Social Story: अवनीश का खूनी खेल – कर्मो की मिली सजा

Social Story: कानपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है अकबरपुर. यह  (देहात) जिले के अंतर्गत आता है. तहसील व जिला मुख्यालय होने के कारण कस्बे में हर रोज चहलपहल रहती है. इस नगर से हो कर स्वर्णिम चतुर्भुज राष्ट्रीय मार्ग जाता है जो पूर्व में कानपुर, पटना, हावड़ा तथा पश्चिम में आगरा, दिल्ली से जुड़ा है.

इस नगर में एक ऐतिहासिक तालाब भी है जो शुक्ल तालाब के नाम से जाना जाता है. शुक्ल तालाब ऐतिहासिक वास्तुकारी का नायाब नमूना है. बताया जाता है कि सन 1553 में बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल ने शीतल शुक्ल को इस क्षेत्र का दीवान नियुक्त किया था. दीवान शीतल शुक्ल ने सन 1578 में इस ऐतिहासिक तालाब को बनवाया था.

इसी अकबरपुर कस्बे के जवाहर नगर मोहल्ले में सभासद जितेंद्र यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी अर्चना यादव के अलावा बेटी अक्षिता (5 वर्ष) तथा बेटा हनू (डेढ़ वर्ष) था. जितेंद्र के पिता कैलाश नाथ यादव भी साथ रहते थे. वह पुलिस में दरोगा थे, लेकिन अब रिटायर हो चुके हैं. जितेंद्र यादव की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उन का अपना बहुमंजिला आलीशान मकान था.

जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव पढ़ीलिखी महिला थी. वह नगर के रामगंज मोहल्ला स्थित प्राइमरी पाठशाला में सहायक शिक्षिका थी, जबकि जितेंद्र यादव समाजवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य थे. 2 साल पहले उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सभासद का चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. वर्तमान में वह जवाहर नगर (वार्ड 14) से सभासद है. जितेंद्र यादव का अपने मकान के भूतल पर कार्यालय था, साथ ही पिता कैलाश नाथ यादव रहते थे, जबकि भूतल पर जितेंद्र अपनी पत्नी अर्चना व बच्चों के साथ रहते थे.

मकान के दूसरी और तीसरी मंजिल पर 4 किराएदार रहते थे, जिन में 2 महिला पुलिसकर्मी अनीता व ऊषा प्रजापति थीं. मकान की देखरेख व किराया वसूली का काम कैलाश नाथ यादव करते थे. ऊषा का पति अवनीश प्रजापति मूलरूप से प्रयागराज जनपद के फूलपुर का रहने वाला था. महिला कांसटेबल ऊषा पहले प्रयागराज में तैनात थी. उस के साथ उस का पति भी रहता था. अवनीश वहां लैब टैक्नीशियन था, लेकिन लौकडाउन लगने के कारण मई 2020 में उस की लैब बंद हो गई थी.

ऊषा का ट्रांसफर भी प्रयागराज से कानपुर देहात जनपद के थाना अकबरपुर में हो गया था. उस के बाद वह पति अवनीश के साथ अकबरपुर कस्बे में सभासद जितेंद्र यादव के मकान में किराए पर रहने लगी थी. ऊषा की शादी अवनीश प्रजापति के साथ 4 साल पहले हुई थी. 4 साल बीत जाने के बाद भी ऊषा मां नहीं बन सकी थी. इस से उस का बेरोजगार पति अवनीश टेंशन में रहता था. अवनीश घर में ही पड़ा रहता था. उस का काम केवल इतना था कि वह पत्नी ऊषा को ड्यूटी पर अकबरपुर कोतवाली स्कूटर से छोड़ आता था और ड्यूटी समाप्त होने पर घर ले आता था.

ऊषा पुलिसकर्मी होने के बावजूद जितनी सरल स्वभाव की थी, उस का पति बेरोजगार होते हुए भी उतने ही कठोर स्वभाव का था. अवनीश की न तो किसी अन्य किराएदार से पटती थी और न मकान मालिक से. हां, वह सभासद जितेंद्र यादव से जरूर भय खाता था, जितेंद्र की पत्नी अर्चना यादव तो उसे फूटी आंख नहीं सुहाती थी. सभासद की पत्नी अर्चना यादव तथा ऊषा के पति अवनीश प्रजापति के बीच पटरी नहीं बैठती थी. दोनों के बीच अकसर तनाव बना रहता था. तनाव का पहला कारण यह था कि अवनीश साफसफाई से नहीं रहता था. वह मकान में भी गंदगी फैलाता रहता था.

अर्चना यादव शिक्षिका थीं. वह खुद भी साफसफाई से रहती थीं और मकान में रहने वाले अन्य किराएदारों को भी साफसफाई से रहने को कहती थीं. अन्य किराएदार तो अर्चना के सुझाव पर अमल करते थे, लेकिन अवनीश नहीं करता था. वह गुटखा और पान खाने का शौकीन था. पान खा कर उस की पीक कमरे के बाहर ही थूक देता था. कमरे के अंदर की साफसफाई का कूड़ा भी बाहर जमा कर देता था, जो हवा में उड़ कर पूरे फ्लोर पर फैल जाता था.

तनाव का दूसरा कारण अवनीश की बेशरमी थी. उस की नजर में खोट था. वह अर्चना को घूरघूर कर देखता था. उसे देख कर वह कभी मुसकरा देता, तो कभी कमेंट कस देता. उस की हरकतों से अर्चना गुस्सा करती तो कहता, ‘‘अर्चना भाभी, जब तुम गुस्सा करती हो तो तुम्हारा चेहरा गुलाब जैसा लाल हो जाता है और गुलाब मुझे बहुत पसंद है.’’

अर्चना ने अवनीश की हरकतों और गंदगी फैलाने की शिकायत अपने ससुर कैलाश नाथ यादव से की तो उन्होंने अवनीश को डांटाफटकारा और कमरा खाली करने को कह दिया. लेकिन अवनीश की पत्नी ऊषा ने बीच में पड़ कर मामले को शांत कर दिया. ऊषा प्रजापति ने मामला भले ही शांत कर दिया था, लेकिन अर्चना की शिकायत ने अवनीश के मन में नफरत के बीज बो दिए थे. वह मन ही मन उस से नफरत करने लगा था. अर्चना अपने बच्चों को भी अवनीश से दूर रखती थी. दरअसल, ऊषा की कोई संतान नहीं थी, अर्चना को डर था कि गोद भरने के लिए कहीं ऊषा व अवनीश उस के बच्चों पर कोई टोनाटोटका न कर दें.

एक रोज अर्चना किसी काम से छत पर जा रही थी. वह पहली मंजिल पर पहुंची तो अवनीश के कमरे के अंदरबाहर कूड़ा बिखरा देखा. इस पर उस ने गुस्से में कहा, ‘‘अवनीश कुत्ता भी पूंछ से जगह साफ कर के बैठता है, लेकिन तुम तो उस से भी गएगुजरे हो जो गंदगी में पैर फैलाए बैठे हो.’’

अर्चना की बात सुन कर अवनीश का गुस्सा बढ़ गया, ‘‘भाभी, मैं कुत्ता नहीं इंसान हूं. मुझे कुत्ता मत बनाओ. आप मकान मालकिन हैं, लेकिन इतना हक नहीं है कि आप मुझे कुत्ता कहें. आज तो मैं किसी तरह आप की बात बरदाश्त कर रहा हूं, लेकिन आइंदा नहीं करूंगा.’’

इस बार अर्चना ने अपने सभासद पति जितेंद्र से अवनीश की शिकायत की. इस पर सभासद ने अवनीश को खूब फटकार लगाई, साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर उसे मकान में रहना है तो सफाई का पूरा ध्यान रखना होगा. वरना मकान खाली कर दो. अर्चना द्वारा बारबार शिकायत करने से अवनीश के मन में नफरत और बढ़ गई. उसे लगने लगा कि अर्चना जानबूझ कर किराएदारों के सामने उस की बेइज्जती करती है. उस के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़कने लगी. वह बेइज्जती का बदला लेने की सोचने लगा.

28 फरवरी, 2021 की सुबह अवनीश ने पान की पीक कमरे के बाहर थूक दी. पीक की गंदगी को ले कर अर्चना और अवनीश में जम कर तूतूमैंमैं हुई. ऊषा ने किसी तरह पति को समझा कर शांत किया और गंदगी साफ कर दी. झगड़ा करने के बाद अवनीश दिन भर कमरे में पड़ा रहा और अर्चना को सबक सिखाने की सोचता रहा. आखिर उस ने एक बेहद खतरनाक योजना बना ली. रात 8 बजे अवनीश अपनी पत्नी ऊषा को अकबरपुर कोतवाली छोड़ने गया. वहां से लौटते समय उस ने पैट्रोल पंप से एक बोतल में आधा लीटर पैट्रोल लिया और वापस घर लौट आया.

उस ने ऊपरनीचे घूम कर पूरे मकान का जायजा लिया. ग्राउंड फ्लोर स्थित कार्यालय में सभासद जितेंद्र यादव क्षेत्रीय लोगों के साथ क्षेत्र की समस्यायों के संबंध में बातचीत कर रहे थे, कैलाश नाथ भी अपने कमरे में थे. जायजा लेने के बाद अवनीश पहली मंजिल पर आया. वहां अर्चना यादव रसोई में थी. पास में उन की 5 साल की बेटी अक्षिता तथा 18 माह का बेटा हनू भी बैठा था. अर्चना खाना पका रही थीं, जबकि दोनों बच्चे खेल रहे थे. इस बीच सिपाही अनीता कोई सामान मांगने अर्चना के पास आई. फिर वापस अपने कमरे में चली गई.

सही मौका देख कर अवनीश अपने कमरे में गया और वहां से पैट्रोल भरी बोतल ले आया. फिर वह रसोई में पहुंचा और पीछे से अर्चना यादव व उस के बच्चों पर पैट्रोल उड़ेल दिया. उस समय गैस जल रही थी, अत: पैट्रोल पड़ते ही गैस ने आग पकड़ ली. अर्चना व उस के बच्चे धूधू कर जलने लगे. आग की लपटों से घिरी अर्चना चीखी तो महिला सिपाही अनीता ने दरवाजा खोला. सामने का खौफनाक मंजर देख कर वह सहम गई. वह उसे बचाने को आगे बढ़ी तो अवनीश ने उस पर वार कर दिया. अनीता चीखनेचिल्लाने लगी.

भूतल पर सभासद जितेंद्र यादव साथियों सहित मौजूद थे. उन्होंने चीखपुकार सुनी तो पिता कैलाश नाथ व अन्य लोगों के साथ भूतल पर पहुंचे और आग की लपटों से घिरी पत्नी अर्चना व बच्चों के ऊपर कंबल डाल कर आग बुझाई. इसी बीच पकड़े जाने के डर से अवनीश भागा और केबिल के सहारे नीचे आ गया. घर के बाहर सभासद की स्कौर्पियो कार खड़ी थी. उस ने उसे भी जलाने का प्रयास किया. इसी बीच सभासद के साथियों ने उसे दौड़ाया तो वह भागने लगा. भागते समय सड़क पार करते हुए वह मिनी ट्रक की चपेट में आ गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उपचार हेतु सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया.

इधर सभासद जितेंद्र यादव ने गंभीर रूप से जली पत्नी और दोनों बच्चों को अपनी कार से प्राइवेट अस्पताल राजावत पहुंचाया. लेकिन डाक्टरों ने उन की गंभीर हालत देख कर जिला अस्पताल रेफर कर दिया. सभासद  के पिता कैलाश नाथ यादव ने घटना की सूचना पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को दी तो हड़कंप मच गया. कुछ ही देर में कोतवाल तुलसी राम पांडेय, डीएसपी संदीप सिंह, एसपी केशव कुमार चौधरी, एएसपी घनश्याम चौरसिया तथा डीएम दिनेश चंद्र जिला अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने सभासद जितेंद्र यादव को धैर्य बंधाया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया.

चूंकि अर्चना की हालत नाजुक थी. अत: जिलाधिकारी डा. दिनेश चंद्र ने अर्चना का बयान दर्ज कराने के लिए एसडीएम संजय कुशवाहा को जिला अस्पताल बुलवा लिया. संजय कुशवाहा ने अर्चना का बयान दर्ज किया. अर्चना ने कहा कि किराएदार अवनीश ने पैट्रोल डाल कर उसे और उस के दोनों मासूम बच्चों को जलाया है. जिला अस्पताल में अर्चना व उस के बच्चों की हालत बिगड़ी तो डाक्टरों ने उन्हें कानपुर शहर के उर्सला अस्पताल में रेफर कर दिया. उर्सला अस्पताल में रात 11 बजे जितेंद्र के मासूम बेटे हनू ने दम तोड़ दिया.

रात 1 बजे बेटी अक्षिता की भी सांसें थम गईं. उस के बाद 4 बजे अर्चना ने भी उर्सला अस्पताल में आखिरी सांस ली. इस के बाद तो परिवार में कोहराम मच गया. जितेंद्र पत्नी व मासूम बच्चों का शव देख कर बिलख पड़े. अर्चना की मां व भाई भी आंसू बहाने लगे. पहली मार्च को सभासद जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव व उस के मासूम बच्चों को किराएदार अवनीश द्वारा जिंदा जलाने की खबर अकबरपुर कस्बे में फैली तो सनसनी फैल गई. चूंकि मामला सभासद के परिवार का था, उन के सैकड़ों समर्थक थे. अत: उपद्रव की आशंका से पुलिस अधिकारियों ने अकबरपुर कस्बे में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

इधर अर्चना व उस के बच्चों की मौत की खबर अकबरपुर कोतवाल तुलसीराम पांडेय को मिली तो उन्होंने अवनीश व उस की पत्नी ऊषा की सुरक्षा बढ़ा दी. उन्होंने अवनीश को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर अपनी कस्टडी में ले लिया. सभासद जितेंद्र यादव की तहरीर पर कोतवाल तुलसीराम पांडेय ने भादंवि की धारा 326/302 के तहत अवनीश प्रजापति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे बंदी बना लिया. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद डीएसपी संदीप सिंह ने अभियुक्त अवनीश से घटना के संबंध में पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज किया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का भी बारीकी से निरीक्षण किया तथा साक्ष्य जुटाए.

2 मार्च, 2021 को नगरवासियों ने मृतकों की आत्माओं की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला और अंडर ब्रिज के नीचे उन की फोटो पर पुष्प अर्पित किए. अनेक युवकों के हाथों में हस्तलिखित तख्तियां थी. उन की मांग थी कि हत्यारे को फांसी की सजा मिले. युवक सीबीआई जांच की भी मांग कर रहे थे. उन को शक था कि इस साजिश में कुछ और लोग भी शामिल हैं, जिन का परदाफाश होना जरूरी है.

3 मार्च, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त अवनीश प्रजापति को कानपुर देहात की माती कोर्ट में मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सभासद जितेंद्र यादव और उन के पिता इस हृदयविदारक घटना से बेहद दुखी हैं. जितेंद्र यादव से दर्द साझा किया गया तो वह फफक पड़े. बोले, ‘किस पर भरोसा करूं. चंद मिनटों में ही हमारा सब कुछ खत्म हो गया. किराएदार ऐसा कर सकता है, कभी सोचा नहीं था. अवनीश ने मेरे परिवार को योजना बना कर जलाया है. बदले की आग में उस ने हमारी दुनिया ही उजाड़ डाली.’ Social Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Mumbai News: राधे मां का मायावी संसार

Mumbai News: राधे मां का मामला सामने आने के बाद यह बात साफ हो गई है कि साधुसंत हो या कोई तथाकथित अध्यात्म का ठेकेदार, सब के लिए मार्केटिंग जरूरी है. जितनी अच्छी मार्केटिंग होगी, उतना ही लाभ मिलेगा. अगर खूबसूरती पर आडंबर का आवरण चढ़ा दिया जाए तो कहना ही क्या…

वहां अनगिनत लोगों का जमावड़ा था. अधिकांश के माथे पर राधे मां के नाम की लाल पट्टी बंधी थी. भीड़ के बावजूद वहां पुलिस नहीं थी, अलबत्ता कैमरों के साथ बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी जरूर मौजूद थे. जिन में पलपल की खबर देने की होड़ सी लगी थी. जिस जगह यह जमावड़ा लगा था वह थी मुंबई में बालकेश्वर इलाके के एक बड़े मकान के सामने की खुली जगह. उस दिन तारीख थी इसी साल की 14 अगस्त. सुबह का वक्त. इस जगह को प्रैस वालों ने पिछले रोज तब से ही अपने कैमरों के फोकस पर ले रखा था, जब मुंबई की ढिंडोसी कोर्ट के माननीय सेशन जज वी.ए. राउत ने राधे मां के खिलाफ दर्ज दहेज प्रताड़ना के केस में उन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी.

यह आपराधिक प्रकरण मुंबई के थाना कांदिवली में 7 लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ था. इन में 6 लोगों से पुलिस ने पूछताछ पूरी कर ली थी, जिन्हें अदालत से अग्रिम जमानत भी मिल चुकी थी. सातवीं आरोपी राधे मां थीं, जिन से पूछताछ करने के लिए पुलिस ने सम्मन भेज कर उन्हें 14 अगस्त को दोपहर 12 बजे थाना कांदिवली बुलाया था. शुरू में राधे मां ने शायद इस सब को हल्केपन से लिया था. दरअसल, उन का मानना था कि कोई उन के खिलाफ कुछ भी कहता रहे, न तो पुलिस उन का कुछ बिगाड़ सकती है और न कोई कानून. संभवत: राधे मां को यह भी भरोसा था कि उन की कथित महानता के चलते पुलिस उन के खिलाफ कोई केस दर्ज करने की हिम्मत नहीं कर पाएगी.

उन के इस अति आत्मविश्वास का कारण था, उन के अनुयायियों में महानगर के तमाम बड़ेबड़े प्रभावशाली लोगों का होना, जिन में कई जानीमानी फिल्मी हस्तियां भी थीं. वैसे भी उन के भक्तों का दायरा इतना बड़ा था कि अपनी धर्मगुरु राधे मां के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की स्थिति में वे जमीनआसमान एक कर सकते थे. यही वजह थी कि राधे मां के खिलाफ आवाजें उठते ही बड़ी संख्या में लोग उन के आश्रम पर एकत्रित होने लगे. कई लोग ऐसे भी थे जो फोन कर के उन्हें हर तरह से आश्वस्त कर रहे थे.

राधे मां का आश्रम बोरीवली स्थित एक विशाल इमारत के 5वें माले पर था. इस बिल्डिंग के छठें माले पर राधे मां ने अपना निजी आवास बना रखा था, जहां उन की अनुमति के बगैर कोई नहीं आजा सकता था. जिस इमारत में आश्रम और राधे मां का निवास है वह मुंबई (मलाड) की मशहूर एम.एम. मिठाईवाला चेन के मालिक मनमोहन गुप्ता की है. पूरा गुप्ता परिवार राधे मां का अनन्य भक्त है. परिवार के मुखिया मनमोहन गुप्ता राधे मां के आदेश के बिना न तो कोई व्यापारिक फैसला लेते हैं और न ही पारिवारिक.

मनमोहन गुप्ता का एक भांजा है नकुल. 30 अप्रैल, 2012 को उस की शादी मुंबई के ही कांदिवली इलाके की रहने वाली निक्की अग्रवाल से हुई थी. यह शादी राधे मां की अनुमति से ही संपन्न हुई थी. लेकिन चंद रोज बाद ही यह विवाह टूटने के कगार पर पहुंच गया था. इस की वजह बताई जा रही हैं राधे मां. कम से कम निक्की का तो यही कहना है. 16 जुलाई, 2015 को निक्की ने इस संबंध में थाना कांदिवली में भादंवि की धाराओं 498ए, 406 एवं 506 के तहत गुप्ता परिवार के 6 सदस्यों के अलावा राधे मां को भी नामजद करते हुए अपनी रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. यह प्राथमिकी पुलिस ने अदालती आदेश पर दर्ज की थी.

अपनी इस रिपोर्ट में निक्की ने जिस पर सब से ज्यादा आरोप लगाए थे, वह थीं राधे मां. निक्की के आरोप के अनुसार यह शादी न केवल राधे मां की अनुमति से हुई थी, बल्कि शादी से जुड़े अन्य मामलों में भी उन का पूरा दखल था. दानदहेज की बातें भी उन्होंने ही खुल कर की थीं. बकौल निक्की सब कुछ तय हो जाने के बाद राधे मां ने शादी में शिरकत करने के लिए वायुमार्ग से आने की बात कहते हुए एक विशेष हेलीकौप्टर, लग्जरी गाड़ी व 25 लाख रुपयों की मांग की थी, जो उस के घर वाले उन की इच्छा के मुताबिक पूरी नहीं कर पाए. निक्की के अनुसार दहेज में 25 लाख रुपए दे दिए जाने के बावजूद राधे मां शेष मांगें पूरी न होने की वजह से खफा हो गईं.

शादी हो जाने के बाद इसी की सजा देने के लिए उन्होंने उसे तब अपने यहां हाजिर होने का फरमान सुना दिया, जब वह अपने पति के साथ हनीमून पर विदेश गई हुई थी. अपनी गुरुमां के आदेश की अवहेलना करना उस के पति के बूते की बात नहीं थी. लिहाजा हनीमून बीच में छोड़ नकुल ने वापस लौट कर उसे राधे मां के सामने पेश कर दिया. निक्की द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार इस के बाद राधे मां ने उसे अपनी सेविका बना कर अपने निवास पर रख लिया, जहां उस से साफसफाई करने से ले कर कई ऐसे कार्य भी करवाए जाते थे जिन्हें करने के बारे में उस ने अपने घर में कभी सोचा तक नहीं था.

बकौल निक्की इन कामों में जरा सी भी कोताही होने पर उसे राधे मां के गुस्से का शिकार बनना पड़ता था. राधे मां उस के प्रति न केवल कठोर शब्दों का इस्तेमाल करती थीं बल्कि उस के जिस्म के हिस्सों पर अपने त्रिशूल की नोक चुभो कर उसे बुरी तरह प्रताडि़त भी करती थीं. बाद में वह उस की ससुराल वालों को बुलवा कर उन से उस की पिटाई भी करवाती थीं. उस वक्त राधे मां निक्की को संबोधित कर के कहती थीं, ‘‘आगे से कभी भी मुझे न कहने की जुर्रत मत करना.’’

निक्की ने पुलिस को बताया कि उस के परिवार वालों ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्चा कर के उस की शादी बड़ी धूमधाम से की थी, जिस में अच्छाखासा दहेज भी दिया गया था. लेकिन उस का जीवन नर्क बना दिए जाने के बावजूद उस की ससुराल वाले उस के मातापिता से 65 लाख रुपए नगद मांग कर रहे थे.

बकौल निक्की यह सब राधे मां के कहने पर किया जा रहा था. राधे मां ने उसे एक तरह से अपनी बंधक बना लिया था. तमाम तरह की प्रताड़नाओं की वजह से उस का जीवन नर्क बनता जा रहा था. न कोई उसे बचाने वाला था, न ही उस की बात सुनने वाला. उस के मातापिता व भाई रौनक अग्रवाल उस की दशा देख कर अलग खून के आंसू रो रहे थे. लेकिन राधे मां के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत उन में भी नहीं थी. निक्की की सोच के मुताबिक राधे मां ने शायद उस पर काला जादू कर के उसे अपने वश में कर रखा था. वह जितना भी इस जाल से निकलने का प्रयास करती, उतना ही और ज्यादा फंसती जाती थी. आखिर जैसेतैसे एक दिन वह राधे मां के जाल से निकल कर अपने घर पहुंचने में सफल हो गई.

इस के बाद उस ने वकील सन्नी वास्कर से मिल कर अपनी तहरीर तैयार की और इसे ले कर पुलिस के पास पहुंची. लेकिन जब पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की तो उस ने अदालत में अपनी याचिका लगाई. आखिर अदालत ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर के काररवाई करने का निर्देश दिया. निक्की की शिकायत पर पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर के 6 लोगों के बयान लिए और राधे मां को थाने में पेश होने का लिखित आदेश दिया.

राधे मां के पास जब यह आदेश पहुंचा तब वह बोरीवली स्थित अपने आवास पर थीं, जहां से वह अचानक गायब हो गईं. पुलिस को संदेह हुआ कि कहीं वह विदेश भागने की कोशिश न करें, लिहाजा इस संबंध में रेड कौर्नर नोटिस जारी कर के उन की फोटो के साथ सभी हवाईअड्डों को सूचित कर दिया गया. इधर यह सब चल रहा था, उधर मुंबई की एक वकील फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट ने राधे मां पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाते हुए उन के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी. इस बारे में फाल्गुनी का कहना था कि राधे मां की कथित महिमा के बारे में सुन कर वह खुद उन के दरबार में गई थीं. वहां का माहौल एकदम अभद्र व अश्लील था, जिस से आहत हो कर उन्होंने राधे मां के खिलाफ बोरीवली थाने में शिकायत दर्ज करवाई.

बकौल फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट राधे मां अपने यहां लोगों को देर रात की पार्टियों में बुलाती हैं, जिस में वह बौलीवुड के गानों पर लोगों के साथ नाचती हैं. इतना ही नहीं, बल्कि वह अपने भक्तों खासकर पुरुषों को उन्हें गोद में उठा कर झूला झुलाने और चूमने को भी कहती हैं. मुंबई में जगहजगह राधे मां के होर्डिंग्स लगे हुए थे. उन्हें दुर्गा मां का अवतार कह कर प्रचारित किया गया था. वह रहती भी अपनी अलग वेशभूषा में थीं. निहायत कीमती लाल सुर्ख जोड़े के साथ महंगे आभूषणों से लदीफदी राधे मां के चेहरे पर फिल्मी तारिकाओं जैसी चमक और सौंदर्य झलकता था. वह गहरे लाल रंग की लिपस्टिक का इस्तेमाल करती थीं. उन के माथे पर गहरे लाल रंग की लंबी रेखा खिंची रहती थी.

केशविन्यास भी फिल्मी तारिकाओं से कम नहीं था, जिस में दाईं तरफ बालों में गुलाब का फूल टंका रहता था. इस कथित दिव्य रूप के साथ राधे मां के दाएं हाथ में गोटे वाली लाल रंग की चुनरी में लिपटा छोटा सा त्रिशूल होता था और बायां हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में उठा रहता था. संभवत: मार्केटिंग को ध्यान में रखते हुए राधे मां का यही स्वरूप जनमानस को परोसा गया था. अपनी इसी छवि के साथ राधे मां आम लोगों के जेहन में समाई हुई थीं. दरअसल अगर कोई व्यक्ति उन का भक्त नहीं भी था तो भी वह उन के इस रूप को राधे मां के रूप में पहचानता था. इस कथित दिव्य चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा भी छिपा हो सकता था, इस बारे में अभी तक शायद किसी ने सोचने की जहमत नहीं उठाई थी.

लेकिन खुद को देवी का अवतार बताने वाली राधे मां के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने का जरा सा धुआं क्या उठा कि छोटे रूप में ही सही आग की चिंगारियां नजर आने लगीं. इन चिंगारियों की चमक तब और बढ़ गई जब सोशल साइट्स पर राधे मां का एक वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में वह अपने चिरपरिचित परिधान की जगह थोड़े मौडर्न लिबास में फिल्मी गाने की धुन पर हिरणी वाले अंदाज में ठुमके लगाती हुई नजर आईं.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, किसी ने उन के कुछ ऐसे अभद्र चित्र भी नेट पर डाल दिए, जिन में वह निहायत आधुनिक लिबास पहने नजर आ रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने आधेअधूरे मौडर्न कपड़ों में मौडलिंग का सेशन करवाया हो. अभी तक यह रहस्य ही था कि आखिर राधे मां के इस तरह के फोटो जुटा कर किस ने सार्वजनिक कर दिए. इसी बीच टीवी कलाकार राहुल महाजन ने एक टीवी चैनल पर आ कर बताया कि ये फोटो उन्होंने अपने एक मित्र से हासिल कर के सार्वजनिक किए थे ताकि ऐसे ढोंगी साधुसंतों की सच्चाई लोगों के सामने आ सके.

इस के साथ ही राधे मां का हर क्रियाकलाप ब्रेकिंग न्यूज बनने लगा. सभी न्यूज चैनलों पर राधे मां पर होने वाली परिचर्चा दिखाई जाने लगी. कोई राधे मां के हक में बोल रहा था तो कोई विरोध में. अखबारों के पन्ने भी इस तरह के समाचारों से रंगने लगे थे. घरघर में राधे मां की चर्चा हो रही थी. दूसरी ओर अपने खिलाफ मामला दर्ज होने और पुलिस द्वारा थाने में पेश होने का सम्मन मिलने पर राधे मां अपने बोरीवली आश्रम कम निवास से गायब हो गईं. इस से पुलिस को संदेह हुआ कि राधे मां विदेश भागने की कोशिश कर सकती हैं. इसी के मद्देनजर उन के खिलाफ रेड कौर्नर नोटिस जारी कर दिया गया.

पुलिस को तो राधे मां की तलाश थी ही, मीडिया भी उन की खोजखबर लेने के लिए दिनरात शिद्दत से जुटा था. आखिर 8 अगस्त की भोर में कुछ मीडियाकर्मियों को पता चला कि राधे मां अपने खास भक्तों के साथ महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित एक बड़े होटल में ठहरी हैं. उन्हें यह भी पता चला कि वह होटल से सुबहसुबह नांदेड़ के लिए रवाना हो जाएंगी. इस का नतीजा यह हुआ कि जब राधे मां नांदेड़ जाने के लिए तैयार हो कर होटल से बाहर निकलीं तो पत्रकारों ने उन्हें घेर कर सवाल दागने शुरू कर दिए, जिस पर एक बार तो वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर गईं. इस पर उन के साथी पत्रकारों को लताड़ते हुए उन्हें गोद में उठा कर उन की कार तक ले गए. इस बीच वह होश में आ गई थीं.

राधे मां के पास काले रंग की चमचमाती विदेशी जगुआर कार थी. भारतीय मुद्रा में इस कार की कीमत करीब एक करोड़ रुपए है. इस कार में ड्राइवर के साथ वाली सीट हटा कर लाल रंग का सिंहासन लगवा दिया गया था. साथ ही इस के नीचे आने वाले कार के पहिए पर भी लाल रंग पोत दिया गया था. अन्य तीनों पहिए जिस तरह के थे, उन्हें वैसा ही रहने दिया गया था. पत्रकार लगातार प्रश्न पूछते हुए राधे मां के पीछे आ गए थे. राधे मां के साथियों ने जब उन्हें ले जा कर गाड़ी में बने सिंहासन पर बैठा दिया तो वह एक बार तो अपना चेहरा हाथों में छिपा कर रोने लगीं. फिर अचानक खिड़की का शीशा नीचे करते हुए पत्रकारों से मुखातिब हो कर बोलीं, ‘‘मैं मीडिया, पुलिस और कानून का सम्मान करती हूं. मेरा न्याय मेरा भगवान करेगा.’’

इस के बाद वह अपने समर्थकों समेत नांदेड़ के लिए रवाना हो गईं. मीडिया भी उन के पीछे लगा रहा. नांदेड़ के एक बड़े गुरुद्वारे में जा कर राधे मां ने मत्था टेका और अरदास की. 9 तारीख को वह मुंबई लौट आईं. इसी दिन किसी ने उन की वेबसाइट को हैक कर लिया. मातामणि श्री राधे गुरु मां चैरिटेबल ट्रस्ट के कार्यकारी ट्रस्टी संजीव गुप्ता ने इस बारे में पत्रकारों को बताया कि किसी शरारती तत्व ने वेबसाइट हैक कर के उस पर लिख दिया था— ‘प्लीज, ढोंग करने वाले किसी तथाकथित संत को मत पूजो. आप लोग मेहनत कीजिए. राधे मां को पूजने से कुछ नहीं होगा.’

बहरहाल जल्दी ही वेबसाइट को ठीक कर दिया गया. बहरहाल, मुंबई लौट कर राधे मां एक मजार पर चादर चढ़ाने भी गईं. इस के साथ ही उन्होंने कांदिवली थाने में एक लिखित प्रार्थनापत्र दे कर इस बात की गुजारिश की कि 14 अगस्त की बजाय थाने में उन की पेशी 26 अगस्त तक के लिए मुल्तवी कर दी जाए. दरअसल राधे मां के एक बेटे को हीरो के रूप में ले कर एक फिल्म निर्माता फिल्म बना रहे थे ‘इश्क डौट कौम’. इस फिल्म की शूटिंग बैंकाक में हो रही थी, जिसे देखने के लिए राधे मां को वहां जाना था. लेकिन पुलिस ने उन का यह अनुरोध अस्वीकार करते हुए अपना सख्त आदेश भिजवा दिया कि वह किसी भी सूरत में 14 अगस्त, 2015 को दिन के ठीक 12 बजे थाने में हाजिर हो जाएं, यही उन के हित में होगा.

नांदेड़ से मुंबई लौटने पर राधे मां बोरीवली न जा कर बालकेश्वर इलाके में स्थित अपने दूसरे आवास पर जा कर ठहर गई थीं. यहीं से उन्हें थाना कांदिवली पहुंचना था. इस जगह से थाने की दूरी करीब 30 किलोमीटर थी. मुंबई के ट्रैफिक को देखते हुए डेढ़-2 घंटे का वक्त लग सकता था. लिहाजा तय हुआ कि वहां से 10 बजे निकला जाए. अपने चिरपरिचित अंदाज में राधे मां सही वक्त पर अपने इस निवास से निकल भी आईं. लेकिन बाहर आते ही उन्हें पत्रकारों ने घेर लिया, जिस पर राधे मां ने इतना ही कहा, ‘‘देखिए, मैं पूरी तरह प्योर और पायस हूं. मैं ने आज तक कभी किसी का दिल नहीं दुखाया. मैं पूरी तरह प्योर हूं.’’

फिर उन्होंने पहले तो आम प्रचलित कवितानुमा बात कही, ‘‘सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से.’’

इस के बाद राधे मां ने कबीर के इस दोहे का उल्लेख किया, ‘‘साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप. जाके हृदय साच है ताके हृदय आप.’’

इस के बाद राधे मां ने खुद को बेकसूर कहते हुए फरमाया कि वह पैसे वाली देवी हैं, उन के श्रद्धालु उन्हें इतना चढ़ावा चढ़ाते हैं कि उन्हें पैसों की कोई कमी नहीं है. ऐसे में वह निक्की के परिवार वालों से पैसा क्यों मांगेगी? जबकि वह तो हमेशा दूसरों की मदद करती आई हैं. इसी मौके पर राधे मां ने इलैक्ट्रौनिक मीडिया के एक फोटोग्राफर से कहा, ‘‘बेटा, इस वक्त भी मेरी गाड़ी में 20 लाख रुपया पड़ा है, जिसे मैं जिसे चाहूं दे सकती हूं. तुम्हारा कैमरा अगर टूट जाए तो चिंता नहीं करना. मैं ले कर दूंगी तुम्हें नया कैमरा.’’

खैर, अपने साथियों, छोटी मां व टल्ली बाबा समेत वह अपने 60 समर्थकों सहित दिन के ठीक पौने 11 बजे कांदिवली थाने के लिए रवाना हो गईं. इस बार वह काले रंग की अपनी जगुआर कार पर न जा कर सफेद रंग की फार्चुनर गाड़ी से निकली थीं. बहरहाल, राधे मां ने थाने में क्या कहा, यह जानने से पहले उन का इतिहास खंगालने की कोशिश करते हैं. राधे मां का वास्तविक नाम है सुखविंदर कौर. कुछ लोग उन्हें बब्बो के नाम से भी जानते हैं. उन का जन्म 4 अप्रैल, 1965 को जिला गुरदासपुर (पंजाब) के गांव दोरांगला निवासी अजीत सिंह के यहां हुआ था.

उन की 3 बहनें और 2 भाई थे. अजीत सिंह पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में नौकरी करते थे. अपनी पुत्रवधू की हत्या में सजा भुगतने के बाद 2014 में उन की मृत्यु हो गई थी. सुखविंदर ने गांव के सरकारी स्कूल से 10वीं पास की थी. जब वह कुल 17 साल की थी, तभी उस की शादी कर दी गई. उस की ससुराल जिला होशियारपुर के कस्बा मुकेरियां में थी. उस का पति मोहन सिंह अपने पिता करम सिंह हलवाई के साथ दुकान पर काम करता था.

सुखविंदर को धर्मकर्म में बचपन से ही रुचि थी. शादी के बाद भी उस का धर्मकर्म के प्रति लगाव बना रहा. इत्तफाक से उस की कही कई बातें सच हो गई थीं. इसी को ध्यान में रख कर उस ने अपने पति के बारे में भी भविष्यवाणी की कि विदेश में जा कर काम करने से वह अच्छा पैसा कमा सकते हैं. मोहन सिंह पत्नी की बात मानते हुए दोहा कतर चले गए. तब तक सुखविंदर 3 बच्चों की मां बन चुकी थी.

पति के विदेश जाने के बाद घरगृहस्थी चलाने के लिए सुखविंदर ने घर पर ही कपड़े सिलने का काम शुरू कर दिया. लेकिन उस ने अपनी भक्ति में कमी नहीं आने दी. स्थानीय काली मंदिर में जा कर वह घंटों काली मां की पूजाअर्चना किया करती थी. धीरेधीरे वह अध्यात्म की दिशा में मुड़ कर मुकेरियां स्थित डेरा परमहंस बाबा के महंत रामादीन दास की शिष्या बन गई. महंत ने उसे आध्यात्मिक दीक्षा दी. साथ ही नया नाम दिया—राधे मां.

इस के बाद सुखविंदर राधे मां के रूप में सत्संग करने लगीं. वैसे भी लोग अब उन्हें राधे मां के नाम से ही जाननेपुकारने लगे थे. खानपुर में मां भगवती मंदिर राधे मां का आध्यात्मिक केंद्र बन गया. आज भी वहां के लोगों का कहना है कि इस तरह के सत्संग के दौरान वह अपने भक्तों को वरदान देती थीं, जिस से उन के संकट दूर हो जाते थे. उन दिनों खुद को देवी का अवतार कहते हुए राधे मां जागरण भी किया करती थीं. सन 2002 में राधे मां ने फगवाड़ा में ऐसे ही एक भव्य जागरण का आयोजन करवाया, जिस में उन्होंने खुद को मां दुर्गा के अवतार के तौर पर प्रचारित करने का प्रयास किया. फगवाड़ा में रहने वाले विश्व हिंदू परिषद के नेता सुरेंद्र मित्तल ने इस बात का विरोध किया.

30 मार्च 2002 को हुए जागरण के बाद राधे मां एक कारोबारी अरण नंदा के दीवान हाउस में ठहरी हुई थीं. सुरेंद्र मित्तल ने अपने साथियों के साथ वहां पहुंच कर राधे मां का विरोध किया. यह विरोध प्रदर्शन 3 घंटों तक चला. मौके पर स्थानीय पुलिस भी पहुंच गई थी. आखिर राधे मां द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगे जाने के बाद यह प्रदर्शन खत्म हो पाया. जो भी था, एक जगह राधे मां का विरोध हुआ तो 10 जगह जयजयकार भी होती रही. राधे मां प्रवचन सुनातीं व जागरण करतीं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देतीं. भक्त भी कहते रहे कि राधे मां के आशीर्वाद से उन के कष्ट दूर हो गए हैं.

कहते हैं कि ऐसा ही एक आशीर्वाद राधे मां ने मुंबई के एक भक्त मनमोहन गुप्ता को भी दिया था. काम हो जाने पर वह राधे मां से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्हें अपने साथ मुंबई ले गए. इस तरह मुंबई का जानामाना गुप्ता परिवार राधे मां का अनन्य भक्त बन गया. मनमोहन गुप्ता का लड़का संजय गुप्ता अपनी ग्लोबल एडवरटाइजिंग एजेंसी चलाता था. यह एजेंसी बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगाने का काम करती थी. संजय गुप्ता ने अपने इस व्यवसाय के माध्यम से राधे मां को उच्च श्रेणी की देवी बना कर लोगों के सामने पेश किया और अपने बोरीवली वाले विशाल बंगले की 2 मंजिलें उन्हें दे दीं. राधे मां को विदेशी जगुआर गाड़ी भी संजय गुप्ता ने ही भेंट की थी.

फलस्वरूप गुप्ता परिवार की बदौलत कुछ ही सालों में राधे मां की प्रसिद्धि इस तरह आसमान छूने लगी कि 2 अगस्त, 2012 को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि ने गुरु पूर्णिमा पर अनुष्ठानों के साथ राधे मां को महामंडलेश्वर की पदवी से नवाज दिया. इस अलंकरण समारोह को पूरी तरह गुप्त रखा गया था. अखाड़े के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार महामंडलेश्वर पदवी मिलने के अगले ही दिन राधे मां मुंबई चली गई थीं. इस के बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी दिए जाने पर कई सवाल उठने लगे.

जांच के लिए राधे मां के आध्यात्मिक गुरु स्वामी पंचनंद के नेतृत्व में 11 सदस्यीय जांच समिति बनी. समिति ने राधे मां के जीवन से जुड़े विभिन्न स्थानों पर जा कर जांच की. इस के बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी से निलंबित कर दिया गया था. इस से पहले द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने राधे मां को नासिक कुंभ मेले में औपचारिक शाही स्नान में हिस्सा लेने से रोक दिया था. अखाड़ों में संतों के बीच राधे मां को ले कर भले ही कुछ भी चलता रहा हो, मुंबई में राधे मां का दबदबा तब तक पूरी तरह कायम रहा, जब तक निक्की ने उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई थी. निक्की की उसी रिपोर्ट ने उन्हें थाने पहुंचने को मजबूर कर दिया था.

बहरहाल, 14 अगस्त 2015 को दिन के ठीक पौने 11 बजे बालकेश्वर से चला राधे मां का काफिला 12 बज कर 20 मिनट पर थाना कांदिवली जा पहुंचा. मामले की नजाकत को देखते हुए थाने में भारी पुलिस बल का प्रबंध किया गया था. राधे मां के अलावा किसी को भी थाने के भीतर नहीं जाने दिया गया. थाने के विशेष रूम में 3 महिला इंसपेक्टरों और एक पुरुष इंसपेक्टर ने राधे मां से 75 सवालों की सूची के साथ 4 घंटे 42 मिनट तक पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान 25 मिनट तक राधे मां रोईं और एक बार बेहोश भी हुईं. तब उन्हें वातानुकूलित कमरे में ले जा कर उन की सहायक छोटी मां को भीतर बुलाया गया जो लगातार उन्हें टेट्रापैक जूस व काजू देती रहीं.

इस बीच राधे मां के वकील अशोक गुप्ते व आबाद कोंडा उन्हें हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत दिलवाने का प्रयास करते रहे जो आखिर स्वीकार कर ली गई. यह जमानत 2 हफ्तों के लिए स्वीकार की गई. साथ ही राधे मां को इस बात का निर्देश भी दिया गया कि उन्हें तय समय पर मामले की जांच के सिलसिले में कांदिवली पुलिस थाने जाना होगा. यह सिलसिला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि इस दौरान अन्य कई जगहों पर राधे मां के खिलाफ शिकायतें दर्ज हो गईं. जगहजगह आक्रोश भी प्रकट हो रहा था.

इस सिलसिले में मुकेरियां में हिंदू संगठनों ने न केवल उन के विरोध में प्रदर्शन किया, बल्कि उन का पुतला जला कर उन के चित्रों वाले होर्डिंग्स पर कालिख पोत दी गई. तमाम संतों के बीच वह बहस का मुद्दा तो बनी ही रहीं. यहां तक कि राधे मां का मामला लोकसभा में भी गूंजा. सदन में सरकार से फरजी साधूसाध्वियों के खिलाफ कठोर कदम उठाने की मांग की जाती रही. मलोट कस्बे के वकील चूनीलाल भारती ने स्थानीय सिटी पुलिस में राधे मां के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करवाते हुए आरोप लगाया कि राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर खुद को दुर्गा मां का अवतार बता कर चौकी लगाती हैं. इस से जहां वह अंधविश्वास फैला रही हैं, वहीं वह धार्मिक भावनाओं से भी खिलवाड़ कर रही हैं. बकौल वकील भारती राधे मां ने यह पाखंड रच कर 1000 करोड़ की संपत्ति एकत्र की है.

राधे मां पर एक आरोप उन के भाई के ससुराल वालों ने भी लगाया है. आरोप के अनुसार पंजाब के गांव नानोमंगल निवासी बलविंदर कौर की शादी राधे मां के भाई सुखबीर सिंह हुई थी. बलविंदर आंगनवाड़ी में सरकारी नौकरी करती थी. शादी के 6 साल बाद तक उसे बच्चा नहीं हुआ तो 6 जून, 2002 को गला दबा कर उस की हत्या कर दी गई. इस आरोप में राधे मां के पिता अजीत सिंह और भाइयों सुखबीर सिंह व निर्मल सिंह के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हुआ. 11 अक्तूबर 2004 को इन तीनों को 10-10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी. बलविंदर के भाई जगतार सिंह ने आरोप लगाया है कि उस की बहन की हत्या के षडयंत्र में राधे मां भी शामिल थी, लेकिन उस के खिलाफ कुछ नहीं किया गया. अब इस की विस्तृत जांच की जाए.

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा-चंबा सीमा पर स्थित हटली राम मंदिर के महंत श्यामसुंदर ने बताया कि वह और राधे मां गुरु रामादीन दास परमहंस के शिष्य थे. गुरुजी ने ही सुखविंदर कौर को राधे मां बनाया था. महंत श्यामसुंदर का आरोप है कि गुरुजी की संपत्ति हथियाने के मकसद से राधे मां एक बार उन्हें अपने साथ विदेश ले गईं, जहां से वापस आने पर गुरुजी इस कदर बीमार हुए कि आखिर मौत की नींद ही सो गए. महंत श्यामसुंदर को आशंका है कि अब राधे मां से उन्हें भी जान का खतरा है.

14 अगस्त को फगवाड़ा निवासी सुरेंद्र मित्तल ने एसएसपी कपूरथला को लिखित शिकायत दे कर राधे मां, उस की बहन राजेंद्र कौर उर्फ रज्जी मौसी, रितु सरीन उर्फ छोटी मां, उस की पुत्रवधू मेघा सिंह व संजीव गुप्ता पर धमकाने, अश्लीलता फैलाने व आडंबर रच कर हिंदू धर्म को ठेस पहुंचाने के आरोप लगाए हैं. लुधियाना में भी इस तरह की एक शिकायत अदालत में दर्ज हुई है. फिल्म अभिनेत्री डौली बिंद्रा पहले राधे मां की मुरीद थीं, अब उन्होंने भी इसी तरह की शिकायत मुंबई पुलिस में की है.

फिल्म अभिनेता ऋषि कपूर खुल कर राधे मां के खिलाफ बोले, तो दिग्गज फिल्म निर्माता सुभाष घई ने उन के हक की बात की. गायक सोनू निगम तो पूरी तरह राधे मां के समर्थन में उतर पड़े. 17 अगस्त 2015 को उन्होंने राधे मां के समर्थन में एक के बाद एक ट्वीट कर के उन का समर्थन करते हुए उन की तुलना काली मां से कर डाली. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, ‘काली मां को तो राधे मां से भी कम कपड़ों में दर्शाया गया है, यह बहुत रोचक है कि यह देश कपड़ों की वजह से एक महिला पर केस चलाना चाहता है.’ सोनू का दूसरा ट्वीट था, ‘पुरुष साधु नग्न घूम सकते हैं, अजीब तरह के डांस कर सकते हैं, लेकिन रेप का आरोप लगने के बाद ही उन्हें जेल में डाला जा सकता है. क्या यह लैंगिक समानता है?’

सोनू ने तीसरे ट्वीट में लिखा, ‘केस चलाना चाहते हैं तो अनुयायियों पर केस चलाइए. अपने आप पर केस चलाइए. महिलाओं और पुरुषों को धर्मगुरु बनाने के लिए अलगअलग नियम. यह सही नहीं है.’ इसे ले कर सोनू निगम के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ है क्योंकि उन्होंने राधे मां की तुलना काली मां से कर दी थी. बहरहाल, इसे रोचक ही कहा जाएगा कि इस वक्त राधे मां की सर्वाधिक चर्चा फिल्मनगरी में है. कोई उन का विरोध कर रहा है तो कोई उन के हक में आवाज बुलंद कर रहा है. राधे मां के एक पूर्व अनुयायी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर जो बताया वह भी कम रोचक नहीं है, ‘सब माया का खेल था, जबरदस्त मार्केटिंग थी. प्रचार से लोग, बीड़ी कच्छा बेच कर क्या से क्या बन गए, यहां तो फिर भी…’

इसी सब के चलते 20 अगस्त को राधे को पुन: थाने बुलाया गया. इस बार उन के सामने 23 सवालों की सूची रखी गई. इस सूची में एक नया नाम ‘डैडी’ भी शामिल था. पूछताछ में राधे मां ने बताया कि डैडी उन के पति को कहा जाता है जबकि अपने और डैडी के पासपोर्ट के बारे में राधे मां ने कोई जानकारी नहीं दी. जो भी हो, ज्यादा रोचक तो इस समाचार को माना जाना चाहिए कि ‘ग्लैमरस राधे मां’ नाम से इस प्रकरण पर फिल्म की घोषणा भी हो गई है. Mumbai News

 

Lucknow News: धंधे की तपिश में झुलसी बेटी

Lucknow News: सायरा लखनऊ में देहधंधे की बड़ी धुरी थी. दूसरे की बेटियों को वेश्यावृत्ति की आग में झोंकने वाली सायरा अपनी बेटियों पर इस धंधे की छाया भी नहीं पड़ने देना चाहती थी. लेकिन उस की करतूतों की सजा बेटी को उठानी ही पड़ गई. सायरा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही चंचल और शोख हसीन भी. अन्य लड़कियों की तरह शादी को ले कर उस के भी सुनहरे सपने थे. लेकिन उस के सारे सपने उस वक्त चकनाचूर हो गए जब उस की शादी सीतापुर जिले के महमूदाबाद कस्बे के हुसनैन के साथ हुई. उस का मायका भी इसी कस्बे के दूसरे मोहल्ले का था.

हुसनैन मेहनतमजदूरी करता था. वह जो पैसे कमाता था उस से उस के घर का केवल खर्च ही चल पाता था. ऐसे में उस ने अपने सपनों को एक तरफ सरका दिया और अपनी घरगृहस्थी में रम गई. लेकिन जब कभी वह गहने या अच्छे कपड़े पहनी हुई अन्य महिलाओं को देखती तो उस के दिल में टीस सी उठती थी. तब वह सोचती कि उस के सपने भी कभी पूरे होंगे या जिंदगी ऐसे ही अभावों में कटेगी.

जब उसे निश्चित हो गया कि कस्बे में रह कर उस के सपने पूरे नहीं हो सकते तो उस ने लखनऊ जाने की ठान ली और इस के लिए उस ने पति को भी किसी तरह तैयार कर लिया. इस के बाद सायरा और हुसनैन महमूदाबाद से लखनऊ पहुंच गए. पुराने लखनऊ में उन्होंने एक कमरा किराए पर ले लिया. शहर में जाते ही कोई काम मिलना आसान नहीं होता, इसलिए हुसनैन रिक्शा चलाने लगा. इस से उसे पहले से ज्यादा कमाई होने लगी पर शहर में रहने की वजह से उन के खर्च भी बढ़ने लगे थे. इस के बावजूद भी दोनों वहां खुश थे.

सायरा खुद भी अपने लिए कामधंधे की तलाश में लग गई. किसी जानकार के माध्यम से उसे एक ब्यूटीपार्लर में काम मिल गया. उस की शादी को 8 साल हो हो चुके थे और वह 4 बच्चों की मां भी बन गई थी. ब्यूटीपार्लर में काम करने की वजह से वह बनठन कर रहती थी. इस से पता नहीं लग पाता था कि वह 4 बच्चों की मां है. उसी ब्यूटीपार्लर में काम करने वाली परवीन नाम की एक औरत से उस की दोस्ती हो गई. सायरा परवीन से अपने घर के हालात बताती रहती थी.

एक दिन परवीन ने उस से कहा, ‘‘सायरा, तुम्हारी गरीबी देख कर मुझे दया आ रही है. वैसे मेरे पास एक काम है. इस में पैसा खूब है लेकिन यह बात तुम अपने तक ही रखना.’’

‘‘क्या काम है और इस में मुझे करना क्या होगा?’’ सायरा ने अचंभे से पूछा.

‘‘देख, करना कुछ नहीं है. बस यह समझ ले कि जिस काम को तू हुसनैन के साथ मुफ्त में करती है, उसी को तुझे दूसरी जगह करना है. 3 से 4 घंटे में ही तुझे उतने पैसे मिल जाएंगे, जितने ब्यूटीपार्लर में 15 दिन में नहीं कमाती होगी.’’

‘‘अच्छा…’’ सायरा हंसते हुए बोली.

‘‘मैं तो कई सालों से इसे मजे से कर के पैसे कमा रही हूं.’’ परवीन ने बताया.

‘‘फिर तुम ब्यूटीपार्लर में नौकरी क्यों करती हो?’’ सायरा ने पूछा.

‘‘वह तो सिर्फ दिखावे के लिए है. इस बहाने मैं घर से बाहर आ जाती हूं.’’

‘‘इस में कोई रिस्क तो नहीं है?’’ सायरा ने पूछा.

‘‘रिस्क कैसा. तू मेरे साथ रहेगी तो सब जान जाएगी. हम दोनों मिल कर यह काम करते हैं.’’ परवीन ने कहा तो सायरा ने हां कर दी. इस के बाद दोनों मिल कर जिस्मफरोशी का धंधा करने लगीं.

सायरा के पति हुसनैन को पता नहीं था कि उस की बीवी क्या काम करती है. जबकि उस की गतिविधियों से मोहल्ले वाले उस के चालचलन को जान चुके थे. मगर इस की उस ने चिंता नहीं की. उस का मकसद पैसे कमाना था, इसलिए लोगों की बातों को अनसुना कर वह अपने मिशन में जुटी रही. परवीन के साथ रह कर सायरा भी इस क्षेत्र की खिलाड़ी बन गई. धंधे की सारी जानकारी हो जाने के बाद सायरा परवीन से अलग रह कर काम करने लगी.

फिर उस ने पुराना मोहल्ला का कमरा छोड़ कर मडियांव इलाके में दूसरा कमरा किराए पर ले लिया. यहां उस ने एक प्लौट भी खरीद लिया. मडियांव इलाके में घनी आबादी नहीं थी. वह एक नई कालोनी बस रही थी. इस कारण वहां पर कौन किस के पास आजा रहा है, इस का किसी को पता भी नहीं चल रहा था. कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सकता. यानी उस के पति हुसनैन को भी उस के धंधे की भनक लग गई. उस ने उसे डांटा और उस के काम का विरोध किया पर सायरा को बिना कोई ज्यादा मेहनत किए अच्छी आमदनी हो रही थी इसलिए उस ने पति के विरोध की परवाह नहीं की.

हुसनैन भी गैरतमंद था, अपनी बात पर अड़ते हुए उस ने पत्नी को कई चेतावनियां भी दीं. इस का भी उस पर असर नहीं हुआ तो वह उस से अलग हो कर दूसरी जगह रहने लगा. अब सायरा की लगाम कसने वाला कोई नहीं था. वह अपने घर पर ही ग्राहकों को बुलाने लगी. इसी दौरान उस की मुलाकात हरदोई जिले के लालबहादुर मिश्रा से हुई. सायरा को एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो उस के साथ रहे और कोई मुसीबत आए तो उस का साथ दे. सायरा के काम से वाकिफ होते हुए भी लालबहादुर मिश्रा ने सायरा से शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपना नाम शम्सुद्दीन रख लिया.

लालबहादुर का साथ मिलते ही सायरा की कमाई तेजी से बढ़ने लगी. अब उस ने अपने साथ दूसरी लड़कियां भी रख लीं. इस से उसे और ज्यादा कमाई होने लगी. कुछ दिनों बाद उस ने मडियांव की ही बसंत विहार कालोनी में एकएक कर के 4 प्लौट खरीद लिए. इन में से 2 प्लौट अपने नाम से और 2 लालबहादुर के नाम पर थे. करीब 1 हजार वर्गमीटर के इन प्लौटों पर उन्होंने 28 कमरे बनवाए. सारे कमरों को होटल के कमरों की तरह से तैयार कराया गया था. सभी कमरों में होटल की तरह सभी सुविधाएं मौजूद थीं.

कमरों में एसी, फ्लोर टाइल्स, छतों पर पीओपी की पूरी कारीगरी, दीवारों पर महंगा पेंट और कमरों में आरामदायक बेड डाले गए थे. कमरे इस तरह से बनाए गए थे कि आपातकाल में वहां से सुरक्षित निकला जा सके. मडियांव में हिंदुओं की आबादी ज्यादा थी इस वजह से वह हिंदू औरत की तरह रह रही थी. उस के मोहल्ले में भी किसी को यह पता नहीं था कि उस का पति हिंदू से मुस्लिम बन गया है. सायरा ने अपने घर के सामने एक मंदिर भी बनवा रखा था. वह खुद भी सुबहशाम उस मंदिर में पूजा करने जाती थी. सायरा के इस काम से मोहल्ले वाले भी प्रभावित रहते थे.

दूसरी ओर सायरा अपने धंधे को और बढ़ाने का काम भी कर रही थी. उस के पास दूसरे शहरों से भी लड़कियां आने लगीं. वह लड़कियां उस के मकान में ही ठहरती थीं. मोहल्ले वालों से उन लड़कियों को किराएदार बताती. किसीकिसी को वह अपनी रिश्तेदार तक बता देती थी. वहां जो ग्राहक आते, उन से कमरों का किराया भी वसूलती थी. इस तरह उस की आमदनी दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. धीरेधीरे सायरा के संबंध दूसरे राज्यों में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाले लोगों से भी हो गए. दिल्ली, मुंबई व अन्य शहरों की सी-ग्रेड की मौडल भी उस के यहां आने लगीं. कुछ दलाल उस के यहां नाबालिग लड़कियों को भी छोड़ जाते थे. उन्हें वह अपने घर के तहखाने में ठहराती थी.

तहखाने में भी एसी लगे थे. जब कोई लड़की देहधंधे के लिए तैयार नहीं होती तो उस को डरायाधमकाया जाता था. उसे भूखाप्यासा रखा जाता था. वहां रहने वाले मुस्टंडे उस के साथ बलात्कार करते. ऐसी प्रताड़नाओं को सह कर ज्यादातर नाबालिग लड़कियां सायरा की बात मानने को तैयार हो जाती थीं. तब वह उन्हें ग्राहकों के पास भेज देती थी. सायरा के ग्राहकों में पुलिस, बिल्डर, माफिया और छोटे नेता तक शामिल थे. ये उस के यहां आते थे तो कई अपने पास ही लड़कियां बुलवाते थे. अपने धंधे को चलाने के लिए उस ने लखनऊ में ही अलगअलग जगहों पर कुछ और कमरे भी किराए पर ले रखे थे.

वह दूसरों की लड़कियों को देहधंधे में लगाने का काम करती थी. लेकिन उस ने अपनी लड़कियों को इस से दूर रखा. अपनी बड़ी बेटी सना की वह शादी कर चुकी थी. अपनी छोटी बेटी सोनी और बेटे साजिद को वह अपने साथ रखती थी. उस के यहां बाहरी लोगों का ज्यादा आनाजाना हो गया तो मोहल्ले वाले भी उस की असलियत समझ गए. फिर तो उस के यहां आए दिन छापे पड़ने लगे. सायरा की जिंदगी ऊपर से भले ही सरल दिख रही थी, पर उस की परेशानियां भी कम नहीं थीं. मोहल्ले वालों की शिकायत पर उस के अड्डे पर कई बार पुलिस के छापे भी पड़े, जिस में सायरा और लालबहादुर को जेल भी जाना पड़ा. बाद में वे लोग जमानत पर जेल से बाहर आ गए.

उन के ऊपर कई मुकदमे चल रहे थे. लालबहादुर पर गुंडा एक्ट भी लगा हुआ था. उसे जिला बदर भी किया गया था. इस के बावजूद भी वह पुलिस से चोरीछिपे अपने घर पर रह रहा था. सायरा ग्राहकों की मांग पर अपने घर के कमरों को खास किस्म की थीम से भी सजाती थी. इस के लिए ग्राहक को अलग से पैसा देना पड़ता था. जैसे किसी ग्राहक को सुहागरात जैसा कमरा चाहिए तो वह फूलों से सजा कर कमरे को तैयार करा देती थी.

पहली जून, 2015 की रात करीब साढ़े 8 बजे सायरा कहीं बाहर से घर लौटी थी. लालबहादुर और बेटा साजिद कुछ सामान लेने के लिए बाजार गए थे. घर में अंदर घुसने के बाद सायरा ने अपनी साड़ी उतार कर मैक्सी पहन ली. उस की 16 साल की बेटी सोनी किचन में खाना बना रही थी. उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई. सायरा ने दरवाजा खोला तो सामने 2 लोग थे. सायरा उन में से एक को जानती थी. इसलिए उस ने उन्हें घर में बुला लिया. तभी उन में से एक युवक ने बड़ी फुरती से सायरा की कनपटी और गरदन पर गोली मार दी.

गोलियों की आवाज सुन कर बेटी सोनी किचन से बाहर आई तो बदमाशों को देख कर डर की वजह से वह बाथरूम में घुस गई. लेकिन वह बाथरूम का दरवाजा बंद कर पाती, उस से पहले ही बदमाश उस के पीछेपीछे पहुंच गए. दरवाजा खोल कर उन्होंने सोनी के माथे पर गोली मार कर हत्या कर दी. 2 लोगों की हत्या कर के बदमाश वहां से भाग गए. आधे घंटे बाद सायरा का बेटा साजिद घर लौटा तो घर का गेट खुला देख कर उसे कुछ अजीब लगा. वह अंदर दाखिल हुआ तो मां को खून से लथपथ देख कर उस की चीख निकल गई. फिर वह अपनी बहन सोनी की तलाश करने लगा.

बाथरूम में वह भी मृत अवस्था में मिली. दोनों लाशें देख कर वह जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के कुछ लोग वहां आ गए. उन के सहयोग से वह मां और बहन को मैडिकल कालेज के ट्रामा सेंटर ले गया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल की तरफ से सूचना थाना मडियांव पुलिस को दे दी गई. सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी संतोष सिंह भी अस्पताल पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया.

मडियांव थाने से महज कुछ दूरी पर हुए दोहरे हत्याकांड से पुलिस भी हैरान रह गई. खबर मिलने पर सीओ राजेश यादव और डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी मौके पर पहुंच गए. साजिद ने पुलिस को बताया कि उस की मां हर समय ज्वैलरी पहने रहती थीं. पर उन की लाश पर एक भी ज्वैलरी नहीं थी. हत्यारे उस की मां के सारे गहने भी उतार कर ले गए. घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. इस केस को खोलने के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में इंसपेक्टर संतोष सिंह, एसएसआई अक्षय कुमार सिंह, हेडकांस्टेबल अमरेश त्रिपाठी, सिपाही अनिल सिंह, हमीदुल्लाह, राजीव पांडेय, लवकुश, रामनरेश कनौजिया आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने सायरा के धंधे और उस से जुड़े हर पहलू की छानबीन शुरू की. दिन पर दिन बीतते रहे लेकिन घटना से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. इस बीच लखनऊ में राजेश पांडेय को एसएसपी के रूप में तैनात किया गया. एसएसपी ने टीम के साथ मिल कर केस की समीक्षा की. सर्विलांस सेल को भी टीम के साथ लगाया गया. फिर सायरा के नजदीकियों से एकएक कर के पूछताछ की. इस का नतीजा यह निकला कि पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंच गई. हत्यारा भी और कोई नहीं सायरा की खास सहेली फिरोजा का पति शिवओम निकला. उस ने इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

शिवओम मडियांव थाने के ही नौबस्ता का रहने वाला था. वह आपराधिक किस्म का था. सन 2003 में उस ने अपनी पहली पत्नी पंचमाला उर्फ सुमन की हत्या कर के उस की लाश भी ठिकाने लगा दी थी. पंचमाला के साथ शिवओम की शादी सन 1996 में हुई थी. उस के एक बेटी भी हुई. बेटी के पैदा होने के बाद शिवओम घर से दूर रहने लगा था. पंचमाला ने जब पति की छानबीन की तो पता चला कि उस ने धर्म बदल कर खदरा की रहने वाली फिरोजा से निकाह कर लिया है. तब 2 मई, 2003 को पंचमाला ने शिवओम के खिलाफ विकास नगर थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया. रिपोर्ट दर्ज होते ही शिवओम डर गया. पुलिस के डर से उस ने पत्नी के साथ समझौता कर लिया और उसे अपने घर ले आया.

9 जुलाई, 2003 को पंचमाला अचानक कहीं लापता हो गई. पुलिस ने जब शिवओम से पूछताछ की तो उस ने सारी सच्चाई बयां कर दी. उस ने बताया कि वह पंचमाला की हत्या कर के लाश को ठिकाने लगा चुका है. तब पुलिस ने पत्नी की हत्या के आरोप में उसे जेल भेज दिया. अदालत में केस चलने के बाद उसे 7 साल की सजा हुई, लेकिन बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर वह बाहर आ गया. शिवओम की दूसरी पत्नी फिरोजा की सायरा से अच्छी दोस्ती थी. फिरोजा की 2 बेटियां थीं. कई बार फिरोजा सायरा के पास जाती तो अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाती थी.

शिवओम सायरा के धंधे से वाकिफ था, इसलिए फिरोजा का उस के यहां जाना उसे पसंद नहीं था. उसे शक था कि सायरा कहीं उस की पत्नी और दोनों बेटियों को भी देहधंधे में न लगा दे. उस ने पत्नी से कहा कि वह सायरा से नहीं मिला करे लेकिन सायरा फिरोजा की गहरी दोस्त थी, इसलिए उस ने पति की बात नहीं मानी. शिवओम ने कई बार सायरा को भी समझाया था कि वह उस की पत्नी और बेटियों से न मिला करे. लेकिन सायरा ने उस की बात को अनसुना कर दिया. तब उस ने सायरा को ही रास्ते से हटाने की योजना बना ली.

पहली जून, 2015 की देर शाम को योजना के अनुसार शिवओम अपने दोस्त आमिर के साथ सायरा के घर पहुंच गया. दरवाजा बंद था. दस्तक देने पर सायरा ने दरवाजा खोला तो शिवओम ने उसे 2 गोली मारी, जिस से उस का वहीं काम तमाम हो गया. तभी सायरा की बेटी सोनी वहां आ गई. चूंकि वह शिवओम को पहचानती थी, इसलिए न चाहते हुए मजबूरी में उस की हत्या करनी पड़ी. सायरा के शरीर पर सोने के काफी गहने थे. शिवओम ने उस के सारे गहने उतारे और भाग गया. गहने गायब होने से पुलिस को शुरू में यह शक हुआ था कि कहीं हत्या की वजह लूट तो नहीं थी. लेकिन पुलिस ने जब जांच की तो मामला दूसरा ही निकला.

एसएसपी राजेश पांडेय ने केस का खुलासा करने वाली टीम की सराहना की है. जिस देहधंधे ने सायरा को गरीबी से उठा कर ऐशोआराम की जिंदगी मुहैया कराई, वही धंधा उस की मौत का कारण बना. इस तरह की घटनाओं से यही सीख मिलती है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है. बुराई का अंजाम उस व्यक्ति को ही नहीं, उस के पूरे परिवार को उठाना पड़ता है. Lucknow News

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

Crime Stories: जानलेवा

Crime Stories: इन्क्वायरी अफसर ने अपनी जांच में पूरे भरोसे के साथ औफिस बौय रमीज को कत्ल के इल्जाम में फंसा दिया था कि असली मुलजिम यही है, लेकिन एडवोकेट मिर्जा अमजद बेग ने अपने तर्कों से उस की जांच को गलत साबित कर दिया. जो औरत मेरे सामने बैठी थी, वह चेहरे से ही काफी परेशान लग रही थी. वह 28-29 साल की गोरी सी दुबलीपतली औरत थी. शक्लसूरत से वह किसी शरीफ घराने की लग रही थी. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने दुखी

लहजे में कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर को बचा लीजिए.’’

‘‘आप के शौहर को क्या हुआ, किस से बचाना है उन्हें?’’

‘‘पुलिस उन्हें कत्ल के इल्जाम में पकड़ ले गई है.’’

‘‘आप के शौहर ने किस का कत्ल किया है?’’

‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने कोई कत्ल नहीं किया, फिर भी उन पर पुलिस माजिद निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ ले गई है. उन्हें किसी गहरी साजिश के तहत फंसाया गया है.’’

मेरे सवालों के जवाब में उस औरत ने जो बताया था, उस के अनुसार औरत का पति रमीज और माजिद निजामी एक ही कंपनी में काम करते थे. कंपनी का नाम खान ट्रेडर्स था, जो एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम करती थी. निजामी उस कंपनी में जनरल मैनेजर था, जबकि रमीज औफिस बौय था. उसे चपरासी भी कह सकते हैं. रमीज सीधासादा, लड़ाईझगड़े से दूर रहने वाला ठंडे मिजाज का आदमी था. उस से औफिस का हर आदमी खुश रहता था.

इतना जान लेने के बाद मैं ने उस औरत, जिस का नाम सानिया था, से पूछा, ‘‘जब तुम्हारे शौहर के सब से इतने अच्छे संबंध थे तो फिर उन्हें पुलिस क्यों पकड़ ले गई?’’

उस ने उदासी से कहा, ‘‘यह मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘यह कब और कहां की बात है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘माजिद निजामी को कल शाम औफिस के उस के कमरे में कत्ल किया गया था और मेरे शौहर को आज सुबह 9-10 बजे घर से गिरफ्तार किया गया. उस समय वह औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे.’’

‘‘गिरफ्तार करते समय पुलिस ने क्या कहा था?’’

‘‘कोई सवाल किए बगैर पुलिस ने सीधे उन पर निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ लिया था. परेशान हो कर मैं भागीभागी थाने पहुंची तो वहां सिर्फ इतना पता चला कि रमीज ने औफिस के मैनेजर निजामी का कत्ल कर दिया है. इस के बाद मैं उन के औफिस गई तो बाकी बातें वहां से पता चलीं.’’

‘‘आप को इस केस से संबंधित छोटीबड़ी जो भी बातें औफिस से पता चली हों, मुझे विस्तार से बताओ. उस के बाद ही मैं आप के शौहर की कुछ मदद कर सकूंगा.’’

सानिया ने मुझे जो कुछ बताया था, वह इस प्रकार था. खान ट्रैडर्स का औफिस एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में था, जो बलोच कालोनी के पास थी. उस बिल्डिंग में खान ट्रैडर्स का औफिस तीसरी मंजिल पर था. वहां एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम होता था. रमीज को वहां काम करते 6 साल हो गए थे. वह भले ही कम पढ़ालिखा था, लेकिन चपरासी का अपना काम बहुत अच्छे से करता था, जैसे फाइलें इधर से उधर पहुंचाना, चाय बनाना, पिलाना, लंच करवाना और औफिस की सफाई आदि अपनी निगरानी में करवाना. बैंक के काम भी वही करता था.

सईद खान बड़ा बिजनैसमैन था. एक अरसे से वह यह कंपनी चला रहा था. शहर में उस का नाम था. वह डिफैंस इलाके में रहता था. अन्य स्टाफ में महमूद खान, जो एकाउंट देखता था, नादिरा अलवी कंपनी की डायरेक्टर थीं. मकतूल निजामी जनरल मैनेजर था. लुबना अली रिसैप्शनिस्ट थीं, जो फोन औपरेटर का भी काम करती थीं. खान ट्रैडर्स के औफिस का समय 10 बजे से 6 बजे था. एक रमीज को छोड़ कर बाकी सभी लोग 11 बजे तक आते थे. वह जल्दी इसलिए आ जाता था, क्योंकि उसे औफिस खोल कर साफसफाई करवानी होती थी. उस दिन वह औफिस जाने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था.

मकतूल निजामी समनाबाद में अपनी बीवीबच्चों के साथ रहता था. वह कर्मठ और ईमानदार आदमी था. औफिस में वह काफी देर तक काम करता था, जिस से रात 9 बजे तक घर पहुंचता था. लेकिन उस दिन जब वह 10 बजे तक भी घर नहीं पहुंचा तो उस की बीवी शाइस्ता ने औफिस फोन किया. औफिस में किसी ने फोन नहीं उठाया तो उसे लगा कि वह औफिस से निकल चुके हैं. उस ने थोड़ी देर और राह देखी. जब काफी देर हो गई तो उस ने असिस्टैंट को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘आ जाएंगे, कहीं फंस गए होंगे.’’

लेकिन शाइस्ता की परेशानी बढ़ती जा रही थी, क्योंकि निजामी का कुछ अतापता नहीं चल रहा था. असिस्टैंट ने बताया था कि जब वह औफिस से निकला था तो निजामी काम कर रहे थे. रमीज भी था. उस ने यह भी बताया कि जब एकाउंटैंट महमूद औफिस से निकला था तो उन के पास कोई मिलने वाला बैठा था. जब कहीं से कुछ पता नहीं चला तो रात साढ़े 11 बजे शाइस्ता ने अपने बड़े बेटे इमरान को मोटरसाइकिल से औफिस भेजा. घर से औफिस काफी दूर था, इसलिए वह वहां देर रात पहुंचा. वह मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए पार्किंग में गया तो यह देख कर चौंका कि उस के पापा की कार वहां खड़ी थी. इस का मतलब पापा अभी औफिस में ही थे.

उस ने एक बार फिर औफिस में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. वह बड़बड़ाया, ‘अगर पापा अंदर हैं तो फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं?’

उस ने चौकीदार के पास जा कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जब मैं ने औफिस बंद किया था तो वहां कोई नहीं था.’’

चौकीदार भी सोच में पड़ गया कि आखिर निजामी साहब कहां चले गए? इमरान ने पूछा, ‘‘क्या तुम ने उन्हें जाते हुए देखा था?’’

‘‘नहीं, मैं उस समय गेट पर मौजूद नहीं था.’’

‘‘जब उन की गाड़ी यहां खड़ी है तो वह कैसे चले गए?’’

‘‘हो सकता है गाड़ी खराब हो गई हो, इसलिए यहीं छोड़ गए हों.’’

‘‘वह कभी इस तरह गाड़ी छोड़ कर नहीं जा सकते. चलो मान लेते हैं कि उन्होंने गाड़ी छोड़ दी, लेकिन उन्हें घर तो पहुंचना चाहिए. तुम मेरे साथ ऊपर चलो, हम वहां देखते हैं.’’

चौकीदार इमरान के साथ चल पड़ा. ऊपर जाते हुए चौकीदार ने पूछा, ‘‘आप ने औफिस के अन्य लोगों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था?’’

‘‘हां, उन के असिस्टैंट और दोस्तों से पूछा था, कहीं से कुछ पता नहीं चला. रिश्तेदारों से भी पूछा था.’’

चौकीदार ने सोचते हुए कहा, ‘‘एक उलझन है. जब कोई औफिस में गाड़ी छोड़ कर जाता है तो मुझे जरूर बताता है, पर निजामी साहब ने कुछ नहीं कहा था.’’

ऊपर पहुंच कर चौकीदार ने निजामी के कमरे के दरवाजे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखिए, दरवाजा बंद है.’’

लेकिन जब इमरान ने दरवाजे के हैंडल को घुमा कर हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. इस का दरवाजा लौक नहीं था. चौकीदार बड़बड़ाया, ‘‘मैं ने तो सारे दरवाजों के हैंडल घुमा कर देखे थे, पता नहीं यह कैसे खुला रह गया?’’

दोनों कमरे के अंदर घुसे. कमरे में लाइट जल रही थी. पंखा भी चला रहा था. सामने एक दहशतनाक मंजर था, निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था, उस की गरदन और सिर टेबल पर बेढंगे अंदाज में रखा था. चेहरे का बायां हिस्सा बाएं कान के बल पर टेबल पर टिका था और दाईं ओर से उस की गरदन कान से जरा नीचे और आगे से पीछे तक कटी हुई नजर आ रही थी. किसी बहुत तेज धार वाले हथियार से गरदन इस तरह काटी गई थी कि आधी से अधिक कट गई थी. यह खतरनाक काम उस समय किया गया था, जब निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था.

गरदन काटने के बाद उस का सिर झटके से टेबल पर आ टिका था. वार इतना घातक था कि उसे मरने में जरा भी देर नहीं लगी. उस की गरदन से निकला खून औफिस में बिछे कालीन को दागदार कर गया था. इमरान बाप की लाश देख कर बुरी तरह घबरा गया. उस ने मां को फोन किया. चौकीदार ने कंपनी के मालिक सईद खान और अन्य लोगों को फोन किया. करीब 4 बजे सुबह तक सईद खान, महमूद, नादिरा और लुबना आदि पहुंच गए. रमीज के घर फोन नहीं था, इसलिए उसे खबर नहीं दी जा सकी. जल्दी ही पुलिस भी पहुंच गई.

इंसपेक्टर कादरबख्श अपने 2 साथियों के साथ आया था. जांचपड़ताल और पूछताछ शुरू हुई. चौकीदार से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस का शक रमीज पर गया. पुलिस को उसी पर क्यों शक हुआ, यह आप को अदालत की काररवाई के दौरान पता चलेगा. सानिया की विपदा सुन कर मैं ने यह केस ले लिया था. अगले दिन पुलिस ने रमीज को अदालत में पेश किया. उस पर निजामी का बेदर्दी से कत्ल करने का इल्जाम था. हालात और मौके की स्थिति भी कुछ यही कह रही थी. अदालत ने थोड़ी काररवाही के बाद मुलजिम रमीज को 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया.

अदालत के बाहर सानिया 5 साल की बेटी को लिए परेशान खड़ी थी. मैं ने उसे तसल्ली दे कर कहा, ‘‘यह कत्ल का केस है, अभी जमानत का सवाल ही नहीं उठता. चिंता मत करो, अगर तुम्हारा शौहर बेगुनाह है तो वह जरूर छूट जाएगा.’’

रमीज से मुलाकात होने पर कई बातें और पता चलीं. औफिस के हालात, आपस के ताल्लुक और वहां की हर छोटीबड़ी बात मैं ने उस से पूछी. मैं ने उस से कहा, ‘‘सारी सच्चाई सुन कर साफ लगता है कि तुम्हें फंसाया गया है, पर इस का ठोस सबूत ढूंढना जरूरी है. तुम्हारा औफिस में कोई ऐसा हमदर्द है, जो तुम्हारी मदद कर सकता है.’’

‘‘हां, लुबना मैम औफिस की राजनीति में नहीं रहतीं. वह मेरी हमदर्द भी हैं. वह आप को बहुत कुछ बता सकती हैं, क्योंकि उन्हें काफी कुछ पता है.’’

‘‘मैं लुबना से बात करूंगा. क्या औफिस के बाहर भी तुम्हारा ऐसा कोई दोस्त है, जो मेरे लिए जानकारियां जुटा सकता है?’’

‘‘हां, मेरा एक अच्छा दोस्त है बाबर अली, वह प्रूफ रीडिंग करता है, समझदार और पढ़ालिखा भी है.’’

रमीज ने उस का फोन नंबर मुझे दे दिया था. मैं ने लुबना से फोन पर बात की तो उस ने कहा, ‘‘यहां मैं कुछ नहीं कह सकती. आप के औफिस आ कर बात करूंगी.’’

अगले दिन शाम को वह मेरे औफिस आई. मुझे उस से काफी उपयोगी जानकारियां मिलीं. पर इस शर्त के साथ कि बीच में उस का नाम नहीं आना चाहिए. इस के बाद मैं ने बाबर अली से मुलाकात की. वह बड़े काम का आदमी निकला. मैं ने उसे केस से संबंधित कुछ जानकारियां जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी थीं, उस ने बड़ी मेहनत तथा फुरती से काम शुरू कर दिया और कई बातें मालूम कर लीं. वे जानकारियां रमीज को बरी करवाने में बड़ी उपयोगी साबित हुईं.

रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भी रमीज की जमानत नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक माजिद निजामी की मौत 11 जुलाई की रात 6 से 8 के बीच हुई थी. तेज धार वाले हथियार से उसे मौत के घाट उतार गया था. पुलिस ने वहीं से हथियार को बरामद भी कर लिया था. वह तेज धार की बड़ी छुरी थी. उस के लंबे फल पर लगे खून के नमूने को लेबौरेटरी भेजा गया था, वहां से पता चला कि उसी से कत्ल किया गया था. 2 महीने बाद मुकदमे की बाकायदा सुनवाई शुरू हुई. जज ने मुलजिम के अपराध की रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई. मेरे मुवक्किल ने कत्ल से साफ इनकार कर दिया. सरकारी वकील ने रमीज से कुछ सवाल किए. जिस का मतलब कुछ इस तरह निकलता था.

वह 6 सालों से खान ट्रैडर्स में मेहनत, लगन और ईमानदारी से काम कर रहा था. उस से सब खुश थे, घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से वह अकसर कंपनी से लोन या एडवांस लेता रहता था. पिछले 6 सालों में वह 9 बार एडवांस ले चुका था. सरकारी वकील ने इसी बात को मुद्दा बना कर उसे उलझाना चाहा, ‘‘रमीज, तुम ने दसवीं बार औफिस से एडवांस मांगा था. इस की क्या वजह थी और इस का क्या नतीजा निकला था?’’

‘‘मैं एक बड़ी मुसीबत में फंस गया था. मेरे एक बड़े ही अजीज दोस्त ने मुझ से 10 हजार रुपए मांगे थे, जो मेरे पास नहीं थे. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. मैं ने जो एडवांस ले रखा था, उस की सिर्फ 2 किश्तें बाकी थीं. इसलिए मैं एडवांस नहीं ले सकता था. मैं ने एक सूदखोर से एक महीने के लिए 10 हजार रुपए उधार ले कर अपने उस दोस्त को दे दिए थे.

‘‘उस ने एक महीने में लौटाने का वादा किया था. मैं ने उसे बता दिया था कि ये रुपए 1 हजार रुपए महीने के ब्याज पर ले कर दे रहा हूं, जिसे हर हाल में अगले महीने लौटाना है. पर मेरी बदनसीबी कि मेरा वह दोस्त मेरे रुपए ले कर दुबई चला गया और मैं फंस गया. 2 महीने ब्याज भरने के बाद औफिस का एडवांस पूरा हो गया तो मैं ने औफिस से एडवांस मांगा, पर कंपनी ने एडवांस देने से साफ मना कर दिया.’’

‘‘एडवांस न मिलने पर तुम्हें जनरल मैनेजर पर सख्त गुस्सा आया होगा. तुम्हें लगा होगा कि उसे किसी ने तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया है.’’

‘‘मैं मुश्किल में था, इसलिए गुस्सा आना लाजिमी था. इस से पहले हर बार मुझे एडवांस मिल गया था. इसलिए मुझे यह शक भी हुआ.’’

‘‘इसी बात को ले कर तुम एकाउंटैंट महमूद के पास भी गए थे. उस ने तुम से हमदर्दी तो जताई, पर जनरल मैनेजर के आदेश के बगैर वह तुम्हें एडवांस नहीं दे सकता था. तुम ने महमूद के सामने कहा था, ‘जी चाहता है कि जनरल मैनेजर को चाय में जहर मिला कर पिला दूं.’ क्या यह सच है?’’

‘‘हां, उस दिन मैं बहुत परेशान था. तब गुस्से में मैं ने ऐसा कह दिया था, पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था.’’

‘‘और तुम ने बदला लेने के लिए जहर के बजाय निजामी का छुरी से कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठ है, मेरे खिलाफ कोई साजिश रची गई है.’’

‘‘क्या तुम इस बात से इनकार करोगे कि वारदात वाले दिन मृतक का कोई दोस्त उस से मिलने आया था?’’

‘‘जी हां, आए थे. उन का नाम तौसीफ अहमद था.’’

‘‘मृतक ने उस के लिए तुम से चाय लाने को कहा था?’’

‘‘जी हां, चाय लाने के लिए कहा था. लेकिन उस दिन दूध खत्म हो गया था, तब मैं चाय लेने नजदीक के होटल चला गया था.’’

‘‘तुम ने चाय लाने में इतनी देर कर दी कि दोस्त ही नहीं, औफिस के सभी कर्मचारी तक चले गए. आखिर क्यों देर की? देर होने पर उन्होंने तुम्हें डाटा होगा. उस के बाद तुम ने गुस्से में उन का कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठा इल्जाम है. कत्ल से मेरा कोई वास्ता नहीं है. होटल में लड़ाई हो रही थी, इसलिए मुझे आने में देर हो गई थी. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, मैं ने कत्ल नहीं किया.’’

इस के बाद सरकारी वकील की जिरह खत्म हो गई. मैं ने जज से इन्क्वायरी अफसर से कुछ सवाल पूछने की इजाजत मांगी. इजाजत मिलने पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘इंसपेक्टर कादरबख्श साहब, अभी सरकारी वकील से पता चला कि जब मेरा मुवक्किल चाय ले कर आया तो जनरल मैनेजर का दोस्त और दूसरे लोग जा चुके थे. मुलजिम ने अच्छा मौका देख कर उस का कत्ल कर दिया. आप इस बात को साबित कैसे करेंगे? जबकि मेरा मुवक्किल इस इल्जाम से मना कर रहा है. आप के पास इस वारदात का कोई गवाह भी नहीं है.’’

‘‘जिस समय मृतक का दोस्त आया था, मुलजिम के अलावा एकाउंटैंट महमूद भी मौजूद था. जब मुलजिम को चाय लेने भेजा गया था, तब तीनों थे. लेकिन जब वह लौट कर आया तो महमूद और तौसीफ जा चुके थे. इस के बाद यह काम कौन कर सकता है सिवाय रमीज के? यह उसी का काम हो सकता है?’’ इन्क्वायरी अफसर ने कहा.

‘‘वाह जनाब, क्या थ्यौरी है. जरा सी डांट पड़ने पर मुलजिम कत्ल कर के आराम से घर चला गया और उस ने दरवाजा तक बंद नहीं किया. एक बात बताइए, क्या आप ने छुरी से फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘जी हां, फिंगरप्रिंट्स उठाए थे.’’

‘‘क्या छुरी पर मुलजिम की अंगुलियों के निशान मिले थे?’’

‘‘नहीं, उस पर निशान नहीं मिले, साफ कर दिए होंगे.’’

‘‘मैं आप से जो सवाल करने जा रहा हूं, जरा उस का सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा. क्या आप ने मकतूल की लाश और कमरे की ध्यान से जांच कर के कमरे का नक्शा तैयार किया था?’’

‘‘जी हां, सब बहुत ध्यान और सावधानी से किया था.’’

मैं ने भी कमरे और लाश की स्थिति के बारे में पता किया था. इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘आप की तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक मृतक को तेज धार वाली छुरी से मारा गया था. उस की आधी से ज्यादा गरदन कट गई थी. जब वार किया गया था, वह अपनी कुरसी पर बैठा था. गरदन कटने के बाद सिर टेबल पर आ टिका था. गरदन का कटा हुआ हिस्सा ऊपर और सुरक्षित हिस्सा नीचे टेबल पर टिका था, मैं गलत तो नहीं कह रहा इंसपेक्टर साहब?’’

‘‘नहीं, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’

‘‘अब मैं घटनास्थल की बात करता हूं. उस कमरे में 2 दरवाजे हैं, एक अंदर जाने का और दूसरा वौशरूम का. मृतक की टेबल 3 बाई 5 फुट की है, जिस के आगे आने वालों के लिए कुर्सियां रखी हैं. मृतक के बाएं हाथ की ओर एक साइड टेबल रखी है, इसलिए वह दाईं ओर से अपनी कुरसी तक जाता था. फर्श पर ब्लू कालीन बिछा है, सफेद परदे लगे हैं, ठीक है न?’’

मैं ने घटनास्थल का ऐसा नक्शा खींचा कि इन्क्वायरी अफसर हैरान हो कर बोला, ‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन एक बात मेरी समझ में यह नहीं आई कि यह सब बता कर आप साबित क्या करना चाहते हैं?’’

सरकारी वकील ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘मिर्जा साहब को इस तरह की बेमतलब की बातें कर के मुकदमे को उलझाने की आदत है. जनाबेआली इन्हें रोका जाए.’’

जज ने मेरी ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘आप का इस बारे में क्या कहना है बेग साहब?’’

‘‘जनाबेआली, मैं ने यह सारी मेहनत ऐसे ही नहीं की है. इस का इस मुकदमे से गहरा संबंध है, जिस का खुलासा आगे होगा. पहले इस मामले के गवाह मि. महमूद और मि. तौसीफ अहमद के बयान हो जाएं. जो कुछ मैं ने इन्क्वायरी अफसर से पूछा है, उस का ताल्लुक मेरे मुवक्किल की बेगुनाही से है.

‘‘मुझे पूरा यकीन है कि उसे साजिश कर के फंसाया गया है, वह बेकसूर है. कातिल कोई और है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार निजामी की मौत 6 से 8 बजे के बीच हुई थी. 6 बजे औफिस के अन्य लोग जा चुके थे. एकाउंटैंट 6 बजे औफिस से निकला था.

‘‘मुलजिम, मृतक और मृतक का दोस्त औफिस में मौजूद था. अगर पुलिस का यह दावा है कि कत्ल मेरे मुवक्किल ने किया है तो मैं भी दावा कर सकता हूं कि कत्ल तौसीफ अहमद या महमूद ने किया है या इस के अलावा बाहर का भी कोई आदमी हो सकता है. खैर, कातिल जो भी है, जल्दी ही सामने आ जाएगा. यह सारी मेहनत मैं ने इसीलिए की है.’’

‘‘ओके इट्स ओके, क्या अब आप मुलजिम से कुछ सवाल पूछना चाहते हैं?’’

‘‘जनाबेआली, मैं मुलजिम से 2-4 सवाल जरूर पूछूंगा, जिस से अगली सुनवाई में आसानी रहे.’’

जज ने मुझे इजाजत दे दी.

मैं ने रमीज से पूछा, ‘‘तुम बता सकते हो कि वारदात वाले दिन मृतक का दोस्त तौसीफ अहमद उस से मिलने कितने बजे औफिस पहुंचा था?’’

‘‘जी मुझे बिलकुल याद है. वह साढ़े 5 या पौने 6 बजे आए थे.’’

‘‘एक जवाब चाहिए.’’

‘‘करीब 5:40 पर आए थे.’’

‘‘जब तौसीफ अहमद आए थे, तब औफिस में कौनकौन था?’’

‘‘सिर्फ एकाउंटैंट महमूद साहब थे, बाकी सभी लोग जा चुके थे.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’

‘‘मेहमान से चाय के लिए पूछना मेरी ड्यूटी थी. जब मैं ने निजामी साहब से पूछा तो उन के दोस्त ने कहा, ‘अच्छी सी चाय पिलवाओ.’

‘‘हमारी बिल्डिंग के पास ही एक होटल है. मैं वहीं चाय लेने चला गया था.’’

‘‘तुम चाय लेने होटल क्यों गए, जबकि खान ट्रैडर्स में चाय बनाने और खाना गरम करने के लिए किचन है.’’ मैं ने थोड़ा तेज लहजे में पूछा.

‘‘वकील साहब, आप की बात सही है. पर उस दिन दूध खत्म हो गया था, इसलिए मुझे चाय लाने के लिए बाहर जाना पड़ा. मैं ने निजामी साहब को इंटरकौम पर बता दिया था कि औफिस में दूध खत्म हो गया है, चाय लेने के लिए बाहर जाना पड़ेगा. उन्होंने इजाजत दे दी थी, लेकिन जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘पुलिस जांच के अनुसार, जब तुम चाय ले कर लौटे तो मृतक निजामी का दोस्त तौसीफ अहमद जा चुका था. लेट होने पर मृतक ने तुम्हें डांटा और चाय पीने से मना कर दिया तो तुम ने गुस्से में किचन में जा कर चाय की केतली पटकी और डबलरोटी काटने वाली छुरी पीछे छिपा कर मृतक के कमरे में गए. एडवांस न मिलने से तुम उन से पहले से ही नाराज थे. उन की डांट ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया, जिस से तैश में आ कर तुम ने जनरल मैनेजर माजिद निजामी का कत्ल कर दिया. क्या सब कुछ ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘नहीं, वकील साहब, यह सब झूठ है. मैं चाय लेने गया था, सिर्फ यह सच है.’’

‘‘सच क्या है, विस्तार से बताओ?’’

‘‘मैं चाय लेने होटल गया तो वहां होटल के मालिक की एक आदमी से लड़ाई हो रही थी, जिस से चाय बनने में इतनी देर लग गई कि मैं ऊपर औफिस जाने के बजाय नीचे से ही घर चला गया था.’’

‘‘तुम नीचे से ही घर क्यों चले गए थे?’’ मैं ने यह बात जानबूझ कर पूछी, ‘‘तुम्हें तो चाय लेने भेजा गया था.’’

‘‘हां, मुझे चाय लेने भेजा गया था, लेकिन चाय तैयार होती, उस के पहले ही मैनेजर साहब अपने दोस्त के साथ चले गए थे. जिन के लिए मुझे चाय लानी थी, वे चले गए तो मैं ऊपर औफिस में जा कर क्या करता.’’ रमीज ने आत्मविश्वास के साथ बताया.

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि निजामी साहब अपने दोस्त के साथ चले गए हैं? तुम तो उस समय चाय के लिए होटल में खड़े थे?’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘यह बात मुझे महमूद साहब ने बताई थी.’’

‘‘पर महमूद साहब को तो तुम औफिस में बैठा छोड़ कर गए थे?’’

‘‘यह सच है कि जब मैं चाय के लिए जा रहा था तो महमूद साहब औफिस में बैठे थे. मैं ने उन से भी चाय के लिए पूछा था. तब उन्होंने मना कर दिया था. लेकिन जब मैं चाय के लिए होटल में खड़ा था और चाय तैयार होने वाली थी तो मैं ने महमूद साहब को अपनी ओर आते देखा. करीब आ कर उन्होंने मुझ से कहा, ‘माजिद निजामी चाय का इंतजार कर के अपने दोस्त तौसीफ अहमद के साथ निकल गए हैं. अब चाय ले जाने की जरूरत नहीं है. तुम भी अपने घर चले जाओ.’’

मैं ने कहा, ‘‘अगर वह चले गए हैं तो मुझे औफिस बंद करना होगा. मैं ऊपर जा कर औफिस बंद कर देता हूं.’’

‘‘औफिस मैं ने बंद कर दिया है. मुझे एक जगह जाना है, इसलिए तुम्हारा इंतजार किए बिना ही मैं चला आया. औफिस भी मैं ने बंद कर दिया है.’’

‘‘निजामी साहब से जब इंटरकौम पर बात हुई थी, तब उन्होंने जल्दी आने को कहा था, क्योंकि उन का दोस्त ज्यादा देर रुकने वाला नहीं था. लेकिन लड़ाई की वजह से देर हो गई. महमूद साहब ने बताया कि मेहमान चले गए हैं तो मैं ने सोचा कि मैं औफिस जा कर क्या करूंगा. बहुत होगा, अगले दिन निजामी साहब डाटेंगे तो डांट सुन लूंगा. फिलहाल घर जाना ही बेहतर समझा. मुझे सोचते देख कर महमूद साहब बोले, ‘क्या तुम्हें ऊपर औफिस में कोई काम है क्या?’

‘‘मैं ने कहा, ‘नहीं, मुझे कोई काम नहीं है. आप कह रहे हैं तो मैं घर चला जाता हूं.’ कह कर मैं घर चला गया. अगले दिन मैं औफिस आने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने मुझे कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया.’’

मैं ने आखिरी सवाल पूछा, ‘‘पुलिस जांच के अनुसार मृतक की कार औफिस की बिल्डिंग के नीचे पार्किंग में खड़ी थी, तुम्हारी नजर उस पर नहीं पड़ी?’’

‘‘जनाब, चाय का होटल बाईं ओर जरा अंदर की तरफ है. मैं वहीं से सीधे घर चला गया था. इसलिए गाड़ी मुझे नहीं दिखाई दी. वैसे भी महमूद साहब के कहने पर मुझे उन के जाने का यकीन हो गया था.’’

इस के बाद अदालत का समय खत्म हो गया. अगली पेशी पर 3 गवाहों को अदालत में लाया गया. 2 गवाहों की गवाही में कोई खास बात नहीं थी, तीसरे गवाह का नाम तौसीफ अहमद था, वह 50 साल का अच्छाभला सेहतमंद आदमी था. वह बड़े सुकून और इत्मीनान से विटनैसबौक्स में खड़ा था. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘तौसीफ साहब, आप की मृतक से काफी गहरी दोस्ती थी, उन की मौत का मुझे भी अफसोस है. आप कितने बजे निजामी साहब के औफिस पहुंचे थे?’’

‘‘मैं करीब पौने 6 बजे उन के औफिस पहुंचा था.’’

‘‘उस वक्त वहां कौनकौन था?’’

‘‘निजामी साहब, उन का एकाउंटैंट महमूद और औफिस बौय रमीज. एकाउंटैंट का जिक्र निजामी साहब ने ही किया था.’’

‘‘क्या निजामी साहब ने आप के सामने मुलजिम रमीज को चाय लाने भेजा था?’’

‘‘जी हां, औफिस में दूध खत्म हो गया था. इस के बाद उन्होंने होटल से जल्दी चाय लाने के लिए कहा था, क्योंकि मुझे जरा जल्दी जाना था.’’

‘‘क्या मुलजिम जल्दी चाय ले कर आ गया था?’’

‘‘जल्दी क्या, वह गया तो लौट कर आया ही नहीं.’’

मैं ने नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि उस दिन आप बिना चाय पिए ही चले गए थे, कितने बजे गए थे आप?’’

‘‘मैं करीब साढ़े 6 बजे वहां से निकला था.’’

‘‘जब आप निकले थे, तब तक मुलजिम नहीं आया था?’’

‘‘जी हां, तब तक नहीं आया था, निजामी साहब को बड़ा गुस्सा आया था. अगर वह आ जाता तो चाय उस के मुंह पर फेंक देते, लेकिन वह आया ही नहीं.’’

‘‘अफसोस कि वह सीधे घर चला गया था. उस के बाद उसे औफिस आने का मौका ही नहीं मिला. तौसीफ साहब जब आप साढे़ 6 बजे जाने के लिए औफिस से निकले थे तो क्या निजामी साहब भी आप के साथ निकले थे? जब आप निकल रहे थे तो एकाउंटैंट महमूद अपने कमरे में मौजूद था?’’

‘‘निजामी साहब मेरे साथ नहीं गए थे. उन्हें कुछ काम निपटाने थे. महमूद का मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं निजामी साहब के पास से उठ कर इधरउधर देखे बगैर, सीधे बाहर निकल गया था.’’

‘‘थैंक्यू तौसीफ साहब, आप ने एकदम सटीक जवाब दिए हैं. बस अब आप को एक टेस्ट देना बाकी है. यही टेस्ट निजामी साहब के असली कातिल तक पहुंचाएगा. इस टेस्ट में वही लोग शामिल होंगे, जो 6 बजे से 8 बजे तक औफिस में मौजूद थे.’’

तौसीफ अहमद उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे. सरकारी वकील ने कहा, ‘‘बेग साहब, आप कैसे टेस्ट की बात कर रहे हैं?’’

‘‘यह ऐसा टेस्ट है, जो असली कातिल को सामने ले आएगा.’’ मैं ने जज की ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

जज ने पूछा, ‘‘बेग साहब, अभी आप कितने लोगों का टेस्ट लेंगे और यह कैसा टेस्ट है?’’

‘‘जनाबेआली, यह टेस्ट उन लोगों का लिया जाएगा, जो वारदात के समय वहां मौजूद थे. निजामी साहब तो रहे नहीं, मुलजिम रमीज, गवाह तौसीफ अहमद और कंपनी के एकाउंटैंट महमूद साहब का टेस्ट लेना है. मृतक की गरदन जिस अंदाज में कटी थी, वह खुदकुशी नहीं, यकीनन कत्ल था. फिंगरप्रिंट्स मिले नहीं, इसलिए टेस्ट से ही सच्चाई पता चल सकती है. यह एक साधारण टेस्ट है.’’

मैं ने तौसीफ अहमद से पूछा, ‘‘आप टेस्ट के लिए तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, मैं तो तैयार हूं.’’

मैं गवाह तौसीफ अहमद को जज साहब के पास ले गया. एक पैड और कलम देते हुए बोला, ‘‘आप जज साहब के सामने इस पैड पर लिखें कि मैं ने निजामी साहब का कत्ल नहीं किया है.’’

उन्होंने मेरे कहे अनुसार लिख दिया.

‘‘शुक्रिया अहमद साहब, अब आप जा सकते हैं.’’

जज ने सवालिया नजरों से मेरी ओर देखा तो मैं ने कहा, ‘‘जनाबेआली, मुझे इस टेस्ट से यह साबित करना है कि गवाह तौसीफ बहमद राइट हैंड से काम करने का आदी है.’’

जज साहब ओके, कह कर कागज देखने लगे. फिर वही टेस्ट मैं ने मुलजिम रमीज से करवाया, दोनों कागज जज की टेबल पर रख कर कहा, ‘‘जनाब, मैं यह साबित करना चाहता था कि ये दोनों सीधे हाथ से काम करने के आदी हैं.’’

सरकारी वकील बड़ी उलझन में था. उस ने पूछा, ‘‘जनाबेआली, यह क्या हो रहा है?’’

जज ने कागज देखते हुए कहा, ‘‘बेग साहब यह साबित करना चाहते थे कि ये दोनों राइट हैंडेड हैं. नतीजे के बारे में तो यही बताएंगे.’’

अदालत में बैठे लोग सन्न मारे सारी काररवाही देख रहे थे. मैं ने आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘जैसा कि जज साहब ने बताया है, तौसीफ अहमद और मुलजिम रमीज राइट हैंड से काम करने के आदी हैं. घटनास्थल का नक्शा, कमरे और टेबल की सिचुएशन, लाश की स्थिति इस बात की गवाह है कि माजिद निजामी का कत्ल किसी ऐसे आदमी ने किया है, जो बाएं हाथ से काम करने का आदी है. यानी लैफ्ट हैंडेड है. इसलिए तौसीफ अहमद और रमीज दोनों में से कोई भी कातिल नहीं हो सकता.’’

इन्क्वायरी अफसर जो बड़े ध्यान से सारी काररवाही देख रहा था, एकदम बोल पड़ा, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं बेग साहब?’’

मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘कादरबख्श साहब, आप ने बड़ी बारीकी से लाश की जांच की थी और बड़ी सावधानी से कमरे का नक्शा बनाया था. यह पौइंट आप की समझ में आना चाहिए था.’’

उस के चेहरे पर घबराहट नजर आने लगी. अब मैं ने जज की ओर देख कर कहा, ‘‘जनाबेआली, मैं ने पिछली पेशी में इस से लंबी जिरह जिस मकसद से की थी, उस का मकसद यही था. अब मौका है कि मैं अपने मुवक्किल को बेगुनाह साबित करूं.’’

जज गहरी दिलचस्पी से मेरी बातें सुन रहे थे. अदालत में सन्नाटा छा गया था. सभी का ध्यान मेरी ओर था. मैं अपनी दलीलें आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘जनाबेआली, मृतक की कुरसी उस के कमरे में इस कोण से ऐसी पोजीशन में रखी थी कि दाएं हाथ से काम करने वाले के लिए उस पर, खास तौर पर उस की गरदन पर ऐसा हमला करना नामुमकिन था.

‘‘कमरे की दीवार और मृतक की गरदन के बीच इतना फासला नहीं था कि लंबे फल वाली छुरी को आजादी से घुमा कर गरदन पर भरपूर वार किया जा सकता. अगर इत्तफाक से ऐसा हो भी जाता तो उस स्थिति में गरदन को बाएं तरफ से कान के नीचे से कटना चाहिए था.

‘‘लेकिन हकीकत में मृतक की गरदन दाईं ओर से कान के नीचे से कटी थी. इस का मतलब यह कि किसी लेफ्ट हैंडेड आदमी ने निजामी पर कातिलाना हमला किया था, जो बहुत घातक साबित हुआ. मृतक पलक झपकते ही मर गया.’’

‘‘मेरा तो इस तरफ ध्यान ही नहीं गया. सचमुच यह तो बहुत खास पौइंट है.’’ इन्क्वायरी अफसर ने शर्मिंदा होने वाले लहजे में कहा.

‘‘आप का इस ओर ध्यान नहीं गया, कोई बात नहीं. मैं आप का ध्यान इस तरफ दिला रहा हूं. आप घटनास्थल के नक्शे को दिमाग में ताजा करें और पूरी ईमानदारी से बताएं कि माजिद निजामी का कातिल कौन हो सकता है. लेफ्ट हैंडेड या राइट हैंडेड? यह आप की समझबूझ का टेस्ट है.’’

इन्क्वायरी अफसर ने फौरन दृढ़ता से जवाब दिया, ‘‘कातिल ने वह खतरनाक वार बाएं हाथ से ही किया था. कातिल लेफ्ट हैंडेड था.’’

‘‘और मेरा मुवक्किल एक सौ एक प्रतिशत राइट हैंडेड है.’’ मैं ने जज की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जनाबेआली, आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि मुलजिम दाएं हाथ से काम करने का आदी है. जबकि इन्क्वायरी अफसर भी कह रहे हैं कि कातिल यकीनन लेफ्ट हैंडेड था. इसलिए मेरी आप से दरख्वास्त है कि मेरा मुवक्किल बेगुनाह है, इसलिए उसे बाइज्जत बरी किया जाए.’’

जज ने घूर कर इन्क्वायरी अफसर की ओर देखा और नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि पूरी विवेचना ही गलत है.’’

इन्क्वायरी अफसर घबरा कर बोला, ‘‘जनाबेआली, यह लेफ्टराइट की गलती तो मुझ से हो गई है.’’

‘‘आप की यह लेफ्टराइट की गलती एक बेगुनाह इंसान को गुनहगार बना देती. यह अदालत आप को हुक्म देती है कि 7 दिनों के अंदर नया चालान पेश करें और अब लेफ्टराइट की गलती नहीं होनी चाहिए.’’

उसी वक्त सरकारी वकील की हैरतभरी आवाज गूंजी, ‘यह लेफ्ट हैंडेड व्यक्ति कौन हो सकता है, जिस ने निजामी का कत्ल किया है?’

‘‘मेरे दोस्त अब लेफ्ट हैंडेड कातिल को तलाशना जरूरी है, क्योंकि पहले लापरवाही की गई. अगर कमरे और टेबल की सिचुएशन व नक्शे को बारीकी व सावधानी से देखा जाता तो यह बात पहले ही पता चल जाती कि कातिल लेफ्ट हैंडेड है, क्योंकि जिस तरफ से राइट हैंड उपयोग में आ सकता था, वहां इतनी जगह ही नहीं थी कि खुल कर छुरी का वार किया जा सकता. मैं आप को इतनी हिंट दे सकता हूं कि लेफ्ट हैंड कातिल को इस्तगासा के गवाहों में ही ढूंढ़े, जो 6 से 8 बजे के बीच औफिस में मौजूद थे. एक इशारा और कर दूं, मैं ने अभी तक कातिल का अदालती टेस्ट नहीं लिया है.’’ मैं ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘ऐसा तो सिर्फ एक ही आदमी है, खान ट्रैडर्स का एकाउंटैंट महमूद.’’ उस ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा. इंसपेक्टर साहब, वैसे अक्लमंद को इशारा काफी है.’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. इस के साथ ही अदालत का वक्त खत्म हो गया. अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया. इन्क्वायरी अफसर ने खुद को अक्लमंद साबित करते हुए एकाउंटैंट महमूद को अदालत के सामने पेश कर दिया. महमूद ने पुलिस कस्टडी में ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

वह लेफ्ट हैंडेड था. उसी ने कंपनी के जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतारा था. अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए वारदात के दिन औफिस बौय रमीज को कुरबानी के बकरे की तरह इस्तेमाल किया था. उस से झूठ बोल कर उसे औफिस आने देने के बजाय उसे घर भेज दिया, ताकि अगले दिन जब वह औफिस आए तो फौरन ही उस के कत्ल के इल्जाम में धर लिया जाए. उस के प्लान के मुताबिक ऐसा ही हुआ. औफिस से मिली जानकारी के मुताबिक जनरल मैनेजर निजामी एक बेहद ईमानदार और उसूल वाला आदमी था, जब से उस ने यह कंपनी संभाली थी. उन लोगों को बड़ी तकलीफ थी, जो कंपनी को नुकसान कर के खुद का घर भर रहे थे. बेईमानी करने में सब से ऊपर नाम महमूद का था.

वारदात से करीब 3 महीने पहले मृतक ने एकाउंटैंट का एक संगीन फ्रौड पकड़ लिया था, जिस की वजह से महमूद को बौस के सामने बुरी तरह से अपमानित होना पड़ा था और बौस ने अगली बार उसे निकाल बाहर करने की धमकी दी थी. इस से औफिस में उस की बदनामी और थूथू हुई थी. अपनी बदनामी और अपमान का बदला लेने के लिए वह मौके की ताक में था. उस के दिल में बदले की आग दहक रही थी. रमीज को जनरल मैनेजर ने एडवांस देने से मना कर दिया. रमीज अपनी दिल की भड़ास महमूद के सामने निकालता. निजामी को बुराभला कहता और लोगों के सामने भी उस के खिलाफ बकबक करता.

महमूद को रमीज की शक्ल में एक कुरबानी का बकरा मिल गया. उस ने फैसला कर लिया कि वह जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतार देगा और इस कत्ल का इल्जाम रमीज के सिर पर डाल देगा. ऐसी बातें करेगा, जिस से सब का शक रमीज की तरफ चला जाए. जो लोग उसूल परस्त और ईमानदार होते हैं, उन्हें कदमकदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और कभीकभी ईमानदारी जानलेवा भी साबित होती है, जैसा कि माजिद निजामी के साथ हुआ. पर महमूद भी अपने बदले की आग में खुद जल गया. Crime Stories

 

Karnataka News: बच्चा न होने पर पत्नी का मर्डर

Karnataka News: एक बेहद शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक पति ने पत्नी को सिर्फ इस वजह से मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उसे संतान नहीं हो रही थी. इसी कारण आरोपी ने पत्नी का गला घोंटकर उस की जान ले ली. सवाल यह है कि क्या वाकई बच्चे की चाह में पति हत्यारा बना या इस वारदात के पीछे कोई और सच्चाई छिपी है. आइए जानते हैं इस सनसनीखेज क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो हर किसी को झकझोर कर रख देगी.

यह शर्मनाक घटना कर्नाटक के बेलगावी जिले से सामने आई है. यहां पति फकीरप्पा गिलक्कनवर ने बच्चा न होने के कारण अपनी पत्नी राजेश्वरी की गला घोंटकर हत्या कर दी. वारदात के बाद फकीरप्पा ने झूठी कहानी सुनाई और कहा कि राजेश्वरी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है. उसने रिश्तेदारों को बुलाकर यही बात दोहराई.

सूचना मिलने के बाद राजेश्वरी के पेरेंट्स बेटी के अंतिम संस्कार में पहुंचे तो शव देखकर लगा कि बेटी की मौत दिल के दौरे से नहीं हुई, बल्कि इसे मारा गया है. क्योंकि राजेश्वरी के गले पर मौजूद निशान थे. इस के बाद हन्होंने तुरंत बैलहोंगल पुलिस स्टेशन पुलिस को पूरे मामले की जानकारी दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की. जांच के दौरान हत्या का सच सामने आ गया.

पुलिस ने आरोपी फकीरप्पा गिलक्कनवर को तुरंत हिरासत में ले कर थाने पहुंचाया. राजेश्वरी के शव को पोस्टमार्टम के लिए बेलगावी बीआईएमएस भेजा गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटकर हत्या की पुष्टि हुई. पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस के बाद पुलिस ने आरोपी फकीरप्पा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. Karnataka News

Delhi News: पार्क में युवक की गोली मारकर हत्या

Delhi News: एक शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक युवक की पार्क में गोली मारकर हत्या कर दी गई. आखिर कौन थे वे अपराधी, जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया. पूरा सच जानने के लिए पढ़िए पूरी स्टोरी विस्तार से.

यह घटना देश की राजधानी दिल्ली से सामने आई है. गणतंत्र दिवस की सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद दिल्ली में बदमाशों के हौसले बुलंद नजर आ रहे हैं. शास्त्री पार्क इलाके में देर रात समीर उर्फ मुस्तकीम उर्फ कमू पहलवान नामक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई. पुलिस को रात करीब 11 बजकर 24 मिनट पर बुलंद मसजिद इलाके में गोली चलने की सूचना मिली थी. मौके पर पहुंची पुलिस को पता चला कि घायल समीर उर्फ मुस्तकीम उर्फ कमू पहलवान को उस के फेमिली वाले पहले ही जेपीसी अस्पताल ले जा चुके थे. जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल की जांच की और वहां से अहम सबूत जुटाए. शास्त्री पार्क थाने में इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कई टीमें गठित की हैं. यह घटना दिल्ली की कानून व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े करती है. पुलिस हर एंगल से मामले की जांच कर रही है.

पुलिस आरोपियों की पहचान कर उन्हें पकड़ने के लिए पूरी तरह जुटी हुई है. इस के लिए आसपास के इलाकों, संदिग्ध ठिकानों और तकनीकी सर्विलांस की मदद ली जा रही है. पुलिस मृतक समीर के फेमिली वालों और अन्य लोगों से भी पूछताछ कर रही है, ताकि कोई ठोस सुराग मिल सके. पुलिस का कहना है कि वे हर पहलू से जांच कर रहे हैं और जल्द ही इस मामले का खुलासा किया जाएगा. Delhi News

Crime News: खुद को बचाने के लिए मार दिया दोस्त को

Crime News: कंधे पर बैग टांग कर घर से निकलते हुए राजा ने मां से कहा कि वह 2 दिनों के लिए बाहर जा रहा है तो मां ने पूछा, ‘‘अरे कहां जा रहा है, यह तो बताए जा.’’ लेकिन जब बिना कुछ बताए ही राजा चला गया तो माधुरी ने झुंझला कर कहा, ‘‘अजीब लड़का है, यह भी नहीं बताया कि कहां जा रहा है?’’

यह 19 अक्तूबर, 2016 की बात है. मीरजापुर की कोतवाली कटरा के मोहल्ला पुरानी दशमी में अशोक कुमार का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी माधुरी के अलावा 4 बेटों में राजन उर्फ राजा सब से छोटा था. उस की अभी शादी नहीं हुई थी. अशोक कुमार के परिवार का गुजरबसर रेलवे स्टेशन पर चलने वाले खानपान के स्टाल से होता था. अशोक कुमार के 2 बेटे उन के साथ ही काम करते थे, जबकि 2 बेटे गोपाल और राजा मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर स्थित होटल जननिहार में काम करते थे. चूंकि मीरजापुर और मुगलसराय स्टेशन के बीच बराबर गाडि़यां चलती रहती हैं, इसलिए उन्हें आनेजाने में कोई परेशानी नहीं होती थी.

राजा 2 दिनों के लिए कह कर घर से गया था, जब वह तीसरे दिन भी नहीं लौटा तो घर वालों ने सोचा कि किसी काम में लग गया होगा, इसलिए नहीं आ पाया. लेकिन जब चौथे दिन भी वह नहीं आया तो घर वालों को चिंता हुई. दरअसल इस बीच उस का एक भी फोन नहीं आया था. घर वालों ने फोन किया तो राजा का फोन बंद था. जब राजा से बात नहीं हो सकी तो उस की मां माधुरी ने उस के सब से खास दोस्त रवि को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘राजा दिल्ली गया है. मैं भी इस समय बाहर हूं.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था. राजा का फोन बंद था, इसलिए उस से बात नहीं हो सकती थी. उस के दोस्त रवि से जब भी राजा के बारे में पूछा जाता, वह खुद को शहर से बाहर होने की बात कह कर राजा के बारे में कभी कहता कि इलाहाबाद में है तो कभी कहता फतेहपुर में है. अंत में उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया.

जब राजा का कहीं पता नहीं चला तो परेशान अशोक कुमार मोहल्ले के कुछ लोगों को साथ ले कर कोतवाली कटरा पहुंचे और राजा के गायब होने की तहरीर दे कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. कोतवाली पुलिस ने गुमशुदगी तो दर्ज कर ली, लेकिन काररवाई कोई नहीं की. इस के बाद अशोक कुमार 26 अक्तूबर को समाजवादी पार्टी के युवा नेता और सभासद लवकुश प्रजापति के अलावा मोहल्ले के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को साथ ले कर मीरजापुर के एसपी अरविंद सेन से मिले और उन्हें अपनी परेशानी बताई.

अशोक कुमार की बात सुन अरविंद सेन ने तत्काल कटरा कोतवाली पुलिस को काररवाई का आदेश दिया. कोतवाली पुलिस ने राजा के बारे में पता करने के लिए उस के दोस्त रवि से पूछताछ करनी चाही, लेकिन वह घर से गायब मिला. अब तक राजा को गायब हुए 10 दिन हो गए थे. रवि घर पर नहीं मिला तो पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया, क्योंकि उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.

पुलिस की लापरवाही से तंग आ कर बेटे के बारे में पता करने के लिए अशोक कुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया. मामला न्यायालय तक पहुंचा तो पुलिस ने तेजी दिखानी शुरू की. 28 अक्तूबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि और उस के पिता को एसपी औफिस के पास एक मिठाई की दुकान से पकड़ कर कोतवाली लाया गया. लेकिन उन से की गई पूछताछ में कोई जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इसी तरह अगले दिन भी हुआ.

संयोग से उसी बीच एसपी अरविंद सेन ही नहीं, कोतवाली प्रभारी का भी तबादला हो गया. मीरजापुर जिले के नए एसपी कलानिधि नैथानी आए. दूसरी ओर कटरा कोतवाली प्रभारी की जिम्मेदारी इंसपेक्टर अजय श्रीवास्तव को सौंपी गई. अशोक कुमार 9 नवंबर को नए एसपी कलानिधि नैथानी से मिले. एसपी साहब ने तुरंत इस मामले में काररवाई करने का आदेश दिया. उन्हीं के आदेश पर कोतवाली प्रभारी ने अपराध संख्या 1232/2016 पर भादंवि की धारा 364 के तहत मुकदमा दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी.

इस घटना को चुनौती के रूप में लेते हुए एसपी कलानिधि नैथानी ने कोतवाली प्रभारी कटरा, प्रभारी क्राइम ब्रांच स्वाट टीम एवं सर्विलांस को ले कर एक टीम गठित कर दी. इस टीम ने मुखबिरों द्वारा जो सूचना एकत्र की, उसी के आधार पर 14 नवंबर, 2016 को राजा के दोस्त रवि कुमार को मीरजापुर के नटवां तिराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस से राजा के बारे में पूछा गया तो उस ने उस के गायब होने के पीछे की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस वाले जहां हैरान रह गए, वहीं रवि के पकड़े जाने की खबर सुन कर कोतवाली आए राजा के घर वाले रो पड़े. क्योंकि उस ने राजा की हत्या कर दी थी.

उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के थाना नरसैना के गांव रूखी के रहने वाले नरेश कुमार पीएसी में होने की वजह से मीरजापुर में परिवार के साथ रहते हैं. वह पीएसी की 39वीं वाहिनी में स्वीपर हैं. रवि कुमार उन्हीं का बेटा था. उस की दोस्ती राजा से हो गई थी, इसलिए कभी वह उस से मिलने मुगलसराय तो कभी उस के घर आ जाया करता था. दोनों में पक्की दोस्ती थी.

रवि का एक चचेरा भाई दीपेश उर्फ दीपू फिरोजाबाद के टुंडला की सरस्वती कालोनी में किराए का कमरा ले कर पत्नी के साथ रहता था. वह वहां दर्शनपाल उर्फ जेपी की गाड़ी चलाता था. जेपी की बहन राजमिस्त्री का काम करने वाले प्रवीण कुमार से प्यार करती थी. यह जेपी को पसंद नहीं था. उस ने बहन को समझाया . बहन नहीं मानी तो प्रेमी से उसे जुदा करने के लिए उस ने प्रवीण कुमार को ठिकाने लगाने का मन बना लिया.

यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने ड्राइवर दीपेश उर्फ दीपू को साथ मिलाया और 13 अक्तूबर, 2016 को बहन के प्रेमी प्रवीण कुमार को अगवा कर लिया. दोनों उसे शहर से बाहर ले गए और गोली मार कर हत्या कर दी. दोनों के खिलाफ इस हत्या का मुकदमा थाना टुंडला में दर्ज हुआ. चूंकि इस मुकदमे में एससी/एसटी एक्ट भी लगा था, इसलिए पुलिस दोनों के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. दर्शनपाल उर्फ जेपी तो गिरफ्तार हो गया, लेकिन दीपेश उर्फ दीपू फरार चल रहा था.

पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए जगहजगह छापे मार रही थी. पुलिस दीपेश को तेजी से खोज रही थी. इस स्थिति में पुलिस से बचने के लिए वह मीरजापुर आ गया था. टुंडला में घटी घटना के बारे में उस ने चचेरे भाई रवि को बता कर कहा, ‘‘रवि, मैं बुरी तरह फंस गया हूं. अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं बच सकता हूं.’’

इस के बाद राजा और दीपेश ने योजना बनाई कि किसी ऐसे आदमी को खोजा जाए, जिसे टुंडला ले जा कर हत्या कर के उस की लाश को जला दिया जाए और लाश के पास दीपेश अपनी कोई पहचान छोड़ दे, जिस से पुलिस समझे कि लाश दीपेश की है और उस की हत्या हो चुकी है. इस के बाद पुलिस उस का पीछा करना बंद कर देगी.

जब ऐसे आदमी की तलाश की बात आई तो रवि को अपने दोस्त राजा उर्फ राजन की याद आई. क्योंकि राजा का हुलिया दीपेश से काफी मिलताजुलता था. फिर क्या था, दोनों ने राजा को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली, उसी योजना के तहत उस ने 18 अक्तूबर को राजा को फोन कर के कहा, ‘‘राजा, हम लोगों ने किराए पर एक गाड़ी की है, जिस से कल यानी 19 अक्तूबर को दिल्ली घूमने चलेंगे. मेरा चचेरा भाई दीपेश भी आया हुआ है, वह भी साथ चलेगा. मैं चाहता हूं कि तुम भी चलो.’’

राजा तैयार हो गया तो रवि ने 19 अक्तूबर, 2016 को पीएसी कालोनी के एक परिचित की गाड़ी बुक कराई और राजा को साथ ले कर दिल्ली के लिए चल पड़ा. योजना के अनुसार रास्ते में पैट्रोल खरीद लिया गया. इस के बाद उन्होंने बीयर खरीदी और राजा को जम कर पिलाई. वह नशे में हो गया तो रात 11 बजे के करीब फिरोजाबाद के थाना पचोखरा के गांव सराय नूरमहल और गढ़ी निर्भय के बीच सुनसान स्थान पर पेशाब करने के बहाने गाड़ी रुकवाई और राजा को उतार कर मारपीट कर पहले उसे बेहोश किया, उस के बाद पैट्रोल डाल कर जला दिया.

जब उन्हें विश्वास हो गया कि राजा मर गया है तो पहचान के लिए दीपेश ने अपना जूता राजा की लाश के पास रख दिया, जिस से बाद में उस लाश की पहचान उस की लाश के रूप में हो. इस के बाद दीपेश ने फिरोजाबाद पुलिस को मोबाइल से फोन कर के कहा, ‘‘मैं दीपेश उर्फ बाबू बोल रहा हूं. 3-4 बदमाश मेरा पीछा कर रहे हैं. मुझे बचा लीजिए अन्यथा ये मुझे मार डालेंगे.’’

जिस जगह पर रवि और दीपेश ने राजा को जलाया था, दीपेश का घर वहां से करीब 8 किलोमीटर दूर था. दीपेश ने इस जगह को यह सोच कर चुना था, जिस से पुलिस को लगे कि वह चोरीछिपे अपने गांव आया था. बदमाशों को पता चल गया तो उन्होंने उसे मार डाला. पुलिस को फोन कर के रवि और दीपेश फरार हो गए. जबकि पुलिस सर्विलांस के माध्यम से लोकेशन के आधार पर उन की तलाश में मीरजापुर से फिरोजाबाद तक उन के पीछे लगी थी. दीपेश तो फरार हो गया, लेकिन रवि मीरजापुर तो कभी सोनभद्र तो कभी सिगरौली जा कर छिपा रहा. आखिर ज्यादा दिनों तक वह पुलिस की नजरों से बच नहीं पाया और 14 नवंबर को उसे पकड़ लिया गया.

पूछताछ के बाद रवि की निशानदेही पर पुलिस ने पैट्रोल का डिब्बा, वह गाड़ी जेस्ट कार संख्या यूपी 63जेड 8586, जिस से वे राजा को ले गए थे, बरामद कर ली. इस के बाद उसे उस स्थान पर भी ले जाया गया, जहां उस ने दीपेश के साथ मिल कर राजा को जलाया था. राजा के पिता अशोक कुमार भी साथ थे, इसलिए उन्होंने राजा के अधजले कपड़ों को पहचान लिया था. पुलिस ने रवि को प्रैसवार्ता में पेश किया, जहां उस ने अपना अपराध स्वीकार कर के हत्या की सारी कहानी सुना दी.

घटना का खुलासा होने के बाद कोतवाली पुलिस ने राजा उर्फ राजन की गुमशुदगी हत्या में तब्दील कर आरोपी रवि को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. दीपेश उर्फ दीपू की तलाश में पुलिस ने ताबड़तोड़ छापे मारने शुरू कर दिए तो दबाव में आ कर उस ने फिरोजाबाद की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. अदालत ने उसे जेल भेज दिया था. Crime News

Emotional Story: मजा, जो बन गया सजा

Emotional Story: न्यू आगरा के रहने वाले रामप्रसाद ने मंजू की शादी कर के यही सोचा था कि वह बेटी से मुक्ति पा गए हैं. लेकिन मंजू को न पति अच्छा लगा था, न उस के घर वाले. यही वजह थी कि एक बेटी पैदा होने के बाद भी वह ससुराल में मन नहीं लगा पाई और एक दिन बेटी को ले कर बाप के घर आ गई.

बेटी ससुराल वालों से लड़ाईझगड़ा कर के हमेशा के लिए मायके आ गई है, यह बात न तो रामप्रसाद को अच्छी लगी थी और न उन की पत्नी को. उन्होंने मंजू को ऊंचनीच समझा कर ससुराल भेजना चाहा तो उस ने साफ कह दिया कि उन्हें उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह कहीं नौकरी कर के अपना और बेटी का गुजारा कर लेगी.

मंजू ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि कोशिश कर के नौकरी कर भी ली. उसे एक कंपनी में चपरासी की नौकरी मिल गई थी. इस के बाद वह निश्चिंत हो गई, क्योंकि उसे वहां से गुजारे लायक वेतन मिल जाता था. रहने के लिए पिता का घर था ही.

मंजू अपनी नौकरी पर औटो से आतीजाती थी. इसी आनेजाने में कभी मंजू की मुलाकात औटोचालक करन शर्मा से हुई तो दोनों में जल्दी ही जानपहचान हो गई.

करन अकसर मंजू को अपने औटो से लाने ले जाने लगा तो धीरेधीरे उन की यह जानपहचान दोस्ती में बदल गई. उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यहां परेशानी यह थी कि दोनों ही शादीशुदा नहीं, बच्चे वाले थे.

मंजू तो खैर पति को छोड़ कर आ गई थी, लेकिन करन शर्मा तो पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था. इस के बावजूद वह मजा लेने के चक्कर में मंजू से प्यार कर बैठा.

करीब 7 साल पहले करन की शादी भावना से हुई थी. उस के 2 बच्चे थे  बेटा ललित और बेटी आयुषि. भावना अपने इस छोटे से परिवार में खुश थी. प्यार करने वाला पति था तो सुंदर से 2 बच्चे. इन्हीं सब की देखभाल में उस का समय बीत जाता था.

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लेकिन अचानक मंजू ने उस के प्यार में सेंध लगा दी थी. मंजू के ही चक्कर में पड़ कर करन देर से घर आने लगा. वह भावना को घर का खर्च भी कम देने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह अपनी कमाई का एक हिस्सा मंजू पर खर्च करने लगा था.

कुछ दिनों तक तो भावना की समझ में ही नहीं आया कि पति में यह बदलाव कैसे आ गया? लेकिन जब उस ने देखा कि करन देर रात तक न जाने किस से फोन पर बातें करता रहता है तो उसे संदेह हुआ. उस ने पूछा भी कि इतनी रात तक वह किस से बातें करता रहता है? करन ने लापरवाही से कह दिया कि उस का एक दोस्त है, उसी से वह बातें करता है.

आखिर बहाना कब तक चलता. भावना को लगा कि पति झूठ बोल रहा है तो उसे डर लगा कि पति कहीं किसी गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है. भावना का डर गलत भी नहीं था.

उधर मंजू के दबाव में करन ने उस से नोटरी के यहां शादी कर ली थी. शादी के बाद मंजू मायके में नहीं रहना चाहती थी, इसलिए करन ने थाना सिकंदरा की राधागली में किराए पर एक कमरा ले लिया और उसी में दोनों पतिपत्नी के रूप में रहने लगे. मंजू की बेटी इच्छा भी उसी के साथ रह रही थी.

मंजू को लगता था कि वह करन को अपने प्यार की डोर में इस तरह से बांध लेगी कि वह अपनी ब्याहता पत्नी को भूल जाएगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि करन 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह मंजू से इस तरह मिल रहा था कि भावना को पता न चले, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे पता चल गया तो घर में तूफान आ जाएगा.

यही वजह थी कि करन रात में मंजू के यहां जाता तो कोई न कोई बहाना बना कर जाता था. लेकिन पति के बदले हावभाव से परेशान हो कर भावना ने उस की शिकायत ससुर से कर दी. राधेश्याम ने बेटे को डांटफटकार कर तरीके से रहने को कहा. भावना ने भी धमकी दी कि अगर वह ढंग से नहीं रहा तो वह बच्चों को छोड़ कर मायके चली जाएगी.

पत्नी की इस धमकी से करन डर गया, क्योंकि अगर पत्नी घर छोड़ कर चली जाती तो वह बच्चों को कैसे संभालता? आखिर पत्नी की धमकी के आगे करन ने सरेंडर कर दिया और मंजू से मिलनाजुलना कम कर दिया. उस के इस व्यवहार से मंजू को लगा कि वह परेशानी में फंस गई है, क्योंकि करन से शादी करने के बाद वह नौकरी भी छोड़ चुकी थी. अब वह पूरी तरह से करन पर ही निर्भर थी. मकान के किराए के अलावा घर के खर्चे की भी चिंता थी.

एक दिन ऐसा भी आया, जब करन का मोबाइल फोन बंद हो गया. मंजू परेशान हो उठी. करन के बिना वह कैसे रह सकती थी? वह मायके भी नहीं जा सकती थी. करन के घर का पता भी उस के पास नहीं था. आखिर औटो वालों की मदद से उस ने करन को खोज निकाला.

मंजू करन के घर पहुंच गई. उस ने करन से साथ चलने को कहा तो भावना भड़क उठी. मंजू को भलाबुरा कहते हुए भावना ने कहा कि करन उसे छोड़ कर कैसे जा सकता है. उस ने उस से ब्याह किया है. उस से उस के 2 बच्चे हैं.

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मंजू और भावना में लड़ाई होने लगी. शोर सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. किसी ने थाना पुलिस को फोन कर दिया. सूचना पा कर थाना सिकंदरा के थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय करन के घर पहुंच गए. वह करन, मंजू और भावना को थाने ले आए.

तीनों की बातें सुन कर ब्रजेश पांडेय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? एक आदमी ने मौजमस्ती के लिए 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया था. करन को न मंजू छोड़ रही थी और न भावना. छोड़ती भी कैसे, दोनों का भविष्य अब उसी पर टिका था. इस परेशानी को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय ने कहा कि करन एक महीने मंजू के साथ रहेगा और एक महीने भावना के साथ. जब तक वह जिस के साथ रहेगा, उस की कमाई पर उसी का हक होगा.

मंजू को यह समझौता कतई मंजूर नहीं था, क्योंकि उस का रिश्ता तो रेत की दीवार की तरह था, जो कभी भी ढह सकती थी. लेकिन भावना इस समझौते पर राजी थी. मंजू ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि एक दिन करन उस के साथ रहेगा और एक दिन भावना के साथ.

हालांकि इस समझौते का कोई कानूनी मूल्य नहीं था, फिर भी ब्रजेश पांडेय ने एक कागज पर लिखवा कर दोनों औरतों और करन के दस्तखत करवा लिए. इस समझौते से जहां मंजू ने राहत की सांस ली, वहीं भावना को मजबूरी में सौतन के लिए अपने पति का बंटवारा करना पड़ा.

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करन ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी होगा, इसलिए अब वह परेशान था. उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उस ने जो गलती की थी, अब उस का खामियाजा तो उसे भोगना ही था.

थानाप्रभारी ने जो समझौता कराया था, करन के घर वालों ने उस का सख्ती से विरोध किया. जब इस समझौते की खबर अखबारों में छपी तो सभी हैरान थे कि एक पुलिस अधिकारी ने ऐसा समझौता कैसे करा दिया? बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो कोई बवाल होता, उस के पहले ही इंसपेक्टर ब्रजेश पांडेय का तबादला कर दिया गया.

कुछ भी हो, मंजू को लग रहा है कि उस की अपनी गृहस्थी बस गई है. करन अब एक दिन उस के साथ रहता है तो अगले दिन भावना के साथ. उस दिन वह जो कमाता है, उसे देता है जिस के साथ रहता है. लेकिन करन का लगाव भावना और अपने बच्चों के प्रति अधिक था, इसलिए अब वह मंजू पर उतना ध्यान नहीं देता, जितना देना चाहिए. इस से आए दिन उस का मंजू से झगड़ा होता रहता है.

करन ने जो गलती की है, अब वह उस का खामियाजा भोग रहा है. उसे भी कहां सुख मिल रहा है. कभी वह मंजू की ओर भागता है तो कभी भावना की ओर. परेशानी की बात तो यह है कि अभी इस समझौते को हुए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, खींचतान शुरू हो गई है. आगे क्या होगा, कौन जानता है.

आखिर एक आदमी की गलती से 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. उस का भी क्या होगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. यह समझौता भी कितने दिनों तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. Emotional Story

Social Story: बहू भी कराती है हत्या

Social Story: आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था.

तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये.

इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.

Crime Story: ये है असली ‘शोले’, शौहर ही बन गया ‘गब्बर’

Crime Story: मनोज ने बांहों में जोर से कस कर अपनी बीवी फूलकुमारी को जकड़ लिया और भाभी सविता देवी ने उस के जिस्म पर गरम सलाखों से मारना शुरू कर दिया. बीचबीच में मनोज का बड़ा भाई सरोज उसे उकसाता रहा. फूलकुमारी रोतीचिल्लाती, तो उसे फिल्म ‘शोले’ की हीरोइन बसंती की तरह नाचने के लिए कहा जाता. जब वह नाचने से इनकार करती, तो गरम सलाखों से दागा जाता. दर्द से तड़पती फूलकुमारी नाचने की कोशिश करती, पर गश खा कर जमीन पर गिर पड़ती थी. चेहरे पर पानी डाल कर उसे होश में लाया जाता और उस के बाद फिर से उसे नाचने का फरमान सुना दिया जाता. फिल्म ‘शोले’ के खतरनाक विलेन गब्बर सिंह की हैवानियत को भी फूलकुमारी के पति और ससुराल वालों ने मात दे दी थी.

फूलकुमारी के बेटी को जन्म देने के साथ ही परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया था और उस की शादीशुदा और पारिवारिक जिंदगी लगातार खराब होती गई थी.

बेटी को जनने वाली फूलकुमारी पर उस के सास, ससुर, भैसुर, गोतनी और उस के पति का जोरजुल्म शुरू हो गया. फूलकुमारी और उस के मांबाप को परेशान करने के लिए मनोज ने यह रट लगानी शुरू कर दी कि उसे दहेज में मोटरसाइकिल नहीं मिली है. वह फूलकुमारी पर दबाव बनाने लगा कि वह अपने मांबाप से मोटरसाइकिल दिलाए, नहीं तो तलाक के लिए तैयार हो जाए.

मनोज की इस कारिस्तानी में गांव का ही रामानंद केवट भी बढ़चढ़ कर मदद करने लगा. रामानंद केवट पर औरतों को सताने के पहले से कई मुकदमे दर्ज हैं. उस ने अपने बड़ी बहू को इस कदर तंग किया था कि उस ने फांसी लगा कर अपनी जिंदगी ही खत्म कर ली थी. वह छोटी बहू को भी डराधमका कर रखता है और कहीं बाहर आनेजाने भी नहीं देता है. फूलकुमारी देवी बताती है कि मनोज ने मायके वालों से फोन पर बात करने पर भी पाबंदी लगा दी. 4 जून, 2016 को उसे घर के एक कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया गया और सास मुन्नी देवी पहरेदार के रूप में बाहर डंडा ले कर बैठी रहती थीं.

24 मई, 2014 को बिहार की राजधानी पटना के दीघा थाने की बिंद टोली में काफी धूमधाम से मनोज और फूलकुमारी की शादी हुई थी. भोजपुर जिले के आरा शहर के रघु टोला में रहने वाले किसान रामदयाल केवट और मुन्नी देवी के बेटे मनोज के साथ फूलकुमारी आरा आ गई.

इस बीच मनोज के बड़े भाई धनोज की बीवी रिंकू ने 6 मार्च, 2015 को बेटी को जन्म दिया. घर में खुशियां मनाई गईं और जम कर पार्टी हुई. उस के बाद जनवरी, 2016 को धनोज और रिंकू मुंबई चले गए. धनोज मुंबई में गरम मसाले का कारोबार करता है. उस के बाद मनोज और फूलकुमारी देवी के घर भी 27 अक्तूबर, 2015 को बेटी का जन्म हुआ. फूलकुमारी के बेटी होने के बाद पूरे घर में कुहराम मच गया.

जब फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो को अपनी बेटी की दर्दभरी कहानी का पता चला, तो वे बेटी की ससुराल आरा पहुंचे. उन्हें बेटी से नहीं मिलने दिया गया और बेइज्जत कर के घर से भगा दिया गया. उस के बाद रवींद्र महतो महिला थाने पहुंचे और इंचार्ज पूनम कुमारी से मिल कर पूरी घटना की जानकारी दी.

रवींद्र ने जब एफआईआर दर्ज करने की गुजारिश की, तो थाना इंचार्ज ने उन से कहा कि आप लोग पटना के दीघा थाना इलाके में रहते हैं, इसलिए आरा में एफआईआर दर्ज करने से आप लोगों को बारबार पटना से आरा आनेजाने में काफी पैसा और समय बरबाद होगा. आरा के सभी मामले पटना में ही रैफर कर दिए जाते हैं, इसलिए दीघा थाने जा कर एफआईआर दर्ज कराएं, तो अच्छा रहेगा.

थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने कहा कि दीघा थाने के थानाध्यक्ष के पास जा कर मामला दर्ज कराएं. पूनम कुमारी ने यह भी भरोसा दिलाया कि अगर दीघा थानाध्यक्ष मामला दर्ज नहीं करेंगे, तो उन से उन की बात करा देना. महिला थाने से निराशा हाथ लगने के बाद रवींद्र महतो पटना के दीघा थाने गए. वहां पर पुलिस वालों को बेटी के साथ हुए अत्याचार की कहानी सुनाई और एफआईआर दर्ज करने की गुहार लगाई.

रवींद्र की बातों को सुनने के बाद पुलिस वालों ने साफतौर पर कहा कि यह मामला तो भोजपुर जिले के आरा शहर का है, इसलिए यहां तो किसी भी हालत में एफआईआर दर्ज नहीं होगी. आरा में जा कर ही मामला दर्ज कराएं. इस के बाद फूलकुमारी के पिता रवींद्र महतो थाने में ही बैठ कर रोने लगे और बेटी को इंसाफ दिलाने की रट लगाने लगे. इस के बाद भी पुलिस वालों ने उन की मदद नहीं की.

पटना पुलिस हैडक्वार्टर के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, 9 जून, 2016 को दोपहर में महिला थाने की थानाध्यक्ष पूनम कुमारी ने रिपोर्ट में कहा था कि घायल के परिजन खुद ही इंजरी रिपोर्ट और एफआईआर दर्ज नहीं कराना चाह रहे थे. उन का कहना था कि पटना में एफआईआर दर्ज करेंगे. इस से यह साफ हो जाता है कि महिला थानों में भी औरतों के मामले को ले कर किस कदर लापरवाही बरती जाती है. Crime Story