ट्रॉली बेग में सिमटा आयुषि का प्यार – भाग 2

मुख्यमंत्री व डीजीपी कार्यालय से ली गई जानकारी

जैसे ही यह खबर चर्चा में आई, वैसे ही मुख्यमंत्री और डीजीपी कार्यालय से लगातार इस की जानकारी की जाने लगी थी. ऐसे में पुलिस भी युवती की हत्या का परदाफाश करने को ले कर तनाव में थी.

दिल्ली-एनसीआर में मृतका के पोस्टर भी लगवाए. इस के अलावा पुलिस की टीमें युवती की पहचान के लिए गुरुग्राम, अलीगढ़, हाथरस, नोएडा, आगरा और दिल्ली तक पहुंचीं.

इस के बाद कानपुर देहात जिले से एक परिवार जानकारी होने पर 19 नवंबर, 2022 की सुबह थाना राया पहुंचा.  उन की बेटी 11 नवंबर से गायब थी. पुलिस ने जब मृतका के फोटो उस परिवार को दिखाए तो वह लाश उन की बेटी की नहीं निकली. अलीगढ़ से भी एक परिवार पहुंचा था. और भी कई जिलों से पुलिस के पास फोन आए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

आखिर में पुलिस की मेहनत रंग लाई. 48 घंटे बाद किसी अंजान व्यक्ति का राया पुलिस के पास फोन आया. फोन करने वाले ने बताया कि उस ने एक वाट्सऐप ग्रुप में जो अज्ञात युवती की लाश देखी है, वह उसे पहचानता है. उस युवती का नाम आयुषि यादव है, जो मकान नंबर 2461, गली नंबर 65, ब्लौक ई-2 मोलड़बंद एक्सटेंशन, थाना बदरपुर, नई दिल्ली की रहने वाली है.

यह जानकारी मिलने के बाद कार्यवाहक एसएसपी मार्तंड प्रकाश सिंह ने 2 टीमों को 20 नवंबर को दिल्ली रवाना कर दिया. पुलिस की टीमें फोन पर बताए गए दिल्ली के पते पर पहुंच गईं. फोटो का मिलान करते हुए पुलिस टीम ने घर वालों से पूछताछ की.

पुलिस ने मृतका का फोटो जब उन्हें दिखाया तो उन्होंने वह पहले फोटो पहचानने से इंकार कर दिया, लेकिन पुलिस के पास पुख्ता जानकारी थी कि ये फोटो आयुषि के ही हैं. इसलिए बारबार पुलिस ने पूछा तो आयुषि के छोटे भाई आयुष ने बताया कि ये फोटो उस की बड़ी बहन आयुषि की है.

48 घंटे तक हवा में तीर चला रही पुलिस को यहीं से उम्मीद की किरण दिखी. पूछताछ में परिजनों ने बताया कि आयुषि 17 नवंबर, 2022 की सुबह घर से कहीं गई थी.

‘‘जब गायब थी तो आप ने इस की सूचना स्थानीय पुलिस को क्यों नहीं दी?’’ पुलिस ने पूछा.

पुलिस के इस सवाल पर परिजनों ने कहा कि वह अपने स्तर से उसे तलाश रहे थे.

आयुषि 17 नवंबर की सुबह घर से गई थी. उस का शव पुलिस को 18 नवंबर को मिला था. शव की हालत देख कर 12 से 16 घंटे पहले हत्या होने का अनुमान लगाया जा रहा था. इस का मतलब यह हुआ कि घर से निकलने के बाद जहां भी आयुषि गई, वहां रात में उस की हत्या के बाद सुबह के समय शव को मथुरा ला कर डाला गया था.

उस समय घर पर आयुषि का पिता नितेश यादव मौजूद नहीं था. पुलिस ने नितेश यादव के बारे में जानकारी की तो पता चला कि वह इलैक्ट्रीशियन है और काम करने गया है. पुलिस उस के भाई को साथ ले कर नितेश को तलाशने लगी.

कई घंटों की तलाश के बाद 44 वर्षीय पिता नितेश एक राजनीतिक पार्टी के कार्यालय में मिल गया. पिता नितेश, मां ब्रजबाला व भाई आयुष को ले कर पुलिस मथुरा के लिए रवाना हुई ताकि वह लाश की शिनाख्त कर सकें.

नितेश ने पुलिस से मांगी बीयर

20 नवंबर, 2022 रविवार की देर शाम पोस्टमार्टम गृह पर शव को देखते ही उन सभी ने लाश की पहचान आयुषि के रूप में कर ली. मां फूटफूट कर रोने लगी.

हालांकि पुलिस को शुरुआत में घर वालों से बात करने के दौरान ही शक हो गया था कि आयुषि की हत्या औनर किलिंग में की गई है. इसी के चलते पुलिस नितेश यादव को पोस्टमार्टम गृह तक नहीं लाई.

प्राइवेट कार से एसएचओ ओमहरि बाजपेयी, एसआई विनय कुमार और एक सिपाही के साथ केवल मां ब्रजबाला और भाई आयुष को ही लाया गया था. नितेश का परिवार मूलरूप से गांव सुनारी, देवरिया (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला है.

दिल्ली में एक राजनीतिक दल के चुनाव कार्यालय से पुलिस ने नितेश यादव को उठाया था. हत्यारोपी नितेश पूरी शिद्दत से एमसीडी चुनाव में जुटा हुआ था. वह उस समय नशे में धुत था. नशे में होने के कारण पुलिस ने उसे अलग गाड़ी में बैठाया.

शव की पहचान के लिए स्वाट टीम नितेश को ले कर मथुरा चली तो रास्ते में पुलिस ने उससे पूछताछ शुरू कर दी. पूछताछ के दौरान ही उसने बीयर पीने की मांग की. पुलिस ने युवती की हत्या की सच्चाई जानने के लिए उस की इच्छा पूरी की. इस के बावजूद वह पुलिस को गुमराह करता रहा.

आखिर 20 नवंबर, 2022 की देर रात लगभग साढ़े 11 बजे पुलिस ने जब सख्ती की तो नितेश टूट गया. उस ने अपनी 22 वर्षीय बेटी आयुषि यादव की गोली मार कर हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

कार्यवाहक एसएसपी मार्तंड प्रकाश सिंह ने प्रैस कौन्फ्रैंस में जानकारी देते हुए बताया कि आयुषि की हत्या पिता नितेश और मां ब्रजबाला ने मिल कर की थी. हत्या के बाद सबूत छिपाने में दोनों शामिल थे. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कार, लाइसेंसी रिवौल्वर, 2 खोखों को अब तक बरामद कर लिया गया था.

आयुषि ने चोरीछिपे की थी लव मैरिज

आयुषि दिल्ली ग्लोबल इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी में बीसीए की अंतिम वर्ष की होनहार छात्रा थी. राजस्थान के भरतपुर का रहने वाला छत्रपाल गुर्जर का एक रिश्तेदार आयुषि का सहपाठी था.

सहपाठी ने आयुषि से छत्रपाल का परिचय कराया. छत्रपाल भी दिल्ली में बैंक प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा था. इसी दौरान दोनों की दोस्ती हो गई और दोनों ने अपने फोन नंबर एकदूसरे को दे दिए.

यहीं से दोनों के अफेयर की शुरुआत हुई. दोनों ने एक दिन हाथ पकड़ कर जीवन भर साथ देने का वादा किया. जब इस की जानकारी आयुषि के घर वालों को हुई तो उन्होंने विरोध किया.

विरोध के बावजूद आयुषि ने छत्रपाल से चोरीछिपे 13 नवंबर, 2021 को दिल्ली के आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली थी. जबकि उस ने इसी वर्ष 14 अक्तूबर को शाहदरा के जिला मजिस्ट्रैट के कार्यालय में अपने विवाह का पंजीकरण करा लिया था.

मोहब्बत का खूनी अंजाम – भाग 1

जब जब इश्क की कलम से दिल के कागज पर मोहब्बत की इबादत लिखी गई है, तबतब मोहब्बत करने वाले फना हुए हैं. इस तरह की कहानी में तब और दिलचस्प मोड़ आया है, जब वह त्रिकोण प्रेम पर आधारित हुई है और प्रेम त्रिकोण की कहानी में अकसर खूनी खेल सामने आता है. कुछ ऐसा ही इस त्रिकोण प्रेम में भी हुआ.

8 दिसंबर, 2017 की अलसाई सुबह चटख धूप के साथ खिली. लोग अपने घरों से निकल कर अपनी दिनचर्या में रम रहे थे.

उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के बिलरियागंज थाने के भदाव गांव के कुछ लोग अपने खेतों की तरफ जा रहे थे. तभी गांव से बाहर कच्ची सड़क से दाईं ओर करीब 500 मीटर की दूरी पर कुदारन तिवारी के खेत में सफेद रंग की स्विफ्ट डिजायर कार लावारिस हालत में खड़ी दिखी. उत्सुकतावश लोग उस कार की ओर चले गए कि सुबहसुबह खेत में किस की कार खड़ी है.

लोगों ने जब कार के भीतर झांक कर देखा तो भीतर कोई नहीं था. कार का नंबर था यूपी53सी 3262. कार से कुछ दूरी पर एक युवक की लाश पड़ी थी. उस के सिर के घाव से लग रहा था कि किसी ने सिर में गोली मार कर उस की हत्या की है. उस का चेहरा खून से सना था.

मृतक काले रंग की पैंट और नीलेपीले रंग की धारीदार डिजाइन वाली जैकेट पहने था. उसके पैरों में कोई चप्पल या जूते नहीं थे. चेहरे पर दाढ़ी थी. वह शक्लसूरत और पहनावे से किसी अच्छे परिवार का लग रहा था.

लाश पड़ी होने की जानकारी मिलते ही आसपास के गांव के और लोग भी वहां जुटने लगे. उसी भीड़ में से किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के इस की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. चूंकि मामला बिलरियागंज थाने का था, इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम ने बिलरियागंज थाने को घटना की इत्तला दे दी. लाश मिलने की खबर पा कर बिलरियागंज के थानाप्रभारी विजय प्रताप यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

घटनास्थल पहुंचने के बाद थानाप्रभारी ने अपने आला अधिकारियों को भी मामले की सूचना दे दी. इस के अलावा उन्होंने फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी सूचना दे कर मौके पर बुला लिया.

खबर पा कर एसपी अजय कुमार साहनी, एसपी (देहात) एन.पी. सिंह, सीओ (सगड़ी) सुधाकर सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कार के नंबर की जांच की तो वह नंबर गोरखपुर आरटीओ का था.

जांचपड़ताल से पता चला कि वह कार गोरखपुर के दीपक सिंह के नाम से रजिस्टर्ड थी. इस से यही अंदाजा लगाया गया कि मृतक गोरखपुर का रहने वाला होगा. फिर पुलिस ने मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो उस की जेब से सगड़ी के बाबू शिवपत्तर राय स्मारक कालेज का एक परिचयपत्र मिला. उस परिचयपत्र से उस की शिनाख्त एमए के छात्र विभांशु प्रताप पांडेय के रूप में हुई, जिस में उस का पता गांव भौवापार थाना बेलीपार लिखा था.

कार की तलाशी लेने पर डिक्की में उल्टी और खून के धब्बे मिले. कार में एक जोड़ी लेडीज चप्पल पड़ी मिली. ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा था कि बदमाश हत्या कहीं और कर लाश को ठिकाने लगाने ले जा रहे थे, लेकिन कार खेत में फंस जाने की वजह से दूर नहीं भाग सके और उस की लाश फेंक कर फरार हो गए. इस का मतलब साफ था कि कार में कोई महिला भी सवार थी. वह कौन थी? यह मामला और भी पेचीदा हो गया.

पुलिस इस मामले को प्रेम संबंधों से जोड़ कर देखने लगी थी. कार में लेडीज चप्पल और उल्टी ने गुत्थी बुरी तरह उलझा कर रख दी थी. विभांशु के मुंह से झाग निकले थे. वह झाग किसी जहरीले पदार्थ के सेवन से थे या किसी और के, यह बात जांच के बाद ही पता चलना था.

मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी. कागजी काररवाई पूरी करने के पहले पुलिस ने घटना की सूचना मृतक के परिजनों को दे दी थी. सूचना मिलने के बाद वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

मृतक के बड़े भाई जोकि पेशे से एक वकील थे, उन की तहरीर पर पुलिस ने रुचि राय पुत्री अरविंद राय, ग्रामप्रधान श्यामनारायण राय और उस के भाई सत्यम राय सहित 8 अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

सभी आरोपी कोतवाली जीयनपुर के बांसगांव के निवासी थे. घनश्याम पांडेय का आरोप था कि भाई को उस की प्रेमिका रुचि राय ने फोन कर के बुलाया था और उस की हत्या करवा दी. रिपोर्ट नामजद लिखाई गई थी, इसलिए पुलिस ने नामजद आरोपियों की तलाश शुरू कर दी.

चूंकि वादी घनश्याम पांडेय एक वकील के साथसाथ रसूखदार और ऊंची पहुंच वाला था, पुलिस की थोड़ी सी भी चूक कानूनव्यवस्था बिगाड़ सकती थी, इसलिए एसपी अजय कुमार साहनी ने सीओ सुधाकर सिंह के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम को निर्देश दे दिए थे कि नामजद आरोपियों को जल्द गिरफ्तार किया जाए.

पुलिस टीम ने आरोपियों के घर दबिश डाली तो वह अपने ठिकानों पर नहीं मिले. उन के न मिलने पर पुलिस की समस्या और बढ़ गई. उन की तलाश के लिए पुलिस ने अपने सभी मुखबिरों को भी अलर्ट कर दिया.

9 दिसंबर, 2017 की सुबह थानाप्रभारी विजय प्रताप यादव को एक मुखबिर ने आरोपी ग्रामप्रधान श्यामनारायण राय के बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी. उस से मिली जानकारी के बाद थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ सगड़ी-खालिसपुर मार्ग पर पहुंच गए. श्यामनारायण वहीं खड़ंजे के पास खड़ा मिल गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. वह वहां से कहीं भागने की फिराक में था.

तलाशी लेने पर उस के पास से एक पिस्टल .32 बोर व 2 जिंदा कारतूस के अलावा एक कारतूस का खोखा भी मिला. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई, उस ने विभांशु की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.

पुलिस ने उस के पास से जो पिस्टल बरामद किया था, उसी से उस ने विभांशु की हत्या की थी. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह प्रेम त्रिकोण वाली निकली—

प्यार बना कंकाल : क्या हुआ खुशबू के साथ – भाग 1

चूडि़यों की खनक के लिए प्रसिद्ध फिरोजाबाद जिले के थाना सिरसागंज का एक गांव है कीठौत. इसी गांव के रहने वाले हैं भीकम सिंह और चंद्रभान सिंह. दोनों के घरों के बीच मात्र 4 घरों का फासला है. एक ही जाति के होने के कारण दोनों के परिवार का एकदूसरे के यहां आनाजाना था.

चंद्रभान सिंह के 3 बेटे अक्षय, गौरव व सौरभ थे. इन में दूसरे नंबर का 24 वर्षीय गौरव कुमार रेलवे में बिजली के तार खींचने का प्राइवेट काम करता था. जबकि भीकम सिंह के 2 बेटे रवि व अंकुश के अलावा 2 बेटियां आरती व खुशबू थीं.

आरती की शादी काफी पहले हो चुकी थी. भीकम सिंह व उन के बेटे गुजरबसर के लिए सिरसागंज में मट्ठा (छाछ) बेचने का काम करते थे.

जब गौरव छुट्टी पर गांव कीठौत आता तो अपनी बाइक से गांव में घूमता था. एक दिन खुशबू ने अपनी मां आशा देवी से कहा, ‘‘मां, मैं भी बाइक चलाना सीखना चाहती हूं.’’

इस पर आशा देवी ने गौरव से कहा, ‘‘बेटा खुशबू बाइक चलाना सीखना चाहती है. तुम उसे चलाना सिखा दो.’’

इस पर गौरव को कोई ऐतराज नहीं था. लिहाजा वह उसे बाइक सिखाने को तैयार हो गया. इस के बाद गौरव खुशबू को बाइक सिखाने लगा. दोनों ही हमउम्र थे. उन्हें एकांत मिला तो इस बीच दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती चली गईं.

बाइक सिखाने के दौरान मौका मिलते ही दोनों बाइक से गांव के बाहर निकल जाते. बाइक पर पीछे बैठने के दौरान वह गौरव को कस कर भींच लेती थी. खुशबू की इस छुअन से गौरव के शरीर में सनसनी सी दौड़ जाती. ऐसा करना खुशबू को भी अच्छा लगता था. क्योंकि वह उसे प्यार जो करने लगी थी.

अब दोनों का यह हाल हो गया था कि जब तक वे एकदूसरे को देख नहीं लेते थे, उन्हें चैन नहीं आता था.

जब गौरव अपनी नौकरी पर चला जाता तो खुशबू उस का बेसब्री से इंतजार करती. उस के गांव आने पर वह उस से मिलने उस के घर पहुंच जाती. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे थे.

गौरव ने खुशबू को उस के साथ घर बसाने के सपने दिखाए. एक ही जाति के होने से खुशबू को पूरा विश्वास था कि घर वाले उन की शादी में रोड़ा नहीं अटकाएंगे. इस दौरान उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे.

शादी का पुख्ता भरोसा मिलने के बाद खुशबू के जैसे पंख ही लग गए थे. दोनों का प्रेम प्रसंग पिछले 2 साल से चल रहा था. गौरव के गांव आने और कुछ दिन रहने के बाद नौकरी पर चले जाने से खुशबू के घर वालों को दोनों के प्रेम प्रसंग की खबर नहीं थी. जबकि गौरव के घर वाले सब कुछ जानते थे.

21 वर्षीय खुशबू, जो सातवीं कक्षा तक पढ़ी थी, की शादी सन 2018 में हाथरस में निजामतपुर में हो गई थी. जिस लड़के के साथ शादी हुई थी, उस का किसी लड़की से पहले से ही प्रेम प्रसंग चल रहा था. इस के चलते वह खुशबू के साथ दुर्व्यवहार करने के साथ ही मारपीट करता था.

8-9 महीने बाद ही खुशबू ससुराल से वापस मायके आ गई थी और पति से संबंध खत्म हो गए थे. जवान बेटी की जिंदगी आसानी से कट जाए, इसलिए घर वाले उस के लिए लड़के की तलाश कर रहे थे.

21 नवंबर, 2020 को खुशबू अंडे लेने के बहाने घर से निकली थी. लेकिन जब काफी देर तक वापस नहीं आई, तब घर वालों ने उस की तलाश की. गौरव के घर भी पूछने आए. लेकिन गौरव के घर वालों ने खुशबू के अपने घर आने की बात से इंकार कर दिया.

खुशबू मीट नहीं खाती थी. जब भी घर में मीट बनता खुशबू नाराज हो जाती थी. 21 नवंबर, 2020 को भी घर में मीट बन रहा था, इसलिए वह अपने लिए अंडे लेने गई थी.

घर वालों ने उस के लापता होने पर सोचा कि वह घर में मीट बनने की बात से नाराज हो कर पड़ोस में कहीं चली गई होगी. गुस्सा शांत हो जाने पर आ जाएगी. लेकिन वह नहीं लौटी.

रात भर घर के लोग गांव वालों के साथ उसे तलाशते रहे. दूसरे दिन भी आसपास के गांवों के साथ ही रिश्तेदारियों में उस की तलाश की.

उधर घटना वाली रात को अचानक गौरव, उस के दोनों भाई व मां गांव छोड़ कर फरार हो गए. घर में केवल गौरव का पिता चंद्रभान रह गया था. चंद्रभान दूसरे दिन खुशबू के घर वालों के साथ उस की तलाश के बीच अपनी दोनों भैंसों को बेच घर में ताला लगा कर वह भी फरार हो गया.

खुशबू के घर वालों को अब तक खुशबू और गौरव के प्रेम प्रसंग की जानकारी हो गई थी. इसलिए खुशबू के गायब होने में वे लोग गौरव का हाथ मान रहे थे.

गौरव के घर वालों के घर में ताला लगा कर फरार हो जाने पर खुशबू के घर वालों को गौरव और उस के घर वालों पर ही खुशबू को गायब करने का हो रहा शक अब पूरी तरह यकीन में बदल चुका था.

आखिर 2 दिन बाद 23 नवंबर को थाना सिरसागंज में खुशबू की मां आशा देवी ने गौरव के अलावा गांव के ही दीपू, सुमित व रजनीकांत के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

धोखे में लिपटी मोहब्बत – भाग 1

9 जनवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना के रहने वाले 65 वर्षीय रामजी सिंह पटना के सचिवालय थाने पहुंचे तो उस समय इंसपेक्टर प्रकाश सिंह अपने कक्ष में बैठे कुछ जरूरी फाइलें निबटा रहे थे. रामजी सिंह उन के सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गए.

इंसपेक्टर ने फाइलों को एक तरफ किया और रामजी सिंह से मुखातिब हुए. रामजी सिंह ने उन्हें बताया कि उन का बेटा विनोद कुमार सिंह पटना के सचिवालय में लघु सिंचाई विभाग में नौकरी करता है. वह अंतरराष्ट्रीय तैराक भी रह चुका है. जन्म से उस के दोनों हाथ नहीं हैं. पिछले 2 दिनों से उस का कहीं पता नहीं चल रहा है और उस का मोबाइल भी बंद है.

रामजी सिंह की बात सुन कर इंसपेक्टर प्रकाश सिंह चौंके. हाई प्रोफाइल मामला था और सचिवालय से जुड़ा हुआ भी. उन्होंने सारा काम छोड़ कर रामजी की पूरी बात सुनी. रामजी ने उन्हें आगे बताया कि 2 दिन पहले 7 जनवरी, 2017 को दोपहर को बेटे से उन की बात हुई थी. उस ने कहा था कि वह कुछ जरूरी काम से भागलपुर जा रहा है. काम निपटा कर वह वापस पटना लौट जाएगा.

उस के बाद से उस का फोन बंद बता रहा है. वह 2 दिनों से लगातार उस के मोबाइल पर फोन कर रहे थे, लेकिन उस से न तो बात हो सकी और न ही उस का कुछ पता चल रहा है.

मामला गंभीर था, इसलिए बिना देर किए प्रकाश सिंह ने इस मामले की जानकारी एसएसपी मनु महाराज और आईजी नैयर हसनैन खान को दे दी. मामला सचिवालय से जुड़ा होने की वजह से अधिकारियों के भी हाथपांव फूल गए. वे किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने प्रकाश सिंह को उचित काररवाई करने के आदेश दिए.

त्वरित काररवाई करते हुए प्रकाश सिंह रामजी सिंह के साथ विनोद के कमरे पर पहुंचे. विनोद शास्त्रीनगर के राजवंशीनगर, रोड संख्या 6 के मकान नंबर 396/400 में अपने भांजे अंकित कुमार सिंह के साथ रहता था. प्रकाश सिंह ने सब से पहले अंकित से विनोद के बारे में पूछताछ की. लेकिन वह विनोद के बारे में कुछ खास नहीं बता सका तो उन्होंने कमरे में रखे विनोद के सामान की जांच की. तो उस में उन्हें विनोद की एक पुरानी डायरी मिली.

उस डायरी में भागलपुर के रहने वाले एक तैराक संजय कुमार का मोबाइल नंबर लिखा था. इस के अलावा वहां से ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से विनोद के बारे में कुछ पता चलता. प्रकाश सिंह ने यह बात एसएसपी मनु महाराज को बता दी. मनु महाराज ने उन्हें आदेश दिया कि एक पुलिस अफसर को भागलपुर भेज कर वहां से पता लगाने की कोशिश करें. इस पर उन्होंने रामजी सिंह के साथ एसआई अरविंद कुमार को भागलपुर भेज दिया.

10 जनवरी, 2017 को रामजी सिंह और एसआई अरविंद कुमार भागलपुर पहुंचे. संजय कुमार के मोबाइल पर संपर्क करके वे उसके घर पहुंच गए. वह तिलकामांझी मोहल्ले में अपने निजी मकान में रहता था. उससे अरविंद कुमार ने विनोद के बारे में पूछताछ की तो उस ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर दोनों हैरान रह गए.

संजय ने बताया कि 1 जनवरी, 2017 को विनोद रंजना नाम की एक लड़की से मिलने भागलपुर आया था. रंजना को ले कर उस की रंजना के बहनोई शंभू मंडल और उस के मौसेरे भाई बिट्टू से कहासुनी हुई थी. कहासुनी के बीच शंभू मंडल ने विनोद के गाल पर कई थप्पड़ मारे थे, साथ ही उस पर अपनी साली का मोबाइल चुराने का आरोप भी लगाया था. इस के बाद दोनों उसे ले कर तिलकामांझी थाने गए थे.

तिलकामांझी थाने के थानाप्रभारी विनोद को देख कर दंग रह गए थे, क्योंकि विनोद के दोनों हाथ नहीं थे. ऐसे में वह चोरी कैसे कर सकता था. थानाप्रभारी को शंभू और बिट्टू पर शक हुआ तो उन्होंने उन से पूछताछ की. उन्होंने कहा कि जिस के दोनों हाथ ही नहीं हैं, वह भला चोरी कैसे कर सकता है. यह कुछ और ही मामला लगता है.

उन्होंने शंभू से रंजना के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह यहां नहीं है. हां, उस से बात करा सकता है. इस के बाद उस ने रंजना की थानाप्रभारी से बात कराई. रंजना ने उन्हें बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल चुराया नहीं, बल्कि जबरन अपने पास रख लिया है, जिसे वह उसे लौटा नहीं रहा है.

थानाप्रभारी तिलकामांझी ने रंजना के मोबाइल के बारे में विनोद से पूछा तो उस ने कहा कि उस का मोबाइल उस के पास है. थानाप्रभारी ने विनोद से उस का मोबाइल लौटाने को कहा तो उस ने मोबाइल शंभू मंडल को लौटा दिया. शंभू मंडल और बिट्टू मोबाइल ले कर चले गए. थानाप्रभारी ने विनोद को समझाया कि वह अपने घर लौट जाए. ये अच्छे लोग नहीं हैं. उन दोनों के चले जाने के बाद थानाप्रभारी ने थाने के 2 सिपाहियों के साथ विनोद को स्टेशन पहुंचवा दिया. इस के आगे संजय कुछ नहीं बता सका.

संजय ने जो भी बताया था, उस की तसदीक करने के लिए एसआई अरविंद कुमार और रामजी सिंह तिलकामांझी थाने पहुंचे. वहां से पता चला कि संजय द्वारा दी गई जानकारी सही थी. सच्चाई जानने के बाद एसआई अरविंद कुमार ने रामजी सिंह से रंजना के बारे में पूछा.  वह केवल इतना ही बता सका कि रंजना राज्य स्तर की वौलीबाल खिलाड़ी थी. दोनों का एकदूसरे से परिचय खेल के माध्यम से ही हुआ था. 6 महीने पहले दोनों को पटना सचिवालय में एक साथ देखा गया था.

रामजी सिंह ने इस बारे में बेटे विनोद से पूछा था तो उस ने बताया था कि भागलपुर की रहने वाली वौलीबाल खिलाड़ी रंजना उस की दोस्त है. रामजी सिंह को इस से ज्यादा कुछ पता नहीं था. जो भी जानकारी मिली, उसी के आधार पर एसआई अरविंद कुमार को यह प्रेमप्रसंग का मामला लगा.

विनोद कुमार का मामला रहस्यमय ढंग से उलझ गया था. जब कोई सुराग हाथ नहीं लगा तो दोनों पटना लौट आए. 2 दिनों तक रामजी सिंह पटना में रह कर अपने स्तर से बेटे की तलाश करते रहे. उन्होंने दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों के यहां पता लगाया, लेकिन विनोद का कहीं पता नहीं चला. जब कहीं से भी कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्होंने 13 जनवरी को बेटे की गुमशुदगी थाना सचिवालय में दर्ज करा दी.

गुमशुदगी दर्ज होने के बाद पुलिस की काररवाई में तेजी आई. कई दिनों तक पुलिस विनोद की खोज करती रही. मुखबिर भी लगाए गए, फिर भी विनोद के बारे में कुछ पता नहीं चला. 21 जनवरी, 2017 को पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय तैराक विनोद कुमार सिंह के अपहरण का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ भादंसं की धारा 363, 365 और 34 के तहत दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने विनोद की सुरागरसी में जमीनआसमान एक कर दिया. पूछताछ के लिए उस के कुछ दोस्तों को भी हिरासत में लिया गया, लेकिन इस से भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. स्थानीय अखबारों ने दिव्यांग तैराक विनोद के अपहरण की खबरों को खूब सुर्खियों में उछाला, जिस से पुलिस की खूब छीछालेदर हो रही थी.

शादी का झांसा देने वाला फरजी सीबीआई अधिकारी – भाग 1

12 दिसंबर, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना अशोका गार्डन में काफी भीड़भाड़ थी. धीरेधीरे यह भीड़ बढ़ती जा रही थी. लोग यह जानने के लिए उस भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे थे कि आखिर यहां हो क्या रहा है? लोग उत्सुकता से एकदूसरे का मुंह भी ताक रहे थे कि यहां हो क्या रहा है? उधर से गुजरने वाला हर आदमी बिना ठिठके आगे नहीं बढ़ रहा था.

इस की वजह यह थी कि शायद माजरा उस की समझ में आ जाए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सभी के सभी हक्केबक्के रह गए. एक लड़की, जिस की उम्र 23-24 साल रही होगी, वह एक लड़के का गिरेबान पकड़ कर कह रही थी, ‘‘सर, इस ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. इस ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है.’’

इस के बाद उस लड़की ने थाना पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार उस लड़के ने फरजी आईपीएस अधिकारी बन कर उसे शादी का झांसा दिया था. काफी समय तक वह उस की इज्जत को तारतार करते हुए उस के भरोसे से खेलता रहा. यही नहीं, शादी करने के नाम पर उस ने उस से लाखों रुपए भी लिए थे.

लड़की को जब लड़के की सच्चाई का पता चला तो उस ने फरार होने की कोशिश की, लेकिन लड़की ने घर वालों की मदद से उसे पकड़ लिया और थाने ले आई. हर मांबाप की यही ख्वाहिश होती है कि वह अपनी औलाद को पढ़ालिखा कर इस काबिल बना दे कि वह खूब तरक्की करे.

ऐसी ही ख्वाहिश याकूब मंसूरी की भी थी. वह अपनी बेटी जेबा को गेट की तैयारी करवा रहे थे. जबकि मुसलमानों में आमतौर पर यही माना जाता है कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ालिखा कर उन से नौकरी थोड़ी ही करानी है. लेकिन याकूब मंसूरी की सोच इस के विपरीत थी. वह जेबा को पढ़ालिखा कर कुछ करने के लिए प्रेरित करने के साथसाथ हर तरह से उस की मदद भी कर रहे थे.

जेबा मंसूरी भी अपने वालिद के सपनों को साकार करने में पूरी ईमानदारी से जुटी थी. वह परीक्षा की तैयारी मेहनत से कर रही थी. वह पढ़ने में भी काफी होशियार थी. उसे पूरी उम्मीद थी कि इस साल वह गेट की परीक्षा पास कर लेगी. इस के लिए वह रातदिन मेहनत कर रही थी. लेकिन जो सपने उस ने बुने थे, उस पर समीर खान की नजर लग गई.

मैट्रीमोनियल साइट से हुई दोस्ती

जवान होती लड़की के लिए हर मांबाप की यही ख्वाहिश होती है कि उन की बेटी के लिए किसी भी तरह एक अच्छा सा लड़का मिल जाए. इस के लिए मांबाप लड़के वालों की तमाम तरह की मांगों को पूरी करने की कोशिश भी करते हैं. अच्छे रिश्ते के लिए ही याकूब मंसूरी ने शादी डाटकौम पर बेटी जेबा की प्रोफाइल बनाई थी.

उन्होंने ऐसा बेटी के सुखद भविष्य के लिए किया था. लेकिन हो गया उल्टा. शायद इसीलिए जहां शादी की शहनाई बजनी थी, वहां अब मातम पसरा था. समाज में आज इतना बदलाव आ गया है कि लड़केलड़कियां अपनी पसंद से शादी करने लगे हैं. इस में कोई बुराई भी नहीं है. क्योंकि जब लड़के और लड़की को जीवन भर साथ रहना है तो पसंद भी उन्हीं की होनी चाहिए.

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इसीलिए अब परिचय सम्मेलन आयोजित किए जाने लगे हैं. इस से सब से बड़ा फायदा यह हुआ है कि लड़के के साथ लड़की को भी अपनी पसंद का जीवनसाथी मिल जाता है. चूंकि जमाना हाइटेक हो चुका है, इसलिए अब विवाह के लिए जीवनसाथी तलाशने का काम औनलाइन भी होने लगा है. कई प्लेटफार्म लोगों की शादी के लिए अच्छा जरिया बन गए हैं.

जेबा मंसूरी ने थाना अशोका गार्डन पुलिस को जो तहरीर दी थी, उस के अनुसार शादी के नाम पर उस के साथ धोखा हुआ था. जेबा ने नए साल में अपने लिए तरहतरह के जो अरमान पाले थे, नए साल के कुछ दिनों पहले ही उस के साथ जो हुआ, उस से उस के सारे अरमान एक ही झटके में चकनाचूर हो गए.

उस ने क्या सोचा था और उस के साथ क्या हो गया. शादी के नाम पर उस लड़के ने उस के साथ बहुत भयानक खेल खेला था, जिसे वह चाह कर भी इस जनम में नहीं भुला पाएगी. जेबा ने जो शिकायत दर्ज कराई है, उस के अनुसार उस के शादी के नाम पर धोखा खाने की कहानी कुछ इस प्रकार है—

जेबा प्रतियोगी परीक्षा गेट की तैयारी कर रही थी. जवान होती बेटी की शादी के लिए पिता याकूब मंसूरी ने शादी डाटकौम पर प्रोफाइल बना दी थी. शादी डाटकौम के जरिए शादी के लिए उस की प्रोफाइल पर एक रिक्वेस्ट आई. रिक्वेस्ट में दिए मोबाइल नंबर पर याकूब मंसूरी ने बात की.

इस बातचीत में उस ने अपना नाम समीर खान बताया था. उस ने बताया कि वह चेन्नई में सीबीआई में बतौर अंडरकवर डीएसपी नौकरी करता है. याकूब ने उस के घर वालों से बात करने की इच्छा जाहिर की तो उस ने अपने पिता अनवर खान का नंबर दे दिया. अनवर खान से समीर खान के बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि उन का बेटा समीर सीबीआई में अंडरकवर डीएसपी है. फिलहाल उस की पोस्टिंग चेन्नई में है.

बातचीत के लिए जेबा को ले गया होटल में

इस के बाद समीर ने याकूब मंसूरी से जेबा का मोबाइल नंबर यह कह कर मांग लिया कि वह उस से बात करेगा. अगर वह उसे पसंद आ गई तो वह इस जानपहचान को जल्दी ही शादी जैसे खूबसूरत रिश्ते में बदल देगा. याकूब मंसूरी ने समीर की बातों पर विश्वास कर के उसे जेबा का नंबर दे दिया.

अक्तूबर महीने में एक दिन जेबा के मोबाइल पर समीर ने फोन किया. दोनों में काफी देर तक बातें हुईं. दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने घर परिवार और विचारों के बारे में बताया. समीर ने ऐसी लच्छेदार बातें कीं कि जेबा उस के दिखाए सब्जबाग में फंस गई. इस के बाद अकसर उन की बातें होने लगीं. वाट्सऐप पर भी संदेशों का आदानप्रदान होने लगा.

ऐसे में ही एक दिन समीर ने भोपाल आ कर जेबा से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की, जिसे वह मना नहीं कर सकी. समीर के भोपाल आने की बात पर एक ओर जहां जेबा खुश हो रही थी, वहीं दूसरी ओर अंजाना सा डर भी सता रहा था. क्योंकि किसी से फोन पर बात करना अलग बात होती है और आमनेसामने मिलना अलग.

लेकिन शादी का मामला था, इसलिए जेबा ने मिलना मुनासिब समझा. आखिर वह समीर को लेने भोपाल रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई.  यह 22 नवंबर, 2017 की बात है. दोनों ने एकदूसरे को देखा तो पहली नजर में ही पसंद कर लिया.

बिछड़ा राही प्यार का : समीर के प्यार को क्यों ठुकरा दिया – भाग 1

अभी रात का अंधेरा पूरी तरह छंटा भी नहीं था कि गाजियाबाद शहर की कोतवाली के इसलामपुर  मोहल्ले में स्थित एक मकान से औरतों के जोरजोर से रोने की आवाजों ने आसपड़ोस के लोगों की नींद में खलल पैदा कर दी. जो लोग जल्दी उठ जाते थे, वह और जो अभी रजाइयों में दुबके नींद की आगोश में समाए हुए थे, हड़बड़ा कर अपनेअपने घरों से बाहर निकल आए.

यह रोने की आवाजें नन्हे ठेकेदार के घर से आ रही थीं. नन्हे ठेकेदार के घर में जरूर कोई अनहोनी हुई है, यह सोच कर लोग उस के दरवाजे पर जमा होने लगे. कुछ बुजुर्ग आगे बढ़े और उन्होंने नन्हे ठेकेदार के घर का दरवाजा थपथपा कर जोर से पूछा, ‘‘नन्हे, क्या हो गया है?’’

नन्हे ठेकेदार कुछ ही देर में दरवाजा खोल कर बाहर आया. उस के चेहरे पर आंसुओं की मोटीमोटी लकीरें थीं, जो रेंगती हुई उस के कुरते का अगला भाग भिगो रही थीं.

‘‘क्या हुआ नन्हे?’’ एक बुजुर्ग ने घबराए स्वर में पूछा, ‘‘तुम रो रहे हो…अंदर औरतें भी रोनापीटना कर रही हैं. हुआ क्या है भाई?’’

‘‘मेरी बेटी गुलफ्शा…’’ नन्हे इतना ही कह पाया तो उस की रुलाई फूट पड़ी. वह फफकफफक कर रोने लगा

अड़ोसपड़ोस के लोग अधूरे वाक्य का अर्थ निकालने का प्रयास करते हुए दरवाजे से अंदर घुस गए.

अंदर बरामदे में चारपाई पर 20 वर्षीया गुलफ्शा पीठ के बल पड़ी थी. उस का शरीर बेजान, बेहरकत था. देखने से ही समझ में आ रहा था कि उस की मौत हो चुकी है. चारपाई के पास घर की औरतें बैठीं छाती पीटपीट कर रो रही थीं. सिरहाने की तरफ नन्हे के दोनों बेटे तौहीद और मोहिद गमजदा खड़े थे.

नन्हे ठेकेदार भी अंदर आ गया. वह अभी भी रो रहा था.

‘‘यह सब कैसे और कब हुआ नन्हे?’’ एक व्यक्ति ने जो उम्र में नन्हे से बड़ा था, पूछा. उस के स्वर में हैरानी थी.

‘‘पता नहीं इब्राहिम, हम सब सोए हुए थे. गुलफ्शा भी अपनी अम्मी के कमरे में सो रही थी. वह बाहर बरामदे में कब और कैसे आ गई, उस के साथ क्या घटा, कुछ नहीं मालूम. सुबह मेरी बीवी शमशीदा गुसलखाने में जाने के लिए उठी तो उसे बरामदे की चारपाई पर गुलफ्शा मृत नजर आई. उस ने चीखते हुए मुझे उठाया फिर मेरे बेटों और बहू को. हम ने बाहर गुलफ्शा को चारपाई पर इस हालत में देखा तो सभी रोने लगे.’’ नन्हे ने भर्राई आवाज में बताया.

‘‘क्या गुलफ्शा की तबीयत खराब थी?’’ एक बुजुर्ग ने प्रश्न किया तो तुरंत एक महिला बोल पड़ी, ‘‘कल शाम को तो मैं ने गुलफ्शा को भलीचंगी हालत में देखा था.’’

‘‘हां, शाम को तो यह ठीक थी और खुश भी थी. हम ने इस के लिए एक लड़का देखा है, यह बात इस की अम्मी ने इसे बता दी थी. इसी से बहुत खुश लग रही थी यह. शाम को अपनी सहेली से मिलने चली गई थी.’’ नन्हे ने बताया.

‘‘पुलिस को इत्तिला दी क्या?’’ किसी ने टोका.

‘‘पुलिस का केस थोड़ी है,’’ पास खड़ा तौहीद जल्दी से बोला, ‘‘यह अटैक से मर गई लगता है.’’

‘‘मामला संदिग्ध है तौहीद. पुलिस को तो इत्तिला देनी ही होगी. वही जांचपड़ताल करवाएगी कि भलीचंगी लड़की अचानक क्यों मर गई.’’ इब्राहिम ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘हांहां, इब्राहिम ठीक कह रहे हैं.’’ 2-3 लोगों के स्वर उभरे तो नन्हे ने सिर हिला कर कह दिया, ‘‘जैसा आप लोगों को ठीक लगे.’’

तब तक नन्हे के भाई का लड़का मोहम्मद दाऊद वहां आ गया था. उस ने गुलफ्शा की लाश को देखा. लोगों की बातें सुनीं तो अपना मोबाइल निकाल कर कोतवाली का नंबर मिला दिया.

कुछ देर घंटी बजती रही फिर दूसरी ओर से किसी पुलिस वाले की रौबदार आवाज उस के कानों से टकराई, ‘‘थाना कोतवाली से मैं एसएचओ अमित कुमार खारी बोल रहा हूं. बताइए, कैसे फोन किया आप ने?’’

प्यार में लगी सेंध : शिवम बना हत्यारा – भाग 1

5 अक्तूबर, 2022 को दशहरा पर्व था. कानपुर शहर की कच्ची बस्ती परमपुरवा निवासी 25 वर्षीय शालू भी अपने दोस्तों के साथ रात 12 बजे अरमापुर स्टेट का दशहरा मेला देखने घर से निकला. रात अधिक होने के कारण शालू की बहन नसीमा ने उसे मना किया तो वह बोला, ‘‘आपा, घंटे-2 घंटे में वापस आ जाऊंगा. तुम परेशान न होना.’’

नसीमा की बात को नकार कर शालू चला तो गया, लेकिन नसीमा की चिंता कम नहीं हुई. वह कमरे में पड़ी चारपाई पर लेट तो गई, लेकिन नींद नहीं आई.

रात लगभग एक बजे उस के मोबाइल पर काल आई. उस ने स्क्रीन पर नंबर देखा तो वह उस के भाई शालू का था. उस ने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘आपा, मुझे बचा लो. दोस्त मुझे पीट रहे हैं. इन के इरादे खतरनाक हैं. मेरी जान जा सकती है.’’

इस के बाद काल डिसकनेक्ट हो गई. नसीमा को लगा, जैसे किसी ने शालू से फोन छीन लिया हो.

भाई की जान खतरे में भांप कर नसीमा घबरा गई. उस ने बड़े भाई शेरू को जगाया फिर सारी बात बताई.

नसीमा की बात सुन कर शेरू भी घबरा गया. शेरू को पता था कि उस के भाई शालू के 3 दोस्त शिवम मिश्रा उर्फ बांगरू, अमित पासवान व सनी गुप्ता हैं, जो दर्शनपुरवा व ओमनगर में रहते हैं.

अत: शेरू भाई की तलाश में रात में ही दर्शनपुरवा उस के दोस्तों के घर गया. लेकिन तीनों में से कोई भी घर पर नहीं मिला. शेरू तब वापस घर आ गया. इस के बाद घर वाले रात भर शालू के वापस आने का इंतजार करते रहे.

सुबह होते ही शेरू व उस के घर वालों ने फिर से शालू की तलाश शुरू की. लेकिन जब उस का कुछ भी पता न चला तो शेरू अपनी बहन नसीमा के साथ सुबह 10 बजे थाना जूही जा पहुंचा.

उस समय एसएचओ जितेंद्र सिंह थाने में ही मौजूद थे. शेरू ने उन्हें सारी बात बताई और शालू की गुमशुदगी दर्ज करने का अनुरोध किया.

शालू कोई बच्चा तो था नहीं. वह 25 साल का हट्टाकट्टा युवक था. अत: घर वालों के अनुरोध पर एसएचओ जितेंद्र सिंह ने गुमशुदगी तो दर्ज कर ली, लेकिन उसे खोजने का प्रयास नहीं किया.

लेकिन 11 बजे के लगभग एसएचओ जितेंद्र सिंह को गुरुदेव पैलेस रेलवे क्रौसिंग के पास रेल पटरियों के बीच एक युवक की लाश पाए जाने की सूचना मिली. सूचना थाना रावतपुर से वायरलैस से प्रसारित की गई थी.

इस के बाद एसएचओ ने शालू के भाई शेरू तथा पिता अकमल को थाने बुलवा लिया. फिर उन को साथ ले कर गुरुदेव पैलेस क्रौसिंग पहुंच गए, जहां युवक की लाश पड़ी थी.

उस समय वहां लोगों की भीड़ जुटी थी. रावतपुर के एसएचओ एस.के. सिंह के अलावा पुलिस कमिश्नर वी.पी. जोगदंड तथा डीसीपी (साउथ) प्रमोद कुमार वहां मौजूद थे और शव की शिनाख्त में जुटे थे.

शेरू व अकमल ने जब शव को देखा तो दोनों फफक पड़े. शेरू ने बताया कि शव उस के छोटे भाई शालू का है. अकमल ने भी शव की पहचान अपने बेटे शालू के रूप में की.

शव की शिनाख्त होने के बाद पुलिस अधिकारियों ने शालू के शव को पोस्टमार्टम हेतु लाला लाजपत राय अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद डीसीपी प्रमोद कुमार ने मृतक के भाई शेरू से घटना के संबंध में पूछताछ की.

शेरू ने बताया कि उस के भाई की हत्या उस के दोस्त शिवम मिश्रा उर्फ बांगरू ने अपने साथियों के साथ मिल कर की है. यही लोग शालू को बीती रात आटो में बिठा कर मेला देखने के बहाने अपने साथ ले गए थे.

‘‘तुम्हारे भाई शालू की हत्या उस के दोस्तों ने क्यों की?’’ डीसीपी प्रमोद कुमार ने शेरू से पूछा.

‘‘साहबजी, शिवम और शालू में गहरी दोस्ती थी. एक युवती से प्रेम संबंधों को ले कर दोनों के बीच दरार पड़ गई.’’

अवैध रिश्तों में हुई हत्या का पता चलते ही डीसीपी प्रमोद कुमार ने थाना जूही के एसएचओ जितेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह मामले की गंभीरता से जांच करें और हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करें. यही नहीं, उन्होंने एसीपी (बाबूपुरवा) आलोक सिंह की अगुवाई में एक पुलिस टीम भी गठित कर दी.

टीम ने शेरू के घर के सामने मसजिद की दीवार पर लगे सीसीटीवी कैमरों को खंगाला तो 3 युवक शालू को आटो में बिठाते दिखे. कुछ दूरी पर एक युवती भी मुंह ढंके खड़ी थी. पुलिस टीम ने अंदाजा लगाया कि यह युवती शालू की प्रेमिका होगी.

टीम ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया तो पता चला कि शालू की हत्या सिर में किसी भारी चीज से प्रहार कर की गई थी.

पूरी जानकारी जुटाने के बाद पुलिस टीम ने 7 अक्तूबर, 2022 की रात 12 बजे शिवम मिश्रा उर्फ बांगरू के दर्शनपुरवा (ओम नगर) स्थित घर पर छापा मारा और उसे गिरफ्तार कर लिया.

बांगरू की निशानदेही पर पुलिस टीम ने उस के साथी दर्शनपुरवा निवासी अमित पासवान व सनी गुप्ता के घर दबिश डाल कर उन दोनों को भी गिरफ्तार कर  लिया. तीनों को थाना जूही लाया गया.

ट्रॉली बेग में सिमटा आयुषि का प्यार – भाग 1

मथुरा में यमुना एक्सप्रैसवे पर नोएडा से आगरा की ओर जाने वाली सर्विस रोड पर स्थित है सरकारी कृषि अनुसंधान केंद्र. राया में स्थित इसी अनुसंधान केंद्र की झाडि़यों में एक लाल रंग का ट्रौली बैग पड़ा था. वहां काम कर रहे मजदूरों की नजर उस ट्रौली बैग पर पड़ी. यह क्षेत्र मथुरा जिले के राया थाने के अंतर्गत आता है. मजदूरों ने सोचा कि यह शायद किसी गाड़ी से गिर गया होगा. यह बात 18 नवंबर, 2022 की सुबह 11 बजे की है.

ट्रौली बैग पड़े होने की सूचना एक मजदूर ने राया पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही थाना राया के एसएचओ ओमहरि वाजपेई पुलिस टीम के साथ बताए गए स्थान पर जा पहुंचे. पुलिस ने बैग को झाडि़यों से निकाल कर सड़क किनारे रख दिया. बैग में लौक नहीं लगा था. पुलिस ने जब बैग को खोला तो पुलिस के साथ वहां मौजूद लोग भी हैरान रह गए.

बैग में 20-22 साल की एक युवती की पौलीथिन में लिपटी खून से लथपथ लाश थी. लाश को बैग से बाहर निकाला गया. युवती के पैर मोड़ कर सीने से सटा दिए गए थे. इस के बाद उसे बैग में पैक किया गया था. कहीं खून बाहर न निकले, इस के लिए शव को सफेद रंग की बड़ी पौलीथिन में अच्छी तरहलपेट कर रखा गया था.

पुलिस ने पौलीथिन खोल कर युवती के पैर सीधे किए तो वे आराम से सीधे हो गए. इस से अनुमान लगाया गया कि युवती की हत्या लगभग 12 से 16 घंटे पहले ही की गई थी.

गोरा रंग, लंबे काले बालों वाली वह युवती सलेटी रंग की टीशर्ट और नीले सफेद रंग के फूलपत्ती वाली प्लाजो पहने थी. मृतका की बाईं तरफ छाती और सिर पर गोली के घाव थे. संभवत: उसे गोली मारी गई थी.

युवती के सिर व नाक से भी खून निकला था. उस का गला दबाने की भी आशंका लगाई गई. युवती के हाथ और पैरों में चोट के निशान थे, जो उस के साथ बरती गई बेरहमी की तरफ इशारा कर रहे थे. बैग में युवती की लाश मिलने की जानकारी होते ही पूरे इलाके में हड़कंप मच गया.

लाश का मुआयना करने के बाद एसएचओ ओमहरि वाजपेई ने तुरंत अपने उच्चाधिकारियों को घटना की जानकारी दी. सीओ (महावन) आलोक सिंह, एसपी (देहात) त्रिगुण बिसेन, कार्यवाहक एसएसपी मार्तंड प्रकाश सिंह भी घटनास्थल पर फोरैंसिक टीम के साथ पहुंच गए.

उस समय एसएसपी अभिषेक यादव अवकाश पर थे. एसपी (सिटी) मार्तंड प्रकाश सिंह ही उन का कार्यभार देख रहे थे.

अधिकारियों ने लाश का निरीक्षण किया. युवती के पैर के नाखूनों पर हरे रंग की नेल पौलिश लगी थी. बाएं हाथ पर लाल कलावा और काला धागा बंधा था. बैग में लाल सफेद और बैंगनी रंग की साड़ी भी मिली.

पहने हुए कपड़ों से यह अंदाजा लगाया गया कि युवती मध्यमवर्गीय परिवार की है. फुल साइज के उस ट्रौली बैग का टैग हटा हुआ था, लेकिन एक जगह ्नक्त्रढ्ढस्ञ्जहृष्टक्त्र्नञ्ज लिखा था.

युवती का शव नोएडा की ओर से आने वाली सर्विस रोड पर मिला था. इस से माना जा रहा था कि कार में रख कर बैग को यहां लाया गया होगा. पुलिस ने मौके की काररवाई निपटाने के बाद शव को 72 घंटे के लिए मोर्चरी में रखवा दिया.

वहीं फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल तथा ट्रौली बैग से जरूरी सबूत जुटाए. युवती की शिनाख्त व हत्या के खुलासे के लिए कार्यवाहक एसएसपी ने पुलिस की 4 टीमें लगा दीं.

लव जिहाद का शिकार तो नहीं बनी युवती

ट्रौली बैग में शव मिलने की सूचना पर जुटी भीड़ में शामिल लोग इस बात क ी चर्चा  कर रहे थे कि युवती कहीं लव जिहाद का शिकार तो नहीं हो गई. पढ़ीलिखी और पहनावे से शहरी लग रही युवती के दिल्ली-एनसीआर या आसपास के जिलों की होने की संभावना व्यक्त की जा रही थी.

एक साल पहले भी एक महिला और उस के 2 बेटों की हत्या कर के उन के शव मथुरा क्षेत्र में एक्सप्रैसवे पर फेंके गए थे. शव फेंकने के लिए यमुना एक्सप्रैसवे महफूज बनता जा रहा है. इस बात को ले कर लोग चिंतित हैं.

पुलिस कयास लगा रही थी कि ट्रौली बैग में मिली युवती की हत्या में एक से अधिक लोग शामिल हो सकते हैं. फिलहाल पुलिस का पूरा फोकस युवती की पहचान पर आ कर टिक गया था.

युवती का अपहरण किए जाने की भी पुलिस को आशंका थी. पुलिस का कहना था कि युवती की जिस तरह हत्या करने के बाद ट्रौली बैग में पैक कर उसे हाईवे पर झाडि़यों में फेंका गया, उस से आशंका है कि युवती का अपहरण किया गया हो. इस के बाद उस के साथ कोई गलत काम किया गया हो. कहीं राज खुल न जाए, इस कारण हत्या कर के शव ठिकाने लगा दिया गया है.

युवती के शरीर पर जिस तरीके के कपड़े मिले थे, उस से यह अंदाजा लगाया जा रहा था कि युवती कहीं घर पर थी या उसे किसी होटल में रोका गया था. यह भी संभावना लग रही थी कि वह शायद लिवइन में रह रही हो. पुलिस को आशंका थी कि युवती की हत्या प्रेम प्रसंग में हुई है.

युवती की पहचान के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और जिला अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (डीसीआरबी) से आंकड़े भी इस मकसद से जुटाए गए कि कहीं इस हुलिए से मिलतीजुलती युवती की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. गुमशुदगी में लगी फोटो से मृतका की शक्ल का मिलान भी किया जाने लगा.

24 घंटे बीत जाने के बाद भी पुलिस मृतका की शिनाख्त नहीं करा सकी. तब कार्यवाहक एसएसपी मार्तंड प्रकाश सिंह ने 3 टीमें और बना दीं. नोएडा से ले कर आगरा तक के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज पुलिस टीमों ने खंगालने शुरू किए. युवती का पूरा विवरण फोटो सहित सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया.

पुलिस टीम में एसएचओ ओमहरि वाजपेई, स्वाट टीम प्रभारी अजय कौशल, सर्विलांस प्रभारी विकास कुमार, एसआई हरेंद्र कुमार, बिचपुरी चौकी इंचार्ज विनय कुमार, मांट टोल चौकी इंचार्ज रजत दुबे, संजीव कुमार, राहुल कुमार, गोपाल, राघवेंद्र, आशीष तिवारी, अभिजीत कुमार, सोनू भाटी, रामन चौधरी, सुदेश कुमार, राहुल बालियान शामिल थे.

बुढ़ापे का इश्क : चंपा ने पूरी की मदन की इच्छा

संजय वर्मा का परिवार दिल्ली के हुमायूंपुर में रहता था, लेकिन उस के पिता मदनमोहन वर्मा रिटायरमेंट  के बाद उत्तरपूर्वी दिल्ली के भजनपुरा में अकेले ही रहते थे. पिता और पुत्र अपनीअपनी दुनिया में मस्त थे.

22 जुलाई, 2017 की सुबह भजनपुरा में मदनमोहन के पड़ोस में रहने वाले विजय ने संजय वर्मा को फोन कर के बताया, ‘‘आप के पिता के कमरे का कल सुबह से ताला बंद है. उन के कमरे से तेज बदबू आ रही है.’’

विजय की बात सुन कर संजय वर्मा को पिता की चिंता हुई. उन्होंने उसी समय पिता का नंबर मिलाया, तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला. फोन बंद मिलने पर उन की चिंता और बढ़ गई. इस के बाद वह भजनपुरा के सी ब्लौक स्थित अपने पिता के तीसरी मंजिल स्थित कमरे पर पहुंच गए.

संजय को भी पिता के कमरे से तेज दुर्गंध आती महसूस हुई. उस के मन में तरहतरह की आशंकाएं आने लगीं. कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई, यह सोच कर उस ने अपने मोबाइल फोन से दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को फोन कर के पिता के बंद कमरे से आ रही बदबू की सूचना दे दी. यह क्षेत्र थाना भजनपुरा के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोलरूम से यह सूचना थाना भजनपुरा को प्रेषित कर दी गई.

सूचना पा कर एएसआई हरकेश कुमार हैडकांस्टेबल सतेंदर कुमार को अपने साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. जैसे ही वह भजनपुरा के सी ब्लौक स्थित मकान नंबर 412 की तीसरी मंजिल पर पहुंचे, वहां बालकनी पर कुछ लोगों की भीड़ लगी दिखाई दी. उन्हीं के बीच संजय परेशान हालत में मिला.

एएसआई हरकेश कुमार को अपना परिचय देते हुए संजय ने बताया, ‘‘सर, मैं ने ही पीसीआर को फोन किया था.’’

जिस कमरे से बदबू आ रही थी, उस के बाहर ताला लगा था. इस से उन्होंने सहज ही अनुमान लगा लिया कि जरूर कोई अप्रिय घटना घटी है. इसलिए उन्होंने इस की जानकारी थानाप्रभारी अरुण कुमार को दे दी.

कुछ ही देर में थानाप्रभारी अन्य स्टाफ के साथ वहां आ पहुंचे. कमरे के बाहर लटके ताले की चाबी संजय के पास नहीं थी, इसलिए पुलिस ने ताला तोड़ दिया. दरवाजा खुलते ही दुर्गंध का झोंका आया. पुलिस कमरे में दाखिल हुई तो पूरब दिशा की ओर की दीवार से सटे दीवान के अंदर एक अधेड़ आदमी की सड़ीगली लाश एक कार्टून में बंद मिली.

लाश देख कर संजय रोने लगा, क्योंकि वह लाश उस के पिता मदनमोहन वर्मा की थी. अरुण कुमार ने मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम का काम निपट गया तो पुलिस लाश का निरीक्षण करने लगी. मृतक के सिर के पीछे चोट का गहरा निशान था.

दीवान के बौक्स में और उस के नीचे कमरे के फर्श पर खून फैला था, जो सूख चुका था. इस से अनुमान लगाया कि यह हत्या 2-3 दिन पहले की गई थी. कमरे में मौजूद सारा सामान अपनी जगह मौजूद था. इस से इस बात की पुष्टि हो गई कि हत्यारे का मकसद लूटपाट नहीं था.

हत्या क्यों की गई, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया. इस के बाद थाने आ कर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी राजीव रंजन को सौंपी.

इंसपेक्टर राजीव रंजन ने इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के लिए संभावित सुराग की तलाश में दोबारा घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने मृतक के बेटे संजय वर्मा और वहां रहने वाले पड़ोसियों से काफी देर तक पूछताछ की. पड़ोसी विजय ने बताया कि उन्होंने आखिरी बार मदनमोहन वर्मा को 20 जुलाई की रात साढ़े 10 बजे कमरे के बाहर देखा था.

संजय ने उन्हें बताया था कि उस के पिता शुरू से ही अलग मिजाज के व्यक्ति थे. घर के लोगों में वह ज्यादा रुचि नहीं लेते थे. रिटायरमेंट के बाद बेटे और बहुओं के होते हुए भी वह यहां भजनपुरा में अलग रहते थे. उन की देखभाल करने नौकरानी चंपा आती थी. वह घर की साफसफाई, खाना बनाने के साथ उन के कपड़े भी धोती थी.

नौकरानी चंपा का जिक्र आते ही इंसपेक्टर राजीव रंजन उस में रुचि लेने लगे. उन्होंने विजय को थाने में बुला कर पुन: पूछताछ की. उन्होंने नौकरानी के स्वभाव और उस के मदनमोहन के यहां आने और घर जाने के समय के बारे में पूछा. विजय ने बताया कि चंपा मदनमोहन वर्मा के काफी करीब थी. जिस दिन से उन के दरवाजे के बाहर ताला लगा था, पिछली रात को नौकरानी चंपा के जवान बेटे प्रेमनाथ को एक अन्य लड़के के साथ मकान के नीचे टहलते देखा था.

इंसपेक्टर राजीव रंजन विजय से चंपा का पता हासिल कर वह करावलनगर स्थित उस के घर पहुंच गए. चंपा और उस का पति कल्लन घर पर ही मिल गए.

इंसपेक्टर राजीव रंजन ने चंपा से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘कल सुबह मदनमोहन वर्मा के यहां काम करने गई थी, लेकिन कमरे का दरवाजा बंद होने के कारण लौट आई थी.’’

उस वक्त चंपा का बेटा प्रेमनाथ घर पर मौजूद नहीं था. राजीव रंजन चंपा से उस के बेटे का मोबाइल नंबर ले कर थाने आ गए.

अगले दिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि मदनमोहन का पहले गला घोंटा गया था, उस के बाद में सिर पर घातक चोट पहुंचाई गई थी. इस से इंसपेक्टर राजीव रंजन सोचने लगे कि ऐसी क्रूर हरकत तो कोई दुश्मन ही कर सकता है. यह दुश्मन कौन हो सकता है?

जांच में पुलिस को पता चला था कि सरकारी नौकरी के रिटायर होने के बाद का सारा पैसा मदनमोहन के बैंक एकाउंट में जमा था. वह किसी से पैसा न तो उधार लेते थे और न ही किसी को देते थे. और तो और, बेटों को भी उन्होंने उस में से कोई रकम नहीं दी थी.

राजीव रंजन ने चंपा के बेटे प्रेमनाथ का नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. इस से उन्हें उस पर शक हुआ. उस का नंबर सर्विलांस पर लगाने और काल डिटेल्स रिपोर्ट निकलवाने पर पता चला कि घटना वाली रात उस के फोन की लोकेशन उसी इलाके की थी, जहां मदनमोहन वर्मा रहते थे.

फिलहाल उस की लोकेशन उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर की थी. प्रेमनाथ के बारे में गुप्तरूप से पता किया गया तो जानकारी मिली कि वह नशेड़ी होने के साथसाथ एक बार जेल भी जा चुका था. भजनपुरा थाने की एक पुलिस टीम प्रेमनाथ की तलाश में मथुरा भेजी गई. पुलिस टीम मथुरा पहुंची तो खबर मिली कि प्रेमनाथ दिल्ली चला गया है. पुलिस ने 24 जुलाई को मुखबिर की सूचना पर प्रेमनाथ को करावलनगर, दिल्ली के कजरी चौक से हिरासत में ले लिया.

थाने में जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने एक दोस्त के साथ मिल कर मदनमोहन वर्मा की हत्या की थी. उस ने हत्या की जो वजह बताई, वह इस प्रकार थी—

मदनमोहन वर्मा सपरिवार दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव के पास हुमायूंपुर में रहते थे. उन का भरापूरा परिवार था. उन के परिवार में पत्नी यशोधरा के अलावा 3 बेटे और एक बेटी थी. बड़ा बेटा संजय वर्मा है, जो दिल्ली की एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करता है.

मदनमोहन वर्मा मिंटो रोड स्थित गवर्नमेंट प्रैस में नौकरी करते थे. अच्छे पद पर होने की वजह से उन के घर की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. घर में सब कुछ होने के बावजूद वह परिवार के सदस्यों में कम रुचि लेते थे. पत्नी यशोधरा से भी उन का रिश्ता बहुत अच्छा नहीं था. दांपत्य जीवन में पति की बेरुखी यशोधरा को हमेशा परेशान करती रही.

वह चाहती थीं कि पति घरपरिवार की जरूरतों को समझें. बेटों के सुखदुख के मौके पर उन का साथ दें. पर उन की यह ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो सकी. आखिरकार पति की बेजा हरकतों और दांपत्य जीवन की कड़वाहट से तंग आ कर 4 साल पहले उन्होंने अपने कमरे में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली.

उन की मौत के बाद मदनमोहन वर्मा ने घरेलू कामकाज के लिए नौकरानी चंपा को 9 हजार रुपए वेतन पर रख लिया. गोरे रंग और भरे बदन की चंपा की उम्र करीब 35 साल थी. वह सुबह 9 बजे उन के घर आती और सारा काम निपटा कर शाम को अपने घर चली जाती.

चंपा के काम से घर के सारे सदस्य संतुष्ट थे. कभीकभार चंपा को रुपएपैसों की जरूरत होती तो मनमोहन उस की मदद कर देते थे. बाद में वह चंपा पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गए. वह उस से कुछ ज्यादा ही हमदर्दी जताने लगे. चंपा भी अपने मालिक के दयालु स्वभाव से खुश थी.

जिस दिन मदनमोहन औफिस से जल्दी घर आ जाते या उन की छुट्टी होती तो चंपा बहुत खुश रहती. वह पूरे दिन उन के आसपास ही मंडराती रहती. घर के सदस्यों को चंपा की ये हरकतें नागवार गुजरने लगीं. संजय ने चंपा से साफ कह दिया कि वह पापा के कमरे में ज्यादा न जाया करे.

चंपा को नौकरी करनी थी, इसलिए उस ने संजय की बात मानते हुए उन के कमरे में आनाजाना कम कर दिया. मदनमोहन को इस बात का पता नहीं था कि चंपा को उन के  कमरे में आने के लिए रोक दिया गया है.

जब मदनमोहन को महसूस हुआ कि चंपा उन से दूर रहने लगी है तो एक दिन उन्होंने उस से पूछ लिया. तब चंपा ने बताया, ‘‘आप के बेटे और बहुओं की नाराजगी की वजह से मैं ने यह दूरी बनाई है.’’

चंपा की बात सुन कर मदनमोहन वर्मा को अपने परिवार वालों पर गुस्सा बहुत आया. वह अपने घर वालों के प्रति और कठोर हो गए. करीब 1 साल पहले जब वह रिटायर हुए तो उन्होंने घर में यह कह कर सब को चौंका दिया कि अब वह उन लोगों से अलग भजनपुरा में अकेले ही रहेंगे.

उन्होंने भजनपुरा में किराए पर कमरा ले भी लिया. रिटायरमेंट के बाद उन्हें करीब 20 लाख रुपए मिले थे. इस में से उन्होंने अपने बेटों को कुछ भी नहीं दिया, जबकि तीनों बेटों और बहुओं को उम्मीद थी कि ससुर के रिटायरमेंट के बाद जो पैसे मिलेंगे, उस में से कुछ उन्हें भी मिलेंगे.

मदनमोहन का तुगलकी फैसला सुन कर बेटों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, पर उन के दिमाग में तो कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. दरअसल, उन के दिमाग में चंपा का यौवन मचल रहा था. अब वह अपनी बाकी की जिंदगी चंपा के साथ गुजारना चाहते थे. चंपा की खातिर उन्होंने खून के सभी रिश्तेनातों को दूर कर दिया.

इस उम्र में मदनमोहन के इस फैसले से उन के बेटों की कितनी बदनामी होगी, इस बात की भी उन्हें परवाह नहीं थी. उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी और बेटों का साथ छोड़ कर भजनपुरा के सी-ब्लौक में कमरा ले कर अकेले रहने लगे.

चंपा भजनपुरा के पास स्थित करावलनगर में रहती थी. उस के परिवार में पति कल्लन के अलावा बेटे भी थे. मूलरूप से मथुरा का रहने वाला कल्लन कामचोर प्रवृत्ति का था. हरामखोर कल्लन बीवी की कमाई पर ऐश कर रहा था. जब कभी उसे पैसों की जरूरत होती, वह चंपा को ही मालिक से कर्ज मांगने के लिए उकसाता था.

अब चंपा रोज सुबह मदनमोहन के भजनपुरा स्थित कमरे पर आती और सारा दिन वहां का काम निपटा कर शाम को घर जाती थी. कुछ दिनों तक तो ऐसे ही चला, पर जब वह रात में भी वह मदनमोहन के कमरे में रुकने लगी तो आसपड़ोस के लोगों के बीच उन के रिश्तों को ले कर तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं.

कुछ लोगों ने उस के पति कल्लन को भी उस की हरकतों की जानकारी दी, पर कल्लन को तो पहले से ही सब कुछ पता था. इसलिए उस ने लोगों की बातों को अनसुना कर दिया. इस तरह चंपा और मदनमोहन मौजमस्ती करते रहे.

धीरेधीरे चंपा के पड़ोसियों को भी पता चल गया कि चंपा ने किसी बुड्ढे को फांस लिया है. इस के बाद चंपा और मदनमोहन की चर्चा चंपा के मोहल्ले में होने लगी. चंपा का बेटा प्रेमनाथ 21 साल का हो चुका था. वह अब कोई बच्चा नहीं था, जो मोहल्ले के लोगों की बातों को न समझता.

कोईकोई तो उसे यह तक कह देता कि तेरे 2-2 बाप हैं. प्रेमनाथ कुछ करताधरता नहीं था. साथियों के साथ गांजा और कई अन्य नशे करता था. वह अपनी मां के मदनमोहन वर्मा की रखैल होने के ताने सुनसुन कर परेशान रहने लगा था. धीरेधीरे बात बरदाश्त से बाहर होती जा रही थी.

एक दिन तो एक दोस्त ने उस पर तंज कसते हुए कहा, ‘‘अरे तुझे कामधंधे की क्या चिंता है, तेरे तो 2-2 बाप हैं. तुझे भला किस बात की कमी है?’’

दोस्त की यह बात प्रेमनाथ के कलेजे में नश्तर की तरह चुभी. जवानी का खून उबाल मारने लगा. उस ने अपने एक नाबालिग दोस्त सुमित (बदला हुआ नाम) को अपना सारा दर्द बताते हुए कहा, ‘‘सारे फसाद की जड़ बुड्ढा मदनमोहन वर्मा है. उसी के कारण लोग मुझे ताना देते हैं. अगर तुम मेरा साथ दो तो मैं आज ही उसे ठिकाने लगा दूं.

इस उम्र की दोस्ती बड़ी खतरनाक होती है. दोस्त का दुख अपना दुख होता है. प्रेमनाथ की बात सुन कर सुमित उस का साथ देने को तैयार हो गया. 20 जुलाई, 2017 की रात दोनों दोस्त पूर्व नियोजित योजना के अनुसार, मदनमोहन के घर के आसपास तब तक चक्कर लगाते रहे जब तक कि वहां लोगों की लाइटें बंद नहीं हो गईं.

सड़क से मदनमोहन का कमरा साफ दिखाई देता था. जब मदनमोहन के पड़ोसी कमरा बंद कर के सोने चले गए तो दोनों नशा कर के सीढि़यों से तीसरी मंजिल स्थित मदनमोहन के कमरे के सामने पहुंच गए. उस रात अत्याधिक गरमी होने के कारण मदनमोहन ने कमरे का दरवाजा खोल दिया था. वह सोने की तैयारी में थे.

वह प्रेमनाथ को जानते थे, क्योंकि 2-3 बार वह मां के साथ उन के कमरे पर आ चुका था. इतनी रात को प्रेमनाथ को अपने कमरे के बाहर देख कर मदनमोहन कांप उठे. हिम्मत जुटा कर उन्होंने उसे बाहर जाने के लिए को कहा. लेकिन प्रेमनाथ और सुमित ने 61 साल के मदनमोहन वर्मा को संभलने का मौका दिए बगैर साथ लाया अंगौछा उस की गरदन में लपेट कर दोनों ने पूरी ताकत से कस दिया.

मदनमोहन ने बचने के लिए हाथपांव मारे, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. कुछ ही देर में उन की मौत हो गई. वह जीवित न बच जाएं, इसलिए प्रेमनाथ ने वहां पड़ा डंडा उठा कर उन के सिर पर मारा, जिस से सिर से खून बहने लगा.

इतना करने के बाद उन्होंने लाश को कमरे में रखे एक कार्टून में बंद कर के उसे दीवान के बौक्स में रख दिया और बाहर आ गए. प्रेमनाथ ने दरवाजे में ताला लगाया और नीचे उतर कर दोनों फरार हो गए.

अतिरिक्त थानाप्रभारी राजीव रंजन ने पूछताछ के बाद प्रेमनाथ को 25 जुलाई को अदालत में पेश कर एक दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस से वह अंगौछा भी बरामद कर लिया गया, जिस से मदनमोहन वर्मा का गला घोंटा गया था. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अगले दिन पुलिस ने उस के साथी सुमित को भी गिरफ्तार कर उसे बाल न्यायालय में पेश कर उसे बाल सुधार गृह भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित