नौसिखिया डाक्टरों से आप भी रहें सावधान

अजमत खान उत्तर प्रदेश पुलिस में सर्विलांस ऐक्सपर्ट सिपाही था. वह बुखार से पीडि़त हुआ. 11 अक्तूबर, 2015 को वह उत्तर प्रदेश के जनपद बुलंदशहर के जिला अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा. उस वक्त वहां तैनात इमर्जैंसी प्रभारी डाक्टर सचिन ने अजमत खान को 2 इंजैक्शन लगा दिए. अजमत खान खुश था कि अब उसे आराम मिल जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. घर पहुंचने के 24 घंटे के अंदर ही अजमत खान के बदन में सूजन आ गई. हालत ज्यादा बिगड़ने पर उसे तुरंत एक प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया गया. वहां पता चला कि बिना जांचपड़ताल किए और मर्ज को ठीक से समझे बिना ही दिए गए इंजैक्शनों ने उस की यह हालत की थी.

डाक्टर की यह करतूत जब सुर्खियों में आई, तो बजाय कोई कार्यवाही करने के अस्पताल प्रशासन ने उसे छुट्टी पर ही भेज दिया.

उधर अजमत खान का शरीर गलना शुरू हो गया. गंभीर हालत के चलते उसे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भरती कराया गया. उस के शरीर से खून रिसने लगा. वह कोमा में चला गया और उस के गुरदों ने भी काम करना बंद कर दिया. कई दिनों के बाद उस ने दम तोड़ दिया.

मामले ने तूल पकड़ा और आरोपी डाक्टर को मरीज की अनदेखी का जिम्मेदार माना गया. डाक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. नौसिखिया डाक्टर भी हर बड़ेछोटे अस्पतालों में पाए जाते हैं. कहने को उन के पास डिगरियां होती हैं, लेकिन वे असल होती हैं या थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के हासिल की गई होती हैं, इसे कोई नहीं जानता.

कई बार डिगरी लेने के तुरंत बाद ही डाक्टर अपना निजी अस्पताल खोल कर बैठ जाते हैं. वे अनुभव को तवज्जुह नहीं देते, जिस के नतीजे कभीकभी घातक साबित होते हैं.

गाजियाबाद के रहने वाले फूड इंस्पैक्टर शिवराज सिंह दिल की बीमारी से पीडि़त थे. 29 नवंबर, 2015 को उन्होंने एक लैब में ब्लड सैंपल दिया. सैंपल लेने वाला नौजवान नौसिखिया था. उस की लापरवाही से हाथ में इंजैक्शन से हवा चली गई. नतीजतन, शिवराज का हाथ सूज कर नीला पड़ गया.

उस लैब को चलाने वालों ने अपनी लापरवाही से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को खबर की गई, तो उन्होंने गलती मानी. पता चला कि लोगों का ब्लड सैंपल एक नौसिखिया ले रहा था. उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

बरेली जिले की एक डाक्टर ने तो अनाड़ीपन की हदों को ही लांघ दिया. जचगी के दर्द के बाद नाजिम नामक नौजवान ने अपनी पत्नी मेराज को सुभाष नगर इलाके में डाक्टर राधा शर्मा के घर में बने अस्पताल में भरती कराया. डिलीवरी के दौरान उस से 10 हजार रुपए जमा कराने को कहा गया, जो उस ने जमा करा दिए.

मेराज ने नौर्मल डिलीवरी से एक बेटी को जन्म दिया. डाक्टर ने सिंकाई की बात कह कर नवजात के सीने पर इलैक्ट्रौनिक सिंकाई मशीन रख दी. इस से उस का सीना जल गया. कुछ देर बाद ही उस की मौत हो गई.

मामला बिगड़ने पर डाक्टर राधा शर्मा ने समझौते की कोशिश की, लेकिन इस बात की शिकायत पुलिस से की गई, तो पुलिस ने डाक्टर राधा शर्मा को गिरफ्तार कर लिया.

जांच में पता चला कि राधा शर्मा के पास एक ट्रेनिंग सैंटर से प्रसव सहायक का सर्टिफिकेट था. इस के बल पर उस ने खुद को डाक्टर घोषित कर के घर में ही अस्पताल खोल लिया था.

4 कमरों के अस्पताल में उस ने एक कमरे में ओपीडी बनाई हुई थी. फरवरी महीने में वह 2 नवजात बच्चों की मौत के मामले में जेल गई थी, लेकिन हाईकोर्ट से जमानत ले कर बाहर आ गई थी.

जेल से बाहर आ कर भी डाक्टर राधा शर्मा का अनाड़ीपन खत्म नहीं हुआ और न ही कोई सबक लिया गया. उस ने फिर से नया कारनामा कर दिया. इस के बाद पुलिस ने न केवल उस के अस्पताल को सील कर दिया, बल्कि उसे पेशेवर अपराधी घोषित कर दिया.

सहारनपुर के रहने वाले अनिल कुमार को बुखार था. वह एक डाक्टर के पास पहुंचा. उसे वहां इंजैक्शन लगाया गया. इस के बाद उस की तबीयत अचानक बिगड़ गई और देखते ही देखते उस की मौत हो गई. इस मामले में मुकदमा दर्ज करा दिया गया.

पता चला कि जिस ने अनिल को इंजैक्शन लगाया था, वह नौसिखिया कंपाउंडर टीटू था. बुलंदशहर जिले के किसान छोटू गिरी के 6 साला बेटे अजय की खेलते समय कुहनी की हड्डी टूट गई. वे उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल ले गए. डाक्टर ने उस का एक्सरे कराया और प्लास्टर लगा दिया गया. अगले 5 दिनों में आराम मिलना तो दूर अजय की हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई.

बाद में उन्होंने दिल्ली ले जा कर बेटे का इलाज कराया, तो पता चला कि डाक्टर ने हड्डी ही गलत तरीके से जोड़ दी थी, जिस की वजह से अजय बहुत परेशान था.

हड्डी जोड़ने वाले उस डाक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई.

गाजियाबाद जनपद में मोतियाबिंद के आपरेशन के चक्कर में 8 मरीजों की जिंदगी में अंधेरा छा गया. आंखों के एक अस्पताल के बाहर औफर वाला बोर्ड लगा था कि उन के यहां मोतियाबिंद का सफल आपरेशन केवल 2 हजार रुपए में किया जाता है.

डाक्टरों ने एक ही दिन में कई आपरेशन कर डाले. इसे लापरवाही कहें या नौसिखियापन, 8 मरीजों की एक आंख की रोशनी जाती रही. इन मरीजों में फूलवती, राजेंद्री देवी, जगवती, फरजाना, जुम्मन, अमाना खातून, शिक्षा देवी व नेपाल शामिल थे. मामले के खुलने पर अस्पताल के खिलाफ जांच बैठा दी गई.

इस तरह के मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि मरीजों की जिंदगी से नौसिखिया डाक्टर किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं.

लाला लाजपतराय मैडिकल कालेज के सुपरिंटैंडैंट डाक्टर सुभाष सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर को डिगरी मिल जाना ही काफी नहीं होता, उसे प्रैक्टिस भी करनी होती है. डाक्टरी का पेशा गंभीर है. मामूली सी लापरवाही भी किसी मरीज की जिंदगी ले सकती है.

इस मसले पर डाक्टर वीपी सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर पर शक हो, तो उस की जांच कराई जा सकती है. लापरवाही और अनाड़ीपन से बचने के लिए डाक्टर के बारे में उचित जांचपड़ताल भी मरीजों को कर लेनी चाहिए.

पटरियों पर बलात्कार : समाज में होता अपराध – भाग 1

31 अक्तूबर, 2017 की शाम भोपाल में खासी चहलपहल थी. ट्रैफिक भी रोजाना से कहीं ज्यादा था. क्योंकि अगले दिन मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस समारोह लाल परेड ग्राउंड में मनाया जाना था. सरकारी वाहन लाल परेड ग्राउंड की तरफ दौड़े जा रहे थे.

सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात मार्गों में भी बदलाव किया गया था, जिस की वजह से एमपी नगर से ले कर नागपुर जाने वाले रास्ते होशंगाबाद रोड पर ट्रैफिक कुछ ज्यादा ही था. इसी रोड पर स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन के बाहर तो बारबार जाम लगने जैसे हालात बन रहे थे.

एमपी नगर में कोचिंग सेंटर और हौस्टल्स बहुतायत से हैं, जहां तकरीबन 85 हजार छात्रछात्राएं कोचिंग कर रहे हैं. इन में लड़कियों की संख्या आधी से भी अधिक है. आसपास के जिलों के अलावा देश भर के विभिन्न राज्यों के छात्र यहां नजर आ जाते हैं.

शाम होते ही एमपी नगर इलाका छात्रों की आवाजाही से गुलजार हो उठता है. कालेज और कोचिंग आतेजाते छात्र दीनदुनिया की बातों के अलावा धीगड़मस्ती करते भी नजर आते हैं. अनामिका भी यहीं के एक कोचिंग सेंटर से पीएससी की कोचिंग कर रही थी. अनामिका ने 12वीं पास कर एक कालेज में बीएससी में दाखिला ले लिया था.

उस का मकसद एक अच्छी सरकारी नौकरी पाना था, इसलिए उस ने कालेज की पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी थी. सर्दियां शुरू होते ही अंधेरा जल्दी होने लगा था. इसलिए 7 बजे जब कोचिंग क्लास छूटी तो अनामिका ने जल्द हबीबगंज रेलवे स्टेशन पहुंचने के लिए रेलवे की पटरियों वाला रास्ता चुना.

रेलवे लाइनें पार कर शार्टकट रास्ते से जाती थी स्टेशन

अनामिका विदिशा से रोजाना ट्रेन द्वारा अपडाउन करती थी. उस के पिता भोपाल में ही रेलवे फोर्स में एएसआई हैं और उन्हें हबीबगंज में ही स्टाफ क्वार्टर मिला हुआ है पर वह वहां जरूरत पड़ने पर ही रुकती थी. उस की मां भी पुलिस में हवलदार हैं.

कोचिंग से छूट कर अनामिका हबीबगंज स्टेशन पहुंच कर विदिशा जाने वाली किसी भी ट्रेन में बैठ जाती थी. फिर घंटे सवा घंटे में ही वह घर पहुंच जाती थी, जहां उस की मां और दोनों बड़ी बहनें उस का इंतजार कर रही होती थीं.

रोजाना की तरह 31 अक्तूबर को भी वह शार्टकट के रास्ते से हबीबगंज स्टेशन की तरफ जा रही थी. एमपी नगर से ले कर हबीबगंज तक रेल पटरी वाला रास्ता आमतौर पर सुनसान रहता है. केवल पैदल चल कर पटरी पार करने वाले लोग ही वहां नजर आते हैं. बीते कुछ सालों से रेलवे पटरियों के इर्दगिर्द कुछ झुग्गीबस्तियां भी बस गई हैं, जिन मेें मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं. यह शार्टकट अनामिका को सुविधाजनक लगता था, क्योंकि वह उधर से 10-12 मिनट में ही रेलवे स्टेशन पहुंच जाती थी.

अनामिका एक बहादुर लड़की थी. मम्मीपापा दोनों के पुलिस में होने के कारण तो वह और भी बेखौफ रहती थी. शाम के वक्त झुग्गीझोपडि़यों और झाडि़यों वाले रास्ते से किसी लड़की का यूं अकेले जाना हालांकि खतरे वाली बात थी, लेकिन अनामिका को गुंडेबदमाशों से डर नहीं लगता था.

उस वक्त उस के जेहन में यही बात चल रही थी कि विदिशा जाने के लिए कौनकौन सी ट्रेनें मिल सकती हैं. वैसे शाम 6 बजे के बाद विदिशा जाने के लिए 6 ट्रेनें हबीबगंज से मिल जाती हैं, इसलिए नियमित यात्रियों को आसानी हो जाती है. नियमित यात्रियों की भी हर मुमकिन कोशिश यही रहती है कि जल्दी प्लेटफार्म तक पहुंच जाएं. शायद देरी से चल रही कोई ट्रेन खड़ी मिल जाए और ऐसा अकसर होता भी था कि प्लेटफार्म तक पहुंचतेपहुंचते किसी ट्रेन के आने का एनाउंसमेंट सुनाई दे जाता था.

एमपी नगर से कोई एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद ही रेलवे के केबिन और दूसरी इमारतें नजर आने लगती हैं तो आनेजाने वालों को उन्हें देख कर बड़ी राहत मिलती है कि लो अब तो पहुंचने ही वाले हैं.

बदमाश ने फिल्मी स्टाइल में रोका रास्ता

यही उस दिन अनामिका के साथ हुआ. पटरियों के बीच चलते स्टेशन की लाइटें दिखने लगीं तो उसे लगा कि वक्त पर प्लेटफार्म पहुंच ही जाएगी. जब दूर से आरपीएफ थाना दिखने लगा तो अनामिका के पांव और तेजी से उठने लगे.

लेकिन एकाएक ही वह अचकचा गई. उस ने देखा कि गुंडे से दिखने वाले एक आदमी ने फिल्मी स्टाइल में उस का रास्ता रोक लिया है. अनामिका यही सोच रही थी कि क्या करे, तभी उस बदमाश ने उस का हाथ पकड़ लिया. आसपास कोई नहीं था और थीं भी तो सिर्फ झाडि़यां, जो उस की कोई मदद नहीं कर सकती थीं. अनामिका के दिमाग में खतरे की घंटी बजी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी और उस बदमाश से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी.

प्रकृति ने स्त्री जाति को ही यह खूबी दी है कि वह पुरुष के स्पर्श मात्र से उस की मंशा भांप जाती है. अनामिका ने खतरा भांपते हुए उस बदमाश से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश तेज कर दी. अनामिका ने उस पर लात चलाई, तभी झाडि़यों से दूसरा गुंडा बाहर निकल आया. तुरंत ही अनामिका को समझ आ गया कि यह इसी का ही साथी है.

मदद के लिए चिल्लाने का कोई फायदा नहीं हुआ

अभी तक तीनों रेल की पटरियों के नजदीक थे, जहां कभी भी कोई ट्रेन आ सकती थी. बाहर आए दूसरे गुंडे ने भी अनामिका को पकड़ लिया और दोनों उसे घसीट कर नजदीक बनी पुलिया की तरफ ले जाने लगे. अनामिका ने पूरी ताकत और हिम्मत लगा कर उन से छूटने की कोशिश की पर 2 हट्टेकट्टे मर्दों के चंगुल से छूट पाना अब नाममुकिन सा था. अनामिका का विरोध उन्हें बजाए डराने के उकसा रहा था, इसलिए वे घसीटते हुए उसे पुलिया के नीचे ले गए.

उन्होंने अनामिका को लगभग 100 फुट तक घसीटा लेकिन इस दौरान भी अनामिका हाथपैर चलाती रही और मदद के लिए चिल्लाई भी लेकिन न तो उस का विरोध काम आया और न ही उस की आवाज किसी ने सुनी.

आखिरकार अनामिका हार गई. दोनों गुंडों ने उस के साथ बलात्कार किया. इस बीच वह इन दोनों के सामने रोईगिड़गिड़ाई भी. इतना ही नहीं, उस ने अपनी हाथ घड़ी, मोबाइल फोन और कान के बुंदे तक उन के हवाले कर दिए पर इन गुंडों का दिल नहीं पसीजा. ज्यादती के पहले ही खींचातानी में अनामिका के कपड़े तक फट चुके थे.

उन दोनों की बातचीत से उसे इतना जरूर पता चल गया कि इन बदमाशों में से एक का नाम अमर और दूसरे का गोलू है. जब इन दोनों ने अपनी कुत्सित मंशाएं पूरी कर लीं तो अनामिका को लगा कि वे उसे छोड़ देंगे. इस बाबत उस ने उन दरिंदों से गुहार भी लगाई थी.

पटवारी की दुधारी तलवार से बच कर रहना

‘साहब, मैं कभी पाकिस्तान तो क्या, प्रदेश के किसी दूसरे जिले में भी नहीं गया. जैसेतैसे कर के मैं अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा हूं.’’ हाथ बांधे सुलेमान बाड़मेर के तत्कालीन एसडीएम की अदालत में गिड़गिड़ा रहा था. यह सन 1975 के शुरुआती दिनों की बात है.

‘‘सुलेमान, तुम्हारे इलाके के पटवारी ने रिपोर्ट दी है कि तुम कुछ दिनों पहले अनाधिकृत रूप से पाकिस्तान भाग गए थे. इसलिए तुम्हारी पुश्तैनी कृषि भूमि को राजस्थान टीनेंसी एक्ट के तहत जब्त किए जाने की काररवाई विचाराधीन है.’’ उपखंड अधिकारी ने कहा.

सुलेमान फिर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, पाकिस्तान भाग जाने का आरोप झूठा है. हां, उन दिनों मैं रोजीरोटी के लिए परिवार के साथ कहीं दूसरी जगह जरूर चला गया था. पटवारीजी ने मेरे बारे में झूठी रिपोर्ट दी है. गरीब होने के कारण मैं उन की सेवा नहीं कर सकता. इसीलिए उन्होंने नाराज हो कर झूठ लिख दिया है.’’

एसडीएम सुलेमान की फाइल फिर से पलटने लगे. तहसीलदार के निर्णय के खिलाफ सुलेमान ने एसडीएम की अदालत में अपील की थी. आखिरकार एसडीएम ने सुलेमान की गैरहाजिरी में उस की 24 बीघा कृषि भूमि को जब्त कर सरकारी घोषित कर दिया था. तारीख पेशी की जानकारी नहीं होने के कारण सुलेमान उस दिन अदालत में नहीं था.

सुलेमान को जब यह जानकारी मिली तो उसे बड़ा धक्का लगा. उस ने अपनी व्यथा अपने पड़ोसी चौथमल को बताई. चौथमल उस के साथ हुई नाइंसाफी से द्रवित हो उठा. उस ने सुलेमान को राजस्थान हाईकोर्ट जाने की सलाह दी. इतना ही नहीं, वह सुलेमान के साथ जोधपुर स्थित हाईकोर्ट गया और एसडीएम के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में अपील दायर कर दी. वहां भी कई सालों तक केस चला.

अंत में वहां का फैसला भी सुलेमान के पक्ष में नहीं आया. इस के बाद चौथमल ने हाईकोर्ट की ही डबल बेंच में अपील दाखिल करा दी.

पिछले महीने खंडपीठ के माननीय न्यायाधीश गोविंद माथुर और एस.पी. शर्मा ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि किसी नागरिक के देश में किसी अन्य क्षेत्र में चले जाने से उस के खिलाफ टीनेंसी एक्ट की काररवाई अनुचित है. आदेश सुनते ही सुलेमान की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

राजस्व विभाग के अंतिम छोर के प्यादे ‘पटवारी’ की गलत रिपोर्ट के कारण गरीब सुलेमान 40 सालों तक अदालतों के धक्के खाता रहा. यह तो पटवारी के क्रियाकलापों की बानगी मात्र है, लेकिन राजस्थान के ही हनुमानगढ़ के पटवारी ने अधिकारियों व अन्य लोगों से सांठगांठ कर के फरजीवाड़े का जो खेल खेला, सुन कर आप जरूर चौंक जाएंगे.

देहातों में आज भी बरसों पुरानी एक लोकोक्ति प्रचलित है, ‘ऊपर करतार, नीचे पटवार’. यहां पटवार का मतलब पटवारी यानी लेखपाल से है. लेखपाल राजस्व महकमे का प्यादा होता है. ब्रिटिश हुकूमत काल में कृषि संबंधी लेखाजोखा व लगान वसूली अमीन करता था, जो पटवारी का ही पर्याय होता था. तहसील के मामलों में पटवारी की जांच आख्या को महत्त्वपूर्ण माना जाता है. अपने स्वार्थ की वजह से कुछ पटवारी अपनी कलम से स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने से नहीं चूकते.

राजस्थान प्रदेश का एक जिला है हनुमानगढ़. इसी जिले की पीलीबंगा तहसील का गांव है पड़ोपल बारानी. 10-12 हजार की आबादी वाले इस गांव की कृषि भूमि किलाबंदी के अभाव में आज भी खसरों में समाहित है. इस क्षेत्र में कभी घग्घर नदी का बहाव था, जिस से क्षेत्र की लाल व दोमट मिट्टी बारानी होने के बावजूद बहुत उपजाऊ है. इसी कारण यहां की कृषि भूमि जिले के और क्षेत्रों की अपेक्षा कुछ महंगी है.

सन 2012 के आसपास का वाकया है. इस क्षेत्र में पटवारी संजीव मलिक की नियुक्ति हुई. कहा जाता है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाले संजीव की पहुंच राष्ट्रीय स्तर की एक राजनीतिक पार्टी के आला पदाधिकारियों तक थी. शातिरदिमाग संजीव मलिक की ऊंची महत्त्वाकांक्षाएं थीं. अपने क्षेत्र की सरकारी भूमि खाली देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह भूमि उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी नजर आ रही थी.

पर वह सोने के अंडे देने वाली मुरगी उसे उच्चाधिकारियों के सहयोग के बिना मिलनी असंभव थी. इस बेशकीमती कृषि भूमि के सहारे उस ने करोड़पति बनने का सपना संजो लिया था. इस के लिए उस ने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए.

अधिकारियों से संबंध बनाने के लिए उस ने अपने घर पर एक पार्टी का आयोजन किया, जिस में कानूनगो से ले कर एसडीएम तक को आमंत्रित किया. कुल मिला कर 15 मेहमान जुटे.

भोज छोटा था, पर मकसद बहुत ऊंचा था. शाही दावत के रूप में आयोजित इस भोज में संजीव ने शराब और कबाब की भी व्यवस्था की थी. सभी मेहमानों ने इस भोज की जी खोल कर प्रशंसा की.

दावत खाने के बाद विदा होते समय एक अधिकारी ने संजीव का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘भई मान गए संजीव, तुम्हारी जिंदादिली को. तुम्हारा प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. सचमुच मजा आ गया.’’

‘‘साहब, यह आप की ही कृपा का फल है और उम्मीद है कि इस नाचीज पर भविष्य में भी आप की कृपा बनी रहेगी.’’ उचित अवसर देख कर संजीव ने साहब का हाथ दबाते हुए दिल की मंशा जाहिर कर दी.

‘‘हां..हां… क्यों नहीं, कल सुबह औफिस में आ जाना. बैठ कर बातें करेंगे.’’ अधिकारी ने कहा.

संजीव का फेंका गया दूसरा पांसा भी सटीक पड़ा था. अगले दिन संजीव अपने अधिकारी के औफिस चला गया. दोनों में आधे घंटे तक गुफ्तगू होती रही. संजीव ने अपनी सोच जाहिर की तो साहब ने उस पर अपनी मौन स्वीकृति दे दी. पटवारी संजीव की भावी योजना में साहब की सीधे कोई भूमिका नहीं थी. केवल उन्हें चुप रहते हुए अपनी आंखें बंद रखनी थीं.

इस के बाद पटवारी संजीव ने अधिकारियों से सांठगांठ कर फरजी तरीके से भू आवंटन करना शुरू कर दिया. जो कोई उस का विरोध करता, वह मोटे गिफ्ट दे कर उस का मुंह बंद कर देता.

राजस्व विभाग में कामयाबी मिलने के बाद संजीव मलिक ने अगला कदम बैंकिंग प्रबंधन में पैठ बढ़ाने के लिए उठाया. शातिर संजीव ने एकदो व्यापारी मित्रों के सहयोग से इलाके के बैंक मैनेजरों को पटा लिया. वर्तमान में देश के सभी राष्ट्रीयकृत व सहकारी बैंक किसानों को उन की जोत वाली कृषि भूमि पर ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं. हर बैंक का कृषक ऋण का कोटा निश्चित होता है. इसी का फायदा संजीव ने उठाया.

संजीव की सांठगांठ से बैंककर्मियों को दोहरा लाभ हो रहा था. एक तो उन का ऋण आवंटन का कोटा सहजता से पूरा हो रहा था, ऊपर से जेब भी गरम हो रही थी. जिस खेती की जमीन पर बैंक लोन देती थी, बैंककर्मी उस का सत्यापन बैंक में बैठेबैठे ही पूरा कर के रिपोर्ट लगा देते थे.

संजीव मलिक ने शुरू में अपने खासमखास छुटभैया नेता ओमप्रकाश व उस के भाई के सहयोग से भरोसेमंद ग्राहकों को फांसा. बाद में उस के नेटवर्क में अन्य क्षेत्रीय राजनेता भी जुड़ गए. संजीव ने ओमप्रकाश व उस के भाई के नाम 56 बीघा कृषि भूमि इंद्राज कर के उन्हें खातेदार घोषित किया. इतना ही नहीं, दोनों ही भाइयों के नाम से 10 लाख 29 हजार रुपए व साढ़े 8 लाख रुपए का कृषि ऋण भी एक बैंक से दिला दिया.

इसी प्रकार खसरा नंबर 1236 में मात्र 2 बिस्वा (1 बीघा का दसवां हिस्सा) रकबा राजकीय दर्ज था. पर लेखपाल से मिलीभगत कर इस खसरा में 40 बीघा रकबा दर्ज दिखा कर दोनों भाइयों के नाम 20-20 बीघा खातेदारी घोषित कर दी गई.

राजस्थान में प्रदेश सरकार राजस्व विभाग की सहायता से समयसमय पर जायज भूमिहीन कृषकों को भूमि आवंटन व निर्धारित दर से भूमि विक्रय करती है. भू आवंटन हेतु एसडीएम की अध्यक्षता में गठित कमेटी भू आवंटन करती है. क्षेत्र के भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो), हलका पटवारी से संबंधित भूमि व कृषक की रिपोर्ट से संतुष्ट होने पर एसडीएम किसान को भू आवंटन करता है.

इस आवंटन का इंद्राज पटवार परत व सरकार परत में इंतकाल के रूप में दर्ज किया जाता है. इंतकाल की प्रक्रिया पूरी होने के साथ किसान भूमि का मालिकाना हक पा जाता है. पटवार परत जिसे आम बोलचाल में बही कहते हैं, वह पटवारी के पास तहसील कार्यालय में रहती है.

पटवारी के चोले में छिपा संजीव मलिक अब भू माफिया बन चुका था. अपेक्षित स्तर पर मिल रहे सहयोग के बल पर वह फरजी भू आवंटन से बेशुमार दौलत कमा रहा था. सन 2015 के अगस्त माह का वाकया है. क्षेत्र का एक किसान हेतराम संजीव मलिक से मिला. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पटवारीजी, गरीब आदमी हूं. मुझे भी एक मुरब्बा खातेदारी अलाट करवा दो.’’

‘‘देखो हेतराम, एक मुरब्बा का रेट 7 लाख है. तुम गरीब आदमी हो, इसलिए तुम्हारे 5 लाख लगेंगे. पैसे ले आओ, तुम्हारा काम कर दूंगा.’’

‘‘साहब, 5 लाख तो दूर, मेरे पास तो एक लाख भी नहीं हैं.’’

‘‘देखो हेतराम, पैसे ऊपर तक देने पड़ते हैं. तुम जैसे भी हो, पैसों की व्यवस्था कर लो. बाद में तुम्हें बैंक से केसीसी दिला दूंगा. इस से तुम्हारी जेब में 2-3 लाख ज्यादा आ जाएंगे.’’ संजीव ने कहा.

हेतराम ने जैसेतैसे कर मोटे ब्याज पर रुपए ले कर पटवारी को सौंप दिए. एक पखवाड़े में ही हेतराम एक मुरब्बा कृषि भूमि का मालिक बन गया. पटवारी संजीव मलिक ने हेतराम को उसी जमीन पर 8 लाख रुपए का लोन भी दिलवा दिया था. उस में से उस ने अपने हिस्से के 5 लाख रुपए ले लिए.

समय गुजरता रहा और पटवारी के ग्राहकों की संख्या बढ़ती रही. सूची में क्षेत्र के लोगों के अलावा एकचौथाई कृषक खातेदारी अधिकारों से वंचित हैं. ऐसे कृषकों को बैंकों के कृषि लोन या अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता था.

जब उन लोगों को पता चला कि पटवारी संजीव जरूरतमंद व्यक्तियों के बजाए अन्य लोगों को लाभ पहुंचा रहा है तो उन्होंने खातेदारी अधिकार के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. अप्रैल, 2016 के दूसरे पखवाड़े में शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने खातेदारी के साथसाथ पटवारी संजीव के कारनामे की जांच व तबादले की मांग भी जोड़ दी.

आंदोलन उग्र होता, इस से पहले ही जिला प्रशासन हरकत में आ गया. तत्कालीन जिलाधिकारी रामनिवास ने इस पूरे मामले की जांच मोहर के एडीएम सुखवीर सिंह चौधरी को सौंप दी. एडीएम ने व्यापक स्तर पर हुए भू घोटाले की जांच हेतु 2 जांच टीमें गठित कीं. पहली टीम में इंसपेक्टर राम सिंह मंद्रा के साथ पटवारी जसवंत सिंह, विनोद कुमार तथा दूसरी में इंसपेक्टर देवीलाल धिंपा के साथ हंसराज व राजकुमार को शामिल किया गया.

जांच टीमों ने सन 2005 से ले कर 2015 तक के तमाम खातों व जमा बंदियों की जांच की. जांच के दौरान पता चला कि आवंटित खसरों में अनुचित रूप से कांटछांट कर अन्य किसानों के नाम जोड़ दिए गए थे. फरजी स्तर पर खातेदारी अधिकार रेवडि़यों की तरह बांटे गए थे.

एडीएम सुखवीर सिंह ने बारीकी से जांच कर 40 पेज की रिपोर्ट तैयार कर के जिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत की. रिपोर्ट के अनुसार, पटवारी व अन्य ने अनधिकृत रूप से 41 खाते जोड़े थे. कंप्यूटराइज जमा बंदियों में संविदाकर्मी उमाराम व संजीव मलिक के फरजीवाड़े को इंसपेक्टर उमाराम द्वारा आंखें मूंद कर तसदीक किए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में था.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सन 1998 से ले कर 2001 तक की पटवार परत/सरकार परत कार्यालय में नहीं मिली. रकबा उपलब्ध नहीं होने के बावजूद फरजी ढंग से पटवार परत में कांटछांट व ओवरराइटिंग कर के किसानों को भू आवंटन किया गया.

जिलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार पीलीबंगा को 9 कर्मचारियों व 67 लाभान्वितों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के आदेश दिए. इन में 5 महिलाएं भी थीं. इस जांच रिपोर्ट में पीलीबंगा के तत्कालीन उपखंड अधिकारी व तहसीलदार की भूमिका पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी.

पीलीबंगा के तत्कालीन तहसीलदार बसंत सिंह ने 23 अप्रैल, 2016 को थाने में भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो) बनवारीलाल, जगदीश बैन, बृजलाल शर्मा, मदनलाल, उमाराम व 4 पटवारियों संजीव, वेदप्रकाश, रामचंद्र व ओमप्रकाश ताखर सहित 76 लोगों के विरुद्ध भांदंवि की धारा 420, 409, 467, 468, 471, 167 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

एक आरोपी महिला कृषक चंद्रावली जाट जो एक क्षेत्रीय नेताजी की मां है, को 8 खसरों में लगभग 65 बीघा रकबा आवंटित किया गया था. इस रकबे पर लाखों रुपए का कृषि लोन भी लिया गया था.

मुकदमा दर्ज होते ही राजस्व विभाग ने पटवारी संजीव मलिक को अपदस्थ कर दिया था. पर संजीव मलिक राजस्थान उच्च न्यायालय में राजनीतिक द्वेष का हवाला दे कर राहत पाने में सफल हो गया. मुकदमा दर्ज होते ही नामजद लोगों की नींद उड़ गई. संजीव मलिक के कृत्य से आहत किसानों ने अप्रैल में ही उच्च न्यायालय की शरण ली.

माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई के बाद अक्तूबर, 2016 में जांच अधिकारी सीओ पीलीबंगा को तलब कर लिया. उच्च न्यायालय के दखल के बाद धीमी गति से चल रही पुलिस जांच में तेजी आ गई. सीओ विजय मीणा के निर्देश पर एएसआई हंसराज, हैडकांस्टेबल लिघमन, सुरेंद्र, अमीलाल व बलतेज सिंह ने नामजद पटवारी संजीव मलिक व उमाराम गिरदावर को उन के निवास स्थान से 3 दिसंबर, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

10 दिसंबर को इसी टीम ने पटवारी के सहायक श्रीचंद मेघवाल व संविदाकर्मी उदाराम को भी गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार आरोपियों से व्यापक पूछताछ के बाद न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया.

पटवारी संजीव मलिक ने जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित पौश इलाके ड्रीमलैंड सोसाइटी में एक भव्य बंगला बनवाया था. कहा जाता है कि उस के बंगले पर लग्जरी गाडि़यों का आनाजाना लगा रहता था. यह भी कहा जाता है कि बीसियों लाख रुपयों से बने उस के बाथरूम तक में एसी लगे हुए थे. कृषि भूमि आवंटन के फ्रौड में करोड़ों बनाने वाला साईं भक्त संजीव मलिक अपने 3 साथियों के साथ जेल में बंद है.

हजारों बीघा कृषि भूमि के फरजी आवंटन के इस सिलसिले में कमाए गए लाखों रुपयों की बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हुई है. कई राजनेताओं पर भी आरोप लग रहे हैं. पूर्व में जिलाधिकारी हनुमानगढ़ ने सभी आवंटन रद्द करने के आदेश जारी किए थे.

पुलिस जांच मात्र राजस्व विभाग के निचले पायदान के कार्मिकों व नामजद किसानों के इर्दगिर्द घूम रही है. विभाग के आला अधिकारी अभी भी जांच से कोसों दूर हैं. जांच उन बैंककर्मियों की भी होनी चाहिए, जिन्होंने फरजी कागजातों के आधार पर खुले हाथों से लाखों के कृषि लोन मंजूर कर बंदरबांट की. पीडि़त किसानों ने राज्य सरकार से इस महाघोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है.      ?

– कथा राजस्व व पुलिस सूत्रों के आधार पर

नशे की गिरफ्त में स्कूली बच्चे

केरल के कोचीन के एक हायर सैकंडरी स्कूल में घटित घटना को पढ़ कर आप भी हैरान हो जाएंगे. घटना कुछ यों है : कक्षा में 2 छात्र स्कूल समय से देरी से पहुंचते हैं और बेहद थके हुए दिखाई देते हैं. इस बात की खबर दूसरे छात्र तुरंत अध्यापकों को देते हैं. अध्यापक छात्रों को स्टाफ रूम में बुलाते हैं और छात्रों से विस्तृत पूछताछ करते हैं.

बच्चों से पूछताछ करने पर जो सचाई सामने आती है वह हैरान कर देने वाली है. दरअसल, उन दोनों छात्रों ने नशीले पदार्थों का सेवन किया हुआ था. केरल में स्कूली छात्रों के बीच नशीले पदार्थों का सेवन तेजी से जोर पकड़ रहा है. स्कूल से क्लास मिस कर के बाहर घूमने वाले छात्रों पर जब पुलिस ने निगरानी रखी तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.

राज्य की ही एक अन्य घटना में पता चला कि ड्रग्स माफिया ने स्कूल जाते बच्चे को पहले पत्थर मार कर गिरा दिया और फिर नशीले पदार्थ इंजैक्ट करने की कोशिश की. स्कूली बच्चों में नशीले पदार्थों का सेवन तेजी से बढ़ रहा है. केरल के अनेक जिलों के कई बच्चे पुलिस को कुछ ऐसी ही घटनाओं में लिप्त मिले. इन में अधिकांश बच्चे शराब व नशीले पदार्थों की लत के शिकार थे. पुलिस ने बच्चों के अलावा ऐसे समूहों को भी पकड़ा जो स्कूली बच्चों को निशाना बना कर यह धंधा करते हैं.

नशीले पदार्थों की लत

पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि एक बार मित्रों के आग्रह पर नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बच्चे इस की लत का शिकार हो जाते हैं और बारबार नशीले पदार्थों के प्रयोग के लिए मजबूर हो जाते हैं. पुलिस ने हाल ही में क्लास मिस कर के इधरउधर घूमते, नशे का सेवन करते अनेक छात्रों को धरपकड़ा था.

अकेले कोट्टयम शहर से ऐसे 178 छात्र पकड़े गए हैं. कोट्टयम वैस्ट के सर्कल इंस्पैक्टर ए जे थौमस बच्चों में बढ़ रहे नशीले पदार्थों के व्यापक प्रयोग के बारे में कहते हैं, ‘‘घर से स्कूल जाने के लिए स्कूल यूनिफौर्म पहन कर ये बच्चे स्कूल जाने का ढोंग रचते हैं. वे स्कूल न पहुंच कर कपड़े बदल कर पार्क, मौल, रैस्टोरैंट में समय गुजारते हैं और नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने के बाद सिनेमा देखने में भी समय बिताते हैं.

जब कोट्टयम पुलिस ने कोट्टयम वैस्ट से ऐसे 112 बच्चों को और कोट्टयम ईस्ट से 64 बच्चों को ढूंढ़ा और उन से पूछताछ की तो पता चला कि ये बच्चे स्कूल से भाग कर मौजमस्ती कर रहे थे. पुलिस ने घटना की सूचना बच्चों के परिवार वालों को दी और उन से बच्चों के बारे में बात की.’’

पुलिस के नेतृत्व में गुरुकुलम

जब कोट्टयम पुलिस की जांच में विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ कर नशीले पदार्थों में लिप्त होने की बात सामने आई और बच्चों से विस्तृत पूछताछ करने पर पता चला कि ये बच्चे शराब और नशीले पदार्थों की लत के शिकार थे, तब ऐसे बच्चों को नशे की इस गिरफ्त से बचाने के लिए पुलिस के नेतृत्व में गुरुकुलम योजना शुरू की गई.

योजना के अंतर्गत बच्चे कक्षा में पूरे समय उपस्थित रहें, इस बात का ध्यान रखा जाता है और जो बच्चे उपस्थित नहीं होते उन की जानकारी एसएमएस द्वारा पुलिस को दी जाती है. बच्चे नशीले पदार्थों से कैसे दूर रहें, इस बात पर भी बच्चों की काउंसलिंग की जाती है. इस योजना की जानकारी स्कूलों के अध्यापकों को भी दी गई है ताकि वे बच्चों पर निगरानी रखें व उन्हें सही दिशा दें. पुलिस द्वारा की गई जांच में यह बात भी सामने आई है कि कमजोर तबके के परिवारों के बच्चे ही इस प्रकार के गलत रास्तों पर भटक जाते हैं.

स्कूल परिसर में ड्रग्स माफिया

कुछ महीने पहले केरल के कासर्गोड जिले में स्कूली बच्चों को नशीले पदार्थों का शिकार बनाने वाले ड्रग्स माफिया का खुलासा हुआ था. पुलिस जांच से यह बात सामने आई कि यह माफिया बच्चों को अपना शिकार बनाने के लिए स्कूलों के आसपास की दुकानों में पैन की तरह दिखने वाली सिगरेट बेचने के लिए रखते हैं. इस सिगरेट में पानमसाले का अंश अधिक होता है. एक अन्य घटना में स्कूल की छात्रा ने अपने जन्मदिन पर स्कूल में मिठाई बांटी.

मिठाई का स्वाद अध्यापक को अजीब लगने पर जब उस की जांच की गई तो उस में नशीले पदार्थों की मिलावट पाई गई और साथ ही, यह भी मालूम पड़ा कि ये मिठाइयां स्कूल के आसपास की दुकानों में ही सप्लाई की जाती हैं. यह माफिया बच्चों को अपना शिकार बनाने के लिए सोशल साइट्स व धार्मिक चिह्नों का भी इस्तेमाल करता है. मोबाइल मैसेजेस द्वारा भी यह अपने उद्देश्य को पूरा करता है. नशीले पदार्थों को बच्चों तक पहुंचाने के लिए माफिया कई तरह की मालाएं, लौकेट, खास रंग, चप्पल, बैग आदि निशानी के तौर पर इस्तेमाल करता है.

लत के पीछे इंटरनैट, मोबाइल

बच्चों में इंटरनैट व मोबाइल का दुरुपयोग बढ़ रहा है. इंटरनैट व मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखने वाले बच्चों की मानसिक अवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ता है और वे गलत राह की ओर अग्रसर हो जाते हैं. बच्चों को इस से बचाने के लिए मातापिता को चाहिए कि वे बच्चों को इस से बचाने के लिए उन पर निगरानी रखें कि वे कौनकौन सी साइट्स देख रहे हैं. बच्चा अगर बाहर किसी अनजान व्यक्ति से मिलता है तो इस बात की भी जानकारी रखें.

बच्चों के दोस्तों व उन के परिवार वालों से भी मेलजोल रखें और बढ़ते बच्चों को समयसमय पर सही दिशानिर्देश दें ताकि वे नशे की आदतों का शिकार हो कर गलत हाथों में न पड़ें. कई बार मातापिता के बीच अलगाव व झगड़े भी बच्चों को बाहरी दुनिया की ओर आकर्षित करते हैं. जब बच्चों को घर में स्वस्थ व खुशहाल माहौल नहीं मिलता और मातापिता व बच्चों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं होता तब भी बच्चे गलत दोस्तों की संगत में पड़ जाते हैं और गलत राह पर चलने लगते हैं. घर के खुशहाल माहौल के अभाव में बच्चे स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं और सुरक्षा की कमी से मानसिक संघर्ष से जूझते हैं.

तीजतन, ऐसी अवस्था से मुक्ति पाने के लिए नशीले पदार्थों का प्रयोग करना शुरू कर देते हैं और इस तरह उन्हें नशीले पदार्थों की लत लग जाती है. हाल ही में एक बच्चे ने घर में किसी सदस्य के न होने पर घर में रखी शराब पी ली और बेहोश हो कर गिर पड़ा.

शोषण का शिकार बच्चे

शराब एवं नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले बच्चे शारीरिक शोषण का शिकार भी आसानी से बनते हैं. चूंकि इन बच्चों की नशीले पदार्थों के सेवन के कारण सोचनेसमझने की शक्ति क्षीण हो जाती है. और ऐसे में अगर परिवार की ओर से स्वस्थ माहौल न मिले तो ये बच्चे अवैध रिश्तों की ओर आकर्षित हो जाते हैं. परिणामस्वरूप ऐसे बच्चे सामान्य जिंदगी से दूर होने लगते हैं.

बच्चों को समय दें

बढ़ते बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए मांबाप का प्यार और देखभाल बहुत जरूरी होती है. बच्चे गलत राह की ओर न बढ़ें, इस के लिए जरूरी है कि परिवार के सभी लोग एकसाथ समय व्यतीत करें, इकट्ठे खाना खाएं, हंसीमजाक करें. अभिभावक बच्चों से उन की शिक्षा, दिनचर्या और दोस्तों के बारे में जानकारी लें.

बच्चों को घर से बाहर घुमानेफिराने ले जाएं. बच्चों को हमेशा यह एहसास दिलाएं कि आप उन के साथ हैं. बच्चों के जन्मदिन पर व अच्छा काम करने पर उन्हें उपहार दें, उन की तारीफ करें. बच्चों से उन की समस्या के बारे में जानें व उस का हल निकालने में उन की मदद करें. अगर आप समस्या सुलझाने में असमर्थ हों तो मनोचिकित्सक व काउंसलर की सहायता लें.

नशे की लत में डूबे बच्चों को सामान्य जिंदगी की ओर लाने में अभिभावकों का योगदान महत्त्वपूर्ण है, इस में जरा भी देरी न करें. बच्चे देश का भविष्य हैं, उन्हें स्वस्थ व सुरक्षित जीवन जीने के लिए प्रेरित करें.

जागरूक करें बच्चों को

क्लीनिकल साइक्लौजिस्ट डा. विपिन वी रोलडेंट का इस बारे में कहना है कि बच्चे घर और बाहर की परिस्थितियों को बहुत जल्दी समझते हैं और उन से प्रभावित भी होते हैं. वे हर नई बात को अपनाने की चाहत रखते हैं. घर में अगर पिता शराब का सेवन करता हो तो बच्चा भी इस लत का शिकार हो सकता है.

बच्चों को नशीले पदार्थों से दूर रखने के लिए उन्हें जागरूक करना जरूरी है. स्कूली पाठ्यक्रम के साथसाथ बच्चों को नशे से दूर रहने के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. वहीं, नशे के शिकार बच्चों को काउंसलिंग व चिकित्सा द्वारा सामान्य जिंदगी की ओर लाने का प्रयास किया जाना चाहिए.

– डा. विपिन वी रोलडेंट
मनोचिकित्सक

ब्यूटी सैक्स दौलत कत्ल : महत्त्वाकांक्षा और माया का इंद्राणी जाल

महत्त्वाकांक्षा जीवन में आगे बढ़ने के लिए बेहद सार्थक और जरूरी है लेकिन अगर यही महत्त्वाकांक्षा नाजी तानाशाह हिटलर सरीखी हो जाए तो इतिहास के शब्द खून से सने नजर आते हैं.

शीना हत्याकांड में अबूझ पहेली बनी इंद्राणी मुखर्जी भी इसी अतिमहत्त्वाकांक्षा के जाल में जा फंसी जो उस ने जानेअनजाने खुद ही बुना था. ऊंची साख बनाने और प्रसिद्धि पाने की मानसिकता ने आज के दौर की इंद्राणी सरीखी महिलाओं के हौसले बुलंद तो किए हैं पर कुछेक को अंधेरे दलदल की ओर धकेल भी दिया जहां सिवा अफसोस और अवसादभरी तनहा जिंदगी के कुछ भी नहीं होता.

इस का प्रत्यक्ष उदाहरण है शीना बोरा मर्डर केस में फंसी आईएनएक्स मीडिया की पूर्व सीईओ इंद्राणी मुखर्जी.

पोरी बोरा से इंद्राणी बनने तक

देश की सब से बड़ी मर्डर मिस्ट्री बन चुका शीना बोरा हत्याकांड पुलिस, मीडिया सब के लिए एक पहेली बना हुआ है. असम के गुवाहाटी की पोरी बोरा मायानगरी मुंबई में जिस तरह हाई प्रोफाइल इंद्राणी मुखर्जी बन गई, वह बौलीवुड की किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. इंद्राणी मुखर्जी बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी थी.

कमसिन उम्र में ही उस का प्रेम परवान चढ़ा और शादी के पहले ही वह गर्भवती हो गई. उस समय पोरी बोरा के नाम से जानी जाने वाली इंद्राणी ने सिद्धार्थ दास से पहली शादी शिलांग (मेघालय) में की. हालांकि सिद्धार्थ ने इसे स्वीकार नहीं किया है. शादी के बाद बेटी शीना और बेटे मिखाइल को जन्म दिया.

सिद्धार्थ से अलग होने के बाद व्यापारी संजीव खन्ना से दूसरी शादी रचाई. इस रिश्ते से विधि खन्ना पैदा हुई. कुछ समय बाद संजीव खन्ना से भी तलाक हो गया. पर यह तलाक दिखावे के लिए था. असल में स्टार इंडिया के तत्कालीन सीईओ से विवाह बंधन में बंध कर इंद्राणी उन की दौलत की मालकिन बनना चाहती थी.

 इंद्राणी स्टार इंडिया में एचआर कंसल्टैंट के तौर पर काम करती थी और मौके का फायदा उठा कर स्टार इंडिया के मुखिया पीटर मुखर्जी पर डोरे डालने लगी थी. 2002 में इंद्र्राणी पीटर मुखर्जी से शादी कर ब्रौडकास्ट इंडस्ट्री की सब से ताकतवर शख्सीयत बन गई. उस दौरान पूर्व पति संजीव से पैदा हुई विधि 9 साल की थी. इंद्राणी ने पीटर को विधि के बारे में बताया, लेकिन सिद्धार्थ से पैदा हुई बेटी शीना और बेटे मिखाइल के बारे में नहीं बताया.

पीटर मुखर्जी की भी इंद्राणी से दूसरी शादी है. पहली पत्नी शबनम से पीटर के 2 लड़के हैं-राहुल और रौबिन. इंद्राणी ने पीटर मुखर्जी से 2002 में शादी की थी. इस के बाद इंद्राणी और पीटर ने 2007 में 9ङ्ग चैनल शुरू किया.

इस कंपनी में इंद्राणी  सीईओ बनी. अंगरेजी अखबार के मुताबिक, इंद्राणी ने 4 कंपनियों को जोड़ कर आईएनएक्स कंपनी में इन्वैस्टमैंट किया था. लेकिन 2009 में इंद्राणी ने कंपनी को 170 मिलियन डौलर में बेच दिया. 

शीना बोरा मर्डर मिस्ट्री सैक्स, पैसा और हाई प्रोफाइल जिंदगी से जुड़ी एक ऐसी कहानी है जिस ने मांबेटी के रिश्ते को तारतार कर दिया है. वरना इतने बड़े संपन्न परिवार की एक महिला अपनी बेटी शीना, जो तथाकथित तौर पर उस की बहन भी कही जा रही थी, की हत्या कर दे, कैसे संभव है? शीना की अप्रैल 2012 में हत्या करने और उस का शव रायगढ़ के जंगल में ठिकाने लगाने के आरोप में इंद्राणी,  उस के पूर्व पति संजीव खन्ना और उस के पूर्व चालक श्याम राय को गिरफ्तार किया गया है.

पुलिस के मुताबिक, जिस कार में शीना की हत्या की गई थी उस कार में ड्राइवर श्याम राय ने शीना बोरा के पैर पकड़े और संजीव खन्ना ने उस का गला दबा दिया था. इस के बाद इंद्राणी ने पुलिस से बचने के लिए शीना के शव का मेकअप तक किया. उस के बाल संवारे थे और लिपस्टिक लगाई थी ताकि लोग शंका न कर सकें.

रिश्तों की उलझन शीना की डायरी से भी समझी जा सकती है जिस में वह लिखती है कि मुझे अब मां से नफरत है. वह मां नहीं, डायन है. शीना बोरा हत्याकांड मानवीय मूल्यों के माने ही खत्म होने की मिसाल है. सवाल कई हैं. अगर इंद्राणी ने सबकुछ हासिल कर लिया था तो उसे हत्या जैसा कदम क्यों उठाना पड़ा? क्या कोई ऐसा राज था जो शीना के दिल में दफन करने के लिए उस की हत्या की साजिश रची गई या फिर इस डिसफंक्शनल परिवार में और भी ऐसी कई सड़ांध फैली थीं जिन के फैलने के डर से अपनों ने ही शीना का गला घोंट दिया?   

महत्त्वाकांक्षा की मार

जब औरत महत्त्वाकांक्षा के बुने जाल में फंसती है तो उसे इस की कीमत अकसर अपनी जान दे कर या गहरे अपराध में फंस कर जेल के अंधेरे बंद कमरे में चुकानी पड़ती है. इंद्राणी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. पैसा और शोहरत का यह रास्ता शुरुआत में भले ही सुगम और सुखदाई लगे लेकिन यह रास्ता आखिरकार जाता अवसाद और अपराध की ओर ही है. इंद्राणी ने भी सफलता की सीढि़यां चढ़ने के लिए शौर्टकट अपनाया और अब पुलिस की गिरफ्त में है.

 दरअसल, अपने दूसरे पति सिद्धार्थ दास से अलग होने के बाद इंद्राणी की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी. उस वक्त इंद्राणी के पास काइनेटिक स्कूटी हुआ करती थी. लेकिन आज स्थिति ठीक उलट है. इंद्राणी के पास मुंबई, कोलकाता, देहरादून समेत कई शहरों में अरबों की संपत्ति तो है ही, साथ में कई लग्जरी कारें भी हैं. यही नहीं, पीटर मुखर्जी से शादी के बाद इंद्राणी को नीता अंबानी, शाहरुख खान समेत कई बड़ी हस्तियों के साथ देखा गया. इंद्राणी पेज 3 पार्टीज में खूब शिरकत करती थी और ज्यादा पैसे वाला मिलते ही वह दूसरी शादी रचा लेती थी.

अब तक 5 पतियों को छोड़ चुकी इंद्राणी और पीटर के बीच मुलाकात भी एक ‘बार’ में पार्टी के दौरान हुई थी. इंद्राणी के एक दोस्त का तो यहां तक कहना है कि इंद्राणी हद से अधिक आक्रामक और महत्त्वाकांक्षी थी, वह अपना काम पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी.

और भी हैं इंद्राणी

किसी भी कीमत पर सबकुछ पाने की सोच और उन्मुक्त जीवन व आजादी का यह सपना एक नहीं कई इंद्राणियों को दर्द व अवसाद की गहरी खाई में धकेल चुका है. पुरुषों से ज्यादा महत्त्वाकांक्षी होने के चलते औरतें अपना सर्वस्व समर्पित करने से गुरेज नहीं करती हैं.

लेकिन बदले में सिवा बरबादी और तकलीफ के कुछ हासिल नहीं होता. हमारे सामने मधुमिता, भंवरी देवी, शिवानी भटनागर, फिजा, सुनंदा पुष्कर और रूपम जैसे कई उदाहरण हैं जहां महिलाएं अपनी ही महत्त्वाकांक्षा के बुने जाल में फंस गईं और उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी.

इस के लिए कभी शशि थरूर जैसे रसूखदार केंद्रीय मंत्री का सहारा लिया गया तो कभी आर के शर्मा जैसे भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का और कभी चांद मोहम्मद उर्फ चंद्रमोहन जैसे लोगों का. लेकिन तमाम किस्सों में बलि का बकरा सिर्फ औरत बनी. इन की महत्त्वाकांक्षी और पुरुषों की दुनिया में वर्चस्व हासिल करने की जिद ने इन्हें दुनिया से ही विदा कर दिया.  

शिवानी भटनागर एक वरिष्ठ पत्रकार बनने से पहले जब प्रशिक्षु थी, तो उस ने अपने सीनियर पत्रकार से शादी की जबकि दोनों की आदतों में बहुत अंतर था. उस पत्रकार एवं पति की बदौलत उस को मीडिया में वह रुतबा हासिल हुआ जो इतने कम समय में मिलना बेहद मुश्किल था. इस दौरान उस की नजदीकियां पुलिस अधिकारी आर के शर्मा से बढ़ीं, जिस के पीछे त्वरित सफलता पाने की शिवानी की ख्वाहिश काम कर रही थी. नजदीकियां हदों से पार निकल गईं. आखिरकार, वह मौत का कारण भी बन गई.

इसी तरह फिजा उर्फ अनुराधा बाली एक अधिवक्ता थी. मगर राजनीति के गलियारों में पैठ बनाने के लिए मिला एक शादीशुदा चंद्रमोहन, एक प्रदेश का उपमुख्यमंत्री. दोनों ने शादी भी कर ली चांद और फिजा बन कर. मगर जब फिजा दुनिया से रुखसत हुई तो अफसोस के सिवा उस के पास कुछ नहीं था. सुनंदा पुष्कर ने चुना एक केंद्रीय मंत्री, जिस की पिछली पारिवारिक जिंदगियां सदैव संदेह के घेरों में रहीं.

सुनंदा की भी पृष्ठभूमि कोई पाकसाफ नहीं थी. वह एक तथाकथित सोशलाइट थी, जिस में शीर्ष के लोगों के साथ की ललक व चाहत थी. मगर यहां सवाल यह उठता है कि सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर के बीच ऐसे कौन से हालात बन गए थे जिन की परिणति एक असामयिक और संदिग्ध मौत के रूप में हुई? कुछ तो जरूर होगा जो शायद महत्त्वाकांक्षा की अतिशयता से जुड़ा होगा? दरअसल, जब हम किसी का इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि कहीं न कहीं वह भी हमारा इस्तेमाल कर रहा है. और आखिर में शिकार इंद्राणी जैसी औरतों का ही होता है.

खूबसूरती और ताकत की भूख

इस हश्र से परे अगर इन के इंद्राणी बनने के पीछे के जरियों की पड़ताल की जाए तो 2 कारक सामने आते हैं. पहला, खूबसूरती यानी शरीर का इस्तेमाल और दूसरा बेशुमार ताकत हासिल करने की भूख. इन 2 अरमानों तले पलती महिलाएं पुरुषप्रधान समाज में पुरुषों का ही इस्तेमाल कर फर्श से अर्श तक का सफर पूरा करती हैं. इन को समझने के लिए विश्व राजनीति के पटल पर क्लियोपेट्रा को समझना बेहद जरूरी है. यह एक ऐसा नाम है जिस ने अपनी खूबसूरती और अपने शरीर का इस्तेमाल अपने कैरियर को बढ़ाने में बेहतरीन तरीके से किया.

उस ने सैक्स पावर को पहचानते हुए खुल कर उस का उपयोग किया और उसे अपनी सफलता की सीढ़ी बना कर बुलंदी पर जा पहुंची. क्लियोपेट्रा इस बात को जानती थी कि किस तरह अपने शरीर का इस्तेमाल कर के मर्दों को गुलाम बनाया जा सकता है. उसे उस हुनर का पता था जिस के बल पर वह बड़ेबड़े लोगों को अपने मोहजाल में फंसा सकती थी. साफ है कि क्लियोपेट्रा ने सैक्स और अपने शरीर को एक कमोडिटी की तरह अपने हक में सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया.

क्लियोपेट्रा अब एक नाम नहीं रही, बल्कि यह एक प्रवृत्ति के तौर पर स्थापित हो चुकी है. ऐसा नहीं है कि इस तरह की महिलाएं, जो अपनी देह को सत्ता हासिल करने का जरिया बनाती हैं,  सिर्फ विदेशों या पश्चिमी देशों में हैं, इस तरह के कई उदाहरण हमारे देश में भी मिल जाएंगे.

कितने खून माफ होंगे?

रस्किन बौंड की कहानी ‘सुजैन्स सेवन हस्बैंड्स’ पर विशाल भारद्वाज ने फिल्म ‘सात खून माफ’ बनाई, जो काफी हद तक ऐसी औरत की कहानी थी जो प्यार, ताकत और वर्चस्व की चाह में औरतों के अपने बनाए मापदंडों पर पुरुषों को खरा न पा कर उन की हत्या कर देती है. वह अलगअलग मिजाज के लोगों से 7 शादियां करती हैं.

प्यार,  नफरत, सैक्स, लालच जैसे भावों से भरी इस फिल्म में सुजैन का किरदार इंद्राणियों सरीखा है जो अपनी शर्तों पर जिंदगी जीती हैं और रास्ते पर चाहे पति आए या बेटी, गला घोंटने से गुरेज नहीं करतीं. इसी तरह, विद्या बालन अभिनीत फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’, जोकि दक्षिण भारतीय फिल्मों में सिल्क स्मिता के नाम से मशहूर सी ग्रेड अभिनेत्री के जीवन पर आधारित थी, उसी पुरुषवादी समाज का इस्तेमाल कर उभरती और डूबती औरत की कहानी थी.

फर्क इतना भर है कि सुजैन अपने पतियों का कत्ल कर देती है और सिल्क को आत्महत्या करनी पड़ती है. लेकिन गौर करें तो दोनों ही हालात में औरतें अकेली और अवसाद भरी जिंदगी के मुहाने पर थकी और लाचार सी खड़ी दिखाई देती हैं. इस तरह के किरदारों पर कई फिल्में बनी हैं जिन में डकैत फूलन देवी की ‘बैंडिट क्वीन’ की भी कहानी शामिल की जा सकती है.

अब्बास मस्तान की प्रियंका चोपड़ा अभिनीत फिल्म ‘ऐतराज’ भी कुछ यही बयां करती है. जहां एक महत्त्वाकांक्षा की मारी औरत अमीर बनने के लिए एक उम्रदराज बिजनैसमैन से शादी तो कर लेती है लेकिन जिस्म की भूख शांत करने के लिए अपने पुराने प्रेमी का इस्तेमाल करना चाहती है. बदले में उसे कंपनी में बड़ा ओहदा भी औफर करती है. उस की पावर को जब नायक चुनौती देता है तो उस पर रेप का झूठा इल्जाम लगाती है. आखिर में खुदकुशी की दहलीज पर उसे ही जाना पड़ता है.

सामाजिक सरोकार

ऐसी अपराधभरी घटनाएं जब अखबार और टीवी पर दिनरात टीआरपी के नशे में घरघर परोसी जाती हैं तो सामाजिक तबके पर इस के अलग प्रभाव दिखते हैं. कोई सैक्स और हत्या की इस गुत्थी को चटकारे ले कर गलीनुक्कड़ में सुनतासुनाता है तो कोई अपने घर की फैली सड़ांध से इसे मैच करने लगता है. सभ्य और अमीर समाज की धज्जियां उड़ाती ऐसी घटनाओं के गहरे सामाजिक सरोकार हैं और इन से सबक लेना ज्यादा जरूरी है बजाय इन पर सोशल मीडिया में चुटकुले गढ़ने के.

ये हालात किसी के घर भी हो सकते हैं. शीना मर्डर केस का असर राजधानी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल में 7वीं क्लास के एक छात्र पर कुछ इस तरह दिखा कि उस की मां उसे इंद्र्राणी मुखर्जी की तरह लगने लगी है. उस ने नोट्स में अपनी मां के बारे में लिखा था, ‘‘मैं एक नाजायज बच्चा हूं. मेरी मां इंद्र्राणी मुखर्जी की तरह है. उसे बहुत से आदमियों के साथ सैक्स करना पसंद है.’’ टीचर ने इस बात की जानकारी स्कूल के प्रिंसिपल को दी. प्रिंसिपल ने उस बच्चे के मातापिता को मिलने के लिए स्कूल बुलाया. बहरहाल, अब वह स्टूडेंट काउंसलिंग की प्रक्रिया से गुजर रहा है.

अंत बुरा तो सब बुरा

फर्ज कीजिए, अगर इंद्र्राणी ने शीना की हत्या नहीं की होती तो क्या सबकुछ ठीक होता इन की जिंदगी में, कतई नहीं. सिर्फ हत्या प्रकरण को हटा दें तो भी शीना अपनी मां से नफरत करती. इंद्र्राणी इसी तरह सफलता की सीढि़यां चढ़ने के लिए शादियां करती और परिवार इस तरह की डिसफंक्शनल जाल में उलझा रहता. 

जरा सोचिए, इतनी उलझनों के बीच परिवार में कौन खुश रहता. जहां भाई मां के खिलाफ है और बेटी को मां से नफरत है, जहां परिवार के साधारण से रिश्तों की गुत्थी सुलझाने के लिए दिमाग के न जाने कितने घोड़े दौड़ाने पड़ते हैं, वहां सिवा अपराध, हत्या, झगडे़ और साजिश के और क्या हो सकता था. 

आज के इस युग में जब संवेदनाएं सूख रही हैं और संबंधों का भी बाजारीकरण हो चुका है, ऐसे में महिलाओं को समझना होगा कि सशक्तीकरण का अर्थ सिर्फ धन कमाना और ऊंची पहुंच बनाना नहीं है. सशक्तीकरण का सही अर्थ है जागरूकता, आत्मनिर्भरता, संवेदनशील सोच व सतर्कता और अपने सामाजिक व पारिवारिक मूल्यों का बोध. जब महिलाएं इस बात को समझ जाएंगी, तभी उन का और उन से जुड़े रिश्तों का जीवन दिशाहीन होने से बच सकेगा.

-साथ में राजेश कुमार

ए सीक्रेट नाइट इन होटल – भाग 3

वीडियो देख कर रश्मि पानीपानी हो गई. अब उसे लग रहा था कि उस ने और विवेक ने जो किया था, वह किसी ब्लू फिल्म से कम नहीं था. वह हैरान इस बात पर थी कि यह सब रिकौर्ड कैसे हुआ? जबकि विवेक ने कमरे में दाखिल होते ही अच्छे से ठोकबजा कर देख लिया था कि कमरे में कोई कैमरा वगैरह तो नहीं लगा.

पर जो हुआ था, वह कंप्यूटर स्क्रीन पर चल रहा था. वीडियो देख कर सकते में आ गई रश्मि ने तुरंत फोन कर के विवेक को अपने घर बुलाया. विवेक आया तो रश्मि ने उसे सारी बात बताई, जिसे सुन कर वह भी झटका खा गया. यह तो साफ समझ आ रहा था कि वीडियो उसी रात का था, पर इसे भेजने वाले की मंशा साफ नहीं हो रही थी कि वह क्या चाहता है, सिवाय इस के कि वह गलत मंशा से रश्मि पर दबाव बना रहा था.

दोनों गंभीरतापूर्वक काफी देर तक इस बिन बुलाई मुसीबत पर चरचा करते रहे. बात चिंता की थी, इस लिहाज से थी कि अगर यह वीडियो वायरल हो गया तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे. दोनों अब अपनी जवानी के जोश में छिप कर किए इस कृत्य पर पछता रहे थे. लंबी चर्चा के बाद आखिरकार उन्होंने तय किया कि भेजने वाले से उस की मंशा पूछी जाए.

लिहाजा उन्होंने इस बाबत मैसेज किया तो जवाब आया कि अगर इस वीडियो को वायरल होने से बचाना है तो ढाई लाख रुपए दे दो. अब तसवीर साफ थी कि उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था. विवेक और रश्मि, दोनों निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों से थे, इसलिए ढाई लाख रुपए का इंतजाम करना उन की हैसियत के बाहर की बात थी. पर होने वाली बदनामी का डर भी उन के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

आखिरकार विवेक ने सख्त और समझदारी भरा फैसला लिया कि जब पौकेट में इतने पैसे नहीं हैं तो बेहतर है कि पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जाए. दोनों अपनेअपने घर से बहाना बना कर बीती 1 मई को ग्वालियर पहुंचे और सीधे एसपी डा. आशीष खरे से मिले. मामले की गंभीरता और शादी के बंधन में बंधने जा रहे इन दोनों की परेशानी आशीष ने समझी और मामला पड़ाव थाने के टीआई को सौंप दिया.

पुलिस वालों ने दोनों को सलाह दी कि वे ब्लैकमेलर से संपर्क कर किस्तों में पैसा देने की बात कहें. रश्मि ने पुलिस की हिदायत के मुताबिक ब्लैकमेलर को फोन कर के कहा कि वह ढाई लाख रुपए एकमुश्त तो देने की स्थिति में नहीं हैं, पर 5 किस्तों में 50-50 हजार रुपए दे सकती है. इस पर ब्लैकमेलर तैयार हो गया.

सीधे उत्तम होटल पर छापा न मारने के पीछे पुलिस की मंशा यह थी कि ब्लैमेलर को रंगेहाथों पकड़ा जाए. ऐसा हुआ भी. आरोपी आसानी से पुलिस के बिछाए जाल में फंस गया और रश्मि से 50 हजार रुपए लेते धरा गया. जिस युवक को पुलिस ने पकड़ा था, उस का नाम भूपेंद्र राय था. वह उत्तम होटल में ही काम करता था.

भूपेंद्र को उम्मीद नहीं थी कि रश्मि पुलिस में खबर करेगी, इसलिए वह पकड़े जाने पर हैरान रह गया. पूछताछ में उस ने बताया कि वह तो बस पैसा लेने आया था, असली कर्ताधर्ता तो कोई और है.

वह कोई और नहीं, बल्कि होटल का 63 वर्षीय मैनेजर विमुक्तानंद सारस्वत निकला. उसे भी पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने पूछताछ में मान लिया कि उन्होंने इस तरह कई जोड़ों को ब्लैकमेल किया था.

भूपेंद्र ने बताया कि इस होटल में उसे उस के बहनोई पंकज इंगले ने काम दिलवाया था. काम करतेकरते भूपेंद्र ने महसूस किया कि होटल में रुकने वाले अधिकांश कपल सैक्स करने आते हैं. लिहाजा उस के दिमाग में एक खुराफाती बात वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने की आई, जिस का आइडिया एक क्राइम सीरियल से उसे मिला था.

भूपेंद्र ने दिल्ली जा कर नाइट विजन कैमरे खरीदे, जो आकार में काफी छोटे होते हैं. इन कैमरों को उस ने टीवी के औनऔफ स्विच में फिट कर रखा था. इस से कोई शक भी नहीं कर पाता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं. आमतौर पर ठहरने वाले इस बात पर ध्यान नहीं देते कि टीवी का स्विच औन है, क्योंकि इस से कोई खतरा रिकौर्डिंग का नहीं होता.

ग्राहकों के जाने के बाद भूपेंद्र कैमरे निकाल कर फिल्म देखता था और जिन लोगों ने सैक्स किया होता था, उन के नामपते होटल में जमा फोटो आईडी से निकाल कर फेसबुक, व्हाट्सऐप या फिर सीधे मोबाइल फोन के जरिए ब्लैकमेल करता था. दोनों ने माना कि वे ब्लैकमेलिंग के इस धंधे से लाखों रुपए अब तक कमा चुके हैं. दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

मामला उजागर हुआ तो ग्वालियर में हड़कंप मच गया. पता यह चला कि कई होटलों में इस तरह के कैमरे फिट हैं और ब्लैकमेलिंग का धंधा बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है. इस तरह की रिकौर्डिंग के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रदर्शन भी किया.

इस पर पुलिस ने कई होटलों में छापे मारे, पर कुछ खास हाथ नहीं लगा. क्योंकि संभावना यह थी कि भूपेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही ब्लैकमेलर्स ने कैमरे हटा दिए थे. हालांकि उम्मीद बंधती देख कुछ लोगों ने पुलिस में जा कर अपने ब्लैकमेल होने का दुखड़ा रोया.

जब यह सब कुछ हो गया तो विवेक और रश्मि ब्रेफ्रिकी से नोएडा वापस चले गए और दोबारा शादी की तैयारियों में जुट गए. पर एक सबक इन्हें मिल गया कि हनीमून मनाते वक्त  होटल में इस बात का ध्यान रखेंगे कि टीवी के खटके में कैमरा न लगा हो और घर आने के बाद फिर फेसबुक पर यह मैसेज न मिले कि ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल.’

पढ़े लिखों पर भारी पड़ते अनपढ़ – भाग 3

जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लगातार हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए काफी समय पहले अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन एवं पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम गठित कर इस टीम को ऐसे अपराधियों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा था.

इस टीम ने ठगी के एकएक मामले का अध्ययन कर अपराधियों की कार्यप्रणाली समझी. उस के बाद तकनीकी माध्यम से उन मोबाइल नंबरों का पता लगाया, जिन से लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया था. व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने झारखंड से 3 ठगों को गिरफ्तार किया था.

इस से पहले इसी साल 24 फरवरी को सब से पहले सत्यम राय को पकड़ा गया. वह झारखंड के देवघर के खाजुरिया बसस्टैंड के पास स्थित विकासनगर का रहने वाला था. फिलहाल वह पश्चिम बंगाल के कोलकाता के टालीगंज में के.एम. लक्षकार रोड पर रह रहा था. उस ने पिछले साल जयपुर के राजेंद्र गहलोत को अपना शिकार बनाया था.

20 साल के सत्यम राय ने फोन पर खुद को बैंक अधिकारी बता कर राजेंद्र गहलोत से एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 43 हजार 391 रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस ठगी का मुकदमा जयपुर दक्षिण के थाना ज्योतिनगर में दर्ज है.

पूछताछ में सत्यम राय ने बताया था कि राजेंद्र गहलोत से ठगी कर के उस ने 21 हजार 891 रुपए का सैमसंग गैलेक्सी ए 5 एड्रौयड मोबाइल फोन औनलाइन खरीदा था. बाकी रकम उस ने अलगअलग गेटवे के माध्यम से बैंक खाते तथा वौलेटों में डाली थी. मोबाइल फोन आ गया तो उसे ओएलएक्स पर आईफोन एस-5 से एक्सचैंज कर लिया था.

कोलकाता से बीबीए की पढ़ाई करने के बाद सत्यम राय ने हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और बंगला सहित अन्य भाषाएं सीखीं, ताकि पूरे देश में विभिन्न बोलीभाषाओं में बात कर लोगों को झांसे में ले सके. पूछताछ में उस ने बताया था कि वह ठगी के जरिए मिली रकम के एक हिस्से से औनलाइन शौपिंग करता था, जिसे वह बेच कर पैसे खड़े कर लेता था.

पुलिस ने सत्यम राय से सैमसंग गैलेक्सी ए-7, आईफोन एस-5 और सैमसंग गैलेक्सी ए-5 फोन बरामद किए थे. उस से पूछताछ और उस के मोबाइल फोन की जांच से पता चला कि उस ने देश के अनेक राज्यों में ठगी के लिए कुल 2860 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर के सूरज प्रजापति से 55 हजार रुपए की इसी तरह की गई ठगी में पुलिस ने सागरदास और उस के साले विक्कीदास को 26 फरवरी, 2017 को गिरफ्तार किया था. ये दोनों ठग झारखंड में जामताड़ा जिले के अंबेडकर चौक पंडेडीह के रहने वाले थे. पुलिस ने इन से 5 मोबाइल फोन बरामद किए थे. इन मोबाइल फोनों में फर्जी आईडी पर जारी किए गए सिम मिले थे. जीजासाले ने अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 779 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर निवासी राजेश कुमार वर्मा से बैंक अधिकारी बन कर 21 हजार 566 रुपए की  औनलाइन ठगी करने के मामले में जयपुर पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड थाना के धरवाड़ी गांव के रहने वाले जयकांत मंडल को मार्च, 2017 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार किया था.

पुलिस ने उस से 3 मोबाइल फोन, 4 सिम और 4 एटीएम कार्ड बरामद किए थे. वह झारखंड के धनबाद के देवली गोविंदपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. उस ने कई भाषाएं सीख रखी थीं. जांच में पता चला कि जयकांत ने ठगी के लिए विभिन्न मोबाइल नंबरों से अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 9068 लोगों को फोन किए थे.

जांच में पता चला है कि झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड सहित कुछ इलाके साइबर अपराधियों के गढ़ हैं. कहा जाता है कि करमाटांड के झिलुआ गांव के रहने वाले सीताराम मंडल ने सन 2008-09 में बैंक अधिकारी बन कर लोगों से औनलाइन ठगी के साइबर अपराध को जन्म दिया था. इस का जाल अब पूरे जामताड़ा जिले में फैल चुका है. आजकल वहां 150 से अधिक गिरोह काम कर रहे हैं, जिन में 20 से 30 साल के युवा शामिल हैं.

इन में कुछ गिरोह ऐसे भी हैं, जिन्होंने वेतन और कमीशन के आधार पर दूसरे युवकों को नौकरी दे रखी है. कुछ पुराने ठग नई पीढ़ी के युवाओं को औनलाइन ठगी की ट्रेनिंग देते हैं और इस के बदले में मोटा मेहनताना वसूलते हैं. इन गिरोहों ने बैंक अधिकारी बन कर पूरे देश में अब तक कई अरब रुपए की ठगी की है.

मजे की बात यह है कि इन में ज्यादातर ठग ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं. लेकिन देश के अलगअलग राज्यों की भाषाएं सीख कर ये लोगों को ठग रहे हैं. देश में ऐसा कोई वर्ग नहीं है, जो इन की ठगी का शिकार न हुआ हो.

केंद्रीय मंत्री से ले कर, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों, आईएएस एवं आईपीएस अधिकारियों, जज, डाक्टर, प्रोफेसर, आयकर अधिकारी, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटैंट, बिजनेसमैन सभी इन की ठगी का शिकार हो चुके हैं, जबकि इन लोगों को कहा जाता है कि ये अपनी बुद्धि और वाकचातुर्य के बल पर देश को चला रहे हैं.

आम आदमी को तो ये ठग कुछ ही मिनट में बातों में उलझा कर उस का एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर आदि हासिल कर लेते हैं. इन ठगों ने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री, बांका के जिला जज, एयरपोर्ट अथौरिटी के एजीएम सहित तमाम बडे़बडे़ अधिकारियों को ठगा है.

साइबर ठगी में लगे तमाम लड़के उच्च शिक्षा भी हासिल कर सूचना प्रौद्योगिकी में दक्ष हो रहे हैं, ताकि लोगों को उन के हिसाब से हैंडल किया जा सके. जामताड़ा में साइबर क्राइम की शुरुआत एसएमएस से मोबाइल फोन का बैलेंस उड़ा कर दूसरों को सस्ती दरों पर मोबाइल फोन का बैलेंस बेचने से हुई थी. इस के बाद 8-9 सालों में यह जिला पूरे देश में चर्चित हो चुका है.

जामताड़ा इलाके से जब मोबाइल फोन से बहुत ज्यादा फोन किए जाने लगे तो मोबाइल कंपनियों को मोटी कमाई होने लगी. नेटवर्क की समस्या दूर करने के लिए मोबाइल कंपनियों ने वहां नए टौवर लगवा दिए, जिस से वहां नेटवर्क अच्छा हो गया. इस से ठगों का काम और ज्यादा आसान हो गया.

ठगी की रकम से ठग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं. उन के पास आलीशान मकान और लग्जरी गाडि़यां हैं. सड़कें खराब होने से गाडि़यां चलाने में परेशानी हुई तो इन ठगों ने सड़कें भी खुद ही बनवा लीं. अब ये अपराधी खुद को भारतीय रिजर्व बैंक का अधिकारी बता कर ठगी करने लगे हैं. एटीएम रिन्यू करने, उस की वैलिडिटी बढ़ाने एवं आधार कार्ड से जोड़ने के बहाने तो कई सालों से चल रहे हैं.

जामताड़ा इलाके में रोजाना किसी न किसी राज्य की पुलिस साइबर ठगों की तलाश में पहुंचती रहती है. इसलिए अब यहां के ठग थोड़ेथोड़े समय के लिए दूसरे राज्यों में जा कर अपना  ठगी का धंधा करते हैं.

जामताड़ा से पिछले 2 सालों में 268 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए हैं. इन से 16 सौ से ज्यादा मोबाइल फोन, 176 लग्जरी कारें और करोड़ों रुपए बरामद किए गए हैं.  जयपुर पुलिस की ओर से देवघर से गिरफ्तार मिथलेश ने पुलिस को बताया कि वह अपना एसबीआई का बैंक एकाउंट साइबर ठगों को किराए पर देता था. इस के बदले वह खाते में जमा होने वाली रकम से 20 प्रतिशत हिस्सा लेता था.

भले ही अपराधी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन साइबर ठगी बंद होने का नाम नहीं ले रही है. पढ़लिख कर आदमी बुद्धिमान हो जाता है, लेकिन जामताड़ा के अनपढ़ या मामूली शिक्षित अपराधी उन लोगों की आंखों से भी काजल चुरा लेते हैं, जो खुद को सब से ज्यादा समझदार समझते हैं.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित