Varanasi Crime: मदद के नाम पर देह धंधा

Varanasi Crime: उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी की रहने वाली सुनीता की मां अकसर बीमार रहती थी. उसे लगता था कि अगर कहीं उस की नौकरी लग जाती तो वह अपनी मां का ठीक से इलाज करा लेती. उस के पिता की मौत हो चुकी थी.

एक छोटा भाई जरूर था, लेकिन वह अभी पढ़ रहा था. एक दिन उस के फोन पर एक मिसकाल आई. उस ने पलट कर फोन किया तो पता चला वह नंबर लखनऊ की रहने वाली सोनी का था.

इस के बाद सोनी और सुनीता में बातचीत होने लगी. बाचतीत में एक दिन सुनीता ने सोनी से अपनी परेशानी कह सुनाई. सोनी बातचीत में काफी माहिर थी. मीठीमीठी बातें कर के उस ने सुनीता से दोस्ती गांठ ली. फोन के साथसाथ दोनों वाट्सऐप पर भी एकदूसरे को मैसेज करने लगी थीं.

सुनीता काफी सुंदर थी. उस की सुंदरता ने सोनी का मन मोह लिया. इसी वजह से सोनी के मन में लालच आ गया. उसे लगा कि अगर सुनीता उस के पास आ जाए तो उस का काम बन जाए.

सुनीता वाराणसी के लंका स्थित अपने घर में मां के साथ रहती थी. संयोग से एक दिन उस ने खुद ही सोनी को मौका दे दिया. उस ने कहा, ‘‘सोनी, मेरी मां की तबीयत खराब रहती है. उन का इलाज कराना है, घर में कोई मदद करने वाला नहीं है. मैं क्या करूं, कुछ समझ नहीं पा रही हूं. कोई नौकरी भी नहीं मिल रही है.’’

‘‘अगर तुम लखनऊ में होती तो मैं तुम्हारी मदद कर देती. यहां मैं कोई नौकरी दिला देती, जिस से तुम्हें आराम से 10 से 15 हजार रुपए महीना वेतन मिल जाता. अगर तुम बढि़या काम करती तो जल्दी ही तुम्हारा वेतन दोगुना हो जाता.’’ जवाब में सोनी ने सुनीता को समझाते हुए कहा.

‘‘अभी तो मैं मां को ले कर लखनऊ आ नहीं सकती. अगर नौकरी मिल जाए और महीने, 2 महीने में कुछ पैसे मिल जाएं तो मैं मां को ला कर वहीं रहने लगती.’’ सोनी की बात सुन कर सुनीता ने कहा.

crime

सुनीता की बातों से सोनी को लगा कि वह लखनऊ आ सकती है. उसे आकर्षित करने के लिए सोनी ने कहा, ‘‘सुनीता, तुम यहां आ जाओ और हम लोगों के साथ रह कर काम को देखसमझ लो. अगर काम पसंद आ जाए तो मां को ले आना. यहां रहने की कोई कमी नहीं है. मैं अपनी सहेली सुमन के साथ रहती हूं. हम से मिल कर तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा.’’

सुनीता जरूरतमंद थी ही, इसलिए उसे लगा कि एक बार लखनऊ जा कर सोनी से मिलने में कोई बुराई नहीं है. लखनऊ कोई बहुत दूर तो है नहीं, क्यों न एक बार जा कर उस के काम को देखसमझ ले. अगर काम अच्छा लगा तो करेगी, वरना वाराणसी लौट आएगी.

सोनी से हुई बातचीत के करीब 10 दिनों बाद सुनीता वाराणसी पैसेंजर ट्रेन से लखनऊ के लिए निकल पड़ी. सुमन और सोनी को उस ने अपने आने की बात पहले ही बता दी थी, इसलिए दोनों उसे लेने के लिए चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंच गई थीं.

सोनी और सुमन से मिलने के बाद सुनीता ने कहा, ‘‘यार ट्रेन काफी लेट हो गई, जिस से यहां पहुंचने में काफी देर हो गई. चलो, पहले वहां चलते हैं, जहां नौकरी की बात करनी है. उस के बाद बैठ कर आराम से आपस में बातें करेंगे. अगर नौकरी पसंद आई तो रुक जाऊंगी, वरना रात की ट्रेन से वापस लौट जाऊंगी. तुम दोनों को नाहक परेशान नहीं होना पड़ेगा.’’

‘‘सुनीता, तुम जंगल में नहीं आई हो. हम दोनों तुम्हारे साथ हैं. आज तो देर हो गई है. औफिस बंद हो गया होगा. कल वहां चल कर बात कर लेंगे. अभी तुम हमारे साथ मेरे कमरे पर चलो. आज हम तीनों पार्टी कर के खूब एंजौय करेंगे.’’ सोनी ने कहा.

सुनीता को बहुत दिनों बाद घर से बाहर निकल कर तनावरहित कुछ समय गुजारने का मौका मिला था. सुमन और सोनी से मिल कर वह काफी खुश थी. दोनों उसे बहुत अच्छी लगी थीं. तीनों एक कार में बैठ कर लखनऊ के तेलीबाग स्थित सोनी के घर पहुंच गईं.

घर में सिर्फ सोनी का पति तौहीद था. वह देखने में काफी सीधासादा था. तीनों के घर पहुंचते ही वह घर से चला गया. उस समय शाम के करीब 6 बज रहे थे.

ठंडी का मौसम था. सुनीता का स्वागत चायपकौड़ों से किया गया. तीनों आपस में चाय पीते हुए बातें करने लगीं. चाय खत्म हुई तो सोनी ने कहा, ‘‘सुनीता, मैं तुम्हें कपड़े देती हूं. तुम फ्रैश हो कर कपड़े बदल लो.’’

‘‘सुनीता, सोनी के कपड़े तुम्हें एकदम फिट आएंगे. यह बहुत ही सैक्सी लुक वाले कपड़े पहनती है. उन्हें पहन कर तो तुम कयामत लगोगी.’’ सुमन ने कहा.

इस बीच सोनी कपड़े ले आई. न चाहते हुए भी सुनीता को सोनी की ड्रैस पहननी पड़ी. कपड़े पहन कर उस ने खुद को देखा तो सचमुच ही वह अलग दिख रही थी. वह खुश हो गई. बातें करतेकरते एकदूसरे के फोटो खींचे जाने लगे.

सोनी ने सुनीता के मौडलिंग वाले फोटो खींचतेखींचते बिना कपड़ों के भी फोटो खींचे. उस समय सुनीता की समझ में कुछ नहीं आया. वह सोच रही थी कि यह लड़कियों की दोस्ती है.

थोड़ी देर बाद सुमन अपने घर चली गई. अब सोनी और सुनीता ही रह गईं. रात में सोनी का पति तौहीद आया तो खाना खा कर सोनी अपने पति के साथ सोने चली गई. सुनीता भी अलग कमरे में सो गई. उसे नींद आने लगी थी, तभी उस के कमरे का दरवाजा खुला. सोनी एक आदमी के साथ उस के कमरे में आई.

सोनी उस आदमी को वहीं छोड़ कर बाहर निकल गई और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया. अब कमरे में सुनीता और वह आदमी ही रह गए. सोनी के जाते ही उस ने कहा, ‘‘सुनीता, आज की रात के लिए सोनी ने तुम्हारा 6 हजार रुपए में सौदा किया है.’’

उस आदमी की बात सुन कर सुनीता के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस की आंखों के सामने लखनऊ से ले कर वाराणसी तक की दोस्ती, बातचीत और आवभगत की तसवीर घूमने लगी. सुनीता समझ गई कि वह फंस चुकी है. उस आदमी ने सुनीता को उस के वे निर्वस्त्र फोटो दिखाए, जो कुछ देर पहले ही सोनी और सुमन ने मजाकमजाक में खींचे थे. उस ने कहा, ‘‘अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो ये तुम्हारी इन तसवीरों को सार्वजनिक कर देंगी. तब लोग तुम्हें ही गलत समझेंगे.’’

सुनीता के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उसे पूरी रात उस आदमी की दरिंदगी का सामना करने को मजबूर होना पड़ा. सवेरा होते ही वह आदमी चला गया. उस के जाने के बाद सोनी कमरे में आई. सुनीता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

सोनी चुपचाप सब सुनती रही. इस के बाद उस ने सुनीता को एक हजार रुपए देते हुए कहा, ‘‘सुनीता, आज से यही तुम्हारी नौकरी है. तुम्हारा खानापीना, कपड़े और मैकअप का सारा खर्च हम उठाएंगे. रहने के लिए हमारा घर है ही. इस सब के अलावा तुम्हें हर रात के एक हजार मिलेंगे. तुम 8-10 हजार रुपए की बात कर रही थी, मैं तुम्हें 20 से 25 हजार रुपए देने की बात कर रही हूं. अब तुम देख लो कि तुम्हें बदनाम होना है या मैं जो कह रही हूं, वह करना है.’’

चंगुल में फंस चुकी सुनीता को बचाव का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. उसे लगा कि अगर उस ने लड़ाईझगड़ा किया तो वे उस के साथ और ज्यादा बुरा कर सकते हैं. इसलिए वह मजबूर हो गई. फिर उस के साथ यह सिलसिला सा चल निकला.

पहले रात को ही कोई आदमी आता था. कुछ दिनों बाद दिन में भी उस के पास ग्राहक आने लगे. सुनीता कुछ कहती तो सुमन, सोनी और दोनों के पति तौहीद और सुरजीत कहते, ‘‘सुनीता जाड़े के दिनों में कमाई ज्यादा होती है. अभी कमा कर रुपए जमा कर लो, गरमी में ग्राहक कम होंगे तो ये काम आएंगे.’’

कुछ ही दिनों में सुनीता को यह काम बोझ लगने लगा. 10 दिन साथ रहने के बाद उन लोगों को सुनीता पर भरोसा हो गया. वे उसे ग्राहकों के साथ बाहर भी भेजने लगे. सुनीता को बाहर जाना होता तो तौहीद और सुरजीत उसे पहुंचाने जाते. सवेरा होने पर वे जा कर उसे ले आते. इस तरह वह दिन में अलग और रात को अलग ग्राहकों को खुश करने लगी.

crime

एक दिन सोनी ने सुनीता से कहा, ‘‘सुनीता, मैं तुम्हें अपनी सहेली के यहां भेज रही हूं. तुम वहां जा कर काम करो. हम लोग एक जगह इस तरह का काम नहीं कर सकते. एक जगह ऐसा काम करने में पकड़े जाने का खतरा रहता है.’’

सोनी ने सुनीता को अपनी सहेली शोभा के यहां भेज दिया. शोभा जानकीपुरम में रहती थी. वहां सुनीता के साथ और ज्यादा बुरा सलूक होने लगा. शोभा के यहां दिन में 2 और रात में 2 ग्राहक उस के पास आने लगे. ज्यादा कमाई के चक्कर में शोभा ने ग्राहकों की संख्या बढ़ा दी थी. क्योंकि उसे पता था कि सुनीता एक सप्ताह के लिए ही उस के पास आई है.

वह लालच में फंस गई. ज्यादा काम करने से सुनीता की तबीयत खराब हो गई. इस के बाद भी शोभा ने उस के पास ग्राहकों को भेजना जारी रखा. एक दिन सवेरे सुनीता को भागने का मौका मिल गया.

बिना किसी बात की परवाह किए सुनीता सवेरे 4 बजे घर से भाग निकली. घर से बाहर आते ही उसे मौर्निंग वाक कर जाने वाले प्रदीप मिल गए. उन की मदद से वह थाना जानकीपुरम पहुंची, जहां उस की मुलाकात इंसपेक्टर अमरनाथ वर्मा से हुई. उन्होंने सुनीता को आराम से बैठाया और उस की पूरी बात ध्यान से सुनी.

इस के बाद उन्होंने महिला सिपाही कोमल और ज्योति के जरिए पूरी जानकारी प्राप्त की. सुनीता से पता चला कि उस की तरह तमाम लड़कियां इस जाल में फंसी हुई हैं. वाट्सऐप के जरिए लड़कियों के फोटो भेज कर उन का सौदा किया जाता है.

सौदा तय होने के बाद वे लड़कियों को ग्राहकों तक पहुंचाते थे. लड़की को ग्राहक के पास पहुंचा कर वे पैसा ले लेते थे. अगले दिन सुबह जा कर लड़की को ले आते थे.

सीओ अलीगंज डा. मीनाक्षी ने मामले की जांच कराई. इसी के साथ शोभा, मणिशंकर, सुरजीत, तौहीद, सुमन और सोनी के खिलाफ देहव्यापार कराने का मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस ने सुरजीत, तौहीद, सुमन और सोनी को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन शोभा और मणिशंकर फरार होने में कामयाब रहे.

दरअसल, सुनीता के भागने का पता चलते ही वे भी घर छोड़ कर भाग गए थे. जांच में पता चला कि सुमन और सोनी मीठीमीठी बातें कर के लड़कियों को जाल में फंसाती थीं. इस के लिए वे कई बार रेलवे स्टेशन या बसअड्डे पर भी जाती थीं. इन का निशाना ऐसी लड़कियां होती थीं, जो नौकरी की तलाश में रहती थीं.

सुमन और सोनी महिलाएं थीं, इसलिए लड़कियां उन पर भरोसा कर लेती थीं. दोनों लड़कियों का भरोसा जीतने के लिए उन्हें अपने घर ठहराती थीं. वहां हंसीमजाक के दौरान उन की अश्लील फोटो खींच लेती थीं. इस के बाद उन्हीं फोटो की बदौलत वे उन्हें ब्लैकमेल कर के देहव्यापार में उतार देती थीं.

ये लड़की को बताते थे कि उन का ग्राहक बहुत बड़ा आदमी है. वह नौकरी दिलाएगा. इस के बाद बुकिंग और सप्लाई का धंधा शुरू हो जाता था. लड़की का पूरा खर्च यही लोग उठाते थे. ग्राहक के हिसाब से लड़की को हजार, 5 सौ रुपए दिए जाते थे.

ग्राहकों को लुभाने के लिए लड़कियों को आकर्षक कपड़े पहनने को दिए जाते थे, बढि़या मेकअप किया जाता था. जिस से ग्राहक मोटा पैसा दे सके. हर लड़की के एक रात के लिए 6 से 8 हजार रुपए लिए जाते थे.

कई बार ज्यादा कमाई के लिए ग्राहकों की संख्या बढ़ा दी जाती थी. बाद में यही लड़कियां दूसरी जरूरतमंद लड़कियों को यहां ले आती थीं. पुलिस ने सुनीता को उस के घर भेज कर बाकी आरोपियों को जेल भेज दिया है.

सुनीता का कहना है, ‘‘मुझे जरा भी अहसास नहीं हुआ कि मैं एक ऐसे जाल में फंसने जा रही हूं, जिस से मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं ने उन लोगों का क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने मेरा भविष्य खराब कर दिया. मैं ने तो मदद मांगी थी, उन लोगों ने मदद के बहाने मुझे देह के बाजार में धकेल दिया.’’ Varanasi Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित तथा सुनीता परिवर्तित नाम है

Hindi crime story: लखनऊ का कालगर्ल डौटकौम

Hindi crime story: ‘‘नेहा न तो ये देह व्यापार है और न ही तुम कोई कालगर्ल. यह तो जस्ट अ फन है, जिस में रात के कुछ घंटे किसी के साथ गुजारने हैं. ऐसे ही किसी के साथ भी नहीं, बल्कि जिसे तुम पसंद करो उस के साथ. पहले तुम उस की फोटो को पसंद कर लो, फिर वह तुम्हारी फोटो पसंद करेगा.’’ विपिन ने नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘फिर भी रिस्क तो है न, पकड़े गए तो क्या होगा?’’ नेहा को इस काम से इनकार नहीं था, वह तो बस बदनामी से डर रही थी. वह ऐसा लफड़ा नहीं चाहती थी, जिस से वह पकड़ी जाए.

‘‘नेहा, कोई रिस्क नहीं है, यह तो केवल गेम है. हम लोग तुम्हें होटल में छोड़ेंगे, वहां से तुम्हें हम ही पिक भी करेंगे. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. कई बार तो होटल की जगह किसी का घर भी हो सकता है.’’

‘‘यह सब केवल रात में ही करना होगा.’’ नेहा ने पूछा.

‘‘हां, केवल रात, वह भी पूरी नहीं. रात में 11 से सुबह 4-5 बजे तक. किसी को कानोंकान खबर नहीं होगी.’’

‘‘यार, कुछ गड़बड़ न हो बस.’’

‘‘कोई गड़बड़ नहीं होगी. तुम्हारे साथ रहने वाली प्रिया तो सब जानती है. एक रात का 10 हजार मिलेगा. आराम से 3-4 रात यह काम करो, इस के बाद महीना भर आराम से रहो. किसी तरह का कोई रिस्क नहीं, यह सारा काम इंटरनेट और वाट्सऐप पर चलता है.’’

ये सारी बातें नेहा और दलाल टाइप के युवक के बीच हो रही थीं. युवक उस गिरोह का हिस्सा था, जो सोशल मीडिया के माध्यम से देह व्यापार चला रहा था.

नेहा ने अपनी साथी प्रिया से पूछा तो उस ने बताया कि कई लड़कियां इस तरह ही अपना खर्च उठा रही हैं. इस के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. नेहा ने बात मान ली.

पहली बार नेहा को डर लगा लेकिन धीरेधीरे यह डर खत्म हो गया. अब नेहा और प्रिया एक साथ ही जाने लगीं. होटल और ग्राहक के बीच घूमते हुए नेहा को मजा आने लगा. लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के जरिए उन्हें जो ग्राहक मिलते थे, वे अलग थे. उन से मिले पैसों पर कमीशन नहीं देना पड़ता था.

कई बार प्रिया अपने लिए खुद भी ग्राहक खोज लेती थी. ऐसे में उसे किसी को पैसा भी नहीं देना होता था. प्रिया ने यह गुर नेहा को भी बताया, ‘‘कुछ दिन इन लोगों के साथ काम कर लो. उस के बाद हर हफ्ते 1-2 ग्राहक बना लो, अच्छा पैसा मिलने लगेगा. पता है, खुद को तैयार करने के लिए मेकअप से ले कर ड्रैस तक खुद ही खरीदनी पड़ती है.’’

प्रिया ने आगे बताया, ‘‘हर ग्राहक को हर बार नई लड़की की जरूरत होती है. ऐसे में हम दोनों अपने ग्राहकों में अदलाबदली कर लेंगे. इस में हमें किसी और को पैसे नहीं देने होंगे.’’

नेहा ने पूछा, ‘‘जब सब हम ही लोग कर लेंगे तो इन लड़कों को क्यों साथ रखें?’’

प्रिया ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, हर ग्राहक शरीफ नहीं होता. कई बार जब उसे लगता है कि अकेली लड़की है तो वह अपनी मनमरजी करने लगता है. ग्राहक के साथसाथ लड़की को अकेली जान कर पुलिस भी परेशान करती है. ऐसे में लड़कों का सहारा होता है तो ठीक रहता है. यह हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है.’’

नेहा और प्रिया की तरह दरजनों लड़कियां लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के माध्यम से देह व्यापार कर रही थीं. ये लड़कियां लालच दे कर नई लड़कियों को देह व्यापार के लिए तैयार भी करती थीं. वैसे ही जैसे एक दलाल और प्रिया ने नेहा को तैयार किया था. कोठे, कोठियों, रेडलाइट एरिया और मसाज पार्लरों से होता हुआ देहव्यापार अब इंटरनेट तक पहुंच चुका है. अब कई ग्राहक वाट्सऐप पर लड़कियों के फोटो और वीडियो देख कर उन्हें पसंद करने लगे हैं. इंटरनेट से देहधंधे में सुविधाएं बढ़ गई हैं. लड़की को अपने अड्डे से ले कर होटल तक ले जाया जा सकता है.

होटल की भी इंटरनेट से बुकिंग होने लगी है, जहां पहले जैसी छानबीन का खतरा नहीं होता. कालोनियों के घरों जैसे बने कुछ कमरों में ही होटल चलने लगे हैं. ऐसे होटलों में खानेपीने की सुविधाएं नहीं होतीं, वहां केवल ठहरने की सुविधा होती है. खानेपीने की सुविधा के लिए होटल के बाहर बनी दुकानों पर निर्भर होना पड़ता है. इस तरह के रैकेट चलाने वाले पेशेवर लड़कियों के दलाल नहीं होते. यहां धंधा करने वाली लड़कियां भी जबरन नहीं लाई जातीं. वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए ही इन को बुलाया जाता है.

कई तो हौलीडे पैकेज मान कर 4 से 6 दिन के लिए आती हैं और बाकी बचे महीने भर इस धंधे से दूर रहती हैं. इन में कुछ पढ़ने वाली लड़कियां हैं तो कुछ प्राइवेट जौब करने वाली. कुछ तो डांस, मौडलिंग और एक्टिंग के क्षेत्र में काम करने का दावा तक करती हैं. देह के इस धंधे में इस तरह की लड़कियों की डिमांड ज्यादा होती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर जैसे पौश एरिया में एक ऐसे ही सैक्स रैकेट को पकड़ा गया. यह सैक्स रैकेट लखनऊ कालगर्ल डौटकौम के नाम से चलता था. गिरोह को चलाने वाले लड़के लड़कियों को ग्राहकों के कमरों तक पहुंचाने और वहां से सुरक्षित लाने का काम भी करते थे.

कई बार ग्राहक पैसे देने में आनाकानी और लड़कियों से जोरजबरदस्ती करने की कोशिश करता है तो उस के लिए गिरोह चलाने वाले अपने पास रिवौल्वर रखते हैं ताकि ऐसे लोगों को धमकाया जा सके. लखनऊ पुलिस को इस बात की सूचना लगी तो उस ने इस गिरोह का राजफाश करने का बीड़ा उठाया. पुलिस ने देर रात चलने वाले वाहनों पर नजर रखनी शुरू कर दी.

9 जून, 2018 को रात करीब ढाई बजे सीओ गोमतीनगर चक्रेश मिश्रा के निर्देश पर पुलिस कठौथा झील के पास आनेजाने वाले वाहनों की चैकिंग कर रही थी, तभी लाल रंग की कार में कुछ लोग आते दिखे. पुलिस ने जब उन्हें रुकने का इशारा किया तो वे तेजी से भागने लगे. पुलिस द्वारा पीछा करने पर कार से उतर कर भाग रहे विपिन नाम के लड़के को पकड़ा गया तो पता चला कि वे लोग सैक्स रैकेट का संचालन कर रहे थे. कार सवार लड़के तो भाग गए लेकिन कार से उतरने वाले लड़के को पुलिस ने पकड़ लिया.

पुलिस ने उस के पास से आधार दरजन मोबाइल, 13 हजार रुपए, एक पिस्टल और एक कार बरामद की. पुलिस की छानबीन में उस ने अपना नाम विपिन शर्मा बताया. विपिन ने अपने फरार साथियों के नाम अंकित, अतुल और गोलू बताए. उस ने पुलिस को बताया कि वे लोग देह व्यापार का धंधा करते हैं. बरामद पिस्टल के बारे में विपिन ने बताया कि कुछ ग्राहक बिगड़ैल किस्म के होते हैं. ऐसे लोग पेमेंट को ले कर लड़ाईझगड़ा तो करते ही हैं, लड़कियों को सैक्स के दौरान परेशान भी करते हैं. पिस्टल ऐसे ग्राहकों को डराने के काम आती है.

विपिन के पास से बरामद पिस्टल गैरलाइसेंसी थी. विपिन ने उस रात 3 लड़कियां ग्राहकों के पास भेजी थीं. वे लड़कियां वापस आने वाली थीं, ये लोग उन्हीं को लेने के लिए आए थे. यह जानकारी मिलते ही एसएसआई अमरनाथ सरोज ने थाने से 2 महिला सिपाही चारू मलिक और रुचि मांगट को बुला लिया. विपिन के दिए बयान के अनुसार पुलिस वहां आने वाली लड़कियों का इंतजार करने लगी. सुबह करीब 6 बजे कार से 4 युवक विकास यादव, कर्मदेव यादव, सतवंत सिंह और आदित्य वर्मा वहां आए. पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया.

इन लोगों ने पुलिस को बताया कि 3 लड़कियों को होटल के पास छोड़ा था. वे अभी आ रही होंगी. कुछ ही देर में 3 लड़कियां पैदल आती दिखीं. इन्हें महिला सिपाहियों ने पकड़ लिया. पुलिस की तलाशी में रीना, प्रिया और नेहा के पास पर्स से नकदी, मोबाइल और कुछ आपत्तिजनक चीजें मिलीं. इस में 2 लड़कियां प्रिया और नेहा हावड़ा की रहने वाली थीं. ये चिनहट के पास एक महिला हौस्टल में रह रही थीं. रीना गोरखपुर की थी और एमबीए की पढ़ाई करने के लिए हौस्टल में रह रही थी. पुलिस जब लड़कियों को ले कर होटल गई तो वहां कोई ग्राहक नहीं मिला. ग्राहकों के नाम अहसान अली और दुर्गेश कुमार थे, जो पहले ही जा चुके थे.

पुलिस को पता चला कि इस रैकेट को विपिन कुमार अपने साथियों के साथ मिल कर चलाता था. ये लोग एक कमरा ले कर किराए पर रहते थे. विपिन बीकौम में पढ़ता है, जबकि विकास और आदित्य प्राइवेट जौब करते हुए यह काम करते थे. विभूतिखंड थाने के प्रभारी बृजेश कुमार राय ने बताया कि पुलिस को पता चला है कि ये लोग बड़ेबड़े लोगों को भी लड़कियां सप्लाई करते थे. इस की जांच होगी. पुलिस के सहयोग के लिए साइबर क्राइम पुलिस को भी सहयोग देने के लिए कहा गया है.

पूरा मामला इंटरनेट से जुड़ा होने के कारण साइबर पुलिस की उपयोगिता बढ़ गई थी. उस के सहयोग से ही पुलिस इंटरनेट पर ठिकाना बना कर देह व्यापार कराने वाले रैकेट को पकड़ सकी. पुलिस भी मानती है कि ऐसे धंधों का खत्म होना संभव नहीं है. धरपकड़ कर के केवल इन्हें सीमित भर किया जा सकता है.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. पहचान छिपाने के लिए कुछ नाम बदल दिए गए हैं

Hindi Crime Story: तांत्रिक की सेक्स पूजा

Hindi Crime Story: बदहवास युवती अजमेर के थाना आदर्श नगर थानाप्रभारी सुगन सिंह के सामने जमीन पर घबराई हुई आकर बैठ गई. उस ने उन के पांव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘साहबजी, मुझे बचा लीजिए, वह आज फिर मेरी इज्जत लूटेगा.’’

‘‘कौन इज्जत लूटेगा? मेरा पैर छोड़ो पहले. ऊपर कुरसी पर सामने बैठ कर बताओ कि क्या कहना चाहती हो?’’ सुगन सिंह बोले और एक महिला सिपाही को पानी का गिलास लाने के लिए कहा.

‘‘महिला सिपाही एक गिलास पानी ले आई. तब तक करीब 22-23 साल की दिखने वाली युवती थानाप्रभारी के सामने की कुरसी पर बैठ गई. झट से पानी का गिलास ले कर पानी तेजी से पी गई.

‘‘अब शांति से बताओ कि तुम्हारा नाम क्या है? कहां से आई हो? क्या बात है? तुम क्यों घबराई हुई हो?’’ थानाप्रभारी सुगन सिंह ने एक साथ कई सवाल कर दिए.

‘‘मेरा नाम ललिता है साहब. मुझे बचा लो साहब, मैं अब घर नहीं जाऊंगी. क्योंकि वह फिर मेरे साथ रेप करेगा. बहुत तकलीफ होती है साहब. बुरीबुरी हरकत करता है वो,’’ युवती एक सांस में बोली.

‘‘कौन है वह? पूरी बात साफसाफ बताओ. पहले इस पन्ने पर अपना नाम और पूरा पता लिखो,’’ थानाप्रभारी ने उस की ओर सादा पन्ना लगा राइटिंग पैड और कलम बढ़ा दिया. युवती पन्ने पर अपना नामपता लिखने के बाद बताने लगी—

‘‘साहब, मैं यहीं आदर्श नगर क्षेत्र में ही रहती हूं. मैं 22 फरवरी को अपने मातापिता के साथ एक रिश्तेदार की शादी में दिल्ली गई थी. वहीं एक तथाकथित तांत्रिक राजेंद्र कुमार ने मेरे मातापिता को बताया कि उन का पूरा परिवार मृत्युदोष से ग्रसित है.

‘‘उस ने कहा कि परिवार में पहले छोटी बेटी, फिर पिता उस के बाद बड़ी बेटी की मृत्यु होने वाली है. हवन और पूजापाठ से इस बला से मुक्ति मिल सकती है. उस ने खुद को पहुंचा हुआ तांत्रिक बताया था.

‘‘मेरे पिता उस की बातों में आ गए और उसे अपने घर आने को कह दिया. उस के बाद  27 फरवरी, 2022 को वह तांत्रिक हमारे घर आ गया और पूजापाठ की तैयारी करने के साथ ही कहा कि विशेष पूजा सिर्फ घर की बड़ी बेटी के साथ होगी.

‘‘परिवार वाले तांत्रिक के हर आदेश को मानते हुए बड़ी बेटी के नाते मुझे घर में छत पर बने एक कमरे में तांत्रिक के साथ बंद कर दिया. तांत्रिक पूजा करने के लिए मंत्रजाप करने लगा. उस ने मुझे मंत्रपूरित पानी पीने के लिए दिया.

‘‘पानी पीते ही मेरी आंखें मुंदने लगीं. अर्द्धबेहोशी की हालत में उस ने मेरे कपड़े उतार दिए और मेरे साथ जबरदस्ती की. मैं ने उस का विरोध किया तब उस ने मेरी पिटाई कर दी. मुझे यह कह कर डरा दिया कि उस की आज्ञा का पालन नहीं किया तो मांबाप की मौत हो जाएगी.

‘‘मैं डर गई. उस ने मेरे साथ रेप किया और पिता से एक लाख रुपए भी लिए. एक सप्ताह बाद वह फिर आया और मेरे साथ एक मंदिर में पूजा करने के बहाने से वह मुझे मुरैना ले गया. वहां मुझे एक धर्मशाला में ठहराया और मेरे साथ जोरजबरदस्ती की.

‘‘उस के बाद होली से पहले घर आया और पूजापाठ के बहाने से रेप किया. फिर वही बाबा आज घर आ गया है और पूजा करने की योजना बना रहा है. वह फिर मेरी इज्जत लूटेगा. मेरे साथ जोरजबरदस्ती करेगा… मुझे बचा लीजिए साहब.’’

यह बात 19 मार्च, 2022 की है. ललिता की शिकायत पर थानाप्रभारी सुगन सिंह ने ललिता को विश्वास दिलाया कि अब तुम्हारे साथ कुछ नहीं होगा और उस तांत्रिक के खिलाफ कानूनी काररवाई की जाएगी.

मामला काफी गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने उसी वक्त यह जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी. तब अजमेर के एसपी ने एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एएसपी (सिटी) विकास सांगवान, सीओ (दक्षिण) राजेंद्र बुरडक, थानाप्रभारी सुगन सिंह, एएसआई विजय कुमार, हैडकांस्टेबल संतोष कुमार, कांस्टेबल रमेश, करतार सिंह, पीयूष आदि को शामिल किया.

ललिता को साथ ले कर पुलिस टीम आदर्श नगर स्थित उस के घर पहुंच गई. उस समय घर पर वह तांत्रिक ललिता के घर वालों के साथ बातें करने में मशगूल था. ललिता के साथ पुलिस को देख कर उस के घर वाले ही नहीं, बल्कि तांत्रिक राजेंद्र भी चौंक गया.

ललिता के इशारे पर पुलिस ने तांत्रिक राजेंद्र को हिरासत में ले लिया. लेकिन उस का सहयोगी पवन वहां से भाग गया. पुलिस ने तांत्रिक को गिरफ्तार करने की वजह ललिता के मातापिता को बताई तो उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस तांत्रिक के कहने पर वह सब कुछ कर रहे थे, वह उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा है. घर वालों से पूछताछ करने के बाद पुलिस तांत्रिक राजेंद्र को थाने ले आई.

पूछताछ में पता चला कि उस तथाकथित तांत्रिक का नाम राजेंद्र कुमार वाल्मिकी है और वह दिल्ली के गुलाबी बाग क्षेत्र स्थित प्रताप नगर में रहता है. राजस्थान के रहने वाले ललिता के पिता की तांत्रिक के संपर्क में आने की एक अलग घटना है. दरअसल, ललिता के पिता कोरोना काल के दौरान वायरस संक्रमण का शिकार हो गए थे. स्वस्थ होने के बाद वह अपने कामधंधे में जुट गए थे, लेकिन जब भी कुछ अनहोनी होती तो वह डर जाते थे.

इसी बीच फरवरी, 2022 में उन का दिल्ली जाना हुआ. वहां उन के एक रिश्तेदार के यहां शादी थी. उसी दौरान उन्होंने अपने रिश्तेदार से अपनी समस्या बताई. रिश्तेदार ने इस का उपाय करने के लिए एक तांत्रिक से मिलवाया. वह तांत्रिक कोई और नहीं राजेंद्र कुमार वाल्मिकी था. तांत्रिक ने देखते ही बताया कि उस पर भूत का साया है और वह मृत्युदोष का शिकार है. उस ने छूटते ही कहा कि उस पर एक बार मृत्यु आ कर वापस लौट चुकी है, लेकिन अबकी बार आएगी तब बारीबारी से परिवार के 3 सदस्यों को अपने साथ ले जाएगी.

ललिता के पिता यह सुन कर डर गए. उन का 4 लोगों का परिवार था. पतिपत्नी और 2 बेटियां. वह चिंतित हो गए कि पता नहीं परिवार के किस सदस्य को मौत गले लगा ले. उन्होंने बाबा से तुरंत उपाय पूछा. बाबा ने कहा कि घर में 5 दिनों का अनुष्ठान करना होगा और अनुष्ठान में घर की कुंवारी कन्या को शामिल करना जरूरी होगा. इस के साथ ही उस ने कुछ शर्तें भी रखीं, जो उस ने कान में कही थीं. इस में मोटी रकम खर्च की भी बात थी.

ललिता के पिता ने बाबा की सभी शर्तों को मान कर तांत्रिक राजेंद्र को फरवरी, 2022 महीने में अपने घर बुला लिया और तांत्रिक पूजा के लिए घर की छत का एक कमरा दे दिया. पूजा में शामिल होने के लिए उन्होंने बड़ी बेटी को सौंप दिया. उस के बाद बाबा ने तंत्र पूजा के बहाने से वासना का खेल खेला. रेपलीला की. परिवार के बाकी सदस्यों ने बाबा की खूब आवभगत की थी.

शिक्षित ललिता समझ गई कि उस के पिता ढोंगी तांत्रिक के जाल में फंस चुके हैं. उस ने हिम्मत दिखाई और थाने जा कर उस तांत्रिक के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी. पुलिस ने ढोंगी तांत्रिक के मोबाइल फोन की जांच की तो उस से कई राज खुले. जांच में सामने आया कि राजेंद्र कुमार वाल्मिकी खुद को भगवान बताता था. कहता था, वह भूत को बोतल में बंद कर रखता है. फिर मृत्यु दोष और भूत के साए के नाम पर लोगों को डराधमका कर उन की बहूबेटियों से रेप करता था.

तांत्रिक धंधे में जुड़ने से पहले राजेंद्र कुमार दिल्ली में आटोरिक्शा चलाता था. वह सट्टा व जुआ भी लगाता था. नौकरी का झांसा दे कर धोखाधड़ी करता था. इतना ही नहीं, वह खुद 5वीं फेल है, लेकिन बीमारियों का शर्तिया इलाज करने का झांसा दे कर लोगों से रुपए ऐंठता था. वह जिस परिवार को निशाना बनाता, उस के बारे में दूर के रिश्तेदारों से पहले ही सारी जानकारियां जुटा लेता था. परिवार की समस्या को दूर करने के लिए तांत्रिक राजेंद्र उस के घर में आसन जमा लेता. रात के समय लोगों को उन से जुड़ी पुरानी बुरी घटनाओं को बता कर स्वयं को भगवान का अवतार बताता.

परिजनों से कहता कि आप के घर में भयानक भूत ने अड्डा जमा रखा है. भविष्य में सब से पहले आप की सब से छोटी संतान को मारेगा और उस के बाद सब की बारी आएगी. मंत्रों से भूत को बोतल में बंद करने के लिए परिवार की सब से बड़ी बेटी को कमरे में अकेले साथ भेजने के लिए कहता. एकांत में तांत्रिक क्रिया करने का नाटक करता. डरेसहमे परिजन ढोंगी की बातों में आ कर बहूबेटियों को उस के कमरे में भेज देते थे. वह परिजनों को दरवाजे के बाहर बैठा देता और जोरजोर से कुल देवता का मंत्र जाप करने के लिए कहता. इस दौरान तांत्रिक क्रिया के बहाने वह महिलाओं से रेप करता था.

बोतल में काले डोरे, रंग आदि लगा कर लाता और परिजनों से कहता कि तंत्रमंत्र कर भूत को बोतल में बंद कर दिया है. अब इस बोतल को दूर जंगल में फेंक आओ. एक पीडि़त परिवार से किसी दूसरे पीडि़त परिवार के बारे में जानकारी जुटाता और फिर इस प्रकार एक चेन सिस्टम बना कर लोगों को फंसाता था. तांत्रिक के मोबाइल फोन में औनलाइन सट्टे पर दांव लगाने के सबूत भी पुलिस को मिले. पुलिस की शुरुआती पड़ताल में सामने आया कि दिल्ली निवासी विजय सोनकर ने ढोंगी बाबा को अपने तीनों बेटों की सरकारी नौकरी लगवाने के लिए 10 लाख रुपए दिए थे.

मामले में पीडि़त विजय द्वारा दिल्ली के सराय रोहिल्ला थाने में मुकदमा दर्ज कराया था. साथ ही ढोंगी बाबा से कई लोगों का इलाज करने के बहाने रुपए ऐंठने की वाट्सऐप चैटिंग और पेमेंट के स्क्रीनशौट मिले. अजमेर पुलिस ने इस ढोंगी तांत्रिक राजेंद्र को गिरफ्तार कर उस के काले कारनामों से परदा उठा दिया. बताते हैं कि यह 300 से 400 परिवारों को अपना शिकार बना चुका है. इतना ही नहीं, जब आरोपी बाबा को गिरफ्तार किया गया, तब उस ने पुलिस पर अपने तंत्रमंत्र का भय दिखाया, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे ज्यादा देर नहीं टिक पाया.

पुलिस गिरफ्त में आने के बाद तांत्रिक राजेंद्र का कानून के चंगुल से बचना मुश्किल हो गया. उस पर अंधविश्वास, ठगी से ले कर रेप तक की धाराएं लगा कर पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस मामले में ढोंगी बाबा राजेंद्र वाल्मिकी (49) के बेटे अभिषेक सिरसवाल उर्फ बुक्की (25 साल) को भी पुलिस ने दिल्ली की सराय रोहिल्ला मलकागंज रेलवे कालोनी से गिरफ्तार कर लिया.

वह अपने पिता की तंत्र विद्या का प्रचार करता था. लोगों को उन के चमत्कारी उपाय के बारे में बताता था. भूतप्रेत भगाने के नाम पर वसूली जाने वाली रकम को वह ही लेता था. फरार हो चुके तांत्रिक के सहयोगी पवन कुमार को पुलिस संभावित स्थानों पर तलाश रही थी, लेकिन वह कथा संकलन तक गिरफ्तार नहीं हो सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में ललिता परिवर्तित नाम है.

Best Spy Agencies: ये हैं दुनिया की बेहतरीन जासूसी एजेंसियां

Best Spy Agencies: हम ने कई फिल्मों में रा और आईएसआई के एजेंटों के बारे में देखा है. टीवी पर भी इस से संबंधित कई सीरियल आए हैं. जैसे अनिल कपूर का मशहूर शो ‘24’ भी काफी लोकप्रिय हुआ था. इस में अनिल कपूर ने एक रा एजेंट की भूमिका निभाई थी. आज के किशोर आधुनिक तकनीकी के साथ हर चीज से अपडेट रहना चाहते हैं तो क्यों न उन्हें दुनिया की खासखास और बेहतरीन खुफिया एजेंसियों के बारे में जानकारी दी जाए.

किसी भी देश में सुरक्षा और चौकसी बनाए रखने के लिए कई तरह की सेनाओं, एजेंसियों और अन्य माध्यमों का प्रयोग किया जाता है. इन में से एक महत्त्वपूर्ण कार्य है जासूसी करना. यह काम सरकारी जासूसी एजेंसी से कराया जाता है. खुफिया एजेंसियों का काम दूसरे देशों और संगठनों में सेंध लगा कर उन की जानकारी अपने देश के लिए निकालना होता है.

यही कारण है कि हर देश अपनी सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुफिया एजेंसियों पर निर्भर रहता है. वह खुफिया जानकारी ही होती है, जो किसी भी वारदात को अंजाम तक पहुंचने से पहले रोक सकती हैं.

दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों के असर को काटने के लिए अपनी खुफिया एजेंसी को ज्यादा कारगर बनाना जरूरी होता है. इन एजेंसियों में काम करने वाले लोग और इन के तरीके आम लोगों को पता नहीं होते. इन का सार्वजनिक रूप से कभी खुलासा भी नहीं किया जाता. इन के काम का भी कोई सेट फार्मूला नहीं होता है. यहां कुछ खुफिया एजेंसियों के बारे में बताया जा रहा है, जिन के काम करने की शैली आम लोगों के लिए हमेशा राज ही रहती है.

रा (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग, भारत)

खुफिया एजेंसी किसी भी देश की सुरक्षा में अपना अलग महत्त्व रखती है. रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रा) का गठन 1962 के भारतचीन युद्ध और 1965 के भारतपाक युद्ध के बाद तब किया गया, जब इंदिरा गांधी सरकार ने भारत की सुरक्षा की जरूरत को महसूस किया. इस की स्थापना सन 1968 में की गई थी. इसे दुनिया की ताकतवर खुफिया एजेंसी माना जाता है.

society

इस पर खासतौर से विदेशी धरती से भारत के खिलाफ रची जाने वाली साजिशों, योजनाओं का पता लगाने, अपराधियों और आतंकवादियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने और उस के हिसाब से देश के नीति निर्माताओं को जानकारी मुहैया कराने की जिम्मेदारी है, ताकि देश और यहां के लोगों की सुरक्षा संबंधी नीतियों को बेहतर बनाया जा सके.

इसका मुख्यालय दिल्ली में स्थित है. यह एजेंसी भारत के प्रधानमंत्री के अलावा किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. यह विदेशी मामलों, अपराधियों, आतंकियों के बारे में पूरी जानकारी रखती है. रा अपने खुफिया औपरेशंस के लिए जानी जाती है. इस ने अपनी कार्यकुशलता के जरिए कई बडे़ आतंकी हमलों को नाकाम किया है.

इस के सभी मिशन इतने सीक्रेट होते हैं कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती. यहां तक कि एजेंसी में काम करने वालों के परिजनों तक को पता नहीं होता कि वह किस मिशन पर काम कर रहा है. यह एजेंसी इतनी खुफिया है कि किसी भी अखबार को इस के बारे में छापने की अनुमति नहीं है.

आईएसआई (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस, पाकिस्तान)

यह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी है जो आतंकवाद और उपद्रव को बढ़ाने के लिए भी बदनाम रही है. आईएसआई की स्थापना सन 1948 में की गई थी. 1950 में पूरे पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का जिम्मा आईएसआई को सौंप दिया गया था.

society

इस में सेना के तीनों अंगों के अधिकारी मिल कर काम करते हैं. अमेरिका क्राइम रिपोर्ट के मुताबिक आईएसआई को सब से ताकतवर एजेंसी बताया गया था. हालांकि आईएसआई पर आए दिन आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. भारत में हुए कई आतंकी हमलों में भी आईएसआई के एजेंटों की भूमिका उजागर हो चुकी है. इस का मुख्यालय इस्लामाबाद में है.

सीआईए (सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी, अमेरिका)

यह अमेरिका की बहुचर्चित खुफिया एजेंसी है. इस की स्थापना सन 1947 में तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने की थी. सीआईए 4 भागों में बंटी हुई है. इस का मुख्यालय वर्जीनिया में है. सीआईए सीधे डायरेक्टर औफ नैशनल इंटेलिजेंस को रिपोर्ट करती है. 2013 में वाशिंगटन पोस्ट ने सीआईए को सब से ज्यादा बजट वाली खुफिया एजेंसी बताया था. साइबर क्राइम, आतंकवाद रोकने समेत सीआईए देश की सुरक्षा के लिए काम करती है. कहा जाता है कि अमेरिका को सुपर पावर का दरजा सीआईए के खुफिया कार्यक्रमों की वजह से ही मिल पाया है.

वैसे भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में सीआईए की गतिविधियों को ले कर सदैव प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं. हालांकि ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में सीआईए की सफलता एक लंबे अरसे के बाद मिली ऐतिहासिक विजय मानी गई थी. सीआईए के पास दूसरे देशों से खुफिया जानकारी जुटाने के अलावा आतंकवाद, परमाणु हथियार और देश के बड़े नेताओं की सुरक्षा का भी जिम्मा है.

society

मौजूदा समय में सीआईए के सामने आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है. कहा जाता है कि सीआईए का बजट अरबों डौलर का होता है. इसे मिलने वाले पैसे की जानकाररी को वैसे तो गुप्त रखा जाता है पर माना जाता है कि 2017 में इस के लिए अमेरिकी सरकार ने 12.82 अरब डौलर का बजट दिया था.

एमआई-6 (मिलिट्री इंटेलिजेंस सेक्शन-6, ब्रिटेन)

जेम्स बौंड सीरीज की फिल्मों में बौंड के किरदार को इसी इंटेलिजेंस एजेंसी का सीक्रेट एजेंट बताया जाता है. अब आप समझ ही गए होंगे कि तकनीक और बहादुरी में इस का कोई मुकाबला नहीं है. इस की स्थापना सन 1909 में की गई थी. यह सब से पुरानी खुफिया एजेंसियों में से एक है. माना जाता है कि इस एजेंसी ने अपनी सेवाएं प्रथम विश्वयुद्ध में भी दी थीं और हिटलर को हराने में इस की मुख्य भूमिका थी.

society

इस एजेंसी की खास बात यह भी है कि यह दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों को भी उन के मिशन में मदद करती है. इसे यूनाइटेड किंगडम की सुरक्षा का गुप्त मोर्चा भी कहा जाता है. एमआई-6 जौइंट इंटेलिजेंस, डिफेंस सरकार के साथ जानकारी साझा करने जैसे काम करती है.

एमएसएस (मिनिस्ट्री औफ स्टेट सिक्योरिटी, चीन)

यह चीन की एकलौती खुफिया एजेंसी है, जो आंतरिक और बाहरी दोनों मामलों पर नजर रखती है. इस का मुख्यालय बीजिंग में है. यह एजेंसी चीन को विश्व की गतिविधियों से अवगत कराती है. इस एजेंसी के जिम्मे काउंटर इंटेलिजेंस औपरेशंस और विदेशी खुफिया औपरेशंस को चलाना है. इस का गठन सन 1983 में हुआ था.

यह एजेंसी देश के आंतरिक मामलों में दखल बस कम्युनिस्ट पार्टी की लोकप्रियता बनाए रखने के लिए देती है. चीन जैसे कम्युनिस्ट देश में कई बार सूचनाओं पर भी प्रतिबंध लग जाते हैं.

वैसे भी यहां की कम्युनिस्ट सरकार को अगर कोई गुप्त सूचना या दुश्मन के बारे में जानना होता है तो वह एमएसएस को ही याद करती है. यह चीनी सरकार की सब से भरोसेमंद एजेंसी है. इस एजेंसी का एक ही मकसद है चीनी जनता की रक्षा और कम्युनिस्ट पार्टी का शासन बरकरार रखना.

पिछले 2 दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तेजी से उभरी है. इस की खासियत यह है कि जितनी बारीकी से यह अपने देश के नागरिकों की हर गतिविधि का रिकौर्ड रखती है, उतना ही मजबूत तंत्र इस का विदेशों में भी है.

society

चीन ने जिस तरह से आर्थिक क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया है और उस से महाशक्ति अमेरिका तक परेशान है, ठीक इसी तरह उस की खुफिया एजेंसी भी काफी मजबूत हो गई है. उस के स्लीपर सेल आज दुनिया के कोनेकोने में फैले हुए हैं.

एएसआईएस (आस्ट्रेलियन सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस, आस्ट्रेलिया)

यह आस्ट्रेलिया की खुफिया एजेंसी है. पिछले 2 दशकों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तेजी से उभरी है. इस का मुख्यालय कैनबरा में है. इस का सहयोग व्यापार और विदेशी मामलों में भी लिया जाता है. 13 मई, 1952 को इस जांच एजेंसी का गठन किया गया था. इस की इंटेलिजेंसी काफी कुशल है जो अब तक इसे अंतरराष्ट्रीय खतरों से बचाए हुए है. इस का कार्यक्षेत्र एशिया और प्रशांत महासागर के क्षेत्र हैं.

यह खुफिया एजेंसी आस्ट्रेलियाई सरकार की एक तरह से वाचडौग है और यह चौबीसों घंटे देश की सेवा में लगी रहती है. पिछले कुछ सालों में इस ने कई घरेलू और बाहरी अपराधियों को गिरफ्तार करवाया है.

society

मोसाद (इजराइल)

यह खुफिया एजेंसी दुनिया की सब से बेहतरीन खुफिया एजेंसी मानी जाती है. इस एजेंसी का अरब के देशों में काफी दबदबा है. इस की स्थापना सन 1949 में की गई थी. इस के बारे में खास बात यह है कि ये अपना काम बहुत ही क्रूरता के साथ करती है.

अगर इजराइल या फिर उस के नागरिकों के खिलाफ कोई साजिश रची जा रही हो तो जानकारी मिलने पर मोसाद के खूंखार एजेंट ऐसे साजिशकर्ताओं को दुनिया के किसी भी कोने से ढूंढ कर मौत के घाट उतार देते हैं.

society

यह दुनिया की सब से खतरनाक खुफिया एजेंसी है. कहा जाता है कि इस का कोई भी औपरेशन आज तक फेल नहीं हुआ. मोसाद मुख्यत: आतंक विरोधी औपरेशंस को अंजाम देती है और सीक्रेट औपरेशंस चलाती है, जिस का उद्देश्य देश की रक्षा करना होता है. वैसे तो मोसाद काम इजराइल में अन्य एजेंसियों के साथ मिल कर करती है, लेकिन उस की जवाबदेही केवल प्रधानमंत्री को ही है.

डीजीएसई (डायरेक्टोरेट जनरल फौर एक्सटर्नल सिक्योरिटी, फ्रांस)

इस एजेंसी को सन 1982 में बनाया गया था, जिस का मकसद फ्रांस सरकार के लिए विदेशों से खुफिया जानकारी एकत्र करना है. इस का मुख्यालय पेरिस में है. यह एजेंसी अन्य देशों की खुफिया एजेंसी से काफी अलग है. डीजीएसई सिर्फ देश के बाहरी मामलों पर नजर रखती है. इस का मुख्य काम सरकार को आईएसआई की गतिविधियों से आगाह कराना है.

यह लोकल पुलिस के साथ मिल कर भी काम करती है. इस एजेंसी के द्वारा सेना और पुलिस को रणनीति बनाने में बहुत सहयोग दिया जाता है. कुछ देशों की तरह यह एजेंसी भले ही शक्तिशाली न हो लेकिन 9/11 के बाद इस ने 15 आतंकवादी घटनाएं होने से बचाई है. संसाधनों की कमी के बावजूद इस के हजारों जासूस दुनिया भर में फैले हुए हैं.

बीएनडी (फेडरल इंटेलिजेंस सर्विस, जर्मनी)

जर्मनी की बीएनडी को बेहतरीन और आधुनिक तकनीकों से लैस खुफिया एजेंसी माना जाता है. इस का मुख्यालय म्यूनिख के पास पुलाच में है. इस एजेंसी की खास बात यह है कि यह दुनिया भर की फोन काल्स पर खास नजर रहती है. इस एजेंसी के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है.

इस की निगरानी प्रणाली इतनी शानदार है कि शायद ही कोई इंटेलिजेंस एजेंसी इसे मात दे पाए. खतरे को पहले ही भांप कर यह उसे खत्म कर देती है. इस का गठन सन 1956 में हुआ था. बीएनडी योजनाबद्ध अपराध, प्रौद्योगिकी के अवैध हस्तांतरण, हथियारों और नशीली दवाओं की तस्करी, मनी लांड्रिंग और गैरकानूनी ढंग से देश से आनेजाने वालों का भी मूल्यांकन करती है.

समय के साथसाथ इस एजेंसी ने अपने कदम काफी आगे बढ़ा लिए हैं, इस एजेंसी की सब से बड़ी ताकत इस के जासूस होते हैं. अपने जासूसों के बल पर ही यह एजेंसी जान पाती है कि दुनिया में क्या चल रहा है. कहते हैं कि मौजूदा समय में बीएनडी के पास लगभग 4 हजार जासूसों का नेटवर्क है.

देश की सुरक्षा से संबंधित इस एजेंसी के पास बहुत से अधिकार भी हैं जैसे कि सुरक्षा की बात हो तो यह कभी भी किसी का भी फोन टेप कर सकती है. किसी की निजी जानकारी लेने पर भी वह किसी भी प्रकार की बाधा में नहीं फंसते हैं.

एफएसबी (फेडरल सिक्योरिटी सर्विस, रूस)

1995 में स्थापित एफएसबी खुफिया एजेंसी का लोहा पूरी दुनिया मानती है. इस का मुख्यालय मौस्को में है. माना जाता है कि सूचना देने और सुरक्षा पहुंचाने में एफएसबी का कोई जवाब नहीं है. खुफिया से जुड़े मामलों के अलावा एफएसबी बौर्डर से जुड़े मामलों पर भी गहरी नजर रखती है. यह गंभीर अपराधों और संघीय कानूनों के उल्लंघन की जांच भी करती है. ऐसा रूस के शीर्ष सुरक्षा बलों का मानना है.

society

यूं तो पिछले कई सालों तक जब सोवियत संघ का पतन नहीं हुआ था, तब रूस में खुफिया एजेंसी केजीबी का दबदबा था और राष्ट्रपति पुतिन उस के चीफ रह चुके हैं. लेकिन एफएसबी ने पिछले कुछ सालों से आतंकवाद के खात्मे के लिए जो कार्यक्रम चलाए हैं, उस से यह रूस की नंबर एक खुफिया एजेंसी बन गई है.

इस एजेंसी ने ही रूस को एक बार फिर सुपरपावर देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बना दिया है वरना केजीबी के बंद होने के बाद रूस की परेशानी बढ़ गई थी. देश के बाहर ही नहीं, बल्कि देश में आतंकवाद की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए यह मशहूर है. Best Spy Agencies

Crime Story: नकली नोटों को असली बनाने की शातिर चाल

Crime Story: कोलकाता में पिछले दिनों नकली नोटों का एक बड़ा और अनोखा मामला सामने आया. गिरफ्तार चंद्रशेखर जायसवाल पुराने और सड़ेगले असली नोटों के ‘सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड’ को निकाल कर उस से नकली नोट तैयार करता था. एक और बड़ी बात यह कि चंद्रशेखर न केवल नकली भारतीय करेंसी तैयार करता था, बल्कि डौलर, यूरो समेत कई अन्य देशों की भी नकली करेंसियां उस के यहां से बरामद हुई हैं. यह तो थी एक खबर.

आइए, अब देखते हैं नकली नोटों का कारोबारी चंद्रशेखर जायसवाल अपना यह कारोबार किस तरह चला रहा था. मध्य कोलकाता के बऊबाजार में 2 लाख रुपए के नकली नोटों के साथ चंद्रशेखर जायसवाल नामक एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई. इस के बाद कांकुड़गाछी स्थित उस के घर से 10 करोड़ रुपए के नकली नोट बरामद हुए. इस से पहले नकली नोटों के ऐसे कई मामले सामने आए हैं.

इन मामलों से पता चला है कि बरामद नकली नोट की छपाई पाकिस्तान व बंगलादेश में होती है और पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल की सीमा से हमारे देश में ये नकली नोट पहुंचाए जाते हैं. लेकिन चंद्रशेखर जायसवाल का मामला कई माने में अनोखा साबित हो रहा है. चूंकि यह मामला नकली विदेशी करेंसी से भी जुड़ा है, इसीलिए जांच एजेंसी की नजर में यह मामला देश की आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है.

गिरफ्तार चंद्रशेखर जायसवाल ने कबूल किया कि सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड उसे रिजर्व बैंक की पटना शाखा के एक ठेकेदार की मारफत मिला करते थे. हावड़ा जिले के डोमजुड़ में चंद्रशेखर जायसवाल बाकायदा नकली नोटों का एक बड़ा कारखाना चलाता था. स्पैशल टास्क फोर्स ने इसी कारखाने के गोदाम में छापेमारी कर के नकली नोट बनाने के तमाम सामान बरामद किए हैं. 

टस्क फोर्स के अधिकारी अमित जावलगी के अनुसार, छापेमारी में सब से चौंकाने वाला जो सामान बरामद हुआ है वह पुराने खस्ताहाल, सड़ेगले असली पुराने नोटों की 20 बोरियां हैं. पूछताछ में चंद्रशेखर ने एजेंसी के अधिकारियों के सामने कबूल किया कि इस की आपूर्ति रिजर्व बैंक का एक ठेकेदार किया करता था. कारखाने से पुराने असली नोटों के अलावा नोट छापने वाले कागज, स्टैंप, स्याही के साथ 450 नकली नोटों की बोरियां भी बरामद हुई हैं. बरामद हुए नकली नोटों में केवल 500 और 1000 रुपए के नोट थे. 

आयरन स्क्रैप के कारोबारी चंद्रशेखर का यह कारखाना स्थानीय रूप से लोहे की कील बनाने वाले कारखाने के रूप में जाना जाता था. स्थानीय लोगों को कारखाने की चारदीवारी के उस पार लोहे के स्क्रैप का ढेर दिखता था. स्थानीय रूप से प्रचारित यही किया गया था कि कारखाने में स्क्रैप को गला कर विभिन्न साइज की कीलें तैयार की जाती हैं. लेकिन इस कारखाने में पिछले 2 साल से नकली नोट छापे जा रहे थे.

मामले की जांच कर रही स्पैशल टास्क फोर्स की जांच से खुलासा हुआ कि गिरफ्तार चंद्रशेखर के नकली नोटों का कारोबार खास कोलकाता और डोमजुड़ के बीच फलफूल रहा था. छापेमारी में इस कारखाने से न केवल नकली भारतीय नोट बरामद हुए, बल्कि डौलर और यूरो समेत टर्की, जिम्बाब्वे व अन्य कई देशों की करेंसियों के भी नकली नोट बरामद हुए. जाहिर है इस कारखाने से चंद्रशेखर विदेश में भी अपना कारोबार चला रहा था. इसीलिए इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दिया गया.

रिजर्व बैंक की सुरक्षा में सेंध

नकली नोट में सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल अपनेआप में एक अनोखा खुलासा था. चंद्रशेखर के कारखाने में तैयार नकली नोटों को ‘ग्रेड वन’ नकली नोट बताया गया. इस की वजह, नकली नोट में बाकायदा सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल है. नकली नोट की जांच का काम जितना आगे बढ़ता गया, जांच अधिकारी के आगे एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. अब तक नकली नोट तैयार करने का जितना भी खुलासा हुआ है उस में असली नोट जैसे कागज का इस्तेमाल करने, वाटर मार्क की नकल और उम्दा स्याही के इस्तेमाल की बातें सामने आई थीं.

सिक्योरिटी थ्रेड का इस्तेमाल पहली बार हुआ है. इसीलिए यह रिजर्व बैंक की सुरक्षा में सेंध का मामला बन गया. टास्क फोर्स के अधिकारी बताते हैं कि नकली नोट छापने के लिए भी विशेष रूप से प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है. कारखाने में 20 कर्मचारी अत्याधुनिक मशीन पर नकली नोट छापते थे. चंद्रशेखर के पास ऐसे 3 प्रशिक्षित कर्मचारी थे, जिन्हें वह मुंबई से ले कर आया था.

चूंकि इस से पहले ऐसा कोई मामला टास्क फोर्स के सामने नहीं आया था इसीलिए टास्क फोर्स ने रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों से भी पत्र लिख कर जानना चाहा कि पुराने असली नोट के ‘सिल्वर सिक्योरिटी थ्रेड’ का इस्तेमाल नकली नोटों में कैसे किया जा सकता है? मजेदार बात यह कि रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों के लिए भी यह बड़ा चौंकाने वाला मामला था. रिजर्व बैंक के नोट विशेषज्ञों की राय में सिक्योरिटी थ्रेड को निकाल कर फिर से इस्तेमाल करना कोई नामुमकिन बात भी नहीं है.

दरअसल, यह सिक्योरिटी थ्रेड चांदी की पन्नी हुआ करती थी. नोट भले ही सड़ जाए, लेकिन चांदी की पन्नी को फिर भी निकाला जा सकता है. रिजर्व बैंक के अनुसार, पन्नी का फिर से इस्तेमाल पूरी तरह से भले ही नहीं किया जा सकता हो लेकिन आंशिक तौर पर किया ही जा सकता है. रिजर्व बैंक ने यह भी माना कि हर रोज कोलकाता के तमाम बैंकों से बड़े पैमाने पर नकली नोट पकड़े जा रहे हैं.

जांच में पता चला कि नकली नोट का कारोबार करने वालों में से अब तक किसी ने सिक्योरिटी थे्रड का इस्तेमाल नहीं किया है. नकली नोटों में असली सिक्योरिटी थे्रड का इस्तेमाल इतनी सफाई से किया गया था कि नकली नोटों की शिनाख्त लगभग नामुमकिन ही थी. 

कोलकाता पुलिस के इतिहास में नकली नोट का इतना बड़ा कारोबार इस से पहले कभी नहीं पकड़ा गया था. जब इस मामले का खुलासा हुआ तो सब से पहले मध्य कोलकाता के बड़ा बाजार में आतंक का माहौल देखा गया. रुपए का लेनदेन मुश्किल हो गया. गौरतलब है कि बड़ाबाजार के थोक कारोबार का एक बड़ा हिस्सा नकदी में चलता है. जांच कर रही टास्क फोर्स का कहना है कि बैंकों के जरिए नकली नोट कोे लंबे समय तक चलाते जाना इतना भी सहज नहीं है. नकली नोट का कारोबार थोक बाजार में अधिक होता है, क्योंकि थोक बाजार से ये नोट आसानी से बैंकों तक पहुंच जाते हैं.

पुराने नोट का निबटारा

रिजर्व बैंक के एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि पहले रिजर्व बैंक द्वारा पुराने, फटे, सड़ेगले नोटों को एक तय समय के बाद जला कर नष्ट कर दिया जाता था. इस के बाद कुछ वर्ष पहले पुराने नोटों को नीलाम करने का चलन शुरू हुआ. इस के लिए पहले पेपर कटर मशीन में डाल कर उस के टुकड़ेटुकड़े करना जरूरी है. इस के बाद ही इन्हें नीलाम किया जा सकता है.

नियमानुसार इन स्क्रैप नोटों को कटर मशीन में डाल कर इन में रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर समेत नोटों में वाटर मार्क और सिक्योरिटी थ्रेड वाले हिस्से कुछ इस तरह नष्ट करना जरूरी है, ताकि उन का फिर से इस्तेमाल न किया जा सके.

टास्क फोर्स अधिकारी अमित जावलगी ने बताया कि रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर, वाटर मार्क और सिक्योरिटी थ्रेड नष्ट करने के बाद ही सड़ेगले, पुराने नोटों की नीलामी होती है. नीलामी में रिजर्व बैंक में पंजीकृत कंपनी ही भाग ले सकती है. पंजीकृत कंपनी ही रिजर्व बैंक का ठेकेदार कहलाती है.

ठेकेदार कंपनी इन सड़ेगले नोटों का व्यवहार अपने तरीके से कर सकती है. पर पुराने नोट का ठेकेदार कंपनी कुछ भी करे, उस का पूरा दायित्व ठेकेदार कंपनी का होता है. लेकिन नियमानुसार रिजर्व बैंक से प्राप्त सड़ेगले नोट ठेकेदार कंपनी के मारफत किसी भी सूरत में बाहरी लोगों के हाथों तक पहुंचना गैरकानूनी है. 

रिजर्व बैंक के ऐसे ही एक ठेकेदार की मारफत चंद्रशेखर असली नोट का सिक्योरिटी थे्रड हासिल किया करता था. नीलामी से प्राप्त असली नोट से सिक्योरिटी थे्रड को निकाल कर उस का इस्तेमाल बड़ी सफाई से नकली नोटों में किया जाता था. यही कारण है कि कभीकभी असलीनकली नोट की परखने वाली मशीन भी गच्चा खा जाया करती है.

बहरहाल, ठेकेदार की शिनाख्त हो चुकी है और उस से पूछताछ में पता चला कि सिक्योरिटी थे्रड प्राप्त करने के लिए चंद्रशेखर पुराने नोट खरीदने में उस के मूल्य से दोगुना पैसा खर्च किया करता था. 50 हजार रुपए से भी कम कीमत के सड़ेगले खस्ताहाल नोटों को चंद्रशेखर 1 लाख रुपए में खरीद लेता था. कारखाने में नकली नोटों पर यह सिल्वर थ्रेड बिठा दिया जाता था. 

टास्क फोर्स के अधिकारी का कहना है कि इस से पहले पश्चिम बंगाल में जो भी नकली नोट बरामद हुए हैं, उन में से ज्यादातर पाकिस्तान व बंगलादेश में छपे थे. पाकिस्तान में छपे नोट असली नोट के काफी करीब हुआ करते हैं. डोमजुड़ से बरामद हुए नकली नोट असली भारतीय नोट के करीब तो नहीं, लेकिन पाकिस्तान में तैयार किए गए भारतीय नोट के ज्यादा करीब थे.

छोटे नोटों की किल्लत

जांच में जो तथ्य निकल कर सामने आया है वह यह कि छोटे नोटों की किल्लत के बीच नकली बड़े नोटों का बाजार चलता है. गौरतलब है कि कोई भी राज्य क्यों न हो, हर राज्य के बड़े शहरों से ले कर गांवदेहात और कसबे में 20 और 50 रुपए के नोटों की किल्लत आम है. वहीं, ज्यादातर एटीएम में 100, 500 और 1000 रुपए के ही नोट मिलते हैं. दरअसल, बड़े नोटों का छुट्टा 50-100 रुपए की खरीदारी में आसानी से हो जाता है. ये नोट दुकानदार की मारफत हाथोंहाथ हर जगह पहुंच जाते हैं.

जहां तक छोटे नोटों की किल्लत का सवाल है, राष्ट्रीयकृत बैंक सारा दोष यह कह कर रिजर्व बैंक के मत्थे मढ़ देते हैं कि वहां से पर्याप्त मात्रा में छोटे नोट नहीं आते. एक अधिकारी का कहना है कि शालबनी, देवास और नासिक से नोट रिजर्व बैंक की विभिन्न शाखाओं में पहुंचते हैं. नोट का शालबनी कारखाना रिजर्व बैंक के अधीन है, लेकिन देवास और नासिक के कारखानों पर मालिकाना हक केंद्रीय वित्त मंत्रालय का है.

रिजर्व बैंक की किसी शाखा को किस डिनौमिनेशन यानी किस मूल्य का कितना नोट भेजा जाए, वित्त वर्ष की शुरुआत में ही यह मुंबई स्थित रिजर्व बैंक के मुख्यालय में तय हो जाता है. अब इस बारे में रिजर्व बैंक के एक सूत्र का कहना है कि 50 और 20 रुपए के नोट की किल्लत के कई कारण हैं. इन का आवंटन 10 रुपए, 100 रुपए, 500 रुपए और 1000 रुपए के नोट की तुलना में महज 10 से 20 प्रतिशत होने के कारण इन की किल्लत बनी रहती है.

साल के दौरान समयसमय पर 20 और 50 रुपए का संकट बना रहता है. लेकिन इस तरह की किल्लत की समस्या हर वित्त वर्ष के अंत में अधिक देखी जाती है. इस की वजह यह है कि जिस तरह के कागज में 20 और 50 रुपए के नोटों की छपाई होती है, उस के आयात में कभीकभी दिक्कत पेश आती है.

वहीं एटीएम में 100 रुपए का नोट न मिलने के बारे में आईसीआईसीआई बैंक के एक अधिकारी का कहना है कि किसी एटीएम में रुपए स्टोर करने की जो जगह है उस में एक बार में अधिकतम 50 लाख रुपए से अधिक नहीं डाले जा सकते.  अब अगर मशीन में 100 रुपए के नोट डाले जाएं तो 50 लाख रुपए से कम राशि ही डाली जा सकेगी. यही कारण है कि ज्यादातर एटीएम में 500 और 1000 रुपए के ही नोट डाले जाते हैं. 100 रुपए के नोट भी एटीएम में डाले जाते हैं लेकिन कम संख्या में. साफ है, इन्हीं स्थितियों का लाभ उठा कर नकली नोटों का कारोबार फलताफूलता है. Crime Story

Crime Stories: ममता, मजहब और माशूक

crime stories: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली धार्मिक नगरी चित्रकूट में यों तो साल भर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन तीजत्यौहार के दिनों में भक्तों का जो रेला यहां उमड़ता है, उसे संभालने में पुलिस प्रशासन के पसीने छूट जाते हैं. ऐसे में यदि व्यवस्था में जरा सी चूक हो जाए तो पुलिस प्रशासन के लिए समस्या खड़ी कर सकती है. लिहाजा पुलिस व प्रशासन भीड़भाड़ वाले दिनों में अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि व्यवस्था और सुविधाओं में कोई कमी न रह जाए.

इस साल भी जनवरी के दूसरे सप्ताह से ही चित्रकूट में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, जिन का इंतजार पंडेपुजारियों के अलावा स्थानीय व्यापारी भी करते हैं. कहा जाता है कि मकर संक्रांति की डुबकी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक लाभ पहुंचाती है और यदि डुबकी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय लगाई जाए तो हजार गुना ज्यादा पुण्य मिलता है.

14 जनवरी, 2018 को मकर संक्रांति की डुबकी लगाने के लिए लाखों लोग चित्रकूट पहुंच चुके थे. श्रद्धालु अपनी हैसियत के मुताबिक लौज, धर्मशाला व मंदिर प्रांगणों में ठहरे हुए थे. वजह कुछ भी हो पर यह बात दिलचस्प है कि चित्रकूट आने वालों में बहुत बड़ी तादाद मामूली खातेपीते लोगों यानी गरीबों की रहती है. उन्हें जहां जगह मिल जाती है, ठहर जाते हैं और डुबकी लगा कर अपने घरों को वापस लौट जाते हैं.

चित्रकूट में दरजनों प्रसिद्ध मंदिर और घाट हैं, जिन का अपना अलगअलग महत्त्व है. हर एक मंदिर और घाट की कथा सीधे राम से जुड़ी है. कहा यह भी जाता है कि चित्रकूट में राम और तुलसीदास की मुलाकात हुई थी. इन्हीं सब बातों की वजह से यहां लगने वाले मेले में देश के दूरदराज के हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं.

मेले में आए लोग श्री कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा भी जरूर करते हैं. लगभग 7 किलोमीटर की यह पदयात्रा करीब 4 घंटे में पूरी हो जाती है. 14 जनवरी को भी श्रद्धालु श्री कामदगिरि की परिक्रमा कर रहे थे, तभी कुछ ने यूं ही जिज्ञासावश पहाड़ी के नीचे झांका तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं.

इस की वजह यह थी कि पहाड़ी के नीचे की तरफ लगे बिजली के एक खंभे पर एक लड़की की लाश लटकी थी. शोर हुआ तो देखते ही देखते परिक्रमा करने वाले लोग वहां रुक कर लाश देखने लगे.

पुलिस को बुलाने या सूचना देने के लिए किसी को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. क्योंकि भीड़ जमा होने पर परिक्रमा पथ पर तैनात पुलिस वाले खुद ही वहां पहुंच गए. पुलिस वालों ने जब खंभे पर लटकी लड़की की लाश देखी तो उन्होंने तुरंत इस की खबर आला अफसरों को दी. कुछ ही देर में थाना नयापुरा के थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस लाश उतरवाने में लग गई.

पुलिस काररवाई के चलते भीड़ यह निष्कर्ष निकाल चुकी थी कि लड़की अपने घर वालों के साथ आई होगी और खाईं में गिर गई होगी. लेकिन पुलिस ने जब खंभे से लाश उतारी तो न केवल पुलिस वाले बल्कि मौजूद भीड़ भी हैरान रह गई. क्योंकि तकरीबन 11-12 साल की लग रही उस लड़की के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था.

मुंह में कपड़ा ठूंसा होने पर मामला सीधेसीधे हत्या का लगने लगा. पुलिस भी यह मानने लगी कि हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी होगी. क्योंकि अभी तक आसपास के किसी थाने से किसी लड़की की गुमशुदगी की खबर नहीं आई थी.

चित्रकूट में लड़की की लाश मिलने की खबर आग की तरह फैली तो लोग तरहतरह की बातें करने लगे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में बताया गया कि उस लड़की की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 और 201 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

उस वक्त चित्रकूट में बाहरी लोगों की भरमार थी. इसी वजह से लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. फिर भी पुलिस कोशिश में लग गई कि शायद कोई सुराग मिल जाए. अब तक की जांच से यह स्पष्ट हो गया था कि मृतका चित्रकूट की न हो कर कहीं बाहर की रही होगी.

इस तरह के ब्लाइंड मर्डर पुलिस के लिए न केवल चुनौती बल्कि सरदर्द भी बन जाते हैं. इस मामले में भी यही हो रहा था. हत्यारों तक पहुंचने के लिए लाश की शिनाख्त जरूरी थी.

पुलिस वालों ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज देखने का फैसला लिया, लेकिन यह भी आसान काम नहीं था, क्योंकि मकर संक्रांति के वक्त चित्रकूट में सैकड़ों कैमरे लगे हुए थे. यह जरूरी नहीं था कि सभी फुटेज देखने के बाद भी इतनी भीड़भाड़ में वह लड़की दिख जाए. पर सीसीटीवी फुटेज देखने के अलावा पुलिस के पास कोई और रास्ता भी नहीं था.

चित्रकूट में इस हत्या की चर्चा तेज होने लगी तो सतना के एसपी राजेश हिंगणकर ने मामला अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने जांच में जुटी पुलिस के साथ बैठक की और कुछ दिशानिर्देश दिए. पुलिस टीम के लिए यह काम भूसे के ढेर से सुई ढूंढने जैसा था. पुलिस टीम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने में जुट गई. पुलिस की मेहनत रंग लाई.

12 जनवरी, 2018 की एक फुटेज में एक युवक और युवती के साथ वह लड़की दिखी तो पुलिस वालों की आंखें चमक उठीं.

उत्साहित हो कर पुलिस ने और फुटेज खंगालीं तो इस बात की पुष्टि हो गई कि जिस लड़की की लाश पुलिस ने बरामद की थी, वह वही थी जो फुटेज में युवकयुवती के साथ थी. यह फुटेज जानकीकुंड अस्पताल की थी, जहां युवक व युवती मरीजों वाली लाइन में लगे थे.

उस दिन स्नान के लिए वहां लाखों लोग आए थे. इसलिए यह पता लगाना आसान नहीं था कि वह युवक और युवती कहां के रहने वाले थे, इसलिए पुलिस ने ये फुटेज सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिए, जिस से उन तक जल्द से जल्द पहुंचा जा सके.

फुटेज सोशल मीडिया पर डालने के बाद भी पुलिस को उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर हत्यारे का सुराग देने पर 10 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया. इसी दौरान पुलिस वालों ने जानकीकुंड अस्पताल के रजिस्टर की जांच भी शुरू कर दी थी.

अस्पताल में आए मरीज का नामपता जरूर लिखा जाता है लेकिन हजारों की भीड़ में यह पता लगा पाना मुश्किल काम था कि जो चेहरे कैमरे में दिख रहे थे, उन के नाम क्या थे. इस के बाद भी पुलिस वाले नामपते छांटछांट कर अंदाजा लगाने में लगे रहे कि वे कौन हो सकते हैं. इस प्रक्रिया में 25 दिन निकल चुके थे और लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस के हाथ कामयाबी नहीं लग रही थी.

चित्रकूट के लोगों की दिलचस्पी भी अब मामले में बढ़ने लगी थी. उन्हें सस्पेंस इस बात को ले कर था कि देखें पुलिस कैसे हत्यारों तक पहुंचती है और पहुंच भी पाती है या नहीं.

अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज जिन नामों पर पुलिस ने शक किया और जांच की, उन में एक नाम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के विजय और उस की पत्नी आरती का भी था. एसपी के निर्देश पर एक पुलिस टीम विजय के गांव ऐंझी पहुंच गई.

विजय से सीधे पूछताछ करने के बजाय पुलिस ने पहले उस के बारे में जानकारी हासिल की तो एक जानकारी यह मिली कि उस की 10-11 साल की एक बेटी नेहा भी थी, जो लगभग एक महीने से नहीं दिख रही है.

पुलिस ने चित्रकूट से लड़की की जो लाश बरामद की थी, उस की उम्र भी 10-12 साल थी. यह समानता मिलने पर पुलिस की जिज्ञासा बढ़ गई. इस के बाद पुलिस विजय के घर पहुंच गई. उस समय उस की पत्नी आरती भी घर पर मौजूद थी. पुलिस ने जब उन दोनों से उन की बेटी नेहा के बारे में पूछा तो वह बोले कि उन की कोई बेटी नहीं थी, केवल एक बेटा ही है.

उन की बातों से लग रहा था कि वह झूठ बोल रहे हैं क्योंकि उनके पड़ोसियों ने बता दिया था कि इन की 10-11 साल की एक बेटी नेहा थी, जो पता नहीं कहां चली गई है. इसी शक के आधार पर पुलिस विजय और उस की पत्नी आरती को चित्रकूट ले आई.

थाने में उन दोनों से जब पूछताछ शुरू हुई तो दोनों साफ मुकर गए कि उन की कोई बेटी भी है. तब पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई, जिस में उन के साथ 10-11 साल की बच्ची थी. फुटेज देखते ही दोनों बगले झांकने लगे. उसी समय दोनों ने आंखों ही आंखों में कुछ बात की और चंद मिनटों में ही बेटी की हत्या का राज उगल दिया.

पुलिस वाले यह जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि आरती का असली नाम सबीना शेख है और वह मुसलमान है. सबीना की शादी सन 2006 में उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के ही निवासी जाहिद अली से हुई थी. जाहिद से उसे 2 बच्चे हुए, पहली बेटी सिमरन और दूसरा बेटा साजिद जो 5 साल का है.

सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उस के साथ उस की कभी पटरी नहीं बैठी, क्योंकि सबीना किसी और को चाहती थी.

दरअसल सबीना और विजय एकदूसरे को बचपन से चाहते थे, लेकिन सबीना की शादी घर वालों ने उस की मरजी के खिलाफ जाहिद से कर दी थी, इसलिए सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उसे वह दिल से नहीं चाहती थी.

उस ने तो अपने दिल में विजय को बसा रखा था. जब दिल नहीं मिले तो उन के बीच बातबेबात झगड़ा रहने लगा. अपनी कलह भरी जिंदगी सुकून से गुजारने की गरज से सबीना ने शादी के 9 साल बाद विजय को टटोला. उसे यह जान कर खुशी हुई कि विजय उसे आज भी पहले की तरह चाहता है और उसे बच्चों सहित अपनाने को तैयार है.

बस फिर क्या था बगैर कुछ सोचेसमझे एक दिन वह पति को बिना बताए विजय के साथ भाग गई. यह सन 2015 की बात है.  योजनाबद्ध तरीके से दोनों भाग कर ऐंझी गांव आ कर रहने लगे. सबीना अपने बच्चों को भी साथ ले आई थी, जिस पर विजय को कोई ऐतराज नहीं था.

अपने पुराने और पहले आशिक के साथ रह कर सबीना खुश थी. उधर जाहिद ने भी बीवी के गायब होने पर कोई भागदौड़ नहीं की, क्योंकि वह तो खुद सबीना से छुटकारा पाना चाहता था. सबीना अब हिंदू के साथ रह रही थी, इसलिए उस ने खुद का नाम आरती सिंह, बेटी सिमरन का नाम नेहा सिंह और बेटे साजिद का नाम बदल कर आशीष सिंह रख लिया था.

नए पति के साथ खुशीखुशी रह रही सबीना को थोड़ाबहुत डर अपने मायके वालों से लगता था कि अगर उन्हें पता चला तो वे जरूर फसाद खड़ा कर सकते हैं. साजिद उर्फ आशीष ने तो विजय को पापा कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थी. सिमरन उर्फ नेहा चूंकि 10-11 साल की हो चुकी थी, इसलिए वह दुनियाजहान को समझने लगी थी. उस का दिल और दिमाग दोनों विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थे.

आरती की बड़ी इच्छा थी कि नेहा विजय को पापा कहे. इस बाबत शुरू में तो आरती और विजय ने उसे बहुत बहलायाफुसलाया, लेकिन इस्लामिक माहौल में पली सिमरन हमेशा विजय को मामू ही कहती थी. जब इस संबोधन पर सबीना ने सख्ती से पेश आना शुरू किया तो वह सिमरन के इस मासूमियत भरे सवाल का कोई जवाब वह नहीं दे पाई कि आप ही तो कहती थीं कि ये मामू हैं, अब इन्हें पापा कैसे कह दूं. मेरे अब्बू तो दूसरे गांव में रहते हैं.

इस से विजय और सबीना की परेशानी बढ़ने लगी थी. वजह मामू और अब्बा के मुद्दे पर सिमरन बराबरी से विवाद और तर्क करने लगी थी. दोनों को डर था कि यह उजड्ड और बातूनी लड़की कभी भी उन का राज खोल सकती है क्योंकि गांव में कोई इन की असलियत नहीं जानता था. अगर गांव वाले सच जान जाएंगे तो धर्म के ठेकेदार इन का रहना और जीना मुहाल कर देते.

जब लाख समझाने और धमकाने से भी बात नहीं बनी यानी सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं हुई तो खुद सबीना ने विजय को इशारा किया कि इस से तो अच्छा है कि सिमरन का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए. विजय भी इस के लिए तैयार हो गया.

दोनों ने मकर संक्रांति पर चित्रकूट जाने की योजना बनाई और सिमरन से कहा कि वहां तुम्हारी आंखों की जांच भी करा देंगे. सिमरन जिद्दी जरूर थी, पर इतनी समझदार अभी नहीं हुई थी कि सगी मां के मन में पनप रही खतरनाक साजिश को भांप पाती.

12 जनवरी, 2018 को चित्रकूट आ कर दोनों ने जानकीकुंड अस्पताल में सिमरन उर्फ नेहा की आंखों की फ्री जांच करवाई और उस दिन उन्होंने विभिन्न मंदिरों में दर्शन किए. 13 जनवरी, 2018 को इस अंतरधर्मीय परिवार ने चित्रकूट में परिक्रमा की और रात में नरसिंह मंदिर के प्रांगण में आ कर सो गए.

2 दिन घूमनेफिरने के बाद थकेहारे दोनों बच्चे तो जल्द सो गए, लेकिन दुनिया के सामने दोहरी जिंदगी जीते विजय और आरती उर्फ सबीना की आंखों में नींद नहीं थी. रात 12 बजे के लगभग दोनों ने गहरी नींद में सोई नेहा उर्फ सिमरन का गला मफलर से घोंट डाला.

उस के मर जाने की तसल्ली होने के बाद दोनों यह सोच कर लाश को झाडि़यों में फेंक आए कि सिमरन की लाश को जल्द ही चीलकौए और जानवर नोचनोच कर खा जाएंगे और उन के जुर्म की भनक किसी को भी नहीं लगेगी. लाश खाईं में गिराने के बाद वे दोनों बेटे को ले कर गाजियाबाद भाग गए और कुछ दिन इधरउधर भटकने के बाद ऐंझी पहुंच गए.

पहाड़ी से लाश गिराते समय इत्तफाक से नेहा की लाश का बायां पांव खंभे में उलझ गया और लाश लटकी रह गई.

9 फरवरी, 2018 को जब सारे राज खुले तो हर किसी ने इसे वासना के लिए ममता का गला घोंटने वाली शर्मनाक वारदात कहा. बात सच भी थी, जिस का दूसरा पहलू सबीना और विजय की यह बेवकूफी थी कि वे नाम बदल कर चोरीछिपे रह रहे थे.

सबीना जाहिद से तलाक ले कर सीना ठोंक कर विजय से शादी करती तो शायद सिमरन भी विजय को पिता के रूप में स्वीकार कर लेती, पर इसे इन दोनों की बुजदिली ही कहा जाएगा कि धर्म और समाज के दबाव से लड़ने के बजाय उन्होंने एक मासूम की हत्या कर के अपनी जिंदगी खुशहाल बनने का ख्वाब देख डाला. कथा संकलन तक दोनों जेल में थे. Crime Stories

Hindi Story: मौत जो बन गई पहेली

Hindi Story: 6 जनवरी 2020 को रात करीब 10 बजे का वक्त था. ग्रेटर नोएडा के गौर सिटी एवेन्यू-5 में रहने वाले 40 साल के वर्किंग प्रोफेशनल गौरव चंदेल गुरुग्राम स्थित अपने दफ्तर से नोएडा एक्सटेंशन में स्थित अपने घर लौट रहे थे. रास्ते में चंदेल ने अपनी पत्नी प्रीति को फोन कर के कहा कि वह रात 10 बजे तक घर पहुंच जाएंगे. लेकिन वे दिल्ली एनसीआर के हमेशा रहने वाले जाम के कारण जब समय पर घर नहीं पहुंचे तो आदतन उन की पत्नी प्रीति ने रात करीब साढ़े 10 बजे फिर से गौरव चंदेल को फोन कर के पूछा कि वह घर कब तक पहुंचेंगे.

ज्यादा बात तो नहीं हो सकी लेकिन गौरव ने पत्नी को इतना जरूर बताया कि वह पर्थला चौक पर हैं और थोड़ी देर में घर पहुंच जाएंगे. पूछने पर उन्होंने पत्नी को इतना ही बताया था कि वह इस वक्त अपनी गाड़ी के पेपर चैक करा रहे हैं. इस के बाद गौरव ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. लेकिन उस के पहले प्रीति ने फोन पर दूसरी तरफ से स्पष्ट सुना था. गौरव से कोई कह रहा था कि कार सड़क किनारे ले लो. प्रीति को लगा कि शायद पुलिस वाले होंगे जो चैकिंग कर रहे होंगे.

पर्थला चौक से चंदेल का घर महज 4 किलोमीटर ही रह गया था. कायदे से अगले 10 या 15 मिनट में गौरव चंदेल को अपने घर पर होना चाहिए था. लेकिन काफी वक्त गुजर जाने के बाद भी वह अपने घर नहीं पहुंचे.आमतौर पर जब भी काम से फुरसत होती, गौरव अपनी पत्नी से फोन पर बातें किया करते थे. इस रोज भी दफ्तर से रवाना होने से पहले उन्होंने प्रीति को फोन किया था. इस हिसाब से गौरव को रात करीब 10 बजे तक गुरुग्राम से नोएडा एक्सटेंशन के अपने फ्लैट पर पहुंच जाना चाहिए था. गौरव चंदेल गुरुग्राम के उद्योग विहार स्थित सर्जिकल इक्विपमेंट बनाने वाली 3एम इंडिया लिमिटेड कंपनी में रीजनल मैनेजर थे.

गौरव चंदेल ने पत्नी से फोन पर जो कहा था, उस के हिसाब से गौरव को कम से कम अगले आधे घंटे यानी रात पौने 11 या 11 बजे तक घर पहुंच जाना चाहिए था. लेकिन जब 40-45 मिनट गुजर जाने के बाद भी गौरव घर नहीं पहुंचे तो प्रीति की बेचैनी बढ़ने लगी.अब उस ने गौरव को एक के बाद एक कई फोन किए. घंटी बजती रही लेकिन गौरव ने फोन नहीं उठाया. प्रीति को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अपनी गाड़ी के कागज चैक करवा रहे गौरव के साथ बीच रास्ते में ऐसा क्या हुआ कि वह न तो घर लौटे और न ही फोन उठा रहे हैं. ये हालत प्रीति ही नहीं, बल्कि पूरे चंदेल परिवार और रिश्तेदारों को बेचैन करने के लिए काफी थे.

लिहाजा प्रीति ने अब अपने पड़ोसियों से बात की और फोन पर ही कुछ और देर तक गौरव का पता लगाने की कोशिश चलती रही. लेकिन जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं तो उस ने आसपड़ोस में रहने वाले लोगों को बुलाया और सभी लोग सीधे बिसरख पुलिस स्टेशन पहुंचे.

थाने में उन के साथ वैसा ही हुआ जैसा कि आमतौर पर पुलिस थानों में होता है, बिसरख थाने के पुलिस वालों ने परेशान चंदेल परिवार को बहुत ठंडा रिस्पौंस दिया और ये समझाने की कोशिश की कि गौरव अपनी मरजी से कहीं चले गए होंगे और खुद ही वापस लौट आएंगे.चूंकि गौरव की पत्नी प्रीति को पूरे सीक्वेंस यानी घटनाक्रम का पता था तो वह पुलिस की बात मानने को तैयार नहीं हुई. ऐसे में जिद करने पर बिसरख के पुलिस वालों ने चंदेल परिवार को पहले थाना फेस-3 फिर चेरी काउंटी पुलिस चौकी और तब गौड़ सिटी पुलिस चौकी के लिए टरका किया.

परिवार के लोग पड़ोसियों के साथ इस चौकी से उस चौकी तक भटकते रहे, लेकिन हर जगह उन्हें वहां तैनात पुलिस वालों ने यह कह कर टरका दिया कि ये हमारे क्षेत्र का मामला नहीं है.इस तरह गौरव के परिवार वाले रात भर थाने और पुलिस चौकी में ढूंढते और पुलिस से फरियाद करते रहे. आधी रात बीत जाने के बाद परिवार के लोग फिर से बिसरख थाने पहुंचे. जहां इस बार उन्हें बिसरख थानाप्रभारी मनोज पाठक मिले.

पाठक को जब सारी बात पता चली तो उन्होंने गौरव की गुमशुदगी दर्ज करवा कर उन के फोन की लोकेशन ट्रेस करने के लिए उसी समय कुछ पुलिसकर्मियों को काम पर लगा दिया. कुछ ही देर में बिसरख पुलिस को पता चल गया कि गौरव के मोबाइल फोन की लोकेशन एक्टिव थी.पुलिस को नोएडा एक्सटेंशन के ही रोजा जलालपुर और हैबतपुर जैसे गांवों का पता चला जहां गौरव के मोबाइल फोन की लोकेशन नजर आ रही थी. परिजनों ने राहत की सांस ली. उन्हें लगा कि गौरव कुशल से है, लिहाजा परिवार तथा पड़ोस के लोगों ने पुलिस पर दबाव बनाया कि वह इन जगहों पर चल कर गौरव को तलाशने के लिए उन के साथ चले.

पुलिस को जिन मामलों में अपना कोई फायदा नजर नहीं आता, उन में वह बहुत मेहनत नहीं करना चाहती. लिहाजा पुलिस अनमने ढंग से चंदेल परिवार के साथ गौरव को ढूंढने के लिए गई. लेकिन रात के अंतिम पहर में इधरउधर भटकने के अलावा उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली.घर वाले खुद गौरव की तलाश में जुट गए. घर वालों ने पड़ोसियों के साथ मिल कर एक बार फिर पर्थला गोल चक्कर से गौड़ सिटी तक गौरव को ढूंढने का काम शुरू किया. क्योंकि गौरव को इसी रूट से अपने घर आना था और आखिरी बार उस की अपनी बीवी प्रीति से पर्थला चौक पर ही फोन पर बात हुई थी. इसी तमाम भागदौड में सुबह के करीब साढ़े 4 बज गए थे.

चंदेल परिवार से जुड़े लोगों की गाड़ी पर्थला चौक से गौड़ चौक की तरफ सर्विस लेन पर चल रही थी. तभी उन्हें हिंडन पुलिया से पहले एक क्रिकेट ग्राउंड के पास कोई जमीन पर पड़ा नजर आया.बेचैन घर वालों ने अंधेरे में उस शख्स को टटोलने की कोशिश की, लेकिन करीब पहुंचते ही सब के पैरों तले जमीन खिसक गई. क्योंकि ये गौरव ही थे, जो औंधे मुंह जमीन पर पड़े थे और उन के सिर से खून निकल रहा था. यहां तक की सांसें भी थम चुकी थीं.

प्रीति ने पति को इस हाल में देखा तो उस के जान हलक में आ गई और वह छाती पीट कर रोने लगी. लेकिन परिवार के कुछ लोगों को फिर भी करिश्मे की उम्मीद थी, लिहाजा वे सब फौरन गौरव को नजदीक के अस्पताल ले कर गए लेकिन वहां पहुंचते ही चिकित्सकों ने बताया कि उन की सांसें थम चुकी हैं.

गौरव की मौत की खबर पूरे चंदेल परिवार पर बिजली बन कर गिरी. रात भर गौरव को तलाशते रहे घर वालों को अब ये समझ नहीं आ रहा था कि वे करें तो क्या करें, क्योंकि गौरव तो मिल चुका था मगर जिंदा नहीं मुर्दा.

कुछ परिजनों ने खुद को संयत किया और तत्काल गौरव चंदेल की हत्या की सूचना बिसरख पुलिस को दी. जैसे ही बिसरख थानाप्रभारी मनोज पाठक को गौरव चंदेल की हत्या और उन का शव मिलने की सूचना मिली. वे आननफानन में अपने आला अधिकारियों को इस की सूचना दे कर सहयोगियों को ले कर उस निजी अस्पताल में पहुंचे, जहां परिजन गौरव चंदेल को ले कर गए थे.

पाठक ने अस्पताल जा कर परिजनों से पूछताछ कर के जानकारी हासिल की. उन्होंने पुलिस की एक टीम को मौके पर ही आगे की काररवाई करने के लिए छोड़ दिया और खुद एक टीम ले कर परिवार के कुछ सदस्यों को ले कर उस जगह पहुंच गए, जहां गौरव चंदेल की लाश मिली थी.घटनास्थल पर इलाके के सीओ और क्राइम टीम के लोग भी पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल की फोटोग्राफी और रिकौर्डिंग करवाई ताकि अपराधियों तक पहुंचने का कोई सुराग मिल सके. लेकिन पुलिस को कोई ऐसी चीज हाथ नहीं लगी, जिस से कामयाबी मिलती. सवाल यह था कि अगर गौरव चंदेल की लाश वहां थी तो उन की कार
कहां गई.

इसी सवाल का जवाब पाने के लिए पुलिस की कुछ टीमों को आसपास के इलाकों में दौड़ाया गया. एक बात साफ हो रही थी कि गौरव चंदेल की हत्या ऐसे लोगों ने की थी, जिन का मकसद लूटपाट करना रहा होगा.  बहरहाल, पुलिस ने गौरव चंदेल की गुमशुदगी को अपराध संख्या 17 पर भारतीय दंड संहिता में लूटपाट की नीयत से हुई हत्या का मामला दर्ज कर लिया.इस की जांच का काम इंसपेक्टर मनोज पाठक को सौंप दिया गया. इधर, गौरव चंदेल की रहस्यमय ढंग से हुई गुमशुदगी और उन का शव बरामद की जानकारी मीडिया को भी लग चुकी थी. लिहाजा मीडिया ने पुलिस के खिलाफ अगले ही दिन से गौरव चंदेल हत्याकांड में बरती लापरवाही को ले कर परतें उधेड़नी शुरू कर दीं.

इधर उच्चाधिकारियों ने मामले के तूल पकड़ने पर न सिर्फ एसटीएफ को इस मामले का खुलासा करने की जिम्मेदारी सौंप दी बल्कि बिसरख पुलिस से एसएसपी ने जवाबतलब भी कर लिया कि किन परिस्थितियों में पुलिस ने लापरवाही बरती.इधर पुलिस जांच आगे बढ़ती रही, उधर वक्त बीतने के साथ पुलिस के खिलाफ लोगों का गुबार सामने आता रहा. नोएडा में गौरव चंदेल के परिवार को न्याय दिलाने के लिए लोग सडकों पर उतर आए. कैंडल मार्च से ले कर पुलिस के खिलाफ विरोध प्रर्दशन शुरू हो गए.

परेशानी यह थी कि गौरव अपने परिवार का एकलौता सहारा थे. परिवार में उन की वृद्ध मां और पत्नी प्रीति के अलावा 14 साल का एक बेटा ही था. दूर के कुछ रिश्तेदार जो नोएडा या आसपास के इलाकों में रहते थे, वे ही मामले का खुलासा कराने के लिए पुलिस के पास भागदौड़ कर रहे थे.

कानून व्यवस्था को ले कर जब सवाल खड़े होते हैं तो उस पर सियासत भी शुरू हो जाती है. सरकार और पुलिस के खिलाफ विपक्षी राजनीतिक दलों ने भी सवाल खड़े करने शुरू किए तो लखनऊ से सरकार ने भी नोएडा पुलिस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया.पुलिस भी अब तक की जांच में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी थी. सवाल यह था कि गौरव चंदेल के मोबाइल पर आखिरी काल रात करीब साढ़े 10 बजे पत्नी की आई थी. तब चंदेल की लोकेशन पर्थला चौक थी.

इस के बाद अगले कुछ घंटों में चंदेल का मोबाइल 3 अलगअलग लोकेशन बता रहा था. पर्थला चौक के बाद दूसरी लोकेशन हैबतपुर थी. हैबतपुर पर्थला चौक से करीब साढ़े 3 किलोमीटर दूर है. लेकिन हैबतपुर चंदेल के घर के रूट पर नहीं पड़ता तो चंदेल उधर क्यों गया था. कहीं ऐसा तो नहीं उसे जबरन ले जाया गया?हैबतपुर के बाद चंदेल की दूसरी लोकेशन करीब 9 किलोमीटर दूर रोजा जलालपुर की थी. रोजा जलालपुर के बाद चंदेल के मोबाइल ने जिस आखिरी लोकेशन का पता दिया, वह थी सैदुल्लापुर. रोजा जलालपुर से करीब ढाई किलोमीटर आगे. ये तीनों ही लोकेशन मेनरोड से हट कर कच्ची सड़कों की थीं और चंदेल के घर के रूट पर तो बिलकुल भी नहीं.

इन 3 लोकेशन के बाद 7 जनवरी की सुबह खुद चंदेल की लाश जिस हिंडन नदी के किनारे मिली, वह इन तीनों लोकेशन से अलग थी. इस से साफ था कि गौरव चंदेल के साथ किसी कार जैकर गिरोह ने वारदात की थी.यह अनुमान इसलिए भी लगाया जा रहा था कि अभी तक न तो गौरव चंदेल की कार मिली थी और न ही उस में रखा लैपटौप और मोबाइल आदि बरामद हुए थे. गौरव चंदेल का मोबाइल भी आखिरी लोकेशन मिलने के बाद से लगातार बंद चल रहा था.

चूंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि गौरव चंदेल के सिर में 2 गोलियां मारी गई थीं. आमतौर पर इस तरह की वारदात को लूटपाट करने वाले गिरोह ही अंजाम देते हैं. इसलिए नोएडा पुलिस ने अब सारा फोकस आसपास के इलाकों में सक्रिय उन गिरोह पर कर दिया जो कार जैकिंग और लूटपाट की वारदातों को अंजाम देते हैं.पुलिस की सब से बड़ी परेशानी कत्ल के साथसाथ कातिल की पहचान को ले कर भी थी. क्योंकि चंदेल की पत्नी प्रीति के मुताबिक आखिरी बातचीत के दौरान चंदेल अपनी गाड़ी के कागजात दिखा रहे थे. अब कागजात पुलिस वाले ही चैक करते हैं. तो क्या चंदेल की आखिरी मुलाकात पुलिसवालों से ही हुई थी? या फिर पुलिस के वेश में लुटेरे थे?

पुलिस सोच रही थी कि ये काम लुटेरों के अलावा किसी और का भी हो सकता है. चंदेल के किसी दुश्मन का तो ये काम नहीं था. इस बिंदु पर भी जांच हुई, मगर कोई सुराग हाथ नहीं लगा.अब सवाल ये भी था कि आखिर गौरव की ब्रैंड न्यू सेल्टोस कार कहां है? 2 मोबाइल, लैपटौप और दूसरी कीमती चीजें भी गायब थीं. तो क्या ये मामला लूट और उस के लिए हुए कत्ल का है.

अब तक की जांच में पुलिस के सामने खुलासा हुआ था कि गुरुग्राम की एक कंपनी में रीजनल मैनेजर का काम करने वाले गौरव खुशमिजाज इंसान थे. उन्हें कारों से बड़ा लगाव था और शायद यही वजह थी कि गौरव ने अपनेलिए बमुश्किल महीने भर पहले हाल ही में लौंच हुई किया सेल्टोस कार खरीदी थी.

कार खरीदने के दौरान शोरूम में खिंचवाई गई गौरव की तसवीर उस की खुशी और जिंदगी को ले कर उस की उम्मीदों की गवाह बन कर रह गई है. लेकिन इसी गौरव के साथ 6 और 7 जनवरी की दरमियानी रात को जो कुछ हुआ वो भी मानो एक पहेली बन कर रह गया.

गौरव चंदेल की हत्या में पुलिस की भूमिका को ले कर सवार यूं ही नहीं उठ रहे थे. अगर वारदात की रात सचमुच ग्रेटर नोएडा पुलिस की कार्यशैली पर गौर करें, तो सामने आ रहा था कि गौरव की जिंदगी बचाने के लिए पुलिस ने उस रात वह नहीं किया, जो उसे करना चाहिए था.बल्कि सच्चाई तो यह है कि मोबाइल फोन की लोकेशन निकाल लेने के बावजूद सीमा विवाद में उलझी ग्रेटर नोएडा की पुलिस उसे ढूंढने के बजाय टोपी ट्रांसफर करने के खेल में उलझी रही और यही वजह रही कि नोएडा के आखिरी एसएसपी वैभवकृष्ण ने बिसरख थाने के एसएचओ से इस सिलसिले में जवाबतलब किया था.

पुलिस की कई टीमें गौरव चंदेल हत्याकांड के आरोपियों तक पहुंचने के लिए लगातार काम कर रही थीं. पुलिस टीमें चंदेल की कार के अलावा उस के मोबाइल फोन को लगातार ट्रैक किया जा रहा था.

इसी दौरान 15 जनवरी को अचानक सर्विलांस टीम को गौरव चंदेल का एक मोबाइल फोन एक्टिव होने का पता चला. पुलिस टीमों ने उसी रात मोबाइल की लोकेशन के आधार पर मजदूरी करने वाले एक शख्स को हिरासत में ले लिया और उस से पूछताछ की जाने लगी.पूछताछ करने पर पता चला कि वह शख्स एक फैक्ट्री में काम करने वाला मामूली सा मजदूर था. 7 जनवरी को उसे गौरव चंदेल का मोबाइल फोन लावारिस अवस्था में उस स्थान से थोड़ी दूर झाडि़यों में पड़ा मिला था, जहां गौरव चंदेल की लाश मिली थी. रामकुमार नाम के इस राहगीर ने लावारिस पड़े इस मोबाइल को अपने पास रख लिया.

1 सप्ताह अपने पास रखने के बाद रामकुमार ने इस मोबाइल को 15 जनवरी की सुबह जैसे ही अपना नंबर डाल कर फोन किया, बिसरख पुलिस ने उसे दबोच लिया. पुलिस ने हर बिंदु पर इस बात की पुष्टि कर ली कि रामकुमार का संबंध किसी गैंग या अपराधी गिरोह से नहीं है.पूरी संतुष्टि होने के बाद पुलिस ने उसे रिहा तो कर दिया लेकिन न सिर्फ उस की निगरानी शुरू कर दी, बल्कि उसे यह भी ताकीद कर दिया कि पुलिस को जब भी उस की जरूरत पड़ेगी, वह पूछताछ के लिए थाने में हाजिर होगा.

मोबाइल फोन की इस बरामदगी से पुलिस को गौरव  चंदेल हत्याकांड की गुत्थी सुलझने की उम्मीद बढ़ गई थी. पुलिस चंदेल के मोबाइल की काल डिटेल्स खंगाल ही रही थी कि इसी दौरान पड़ोसी जनपद गाजियाबाद पुलिस की मसूरी थाना पुलिस को गौरव चंदेल की किया सेल्टोस कार लावारिस अवस्था में बरामद हो गई.

मसूरी पुलिस ने 16 जनवरी को ग्रेटर नोएडा से लगभग 40 किलोमीटर दूर गाजियाबाद के मसूरी की आकाश नगर कालोनी से कार लावारिस हालत में बरामद की थी. बरामदगी के वक्त कार लौक्ड थी.

गौरव चंदेल की कार किया सेल्टोस नंबर यूपी16सी एल0133 को कब्जे में ले कर पुलिस ने जांच शुरू कर दी. पुलिस ने कार की फोरैंसिक जांच भी शुरू करवा दी.

हालांकि बरामद की गई कार पर नंबर प्लेट नहीं लगी हुई थी. दरअसल हत्यारों ने गाड़ी की पहचान छिपाने के लिए नंबर प्लेट तोड़ डाली थी, लेकिन कार के शीशे पर लगे गेट पास से कार के चंदेल की होने की पुष्टि हो गई.आकाश नगर में  जिस मकान के बाहर यह कार खड़ी हुई थी, उस के आसपास सीसीटीवी कैमरे लगे थे. जब उन्हें खंगाला गया तो पुलिस को उस में कार को खड़ा करने वाले नजर आ गए. सीसीटीवी में दिख रहे लोगों की पहचान करने की कोशिश की गई मगर तसवीरें इतनी धुंधली थीं कि उन की पहचान नहीं हो सकी.

फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम ने गाड़ी की जांच की, मगर उस से कोई मदद नहीं मिली. अलबत्ता गौरव चंदेल का लैपटौप बैग, आईडी, मोबाइल व दूसरे सामान कार में नहीं मिले.इस मामले में नया ट्विस्ट तब आया, जब 3 दिन बाद मसूरी थाना पुलिस ने ही आकाश नगर इलाके में गौरव चंदेल की कार से करीब एक किलोमीटर दूर चिराग अग्रवाल नाम के एक कारोबारी की टियागो कार को बरामद किया.

उस कार की नंबर प्लेट बदली गई थी, लेकिन कार पर लगे स्टिकर से कार के सही नंबर का पता चल गया.चिराग अग्रवाल की टियागो कार मिलने के बाद यह बात साफ हो गई कि इस इलाके में सक्रिय कोई गिरोह है, जिस ने इन वारदातों को अंजाम दिया है. नोएडा और गाजियाबाद पुलिस के साथ यूपी एसटीएफ की टीम इलाके के बदमाशों और सक्रिय गैंगों की कुंडली खंगालने लगी. पुलिस की जांच मसूरी इलाके में सक्रिय मिर्ची गैंग पर आ कर ठहर गई.

एसटीएफ ने मिर्ची गैंग की फाइलें खंगालीं तो पता चला कि इस गिरोह का सरगना आशु जाट है. गैंग में कई और गुर्गे भी हैं जिन में से ज्यादातर का ताल्लुक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर इलाके से है. ये गैंग दिल्ली के अलावा एनसीआर में वारदात को अंजाम दे कर वापस अपनेअपने इलाकों में लौट आता है.

यही वजह है कि पुलिस या तो इन तक पहुंच नहीं पाती या फिर उसे इन तक पहुंचने में काफी वक्त लग जाता है. इन का यानी वारदात को अंजाम देने का तरीका यह है कि ये या तो किराए की गाड़ी या आटो से किसी मौल या पौश इलाकों में घूम कर पहले रेकी करते हैं और फिर जैसे ही इन्हें कोई अकेला आदमी नजर आता है ये उसे टारगेट करते हैं.

वारदात को अंजाम देने वाला ये गैंग लाल मिर्च का पाउडर ले कर चलता है. किसी बहाने से बात की शुरुआत करने की कोशिश करते हैं. और जैसे ही कोई इन के जाल में वह फंस जाता है तो ये उस की आंखों में लाल मिर्च झोंक देते हैं. फिर उसे या तो जख्मी कर के लूट लेते हैं या फिर ये गैंग उस का अपहरण कर लेते हैं और मार देते हैं. दिल्ली एनसीआर में पिछले कई सालों में मिर्ची गैंग ने ऐसी कई वारदातों को अंजाम दिया है.

पुलिस का टारगेट अब मिर्ची गैंग और उस का सरगना आशु जाट था. आशु जाट तक पहुंचना इतना आसान नहीं था, लेकिन पुलिस ने उस तक पहुंचने के लिए मसूरी इलाके में ही रहने वाली आशु जाट की पत्नी पूनम की निगरानी शुरू करा दी और पूनम के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा दिया. गौरव चंदेल हत्याकांड के बाद आशु जाट एसटीएफ के अलावा आसपास के जिलों की पुलिस की नजरों में भी चढ़ चुका था. सब अपनी तरह से उस तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रहे थे.

लेकिन सफलता मिली हापुड़ पुलिस को. 26 जनवरी को हापुड़ जिले की सर्विलांस टीम को सूचना मिली कि आशु जाट की पत्नी पूनम आशु के एक करीबी सहयोगी के साथ मोटरसाइकिल पर सवार हो कर धौलाना थाना क्षेत्र के करणपुर जट्ट गांव में किसी से मिलने जाने वाली है.इस सूचना के बाद सर्विलांस टीम ने स्वाट टीम और धौलाना पुलिस के साथ उस इलाके की घेराबंदी कर दी.

सूचना सटीक निकली और पुलिस टीम ने दोनों को दबोच लिया. उस के पास से एक .32 बोर की पिस्टल भी बरामद हुई. आशु जाट की पत्नी पूनम से महिला पुलिस पूछताछ करने लगी, जबकि धौलाना थाने के एसएसआई राजीव कुमार शर्मा, शिकारपुर, बुलंदशहर निवासी उमेश से उस के गिरोह के सरगना आशु जाट के बारे में पूछताछ  करने लगे.

आशु जाट के बारे में तो उमेश कोई सटीक जानकारी नहीं दे सका, लेकिन उस ने बताया कि 6 जनवरी की रात उस ने आशु जाट व अपने 3 साथियों के साथ मिल कर ग्रेटर नोएडा में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी और उस की सेल्टोस कार लूट ली थी.जैसे ही पुलिस को पता चला कि उन के सामने गौरव चंदेल हत्याकांड का एक आरोपी है तो पुलिस ने कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए लूट के सामान की बरामदगी का प्रयास शुरू कर दिया.उमेश ने बताया कि वे लूटे गए एक मोबाइल व लैपटौप को नोएडा के फेस-3 इलाके से बरामद करवा सकता है तो राजीव शर्मा की टीम उसे माल बरामद करने के लिए रवाना हो गई.

लेकिन उमेश पुलिस टीम की उम्मीदों से कहीं ज्यादा शातिर और चालाक निकला. पुलिस की गाड़ी जब गुलावठी मसूरी रोड पर डहाना गांव के पास से गुजर रही थी तो अचानक वह शौच के बहाने गाड़ी से उतरा. वह एसएसआई राजीव शर्मा के हाथ से उन की सरकारी पिस्टल छीन कर

भागने लगा.पुलिस ने पहले तो उसे पकड़ने की कोशिश की, मगर जब देखा कि वह उन की पकड़ से निकल सकता है तो उन्होंने उस पर गोली चला दी. एक के बाद एक 2 गोलियां उमेश के दाएं पैर में लगी और वो वहीं गिर पड़ा. इस के बाद पुलिस उसे घायलावस्था में ले कर अस्पताल पहुंची.

पूछताछ करने पर पता चला कि उमेश ने भागने का रास्ता खोजने के लिए ही पुलिस को लूट का माल बरामद करवाने का झांसा दिया था. लेकिन पुलिस को इतना तो पता चल ही चुका था कि मिर्ची गैंग ने ही गौरव चंदेल की हत्या को लूट के इरादे से अंजाम दिया था.पुलिस ने उसी दिन कविनगर के काजीपुरा इलाके में रहने वाले आशु जाट उर्फ प्रवीण उर्फ धर्मेंद्र की पत्नी पूनम के साथ उमेश के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर लिया और आगे की काररवाई के लिए एसटीएफ तथा नोएडा पुलिस को सूचित कर दिया.

नोएडा पुलिस व एसटीएफ की टीम सूचना मिलने के तत्काल बाद धौलाना पहुंच गई और इस मामले की आगे की जांच अपने हाथ में ले ली. उमेश पर लूटपाट, अपहरण और हत्या के एक दरजन से ज्यादा मामले दर्ज हैं. इस गैंग के बौस यानी सरगना आशु जाट पर भी ऐसे ही 40 से ज्यादा मामले दर्ज हैं.

पुलिस उमेश की गिरफ्तारी को बड़ी उपलब्धि मान रही थी. लेकिन आशु जाट की गिरफ्तारी न होना और बदमाशों से लूट का कोई भी माल बरामद न होना उस की काररवाई पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा था. हालांकि हापुड़ पुलिस की उमेश से पूछताछ के आधार पर दावा किया था कि 6 जनवरी को नोएडा के गौरव चंदेल का कत्ल मिर्ची गैंग ने ही किया था और इस कत्ल और लूटपाट में उमेश भी शामिल था.

उमेश ने पुलिस को पूछताछ में बताया था कि गौरव चंदेल वारदात वाली रात करीब साढ़े 10 बजे हिंडन विहार स्टेडियम के करीब सड़क किनारे अपनी कार रोक कर फोन पर बात कर रहे थे. उसी उमेश व उस के साथी कार के करीब पहुंचे. इस के बाद गौरव को .32 बोर के पिस्टल से 2 गोली मारीं और उन की कार ले कर मौके से फरार हो गए. हापुड़ पुलिस के मुताबिक गौरव चंदेल को जिस .32 बोर के पिस्टल से गोरी मारी गई वह पिस्टल और उस के साथ 3 गोलियां भी उमेश से बरामद हो गई हैं.

हापुड़ पुलिस का कहना है कि गौरव चंदेल के कत्ल का असली मास्टरमाइंड मिर्ची गैंग का सरगना आशु जाट है, जो अभी फरार है. लेकिन इतना सब होने के बाद भी नोएडा पुलिस हापुड़ पुलिस के इस दावे को ले कर चुप्पी साधे हुए है. पर क्यों? क्या हापुड़ पुलिस के दावे में कोई झोल है या फिर बात कुछ और है?

मामला चूंकि समूची राज्य की पुलिस की विश्वसनीयता का है, इसलिए हो सकता है कि नोएडा पुलिस हापुड़ पुलिस के दावों पर चुप हो. नोएडा पुलिस अब इस कोशिश में है कि किसी तरह मिर्ची गैंग का सरगना आशु उस के हाथ लग जाए तो उस की कुछ इज्जत बच सकती है.

इसी इंतजार में अभी तक गौरव चंदेल के कत्ल की गुत्थी सुलझा लेने का दावा करने से पुलिस बच रही है. दूसरा नोएडा पुलिस उमेश के बयान पर आंख मूंद कर भरोसा करने के बजाए पहले केस की सारी कडि़यों को भी जोड़ लेना चाहती है, ताकि आगे फजीहत न हो.

दिलचस्प बात यह है कि अपने गुडवर्क को बढ़ाचढ़ा कर बताने वाली नोएडा पुलिस न तो इस मामले में कोई जानकारी साझा कर रही है और न ही इस मामले में उसे अभी कोई दूसरी सफलता मिली है.

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पुलिस ने शासन के दबाव और फजीहत से बचने के लिए मिर्ची गैंग के सरगना पर इस हत्या व लूटकांड का ठीकरा फोड़ा है या वास्तव में इसी गिरोह ने इस वारदात को अंजाम दिया था?

लेकिन ऐसे कई सवाल हैं जिस से ये पूरा मामला एक पहेली बन गया है. अगर आशु जाट के मिर्ची गैंग ने ही इस पूरी वारदात को अंजाम दिया था तो उन्होंने वारदात के बाद गौरव चंदेल से लूटी गई किया सेल्टोस कार मसूरी इलाके में लावारिस क्यों छोड़ी?

आमतौर पर लूटपाट के लिए वारदात को अंजाम देने वाले इन बदमाशों ने कीमती कार छोड़ कर सिर्फ गौरव चंदेल का एक मोबाइल व लैपटाप लूटा था. जबकि एक मोबाइल वे पहले ही उस जगह फेंक चुके थे, जहां गौरव चंदेल की हत्या कर के उसके शव को फेंका था.

पुलिस अभी तक गौरव चंदेल के डेबिट व क्रेडिट कार्ड तथा उस की सोने की चेन व अंगूछी के बारे में नहीं बता सकी है कि वे किस के पास हैं. अगर उमेश इस वारदात में शामिल था, तो पुलिस उस से इन सामानों का खुलासा क्यों नहीं करवा सकी? अगर पुलिस की कहानी पर विश्वास कर भी लिया जाए तो वे लूटे गए सामान कहां हैं?

सवाल उठ रहे हैं कि पुलिस ने इस मामले में फजीहत से बचने और गरदन बचाने के लिए केस का खुलासा तो कर दिया, लेकिन अभी तक उस के पास हत्या की ठोस वजह नहीं है.हो सकता है कि गौरव चंदेल की हत्या उस के किसी दुश्मन की सोची- समझी साजिश का कारनामा हो लेकिन पुलिस उस चक्रव्यूह को तोड़ने में नाकाम रही है. पुलिस ने सिर्फ मिर्ची गिरोह की कार्यशैली को देख कर इस के ऊपर हत्याकांड का ठीकरा फोड़ दिया है. Hindi Story

Hindi stories: औरतें अपने पैरों पर खड़ी हों – प्रज्ञा भारती

Hindi stories: साल 2003 में हैल्थ सैक्टर से समाजसेवा का काम शुरू करने वाली प्रज्ञा भारती आज बिहार में अच्छीखासी पहचान और इज्जत हासिल कर चुकी हैं. प्रज्ञा भारती साल 2005 से औरतों की तरक्की के लिए भी लगातार काम कर रही हैं. वे अब तक बिहार के 10 जिलों में 5 हजार औरतों को हुनरमंद बना चुकी हैं और 2 हजार औरतों को रोजगार दिला चुकी हैं. वे ‘परिहार सेवा संस्थान’ के तले औरतों को हुनरमंद बनाने के साथसाथ उन्हें रोजगार देने की मुहिम में लगी हुई हैं. साथ ही, वे पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रही हैं.

प्रज्ञा भारती कहती हैं कि औरतों को हुनरमंद बनाने के साथसाथ उन्हें रोजगार से जोड़ना जरूरी है. जब तक काम करने के बाद औरतों के हाथ में पैसा नहीं आएगा, तब तक उन के मन में अपने पैरों पर खड़ा होने का भाव नहीं आएगा.

फिलहाल प्रज्ञा भारती ‘वुमन फूड वैंडर योजना’ पर काम कर रही हैं. इस योजना में औरतों को ही रखा गया है. कैटरिंग से ले कर सर्विस तक के काम में औरतों को ही लगाया गया है. औरतें ही खाना पकाएंगी, परोसेंगी, पैक करेंगी और उसे पहुंचाएंगी. इस के लिए फिलहाल सौ औरतों को ट्रेंड किया गया है.

प्रज्ञा भारती कहती हैं कि घरेलू औरतों को उन के घर में ही काम देने की जरूरत है. इस से वे कमाई के साथसाथ अपने बच्चों और परिवार की भी देखरेख कर सकेंगी. प्रज्ञा भारती बाल सुधारगृह के बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए स्पैशल ट्रेनिंग देने में लगी हुई हैं. इस से बाल सुधारगृह से बाहर निकल कर बच्चे रोजगार में लग सकेंगे.

प्रज्ञा भारती बताती हैं कि उन्होंने पटना कालेज से बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद मास कम्यूनिकेशन में एमए किया था. उस के बाद कुछ दिनों तक पत्रकारिता की, पर उस में मन नहीं रमा, क्योंकि वे समाजसेवा और औरतों को मजबूत करने की दिशा में कुछ ठोस काम करने के सपने देख रही थीं और साल 2003 में वे इस मुहिम में लग गईं.

सब से पहले उन्होंने पटना के स्लम एरिया कमला नेहरू नगर, कौशल नगर और कुम्हार टोली की औरतों के हालात का जायजा लिया और उन्हें हुनरमंद बनाने के काम में लग गईं. इस के बाद प्रज्ञा भारती जहानाबाद और अरवल जैसे नक्सली पैठ वाले इलाकों में भी अपने दलबल के साथ पहुंच गईं और वहां की औरतों को काम सिखाने लगीं.

सिकरिया जैसे नक्सली इलाके, जहां पुलिस भी जाने से खौफ खाती थी, में पहुंच कर प्रज्ञा भारती ने औरतों के मन से मर्द के भरोसे बैठ कर जिंदगी गुजार देने के भाव को मिटाने में कामयाबी हासिल की. प्रज्ञा भारती को औरतों और कमजोर लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने की सीख अपने मातापिता से मिली. उन के पिता बचपन से ही पोलियो के शिकार हो गए थे, इस के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और सांख्यिकी महकमे के डायरैक्टर पद तक पहुंचे.

प्रज्ञा भारती की मां ने भी शारीरिक रूप से कमजोर होने के बावजूद अपना कारोबार खड़ा किया. ह्वीलचेयर पर बैठ कर ही उन्होंने अपने कारोबार को आगे बढ़ाने में कामयाबी पाई. उन की मां की सोच है कि वे किसी के सहारे जिंदगी न गुजारें. इसी सोच ने प्रज्ञा भारती को. Hindi stories

UP News: महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग उत्तर प्रदेश सरकार

UP News: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के समक्ष ‘मिशन शक्ति’ की प्रगति, इसके द्वितीय फेज़ तथा इसमें विभिन्न विभागों द्वारा दिए गए योगदान के सम्बन्ध में प्रस्तुतीकरण किया गया. इस अवसर पर मुख्यमंत्री जी ने कहा कि राज्य सरकार महिलाओं की सुरक्षा तथा आत्मसम्मान सुनिश्चित करने के लिए कटिबद्ध है. ‘मिशन शक्ति’ को इसी उद्देश्य से लागू किया गया था. उन्होंने कहा कि 08 मार्च, 2021 को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है. इसके दृष्टिगत ‘मिशन शक्ति’ के तहत महिला सशक्तीकरण से सम्बन्धित विभिन्न विभागीय आयोजन 26 फरवरी, 2021 से ही शुरू कर दिए जाएं.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि इस अभियान का सकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ा है और महिलाओं की सुरक्षा और आत्मसम्मान के प्रति समाज अब और जागरूक हो रहा है. उन्होंने राजस्व विभाग को घरौनी के तहत स्वामित्व का अधिकार घर की महिला को देने के निर्देश दिए. उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किए गए सामुदायिक शौचालयों में महिला कर्मी की तैनाती शीघ्र की जाए. उन्होंने सभी जनपदों में अपर पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में एक रिपोर्टिंग चौकी स्थापित करने के निर्देश दिए, जहां महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के सम्बन्ध में सूचना दर्ज कर त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी.

मुख्यमंत्री ने कन्या सुमंगला योजना और मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए.

मुख्यमंत्री जी के समक्ष नारी सुरक्षा, नारी सम्मान तथा नारी स्वावलम्बन के लिए चलाए जा रहे ‘मिशन शक्ति’-द्वितीय फेज़ का प्रस्तुतीकरण अपर मुख्य सचिव गृह श्री अवनीश कुमार अवस्थी ने किया.

उन्होंने ‘मिशन शक्ति’ के द्वितीय फेज़ के दौरान महिला थाने की रिपोर्टिंग पुलिस चौकी की स्थापना तथा इससे सम्बन्धित प्रस्ताव, महिला साइबर क्राइम सेल, साइबर बुलीइंग व साइबर स्टॉकिंग के लिए डूज़ व डोन्ट्स, कम्युनिटी पुलिसिंग के तहत महिला सुरक्षा समिति के गठन, समिति के स्वरूप, महिला हेल्प डेस्क में प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा, अत्यधिक वृद्ध महिला कैदी/शारीरिक रूप से अशक्त महिला कैदियों की रिहाई, ‘मिशन शक्ति’ पुरस्कार इत्यादि के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री जी को अवगत कराया.

प्रस्तुतीकरण के दौरान मुख्यमंत्री जी के समक्ष ‘मिशन शक्ति’ में प्रतिभाग करने वाले विभिन्न विभागों जिनमें कृषि, पंचायती राज, राजस्व, महिला कल्याण तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार, चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास, युवा कल्याण, बेसिक शिक्षा, समाज कल्याण, उच्च शिक्षा, दुग्ध विकास, चिकित्सा शिक्षा, संस्कृति, माध्यमिक शिक्षा, प्राविधिक शिक्षा, औद्योगिक विकास, ग्राम्य विकास, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, परिवहन, नगर विकास, पशुपालन, अल्पसंख्यक कल्याण, न्याय तथा सहकारिता विभाग शामिल हैं, ने अपने-अपने विभाग द्वारा किए गए कार्यों तथा उपलब्धियों के विषय में जानकारी दी.

उल्लेखनीय है कि ‘मिशन शक्ति’ की शुरुआत शारदीय नवरात्र 2020 से की गई थी. यह अभियान बासन्तिक नवरात्र 2021 तक चलेगा. UP News

Social Stories: अनिता की समझदारी : इंस्पेक्टर सबको थाने क्यों ले गए

Social Stories: गरमी की छुट्टियों में पापा को गोआ का अच्छा और सस्ता पैकेज मिल गया तो उन्होंने एयरटिकट बुक करा लिए. अनिता और प्रदीप की तो जैसे मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई थी. एक तरफ जहां हवाईयात्रा का मजा था वहीं दूसरी तरफ गोआ के खूबसूरत बीचिज का नजारा देखने की खुशी थी. अनिता ने जब से अपने सहपाठी विजय से उस की गोआ यात्रा का वृत्तांत सुना था तब से उस के मन में भी गोआ घूमने की चाह थी.

आज तो उस के पांव जमीं पर नहीं पड़ रहे थे. बस, इंतजार था कि कब यात्रा का दिन आए और वे फुर्र से उड़ कर गोआ पहुंच गहरे, अथाह समुद्र की लहरों का लुत्फ उठाएं. उस का मन भी समुद्र की लहरों की तरह हिलौरे मार रहा था. अनिता 12वीं व प्रदीप 10वीं कक्षा में आए थे. हर साल पापा के साथ वे किसी हिल स्टेशन पर रेल या बस द्वारा ही जा पाते थे, लेकिन पहली बार हवाई यात्रा के लुत्फ से मन खुश था.

आखिर इंतजार की घडि़यां समाप्त हुईं और वह दिन भी आ गया जब वे अपना सामान पैक कर कैब से एयरपोर्ट पहुंचे और चैकिंग वगैरा करवा कर हवाईजहाज में बैठे. करीब ढाई घंटे के मजेदार हवाई सफर के बाद वे दोपहर 3 बजे गोआ एयरपोर्ट पहुंच गए, जहां बाहर होटल का कर्मचारी हाथ में तख्ती लिए उन्हें रिसीव करने आया था. बाहर निकलते ही सामने होटल के नाम की तख्ती लिए कर्मचारी को देख प्रदीप बोला, ‘‘वह रहा पापा, हमारे होटल का कर्मचारी.’’

पापा उस ओर मुखातिब हुए और उस व्यक्ति को अपना परिचय दिया. उस ने उन्हें एक तरफ खड़े होने को कहा और अन्य सवारियों को देखने लगा. फिर सब सवारियों के आ जाने पर उस ने अपनी ट्रैवलर बस बुलाई और सब को ले कर होटल रवाना हो गया. अनिता ने जिद कर खिड़की की सीट ली. ट्रैवलर बस सड़क किनारे लगे ऊंचेऊंचे नारियल के पेड़ों से पटी सड़कों पर दौड़ती जा रही थी. हरियाली, समुद्र के साइडसीन व मांडवी नदी पर बने पुल से बस गुजरी तो बड़ेबड़े क्रूज को नदी में तैरते देख अनिता ‘वाऊ’ कहे बिना न रही. होटल पहुंचे तो शाम हो चुकी थी. पापा ने बताया, ‘‘यहां क्रूज का लुत्फ उठाना अलग ही मजा देता है, थोड़ा आराम कर लेते हैं फिर क्रूज के सफर का मजा लेंगे.’’

ठीक 6 बजे सभी फ्रैश हो कर क्रूज की सवारी के लिए रवाना हो गए. रास्ते में प्राकृतिक नजारे, हरियाली, नारियल के पेड़ों का मनोरम दृश्य देखते ही बनता था. अनिता और प्रदीप ने कईर् सैल्फी लीं.

टैक्सी से उतरते ही सामने खड़े क्रूज को देख वे हतप्रभ रह गए. आते समय मांडवी नदी में तैरता क्रूज कैसे छोटी सी नाव सा दिख रहा था, पर वास्तव में दोमंजिला यह जहाज कितना बड़ा है. क्रूज के अंदर का नजारा भी दिलचस्प था. यहां छत पर डीजे बज रहा था तो निचली मंजिल पर खानेपीने की दुकान व अन्य इंतजाम था. क्रूज की छत से सनसैट का बहुत ही सुंदर नजारा दिख रहा था. लगभग एक घंटा क्रूज का लुत्फ उठा, मांडवी नदी की सैर कर स्टेज पर वहां के लोकल नृत्य देख वे फूले न समाए. उन्होंने यहां कई फोटो लिए. उन का यहां से वापस आने का मन नहीं कर रहा था.

अगले दिन जब वे बीचिज घूमने निकले तो अनिता ने डिमांड की कि अंजुना बीच चलते हैं, क्योंकि उस के सहपाठी विजय ने वहां के अप्रतिम सौंदर्य के बारे में बताया था.

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ पापा ने कहा और टैक्सी से वे अंजुना बीच के लिए रवाना हो गए. अंजुना तट के पास वर्ष 1920 में निर्मित अलबुकर्म का महल है जो 8 स्तंभों से घिरा है. इसे देख वे बीच पर आ कर लहरों का मजा लेने लगे.

तभी पापा के पास 2 व्यक्ति आए और अपने होटल के बारे में बताते हुए बोले, ‘‘हम सिर्फ होटल का प्रचार कर रहे हैं साथ ही आप को गिफ्ट भी देंगे. आज के लकी स्कीम वाले ब्रौशर हमें दिए गए हैं. बस, आप अपना फोन नंबर और कहां से आए हैं बताएं और कार्ड स्क्रैच करें,’’ ब्रौशर में कई मुफ्त गिफ्ट के फोटो छपे थे.

पापा ने फोन नंबर व नाम आदि लिखवाया व कार्ड स्क्रैच किया तो उस में मोबाइल लिखा मिला जिस से पापा के चेहरे पर भी मुसकुराहट आ गई. फिर उन दोनों ने उत्साहित होते हुए पापा को बताया कि हम आप को अपना होटल दिखाएंगे. जहां ले जाना व वापस छोड़ना फ्री रहेगा, फिर गिफ्ट देंगे.

पापा को लालच भी आया सो वे उन की बात मान टैक्सी में बैठ गए, लेकिन अनिता को यह अटपटा लग रहा था. वह मन ही मन सोच रही थी कि भला कोई किसी को फ्री में कुछ भी क्यों देगा? लगभग 2 किलोमीटर चल कर वह टैक्सी वाला उन्हें एक महलनुमा होटल के रिसैप्शन पर छोड़ कर चला गया. रिसैप्शन पर बैठी रिसैप्शनिस्ट ने पापा से हाथ मिलाया व अपना परिचय देते हुए बताया कि हम आप तीनों के लिए गिफ्ट भी प्रोवाइड करेंगे. बस, आप यह फौर्म भर दें.

फौर्म में नाम, पता, फोन नंबर और क्रैडिट कार्ड की डिटेल तक मांगी गई थी. साथ ही उन्होंने क्रैडिट कार्ड दिखाने को भी कहा. फिर अंदर से 2 युवतियां आईं जो देखने में ठीक नहीं लग रही थीं, उन्होंने भी पापा से हाथ मिलाया. रिसैप्शनिस्ट ने बताया कि ये दोनों युवतियां आप को होटल दिखाएंगी, लेकिन अनिता को उन की बातें खल रही थीं, ‘आखिर क्यों कोई फ्री में किसी को महंगे मोबाइल गिफ्ट करेगा सिर्फ होटल दिखाने के लिए?’ तभी उन में से एक युवती बड़ी अदा दिखाती हुई बोली, ‘‘आइए न, आप को होटल दिखाती हूं. हमारे होटल में हर तरह की सुविधा है.’’

अभी वह कुछ और कहती कि अनिता ने पापा को बुलाया और कहा, ‘‘पापा क्या आप मेरी बात समझ पाएंगे. मुझे लगता है ये लोग फ्रौड हैं. रूम दिखाने के बहाने कस्टमर को रूम में ले जाते हैं और युवती को अकेले में तंग करने का आरोप लगाते हैं फिर उसे ब्लैकमेल करते हैं.

‘‘पिछली बार मेरे क्लासफैलो विजय और उस के दोस्त गोआ आए थे तो उन के साथ बिलकुल ऐसी ही घटना घटी थी. उस ने मुझे बताया था. ये युवतियां भी मुझे कुछकुछ ऐसा ही इशारा करती दिखती हैं. बी अलर्ट पापा.’’ अनिता की बात सुन पापा का भी माथा ठनका, लेकिन तभी होटल की युवती बोली, ‘‘रुक क्यों गए. चलिए न,’’ और पापा का हाथ पकड़ कर ले जाने लगी.

पापा को लगा अनिता ठीक कह रही है यह इतने अपनेपन से हमें क्यों होटल दिखाएगी, लेकिन वे विरोध नहीं कर पाए. तब तक अनिता ने मम्मी व प्रदीप को भी सारी बात बता दी थी, ‘‘मम्मी आप ही सोचिए, कोई युवती इस तरह किसी का हाथ पकड़ कर ले जाती है भला?’’ अब मम्मी व प्रदीप ने भी पापा को रोका, प्रदीप बोला, ‘‘पापा, दीदी ठीक कह रही हैं, कोई हमें फ्री में गिफ्ट, फ्री में गाड़ी में यहां लाना व वापस छोड़ना क्यों करेगा भला? जरूर दाल में कुछ काला है.’’

अब पापा को भी किसी अनहोनी की आशंका लगी, अत: वे रूड होते हुए बोले, ‘‘छोड़ो मेरा हाथ, नहीं देखना मुझे तुम्हारा होटल,’’ फिर वे रिसैप्शन पर गए और वहां से अपना डिटेल भरा फौर्म ले कर फाड़ दिया और बोले, ‘‘फ्री के झांसे में हम नहीं आने वाले हटो, अगर गिफ्ट देना था, होटल ही दिखाना था तो क्रैडिट कार्ड की डिटेल क्यों भरवाईं,’’ कहते हुए पापा बाहर निकल गए. पीछेपीछे अनिता, प्रदीप व मम्मी भी चल दिए. होटल की ये युवतियां जाल में फंसा मुरगा हाथ से निकलने पर कुढ़ती हुई अपना सा मुंह ले कर रह गईं. बाहर आ कर वे राहत महसूस करते हुए अनिता की तारीफ कर रहे थे. उन्हें लग रहा था जैसे वे किसी बड़ी मुसीबत में फंसने से बच गए हैं. अब वे वापस अंजुना बीच जाने का रास्ता पूछना चाहते थे कि तभी वहां एक नवविवाहित जोड़ा आपस में लड़ता दिखा. वे दोनों एकदूसरे पर इलजाम लगा रहे थे तुम्हारे कारण ही फंसे, युवती कहती तुम ने मोबाइल गिफ्ट का लालच किया.

उन की बातें सुन अनिता को अपनी कहानी से जुड़ता वाकेआ लगा सो अनिता ने उन से पूछा, तो पता चला कि ठीक उसी तरह उस जोड़े को भी अंजुना बीच से मोबाइल गिफ्ट का सब्जबाग दिखा कर होटल लाया गया था. अंदर जा कर होटल दिखाने के बहाने होटल की उन लड़कियों ने मोबाइल व पर्स तक छीन लिया.

फौर्म में भरी क्रैडिट कार्ड की डिटेल दिखा कर बोले इस में लिखा है कि तुम इस कार्ड से पेमैंट करोगे. उन्होंने पुलिस बुलानी चाही पर उन्होंने बाउंसर रखे हुए हैं जो पकड़ कर उन्हें सड़क पर फेंक गए. अनिता ने फिर समझदारी दिखाई और बोली, ‘‘पापा, हमें पुलिस को कंप्लेंट कर इन की मदद करनी चाहिए.’’

‘‘नहीं,’’ वह युवक बोला, ‘‘उन्होंने फौर्म में हमारा, हमारे होटल का पता व रूम नंबर भी लिखवाया है और कहा है कि अगर तुम ने शिकायत की तो वहीं बाउंसर भेज कर पिटाई करवा देंगे.’’

‘‘ओह, तो क्या उन की धमकी से डर कर शिकायत भी नहीं करोगे. पापा, आप शिकायत कीजिए, हम अपना वाकेआ भी बताएंगे.’’

पापा को लगा अनिता ठीक कह रही है अत: उन्होंने पास के थाने में जा कर शिकायत की. पुलिस ने भी मुस्तैदी दिखाते हुए छापा मारा तो उस होटल से कई युवतियां पकड़ी गईं. यह एक गैंग था. पकड़े जाने पर रिसैप्शनिस्ट ने बताया कि हमारे गैंग के लोग बीच पर आए भोलेभाले लोगों को गिफ्ट के लालच में फ्री में गाड़ी में बैठा कर यहां लाते हैं. ‘‘फिर हम लोग होटल दिखाने के बहाने उन की सारी डिटेल भी लिखवा लेते हैं व होटल घुमाते हुए युवतियां पुरुष पर छेड़छाड़ का इलजाम लगा उन्हें धमकाती हैं. फिर इज्जत बचाने के लिए वे लोग सब दे जाते हैं व किसी से कहते भी नहीं.’’

इंस्पैक्टर ने सभी को गाड़ी में बैठाया और थाने ले आए जहां मीडिया वाले भी पहुंच चुके थे. सभी अनिता की समझदारी की तारीफ कर रहे थे. पापा ने भी अनिता की पीठ थपथपाई, ‘‘अनिता, आज तुम्हारी समझदारी से न केवल हम सब लुटने से बच गए बल्कि इस कपल्स का लुटा सामान भी वापस मिल पाया और गैंग का भंडाफोड़ हुआ सो अलग. मुझे तुम पर गर्व है बेटी.

’’ सुबह होटल के रैस्टोरैंट में नाश्ते को पहुंचे तो वहां पड़े अखबार में अनिता की समझदारी के चर्चे पढ़ कर पापा गर्व महसूस कर रहे थे. आसपास के लोगों को भी घटना का पता चला तो उन्होंने आ कर अनिता की पीठ थपथपाई व उस की समझदारी की तारीफ की. नाश्ता कर वे अपने अगले पड़ाव वैगेटोर बीच की ओर प्रस्थान कर गए. इस घटना ने उन की गोआ यात्रा को अविस्मरणीय बना दिया था. Social Stories