Family Betrayal Story: जिंदगी के अदाकार

Family Betrayal Story: तुम्हारे आखिरी दाग की निशानी मेरे वजूद पर लग चुकी है और शायद इसी से मेरी बेनाम जिंदगी की शुरुआत हो. यही दाग मेरे जीने का बहाना बन जाए. तुम्हारी दलील अपनी जगह सही है कि एक वक्त में 2 इंसानों को एक जैसा, एक ही जितना प्यार किया जा सकता है.   जब मैं 9 साल की थी और मेरा भाई 3 साल का तो मेरी मां ने मेरे लखपति बाप जफर अली खां से तलाक ले कर अजीज मियां से शादी कर ली थी, जो नयानया दौलतमंद बना था. उस ने भी अपनी बीवी को तलाक दे कर मम्मी से

शादी की थी. मगर पहली बीवी से उस के कोई औलाद नहीं थी, जबकि मम्मी हम बहनभाई को छोड़ कर उस की बीवी बन गई थीं. अहमद को तो अब्बू ने अपने पास मुंबई में रख लिया था. वह वहीं बिजनैस करते थे, मुझे पूना भेज दिया गया था, जहां मेरी दादी और दादा रहते थे. मेरे अब्बू अपने मांबाप की एकलौती औलाद थे, इसलिए मुझे दादीदादा से भरपूर प्यार मिला. मगर वह प्यार भी मेरी शख्सियत में जगह बना लिए उस खालीपन को न भर सका, जो मांबाप से बिछुड़ने की वजह से पैदा हुआ था. दादाजान के पास भी दौलत की कोई कमी नहीं थी, मगर वह बड़े कठोर और उसूल वाले इंसान थे.

अगर मुझे नाश्ते या दोपहर और रात के खाने पर डायनिंग रूम में पहुंचने में एक मिनट की भी देर हो जाती तो मेरा कोर्टमार्शल हो जाता. इसी तरह अगर मैं क्लास में सेकेंड या थर्ड आ जाती तो दो ट्यूटर लगा दिए जाते. जब तक मैं जूनियर स्कूल में रही, मुझे चूडि़यांबुंदे तक पहनने की इजाजत नहीं थी. लेकिन दादी अपनी अलमारी खोल कर खूबसूरत जेवरात दिखातीं और कहतीं, ‘‘कंवल बेटी! यह सब कुछ तेरा है, मगर अभी नहीं.’’

हर ईद पर अहमद और अब्बू आ जाते तो मुझे अजीब सी वहशत होने लगती. अलबत्ता अहमद पर मुझे बहुत प्यार आता. अब्बू और अहमद एक हफ्ता हमारे साथ बिताने के बाद मुंबई चले जाते तो जिंदगी फिर उसी पुरानी डगर पर वापस आ जाती. स्कूल से वापस आती तो पौने 2 बजे तैयार हो कर खाने की उस खौफनाक मेज पर पहुंच जाती, जहां सिर्फ छुरीकांटों और चम्मचों की आवाज ही सुनाई देती, क्योंकि दादाजान को खाते वक्त बातें करना सख्त नापसंद था. हमारे यहां गोश्त और मुर्गामछली वाले पकवान ज्यादा बनते थे, जबकि मुझे दालचावल बहुत पसंद थे. मगर दादीजान मुझे गरीबों का यह खाना कभी न खाने देतीं. कहती थीं, ‘‘कंवल, चावल खाने से मोटी हो जाओगी और भला दाल भी कोई खाने की चीज है?’’

जब मैं हाईस्कूल में आई तो जवान होने लगी थी. स्कूल में एक लड़की लबना के सिवा कोई और सहेली न बन सकी. वह मेरे मिजाज से वाकिफ थी और मेरे घर आती थी. लेकिन मुझे उस के घर जाने की इजाजत नहीं थी. मैं ने दादीजान से शिकायत की तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे दादाजान ने तुम्हारी मां की हरकतों की वजह से यह पाबंदी लगाई है. वह नहीं चाहते कि…’’ इतना कह कर वह रुक गईं.

‘‘जी?’’ मैं ने उन की आंखों में झांक कर कहा तो वह नजरें चुरा गईं. तब मुझे बहुत अफसोस हुआ था, मगर मैं कुछ भी न कह सकी. जो कुछ मेरी मां ने हमारे साथ किया था, वह कोई ढकीछिपी बात नहीं थी. बाद में पता चला कि अजीज मियां अब्बू के दोस्तों में थे और मम्मी ने बाकायदा इश्क कर के उन से शादी की थी. कई बार मांबाप के किए की सजा औलाद को भुगतनी पड़ती है. इसीलिए मेरी नजर में हर रिश्ते की अहमियत खत्म हो गई थी. सीनियर कैंब्रिज का इम्तहान खत्म हुआ तो अब्बू ने मुझे मुंबई बुला भेजा. वह बुलावा इस टाइमटेबल की कैद जिंदगी से बाहर निकलने का अकेला रास्ता था, जो मुझे 7 साल के लंबे अरसे बाद मिला था.

दादाजान की ढेरों नसीहतों और अपने सूटकेस समेत मैं मुंबई पहुंची. यह देख कर मुझे न अफसोस हुआ, न ताज्जुब कि अब्बू मुझे लेने स्टेशन पर मौजूद नहीं थे. अहमद और ड्राइवर मुझे लेने आए थे. मैं अपने भाई से मिल कर बहुत खुश हुई. अहमद अब बड़ा हो गया था और 5वीं में पढ़ रहा था, मगर उस का कद अब्बू पर गया था. मुझ से कुछ ही छोटा था. उस ने बताया, ‘‘आपी, अब्बू के कुछ मेहमान बाहर से आए हैं. वह उन्हें ले कर डिनर पर गए हैं.’’

मैं उस की बात पर सिर्फ मुसकरा दी.

हम लौन में बैठे तारे गिन रहे थे. समुद्र की तरफ से आने वाली हवा मेरे बाल बिखरा रही थी. मैं ने अहमद से पूछा, ‘‘तुम यहां बोर नहीं हो जाते?’’

‘‘नहीं आपी, मुझे बोर होने का वक्त ही नहीं मिलता.’’ वह बोला.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘भई, सुबह पौने 8 बजे मेरा स्कूल लगता है. एक बजे मैं घर आता हूं. डेढ़ से 3 मैं पढ़ता हूं. 3 बजे मौलवी साहब आते हैं. साढ़े 3 से 5 बजे तक खेलता हूं. फिर अब्बू के दफ्तर जाता हूं. वहां से हम साथ वापस आते हैं और यों दिन खत्म हो जाता है.’’

‘‘वाकई तुम तो बड़े काम के आदमी हो यार.’’ मैं हंस पड़ी.

अब्बू अभी तक लौट कर नहीं आए थे. पौने 11 बजे अहमद ने कहा, ‘‘आपी, चलें सोने. सुबह मेरा स्कूल है.’’

‘‘चलो,’’ मैं भी उठ गई.

न जाने रात के किस पहर मुझे नींद आई. मैं ने सोच रखा था कि बहुत देर तक सोती रहूंगी. दादाजान के साथ तो सुबह 8 बजे नाश्ता करना जरूरी था. लेकिन न चाहने के बावजूद सुबह सात बजे मेरी आंख खुल गई. बिस्तर से उठने को जी न चाहा तो घंटी बजा कर वहीं ब्लैक कौफी मंगवाई. फिर नहाधो कर तैयार हो गई. नाश्ते की मेज पर अब्बू ने मुझ से बहुत चौंका देने वाला एक सवाल किया, ‘‘कंवल, तुम्हारी मम्मी चाहती हैं कि तुम उन के पास जा कर रहने लगो.’’

‘‘जी, कौन मम्मी?’’ टोस्ट पर जैम लगातेलगाते मेरे हाथ रुक गए.

‘‘जज्बाती न बनो कंवल, अब तुम्हें अख्तियार है कि तुम मेरे या खालिदा के साथ रहो.’’

‘‘अब्बू, जज्बात क्या होते हैं, मुझे नहीं मालूम. रहा साथ रहने का सवाल तो न तो मैं उन के साथ रहूंगी और न आप के साथ रह रही हूं. मैं दादाजान के पास हूं और वहीं रहना चाहती हूं.’’

‘‘अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं कंवल. मगर खैर, तुम जब तक यहां रहना चाहो, रह सकती हो.’’ अब्बू बोले.

जब 15 दिन और बीत गए तो मैं बोर हो गई और वापसी का इरादा किया. अब्बू और अहमद मुझे बहुत रोकते रहे, मगर मैं वापस पूना आ गई. दादादादी उदास थे. मुझे सीने से लगा कर रो पड़े, मगर मेरे दिल में कोई जज्बात नहीं थे. न खुशी न गम और न मोहब्बत. दादीजान की इच्छा थी कि मैं आगे न पढ़ूं. मगर दादा मुझे पढ़ाना चाहते थे. और मैं? मैं कुछ नहीं चाहती थी. छुट्टियों के दिन थे. नवंबर का महीना था. मौसम बेहद खूबसूरत था. सुबह से बारिश हो रही थी. जब मैं अपना हुलिया सही कर के खाने की मेज पर पहुंची तो चौथी कुरसी को भी भरी हुई पाया. मेरे बैठ जाने के बाद दादाजान ने परिचय करवाया, ‘‘कंवल, यह अमीर है. मेरे दोस्त अल्ताफ हुसैन का बेटा. कुछ दिनों पहले ही अमेरिका से लौटा है.’’

‘‘आदाब.’’ मैं ने केवल इतना कहा और मेज पर खामोशी छा गई. सिर्फ कांटेछुरी की आवाजें थीं. खाने के फौरन बाद दादाजान अमीर को ले कर अपनी लाइब्रेरी में चले गए. दादी अपने कमरे में और मैं यूं ही बेमकसद लौन वाले चबूतरे की सीढ़ी पर बैठ गई.

सारे गुलाब धुल कर खूबसूरत हो गए थे और बारिश थम गई थी. न जाने कितनी देर मैं बैठी रही थी कि अमीर बाहर आया. उस की उम्र 30 के आसपास रही होगी. वह बेहद शानदार शख्सियत का मालिक था. उस ने मेरे चेहरे पर नजर डालते हुए पूछा, ‘‘आप यहां बैठी हैं? क्या मैं भी बैठ कर खूबसूरती का नजारा कर सकता हूं?’’

‘‘जरूर, शौक से.’’

वह मेरे बराबर सीढि़यों पर बैठ गया और पूछा, ‘‘आप क्या यूं ही आदम बेजार हैं?’’

‘‘जब आदम ही नहीं तो बेजारी किसे दिखाऊं?’’

‘‘मैं कल भी आया था, मगर आप नजर नहीं आईं. आज भी सिर्फ खाने की मेज पर दिखाई दीं. क्या आप तनहाईपसंद हैं.’’

‘‘कल मुझे आप के आने का पता न लग सका था और रही आज की बात तो आप दादाजान के मेहमान थे और इस घर के सख्त उसूलों में से एक यह भी है कि किसी अजनबी से बेतकल्लुफ न हुआ जाय.’’

‘‘ओह!’’ वह हंस पड़ा, ‘‘क्या आप मेरे साथ लांग ड्राइव पर चलेंगी?’’

‘‘जी?’’ मैं ने आंखें फाड़ कर उसे देखा, ‘‘आप शायद नहीं जानते कि दादाजान के पेनल कोड में इस की बहुत बड़ी सजा है.’’

‘‘चलिए उठिए, पूछ लेते हैं उन से.’’ वह उठा और हाथ बढ़ा कर मुझे भी उठाना चाहा तो मैं झिझक गई और खुद ही उठ खड़ी हुई.

दादाजान ने फौरन इजाजत दे दी तो मैं उस की कार में बैठ गई. हलकीहलकी बारिश हो रही थी. विंडस्क्रीन पर नजरें जमाए मैं चुपचाप बैठी रही. वह मुझे भरपूर नजरों से देखते हुए बोला, ‘‘मेरे वालिद ने मेरे लिए आप को पसंद किया है. क्या यह रिश्ता आप को मंजूर है?’’

मैं ने गहरी सांस ली. अपने यहां की लड़कियों की तरह न तो मैं बीरबहूटी बनी और न दुपट्टे का कोना अंगुली पर लपेटा. बेपरवाही से बोली, ‘‘दादाजान जो फैसला करेंगे, मेरे लिए वही कुबूल होगा.’’

‘‘क्यों? आप की अपनी पसंद कोई नहीं है?’’ अमीर ने जरा नाराज होते हुए पूछा.

‘‘मेरी पसंद या नापसंद का कोई फायदा नहीं.’’ मैं ने उसी तरह सामने देखते हुए कहा.

‘‘फिर भी मैं यानी अमीर हुसैन, अमेरिका से न्यूरो सर्जरी की डिग्री ले कर आया हूं और 30 साल मेरी उम्र है. देखने में भी बुरा नहीं हूं. फिर आप के इनकार की वजह?’’

‘‘मैं ने इनकार तो नहीं किया?’’ सीधे मैं ने उस की आंखों में झांका.

‘‘ऊंची सोसायटी में यूं ही इनकार करते हैं.’’

‘‘दरअसल, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘क्यों? अब आप इतनी छोटी भी नहीं हैं.’’ वह बोला, हालांकि मेरी और उस की उम्र में 15 साल का फर्क था.

‘‘बात यह है अमीर साहब, मुझे अपनी जिंदगी में बसे खौफ को दूर करना है. जीने का जोश पैदा करना है और मैं नहीं चाहती कि आप मेरे साथ बेसुकून हों.’’

‘‘अच्छा,’’ वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘अगर आप अभी शादी नहीं करना चाहतीं या तैयार नहीं हैं तो मैं आप का इंतजार करूंगा.’’

‘‘अब मैं ऐसी चीज भी नहीं कि आप एक उम्र मेरे लिए बिता दें.’’

‘‘आप अपनी तारीफ सुनना चाहती हैं?’’

‘‘हरगिज नहीं. अगर कोई मेरी तारीफ करता है तो मुझे वहशत होती है. दरअसल बात यह है अमीर साहब कि मैं रिश्तों की पहचान करना चाहती हूं. मेरी नजर में फिलहाल सभी रिश्ते खोखले और नापायेदार हैं. अपनेअपने मतलब की खातिर सब एकदूसरे से मोहब्बत करते हैं. मैं सच्चाई की खोज में हूं और शायद उसी का इंतजार कर रही हूं.’’

‘‘तुम तो फिलौस्फर हो कंवल.’’ अमीर हंस पड़ा.

‘‘मैं फिलौस्फर नहीं, हकीकतपसंद हूं.’’ मैं ने घड़ी देखी, हमें निकले हुए तकरीबन एक घंटा हो गया था, ‘‘अब वापस चलें.’’

‘‘दिल भर गया?’’

अमीर की इस बात पर मैं हंस पड़ी, ‘‘दिल क्या चीज होती है डाक्टर साहब, हम सब तकदीर के, वक्त के गुलाम हैं. दिल के चाहने, न चाहने से कुछ नहीं होता.’’

अमीर चुपचाप गाड़ी चलाता रहा, यहां तक कि घर आ गया.

‘‘फिर कब आऊं जवाब लेने?’’ अमीर ने आगे को झुक कर मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘मैं आप को खुद फोन करूंगी. खुदा हाफिज और थैंक्स.’’ यह कह कर मैं गाड़ी से  उतर गई. शायद दादाजान के कहने पर अमीर ने खुद यह बात की थी.

एक दिन मैं कालेज से लौटी तो खाने के बाद दादीजान ने याद फरमाया, ‘‘बिटिया, अगले हफ्ते तुम्हारी मंगनी है. अमीर की वालिदा आ रही हैं.’’

‘‘अच्छा!’’ मैं ने सिर्फ इतना कहा और सोचा कि यकीनन मेरी मरजी की कोई अहमियत नहीं है.

शाम को दादादादी कहीं डिनर पर चले गए थे. मैं वीसीआर पर कार्टून देख रही थी कि अमीर का फोन आ गया, ‘‘मैं ने तुम्हारे फोन का इंतजार किए बगैर मंगनी की तारीख तय कर दी है.’’

‘‘जी, मुझे पता है.’’

‘‘मेरे घर में तुम्हें सारी मोहब्बतें मिलेंगी कंवल, जिन की तुम तलाश में हो.’’ इस बात पर मैं चुप रही.

‘‘तुम्हें रंग कौन सा पसंद है कंवल?’’

‘‘रंगों, कपड़ों और पत्थरों से मुझे कोई दिलचस्पी नहीं अमीर.’’ यह कह कर मैं ने फोन बंद कर दिया.

मेरी मंगनी हुई. मैं ने अपनी सास को पहली बार देखा और न जाने क्यों उन का प्यार मुझे एक दिखावा लगा, जिस से मुझे शदीद नफरत थी. मेरी शादी पर डैडी और अहमद भी मुंबई से आए. बहुत धूमधाम से हुई मेरी शादी. वे सारे जेवरात, जो दादीजान के सेफ में बंद रहते थे, मुझे मिल गए और भी बहुत कुछ दहेज में मिला, जिस में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी. न तो मैं विदाई के समय रोई और न ही मुझे बाबुल का घर छोड़ने का कोई अफसोस हुआ. जब मैं विदा हो कर अमीर के घर आई तो एक नई दुनिया, एक नई जिंदगी मेरे इंतजार में थी. अमीर मुझ से बहुत मोहब्बत करते थे, इतनी कि मैं बयान नहीं कर सकती. उन की जिंदगी बहुत बिजी थी. वह सुबह क्लीनिक जाते, 2 बजे वापस आते, खाना खा कर आराम करते. फिर 5 बजे उठ कर वापस चले जाते.

हफ्ते में 2 दिन छुट्टी करते और इन 2 दिनों में हर मुमकिन कोशिश करते कि मेरे पास रहें, मुझे ले कर घूमने चलें. इसी दौरान मेरे ससुर का इंतकाल हो गया. उन की मौत पर मेरा देवर जावेद, जो लंदन में रहता था, बीवी रीटा के साथ घर आ गया. रीटा गैर मुसलमान थी. कुछ ही दिनों में मैं ने यह बात महसूस कर ली कि मेरी सास और रीटा के आपसी ताल्लुकात वाजिब से थे. मेरी तो शुरू से यह आदत थी कि कभी किसी के मामले में दखल नहीं देती थी. यह घर अमीर का था, जिसे अपनी सास के आने से पहले मैं चलाती थी. जब वह आईं तो मैं ने सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी. वह मुझ से बहुत खुश रहने लगीं. सब आनेजाने वालों के आगे मेरी तारीफ करतीं. मगर मैं बजाय खुश होने के डर जाती कि कहीं यह धोखा न हो.

मुझे अपने पास बिठा कर वह रीटा की बुराइयां करतीं. तब भी मैं चुप रहती, क्योंकि दादाजान की सीखों में किसी की बुराई शामिल नहीं थी. न जाने ‘फूट डालो और राज करो’ का उसूल बूढ़े लोग क्यों अपनाते हैं. रीटा बेचारी किसी अजनबी की तरह घर में रहती और घबराई सी घूमती. मैं उसे बहुत समझाती और दिलासा देती, ‘‘रीटा, यह घर तुम्हारा भी है. तुम मेरी छोटी बहन की तरह हो. जावेद ने तुम्हें प्यार किया. तुम मेरे लिए पाक हो.’’

मगर जो खौफ उस के दिल में था, वह दूर न हो सका. और तो और, अमीर भी उस से खिंचेखिंचे रहते. मैं ने उन्हें टोका, ‘‘अमी, वह लड़की तुम्हारे भाई की खातिर अपना मजहब छोड़ कर आई है. तुम उसे नफरत दे कर उसे अपने मजहब से नफरत करना सिखा रहे हो.’’

मेरे लेक्चर का उन पर असर हुआ. वह कुछ संभल गए. अब मैं अकसर सोचती और खुदा से दुआ मांगती, ‘‘ऐ खुदाया, आखिर कब तक मुझे रिश्तों की पहचान आएगी? कब से दुनियावी रिश्ते हकीकत में तब्दील हो कर मेरे दिल में भी मोहब्बत की जोत जगाएंगे?’’

हमारी शादी को 2 साल का समय बीत गया था, जब दादाजान पर फालिज ने हमला कर दिया और वह बोलने की ताकत खो बैठे. बुलंद आवाज वाले दादाजान चुप हो गए तो अब्बू और अहमद भी घर आए. मैं भी गई हुई थी. एक दिन अब्बू ने मुझ से कहा, ‘‘कंवल, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘जी.’’ मैं उन के सामने बैठ गई.

वह कुछ नर्वस हो गए थे. उन का सिर झुका हुआ था. वह आहिस्ता से बोले, ‘‘मैं शादी करना चाहता हूं.’’

इस बात ने मुझे हिला दिया, हालांकि मेरे बाप ने जवानी हमारे नाम कर दी थी. बाप होते हुए भी उन्होंने यह कुरबानी दी थी. इसलिए मैं खुदगर्ज बनना नहीं चाहती थी. मुझे पता था, अब वह उम्र के उस हिस्से में थे, जहां हर एक को किसी दोस्त, किसी सहारे की, एक हमदम की जरूरत होती है. कुछ लम्हे सोच कर मैं ने उन से कहा, ‘‘अब्बू, आप ने अहमद की खातिर जो कुरबानी दी है, उसे हम दोनों ताजिंदगी भुला नहीं पाएंगे. लेकिन अब जबकि अहमद 15 साल का हो गया है, क्या आप 2 बरस रुक नहीं सकते?’’

उन का झुका हुआ सिर उठा तो उन की आंखें नम थीं, ‘‘अगर तुम मुझे मना कर दो कंवल तो मैं कभी शादी नहीं करूंगा.’’

आज बरसों बाद मैं ने उन की आंखों में अपने लिए प्यार देखा था, शायद पहली बार. मगर मैं अपने अंदर वह कशिश, वह मोहब्बत पैदा न कर सकी, जो एक बेटी को बाप से होती है. मैं ने कुछ देर सोचा, फिर उन के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बोली, ‘‘मैं अहमद को समझाऊंगी. अब्बू आप निकाह कर लें. मुझे आप की तनहाइयों का पूरा अहसास है. हम और खुदगर्ज नहीं बन सकते.’’

वह हौले से हंस दिए. मैं ने अहमद को बुला कर समझाया तो अंदाजा हुआ कि एक 15 साल के अल्हड़ लड़के से नहीं, बल्कि 30 साल के मर्द से बात कर रही हूं. वह सयाना हो गया था. उस के दिल में अपनी मां के लिए बेअंदाज नफरत थी. वह कैंब्रिज के बाद अमेरिका जाना चाहता था और मुझे पता था कि वह एक बार बाहर जाएगा तो फिर कभी लौट कर नहीं आएगा. अब्बू ने मुंबई लौट कर निगहत बट से शादी कर ली. निगहत बेवा थीं और बकौल अहमद बहुत नेक औरत थीं. अहमद ने फोन पर बताया कि वह उस का बहुत खयाल रखती थीं. दूसरी बात यह थी कि उन के कोई औलाद नहीं थी और न हो सकती थी.

इधर मेरी सास को मेरी गोद हरी न होने का गम खाए जा रहा था. हर किस्म के तावीजगंडे वह आजमा चुकी थीं. उन का बस नहीं चलता था, नहीं तो वह कहीं से एक बच्चा ला कर मेरी गोद में डाल देतीं. अमीर अपने क्लीनिक में मगन थे. उन्हें अब तक इस बात की कमी महसूस नहीं हुई थी. मैं ने उन से यह बात की तो वह हंस पड़े, ‘‘क्या तुम यह चाहती हो कि हमारा बच्चा जल्दी हो?’’

‘‘हां. हो सकता है, यही रिश्ता मुझे रिश्तों की पहचान करवा दे.’’

‘‘क्या तुम ने मेरे प्यार में कोई कमी महसूस की है कंवल?’’

‘‘जिस दिन करूंगी, बेझिझक कह दूंगी.’’

‘‘गुड गर्ल. मैं बहुत बिजी हूं. यहां नयानया सेट हो रहा हूं. फिर अब्बू की मौत के बाद कारोबार की भी देखभाल करना होता है. दूसरे जावेद ने परेशान कर रखा है.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘वह अलग रहना चाहता है. अब दुनिया वाले क्या कहेंगे कि मैं एक भाई की जिम्मेदारी भी नहीं उठा सकता. फिर आज वह अलग मकान लेगा, कल कारोबार में बंटवारा चाहेगा. यह कैसे मुमकिन है?’’ अमीर दूर की सोचते हुए मुझ से बातें कर रहे थे.

‘‘सुनो अमी, यह दुनिया क्या होती है भला? अगर जावेद अलग रहना चाहता है तो रहने दो. हर इंसान को अपनी जिंदगी जीने का हक है. देखो, बात साथ रहने और अलग रहने की नहीं है. सारी बात मोहब्बत की है. अगर दो अलगअलग मकानों में रह कर भी तुम उसे उस का हक और मोहब्बत दे रहे हो तो वह साथ रह कर मनमुटाव से हजार दरजे बेहतर है.’’ मैं ने उस की गहरी आंखों में झांकते हुए कहा और वह कुछ सोच कर रजामंद हो गए.

बच्चे की चाहत मेरे दिल में अपनी जड़ें मजबूत करती जा रही थी. मगर 10 माह बीत जाने के बाद भी खुशखबरी न मिल सकी तो मैं बहुत परेशान रहने लगी. अमीर मेरी उलझन पर हंस पड़े और बोले, ‘‘जल्दी क्या है कंवल? अपने आप को कुछ वक्त दो.’’

मैं उन के मना करने के बावजूद गाइनाकालौजिस्ट के पास गई. उस ने कई टेस्ट लिख दिए. सब से पहले उस ने मेरी डीएनसी की रिपोर्ट देखी और बताया कि तुम बच्चे पैदा करने के काबिल नहीं हो. शदीद मायूसी का एक दौरा मुझ पर पड़ा. अमीर ने मुझे बच्चा गोद लेने का मशविरा दिया, मगर मैं तो अपने खून जिगर से रिश्ता बनाना चाहती थी और मुझे पता था कि मैं किसी गैर के बच्चे के साथ इंसाफ न कर पाऊंगी. इस वाकये के बाद दादाजी एक दिन चुपचाप चल बसे और तब मुझे अहसास हुआ, जैसे मैं नंगे सिर सूरज की तेज तपिश में आ गई हूं. मेरे ऊपर से जैसे किसी ने साया खींच लिया हो. तब मुझे उन से अपनी मोहब्बत का अहसास हुआ. दादीजान अब्बू के पास मुंबई चली गईं और पूना की वह बड़ी हवेली बंद हो गई.

मरतेमरते दादाजान हवेली मेरे नाम कर गए थे. मैं ने उस में एक स्कूल खोल लिया और छोटेछोटे मासूम बच्चों को तालीम दे कर अपनी प्यास बुझाती रही. यह जान कर मुझे बड़ी हैरत होती कि कई मांओं ने अपने छोटेछोटे मासूम बच्चों को सिर्फ पीछा छुड़ाने की खातिर स्कूल में डाला हुआ था. कई बार बच्चे बुखार में तप रहे होते, मगर मांओं को इस का पता न होता. वे बुखार में तपते हुए बच्चों को आया और ड्राइवर के साथ स्कूल भेज देतीं. अगर यह नेमत इतनी सस्ती थी तो फिर मैं क्यों तड़प रही थी? क्यों बेचैन थी बच्चे के लिए? हम अल्लाहताला की नेमतों का शुक्रिया अदा नहीं करते. जब वह नहीं देता तो गिला करते हैं. देता है तो कद्र नहीं करते.

औरत और मर्द की शादीशुदा जिंदगी की बुनियाद उन की मोहब्बत और वफादारी पर टिकी होती है. मुझे ऐसा महसूस होने लगा था कि अब अमीर में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही. वह मेरा अब पहले जैसा खयाल नहीं रखते थे. रात को जल्दी से करवट बदल कर सो जाते. उन की मोहब्बत ठंडी पड़ गई थी. मैं उन से बात करने को तरसती रहती. मगर वह बेखबर गहरी नींद सोते रहते. शादी के 4 बरसों में मैं क्या इतनी बदसूरत और बासी हो गई थी कि अमीर को मुझ में किसी तरह की दिलकशी महसूस नहीं होती थी? मैं घंटों सोचती रहती. सुबह अमीर जल्दी चले जाते और बात आईगई हो जाती. औरत शादी के बरसों बाद भी अपने शौहर से यह सुनने की ख्वाहिश रखती है कि वह उस से मोहब्बत करता है. बिलकुल एक प्रेमी, एक आशिक की तरह, शौहर की तरह नहीं. और शादी वही कामयाब होती है, जिस में शौहर प्रेमी भी हो सिर्फ शौहर न हो.

उस दिन स्कूल की छुट्टी थी. मैं ने सोचा चलो, थोड़ा सा वक्त अपने आप को दूं. इसी खयाल से ब्यूटीपार्लर चली गई. बाल सेट करवाए. शाम को अच्छी सी साड़ी पहन कर अमीर का इंतजार करने लगी. कोई साढ़े 11 बजे अमीर आए. मैं कुरसी पर बैठेबैठे ऊंघ रही थी.

‘‘हैलो कंवल!’’ उन्होंने बिस्तर पर गिरने जैसे अंदाज में कहा. मैं ने अपने शौहर से कभी यह नहीं पूछा कि वह घर देर से क्यों आते थे. मैं इंतजार करती रही कि वह मुझे देखें और अपनी राय दें. मगर वह टाई की गिरह ढीली करते हुए बोले, ‘‘कंवल, जरा एसी तेज कर दो. मैं बहुत थक गया हूं.’’

‘‘क्या आज क्लीनिक में भीड़ ज्यादा थी?’’ मैं उन के नजदीक चली गई.

‘‘हां. और तुम खाना खा लो. मुझे भूख नहीं है.’’ उन्होंने आंखें बंद करते हुए कहा और जब कोई शौहर हर रोज यह कह कर सो जाए तो समझ लेना चाहिए कि उस ने पेट की भूख के साथसाथ जिस्म और रूह की भूख भी कहीं मिटा ली है.

सुबह नाश्ते की मेज पर मुझे देखते हुए अमीर ने कहा, ‘‘अरे वाह, यह हेयर स्टाइल कब तब्दील किया कंवल?’’

‘‘शुक्र है, आप ने देखा तो.’’ कार्न फ्लैक्स में दूध डालते हुए मैं ने कहा.

अचानक उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. मेज पर रखे हुए मेरे हाथ पर हाथ रखते हुए बोले, ‘‘अरे, तुम तो रूठती भी हो.’’

मैं ने इस बात पर नाराज नजरों से उन्हें देखा और उन के हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख दिया और बहुत हौले से कहा, ‘‘याद है अमीर, मैं ने आप से क्या कहा था?’’

वह नजर उठा कर मुझे देखने लगे. न जाने क्यों अजनबियत का हलकाहलका धुआं उन की नजर से झांक रहा था.

‘‘मैं ने कहा था कि मेरे आगे सभी रिश्ते बेमतलब हैं. मैं रिश्तों की पहचान चाहती हूं.’’

‘‘हां, मुझे याद है.’’

‘‘मुझे अपनी जिंदगी के इस आखिरी खेल में मात न देना.’’

‘‘फिक्र न करो.’’ वह नैपकिन से मुंह साफ करते हुए लापरवाही से बोले तो मैं भी उठ खड़ी हुई.

‘‘आज रात का खाना मेरे साथ खा सकते हैं?’’

‘‘ओके.’’ वह कुछ सोचते हुए बोले और चले गए.

स्कूल में मेरा दिमाग उलझा रहा. मैं सोचती रही, क्या ऐसा मुमकिन है कि मेरा शौहर किसी दूसरी औरत के चक्कर में हो? घर आ कर मैं ने चिकन रोस्ट किया. रशियन सलाद और चाइनीज राइस बनाए. झींगों का सालन और फ्रूट ट्राफल बना कर जब कमरे में पहुंची तो शाम के साढ़े 5 बज गए थे. नहाधो कर तैयार हो रही थी कि मेरी सहेली लबना आ गई. उस के अब तक 3 बच्चे हो गए थे.

‘‘न जाने क्यों लबना, मुझे शिद्दत से तुम्हारी जरूरत थी.’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों, खैरियत तो?’’ फालसे का शरबत पीते हुए वह बोली.

‘‘यों अहसास होता है, जैसे मैं जिंदगी की बाजी हार रही हूं.’’

‘‘तुम्हारे पास सब कुछ है कंवल. फिर तुम ऐसा क्यों सोचती हो?’’

‘‘मेरे पास हमेशा ही सब कुछ था लबना, फिर भी मैं कंगाल थी. मैं ने अपनी मां से जिस शिद्दत से नफरत की है, उसी शिद्दत से उन्हें चाहा भी है. और उन्हीं की वजह से मेरे वजूद में बड़ेबड़े सूराख हो गए हैं, जो कभी नहीं भर सकते.’’

‘‘भूल जाओ सब कुछ.’’ लबना ने अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर रख दिए.

‘‘मैं भूलने की तरफ कदम बढ़ा रही थी लबना, मगर अब लगता है कई कदम पीछे हट गई हूं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मैं अमीर में एक बड़ी तब्दीली महसूस कर रही हूं. मेरे घर की बुनियादें हिल रही हैं. मुझे मशविरा दो, मैं क्या करूं?’’

‘‘क्या यह सिर्फ तुम्हारा शक है?’’

‘‘मेरे पास सुबूत नहीं है, मगर मुझे यकीन है.’’

‘‘शक की दीमकों से अपने घर की दीवारों को खोखली न करो कंवल.’’

‘‘नहीं लबना, मैं उन औरतों में हरगिज नहीं हूं, जो शौहर की हर हरकत की टोह में रहती हैं. मैं ने बहुत देखभाल और यकीन के बाद यह बात कही है.’’

‘‘फिर?’’

‘‘मैं चाहती हूं, वह मुझे धोखा न दें और खुद ही सब कुछ बता दें.’’

‘‘यह नामुमकिन है कंवल. कोई भी मर्द अपनी बेवफाई की दास्तान खुद नहीं सुनाता.’’

‘‘मगर अमीर अल्ताफ हुसैन को खुद ही सब कुछ बताना पड़ेगा.’’ मैं ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा.

लबना चली गई और मैं बेचैनी से अमीर का इंतजार करने लगी. वह साढ़े 10 बजे आए. मेज सजी देख कर वहीं बैठ गए. एक अजनबी सी खुशबू उन के कपड़ों से आ रही थी.

‘‘अमीर…’’

‘‘हूं.’’ सलाद खातेखाते उन का हाथ रुक गया.

‘‘यह अनजानी सी खुशबू की दीवार किस की है?’’

‘‘क्या मतलब?’’ उन के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘आप खूब जानते हैं कि मैं क्या कह रही हूं.’’

‘‘तुम्हारा वहम है कंवल. तुम कुछ दिनों के लिए अपने अब्बू के पास मुंबई चली जाओ.’’

‘‘मुझे मेरे सवाल का जवाब चाहिए अमीर, मशविरा नहीं.’’

‘‘देखो कंवल,’’ खाना निकालतेनिकालते मेरे शौहर का हाथ रुक गया, ‘‘मुझे उन औरतों से सख्त नफरत है, जो अपने शौहर को कुरेदती हैं. अपने लंबेलंबे नाखूनों से अपने शौहर की खाल के नीचे घुसने की कोशिश करती हैं.’’ अमीर का लहजा तल्ख हो गया था.

मैं कुछ लम्हे उन की शक्ल देखती रही. मुझे यकीन हो गया था कि मैं ने अपना शौहर किसी दूसरी औरत के आगे हार दिया है. अब बहस से कोई फायदा नहीं था. मैं नार्मल अंदाज में अपनी प्लेट में पड़ा खाना खाती रही, यों जैसे कुछ भी न हुआ हो. फिर भी सारा वक्त मैं सोचती रही कि ऐसा क्यों हुआ? वह शख्स, जिसे मैं ने अपने तौर पर प्यार किया, चाहा, उस ने भी मुझे चाहा. फिर कैसे दूसरी औरत यह बाजी जीत गई? मुझ में, मेरे प्यार में क्या कमी थी? बहुत दिनों तक दिल बहुत उदास रहा. मेरे और अमीर के बीच ठंडी लड़ाई जारी थी. ऐसी लड़ाई, जिस की ठंडक से मेरी रीढ़ की हड्डी से गुजरने वाली सारी नसें जम गई हों और मेरे सारे जिस्म को लकवा मार गया हो.

एक दिन जब अमीर क्लीनिक से आए, तब मैं किताब पढ़तेपढ़ते ऊंघ गई थी. उन्होंने धीरे से मेरी गोद से किताब उठाई तो मैं अधखुली आंखों से उन्हें देखती रह गई. वह मेरी गोद में अपना सिर रख कर बोले, ‘‘कंवल, क्या ऐसा मुमकिन नहीं कि एक वक्त में एक मर्द दो औरतों से प्यार करे? एक उसे जिस्मानी राहत दे और दूसरी रूहानी. वह दोनों से प्यार करता है और उन में से किसी को भी छोड़ नहीं सकता. मैं क्या करूं? मुझे बताओ.’’

मर्द गलती कर के एक ऐसा छोटा बच्चा बन जाता है, जो टौफी न मिलने पर रूठा हुआ हो. इस दुनिया में मर्द को तो यह हक मिला है कि वह एक वक्त में अनेक औरतों से इश्क करे, मगर औरत को न तो समाज यह इजाजत देता है न खुद उस का जमीर. और अगर कोई ऐसी औरत है तो वह रखैल या वेश्या कहलाती है. उस रात बहुत सोचविचार के बाद मैं ने फैसला किया कि मैं किसी मनोवैज्ञानिक से मिलूंगी और उस की जरूरत मुझे यों पेश आई कि मुझे अपने तन से नफरत हो गई, घिन सी आने लगी. न जाने क्यों मुझे अपनी खाल के नीचे छोटेछोटे कीड़े रेंगते हुए महसूस हुए. मैं उन मनोवैज्ञानिक से मिली, जो दादाजान के दोस्तों में थे.

जब मैं ने उन्हें सब कुछ बता दिया तो उन्होंने कहा, ‘‘यह एक दौर है, जो गुजर जाएगा. फिर तुम अमीर के साथ यूं ही रहोगी, जैसे रहती आई हो.’’

‘‘नहीं डाक्टर अंकल, मुझे यह कहते हुए शर्म भी महसूस हो रही है, मगर बताए बिना उपाय भी नहीं. वह जब मेरे करीब आते या लेटते हैं तो मुझे मितली होने लगती है. मैं अपने आप पर कंट्रोल करती हूं, पर हो नहीं पाता.’’ यह कहतेकहते मैं रो पड़ी. उन्होंने मेरे आंसू खुश्क करते हुए कहा, ‘‘फिर तो अपने अंदर हिम्मत पैदा कर के फैसला कर डालो बेटी.’’

अभी मैं कोई फैसला नहीं कर पाई थी कि एक दिन मुंबई से अहमद का फोन आ गया. वह अमेरिका जा रहा था. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘आप अमेरिका कब आएंगी?’’

‘‘बहुत जल्दी.’’ मैं ने उसे यकीन दिलाया.

‘‘मेरे जाने से पहले आप मुंबई आ जाएं या फिर मैं पूना आ जाता हूं.’’

‘‘नहीं अहमद,’’ आंखों में आए आंसू साफ करते हुए मैं ने कहा, ‘‘मुझे बिछुड़ना पसंद नहीं मेरे भाई. खुदा हाफिज.’’

‘‘अपना खयाल रखिएगा.’’ यह कह कर उस ने फोन बंद कर दिया. अभी मैं रिसीवर रख कर पलटी ही थी कि जावेद आ गया.

‘‘कैसे हो जावेद?’’ हम वहीं लाउंज में बैठ गए.

‘‘ठीक हूं भाभी. मुझे आप से एक जरूरी बात करनी है.’’

‘‘कहो,’’ मैं गरम कौफी का मग होंठों से लगाते हुए बोली. फिर उस ने मुझे उस औरत का नामपता बताया, जिस के इश्क में अमीर अल्ताफ हुसैन यानी मेरे शौहर साहब गिरफ्तार थे. मैं हंस पड़ी, ‘‘मैं क्या करूं जावेद?’’

‘‘अगर आप नहीं कर सकतीं तो मुझे करने दें.’’

‘‘नहीं जावेद, यह मेरी लड़ाई है और यह मैं खुद ही लड़ूंगी.’’

‘‘भाभी, मैं और रीटा आप के साथ हैं. जिस तरह आप ने हमारा साथ दिया था, उसे मैं कभी भुला नहीं सकता.’’

‘‘क्या तुम ने यह बात अम्मी को बता दी है?’’

‘‘अगर आप कहें तो बता दूं?’’

‘‘नहीं जावेद.’’ मैं ने मुसकरा कर उसे देखा और हौले से उस का हाथ दबा कर बोली, ‘‘शुक्रिया मेरे भाई.’’

उस दिन रात के खाने पर अमीर मौजूद थे. खाने के बाद बोले, ‘‘कंवल, मुझे एक कौन्फ्रैंस में माल्टा जान पड़ेगा. करीब एक महीना लग जाएगा. मैं चाहता हूं कि तुम भी मेरे साथ चलो.’’

‘‘मुश्किल है अमीर, स्कूल में इम्तहान हो रहे हैं और फिर मैं अपने लिए कुछ वक्त चाहती हूं.’’

‘‘चली चलो. यह अच्छा मौका है और माल्टा अच्छी जगह है.’’

‘‘फिर कभी.’’ मैं हंस दी.

वह चले गए और मैं अकेली रह गई. उलझीउलझी फिरती रही. एक कसक, एक चुभन दिल के आरपार हो रही थी. एक सवाल मुझे बारबार परेशान कर रहा था, ‘‘क्या मैं और अमीर अब पहले की तरह रह सकते हैं? क्या मैं भी आम बीवियों की तरह अपने शौहर की बेवफाई का शिकवा न करूं? लेकिन मुझे पता था, यह नामुमकिन है. यह समझौता मुझ से न होगा. यह दोहरी जिंदगी कोई कैसे बिता सकता है?’’

उस दिन सुबह मुझे इस कदर जोर का चक्कर आया कि खड़े रहना मुश्किल हो गया. अंदर आई तो मितली सी महसूस हुई. खाली पेट का खयाल कर के एक बिस्कुट जो खाया तो वह भी बाहर आ गया. स्कूल के सामने ही एक छोटा सा खूबसूरत प्राइवेट अस्पताल था. वहां चली गई. टेस्ट वगैरह करवा कर वापस आई तो तबीयत बोझिल सी रही. दूसरे दिन सुबह मेरी मेज पर चपरासी मेरी रिपोर्ट रख गया था. मैं ने काम से फारिग हो कर छुट्टी से 10 मिनट पहले रिपोर्ट खोली और कुदरत के इस मजाक पर हंस पड़ी. यह कैसा करिश्मा था. रिपोर्ट के मुताबिक मैं अमीर के बच्चे की मां बनने वाली थी. मैं, जिसे मैडिकल साइंस ने बंजर जमीन बता दिया था.

अब मेरे फैसले की घड़ी आ पहुंची थी. बहुत सोचने के बाद उस दिन मैं जावेद के दिए हुए पते पर जा पहुंची. वह एक बहुत खूबसूरत कोठी थी. नौकर ने मुझे ड्राइंगरूम में बिठा दिया. थोड़ी देर बाद बिलकुल फिल्मी अंदाज में ड्राइंगरूम का परदा सरका. सफेद साड़ी पहने, कानों में हीरे और मोती के जेवर पहने, अपने कंधों पर बिखरे बालों पर हाथ फेरती हुई मेरे सामने मेरी वालिदा खड़ी थीं, जिन्हें 19 साल के लंबे अरसे के बाद मैं देख रही थी. वह अब भी वैसी ही थीं, उतनी ही खूबसूरत, जब वह मुझे छोड़ कर गई थीं. आंखों में अजीब सी जानपहचान की चमक लिए वह मुझे देख रही थीं.

‘‘कौन हैं आप?’’ उन्होंने धीरे से पूछा. जैसे जो कुछ वह देख रही थीं, उस की पुष्टि करना चाहती हों. मैं खामोश खड़ी अपने रहजन को देख रही थी. वह आगे बढ़ीं और इस से पहले कि वह मुझे छूतीं, मैं पीछे हट गई.

‘‘तुम कंवल हो?’’ उन्होंने हौले से कहा.

‘‘नहीं,’’ मैं बहुत आराम से उन के नरम, गद्देदार सोफे पर बैठ गई और उन की आंखों में देखते हुए बोली, ‘‘मेरा नाम मिसेज अमीर अल्ताफ हुसैन है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जी, आप ने तो अपना नाम खालिदा से बदल कर गीता रख लिया है, मगर मैं अभी तक कंवल हूं.’’

वह दम साधे बैठी थीं. उन का रंग सफेद पड़ गया था.

‘‘मैं तो सिर्फ उस खूबसूरत औरत से मिलने आई थी, जिस के इश्क में मेरा शौहर गिरफ्तार है. आप हमारी जिंदगियों से निकल कर दोबारा क्यों आ गई हैं? एक बार हम आप की वजह से बिखर गए, तबाह हो गए. फिर आप दोबारा हमारी बरबादियों का सामान क्यों बन गई हैं?’’

‘‘सुनो कंवल, यह झूठ है.’’ वह बोलीं.

‘‘क्या झूठ है? यह कि आप मेरी मां हैं, या वह मेरे शौहर हैं या मैं आप की बेटी हूं? क्या झूठ है? बताइए न?’’ गम और सदमे ने मुझे निढाल कर दिया. मैं ने आगे बढ़ कर शीशे की मेज पर रखा अपना बैग उठाया. मगर इस से पहले कि मैं बाहर निकलती, उन्होंने बढ़ कर मुझे थाम लिया.

‘‘तुम इस तरह नहीं जा सकती कंवल. तुम्हें मेरी बात सुननी होगी.’’

‘‘हरगिज नहीं.’’

‘‘कंवल.’’ उन का हाथ उठा और पूरी ताकत से मेरे गाल पर अपना निशान छोड़ गया. आज इतने सालों बाद मुझे किसी ने थप्पड़ मारा था. मेरा गाल एक अजीब सा लज्जत से जल उठा. मैं कुरसी पर गिर पड़ी. आंसू मेरी आंखों से बह रहे थे. उन्होंने उठ कर मेरे हाथ से बाल हटाए और अपने होंठ उस पर रख दिए. मां के होंठों की गरमी से मेरा वजूद जलने लगा.

‘‘आज तक मुझे अपनी सफाई में कुछ कहने का कभी मौका नहीं दिया गया. न जाने तुम लोग मेरे बारे में क्या सोचते होगे. यह सोचसोच कर मैं ने ये साल गुजारे हैं, लेकिन आज तुम इस काबिल हो कि मुझे, मेरे हालात, मेरी बातों को समझ सको. जब मेरी शादी तुम्हारे अब्बू से हुई थी बेटी, तो मेरी उम्र उस वक्त सिर्फ 15 बरस थी.

‘‘मैट्रिक का इम्तहान दे कर मैं छुट्टियों में आराम कर रही थी. तुम्हारी दादी ने मुझे किसी समारोह में देखा और मुझ पर फिदा हो गईं. उन लोगों के पास दौलत की कमी नहीं थी और हमारे पास कुछ भी नहीं था. उन्हें एक खूबसूरत बहू चाहिए थी और मैं हसीन थी. सौदा तय हो गया और मेरी शादी तुम्हारे अब्बू से हो गई, जो मुझ से 14 साल बड़े थे.

‘‘मैं एक गरीब परिवार की लड़की, जब महलों में आई तो चकरा गई. तुम्हारे अब्बू लंदन से नएनए पढ़ कर आए थे. बेहद नए खयालात के मालिक थे. मेरे लंबेलंबे बाल कटवा कर उन्होंने मेरा हुलिया ही बदल डाला. वह मुझे पार्टियों में ले जाते, जहां गैरमर्द मेरे नजदीक आ कर मेरी कमर में बाहें डाल देते और तुम्हारे अब्बू खड़े हंस रहे होते. उन के लिए ये सब आम बातें थीं, जो ऊंची सोसायटी में रोजमर्रा होती थीं. लेकिन मुझे शुरूशुरू में अजीब सा लगा. साड़ी का पल्लू अपने बदन से लपेट लेती, ताकि कोई मेरा जिस्म न देख सके, मगर कुछ हासिल न होता.

‘‘मैं उम्र के कच्चे दौर से गुजर रही थी. बहुत जल्दी मुझ पर उन पार्टियों का जादू चल गया और मैं उस रंग में रंग गई, जिस में मेरे शौहर चाहते थे. फिर तुम पैदा हुई, जिस के बाद मेरी मुलाकात अजीज से हुई, जो तुम्हारे अब्बू के करीबी दोस्तों में थे. वह पहली ही नजर में मुझे पसंद करने लगे थे. हम दोनों घंटों बेतकल्लुफ बातें करते. फिर अहमद पैदा हुआ तो जफर और मेरे दरमियान दूरी बढ़ गई. शौहर और बीवी के बीच जिस्मानी रिश्ते के अलावा भी कुछ होना चाहिए बेटी, जो हम दोनों में नहीं था.

‘‘मुझे पता चल गया था कि अब मैं जफर के साथ नहीं रह सकूंगी. मैं ने तलाक की मांग की तो जफर ने तुम दोनों को मुझ से जुदा कर दिया. तलाक के फौरन बाद मेरी शादी अजीज से हो गई, जिस ने अपनी बीवी को तलाक दे दी थी. तुम पूछोगी बेटी कि यह गीता कौन है, तो गीता मेरी बेटी है. शादी के 2 साल बाद ही वह बेवा हो गई है. उस के शौहर को ब्रेन ट्यूमर था, जिस का इलाज अमीर ने किया था. वह बेहद दुखी है बेटी.’’

उन के बारबार यों बेटी कहने से न जाने क्यों मेरा खून खौल रहा था. उन्हें भला मुझे बेटी कहने का क्या हक था? उन्होंने मुझे जनम दिया था और बस. उन की बात खत्म होने पर मैं कुछ लम्हे उन्हें देखती रही. उन की खूबसूरत आंखों से आंसू बह रहे थे. मैं ने उन से कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि आप को क्या कह कर मुखातिब करूं? मां कहने का हक तो आप कब का खत्म कर चुकी हैं. बहरहाल आप मेरी मां हैं और जज्बात में बहने वाली लड़कियों में से मैं नहीं हूं, इसलिए मैं आप को मां ही कहूंगी. आप की कहानी सुन कर न तो मुझे अपने बाप से नफरत हो सकी है और न आप से हमदर्दी. खैर, अब्बू ने अपनी जवानी हमारे नाम कर दी थी. कम से कम अहमद के नाम. लेकिन मुझे आप से कोई शिकायत नहीं है. आप की अपनी जिंदगी थी और आप ने अपने लिए जिस जिंदगी को चुना है, उस पर आप को हक था. हो सकता है, आप को मुझ से ज्यादा गीता से प्यार हो, लेकिन यकीन जानें, मेरे जज्बात भी आप के लिए कोरे हैं.’’

‘‘नहीं कंवल,’’ उन्होंने मेरी बात काट कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए भी बहुत तड़पी हूं, रोई हूं. मुझे तुम भी उतनी ही प्यारी हो.’’

‘‘खैर, यह सब किताबी और जज्बाती बातें हैं अम्मी.’’ मैं हंस पड़ी, ‘‘क्योंकि जब प्यार देने का वक्त आया था तो आप ने हमें छोड़ दिया था. यों आप ने तो मुझे तोड़ दिया था अम्मी. मेरी शख्सियत को बनने के पहले ही तबाह कर दिया था. आप के लगाए हुए जख्म नासूर बन कर उसी तरह रिस रहे हैं. 9 बरस की उस मासूम लड़की पर जवानी न आ सकी और वह बूढ़ी हो गई अम्मी. बहुत ज्यादा ऐशोआराम में पलने के बावजूद मेरे वजूद में पड़ी इन दरारों को कोई न भर सका.’’

मेरी आंखों में मिर्चें सी लग रही थीं. आंसुओं का एक समंदर था, जो मेरे अंदर उमड़ रहा था. मैं भागती हुई बाहर निकली और वहां से चली आई. घर आ कर इतना रोई कि जिंदगी में कभी न रोई थी.

‘‘तो कंवल अमीर, तुम जिंदगी की आखिरी बाजी भी हार आई हो.’’ मैं ने खुद से कहा और वक्त के एक बहुत नाजुक लम्हे में वह फैसला कर लिया. फिर लबना को बुलाया. वह आई तो उसे सब कुछ कह सुनाया.

‘‘सब भूल जाओ कंवल,’’ उस ने मेरे आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारा बच्चा होगा तो अमीर सब भूल जाएंगे.’’

‘‘हो सकता है कि ऐसा ही हो लबना, मगर मैं एक ऐसे इंसान के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती, जो बाकी सारी उम्र शर्मिंदा ही रहे और यह रिश्ता कानूनन यों भी जायज नहीं. विश्वास की डोर भी टूट गई है. अब कुछ नहीं हो सकता. मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं अमेरिका चली जाऊंगी. मेरा अपना पैसा है और मेरा भाई है वहां. तुम अपने शौहर नवेद भाई से कह कर मेरा पासपोर्ट वीजा बनवा सकती हो. आखिर उन की एजेंसी किस दिन काम आएगी?’’

‘‘कंवल, यह बहुत खतरनाक कदम है.’’

‘‘मैं अमीर के आने से पहले यहां से चली जाना चाहती हूं. पहले मुंबई और फिर अमेरिका. अगर तुम मेरी मदद कर सकती हो तो ठीक है, वरना…’’

‘‘ओके कंवल.’’ मेरे लहजे की संजीदगी ने उसे हथियार डालने पर मजबूर कर दिया.

स्कूल की चाबी मैं ने लबना के हवाले कर दी और भागदौड़ कर नवेद भाई ने मेरे जाने का प्रबंध कर दिया. जिस रात अमीर वापस आ रहे थे, उसी शाम मुझे मुंबई के लिए फ्लाई करना था. जाने से पहले अमीर के नाम मैं ने एक लंबा खत लिखा—

अमीर,

अब तुम्हें जान या डियर लिखते हुए बहुत अजीब लग रहा है. इसलिए कि तुम मेरी न जान हो और न मैं तुम्हारी. हम दोनों एकदूसरे के बगैर भी रह सकते हैं. यह सब दिखावे के खोखले रिश्ते हैं, जिन्हें हम निभाए जा रहे थे और जो अब कच्चे धागे की तरह टूट गए हैं. मैं जा रही हूं. तुम से कुछ नहीं चाहिए. मेरा कुछ पैसा है, वह साथ लिए जा रही हूं और जहां भी जाऊंगी, नौकरी कर के अपनी जिंदगी की गाड़ी चला लूंगी. जब तुम्हें इस बात का पता चलेगा कि तुम मेरी मां की बेटी, यानी मेरी सौतेली बहन से इश्क करते हो तो तुम शर्मिंदगी के बोझ तले दब जाओगे. अमीर, अगर मैं रह गई और तुम लौट आए तो भी एक ऐसे मर्द के साथ जिंदगी बितानी पड़ेगी, जो मुझ से मोहब्बत नहीं करता और सिर्फ अपनी शर्मिंदगी का बदला चुका रहा होगा, जो नामुमकिन है. मैं ने एक दिन तुम से कहा था न कि मेरे आगे सारे रिश्ते कोरे हैं, उन का कोई नाम नहीं, मुझे उन की पहचान करना है.

तो दोस्त, रिश्ते अब भी वैसे ही कोरे कागज की तरह हैं. उन का कोई नाम नहीं है और मैं बेनाम रिश्तों के साथ सारी उम्र अपने जिस्म पर दाग नहीं लगाना चाहती, क्योंकि यह दाग मेरे जिस्म पर नहीं, बल्कि मेरी रूह पर लगेंगे. तुम्हारे आखिरी दाग की निशानी मेरे वजूद पर लग चुकी है और शायद इसी से मेरी बेनाम जिंदगी की शुरुआत हो. यही दाग मेरे जीने का बहाना बन जाए. तुम्हारी दलील अपनी जगह सही है कि एक वक्त में 2 इंसानों को एक जैसा, एक ही जितना प्यार किया जा सकता है. मगर मेरे लिए यह एक मजाक की बात है. मेरे दोस्त, मैं जिंदगी में हमेशा तुम्हारी बीवी रहना चाहती हूं. मुझे तुम से कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ तुम्हारा नाम चाहिए, जिस की जरूरत मुझ से ज्यादा उस वजूद को होगी, जो मेरे वजूद में सांसें ले रहा है.

यह एक नरम, मुलायम सा समझौता होगा, जो मेरे और तुम्हारे दरमियान रहेगा और मुझे उम्मीद है कि तुम भी इसे तोड़ने की कोशिश नहीं करोगे. इसलिए कि यह बेनाम सा रिश्ता, जो हमारे दरमियान है, जिसे न तो  मोहब्बत के नाम से याद करूंगी और न दोस्ती से, न जाने क्या है? लेकिन उस आने वाले वजूद के लिए बहुत अहम है, जिसे तुम्हारी मैडिकल साइंस ने सिरे से खत्म कर दिया था. मगर यह जिंदगी एक स्टेज है और हम सब अदाकार हैं. इस करिश्मे को अपने वजूद में छिपा कर मैं तुम से बहुत दूर जा रही हूं. न जाने तुम मेरी बात समझे भी हो या नहीं? यह बात तुम्हें मालूम हो जाएगी कि गीता मेरी बहन है. इस मामले में जो तुम्हारी शरई जिम्मेदारी होगी, वह तुम समझ सकते हो.

—केवल कंवल

यह खत मैं ने टेलीफोन की मेज पर रखा और आखिरी बार उन बेजान चीजों की तरफ देखा, जो मेरी थीं. अपनी आंखों में आंसुओं के समंदर छिपाए एयरपोर्ट की तरफ रवाना हो गई. Family Betrayal Story

 

डोरोथी की जिंदादिली

बात उस समय की है, जब लंदन, लंदन था. उस के मोहल्ले, उस की ज्यादातर गलियां और सड़कें खुशनुमां पार्क जैसी हुआ करती  थीं. वह कारों और बसों का जुलूस बन कर नहीं रह गया था. लंदन की हवा में पर्वतीय हवाओं वाली ऐसी कशिश थी कि जितनी सीनें में पहुंचे, उतनी ही और पा लेने के लिए सीना फूलता जाए. मैं लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से सोशल प्लानिंग विषय में एमएससी करने के लिए पिछले दिन ही लंदन आया था.

मुझे लंदन विश्वविद्यालय के लिलियन पेंसन हौल में रहने के लिए कमरा मिल गया था. आज स्कूल जाने का पहला दिन था. मैं नजदीक के पैडिंग्टन स्टेशन से अंडरग्राउंड (मेट्रो) द्वारा चल कर हौबर्न स्टेशन पर उतरा. मैं हैरान परेशान सा झिझकता हुआ लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स का रास्ता तलाश रहा था.

मन में एक ओर सुंदर नगर में रहने की खुशी एवं अप्सरा जैसी गोरियों के नैनसुख का असीम आकर्षण था तो अनजाने में छलांग लगाने जैसी रोमांचकारी घबराहट भी थी. कल लंदन आते समय एक सज्जन ने सलाह दी थी कि रास्ता पूछना हो तो पुलिस वाले अथवा टैक्सी वाले से पूछना. लेकिन यहां न तो कोई पुलिस वाला नजर आ रहा था न टैक्सीवाला.

फुटपाथ पर चलने वाले लोग ऐसे भागे जा रहे थे, जैसे मैराथन वौक में हिस्सा ले रहे हों. विशेषकर ऊंची ऊंची हील की जूतियां और घुटने के ऊपर तक की स्कर्ट पहने लंबी छरहरी कोमलांगियां तो पुरुषों के कान काटने पर तुली लगती थीं. उन में से किसी को रोक कर उस की स्पर्धा को भंग करने का साहस मैं नहीं कर पा रहा था.

मैं भौचक्का सा इधरउधर ताक रहा था कि तभी झुर्रियों भरे मुख वाली एक संभ्रांत वृद्धा बेंत के सहारे कांखते हुए पीछे से आती दिखाई दी. उन की सुस्त चाल देख कर मेरा साहस बढ़ा और आगे बढ़ कर मैं ने पूछा, ‘‘एक्सक्यूज मी, व्हेयर इज लंडन स्कूल औफ इकोनौमिक्स?’’

वृद्धा ने आराम से बेंत के सहारे खड़ी हो कर मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, इस के बाद सवाल का उत्तर देने के बजाय मुझ से ही पूछ लिया, ‘‘आर यू ए न्यू स्टूडैंट देयर?’’

मेरे ‘यस’ कहने पर उन्हें जैसे किसी आत्मीय से मिलने की प्रसन्नता हुई हो, इस तरह के भाव ला कर वह (अंगे्रजी में) बोलीं, ‘‘मेरा बेटा भी उसी स्कूल में पढ़ा था. थोड़ा आगे सामने ‘इंडिया हाउस’ है, उस से पहले बाईं तरफ मुड़ कर 2 ब्लाक के बाद बाईं ओर लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स है.’’

मैं थैंक्स कह कर आगे बढ़ता, उस के पहले ही उन्होंने कहा, ‘‘मुझे पता है, उस विश्वविख्यात स्कूल का छोटा और साधारण सा भवन देख कर तुम्हें निराशा होगी. लेकिन यह मत भूलो कि विश्व के एक से एक नामी अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, प्रोफेसर और राजनेता उसी की चारदीवारी से निकले हैं.’’

मैं आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन वह महिला मुझे जल्दी नहीं छोड़ना चाहती थी. बेचैनी के भाव से उन्होंने आगे कहा, ‘‘तुम मेरे पीछेपीछे चले आओ. मैं उधर ही जा रही हूं.’’

पहला दिन होने के कारण मैं लिलियन पेंसन हौल से दो घंटे पहले ही निकल पड़ा था. इसलिए मुझे कोई जल्दी नहीं थी. मैं उस महिला के साथ धीरेधीरे चल पड़ा. महिला ने मेरे बारे में जानने के लिए सवाल किए. उस के बाद बिना कुछ पूछे ही अपने एवं अपने बेटे के बारे में बताती रही, जिसे मैं ने अनमने मन से एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया.

विदा लेने से पूर्व उन्होंने मुझे अपना कार्ड देते हुए कभी आने को कहा. मैं ने अंगे्रजों के बारे में सुना था कि वे बड़े नकचढ़े होते हैं. लेकिन वह महिला मुझे हैरान करती हुई बिलकुल विपरीत लगी. मैं ने कार्ड में उस का नाम डोरोथी पढ़ा और जेब में रख लिया. डोरोथी से कभी मिलने जाने के बारे में मैं असमंजस में रहा, कोई निश्चय नहीं कर सका.

संयोग से एक दिन सोशल प्लानिंग के प्रोफेसर मिजली व्यावहारिक पढ़ाई के लिए हमें डेस्टिच्यूट चिल्ड्रेन होम दिखाने के बाद जब हमें ओल्ड एज होम ले गए तो डोरोथी दरवाजे पर खड़ी मिल गई. मुझे देखते ही आगे बढ़ कर उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया. इस के बाद ओल्ड एज होम के लिए तय 2 घंटे के समय में मेरा ज्यादा समय डोरोथी ने ही ले लिया. पुन: आने का पक्का वादा करने के बाद ही उन्होंने मुझे जाने दिया था.

लंदन के उस ओल्ड एज होम में बूढों के रहने के कमरे साफसुथरे एवं आरामदायक थे. उन के खानेपीने, दवादारू, पढ़ने लिखने एवं व्यायाम और मनोरंजन की पूरी व्यवस्था थी. इस तरह के रहनसहन एवं देखभाल के लिए तो हमारे देश में बड़ेबड़े लोग तरसते होंगे. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि डोरोथी मुझ जैसे अनजाने हिंदुस्तानी से संपर्क बढ़ाने के लिए आतुर क्यों थीं.

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डोरोथी की बातचीत और अपनेपन से मैं जितना चकित था, उस से कहीं ज्यादा हैरान था. इस उत्सुकता को शांत करने के लिए मैं कभी कभी उन के पास जाने लगा. वह बड़ी बेचैनी से मेरा इंतजार करती थीं. पहुंचने पर मुझे बड़े प्रेम से गले लगातीं और मेरे बिना पूछे ही ओल्ड एज होम की, अपनी एवं बेटेबहू और पोते की ढेर सारी बातें बतातीं.

अपनी बात कह कर मेरे, मेरे परिवार एवं दुनियाजहान की बातें करतीं. उस दौरान अन्य बूढ़े हमें हैरानी एवं हसरत से देखते रहते. डोरोथी से बातें कर के मुझे उस अंगे्रज वृद्धा का दुख, पीड़ाएं, अभिलाषाएं एवं अहं के बारे में इतनी जानकारी हो गई कि मैं ने सोशल प्लानिंग में एमएससी के लिए अनिवार्य लंबा लेख डोरोथी पर आधारित ही लिखा, जिसे सब से अच्छा माना गया. उस का सारांश कुछ इस तरह था.

डोरोथी ने जौन से प्रेमविवाह किया था. जौन की औक्सफोर्ड स्ट्रीट पर किताबों की दुकान थी, जिस से ठीकठाक आमदनी होती थी. स्वभाव एवं जीवनदर्शन में डोरोथी और जौन दोनों ही ‘मेड फौर ईच अदर’ थे. वर्तमान में जीने वाले ‘हैपी-गो-लकी’ प्रकृति के जीव. बेटे बौब के जन्म के बाद दोनों का जीवन सफल हो गया था. बौब बड़ा ही प्यारा बच्चा था. सुंदर चेहरा, सरल स्वभाव एवं तेज बुद्धि. जौन और डोरोथी दोनों ही बौब पर प्राण न्यौछावर करते थे. बौब भी मांबाप से उतना ही प्रेम करता था.

बौब ने विशेष योग्यता से परीक्षाएं पास की थीं. इस से उसे लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स में दाखिला मिल गया था. कालेज घर से दूर नहीं था. कालेज में पढ़ने वाले अन्य लड़के लड़कियों के ‘ममाज ब्वाय’ जैसे कटाक्ष सुनने के बावजूद बौब कहीं बाहर न रह कर मातापिता के साथ ही रह कर पढ़ाई करता रहा. उस का लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स में दूसरा वर्ष शुरू हुआ तो डोरोथी को लगा कि बौब का मन घर में कुछ उचटा उचटा सा रहता है.

फिर एक रविवार को वह जेन को ले कर घर आया और अपनी गर्लफ्रेंड के रूप में उस का परिचय कराया तो डोरोथी और जौन ने खुले दिल से मुसकरा कर जेन का स्वागत किया. लेकिन उन्हें लगा कि जेन परिवार में घुलमिल नहीं पा रही है. इसे उन्होंने जेन की हिचकिचाहट समझा.

उन की इस आशा को पहला झटका तब लगा, जब एक माह बाद ही बौब ने डोरोथी से कहा, ‘‘मौम, अब मैं और जेन अलग अपार्टमेंट में रहेंगे. जेन को एक डिपार्टमेंटल स्टोर में जौब मिल गई है और मुझे आगे की पढ़ाई के लिए फेलोशिप.’’

डोरोथी अवाक थी, क्योंकि उसे बौब से गहरा लगाव था और आशा थी कि बड़ा मकान होने के कारण कम से कम विवाह होने तक बौब उन के साथ रहेगा. बौब के स्वर में इतनी दृढ़ता थी कि डोरोथी अथवा जौन उसे समझाने बुझाने का साहस नहीं कर सके. अगले सप्ताह ही बौब अपना सामान ले कर अलग रहने चला गया. धीरेधीरे उस का घर आना कम होता गया. वह जब भी आता, अकसर अकेला ही आता. अगर कभी जेन साथ आती तो मेहमान की तरह ‘हायहैलो’ कर के चली जाती.

ग्रेजुएशन के बाद बौब और जेन ने विवाह कर लिया, जिस में डोरोथी और जौन को भी बुलाया गया था. लेकिन वे मेहमान की तरह ही शामिल हुए थे. विवाह के बाद बौब का मांबाप के पास आनाजाना ईस्टर क्रिसमस जैसे त्यौहारों तक ही सीमित हो गया था. इस से डोरोथी और जौन को बड़ा धक्का लगा और उन के जीवन में एक खालीपन आता गया.

धीरेधीरे डोरोथी ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया, लेकिन जौन मन ही मन दुखी रहने लगा. एक अवसाद सा भर गया. उसी अवस्था में कार चलाते हुए एक दिन उन की कार आगे जाने वाली बस से टकरा गई तो वह डोरोथी को अकेली छोड़ कर इस दुनिया से विदा हो गए. मरने का समाचार पा कर बौब और जेन भी आए. बौब काले कपड़ों में अपने पिता की अंतिम यात्रा में भी शामिल हुआ.

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डोरोथी के अकेलेपन के साथ बेबसी भी जुड़ गई थी. बेबसी की स्थिति में मनुष्य तिनके में भी सहारा ढूंढने लगता है. डोरोथी को लगने लगा था कि संभवत: अब बौब और जेन उस की अधिक परवाह करेंगे. ऐसे में ही डोरोथी ने एक दिन बौब के आने पर शिकायती लहजे में कहा, ‘‘इतने दिनों बाद मां की याद आई?’’

बौब ने तो बस इतना ही कहा, ‘‘मां आप भी?’’

लेकिन पीछे से आती जेन रूखे स्वर में बोली, ‘‘मौम, आप को समझना चाहिए कि हम लोग कितने व्यस्त रहते हैं.’’

डोरोथी चुप रह गई थी. उस की यह चुप्पी हमेशा के लिए हो गई थी. तनाव ने उस के मन में भी घर कर लिया. वह सच्चाई के बजाय यादों में खोई रहने लगी. उसे नन्हा बौब और उस का शरारतीपन इतना घेरे रहता कि घर संभालना असंभव हो गया, इसलिए घर बेच कर उस ने सारा पैसा उस ‘चैरिटेबल ट्रस्ट’ को दान कर दिया, जो यह ओल्ड एज होम चलाता था.

इसी के साथ वहां आ कर जीवन के बाकी दिन काटने लगी. यहां सभी सुविधाएं और अन्य हमउम्र लोगों की संगत उपलब्ध थी, परंतु उन की बातों में मन में बसी अपनों से वियोग की टीस और हंसी में खालीपन साफ झलकता था, जो डोरोथी के तनाव के हवनकुंड में घी का काम करता था.

एक दिन ट्यूटोरियल क्लास में मैं ने प्रोफेसर मिजली को डोरोथी के प्रकरण के संबंध में बताया तो उन्होंने इसे एक ‘केस स्टडी’ के रूप में तैयार कर के कक्षा में प्रस्तुत करने को कहा. मेरे द्वारा ‘केस स्टडी’ की प्रस्तुति के बाद उन्होंने बताया कि डोरोथी का यह केस अनोखा नहीं है. पश्चिमी देशों में बूढ़ों की समस्याएं मुख्यत: परिवार से अलगाव, अकेलेपन एवं वर्तमान के बजाय भूत की यादों में जीने की विवशता है.

यहां बौब का अपने मातापिता से अलग हो जाना आम बात है. ग्रेजुएशन करने वाला शायद ही कोई लड़का या लड़की मातापिता के साथ रहता हो. अलग होने के बाद बेटे मेहमान की भांति समय ले कर ही मांबाप से मिलने आते हैं और मातापिता भी समय ले कर ही बेटे के यहां जाते हैं. बुढ़ापा बढ़ने पर अथवा मां या बाप के अकेले रह जाने पर बच्चों से यह दूरी बेचैनी बन कर मन में समा जाती है. ऐसे बूढ़ों में किसी की सहानुभूति मिल जाने पर उस से लगातार बातें करते रहने की अदम्य इच्छा जाग उठती है.

डोरोथी से पहली मुलाकात में जब मैं ने रास्ता पूछा था तो उस के मन में समाज के लिए अभी भी अपने उपयोगी होने का आभास जाग उठा था. फिर मेरे लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स में दाखिल होने की बात जान कर उन के मन में बौब के प्रति बसा प्रेम उमड़ पड़ा होगा. उन के स्नेह के बदले मैं ने स्नेह दिया तो वह स्नेहधारा नदी की बहने लगी होगी.

कुछ रुक कर प्रोफेसर मिजली ने कहा, ‘‘डोरोथी से किसी दिन पूछना कि अगर बौब और जेन उन्हें अपने साथ रहने के लिए ले जाने को आएं तो वह जाएंगी या नहीं?’’

अगली बार जब मैं ने डोरोथी से यह सवाल किया तो उस स्वाभिमानी औरत ने कहा, ‘‘कदापि नहीं, एक दिन के लिए भी नहीं. कैदी को कैदियों के बीच रहना उतना कठिन नहीं होता है, जितना आजाद घूमने वालों के बीच रहना.’’

थोड़ी देर रुक कर एक आह सी भर कर उन्होंने कहा, ‘‘अगर मेरी बेटी होती तो उस के यहां कभीकभी जाने की बात जरूर सोच सकती थी.’’

मैं डोरोथी के स्वर एवं शब्दों में निहित निश्चय से उस की जिंदादिली का कायल हो गया था और मांबाप के लिए बेटे की तुलना में बेटी के प्यार का भी.

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सहेली : क्या शालू अपने पिता की जगह किसी और को दे पाएगी?

पापा की मौत के साल भर बाद मम्मी ने खुद को काफी हद तक संभाल लिया था, लेकिन शालू पिता की मौत के सदमे से नहीं उबर सकी थी. मम्मी खुद को इसलिए संभालने में सफल हो गई थीं, क्योंकि पापा की तेरहवीं की रस्म के पूरा होते ही उन्हें अपनी नौकरी पर जाना पड़ा था.

जिम्मेदारी का बोझ, काम की व्यस्तता और जिंदगी की भागदौड़ ही मम्मी को गम से उबारने में सहायक साबित हुई थी. लेकिन पिता की असमय और अचानक मौत की वजह से अंदर ही अंदर बुरी तरह टूट गई शालू के हालात अलग थे.

मम्मी के काम पर जाने के बाद घर में अकेले पड़े पड़े शालू को पापा की याद बहुत सताती थी, जिस की वजह से वह रोती रहती थी. मम्मी को मालूम था कि उस की गैरमौजूदगी में शालू रोती रहती है. उस की लाललाल आंखें देख कर मम्मी को सब पता चल जाता था.

मम्मी शालू को समझाने की कोशिश करती थीं कि रोने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. हमें सब कुछ भुला कर ही जीने की आदत डालनी होगी. सबकुछ भुलाने का बेहतर तरीका यही है कि तुम भी मेरी तरह खुद को बिजी कर लो. आगे पढ़ने का इरादा हो तो ठीक है, वरना कोई नौकरी कर लो.

मम्मी की बात शालू को ठीक लगती थी. पापा जिंदा रहते तो शालू जरूर आगे की महंगी उच्च शिक्षा के बारे में सोचती. लेकिन वह जानती थी कि मम्मी अपनी नौकरी से इतना खर्च नहीं उठा पाएंगी. वह चूंकि मम्मी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, इसलिए उस ने नौकरी करने का फैसला कर लिया. नौकरी के लिए मन बन गया तो उस ने अखबार में नौकरी वाले कालम देखने शुरू कर दिए.

मम्मी ने खुद को बेशक संभाल लिया था और अपने दर्द को जाहिर नहीं करती थीं, मगर शालू उन के दर्द को अभी भी महसूस कर रही थी. रात को कई बार अचानक शालू की नींद खुल जाती तो वह अपने साथ सोई मम्मी को जागते हुए पाती. आधी रात को बिस्तर पर बैठी वह पता नहीं क्या सोचती रहती थीं. पूछने पर वह कुछ बताती भी नहीं थी.

वैसे भी मम्मी अभी देखने में ज्यादा उम्र की नहीं लगती थीं. बराबर में खड़ी होतीं तो वह शालू की मां कम और बड़ी बहन अधिक लगती थीं. यह बात पापा भी मानते थे. शालू को याद आया कि वह संडे की छुट्टी का दिन था. वह मम्मी के साथ नाश्ते की टेबल पर बैठी पापा का इंतजार कर रही थी.

पापा तैयार हो कर जब नाश्ते की टेबल पर आए तो काफी अच्छे मूड में थे. मांबेटी को साथ बैठे देख वह बरबस कह उठे थे, ‘‘मेरी नजर न लगे, सच कहता हूं तुम दोनों मांबेटी कम, बहनें ज्यादा लगती हो.’’

पापा की बात पर मम्मी तो केवल हलके से मुसकरा कर रह गई थीं, लेकिन मम्मी के गले में प्यार से बांहें डाल कर शालू ने कहा था, ‘‘मेरी मम्मी दुनिया की बेस्ट मम्मी हैं पापा. आई एम श्योर, यह देख कर लोग मुझ से जरूर जलते होंगे. सच बोलूं पापा, मम्मी मेरी मम्मी नहीं, सहेली हैं.’’

इस के एक महीने बाद ही हार्टअटैक आने से पापा की मौत हो गई थी.

पापा की मौत के बाद मम्मी कुम्हला सी गई थीं. यह स्वाभाविक ही था. लेकिन जौब में होने और खानपान में सतर्कता बरतने की वजह से उन के शरीर पर कोई खास असर नहीं पड़ा था.

बड़ी बहन जैसी मम्मी के साथ चलते हुए शालू को अकसर गर्व महसूस होता था. कभीकभी शालू इस खयाल से बहुत बेचैन हो जाती कि शादी कर के जब वह घर से विदा हो जाएगी तो अकेली मम्मी क्या करेंगी? इस खयाल से शालू के अंदर द्वंद वाली स्थिति बन जाती और वह कमजोर पड़ने लगती.

शालू चाहती थी कि मम्मी को जीवन के लंबे सफर में कोई हमसफर मिल जाए, लेकिन उस के सामने यह सवाल खड़ा हो जाता कि क्या वह अपने पापा की जगह किसी दूसरे इंसान को देख सकेगी? आखिर में यह सवाल एक ऐसा चक्रव्यूह बन जाता, जिस में फंसी शालू निकल नहीं पाती थी.

कई बार शालू को लगता कि मम्मी के अंदर किसी बात को ले कर कशमकश चल रही है. वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन कहते कहते रुक जाती थीं. उन के सहेलियों जैसे संबंध इस मामले में मांबेटी के संबंधों में बदल जाते थे.

एक दिन काम से लौट कर मम्मी ने शालू से कहा कि उन्होंने उस के लिए एक नौकरी ढूंढ ली है और उसे कल ही नौकरी जौइन करनी है.

उन्होंने कहा, ‘‘अच्छी कंपनी है. कंपनी का मैनेजर किसी समय मेरी कंपनी में मेरे साथ ही काम करता था. सैलरी भी अच्छी मिलेगी और आगे चल कर तरक्की की भी गुंजाइश है.’’

अगले ही दिन शालू ने मम्मी द्वारा ढूंढी गई नौकरी जौइन कर ली. मम्मी खुद शालू को साथ ले कर वहां गई थीं. इलैक्ट्रिक आयरन, गीजर और हीटर बनाने वाली ग्लोब नाम की उस कंपनी का दफ्तर ज्यादा बड़ा तो नहीं था, लेकिन था शानदार.

मम्मी ने कंपनी के जिस जानकार मैनेजर का जिक्र किया था, उस की उम्र 50-55 के आसपास थी. वह आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व का मालिक था. स्वभाव से भी खुशमिजाज और मिलनसार लगता था. नाम था शीतल साहनी.

शीतल साहनी चूंकि कभी मम्मी के साथ उन्हीं की कंपनी में काम कर चुका था, इसलिए वह मम्मी के साथ बड़े दोस्ताना और खुले अंदाज में पेश आया.

मम्मी को शालू को साथ ले कर आने की वजह शीतल साहनी को मालूम थी. शायद सब कुछ पहले से ही तय था, इसलिए नौकरी के लिए पूछे जाने वाले सवालों का सामना शालू को नहीं करना पड़ा. शालू से उसी वक्त नौकरी संबंधी एप्लीकेशन ले ली गई और कुछ ही देर में उस का अप्वाइंटमेंट लैटर उस के हाथ में थमा दिया गया.

अप्वाइंटमेंट लैटर शालू के हाथ में देते हुए शीतल साहनी ने कहा, ‘‘तुम इसी समय से अपनी नौकरी जौइन कर रही हो, मेरी सेके्रट्री तुम्हें तुम्हारे बैठने की जगह बता कर काम समझा देगी. मन लगा कर काम करना.’’

‘‘थैंक्यू सर.’’

‘‘थैंक्यू मेरा नहीं, अपनी मम्मी का करो.’’ शीतल साहनी ने मम्मी की तरफ देखते हुए कहा.

जवाब भी मम्मी ने ही दिया, ‘‘थैंक्स, थैंक्यू सो मच साहनी, शालू को ले कर मैं बहुत परेशान थी. तुम ने मेरी बहुत बड़ी चिंता दूर कर दी.’’

‘‘अगर ऐसा है तो हमें इस खुशी को चाय के साथ सेलीबे्रट करना चाहिए.’’ शीतल साहनी ने इंटरकौम का रिसीवर उठाते हुए कहा.

मम्मी ने भी मुसकराकर अपनी सहमति दे दी. इंटरकौम पर 3 कप चाय के लिए कहने के बाद शीतल साहनी ने हलकीफुलकी बातचीत शुरू कर दी. थोड़ी देर में चाय आ गई. मम्मी चाय पी कर चली गईं.

शालू का पहला दिन अपना काम समझने में ही बीत गया. बीचबीच में 2-3 बार शीतल साहनी ने संदेश भेज कर उसे अपने कमरे में बुलाया और उस से पूछा कि उसे अपना काम समझने में कोई मुश्किल तो पेश नहीं आ रही है.

शालू ने पूरी शालीनता से इनकार कर दिया. बेशक शीतल साहनी यह सब उस के प्रति अपनापन दिखाने के लिए कर रहा था. लेकिन शालू को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था.

नौकरी दे कर शीतल साहनी ने एक तरह से एहसान किया था, लेकिन शालू को यह बिलकुल पसंद नहीं था कि अपने एहसान के बदले वह उस से अधिक आत्मीयता दर्शाने की कोशिश करे.

शालू की नजरों में शीतल साहनी ने उस पर नहीं, मम्मी पर एहसान किया था. पहले दिन की नौकरी के बाद शालू घर लौटी तो काफी खुश दिख रही मम्मी ने एक के बाद एक उस पर सवालों की बौछार सी कर दी.

वह जानना चाहती थीं कि नौकरी पर उस का पहला दिन कैसा बीता? उसे अपना काम पसंद आया कि नहीं?

अपने सवालों में मम्मी ने शालू से शीतल साहनी के बारे में भी काफी कुरेदकुरेद कर पूछा, जो शालू को ज्यादा अच्छा नहीं लगा. ऐसा लग रहा था, जैसे वह शीतल साहनी के प्रति शालू के विचारों को जानना चाहती हों.

लेकिन शालू ने शीतल साहनी को ले कर अपने निजी विचार व्यक्त करने के बजाय मम्मी से सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘मुझे नौकरी दे कर उन्होंने हम पर जो एहसान किया है, उस के एवज में उन्हें एक अच्छा इंसान ही कहा जा सकता है.’’

शालू के इस जवाब से मम्मी संतुष्ट और खुश नजर नहीं आईं. वह शायद नौकरी के अलावा शीतल साहनी के बारे में कुछ और सुनने की उम्मीद कर रही थीं.

पता नहीं क्यों शालू को पापा के अलावा किसी दूसरे मर्द की तारीफ मम्मी की जुबान से कतई अच्छी नहीं लग रही थी. शालू को ऐसा लग रहा था, जैसे कोई उस के और मम्मी के बीच में आने की कोशिश कर रहा है. यह शालू को बरदाश्त नहीं था.

शालू ने नौकरी कर के मानो एक अप्रत्याशित तनाव मोल ले लिया था. एक ऐसा तनाव, जिस की साफ वजह भी उसे मालूम नहीं थी.

शालू काम पर जाती तो उसे लगता कि उस का बौस शीतल साहनी न केवल उस के प्रति नरमी बरतता है, बल्कि उसे दूसरे लोगों से ज्यादा महत्त्व देता है. शालू को यह बात चुभती थी.

वह जानती थी कि यह सब मम्मी की वजह से हो रहा है. शालू खुद को उस समय सब से अधिक असहज महसूस करती, जब शीतल साहनी उस की मम्मी के बारे में मम्मी का नाम ले कर पूछता.

शालू की मम्मी का नाम सोनिया था. पापा अक्सर मम्मी को सोनिया कह कर ही बुलाते थे. लेकिन शीतल साहनी का मम्मी को उन के नाम से बुलाना शालू को एकदम अच्छा नहीं लगता था.

दूसरी ओर मम्मी भी शीतल साहनी के बारे में कुछ ज्यादा ही बातें करने लगी थीं. कभीकभी तो वह शालू से मिलने के बहाने उस के दफ्तर में आ जातीं और काफी देर तक शीतल के कमरे में बैठी रहतीं. मम्मी का ऐसा करना शालू को बहुत अखरता था.

शालू देख रही थी कि इधर कुछ दिनों में मम्मी में काफी बदलाव आ रहा है. पापा की मौत के बाद एकदम बुझ सी गईं मम्मी में जैसे एक बार फिर से जीने की उमंग भर गई थी.

शालू सोचती थी कि कहीं मम्मी में आए इस बदलाव का मतलब यह तो नहीं कि वह पापा की जगह किसी दूसरे मर्द को देने का मन बना रही थीं? यह दूसरा मर्द शीतल साहनी ही हो सकता था. शालू को ऐसा लगने लगा था, जैसे जिस मम्मी को वह अपनी सहेली मानती रही थी, वह अजनबी बन कर अचानक उस से दूर हो रही थीं. करीब होते हुए भी कोई अदृष्य सी दीवार उन के बीच खड़ी हो रही थी.

यह खयाल शालू के लिए बड़ा ही तकलीफदेह था कि इतना बड़ा फैसला मम्मी ने उस से कोई बात किए बगैर अकेले ही कर लिया था.

यही सोच कर शालू का मन महीना भर पुरानी नौकरी से उचाट होने लगा. वह किसी भी तरह शीतल साहनी का सामना करने से बचना चाहती थी, जबकि नौकरी में रहते हुए ऐसा मुमकिन नहीं था. शीतल साहनी अचानक ही शालू को अपनी जिंदगी का खलनायक नजर आने लगा था.

काफी कशमकश के बाद एक दिन शालू ने मम्मी से नौकरी छोड़ने की बात कह दी. उस की बात सुन कर मम्मी का चौंकना स्वाभाविक ही था.

‘‘मगर क्यों?’’ मम्मी ने पूछा.

‘‘मैं इस सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझती.’’

शालू का बेरुखा जवाब सुन कर मम्मी आहत नजर आईं. उन की आंखों में दर्द भी तैरता साफ नजर आया.

‘‘इस जवाब से मैं यह समझूं कि मेरी बेटी मुझ से अपने दिल की बात करने वाली मेरी सहेली नहीं रही?’’ मम्मी ने कहा तो शालू तुनक कर बोली, ‘‘यह सवाल मैं तुम से भी पूछ सकती हूं मम्मी, तुम में भी अब पहले वाली सहेलियों जैसी बात कहां रही है.’’

‘‘ऐसा लगता है जैसे तुम मुझे ताना मार रही हो.’’ मम्मी ने शालू की आंखों में झांकने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘मैं सिर्फ बात कह रही हूं मम्मी, अब तुम इसे ताना समझो तो यह अलग बात है. और हां, अगर अपनी जिंदगी के बारे में तुम ने अकेले ही कोई फैसला कर लिया है तो मैं उस फैसले में रुकावट नहीं बनूंगी. पर इतना जरूर साफ कर देना चाहती हूं कि मैं पापा की जगह तुम्हारी किसी पसंद को स्वीकार नहीं करूंगी.’’

शालू अपनी बात कह कर मम्मी को ड्राइंगरूम में छोड़ कर बाहर आ गई. उस वक्त उस की आंखों में आंसू थे. वह जानती थी कि उस के कठोर शब्दों से मम्मी को कितनी चोट पहुंची होगी.

आवेग कम हुआ तो शालू ने महसूस किया कि वह मम्मी को कुछ ज्यादा ही कह गई है. अपनी कही बातों पर उसे पश्चाताप होने लगा. रात को खाने की टेबल पर शालू ने देखा कि मम्मी की आंखें लाल थीं. लगता था, वह बहुत रोई थीं.

यह देख कर शालू के मन में अपराधबोध की टीस उठी. वह मम्मी के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले कर बोली, ‘‘आई एम सौरी मम्मी, मैं ने तुम से जो कहा है, वह मुझे नहीं कहना चाहिए था.’’

‘‘मुझे तुम से कोई गिला नहीं है शालू. मैं जानती हूं, तुम अपने पापा से कितना प्यार करती थी. मैं भी तुम्हारे पापा को बेहद चाहती थी. वह नहीं रहे. तुम अपनी जगह ठीक हो. जिंदगी के बारे में तुम ने एक बेटी के रूप में सोचा है. मैं ने भी तुम्हारे पापा की मौत के बाद सारी जिंदगी को सिर्फ एक मां के नजरिए से ही देखा था.

‘‘मेरे अंदर की औरत एक मां के फर्ज में कहीं गुम हो गई थी. आज तुम मेरे साथ हो, लेकिन जिस दिन तुम इस घर से चली जाओगी, मैं सिर्फ एक औरत रह जाऊंगी, सिर्फ औरत, जिसे समाज में जीने के लिए किसी सहारे की जरूरत होगी.

‘‘अगर जिंदगी के इस मोड़ पर आ कर मैं ने किसी दूसरे मर्द के बारे में सोचा है तो क्या कोई गुनाह किया है? क्या मुझे अपने आने वाले कल के लिए सोचने का भी हक नहीं है? तुम ने सिर्फ बेटी बन कर ही सोचा, मम्मी की सहेली बन कर नहीं.’’

उदासी में डूबी मम्मी की आवाज में एक शिकायत, एक गिला थी.

कुछ कहने के लिए शालू के पास जैसे शब्द ही नहीं रहे थे. जो बात मम्मी कभी कहते कहते रुक जाया करती थीं, आज वही बात उन्होंने बड़ी साफगोई से कह दी थी. मम्मी ने जो भी कहा था, सच ही कहा था. शालू ने उन्हें सहेली कहा जरूर था, मगर सहेली की तरह उन की भावनाओं को समझ नहीं सकी थी.

शालू को खामोश देख कर मम्मी ने सामने रखे मोबाइल फोन को उठाते हुए कहा, ‘‘मैं साहनी को फोन कर के बोल देती हूं कि तुम कल से नौकरी पर नहीं आ रही हो.’’

लेकिन वह मोबाइल का स्विच औन करतीं, उस के पहले ही शालू ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मैं कल नौकरी पर जा रही हूं. तुम सही सोच रही हो, शीतल साहनी वाकई एक अच्छे इंसान हैं. अगर वह मेरे साथ पापा की तरह पेश आ सकते हैं तो मैं भी उन्हें पापा की जगह स्वीकार करने को तैयार हूं.’’

शालू का इतना कहना था कि मम्मी की आंखें छलक पड़ीं और एकाएक वह फफक कर रोते हुए बेटी से लिपट गईं.

बरसों की साध : क्या प्रशांत अपना वादा निभा पाया?

बस एक बेटा चाहिए

बरसों की साध : क्या प्रशांत अपना वादा निभा पाया? – भाग 3

अगले दिन इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं. ईश्वर भैया शाम की गाड़ी से आ गए. लेकिन आते ही उन्होंने फरमान सुना दिया कि वह इस दुलहन को नहीं रखेंगे. लोगों ने समझायाबुझाया पर वह किसी की नहीं माने.

पति का फरमान सुन कर भाभी रोने लगीं. सुबह भाभी का चेहरा उतरा हुआ था. आंखें इस तरह लाल और सूजी थीं, जैसे वह रात भर रोई थीं. प्रशांत ने इस बारे में पूछा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. रूपमती की चुप्पी पर प्रशांत ने अगला सवाल किया, ‘‘भाभी, दिल्ली से भैया आप के लिए क्या लाए हैं?’’

‘‘मौत.’’ रूपमती ने प्रशांत को संक्षिप्त सा जवाब दिया.

भाभी के इस जवाब पर प्रशांत को गहरा आघात लगा. उस ने कहा, ‘‘लगता है भाभी आप रात में बहुत रोई हैं. क्या हुआ है, कुछ बताओ तो सही.’’

‘‘भैया, अभी यह सब तुम्हारी समझ में नहीं आएगा. दूसरे के दुख में आप क्यों दुखी हो रहे हैं. मेरे भाग्य में जो है वही होगा.’’ कह कर भाभी फफक कर रो पड़ी. दिल का बोझ थोड़ा हलका हुआ तो आंचल से मुंह पोंछ कर बोली, ‘‘आप के भैया बहुत बड़े अधिकारी हैं. मैं उन के काबिल नहीं हूं. उन्हें खूब पढ़ीलिखी पत्नी चाहिए. इसीलिए वह मुझे साथ रखने को तैयार नहीं हैं.’’

रूपमती के साथ जो हुआ था. वह ठीक नहीं हुआ था. लेकिन प्रशांत कुछ नहीं कर सकता था. उसी दिन ईश्वर चला गया. जाने से पहले उस ने प्रशांत के पिता से कहा, ‘‘काका, मुझे यह औरत नहीं चाहिए. इस देहाती गंवार औरत को मैं अपने साथ हरगिज नहीं रख सकता.’’

ईश्वर के जाने के बाद रूपमती ननद के गले लग कर रोते हुए कहने लगी, ‘‘अगर इस आदमी को ऐसा ही करना था तो मुझे विदा ही क्यों कराया गया. विदा करा कर मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की गई. अब कौन मुझे कुंवारी मानेगा. मैं न इधर की रही न उधर की.’’

अब सवाल था रूपमती को मायके पहुंचाने का. मामला तलाक का था. इसलिए घर का कोई बड़ा रूपमती को मायके ले जाने के लिए राजी नहीं था. जब कोई बड़ाबुजुर्ग रूपमती को ले जाने के लिए राजी नहीं हुआ तो उसे मायके ले जाने की जिम्मेदारी प्रशांत की आ गई.

रेलवे स्टेशन से रूपमती का घर ज्यादा दूर नहीं था. कोई संदेश मिला होता तो शायद स्टेशन पर कोई लेने आ जाता. प्रशांत और रूपमती पैदल ही घर की ओर चल पडे़. सामान स्टेशन पर ही एक परिचित की दुकान पर रख दिया गया था.

राह चलते हुए अपनी व्यथा व्यक्त करने की खातिर गांव के ज्ञानेश उर्फ ज्ञानू के बारे में बता कर प्रशांत ने कहा, ‘‘आज मुझे अपने देर से पैदा होने पर अफसोस हो रहा है भाभी. अगर मैं 8-10 साल पहले पैदा हुआ होता तो…’’

दुख की उस घड़ी में भी रूपमती के चेहरे पर मुसकान आ गई. मासूम देवर के कंधे पर हाथ रख कर उस ने कहा, ‘‘तो फिर मैं तुम्हारे बड़े होने की राह देखूं?’’

प्रशांत झेंप गया. गांव आया, फिर घर. गौने गई लड़की के चौथे दिन मायके आने पर उसे देखने के लिए आसपड़ोस की औरतें इकट्ठा हो गईं. उस समय दिल पर पत्थर रख कर रूपमती मुसकराती रही. उस के इस भोलेभाले देवर को ताना न सुनना पड़े, इस के लिए उस ने किसी से कुछ नहीं बताया.

प्रशांत उसी दिन शाम की गाड़ी से लौट आया. रूपमती गांव के बाहर तक उसे छोड़ने आई. विदा करते समय उस ने कहा, ‘‘इस जन्म में फिर कभी मुलाकात हो, तो देवरजी पहचान जरूर लेना. इन चार दिनों में तुम ने जो दिया,’’ प्रशांत का हाथ पकड़ कर सीने पर रख कर कहा, ‘‘इस में समाया रहेगा.’’

इतना कहते हुए रूपमती की आंखों में जो आंसू आए थे, प्रशांत उन्हें आज तक नहीं भूल सका था. इस के बाद से प्रशांत को हमेशा लगता रहा कि जिंदगी में कहीं कुछ छूटा हुआ है, जो तमाम तलाशने पर भी नहीं मिल रहा है.

धीरेधीरे यह प्रसंग मन के किसी कोने में दबता गया और इस के मुख्य पात्रों की स्मृति धुंधली होती गई. इस की मुख्य वजह यह थी कि दोनों ओर से संबंध लगभग खत्म हो गए थे. बदल रही जीवन की घटनाओं के बीच यह दु:सह याद उस ने अंतरात्मा के किसी कोने में डाल दी थी.

प्रशांत को सोच में डूबा देख कर रूपमती ने कहा, ‘‘आप बड़े तो हो गए, पर किया गया वादा भूल गए, निभा नहीं पाए.’’

‘‘भाभी, आप ने भी तो मेरी राह कहां देखी.’’

‘‘देखी देवरजी, बिलकुल देखी. बहुत दिनों तक देखी. आप का इंतजार आज तक करती रही. राह आंख से नहीं, दिल से देखी जाती है देवरजी.’’

प्रशांत आगे कुछ कहता, उस के पहले ही रूपमती ने उठते हुए बहु से कहा, ‘‘सुधा बेटा, तुम्हारे यह चाचाजी, मेरे सगे देवर हैं, तुम इन के पास बैठो. इन के लिए आज मैं खुद खाना बनाऊंगी और सामने बैठ कर खिलाऊंगी. बरसों की अधूरी साध आज पूरी करूंगी.’’

बरसों की साध : क्या प्रशांत अपना वादा निभा पाया? – भाग 2

बचपन में प्रशांत की बड़ी लालसा थी कि उस की भी एक भाभी होती तो कितना अच्छा होता. लेकिन उस का ऐसा दुर्भाग्य था कि उस का अपना कोई सगा बड़ा भाई नहीं था. गांव और परिवार में तमाम भाभियां थीं, लेकिन वे सिर्फ कहने भर को थीं.

संयोग से दिल्ली में रहने वाले प्रशांत के ताऊ यानी बड़े पिताजी के बेटे ईश्वर प्रसाद की पत्नी को विदा कराने का संदेश आया. ताऊजी ही नहीं, ताईजी की भी मौत हो चुकी थी. इसलिए अब वह जिम्मेदारी प्रशांत के पिताजी की थी. मांबाप की मौत के बाद ईश्वर ने घर वालों से रिश्ता लगभग तोड़ सा लिया था. फिर भी प्रशांत के पिता को अपना फर्ज तो अदा करना ही था.

ईश्वर प्रसाद प्रशांत के ताऊ का एकलौता बेटा था. उस की शादी ताऊजी ने गांव में तब कर दी थी. जब वह दसवीं में पढ़ता था. तब गांव में बच्चों की शादी लगभग इसी उम्र में हो जाती थी. उस की शादी उस के पिता ने अपने ननिहाली गांव में तभी तय कर दी थी, जब वह गर्भ में था.

देवनाथ के ताऊजी को अपनी नानी से बड़ा लगाव था, इसीलिए मौका मिलते ही वह नानी के यहां भाग जाते थे. ऐसे में ही उन की दोस्ती वहां ईश्वर के ससुर से हो गई थी. अपनी इसी दोस्ती को बनाए रखने के लिए उन्होंने ईश्वर के ससुर से कहा था कि अगर उन्हें बेटा होता है तो वह उस की शादी उन के यहां पैदा होने वाली बेटी से कर लेंगे.

उन्होंने जब यह बात कही थी, उस समय दोनों लोगों की पत्नियां गर्भवती थीं. संयोग से ताऊजी के यहां ईश्वर पैदा हुआ तो दोस्त के यहां बेटी, जिस का नाम उन्होंने रूपमती रखा था.

प्रशांत के ताऊ ने वचन दे रखा था, इसलिए ईश्वर के लाख मना करने पर उन्होंने उस का विवाह रूपमती से उस समय कर दिया, जब वह 10वीं में पढ़ रहा था. उस समय ईश्वर की उम्र कम थी और उस की पत्नी भी छोटी थी. इसलिए विदाई नहीं हुई थी. ईश्वर की शादी हुए सप्ताह भी नहीं बीता था कि उस के ससुर चल बसे थे. इस के बाद जब भी विदाई की बात चलती, ईश्वर पढ़ाई की बात कर के मना कर देता. वह पढ़ने में काफी तेज था. उस का संघ लोक सेवा आयोग द्वारा प्रशासनिक नौकरी में चयन हो गया और वह डिप्टी कलेक्टर बन गया. ईश्वर ट्रेनिंग कर रहा था तभी उस के पिता का देहांत हो गया था.

संयोग देखो, उन्हें मरे महीना भी नहीं बीता था कि ईश्वर की मां भी चल बसीं. मांबाप के गुजर जाने के बाद एक बहन बची थी, उस की शादी हो चुकी थी. इसलिए अब उस की सारी जिम्मेदारी प्रशांत के पिता पर आ गई थी.

लेकिन मांबाप की मौत के बाद ईश्वर ने घरपरिवार से नाता लगभग खत्म सा कर लिया था. आनेजाने की कौन कहे, कभी कोई चिट्ठीपत्री भी नहीं आती थी. उन दिनों शहरों में भी कम ही लोगों के यहां फोन होते थे. अपना फर्ज निभाने के लिए प्रशांत के पिता ने विदाई की तारीख तय कर के बहन से ईश्वर को संदेश भिजवा दिया था.

जब इस बात की जानकारी प्रशांत को हुई तो वह खुशी से फूला नहीं समाया. विदाई से पहले ईश्वर की बहन को दुलहन के स्वागत के लिए बुला लिया गया था. जिस दिन दुलहन को आना था, सुबह से ही घर में तैयारियां चल रही थीं.

प्रशांत के पिता सुबह 11 बजे वाली टे्रन से दुलहन को ले कर आने वाले थे. रेलवे स्टेशन प्रशांत के घर से 6-7 किलोमीटर दूर था. उन दिनों बैलगाड़ी के अलावा कोई दूसरा साधन नहीं होता था. इसलिए प्रशांत बहन के साथ 2 बैलगाडि़यां ले कर समय से स्टेशन पर पहुंच गया था.

ट्रेन के आतेआते सूरज सिर पर आ गया था. ट्रेन आई तो पहले प्रशांत के पिता सामान के साथ उतरे. उन के पीछे रेशमी साड़ी में लिपटी, पूरा मुंह ढापे मजबूत कदकाठी वाली ईश्वर की पत्नी यानी प्रशांत की भाभी छम्म से उतरीं. दुलहन के उतरते ही बहन ने उस की बांह थाम ली.

दुलहन के साथ जो सामान था, देवनाथ के साथ आए लोगों ने उठा लिया. बैलगाड़ी स्टेशन के बाहर पेड़ के नीचे खड़ी थी. एक बैलगाड़ी पर सामान रख दिया गया. दूसरी बैलगाड़ी पर दुलहन को बैठाया गया. बैलगाड़ी पर धूप से बचने के लिए चादर तान दी गई थी.

दुलहन को बैलगाड़ी पर बैठा कर बहन ने प्रशांत की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘यह आप का एकलौता देवर और मैं आप की एकलौती ननद.’’

मेहंदी लगे चूडि़यों से भरे गोरेगोरे हाथ ऊपर उठे और कोमल अंगुलियों ने घूंघट का किनारा थाम लिया. पट खुला तो प्रशांत का छोटा सा हृदय आह्लादित हो उठा. क्योंकि उस की भाभी सौंदर्य का भंडार थी.

कजरारी आंखों वाला उस का चंदन के रंग जैसा गोलमटोल मुखड़ा असली सोने जैसा लग रहा था. उस ने दशहरे के मेले में होने वाली रामलीला में उस तरह की औरतें देखी थीं. उस की भाभी तो उन औरतों से भी ज्यादा सुंदर थी.

प्रशांत भाभी का मुंह उत्सुकता से ताकता रहा. वह मन ही मन खुश था कि उस की भाभी गांव में सब से सुंदर है. मजे की बात वह दसवीं तक पढ़ी थी. बैलगाड़ी गांव की ओर चल पड़ी. गांव में प्रशांत की भाभी पहली ऐसी औरत थीं. जो विदा हो कर ससुराल आ गई थीं. लेकिन उस का वर तेलफुलेल लगाए उस की राह नहीं देख रहा था.

इस से प्रशांत को एक बात याद आ गई. कुछ दिनों पहले मानिकलाल अपनी बहू को विदा करा कर लाया था. जिस दिन बहू को आना था, उसी दिन उस का बेटा एक चिट्ठी छोड़ कर न जाने कहां चला गया था.

उस ने चिट्ठी में लिखा था, ‘मैं घर छोड़ कर जा रहा हूं. यह पता लगाने या तलाश करने की कोशिश मत करना कि मैं कहां हूं. मैं ईश्वर की खोज में संन्यासियों के साथ जा रहा हूं. अगर मुझ से मिलने की कोशिश की तो मैं डूब मरूंगा, लेकिन वापस नहीं आऊंगा.’

इस के बाद सवाल उठा कि अब बहू का क्या किया जाए. अगर विदा कराने से पहले ही उस ने मन की बात बता दी होती तो यह दिन देखना न पड़ता. ससुराल आने पर उस के माथे पर जो कलंक लग गया है. वह तो न लगता. सब सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए. तभी मानिकलाल के बडे़ भाई के बेटे ज्ञानू यानी ज्ञानेश ने आ कर कहा, ‘‘दुलहन से पूछो, अगर उसे ऐतराज नहीं हो तो मैं उसे अपनाने को तैयार हूं.’’

दुर्भाग्य के भंवरजाल में फंसी नवोदा के लिए ज्ञानू का यह कथन डूबते को तिनके का सहारा की तरह था. उस ने ज्ञानू से शादी कर ली थी. प्रशांत का भी मन ज्ञानू बनने का हो रहा था. लेकिन अभी वह छोटा था. उस की उम्र महज 13 साल थी. दुलहन को घर में बैठा कर पिया का इंतजार करने के लिए छोड़ दिया गया.

बस एक बेटा चाहिए – भाग 3

संविधा को आघात सा लगा. उस ने उस के दुख और मजबूरी भरे जीवन की अपने शानदार और  ऐशोआराम वाले जीवन से तुलना की, तब उसे लगा कि इस दुनिया में शायद दुख ज्यादा और सुख कम है.

उस ने पूछा, ‘‘आप हर साल एक बच्चा पैदा कर के थकी नहीं?’’

‘‘इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है.’’ शंकरी ने ठंडी आह भरते हुए जवाब दिया.

‘‘आप बहुत बहादुर हैं. मेरे वश का तो नहीं है.’’

‘‘मेरी मजबूरी है. मेरे पति चाहते हैं कि उन का एक बेटा हो जाए, जिस से उन के परिवार का नाम चलता रहे.’’

‘‘नाम चलता रहे..?’’ संविधा ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा. उस पर उसे तरस भी आया. क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस के जो बच्चे थे, उन्हें ही वह ठीक से पालपोस सकती. जबकि सिर्फ नाम चलाने के लिए वह बच्चे पर बच्चे पैदा करने को तैयार थी.

संविधा को झटका सा लगा था. वह उस से कहना चाहती थी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं रहा. दोनों बराबर हैं. उस की केवल एक ही बेटी है, जिस से वह और उस के पति खुश हैं. लड़कियां लड़कों से ज्यादा बुद्धिमान और प्रतिभाशाली निकल रही हैं. वे मातापिता की बेटों से ज्यादा देखभाल करती हैं. देखो न लड़कियां पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, उन के कदम चांद पर पहुंच गए हैं.

लेकिन वह कह नहीं पाई. उस के मन में आया कि वह उस से पूछे कि अगर इस बार भी बेटी पैदा हुई तो..? क्या जब तक बेटा नहीं पैदा होगा, वह इसी तरह बच्चे पैदा करती रहेगी? अगर उसे बेटा पैदा ही नहीं हुआ तो वह क्या करेगी?

इस तरह के कई सवाल संविधा के मन में घूम रहे थे. उस की गरीबी और बेटा पाने की चाहत के बारे में सोचते हुए उसे लगा, अगर यह इसी तरह बच्चे पैदा करती रही तो इस की हालत तो एकदम खराब हो जाएगी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘वह लोकगीत गाते हैं.’’ शंकरी ने कहा.

‘‘लोकगीतों का कार्यक्रम करते हैं?’’

‘‘नहीं, मेलों या गांवों में घूमघूम कर गाते हैं.’’

संविधा को याद आया कि जब वह मेले में प्रवेश कर रही थी तो कुछ लोग चादर बिछा कर ढोलक और हारमोनियम ले कर बैठे थे. वे लोगों की फरमाइश पर उन्हें लोकगीत और फिल्मी गाने गा कर सुना रहे थे.

संविधा समझ गई कि ये लोग कहीं बाहर से आए हैं. उस ने पूछा, ‘‘लगता है, तुम लोग कहीं बाहर से आए हो? अपना गांवघर छोड़ कर कहीं बाहर जाने में तुम लोगों को बुरा नहीं लगता?’’

‘‘हमारे पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है.’’

‘‘क्यों? जहां तुम लोग रहते हो, वहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?’’

‘‘काम और कमाई होती तो हम लोग इस तरह मारे मारे क्यों फिरते?’’

‘‘लेकिन तुम लोग अपने यहां खेती भी तो कर सकते हो?’’ संविधा ने सुझाव दिया.

‘‘कैसे मैडम, हमारी सारी जमीनों पर दबंगों और महाजनों ने कब्जा कर लिया है. क्योंकि हम ने उन से जो कर्ज लिया था और उसे अदा नहीं कर पाए.’’

‘‘तुम लोगों ने अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया?’’

‘‘मैडम, हम बहुत कमजोर लोग हैं और वे बहुत शक्तिशाली. उन के पास पैसा भी है और ताकत भी. हम उन से दुश्मनी कैसे मोल ले सकते हैं.’’

‘‘लेकिन तुम लोग यह सब सह कैसे लेते हो?’’

‘‘हम बहुत ही असहाय और बेबस लोग हैं.’’ शंकरी ने लंबी सांस ले कर जमीन पर खेल रही बच्ची के मुंह की धूल को साड़ी के पल्लू से साफ करते हुए कहा.

संविधा के दिमाग में तमाम सवाल उठ रहे थे, लेकिन उसे लगा कि बुद्धिमानी इसी में है कि वह उस से उन सवालों को न पूछे. चेहरे से शंकरी अभी जवान लग रही थी, लेकिन हालात की वजह से चेहरा पीला और सूखा हुआ था. शायद ऐसा गरीबी और बच्चे पैदा करने की वजह से था. संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी कितने साल में हुई थी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम रही.

‘‘तुम यहां कब आई?’’

‘‘जब यह मेला शुरू हुआ.’’

‘‘तुम लोगों के दिन कैसे गुजरते हैं?’’

‘‘सुबह जहां रहते हैं, वहां की साफसफाई करते हैं. दोपहर को ही रात का भी खाना बना लेते हैं, क्योंकि हमारे पास उजाले की व्यवस्था नहीं है. उस के बाद अपने काम में लग जाते हैं. लड़कियां टोलियों में नाचनेगाने का काम करती हैं. शादीशुदा महिलाएं मेरी तरह बायस्कोप दिखाती हैं तो कुछ कठपुतली का नाच दिखाती हैं. कुछ मेहंदी लगाने का भी काम करती हैं.’’

संविधा ने इधरउधर देखा. दूर दूर तक कोई इमारत नहीं थी. मैदान पर मेले में आए दुकानदारों के तंबू लगे थे. मन में जिज्ञासा जागी तो उस से पूछा, ‘‘तुम पूरे दिन इसी तरह बिना आराम के काम करती हो. ऐसे में तुम्हारे बच्चों की देखभाल कौन करता है?’’

‘‘मेरी बड़ी बेटी इन दोनों बेटियों को संभाल लेती है.’’

‘‘इन का खानापीना और नहानाधोना?’’

‘‘बड़ी बेटी छोटी को नहला देती है, बीच वाली खुद ही नहा लेती है.’’

संविधा ने अपनी 8 साल की बेटी पर नजर डाली, उस के बाद शंकरी की एकएक कर के तीनों बेटियों को देखा. छोटी बेटी अभी भी मां के पास चबूतरे पर खेल रही थी. संविधा ने सोचते हुए एक लंबी सांस ली. कुछ देर वह शंकरी और उस की बेटियों को देखती रही. उस का दिल उन के लिए सहानुभूति से भर गया. उस ने पर्स से 10-10 रुपए के 2 नोट निकाले और खेल रही लड़कियों को थमा दिए. इस के बाद वह चलने लगी तो देखा, कुछ बच्चे उधर आ रहे थे. उन्हें आते देख कर शंकरी अपने बायस्कोप के पास जा कर खड़ी हो गई, लेकिन उस की नजरें चबूतरे पर खेल रही बेटी पर ही जमी थीं.

शाम को संविधा घर पहुंची तो उस के दिलोदिमाग में शंकरी और उस की बेटियां ही छाई थीं. वह भी एक औरत थी, इसलिए उस ने प्रार्थना की कि काश! उस के गमों का सिलसिला खत्म हो जाए और उस की इच्छा पूरी हो जाए. इस बार उसे बेटा पैदा हो जाए.

अनुवाद: एम.एस. जरगाम

बरसों की साध : क्या प्रशांत अपना वादा निभा पाया? – भाग 1

प्रशांत को जब अपने मित्र आशीष की बेटी सुधा के साथ हुए हादसे के बारे में पता चला तो एकाएक  उसे अपनी भाभी की याद आ गई. जिस तरह शहर में ठीकठाक नौकरी करने वाले मित्र के दामाद ने सुधा को छोड़ दिया था, उसी तरह डिप्टी कलेक्टर बनने के बाद प्रशांत के ताऊ के बेटे ईश्वर ने भी अपनी पत्नी को छोड़ दिया था. अंतर सिर्फ इतना था कि ईश्वर ने विदाई के तुरंत बाद पत्नी को छोड़ा था, जबकि सुधा को एक बच्चा होने के बाद छोड़ा गया था.

आशीष के दामाद ने उन की भोलीभाली बेटी सुधा को बहलाफुसला कर उस से तलाक के कागजों पर दस्तखत भी करा लिए थे. सुधा के साथ जो हुआ था, वह दुखी करने और चिंता में डालने वाला था, लेकिन इस में राहत देने वाली बात यह थी कि सुधा की सास ने उस का पक्ष ले कर अदालत में बेटे के खिलाफ गुजारे भत्ते का मुकदमा दायर कर दिया था.

अदालत में तारीख पर तारीख पड़ रही थी. हर तारीख पर उस का बेटा आता, लेकिन वह मां से मुंह छिपाता फिरता. कोर्टरूम में वह अपने वकील के पीछे खड़ा होता था.

लगातार तारीखें पड़ते रहने से न्याय मिलने में देर हो रही थी. एक तारीख पर पुकार होने पर सुधा की सास सीधे कानून के कठघरे में जा कर खड़ी हो गई. दोनों ओर के वकील कुछ कहते सुनते उस के पहले ही उस ने कहा, ‘‘हुजूर, आदेश दें, मैं कुछ कहूं, इस मामले में मैं कुछ कहना चाहती हूं.’’

अचानक घटी इस घटना से न्याय की कुरसी पर बैठे न्यायाधीश ने कठघरे में खड़ी औरत को चश्मे से ऊपर से ताकते हुए पूछा, ‘‘आप कौन?’’

वकील की आड़ में मुंह छिपाए खडे़ बेटे की ओर इशारा कर के सुधा की सास ने कहा, ‘‘हुजूर मैं इस कुपुत्र की मां हूं.’’

‘‘ठीक है, समय आने पर आप को अपनी बात कहने का मौका दिया जाएगा. तब आप को जो कहना हो, कहिएगा.’’ जज ने कहा.

‘‘हुजूर, मुझे जो कहना है, वह मैं आज ही कहूंगी, आप की अदालत में यह क्या हो रहा है.’’ बहू की ओर इशारा करते हुए उस ने कहा, ‘‘आप इस की ओर देखिए, डेढ़ साल हो गए. इस गरीब बेसहारा औरत को आप की ड्योढ़ी के धक्के खाते हुए. यह अपने मासूम बच्चे को ले कर आप की ड्योढ़ी पर न्याय की आस लिए आती है और निराश हो कर लौट जाती है. दूसरों की छोडि़ए साहब, आप तो न्याय की कुरसी पर बैठे हैं, आप को भी इस निरीह औरत पर दया नहीं आती.’’

न्याय देने वाले न्यायाधीश, अदालत में मौजूद कर्मचारी, वकील और वहां खडे़ अन्य लोग अवाक सुधा की सास का मुंह ताकते रह गए. लेकिन सुधा की सास को जो कहना था. उस ने कह दिया था.

उस ने आगे कहा, ‘‘हुजूर, इस कुपुत्र ने मेरे खून का अपमान किया है. इस के इस कृत्य से मैं बहुत शर्मिंदा हूं. हुजूर, अगर मैं ने कुछ गलत कह दिया हो तो गंवार समझ कर माफ कर दीजिएगा. मूर्ख औरत हूं, पर इतना निवेदन जरूर करूंगी कि इस गरीब औरत पर दया कीजिए और जल्दी से इसे न्याय दे दीजिए, वरना कानून और न्याय से मेरा भरोसा उठ जाएगा.’’

सुधा की सास को गौर से ताकते हुए जज साहब ने कहा, ‘‘आप तो इस लड़के की मां हैं, फिर भी बेटे का पक्ष लेने के बजाए बहू का पक्ष ले रही हैं. आप क्या चाहती हैं इसे गुजारे के लिए कितनी रकम देना उचित होगा?’’

‘‘इस लड़की की उम्र मात्र 24 साल है. इस का बेटा ठीक से पढ़लिख कर जब तक नौकरी करने लायक न हो जाए, तब तक के लिए इस के खर्चे की व्यवस्था करा दीजिए.’’

जज साहब कोई निर्णय लेते. लड़के के वकील ने एक बार फिर तारीख लेने की कोशिश की. पर जज ने उसी दिन सुनवाई पूरी कर फैसले की तारीख दे दी. कोर्ट का फैसला आता, उस के पहले ही आशीष सुधा की सास को समझाबुझा कर विदा कराने के लिए उस की ससुराल जा पहुंचा. मदद के लिए वह अपने मित्र प्रशांत को भी साथ ले गया था कि शायद उसी के कहने से सुधा की सास मान जाए.

उन के घर पहुंचने पर सुधा की सास ने उन का हालचाल पूछ कर कहा, ‘‘आप लोग किसलिए आए हैं, मुझे यह पूछने की जरूरत नहीं है. क्योंकि मुझे पता है कि आप लोग सुधा को ले जाने आए हैं. मुझे इस बात का अफसोस है कि मेरे समधी और समधिन को मेरे ऊपर भरोसा नहीं है. शायद इसीलिए बिटिया को ले जाने के लिए दोनों इतना परेशान हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं हैं समधिन जी. आप के उपकार के बोझ से मैं और ज्यादा नहीं दबना चाहता. आप ने जो भलमनसाहत दिखाई है वह एक मिसाल है. इस के लिए मैं आप का एहसान कभी नहीं भूल पाऊंगा.’’ आशीष ने कहा.

सुधा की सास कुछ कहती. उस के पहले ही प्रशांत ने कहा, ‘‘दरअसल यह नहीं चाहते कि इन की वजह से मांबेटे में दुश्मनी हो. इन की बेटी ने तलाक के कागजों पर दस्तखत कर दिए हैं. उस हिसाब से देखा जाए तो अब उसे यहां रहने का कोई हक नहीं है. सुधा इन की एकलौती बेटी है.’’

‘‘मैं सब समझती हूं. मेरे पास जो जमीन है उस में से आधी जमीन मैं सुधा के नाम कर दूंगी. जब तक मैं जिंदा हूं, अपने उस नालायक आवारा बेटे को इस घर में कदम नहीं रखने दूंगी. सुधा अगर आप लोगों के साथ जाना चाहती है तो मैं मना भी नहीं करूंगी.’’ इस के बाद उस ने सुधा की ओर मुंह कर के कहा, ‘‘बताओ सुधा, तुम क्या चाहती हो.’’

‘‘चाचाजी, आप ही बताइए, मां से भी ज्यादा प्यार करने वाली अपनी इन सास को छोड़ कर मैं आप लोगों के साथ कैसे चल सकती हूं.’’ सुधा ने कहा.

सुधा के इस जवाब से प्रशांत और आशीष असमंजस में पड़ गए. प्रशांत ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘मां से भी ज्यादा प्यार करने वाली सास को छोड़ कर अपने साथ चलने के लिए कैसे कह सकता हूं.’’

‘‘तो फिर आप मेरी मम्मी को समझा दीजिएगा.’’ आंसू पोंछते हुए सुधा ने कहा.

‘‘ऐसी बात है तो अब हम चलेंगे. जब कभी हमारी जरूरत पड़े, आप हमें याद कर लीजिएगा. हम हाजिर हो जाएंगे.’’ कह कर प्रशांत उठने लगे तो सुधा की सास ने कहा, ‘‘हम आप को भूले ही कब थे, जो याद करेंगे. कितने दिनों बाद तो आप मिले हैं. अब ऐसे ही कैसे चले जाएंगे. मैं तो कब से आप की राह देख रही थी कि आप मिले तो सामने बैठा कर खिलाऊं. लेकिन मौका ही नहीं मिला. आज मौका मिला है. तो उसे कैसे हाथ से जाने दूंगी.’’

‘‘आप कह क्या रही हैं. मेरी समझ में नहीं आ रहा है?’’ हैरानी से प्रशांत ने कहा.

‘‘भई, आप साहब बन गए, आंखों पर चश्मा लग गया. लेकिन चश्मे के पार चेहरा नहीं पढ़ पाए. जरा गौर से मेरी ओर देखो, कुछ पहचान में आ रहा है?’’

प्रशांत के असमंजस को परख कर सुधा की सास ने हंसते हुए कहा, ‘‘आप तो ज्ञानू बनना चाहते थे. मुझ से अपने बडे़ होने तक राह देखने को भी कहा था. लेकिन ऐसा भुलाया कि कभी याद ही नहीं आई.’’

अचानक प्रशांत की आंखों के सामने 35-36 साल पहले की रूपमती भाभी का चेहरा नाचने लगा. उस के मुंह से एकदम से निकला, ‘‘भाभी आप…?’’

‘‘आखिर पहचान ही लिया अपनी भाभी को.’’

गहरे विस्मय से प्रशांत अपनी रूपमती भाभी को ताकता रहा. सुधा का रक्षाकवच बनने की उन की हिम्मत अब प्रशांत की समझ में आ गई थी. उन का मन उस नारी का चरणरज लेने को हुआ. उन की आंखें भर आईं.

रूपमती यानी सुधा की सास ने कहा, ‘‘देवरजी, तुम कितने दिनों बाद मिले. तुम्हारा नाम तो सुनती रही, पर वह तुम्हीं हो, यह विश्वास नहीं कर पाई आज आंखों से देखा, तो विश्वास हुआ. प्यासी, आतुर नजरों से तुम्हारी राह देखती रही. तुम्हारे छोड़ कर जाने के बरसों बाद यह घर मिला. जीवन में शायद पति का सुख नहीं लिखा था. इसलिए 2 बेटे पैदा होने के बाद आठवें साल वह हमें छोड़ कर चले गए.

‘‘बेटों को पालपोस कर बड़ा किया. शादीब्याह किया. इस घर को घर बनाया, लेकिन छोटा बेटा कुपुत्र निकला. शायद उसे पालते समय संस्कार देने में कमी रह गई. भगवान से यही विनती है कि मेरे ऊपर जो बीती, वह किसी और पर न बीते. इसीलिए सुधा को ले कर परेशान हूं.’’

प्रशांत अपलक उम्र के ढलान पर पहुंच चुकी रूपमती को ताकता रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे. रूपमती भाभी के अतीत की पूरी कहानी उस की आंखों के सामने नाचने लगी.

बस एक बेटा चाहिए – भाग 2

शंकरी बायस्कोप जरूर चला रही थी, लेकिन उस का ध्यान कहीं और ही था. उसी समय उस के पास एक अन्य लड़की आई, जिस की उम्र बामुश्किल 6 साल रही होगी. उस की पीली रंग की सलवार समीज मैल की वजह से काली पड़ चुकी थी. कुछ पल मांबेटी आपस में कानाफूसी करती रहीं, उस के बाद वह लड़की वहीं मां के पास बैठ गई और अपने धूल भरे पैर मजे से हिलाने लगी.

लेकिन उस की पीली आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. वह पैर हिलाते हुए वहां घूमने आए ताजा चेहरे वाले बच्चों और उन के मांबाप को ललचाई नजरों से ताक रही थी, क्योंकि वे अपने बच्चों की बड़ी से बड़ी इच्छाएं पूरी कर रहे थे.

तमाशा देखने वाले बच्चे जब चले गए तो वह आ कर मां के पास बैठ गई. मां उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराई. बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस में देखे गए तमाशे के बारे में चर्चा करते हुए हंस रहे थे. उसी बीच हवा का एक ऐसा झोंका आया, जिस से उस औरत का आंचल उड़ गया. उस के उभरे हुए पेट पर संविधा की नजर पड़ी, शायद वह गर्भवती थी.

संविधा ने उभार से अंदाजा लगाया, कम से कम 6 महीने का गर्भ रहा होगा. अपने कमजोर शरीर के पेट पर उस छोटे से उभार के साथ शंकरी मुश्किल से बेटी के साथ जमीन पर बैठ गई. उस की इस 6 साल की बेटी ने प्यार से उसे मां कहा तो वह बेटी की आंखों में झांकने लगी.

उसी समय धोतीकमीज पहने और सिर पर मैरून रंग की पगड़ी बांधे एक आदमी मांबेटी के पास आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही लड़की उसे बापू कह कर उस से चिपक गई और उस के गालों तथा मूंछों को सहलाने लगी. लेकिन उस आदमी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह शंकरी से बातें करने में व्यस्त था.

संविधा को समझते देर नहीं लगी कि वह आदमी शंकरी का पति है. वह आदमी उसी को देख रहा था, जबकि उस की नजरें अपने चारों ओर घूमते लोगों पर टिकी थीं. लड़की अपनी बांहें बापू के गले में डाल कर झूल गई तो वह उसे झटक कर उठ खड़ा हुआ और मेले की भीड़ में गायब हो गया.

लड़की संविधा के पास आ कर खड़ी हो गई. उस की नजरें उस के हाथ में झूल रही पौलीथिन में रखे चिप्स के पैकेट पर जमी थीं. वह उन चीजों को इस तरह ललचाई नजरों से देख रही थी, जैसे जीवन में कभी इन चीजों को नहीं देखा था. उस की तरसती आंखों में झांकते हुए संविधा ने चिप्स का पैकेट उसे थमाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

अब उस की नजरें संविधा की बेटी के लौलीपाप पर जम गई थीं, जिसे वह चूस रही थी. वह उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उस की नजरें उस पर चिपक गई हों. संविधा ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कहा, ‘‘लौलीपाप खाओगी?’’

उस ने मुसकराते हुए हां में सिर हिलाया. संविधा ने पर्स में देखा कि शायद उस में कोई लौलीपाप हो, लेकिन अब उस में लौलीपाप नहीं था. संविधा को लगा, अगर उस ने लड़की से कहा कि लौलीपाप नहीं है तो उसे दुख होगा. इसलिए उस ने पर्स से 10 रुपए का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘जाओ, अपने लिए लौलीपाप ले आओ.’’

लड़की मुसकराते हुए 10 रुपए के नोट को अमूल्य उपहार की तरह लहराती हुई मेले की ओर भागी.

लड़की के जाते ही संविधा शंकरी को देखने लगी. वह काफी व्यस्त लग रही थी. वह बायस्कोप देखने वालों को शो दिखाते हुए सामने से गुजरने वालों को बायस्कोप देखने के लिए आवाज भी लगा रही थी.

4 साल की उस की जो बेटी अपनी छोटी बहन को ले कर गई थी, अब तक मां के पास वापस आ गई थी. उस ने बरगद के पेड़ के चारो ओर बने चबूतरे पर छोटी बहन को बिठाया और अपना हाथ मां के सामने कर दिया, जिस में वह खाने की कोई चीज ले आई थी. शायद वह उसे मां के साथ बांटना चाहती थी.

अब तक बड़ी बेटी भी आ गई थी. उस ने भी अपनी मुट्ठी मां के सामने खोल कर अंगुली से संविधा की ओर इशारा कर के धीमे से कुछ कहा.

शंकरी ने संविधा की ओर देखा. नजरें मिलने पर वह मुसकराने लगी. उस परिवार को देखतेदेखते अचानक संविधा के मन में उस के प्रति आकर्षण सा पैदा हो गया तो उस के मन में उन लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गई. शायद शंकरी के लिए उस के दिल में दया पैदा हो गई थी. उस की स्थिति ही कुछ ऐसी थी, इसीलिए संविधा उस की कहानी जानना चाहती थी.

धीरेधीरे संविधा शंकरी की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख शंकरी खड़ी हो गई. उसे लगा, शायद संविधा बेटी को बायस्कोप दिखाने आ रही है, इसलिए उस ने बायस्कोप का ढक्कन खोलने के लिए हाथ बढ़ाया. संविधा ने कहा, ‘‘मुझे इस मशीन में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो आप से मिलने आई हूं.’’

संविधा की इस बात से शंकरी को सुकून सा महसूस हुआ. वह चबूतरे पर खेल रही छोटी बेटी के पास बैठ गई. संविधा ने उस की तीनों बेटियों की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘ये तीनों तुम्हारी ही बेटियां हैं?’’

‘‘जी.’’ शंकरी ने जवाब दिया.

‘‘ये कितने कितने साल की हैं?’’

शंकरी ने हर एक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘6 साल, 4 साल और सब से छोटी डेढ़ साल की है.’’

इस के बाद उस के उभरे हुए पेट पर नजरें गड़ाते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘शायद तुम फिर उम्मीद से हो?’’

‘‘जी.’’ उस ने लंबी सी सांस लेते हुए कहा.

‘‘कितने महीने हो गए?’’

‘‘6 महीने.’’

संविधा शंकरी को एकटक ताकते हुए उस की दुख भरी जिंदगी के बारे में सोचने लगी, शायद यह बच्चे पैदा करने को मजबूर है. यह कितनी तकलीफ में है. उस की परेशानियों को देखते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी होगी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रही तो नजरें झुका लीं.