Bihar News: दुविधा – जब बेईमानों का साथ देना पड़े

Bihar News: बिहार में डेहरी औन सोन के रहने वाले मदन कुमार एक राष्ट्रीय अखबार के लिए ब्लौक लैवल के प्रैस रिपोर्टर का काम करते हैं. वे पत्रकारिता को समाजसेवा ही मानते हैं.

बेखौफ हो कर वे अपने लेखन से समाज को बदलना चाहते हैं, लेकिन उन के स्थानीय प्रभारी से यह दबाव रहता है कि खबर उन्हीं लोगों की दी जाए, जिन से उन्हें इश्तिहार मिलते हैं. जो इश्तिहार नहीं दे पाते हैं, उन की खबर बिलकुल नहीं दी जाए, भले ही खबर कितनी भी खास क्यों न हो.

मदन कुमार के प्रभारी उन लोगों के बारे में अकसर लिखते रहते हैं, जिन से उन्हें दान के तौर पर कुछ मिलता रहता है. भले ही वे लोग दलाली और भ्रष्टाचार कर के पैसा कमा रहे हैं. अपने ब्लौक के भ्रष्टाचारियों और दलालों की खबरों को ज्यादा अहमियत दी जाती है. उन के बारे में गुणगान पढ़ कर मन दुखी हो जाता है. कभीकभी तो उन के प्रभारी कुछ लोगों से मुंह खोल कर पैट्रोल खर्च, आनेजाने के खर्चे के नाम पर पैसे लेते रहते हैं.

वहीं मदन कुमार द्वारा काफी मेहनत और खोजबीन कर के लाई गई खबरों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, न ही छापा जाता है या बहुत छोटा कर दिया जाता है, क्योंकि उन संस्थाओं से प्रभारी महोदय को नाराजगी पहले से रहती है या कोई ‘दान’ नहीं मिला होता है, इसलिए वे कुछ दिनों से अपने प्रभारी से बहुत नाराज हैं. वे अकसर कहते हैं कि अब पत्रकारिता छोड़ कर दूसरा काम करना ठीक रहेगा और इस के लिए वे कोशिश भी कर रहे हैं. उन्हें इस प्रकार की दलाली पत्रकारिता से नफरत होती जा रही है.

मदन कुमार का कहना है, ‘‘अगर बेईमानी से ही कमाना है तो फिर पत्रकारिता में आने की क्या जरूरत है? बेईमानी के लिए बहुत सारे रास्ते खुले हुए हैं. और फिर मुंह खोल कर किसी से पैट्रोल और आनेजाने के खर्चे के नाम  पर पैसे मांग कर अपना ही कद छोटा करते हैं.

‘‘आम लोग इस तरह के बरताव से सभी रिपोर्टरों को एक ही तराजू पर तौलते हैं, इसीलिए आज स्थानीय पत्रकारों को कोई तवज्जुह नहीं देता है. लोग उन्हें बिकाऊ और दो टके का सम झते हैं, जबकि पत्रकारिता देश का चौथा स्तंभ माना जाता है.

‘‘इस तरह के बेईमानों के साथ काम करने पर मन को ठेस पहुंचती है. ईमानदारी से काम करने वाले के दिल को यह सब कचोटता है, खासकर तब जब आप का बड़ा अधिकारी ही बेईमान हो. आप उस का खुल कर विरोध भी नहीं कर सकते हैं. विरोध करने का मतलब है, अपनी नौकरी को जोखिम में डालना.’’

औरंगाबाद के रहने वाले नीरज कुमार सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं. सरकारी विद्यालय में बच्चों को मिड डे मील के लिए सरकार द्वारा चावल और पैसे दिए जाते हैं. उन के विद्यालय के प्रधानाध्यापक मिड डे मील के चावल और पैसे की हेराफेरी करते रहते हैं. जब कभी बच्चों की लिस्ट बनानी हो, तो उसे नीरज कुमार ही तैयार करते हैं. वे जानते हैं कि गलत रिपोर्ट बना रहे हैं, फिर भी वे उस गलत रिपोर्ट का विरोध नहीं कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें हर हाल में प्रधानाध्यापक की बात माननी पड़ती है.

एक बार प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को इस बारे में शिकायत की थी. तब प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी का कहना था, ‘आप अपने काम से मतलब रखिए. दूसरों के काम में अड़ंगा मत डालिए. आप सिर्फ अपने फर्ज को पूरा कीजिए.’

बाद में नीरज कुमार को पता चला कि इस हेराफेरी में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को भी कमीशन के रूप में पैसा मिलता है. उन का कमीशन फिक्स है, इसलिए वे ऐसे शिक्षकों को हेराफेरी करने से रोकते नहीं हैं, बल्कि सपोर्ट करते हैं. इस सब में नाजायज कमाई करने का एक नैटवर्क बना हुआ है. तब से नीरज कुमार अपने विद्यालय के गरीब बच्चों के निवाला की हेराफेरी करने वाले अपने प्रधानाचार्य का विरोध नहीं करते हैं. उन का कहना है, ‘‘मैं सिर्फ अपने फर्ज को पूरा करता हूं. यह हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, इसलिए मैं इस के बारे में चुप रहता हूं.

‘‘मैं सिर्फ पढ़ानेलिखाने पर ध्यान देता हूं. मैं आर्थिक मामलों में कुछ भी दखलअंदाजी नहीं करता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि ऐसा करने का मतलब है अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना यानी अपना ही नुकसान करना.

‘‘वैसे भी आप शिकायत करने किस के पास जाएंगे? जिन के पास भी जाएंगे यानी आप ऊपर के अधिकारी के पास जाएंगे तो उस की कमाई भी उस हेराफेरी से होती है, इसलिए वैसे लोग उस हेराफेरी को रोकने से तो रहे. बदले में आप का नुकसान भी कर सकते हैं. आप का ट्रांसफर करा देंगे.

‘‘आप को दूसरे मामले में फंसा कर नुकसान पहुंचाना चाहेंगे. अगर आप को शांति से नौकरी करनी है, तो अपना मुंह बंद रखना ही होगा.’’

इस तरह की बातों से यह साफ है कि जब बेईमानों के साथ काम करना पड़े या साथ देना पड़े, तो यह जरूरी है कि हम उन से अपनेआप को अलगथलग रखें. हमें जो काम और जिम्मेदारी दी गई है, उस को बखूबी निभाएं. बेईमान सहकर्मी के बारे में जहांतहां शिकायत करना भी ठीक नहीं है. इस  से आप की उस से दुश्मनी बढ़ने लगती है. शिकायत से कोई फायदा नहीं  होता है. आप के बनेबनाए काम भी बिगड़ जाते हैं, इस से खुद का ही नुकसान होता है. आप दूसरों को सुधारने के फेर में खुद का ही नुकसान कर लेते हैं.

अगर आप अपनी भलाई चाहते हैं, तो ज्यादा रोकटोक न करें. उन की बेईमानी की कमाई में किसी तरह का अड़ंगा न डालें. मुमकिन हो, तो उन्हें किसी दूसरे तरीके से बताने की कोशिश करें. अगर वे आप के इशारे को समझ जाते हैं, तो उचित है वरना अपने काम से मतलब रखें, क्योंकि उन का सीधा विरोध करने पर दुश्मनी महंगी पड़ सकती है. Bihar News

Hindi Story: हिम्मत ने दिलाई वरदी वालों को सजा

Hindi Story: बीकौम की छात्रा स्मिता भादुड़ी न तो कोई पेशेवर अपराधी थी और न ही किसी थाने में उस के खिलाफ कोई केस दर्ज था. उस का गुनाह महज इतना था कि वह अपने दोस्त के साथ कार में बैठ कर बातें कर रही थी. बदमाशों की सूचना पर वहां पहुंचे तथाकथित बहादुर पुलिस वालों ने जोश में आ कर सरकारी असलहे से गोलियां दाग दीं. एक गोली ने स्मिता का सीना चीर दिया.

पुलिस वालों ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उन के सिर पर ऐनकाउंटर के बदले मैडल और प्रमोशन पाने का जुनून सवार था. बेगुनाह छात्रा की हत्या का मामला सीबीआई को दिया गया. आखिरकार 3 पुलिस वालों को कुसूरवार मान कर उन्हें माली जुर्माने के साथसाथ उम्रकैद की सजा सुनाई गई. इसे लाचारी, इंसाफ की राह में कानूनी दांवपेंच की चाल कहें या कुछ और, अपनी होनहार बेटी स्मिता को खो चुके परिवार को इंसाफ के लिए 15 साल का लंबा, थकाऊ और पीड़ा देने वाला इंतजार करना पड़ा.

ऐनकाउंटर में शामिल पुलिस वाले इस दौरान न केवल आजाद रहे, बल्कि बचने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाते रहे. इतना ही नहीं, लंबे वक्त में मजे से नौकरी कर के वे अपने पदों से रिटायर भी हो गए. पुलिस के डरावने चेहरे से रूबरू हुए स्मिता के परिवार के दर्द का हिसाब शायद कोई कानून नहीं दे सकता है. कुसूरवार पुलिस वाले अब सलाखों के पीछे हैं. इस मामले से सीख भी मिलती है कि किसी की जान की कीमत पर मैडल व प्रमोशन पाने की ख्वाहिश देरसवेर सलाखों के पीछे पहुंचा कर भविष्य अंधकारमय भी कर देती है.

यों मारी गई होनहार छात्रा

स्मिता ऐनकाउंटर मामला रोंगटे खड़े कर देता है. स्मिता भादुड़ी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की मोदी कालोनी में रहती थी. उस के पिता एसके भादुड़ी मोदी कंपनी में बतौर इंजीनियर थे. उन के परिवार में पत्नी प्रतिमा के अलावा 2 बेटियां थीं, बड़ी प्रीति और छोटी स्मिता. उन का एक बेटा सुप्रियो भी था. 21 साला स्मिता बीकौम के आखिरी साल की छात्रा थी. स्मिता की दोस्ती मोहित त्योगी से थी. दोनों के बीच मुलाकातें होती रहती थीं. साल 2000 में 14 जनवरी की सर्द शाम थी वह. स्मिता अपने घर से मोहित से मिलने के लिए निकली. वे दोनों कार नंबर यूपी15जे-0898 से घूमने निकल गए.

दिल्लीदेहरादून हाईवे से सटे गांव सिवाया की कच्ची सड़क पर कार रोक कर वे बातें करने लगे. वहां कार खड़ी देख किसी ने बदमाश होने के शक में पुलिस को खबर दे दी. इसी बीच शाम के तकरीबन साढ़े 7 बजे इलाकाई थाना दौराला इंस्पैक्टर अरुण कौशिक, सिपाही भगवान सहाय व सुरेंद्र के साथ जीप ले कर वहां पहुंच गए. उन्होंने सोचा कि कोई बड़ा गैंग होगा. अपने पीछे पुलिस की गाड़ी देख मोहित ने कार आगे बढ़ा दी. इस पर पुलिस वालों ने पीछा करते हुए एकसाथ 11 गालियां दाग दीं. गोलियां कार पर भी लगीं और एक गोली ने स्मिता के सीने को चीर दिया. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

बुरी तरह घबराया मोहित कार रोक कर सरैंडर करने की मुद्रा में फौरन बाहर आ गया. पुलिस वालों ने उसे पीटपीट कर दोहरा कर दिया. इस बीच इंस्पैक्टर अरुण कौशिक ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी थी कि बदमाशों से मुठभेड़ हो गई है और दोनों तरफ से गोलीबारी हो रही है. मौके पर पहुंचे तब के एसएसपी आरपी सिंह को भी गुमराह करने की कोशिश की गई, लेकिन दहशतजदा मोहित की जबानी हकीकत खुलते ही सभी के होश उड़ गए.

छींटदार सलवारसूट व सफेद रंग का कार्डिगन पहने खून से लथपथ स्मिता कार की सीट पर पड़ी थी. नासमझी का परिचय दे कर इंस्पैक्टर ने खून से अपने हाथ रंग लिए थे. बेगुनाह छात्रा की मौत पर तीनों पुलिस वालों को फौरन सस्पैंड कर दिया गया. जिन दिनों यह ऐनकाउंटर हुआ था, उन दिनों पुलिस वालों के सिर पर जुनून सवार था कि ऐनकाउंटर करो और प्रमोशन पाओ. दरअसल, पुलिस की नौकरी में थोड़ी बहादुरी से प्रमोशन पा लिया जाता था. इंस्पैक्टर अरुण कौशिक भी इसी फोबिया के शिकार थे. पुलिस ने समझदारी दिखाई होती, तो स्मिता आज जिंदा होती.

चश्मदीद गवाह मोहित की तरफ से इंस्पैक्टर अरुण कौशिक, सिपाही भगवान सहाय व सुरेंद्र के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. खाकी पर खून के छींटे लगने का मामला तूल पकड़ गया. तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया.

इंसाफ की लंबी लड़ाई

यह मामला उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक पहुंचा, तो केस सीबीआई को चला गया. सीबीआई 3 साल तक जांच करती रही. इस बीच तीनों आरोपी जेल से छूट गए और बहाली पा कर नौकरी करने लगे. इतना ही नहीं, इंस्पैक्टर अरुण कौशिक सीओ भी बन गए. केस वापस लेने के लिए सीबीआई ने 26 फरवरी, 2004 को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की. अदालत में सुनवाई कई साल चलती रही. आरोपी पुलिस वालों ने पीडि़त परिवार पर कई तरह से दबाव बनाया. मोहित को डरायाधमकाया गया, लेकिन इंसाफ की आस में उस ने हार नहीं मानी. तीनों आरोपियों ने मामले को खत्म करने के लिए हाईकोर्ट से स्टे ले लिया और मजे से नौकरी की.

आरोपियों ने कानूनी हथकंडे अपना कर अदालत बदलने की मांग की और कई सुनवाई पर पेश नहीं हुए. नौकरी कर के तीनों रिटायर भी हो गए. सालों चले केस में गाजियाबाद स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने हत्या, जानलेवा हमले व मारपीट का कुसूरवार करार देते हुए आखिरकार 14 दिसंबर, 2015 को तीनों आरोपियों को उम्रकैद व डेढ़डेढ़ लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई.

जज नवनीत कुमार ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मामला विरल से विरलतम अपराध की श्रेणी में आता है. वरिष्ठ लोक अभियोजन अधिकारी कुलदीप पुष्कर की इस मामले में अदालत में दी गई यह दलील माने रखती है कि पुलिस का काम कानून का पालन करना और कराना है. अगर पुलिस ही कानून का पालन न करे और कानून का गलत इस्तेमाल कर किसी की हत्या कर दे, तो ऐसे हालात में समाज में दहशत फैलती है. कुसूरवार पुलिस वालों पर आरोप साबित होने में 15 साल, 9 महीने और 16 दिन लग गए. सजा होते ही तीनों को डासना जेल भेज दिया गया.

दर्द से गुजरा परिवार

बेटी की मौत से दुखी भादुड़ी परिवार जिस गम, दहशत और दर्द के दरिया से गुजरा, उस की भरपाई कानून की कोई धारा नहीं करती. पुलिस का घिनौना रूप आज भी उन्हें डराने का काम करता है. उन चंद लफ्जों ने इंजीनियर एसके भादुड़ी की दुनिया हिला दी थी, जब एक पुलिस अफसर ने उन से कहा, ‘आप की बेटी को पुलिस ने गलती से गोली मार दी है और उस की मौत हो गई है.’ उस रात की यादें कोई नहीं भुला पाता. सिरफिरे पुलिस वालों की करतूत से हंसतेखेलते परिवार पर स्मिता की मौत के साथ ही गम व मुसीबतों का पहाड़ टूट गया.

बेटी स्मिता की मौत के गम में मां प्रतिमा भादुड़ी डिप्रैशन में आ गईं. लाख समझाने पर भी वे बेटी का दर्द नहीं भुला सकीं. ज्यादा दवाओं के सेवन से उन का लिवर खराब हो गया. वे बीमार हुईं, तो इलाज कराया गया. परिवार माली रूप से परेशान हो गया. बाद में साल 2011 में उन की मौत हो गई. स्मिता का भाई सुप्रियो ग्राफिक डिजाइनर है. दोनों बापबेटे अकेले रहते हैं. अदालत के फैसले से वे खुश तो हैं, लेकिन कहते हैं कि ऐसा करने वालों को फांसी होनी चाहिए थी.

क्या सबक लेगी पुलिस

स्मिता का मामला उन पुलिस वालों के लिए एक सबक है, जो वरदी की हनक में बिना सोचेसमझे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं. मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में अव्वल दर्जा हासिल कर रही उत्तर प्रदेश पुलिस में ऐसे पुलिस वालों की एक बड़ी जमात है, जो गंभीर आरोपों से दामन दागदार किए हुए है. उन के कारनामे जनता में डर पैदा करते हैं.

पुलिस से आम आदमी कितना सुरक्षित महसूस करता है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोग आज भी थाने में आने से डरते हैं. पुलिस अगर बेगुनाहों के खून से हाथ रंगने लगे, तो बात सोचने वाली हो जाती है. स्मिता का मामला सबक जरूर देता है कि गलत कामों की सजा देरसवेर मिलती जरूर है. इस मामले में पुलिस वाकई सबक लेगी, इस में शक है. Hindi Story

Dehradun Crime News: डॉक्टर का काला धंधा

Dehradun Crime News: 14 सितंबर, 2017 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय में चल रही उस बैठक में कई पुलिस अधिकारी मौजूद थे. इस मीटिंग में 11 सितंबर को फरार हुए देश के सब से बड़े किडनी सौदागर डा. अमित की गिरफ्तारी को ले कर रायमशविरा हो रहा था.

डा. अमित की सैकड़ों करोड़ की संपत्ति थी और वह हाईप्रोफाइल लाइफ जीता था. उसे विश्व की 14 भाषाओं का ज्ञान था, सैकड़ों बार विदेश यात्रा कर चुका था. उस के व्यावसायिक तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े थे. खाड़ी देशों के अमीर शेखों से ले कर कई देशों के लोग उस के क्लाइंट रह चुके थे. वह अपने देश के गरीबों को रुपयों का लालच दे कर उन की किडनी खरीद कर अमीरों को बेचता था. डा. अमित राउत किडनी सौदागर भी था और किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला डाक्टर भी. इस काम में वह लाखों के वारेन्यारे करता था.

विचारविमर्श के बाद मीटिंग खत्म हो गई. डीजीपी अनिल कुमार रतूड़ी के निर्देशन में डीआईजी पुष्पक ज्योति और एसएसपी निवेदिता कुकरेती इस पूरे मामले की मौनिटरिंग कर रही थीं. सभी की नजर डा. अमित राउत पर टिकी थी.

दरअसल, 11 सितंबर, 2017 की सुबह देहरादून की एसएसपी निवेदिता कुकरेती को सूचना मिली थी कि डोईवाला थाना क्षेत्र के लाल तप्पड़ स्थित उत्तराखंड डेंटल कालेज में बने गंगोत्री चैरिटेबल हौस्पिटल में किडनी निकालने और ट्रांसप्लांट करने का अवैध कारोबार किया जा रहा है. यह भी पता चला था कि जो 4 लोग किडनी बेचने के लिए आए थे, वे हरिद्वार के रास्ते दिल्ली जाने वाले हैं.

एसएसपी ने अविलंब एक पुलिस टीम का गठन कर दिया, जिस में थाना डोईवाला के इंसपेक्टर ओमबीर सिंह रावत, हरिद्वार के इंसपेक्टर प्रदीप बिष्ट, एसआई सुरेश बलोनी, दिनेश सती, राकेश पंवार, महिला एसआई मंजुल रावत, आदित्या सैनी, कांस्टेबल गब्बर सिंह, भूपेंद्र सिंह, विनोद, नीरज और राजीव को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने सप्तऋषि चौकी के पास चैकिंग अभियान शुरू कर दिया. इसी बीच पुलिस ने एक इनोवा कार नंबर यूए 08 टीए 5119 को रोका. कार की चालक सीट पर एक युवक बैठा था, जबकि कार की पिछली सीट पर 2 महिलाएं व 3 पुरुष बैठे थे.

पुलिस को देख कर पीछे बैठे लोगों में से एक व्यक्ति बुरी तरह घबरा गया और उस ने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उसे दबोच लिया.

पुलिस पूछताछ में उन लोगों ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिसकर्मियों के रोंगटे खड़े हो गए. कार चालक का नाम दीपक था, जिसे किराए पर बुलाया गया था. जबकि अन्य लोगों में जावेद खान निवासी एस.बी. रोड सांताकु्रज, मुंबई, भावजी भाई निवासी जिला खेड़ा, गुजरात, शेखताज अली, 42 साल की सुसामा बनर्जी और 32 साल की कृष्णा दास. सुसामा बनर्जी और कृष्णा दास दक्षिण परगना, वेस्ट बंगाल की रहने वाली थीं.

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इन लोगों ने पुलिस को बताया कि अस्पताल का एजेंट जावेद खान उन्हें 3 लाख रुपए में किडनी खरीदने का वादा कर के अस्पताल लाया था. अस्पताल में कृष्णा दास व शेखताज अली की किडनी निकाल ली गई थी.

भावजी भाई और सुसामा बनर्जी को किडनी निकालने के लिए ले जाया गया. उन की किडनी निकालने की तैयारियां शुरू कर दी गई थीं. उसी बीच ठीक होने पर कृष्णा दास व शेखताज ने किडनी के बदले रुपए देने की मांग की तो एजेंट व अस्पताल संचालकों ने टालमटोल शुरू कर दी. यह देख कर भावजी भाई व सुसामा ने किडनी देने से इनकार कर दिया. हंगामा बढ़ता देख अस्पताल वालों ने उन्हें एजेंट के साथ वापस भेज दिया. पैसों को ले कर हुए इस झगड़े की भनक किसी तरह सनीपुर कोतवाली में तैनात कांस्टेबल पंकज कुमार को लग गई थी.

झगड़ा किस बात को ले कर था, यह राज भी पता चल गया था. इस के बाद उस ने जरूरी जानकारियां जुटा कर एसएसपी निवेदिता कुकरेती को इस की सूचना दे दी थी. पुलिस ने कार की तलाशी ली तो उस में से ओमान सहित कुछ देशों के एयर टिकट मिले, जिस से पता चलता था कि गिरोह के तार विदेशों तक जुड़े हैं. पुलिस ने जावेद खान से पूछताछ की तो उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि वह हौस्पिटल के संचालक डा. अमित के लिए काम करता था. वह देश के अलगअलग हिस्सों से गरीब लोगों को रुपयों का लालच दे कर देहरादून लाता था. किडनी देने वालों को 3 लाख रुपए मिलते थे, जबकि उसे कमीशन मिलता था.

जावेद ने यह भी बताया कि हौस्पिटल के संचालक किडनी की खरीदफरोख्त करने के साथसाथ किडनी ट्रांसप्लांट भी करते थे. इस काम में उन्हें मोटी कमाई होती थी. यह खबर डीजीपी अनिल रतूड़ी, एडीजे (कानून व्यवस्था) राम सिंह मीना, डीआईजी पुष्पक ज्योति को मिली तो उन्होंने एसएसपी को इस मामले में तत्काल सख्त काररवाई करने के निर्देश दिए. एसएसपी के निर्देशन में एसपी देहात सरिता डोभाल, एएसपी लोकेश्वर सिंह, मंजूनाथ टीसी सहित कई थानों की पुलिस टीम ने हौस्पिटल में रेड की, लेकिन तब तक अस्पताल का ज्यादातर स्टाफ और डा. अमित फरार हो चुका था.

स्वास्थ्य विभाग व एफएसएल की टीमों को भी मौके पर बुलवा लिया गया था. जांच के दौरान कई ऐसी दवाइयां मिलीं, जो किडनी ट्रांसप्लांट में काम आती थीं. औपरेशन थिएटर में भी ऐसे इंस्ट्रूमेंट मौजूद थे. पुलिस ने जरूरी रिकौर्ड व सबूतों को कब्जे में ले कर अस्पताल को सील कर दिया.

केस दर्ज कर के कार्रवाई

पुलिस ने इस संबंध में थाना डोईवाला में जावेद के अलावा डा. अमित कुमार, डा. अक्षय उर्फ राउत, डा. संजय दास, सुषमा कुमारी, राजीव चौधरी, चंदना गुडि़या के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 370, 342 और मानव अंगों के प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 की धारा 18, 19, 20के  अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया.

डा. अमित के अलावा अन्य लोग उस की टीम का हिस्सा थे. पुलिस ने भावजी भाई, शेखताज अली, सुसामा बनर्जी और कृष्णा दास को मैडिकल परीक्षण हेतु अस्पताल में भर्ती करा दिया. बाद में उन्हें कोर्ट में पेश कर के धारा 164 के तहत उन के बयान दर्ज कराए गए. पुलिस ने जरूरी पूछताछ के बाद जावेद को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस जांच के साथ ही डा. अमित और उस के साथियों की तलाश में जुट गई. विवेचना के दौरान पुलिस ने अमित के साथियों अनुपमा, नसीम, प्रदीप उर्फ बिल्लू, सरला व अभिषेक को भी आरोपी बनाया.

किडनी के अवैध कारोबार के अब तक के सब से बड़े खुलासे ने पुलिस से ले कर सुरक्षा एजेंसियों तक को सकते में डाल दिया था. जो गंभीर बातें सामने आईं, उन के अनुसार, पिछले कुछ समय में खाड़ी देशों के शेखों के अलावा यूरोप व एशियाई देशों के विदेशी डा. अमित के यहां किडनी ट्रांसप्लांट करा कर जा चुके थे. ऐसे लोग टूरिस्ट वीजा ले कर उत्तराखंड घूमने के बहाने आते थे, लेकिन उन का वास्तविक मकसद किडनी ट्रांसप्लांट कराना होता था.

5 टीमें लगाई गईं

मामला गंभीर था, लिहाजा प्रदेश सरकार के प्रवक्ता कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने भी इस मामले में विस्तृत जांच करने के आदेश दे दिए. डा. अमित व उस के साथियों की गिरफ्तारी के लिए 5 पुलिस टीमों का गठन किया गया. 48 घंटे बीत चुके थे, लेकिन डाक्टर का कुछ पता नहीं चल रहा था. आरोपी विदेश भाग सकता था, इसलिए लुकआउट नोटिस जारी कर के हवाई अड्डों को भी सूचना दे दी गई थी. इसी बीच 13 सितंबर को पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी डाक्टर डोईवाला इलाके के ही नेचर विला रिसौर्ट में रुका हो सकता है. पुलिस टीम सर्च वारंट ले कर वहां पहुंची. वहां की तलाशी ले कर पुलिस ने एंट्री रजिस्टर को अपने कब्जे में ले लिया. लेकिन आरोपी वहां नहीं मिला.

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पुलिस ने कमरा नंबर 103 की खासतौर पर तलाशी ली और जरूरी चीजों की जांच पड़ताल की. पुलिस डा. अमित व उस के साथियों की सरगर्मी से तलाश में जुटी थी. उस के करीबियों को उठा कर पूछताछ की जा रही थी. डा. अमित सहित सभी फरार आरोपियों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ  आ रहे थे. पुलिस उन की काल डिटेल्स हासिल कर चुकी थी, लेकिन उस से भी कोई मदद नहीं मिल रही थी.

इस बीच पुलिस ने डा. अमित से जुडे़ 9 बैंक खातों को सीज करा दिया. डा. अमित की फरारी पुलिस के लिए चुनौती बन गई थी. पुलिस टीमों के काम की मौनिटरिंग आला अधिकारी खुद कर रहे थे. 14 सितंबर को एएसपी लोकेश्वर सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम डा. अमित के करीबियों की मोबाइल सर्विलांस व मुखबिरों से मिली सूचना के जरिए दिल्ली होते हुए पहले चंडीगढ़ और फिर पंचकूला पहुंची. दरअसल, डा. अमित के एक मोबाइल नंबर की लास्ट लोकेशन वहीं मिली थी, इसलिए पुलिस ने अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया था.

देहरादून से पंचकूला

इस पुलिस टीम मे एसओजी प्रभारी पी.डी. भट्ट, थानाप्रभारी रानीपोखरी धर्मेंद्र सिंह, एसएसआई मनोज रावत, रायवाला थानाप्रभारी आशीष गोसाई, एसआई ब्रजपाल सिंह, भुवनचंद्र पुजारी, मंजुल रावत, दिनेश सिंह सती, योगेश कुमार व दीपक सिंह पंवार आदि शामिल थे. पुलिस के पास सूचना थी कि डा. अमित व उस के साथी पंचकूला की साहिलपुरी कालोनी के सैक्टर-8 स्थित एक घर में छिपे हैं, लेकिन पुलिस ने वहां दबिश दी तो घर बंद मिला. अगले दिन यानी 15 सितंबर को पुलिस टीम सैक्टर-18 स्थित फाइव स्टार होटल पल्लवी पहुंची. होटल की पार्किंग में एक बीएमडब्ल्यू कार नंबर-डीएल 3 एफटी 5000 व मर्सिडीज कार नंबर यूपी 16 एआर 1100 खडी थीं, जिन्हें देख कर पुलिस को शक हुआ.

पुलिस टीम ने होटल का रजिस्टर देख कर और डा. अमित का फोटो दिखा कर होटल के स्टाफ से पूछमाछ की तो उन्होंने ऐसे व्यक्ति का अपने यहां ठहरना बताया. पुलिस ने एक कमरे मे दस्तक दी तो दरवाजा एक युवती ने खोला. पुलिस को देख कर युवती बुरी तरह घबरा गई. पुलिस उसे किनारे कर के अंदर दाखिल हो गई. डा. अमित कमरे में आराम से बैड पर लेटा विदेशी खजूर खा रहा था. पुलिस को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पुलिस ने डा. अमित के साथसाथ युवती व दूसरे कमरे में रुके उन के 2 साथियों को गिरफ्तार कर लिया. डा. अमित कसमसा कर रह गया. पकड़े गए लोगों में नर्स सरला, जीवन और मैनेजमैंट का काम देखने वाला प्रदीप शामिल था. पुलिस ने उन के कब्जे से दोनों कारों के अलावा 5 मोबाइल फोन, जिन में 2 आईफोन थे और 33 लाख 73 हजार रुपए नकद बरामद किए. डा. अमित 2 हजार के नए नोटों की गड्डियां बैग में लिए घूम रहा था. पुलिस टीम सभी को गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई.

डा. अमित सहित अन्य से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की. जांच व पूछताछ में डा. अमित के किडनी के गोरखधंधे की ऐसी कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने पुलिस के आला अधिकारियों को भी चौंका दिया. कालाधंधा करने वाला यह डाक्टर देश का सब से बड़ा किडनी सौदागर निकला.

64 वर्षीय अमित राउत मूलरूप से महाराष्ट्र का रहने वाला था और पिछले कई सालों से इस काम में लिप्त था. बताते हैं कि एक नेफ्रोलौजिस्ट के अधीन काम कर के उस ने किडनी ट्रांसप्लांट में महारथ हासिल की और फिर राह से भटक कर रैकेट चलाना शुरू कर दिया. सन 1993 में उस पर मुंबई में किडनी ट्रांसप्लांट का पहला केस दर्ज हुआ. उसे जेल जाना पड़ा. तब तक देश में न तो कोई ऐसा कानून था और न ही ऐसी कोई परिभाषा कि मानव अंगों का प्रत्यारोपण किन मामलों में सही है.

सरकार ने इसे गंभीरता से ले कर मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम बना दिया, जिस में स्पष्ट किया गया कि डोनर कौन हो सकता है और ब्लड रिलेशन की परिभाषा क्या है. जेल से जमानत पर आ कर अमित जयपुर गया और फिर से इसी काम में जुट गया.

ठिकाने बदलबदल कर वह अपना काम करता रहा. जिस शहर या राज्य में भी वह पकड़ा जाता, उसे हमेशा के लिए छोड़ देता. न उसे कानून का डर था और न शर्म. उत्तराखंड उसे अपने लिए सुरक्षित ठिकाना लगा. कई साल पहले उस ने अपने एक दोस्त राजीव चौधरी के साथ मिल कर उत्तराखंड के डेंटल कालेज के अंदर 50 लाख रुपए की सालाना लीज पर जगह ले कर गंगोत्री चैरिटेबल हौस्पिटल खोल लिया. चैरिटेबल की आड़ भर थी, वास्तव में अमित का असली धंधा कुछ और था. कई लोगों की अच्छेबुरे कामों को ले कर अपनी धारणा होती है.

किडनी ट्रांसप्लांट को ले कर डा. अमित की धारणा थी कि यह सामाजिक काम है. इस से लोगों की जिंदगी बचती है. कानून से खेलने की उस की जैसे आदत बन चुकी थी. क्योंकि इस में मोटी कमाई थी. वह जरूरतमंद गरीब लोगों की किडनी 2 से 3 लाख रुपए में लेता था, जबकि उसे 40 से 50 लाख रुपए में ट्रांसप्लांट करता था. अपने इस काम का वह इतना एक्सपर्ट हो चुका था कि उस का कभी भी कोई औपरेशन असफल नहीं हुआ.

दूसरे डाक्टरों को इस काम में 6 घंटे लगते थे, जबकि यह काम वह महज 2 से ढाई घंटे में कर देता था. वह देशभर में फैले अपने एजेंटों के जरिए कई बार डोनरों को हवाईजहाज की यात्रा कराता था. गरीब डोनर स्वेच्छा से किडनी देते थे और ट्रांसप्लांट कराने वाले विदेशी होते थे, इसलिए मामला खुलता नहीं था. अमित का पूरा स्टाफ उस के इस धंधे को जानता था. लेकिन वह उन्हें न सिर्फ अच्छा पैसा देता था, बल्कि अपने धंधे को समाज सेवा बताता था. अमित शातिर दिमाग था, वह 5 मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करता था. इन में देशी एजेंटों, विदेशी एजेंटों, डाक्टरों व खरीददारों के लिए अलगअलग नंबर थे.

अरबों की संपत्ति का मालिक

अमित का अंतरराष्ट्रीय मैनेजमेंट नेटवर्क अमेरिका, श्रीलंका, नेपाल, तुर्किस्तान, ओमान, दुबई, इंग्लैंड समेत एक दर्जन से भी ज्यादा देशों में फैला हुआ था. विदेशी एजेंटों से संपर्क के लिए उस ने औनलाइन सिस्टम बनाया हुआ था. वह बड़े रईसों के औपरेशन के लिए विदेश भी जाता था. डा. अमित दिमाग का इतना तेज था कि उस की 14 भाषाओं पर पकड़ थी. इसी धंधे से अमित ने कई सौ करोड़ की संपत्ति जुटा ली थी.

भारत के दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, पंजाब, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु राज्यों के अलावा कनाडा, आस्ट्रेलिया, ग्रीस, नेपाल व हौंगकौंग में भी उस की संपत्तियां हैं.

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देहरादून में ही उस की 50 बीघा से ज्यादा जमीन है. मनी लौंड्रिंग के केस में प्रवर्तन निदेशालय उस की संपत्तियों को जब्त भी करता रहा है. लेकिन डा. अमित की कमाई ही इतनी थी कि उस पर कोई असर नहीं पड़ा. 11 सितंबर को पैसों को ले कर डोनर से झगड़ा न हुआ होता तो शायद ही उस की पोल खुलती.

पुलिस द्वारा एजेंट के पकड़े जाने की खबर लगते ही वह अपने खास स्टाफ के साथ फरार हो गया था. अमित जानता था कि पुलिस उसे भूखे शेर की तरह ढूंढ रही है. वह छिपताछिपाता पंचकूला के होटल में जा कर रुका. डा. अमित पूरी तरह आश्वस्त था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी. वहां से उस का इरादा नेपाल भागने का था, लेकिन उस से पहले ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

किडनी रैकेट के सरगना डा. अमित की फैमिली लाइफ भी अजीब निकली. उस की पहली शादी सुनीता के साथ हुई थी, जबकि दूसरी बीवी पूनम कनाडा में है. उस ने तीसरी शादी बुलबुल नाम की महिला से करने की बात पुलिस को बताई.

खुद को समाज सेवी समझता था डाक्टर

खास बात यह थी कि वह चौथी शादी करने की भी तैयारी में था, लेकिन किडनी कांड के उछलने के बाद उस की योजना पर पानी फिर गया. डा. अमित की पहली पत्नी का बेटा अक्षय एमबीबीएस और एमडी डिग्री धारक है और अमेरिका में रहता है. अपने काले धंधे को ले कर अमित को कोई अफसोस नहीं है. उस का कहना था कि कानून की नजर में वह भले ही अपराधी हो, लेकिन उस ने सैकड़ों जिंदगियां बचाई हैं. उन सब की दुआएं उस के साथ हैं.

पुलिस ने अमित सहित सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक अमित की जमानत नहीं हो सकी थी. जबकि पुलिस उस के अन्य साथियों को तलाश रही थी.

17 सितंबर को पुलिस ने अमित के दोस्त राजीव चौधरी (जो अस्पताल के संचालन का काम देखता था) की पत्नी अनुपमा, मैडिकल स्टोर संचालक अभिषेक व अमित के एक अन्य साथी जगदीश को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. राजीव के साथ अनुपमा भी हौस्पिटल का काम देखती थी. इतना ही नहीं, सर्जरी के लिए खरीदी जाने वाली दवाओं का भुगतान अनुपमा के खातों से ही होता था. पूछताछ के दौरान इन लोगों ने भी अमित के गोरधखंधे की पोल खोली है. Dehradun Crime News

–  कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: 100 लाशों के साथ सेक्स करने वाला इलेक्ट्रीशियन

Crime Story: इंग्लैड के ईस्ट ससेक्स राज्य में ब्रिटिश पुलिस को 34 सालों से 2 युवतियों के हत्यारे की तलाश थी. इस के लिए पुलिस ने जबरदस्त जाल बिछा रखा था. फिर भी हत्यारे पकड़ से बाहर थे. इस कारण पुलिस ने जासूसों की टीम भी लगाई.

मामला 25 वर्षीया वेंडी नेल और 20 साल की कैरोलिन पियर्स की हत्याओं का था. उन के साथ दुष्कर्म भी हुआ था. दोनों टुगब्रिज वेल्स में रहती थीं और अलगअलग वारदातों में 1987 में दोनों की हत्या कर दी गई थी. उस हत्याकांड को ‘बेडसिट मर्डर्स’ के रूप में जाना गया था. नेल गिल्डफोर्ड रोड स्थित अपने अपार्टमेंट में 23 जून, 1987 को मृत पाई गई थी. पुलिस को इस की सूचना उस के मंगेतर ने दी थी. उस के शरीर पर कई जख्म थे. जबकि पियर्स की लाश उसी साल 5 महीने बाद 24 नवंबर को उन के घर से 40 मील दूर बांध के पानी में तैरती हुई बरामद हुई थी.

उन की मौत के सिलसिले में हुई जांच में हत्या और दुष्कर्म के जो सुराग मिले थे, उस के अनुसार मृतकों के शरीर, अंगवस्त्र, तौलिए, बैडशीट आदि से मिले एक जैसे डीएनए को सबूत का आधार बनाया गया था. उस डीएनए वाले व्यक्ति का पता लगाने के लिए 15 दिसंबर, 1987 को अदालती आदेश के बाद ब्रिटिश पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी थी. फोरैंसिक वैज्ञानिकों द्वारा 1999 में डीएनए जांच के आधुनिक तरीके अपनाए गए थे और इस के लिए एक नैशनल लेवल पर डेटाबेस तैयार किया गया था.

दोनों लड़कियों के सैकड़ों करीबियों से पूछताछ के साथसाथ उन के डीएनए की भी जांच की गई थी. रिश्तेदारों, दोस्तों और फिर उन के करीबियों से जांच के सिलसिले में डेविड फुलर के घर वालों के डीएनए की भी जांच हुई, जिसे हत्या के आरोप में पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका था.

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इस तरह पुलिस को अंतत: 2019 में सफलता मिल गई, लेकिन कोरोना संक्रमण की वजह से उस की गिरफ्तारी 3 दिसंबर, 2020 को हो पाई. 67 वर्षीय डेविड फुलर को ईस्ट ससेक्स के हीथफील्ड स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उस का डीएनएन मृतकों से प्राप्त नमूने से मेल खाता था. इसी के साथ जब उस के घर की गहन तलाशी ली गई, तब यौन अपराध का जो राज खुला, वह जितना चौंकाने वाला था, उतना ही घिनौना भी था.

फुलर के अनगिनत कुकर्मों का खुलासा उस के घर और घर के कार्यालय की तलाशी के बाद हुआ. पुलिस को कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, सीडी, डीवीडी और फ्लौपी डिस्क में 14 मिलियन से अधिक अश्लील तसवीरें भरी मिलीं. उन में बच्चों की लाश के साथ अश्लील वीडियो भी थे. सभी अलगअलग फोल्डर में रखे गए थे और उन पर नाम का लेबल भी लगाया गया था. साथ ही एक डायरी में यौन अपराधों का काला चिट्ठा दर्ज था.

उसी आधार पर पुलिस ने पाया कि फुलर अपनी वासना की आग बुझाने के लिए 2 मुर्दाघरों में महिलाओं की लाशों के साथ दुष्कर्म किया करता था. यह कुकर्म वह करीब 100 लाशों के साथ कर चुका था, जिन में 9 साल की बच्ची से ले कर 100 साल की वृद्धा तक की लाशें शामिल थीं. यह सब उस ने तब किया था, जब वह हीथफील्ड अस्पताल में इलैक्ट्रीशियन की नौकरी करता था.

ये सारी बातें फुलर ने मेडस्टोन क्राउन अदालत में दोनों लड़कियों की हत्या को ले कर हुई सुनवाई के दौरान स्वीकार की. उस ने यह भी बताया कि दोनों की बेरहमी से हत्या करने के बाद उस की लाश के साथ दुष्कर्म किया था. तभी नेल के तौलिए, अंडरगारमेंट, और लार में फुलर का डीएनए पाया गया था. फुलर के जुर्म से इंग्लैंड की अदालत भी दंग थी. कोर्ट ने माना कि ब्रिटेन या कहें कि दुनिया के इतिहास में इतना खौफनाक और दर्दनाक वाकया शायद कभी नहीं गुजरा, लिहाजा कोर्ट ने इस मामले को बेहद संजीदगी से लेते हुए उसे अपराधी ठहरा दिया.

न्यायाधीश चीमा ग्रव ने फुलर को उन की हत्याओं के अलावा 51 अलगअलग मामलों के अपराधों का भी दोषी करार दिया, जिस में 44 मामले लाशों से छेड़छाड़ के थे. साथ ही मुर्दाघरों में 78 लाशों की भी पहचान कर ली गई. उसे 2 लड़कियों नेल और पियर्स की हत्या के लिए भी दोषी ठहराया गया. कैरोलीन पियर्स का फुलर ने 24 नवंबर, 1987 को उस के घर के बाहर ग्रोसवेन पार्क से अपहरण कर लिया था. वहीं उस की हत्या कर लाश के साथ दुष्कर्म किया था.

पड़ोसियों ने उस के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनी थी. एक हफ्ते बाद उस की लाश उन के घर से 40 मील दूर मिली थी, जिस की सूचना पुलिस को एक खेतिहर मजदूर ने दी थी. पुलिस ने अदालत में बताया कि फुलर दोनों लड़कियों को पहले से जानता था. वह उसी फोटो डेवलपमेंट चेन का ग्राहक था, जहां नेल काम करती थी. इस के अलावा फुलर की पियर्स से जानपहचान बस्टर ब्राउन रेस्टोरेंट में हुई थी, जहां वह मैनेजर थी.

इन वारदातों के 24 साल बाद फुलर की सितंबर 2011 में गिरफ्तारी हुई थी. तब वह सबूत नहीं मिलने के कारण छूट गया था. उस ने अदालत में बताया कि वह 1989 से 12 साल तक हीथफील्ड अस्पताल के 2 मुर्दाघरों में बिजली संबंधी समस्याओं की देखभाल के लिए अकसर आताजाता था. वह वहां के रखरखाव का सुपरवाइजर था. मुर्दाघर के फ्रीजर के देखभाल की जिम्मेदारी उसी पर थी. इस के लिए उसे वहां प्रवेश के

लिए निजी एक्सेस स्वाइप कार्ड मिला हुआ था. मुर्दाघर में कुल 5 कर्मचारी काम करते थे, जिन की ड्यूटी सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक की होती थी. फुलर की ड्यूटी दिन के 11 बजे से शाम के 7 बजे तक की थी. इस कारण दूसरे कर्मचारियों के चले जाने के बाद भी वह मुर्दाघर में रुका रहता था. अपनी शिफ्ट के अखिरी 3 घंटों में ही उस ने यह घिनौने काम किए थे. वैसे अस्पताल के कुली किसी भी समय नए शवों के साथ मुर्दाघर में आ सकते थे. यह फुलर के लिए पोस्टमार्टम कक्ष में प्रवेश करने का अच्छा मौका होता था. फुलर पोस्टमार्टम कक्ष में चला जाता था. ऐसा करते हुए किसी का ध्यान उस पर नहीं जाता था.

मुर्दाघर के अन्य हिस्सों की तुलना में शवों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए पोस्टमार्टम कक्ष में कोई सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए गए थे. हालांकि  मुर्दाघर की ओर जाने वाले गलियारों सहित अन्य क्षेत्रों पर निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगे थे. इस नतीजे तक पहुंचने में इंग्लैंड पुलिस को 2.5 मिलियन यूरो यानी 21.42 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े थे. फुलर के अपराध मुर्दाघर की लाशों के साथ यौनाचार तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इसे यादगार बनाए रखने के लिए  उस ने एक डायरी भी बना रखी थी.

वह लाशों के साथ यौन संबंध बनाने के बाद बाकायदा उस घटना को अपने अनुभवों के साथ डायरी में नोट करता था. यही नहीं, उस ने सैक्स की फ्यूचर प्लानिंग तक कर रखी थी. Crime Story

Crime News: अपहरण के चक्कर में फंस गया मुंबई का किंग

Crime News:15 मई, 2017 की सुबह की बात है. समय 11-साढ़े 11 बजे सीकर जिले के शहर फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार अपनी ज्वैलरी की दुकान पर थे. उन की पत्नी पार्वती और बेटा ध्रुव ही घर पर थे. बेटी वर्षा किसी काम से बाजार गई थी. उसी समय अच्छी कदकाठी का एक सुदर्शन युवक उन के घर पहुंचा. उस के हाथ में शादी के कुछ कार्ड थे. युवक ने ललित के घर के बाहर लगी डोरबेल बजाई तो पार्वती ने बाहर आ कर दरवाजा खोला. युवक ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘नमस्ते आंटीजी, पोद्दार अंकल घर पर हैं?’’

पार्वती ने शालीनता से जवाब देते हुए कहा, ‘‘नमस्ते भैया, पोद्दारजी तो इस समय दुकान पर हैं. बताइए क्या काम है?’’

‘‘आंटीजी, हमारे घर में शादी है. मैं कार्ड देने आया था.’’ युवक ने उसी शालीनता से कहा.

युवक के हाथ में शादी के कार्ड देख कर पार्वती ने उसे अंदर बुला लिया. युवक ने सोफे पर बैठ कर एक कार्ड पार्वती की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आंटीजी, यह कार्ड पोद्दार अंकल को दे दीजिएगा. आप लोगों को शादी में जरूर आना है. बच्चों को भी साथ लाइएगा.’’

पार्वती ने शादी का कार्ड देख कर कहा, ‘‘भैया आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आंटीजी, आप नहीं पहचानतीं, लेकिन पोद्दार अंकल मुझे अच्छी तरह से पहचानते हैं.’’ युवक ने कहा.

पार्वती ने घर आए, उस मेहमान से चायपानी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘चायपानी के तकल्लुफ की कोई जरूरत नहीं है, आंटीजी. अभी एक कार्ड आप के भांजे अश्विनी को भी देना है. मैं उन का घर नहीं जानता. आप अपने बेटे को मेरे साथ भेज देतीं तो वह उन का घर बता देता. कार्ड दे कर मैं आप के बेटे को छोड़ जाऊंगा.’’

बाहर तेज धूप थी. इसलिए पार्वती बेटे को बाहर नहीं भेजना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आप कार्ड हमें दे दीजिए. शाम को अश्विनी हमारे घर आएगा तो हम कार्ड दे देंगे.’’

पार्वती की बात सुन कर युवक ने मायूस होते हुए कहा, ‘‘कार्ड तो मैं आप को दे दूं, लेकिन पापा मुझे डांटेंगे. उन्होंने कहा है कि खुद ही जा कर अश्विनी को कार्ड देना.’’

युवक की बातें सुन कर पार्वती ने ड्राइंगरूम में ही वीडियो गेम खेल रहे अपने 13 साल के बेटे ध्रुव से कहा, ‘‘बेटा, अंकल के साथ जा कर इन्हें अश्विनी का घर बता दे.’’

ध्रुव मां का कहना टालना नहीं चाहता था, इसलिए वह अनमने मन से जाने को तैयार हो गया. वह युवक ध्रुव के साथ घर से निकलते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू आंटीजी.’’

ध्रुव और उस युवक के जाने के बाद पार्वती घर के कामों में लग गईं. काम से जैसे ही फुरसत मिली उन्होंने घड़ी देखी. दोपहर के साढ़े 12 बज रहे थे. ध्रुव को कब का घर आ जाना चाहिए था. लेकिन वह अभी तक नहीं आया था. पार्वती ने सोचा कि ध्रुव वहां जा कर खेलने या चायपानी पीने में लग गया होगा. हो सकता है, अश्विनी ने उसे किसी काम से भेज दिया हो. यह सोच कर वह फिर काम में लग गईं.

थोड़ी देर बाद उन्हें जब फिर ध्रुव का ध्यान आया, तब दोपहर का सवा बज रहा था. ध्रुव को घर से गए हुए डेढ़ घंटे से ज्यादा हो गया था. पार्वती को चिंता होने लगी. 10-5 मिनट वह सेचती रहीं कि क्या करें. कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने पति ललित पोद्दार को फोन कर के सारी बात बता दी. पत्नी की बात सुन कर ललित को भी चिंता हुई. उन्होंने पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘ध्रुव कोई छोटा बच्चा नहीं है कि कहीं खो जाए या इधरउधर भटक जाए. फिर भी मैं अश्विनी को फोन कर के पता करता हूं.’’

ललित ने अश्विनी को फोन कर के ध्रुव के बारे में पूछा तो अश्विनी ने जवाब दिया, ‘‘मामाजी, मेरे यहां न तो ध्रुव आया था और ना ही कोई आदमी शादी का कार्ड देने आया था.’’

अश्विनी का जवाब सुन कर ललित भी चिंता में पड़ गए. वह तुरंत घर पहुंचे और पार्वती से सारी बातें पूछीं. उन्होंने वह शादी का कार्ड भी देखा, जो वह युवक दे गया था. कार्ड पर लियाकत सिवासर का नाम लिखा था. ललित को वह शादी का कार्ड अपने किसी परिचित का नहीं लगा. उन्होंने कार्ड पर लिखे मोबाइल नंबरों पर फोन किया तो वे नंबर फरजी निकले.

ललित को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. उन के मन में बुरे ख्याल आने लगे. उन्हें आशंका इस बात की थी कि कहीं किसी ने पैसों के लालच में ध्रुव का अपहरण न कर लिया हो. इस की वजह यह थी कि वह फतेहपुर के नामीगिरामी ज्वैलर थे. राजस्थान के शेखावटी इलाके में उन का अच्छाखासा रसूख था. बेटे के घर न आने से पार्वती का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

ललित ने अपने कुछ परिचितों से बात की तो सभी ने यही सलाह दी कि इस मामले की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए. इस के बाद दोपहर करीब ढाई बजे ललित ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. पार्वती से पूछताछ की गई. शुरुआती जांच से यही नतीजा निकला कि ध्रुव का अपहरण किया गया है.

अपहर्त्ता प्रोफेशनल अपराधी हो सकते थे. क्योंकि रात तक फिरौती के लिए किसी अपहर्त्ता का फोन नहीं आया था. पुलिस को अनुमान हो गया था कि अपहर्त्ता ने ध्रुव के अपहरण का जो तरीका अपनाया था, उस से साफ लगता था कि उन्होंने रेकी कर के ललित पोद्दार के बारे में जानकारियां जुटाई थीं.

पुलिस ने फिरौती मांगे जाने की आशंका के मद्देनजर पोद्दार परिवार के सारे मोबाइल सर्विलांस पर लगवा दिए. लेकिन उस दिन रात तक ना तो किसी अपहर्त्ता का फोन आया और ना ही ध्रुव को साथ ले जाने वाले उस युवक के बारे में कोई जानकारी मिली. पुलिस ने ललित के घर के आसपास और लक्ष्मीनारायण मंदिर के करीब स्थित उस की दुकान के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, लेकिन उन से पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ.

पुलिस को अब तक केवल यही पता चला था कि ललित पोद्दार के घर जो युवक शादी का कार्ड देने आया था, उस की उम्र करीब 30 साल के आसपास थी. वह सफेद शर्ट पहने हुए था. अगले दिन सीकर के एसपी राठौड़ विनीत कुमार त्रिकमलाल ने ध्रुव का पता लगाने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दिशानिर्देश दिए. इस के बाद पुलिस ने उस शादी के कार्ड को आधार बना कर जांच आगे बढ़ाई.

परेशानी यह थी कि शादी के कार्ड पर किसी प्रिंटिंग प्रैस का नाम नहीं लिखा था, जबकि हर शादी के कार्ड पर प्रिंटिंग प्रैस का नाम जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि राजस्थान सरकार ने बालविवाह की रोकथाम के लिए यह कानूनी रूप से जरूरी कर दिया है. पुलिस ने शादी के कार्ड छापने वाले प्रिंटिंग प्रैस मालिकों से बात की तो पता चला कि उस कार्ड में औफसेट पेंट का इस्तेमाल किया गया था.

उस पेंट का उपयोग फतेहपुर में नहीं होता था. सीकर में प्रिंटिंग प्रैस वाले उस का उपयोग करते थे. इस के बाद पुलिस ने सीकर, चुरू और झुंझुनूं के करीब डेढ़ सौ प्रैस वालों से पूछताछ की. इस जांच के दौरान एक नया तथ्य यह सामने आया कि ध्रुव के अपहरण से 4 दिन पहले से उसी के स्कूल में पढ़ने वाला छात्र अंकित भी लापता था. अंकित चुरू जिले के रतनगढ़ शहर का रहने वाला था. वह फतेहपुर के विवेकानंद पब्लिक स्कूल में पढ़ता था और हौस्टल में रहता था. गर्मी की छुट्टी में वह रतनगढ़ अपने घर गया था. वह 12 मई को दोपहर करीब सवा बारह बजे बाल कटवाने के लिए घर से निकला था, तब से लौट कर घर नहीं आया था.

तीसरे दिन आईजी हेमंत प्रियदर्शी एवं एसपी राठौड़ विनीत कुमार ने ध्रुव के घर वालों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि ध्रुव का जल्द से जल्द पता लगा लिया जाएगा. उसी दिन यानी 17 मई को अपहर्त्ता ने ललित पोद्दार को फोन कर के बताया कि उन के बेटे ध्रुव का अपहरण कर लिया गया है. उन्होंने ध्रुव की उन से बात करा कर 70 लाख रुपए की फिरौती मांगी.

उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर पुलिस को बताया तो बच्चे को मार दिया जाएगा. ललित ने समझदारी से बातें करते हुए अपहर्त्ता से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि नोटबंदी को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. भाइयों, परिवार वालों और रिश्तेदारों से पैसे जुटाने के लिए समय चाहिए. चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 70 लाख रुपए इकट्ठे नहीं हो पाएंगे. बैंक से एक साथ ज्यादा पैसा निकाला तो पुलिस को शक हो जाएगा.

ललित ने अपहर्ता को अपनी मजबूरियां बता कर यह जता दिया कि वह 70 लाख रुपए नहीं दे सकते. बाद में अपहर्ता 45 लाख रुपए ले कर ध्रुव को सकुशल छोड़ने को राजी हो गए. अपहर्ताओं ने फिरौती की यह रकम कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर पहुंचाने को कहा. लेकिन बाद में वे फिरौती की रकम मुंबई में लेने को तैयार हो गए.

ललित का मोबाइल पहले से ही पुलिस सर्विलांस पर लगा रखा था. पुलिस को अपहर्ता और ललित के बीच हुई बातचीत का पता चल गया. इसी के साथ पुलिस को वह मोबाइल नंबर भी मिल गया, जिस से ललित को फोन किया गया था.

इसी बीच पुलिस ने शादी के उस कार्ड की जांच एक्सपर्ट से कराई तो पता चला कि वह एविडेक प्रिंटर से छपा था. शेखावटी के सीकर, चुरू व झुंझुनूं जिले में करीब 60 एविडेक प्रिंटर थे. इन प्रिंटर मालिकों से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह कार्ड नवलगढ़ के एक प्रिंटर से छपवाया गया था. उस प्रिंटर के मालिक से पूछताछ में पता चला कि वह कार्ड फतेहपुर के किसी आदमी ने उस के प्रिंटर पर छपवाया था. उस आदमी से पूछताछ में पुलिस को अपहर्त्ता युवक के बारे में कुछ सुराग मिले.

इस के अलावा पुलिस ने 15 मई को ललित पोद्दार के मकान के आसपास घटना के समय हुई सभी मोबाइल कौल को ट्रेस किया. इस में मुंबई का एक नंबर मिला. यह नंबर साजिद बेग का था. काल डिटेल्स के आधार पर यह भी पता चल गया कि साजिद के तार फतेहपुर के रहने वाले अयाज से जुड़े थे.

जांच में यह बात भी सामने आ गई कि अपहर्ता मुंबई से जुड़ा है. इस पर पुलिस ने फतेहपुर से ले कर विभिन्न राज्यों के टोल नाकों पर जांच की और उन नाकों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस में सब से पहले शोभासर के टोल पर सफेद रंग की एसेंट कार पर जयपुर का नंबर मिला. अगले टोल नाके मौलासर पर इसी कार पर महाराष्ट्र की नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. आगे के टोल नाकों पर उसी कार पर अलगअलग नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. जांच में ये सारे नंबर फरजी पाए गए.

सीकर के एसपी ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर से बात कर के ध्रुव के अपहरण की पूरी जानकारी दे कर अपराधियों को पकड़ने में सहायता करने का आग्रह किया. इसी के साथ एसपी के दिशानिर्देश पर एडिशनल एसपी तेजपाल सिंह ने 3 टीमें गठित कर के 3 राज्यों में भेजी. सब से पहले रामगढ़ शेखावाटी के थानाप्रभारी रमेशचंद्र को टीम के साथ मुंबई भेजा गया. यह टीम मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के साथ मिल कर आरोपियों की तलाश में जुट गई.

फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह ने लगातार जांच कर के ध्रुव के अपहरण में साजिद बेग और फतेहपुर के रहने वाले अयाज के साथ उस के संबंधों के बारे में पता लगाया.

एसपी ध्रुव के घर वालों को सांत्वना देने के साथ यह भी बताते रहे कि उन्हें अपहर्ता को किस तरह बातों में उलझा कर रखना है, ताकि पुलिस बच्चे तक पहुंच सके. पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश और एक टीम पश्चिम बंगाल भी भेजी गई. पुलिस को संकेत मिले थे कि अपहर्ता धु्रुव को ले कर मुंबई, कोलकाता या कानपुर जा सकते हैं.

लगातार भागदौड़ के बाद सीकर पुलिस ने मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की मदद से 21 मई की आधी रात के बाद मुंबई के बांद्रा  इलाके से ध्रुव को सकुशल बरामद कर लिया. पुलिस ने उस के अपहरण के आरोप में साजिद बेग को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया था. इस के अलावा उस की 2 गर्लफ्रैंड्स को भी गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने वह एसेंट कार भी बरामद कर ली, जिस से ध्रुव का अपहरण किया गया था. सीकर पुलिस 22 मई की रात ध्रुव और आरोपियों को ले कर मुंबई से रवाना हुई और 23 मई को फतेहपुर आ गई.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में मुंबई से साजिद बेग और उस की गर्लफ्रैंड्स यास्मीन जान और हालिमा मंडल को गिरफ्तार किया था. पूछताछ के बाद फतेहपुर के रहने वाले अयाज उल हसन उर्फ हयाज को गिरफ्तार किया गया. इस के बाद सभी आरोपियों से की गई पूछताछ में ध्रुव के अपहरण की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

साजिद बेग पेशे से सिविल इंजीनियर था. वह बांद्रा, मुंबई में मछली बाजार में रहता था. उसे हिंदी, अंग्रेजी व मारवाड़ी का अच्छा ज्ञान था. वह मूलरूप से फतेहपुर का ही रहने वाला था. उस के दादा और घर के अन्य लोग मुंबई जा कर बस गए थे. फतेहपुर में साजिद का 2 मंजिला आलीशान मकान था. वह फतेहपुर आताजाता रहता था. उस की पत्नी भी पढ़ीलिखी है. उस का एक बच्चा भी है.

मुंबई स्थित उस के घर पर नौकरचाकर काम करते हैं. उस के पिता के भाई और अन्य रिश्तेदार भी मुंबई में ही रहते हैं. इन के लोखंडवाला, बोरीवली सहित कई पौश इलाकों में आलीशान बंगले हैं. वह मुंबई में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम करता था. मौजमस्ती के गलत शौक और व्यापार में घाटा होने की वजह से साजिद कई महीनों से आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस पर करीब 30 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. इसलिए वह जल्द से जल्द किसी भी तरीके से पैसे कमा कर अपना कर्ज उतारना चाहता था.

करीब 2 महीने पहले साजिद ने फतेहपुर के रहने वाले अपने बचपन के दोस्त अयाज उल हसन उर्फ हयाज को मुंबई बुलाया. वह 5 दिनों  तक मुंबई में रहा. इस बीच साजिद ने उस से पैसे कमाने के तौर तरीकों के बारे में बात की. इस पर अयाज ने कहा कि फतेहपुर में किसी का अपहरण कर के उस के बदले में अच्छीखासी फिरौती वसूली जा सकती है. हालांकि उस समय यह तय नहीं हुआ था कि अपहरण किस का किया जाएगा.

साजिद ने अयाज को यह कह कर फतेहपुर वापस भेज दिया कि वह किसी ऐसी पार्टी का चयन करे, जिस से मोटी रकम वसूली जा सके. अयाज फतेहपुर आ कर योजना बनाने लगा. अयाज ने पिछले साल फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार के मकान पर पेंट का काम किया था. इसलिए उसे ललित के घरपरिवार की सारी जानकारी थी. उस ने साजिद को ललित के बारे में बताया.

इस के बाद दोनों ने ललित के बेटे ध्रुव के अपहण की योजना बना ली. उसी योजना के तहत शादी का फरजी कार्ड नवलगढ़ से छपवाया गया. इस के बाद कार्ड से कैमिकल द्वारा प्रिंटिंग प्रैस का नाम हटा दिया गया. योजनानुसार साजिद 10 मई को मुंबई से कार ले कर फतेहपुर आ गया और दरगाह एरिया में रहने वाले अपने दोस्त अयाज से मिला. इस के बाद ध्रुव के अपहरण की योजना को अंतिम रूप दिया गया.

15 मई को शादी का कार्ड देने के बहाने साजिद ललित के घर से उस के बेटे धु्रव को अश्विनी के घर ले जाने की बात कह कर साथ ले गया और उसे घर के बाहर खड़ी एसेंट कार में बैठा लिया. उस ने धु्रव से कहा कि गाड़ी में पैट्रोल नहीं है, इसलिए पहले पैट्रोल भरवा लें, फिर अश्विनी के घर चलेंगे.

फतेहपुर में पैट्रोल पंप से पहले ही साजिद ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी तो ध्रुव को शक हुआ. वह शीशा खोल कर ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगा. इस पर साजिद ने उसे कोई नशीली चीज सुंघा दी, जिस से वह बेहोश हो गया.

ध्रुव को बेहोशी की हालत में पीछे की सीट पर सुला कर साजिद अपनी कार से मुंबई ले गया. बीचबीच में टोलनाकों से पहले उस ने 5 बार कार की नंबर प्लेट बदलीं.

साजिद ने अपहृत ध्रुव को मुंबई में अपनी 2 गर्लफ्रैंड्स के पास रखा. इन में एक गर्लफ्रैंड यास्मीन जान मुंबई के चैंबूर में लोखंड मार्ग पर रहती थी. तलाकशुदा यास्मीन को साजिद ने बता रखा था कि वह कुंवारा है. उस ने उसे शादी करने का झांसा भी दे रखा था. साजिद ने यास्मीन को धु्रव के अपहरण के बारे में बता दिया था. यास्मीन फिरौती में मिलने वाली मोटी रकम से साजिद के साथ ऐशोआराम की जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी. इसलिए उस ने साजिद की मदद की और धु्रव को अपने पास रखा.

साजिद की दूसरी गर्लफ्रैंड हालिमा मंडल मूलरूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी. वह पिछले कई सालों से बांद्रा इलाके में बाजा रोड पर रहती थी. उस के 2 बच्चे हैं. साजिद मुंबई पहुंच कर ध्रुव को सीधे हलिमा के घर ले गया था. उस ने उसे ध्रुव के अपहरण के बारे में बता दिया था. हालिमा ने भी फिरौती में मोटी रकम मिलने के लालच में साजिद का साथ दिया और ध्रुव को अपने पास रखा. वह ध्रुव को नींद की गोलियां देती रही, ताकि वह शोर न मचा सके.

फेसबुक पर एक पोस्ट में खुद को मुंबई का किंग बताने वाला साजिद इतना शातिर था कि ललित पोद्दार से या अयाज से बात करने के बाद मोबाइल स्विच औफ कर लेता था, ताकि पुलिस उसे ट्रेस न कर सके. ध्रुव को जहां रखा गया था, वहां से वह करीब सौ किलोमीटर दूर जा कर नए सिम से फोन करता था, ताकि अगर किसी तरह पुलिस मोबाइल नंबर ट्रेस भी कर ले तो उसी लोकेशन पर बच्चे को खोजती रहे.

साजिद के बताए अनुसार, टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देख कर उस ने ध्रुव के अपहरण की साजिश रची थी. सीरियलों को देख कर ही उस ने हर कदम पर सावधानी बरती, लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई. जबकि उस ने पुलिस से बचने के तमाम उपाय किए थे.

23 मई को पुलिस ध्रुव को ले कर फतेहपुर पहुंची तो पूरा शहर खुशी से नाच उठा. पुष्पवर्षा और आतिशबाजी की गई. 9 दिनों बाद बेटे को सकुशल देख कर पार्वती की आंखों से आंसू बह निकले. पिता ललित पोद्दार ने बेटे को गले से लगा कर माथा चूम लिया. सालासर मंदिर में लोगों ने फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह का सम्मान किया.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में साजिद के अलावा यास्मीन जान, हालिमा मंडल और फतेहपुर निवासी अयाज को गिरफ्तार किया था. फतेहपुर के एक अन्य युवक की भी इस मामले में भूमिका संदिग्ध पाई गई. इस के अलावा उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर नसरत उर्फ नागा उर्फ चाचा का नाम भी ध्रुव के अपहरण में सहयोगी के रूप में सामने आया है.

नसरत उर्फ नागा उत्तर प्रदेश के सिमौनी का रहने वाला था. वह फिलहाल मुंबई के गौरी खानपुर में रहता है. साजिद काफी समय से उस के संपर्क में था. उस के साथ नागा भी आया था. उस ने नागा को सीकर में ही छोड़ दिया था.

ध्रुव के अपहरण के बाद नागा साजिद के साथ हो गया था. दोनों ध्रुव को ले कर मुंबई गए थे. नागा पर उत्तर प्रदेश और मुंबई में हत्या के 3 मामले और लूट, चाकूबाजी, हथियार तस्करी, गुंडा एक्ट आदि के दर्जनों मामले दर्ज हैं. वह हिस्ट्रीशीटर है. कथा लिखे जाने तक सीकर पुलिस इस मामले में नागा की तलाश कर रही थी. Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Honey Trap Case: सुनहरे जाल में फंसा डीआरडीओ का वैज्ञानिक

Honey Trap Case: धन और सुंदर रूपयौवन का लालच ऐसा है जिस से कोई बच नहीं सकता. शातिर किस्म के लोग कहीं धन दिखा कर तो कहीं सुंदर यौवन दिखा कर सुनहरा जाल फेंकते हैं और मनचाहा शिकार फांस ही लेते हैं. इस जाल में फंसने से विरला ही कोई हो जो बच सके. रामायण की कथा के नायक और त्रिकालदर्शी कहे जाने वाले राम ही जब सोने के हिरण के भ्रम में फंस कर अपनी पत्नी सीता को गंवा बैठे तो आम इंसान की क्या औकात है.

आजकल हनीट्रैप के मामले भी ऐसे ही हैं. आए दिन नए राम फंस रहे हैं पर यह मामला जरा गंभीर किस्म का है. देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. महाराष्ट्र एटीएस ने डीआरडीओ के सीनियर सिस्टम इंजीनियर निशांत अग्रवाल को गिरफ्तार कर पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी करने का खुलासा किया है. निशांत फेसबुक पर पाकिस्तान की फर्जी महिला के जाल में फंस गया था. उसे हाल ही में युवा इंजीनियर का अवार्ड भी मिला था.

निशांत अग्रवाल पाकिस्तान की दो महिलाओं  के फर्जी नाम से बने फेसबुक अकाउंट से उन के जाल में फंसा हुआ था. उस की इन ‘महिलाओं’ से चैटिंग होती थी. चैटिंग के दौरान उस ने अपनी मिसाइल यूनिट से कई गोपनीय जानकारियां जुटानी शुरू कर दीं. इन में से कुछ जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचाने की बात सामने आई है.

निशांत मिसाइल यूनिट में सीनियर सिस्टम इंजीनियर है. वह नागपुर में डीआरडीओ की ब्रह्मोस यूनिट में कार्यरत था. उस के पास यहां की कई तकनीकी गोपनीय जानकारियां रहती थीं. गोपनीय जानकारियों को उस ने अपने निजी लैपटोप और मोबाइल में सेव कर रखा था.

उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र एटीएस उस से पूछताछ कर रही है. निशांत के अलावा जासूसी के शक में डिफेंस मैटेरियल एंड स्टोर्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेबलिशमेंट [डीएमएसआरडीई] कानपुर के दो वैज्ञानिकों से भी पूछताछ की गई. दोनों वैज्ञानिक ब्रह्मोस से संबंधित बेहद संवेदनशील पार्ट्स को विकसित करने वाली तकनीक से जुड़े हैं. एटीएस ने एक महिला वरिष्ठ वैज्ञानिक को हिरासत में लिया है. पूछताछ के बाद उस का लैपटोप भी सीज किया है. संस्थान के इन वैज्ञानिकों को भी फेसबुक के जरिए ट्रैप किया गया. एटीएस को शक है कि ब्रह्मोस से जुड़ी टैक्नोलौजी को लीक किया गया है.

पिछले दिनों बीएसएफ के जवान अच्युतानंद मिश्रा को भी पाकिस्तान के लिए जासूसी के इल्जाम में पकड़ा गया था. उसे इसी तरह जाल में फंसाया गया था. अच्युतानंद की गिरफ्तारी के बाद फेसबुक आईडी से कई दोस्तों की पड़ताल की गई तो निशांत का पता चला. जांच पड़ताल के दौरान पाकिस्तान की दो और महिलाओं के नाम से बनी फर्जी फेसबुक आईडी पर कई राज्यों के और लोग भी चैटिंग कर रहे हैं.

यूपी एटीएस का कहना है कि उस की जांच में पता चला है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई खूबसूरत लड़कियों की फर्जी फेसबुक आईडी बना कर केंद्रीय बलों और वैज्ञानिक संस्थानों के लोगों को प्रेमजाल में फंसा कर जासूसी करा रही है.

आईएसआई के लिए जासूसी करने के आरोप में डीआरडीओ के इंजीनियर निशांत अग्रवाल की गिरफ्तारी एक कर्मचारी पर ही नहीं, सरकार और समूचे समाज व्यवस्था पर सवाल उठाती है? डीआरडीओ देश की रक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान है. इस के एक वरिष्ठ अधिकारी पर जासूसी का आरोप बहुत गंभीर बात है.

सरकारी पद पर बैठने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह के लालच से दूर रहने की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है. ईमानदार, वफादार, कर्तव्यनिष्ठ रहने की न तो हमारे समाज ने ऐसी कोई ट्रेनिंग दी और न ही सरकार ने. कहने को उन के लिए नियमकायदे, आचारसंहिता बनी हुई है पर उस की परवाह कौन करता है.

लालच बुरी बला है, जैसी सूक्तियां सिर्फ दीवारों पर शोभा देती हैं. वास्तविक जीवन में इन सूक्तियों को लोग नहीं अपनाते. गिफ्ट, इनाम, धन दोगुना करने जैसे लालच में लोग आए दिन फंसते हैं.

हालांकि धर्म के प्रवचनों में तमाम तरह की अच्छी सीखें बताई गई हैं पर धर्म की अच्छी सीखें खुद ही एक तरह का जाल ही हैं जो भक्तों को फंसाता है और प्रवचनकर्ता, गुरु को फायदा पहुंचाता है. यह सुनहरी अच्छी सीखों का जाल गुरु, प्रवचनकर्ता ही फेंकता है जो भक्तों को धनदौलत त्याग करने की सलाह देता है और स्वयं स्वर्ण सिंहासन पर बैठता है, एसी गाड़ी में चलता है. धर्म सब से बड़ा सुनहरा जाल है.

जिम्मेदार पद पर बैठे कर्मचारी को कोई भी रूप यौवन, धन का लालच दे कर अपने जाल में फंसा ले, यह शासन, प्रशासन ही नहीं, समाज व देश के लिए भी गंभीरता से सोचने की बात है. Honey Trap Case

Bhopal Crime Story: देवेंद्र से देविका बनने की दर्द भरी दास्तां

Bhopal Crime Story: मुसीबत और परेशानियां ऐसी थीं कि देवेंद्र को उनका कोई हल नहीं सूझ रहा था और जो सूझा वह हैरान कर देने वाला है. साल 2017 तक एक एनजीओ में काम करने बाला यह हट्टा कट्टा  युवा आम लड़कों की तरह ही रहता था लेकिन अब औपरेशन के जरिये लड़की यानि ट्रांसजेंडर बनकर अपने ही शहर भोपाल में किन्नरों की टोली में तालियां बजाता नजर आता है .

आमतौर पर कोई भी लड़का ट्रांसजेंडर तभी बनने की सोचेगा जब उसमें बचपन से ही लड़कियों जैसे लक्षण हों या फिर वह खुद को सेक्स कर पाने में असमर्थ पाये पर देवेंद्र के साथ ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि उसकी कहानी दिल को छू जाने वाली है. खासतौर से उस वक्त जब रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है. देवेंद्र अपनी बहन के लिए देविका बना था जिसका उसे कोई मलाल भी नहीं है, उल्टे वह खुश है कि बलात्कार के झूठे आरोप में फंसने से भी बच गया.

देवेंद्र अपनी बहन को बहुत चाहता था और उसकी विदाई 20 मई 2016 को इन दुआओं के साथ उसने की थी कि बहन ससुराल जाकर खुशहाल ज़िंदगी जिये लेकिन भगवान कहीं होता तो उसकी सुनता. हुआ यूं कि शादी के कुछ दिनों बाद ही बहन की ससुराल वालों ने उस पर तरह तरह के जुल्मों सितम ढाने शुरू कर दिये ठीक वैसे ही जैसे फिल्मों और टीवी सीरियलों में दिखाये जाते हैं. दहेज के लालची ससुराल वालों ने उसकी बहन को इतना सताया कि वह खून के आंसू रो दी .

अब देवेंद्र ने वही गलती की जो आमतौर पर दहेज के लिए सताई जाने वाली लड़कियों के घर वाले करते हैं. यह गलती थी ससुराल वालों के हाथ पैर जोड़ना और अपनी पगड़ी उनके चरणों में रख देना. ऐसे फिल्मी टोटकों से तो फिल्मों में भी बात नहीं बनती फिर यह तो सामने से होकर गुजर रही हकीकत थी. देवेंद्र ने मध्यस्थता करते हर मुमकिन कोशिश की कि जैसे भी हो बगैर किसी झगड़े फसाद विवाद या कोर्ट कचहरी के बहन की ज़िंदगी में खुशियां आ जाएं पर कोई कोशिश कामयाब नहीं हुई तो उसने भी थकहार कर वही रास्ता पकड़ा जो सभी पकड़ते हैं.

ननद की धमकी

लेकिन थाने जाने से पहले उसने बहन की ससुराल बालों को आगाह करना या धोंस देना कुछ भी समझ लें जरूरी समझा कि शायद इससे उनमें अक्ल आ जाए. आमतौर पर ससुराल वाले इस बात से डरते हैं कि अगर बहू या उसके घर वालों ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो कभी कभी जमानत के भी लाले पड़ जाते हैं. यही इस मामले में भी हुआ, शुरू में तो बहन के ससुराल वाले डरे लेकिन जल्द ही बहन की चालाक ननद ने इस का भी तोड़ निकाल लिया और ऐसा निकाला कि देवेंद्र की सारी हेकड़ी तो हेकड़ी मर्दानगी भी हमेशा के लिए हवा हो गई.

इस ननद ने उसे ही यह धमकी देना शुरू कर दिया था कि अगर वह थाने गया तो वह भी थाने जाकर देवेंद्र के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देगी. इस धमकी का उम्मीद के मुताबिक असर हुआ और देवेंद्र ने बहन की ससुराल जाना बंद कर दिया. लेकिन इससे बहन का कोई भला या मदद नहीं हो पा रही थी इसलिए एक दिन उसने जी कडा करते बचाव का रास्ता ढूंढ़ ही लिया कि अगर वह मर्द ही न रह जाये तो बहन की ननद क्या खाकर उसके खिलाफ बलात्कार की झूठी रिपोर्ट लिखाएगी .

नवंबर 2017 में देवेंद्र ऑपरेशन करा कर लड़की बन गया और अपना नया नाम रखा देविका . अब उसे ननद का डर नहीं रह गया था लिहाजा उसने बहन को बचाने पुलिसिया और कानूनी काररवाई शुरू कर दी . मामला जब विधिक सेवा प्राधिकरण पहुंचा तो उसने बेहिचक सारे पत्ते सचिव आशुतोष मिश्रा के सामने खोलते अपने  मेडिकल दस्तावेज़ भी दिखाये  और बताया कि बहन की ननद की धमकियों से आजिज़ आकर उसने यह फैसला लिया था .

देखते ही देखते बहन को तलाक मिल गया और वह ससुराल नाम की जेल से आजाद हो गई . लेकिन डर के चलते और बहन की सलामती के लिए देविका बन गए देवेंद्र को बहुत बड़ी क़ुर्बानी देनी पड़ी जिसकी मिसाल शायद ही ढूंढे से मिले. साड़ी और सलवार सूट पहने देविका माथे पर बिंदी और बड़ा सा टीका भी लगाती है और चूड़ियां भी पहनती है. उसका मेकअप भी लड़कियों जैसा तड़क भड़क भरा होता है .

देवेंद्र, देविका बनकर खुश है और अब ट्रांसजेंडर्स के भले के लिए काम करना चाहता है . मुमकिन है जल्द ही उसकी ज़िंदगी और बहन के लिए त्याग पर कोई फिल्म निर्माता फिल्म बनाए जिसमें भरपूर मसाला और जायका होगा लेकिन देवेंद्र की ज़िंदगी में जरूर कोई जायका नहीं रह गया है. बेहतर तो यह होगा कि वह फिर से आपरेशन कराके पहले की तरह लड़का बन जाये और ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ उठाए.

MP Crime: दोस्त का कत्ल – वफादारी की मिली सजा

MP Crime: मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर की एक तहसील है गोटेगांव. इस तहसील क्षेत्र में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल झोतेश्वर होने की वजह से छोटा शहर होने के बावजूद गोटेगांव खासा प्रसिद्ध है. गोटेगांव के इलाके में ही एक गांव है कोरेगांव.

8 दिसंबर, 2019 की सुबह कोरेगांव का रहने वाला खुमान ठाकुर झोतेश्वर पुलिस चौकी की इंचार्ज एसआई अंजलि अग्निहोत्री के पास आया. उस ने अंजलि को बताया कि उस के भाई का बड़ा लड़का आशीष 6 दिसंबर को किसी काम से घर से निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा. उन्होंने उसे गांव के आसपास के अलावा सभी रिश्तेदारों के यहां तलाश किया, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली. उस ने आशीष की गुमशुदगी दर्ज कर उसे तलाशने की मांग की.

एसआई अंजलि अग्निहोत्री ने खुमान से पूछा, ‘‘आप को किसी पर कोई शक हो तो बताओ.’’

खुमान के साथ आए उस के दामाद कृपाल ने बताया कि 6 दिसंबर को उस ने आशीष को उस के दोस्तों पंकज और सुरेंद्र के साथ खेतों की तरफ जाते देखा था. उस ने यह भी बताया कि आशीष के परिवार के लोगों ने जब पंकज और सुरेंद्र को बुला कर पूछताछ की तो वे इस बात से साफ मुकर गए कि आशीष उन के साथ था. इसलिए हमें उन पर शक हो रहा है.

चौकी इंचार्ज अंजलि अग्निहोत्री ने खुमान की शिकायत दर्ज कर इस घटना की सूचना तत्काल एसपी गुरुचरण सिंह, एसडीपीओ (गोटेगांव) पी.एस. बालरे और टीआई प्रभात शुक्ला को दे दी.

एसडीपीओ के निर्देश पर चौकी इंचार्ज एसआई अंजलि अग्निहोत्री ने कोरेगांव में पंकज और सुरेंद्र के घर दबिश तो दोनों घर पर ही मिल गए. उन दोनों से पुलिस चौकी में पूछताछ की गई तो पंकज और सुरेंद्र ने बताया कि हम तीनों दोस्त मछली मारने के लिए गांव से बाहर खेतों के पास वाले नाले पर गए थे.

मछली मारते समय नाले के पास से जाने वाली मोटरपंप की सर्विस लाइन से आशीष को करंट लग गया, जिस से उस की मौत हो गई.

उन्होंने बताया कि आशीष की इस तरह हुई मौत से वे दोनों घबरा गए. डर के मारे उन्होंने आशीष के शव को नाले के समीप ही गड्ढा खोद कर दफना दिया.

पुलिस को पंकज और सुरेंद्र द्वारा गढ़ी गई इस कहानी पर विश्वास नहीं हुआ. उधर आशीष का छोटा भाई आनंद ठाकुर पुलिस से कह रहा था कि उस के भाई की हत्या की गई है.

मामला संदेहपूर्ण होने के कारण पुलिस ने गोटेगांव के एसडीएम जी.सी. डहरिया को पूरे घटना क्रम की जानकारी दे कर दफन की गई लाश को निकालने की अनुमति ली.

उसी दिन गोटेगांव एसडीपीओ पी.एस. बालरे, फोरैंसिक टीम सहित दोनों आरोपियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. आरोपियों की निशानदेही पर कोरेगांव के नाले के पास खेत में बने एक गड्ढे से लाश निकाली गई.

आशीष के पिता ने लाश के हाथ पर बने टैटू को देखा तो वह फूटफूट कर रोने लगा. लाश के गले पर घाव और खून का निशान था. इस से स्पष्ट हो गया कि आशीष की मौत करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई थी. पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए जबलपुर मैडिकल कालेज भेज दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि आशीष की मौत बिजली के करंट से नहीं, बल्कि किसी धारदार हथियार से गले पर किए गए प्रहार से हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ कर पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि आशीष की हत्या पंकज और सुरेंद्र ने ही की है.

पुलिस ने दोनों आरोपियों से जब सख्ती से पूछताछ की तो पंकज जल्दी ही टूट गया. उस ने पुलिस के सामने आशीष की हत्या करने की बात कबूल ली. आशीष ठाकुर की हत्या के संबंध में उस ने पुलिस को जो कहानी बताई, वह अवैध संबध्ाोंं पर गढ़ी हुई निकली—

आदिवासी अंचल के छोटे से गांव कोरेगांव के साधारण किसान पुन्नूलाल का बड़ा बेटा आशीष और गांव के ही जगदीश ठाकुर के बेटे पंकज की आपस में गहरी दोस्ती थी. हमउम्र होने के कारण दोनों का दिनरात मिलनाजुलना बना रहता था. आशीष पंकज के घर आताजाता रहता था. पंकज ठाकुर की शादी हो गई थी और पंकज की पत्नी अनीता (परिवर्तित नाम) से भाभी होने के नाते आशीष हंसीमजाक किया करता था.

एक लड़की के जन्म के बाद भी अनीता का बदन गठीला और आकर्षक था. अनीता आशीष की शादी की बातों को ले कर उस से मजाक किया करती थी. 24 साल का आशीष उस समय कुंवारा था. वह अनीता की चुहल भरे हंसीमजाक का मतलब अच्छी तरह समझता था. देवरभाभी के बीच होने वाली इस मजाक का कभीकभार पंकज भी मजा ले लेता था.

दोस्तों के साथ मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो देख कर आशीष के मन में अनीता को ले कर वासना का तूफान उठने लगा था. इसी के चलते वह अनीता से दैहिक प्यार करने लगा. उसे सोतेजागते अनीता की ही सूरत नजर आने लगी थी.

पंकज का परिवार खेतीकिसानी का काम करता था. घर के सदस्य दिन में अकसर खेतों में काम करते थे. इसी का फायदा उठा कर आशीष पंकज की गैरमौजूदगी में अनीता से मिलने आने लगा.

करीब 2 साल पहले सर्दियों की एक दोपहर में आशीष पंकज के घर पहुंचा तो अनीता की 2 साल की बेटी सोई हुई थी और अनीता नहाने के बाद घर की बैठक पर कपड़े बदल रही थी.

अनीता के खुले हुए अंगों और उस की खूबसूरती को देखते ही आशीष के अंदर का शैतान जाग उठा. वह घर की बैठक के एक कोने में पड़ी चारपाई पर बैठ गया और अनीता से इधरउधर की बातें करने लगा.

बातचीत के दौरान जैसे ही अनीता उस के पास आई, उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और बोला, ‘‘भाभी, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

आशीष के बंधन में जकड़ी अनीता ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘आशीष, छोड़ो, कोई देख लेगा.’’

इस पर आशीष ने उस के गालों को चूमते हुए कहा, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं तो डरना क्या.’’

अनीता कुछ शरमाई तो आशीष ने उसे अपने सीने से दबाते हुए अपने होंठे उस के होंठों पर रख दिए. देखते ही देखते आशीष के कृत्य की इस चिंगारी से उठी वासना की आग ने अनीता को भी अपने आगोश में ले लिया.

आपस की हंसीमजाक से शुरू हुआ प्यार का यह सफर वासना के खेल में बदल गया. अनीता अपना सब कुछ आशीष को सौंप चुकी थी. अब जब भी पंकज के घर के लोग काम के लिए निकल जाते, आशीष अनीता के पास पहुंच जाता और दोनों मिल कर अपनी हसरतें पूरी करते.

एक बार पंकज ने आशीष को अनीता के साथ ज्यादा नजदीकी से बात करते देख लिया, तब से उस के दिमाग में शक का कीड़ा बैठ गया. उस ने अनीता को आशीष से दूर रहने की हिदायत दे कर आशीष से इस बारे में बात की तो वह दोस्ती की दुहाई देते हुए बोला, ‘‘तुम्हें गलतफहमी हुई है, मैं तो भाभी को मां की तरह मानता हूं.’’

लेकिन प्यार के उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले इन पंछियों पर किसी की बंदिश और समझाइश का कोई असर नहीं पड़ा. आशीष और अनीता के प्यार का खेल बेरोकटोक चल रहा था. जब भी उन्हें मौका मिलता, दोनों अपनी जिस्मानी भूख मिटा लेते थे.

पंकज भी अब पत्नी अनीता पर नजर रखने लगा था. पंकज अकसर सुबह को खेतों में काम के लिए निकल जाता और शाम को ही वापस आता था. लेकिन एक दिन जब वह दोपहर में ही घर लौट आया तो अपने बिस्तर पर आशीष और अनीता को एकदूसरे के आगोश में देख लिया.

अपनी पत्नी को पराए मर्द की बांहों में देख कर उस का खून खौल उठा. आशीष तो जल्दीसे अपने कपड़े ठीक कर के वहां से चुपचाप निकल गया, मगर क्रोध की आग में जल रहे पंकज ने अपनी पत्नी अनीता की जम कर धुनाई कर दी.

पंकज ने बदनामी के डर से यह बात किसी को नहीं बताई. वह गुमसुम सा रहने लगा और आशीष से मिलनाजुलना भी कम कर दिया. अब उस ने गांव के एक अन्य युवक सुरेंद्र ठाकुर से दोस्ती कर ली. इसी दौरान आशीष की शादी भी हो गई और उस ने अनीता से मिलनाजुलना बंद कर दिया. लेकिन पंकज के दिल में बदले की आग अब भी जल रही थी.

उस की आंखों में आशीष और अनीता का आलिंगन वाला दृश्य घूमता रहता था. उस के मन में हर समय यही खयाल आता था कि कब उसे मौका मिले और वह आशीष का गला दबा दे.

पंकज सोचता था कि जिस दोस्त के लिए वह जान की बाजी लगाने को तैयार रहता, उसी दोस्त ने उस की थाली में छेद कर दिया.

6 दिसंबर के दिन योजना के मुताबिक सुरेंद्र ठाकुर आशीष को मछली मारने के लिए गांव के बाहर नाले पर ले गया. नाले के पास ही पंकज ठाकुर अपने खेतों पर उन दोनों का इंतजार कर रहा था.

उस ने आशीष और सुरेंद्र को नाले में मछती मारते हुए देखा तो वह खेत पर रखे चाकू को जेब में छिपा कर नाले के पास आ गया.

आशीष नाले के पानी में कांटा डाले मछली पकड़ने में तल्लीन था. तभी पंकज ने मौका पा कर आशीष के गले पर चाकू से धड़ाधड़ कई वार किए तो आशीष छटपटा कर जमीन पर गिर गया.

कुछ देर में उस ने दम तोड़ दिया. यह देख पंकज ने अपने खेतों से फावड़ा ला कर गड्ढा खोदा और सुरेंद्र की मदद से आशीष को दफना दिया. चाकू और फावड़े को इन लोगों ने खेत के पास झाडि़यों में छिपा दिया. फिर कपड़ों पर लगे खून के छींटों को नाले में धोया और दोनों अपनेअपने घर चले गए.

हत्या के बाद दोनों सोच रहे थे कि उन्हें किसी ने नहीं देखा. लेकिन आशीष के जीजा कृपाल ने सुरेंद्र और आशीष को नाले की तरफ जाते देख लिया था. इसी आधार पर घर वालों ने सुरेंद्र और पंकज पर संदेह होने की बात पुलिस को बताई थी. पंकज ने बिना सोचेसमझे बदले की आग में अपने दोस्त पंकज का कत्ल तो कर दिया, लेकिन कानून की पकड़ से नहीं बच सका.

पंकज और सुरेंद्र के इकबालिया बयान के आधार पर आशीष ठाकुर की हत्या के आरोप में गोटेगांव थाने में भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहम मामला कायम कर उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

जवानी के जोश में अपने दोस्त की पत्नी से अवैध संबंध बनाने वाले आशीष को अपनी जान गंवानी पड़ी तो पंकज ठाकुर और सुरेंद्र ठाकुर को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा. MP Crime

Call Girl Story: कॉलगर्ल – होटल में उस रात क्या हुआ

Call Girl Story: मैं दफ्तर के टूर पर मुंबई गया था. कंपनी का काम तो 2 दिन का ही था, पर मैं ने बौस से मुंबई में एक दिन की छुट्टी बिताने की इजाजत ले ली थी. तीसरे दिन शाम की फ्लाइट से मुझे कोलकाता लौटना था. कंपनी ने मेरे ठहरने के लिए एक चारसितारा होटल बुक कर दिया था. होटल काफी अच्छा था. मैं चैकइन कर 10वीं मंजिल पर अपने कमरे की ओर गया.

मेरा कमरा काफी बड़ा था. कमरे के दूसरे छोर पर शीशे के दरवाजे के उस पार लहरा रहा था अरब सागर.

थोड़ी देर बाद ही मैं होटल की लौबी में सोफे पर जा बैठा.

मैं ने वेटर से कौफी लाने को कहा और एक मैगजीन उठा कर उस के पन्ने यों ही तसवीरें देखने के लिए पलटने लगा. थोड़ी देर में कौफी आ गई, तो मैं ने चुसकी ली.

तभी एक खूबसूरत लड़की मेरे बगल में आ कर बैठी. वह अपनेआप से कुछ बके जा रही थी. उसे देख कर कोई भी कह सकता था कि वह गुस्से में थी.

मैं ने थोड़ी हिम्मत जुटा कर उस से पूछा, ‘‘कोई दिक्कत?’’

‘‘आप को इस से क्या लेनादेना? आप अपना काम कीजिए,’’ उस ने रूखा सा जवाब दिया.

कुछ देर में उस का बड़बड़ाना बंद हो गया था. थोड़ी देर बाद मैं ने ही दोबारा कहा, ‘‘बगल में मैं कौफी पी रहा हूं और तुम ऐसे ही उदास बैठी हो, अच्छा नहीं लग रहा है. पर मैं ने ‘तुम’ कहा, तुम्हें बुरा लगा हो, तो माफ करना.’’

‘‘नहीं, मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा. माफी तो मुझे मांगनी चाहिए, मैं थोड़ा ज्यादा बोल गई आप से.’’

इस बार उस की बोली में थोड़ा अदब लगा, तो मैं ने कहा, ‘‘इस का मतलब कौफी पीने में तुम मेरा साथ दोगी.’’

और उस के कुछ बोलने के पहले ही मैं ने वेटर को इशारा कर के उस के लिए भी कौफी लाने को कहा. वह मेरी ओर देख कर मुसकराई.

मुझे लगा कि मुझे शुक्रिया करने का उस का यही अंदाज था. वेटर उस के सामने कौफी रख कर चला गया. उस ने कौफी पीना भी शुरू कर दिया था.

लड़की बोली, ‘‘कौफी अच्छी है.’’

उस ने जल्दी से कप खाली करते हुए कहा, ‘‘मुझे चाय या कौफी गरम ही अच्छी लगती है.’’

मैं भी अपनी कौफी खत्म कर चुका था. मैं ने पूछा, ‘‘किसी का इंतजार कर रही हो?’’

उस ने कहा, ‘‘हां भी, न भी. बस समझ लीजिए कि आप ही का इंतजार है,’’ और बोल कर वह हंस पड़ी.

मैं उस के जवाब पर थोड़ा चौंक गया. उसी समय वेटर कप लेने आया, तो मुसकरा कर कुछ इशारा किया, जो मैं नहीं समझ पाया था.

मैं ने लड़की से कहा, ‘‘तुम्हारा मतलब मैं कुछ समझा नहीं.’’

‘‘सबकुछ यहीं जान लेंगे. क्यों न आराम से चल कर बातें करें,’’ बोल कर वह खड़ी हो गई.

फिर जब हम लिफ्ट में थे, तब मैं ने फिर पूछा, ‘‘तुम गुस्से में क्यों थीं?’’

‘‘पहले रूम में चलें, फिर बातें होंगी.’’

हम दोनों कमरे में आ गए थे. वह अपना बैग और मोबाइल फोन टेबल पर रख कर सोफे पर आराम से बैठ गई.

मैं ने फिर उस से पूछा कि शुरू में वह गुस्से में क्यों थी, तो जवाब मिला, ‘‘इसी फ्लोर पर दूसरे छोर के रूम में एक बूढ़े ने मूड खराब कर दिया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘बूढ़ा 50 के ऊपर का होगा. मुझ से अननैचुरल डिमांड कर रहा था. उस ने कहा कि इस के लिए मुझे ऐक्स्ट्रा पैसे देगा. यह मेरे लिए नामुमकिन बात थी और मैं ने उस के पैसे भी फेंक दिए.’’

मुझे तो उस की बातें सुन कर एक जोर का झटका लगा और मुझे लौबी में वेटर का इशारा समझ में आने लगा था.

फिर भी उस से नाम पूछा, तो वह उलटे मुझ से ही पूछ बैठी, ‘‘आप मुंबई के तो नहीं लगते. आप यहां किसलिए आए हैं और मुझ से क्या चाहते हैं?’’

‘‘मैं तो बस टाइम पास करना चाहता हूं. कंपनी के काम से आया था. वह पूरा हो गया. अब जो मरजी वह करूं. मुझे कल शाम की फ्लाइट से लौटना है. पर अपना नाम तो बताओ?’’

‘‘मुझे कालगर्ल कहते हैं.’’

‘‘वह तो मैं समझ सकता हूं, फिर भी तुम्हारा नाम तो होगा. हर बार कालगर्ल कह कर तो नहीं पुकार सकता. लड़की दिलचस्प लगती हो. जी चाहता है कि तुम से ढेर सारी बातें करूं… रातभर.’’

‘‘आप मुझे प्रिया नाम से पुकार सकते हैं, पर आप रातभर बातें करें या जो भी, रेट तो वही होगा. पर बूढ़े वाली बात नहीं, पहले ही बोल देती हूं,’’ लड़की बोली.

मैं भी अब उसे समझने लगा था. मुझे तो सिर्फ टाइम पास करना था और थोड़ा ऐसी लड़कियों के बारे में जानने की जिज्ञासा थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘कुछ कोल्डड्रिंक वगैरह मंगाऊं?’’

‘‘मंगा लो,’’ प्रिया बोली, ‘‘हां, कुछ सींक कबाब भी चलेगा. तब तक मैं नहा लेती हूं.’’

‘‘बाथरूम में गाउन भी है. यह तो और अच्छी बात है, क्योंकि हमाम से निकल कर लड़कियां अच्छी लगती हैं.’’

‘‘क्यों, अभी अच्छी नहीं लग रही क्या?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘नहीं, वह बात नहीं है. नहाने के बाद और अच्छी लगोगी.’’

मैं ने रूम बौय को बुला कर कबाब लाने को कहा. प्रिया बाथरूम में थी.

थोड़ी देर बाद ही रूम बौय कबाब ले कर आ गया था. मैं ने 2 लोगों के लिए डिनर भी और्डर कर दिया.

इस के बाद मैं न्यूज देखने लगा, तभी बाथरूम से प्रिया निकली. दूधिया सफेद गाउन में वह सच में और अच्छी दिख रही थी. गाउन तो थोड़ा छोटा था ही, साथ में प्रिया ने उसे कुछ इस तरह ढीला बांधा था कि उस के उभार दिख रहे थे.

प्रिया सोफे पर आ कर बैठ गई.

‘‘मैं ने कहा था न कि तुम नहाने के बाद और भी खूबसूरत लगोगी.’’

प्रिया और मैं ने कोल्डड्रिंक ली और बीचबीच में हम कबाब भी ले रहे थे.

मैं ने कहा, ‘‘कबाब है और शबाब है, तो समां भी लाजवाब है.’’

‘‘अगर आप की पत्नी को पता चले कि यहां क्या समां है, तो फिर क्या होगा?’’

‘‘सवाल तो डरावना है, पर इस के लिए मुझे काफी सफर तय करना होगा. हो सकता है ताउम्र.’’

‘‘कल शाम की फ्लाइट से आप जा ही रहे हैं. मैं जानना चाहती हूं कि आखिर मर्दों के ऐसे चलन पर पत्नी की सोच क्या होती है.’’

‘‘पर, मेरे साथ ऐसी नौबत नहीं आएगी.’’

‘‘क्यों?’’

मैं ने कहा, ‘‘क्योंकि मैं अपनी पत्नी को खो चुका हूं. 27 साल का था, जब मेरी शादी हुई थी और 5 साल बाद ही उस की मौत हो गई थी, पीलिया के कारण. उस को गए 2 साल हो गए हैं.’’

‘‘ओह, सो सौरी,’’ बोल कर अपनी प्लेट छोड़ कर वह मेरे ठीक सामने आ कर खड़ी हो गई थी और आगे कहा, ‘‘तब तो मुझे आप का मूड ठीक करना ही होगा.’’

प्रिया ने अपने गाउन की डोरी की गांठ जैसे ही ढीला भर किया था कि जो कुछ मेरी आंखों के सामने था, देख कर मेरा मन कुछ पल के लिए बहुत विचलित हो गया था.

मैं ने इस पल की कल्पना नहीं की थी, न ही मैं ऐसे हालात के लिए तैयार था. फिर भी अपनेआप पर काबू रखा.

तभी डोर बैल बजी, तो प्रिया ने अपने को कंबल से ढक लिया था. डिनर आ गया था. रूम बौय डिनर टेबल पर रख कर चला गया.

प्रिया ने कंबल हटाया, तो गाउन का अगला हिस्सा वैसे ही खुला था.

प्रिया ने कहा, ‘‘टेबल पर मेरे बैग में कुछ सामान पड़े हैं, आप को यहीं से दिखता होगा. आप जब चाहें इस का इस्तेमाल कर सकते हैं. आप का मूड भी तरोताजा हो जाएगा और आप के मन को शायद इस से थोड़ी राहत मिले.’’

‘‘जल्दी क्या है. सारी रात पड़ी है. हां, अगर कल दोपहर तक फ्री हो तो और अच्छा रहेगा.’’

इतना कह कर मैं भी खड़ा हो कर उस के गाउन की डोर बांधने लगा, तो वह बोली, ‘‘मेरा क्या, मुझे पैसे मिल गए. आप पहले आदमी हैं, जो शबाब को ठुकरा रहे हैं. वैसे, आप ने दोबारा शादी की? और आप का कोई बच्चा?’’

वह बहुत पर्सनल हो चली थी, पर मुझे बुरा नहीं लगा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘डिनर लोगी?’’

‘‘क्या अभी थोड़ा रुक सकते हैं? तब तक कुछ बातें करते हैं.’’

‘‘ओके. अब पहले तुम बताओ. तुम्हारी उम्र क्या है? और तुम यह सब क्यों करती हो?’’

‘‘पहली बात, लड़कियों से कभी उम्र नहीं पूछते हैं…’’

मैं थोड़ा हंस पड़ा, तभी उस ने कहना शुरू किया, ‘‘ठीक है, आप को मैं अपनी सही उम्र बता ही देती हूं. अभी मैं 21 साल की हूं. मैं सच बता रही हूं.’’

‘‘और कुछ लोगी?’’

‘‘अभी और नहीं. आप के दूसरे सवाल का जवाब थोड़ा लंबा होगा. वह भी बता दूंगी, पर पहले आप बताएं कि आप ने फिर शादी की? आप की उम्र भी ज्यादा नहीं लगती है.’’

मैं ने उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया और कहा, ‘‘मैं अभी 34 साल का हूं. मेरा कोई बच्चा नहीं है. डाक्टरों ने सारे टैस्ट ले कर के बता दिया है कि मुझ में पिता बनने की ताकत ही नहीं है. अब दूसरी शादी कर के मैं किसी औरत को मां बनने के सुख के लिए तरसता नहीं छोड़ सकता.’’

इस बार प्रिया मुझ से गले मिली और कहा, ‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ.’’

मैं ने उस की पीठ थपथपाई और कहा, ‘‘दुनिया में सब को सबकुछ नहीं मिलता. पर कोई बात नहीं, दफ्तर के बाद मैं कुछ समय एक एनजीओ को देता हूं. मन को थोड़ी शांति मिलती है. चलो, डिनर लेते हैं.’’

डिनर के बाद मुझे आराम करने का मन किया, तो मैं बैड पर लेट गया. प्रिया भी मेरे साथ ही बैड पर आ कर कंबल लपेट कर बैठ गई थी. वह मेरे बालों को सहलाने लगी.

‘‘तुम यह सब क्यों करती हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कोई अपनी मरजी से यह सब नहीं करता. कोई न कोई मजबूरी या वजह इस के पीछे होती है. मेरे पापा एक प्राइवेट मिल में काम करते थे. एक एक्सीडैंट में उन का दायां हाथ कट गया था. कंपनी ने कुछ मुआवजा दे कर उन की छुट्टी कर दी. मां भी कुछ पढ़ीलिखी नहीं थीं. मैं और मेरी छोटी बहन स्कूल जाते थे.

‘‘मां 3-4 घरों में खाना बना कर कुछ कमा लेती थीं. किसी तरह गुजर हो जाती थी, पर पापा को घर बैठे शराब पीने की आदत पड़ गई थी. जमा पैसे खत्म हो चले थे…’’ इसी बीच रूम बौय डिनर के बरतन लेने आया और दिनभर के बिल के साथसाथ रूम के बिलों पर भी साइन करा कर ले गया.

प्रिया ने आगे कहा, ‘‘शराब के कारण मेरे पापा का लिवर खराब हुआ और वे चल बसे. मेरी मां की मौत भी एक साल के अंदर हो गई. मैं उस समय 10वीं जमात पास कर चुकी थी. छोटी बहन तब छठी जमात में थी. पर मैं ने पढ़ाई के साथसाथ ब्यूटीशियन का भी कोर्स कर लिया था.

‘‘हम एक छोटी चाल में रहते थे. मेरे एक रिश्तेदार ने ही मुझे ब्यूटीपार्लर में नौकरी लगवा दी और शाम को एक घर में, जहां मां काम करती थी, खाना बनाती थी. पर उस पार्लर में मसाज के नाम पर जिस्मफरोशी भी होती थी. मैं भी उस की शिकार हुई और इस दुनिया में मैं ने पहला कदम रखा था,’’ बोलतेबोलते प्रिया की आंखों से आंसू बहने लगे थे.

मैं ने टिशू पेपर से उस के आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘सौरी, मैं ने तुम्हारी दुखती रगों को बेमतलब ही छेड़ दिया.’’

‘‘नहीं, आप ने मुझे कोई दुख नहीं पहुंचाया है. आंसू निकलने से कुछ दिल का दर्द कम हो गया,’’ बोल कर प्रिया ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘पर, यह सब मैं अपनी छोटी बहन को सैटल करने के लिए कर रही हूं. वह भी 10वीं जमात पास कर चुकी है और सिलाईकढ़ाई की ट्रेनिंग भी पूरी कर ली है. अभी तो एक बिजली से चलने वाली सिलाई मशीन दे रखी है. घर बैठेबैठे कुछ पैसे वह भी कमा लेती है.

‘‘मैं ने एक लेडीज टेलर की दुकान देखी है, पर सेठ बहुत पगड़ी मांग रहा है. उसी की जुगाड़ में लगी हूं. यह काम हो जाए, तो दोनों बहनें उसी बिजनेस में रहेंगी…’’ फिर एक अंगड़ाई ले कर उस ने कहा, ‘‘मैं आप को बोर कर रही हूं न? आप ने तो मुझे छुआ भी नहीं. आप को मुझ से कुछ चाहिए तो कहें.’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी सारी रात पड़ी है, मुझे अभी कोई जल्दी नहीं. जब कोई जरूरत होगी कहूंगा. पर पार्लर से होटल तक तुम कैसे पहुंचीं?’’

‘‘पार्लर वाले ने ही कहा था कि मैं औरों से थोड़ी अच्छी और स्मार्ट हूं, थोड़ी अंगरेजी भी बोल लेती हूं. उसी ने कहा था कि यहां ज्यादा पैसा कमा सकती हो. और पार्लरों में पुलिस की रेड का डर बना रहता है. फिर मैं होटलों में जाने लगी.’’

इस के बाद प्रिया ने ढेर सारी बातें बताईं. होटलों की रंगीन रातों के बारे में कुछ बातें तो मैं ने पहले भी सुनी थीं, पर एक जीतेजागते इनसान, जो खुद ऐसी जिंदगी जी रहा है, के मुंह से सुन कर कुछ अजीब सा लग रहा था.

इसी तरह की बातों में ही आधी रात बीत गई, तब प्रिया ने कहा, ‘‘मुझे अब जोरों की नींद आ रही है. आप को कुछ करना हो…’’

प्रिया अभी तक गाउन में ही थी. मैं ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, ‘‘तुम दूसरे बैड पर जा कर आराम करो. और हां, बाथरूम में जा कर पहले अपने कपड़े पहन लो. बाकी बातें जब तुम्हारी नींद खुले तब. तुम कल दिन में क्या कर रही हो?’’

‘‘मुझ से कोई गुस्ताखी तो नहीं हुई. सर, आप ने मुझ पर इतना पैसा खर्च किया और…’’

‘‘नहींनहीं, मैं तो तुम से बहुत खुश हूं. अब जाओ अपने कपड़े बदल लो.’’

मैं ने देखा कि जिस लड़की में मेरे सामने बिना कुछ कहे गाउन खोलने में जरा भी संकोच नहीं था, वही अब कपड़े पहनने के लिए शर्मसार हो रही थी.

प्रिया ने गाउन के ऊपर चादर में अपने पूरे शरीर को इतनी सावधानी से लपेटा कि उस का शरीर पूरी तरह ढक गया था और वह बाथरूम में कपड़े पहनने चली गई.

थोड़ी देर बाद वह कपड़े बदल कर आई और मेरे माथे पर किस कर ‘गुडनाइट’ कह कर अपने बैड पर जा कर सो गई.

सुबह जब तक मेरी नींद खुली, प्रिया फ्रैश हो कर सोफे पर बैठी अखबार पढ़ रही थी.

मुझे देखा, तो ‘गुड मौर्निंग’ कह कर बोली, ‘‘सर, आप फ्रैश हो जाएं या पहले चाय लाऊं?’’

‘‘हां, पहले चाय ही बना दो, मुझे बैड टी की आदत है. और क्या तुम शाम 5 बजे तक फ्री हो? तुम्हें इस के लिए मैं ऐक्स्ट्रा पैसे दूंगा.’’

‘‘सर, मुझे आप और ज्यादा शर्मिंदा न करें. मैं फ्री नहीं भी हुई तो भी पहले आप का साथ दूंगी. बस, मैं अपनी बहन को फोन कर के बता देती हूं कि मैं दिन में नहीं आ सकती.’’

प्रिया ने अपनी बहन को फोन किया और मैं बाथरूम में चला गया. जातेजाते प्रिया को बोल दिया कि फोन कर के नाश्ता भी रूम में ही मंगा ले.

नाश्ता करने के बाद मैं ने प्रिया से कहा, ‘‘मैं ने ऐलीफैंटा की गुफाएं नहीं देखी हैं. क्या तुम मेरा साथ दोगी?’’

‘‘बेशक दूंगी.’’

थोड़ी देर में हम ऐलीफैंटा में थे. वहां तकरीबन 2 घंटे हम साथ रहे थे. मैं ने उसे अपना कार्ड दिया और कहा, ‘‘तुम मुझ से संपर्क में रहना. मैं जिस एनजीओ से जुड़ा हूं, उस से तुम्हारी मदद के लिए कोशिश करूंगा. यह संस्था तुम जैसी लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने में जरूर मदद करेगी.

‘‘मैं तो कोलकाता में हूं, पर हमारी ब्रांच का हैडक्वार्टर यहां पर है. थोड़ा समय लग सकता है, पर कुछ न कुछ अच्छा ही होगा.’’

प्रिया ने भरे गले से कहा, ‘‘मेरे पास आप को धन्यवाद देने के सिवा कुछ नहीं है. इसी दुनिया में रात वाले बूढ़े की तरह दोपाया जानवर भी हैं और आप जैसे दयावान भी.’’

प्रिया ने भी अपना कार्ड मुझे दिया. हम दोनों लौट कर होटल आए. मैं ने रूम में ही दोनों का लंच मंगा लिया. लंच के बाद मैं ने होटल से चैकआउट कर एयरपोर्ट के लिए टैक्सी बुलाई.

सामान डिक्की में रखा जा चुका था. जब मैं चलने लगा, तो उस की ओर देख कर बोला, ‘‘प्रिया, मुझे तुम्हें और पैसे देने हैं.’’

मैं पर्स से पैसे निकाल रहा था कि इसी बीच टैक्सी का दूसरा दरवाजा खोल कर वह मुझ से पहले जा बैठी और कहा, ‘‘थोड़ी दूर तक मुझे लिफ्ट नहीं देंगे?’’

‘‘क्यों नहीं. चलो, कहां जाओगी?’’

‘‘एयरपोर्ट.’’

मैं ने चौंक कर पूछा, ‘‘एयरपोर्ट?’’

‘‘क्यों, क्या मैं एयर ट्रैवल नहीं कर सकती? और आगे से आप मुझे मेरे असली नाम से पुकारेंगे. मैं पायल हूं.’’

और कुछ देर बाद हम एयरपोर्ट पर थे. अभी फ्लाइट में कुछ वक्त था. उस से पूछा, ‘‘तुम्हें कहां जाना है?’’

‘‘बस यहीं तक आप को छोड़ने आई हूं,’’ पायल ने मुसकरा कर कहा.

मैं ने उसे और पैसे दिए, तो वह रोतेरोते बोली, ‘‘मैं तो आप के कुछ काम न आ सकी. यह पैसे आप रख लें.’’

‘‘पायल, तुम ने मुझे बहुत खुशी दी है. सब का भला तो मेरे बस की बात नहीं है. अगर मैं एनजीओ की मदद से तुम्हारे कुछ काम आऊं, तो वह खुशी शानदार होगी. ये पैसे तुम मेरा आशीर्वाद समझ कर रख लो.’’

और मैं एयरपोर्ट के अंदर जाने लगा, तो उस ने झुक कर मेरे पैरों को छुआ. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिन की 2 बूंदें मेरे पैरों पर भी गिरीं.

मैं कोलकाता पहुंच कर मुंबई और कोलकाता दोनों जगह के एनजीओ से लगातार पायल के लिए कोशिश करता रहा. बीचबीच में पायल से भी बात होती थी. तकरीबन 6 महीने बाद मुझे पता चला कि एनजीओ से पायल को कुछ पैसे ग्रांट हुए हैं और कुछ उन्होंने बैंक से कम ब्याज पर कर्ज दिलवाया है.

एक दिन पायल का फोन आया. वह भर्राई आवाज में बोली, ‘सर, आप के पैर फिर छूने का जी कर रहा है. परसों मेरी दुकान का उद्घाटन है. यह सब आप की वजह से हुआ है. आप आते तो दोनों बहनों को आप के पैर छूने का एक और मौका मिलता.’

‘‘इस बार तो मैं नहीं आ सकता, पर अगली बार जरूर मुंबई आऊंगा, तो सब से पहले तुम दोनों बहनों से मिलूंगा.’’

आज मुझे पायल से बात कर के बेशुमार खुशी का एहसास हो रहा है और मन थोड़ा संतुष्ट लग रहा है.

Crime News: पालनहार बना हैवान : संबंधों को किया शर्मसार

Crime News: बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा अनुमंडलीय मुख्यालय स्थित बड़ी दुर्गा स्थान में मिश्र टोला का रहने वाला शिक्षक है रविंद्र झा. 50 वर्षीय रविंद्र झा रोसड़ा के संस्कृत विद्यालय में अध्यापक है. उसकी बुरी नजर अपनी ही 20 साल की बेटी मोनिका पर थी.

4 वर्ष पहले की बात है एक दिन मोनिका घर में अकेली थी. बस, बेशर्म शिक्षक पिता रविंद्र झा ने अपनी बेटी मोनिका के साथ अश्लील हरकत करनी शुरू कर दी. मोनिका ने विरोध किया फिर भी रविंद्र झा ने उस के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बना लिए. मोनिका ने यह बात अपनी मां से बताई. लेकिन लोकलाज का हवाला दे कर मां ने उसे चुप रहने की हिदायत दी.

उस समय मोनिका इंटरमीडिएट की छात्रा थी. वह अब स्नातक तीसरे वर्ष की छात्रा है. उस के बाद रविंद्र झा का मनोबल बढ़ता ही चला गया और वह जबतब घर में अकेली रहती बेटी मोनिका के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने लगा. पिता की हरकत से परेशान हो कर मोनिका ने सबूत इकट्ठा करने के खयाल से ही यह घिनौनी करतूत 20 अप्रैल, 2022 को अपने मोबाइल के कैमरे में कैद कर ली.

पिता के घिनौने कृत्य की वीडियो बनाने के बाद मोनिका ने अपनी मामी से यह बात शेयर की. मामामामी उस के घर पहुंचे और मोनिका को साथ ले कर अपने घर चले गए. जहां मोनिका ने सारी बात मामामामी व अन्य रिश्तेदारों को खुल कर बताई. वहां उस का ममेरा भाई माधव मिश्रा कोने में खड़े हो कर सारी बात सुन रहा था. माधव ने मोनिका को मदद का भरोसा दिलाया तो वह मान गई और मोनिका ने वीडियो माधव के हवाले कर दी.

माधव ने वह वीडियो प्रशासनिक मदद के खयाल से अपने एक परिचित हसनपुर निवासी एक न्यूज पोर्टल के पत्रकार संजय भारती को दे दी. ‘रोसड़ा जंक्शन’ नामक उस न्यूज पोर्टल से जुड़े पत्रकार संजय भारती ने पहले मोनिका से मोबाइल पर संपर्क कर उसे ब्लैकमेल किया और जब उसे पैसा नहीं मिला तो उस ने वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी. मोनिका को जब वीडियो वायरल होने की खबर मिली तो वह बहुत परेशान हो गई. उस ने रोसड़ा थाने जा कर मदद की गुहार लगाई. लेकिन पुलिस वाले पीडि़ता के पिता से मिल गए और उन्होंने केस दर्ज नहीं किया.

पुलिस उच्चाधिकरियों के संज्ञान में मामला आने के बाद पुलिस ने केस दर्ज कर मोनिका के घर पर छापेमारी की. फिर मोनिका के पिता रविंद्र झा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. इतना ही नहीं, पुलिस ने पीडि़ता के ममेरे भाई माधव मिश्रा को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. समस्तीपुर के एसपी हृदयकांत के आदेश पर अब यह मामला समस्तीपुर महिला थानाप्रभारी पुष्पलता कुमारी को ट्रांसफर कर दिया गया है.

दुष्कर्मी पिता रविंद्र झा व ममेरे भाई माधव मिश्रा के खिलाफ भादंवि की धारा 376, 354(बी), 341, 504, 506 आईपीपी व पोक्सो एक्ट एवं 67(ए) आईटी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है. तो वहीं न्यूज पोर्टल के पत्रकार संजय भारती के खिलाफ भी 5 मई, 2022 को भादंवि की धारा 384, 506, 509 व 67(ए) आईटी एक्ट 2000 के तहत रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है. लेकिन वह गिरफ्तार नहीं हो सका है.

थानाप्रभारी पुष्पलता कुमारी ने पीडि़ता मोनिका का 6 मई, 2022 को समस्तीपुर के सदर अस्पताल में मैडिकल कराया. डा. नवनीता, डा. गिरीश कुमार व डा. उत्सव की टीम ने पीडि़ता का मैडिकल परीक्षण किया. उस का अल्ट्रासाउंड व एक्सरे तक कराया गया. मैडिकल जांच में उस के साथ शारीरिक शोषण की पुष्टि हुई.

मैडिकल जांच और कोर्ट में बयान दर्ज कराने के बाद मोनिका को उस के मामामामी के साथ भेज दिया गया है. क्योंकि माधुरी ने मां के साथ घर जाने से इनकार कर दिया था.

फिलहाल मोनिका अभी डर से उबर नहीं पाई है. वह सहमी हुई रहती है.

—कथा में मोनिका नाम परिवर्तित है