकट्ठे हो गए. उसी दौरान किसी ने थाना जीवाजीगंज में फोन कर के सूचना दे दी. घटना की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी शांतिलाल मीणा एसआई कैलाश भारती आदि के साथ मौके पर पहुंच गए. मकान की ऊपर वाली मंजिल के एक कमरे में उन्होंने पलंग पर देवकरण व उस की पत्नी अंतिमा के शव देखे. दोनों ही शव खून से लथपथ थे. पास ही एक पिस्टल पड़ी थी.

निरीक्षण में पता चला कि अंतिमा के सिर में गोली काफी नजदीक से मारी गई थी. लग रहा था कि देवकरण ने पहले अंतिमा की हत्या की फिर खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली. थानाप्रभारी को लगा कि शायद पतिपत्नी के बीच किसी विवाद के कारण यह घटना हुई है पर पुलिस जांच के दौरान अलमारी से जो सुसाइड नोट मिला, उस से पूरी कहानी ही बदल गई. सुसाइड नोट में देवकरण ने रेखा और सुमन नाम की 2 युवतियों का उल्लेख करते हुए लिखा था कि वह उन्हें ब्लैकमेल कर रही थीं. उन की ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर वह आत्महत्या कर रहे हैं.

घटना की जानकारी मिलने पर आईजी राकेश गुप्ता व एसपी (उज्जैन) सचिन अतुलका और एडीशनल एसपी नीरज भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. पुलिस ने देवकरण के मातापिता से इस बारे में पूछताछ की तो वे भी उन दोनों के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं दे सके, जिन का जिक्र सुसाइड नोट में था. इस के बाद थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. फिर केस दर्ज कर के एसपी के निर्देश पर थानाप्रभारी शांतिलाल मीणा ने जांच शुरू कर दी.

थानाप्रभारी ने सब से पहले मृतक देवकरण के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से यह बात सामने आई कि देवकरण की अकसर एकमपुरा सोसायटी में रहने वाली रेखा, इंदौर के पलासिया में रहने वाली उस की छोटी बहन सुमन और एक युवक लाखन से बात होती थी. इस में खास बात यह थी कि देवकरण को इन तीनों की तरफ से ही काल की जाती थी. देवकरण अपनी तरफ  से उन्हें कोई फोन नहीं करता था. देवकरण ने अपने सुसाइड नोट में 2 युवतियों द्वारा ब्लैकमेलिंग की बात भी लिखी थी, इसलिए थानाप्रभारी ने शक के आधार पर रेखा व सुमन को हिरासत में लेकर उन से पूछताछ की. लेकिन दोनों युवतियों ने देवकरण को पहचानने से इनकार कर दिया.

बाद में रेखा ने चौंकाने वाली बात यह बताई कि लगभग ढाई साल पहले देवकरण ने उस से गंधर्व विवाह किया था. इसलिए पत्नी होने के नाते वह देवकरण से खर्च के लिए पैसा मांगती थी. लेकिन ब्लैकमेल करने की बात से उस ने इनकार कर दिया. अब तक पुलिस लाखन को भी हिरासत में ले कर थाने लौट आई थी. थानाप्रभारी मीणा को युवतियों की बात झूठी लगी. लिहाजा उन्होंने रेखा, सुमन व लाखन को अलगअलग रूम में बैठा कर पूछताछ की. उन के द्वारा विरोधाभासी बयान देने पर पता चल गया कि वे तीनों झूठ बोल रहे हैं.

अंतत: उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वे देवकरण को काफी दिनों से ब्लैकमेल करते आ रहे थे. थानाप्रभारी की पूछताछ में देवकरण को ब्लैकमेल करने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उज्जैन के पीपलीनाका क्षेत्र की महावीर सोसायटी में रहने वाले पंडित रमेश शंकर व्यास छोटा सर्राफा स्थित नरसिंह मंदिर के पुजारी थे. उन्होंने अपने बेटे देवकरण को भी पूजापाठ, ज्योतिष की शिक्षा दी थी. इस के बाद देवकरण भी पिता के साथ मंदिर में रह कर पूजापाठ के काम में उन की मदद करने लगा था.. रेखा सिकरवार से देवकरण की मुलाकात सन 2016 में हुई थी. हुआ यह कि रेखा को उस के पति ने छोड़ दिया था. इस के लिए रेखा अपने ग्रह नक्षत्र दिखाने के लिए पंडित रमेशचंद्र व्यास के पास आई थी. रमेशचंद्र व्यास ने रेखा को अपनी कुंडली के बारे में देवकरण से सलाह लेने को कहा. देवकरण ने कुंडली देख कर उस की परेशानियां तो बता दीं, लेकिन खुद परेशानी में फंस गया.

हुआ यह कि सलाह के सिलसिले में रेखा ने देवकरण से उस का मोबाइल नंबर ले लिया और फिर अकसर उस से फोन पर अपनी समस्याओं के बारे में बातचीत करने लगी. मंदिरों में पूजापाठ का काम सुबह काफी जल्द शुरू हो कर देर रात तक चलता था. मंदिर में पूजा के अलावा देवकरण कई यजमानों के घर विभिन्न तरह के अनुष्ठान करवाने के लिए जाता था, इसलिए रेखा से उस की बात अकसर रात में ही हो पाती थी.

इसी बातचीत के दौरान रेखा का देवकरण की तरफ झुकाव हो गया. रेखा काफी शातिर थी. वह जानती थी कि देवकरण के पास काफी पैसा है, इसलिए उस ने उसे शीशे में उतारने की योजना बनाई. उस ने एक रोज पूजापाठ के बहाने देवकरण को अपने घर बुलाया. देवकरण जब वहां पहुंचा तो उस के घर पूजापाठ की कोई तैयारी नहीं थी. यह देख वह कुछ देर रुक कर वापस लौटने लगा तो रेखा ने उसे रोक कर कहा, ‘‘क्या सिर्फ पूजा करना ही अनुष्ठान है? स्त्रीपुरुष का प्यार भी तो अनुष्ठान ही होता है.’’

देवकरण कोई बच्चा नहीं था जो रेखा के कहने का मतलब न समझता. रेखा के प्रति उस के मन में भी आकर्षण था, लेकिन अपने परिवार की इज्जत एवं पेशे की पवित्रता को ध्यान में रख कर वह खुद आगे नहीं बढ़ा था. लेकिन जब रेखा ने खुला प्रेम प्रस्ताव दिया तो वह खुद को रोक नहीं सका, अंतत: दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. इस के बाद आए दिन दोनों की एकांत में मुलाकातें होने लगीं. रेखा के पास रोजीरोटी का कोई सहारा नहीं था, सो देवकरण से वह देहसुख के बदले पैसे वसूलने लगी.

इसी दौरान रेखा की छोटी बहन सुमन सिकरवार को भी उस के पति ने छोड़ दिया, जिस से वह भी मायके आ कर रहने लगी थी. खर्च बढ़ा तो रेखा की देवकरण से मांग भी बढ़ने लगी. लेकिन देवकरण ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इसी बीच पिता रमेशचंद्र व्यास ने देवकरण का रिश्ता उज्जैन में ही फ्रीगंज निवासी अंतिमा के साथ तय कर दिया.

यह बात रेखा को पता चली तो वह समझ गई कि पत्नी के आने के बाद देवकरण उस के कब्जे में ज्यादा दिन नहीं रहेगा. इसलिए देवकरण जब उसे अपनी शादी का निमंत्रण पत्र देने गया तो रेखा ने उसे खूब लताड़ा. रेखा ने कहा कि उस ने वादा किया था कि वह शादी के बाद भी उस का खर्च उठाता रहेगा. अप्रैल, 2017 में अंतिमा से देवकरण का विवाह हो गया. वह बहुत सुंदर थी. अंतिमा के मधुर व्यवहार से ससुराल में सब खुश थे. पत्नी के प्यार ने देवकरण को रेखा से दूर कर दिया. लेकिन रेखा, उस की मां और बहन सुमन को यह मंजूर नहीं था. देवकरण उन के लिए वह खजाना था, जिस में हाथ डाल कर वे जब चाहे पैसा निकाल सकती थीं.

इसलिए रेखा, उस की बहन सुमन और मां भागवंती देवकरण को धमकाने लगीं. उन्होंने धमकी दी कि अगर उस ने पैसा नहीं दिया तो वे उसे बलात्कार के आरोप में जेल पहुंचा देंगी. इसी दौरान रेखा की छोटी बहन सुमन एक साड़ी शोरूम में नौकरी करने लगी थी, जहां पहले से वहां काम कर रहे लाखन के साथ उस के अवैध संबंध बन गए. लाखन भी शातिर था, इसलिए कुछ ही दिन में उस ने सुमन की बहन रेखा को अपने प्रेमजाल में फांस लिया.

कुछ दिनों में यह जानकारी सुमन को भी मिल गई. लाखन और रेखा के संबंधों पर सुमन ने भी कोई ऐतराज नहीं जताया. इस बीच जब रेखा और देवकरण का मामला लाखन की जानकारी में आया तो मां और दोनों बेटियों के साथ वह भी देवकरण को पैसों के लिए धमकाने लगा. देवकरण के पिता रमेशचंद्र की समाज में काफी इज्जत थी. लोग उन का बहुत सम्मान करते थे, इसलिए देवकरण परेशान रहने लगा. साथ ही उसे पत्नी अंतिमा की भी चिंता थी. उसे लगता था कि यदि अंतिमा को रेखा के बारे में पता चलेगा तो वह उस के बारे में क्या सोचेगी.

दूसरी तरफ 2 सालों में 5 लाख से भी ज्यादा रुपए और ज्वैलरी हड़पने के बाद भी रेखा, सुमन, दोनों बहनों के प्रेमी लाखन और मां भागवंती की मांग लगातार बढ़ती जा रही थी. घटना के एक दिन पहले देवकरण उदयपुर में एक यजमान के घर बड़ा अनुष्ठान करवाने गया हुआ था. यह बात रेखा को पता चली तो वह उस पर दबाव बनाने लगी कि अनुष्ठान की दक्षिणा में मिली धनराशि वह सीधे ला कर उसे सौंप दे.

देवकरण ऐसा करता तो घर पर पिता को क्या जवाब देता, इसलिए उस ने रेखा की बात नहीं मानी, जिस से रेखा की मां भागवंती ने उसे फोन पर धमकी दी कि वह उस के हाथपैर तुड़वा देगी. लाखन ने भी देवकरण को धमकाया कि यदि उस ने पैसे नहीं दिए तो अंजाम भुगतने को तैयार रहे. इस से देवकरण को लगने लगा कि अब उस की इज्जत को कोई नहीं बचा सकता. इस से उस ने परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद की जान देने का निर्णय कर लिया. लेकिन खुद की जान देने से पहले उस ने अपनी गलती के लिए पत्नी अंतिमा से क्षमा मांगने की सोच कर अपनी परेशानी बता दी.

इस पर अंतिमा ने कहा कि जब वह नहीं रहेगा तो वह अकेली जीवित रह कर क्या करेगी. इसलिए उस ने भी साथ मरने का फैसला कर लिया. जिस के बाद 17 अप्रैल को मंदिर से घर वापस आ कर देवकरण ने अपने कमरे में अपनी लाइसेंसी पिस्टल से पहले अंतिमा के सिर में गोली मारी, फिर खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली.

पूछताछ करने के बाद देवकरण को ब्लैकमेल करने वाली दोनों बहनों रेखा, सुमन उन की मां भागवंती और प्रेमी लाखन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. MP Crime News

Family Dispute: सौतिया डाह में पत्नी ने लिया बदला

62 वर्षीय रामविलास साह जिला सीतामढ़ी के डुमरा थाना क्षेत्र में आने वाले गांव बनचौरी में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में दूसरी पत्नी सुनीता के अलावा 2 बेटे थे. पहली पत्नी मनतोरिया से उस के 6 बच्चे थे. लेकिन मनतोरिया अपने बच्चों के साथ दूसरे मकान में रहती थी. एक तरह से उस का पति रामविलास से कोई संबंध नहीं था. रामविलास के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. डुमरा इलाके में वह बड़े काश्तकारों में शुमार था. रामविलास के दिन बड़ी खुशहाली में कट रहे थे. अपने नियमानुसार वह सुबह 5 बजे बिस्तर त्याग देता था.

4 जून, 2018 को सुबह के 9 बजे गए थे. उस दिन न तो रामविलास उठा और न ही उस की पत्नी सुनीता और न ही उस के दोनों बेटे. घर में भी कोई हलचल नहीं हो रही थी. यह देख कर पड़ोस में रहने वाले रामविलास के भतीजे श्रवण को बड़ा अजीब लगा. इस के पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि चाचा या चाची इतनी देर तक सोते रहे हों. यह देख कर श्रवण से नहीं रहा गया तो वह चाचाचाची को आवाज लगाते हुए उन के घर के अंदर दाखिल हो गया. घर का मुख्य दरवाजा यूं ही भिड़ा हुआ था, हलका सा धक्का देते ही किवाड़ खुल गई. श्रवण आवाज देते हुए चाचाचाची के कमरे में पहुंच गया.

कमरे में जा कर उस की नजर बिस्तर पर पड़ी तो उस का दिल दहल गया. बिस्तर पर रामविलास साह और उस की पत्नी सुनीता देवी की रक्तरंजित लाशें पड़ी थीं. श्रवण चिल्लाते हुए उलटे पांव बाहर आ गया. उस के चीखने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी वहां आ गए. जब वे लोग रामविलास के घर में गए तो पतिपत्नी की लाशें देख कर हैरत में रह गए. उन के दोनों बच्चे घर में दिखाई नहीं दे रहे थे. लोगों ने जब दूसरे कमरे में देखा तो उन के दोनों बेटों नवल और राहुल की लाशें भी खून से लथपथ पड़ी मिलीं.

हत्यारों ने चारों की हत्या बड़ी बेरहमी से गला रेत कर की थी. थोड़ी देर में ही 4-4 लाशें पाए जाने की खबर बनचौरी गांव में ही नहीं बल्कि पूरे डुमरा क्षेत्र में फैल गई. जिस ने भी सुना दौड़ा चला आया. देखतेदेखते वहां भारी भीड़ जमा हो गई थी. इसी बीच किसी ने घटना की सूचना थाना डुमरा को दे दी थी. एक ही परिवार के 4 लोगों की हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विकास कुमार सिंह तुरंत पुलिस टीम के साथ बनचौरा के लिए रवाना हो गए. जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो रामविलास के घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा था.

उच्चाधिकारियों को घटना की सूचना देने के बाद थानाप्रभारी घटनास्थल का निरीक्षण करने लगे. घटना की सूचना मिलते ही एसपी विकास बर्मन, एएसपी संदीप कुमार नीरज, डीएसपी (सदर) कुमार वीर वीरेंद्र, डीएसपी राजवंश सिंह, नगर थाने के इंसपेक्टर मुकेश चंद कुंवर, एसआई शशि भूषण सिंह आदि घटनास्थल पर पहुंच गए. छानबीन के दौरान पुलिस अधिकारियों ने पाया कि हत्यारों ने चारों को गोली मारी थी. बाद में उन्होंने सब के गले रेते थे. ऐसा काम वही कर सकता था, जो उन से सख्त नफरत करता हो. मतलब यह कि हत्यारा नहीं चाहता था कि उन में से कोई भी जिंदा बचे. वह उन्हें आखिरी सांस तक मरते देखना चाहता था.

छानबीन के दौरान पुलिस ने मौके से 4 खोखे बरामद किए. हत्यारों ने घर में रखे किसी भी सामान को हाथ नहीं लगाया था, कमरे का सारा सामान अपनी जगह रखा था. इस से साफ जाहिर हो रहा था कि हत्यारों का मकसद सिर्फ हत्या करना था. इस का मतलब रामविलास साह और उस के परिवार की हत्या किसी साजिश के तहत की गई थी. निश्चित रूप से हत्यारे परिचित रहे होंगे, जिन्हें घर के कोने की जानकारी थी. तभी वह बड़ी आसानी से अपना काम कर के निकल गए और किसी को कानोंकान भनक तक नहीं लगी.

घटना की सूचना मृतक रामविलास के साले यानी सुनीता के भाई बिरजू साह को मिली तो वह भी बनचौरी पहुंच गया. बहनोई और भांजों की लाशें देख वह दहाड़ मार कर रोने लगा. उस की बहन के घर में कोई दीया जलाने वाला तक नहीं बचा था. पड़ोसियों, गांव वालों आदि से बात करने के बाद पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर चारों लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दीं. पुलिस ने मृतका सुनीता के भाई बिरजू को थाने बुलवा कर पूछताछ की तो उस ने इस सामूहिक नरसंहार के लिए अपने बहनोई की पहली बीवी मनतोरिया देवी और उस के 3 बेटों बिटटू कुमार, विक्रम कुमार उर्फ पप्पू और रोहित कुमार को जिम्मेदार मानते हुए नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी.

बिरजू साह की तहरीर पर पुलिस ने नामजद लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी, 34 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया. घटना की मौनिटरिंग एसपी विकास बर्मन खुद कर रहे थे. उन्होंने सदर डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र को निर्देश दिया कि पुलिस की एक टीम बना कर आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें ताकि वे भाग न सकें.

डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक स्पैशल टीम गठित की, जिस में तेजतर्रार और विश्वासपात्र पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. नामजद चारों आरोपी गांव बनचौरी के ही रहने वाले थे. पुलिस को मुखबिर के जरिए सूचना मिली कि आरोपी गांव में ही छिपे हैं और भाग निकलने का मौका ढूंढ रहे हैं. मुखबिर की सूचना पर पुलिस अविलंब बनचौरी पहुंची और रामविलास की पत्नी मनतोरिया के घर दबिश दी. घर खुला हुआ था लेकिन वहां कोई नहीं मिला. तभी पुलिस को पता चला कि चारों आरोपी अभीअभी घर छोड़ कर फरार हुए हैं.

आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस गांव के बाहर पहुंची. पुलिस को देखते ही आरोपी बिट्टू, विक्रम और रोहित भागने लगे. पुलिस ने दौड़ कर तीनों आरोपियों को पकड़ लिया. ये तीनों भाई थे. इन की मां मनतोरिया उन के साथ नहीं थी. शायद वह किसी दूसरे रास्ते से निकल गई थी. पुलिस तीनों आरोपियों को थाने ले आई. थानाप्रभारी विकास कुमार सिंह ने आरोपियों की गिरफ्तारी की सूचना डीएसपी कुमार वीर वीरेंद्र सिंह और एसपी विकास बर्मन को दे दी.

दोनों अधिकारी थाने पहुंच गए. एसपी और डीएसपी के समक्ष थानाप्रभारी ने तीनों आरोपियों से चौहरे हत्याकांड के संबंध में पूछताछ की तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अपना जुर्म कबूल कर लिया. चारों की हत्या किए जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं था. उन के चेहरों पर कोई अफसोस नहीं दिख रहा था बल्कि उन की आंखों में मृतकों के प्रति नफरत की चिंगारी फूट रही थी. पुलिस ने जब उन से हत्याओं की वजह पूछी तो उन्होंने विस्तार से कहानी सुनाई. पता चला कि इस खूनी कहानी की काली दास्तान पारिवारिक रंजिश की बुनियाद पर लिखी जा गई थी.

तीनों आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद एसपी विकास वर्मन ने पुलिस लाइंस में पत्रकार वार्ता का आयोजन किया. तीनों आरोपियों ने पत्रकारों के सामने अपने पिता, सौतेली मां और दोनों सौतेले भाइयों की हत्या किए जाने का जुर्म कबूल किया. इस के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया. इस खूनी कहानी को विस्तार से जानने के लिए हमें 30 साल पीछे जाना होगा, जब इस कहानी की बुनियाद रखी गई.

रामविलास साह अपने पिता के साथ खेतीकिसानी का काम करता था. करीब 40 साल पहले उस के पिता ने उस का विवाह मनतोरिया के साथ कर दिया था. रामविलास की जिंदगी में मनतोरिया बहार बन कर छा गई. समय के साथ मनतोरिया 6 बच्चों की मां बनी. जिन में 3 बेटे और 3 बेटियां थीं. करीब 30 साल पहले रामविलास साह ने सुनीता से दूसरी शादी रचा ली थी. पति के इस फैसले पर मनतोरिया आगबबूला हो गई. बच्चे भी पिता की दूसरी शादी से खुश नहीं थे, उन्होंने सुनीता को मां मानने से इनकार कर दिया. यहीं से रामविलास साह के जीवन में महाभारत की शुरुआत हो गई. रामविलास ने सुनीता से किस विवशता अथवा मजबूरी के तहत शादी की थी, इसे रामविलास ही जानता होगा.

हालांकि रामविलास दोनों पत्नियों को बराबर प्यार देता था. पहली पत्नी के बच्चों को वही दुलार देता था जो उन्हें देता आया था. बच्चों के साथ उस ने कभी भेदभाव नहीं किया. लेकिन बच्चे पिता से नाखुश रहते थे और अपनी मां का ही साथ देते थे.

खैर, आगे चल कर सुनीता भी 2 बच्चों नवल कुमार उर्फ भोलू और राहुल कुमार की मां बन गई. नवल और राहुल के पैदा होने के बाद तो घर में कलह और बढ़ गई. पहली पत्नी मनतोरिया और उस के बच्चे रामविलास पर दबाव बना रहे थे कि वह सुनीता से संबंध तोड़ दे. लेकिन रामविलास ने मनतोरिया और बच्चों से दो टूक कह दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए वह सुनीता से कभी अलग नहीं हो सकता. पति का यह जवाब सुन कर मनतोरिया मन मसोस कर रह गई.

आखिर रामविलास ने इस कलह से निबटने के लिए अपनी संपत्ति 2 बराबर भागों में बांट दी. एक हिस्सा मनतोरिया के नाम लिख दिया और दूसरा हिस्सा सुनीता के नाम. यही नहीं उस ने पुस्तैनी मकान भी पहली पत्नी को दे दिया और उसी गांव में घर से थोड़ी दूरी पर एक नया घर बना कर सुनीता और दोनों बच्चों के साथ रहने लगा. लेकिन उस का यह पूरा खेल उल्टा पड़ गया. मनतोरिया और उस के तीनों बच्चों को ये सब इसलिए नागवारा गुजरा कि रामविलास ने सौतेली मां को अपनी जायदाद में से हिस्सा क्यों दिया. उन्होंने पिता से कहा कि वह सौतेली मां का हिस्सा उन्हें दे दें, नहीं तो इस का अंजाम बुरा हो सकता है. लेकिन रामविलास ने पत्नी और बच्चों की बातों पर ध्यान नहीं दिया.

बात इसी साल मार्चअप्रैल महीने की है. मनतोरिया और उस के तीनों बेटों बिट्टू, विक्रम और रोहित के मन में लालच आ गया. उन्होंने धोखे से सुनीता के हिस्से की 12 कट्ठे जमीन में से 4 कट्ठा जमीन 4 लाख रुपए में बनचौरी गांव के पवन साह को बेच  दी. पवन साह के नाम जमीन का बैनामा होने तक सुनीता या रामविलास को कानोंकान खबर तक नहीं हुई. लेकिन यह बात छिपने वाली नहीं थी. आखिरकार रामविलास को पता चल ही गया कि मनतोरिया ने धोखे से सुनीता के हिस्से की 4 कट्ठा जमीन गांव के पवन साह को बेच दी है. इस बात को ले कर मनतोरिया और सुनीता के बीच विवाद छिड़ गया.

रामविलास सुनीता का ही साथ दे रहा था. उस ने मनतोरिया को इस के लिए खूब खरीखोटी सुनाई. इस पर मनतोरिया के सब से छोटे बेटे रोहित ने पिता को भलाबुरा कह दिया. बेटे की बात रामविलास के दिल में चुभ गई. उस ने आव देखा न ताव, उस के गाल पर 2 थप्पड़ रसीद कर दिया. बेटे पर हाथ उठाने वाली बात न तो मनतोरिया को अच्छी लगी और न ही बिट्टू और विक्रम को. 2 थप्पड़ों से उस के सीने में धधक रही नफरत की आग ज्वाला बन गई. यह बात तीनों बेटों को नागवार गुजरी कि पिता ने कैसे हाथ उठाया. उन्होंने ठान लिया कि इस का परिणाम उन्हें भुगतना ही होगा. सुनीता जब तक जिंदा रहेगी तब तक उन्हें चैन नहीं मिलेगा.

उस रोज के बाद से तीनों भाइयों के सिर पर खून सवार हो गया. वह पिता, सौतेली मां और उस के दोनों बेटों को मौत के घाट उतारने की योजना बनाने लगे. बिट्टू और विक्रम ने रुपयों का बंदोबस्त कर के आर्म्स सप्लायर वीरेंद्र ठाकुर से 25 हजार रुपए में 2 पिस्टल और कारतूस खरीद लिए. उस के बाद बेटों ने मां को बता कर उसे भी अपनी योजना में शामिल कर लिया. मनतोरिया तो चाहती ही थी कि उस की सौतन सुनीता उस के रास्ते से हट जाए. उस ने बच्चों को डांटने के बजाए उन की पीठ थपथपाई. मां के योजना में शामिल हो जाने से बेटों के हौसले बुलंद हो गए. बिट्टू और रोहित ने साथ देने के लिए खोया गांव में रहने वाले ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह को भी योजना में शामिल कर लिया.

अब वह जल्द से जल्द अपनी योजना को अंजाम देना चाहते थे. आखिर इस के लिए उन्होंने 3 जून, 2018 की रात तय की. योजना को अंजाम देने से पहले तीनों भाइयों ने रात में शराब पी. 3-4 जून, 2018 की रात करीब 12 बजे बिट्टू, विक्रम और रोहित हथियार ले कर अपने पिता रामविलास साह के घर की ओर बढ़े. बिट्टू और विक्रम ने खिड़की से भीतर झांक कर देखा तो रामविलास और सुनीता गहरी नींद में सोए थे. दूसरे कमरे में नवल और राहुल भी सो रहे थे.

बिट्टू और विक्रम के मुख्य शिकार नवल और राहुल ही थे. उन्होंने पहले उन्हीं की हत्या करने की योजना बनाई थी. विक्रम ने खिड़की से ही नवल और राहुल के सीने में 1-1 गोली उतार दी, जबकि बिट्टू ने पिता रामविलास और सौतेली मां सुनीता को गोली मारी, रोहित बाहर खड़ा पहरा दे रहा था. गोली मारने के बाद बिट्टू और विक्रम घर में घुस गए और दोनों ने फलदार चाकू से चारों के गले रेत दिए. इस के बाद इन लोगों ने सीने पर ताबड़तोड़ वार कर अपने आक्रोश को ठंडा किया. जब उन्हें विश्वास हो गया कि चारों के जिस्म ठंडे पड़ गए हैं, तो उन्हें तसल्ली हुई.

इस खूनी खेल को अंजाम देने में उन्हें केवल आधा घंटा लगा. इस के बाद वे अपने घर पहुंचे और खून से सने अपने हाथपैर धोए. फिर मां को बता दिया कि उन्होंने उन चारों को मौत के घाट उतार दिया. अब उन के रास्ते का कांटा सदा के लिए हट गया है. उसी रात उन्होंने अपनी मां को ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह के साथ भेज दिया. वहां से दोनों मनतोरिया को कहां ले गए अब तक पता नहीं चला. 4 जून, 2018 को ही तीन आरोपी गिरफ्तार कर लिए. मनतोरिया कथा लिखने तक पुलिस की गिरफ्त से दूर थी.

पुलिस ने बिट्टू कुमार, विक्रम और रोहित की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल और चाकू भी बरामद कर लिए. इस के अलावा उन्हें पिस्टल और कारतूस उपलब्ध कराने वाले बिट्टू के ममेरे भाई रामकृत साह और सियाराम साह को 6 जून, 2018 को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने तीनों आरोपियों से पूछताछ कर के उन्हें जेल भेज दिया. Family Dispute

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Aligarh Crime: ससुर ही हो दुराचारी फिर कहां जाए बहू बेचारी

Aligarh Crime: बड़े ही धूमधाम से शादी की गई. जब वह ससुराल आई तो उसे ही घर संभालने की जिम्मेदारी दे दी गई. बहू ने सलीके से घर संभाल लिया. पर ससुर की नीयत में खोट आ गई और बन गया बहू की जवानी का प्यासा. यों कहें कि ससुर का दिल बहू की मचलती जवानी पर आ गया और कर बैठा ऐसी हरकत कि बहू का ही नहाते समय का वीडियो बना लिया और करने लगा जिस्मानी संबंध बनाने के लिए ब्लैकमेल. वहीं पति ने भी ससुराल से फोन कर दिया और तलाक दे कर पीछा छुड़ाने में भलाई समझी. अब बहू मायके में रह कर अपना इलाज करा रही है.

यह घटना अलीगढ़ की है जबकि पीड़िता संगम विहार, दिल्ली की है. अलीगढ़ में ससुर ने अपनी बहू से छेड़छाड़ की. बाथरूम में नहाते समय उस का वीडियो बना लिया और उसे ब्लैकमेल करने लगा.

पीड़िता के पुरजोर विरोध करने पर पति व घर के दूसरे सदस्य उसे परेशान करने लगे. सिजेरियन आपरेशन के बाद टांके भी नहीं कटे थे कि उसे बीमार हालत में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ (ससुराल) से संगम विहार, नई दिल्ली (मायके) भिजवा दिया गया.

मायके संगम विहार, दिल्ली में कुछ दिन ही बीते थे कि पति ने फोन कर उसे तलाक दे दिया. इस पर पीड़िता ने संगम विहार थाने में शिकायत दी है और कार्यवाही करने की मांग की है. वहीं वूमन सेल के एसीपी ने बताया कि ससुराल पक्ष को जल्दी ही नोटिस भेज कर बुलाया जाएगा और पुलिस भी कानून सम्मत कार्यवाही करेगी.

पुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने अपना दर्द बयां किया है कि 10 सितंबर, 2017 को उस का निकाह अलीगढ़ के मौलाना आजाद नगर निवासी 23 साला युवक से हुआ था. एक दिन वह घर में खाना बना रही थी. अकेला पा कर ससुर रसोई में घुस आया और छेड़छाड़ करने लगा. जब इस का पुरजोर विरोध किया गया तो ससुर व घर के दूसरे लोगों ने उस की पिटाई की.

7 नवंबर, 2018 को ससुराल वालों ने मच्छर मारने की दवा पिला कर उसे व पेट में पल रहे बच्चे को मारने की कोशिश की. मामला पुलिस तक पहुंचा तो ससुराल वालों ने मौखिक समझौता करा दिया. 23 दिसंबर, 2018 को पीड़िता के कपड़ों में आग लगा दी गई, लेकिन वह किसी तरह बच गई. पुलिस को भी इस की सूचना दी गई थी.

पीड़िता का आरोप है कि 23 दिसंबर, 2018 को वह बाथरूम में नहा रही थी, तभी उस के ससुर ने छिप कर उस का वीडियो बना लिया. फिर वीडियो को इंटरनैट पर वायरल करने की धमकी दे कर संबंध बनाने की कहने लगा.

21 फरवरी, 2019 को पीड़िता ने सिजेरियन आपरेशन से एक बच्चे को जन्म दिया, जिस का खर्च पीड़िता के पिता ने उठाया. उस के टांके कटे भी नहीं थे कि उसे ससुराल अलीगढ़ से बीमार हालत में मायके संगम विहार, दिल्ली भिजवा दिया गया.

पिता ने सफदरजंग अस्पताल में उस का इलाज कराया. 3 अप्रैल की रात 10 बजे पति का फोन आया तो महिला यह सोच कर खुश हो गई कि शायद वह उसे ले जाएगा. लेकिन पति ने कहा कि वह उसे अब नहीं रख सकता, इसलिए उस ने 3 बार तलाक, तलाक, तलाक बोल कर फोन काट दिया. पीड़िता हैरान है कि पति ने भी उसे छोड़ दिया है.

ससुर ने तो रिश्ता तारतार कर ही दिया और पति ने भी आग में घी डालने का काम किया और तलाक दे कर पीछा छुड़ा लिया. ऐसे रिश्ते कितने दिनों तक महफूज रहेंगे और अदालतें भी इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं करती हैं. ससुर तो अपनी करतूतों से बाज नहीं आएगा वहीं पति भी पल्ला झाड़ कर चुप हो गया. पुलिस मामले को सुलझाने के बजाय उलझा ज्यादा देती है. समझौता कराना आसान है पर उसे घर में रह कर निभाना पीड़िता के लिए ज्यादा ही दुखदायी लगा. ऐसे घर में लौटना अब असंभव है. Aligarh Crime

Hindi Stories: गुनाहों की प्रतीमा

Hindi Stories: प्रतिमा ने जिस मौजमस्ती का जीवन जीने के लिए प्रवीण नाईक से शादी की थी, वह सास ऊषा नाईक और जेठानीडा. नेहा नाईक के रहते संभव नहीं था. इस कांटे को दूर करने के लिए उस ने जो किया, वह गुनाहों की प्रतिमा बन गई. पर्यटकों के लिए स्वर्ग कहे जानेवाले गोवा के जिला वास्कोडिगामा शहर से मांगोर हिल जाने वाले रास्ते के बाईं ओर पहाडि़यों से घिरा मायामोले इलाका यहां का अत्यंत पौश इलाका माना जाता है. यहां एक से बढि़या एक मकान, फार्महाऊस और बहुमंजिली इमारतें हैं. पौश इलाका होने की वजह से यहां उच्च और संभ्रांत लोग रहते हैं. इन्हीं में एक परिवार नामदेव नाईक का भी था, जो एक खूबसूरत इमारत के डुप्लेक्स फ्लैट में रहता था.

कुछ दिनों पहले बीमारी की वजह से नामदेव नाईक का निधन हो गया तो उन के पीछे परिवार में पत्नी ऊषा नाईक, 2 बेटे सिद्धार्थ  नाईक, प्रवीण नाईक और उन की बहुएं डा. नेहा नाईक तथा प्रतिमा नाईक रहती थीं. सिद्धार्थ एवं नेहा की 6 महीने की एक बेटी भी थी. परिवार संपन्न और खुशहाल था. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धार्थ नाईक और प्रवीण नाईक, दोनों भाई मर्चेंट नेवी में नौकरी करते थे. नौकरी की वजह से दोनों भाइयों का ज्यादातर समय समुद्र के बीच बीतता था. साल में एक या 2 बार दोनों भाई बारीबारी से छुट्टियां ले कर घर आते थे. उन की अनुपस्थिति में घर की सारी जिम्मेदारियां मां ऊषा नाईक निभाती थीं.

29 जनवरी, 2015 की रात 3, साढ़े 3 बजे जब इमारत के सभी लोग सो रहे थे, तभी दरवाजा पीटने और चीखनेचिल्लाने के शोर से सभी की आंखें खुल गईं. शोर सुन कर घबराए लोग अपनेअपने फ्लैटों का दरवाजा खोल कर बाहर आए तो ऊषा नाईक की छोटी बहू प्रतिमा नाईक को बदहवास हालत में रोतेबिलखते देख कर हैरान रह गए. वह जेठानी की दुधमुंही बच्ची को सीने से चिपटाए जोरजोर से रोते हुए कह रही थी, ‘‘मेरी मदद करो. डाकुओं ने मेरे घर को लूट लिया. मेरी सास और जेठानी को मार डाला. उन्होंने मुझे भी मारापीटा, वे मुझे भी मारना चाहते थे, लेकिन संयोग से मैं बच गई.’’

प्रतिमा नाईक जो कह रही थी, उसे सुन कर इमारत में रहने वालों के होश उड़ गए. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक को साथ ले कर कुछ लोग ऊषा नाईक के फ्लैट पर पहुंचे तो वहां की स्थिति देख कर सभी की आंखें हैरत से फटी की फटी रह गईं. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था. ऊषा की लाश बैडरूम में तो डा. नेहा की लाश उन के बैडरूम में पड़ी थी. लूट और 2-2 हत्याओं का मामला था. अब तक पूरी सोसायटी के लोग एकत्र हो चुके थे. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक ने घटना की सूचना ऊषा के दोनों बेटों, सिद्धार्थ और प्रवीण को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलेस पर प्रसारित की तो थाना वास्कोडिगामा पुलिस को तो घटना की जानकारी हो ही गई थी, इसी के साथ अधिकारियों को भी घटना की जानकारी हो गई थी.

मामला शहर की पौश कालोनी के एक उच्च और सभ्रांत परिवार से जुड़ा था, जिस में 2 लोगों की हत्याएं हो गई थीं, इसलिए सूचना मिलते ही थाना वास्कोडिगामा के सीनियर इंसपेक्टर सागर इकोसकर तुरंत सहायक इंसपेक्टर शैलेष नार्वेकर, संतोष देसाई, उदय परब, रामआसरे, रवि देसाई को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. थाना पुलिस के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही आईजी सुनील गर्ग, पुलिस कमिश्नर शेखर प्रभु देसाई, एडिशनल पुलिस कमिश्नर लौरेस डिसूजा प्रेस फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट ब्यूरो और डाग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस टीम के पहुंचने तक पूरी इमारत के लोग मृतका ऊषा के फ्लैट पर इकट्ठा हो गए थे.

सभी लोग परेशान थे. नाईक परिवार की छोटी बहू प्रतिमा की हालत तो बहुत ज्यादा खराब थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज की चोट लगी थी, जिस से उस के सिर में बड़ा सा गुम्मड़ निकल आया था. पड़ोसी उसे सांत्वना दे कर संभाल रहे थे. वह इस तरह तड़प रही थी, जैसे उसे अंदरूनी चोटें भी लगी थीं. पुलिस ने उसे इलाज के लिए अस्पताल भिजवा दिया और छोटी बच्ची को संभालने के लिए पड़ोसियों के हवाले कर दिया. प्रतिमा को अस्पताल भिजवा कर थाना पुलिस मामले की जांच में जुट गई. अलमारी और शोकेस खुले पड़े थे. उस में रखा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था.

अलमारी का लौकर खाली पड़ा था, इस का मललब उस में रखा सामान गायब था. उस में क्या रखा था, यह बताने वाला उस समय वहां कोई नहीं था. फ्लैट की लौबी के सोफे पर ऊषा नाईक की लाश पड़ी थी. डा. नेहा नाईक की लाश उन के बैडरूम में बेड पर पड़ी थी. लाशों के निरीक्षण से पुलिस को पता चला कि सासबहू की हत्याएं एक ही तरह से की गई थीं. उन के गले में रस्सी डाल कर कस दिया गया था. वह रस्सी भी पुलिस को फ्लैट से मिल गई थी. फर्श पर लालमिर्ची का पाउडर बिखरा था. पुलिस अधिकारियों के साथ आए जासूसी कुत्ते को लाशों को सुंघा कर छोड़ा गया तो पहले वह फ्लैट में ही घूमता रहा. कई चक्कर लगा कर वह फ्लैट से बाहर निकला तो भ्रमित सा हो गया.

इस तरह कुत्ते से पुलिस को कोई मदद नहीं मिल सकी. पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं और थाने आ कर लूट और हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. मामला गंभीर था, इसलिए मामले की जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी इंसपेक्टर सागर इकोसकर ने स्वयं संभाली. शुरुआती जांच में स्पष्ट हो चुका था कि मामला लूटपाट में हत्याओं का था. लूट के लिए लुटेरों ने 2 निर्दोष महिलाओं की हत्या कर दी थी. सोचने की बात यह थी कि अत्यंत सुरक्षित फ्लैट में लुटेरों ने प्रवेश कैसे किया? जांच में फ्लैट के दरवाजों और खिड़कियों के लौक सुरिक्षत पाए गए थे. जिस फ्लैट में वारदात हुई थी, वह ग्राउंड फ्लोर पर था. उस का एक दरवाजा आगे और एक पीछे की ओर था. पीछे वाले दरवाजे की ओर गहरी खाई थी, इसलिए उधर से लुटेरों के आने का कोई चांस नहीं था.

इसी तरह की बातें सागर इकोसकर को परेशान कर रही थीं. उन के दिमाग में जो भी सवाल घूम रहे थे, उन के जवाब परिवार में एकमात्र बची प्रत्यक्षदर्शी प्रतिमा ही दे सकती थी. इसलिए प्राथमिक इलाज के बाद उसे पूछताछ के लिए थाने ले आया गया. इस पूछताछ में प्रतिमा नाईक ने बताया कि इस घर में आए अभी उसे 8 महीने ही हुए हैं. इसलिए इस घर के बारे में उसे ज्यादा कुछ नहीं मालूम. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक अपनी 6 महीने की बेटी के साथ ग्राउंड फ्लोर पर अलगअलग कमरों में सोती थीं. उस का कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था, इसएिल वह फर्स्ट फ्लोर पर सोती थी.

घटना की रात तीनों ने साथसाथ खाना खाया था. खाना खाने के बाद सभी ने एकएक गिलास दूध पिया. उस समय तक रात के साढ़े 9 बज गए थे. सभी लोग बैठे टीवी देख रहे थे, तभी उस की जेठानी की बेटी रोने लगी तो वह प्रतिमा और सास को गुडनाइट कह कर बेटी के साथ सोने चली गईं. डा. नेहा के जाने के बाद प्रतिमा भी फर्स्ट फ्लोर के अपने कमरे में सोने चली गई. ऊषा नाईक काफी देर तक टीवी देखती थीं, इसलिए वह बैठीं टीवी देखती रहीं. रात ढाई बजे के करीब अचानक उस की आंख खुली तो उसे ग्राउंड फ्लोर से उठापटक की आवाजें आती सुनाई दीं. ये कैसी आवाजें हैं, यह जानने के लिए प्रतिमा अपने कमरे से निकल कर नीचे आई तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गई.

4-5 नकाबपोश ऊषा नाईक और डा. नेहा को पकड़ कर उन के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस रहे थे. उन की मदद के लिए प्रतिमा आगे बढ़ी तो नकाबपोशों ने उसे भी पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. लुटेरों में किसी ने उस के सिर पर डंडे से मार दिया, जिस से उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह संभल पाती, लुटेरों ने उस के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. गला कसने से प्रतिमा बेहोश हो गई. इस के बाद घर में क्या हुआ, उसे पता नहीं. यह संयोग था कि वह मरी नहीं. थोड़ी देर बाद उसे होश आया तो उस का सब कुछ खत्म हो चुका था. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा की मौत हो चुकी थी. बच्ची जोरजोर से रो रही थी. प्रतिमा ने उसे उठा कर कर सीने से लगाया और फ्लैट के बाहर आ कर सारी बातें पड़ोसियों को बताईं.

प्रतिमा के बताए अनुसार, घर में लगभग 20 लाख रुपए के गहने थे. नकद के बारे में उसे पता नहीं था. प्रतिमा के बयान के आधार पर सागर इकोसकर ने मामले को अपराध क्रमांक 20/15 पर भादंवि की धारा 449/307/302/201डी, 120बी और 34 के तहत दर्ज कर के अब तक की जांच की जानकारी आईजी सुनील गर्ग और एसपी शेखर प्रभु देसाई को दी. इन अधिकारियों ने सागर इकोसकर को कुछ जरूरी दिशानिर्देश दे कर उन की मदद के लिए साऊथ गोवा के सातों थाने की पुलिस को लगा दिया. सागर इकोसकर ने सहयोगियों के साथ पूरे मामले पर गंभीरता से मंथन किया तो उन्हें जांच में मिले तथ्यों और प्रतिमा के बयानों में काफी अंतर नजर आया. उन के जेहन में कुछ ऐसे सवाल उभर कर आए, जो उन्हें बेचैन करने लगे थे.

पहली बात तो यह थी कि लुटेरे उस फ्लैट के अंदर कैसे पहुंचे? दूसरी बात यह कि अगर लुटेरों ने प्रतिमा की सास और जेठानी को मार दिया था तो प्रतिमा को क्यों छोड़ दिया? तीसरी बात यह कि उन की सुरक्षित अलमारी को बिना किसी तोड़फोड़ के कैसे खोला गया? चौथी सब से अहम बात यह थी कि मृतका ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक ने मरते समय किसी तरह का विरोध क्यों नहीं किया था? जब कि आमतौर पर मरते समय आदमी अपनी जान बचाने के लिए आखिरी समय तक संघर्ष करता है. डा. नेहा नाईक के बैड पर बिछी चादर एकदम ठीकठाक थी. उसी तरह ऊषा नाईक जिस सोफे पर मरी पड़ी थीं, उस सोफे का कवर भी जस का तस था. इस का मतलब यह था कि मरने वालों को मरने से पहले बेहोश किया गया था और ऐसा काम घर का ही कोई कर सकता था.

सभी सवालों पर जब गहराई से विचार किया गया तो शक के दायरे में प्रतिमा आ गई. इस की वजह यह थी कि परिवार में सिर्फ 4 लोग थे, जिन में 2 लोगों को मार दिया गया था. 6 महीने की बच्ची किसी तरह की साजिश कर नहीं सकती थी. अब सिर्फ प्रतिमा बचती थी. लेकिन समस्या यह थी कि मामला एक प्रतिष्ठित परिवार का था, इसलिए सीधे प्रतिमा पर हाथ नहीं डाला जा सकता था. असलियत का पता लगाने के लिए सागर इकोसकर और उन के सहयोगी प्रतिमा के बारे में जानकारी जुटाने में जुट गए. इस के बाद प्रतिमा के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली, वह काफी चौंका देने वाली थी.

सारी जानकारी जुटा कर पुलिस ने प्रतिमा नाईक को दोबारा पूछताछ के लिए थाने बुलाया तो वह पुलिस के एक भी सवाल का सही और संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. पुलिस के सवालों के आगे मजबूर हो कर अंतत: उस ने खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने सास और जेठानी की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी. 27 वर्षीया प्रतिमा जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी थी. गोलमटोल चेहरा, जवानी से भरपूर यौवन, कजरारी आंखों वाली प्रतिमा अपने मातापिता और 3 बहनों के साथ वास्कोवयना के मांगोर हिल स्थित अंबा बाई मंदिर के पास हिल क्रौस्ट इमारत की पहली मंजिल पर रहती थी.

एक साधारण परिवार में पैदा हुई प्रतिमा के सपने बहुत बड़े थे. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, लेकिन वह जिंदगी अमीरों जैसी जीना चाहती थी. प्रतिमा की एक बहन ने 2 साल पहले किसी अमीर घर के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया था और ठाठ से रह रही थी. बहन की ही तरह वह भी प्रेम विवाह कर के ठाठ से जिंदगी जीना चाहती थी. लेकिन वह ससुराल इस तरह की चाहती थी, जहां सिर्फ उस की चले. वह अपनी मनमर्जी की जिंदगी जी सके. उसे कोई रोकनेटोकने वाला न हो. उस का अपना जीवनसाथी भी इस तरह का हो, जो उस की हर इच्छा पूरी कर सके. और यह सब सारे गुण उसे प्रवीण नाईक में दिखाई दिए थे.

9 महीने पहले प्रतिमा ने प्रवीण नाईक को अपने एक दोस्त के यहां पार्टी में देखा तो देखती ही रह गई. सभ्य, सुशील, गोरेचिट्टे, लंबेचौड़े, स्वस्थ, सुंदर प्रवीण नाईक को देख कर प्रतिमा को लगा कि वह जो चाहती है, वह सब कुछ इस आदमी में है. इस के बाद वह उस से जानपहचान बनाने के लिए उस के इर्दगिर्द मंडराने लगी. प्रवीण उस बीच छुट्टी पर आया था और दोस्त के बुलाने पर उस के यहां पार्टी में चला गया था. प्रतिमा का आगेपीछे घूमना प्रवीण को अच्छा लगा. उस के लिए यह एक सुखद अहसास था, जो उसे बहुत अच्छा लगा था. बाद में जब उस के दोस्त ने उन का परिचय कराया तो दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए.

इस के बाद दोनों की मुलाकातें शुरू हुईं तो प्रतिमा ने जल्दी ही प्रवीण को अपनी अदाओं से इस तरह आकर्षित कर लिया कि वह उस की हर बात के लिए राजी रहने लगा. वह उसे अपने घर पर भी ले जाने लगा. प्रतिमा ने प्रवीण का घर और उस की आर्थिक स्थिति को देखा तो वह उस से जल्द ही जल्द शादी करने के बारे में सोचने लगी. क्योंकि शादी के बाद ही प्रवीण का सब कुछ उस का अपना हो सकता था. वह प्रवीण पर विवाह के लिए दबाव बनाने लगी. प्रवीण मां और भाईभाभी से बात करने के बहाने विवाह को कुछ दिनों के लिए टालना चाहता था, लेकिन प्रतिमा इस के लिए तैयार नहीं थी. क्योंकि वह जल्दी से जल्दी प्रवीण की दुलहन बन कर उस की संपत्ति पर राज करना चाहती थी.

आखिर प्रतिमा की जिद के आगे प्रवीण को झुकना पड़ा. उस की मां और भाईभाभी राजी नहीं थे, लेकिन किसी तरह उन्हें मना कर प्रवीण ने प्रतिमा से शादी कर ली. इस तरह प्रवीण की दुलहन बन कर प्रतिमा कामत पैलेस में आ गई. आते ही सब से पहले उस ने अपने घूमनेफिरने के लिए प्रवीण से एक कार खरीदवाई. प्रवीण के पास पैसों की कहां कमी थी. उस ने उस के एक बार कहने पर कार खरीद दी. प्रतिमा के हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उस ने एक काम ऐसा कर डाला कि घर के सभी लोगों की नजरों से वह उतर गई. अपनी जेठानी डा. नेहा के लाखों के गहनों पर प्रतिमा की नजर पड़ी तो अपने विवाह के एक सप्ताह बाद ही जेठानी की अनुमति ले कर वह उस के कमरे में सोने गई तो उसी बीच उन के सारे गहनों पर हाथ साफ कर दिया.

प्रतिमा आजाद खयाल की युवती थी. पति से तोहफे में मिली कार से वह अपने दोस्तों और सहेलियों को अकसर घुमाते हुए पार्टियां दिया करती थी. घर में रहती तो ज्यादातर अपने मोबाइल फोन से चिपकी रहती. यह सब उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक को पसंद नहीं था. डा. नेहा नाईक के गहनों की चोरी का राज खुला तो घर में काफी हंगामा हुआ. प्रतिमा की तरफ अंगुलियां उठीं तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए उस ने जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की. उस के इस नाटक से घर वाले डर गए और अपनी इज्जत की खातिर इस मामले को घर में ही रफादफा कर दिया.

उन गहनों को प्रतिमा पहन तो सकती नहीं थी, इसलिए उस ने उन्हें बेचने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपनी एक सहेली के पति और अपने एक मुंहबोले भाई अभिजीत कोरगांवकर को शामिल किया. जेठानी के सारे गहने उन्हें सौंपते हुए उस ने कहा कि इन्हें बेच कर वे अपने हिस्से का पैसा ले कर उस के हिस्से का पैसा उस के खाते में डाल देंगे. अभिजीत कोरगांवकर वास्कोवयना में रहता था और किसी की कार चलाता था. उस ने वही किया, जैसा प्रतिमा ने उस से कहा था. प्रवीण जब तक घर में रहा, प्रतिमा मौजमस्ती करती रही. प्रवीण के जाते ही प्रतिमा को उस घर में घुटन सी महसूस होने लगी, क्योंकि घर में हुई चोरी की वजह से घर के किसी आदमी को उस पर विश्वास नहीं रह गया था. हर कोई उसे संदेह की नजरों से देखता था.

प्रतिमा की हर हरकत और काम पर उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नजर रखती थीं. उसे कहीं भी आनेजाने, हर किसी से मिलने का हिसाब देना पड़ता था. उसे बताना पड़ता था कि वह कहां, क्यों और किस से मिलने गई थी. प्रतिमा पर लगने वाली यही पाबंदियां ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक के लिए काल बन गईं, क्योंकि सास और जेठानी उस की मौजमस्ती की जिंदगी में बाधा बन गई थीं. एक तो सास और जेठानी की रोजरोज की टोकाटाकी, दूसरे पति से लंबी दूरी उस से सहन नहीं हो रही थी. उसे लगने लगा कि ऐसी जिंदगी से क्या फायदा, जिस की जवानी और शबाब दोनों में घुन लग जाए.

विवाह रुपएपैसे और मौजमस्ती का वास्तविक आनंद क्या होता है? यह सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक के रहते वह नहीं उठा सकती थी. वह ससुराल की धनदौलत पर कब्जा कर के अपने तरीके से मौजमस्ती करने के बारे में सोच रही थी. और यह सब तभी संभव हो सकता था, जब उस के रास्ते से सास और जेठानी हट जाएं. लेकिन वे जल्दी हटने वाली नहीं थीं. इसलिए इस के लिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा. लेकिन वह क्या करे, कैसे करे, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी. वह इन्हीं विचारों में खोई थी कि एक दिन टीवी प्रोग्राम के एक एपीसोड ने उस की सारी समस्या हल कर दी. उस एपीसोड में उस ने जो देखा, वही किया.

घटना की रात प्रतिमा ने सास और जेठानी के साथ खाना खाया. वह उन्हें पीने के लिए जो दूध लाई थी, उस में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिसे पीने के कुछ देर बाद डा. नेहा को नींद आने लगी. वह बेटी को ले कर अपने कमरे में सोने चली गईं. प्रतिमा सास ऊषा नाईक के साथ बैठी टीवी देखती रही. ऊषा नाईक जिस सोफे पर बैठी थीं, टीवी देखतेदेखते उसी पर लुढ़क गईं. उन के लुढ़कते ही प्रतिमा ने उठ कर टीवी बंद कर दिया. घर में सन्नाटा छा गया. प्रतिमा कपड़ा सुखाने वाली नायलौन की रस्सी काट लाई और सास के गले में लपेट कर कस दिया. बेहोशी की हालत में वह मर गईं. इस के बाद वैसा ही जेठानी के साथ किया.

सास और जेठानी की हत्या करने के बाद प्रतिमा ने अलमारी खोल कर उस के लौकर में रखे सारे गहने और नकदी निकाल कर एक कपड़े में बांध दिया. घर में लूट हुई है, यह दिखाने के लिए अलमारी का सारा सामान पूरे कमरे में फैला दिया. डौग स्क्वायड को भ्रमित करने के लिए उस ने कमरे के फर्श पर लालमिर्च पाउडर फैला दिया. अपने हिसाब से हत्या के सारे सबूतों को मिटा कर के वह आराम करने के लिए लेट गई. रात लगभग 2 बजे प्रतिमा ने अभिजीत कोरगांवकर को फोन कर के सारी बात बताई और उसे घर के पास बुलाया. वह आया तो उस ने गहनों और नकदी की पोटली उसे दे कर वापस भेज दिया.

अभिजीत के जाने के बाद प्रतिमा ने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए अपने सिर पर एक भारी लकड़ी से जोर से प्रहार किया, जिस से उस के सिर पर गुम्मड़ निकल आया. गले पर नायलौन की रस्सी लपेट कर ऐसा निशान बनाया कि पुलिस का ध्यान लुटेरों की ओर चला जाए. अपने बचने की पूरी तैयारी करने के बाद उस ने मृतका डा. नेहा की बेटी को सीने से लगा कर जो किया, वह आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. प्रतिमा नाईक से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर इकोसकर ने 3 फरवरी, 2015 को अभिजीत कोरगांवकर को भी गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर 10 लाख रुपए कीमत के गहने और नकदी बरामद कर ली.

उस ज्वैलर्स को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जिस ने 8 महीने पहले अभिजीत कोरगांवकर से प्रतिमा द्वारा दिए गए गहनों को खरीदा था. सारे सबूत जुटा कर सभी को मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रतिमा और अभिजीत जेल में थे. पुलिस मामले की जांच कर रही थी. पुलिस को शक है कि नाईक परिवार में हुई हत्याओं और लूट में प्रतिमा अकेली नहीं थी. उस ने पुलिस को गुमराह किया है, उस रात उस के साथ फ्लैट में जरूर कोई और था, वह उस का मुंहबोला भाई भी हो सकता है. लेकिन जांच पूरी हुए बगैर इस बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Punjab Crime: संत का खूनी कारनामा

Punjab Crime: संत से शादी करने के लिए जसपाल कौर को दशमेश से तलाक लेना पड़ता जबकि दशमेश तलाक देने वाला नहीं था. इस समस्या से निजात पाने के लिए संत ने जो खूनी साजिश रची, उस का परिणाम क्या निकला?

पंजाब के जिला लुधियाना के गांव सिंघवाला खुर्द के रहने वाले दशमेश सिंह के पिता का नाम बलवान सिंह तो मां का सुरजीत कौर था. उस के 5 भाई भगवंत, निरवैर, अशोकजीत, मनोरजीत और सुरिंदरजीत सिंह के अलावा एकलौती बहन कुलदीप कौर थी. इन में दशमेश चौथे नंबर पर था. बलवान सिंह खेतीबाड़ी करते थे. थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के उन के सभी बेटे खेतीबाड़ी के काम में उन का हाथ बंटाने लगे थे. लेकिन कुछ दिनों बाद निरवैर, दशमेश और मनोरजीत को खेतीकिसानी का यह काम अच्छा नहीं लगा तो निरवैर जहां फौज में भरती हो गया, वहीं दशमेश और मनोरजीत समयसमय पर विदेश चले गए.

विदेश जाने से पहले ही दशमेश की शादी गांव कुंभड़ाखुर्द के रहने वाले परमल सिंह की बेटी जसपाल कौर से हो गई थी, जिस से वह 3 बच्चों का बाप बना. दशमेश की शादी के समय एक मजेदार घटना यह घटी थी कि बलवान सिंह गए तो थे अपने बड़े बेटे भगवंत सिंह के लिए लड़की देखने. लेकिन उसी समय उन्हें 2 लड़कियां और पसंद आ गई थीं, जो भगवंत की होने वाली ससुराल में रिश्तेदारी में आई थीं. दोनों सगी बहनें थीं और उन के नाम थे सतविंदर कौर और जसपाल कौर. भगवंत सिंह की शादी वाले दिन ही इन दोनों बहनों का भी बलवान सिंह के 2 बेटों, निरवैर सिंह और दशमेश सिंह से ब्याह हो गया था. इस तरह एक ही दिन बलवान सिंह के 3 बेटों की एक साथ शादियां हो गई थीं, जिस की गांवों में खूब चर्चा हुई थी.

निरवैर सिंह शादी से पहले ही फौज में भरती हो गया था, इस के बाद दशमेश ने भी कुछ दिनों तक सेना की नौकरी की. लेकिन अचानक सेना की नौकरी छोड़ कर वह ग्रीस चला गया, जहां 2 सालों तक रहा. ग्रीस से लौट कर साल भर घर पर रहा. उस के बाद वह फिर ग्रीस चला गया. इस बार वह 3 सालों बाद लौटा. कुछ महीने गांव में रहने के बाद बाद वह जर्मनी चला गया, जहां से पत्नी के बारबार बुलाने के बावजूद वह पूरे 8 सालों बाद लौटा. घर लौटने के कुछ दिनों बाद ही थाना खरड़ के अंतर्गत आने वाले एक पोखर में उस की लाश पड़ी मिली. दशमेश की लाश सब से पहले गांव वडाली के रहने वाले राजकुमार ने उस पोखर में औंधे मुंह पड़ी देखी थी.

लाश पर कपड़ों के नाम पर एकमात्र अंडरवीयर था. वह काफी सड़गल चुकी थी. लाश से उठने वाली दुर्गंध ने ही राजकुमार को अपनी ओर आकर्षित किया था. दुर्गंध की वजह से ही वह पोखर के पास गया था,तब उसे लाश दिखाई दी थी. पोखर में लाश पड़ी होने की सूचना पा कर थोड़ी ही देर में पुलिस उपाधीक्षक एच.पी. सिंह थानाप्रभारी सुरजीत सिंह के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. घटनास्थल पर लाश के पास ही पुलिस को पौलीथिन की एक छोटी थैली में एक पत्र मिला था. पत्र में जो लिखा था, उस के अनुसार वह मृतक का सुसाइड नोट लग रहा था. पत्र में लिखे अनुसार, दशमेश सिंह ने घरेलू कारणों से आत्महत्या की थी, जिस का जिम्मेदार उस ने स्वयं को ठहराया था.

इस के अलावा पुलिस को अन्य कोई सूत्र नहीं मिला था. पुलिस ने मौके की आवश्यक काररवाई करने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद थानाप्रभारी सुरजीत सिंह ने मृतक दशमेश सिंह के पिता बलवान सिंह से पूछताछ की तो उस समय उन्होंने केवल इतना ही कहा कि मरने वाला उन का बेटा दशमेश सिंह था, जो विदेश में रहता था. घर में ऐसी कोई परेशानी वाली बात नहीं थी, जिस से वह आत्महत्या जैसा संगीन कदम उठाता. जबकि सुरजीत सिंह को मामला आत्महत्या का ही लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. इस की एक वजह यह भी थी कि कुछ महीने पहले इस परिवार में आत्महत्या की एक और घटना घट चुकी थी.

दरअसल, दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह ने भी कुछ महीने पहले आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह एक बताए न जा सकने वाले कारण की वजह से आत्महत्या कर रहा है. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस यह मान कर चल रही थी कि परिवार में इस तरह की मानसिक प्रवृत्ति बन चुकी है. उसी मानसिक प्रवृत्ति की वजह से दशमेश ने भी आत्महत्या की है. यही सोच कर पुलिस मामले की जांच करने के बजाय शांत हो कर बैठ गई.

बेटे की अंतिम क्रियाओं से फारिग हो कर बलवान सिंह थाना खरड़ पहुंचे और पुलिस से कहा कि दशमेश ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि गहरी साजिश के तहत उसे मार डाला गया है. स्थानीय पुलिस ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया तो वह एसएसपी साहब से मिले. उन्होंने बलवान सिंह की बातों को गौर से सुना और मामले की फाइल सुरजीत सिंह से ले कर सीआईए के इंसपेक्टर को सौंप दी. 2 सप्ताह की गहन छानबीन के बाद सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी जो रिपोर्ट एसएसपी साहब को सौंपी, उस के अनुसार दशमेश सिंह की साजिश के तहत हत्या की गई थी. रिपोर्ट में साजिश के लिए जिन 2 लोगों को दोषी ठहराया गया था, उन में एक उस क्षेत्र का बहुत ही सम्मानित एवं पूज्यनीय व्यक्ति था.

उस पर हाथ डालने से आसपास के गांवों के हजारों लोग पुलिस के खिलाफ खड़े हो सकते थे. उसी बीच सुरजीत सिंह का तबादला कर के इंसपेक्टर दीदार सिंह को खरड़ थाने का थानाप्रभारी बना दिया गया. उन के चार्ज संभालने के 3 दिनों बाद एसएसपी ने उन्हें अपने निवास पर बुला कर इस मामले की फाइल उन्हें सौंपते हुए कहा, ‘‘दीदार सिंह, इस मामले की गुप्तरूप से छानबीन कर के 2 हफ्तों में मुझे अपनी रिपोर्ट दो.’’

दीदार सिंह को फाइल देने से पहले एसएसपी साहब ने फाइल से सीआईए इंसपेक्टर की रिपोर्ट निकाल कर अपने पास रख ली थी.

दीदार सिंह ने फाइल संभालते हुए कहा, ‘‘जी सर, मैं पूरी छानबीन कर के निश्चित अवधि में अपनी रिपोर्ट अवश्य दे दूंगा.’’

इस के बाद एसएसपी साहब को सैल्यूट कर के वह कैंप औफिस से बाहर निकल आए.  थाने लौट कर उन्होंने फाइल का गहन अध्ययन किया. इस के बाद एएसआई गुरबख्श सिंह और एएसआई इकबाल सिंह की मदद से इस मामले की जांच में जुट गए. ठीक 11 दिनों बाद रिपोर्ट तैयार कर के उन्होंने एसएसपी साहब के सामने रख दी. दीदार सिंह की रिपोर्ट में भी दशमेश की आत्महत्या को हत्या करार देते हुए उन्हीं 2 लोगों पर शक जाहिर किया गया था, जिन का उल्लेख सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में किया था.

रिपोर्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद एसएसपी साहब ने कहा, ‘‘दीदार सिंह, कल सुबह दशमेश के घर के किसी सदस्य को बुला कर उस का बयान दर्ज करो. उस के बाद जिला अटौर्नी की राय ले कर एफआईआर दर्ज करो. उस के बाद जरूरी काररवाई करो.’’

दीदार सिंह ने दशमेश के यहां संदेश भेजा तो बलवान सिंह अपने बेटे अशोकजीत के साथ थाने आ पहुंचे. उन्होंने अशोकजीत से तहरीर ले कर संदिग्ध लोगों के नामपते लिख कर अपनी संस्तुति के साथ वह तहरीर डीएसपी के माध्यम से जिला न्यायवादी के पास भिजवा दी. अगले ही दिन सहायक जिला न्यायवादी ज्ञानचंद ने इस पर टिप्पणी लिख कर भिजवा दिया कि इस मामले में भादंवि की धारा 302/34 के तहत प्राथमिकी दर्ज कर के छानबीन की जा सकती है. फिर क्या था, थाना खरड़ में दशमेश सिंह की हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया. खरड़ थाना पुलिस ने हत्या का यह मामला जिन 2 लोगों के खिलाफ दर्ज किया था, उन में एक तो थी दशमेश सिंह की विधवा जसपाल कौर और दूसरा था उस इलाके का जानामाना संत इंदरजीत सिंह.

जैसे ही दोनों को मुकदमा दर्ज होने का पता चला था, वे भूमिगत हो गए थे. उन की तलाश में दीदार सिंह ने अनेक संभावित स्थानों पर छापे मारे, लेकिन दोनों ही उन के हाथ नहीं लगे, लेकिन इस से वे निराश नहीं हुए और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास करते रहे. अंतत: उन की कोशिश कामयाब हो ही गई. गांव ध्यानपुर के सरपंच पाला सिंह ने दोनों वांछित अभियुक्तों जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह को ला कर थानाप्रभारी दीदार सिंह के सामने पेश कर दिया. दरअसल जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह पुलिसिया काररवाई से घबरा कर पाला सिंह की शरण में पहुंच गए थे. पाला सिंह के सामने दोनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस की मारपीट से बचा लेने की गुहार की थी.

इस के बाद पाला सिंह दोनों को समझाबुझा कर थाने ले आए थे तब बयान दर्ज कर के पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को विधिवत गिरफ्तार कर अलगअलग हवालातों में बंद कर दिया था. अगले दिन दोनों को खरड़ के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी एच.एस. मदान की अदालत में पेश कर के थाना खरड़ पुलिस ने पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. दीदार सिंह द्वारा की गई पूछताछ में इन लोगों ने जो कुछ बताया, उस से ढोंगी संत के घिनौने आपराधिक सिलसिले की एक ऐसी अमानवीय सनसनीखेज कहानी सामने आई, जो औरों के लिए एक सीख बन सकती है.

शादी के बाद सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. दशमेश सिंह अपनी पत्नी से खुश था तो जसपाल कौर को भी पति से कोई शिकायत नहीं थी. समयसमय पर उस ने 3 बच्चों को जन्म दिया. इस के बावजूद उस की सुंदरता में कोई कमी नहीं आई. जसपाल कौर जहां संतोषी युवती थी, वहीं दशमेश बहुत ज्यादा महत्त्वाकांक्षी था. उस पर हमेशा जिंदगी में आगे बढ़ने और अधिकाधिक पैसा कमाने की धुन सवार रहती थी. इस के लिए वह तरहतरह की योजनाएं बनाता रहता था. उन्हीं में से एक योजना यह भी थी कि बारबार भारत लौटने के बजाय कई सालों तक विदेश में रह कर ढेरों रुपया पत्नी को भेजता रहे, ताकि जब वह लौटे तो उसे फिर से विदेश जाने की जरूरत न पड़े.

उस ने यही किया भी. विदेश में लंबे समय तक रह कर वह भले ही घर नहीं आया था, लेकिन रुपए उसने इस कद्र भेजे थे कि उस के परिवार ने कल्पना नहीं की थी. पैसा भले ही खूब आ रहा था, लेकिन पति के बिना जसपाल कौर को सब सूना लगता था. उस ने 2 साल तो जैसेतैसे काट लिए, लेकिन उस के बाद उस का समय काटे नहीं कटता था. दशमेश को वह हर हफ्ते चिट्ठी लिखती और उस से वापस आने का आग्रह करती. दूसरी ओर दशमेश पर अधिक से अधिक पैसा कमाने की धुन सवार थी. इसलिए उस ने पत्नी की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद पत्नी की आहत भावनाओं की जैसे उसे जरा भी चिंता नहीं थी.

इस के बाद पति के विछोह में या अन्य किसी वजह से जसपाल कौर बीमार रहने लगी. गांव के डाक्टरों से ले कर लुधियाना के बड़े डाक्टरों तक से उस का इलाज कराया गया, लेकिन किसी की समझ में उस की बीमारी नहीं आई. जसपाल कौर की बड़ी बहन सतविंदर कौर, जो उस की जेठानी भी थी, ने अपने फौजी पति से कह कर गांव में ही अलग मकान ले लिया था, क्योंकि परिवार के साथ रहना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. छोटी बहन की बीमारी से वह भी परेशान थी.

एक दिन सतविंदर कौर ने जसपाल को अपने घर बुला कर कहा, ‘‘कुल्हैड़ गांव में एक संतजी हैं. वह किसी भी बीमारी का इलाज चुटकियों में कर देते हैं. बहुत पहुंचे हुए महात्मा हैं. अपनी समस्याएं ले कर दूरदूर से लोग उन के पास आते हैं और संतजी उन की परेशानियां चुटकी बजा कर दूर कर देते हैं.’’

‘‘दीदी, यह सब फालतू की बातें हैं.’’ जसपाल ने कहा.

‘‘इसीलिए तो मैं ने आज तक तुम से इस बारे में कोई बात नहीं की. पता नहीं तुम खुद को क्या समझती हो.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है दीदी.’’

‘‘यह बात नहीं, वह बात नहीं. इतने डाक्टरों से इलाज करवा लिया, क्या हुआ, हो गई ठीक?’’

‘‘चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में दिखाने जाऊंगी. देखो, वहां के डाक्टर क्या कहते हैं.’’

‘‘कुछ नहीं कहेंगे, फालतू के टैस्ट कर के तेरा सत्यानाश कर देंगे. ऐसे ही मर जाएगी एक दिन तू.’’ सतविंदर ने बहन को डांटते हुए कहा, ‘‘अच्छा, एक बात बता, कभी मुझे बीमार होते देखा है? मेरी मान, किसी दिन मेरे साथ संतजी के पास चल. एक हफ्ते में तू भलीचंगी न हो जाए तो कहना.’’

‘‘जिस बीमारी का इलाज डाक्टर नहीं कर सके दीदी, भला एक संत उस का इलाज क्या करेगा? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा.’’

‘‘समझने की जरूरत भी नहीं है,’’ सतविंदर ने कहा, ‘‘आज तक किसी डाक्टर ने तुम्हें तुम्हारी बीमारी के बारे में बताया है? दरअसल तुम्हें कोई बीमारीवीमारी नहीं है. किसी ने कुछ कर करा दिया है. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि संतजी तुम्हें हफ्ते भर में भलीचंगी कर देंगे.’’

इस के बाद जसपाल कौर बहन सतविंदर कौर के साथ संतजी के यहां जा पहुंची थी.

संत का इतिहास कुछ इस तरह से था. एक बार दसवीं में फेल होने के बाद इंदरजीत सिंह ने पढ़ाई को तिलांजलि दे दी और गुरुद्वारा में जा कर पूजापाठ करने लगा. उस की इस पूजापाठ से गांव वाले उस की इज्जत करने लगे. इस से प्रेरित हो कर वह इस दिशा में और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा. उसी बीच एक ऐसी घटना घटी कि उस की इज्जत एकदम से बढ़ गई.

गांव की परमजीत कौर को दौरे पड़ते थे. एक दिन वह गुरुद्वारा में मत्था टेकने आई तो इंदरजीत ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बीमारी के लिए दवा तैयार कर रहा हूं. वाहेगुरु ने चाहा तो उस दवा से ठीक हो जाओगी.’’

इंदरजीत देसी दवा बनाने के नुस्खे वाली किताबें पढ़ा करता था. उन्हीं नुस्खों पर दवा तैयार कर के उस ने परमजीत कौर को दी. मनोवैज्ञानिक प्रभाव था या अन्य कोई वजह, संयोग से कुछ ही दिनों में परमजीत बिलकुल ठीक हो गई. इसी तरह के कुछ और मामले इंदरजीत ने सुलझाए तो गांव में उस का रुतबा बढ़ गया. इस के बाद वह कहने लगा कि उस ने अपनी अलौकिक शक्ति से ये कारगर दवाएं तैयार की थीं. इसी वजह से गांव में सब उसे सम्मान की दृष्टि से देखने लगे. लोग अब उसे संतजी कह कर बुलाने लगे.

धीरेधीरे संत इंदरजीत की शोहरत आसपास के इलाकों में फैल गई. अनुभव के आधार पर संत इंदरजीत की देसी दवाओं और जड़ीबूटियों की काफी जानकारी हो गई थी. आशीर्वाद लेने और अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए आने वाले लोगों के अलावा लड़कियां और महिलाओं की एक ऐसी संख्या थी, जो जरा सी बीमारी के लिए भी दवा लेने उस के पास चली आती थीं. उन्हीं में एक सतविंदर कौर भी थी. वह संतजी से काफी प्रभावित थी. यही वजह थी कि वह अपनी छोटी बहन जसपाल कौर को भी समझाबुझा कर उस के पास ले आई थी. जसपाल कौर में ऐसा न जाने क्या था कि पहली ही नजर में वह संत इंदरजीत को भा गई थी. उसे लगा कि शायद यह उसी के लिए बनी है.

जसपाल कौर भी संत के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुई थी. पति से सालों से दूर रह रही जसपाल को भी संत भा गया था. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे. फिर तो पहली नजर के इस प्यार ने उन के भीतर इस कदर कशिश बढ़ा दी कि दोनों 2-4 दिनों के अंतर से मिलने लगे. जसपाल न आ पाती तो इंदरजीत खुद उस के गांव पहुंच जाता. चाहत बढ़ी तो जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. इस के बाद जसपाल की हर बीमारी उड़नछू हो गई. जसपाल के बताए अनुसार, संतजी के आगोश में आने के बाद वह पूरी दुनिया भूल गई थी. संत का सभी आदर करते थे. उस की तरफ अंगुली उठाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. जसपाल कौर को ले कर जब उस की सच्चाई लोगों के सामने आने लगी तो पहले लोगों ने दबी जुबान में, फिर खुल कर इस मामले पर चर्चा करने लगे.

कुछ लोगों ने इस की चर्चा बलवान सिंह से भी की. बलवान सिंह ने इस बात को गंभीरता से लिया और जसपाल कौर को समझाना चाहा तो उस ने उन का घर छोड़ दिया और बड़ी बहन सतविंदर के साथ रहने लगी. बच्चों को भी वह अपने साथ नहीं लाई. बलवान सिंह गांव में अपनी रुसवाई नहीं करवाना चाहते थे, साथ ही विदेश में रह रहे बेटे को भी इस बारे में बता कर परेशान नहीं करना चाहते थे. लिहाजा वह जितना चुप रहे, जसपाल उतनी ही बागी होती गई.

फलस्वरूप तथाकथित संत इंदरजीत के प्रति लोगों के मन में गुस्सा पैदा होने लगा. जब यह गुस्सा बढ़ने लगा तो गांव में टिके रहना संत को खतरे से खाली नहीं लगा. उसे लगने लगा कि जसपाल के साथ उस के संबंधों को ले कर गांव में कभी भी विस्फोट हो सकता है, जो उन दोनों के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है. यह सब सोच कर एक रात संत इंदरजीत ने गांव छोड़ दिया और खरड़ के नजदीकी गांव छिन्नाहर्षा में जा कर रहने लगा. जल्दी ही संत ने यहां भी अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली. जसपाल कौर भी उस के साथ थी. अब तक जसपाल की ससुराल वालों ने उस की तरफ से मुंह मोड़ लिया था. सब ने तय कर लिया था कि दशमेश के स्वदेश लौटते ही उस से जसपाल को तलाक दिलवा दिया जाएगा.

लेकिन दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह को अपनी भाभी के इस गलत दिशा में उठे कदम काफी दुखी किया था. यह बात उस से बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस के बारे में सोचसोच कर उस का मन अवसाद से भर जाता था. एक दिन वह छिन्नाहर्षा स्थित संत के डेरे पर गया. जसपाल कौर और संत इंदरजीत बैठे बातें कर रहे थे. संत को नजरअंदाज कर के सुरिंदर ने जसपाल कौर के पैरों को छू कर कहा, ‘‘भाभी, मैं ने तुम्हें हमेशा मां के रूप में देखा है. मैं तुम से यह कहने आया हूं कि इस संत को छोड़ कर अपनी दुनिया में लौट चलो.’’

‘‘तुम अपने घर जाओ सुरिंदर, अब यही मेरी दुनिया है.’’ जसपाल कौर ने दो टूक जवाब दिया.

‘‘भाभी, तुम मुझ से ज्यादा समझदार हो. इस बात को तुम मुझ से बेहतर जानती हो कि औरत की जन्नत उस के पति का घर होती है.’’

‘‘देखो सुरिंदर, फालतू बातें करने की जरूरत नहीं है. मैं यहां खुश नहीं, बहुत ज्यादा खुश हूं. अब मुझे तुम लोगों से कुछ लेनादेना नहीं है.’’ जसपाल कौर झुंझला कर बोली.

‘‘क्या भैया से भी नहीं?’’ सुरिंदर ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘मुझ से और अपने बच्चों से भी तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है?’’

‘‘नहीं, तुम सब लोग मेरे लिए मर चुके हो.’’

‘‘भाभी, अगर ऐसा है तो तुम एक बात सुन लो, अगर तुम कल तक घर नहीं लौटी तो तुम्हारा यह देवर अपनी जान दे देगा.’’

‘‘अरे कल का इंतजार क्यों, आज ही अपनी जान दे दो. तुम जियो या मरो, मुझे कोई परवाह नहीं है. मेरे पास दुनिया का हर सुख है.’’ जसपाल कौर ने कहा.

देवरभाभी की इस बातचीत में संत इंदरजीत कुछ नहीं बोला. वह चुपचाप मंदमंद मुसकराता रहा. अगली रात सुरिंदर ने बहुत ज्यादा शराब पी कर आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह आत्महत्या का कारण नहीं बता सकता. इस तरह यह मामला रफादफा हो गया था. क्योंकि किसी ने गहराई में जाने की कोशिश ही नहीं की थी. दशमेश को भी यही सूचना भेजी गई थी कि ज्यादा शराब पीने की वजह से सुरिंदर भगवान को प्यारा हो गया था. देखतेदेखते 6 महीने का समय बीत गया. संत इंदरजीत और जसपाल कौर का लगाव धीरेधीरे इतना गहरा हो गया कि लोगों का मुंह बंद करने के लिए उन्होंने शादी करने का मन बना लिया.

इस के लिए जरूरी था कि जसपाल कौर दशमेश से तलाक ले, जिस के लिए शायद वह किसी भी कीमत पर राजी न होता. इसी बात के हल के लिए संत ने मन ही मन खतरनाक योजना बना डाली. इस के बाद उस ने जसपाल से कहा, ‘‘तुम दशमेश को किसी तरह यहां बुलाओ. मैं कुछ इस तरीके से उस का पत्ता साफ करूंगा कि किसी को हम पर जरा भी शक नहीं होगा.’’

‘‘जैसा आप कहेंगे संतजी, मैं वैसा ही करूंगी. मैं दशमेश को बुलाने की कोशिश करती हूं.’’

संत के निर्देशानुसार जसपाल ने दशमेश को लगातार कई पत्र लिखे और फोन किए. इस पर भी दशमेश आने को राजी नहीं हुआ तो उस ने धमकी देते हुए कहा कि अगर अब वह वापस नहीं आया तो वह उसे छोड़ कर किसी और के साथ घर बसा लेगी. आशा के अनुरूप दशमेश भारत लौट आया. गांव पहुंचने पर पत्नी की करतूतों के बारे में पता चला तो वह गुस्से में भरा संत इंदरजीत के डेरे पर जा पहुंचा. लेकिन संत ने उसे अपनी वाणी और शब्दजाल से ऐसा संतुष्ट किया कि उस का गुस्सा शांत हो गया. इस के बाद संत ने कोई बूटी घोल कर शरबत तैयार किया और उसे दशमेश को प्रेम से पिला दिया. उस के पीने के बाद वह उठनेबैठने और चलनेफिरने लायक नहीं रहा.

इस के बाद संत और जसपाल ने चारों तरफ यह बात फैला दी कि दशमेश भी संत का पक्का शिष्य बन गया है. संत ने क्षेत्र के अपने भक्तों में अपना ऐसा प्रभुत्व स्थापित कर लिया था कि उस की प्रचारित अफवाह पर सब ने यकीन कर लिया. अगर जसपाल कौर का मामला दरकिनार कर दिया जाए तो संत इंदरजीत अपने भक्तों के लिए किसी अवतार से कम नहीं था. अपने इसी प्रभाव का फायदा उठाते हुए एक रात संत इंदरजीत ने दशमेश को सल्फास घुली शराब पिला कर मौत की नींद सुला दिया और आधी रात के बाद जसपाल की मदद से उस की लाश को गांव वडाली को जाने वाले रास्ते पर स्थित एक पोखर में फेंक दिया.

लाश फेंकने से पहले उन्होंने दशमेश के शरीर पर अंडरवियर छोड़ कर उस के सारे कपड़े उतार लिए थे और खुद को बचाने के लिए उसी के साथ संत ने खुद की लिखावट बदल कर दशमेश की ओर से सुसाइड नोट भी लिख कर वहां छोड़ दिया था. संत इंदरजीत और जसपाल कौर अपराधी प्रवृत्ति के तो थे नहीं, जिस्मानी भूख मिटाने के चक्कर में बिना कुछ सोचेसमझे यह अपराध कर बैठे थे. शायद यही वजह थी कि बचने की तमाम कोशिश करने के बावजूद वे फंस गए थे. संत की करतूत जब उस के भक्तों के सामने आई तो सभी ने नफरत से उस की ओर से मुंह मोड़ लिया. दशमेश के कपड़े आदि बरामद करने के लिए जिस दिन पुलिस संत को ले कर छिन्नाहर्षा स्थित उस के आश्रम पहुंची, हजारों लोगों ने उस के विरुद्ध नारे लगाए और पुलिस प्रशासन से उसे और जसपाल कौर को फांसी दिलवाने की मांग की.

संत और जसपाल कौर को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था. दोनों का कहना था कि उन्हें सजा हो भी गई तो सजा के बाद वे दोनों बाहर आएंगे तो पतिपत्नी की तरह साथसाथ रहेंगे. रिमांड अवधि समाप्त होने पर थाना खरड़ पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें पटियाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया. पुलिस ने समय पर दोनों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश कर दिया.  रोपड़ की अदालत में 3 साल केस चला. माननीय सेशन जज ने संत इंदरजीत और जसपाल कौर को दशमेश सिंह की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे दोनों पटियाला की जेल में भुगत रहे हैं.

बहरहाल, यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज पारंपरिक आस्थाओं और धर्मों से हट कर पाखंड और प्रपंच से ओतप्रोत एक ऐसी आडंबरी दुनिया रच दी गई है, जिस के स्वयंभू भगवान बन बैठे हैं. इस के संचालक अपने छल से न केवल लोगों को ठगते हैं, बल्कि उन्हें अपराध करना भी सिखाते हैं और खुद भी अपराध की राह पर चलने से नहीं कतराते. आज बहुत जरूरी है कि ऐसे ढोंगी संतोंबाबाओं की कुदृष्टि से समाज को बचाने में कोई कसर न छोड़ी जाए. Punjab Crime

 

Hindi Stories: खून सने इश्क की टेढीं राहें

Hindi Stories: तेजिंदर और हिम्मत सिंह को पतिपत्नी के रूप में देख कर एक वरिष्ठ वकील होते हुए भी मैं चकरा गया, इस की वजह यह थी कि उस ने हिम्मत और उस के जीजा को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली थी. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की अदालतों में मैं ने 50 हजार से भी अधिक क्रिमिनल मुकदमे लड़े हैं. इन में कुछ ऐसे भी मुकदमे थे, जिन की चर्चा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी.

आज मैं जिस मुकदमे की बात करने जा रहा हूं, उस तरह का रोचक और अनूठा मुकदमा मेरे पास दोबारा नहीं आया. अपनी तरह का वह एक ऐसा अनोखा मुकदमा था, जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया. वह इतवार का दिन था. 6 दिनों के काम की थकान उतारने को मैं बिस्तर पर अधलेटा चाय की चुस्कियां लेते हुए टीवी देख रहा था. उस समय दिन के साढ़े 11 बज रहे थे. घर के किसी सदस्य ने आ कर बताया कि मुझ से मिलने के लिए हिम्मत सिंह नाम का कोई आदमी कोठी के गेट पर खड़ा है. हिम्मत एक कत्ल के मुकदमे में फंसा था, जिस की पैरवी मैं ने की थी. उस मुकदमे में वह बरी हो गया था. मुझे तुरंत वह सब याद आ गया. लगा, शुक्रिया अदा करने आया होगा. मैं ने उसे भीतर बुला कर ड्राइंगरूम में बैठाने के लिए कह दिया.

कुछ देर बाद मैं सहज रूप से ड्राइंगरूम में पहुंचा तो वहां का दृश्य चौंकाने वाला था. मेरे ठीक सामने वाले सोफे पर तेजिंदर शादी के लाल सुर्ख जोड़े में बैठी थी और उस की बगल में हिम्मत सिंह बैठा था. वह भी खूब बनठन कर आया था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों ने शादी कर ली है. हिम्मत सिंह के हाथ में बड़ा सा मिठाई का डिब्बा था. उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उस के साथ बैठी औरत उस की पत्नी है. इस का मतलब तेजिंदर ने उस से शादी कर ली थी.

मेरे लिए यह अविश्वसनीय एवं विचित्र बात थी. मैं असमंजस में फंस गया था. इसलिए बिना किसी संबोधन के मैं ने सीधे पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’

हिम्मत सिंह के बजाय जवाब तेजिंदर ने दिया, ‘‘जी हां वकील साहब, कल हम ने शादी कर ली. आज आप से आशीर्वाद लेने आए हैं. आप बहुत ही नेक इंसान हैं. आप हम दोनों को हमेशा सुखी रहने का आशीर्वाद दीजिए. मेरी जीत में आप का बहुत बड़ा योगदान है.’’

‘‘सचमुच तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ मैं ने हिम्मत सिंह की ओर देखते हुए वही सवाल इस तरह दोबारा किया, जैसे तेजिंदर की बात पर मुझे विश्वास न हुआ हो.

तेजिंदर मेरी बात का आशय शायद समझ गई, इसलिए फटाक से बोली, ‘‘जी वकील साहब, मैं ने हिम्मत से सचमुच शादी कर ली है.’’

मुझ से रहा नहीं गया. आशीर्वाद की बात भूल कर मैं ने हिम्मत से पूछा, ‘‘क्यों भई, तुम ने उसी से शादी कर ली, जिस ने तुम्हें फांसी पर चढ़वाने का पूरा इंतजाम कर दिया था? यह सब क्या रहस्य है, मेरी कुछ समझ में नहीं आया?’’

‘‘इस के बारे में तो मैं यही कह सकता हूं वकील साहब कि औरत को समझ पाना दुनिया में किसी के वश का नहीं है. तेजिंदर ने न केवल मुझे फांसी के फंदे से बचाया, बल्कि अपने प्यार के फर्ज को निभाते हुए मेरा उजड़ा हुआ घर भी बसा दिया.’’ हिम्मत ने तेजिंदर की ओर देखते हुए कहा. हिम्मत की यह बात मुझे और ज्यादा हैरान करने वाली लगी. इतने दिनों से वकालत के पेशे में रहने के बावजूद मैं उस की बातों का एकदम से कोई मतलब नहीं निकाल सका. फिलहाल मैं ने दोनों को आशीर्वाद दे कर विदा कर दिया. उन के जाने के बाद मैं उन के बारे में गहराई से सोचने लगा.

लुधियाना की तहसील खन्ना में अपने पति बलवान सिंह के साथ रहती थी तेजिंदर कौर. जब वह मेरे पास आई थी तो उस पर 2 साथियों के साथ मिल कर अपने पति का कत्ल करने का आरोप था. उस समय उस ने मुझे जो बताया था, वह सब कुछ इस तरह था. तेजिंदर का पति बलवान सिंह खन्ना के किसी सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह सीधासादा आदमी था. तेजिंदर को पत्नी के रूप में पा कर वह जितना खुश था, उसी तरह उसे भी खुश रखने की कोशिश करता था. पत्नी की एकएक बात का खयाल रखता था. रात में भी वह उसे भरपूर प्यार देने की कोशिश करता.

इतना सब करने के बावजूद भी बलवान के खजाने में शायद किसी रत्न की कमी थी. भले ही वह पत्नी को हर सुख देने की कोशिश करता था, लेकिन तेजिंदर औरत थी. उसे जरूरत थी उस परमसुख की, जिस की चाह में औरतें किसी पर भी अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं. अफसोस की बात यह थी कि वह अनमोल सुख उसे बलावान सिंह से नहीं मिल पा रहा था. यही वजह थी कि इतना प्यार करने के बावजूद बलवान सिंह पत्नी का मन जीत लेना तो दूर, दिन पर दिन वह उस की उपेक्षा एवं नफरत का शिकार होता गया.

फिर एक समय ऐसा भी आ गया, जब तेजिंदर को बलवान से हद से ज्यादा नफरत हो गई. वह हर रात उसे नई उमंग एवं नए उत्साह से अपनी बांहों में समेटता और भरपूर प्यार करने की कोशिश करता, लेकिन अंत में तेजिंदर तड़पती और छटपटाती रह जाती. वह खर्राटे भरने लगता. ऐसे में तेजिंदर की उस के प्रति नफरत बढ़ती ही गई. वह उसे छोड़ कर कहीं और जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी. उन्हीं दिनों उन के बीच एक तीसरा आदमी आ टपका, जो बलवान सिंह का दोस्त हिम्मत सिंह था. कुछ दिनों पहले उस की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी. इसी के बाद उस ने कहीं भी आनाजाना बंद कर दिया था.

एक दिन बलवान जबरदस्ती उसे अपने घर ले आया और उस का दुख कम करने की कोशिश करने लगा. इस कोशिश में उस ने तेजिंदर को भी शामिल कर लिया था. तेजिंदर लगातर उस के साथ रहती थी. उन की बातों से हिम्मत को काफी हौसला और हिम्मत आई. वह सोचने लगा कि अब वह पिछले गम को भुला कर सहज जिंदगी जिएगा. इस के बाद हिम्मत सिंह अकसर बलवान के घर जाने लगा. कभी ऐसा भी मौका आता, जब बलवान सिंह घर पर नहीं होता. ऐसे में अपना फर्ज निभाते हुए तेजिंदर उस की खूब आवभगत करती और पत्नी की मौत का गम भुलाने वाली बातें करती.

ऐसे में ही एक दिन जब हिम्मत उस के यहां आया तो कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद हिम्मत ने तेजिंदर का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘जब से रानो वाहेगुरु को प्यारी हुई है भाभी, मेरा इस दुनिया से जी भर गया था. सुबह उठ कर ऊपर वाले से यही दुआ करता था कि रानो की तरह मुझे भी अपने पास बुला ले. लेकिन अब तुम्हारी यह मनमोहिनी सूरत मेरे मन में ऐसी बस गई है कि मैं इस सूरत का गुलाम बन कर रह गया हूं. सच कहूं भाभी, तुम से ज्यादा खूबसूरत औरत इस दुनिया में दूसरी कोई नहीं हो सकती.’’

तेजिंदर को किसी पराए मर्द से इस तरह अपनी तारीफ सुनना अच्छा तो लगा, लेकिन इस मामले में समझ से काम लेना जरूरी था. जरा सी भूल उस की जिंदगी तबाह कर सकती थी. इस के बावजूद हिम्मत के मुंह से अपनी तारीफें सुनसुन कर वह उस की ओर खिंचने लगी. उस का मन करता कि वह हमेशा उस के पास बैठा उस की खूबसूरती की तारीफें करता रहे. दूसरी ओर हिम्मत जब तेजिंदर की तारीफें करता, उस वक्त उस की आंखों में एक निमंत्रण दिखाई देता था. तेजिंदर को यही लगता था कि अगर उस ने हिम्मत कर के हिम्मत के आगे आत्मसमर्पण कर दिया तो निश्चित ही वह उस की हर इच्छा पूरी कर देगा.

फिर एक दिन ऐसा हो भी गया. उस रात हिम्मत और बलवान ने घर पर महफिल जमा रखी थी. खातेपीते आधी रात हो गई तो बलवान ने हिम्मत को वहीं सो जाने को कहा. उसे बैडरूम में सुला कर बलवान पत्नी को साथ ले कर छत पर सोने चला गया. अप्रैल का महीना था, ठंडीठंडी हवा चल रही थी. जरा ही देर में बलवान और तेजिंदर गहरी नींद सो गए. रात को तेजिंदर को लगा, उसे कोई उठाने की कोशिश कर रहा है. जैसे ही उस की आंखें खुलीं, उठाने वाले ने फटाक से उस का मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया. उस के बाद कान में धीरे से बोला, ‘‘भाभी, आज अपना प्यार दे दो या फिर जहर दे कर मुझे मेरी रानो के पास भेज दो.’’

तेजिंदर ने आवाज पहचान ली थी. लेटेलेटे उस ने तिरछी नजरों से बलवान को देखा. वह गहरी नींद सो रहा था. उस ने मुंह पर रखा हिम्मत कर हाथ हटा कर प्यार से कहा, ‘‘तुम नीचे चल कर अपने बिस्तर पर लेटो, मैं वहीं आ कर तुम से बात करती हूं.’’

हिम्मत चला लेकिन उस ने तेजिंदर के जिस्म को जैसे झकझोर कर रख दिया था. इस के बाद बिना आगेपीछे की सोचे वह हिम्मत के पीछेपीछे आ कर उस के बगल लेट गई. इस के बाद हिम्मत ने रानो की कमी तेजिंदर से पूरी कर ली. दूसरी ओर तेजिंदर को हिम्मत से जो सुख मिला, उस ने जीवन के प्रति उस का नजरिया ही बदल दिया. शादी के बाद उस ने पहली बार महसूस किया था कि जिंदगी इस तरह भी रंगीन हुआ करती है. अपनी इस नई सोच के साथ वह छत पर पहुंची तो बलवान सिंह पहले की ही तरह गहरी नींद में सो रहा था. एक बार झिझक मिटी तो सिलसिला शुरू हो गया. हिम्मत और तेजिंदर को जब भी मौका मिला, दोनों ने उस का फायदा उठा लिया.

कहते हैं, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. बलवान सिंह को भी किसी तरह पत्नी और हिम्मत के संबंधों की भनक लग गई. पहले तो उस ने समाज की ऊंचनीच बता कर तेजिंदर को समझाया. कोई असर न होते देख उस ने तेजिंदर पर सख्ती करनी शुरू कर दी. लेकिन बलवान की ऐसी किसी भी कोशिश का तेजिंदर पर कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि अब तक वह हिम्मत के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. वह पति के सामने ही हिम्मत के साथ के अपने संबंधों को स्वीकार करने लगी थी. इस स्थिति में कोई भी होता, आपा खो बैठता. बलवान भी अब और सख्त हो गया और भूत की तरह पत्नी के आगेपीछे घूमने लगा.

तेजिंदर के लिए यह बरदाश्त के बाहर की बात हो गई थी. आखिर एक दिन उस ने इस बारे में हिम्मत से बात की तो हिम्मत ने कहा, ‘‘पागल है साला, सारी सच्चाई जानता है, फिर भी अपना मुंह काला करवाने पर तुला है. मैं तो कहता हूं कि तुम अपने हिसाब से रहो. अगर ज्यादा चूंचपड़ करे तो झिड़क दिया करो.’’

‘‘हां, यह भी ठीक है. अब ऐसा ही करूंगी.’’ तेजिंदर ने कहा.

दूसरी ओर बलवान सिंह ने दूसरा ही इरादा बना रखा था. उस ने पत्नी को सही राह पर लाने के लिए और अधिक सख्ती शुरू कर दी. एकाध बार उस ने उस की पिटाई भी कर दी.

इस से तेजिंदर को उस से और ज्यादा नफरत हो गई. अगली मुलाकात में उस ने हिम्मत से साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘अगर तुम मुझे हमेशा के लिए अपनी बना कर रखना चाहते हो तो इस आदमी को हमेशा के लिए मेरी जिंदगी से निकाल दो.’’

‘‘उस से तलाक दिलवा दूं?’’ हिम्मत ने मन की बात जानने के लिए हंस कर पूछा.

‘‘मेरी बातों को हंसी से मत टालो. मैं पूरी तरह से गंभीर हूं. वह इस जनम में मुझे तलाक दे नहीं सकता. मेरी मानो तो उसे इस दुनिया से ही विदा कर दो. इस में मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी.’’

‘‘अरे तुम ने तो बहुत दूर तक सोच लिया. उसे मरवा कर खुद भी जेल जाओगी और मुझे भी भिजवाओगी.’’

‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर इस का कुछ नहीं किया गया तो वह निश्चित मुझे मार डालेगा. वह पागल होता जा रहा है. उस के अंदर का जानवर जाग उठा है.’’ कह कर तेजिंदर फूटफूट कर रोने लगी.

हिम्मत को उस के रोने के पीछे कोई बनावट नजर नहीं आई. उस के रोने में भय और मजबूरी साफ झलक रही थी. इसलिए उस की आंखों में खून उतर आया. वह तैश में आ कर बोला, ‘‘वह ऐसावैसा कुछ करे, उस के पहले ही मैं उस का टेंटुआ दबा दूंगा. तू चिंता मत कर, मैं आज ही गांव से अपने जीजा कुलवंत को बुलाए लेता हूं. इस के बाद हम दोनों बलवान की सारी पहलवानी निकाल देंगे. बस आज रात 9 बजे तुम किसी बहाने उसे रेलवे लाइन पर ले जाना.’’

‘‘ठीक है,’’ तेजिंदर ने खुश हो कर कहा, ‘‘ऐसा ही करूंगी. बस तुम तैयार रहना. और हां, तुम्हें यह काम बड़ी होशियारी से करना होगा. यह कांटा निकल गया तो जिंदगी भर मैं तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूंगी.’’

इतना कह कर तेजिंदर ने हिम्मत का हाथ पकड़ लिया तो उस का हाथ अपने सीने पर रख कर हिम्मत ने कहा, ‘‘तुम अपने इस यार पर भरोसा रखो, यारी की है तो मरते दम तक निभाऊंगा भी.’’

यह 11 मई, 1979 की बात थी. घर पहुंच कर आगे की योजना और स्थितियों से निबटने के लिए तेजिंदर विचार करने लगी. इस के बाद सजधज कर बलवान सिंह का इंतजार करने लगी. शाम को ठीक साढ़े 5 बजे बलवान सिंह घर लौटा तो पत्नी को इस तरह सजीधजी देख कर उसे हैरानी हुई. इस से भी ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि आते ही उस की आवभगत में लग गई. उसे चाय दे कर उस से बड़े प्यार से बातें भी करने लगी.

बलवान उस में आए इस बदलाव के बारे में कुछ पूछता, उस ने खुद ही कहा, ‘‘मेरा बदला हुआ रूप देख कर तुम्हें हैरानी हो रही होगी न? दरअसल आज एक साधु बाबा आए थे. मुझे दुखी देख कर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा अपने पति से झगड़ा रहता है न?’

‘‘यह बात उस ने कही या तुम ने खुद ही उस की बातों में आ कर कही?’’

‘‘भला मैं क्यों कहने लगी. फिर हमारा झगड़ा ही कहां है, मैं तो तुम्हारे दोस्त पर तरस खा कर उस से थोड़ा हंसबोल लेती थी, बस इतनी सी बात पर तुम मेरे चरित्र पर लांछन लगा कर मुझे परेशान करने लगे. जान से मारने की धमकियां देने लगे.’’

‘‘देखो तेजिंदर अब तुम बिना मतलब…’’

‘‘आप फिर बनाबनाया मूड खराब करने लगे. आज साधु बाबा जो कुछ मुझ से कह गए हैं, उस से हमारे बीच का झगड़ा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. बाबा ने कहा कि मैं हमेशा तुम्हारा सहयोग करूं, हमेशा तुम्हारी आवभगत करूं. उन्होंने कहा है कि अब हमारा बुरा वक्त टल गया है, जल्दी ही मुझे सारी खुशियां मिल जाएंगीं. अब आप रोजाना मेरा ऐसा ही रूप देखेंगे.’’

तेजिंदर ने ये बातें कुछ इस तरह कहीं कि बलवान को ताज्जुब होने के बावजूद उस का प्यार करने का यह अंदाज बहुत अच्छा लगा. वह खुशी से झूम उठा. तेजिंदर कौन सा षडयंत्र रच रही है, इस बात का उसे जरा भी अंदाजा नहीं हो सका. शाम को दोनों मुख्य बाजार की ओर घूमने भी गए.  खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे फिर से टहलने निकले. घर से थोड़ी दूर जाने पर तेजिंदर ने बलवान का हाथ पकड़ लिया और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ी. उस की प्यारीप्यारी बातों में खोया बलवान यंत्रचालित सा उस के साथ आगे बढ़ता गया. उस समय चारों ओर गहन अंधेरा छाया था. बलवान घर लौटना चाहता था, लेकिन तेजिंदर ने चालाकी से उसे प्यार भरी बातों में उलझाए रखा. तभी उन्हें गुरु सिंह मिल गया.

वह पंजाब पुलिस में सिपाही था और उसी मकान में किराए पर रहता था, जिस में बलवान सिंह रहता था. उतनी रात को सुनसान जगह में उन्हें घूमते देख कर उस ने पूछा, ‘‘इतनी रात को आप लोग रेलवे लाइन की ओर क्या करने जा रहे हैं?’’

‘‘बस, ऐसे ही तेजिंदर का मन हो आया, इसलिए इधर चला आया. और क्या हालचाल है, ड्यूटी कर के आ रहे हो क्या?’’ बलवान ने पूछा.

लेकिन उस की बात का उत्तर दिए बगैर मुसकराता हुआ गुरु सिंह आगे बढ़ गया. तेजिंदर और बलवान बातें करते हुए थोड़ा और आगे बढ़ गए. उस समय दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले रेलवे लाइन के बीचोबीच चल रहे थे. तेजिंदर ने देखा कि हिम्मत सिंह अपने जीजा कुलवंत के साथ रेलवे लाइन के दाईं ओर कच्चे रास्ते से चला आ रहा है. बलवान की नजर हिम्मत और कुलवंत पर पड़ती, उस के पहले ही वे उस के सामने आ कर खड़े हो गए. उन्हें देखते ही उस ने उन के इरादे भांप लिए. उसे तेजिंदर पर भी संदेह हो गया, इसलिए झटके से हाथ छुड़ा कर वह रतनहेड़ी गांव की ओर भागा.

लेकिन हिम्मत ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उस के बाएं पैर पर गड़ासे से वार कर दिया. इस के बावजूद बलवान रेलवे लाइन पार करने में कामयाब हो गया. वह लंगड़ाता हुआ भागने लगा. वह भाग पाता, कुलवंत ने दौड़ कर उस के पेट में तलवार घुसेड़ दी. खून का फव्वारा फूट पड़ा. इस के बाद वह जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. इस के बाद हिम्मत ने गंडासे से उस पर 4-5 वार कर दिए तो थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया. हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए हिम्मत और कुलवंत ने बलवान की लाश को उठा कर रेलवे लाइन के बीचोबीच रख दिया. उन का सोचना था कि रात में ट्रेन गुजरेगी तो उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े हो जाएंगे. तब लोग यही समझेंगे कि उस ने ट्रेन के नीचे आ कर आत्महत्या कर ली है.

तीनों वहां से लौट रहे थे तो मुख्य सड़क पर बलवान सिंह का ममेरा भाई नेगा सिंह मिल गया. उतनी रात को तेजिंदर को 2 गैरमर्दों के साथ घूमने के बारे में उस ने पूछा तो तेजिंदर ने उसे इस तरह झिड़क दिया कि वह अपना सा मुंह ले कर चला गया. इस के बाद हिम्मत और कुलवंत सलौदी की ओर चले गए तो तेजिंदर अपने घर आ गई. अगले दिन यानी 12 मई, 1979 की सुबह खन्नानगर में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि बलवान सिंह रेलगाड़ी के नीचे कट कर मर गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई दुर्घटना कह रहा था तो कोई आत्महत्या मान रहा था. घटनास्थल पर भीड़ लग गई थी.

किसी ने बलवान सिंह की मौत के बारे में तेजिंदर को बताया तो रोतीबिलखती वह लाश के पास पहुंची. उस के वहां पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर एक सबइंसपेक्टर और 3 सिपाही आ चुके थे. आते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले कर अपनी कानूनी काररवाई शुरू कर दी थी. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर के तमाम जानकारी भी जुटा ली थी. इसलिए तेजिंदर जब लाश से लिपट कर रोने का नाटक करने लगी तो वहां मौजूद सबइंसपेक्टर ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि रात में तेजिंदर को मिले सिपाही गुरु सिंह ने पहले ही सब बता दिया था.

इसलिए सबइंसपेक्टर को उसी पर शक था. वह उसे थाने ले जाना चाहते थे. उसे थाने ले जाने के लिए उन्होंने बहाना बनाया कि उन्हें उस से कुछ कागजों पर दस्तखत करवाने हैं, जिस से बलवान के बाद उसे सरकारी नौकरी आसानी से मिल सके. तेजिंदर कभी थाने तो गई नहीं थी. उसे यह भी मालूम नहीं था कि थाने में पुलिस अपराधियों से किस तरह से पेश आती है? इसलिए पुलिस के रौद्ररूप के आगे वह ज्यादा देर टिक नहीं सकी और बलवान की हत्या का अपना अपराध उस ने स्वीकार कर के हिम्मत और कुलवंत के बारे में भी बता दिया.

हिम्मत को अपनी गिरफ्तारी की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सबइंसपेक्टर ने कुलवंत और हिम्मत को तेजिंदर के सामने खड़े कर पूछताछ शुरू की तो पुलिस की परवाह किए बगैर वह एकदम से तेजिंदर पर टूट पड़ा. 4 सिपाहियों ने मिल किसी तरह तेजिंदर को उस के चंगुल से छुड़ाया. तेजिंदर को मारते समय वह कह रहा था, ‘‘तेजिंदर, तू ने जो तिरिया चरित्तर दिखाया है न, वह तुझे बहुत महंगा पड़ेगा. तू ने ही मुझ से कह कर अपना आदमी मरवाया और अब पुलिस को मेरा नाम भी बता दिया.’’

बहरहाल, शुरुआती पूछताछ में ही तेजिंदर वादामाफ गवाह बन गई. अदालत में चालान पेश हुआ तो उस ने हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ अपना बयान इस तरह दिया, जैसे किसी फिल्म की पटकथा सुना रही हो. बलवान सिंह पर किस ने किस तरह किस हथियार से वार किए थे, फटाफट बकती चली गई.  लुधियाना की सेशनकोर्ट में जब मुकदमा चला तो मैं हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह के वकील की हैसियत से अदालत में पेश हुआ. हर वकील अपने मुवक्किल को बचाना चाहता है. मैं ने भी दोनों को बचाने के लिए कानून के खूब तर्क दिए.

29 फरवरी, 1980 को सैशन जज ने इस मुकदमे का जो फैसला सुनाया, वह इस तरह से था :‘श्रीमती तेजिंदर कौर जाति की जाट है, जबकि उस का प्रेमी हिम्मत सिंह हरिजन. तेजिंदर कौर का कहना कि उस के हिम्मत सिंह से अवैधसंबंध हो गए थे, जिस की जानकारी उस के पति बलवान सिंह को हो गई थी, यह विश्वसनीय नहीं लगता. पंजाब का जाट अपनी पत्नी का अवैधसंबंध किसी और जाति के साथ होने की बात को बड़ी गंभीरता से लेता है.

‘अगर बलवान सिंह को इस की जानकारी होती तो वह और उस के रिश्तेदार पहले ही तेजिंदर कौर अथवा उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार चुके होते. तेजिंदर कौर ने अपने बयान में एक जगह कहा है कि एक बार वह और उस का प्रेमी पतिपत्नी के अंदाज में थे, तभी उस के पति ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया था, लेकिन तब थोड़ाबहुत झगड़ा करने के अलावा और कुछ नहीं हुआ था, यह भी अविश्वसनीय सा लगता है.

‘अपने बयान में तेजिंदर कौर ने यह भी कहा है कि हिम्मत और कुलवंत सिंह ने बलवान की मौत निश्चित हो जाने के बाद भी उस पर तलवार से अनगिनत वार किए, यह सब भी झूठ लगता है. तेजिंदर कौर के बयानों को सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वादामाफ गवाह के रूप में उस का बयान अविश्वसनीय है.

‘उस ने हिम्मत और कुलवंत सिंह को फंसाने के लिए इस जघन्य हत्या की ऐसी कहानी गढ़ी है, जिस से उन दोनों को फांसी हो जाए. कहानी में पर्याप्त दम नहीं है और अभियोगपक्ष भी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप साबित करने में असफल रहा है. लिहाजा हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बलवान सिंह की हत्या के आरोप से दोनों को बरी किया जाता है.’ फैसला आए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि हिम्मत सिंह और तेजिंदर कौर पतिपत्नी के रूप में मेरे सामने आ खड़े हुए थे. ऐसा कैसे संभव हुआ, यह फिलहाल मेरी समझ में नहीं आ रहा था. काफी प्रयास के बाद भी जब मैं इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं ढूंढ सका तो मैं ने 2 दिनों बाद अपने मुंशी को खन्ना भेज कर तेजिंदर को बुलवा लिया.

इस बार भी तेजिंदर हिम्मत सिंह के साथ ही आई. मेरे पूछने पर उस ने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था :

पुलिस ने थाने में जब तेजिंदर से पूछताछ की तो वह पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. लेकिन एक बात उस के हक में यह रही कि हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद भी उस का मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ा. उसी का नतीजा था कि जब पुलिस ने उसे वादामाफ गवाह बना कर उसे अपने ही साथियों के खिलाफ गवाही देने को कहा तो उस ने मन ही मन तय कर लिया कि अदालत में वह हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ इतना बढ़चढ़ कर बोलेगी कि उस के बयान पर जज साहब को यकीन नहीं होगा. तब शायद वह उस के बयान पर यकीन न कर के उन लोगों को बरी कर दें.

थाने में हिम्मत ने जब गालीगलौज करते हुए उस पर हमला किया था, तब उसे क्या पता था कि वह अपना त्रियाचरित्र दिखा रही थी, वह उसे बचाने की जबरदस्त योजना बना रही थी. आखिर वही सब हुआ, जैसा उस ने सोचा था. उस ने अदालत में जो बयान दिया था, जज साहब को सचमुच यकीन नहीं हुआ. संदेह का लाभ पा कर हिम्मत सिंह अपने जीजा के साथ बरी हो गया. उस समय भी दोनों उस से खफा थे. लेकिन जब उन के घर जा कर तेजिंदर ने असलियत बताई तो दोनों ने उस की तारीफ की. इस के बाद जब हिम्मत को उस पर विश्वास हो गया तो उस ने उस से शादी कर ली.

तेजिंदर की दास्तान सुन कर एक वरिष्ठ वकील होने के बावजूद एकबारगी मेरी बुद्धि चकरा गई. फिलहाल वह 2 नौजवान लड़कों की मां है, जिन में से एक की हाल ही में शादी हुई है. अपने परिवार के साथ वह खूब मजे का जीवन बसर कर रही है. वह नहीं चाहती कि अब कोई उस के पुराने जीवन के बारे में पूछे. Hindi Stories

—कथा में प्रमुख पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.

 

 

Mathura Crime Story: प्यार की दुश्मन बनी आशिकी

Mathura Crime Story: प्यार के नाम पर लड़केलड़कियां घर वालों की मरजी के खिलाफ शादी तो कर लेते हैं, लेकिन जब यथार्थ की जमीन पर उन के पांव पड़ते हैं तो उन्हें अपने प्रेमिल संबंध दरकते से नजर आने लगते हैं. बस यहीं से कभीकभी उन के बीच अपराध की भूमिका बनने लगती है. ममता और मुकेश के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ…

कस्बा नौहफील, मथुरा जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर है. कन्हैयालाल शर्मा उत्तर प्रदेश जलनिगम में यहीं पर नौकरी करते थे. कुछ साल पहले उन की मृत्यु हो गई तो मृतक आश्रिता के रूप में उन की पत्नी राजकुमारी को नौकरी मिल गई. राजकुमारी के 3 बेटे थे, मुकेश, सोनू और सुभाष. पति की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी राजकुमारी पर आ गई. बड़े बेटे मुकेश का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो राजकुमारी ने एक दुकान पर उस की नौकरी लगवा दी.

मंझला बेटा सोनू पढ़ाई में तेज था. सौफ्टवेयर इंजीनियर बन कर वह दिल्ली में हिंदुस्तान सिरिंज कंपनी में काम करने लगा, जबकि छोटा सुभाष अभी पढ़ रहा था. राजकुमारी के दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े हो चुके थे, अब उन का पूरा ध्यान छोटे बेटे मुकेश पर था. लेकिन वह महसूस कर रही थीं कि मुकेश का लगाव पढ़ाई से हटता जा रहा है. मुकेश कोई छोटा बच्चा तो था नहीं, जो उसे डांटडपट कर पढ़ाई कराई जा सकती. एक दिन उन्होंने उस से बात की.

इस पर मुकेश ने कहा कि उस के कई दोस्त जागरण मंडली के साथ जाते हैं. वहां से उन्हें अच्छी कमाई होती है, अगर वह अपनी जागरण मंडली बना ले तो अच्छीभली कमाई कर सकता है. दरअसल मुकेश उन लोगों में था, जो रातोंरात अमीर होना चाहते हैं. मां ने भी सोचा कि जब बेटे की इच्छा यही है तो उसे एक मौका दे ही देना चाहिए. जागरण मंडली बनाने के लिए मुकेश को काफी सामान जुटाना था. जबकि सामान खरीदने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. ऐसे में उस की मां ने ही उसे सामान खरीदने के लिए पैसे दिए. सामान आदि जुटाने के बाद मुकेश ने कुछ जानने वाले कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल कर लिया. जब पूरी तैयारी हो गई तो उस ने अपनी जागरण मंडली का प्रचार करना शुरू कर दिया.

प्रचार के बाद मुकेश की जागरण मंडली की बुकिंग होने लगी और उस के पास पैसा आने लगा. इस से राजकुमारी की चिंता थोड़ी कम हुई. उसे लगा कि मुकेश की जिंदगी अब सफल हो जाएगी. इसी बीच मुकेश की मुलाकात ममता से हुई. ममता गायिका थी और जागरण मंडलियों में भजन गाती थी. ममता की सुरीली आवाज मुकेश को अच्छी लगी. उस ने सोचा कि यदि ममता उस की मंडली में आ जाएगी तो मंडली को एक नई पहचान मिलेगी. इसलिए उस ने ममता को अपनी मंडली के साथ जुड़ कर काम करने का औफर दिया. ममता ने उस के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.

मुकेश की मंडली में एक दो लड़कियां और भी थीं. लेकिन ममता की आवाज उन सब से अच्छी थी. मंडली में ममता के आने के बाद वास्तव में मुकेश की मंडली की डिमांड बढ़ गई. ममता उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के गांव सिमरई के रहने वाले अनिल की बेटी थी. बेटी के अलावा अनिल के 2 बेटे थे. उन दोनों की शादी हो चुकी थी. वे पिता से अलग रहते थे. मुकेश के ग्रुप में काम करने की वजह से ममता का उस के घर भी आनाजाना था. ममता खूबसूरत थी, इसलिए मुकेश भी उसे चाहने लगा था. धीरेधीरे ममता का झुकाव भी उस की तरफ हो गया था. वे एकदूसरे के करीब आने लगे. ये बात मुकेश की मां राजकुमारी से छिपी नहीं रही. वह नहीं चाहती थीं कि बेटे की शादी ममता से हो, इसलिए एक दिन उस ने मुकेश से साफ कह दिया कि वह जागरण में जाने वाली लड़कियों को पसंद नहीं करती.

मुकेश मां की बात का मतलब समझ गया था. जबकि ममता ने अपने पिता अनिल को यह बात बताई तो उन्होंने बेटी के फैसले पर सहमति दे दी. कुछ ही दिनों में मुकेश और ममता का प्यार इस मुकाम पर पहुंच गया कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. अपने प्यार की खातिर मुकेश ने मां की बात को नजरअंदाज कर दिया. आखिर घर वालों से छिपा कर सन 2009 में उस ने ममता के साथ कोर्टमैरिज कर ली. बेटी की शादी के समय अनिल भी कोर्ट में मौजूद था. दूसरी ओर मुकेश के घर वालों को इस शादी की भनक तक नहीं लगी. मुकेश से शादी करने के बाद ममता अपने पिता के साथ मथुरा में किराए का मकान ले कर रहने लगी. शादी के बाद मुकेश भला उस से अलग कैसे रह सकता था. पत्नी के साथ रहने के चक्कर में एक दिन वह घर में यह कह कर चला आया कि वह कहीं बाहर जा कर काम करेगा.

मथुरा आ कर वह ममता के कमरे पर ही रहने लगा. किराए पर रहने की वजह से मुकेश को घर का सारा सामान जुटाना पड़ा. उस का खर्चा तो बढ़ गया था, लेकिन उस के हिसाब से कमाई नहीं हो पा रही थी. घरगृहस्थी में फंस जाने की वजह से उन्हें काम पर जाने का भी ज्यादा मौका नहीं मिल पाता था. शादी से पहले ममता ने सोचा था कि मुकेश के साथ वह खूब कमाई करेगी, पर ऐसा हुआ नहीं. शादी से पहले मुकेश उसे हर तरह के सुख उपलब्ध कराने की जो बातें कही थीं, वे सब झूठी साबित हो रही थीं. 2011 को ममता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस के बाद उस के खर्चे और भी बढ़ गए.

ऐसे में ममता मुकेश पर जोर डालती थी कि वह अपने घर से पैसा लाए. लेकिन मुकेश ने शादी के बाद से अपने घर जाना बंद कर दिया था. वह जानता था कि उसे घर से अब कुछ नहीं मिलने वाला. पर ममता ने उसे उस के हिस्से की डेढ़ बीघा जमीन बेचने के लिए मजबूर कर दिया. जमीन बेच कर जो पैसे मिले, ममता ने उन्हें बहुत जल्द खत्म कर दिए. अभी तक मुकेश के घर वालों को यह पता नहीं लगा था कि मुकेश ने शादी कर ली है और वह एक बच्चे का बाप भी बन चुका है, लेकिन यह बात और ज्यादा दिनों तक नहीं छिपी रह सकी. मुकेश की हकीकत पता लगी तो उन्हें गहरा धक्का लगा.

जमीन की बिक्री से मिला पैसा खत्म हो जाने के बाद मुकेश की स्थिति पहले जैसी हो गई. इसी बीच उस के छोटे भाई सोनू ने दिल्ली के मयूर विहार फेस-3 में सिलाई की नई मशीनें लगा कर एक्सपोर्ट होने वाले रेडीमेड कपड़ों की सिलाई का काम शुरू कर दिया. उसे पता चला कि मुकेश पैसेपैसे के लिए मोहताज है तो उस ने उसे भी अपने पास दिल्ली बुला लिया. मुकेश कारीगरों से सिलाई का काम कराने लगा. इस की एवज में सोनू उसे 10 हजार रुपए महीने देता था. कुछ दिनों बाद मुकेश अपने परिवार को भी दिल्ली ले आया. लेकिन दिल्ली जैसे महानगर में 10 हजार रुपए में क्या होने वाला था. यानी आर्थिक तंगी को ले कर ममता और उस के बीच असंतोष अब भी बरकरार था. इस की वजह से मुकेश को अपना दांपत्यजीवन डगमगाता नजर आ रहा था.

रोजरोज की किचकिच से परेशान हो कर आखिर एक दिन ममता अपने पिता के साथ मथुरा आ गई और मंडी चौराहे पर किराए का कमरा ले कर रहने लगी. मुकेश भी भाई के पास से काम छोड़ कर ममता के पास मथुरा चला आया. अब ममता को लगने लगा कि उस ने मुकेश से शादी कर के बहुत बड़ी गलती की है. वह अब फिर से अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए उस ने बेटे को मुकेश के हवाले किया और जागरण में काम करने वाले अपने जानकारों से संपर्क करने लगी. जल्दी ही उसे काम भी मिलने लगा. अपनी कमाई से वह अपना काम चलाने लगी, जबकि मुकेश घर में ही पड़ा रहता था. उसे लगने लगा था कि वह एक हारा हुआ इंसान है. वह ममता से प्यार तो बहुत करता था, लेकिन वह उसे खुश नहीं रख पा रहा था.

उन्हीं दिनों ममता की मुलाकात जागरण पार्टी के दौरान गायक पंकज से हो गई. पंकज राजस्थान के भरतपुर जिले का रहने वाला था. वह अपने इलाके का मशहूर कलाकार था. पंकज की अपनी जागरण मंडली थी. उस के पिता गोविंदप्रसाद की अपनी मोटर स्पेयर पार्ट्स की दुकान थी. कुल मिला कर पंकज एक खातेपीते परिवार से था. ममता अच्छी कलाकार थी, इसलिए पंकज ने उस के सामने अपनी मंडली में शामिल होने का प्रस्ताव रखा तो ममता ने उस का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. ममता अपने पति से परेशान थी ही, इसलिए उस का झुकाव पंकज की तरफ हो गया. पंकज भी उसे चाहने लगा. इसी चक्कर में वह किसी न किसी बहाने मथुरा में ममता के कमरे पर आता रहता था.

जब दोनों को लंबे समय तक एकांत में रहने का मौका मिला तो वे अपनी मर्यादाएं भी भूल गए. यानी उन के बीच की दूरियां खत्म हो गईं. ममता के सामने एक ओर उस का पति मुकेश था, जो एक हारा हुआ इंसान था तो दूसरी तरफ पंकज था, जो एक पैसे वाला आदमी था. उसे उन दोनों में से किसी एक को चुनना था. वह सोचने लगी कि उसे यदि पंकज का साथ मिल जाए तो जीवन में वह सब मिल सकता है, जिसे वह हासिल करना चाहती थी. जागरण के बहाने ममता और पंकज की मुलाकातें होती रहती थीं. मुकेश को पता ही नहीं चला कि उस के दांपत्य संबंधों में पंकज ने कब सेंध लगा दी है. जिस ममता की खातिर उस ने अपने घर वालों को छोड़ दिया था, वही उस के साथ बेवफाई पर उतर आई थी.

एक दिन मुकेश ने अपनी आंखों से पत्नी को पंकज से बातें करते देखा तो वह हैरान रह गया. मुकेश ने इस का विरोध किया और पंकज को चेतावनी दी कि वह उस की पत्नी से दूर ही रहे तो अच्छा होगा. इस पर पंकज ने झूठ बोलते हुए कहा कि वह तो ममता के साथ यूं ही मजाक कर रहा था. लेकिन इस के बाद मुकेश को शक हो गया कि पंकज और ममता के बीच कुछ तो है. पंकज को ले कर अब घर में कलह होने लगी. ममता भी अब चुप नहीं रहती थी. वह उसे बातबात पर ताने देती रहती थी. बात जब बढ़ जाती तो मुकेश ममता को पीट देता था.

ममता अब मुकेश से उकता गई थी. वह किसी भी तरह से उस से अपनी जान छुड़ाना चाहती थी. ममता ने अपने पिता को भी पंकज के साथ अपने संबंधों की बात बता दी थी. उस ने कह दिया था कि वह पंकज के साथ बेहतर जिंदगी बिताना चाहती है, लेकिन मुकेश उस के रास्ते का रोड़ा बना हुआ है. अनिल बेटी की कमाई खा रहा था. इसलिए उस ने ममता से कह दिया कि वह उस की भलाई के लिए कुछ भी करने को तैयार है. ममता ने इस बारे में पंकज से बात की तो उसे पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो गया. तब पंकज, ममता और उस के पिता अनिल ने मुकेश को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. पंकज ने अपने दोस्त जीतू को भी इस योजना में शामिल कर लिया.

इस के बाद पंकज मुकेश का विश्वास जीतने की कोशिश करने लगा. उस ने एक दिन मुकेश से कह भी दिया कि उस के और ममता के बीच कुछ नहीं है. वह तो बस उस की मदद कर देता है. मुकेश भी उस की बातों पर विश्वास करने लगा. पंकज को इसी का इंतजार था. इसी का फायदा उठाने के लिए 16 जुलाई, 2015 को पंकज ने फोन कर के मुकेश से कहा कि उसे ममता के साथ एक जागरण पार्टी में चलना है. आने वाली मुसीबत से बेखबर मुकेश ममता के साथ चल दिया. रास्ते में पंकज और जीतू भी मिल गए. ये लोग पार्टी के बहाने एक जगह शराब पीने बैठ गए, जिस में इन लोगों ने मुकेश को खूब शराब पिलाई. जब वह नशे में होश खोने लगा तो इन लोगों ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी.

अब लाश उन के सामने थी और सवाल यह था कि लाश को कहां फेंका जाए. व लाश को कहीं दूर फेंकना चाहते थे, इसलिए वे भरतपुर से खदौली होते हुए आगरा जाना चाहते थे, पर खदौली में सुनसान जगह देख कर उन्होंने एक जगह लाश फेंक दी. रास्ते का कांटा निकल जाने के बाद ममता और पंकज बहुत खुश थे. फिर अपनी योजना के तहत ममता 8 अगस्त, 2015 को मथुरा के थाना हाईवे पहुंची और थानाप्रभारी सुबोध यादव को बताया कि उस का पति मुकेश 17 जुलाई, 2015 से घर से गायब है. उस का फोन भी स्विच्ड औफ आ रहा है. उस की शिकायत पर पुलिस ने मुकेश की गुमशुदगी दर्ज कर ली.

उस दिन के बाद ममता पति के बारे में पूछताछ के लिए कभी थाने नहीं गई. ममता मथुरा के जिस मकान में किराए पर रहती थी, 20 जुलाई को उस ने वह भी खाली कर दिया. टुंडला में एक टैंपो चालक का मकान किराए पर ले कर वह पंकज, अपने पिता व बच्चे के साथ रहने लगी. इसी बीच एक दिन ममता ने मुकेश के भाई सोनू को फोन कर के बताया कि उस का भाई मुकेश पिछले 7 जुलाई से गायब है और उस का कोई अतापता नहीं है. यह सुन कर मुकेश के घर वाले परेशान हो गए. सोनू ने ममता से कहा कि इस मामले में हमें रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए. लेकिन ममता टालमटोल करने लगी.

सोनू और उस के घर वालों को शक हुआ कि कहीं ममता ने ही तो मुकेश को ठिकाने नहीं लगवा दिया. यह तो पता लग ही गया था कि ममता इस समय पंकज नाम के युवक के साथ रह रही है. इसलिए उन्हें शक हुआ कि कहीं ममता और पंकज ने ही मिल कर मुकेश को ठिकाने लगा दिया हो. इस पर सोनू अपने घर वालों के साथ मथुरा में उस जगह पहुंचा, जहां ममता किराए पर रहती थी. लेकिन वहां  पता लगा कि वह तो 20 जुलाई को ही यहां से मकान खाली कर के कहीं चली गई है. इस से मुकेश के घर वालों को पक्का शक हुआ. वह अपने परिचितों के साथ थाना हारे पहुंच गए. सोनू ने थानाप्रभारी से अपने भाई की हत्या होने की आशंका जताई. थानाप्रभारी सुबोध यादव ने ममता का फोन सर्विलांस पर लगा दिया.

इधर ममता को इस बात की भनक लग गई थी कि सोनू अपने भाई की खोज में लग गया है. इसलिए उसे पुलिस का डर सताने लगा. सर्विलांस से पुलिस को पता चल गया कि ममता इस समय टुंडला में है. ममता और पंकज टुंडला से अलवर शिफ्ट होना चाहते थे. उन्होंने अलवर में किराए का मकान भी ले लिया था और अनिल के साथ बेटे कान्हा को पहले ही अलवर भेज दिया था. पुलिस जब टुंडला में उस के मकान पर पहुंची तो वहां ताला लगा मिला. मकान मालिक से पुलिस ने कह दिया कि जब भी ममता वहां से अपना सामान लेने आए, तुरंत खबर कर दे.

15 सितंबर, 2015 को ममता पंकज के साथ टैंपो ले कर आई. टैंपो में अपना सामान भर कर उन्हें अलवर जाना था. जब पंकज और ममता टैंपो में अपना सामान भर रहे थे, तभी मकान मालिक ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस जल्दी से टुंडला पहुंच गई और पंकज व ममता को दबोच लिया. दोनों को मथुरा के थाना हाईवे ले जा कर पूछताछ की गई तो दोनों ने कहा कि उन्हें मुकेश के बारे में कुछ भी पता नहीं है. लेकिन सख्ती करने पर दोनों ने कुबूल कर लिया कि उन्होंने उस की हत्या कर के लाश खदौली, जिला आगरा में फेंक दी थी. उन्होंने स्वीकारा कि इस गुनाह में जीतू निवासी भरतपुर और अनिल शामिल थे.

पुलिस ने 2 दिनों बाद भरतपुर से जीतू को और अलवर से अनिल को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने मुकेश की गुमशुदगी की सूचना को हत्या में परिवर्तित कर दिया. अभियुक्तों को मुकेश के कत्ल के इल्जाम में जेल भेज दिया गया है.

इस तरह एक नाकाम प्रेम कहानी का भयानक अंत हो गया.

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

 

Crime Story: हत्या जिन के लिए खेल है

Crime Story: किसी का भी खून करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लोग खून देख कर ही घबरा जाते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें किसी को भी मार देना खेल लगता है. यह कहानी ऐसे ही लोगों की है.

लुधियाना न्यू कोर्ट का माहौल उस दिन बड़ा रहस्यमयी लग रहा था. गेट से ले कर अंदर तक चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन अदालत लुधियाना के बहुचर्चित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला हत्याकांड का फैसला सुनाने वाली थी. हत्यारे कितने खतरनाक और खूंखार थे, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें जेल से अदालत तक लाने के लिए 60 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रिया सूद की अदालत को सुरक्षा की दृष्टि से पुलिसकर्मियों ने पूरी तरह से घेर रखा था. क्योंकि उन्हीं की अदालत में फैसला सुनाया जाने वाला था.

राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला की 1 फरवरी, 2012 की रात बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. इस दोहरे हत्याकांड को 6 लोगों, उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ पिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू, हसनजीत सिंह उर्फ जीता, दविंदरपाल सिंह उर्फ लाडी और रविंदर सिंह उर्फ रिंकू ने मिल कर अंजाम दिया था. पंजाब पुलिस ने इन लोगों को बड़ी मेहनत से पकाड़ा था. डीएसपी बलराज गिल की तैनाती उन दिनों जिला मोगा में डीएसपी हैडक्वार्टर के रूप में थी. चुनाव की वजह से पिछले एक महीने से वह काफी व्यस्त थे. ठीकठाक चुनाव संपन्न हो गए तो उन्होंने चैन की सांस ली थी और 1 फरवरी को छुट्टी ले कर लुधियाना स्थित अपने घर आ गए थे.

बलराज गिल सरदार कश्मीरा सिंह की एकलौती संतान थे. कश्मीरा सिंह बीएसएफ में कमांडेट थे और रिटायर्ड होने के बाद घर पर ही रह रहे थे. घर पहुंच कर बलराज गिल ने कुछ देर आराम किया, उस के बाद शाम को सत्संग सुनने चले गए. चुनाव की वजह से वह कई दिनों से सत्संग सुनने नहीं जा सके थे. सत्संग सुनने के बाद बलराज गिल कुछ देर अपने सत्संगी मित्रों के पास बैठ कर बातें करते रहे, उस के बाद घर चले गए. 7 बजे के करीब उन के फोन पर किसी का फोन आया तो पत्नी से 10 मिनट में आने की बात कह कर वह अपनी सफेद रंग की ओपट्रा कार से मौडल टाउन स्थित इश्मीत चौक के पास प्रिंटिंग प्रैस चलाने वाले अपने दोस्त मनिंदरपाल सिंह के पास जा पहुंचे.

वहीं पर बलराज और मनिंदर के क्लासमेट अनमोल सिंह मिल गए. तीनों दोस्त चाय पीते हुए बातें कर रहे थे कि तभी बलराज के फोन पर किसी का फोन आया, जिसे सुनने के बाद वह अपनी कार छोड़ कर मनिंदर की कार ले कर चले गए. जाते समय वह दोस्तों से कह गए कि थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे. लेकिन वह गए तो लौट कर ही नहीं आए. जब काफी देर हो गई तो दोस्तों को चिंता हुई. उन्होंने बलराज को फोन किए, पर उन के दोनों फोन बंद मिले. रात 10 बजे उन्होंने बलराज के घर फोन किया तो उन के पिता कश्मीरा सिंह ने बताया कि बलराज अभी तक घर भी नहीं पहुंचे हैं.

इस के बाद मनिंदरपाल और अनमोल ने कई जगह फोन कर के बलराज के बारे में पूछा, लेकिन कहीं से उन के बारे में कुछ पता नहीं चला. रात 12 बजे तक स्पष्ट हो गया कि बलराज गिल के साथ या तो कोई हादसा हो गया है या फिर उन का अपहरण आदि कर लिया गया है. चिंता की बात यह थी कि बलराज अपना सर्विस रिवौल्वर और सुरक्षा गार्डों को साथ नहीं ले गए थे. वह निहत्थे और अकेले ही गए थे. वैसे तो बलराज गिल जांबाज पुलिस अफसर थे, बड़ेबड़े खूंखार अपराधियों को काबू कर के उन्होंने सलाखों के पीछे पहुंचाया था. लेकिन निहत्थे और अकेले होने की वजह से सभी चिंतित थे.

बहरहाल, जब स्पष्ट हो गया कि बलराज लापता हो गए हैं तो क्षेत्रीय पुलिस और उन की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी उन की तलाश में लग गए. शहर का चप्पाचप्पा छान मारा गया, लेकिन बलराज गिल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला. अगले दिन हंबड़ा रोड स्थित गोल्फ लिंक क्षेत्र में बने एक फार्महाउस से बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका की लाश मिली. उन की कारें कई दिनों बाद शहर से दूर सुनसान जगह से पुलिस ने बरामद की थीं. दोनों कारों की नंबर प्लेटें बदली हुई थीं. बलराज और मोनिका की हत्या की बात सुन कर पूरे शहर में भय का माहौल बन गया था. जब यह खबर बलराल के घर पर पहुंची थी तो वहां कोहराम मच गया.

पिता कश्मीरा सिंह ने तो जैसेतैसे खुद को संभाल लिया था, लेकिन मां गुरदीप कौर का बुरा हाल था. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन का शेर जैसा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा. बलराज गिल सचमुच सुंदरस्वस्थ और लंबेचौड़े जवान थे. उन का ऐसा शरीर था कि वह 4-5 लोगों पर भारी पड़ सकते थे. उन की पत्नी हरिंदर कौर गिल कुंदनपुरी के सरकारी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल थीं. पति की हत्या की बात सुन कर वह बेहोश हो गई थीं. बेटे गुरमन सिंह और बहन गुरशरण कौर का भी रोरो कर बुरा हाल था. लुधियाना के अलावा अन्य जिलों जालंधर, पटियाला, मोगा के भी पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. आईजी, डीआईजी एवं एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

शिनाख्त के बाद बलराज और मोनिका की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था. इस के बाद कश्मीरा सिंह की तहरीर पर थाना हैबोवाल में 2 फरवरी, 2012 को भादंवि की धारा 302, 404, 201, 465, 468, 471 व 120बी के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के युद्ध स्तर पर हत्यारों की तलाश शुरू कर दी गई थी. फार्महाउस के हालात बता रहे थे कि इस हत्याकांड को लगभग आधा दर्जन लोगों ने अंजाम दिया था. फार्महाउस के कई गमले टूटे हुए थे. कमरों के अंदर और बाहर खून ही खून फैला था. क्राईम टीम और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञों की टीम ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल से हाथोंपैरों के निशान उठाए थे. मृतक बलराज गिल की मुट्ठी में कुछ बाल मिले थे.

मोनिका की लाश बाथरूम के पास मिली थी. बाथरूम की दीवार पर खून और उन के सिर के बाल चिपके हुए थे. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए घटनास्थल के 33 फोटो खींचे थे और 2 वीडियो बनाई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार बलराज गिल के सिर और गरदन पर तेज धार हथियार से वार किए गए थे. मोनिका के सिर, बाजू और पीठ के अलावा शरीर के अन्य अंगों पर भी तेज धार हथियार के घाव पाए गए थे. बलराज के सिर और गरदन पर किए गए वार उन की मौत का कारण बने थे. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के अनुसार मरने से पहले बलराज गिल ने हत्यारों से जम कर संघर्ष किया था.

बहरहाल, इस हाईप्रोफाइल दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए डीजीपी के निर्देश पर लुधियाना पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह और एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो की देखरेख में एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम बनाई गई थी, जिस में एसीपी परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी साहनेवाल जसविंदर सिंह, एसीपी क्राईम और सीआईए स्टौफ के तेजतर्रार प्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह गिल, एडीशनल थानाप्रभारी, एसआई अजायब सिंह के अलावा अन्य एसीपी और इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सुरेंद्र मोहन को शामिल किया गया था. इस मामले की जांच में अन्य एजेंसियों को भी टीम की मदद के लिए लगा दिया गया था.

स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम और एसआईटी ने हंबड़ा रोड और आसपास के गांवों से लगभग 2 हजार संदिग्ध युवकों को पूछताछ के लिए उठा लिया था. पुलिस की इस काररवाई से लोगों में रोष पैदा हो गया था. गांवों के प्रधानों और हिरासत में लिए लोगों के घर वालों ने डीजीपी और मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पुलिस हत्यारों को पकड़ने के बजाय उन लोगों को परेशान कर रही है, जो बरसों पहले गलत राह छोड़ कर शराफत की जिंदगी जी रहे हैं. हत्याएं सुनसान इलाके में हुई थीं और हत्यारे ऐसा कोई सबूत नहीं छोड़ गए थे, जिस से जांच आगे बढ़ पाती. जांच आगे न बढ़ते देख डीजीपी पंजाब के आदेश पर दिल्ली की स्पैशल टैक्निकल टीम के विशेषज्ञों को बुलाया गया था. साइबर क्राइम यूनिट और टैक्निकल सपोर्ट इंचार्ज इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से जांच शुरू की गई.

घटनास्थल के आसपास ज्यादा सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, फिर भी दिल्ली से आई साइबर टीम ने 5 किलोमीटर के क्षेत्र में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चेक की. इन में एक कैमरे से इनोवा और ओपट्रा कार की फुटेज मिली, जिस में इनोवा आगे जा रही थी और ओपट्रा उस के पीछे चल रही थी. लेकिन उन कारों में सवार लोगों के चेहरे नहीं दिखाई दे रहे थे. तब दिल्ली पुलिस ने लेटेस्ट टैक्नोलौजी का सहारा लिया. एक स्पैशल पीसी असैंबल कर इस हत्याकांड से पहले से ले कर हत्याकांड के बाद का सारा डाटा इकट्ठा कर सर्च किया तो पता चला कि हत्यारों में से एक हत्यारा मृतक बलराज का मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है.

उस की अंतिम लोकेशन नरपुर बेर के टावर की मिली थी. उस के बाद फोन बंद हो गया था. उस फोन में चलने वाले नंबर की काल डिटेल्स से मिले नंबरों में एक नंबर गोल्फ लिंक वाले क्षेत्र में चल रहा था. उस के साथ 2 अन्य लोगों की भी लोकेशन मिल रही थी. अब तक की जांच से एसआईटी टीम, साइबर टीम और सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह को हत्यारों से जुड़े कुछ अहम सुराग मिल चुके थे. 2 फरवरी से 5 अप्रैल, 2012 तक पुलिस और हत्यारों के बीच आंखमिचौली का खेल चलता रहा. पुलिस को हत्यारों की लोकेशन तो मिल रही थी, लेकिन वे उन के हाथ नहीं लग रहे थे. जबकि पुलिस को यहां तक पता चल चुका था कि इस हत्या में 6 लोग शामिल थे. हत्या के बाद 3-3 लोग अलगअलग जगहों पर घूम रहे थे.

3 आरोपियों ने मोनिका की इनोवा कार पर फर्जी नंबर प्लेट लगा कर जगराओ और गुरदासपुर में बेचने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह बिकी नहीं. तब उन्होंने उसे लुधियाना के लोधी क्लब के पीछे खड़ी कर दी थी. 3 आरोपी हिमाचल प्रदेश में घूम रहे थे, जहां वे नयना देवी मंदिर भी गए थे. बहरहाल, पुलिस ने अपना घेरा तंग कर के इस हाईप्रोफाइल डबल मर्डर मामले के 3 आरोपियों हरविंदर उर्फ बिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू तथा उमेश कारड़ा को गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने की थी. इस के बाद बाकी 3 अभियुक्तों को गिरफ्ताल करने के लिए इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने उन के घर छापा मारा तो वे घर से फरार मिले.

लेकिन 7 अप्रैल को वार्ड नंबर 31 के प्रधान जसपाल सिंह ने उन तीनों आरोपियों रविंदर सिंह, दविंदरपाल सिंह और हसनजीत सिंह को सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह के समक्ष पेश कर दिया था. इस तरह सभी अभियुक्तों के पकड़े जाने के बाद पुलिस उच्चाधिकारियों ने जब सब से पूछताछ की गई तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त डकैती और लूटपाट करते थे. इन का निशाना अधिकतर सुनसान इलाके के फार्महाउस या वे कोठियां होती थीं, जिन में 2-4 लोग रहते थे. 1 फरवरी की रात लगभग 8 बजे ये सभी हंबड़ा रोड पर स्थित संजय अग्निहोत्री के फार्महाउस के पास लूटमार करने के इरादे से इकट्ठा हुए थे. सभी बैठे योजना बना रहे थे कि कहां धावा बोला जाए? उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि सामने वाला फार्महाउस किस का है और यहां कौन आने वाला है?

वे शराब पीते हुए लूटपाट की बातें कर रहे थे कि तभी वहां डीएसपी बलराज गिल अपने मित्र मनिंदरपाल सिंह की ओपट्रा कार से पहुंचे. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद उन की महिला मित्र मोनिका कपिला अपनी इनोवा कार से पहुंचीं. बाहर बैठे लूट की योजना बना रहे लुटेरों ने उन्हें आते देखा तो उन्हें लगा कि फार्महाउस पर इस समय ये दोनों ही हैं. उन्हें लगा कि दोनों के पास कुछ न कुछ माल तो होगा ही और अगर कुछ भी न हुआ तो 2 लग्जरी कारें तो हैं ही. यहीं हाथ मारा जाए. इस तरह आननफानन में लूट की योजना बन गई. लुटेरों के हिसाब से फार्महाऊस में 2 लोग यानी एक औरत और एक मर्द है, जबकि वे 6 थे. 2 लोगों को वे आसानी से काबू कर सकते थे.

यही सोच कर 2 लुटेरे फार्महाऊस की दीवार फांद कर अंदर आए और अंदर से लीवर घुमा कर मुख्य गेट खोल दिया. इस के बाद बाकी 4 लुटेरे भी अंदर आ गए. फार्महाऊस के कमरे में बैठे बलराज और मोनिका बातें कर रहे थे कि तभी बलराज ने पदचाप की आवाज सुनी. बाहर कौन है, यह देखने के लिए वह बाहर लौन में आए तो लुटेरों ने उन्हें दबोच लिया. अचानक हुए इस हमले से वह विचलित तो हुए, लेकिन जल्दी ही खुद को संभाल कर लुटेरों से भिड़ गए. काफी देर तक लुटेरों और बलराज के बीच हाथापाई होती रही. अंत में लुटेरों ने तेजधार हथियारों से उन पर हमला कर के उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया.

वह जमीन पर गिर पड़े तो लुटेरे उन्हें घसीट कर कमरे के अंदर ले गए और सोफे पर पटक दिया. मोनिका ने जब बलराज की हालत देखी तो अपनी जान बचाने के लिए वह कमरे से लगे बाथरूम की ओर भागीं. 2 लुटेरे मोनिका के पीछे भागे. लुटेरों को मोनिका का पीछा करते देख बलराज एक बार फिर उठे. लेकिन बाकी के 4 लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर हथियारों से उन पर फिर से वार कर दिए, जिस से उन की मौत हो गई. मोनिका का पीछा कर लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर उन का सिर बाथरूम की दीवार से टकरा दिया, जिस से उन का सिर फट गया और दीवार पर खून और सिर के बाल चिपक गए. इस के बाद मोनिका की भी उन्होंने हथियारों से वार कर के हत्या कर दी.

दोनों को मार कर लुटेरे उन के पास से नकदी, गहने, मोबाइल तथा दोनों कारें लूट कर फार्महाऊस से चले गए. जाते हुए उन्होंने फार्महाऊस का गेट बाहर से बंद कर दिया था.  इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने सभी छहों अभियुक्तों की निशानदेही पर अभियुक्त हरविंदर से बलराज गिल का सैमसंग का मोबाइल फोन, पर्स और ओपट्रा कार की चाबी बरामद की, प्रितपाल के कब्जे से एप्पल का फोन और बलराज की कलाई घड़ी बरामद की, उमेश के कब्जे से नोकिया फोन तथा इनोवा कार की चाबी बरामद की. पूछताछ एवं बरामदगी के बाद 2 मई, 2012 को सभी छहों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने समय से अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस द्वारा तैयार किए गए आरोपपत्र में 65 गवाहों को शामिल किया गया था, लेकिन अदालत में केवल 44 गवाहों के ही बयान हो सके. अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में घटनास्थल की वीडियो की 4 सीडीज और 85 फोटोग्राफ्स पेश किए गए थे. इसी बीच 4 नवंबर को अभियुक्त उमेश कारड़ा ने साथियों सहित जेल से भागने की कोशिश भी की. इस के बाद इन पर जेल से भागने का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. 1 जनवरी, 2013 को यह मुकदमा लोअर कोर्ट से एडिशनल सैशन जज प्रिया सूद की अदालत में भेज दिया गया. उसी दिन सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम किया गया.

2 फरवरी, 2013 को रविंदर और हसनजीत ने अदालत में जमानत याचिका दायर की, जिसे 11 फरवरी को खाजिर कर दिया गया. अदालत की काररवाई के दौरान 20 अगस्त, 2013 को आरोपी हरविंदर सिंह पर एक गवाह को धमकाने का मामला दर्ज हुआ. हरविंदर सिंह ने गवाह जसपाल सिंह को गवाही देने के लिए अदालत में जान से मारने की धमकी दी थी. अभियुक्त दविंदरपाल ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जो जनवरी, 2014 में मंजूर कर ली गई. अब अदालत में गवाहियां शुरू हो गई थीं.

अभियोजन पक्ष की ओर से चीफ पब्लिक प्रौसीक्यूटर सुखचैन सिंह गिल पैरवी कर रहे थे. मृतक बलराज गिल के पिता कश्मीरा सिंह की ओर से एडवोकेट हरप्रीत संधु मुकदमा लड़ रहे थे. बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट अशोक लखनपाल और नगेंद्र सिंह गोरा पेश हुए थे. 41 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने इस केस को किसी और अदालत में चलाने की याचिका दायर की, जिसे सैशन जज ने यह कह खारिज कर दिया कि अदालत बदले जाने से केस की सुनवाई में देर होगी और सुनवाई प्रभावित होगी.

गवाहियां समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद अतिरिक्त सैशन जज प्रिया सूद ने फैसला सुनाने की तारीख 9 सितंबर तय कर दी, लेकिन उस दिन वह फैसला नहीं सुना सकीं. जबकि उन्होंने सभी छहों आरोपियों को हत्याओं का दोषी करार दे दिया था. फैसला सुनाने के लिए उन्होंने 11 सितंबर की तारीख दी. दोषी करार देने के बाद जमानत पर चल रहे दोषी दविंदरपाल सिंह को तत्काल पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. माननीय जज प्रिया सूद ने 11 सितंबर 2015 को इस दोहरे हाईप्रोफाइल हत्याकांड में अभियुक्त उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ बिंदर तथा प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू को हत्याएं करने, सामान चोरी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने, सबूत खुर्दबुर्द करने तथा साजिश रचने के अपराध में दोषी करार देते हुए दोहरी उम्रकैद यानी 42 साल की कैद तथा 1-1 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

जुरमाना अदा न करने पर सजा 1-1 साल और बढ़ा दी जाएगी. रविंदर सिंह उर्फ रिंकू तथा दविंदरपाल सिंह को सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने और जाली दस्तावेज तैयार करने का दोषी करार देते हुए 3-3 साल की सजा और 5-5 हजार रुपए जुरमाने की तथा हसनजीत सिंह उर्फ हसन को साजिश रचने, सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने का दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सजा और 20 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. सजा सुनाने से पहले अभियोजन पक्ष के वकीलों ने अभियुक्तों को फांसी की सजा की मांग की थी. लेकिन अदालत ने उन की यह मांग नहीं स्वीकार की थी.

मजे की बाज यह थी कि सजा सुनने के बाद भी दोषियों के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी. 9 सितंबर को अदालत द्वारा दोषी करार देने के बाद अभियुक्त जब जेल पहुंचे थे तो उन्होंने झगड़ा कर के 3 विचाराधीन कैदियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था. हत्यारों की मानसिकता का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें सजा होने पर जब घर वाले रोने लगे तो उन्होंने कहा, ‘‘आप लोग क्यों परेशान होते हैं, सजा तो शेरों को होती है.’’ Crime Story

 

Rajasthan Crime Story: हत्यारा निकला प्रशासनिक अधिकारी

Rajasthan Crime Story: 2 बच्चों के पिता आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच ने गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपनी पत्नी नेहा की सुनियोजित तरीके से हत्या कर के उसे दुर्घटना का रूप देने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन…

नेहा को जब पता चला कि उस का रिश्ता एक आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच से पक्का हो गया है तो वह फूली नहीं समा रही थी. उस के मांबाप व घर के अन्य लोग भी खुश थे कि एक प्रशासनिक अधिकारी प्रदीप के साथ शादी के बाद नेहा राज करेगी. लड़का नेहा को हर वह खुशी देगा, जो उसे चाहिए. प्रदीप बालाच राजस्थान के बाड़मेर जिले के गांव गडरा रोड के रहने वाले प्रेम प्रकाश बालाच का बेटा था. प्रेम प्रकाश कोई बड़े आदमी नहीं थे, वह एक साधारण आदमी थे.

खेतीकिसानी से होने वाली आमदनी से उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ायालिखाया था. प्रदीप शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था. स्कूली पढ़ाई पूरी कर के कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी. बाद इस के वह राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की तैयारी करने लगा. उस की मेहनत रंग लाई और आरएएस में उस का चयन हो गया. राजस्थान इंस्टीट्यूट औफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (रीपा), जोधपुर में ट्रेनिंग करने के बाद 13 नवंबर, 2006 को प्रदीप की पहली नियुक्ति जैसलमेर में उपजिलाधिकारी के पद पर हुई. इस के बाद वह जैसलमेर में करीब 2 सालों तक विभिन्न पदों पर प्रशिक्षु के रूप में कार्य करते रहे.

जैसलमेर में तैनाती के दौरान ही 31 जनवरी, 2007 को प्रदीप की शादी बाड़मेर के रहने वाले भीमाराम की बेटी निर्मला उर्फ नेहा के साथ हुई थी. यह शादी बड़ी धूमधाम से हिंदू रीतिरिवाज से हुई थी. शादी में जैसलमेर के तत्कालीन जिलाधिकारी सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा इलाके के अनेक प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हुए थे. गोरे रंग और शर्मीले स्वभाव की नेहा जब अपनी ससुराल पहुंची तो अपने मृदु  व्यवहार से उस ने सब का मन मोह लिया. ससुराल में नेहा की सभी तारीफ कर रहे थे. इस से नेहा भी खुश हो रही थी. नेहा ने अपने दिल में ढेरों सपने संजोए थे. वह दुनिया की वे सब खुशियां पाना चाहती थी, जो एक लड़की चाहती है.

शादी के बाद प्रदीप और नेहा के नवजीवन की शुरुआत हुई. दोनों ही बेहद खुश थे. प्रदीप की छुट्टियां कब बीत गईं, पता ही नहीं चला. छुट्टियां समाप्त होने पर प्रदीप जैसलमेर में अपनी ड्यूटी पर चले गए. एक बार मायके जाने के बाद नेहा भी प्रदीप के साथ जैसलमेर में रहने लगीं. हंसीखुशी के साथ उन का समय गुजर रहा था. इसी बीच नेहा एक बेटे की मां बन गईं. बेटा पैदा होने के बाद घर में खुशी और बढ़ गई. नेहा का समय बच्चे के लालनपालन में व्यतीत होने लगा.

जैसलमेर में लगभग 2 साल रहने के बाद प्रदीप का ट्रांसफर भरतपुर हो गया. भरतपुर के बाद जहांजहां भी प्रदीप का ट्रांसफर हुआ, नेहा उन के साथ ही रही. लेकिन जब प्रदीप को जोधपुर का जिला आबकारी अधिकारी बना कर भेजा गया तो नेहा के पारिवारिक जीवन में अचानक बदलाव आ गया. वह एक और बेटे की मां बन गई. नेहा के साथ उस के सासससुर भी रह रहे थे. जोधपुर आने के बाद नेहा महसूस कर रही थी कि उस का पति उस से कुछ ज्यादा ही चिड़ाचिड़ा सा रहने लगा है. उस ने इस पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया. वह सोचती थी कि ड्यूटी की भागादौड़ी की वजह से यह सब हो रहा है, सब ठीक हो जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. ठीक होने के बजाय घर में हर समय कलह रहने लगी.

बातबात पर प्रदीप व उस की मां उसे डांटतेफटकारते थे. नेहा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग उस के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में आखिर वह क्या करे. रोजरोज की किचकिच से परेशान हो कर नेहा ने एक दिन अपनी मां पार्वती देवी व सहेलियों को यह बात बता दी. मां ने नेहा को ही समझाया कि पारिवारिक विवाद हर घर में होता है. आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा. लेकिन घर का माहौल ठीक नहीं हुआ. दिनप्रतिदिन घर में कलह बढ़ती ही गई. नेहा जैसे ही प्रदीप के सामने पड़ती, वह उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए कहता, ‘‘मैं ने तुम से शादी कर के बहुत बड़ी गलती की है. काश, मैं अपनी मनमरजी से शादी करता तो मेरा जीवन आज नरक नहीं बनता.’’

पति के मुंह से यह बात सुन कर नेहा समझ गई कि प्रदीप ने अपने घर वालों के दबाव में शादी की है. तभी तो वह इस तरह की बातें कह रहा है. नेहा कुछ कहती तो प्रदीप उस पर चिल्लाने लगता. सास तो उसे चैन से बैठने तक नहीं देती. नेहा कहां तो प्रदीप से शादी करने के बाद खुद को किस्मत वाली समझ रही थी. लेकिन अब उस के व्यवहार को देख कर सोचती थी कि इस से तो भला था वह किसी गरीब लड़के से ब्याही होती. एक रोज तो हद ही हो गई. प्रदीप ने अपने मोबाइल में एक लड़की का फोटो दिखाते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरी जिंदगी में नहीं आई होती तो मैं इस से ब्याह रचाता. क्योंकि मैं इस से प्यार करता हूं और यह मुझ से. हम दोनों अच्छे मित्र हैं.’’

यह बात सुन कर नेहा के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. अब पति की बेरुखी का कारण उस की समझ में आ गया था. नेहा ने एक दिन मौका मिलते ही प्रदीप के मोबाइल से उस की गर्लफ्रैंड की फोटो अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर ली. नेहा जब मायके गई तो वह फोटो उस ने मां को दिखाते हुए अपना दुखड़ा रोया. दामाद की हकीकत जान कर पार्वती भी हक्कीबक्की रह गई. पार्वती ने बेटी की समस्या के बारे में पति और बेटे को भी अवगत कराया. तब भीमाराम अपने कुछ रिश्तेदारों को ले कर प्रदीप के यहां गए और बेटी को तंग करने के मुद्दे पर बात की. उस समय प्रदीप ने उन से वादा किया कि वह आईंदा नेहा को तंग नहीं करेगा.

बात आईगई हो गई. नेहा भी मायके से जोधपुर लौट आई. उस के लौटने पर प्रदीप आंखें तरेर कर बोला, ‘‘अपने मांबाप से मेरी शिकायत कर के तुम ने अच्छा नहीं किया. मैं आबकारी अधिकारी हूं. इसलिए पुलिस के बड़ेबड़े अधिकारियों से मेरे अच्छे संबंध हैं. तुम पुलिस के पास जाओगी, तब भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

पति की बात सुन कर नेहा अवाक सी रह गई. कहां तो वह समझ रही थी कि प्रदीप अब उस से कुछ नहीं कहेगा, लेकिन उस ने तो पहले जैसे ही तेवर दिखाने शुरू कर दिए. नेहा की आंखें भर आईं. पति से बहस करने के बजाय वह चुप हो गई, ताकि बात न बिगड़े. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. सास और प्रदीप ने उस का जीना हराम कर दिया था. प्रदीप अकसर देर रात को घर लौटने लगा. नेहा जब उस से देर से आने की वजह पूछती तो वह कहता कि वह अपनी महिलामित्रों के साथ ऐश कर रहा था. यह सब वह नेहा को चिढ़ाने के लिए कहता था या फिर वह जो कह रहा था सच था, इस बात को वह ही जानता था.

कोई भी महिला सब कुछ सहन कर सकती है, पर यह हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती कि उस का पति किसी दूसरी महिला से नजदीकी बनाए. उसी बीच नेहा ने एक दिन पति को घर में ही एक महिला से हंसहंस कर बातें करते देख लिया. वह वही महिला थी, जिस का फोटो उस ने पति के मोबाइल में देखा था. बात गंभीर थी, इसलिए नेहा ने यह बात अपनी मां को फोन पर बता दी. बेटी की बात सुन कर मायके वाले भी बहुत आहत हुए. नेहा की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी.

वह भी चाहते थे कि किसी तरह प्रदीप पर दबाव बना कर उसे लाइन पर लाया जाए. इसलिए वह अपने गांव के कुछ संभ्रांत लोगों को ले कर प्रदीप के गांव गडरा रोड चले गए. जोधपुर से प्रदीप और उस के घर वाले भी अपने गांव चले गए. गांव में पंचायत हुई. पंचायत में प्रदीप ने फिर से वादा किया कि वह नेहा को अब तंग नहीं करेगा. मगर यह उस का मात्र दिखावा था. वह मन से नेहा को निकाल चुका था. उस के दिल में नेहा की जगह कोई और बस गई थी. यही कारण था कि नेहा के सामने वह इस तरह के हालात खड़े कर रहा था कि नेहा परेशान हो कर खुदबखुद मायके जा कर रहने लगे.

लेकिन वह उस से दूर नहीं होना चाहती थी.  प्रदीप को जब लगा कि नेहा उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं है तो वह उस से छुटकारा पाने के उपाय खोजने लगा. इस के लिए उस के दिमाग में यही उपाय आया कि किसी भी तरह नेहा को ठिकाने लगा दिया जाए. इस से उस का नेहा से हमेशा के लिए पीछा छूट जाएगा और कुछ समय बाद वह अपनी उस प्रेमिका से शादी भी कर लेगा, जिस का फोटो नेहा को दिखाया था. भोलीभाली नेहा अपने फरेबी पति के शौतानी दिमाग में मच रही खलबली से नावाकिफ थी. उस के लिए पति और दोनों बेटे ही संसार की सारी खुशियां थीं. नेहा का सोचना था कि हर काली रात के बाद उजाला जरूर होता है. आज नहीं तो कल उस के जीवन से भी अंधकार के बादल छंट जाएंगे और जीवन में उजियारा आएगा. मगर यह उस की सोच भर साबित हुई.

योजना को अंजाम देने के लिए प्रदीप नेहा को ले कर कई बार अपने गांव भी गया, लेकिन मौका न मिलने पर योजना सफल नहीं हो सकी. फिर एक दिन प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘यदि तुम मेरी बीवी बनी रहना चाहती हो तो अपने बाप से 10 लाख रुपए और एक बंगला दिलवा दो. अगर यह नहीं हुआ तो तुम्हें ठिकाने लगा कर मैं अपनी गर्लफ्रैंड से शादी कर लूंगा. मैं अधिकारी हूं, इसलिए पुलिस भी मेरा कुछ नहीं कर पाएगी.’’

यह बात नेहा के दिल पर हथौड़े की तरह लगी. उस ने इस की चर्चा अपने मायके में की. मगर मायके वालों की इतनी हैसियत नहीं थी कि वे प्रदीप की यह मांग पूरी करते. नेहा ने मांबाप की असमर्थता प्रदीप से बता दी. अब प्रदीप ने अपनी चाल चली. 15 अप्रैल, 2015 को प्रदीप नेहा को जोधपुर से ले कर बाड़मेर गया. प्रदीप अपने साथ छोटे भाई हितेश को भी ले गया था. बाड़मेर में एक रात रुक कर अगले दिन वह अपने गांव गडरा रोड गया. पति के बदले मिजाज को देख कर नेहा को शक हो गया. उस ने फोन से अपनी मां पार्वती से बात करते हुए कहा कि मुझे प्रदीप और उस के छोटे भाई हितेष पर शक हो रहा है. ये मेरे साथ कोई अनहोनी कर सकते हैं.

मां ने समझाते हुए कहा कि यह तेरा वहम है. भला वे ऐसा क्यों करेंगे?

‘‘मम्मी, वहम नहीं, न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अब मैं आप से कभी नहीं मिल सकूंगी.’’ इतना कह कर नेहा रोने लगी. मां ने धैर्य रखने को कहा.

3-4 दिन गांव में रुकने के बाद 19 अप्रैल, 2015 की रात प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘चलो, कोई पूजा करनी है, जिस से घर की सुखशांति लौट आए और रोजरोज के क्लेश से मुक्ति मिल जाए.’’

नेहा भी घर में शांति चाहती थी, इसलिए पति के साथ चली गई. पति के साथ वह चली तो गई, लेकिन उस समय कार में बैठने पर उसे डर लग रहा था. बहरहाल वह कार में बैठ कर चली तो गई, लेकिन वापस जीवित नहीं लौटी. दो-ढाई घंटे बाद प्रदीप उस की लाश ले कर वापस अपने घर लौटा. उस समय उस के साथ उस का छोटा भाई हितेष और भाजपा नेता दशरथ मेघवाल भी थे. पड़ोसियों और मोहल्ले वालों के पूछने पर प्रदीप ने विस्तार से बताया, ‘‘चलती गाड़ी का दरवाजा अचानक खुल जाने से नेहा सड़क पर गिर गई. घायल अवस्था में इसे गडरा रोड अस्पताल ले जाया गया, जहां डा. अशोक मीणा ने हालत नाजुक बताई और ऐंबुलैंस से इसे बाड़मेर ले जाने की सलाह दी. तब मैं बाड़मेर अस्पताल ले गया. लेकिन वहां के डाक्टर ने मृत घोषित कर दिया.

‘‘चूंकि मामला दुर्घटना का था, इसलिए डाक्टर ने पुलिस को सूचना दे दी. उस समय आधी रात का समय था. एक कांस्टेबल अस्पताल आया. उस ने कहा कि शव मोर्चरी में रखवा देते हैं, सुबह पोस्टमार्टम के बाद ले जाना. मैं ने सिपाही को अपना परिचय देते हुए कहा कि इन की मौत कार का गेट खुलने पर गिरने से हुई है. मैं इन का पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहता. सिपाही को मेरी बात समझ आ गई और मैं लाश को घर ले आया.’’

प्रदीप ने नेहा की मौत की खबर उस के मायके वालों को देने के बजाय सुबह नेहा का अंतिम संस्कार कर दिया. शव के ऊपर उस ने नमक डाल दिया था. नेहा मेघवाल जाति की थी और राजस्थान में मेघवाल जाति के लोगों का अंतिम संस्कार जमीन में दफना कर ही किया जाता है. मेघवाल जाति हिंदू धर्म में ही आती है, इस के बावजूद भी इस जाति के लोग चिता जलाने के बजाय अंतिम संस्कार लाश को दफना कर करते हैं. नेहा एक जिला आबकारी अधिकारी की पत्नी थी, इसलिए मीडिया वालों को जब घटना की जानकारी हुई तो प्रिंट और इलेक्ट्रौनिक मीडिया में नेहा की मौत की खबर प्रसारित हुई तो प्रदीप को जानने वाले अनेक लोग उस के गांव पहुंचने लगे.

नेहा के मायके वालों को जब नेहा की ऐक्सीडैंट में मौत होने की खबर मिली तो उस के मायके में चीखपुकार मच गई. मायके वाले प्रदीप के गांव पहुंचे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि चलती कार का गेट अचानक कैसे खुल जाएगा. अगर मान भी लिया जाए कि नेहा की मौत ऐक्सीडैंट में हुई थी तो प्रदीप ने उन्हें सूचना क्यों नहीं दी. सूचना दिए बगैर और बिना पोस्टमार्टम कराए ही, उस ने जल्दबाजी में उस का अंतिम संस्कार क्यों कर दिया. ऐसे कई सुलगते सवाल थे, जो नेहा के पिता भीमाराम एवं माता पार्वती के साथ उस के भाइयों के दिमाग में घूम रहे थे.

उन्हें ऐसा लग रहा था कि प्रदीप ने नेहा को मार कर ऐक्सीडैंट का रूप दिया है. पार्वती और भीमराम ने 22 अप्रैल, 2015 को बाड़मेर के पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख अनिल से मुलाकात कर के बेटी की शादी होने के बाद से उसे प्रताडि़त करने, दहेज मांगने की पूरी बात बताई. उन्होंने बताया कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि हत्या का मामला है. उन्होंने नेहा के पति प्रदीप बालाच, देवर हितेष और सास के ऊपर शक जताते हुए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी काररवाई करने की मांग की. नेहा की लाश का पोस्टमार्टम नहीं करवाने और मायके वालों को मौत की सूचना दिए बगैर आननफानन में लाश का अंतिम संस्कार कराने पर एसपी को भी शक हो गया.

उन्होंने गडरा रोड के थानाप्रभारी को निर्देश दिया कि प्रदीप बालाच और उस के भाई को थाने बुला कर पूछताछ की जाए, ताकि नेहा की मौत की सच्चाई सामने आ सके. उधर मीडियाकर्मी अपने स्तर पर नेहा की मौत के राज से परदा उठाने के लिए मैदान में कूद पड़े. प्रदीप बालाच ने जहां नेहा की दुर्घटना होने की बात बताई थी, उस जगह रात 10 बजे रियाज खां नाम का एक शख्स अपनी गाड़ी ले कर गुजर रहा था. रियाज ने सड़क किनारे बोलेरो देख कर अपनी गाड़ी रोक दी थी. उसे बोलेरो में लाल शर्ट पहने ड्राइवर व एक बच्चा बैठा दिखा. सड़क से दूर एक व्यक्ति टौर्च लिए खड़ा था.

रियाज ने जब ड्राइवर से पूछा कि कहां से आए हो तो उसने जवाब देने के बजाय जीप के गेट का शीशा ऊपर चढ़ा दिया. इस के बाद रियाज वहां से गाड़ी ले कर चला गया. रियाज को पत्रकारों ने ढूंढ़ निकाला था और उस से बात कर के यह साबित कर दिया था कि जरूर नेहा को मारा गया था. प्रदीप आबकारी विभाग, जोधपुर की बोलेरो जीप नंबर आरजे19यू आर1069 ले कर जोधुपर से गडरा रोड आया था. उस समय नेहा का 4 वर्षीय बेटा रजत भी था. पत्रकारों ने आबकारी विभाग, जोधपुर के ड्राइवर सुगनलाल से बात की तो उस ने बताया कि उस दिन जीप प्रदीप बालाच के पास थी. नेहा की मौत की खबर मिलने पर वह 20 अप्रैल को प्रदीप बालाच की इनोवा गाड़ी में प्रदीप के मातापिता को ले कर गडरा रोड गया था. इनोवा को गडरा में छोड़ कर वह सरकारी बोलेरो गाड़ी ले कर जोधपुर लौट आया था.

मीडिया द्वारा पुलिस को यह खबरें मिलीं तो एसपी के निर्देश पर चोहटन के सीओ नीरज पाठक ने भाजपा के पदाधिकारी दशरथ मेघवाल से पूछताछ की. दशरथ ने बताया, ‘‘मुझे फोन पर प्रदीप बालाच ने बताया था कि कार का गेट खुलने से नेहा का ऐक्सीडैंट हो गया है और मैं गाड़ी ले कर पहुंचूं. चूंकि उन से मेरे घनिष्ठ संबंध थे, इसलिए मैं गाड़ी ले कर घटनास्थल पर गया और नेहा को ले कर गडरा रोड अस्पताल गया. नेहा की हालत गंभीर थी, इसलिए वहां के डाक्टर ने उसे बाड़मेर रैफर कर दिया. बाड़मेर के डाक्टर ने नेहा को मृत घोषित कर दिया था.’’

इस के बाद सीओ नीरज पाठक ने गडरा रोड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डा. अशोक मीणा के बयान भी नोट किए. इन बयानों के बाद सीओ को जो चौंकाने वाले तथ्य मिले, उस से लगा कि प्रदीप की ससुराल वालों द्वारा लगाए आरोप सही हैं. पुलिस प्रदीप के खिलाफ पहले सबूत जुटाना चाहती थी. इसलिए 24 अप्रैल, 2015 को मैडिकल बोर्ड और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नेहा का शव जमीन से निकाल कर पोस्टमार्टम कराया. नमक डालने की वजह से शव सड़गल चुका था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नेहा की मौत सड़क हादसे में नहीं हुई थी. उस के शरीर पर ऐसी कोई गंभीर चोट नहीं थी, जिस से लगे कि उस की मौत हो गई. नेहा की मौत के कारणों को जानने के लिए विसरा को मैडिकल कालेज, जोधपुर भेज दिया गया.

पुलिस को पूछताछ में पता चला कि प्रदीप बालाच की सरकारी बोलेरो गाड़ी घटनास्थल पर मौजूद थी. इस के बाद उसे बाड़मेर रैफर करने तक प्रदीप ने 3 बार गाडि़यां बदलीं. अपनी सरकारी गाड़ी से नेहा को वह अस्पताल क्यों नहीं ले गया? उस ने अस्पताल ले जाने के लिए भाजपा नेता को क्यों बुलाया? ये सारे सबूत मिल जाने के बाद प्रदीप बालाच और उस के छोटे भाई से पूछताछ करनी जरूरी थी. पुलिस जब उस के घर पहुंची तो हितेष घर से गायब मिला और प्रदीप ने थाने आने से मना कर दिया. सीओ ने इस बात से एसपी को अवगत कराया. एसपी को प्रदीप की यह बात नागवार लगी. उन का मानना था कि सरकारी अधिकारी होने के नाते आबकारी अधिकारी प्रदीप को पुलिस जांच में सहयोग करना चाहिए.

उन्होंने सीओ नीरज पाठक के नेतृत्व में भारी पुलिस बल प्रदीप के घर 25 अप्रैल, 2015 को भेज दिया. पुलिस प्रदीप को पूछताछ के लिए गडरा रोड थाने ले आई. पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख, सीओ चोहटन नीरज पाठक, गडरा रोड थानाप्रभारी बाबूलाल विश्नोई ने प्रदीप से नेहा की हत्या से संबंधित मनोवैज्ञानिक तरीके से रातभर पूछताछ की. लेकिन वह पुलिस को गुमराह करने के लिए बारबार रोने का नाटक करता रहा. पूरी रात ऐसे ही बीत गई. सुबह को अधिकारियों ने उस से फिर पूछताछ की. इस बार वह पुलिस अधिकारियों के सवालों के चक्रव्यूह में फंस गया. आखिर उस ने पत्नी नेहा की हत्या का राज उगल दिया. वह फफकफफक कर रोते हुए बोला, ‘‘हां, मैं ने नेहा की हत्या की है. लंबे समय से कलह के कारण मैं परेशान हो गया था और बस इसी कारण मैं ने उस की जान ले ली.’’

प्रदीप ने बताया कि वह नेहा को टोनेटोटके के बहाने हेलीपैड पर ले गया. वहां टोटका करने के लिए अगरबत्ती जलाई, गेहूं, ज्वार के दाने रखे. जब नेहा पूजा कर रही थी, उस समय गाड़ी में रखे डंडे से नेहा के सिर पर वार किया, जिस से वह घायल हो गई. उसी समय उस ने अपने छोटे भाई हितेष को वहां बुला लिया. फिर वे दोनों नेहा को गाड़ी में डाल कर जैसिंधर गांव से दूर सुनसान सड़क पर ले गए. वहां उन्होंने गाड़ी रोकी और नेहा को धक्का दे कर गिरा दिया ताकि हत्या को हादसे का रूप दे सकें. बाद में उस का गला घोंट दिया.

पुलिस टीम ने जोधुपर से आबकारी विभाग की बोलेरो गाड़ी भी जब्त कर ली. इस के अलावा घटनास्थल से माचिस, लकड़ी के टुकड़े व अन्य सामग्री जब्त की. भीमाराम की तहरीर के आधार पर नेहा की हत्या का मुकदमा गडरा रोड थाना में भादंवि की धारा 302, 498ए, 201 के तहत प्रदीप बालाच, उस के छोटे भाई हितेष बालाच व मां के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. जांच एसआई बाबूलाल बिश्नोई को सौंप दी गई. पुलिस ने हितेष की गिरफ्तारी के लिए अलगअलग टीमें गठित कर उस की तलाश शुरू कर दी. प्रदीप बालाच को 27 अप्रैल को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, वहां से उसे 3 दिन के रिमांड पर ले कर उस से विस्तार से पूछताछ की और घटनास्थल की तफ्तीश कराने के साथ कई सबूत भी जुटाए.

प्रदीप ने पुलिस अधिकारियों से कहा कि पत्नी की हत्या कर के उस ने बड़ा अपराध किया है. उधर 27 अप्रैल, मंगलवार को हितेष बालाच ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. पुलिस टीम उसे भी घटनास्थल पर ले गई और मौका मुआयना कर नेहा की हत्या से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल की. हितेष को 28 अप्रैल को कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया. 30 अप्रैल को पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर प्रदीप व हितेष को बाड़मेर कोर्ट में पेश कर और रिमांड मांगा. प्रदीप को 2 दिनों के रिमांड पर दिया, वहीं हितेष को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

2 दिनों के रिमांड अविध पूर्ण होने पर गडरा पुलिस द्वारा प्रदीप बालाच को 2 मई, 2015 को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, जहां न्यायाधीश द्वारा प्रदीप बालाच को भी न्यायिक अभिरक्षा में भेजने के आदेश दिए. दोनों भाई न्यायिक अभिरक्षा में बाड़मेर जेल में बंद अपने किए की भूल पर पछताते हुए आंसू बहा रहे हैं. नेहा के दोनों मासूम बेटे मां की ममता की छांव से हमेशा के लिए दूर हो गए. 5 मई को पुलिस ने नेहा की सास को भी गिरफ्तार कर लिया. उसे धारा 498ए (दहेज के लिए प्रताडि़त करना) के तहत गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बाड़मेर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

5 मई, 2015 को राज्य सरकार ने पत्नी की हत्या के आरोपी प्रदीप को निलंबित कर दिया है. 48 घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में रहने के कारण राज्य सरकार ने निलंबन आदेश जारी किए. कथा लिखने तक प्रदीप व हितेष बाड़मेर जेल में बंद थे. Rajasthan Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों/समाचार पत्रों/नेहा के मायके पक्ष द्वारा दी जानकारी पर आधारित)