दुलारी की साजिश : प्रियंका बनी हत्यारी – भाग 3

उन के रिश्ते के मामा राधा उरांव राजनीति के पुराने खिलाड़ी थे. राजनीति का ककहरा अनिल ने उसी मामा से सीखा और किस्मत आजमाने रामविलास पासवान के पास पहुंच गए. उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ अनिल के सिर पर रख दिया और उन्हें आदिवासी प्रकोष्ठ का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया.

खद्दर का सफेद कुरता पायजामा पहन कर अनिल उरांव ताकतवर हो गए थे. यह घटना से 7 साल पहले की बात है.

अमीरों की तरह ठाठबाट थे प्रियंका के अनिल के पास अब पैसों के साथ साथ सत्ता की पावर थी और बड़ेबड़े माननीयों के बीच में उठनाबैठना भी. पहली बार अनिल ने सत्ता के गलियारे का मीठा स्वाद चखा था. माननीयों के सामने जब नौकरशाह सैल्यूट मारते थे, यह देख कर अनिल का दिल बागबाग हो जाता था.

यहीं से प्रियंका उर्फ दुलारी नाम की महिला अनिल उरांव की किस्मत में दुर्भाग्य की कुंडली मार कर बैठ गई थी. तब कोई नहीं जानता था कि यही प्रियंका एक दिन नागिन बन कर अनिल को डस लेगी.

36 वर्षीया प्रियंका हाट थानाक्षेत्र में स्थित केसी नगर कालोनी में दूसरे पति राजा के साथ रहती थी. पहला पति उसे बहुत पहले तलाक दे चुका था. उस के कोई संतान नहीं थी लेकिन दोनों बड़े ठाठबाट से रहते थे, अमीरों की तरह.

कई कमरों वाले उस के शानदार और आलीशान मकान में सुखसुविधाओं की सारी चीजें मौजूद थीं. घर में कमाने वाला सिर्फ उस का पति था. एक आदमी की कमाई में ऐसी शानोशौकत देख कर मोहल्ले वाले दंग रहते थे.

प्रियंका की शानोशौकत देख कर मोहल्ले वालों का दंग रहना जायज था. उस का पति राजा पूर्णिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राजनाथ यादव का एक मामूली सा कार ड्राइवर था. उस की इतनी आमदनी भी नहीं थी कि वह घर खर्च के अलावा नवाबों जैसी जिंदगी जिए. ये ऐशोआराम तो प्रियंका की खूबसूरती की देन थी.

गोरीचिट्टी और तीखे नयननक्श वाली प्रियंका की मोहल्ले में बदनाम औरतों में गिनती होती थी. शहर के बड़ेबड़े धन्नासेठों, भूमाफियाओं और नेताओं का उस के घर पर उठनाबैठना था. उस में लोजपा का युवा नेता अनिल उरांव का नाम भी शामिल था.

शादीशुदा होते हुए भी अनिल उरांव प्रियंका की गोरी चमड़ी के इस कदर दीवाने हुए कि उसे देखे बिना रह नहीं पाते थे. लेकिन प्रियंका उन से तनिक भी प्यार नहीं करती थी. वह तो केवल उन की दौलत से प्यार करती थी. वह जानती थी कि अनिल एक एटीएम मशीन है. बस, उस से दौलत निकालते जाओ, निकालते जाओ और ऐश करते जाओ.

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प्रियंका ने बनाई योजना

अनिल उरांव जिस प्रियंका के प्यार में दीवाने थे, पूर्णिया का शूटर अंकित यादव उर्फ अनंत भी उसी प्रियंका को बेपनाह चाहता था. अनिल का उस की प्रेमिका प्रियंका की ओर आकर्षित होना, अंकित के सीने पर सांप लोटने जैसा था.

उस ने प्रियंका से कह दिया था ‘‘तू अपने आशिक से कह देना कि मेरी चीज पर नजर न डाले, वरना जिस दिन मेरा भेजा गरम हो गया तो उस की खोपड़ी में रिवौल्वर की सारी गोलियां डाल दूंगा.’’

फिर उस ने अपने प्रेमी अंकित को समझाया, ‘‘देखो अंकित, तुम ठहरे गरम खून के इंसान. जब देखो गोली, कट्टा और बंदूक की बातें करते हो, कभी ठंडे दिमाग से काम नहीं लेते. जिस दिन से ठंडे दिमाग से सोचना शुरू कर दोगे, उस दिन बिना गोली, कट्टे के सारे काम बन जाएंगे. क्यों बेवजह परेशान हो कर अपना ब्लड प्रैशर बढ़ाते हो. मैं क्या कहती हूं, उसे ध्यान से सुनो. मेरे पास एक नायाब तरीका है. जिस से सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

‘‘बता क्या कहना चाहती है तू.’’ अंकित ने पूछा.

‘‘यही कि अनिल उरांव का अपहरण कर लेते हैं और बदले में उस के घर वालों से फिरौती की एवज में मोटी रकम ऐंठ लेते हैं. नेताजी की जान के बदले उस के घर वालों के लिए 10-20 लाख देना कोई बहुत बड़ी बात

नहीं होगी. बोलो क्या कहते हो?’’ प्रियंका ने प्लान बनाया.

‘‘ठीक है जो करना हो, जल्दी करना. उस गैंडे को तेरे नजदीक देख कर मेरे तनबदन में आग सी लग जाती है, कहीं ऐसा न हो कि मैं अपना आपा खो दूं और तू भी स्वाहा हो जाए. जो करना है, जल्दी करना, समझी.’’ अंकित बोला.

‘‘ठीक है, बाबा ठीक है. क्यों बिना मतलब के अपना खून जलाते हो. समझो कि काम हो गया और तुम्हारी राह का कांटा भी हट गया.’’ प्रियंका ने कहा.

प्रियंका और अंकित ने मिल कर अनिल के अपहरण की योजना बना ली. योजना के मुताबिक, 29 अप्रैल, 2021 की सुबह प्रियंका ने अनिल उरांव को फोन कर के अपने घर आने को कहा. अनिल भतीजे राजन को साथ ले कर मोटरसाइकिल से निकले और बीच रास्ते में खुद मोटरसाइकिल से नीचे उतर कर कहा प्रियंका के यहां जा रहा हूं. जब फोन करूं तो बाइक ले कर चले आना.

फिरौती ले कर बदल गई नीयत

अनिल प्रियंका के यहां पहुंचे तो उस के घर पर पहले से शूटर अंकित यादव उर्फ अनंत, उस का भांजा मिट्ठू कुमार यादव उर्फ मिट्ठू, मोहम्मद सादिक उर्फ राहुल और चुनमुन झा उर्फ बटेसर मौजूद थे.

अंकित को देख कर अनिल घबरा गए और वापस लौटने लगे तो चारों ने लपक कर उन्हें पकड़ लिया. अनिल ने बदमाशों के चंगुल से बचने के लिए खूब संघर्ष किया. कब्जे में लेने के लिए बदमाशों ने अनिल को लातघूंसों से खूब मारा और कपड़े वाली मोटी रस्सी से उन के हाथपैर बांध कर उन्हें कमरे में बंद कर दिया और उन का फोन भी अपने कब्जे में ले लिया ताकि वह किसी से बात न कर सकें.

फिर उन्हीं के फोन से अंकित ने अनिल के घर वालों को फोन कर के अपहरण होने की जानकारी देते हुए फिरौती के 10 लाख रुपए की मांग की. उस के बाद मोबाइल फोन से सिम निकाल कर तोड़ कर फेंक दिया ताकि पुलिस उन तक पहुंच न पाए.

30 अप्रैल, 2021 को फिरौती की रकम मिलने के बाद बदमाशों की नीयत बदल गई. चारों ने प्रियंका के घर पर ही अनिल की गला दबा कर हत्या कर दी और पेचकस जैसे नुकीले हथियार से अंकित ने अनिल की दोनों आंखें फोड़ दीं.

फिर उसी रात अनिल की लाश के. नगर थाने के डंगराहा के एक खेत में गड्ढा खोद कर दफना दी. जल्दबाजी में लाश दफन करते समय मृतक का एक हाथ बाहर निकला रह गया और वे कानून के शिकंजे में फंस गए.

कथा लिखे जाने तक फरार चल रहा मुख्य आरोपी अंकित यादव उर्फ अनंत और उस का भांजा मिट्ठू कुमार यादव दोनों दरभंगा जिले से नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिए गए थे. दोनों आरोपियों ने लोजपा नेता अनिल उरांव के अपहरण और हत्या  करने का जुर्म स्वीकार लिया था.

जांचपड़ताल में प्रियंका के असम में करोड़ों रुपए संपत्ति का पता चला है, जो अपराध से कमाई गई थी. पुलिस ने संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.

कथा लिखे जाने तक पुलिस पांचों आरोपियों प्रियंका उर्फ दुलारी, अंकित यादव, मिट्ठू कुमार यादव, मोहम्मद सादिक और चुनमुन झा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. पांचों आरोपी जेल की सलाखों के पीछे अपने किए की सजा भुगत रहे थे.

दुलारी की साजिश : प्रियंका बनी हत्यारी – भाग 2

‘‘तुम बहुत समझदार हो. बहुत जल्द मेरी बात समझ गई. रुपए का इंतजाम कर के रखना, जल्द ही फोन कर के बताऊंगा कि पैसे कब और कहां पहुंचाने हैं.’’ इस के बाद दूसरी ओर से फोन कट गया.

स्क्रीन पर जिस नंबर को देख कर पिंकी की आंखों में चमक जागी थी, वह नंबर उस के पति का था. बदमाशों ने अनिल के फोन से काल कर के फिरौती की रकम मांगी थी. ताकि पुलिस उन तक पहुंच न सके.

खैर, पति के अपहरण की जानकारी पिंकी ने जैसे ही घर वालों को दी, उस की बातें सुन कर सभी स्तब्ध रह गए. किंतु उन्हें इस बात से थोड़ी तसल्ली हुई थी कि अनिल जिंदा हैं और बदमाशों के कब्जे में हैं. अगर उन्हें फिरौती की रकम दे दी जाए तो उन की सहीसलामत वापसी हो सकती है.

अनिल उरांव की मिली लाश

बदमाशों की धमकी सुन कर पिंकी और उस की ससुराल वालों ने पुलिस को बिना कुछ बताए 10 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया और शाम होतेहोते बदमाशों के बताए अड्डे पर फिरौती के 10 लाख रुपए पहुंचा दिए गए.

बदमाशों ने रुपए लेने के बाद देर रात तक अनिल को छोड़ देने का भरोसा दिया था. पूरी रात बीत गई, लेकिन अनिल उरांव लौट कर घर नहीं पहुंचे तो घर वाले परेशान हो गए.

अनिल उरांव के फोन पर घर वालों ने काल की तो वह बंद आ रहा था. जिन दूसरे नंबरों से बदमाशों ने 3 बार काल की थी, वे नंबर भी बंद आ रहे थे. इस का मतलब साफ था कि फिरौती की रकम वसूलने के बाद भी बदमाशों ने अनिल उरांव को छोड़ा नहीं था. बदमाशों ने उन के साथ गद्दारी की थी. यह सोच कर घर वाले परेशान थे.

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बात 2 मई, 2021 की सुबह की है. के. नगर थाने के झुन्नी इस्तबरार के डंगराहा गांव की महिलाएं सुबहसुबह गांव के बाहर खेतों में आई थीं. तभी उन्होंने खेत में जो दृश्य देखा, वह दंग रह गईं. किसी आदमी का एक हाथ जमीन के बाहर झांक रहा था. जमीन के बाहर हाथ देख कर महिलाएं उलटे पांव गांव की ओर भागीं और गांव पहुंच कर पूरी बात गांव के लोगों को बताई.

खेत में लाश गड़ी होने की सूचना मिलते ही गांव वाले मौके पर पहुंच गए और इस की सूचना के. नगर थाने को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी डंगराहा पहुंच गए और गड्ढे से लाश बाहर निकलवाई. शव का निरीक्षण करने पर पता चला कि हत्यारों ने मृतक के साथ मानवता की सारी हदें पार कर दी थीं. उन्होंने किसी नुकीली चीज से मृतक की दोनों आंखें फोड़ दी थीं और शरीर पर चोट के कई जगह निशान थे.

डंगराहा में एक अज्ञात शव मिलने की सूचना जैसे ही अनिल के घर वालों को मिली, वे भी मौके पर जा पहुंचे थे. उन्होंने लाश देखते ही पहचान ली. घर वाले चीखचीख कर प्रियंका उर्फ दुलारी के ऊपर हत्या का आरोप लगा रहे थे.

लोजपा नेता की लाश मिलते ही क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी. घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था. अपहर्त्ताओं ने धोखा किया था. रुपए लेने के बाद भी उन्होंने हत्या कर दी थी.

जैसे ही नेताजी की हत्या की सूचना लोजपा कार्यकर्ताओं को मिली, वे उग्र हो गए और शहर के हर खास चौराहों को जाम कर आग के हवाले झोंक दिया तथा पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. इधर पुलिस ने लाश अपने कब्जे में ले कर वह पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी और आगे की काररवाई में जुट गए.

पुलिस ने मृतक के घर वालों के बयान के आधार पर उसी दिन दोपहर के समय मृतक की प्रेमिका प्रियंका उर्फ दुलारी को उस के घर से हिरासत में ले लिया और पूछताछ के लिए के. हाट थाने ले आई. प्रियंका ने पहले तो पुलिस को खूब इधरउधर घुमाया, किंतु जब उस की दाल नहीं गली तो उस ने पुलिस के सामने अपने घुटने टेक दिए.

प्रेमिका प्रियंका ने उगला हत्या का राज

अपना जुर्म कबूल करते हुए प्रियंका ने कहा, ‘‘इस कांड को अंजाम देने में मैं अकेली नहीं थी. 4 और लोग शामिल थे. घटना का मास्टरमांइड अंकित यादव है और उसी ने योजना के तहत इस घटना को अंजाम दिया था.’’

प्रियंका के बयान के बाद उस की निशानदेही पर पुलिस ने 2 बदमाशों मोहम्मद सादिक उर्फ राहुल और चुनमुन झा उर्फ बटेसर को धर दबोचा और थाने ले आई. घटना का मास्टरमाइंड अंकित यादव और उस का भांजा मिट्ठू कुमार यादव उर्फ मिट्ठू फरार थे.

आरोपी मोहम्मद सादिक और चुनमुन झा ने भी अपने जुर्म कबूल कर लिए थे. पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के स्थान पर उपर्युक्त सभी को नामजद करते हुए भादंवि की धारा 302, 120बी, 364ए और एससी/एसटी ऐक्ट भी लगाया.

पुलिस ने गिरफ्तार तीनों आरोपियों प्रियंका उर्फ दुलारी, मोहम्मद सादिक उर्फ राहुल और चुनमुन झा उर्फ बटेसर को अदालत में पेश कर उन्हें जेल भेज दिया और फरार आरोपियों अंकित यादव और मिट्ठू कुमार यादव की तलाश में सरगर्मी से जुट गई थी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में आरोपितों के बयान के आधार पर कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

35 वर्षीय अनिल उरांव मूलरूप से बिहार के पूर्णिया जिले के के. हाट थाना क्षेत्र स्थित जेपी नगर के रहने वाले थे. पिता जयप्रकाश उरांव के 2 बच्चे थे. बड़ी बेटी सीमा और छोटा बेटा अनिल. जयप्रकाश एक रिहायशी एस्टेट के मालिक थे.

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विरासत में मिली अरबों की संपत्ति

पुरखों की जमींदारी थी. उन्हें अरबों रुपए की यह चलअचल संपत्ति विरासत में मिली थी. आगे चल कर यही संपत्ति उन के बेटे अनिल उरांव के नाम हो गई थी. क्योंकि पिता के बाद वही इस संपत्ति का इकलौता वारिस था.

जयप्रकाश एक बड़ी प्रौपर्टी के मालिक थे. उन का समाज में बड़ा नाम था. उन के घर से कोई गरीब दुखिया कभी खाली हाथ नहीं जाता था. गरीब तबके की बेटियों की शादियों में वह दिल खोल कर दान करते थे.

गरीबों की दुआओं का असर था कि कभी घर में धन की कमी नहीं हुई. अगर यह कहें कि लक्ष्मी घर के कोनेकोने में वास करती थी तो गलत नहीं होगा.

यही नहीं, उन्होंने अपनी बिरादरी के लिए बहुत कुछ किया था, इसलिए लोग उन का सम्मान करते थे. बाद के दिनों में जब जयप्रकाश का स्वर्गवास हुआ तो उन्हीं के नाम पर उस कालोनी का नाम जेपी नगर रख दिया गया था.

बहरहाल, अनिल को यह संपत्ति विरासत में मिली थी, इसलिए उस की कीमत वह नहीं समझ रहे थे. पुरखों की यह दौलत अपने दोनों हाथों से यारदोस्तों पर पानी की तरह बहाने में जरा भी नहीं हिचकिचाते थे.

समय के साथ अनिल की पिंकी के साथ शादी हो गई. गृहस्थी बसते ही वह 2 बच्चों प्रांजल और मोनू के पिता बने. अनिल की जिंदगी मजे से कट रही थी. खाने को अच्छा भोजन था, पहनने के लिए महंगे कपड़े थे और सिर ढकने के लिए शानदार और आलीशान मकान था.

कहते हैं, जब इंसान के पास बिना मेहनत किए दौलत आ जाए तो उस के पांव दलदल की ओर बढ़ने में देरी नहीं लगती है. अनिल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

जमींदार घर का वारिस तो थे ही वह. अरबों की अचल संपत्ति तो थी ही उन के पास. धीरेधीरे उन्होंने उन जमीनों को बेचना शुरू किया. बेशकीमती जमीनों के सौदों से उन के पास रुपए आते रहे. जब उन के पास रुपए आए तो राजनीति की चकाचौंध से आंखें चौधियां गई थीं.

दुलारी की साजिश : प्रियंका बनी हत्यारी – भाग 1

लोक जनशक्ति पार्टी के आदिवासी प्रकोष्ठ के युवा प्रदेश अध्यक्ष 35 वर्षीय अनिल उरांव रोजाना की तरह उस दिन भी नाश्ता कर के क्षेत्र में भ्रमण के लिए तैयार हो कर ड्राइंगरूम में बैठे अपने भतीजे के आने का इंतजार कर रहे थे. तभी उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. अपनी शर्ट की जेब से मोबाइल निकाल कर डिसप्ले पर उभर रहे नंबर पर नजर डाली तो वह नंबर जानापहचाना निकला.

स्क्रीन पर डिसप्ले हो रहे नंबर को देख कर अनिल उरांव का चेहरा खुशियों से खिल उठा था. उन्होंने काल रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हैलो!’’

‘‘नेताजी, प्रणाम.’’ दूसरी ओर से एक महिला की मीठी सी आवाज अनिल उरांव के कानों से टकराई.

‘‘प्रणाम…प्रणाम.’’ उन्होंने जबाव दिया, ‘‘कैसी हो प्रियंकाजी?’’ उस महिला का नाम प्रियंका उर्फ दुलारी था.

‘‘ठीक हूं, नेताजी.’’ प्रियंका जबाव देते हुए बोली, ‘‘मैं क्या कह रही थी कि जनता की खैरियत पूछने जब क्षेत्र में निकलिएगा तो मेरे गरीबखाने पर जरूर पधारिएगा. मैं आप की राह तकूंगी.’’

‘‘सुबह….सुबह क्यों मेरी टांग खींच रही हैं प्रियंकाजी. कोई और नहीं मिला था क्या आप को टांग खींचने के लिए? आलीशान और शानदार महल कब से गरीबखाना बन गया?’’ अनिल ने कहा.

‘‘क्या नेताजी? क्यों मजाक उड़ा रहे हैं इस नाचीज का. काहे का शानदार महल. सिर ढंकने के लिए ईंटों की छत ही तो है. बहुत मजाक करते हैं आप मुझ से. अच्छा, अब मजाक छोडि़ए और सीरियस हो जाइए. ये बताइए कि दोपहर तक आ रहे हैं न मेरी कुटिया में, मुझ से मिलने. कुछ जरूरी मशविरा करना है आप से.’’ वह बोली.

‘‘ऐसा कभी हुआ है प्रियंकाजी कि आप बुलाएं और हम न आएं. फिर जब आप इतना प्रेशर मुझ पर बना ही रही हैं तो भला मैं कैसे कह दूं कि मैं आप की कुटिया पर नहीं पधारूंगा, मैं जरूर आऊंगा. मुझे तो सरकार के दरबार में हाजिरी लगानी ही होगी.’’

नेता अनिल उरांव की दिलचस्प बातें सुन कर प्रियंका खिलखिला कर हंस पड़ी तो वह भी अपनी हंसी रोक नहीं पाए और ठहाका मार कर हंसने लगे. उस के बाद दोनों के बीच कुछ देर तक हंसीमजाक होती रही. फिर प्रियंका ने अपनी ओर से फोन डिसकनेक्ट कर दिया तो अनिल उरांव ने भी मोबाइल वापस अपनी जेब के हवाले किया.

फिर भतीजे राजन के साथ मोटरसाइकिल पर सवार हो कर वह मनिहारी क्षेत्र की ओर निकल पड़े. वह खुद मोटरसाइकिल चला रहे थे और भतीजा पीछे बैठा था. यह 29 अप्रैल, 2021 की सुबह साढ़े 10 बजे की बात है.

अनिल उरांव को क्षेत्र भ्रमण में निकले तकरीबन 10 घंटे बीत चुके थे. वह अभी तक घर वापस नहीं लौटे थे और न ही उन का फोन ही लग रहा था. घर वालों ने साथ गए जब भतीजे से पूछा कि दोनों बाहर साथ निकले थे तो तुम उन्हें कहां छोड़ कर आए?

इस पर उस ने जबाव दिया, ‘‘चाचा को रेलवे लाइन के उस पार छोड़ कर आया था. उन्होंने कहा था कि वह प्रियंका के यहां जा रहे हैं, बुलाया है, मीटिंग करनी है. थोड़ी देर वहां रुक कर वापस घर लौट आऊंगा, तब मैं बाइक ले कर घर लौट आया था.’’

नेताजी अचानक हुए लापता

भतीजे राजन के बताए अनुसार अनिल प्रियंका से मिलने उस के घर गए थे. राजन उस के घर के पास छोड़ कर आया था तो फिर वह कहां चले गए? अनिल के घर वालों ने प्रियंका को फोन कर के अनिल के बारे में पूछा तो उस ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि नेताजी तो उस के यहां आए ही नहीं.

यह सुन कर सभी के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह प्रियंका के यहां नहीं गए तो फिर कहां गए?

लोजपा नेता अनिल उरांव और प्रियंका काफी सालों से एकदूसरे को जानते थे. दोनों के बीच संबंध काफी मधुर थे. यह बात अनिल के घर वाले और प्रियंका के पति राजा भी जानते थे. बावजूद इस के किसी ने कभी कोई विरोध नहीं जताया था.

अनिल को ले कर घर वाले परेशान हो गए थे. उन के परिचितों के पास भी फोन कर के पता लगाया गया, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. घर वालों को अंदेशा हुआ कि कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

उसी दिन रात में नेता अनिल उरांव की पत्नी पिंकी कुछ लोगों को साथ ले कर हाट थाने पहुंची और पति की गुमशुदगी की एक तहरीर थानाप्रभारी सुनील कुमार मंडल को सौंप दी. तहरीर लेने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार ने पिंकी को भरोसा दिलाया कि पुलिस नेताजी को ढूंढने का हरसंभव प्रयास करेगी. आप निश्चिंत हो कर घर जाएं. उस के बाद पिंकी वापस घर लौट आई.

मामला हाईप्रोफाइल था. लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के आदिवासी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल उरांव की गुमशुदगी से  जुड़ा हुआ मामला था. उन्होंने अनिल उरांव की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली और आवश्यक काररवाई में जुट गए. चूंकि यह मामला राज्य के एक बड़े नेता की गुमशुदगी से जुड़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने इस बाबत एसपी दया शंकर को जानकारी दे दी थी.

वह जानते थे कि अनिल उरांव कोई छोटीमोटी हस्ती नहीं है. उन के गुम होने की जानकारी जैसे ही समर्थकों तक पहुंचेगी, वो कानून को अपने हाथ में लेने से कभी नहीं हिचकिचाएंगे. इस से शहर की कानूनव्यवस्था बिगड़ सकती है, इसलिए किसी भी स्थिति से निबटने के लिए उन्हें मुस्तैद रहना होगा.

इधर पति के घर लौटने की राह देखती पिंकी ने पूरी रात आंखों में काट दी थी. लेकिन अनिल घर नहीं लौटे. पति की चिंता में रोरो कर उस का हाल बुरा था. दोनों बेटे प्रांजल (7 साल) और मोनू (2 साल) भी मां को रोता देख रोते रहे. रोरो कर सभी की आंखें सूज गई थीं.

फिरौती की आई काल

बात अगले दिन यानी 30 अप्रैल की सुबह की है. पति की चिंता में रात भर की जागी पिंकी की आंखें कब लग गईं, उसे पता ही नहीं चला. उस की आंखें तब खुलीं जब उस के फोन की घंटी की आवाज कानों से टकराई.

स्क्रीन पर डिसप्ले हो रहे नंबर को देख कर हड़बड़ा कर वह नींद से उठ कर बैठ गई. क्योंकि वह फोन नंबर उस के पति का ही था. वह जल्दी से फोन रिसीव करते हुए बोली, ‘‘हैलो! कहां हो आप? एक फोन कर के बताना भी जरूरी नहीं समझा और पूरी रात बाहर बिता दी. जानते हो कि हम सब आप को ले कर कितने परेशान थे रात भर. और आप हैं कि…’’

पिंकी पति का नंबर देख कर एक सांस में बोले जा रही थी. तभी बीच में किसी ने उस की बात काट दी और रौबदार आवाज में बोला, ‘‘तू मेरी बात सुन. तेरा पति अनिल मेरे कब्जे में है. मैं ने उस का अपहरण कर लिया है.’’

‘‘अपहरण किया है?’’ चौंक कर पिंकी बोली.

‘‘तूने सुना नहीं, क्या कहा मैं ने? तेरे पति का अपहरण किया है, अपहरण.’’

‘‘तुम कौन हो भाई.’’ बिना घबराए, हिम्मत जुटा कर पिंकी आगे बोली, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया? मेरे पति से तुम्हारी क्या दुश्मनी है, जो उन का अपहरण किया?’’

अपहर्त्ताओं को दिए 10 लाख रुपए

‘‘ज्यादा सवाल मत कर. जो मैं कहता हूं चुपचाप सुन. फिरौती के 10 लाख रुपयों का बंदोबस्त कर के रखना. मेरे दोबारा फोन का इंतजार करना. मैं दोबारा फोन करूंगा. रुपए कब और कहां पहुंचाने हैं, बताऊंगा. हां, ज्यादा चूंचपड़ करने या होशियारी दिखाने की कोशिश मत करना और न ही पुलिस को बताना. नहीं तो तेरे पति के टुकड़ेटुकड़े कर के कौओं को खिला दूंगा, समझी.’’ फोन करने वाले ने पिंकी को धमकाया.

‘‘नहीं…नहीं उन्हें कुछ मत करना.’’ पिंकी फोन पर गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘तुम जो कहोगे, मैं वही करूंगी. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं. मैं पुलिस को कुछ नहीं बताऊंगी. प्लीज, उन्हें छोड़ दो. पैसे कहां पहुंचाने हैं, बता दो. तुम्हारे पैसे समय पर पहुंच जाएंगे.

कांस्टेबल रूपा तोमर हत्याकांड : दोस्ती और प्यार की खौफनाक कहानी

कांस्टेबल रूपा तोमर हत्याकांड : दोस्ती और प्यार की खौफनाक कहानी – भाग 4

1 मई को रूपा ने राहुल से मिलने आने को कहा. राहुल ने इनकार किया तो वह मिन्नत करते हुए बोली, ‘‘प्लीज राहुल आ जाओ, मैं तुम्हें सच बताना चाहती हूं. ऐसा कुछ नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो.’’

राहुल तैयार हो गया. रूपा ने इंटरनेट के जरिए 1 मई का ट्रेन से उस का आरक्षण भी करा दिया. उस के साथ वक्त बिताने के लिए उस ने 24 घंटे की छुट्टी भी ले ली. एक दिन पहले रूपा ने मकान मालिक को भी बता दिया कि उस का मंगेतर उस से मिलने के लिए आएगा.

1 मई की दोपहर राहुल उस के पास गया. रूपा बहुत खुश थी. रूपा ने खाना बनाया और दोनों ने साथ खाना खाया. रूपा ने उसे बताया कि किस तरह लोगों ने उस का फायदा उठाने की कोशिश की. चूंकि वे लोग अपने इरादों में नाकामयाब रहे इसलिए उसे भड़का रहे हैं.

इसी बीच रूपा के मोबाइल पर 1-2 लोगों के फोन आए. इंसान के दिमाग में शक हो तो उसे सबकुछ वैसा ही दिखता है, जैसा उस के दिमाग में चल रहा होता है. राहुल के साथ भी यही हुआ. उसे लगा कि उस के पुरुष दोस्तों के फोन हैं और विवाह के बाद भी वह ऐसी ही रहेगी. इस तरह फोन आने पर दोनों के बीच काफी तनातनी हुई. इसी बीच राहुल ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया.

दरअसल, रिश्ता होने के बाद एक दिन राहुल ने टीवी पर फिल्म ‘बाजीगर’ देखी थी. फिल्म में शाहरूख खान चालाकी से दुश्मन की बेटी को प्यार के जाल में फंसा कर पहले सुसाइड नोट लिखवाता है फिर उसे छत से फेंक देता है.

राहुल के पास जब रूपा के बारे में फोन आने शुरू हुए थे तो उस ने सोच लिया था कि अगर उसे रूपा पर विश्वास नहीं हुआ, तो वह भी उसे इसी तरह मार डालेगा. उस दिन जब रूपा के मोबाइल पर एकदो फोन आए तो राहुल ने मन ही मन ऐसा ही करने की योजना बना ली. इस के लिए सब से पहले उस ने प्यार जता कर रूपा को झांसे में लिया.

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राहुल

रूपा भावात्मक व आत्मिक रूप से उसे अपना मान चुकी थी और हर हाल में उस की होना चाहती थी. अपनी योजना के अनुसार राहुल ने कागज पैन उठाया और अपनी तरफ से सुसाइड नोट लिख कर रूपा को थमाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम्हें इतना प्यार करता हूं. अब अगर मुझे कुछ भी हो जाए, उफ तक नहीं करूंगा. अब बोलो तुम भी मुझ से इतना ही प्यार करती हो?’’

‘‘बिलकुल.’’

‘‘तो ठीक है, जैसा मैं ने लिखा है, हिम्मत है तो तुम भी एक कागज पर लिख कर दो.’’

‘‘तुम्हारे लिए मैं जान भी दे सकती हूं राहुल, मैं ने तुम्हें अपना सब कुछ मान लिया है. फिर ये लाइनें क्या चीज हैं. लाओ लिख देती हूं.’’

राहुल से कागज पैन ले कर रूपा ने भी वैसा ही लिख कर दे दिया. इस के बाद राहुल हंस कर बोला, ‘‘अब तुम्हारा गला दबा दूं?’’

‘‘ये जान अब मेरी नहीं, तुम्हारी है राहुल. चाहे जो करो.’’ रूपा ने कहा तो राहुल दोनों हाथ आगे बढ़ा कर बोला, ‘‘ट्राई करें?’’

उस वक्त रूपा लेटी हुई थी. उस ने सोचा कि राहुल मजाक कर के उस की परीक्षा ले रहा है. राहुल ने उस के दोनों हाथों के पंजे उस की गरदन पर रख कर उन के ऊपर हलका दबाव बनाया तो रूपा कुछ नहीं बोली. वह इसे मजाक समझती रही. उसे नहीं पता था कि वह अपनी मौत को न्यौता दे रही है. राहुल ने इस का फायदा उठा कर कस कर उस की गरदन दबा दी और तब तक हाथ नहीं हटाए जब तक उस के प्राण नहीं निकल गए.

रूपा के हाथ उस के कब्जे में थे. उस की छटपटाहट रोकने के लिए वह उस के ऊपर बैठ गया था. इस तरह राहुल अपनी योजना में पूरी तरह कामयाब हो गया.

इस के बाद उस ने एक दुपट्टा ले कर कुंडे से बांधा और रूपा को उठा कर उस पर लटका दिया. फिर उस ने बिस्तर वगैरह ठीक किया. अपना लिखा सुसाइड नोट उस ने अपनी जेब में रखा और रूपा को उसी हालत में छोड़ कर चुपचाप वहां से निकल गया. उस ने सोचा था कि पुलिस इसे आत्महतया ही समझेगी. ऐसा हुआ भी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने सारी पोल खोल दी.

राहुल के बयानों के बाद पुलिस ने विशेष व राहुल को भी भारतीय दंड संहिता की धारा 109 का आरोपी बना लिया. पुलिस ने विशेष को भी गिरफ्तार कर लिया जबकि पूरे प्रकरण पर नजर रख रहा सिपाही सुशील तब तक ड्यूटी से फरार हो गया था. पुलिस ने दोनों गिरफ्तार आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस सुशील को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कांस्टेबल रूपा तोमर हत्याकांड : दोस्ती और प्यार की खौफनाक कहानी – भाग 3

रूपा विशेष को अपना दोस्त भी मानती थी और शुभचिंतक भी. उस ने इस बारे में विशेष को भी बताया. विशेष पहले ही कुढ़ा बैठा था. उस ने रूपा की हां में हां तो मिलाई पर अंदर ही अंदर जलता रहा. विशेष चाहता था कि रूपा की शादी किसी से भी न हो ताकि उसे और उस के घर वालों को यह पछतावा रहे कि विशेष से रिश्ता न कर के उन्होंने बहुत बड़ी भूल की है.

विशेष ने किसी तरह सुशील का पता लगाया और उस से संपर्क कर के रूपा के पुराने दिनों की बातें बता कर उसे भड़काने का प्रयास किया. लेकिन उस पर इस का कोई असर नहीं पड़ा.

उधर रूपा ने सुशील के बारे में अपने घर वालों से बात की. जब उन्हें पता लगा कि बेटी विवाह करना चाहती है, तो उन्होंने सुशील के बारे में पता लगाया. लेकिन उन्हें जो जानकारी मिली उसे उन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. सुशील न सिर्फ विवाहित था बल्कि एक बच्चे का बाप भी था. यह बात रूपा को पता चली तो उस के सारे सपने टूट कर बिखर गए. वह समझ गई कि सुशील को विवाह की जल्दी क्यों नहीं थी.

दरअसल सुशील शादी के बहाने उसे भावनाओं के जाल में फंसा कर मन बहलाने का साधन बनाना चाहता था. इस झटके ने रूपा को अंदर तक हिला कर रख दिया. रूपा ने सुशील को जम कर खरीखोटी सुनाई और उस से पूरी तरह संपर्क तोड़ दिया. विशेष को इस से बहुत सुकून मिला, जबकि रूपा से अफसोस जता कर वह उस का सच्चा हितैषी होने का ढोंग करता रहा. इसी बीच सुशील का स्थानांतरण बागपत जिले में हो गया.

उधर रूपा के परिजनों ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी. मार्च, 2014 में यह तलाश राहुल के रूप में पूरी हुई. अच्छे परिवार का राहुल सीआरपीएफ में था. रूपा और राहुल ने एक दूसरे को पसंद कर लिया तो दोनों का रिश्ता पक्का हो गया. दोनों ही परिवार चाहते थे कि विवाह जल्द हो जाए. इसलिए 7 अप्रैल को सगाई की रस्म पूरी कर दी गई. विवाह के लिए भी 16 जून की तारीख तय हो गई.

सगाई होने के बाद रूपा और राहुल की मोबाइल पर बातें होने लगीं. रूपा ने राहुल को विश्वास दिलाया कि वह उसे बहुत प्यार करती है और हमेशा करती रहेगी. राहुल भी यह सोच कर मन ही मन खुश था कि उस ने होने वाली पत्नी के रूप में रूपा जैसी सुंदर व हंसमुख युवती का चुनाव किया है. रूपा की खुशी भी किसी से छिपी नहीं थी. उस ने सभी को बता दिया था कि एक महीने बाद उस का विवाह होने वाला है.

विशेष खुद को रूपा का हितैषी जताता था. वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. इस के लिए वह जब तब रूपा से पैसे मांगता रहता था. वह भी यह सोच कर पैसे दे देती थी कि वह उस का दोस्त भी है और वक्त का मारा भी. रूपा नहीं जानती थी कि वह आस्तीन का सांप है.

विशेष को जब रूपा की सगाई और विवाह की योजना का पता चला, तो एक बार फिर उस पर बिजली सी गिरी. उस ने तय कर लिया कि वह इस रिश्ते को तुड़वा कर रहेगा. विशेष सुशील के नजदीक आ चुका था. पोल खुलने पर रूपा के हाथों हुई बेइज्जती की वजह से सुशील भी अपमान की आग में झुलस रहा था.

सुशील अपराध शाखा में रह चुका था. अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर के उस ने सब से पहले रूपा की काल डिटेल्स हसिल की. इस से उसे उस नंबर का पता चल गया जिस पर वह सब से ज्यादा बात करती थी. वह नंबर राहुल का था. उस ने राहुल का नंबर विशेष को बता दिया. विशेष ने राहुल को एक दिन फोन कर के बताया कि वह रूपा से शादी न करे क्योंकि वह उसे प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है. विशेष ने अपना नाम बताए बिना राहुल के सामने शर्त रखी थी कि वह इस बारे में रूपा को कुछ न बताए.

भावी पत्नी के बारे में ऐसी बातें सुन कर राहुल का खून खौल गया. उस ने रूपा से इस मुद्दे पर बात की, तो उस ने इसे झूठ बताया. बहरहाल, दोनों के बीच तकरार और प्यार चलता रहा. धीरेधीरे राहुल को विश्वास हो गया कि कोई उसे भड़काने के लिए ऐसा कर रहा है.

राहुल को विश्वास में ले कर रूपा ने वह नंबर हासिल कर लिया जिस से राहुल को फोन किया गया था. वह नंबर विशेष का निकला. रूपा ने फोन मिला कर विशेष को खूब लताड़ा. उस ने सफाई देनी चाही, लेकिन रूपा ने उस की एक नहीं सुनी.

इस के बाद विशेष की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. रूपा ने उस से बात तक करनी छोड़ दी. योजनानुसार इस के बाद सुशील ने राहुल को फोन कर के अपने और रूपा के रिश्ते की बातें बताईं और उस से दूर रहने को कहा. इन बातों से राहुल का दिमाग खराब हो गया. इस तरह विशेष और सुशील ने मिल कर उस के मन में शक का बीज बो दिया.

इस बात को ले कर रूपा और उस के बीच तकरार भी हुई. इधर यह सब चल रहा था और उधर रूपा का परिवार विवाह की तैयारियां करने में लगा था. इन बातों के बाद राहुल ने रूपा से बात करनी बंद कर दी तो वह विचलित हो गई. इस के बावजूद उस ने राहुल को विश्वास दिलाने के लिए उसे फोन करना जारी रखा. दोनों के बीच कई दिनों तक रूठने मनाने का दौर चलता रहा.

उधर विशेष भी राहुल को फोन कर के भड़काता रहा. जबकि रूपा राहुल को विश्वास दिलाती कि वह सिर्फ उसी से प्यार करती है और उस के लिए अपनी जान भी दे सकती है.

कांस्टेबल रूपा तोमर हत्याकांड : दोस्ती और प्यार की खौफनाक कहानी – भाग 2

पुलिस ने रूपा के मकान मालिक से भी पूछताछ की. उस ने एक ऐसी बात बताई जिस से पुलिस के शक को और भी बल मिला. रूपा ने मकान मालिक को एक दिन पहले बताया था कि उस का मंगेतर उस से मिलने के लिए आएगा.

यह जानने के बाद पुलिस ने राहुल के नंबर की सभी डिटेल्स हासिल कर लीं. उस से पता चला कि 1 मई की दोपहर से ले कर रात तक राहुल की लोकेशन बुलंदशहर में ही थी. इस के बाद उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर दिया था. शक को मजबूत आधार मिला, तो पुलिस ने रूपा के घर वालों की तरफ से राहुल के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया. इस के बाद पुलिस उस की तलाश में जुट गई.

एक पुलिस टीम राहुल की तलाश में पटना रवाना कर दी गई. 14 मई को पुलिस राहुल को हिरासत में ले कर बुलंदशहर लौट आई. पुलिस की इस तरह की काररवाई से वह हक्का बक्का था. पुलिस ने उस से सीधा सवाल किया, ‘‘तुम ने रूपा की हत्या क्यों की?’’

‘‘मैं भला उस की हत्या क्यों करूंगा सर, वह मेरी मंगेतर थी. हम दोनों तो अपनी शादी से खूब खुश थे.’’ राहुल ने संक्षिप्त शब्दों में सीधा जवाब दिया.

‘‘तुम्हारा मोबाइल क्यों बंद था?’’

पूछने पर राहुल बोला, ‘‘मेरा मोबाइल खराब हो गया था. मुझे आप से ही पता चला है कि रूपा की हत्या हो गई है.’’

‘‘तुम्हारी रूपा से आखिरी मुलाकात कब हुई थी?’’

‘‘सगाई के बाद हम लोग एक बार मिले थे. वैसे मोबाइल पर हम बराबर बातें करते रहते थे.’’ राहुल के जवाबों से पुलिस समझ गई कि वह हद से ज्यादा चालाक भी है और झूठ बोलने में माहिर भी. लेकिन जब पुलिस ने उस के साथ सख्ती की तो वह टूट गया.

पहले वह खामोश हो कर शून्य को ताकता रहा, फिर उस ने कुबूल कर लिया कि रूपा की हत्या उस ने ही की थी और यह आइडिया उसे शाहरूख खान की फिल्म बाजीगर देख कर आया था. रूपा की हत्या की उस ने जो वजह बताई वह एक युवा लड़की के विश्वास व भावनाओं के साथ खिलवाड़ के बाद बेरहमी से हुए कत्ल की कहानी थी.

किसान परिवार में जन्मी रूपा होनहार युवती थी. उस की ख्वाहिश थी कि वह बड़ी हो कर पुलिस विभाग में नौकरी करे. यह सर्वविदित है कि उद्देश्य अगर पहले ही साफ हो जाए तो मंजिल तक पहुंचने की राहें आसान हो जाती हैं. रूपा के साथ भी ऐसा ही कुछ था. रूपा का परिवार आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा सक्षम नहीं था. वह चाहती थी कि बड़ी हो कर परिवार के लिए कुछ करे.

इंसान की जिंदगी कई तरह की राहों से हो कर गुजरती है. इन राहों में बहुत से लोग मिलते बिछड़ते हैं. इन लोगों में किस से करीबी रिश्ते बन जाएं कोई पता नहीं होता. कालेज के दिनों में ही रूपा की मुलाकात विशेष कुमार से हुई. विशेष कुमार जिला मेरठ के खेखड़ा थाना क्षेत्र के गांव का रहने वाला था.

रूपा सुंदर व हंसमुख स्वभाव की थी. विशेष उसे पसंद करता था. वह पढ़ने में भी मेहनती था. विचार मिले तो दोनों के बीच दोस्ती हो गई. विशेष की पारिवारिक हालत काफी खराब थी. वह किसी भी तरह अपनी पढ़ाई पूरी कर के नौकरी करना चाहता था.

रूपा उन युवतियों में से थी जो दूसरों की पीड़ा को अपनी समझते हैं. एक दिन विशेष को परेशान देख रूपा ने उस से पूछा तो उस ने बताया कि वह फीस का इंतजाम नहीं कर पा रहा है. हो सकता है, फीस न भर पाने के कारण उसे पढ़ाई छोड़नी पड़े.

रूपा उस की बात सुन कर गंभीर हो गई. उस ने विशेष को समझा कर आश्वासन दिया कि वह उस की मदद करेगी. उस ने किसी तरह इंतजाम कर के विशेष को फीस के रुपए दे दिए. इस से वह बहुत खुश हुआ.

बीए करने के दौरान ही 2011 में उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद के लिए वैकेंसी निकलीं तो रूपा और विशेष ने तय किया कि वह इस के लिए प्रयास करेंगे. दोनों ने एकसाथ पंजीकरण फार्म भरा. चयन के लिए प्रतियोगी टेस्ट हुए, तो रूपा का चयन हो गया जबकि विशेष रह गया. इस से रूपा को तो दुख पहुंचा ही विशेष भी मन मार कर रह गया. रूपा का परिवार बेटी के पुलिस में जाने से खुश था. कुछ महीनों के प्रशिक्षण के बाद रूपा को तैनाती मिल गई.

2013 में रूपा का स्थानांतरण बुलंदशहर जनपद में हो गया. विशेष चूंकि अब तक कहीं नौकरी नहीं कर पाया था इसलिए वह परेशान रहता था. वक्त वक्त पर रूपा उस की आर्थिक मदद करती रहती थी. दोनों की इच्छा विवाह करने की थी, लेकिन रूपा का परिवार उस के परिवार की माली हालत की वजह से इस के लिए तैयार नहीं हुआ.

विशेष ने सोचा था कि उसे कमाऊ पत्नी मिलेगी तो उस के आर्थिक संकट दूर हो जाएंगे. रिश्ता नहीं होने से वह निराश हो गया. नतीजतन उस के दिल में प्रतिशोध की चिंगारी भड़कने लगी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह रूपा को किसी और की भी नहीं होने देगा. लेकिन उस ने अपने इरादे कभी जाहिर नहीं होने दिए. यह अलग बात थी कि मांगने पर रूपा उसे पैसे भेज देती थी.

रूपा की तैनाती देहात के थाने में थी. वहां उसे काफी दिक्कत होती थी. इसलिए वह शहर में आना चाहती थी. इसी दौरान उस की मुलाकात सिपाही सुशील जावला से हो गई. सुशील अपराध शाखा में तैनात था और मूल रूप से नव सृजित जिला शामली के थाना कांधला क्षेत्र के गांव भभीसा का रहने वाला था. वह काफी तेज तर्रार था. अधिकारियों के संपर्क में रहने से डिपार्टमेंट में उस की अच्छी पकड़ थी.

रूपा पहली ही नजर में सुशील के दिल में उतर गई. भावनात्मक स्वभाव की रूपा पुलिस की नौकरी में भले ही आ गई थी, लेकिन उस में न तो पुलिस जैसी तेजी थी और न ही उसे जमाने का तजुर्बा था. सुशील ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो रूपा भी इनकार नहीं कर सकीं.

रूपा ने अपनी समस्या सुशील को बता दी थी. सुशील चाहता था कि रूपा पूरी तरह उस के जाल में फंस जाए, इसलिए उस ने अधिकारियों से अपने संबंधों का फायदा उठा कर रूपा को शहर लाने के प्रयास शुरू कर दिए. इस प्रयास में उसे सफलता मिली, जिस की बदौलत रूपा को शहर कोतवाली में तैनाती मिल गई.

दोनों के बीच मुलाकातों बातों का सिलसिला बढ़ा तो सुशील ने प्रेम का इजहार कर के रूपा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. एक तो सुशील अपनी ही जाति का था. दूसरे था भी मेरठ की तरफ का रहने वाला. इसलिए रूपा को यह ठीक लगा. उस ने सोचा कि सुशील भी चूंकि सरकारी नौकरी में है इसलिए दोनों का जीवन सुखमय रहेगा. शादी की बात करते समय सुशील ने एक बात साफ कर दी थी कि वह शादी 2 साल से पहले नहीं करेगा. उस ने चूंकि रूपा को खूब सपने दिखाए थे, इसलिए वह 2 साल बाद भी शादी करने को तैयार थी.

फारेस्ट औफीसर का कातिल प्रेमी

कांस्टेबल रूपा तोमर हत्याकांड : दोस्ती और प्यार की खौफनाक प्रेम कहानी – भाग 1

10 अप्रैल की दोपहर को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बुलंदशहर (Bulandshahar) की शहर कोतवाली पुलिस को टेलीफोन से सूचना मिली कि महिला  सिपाही रूपा तोमर (Lady Constable Rupa Tomar) ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. रूपा कोतवाली में ही तैनात थी और शहर के कृष्णानगर मोहल्ले में सुनील सिंह के यहां किराए पर रहती थी. सूचना पा कर थानाप्रभारी जितेंद्र कालरा पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. रूपा का शव दुपट्टे के सहारे छत के कुंडे से लटका हुआ था. जिस छोटे से कमरे में रूपा रहती थी उस का हर सामान बड़े सलीके से रखा हुआ था.

पुलिस ने घटनास्थल की जांच की, तो वहां 2-3 लाइन का एक सुसाइड नोट मिला. उस में बड़े ही संतुलित शब्दों में लिखा था, ‘मैं अपनी मरजी से जान दे रही हूं. अपनी मौत की मैं खुद ही जिम्मेदार हूं. इस मामले में किसी से पूछताछ न की जाए.’

थाना प्रभारी ने इस मामले की सूचना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

सूचना पा कर एसपी (सिटी) अजय कुमार साहनी और डिप्टी एसपी (सिटी) राकेश कुमार भी मौके पर पहुंच गए. कुंडे पर लटके शव और मौके पर मिले सुसाइड नोट से प्रथमदृष्टया यह मामला आत्महत्या का ही लग रहा था. रूपा का मोबाइल भी वहीं रखा हुआ था. मोबाइल में कुछ मिस काल थीं, जो रात से ले कर सुबह तक आई थीं. इस से अंदाजा लगाया गया कि उस ने रात में ही किसी वक्त अपनी जीवनलीला समाप्त की होगी.

पुलिस ने रूपा का रिकौर्ड देखा तो पता चला कि वह मूलरूप से जिला बागपत के गांव हिलवाड़ी निवासी मांगेराम तोमर की बेटी थी. पुलिस ने उस के घरवालों को सूचना भिजवा दी. रूपा ने 24 घंटे की छुट्टी ले रखी थी. घटना के समय वह छुट्टी पर थी. सवाल यह था कि आत्महत्या करने के लिए क्या उस ने सोचसमझ कर अवकाश लिया था?

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23 वर्षीया रूपा के अचानक इस तरह आत्महत्या कर लेने से उस के साथी पुलिसकर्मी हैरान थे क्योंकि वह हंसमुख स्वभाव की युवती थी. उस ने ऐसा कभी कुछ जाहिर भी नहीं किया था जिस से लगता कि वह परेशान है. उस की जिंदगी में कोई परेशानी है इस बात का उस ने किसी को संकेत भी नहीं दिया था.

रूपा ने अपने साथियों को बताया था कि एक महीने बाद उस का विवाह होने वाला है. ऐसे में उस ने अचानक ऐसा कदम क्यों उठाया, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी. आत्महत्या का कोई स्पष्ट कारण भी नहीं था. ऐसे में यही सोचा गया कि उस ने किन्हीं निजी कारणों से आत्महत्या की होगी. रूपा ने चूंकि किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया था. इसलिए विशेष जांच का कोई औचित्य नहीं था. फिर भी ऐहतियात के तौर पर पुलिस ने फौरेंसिक एक्सपर्ट की टीम को घटनास्थल पर बुलवाया.

इस टीम द्वारा मुआयना कर के मौके से जरूरी नमूने एकत्र किए गए. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने रूपा के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और उस के परिजनों के थाने आने का इंतजार करने लगी.शाम तक उस के पिता मांगेराम, चाचा संजीव तोमर व भाई सुनील तोमर बुलंदशहर पहुंच गए. उन से भी पूछताछ की गई.

उन्होंने बताया कि एक महीना पहले ही रूपा की सगाई हुई थी. 16 जून को उस का विवाह होना था. वे लोग विवाह की तैयारियों में जुटे थे. अपने विवाह के लिए वह खुद भी खरीदारी करने वाली थी.

रूपा के घर वाले ऐसी कोई वजह नहीं बता सके, जिस के चलते रूपा हताशा के पायदान पर पहुंच गई हो. उस की साथी महिला पुलिसकर्मियों का भी कहना था कि रूपा अपने विवाह को ले कर खुश थी.

थाने में चूंकि रूपा की राइटिंग मौजूद थी इसलिए पुलिस ने पुष्टि के लिए सुसाइड नोट की राइटिंग का मिलान रूपा की राइटिंग से कर के देखा. उस की राइटिंग सुसाइड नोट से पूरी तरह मेल खा रही थी. इस से स्पष्ट हो गया कि सुसाइड नोट उसी का लिखा हुआ था. उधर 2 डाक्टरों की टीम ने रूपा की लाश का पोस्टमार्टम किया.

पोस्टमार्टम के बाद रूपा के शव को उस के घरवालों के हवाले कर दिया गया. रूपा ने खुद आत्महत्या की थी. न उसे किसी ने उकसाया था और न ही इस के लिए उस ने किसी को जिम्मेदार ठहराया था, इसलिए पुलिस ने जांच बंद कर दी.

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अगले दिन पुलिस को रूपा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, तो वह चौंकी. रिपोर्ट में साफतौर पर लिखा था कि रूपा की मौत गला दबाने से सांस रूकने के चलते हुई थी. यानि उस की हत्या की गई थी. रिपोर्ट में हत्या का समय 8 से 10 बजे के बीच बताया गया था.

अब यह बात साफ हो गई थी कि रूपा की हत्या करने के बाद उस के शव को दुपट्टे से लटकाया गया था ताकि मामला आत्महत्या का लगे. लेकिन सवाल यह था कि अगर हत्या हुई थी, तो रूपा ने सुसाइड नोट क्यों लिखा? ताज्जुब की बात यह थी कि मौके पर जोर जबरदस्ती के चिह्न भी नहीं थे जिस से यह माना जाता कि किसी ने उस से दबाव में ऐसा कराया होगा.

हकीकत जानने के बाद एसएसपी उमेश कुमार सिंह चौंके. मामला चूंकि उन के ही विभाग की सिपाही की हत्या का था, इसलिए उन्होंने जांच में थाना पुलिस के साथसाथ अपराध शाखा की टीम को भी लगा दिया. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हत्यारा बहुत चालाक है. वह आया और हत्या को आत्महत्या का रूप दे कर चला गया. सुसाइड नोट की लाइन ‘इस बारे में किसी से पूछताछ न की जाए.’ उस ने जानबूझ कर लिखवाई होगी ताकि पुलिस किसी से पूछताछ न कर के इसे आत्महत्या माने और जांच बंद कर दे.

यह बात साफ थी कि हत्यारा रूपा का ही कोई ऐसा जानकार था जिसे अपने कमरे पर आने से वह इनकार नहीं कर सकती थी. दूसरे उसे कोई डर होता तो वह शोर मचाती या किसी को बताती. यहां यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो गया कि ऐसा कौन आदमी रहा होगा जो रूपा की मरजी से उस के पास पहुंचा और उस की हत्या कर के चला गया?

पुलिस ने रूपा के घरवालों को बुलवा कर उन से विस्तृत पूछताछ की, तो वे ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में नहीं बता सके जिस पर संदेह किया जा सके. उन की खुद भी समझ में नहीं आ रहा था कि रूपा के साथ ऐसा किस ने और क्यों किया.

उन्होंने बताया कि रूपा का रिश्ता मेरठ के कस्बा जानी में रहने वाले राहुल के साथ हुआ था. राहुल सीआईएसएफ में सिपाही था. फिलहाल उस की तैनाती बिहार की राजधानी पटना में थी. राहुल और रूपा के साथसाथ दोनों परिवार भी इस रिश्ते से खुश थे.

रूपा का मोबाइल हत्या का राज खोल सकता था. पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स हासिल कर के उस की छानबीन की तो पता चला कि एक नंबर पर उस की सब से ज्यादा बातें होती थीं. उस नंबर के बारे में उस के घर वालों से पूछा गया तो पता चला वह नंबर राहुल का था.

हत्या वाले दिन और उस से पहले रूपा की राहुल से बराबर बात हो रही थी. जबकि 1 तारीख की दोपहर के बाद दोनों के बीच किसी प्रकार का संपर्क नहीं हुआ था. पुलिस ने राहुल का नंबर मिलाया, लेकिन वह स्विच्ड औफ आ रहा था. इस से पुलिस के शक की सूई राहुल पर जा कर ठहर गई.

फारेस्ट औफीसर का कातिल प्रेमी – भाग 3

एटीएम से आरोपी तक पहुंची पुलिस

जबकि राहुल जिंदा है और फोन बंद कर के फरार है. अब तक जो पुलिस को शक था, राहुल के इस तरह फोन बंद कर के लापता होने से विश्वास में बदलने लगा था. इसलिए पुलिस ने अपना पूरा ध्यान उसी पर केंद्रित कर दिया. पर उस का पता कैसे चले, क्योंकि उस ने अपना फोन तो बंद कर रखा था.

इस बीच पुलिस ने पता किया कि राहुल का खर्च कैसे चलता था. घर वाले पैसे देते थे तो कैश देते थे या बैंक के माध्यम से भेजते थे. पूछने पर घर वालों ने बताया था कि वह अपना खर्च चलाने के लिए प्राइवेट नौकरी करता था. उस का बैंक में अकाउंट है, कंपनी का वेतन उसी में आता था.

राहुल

पुलिस का सोचना था कि राहुल अगर जिंदा है तो उसे खर्च के लिए पैसों की जरूरत तो पड़ती ही होगी. खर्च के लिए वह एटीएम से पैसे जरूर निकालता होगा. पुलिस ने जब इस बारे में बैंक से पता किया तो पता चला कि राहुल ने अपने बैंक अकाउंट से एटीएम द्वारा दिल्ली से पैसे निकाले थे.

राहुल को दिल्ली में कैसे पकड़ा जाए, पुणे पुलिस इस बात पर विचार कर ही रही थी कि उस का फोन कुछ देर के लिए चालू हुआ. लेकिन थोड़ी हो देर में फिर स्विच औफ हो गया. पुलिस ने जब उस की लोकेशन पता की तो वह कोलकाता की थी. पता चला कि उस ने अपने एक रिश्तेदार को फोन कर के बात की थी.

उस रिश्तेदार से राहुल ने क्या बात की थी, जब पुलिस ने रिश्तेदार से पूछा तो उस ने बताया कि राहुल कह रहा था कि अब वह पुणे कभी लौट कर नहीं आएगा. क्योंकि उस का उस के एक दोस्त से झगड़ा हो गया है. इसलिए उस ने पुणे हमेशा हमेशा के लिए छोड़ दिया है.

राहुल की लोकेशन कोलकाता की मिली थी. इस से पहले कि पुलिस कोलकाता जाती या वहां की पुलिस से संपर्क करती, राहुल की लोकेशन मुंबई की मिली. फिर तो पुणे पुलिस ने राहुल को फोन की लोकेशन के आधार पर मुंबई के अंधेरी स्टेशन से 27 जून, 2023 की रात को गिरफ्तार कर लिया.

क्या इसी को कहते हैं प्यार

राहुल को पुणे ला कर अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 3 जुलाई तक के लिए रिमांड पर लिया गया. पूछताछ में राहुल ने दर्शना की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने अपनी बाइक और वह कटर भी बरामद करा दिया था, जिस का उपयोग उस ने दर्शना की हत्या में किया था.

पुलिस कस्टडी में आरोपी राहुल

राहुल ने हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो एसपी (ग्रामीण) अमित गोयल की मौजूदगी में राहुल को पत्रकारों के सामने पेश किया गया, जहां उस ने दर्शना की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

साथसाथ पढ़ाई करते और उठतेबैठते राहुल हंडोरे को दर्शना से प्यार हो गया था. पर उस ने कभी अपने प्यार का इजहार दर्शना से किया नहीं था. क्योंकि उसे लगता था कि जब उचित समय आएगा, तब वह दर्शना से दिल की बात कह देगा. उस के लिए उचित समय तब आता, जब उस की कहीं नौकरी लग जाती.

दर्शना उस के मन की बात जानती थी. उसे भी राहुल पसंद था. पर उस के मन में यही था कि जब दोनों की नौकरी लग जाएगी, तब दोनों शादी कर लेंगे. दोस्ती दोनों में थी ही, वे एकदूसरे से हर बात उसी तरह शेयर करते थे, जैसे कोई अपने बौयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड से करता है.

जब दर्शना की नौकरी लग गई और राहुल की नहीं लगी तो दर्शना राहुल से दूर होने लगी. घर वालों ने उस के लिए लड़का भी देखना शुरू कर दिया. जब इस बात की जानकारी राहुल को हुई तो उस ने दर्शना के सामने ही उस के मम्मीपापा से विवाह के लिए बात की.

दर्शना के मम्मीपापा ने उस के साथ दर्शना का विवाह करने से साफ मना कर दिया. इस के बाद उस ने दर्शना की ओर देखा तो दर्शना की नजरों में उसे पैरेंट्स की बात में सहमति नजर आई. इस तरह राहुल ने दर्शना के साथ विवाह का जो सपना सालों से संजोया था, वह टूट गया. इस से राहुल को बेइज्जती सी महसूस हुई.

वह वहां से तो चुपचाप चला आया, पर उस ने मन ही मन दर्शना से बदला लेने की ठान ली. उस ने तय कर लिया कि दर्शना उस की नहीं तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. अब वह मौके की तलाश में था.

11 जून को पुणे में दर्शना को कोचिंग सेंटर वालों ने सम्मानित करने के लिए बुलाया तो राहुल भी वहां उस से मिलने गया. अगले दिन उस ने दर्शना के साथ वेल्हा तहसील स्थित रायगढ़ और सिंहगढ़ किला घूमने का आयोजन किया तो दर्शना उस के साथ जाने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई. क्योंकि अच्छा दोस्त होने की वजह से वह उस पर आंख मूंद कर विश्वास करती थी. यह बात दर्शना ने अपने दोस्तों और घर वालों को बता भी दी थी.

अगले दिन यानी 12 जून को दोनों सुबह राजगढ़ और सिंहगढ़ के किलों की ट्रैकिंग के लिए निकल गए. राजगढ़ के किले के अंदर एकांत पा कर राहुल ने एक बार फिर दर्शना से विवाह की बात छेड़ दी. तब दर्शना ने साफ कह दिया कि वह वहीं विवाह करेगी, जहां उस के घर वाले चाहेंगे.

राहुल तो ठान कर ही आया था कि उसे अपने अपमान का बदला लेना है, इसीलिए तो वह दर्शना की हत्या करने के लिए हथियार के रूप में कटर ले कर आया था. दर्शना के मना करते ही राहुल ने उस पर कटर से हमला बोल दिया और उस की हत्या कर दी.

दर्शना की हत्या करने के बाद राहुल ने उस की लाश उठा कर पहाड़ी के नीचे तलहटी में फेंक दी. उसी के साथ उस के फोन, चश्मा, जूते आदि भी फेंक दिए और फिर वहां से अपने फोन को स्विच्ड औफ कर के अकेला ही लौट आया. कमरे पर बाइक खड़ी कर के वह फरार हो गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने 3 जुलाई, 2023 को राहुल को फिर अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित