”काय बोले? डाक्टर साहेब चा मुलगा मिलता नाही है?’’ शकुनबाई ने आश्चर्य से अपनी पड़ोसन से पूछा.
”हां, शकुनबाई. पर तुम तो उन्हीं के घर पर काम करती हो. तुम्हें अभी तक नहीं पता?’’ पड़ोसन भी आश्चर्य से शकुनबाई की तरफ देखते हुए बोली.
”हां पाम, मेरा काम तो 12 बजे ही खतम हो गया था तो मैं मैडम को बोल कर आ गई थी. उस बखत मैडम नहाने को गई थी और बाबा सो गया था. मैं ने बाबा को आधा घंटा पहले ही दालभात खिला दिया था.’’ शकुनबाई ने पड़ोसन को बताया.
”हां, मगर अब तो 4 बज रहे हैं. 2 साल का बच्चा इतनी देर में कहां जा सकता है?’’ पड़ोसन के स्वर में दुख झलक रहा था.
”देवाची शप्पथ बहुत सुंदर और नाजुक बच्चा है. मैं अभी डाक्टर के घर को जाती.’’ शकुनबाई बोली.
डा. ईनामदार अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित डाक्टर थे. वह प्राइवेट प्रैक्टिस ही करते थे. शिशु रोग विशेषज्ञ होने के कारण उन के ज्यादातर पेशेंट बच्चे ही थे.
अब तक आसपास के क्षेत्र में यह बात आग की तरह फैल चुकी थी कि डाक्टर साहब का 2 साल का बच्चा अचानक गायब हो गया है. शकुनबाई जब तक डाक्टर के घर पहुंचती, तब तक पुलिस आ चुकी थी.
”ओ देवा ई काय झाला रे.’’ शकुन घर के अंदर घुसते समय रो रही थी. वह डाक्टर साहब की पत्नी के सीने से चिपक गई. यह काफी स्वाभाविक भी था, क्योंकि बच्चे के जन्म के समय से ही वह उसे संभालती आई है. कई बार तो बच्चा अपनी मां के पास न जा कर शकुनबाई के साथ ही रहता था.
”यह कौन है?’’ पुलिस इंसपेक्टर दिवाकर शर्मा ने डाक्टर से पूछा.
”यह हमारी सर्वेंट है और मेरी शादी के काफी पहले से हमारे यहां ही काम कर रही है.’’ डा. ईनामदार ने बताया.
”आप के घर और कितने सर्वेंट्स हैं?’’ इंसपेक्टर ने अगला प्रश्न किया.
”क्लीनिक पर कंपाउंडर और रिसैप्शनिस्ट सहित कुल 3 और घर पर शकुनबाई के अलावा एक माली है, जो हफ्ते में 2 बार आता है.’’ डाक्टर ने बताया, ”शकुनबाई सुबह 8 बजे आ जाती है और दोपहर को 12 बजे तक अपना काम खत्म कर के चली जाती है. शाम को 5 बजे आ जाती है और 7-8 बजे तक काम कर के चली जाती है.’’
”क्या आज माली आया था?’’ इंसपेक्टर ने फिर पूछा.
”नहीं साहब, माली नहीं आया था.’’ डा. ईनामदार ने जवाब दिया.
”हूं.’’ इंसपेक्टर ने हुंकार भरी, ”तुम्हारा नाम क्या है और तुम्हारे घर में और कौनकौन हैं?’’ इंसपेक्टर शकुनबाई की तरफ मुखातिब हो कर बोला.
”अपन चा नाव शकुनबाई है और मेरा मरद इधरइच एक फैक्ट्री में काम करता है. हमारे 3 बेटे हैं और तीनों ही अभी पढाई करते हैं. बड़ा लड़का अभी 17 बरस का है. वो जब 3 महीने का था, मैं तभी से इधरीच नौकरी कर रही हूं. इस लड़के ने अभी बड़ी परीक्षा पास करी है, कालेज में जाने के वास्ते.’’ शकुन बाई बोल रही थी.
”बड़ी क्लास मतलब?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.
”जी, इस के बेटे का अभीअभी एंट्रेंस एग्जाम के थ्रू इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन हुआ है. यह उसी के एडमिशन की बात कर रही है.’’ डा. ईनामदार ने बताया.
”अच्छा अच्छा. और बाकी के दोनों लड़के क्या करते हैं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.
”मंझला वाला अभी 8 किलास में पढ़ता है और सब से छोटा वाला 5वीं किलास में है.’’ शकुनबाई बोली.
”तुम हनी को कब और कैसे छोड़ कर गई थी?’’ इंसपेक्टर ने फिर पूछा.
पुलिस को शकुनबाई पर क्यों हुआ शक
”मैडम ने हनी बाबा को नहलाने के बाद मुझे दे दिया और कहा कि इसे दालभात खिला दो. मैं ने हनी बाबा को दालभात खिला दिया, उस के बाद बाबा को नींद आने लगी तो मैं ने उसे सुला दिया.
”2 बजे मेरा मरद फैक्टरी से खाना खाने आता है, इसी कारन मई चली गई. उस समय मैडम नहा रही थी.’’ शकुन बाई ने बताया, ”मैं रोज ऐसा ही करती हूं.’’
”तुम्हारा घर कहां है?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.
”ये रोड पार करने के बाद अगली रोड के पास जो चाल है, मैं उधरिच रहती हूं.’’ शकुन बाई ने बताया.
”मैडम की और इस बाई की कभी आपस में कुछ कहासुनी हुई है क्या?’’ इंसपेक्टर ने डाक्टर से पूछा.
”नहीं साहब, इस पर शक करना बेकार है. ये लोग काफी समय से रह रहे हैं यहां. इस के तीनों लड़के भी दोपहर से ही हनी को ढूंढ रहे हैं.’’ डाक्टर ने बताया.
”आप तीनों लड़कों को बुलवा दीजिए.’’ इंसपेक्टर ने कहा.
”साहब ये रहे तीनों लड़के.’’ एक सिपाही तीनों लड़कों को कुछ ही देर में ले कर आ गया.
”क्या नाम है तुम्हारा और तुम्हारे छोटे भाइयों का?’’ इंसपेक्टर ने सब से बड़े लड़के से पूछा.
”जी, मेरा नाम श्याम राव है. यह मंझले वाले का गोपाल राव और सब से छोटे वाले का नाम कृष्णा राव है.’’ लड़के ने जवाब दिया.
”तुम्हारा ही एडमिशन पौलिटेक्निक में हुआ है न?’’ इंसपेक्टर ने श्याम राव से पूछा.
”जी, इंजीनियरिंग में.’’ श्याम राव ने जवाब दिया.
”तुम ने हनी को कहां कहां पर खोजा था?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.
”जी, हम ने सभी संभावित दिशाओं में लगभग एकएक किलोमीटर तक खोजा था.’’ श्याम राव ने जवाब दिया.
”ठीक से याद कर लो, तुम ने हनी को कहांकहां खोजा था, वरना मुझे याद दिलाने के लिए तुम्हारी 2-4 हड्डियाँ तोडऩी पड़ेंगी.’’ अब तक शांत बैठा इंसपेक्टर एकदम गुस्से में आ गया और वह कड़क और रौबीली आवाज में बोला.
”इंसपेक्टर साहब, कृपया मेरे घर में मारपीट न करें. मेरी पत्नी की हालत वैसे ही खराब हो रही है.’’ डाक्टर विनती करते हुए बोला.
”ठीक है डाक्टर साहब, मैं सब से छोटे लड़के से पूछता हूं. अगर सही जवाब नहीं मिला तो मैं इन सब को थाने ले जाऊंगा. वैसे भी इस सस्पेंस कहानी में सिर्फ 3 ही पात्र हैं. इसलिए मुझे लगता है कि मेरा जवाब यहीं पर मिल जाएगा.’’ इंसपेक्टर ने कहा.
”हां, बेटे छोटू, क्या नाम है तुम्हारा?’’
”मेरा नाम कृष्णा राव है साहब.’’ छोटा लड़का बोला.
”तुम्हें तुम्हारी उम्र पता है छोटू?’’ इंसपेक्टर ने नरमी से पूछा.
”है साहब, 9 साल.’’ कृष्णा राव बोला.
”तुम्हारा बड़ा भाई बोल रहा था कि तुम ने हनी बाबा को सभी जगह पर देख लिया है.’’ इंसपेक्टर अपनी नरमी कायम रखते हुए बोला.
”जी साहब, सभी जगह देख लिया है.’’ कृष्णा राव ने जवाब दिया.
”तुम्हारे हिसाब से ऐसी कौन सी जगह है, जहां पर तुम लोगों ने नहीं देखा?’’ इंसपेक्टर ने प्रश्न पूछने का अपना अंदाज बदल कर पूछा. इंसपेक्टर को पूरा भरोसा था कि कृष्णा राव इस ढंग से पूछे प्रश्न के जाल में फंस जाएगा.
”साहब, थिएटर के पीछे जो सेफ्टी टैंक है, उस में किसी ने नहीं देखा.’’ कृष्णा राव सचमुच उस जाल में फंस कर बोला.
”तीनों लड़कों को गाड़ी में बिठाओ और चलो थिएटर.’’ इंसपेक्टर बोला, ”आप भी चलिए, डाक्टर साहब.’’
सेफ्टी टैंक में मिली हनी की लाश
डाक्टर के घर से लगभग 800 मीटर दूर एक चौराहा पार करने के बाद एक थिएटर था. जल्दी सब लोग वहां पर पहुंच गए. वहां पर 3 सेफ्टी टैंक थे. बीच वाले सेफ्टी टैंक के ऊपर की फर्श ताजीताजी हटी हुई लग रही थी. इंसपेक्टर ने तुरंत ही उस के अंदर आदमी उतारे. कुछ ही देर में हनी की लाश उन के हाथों में थी.
”हां, तो श्याम राव, बताओ तुम ने यह काम कैसे और क्यों किया? इतने सालों का विश्वास क्यों तोड़ा?’’ इंसपेक्टर श्याम राव की तरफ मुखातिब हो कर बोला.
”मगर इंसपेक्टर साहब, आप को कैसे मालूम हुआ कि यह काम श्याम राव ने ही किया है.’’ डा. ईनामदार बच्चे की लाश को छाती से चिपकाते हुए रोतेरोते बोले.
”डाक्टर साहब, इस कहानी में जैसा कि मैं ने पहले भी बोला था कि सिर्फ 3 ही किरदार थे आप, आप की पत्नी और शकुनबाई. हम चाहते तो शकुनबाई को उसी समय गिरफ्तार कर लेते. मगर ऐसा करने पर हम असली कातिल और उस के मोटिव तक कभी नहीं पहुंच पाते. फिर दिल को छूने वाली मनोरंजक कहानी सामने नहीं आ पाती. क्योंकि कोई भी मां अपने बच्चों को मुसीबत में डालना नहीं चाहेगी.
”यही कारण था कि हम ने पहले श्याम राव से पूछताछ की तथा मंझले लड़के को छोड़ कर सब से छोटे लड़के से पूछताछ की. अगर हम मंझले लड़के से भी पूछताछ करते तो शायद छोटा लड़का सतर्क हो जाता. और वह भी सीखे सिखाए जवाब ही देता.’’ इंसपेक्टर डाक्टर को समझाता हुआ बोला.
”मुझे कितना विश्वास था शकुनबाई के परिवार पर. वह पिछले 17 सालों से हमारे यहां परिवार के सदस्य की तरह काम कर रही है.’’ डा. ईनामदार के स्वर में नफरत झलक रही थी.
”खैर. हां, तो श्याम राव तू कुछ बोलेगा या इन सिपाहियों को बोलूं यहीं पर सबक सिखाने को?’’ इंसपेक्टर अपने लहजे में बोला.
”साहब, मेरा एडमिशन इंजीनियरिंग कालेज में हुआ है. दाखिले के लिए शुरू में ही 25 हजार रुपए देने थे. इतने पैसे हमारे पास नहीं थे. पिताजी ने अपनी फैक्ट्री में बात की तो उन्होंने 10 हजार रुपए देने की स्वीकृति दे दी थी.
”मां ने डाक्टर साहब से बात की तो डाक्टर साहब ने यह कहते हुए मना कर दिया कि जब इतनी बड़ी फैक्ट्री वाले 10 हजार दे रहे हैं तो वह उसे 15 हजार कैसे दे सकते हैं. वह अधिकतम 5 हजार रुपयों की ही मदद कर सकते हैं.
”रुपयों के कारण मेरे भविष्य का सपना चौपट हो जाता. इसी कारण मैं ने मां के साथ मिल कर यह प्लान बनाया. इस प्लान के बारे में मेरे पिताजी तक को मालूम नहीं था.
”मेरे दोनों भाइयों को इस योजना में शामिल करना बहुत जरूरी था, क्योंकि हनी इन दोनों के साथ हंसता खेलता था. मां ने मुझे बता दिया था कि मैडम 11-साढ़े 11 बजे तक नहाती है. इस के बाद आधे घंटे तक पूजा करती है.
”इसी दौरान मां हनी को खाना खिला कर सुला देती है और वापस घर आ जाती है. हनी रोजाना करीब 3 से 4 घंटे सोता था. इन्हीं 4 घंटों में हम अपनी योजना पूरी कर सकते थे.’’ श्याम राव बता रहा था.
क्यों की गई हनी की हत्या
”यहां तक तो ठीक है. तुम्हारी योजना हनी के अपहरण करने की थी, मगर यह हत्या तो तुम्हारी योजना का हिस्सा नहीं रही होगी?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.
”हां साहब, हत्या की बात तो हमारी योजना में शामिल नहीं थी, लेकिन मैं ने अब तक आप को जो बताया, वह योजना का एक हिस्सा ही था. दूसरे हिस्से में इस में एक व्यक्ति और शामिल था. उस का नाम है सरस खान.’’
”सरस खान? कौन है यह सरस खान?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.
”थिएटर का प्रोजेक्टर औपरेटर.’’ श्याम राव ने बताया, ”वह मेरा मित्र है और उस की ड्यूटी रात के 12 बजे तक रहती है. उसे भी बाजार का कुछ पैसा चुकाना था. इसी कारण उस ने यह आइडिया दिया था. दोपहर 12 बजे का शो चालू होने के बाद वहां रखना भी बहुत आसान था.
”मैडम से इतना तो पता चल ही गया था कि हनी बाबा पिक्चर बहुत शांत हो कर देखता है. योजना के अनुसार सोते हुए हनी बाबा को ले कर प्रोजेक्टर रूम में जाना था. वहां पर गोपाल राव और कृष्णा राव रहते थे, जो उसे बहलाते रहते.
”इस बीच मैं घर आ कर मां के हाथों से बाबा के अपहरण की एक चिट्टी डाक्टर साहब के पास पहुंचा देता. हम सिर्फ 17 हजार रुपयों की ही मांग करते.
”इतनी कम मांग के लिए डाक्टर साहब पुलिस में नहीं जाते और हमारा काम भी बिना किसी शक के हो जाता. यह पैसा उन्हें कृष्णा राव के हाथ शाम 6 बजे का शो खत्म होने के बाद पहुंचाना था. शो खत्म हो जाने की भीड़ में यह सब काम आसानी से पूरा हो जाता. इन 17 हजार में से 15 हजार मुझे और 2 हजार सरस खान को रखने थे.’’ श्याम राव ने बताया.
”अभी भी यह नहीं बताया कि हत्या क्यों और कैसे की.’’ इंसपेक्टर ने बोला.
थिएटर तक क्यों नहीं पहुंचा हनी
”रोजाना जब मां डाक्टर साहब के घर का काम खत्म कर के निकलती थी, उस समय अमूमन मैडम या तो नहा रही होती थी या पूजा कर रही होती थी. ऐसे में मां बाहरी दरवाजे को सिर्फ अटका कर निकल जाती थी.
”उस दिन मैं घर के आसपास ही था. मां ने बाहर निकलते समय मुझे इशारा कर दिया था. मैं तुरंत ही हनी बाबा के कमरे में घुस कर पलंग के पीछे छिप गया.
”मैडम नहा कर निकली और हनी बाबा के कमरे में आई. हनी बाबा को सोता देख निश्चिंत हो कर पूजा करने चली गई. अब हम पर शक करने की संभावना भी समाप्त हो गई थी.
”मौका देख कर मैं सोते हुए हनी बाबा को ले कर घर से बाहर आ गया. हमारे प्लान का सब से खास हिस्सा पूरा हो चुका था. योजना के अगले हिस्से के तहत मुझे सोते हुए हनी बाबा को ले कर थिएटर के प्रोजेक्टर रूम में जाना था.
”मगर थिएटर के पिछवाड़े में पहुंचते ही या तो तेज धूप के कारण या पैदल चलने के कारण लग रहे झटकों से हनी बाबा जाग गया और वह मचल कर जोरजोर से रोने लगा. ऐसी अवस्था में उसे प्रोजेक्टर रूम में ले जाने पर थिएटर के मैनेजर और गेटकीपर जैसे लोगों को पता चल जाता.
”इसी कारण हम उसे वहीं पर सेफ्टी टैंक के ऊपर बैठ कर चुप कराने लगे, मगर वह लगातार रोए ही जा रहा था. तब तक गोपाल राव और कृष्णा राव भी वहां पर आ गए. थिएटर का पीछे वाला इलाका सुनसान ही रहता है.
”हनी बाबा के इस तरह जोरजोर से रोने के कारण हम तीनों घबरा गए. उसे डराने के मकसद से कृष्णा राव ने फर्शी का एक बड़ा सा टुकड़ा उठा लिया. मगर हनी बाबा चुप ही नहीं हो रहा था.
”तब गुस्से में आ कर कृष्णा राव ने उस पर फर्शी के उस टुकड़े से वार कर दिया. यह वार हनी बाबा की कनपटी पर लगा. कुछ देर तड़पने के बाद वह शांत हो गया. शायद वह बेहोश हो गया था.
”यह देख कर हम तीनों घबरा गए और सेफ्टी टैंक के कवर वाली फर्शी हटा कर उसे उस में फेंक दिया. इस के बाद टैंक को फिर से ढंक दिया.’’ श्याम राव ने विस्तार से पूरी घटना बता दी.
यह कहानी सुनने के बाद इंसपेक्टर दिवाकर शर्मा ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.
पापा की मौत के साल भर बाद मम्मी ने खुद को काफी हद तक संभाल लिया था, लेकिन शालू पिता की मौत के सदमे से नहीं उबर सकी थी. मम्मी खुद को इसलिए संभालने में सफल हो गई थीं, क्योंकि पापा की तेरहवीं की रस्म के पूरा होते ही उन्हें अपनी नौकरी पर जाना पड़ा था.
जिम्मेदारी का बोझ, काम की व्यस्तता और जिंदगी की भागदौड़ ही मम्मी को गम से उबारने में सहायक साबित हुई थी. लेकिन पिता की असमय और अचानक मौत की वजह से अंदर ही अंदर बुरी तरह टूट गई शालू के हालात अलग थे.
मम्मी के काम पर जाने के बाद घर में अकेले पड़े पड़े शालू को पापा की याद बहुत सताती थी, जिस की वजह से वह रोती रहती थी. मम्मी को मालूम था कि उस की गैरमौजूदगी में शालू रोती रहती है. उस की लाललाल आंखें देख कर मम्मी को सब पता चल जाता था.
मम्मी शालू को समझाने की कोशिश करती थीं कि रोने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. हमें सब कुछ भुला कर ही जीने की आदत डालनी होगी. सबकुछ भुलाने का बेहतर तरीका यही है कि तुम भी मेरी तरह खुद को बिजी कर लो. आगे पढ़ने का इरादा हो तो ठीक है, वरना कोई नौकरी कर लो.
मम्मी की बात शालू को ठीक लगती थी. पापा जिंदा रहते तो शालू जरूर आगे की महंगी उच्च शिक्षा के बारे में सोचती. लेकिन वह जानती थी कि मम्मी अपनी नौकरी से इतना खर्च नहीं उठा पाएंगी. वह चूंकि मम्मी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, इसलिए उस ने नौकरी करने का फैसला कर लिया. नौकरी के लिए मन बन गया तो उस ने अखबार में नौकरी वाले कालम देखने शुरू कर दिए.
मम्मी ने खुद को बेशक संभाल लिया था और अपने दर्द को जाहिर नहीं करती थीं, मगर शालू उन के दर्द को अभी भी महसूस कर रही थी. रात को कई बार अचानक शालू की नींद खुल जाती तो वह अपने साथ सोई मम्मी को जागते हुए पाती. आधी रात को बिस्तर पर बैठी वह पता नहीं क्या सोचती रहती थीं. पूछने पर वह कुछ बताती भी नहीं थी.
वैसे भी मम्मी अभी देखने में ज्यादा उम्र की नहीं लगती थीं. बराबर में खड़ी होतीं तो वह शालू की मां कम और बड़ी बहन अधिक लगती थीं. यह बात पापा भी मानते थे. शालू को याद आया कि वह संडे की छुट्टी का दिन था. वह मम्मी के साथ नाश्ते की टेबल पर बैठी पापा का इंतजार कर रही थी.
पापा तैयार हो कर जब नाश्ते की टेबल पर आए तो काफी अच्छे मूड में थे. मांबेटी को साथ बैठे देख वह बरबस कह उठे थे, ‘‘मेरी नजर न लगे, सच कहता हूं तुम दोनों मांबेटी कम, बहनें ज्यादा लगती हो.’’
पापा की बात पर मम्मी तो केवल हलके से मुसकरा कर रह गई थीं, लेकिन मम्मी के गले में प्यार से बांहें डाल कर शालू ने कहा था, ‘‘मेरी मम्मी दुनिया की बेस्ट मम्मी हैं पापा. आई एम श्योर, यह देख कर लोग मुझ से जरूर जलते होंगे. सच बोलूं पापा, मम्मी मेरी मम्मी नहीं, सहेली हैं.’’
इस के एक महीने बाद ही हार्टअटैक आने से पापा की मौत हो गई थी.
पापा की मौत के बाद मम्मी कुम्हला सी गई थीं. यह स्वाभाविक ही था. लेकिन जौब में होने और खानपान में सतर्कता बरतने की वजह से उन के शरीर पर कोई खास असर नहीं पड़ा था.
बड़ी बहन जैसी मम्मी के साथ चलते हुए शालू को अकसर गर्व महसूस होता था. कभीकभी शालू इस खयाल से बहुत बेचैन हो जाती कि शादी कर के जब वह घर से विदा हो जाएगी तो अकेली मम्मी क्या करेंगी? इस खयाल से शालू के अंदर द्वंद वाली स्थिति बन जाती और वह कमजोर पड़ने लगती.
शालू चाहती थी कि मम्मी को जीवन के लंबे सफर में कोई हमसफर मिल जाए, लेकिन उस के सामने यह सवाल खड़ा हो जाता कि क्या वह अपने पापा की जगह किसी दूसरे इंसान को देख सकेगी? आखिर में यह सवाल एक ऐसा चक्रव्यूह बन जाता, जिस में फंसी शालू निकल नहीं पाती थी.
कई बार शालू को लगता कि मम्मी के अंदर किसी बात को ले कर कशमकश चल रही है. वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन कहते कहते रुक जाती थीं. उन के सहेलियों जैसे संबंध इस मामले में मांबेटी के संबंधों में बदल जाते थे.
एक दिन काम से लौट कर मम्मी ने शालू से कहा कि उन्होंने उस के लिए एक नौकरी ढूंढ ली है और उसे कल ही नौकरी जौइन करनी है.
उन्होंने कहा, ‘‘अच्छी कंपनी है. कंपनी का मैनेजर किसी समय मेरी कंपनी में मेरे साथ ही काम करता था. सैलरी भी अच्छी मिलेगी और आगे चल कर तरक्की की भी गुंजाइश है.’’
अगले ही दिन शालू ने मम्मी द्वारा ढूंढी गई नौकरी जौइन कर ली. मम्मी खुद शालू को साथ ले कर वहां गई थीं. इलैक्ट्रिक आयरन, गीजर और हीटर बनाने वाली ग्लोब नाम की उस कंपनी का दफ्तर ज्यादा बड़ा तो नहीं था, लेकिन था शानदार.
मम्मी ने कंपनी के जिस जानकार मैनेजर का जिक्र किया था, उस की उम्र 50-55 के आसपास थी. वह आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व का मालिक था. स्वभाव से भी खुशमिजाज और मिलनसार लगता था. नाम था शीतल साहनी.
शीतल साहनी चूंकि कभी मम्मी के साथ उन्हीं की कंपनी में काम कर चुका था, इसलिए वह मम्मी के साथ बड़े दोस्ताना और खुले अंदाज में पेश आया.
मम्मी को शालू को साथ ले कर आने की वजह शीतल साहनी को मालूम थी. शायद सब कुछ पहले से ही तय था, इसलिए नौकरी के लिए पूछे जाने वाले सवालों का सामना शालू को नहीं करना पड़ा. शालू से उसी वक्त नौकरी संबंधी एप्लीकेशन ले ली गई और कुछ ही देर में उस का अप्वाइंटमेंट लैटर उस के हाथ में थमा दिया गया.
अप्वाइंटमेंट लैटर शालू के हाथ में देते हुए शीतल साहनी ने कहा, ‘‘तुम इसी समय से अपनी नौकरी जौइन कर रही हो, मेरी सेके्रट्री तुम्हें तुम्हारे बैठने की जगह बता कर काम समझा देगी. मन लगा कर काम करना.’’
‘‘थैंक्यू सर.’’
‘‘थैंक्यू मेरा नहीं, अपनी मम्मी का करो.’’ शीतल साहनी ने मम्मी की तरफ देखते हुए कहा.
जवाब भी मम्मी ने ही दिया, ‘‘थैंक्स, थैंक्यू सो मच साहनी, शालू को ले कर मैं बहुत परेशान थी. तुम ने मेरी बहुत बड़ी चिंता दूर कर दी.’’
‘‘अगर ऐसा है तो हमें इस खुशी को चाय के साथ सेलीबे्रट करना चाहिए.’’ शीतल साहनी ने इंटरकौम का रिसीवर उठाते हुए कहा.
मम्मी ने भी मुसकराकर अपनी सहमति दे दी. इंटरकौम पर 3 कप चाय के लिए कहने के बाद शीतल साहनी ने हलकीफुलकी बातचीत शुरू कर दी. थोड़ी देर में चाय आ गई. मम्मी चाय पी कर चली गईं.
शालू का पहला दिन अपना काम समझने में ही बीत गया. बीचबीच में 2-3 बार शीतल साहनी ने संदेश भेज कर उसे अपने कमरे में बुलाया और उस से पूछा कि उसे अपना काम समझने में कोई मुश्किल तो पेश नहीं आ रही है.
शालू ने पूरी शालीनता से इनकार कर दिया. बेशक शीतल साहनी यह सब उस के प्रति अपनापन दिखाने के लिए कर रहा था. लेकिन शालू को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था.
नौकरी दे कर शीतल साहनी ने एक तरह से एहसान किया था, लेकिन शालू को यह बिलकुल पसंद नहीं था कि अपने एहसान के बदले वह उस से अधिक आत्मीयता दर्शाने की कोशिश करे.
शालू की नजरों में शीतल साहनी ने उस पर नहीं, मम्मी पर एहसान किया था. पहले दिन की नौकरी के बाद शालू घर लौटी तो काफी खुश दिख रही मम्मी ने एक के बाद एक उस पर सवालों की बौछार सी कर दी.
वह जानना चाहती थीं कि नौकरी पर उस का पहला दिन कैसा बीता? उसे अपना काम पसंद आया कि नहीं?
अपने सवालों में मम्मी ने शालू से शीतल साहनी के बारे में भी काफी कुरेदकुरेद कर पूछा, जो शालू को ज्यादा अच्छा नहीं लगा. ऐसा लग रहा था, जैसे वह शीतल साहनी के प्रति शालू के विचारों को जानना चाहती हों.
लेकिन शालू ने शीतल साहनी को ले कर अपने निजी विचार व्यक्त करने के बजाय मम्मी से सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘मुझे नौकरी दे कर उन्होंने हम पर जो एहसान किया है, उस के एवज में उन्हें एक अच्छा इंसान ही कहा जा सकता है.’’
शालू के इस जवाब से मम्मी संतुष्ट और खुश नजर नहीं आईं. वह शायद नौकरी के अलावा शीतल साहनी के बारे में कुछ और सुनने की उम्मीद कर रही थीं.
पता नहीं क्यों शालू को पापा के अलावा किसी दूसरे मर्द की तारीफ मम्मी की जुबान से कतई अच्छी नहीं लग रही थी. शालू को ऐसा लग रहा था, जैसे कोई उस के और मम्मी के बीच में आने की कोशिश कर रहा है. यह शालू को बरदाश्त नहीं था.
शालू ने नौकरी कर के मानो एक अप्रत्याशित तनाव मोल ले लिया था. एक ऐसा तनाव, जिस की साफ वजह भी उसे मालूम नहीं थी.
शालू काम पर जाती तो उसे लगता कि उस का बौस शीतल साहनी न केवल उस के प्रति नरमी बरतता है, बल्कि उसे दूसरे लोगों से ज्यादा महत्त्व देता है. शालू को यह बात चुभती थी.
वह जानती थी कि यह सब मम्मी की वजह से हो रहा है. शालू खुद को उस समय सब से अधिक असहज महसूस करती, जब शीतल साहनी उस की मम्मी के बारे में मम्मी का नाम ले कर पूछता.
शालू की मम्मी का नाम सोनिया था. पापा अक्सर मम्मी को सोनिया कह कर ही बुलाते थे. लेकिन शीतल साहनी का मम्मी को उन के नाम से बुलाना शालू को एकदम अच्छा नहीं लगता था.
दूसरी ओर मम्मी भी शीतल साहनी के बारे में कुछ ज्यादा ही बातें करने लगी थीं. कभीकभी तो वह शालू से मिलने के बहाने उस के दफ्तर में आ जातीं और काफी देर तक शीतल के कमरे में बैठी रहतीं. मम्मी का ऐसा करना शालू को बहुत अखरता था.
शालू देख रही थी कि इधर कुछ दिनों में मम्मी में काफी बदलाव आ रहा है. पापा की मौत के बाद एकदम बुझ सी गईं मम्मी में जैसे एक बार फिर से जीने की उमंग भर गई थी.
शालू सोचती थी कि कहीं मम्मी में आए इस बदलाव का मतलब यह तो नहीं कि वह पापा की जगह किसी दूसरे मर्द को देने का मन बना रही थीं? यह दूसरा मर्द शीतल साहनी ही हो सकता था. शालू को ऐसा लगने लगा था, जैसे जिस मम्मी को वह अपनी सहेली मानती रही थी, वह अजनबी बन कर अचानक उस से दूर हो रही थीं. करीब होते हुए भी कोई अदृष्य सी दीवार उन के बीच खड़ी हो रही थी.
यह खयाल शालू के लिए बड़ा ही तकलीफदेह था कि इतना बड़ा फैसला मम्मी ने उस से कोई बात किए बगैर अकेले ही कर लिया था.
यही सोच कर शालू का मन महीना भर पुरानी नौकरी से उचाट होने लगा. वह किसी भी तरह शीतल साहनी का सामना करने से बचना चाहती थी, जबकि नौकरी में रहते हुए ऐसा मुमकिन नहीं था. शीतल साहनी अचानक ही शालू को अपनी जिंदगी का खलनायक नजर आने लगा था.
काफी कशमकश के बाद एक दिन शालू ने मम्मी से नौकरी छोड़ने की बात कह दी. उस की बात सुन कर मम्मी का चौंकना स्वाभाविक ही था.
‘‘मगर क्यों?’’ मम्मी ने पूछा.
‘‘मैं इस सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझती.’’
शालू का बेरुखा जवाब सुन कर मम्मी आहत नजर आईं. उन की आंखों में दर्द भी तैरता साफ नजर आया.
‘‘इस जवाब से मैं यह समझूं कि मेरी बेटी मुझ से अपने दिल की बात करने वाली मेरी सहेली नहीं रही?’’ मम्मी ने कहा तो शालू तुनक कर बोली, ‘‘यह सवाल मैं तुम से भी पूछ सकती हूं मम्मी, तुम में भी अब पहले वाली सहेलियों जैसी बात कहां रही है.’’
‘‘ऐसा लगता है जैसे तुम मुझे ताना मार रही हो.’’ मम्मी ने शालू की आंखों में झांकने की कोशिश करते हुए कहा.
‘‘मैं सिर्फ बात कह रही हूं मम्मी, अब तुम इसे ताना समझो तो यह अलग बात है. और हां, अगर अपनी जिंदगी के बारे में तुम ने अकेले ही कोई फैसला कर लिया है तो मैं उस फैसले में रुकावट नहीं बनूंगी. पर इतना जरूर साफ कर देना चाहती हूं कि मैं पापा की जगह तुम्हारी किसी पसंद को स्वीकार नहीं करूंगी.’’
शालू अपनी बात कह कर मम्मी को ड्राइंगरूम में छोड़ कर बाहर आ गई. उस वक्त उस की आंखों में आंसू थे. वह जानती थी कि उस के कठोर शब्दों से मम्मी को कितनी चोट पहुंची होगी.
आवेग कम हुआ तो शालू ने महसूस किया कि वह मम्मी को कुछ ज्यादा ही कह गई है. अपनी कही बातों पर उसे पश्चाताप होने लगा. रात को खाने की टेबल पर शालू ने देखा कि मम्मी की आंखें लाल थीं. लगता था, वह बहुत रोई थीं.
यह देख कर शालू के मन में अपराधबोध की टीस उठी. वह मम्मी के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले कर बोली, ‘‘आई एम सौरी मम्मी, मैं ने तुम से जो कहा है, वह मुझे नहीं कहना चाहिए था.’’
‘‘मुझे तुम से कोई गिला नहीं है शालू. मैं जानती हूं, तुम अपने पापा से कितना प्यार करती थी. मैं भी तुम्हारे पापा को बेहद चाहती थी. वह नहीं रहे. तुम अपनी जगह ठीक हो. जिंदगी के बारे में तुम ने एक बेटी के रूप में सोचा है. मैं ने भी तुम्हारे पापा की मौत के बाद सारी जिंदगी को सिर्फ एक मां के नजरिए से ही देखा था.
‘‘मेरे अंदर की औरत एक मां के फर्ज में कहीं गुम हो गई थी. आज तुम मेरे साथ हो, लेकिन जिस दिन तुम इस घर से चली जाओगी, मैं सिर्फ एक औरत रह जाऊंगी, सिर्फ औरत, जिसे समाज में जीने के लिए किसी सहारे की जरूरत होगी.
‘‘अगर जिंदगी के इस मोड़ पर आ कर मैं ने किसी दूसरे मर्द के बारे में सोचा है तो क्या कोई गुनाह किया है? क्या मुझे अपने आने वाले कल के लिए सोचने का भी हक नहीं है? तुम ने सिर्फ बेटी बन कर ही सोचा, मम्मी की सहेली बन कर नहीं.’’
उदासी में डूबी मम्मी की आवाज में एक शिकायत, एक गिला थी.
कुछ कहने के लिए शालू के पास जैसे शब्द ही नहीं रहे थे. जो बात मम्मी कभी कहते कहते रुक जाया करती थीं, आज वही बात उन्होंने बड़ी साफगोई से कह दी थी. मम्मी ने जो भी कहा था, सच ही कहा था. शालू ने उन्हें सहेली कहा जरूर था, मगर सहेली की तरह उन की भावनाओं को समझ नहीं सकी थी.
शालू को खामोश देख कर मम्मी ने सामने रखे मोबाइल फोन को उठाते हुए कहा, ‘‘मैं साहनी को फोन कर के बोल देती हूं कि तुम कल से नौकरी पर नहीं आ रही हो.’’
लेकिन वह मोबाइल का स्विच औन करतीं, उस के पहले ही शालू ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मैं कल नौकरी पर जा रही हूं. तुम सही सोच रही हो, शीतल साहनी वाकई एक अच्छे इंसान हैं. अगर वह मेरे साथ पापा की तरह पेश आ सकते हैं तो मैं भी उन्हें पापा की जगह स्वीकार करने को तैयार हूं.’’
शालू का इतना कहना था कि मम्मी की आंखें छलक पड़ीं और एकाएक वह फफक कर रोते हुए बेटी से लिपट गईं.
मुंबई के उपनगर मुलुंड (पूर्व) के नवघर पुलिस थाने के इंसपेक्टर संपत मुंडे थाने के चार्जरूम में तैनात सबइंसपेक्टर मांजरे के पास बैठे किसी पुराने मामले पर विचारविमर्श कर रहे थे, तभी मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) के एक अधिकारी अपने कुछ कर्मचारियों के साथ थाने आ कर उन से मिले.
उन्होंने बताया कि ईस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे के किनारे बने बीएमसी के डंपिंग ग्राउंड में प्लास्टिक की सफेद रंग की एक बड़ी सी थैली मिली है, जिस में से किसी औरत के लंबे बाल बाहर निकले हुए हैं. लगता है, थैली में किसी महिला की लाश है.
बीएमसी कर्मचारियों की बात को संपत मुंडे ने बड़ी गंभीरता से लिया. उन्होंने सब इंसपेक्टर मांजरे को इस मामले की प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कहा और यह बात अपने सीनियर इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़ व उच्च अधिकारियों को बताने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी सूचना दे दी. इस के बाद वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. यह 14 सितंबर, 2014 की शाम 7-8 बजे के बीच की बात थी.
घटनास्थल पुलिस थाने से अधिक दूर नहीं था, इसलिए पुलिस टीम को वहां पहुंचने में मुश्किल से 10-15 मिनट लगे. पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंची तो वहां बीएमसी के कुछ कर्मचारी और बेगारी मजदूर मौजूद थे. फौरी तौर पर घटनास्थल का निरीक्षण कर के पुलिस टीम उस थैले को डंपिंग ग्राउंड से बाहर निकलवा कर लाई. थैले का मुंह खोला गया तो उस के अंदर का दृश्य देख कर पुलिस दल के साथसाथ बीएमसी कर्मचारियों का भी मुंह खुला रह गया.
उस छोटे से थैले में एक महिला के शव को 2 चादरों के बीच लपेट कर ठूंस कर भरा गया था. महिला की उम्र 25-26 साल के आसपास थी. उस के शरीर पर पेटीकोट और ब्लाउज के अलावा कोई कपड़ा नहीं था.
महिला का शव थैली से बाहर निकलवाने के बाद संपत मुंडे ने उस की लाश का निरीक्षण किया. उन्होंने और सबइंसपेक्टर मांजरे ने मृतका की शिनाख्त के लिए वहां मौजूद बीएमसी कर्मचारियों और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान पाया.
इस का मतलब वह मृतका उस इलाके की रहने वाली नहीं थी. परेशानी की बात यह थी कि लाश के कपड़ों और प्लास्टिक की थैली में ऐसी कोई चीज भी नहीं मिली, जिस के सहारे उस के बारे में पता लगाया जा सकता.
इस घटना की सूचना पा कर मुंबई के एडिशनल सीपी डा. विनय कुमार राठौर, एसीपी मारुति अह्वाड़, नवघर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़, इंसपेक्टर सुनील काले, प्रेस फोटोग्राफर और फ्रिगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.
साथ ही क्राइम ब्रांच सीआईडी भी हरकत में आ गई थी. क्राइम ब्रांच सीआईडी प्रमुख सदानंद दाते, अपर पुलिस कमिश्नर के. प्रसन्ना, डीसीपी मोहन कुमार दहिकर, एसीपी प्रफुल्ल भोसले ने विचारविमर्श के बाद इस मामले की तफ्तीश की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर शंकर पाटिल को सौंप दी.
घटनास्थल पर आए प्रेस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का काम खत्म हो जाने के बाद इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़ ने सारी औपचारिकताएं पूरी कर के मृतका की लाश पोस्टमार्टम के लिए मुलुंड के शताब्दी अस्पताल भेज दी.
पुलिस की परेशानी यह थी कि बीएमसी के जिस डंपिंग ग्राउंड में महिला की लाश मिली थी, वह बहुत बड़ा था और वहां मुंबई के कई क्षेत्रों का हजारों टन कूड़ा फेंका जाता था. यह तो तय था कि मृतका की लाश कूड़े के साथ वहां तक पहुंची थी, लेकिन लाश किस क्षेत्र से आई थी, यह पता लगाना आसान नहीं था.
बहरहाल, तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए नवघर पुलिस थाने के इंसपेक्टर सुनील काले और इंसपेक्टर संपत मुंडे मृतका की शिनाख्त के लिए जीजान से जुट गए. इस के लिए उन्होंने उस के हुलिए सहित सारी जानकारी मुंबई के सभी थानों को भेज दी. अखबारों का भी सहारा लिया गया, इस के साथ कुछ मुखबिरों को भी लगाया गया.
इंसपेक्टर मुंडे को उम्मीद थी कि कहीं से कोई न कोई जानकारी जरूर मिल जाएगी, लेकिन उन का यह प्रयास सफल नहीं रहा. दूसरी तरफ क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल और उन के सहायकों का भी यही हाल था. मामले में जैसेजैसे देरी हो रही थी, वैसेवैसे उन की परेशानी बढ़ती जा रही थी.
आखिर निराश हो कर सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल ने अपनी तफ्तीश की दिशा बदल दी. उन्होंने अपने सहायकों के साथ एक बार फिर घटनास्थल का दौरा किया. बीएमसी कर्मचारियों से पूछताछ कर के उन्होंने वहां कूड़ा ले कर आने वाली गाडि़यों की एंट्री डायरी चेक की तो पता चला कि उस दिन 2575 नंबर की गाड़ी कचरा लेकर काफी देर से डंपिंग ग्राउंड में आई थी.
उस गाड़ी के जाने के बाद ही बीएमसी कर्मचारियों को वह थैला नजर आया था, जिस में लाश थी. वह गाड़ी उस दिन किसकिस इलाके का कचरा उठा कर लाई थी, जब इस की जांच की गई तो मालूम पड़ा कि उस दिन वह गाड़ी सायन, धारावी और माहिम इलाके का कचरा ले कर आई थी.
इस का मतलब था कि उस महिला का शव इन्हीं में से किसी क्षेत्र से आया था. इस से जांच अधिकारियों को तफ्तीश का रास्ता तो मिल गया था, लेकिन मंजिल अभी भी दूर थी. माहिम-सायन और धारावी का इलाका इतना छोटा नहीं था कि आसानी से मृतका का सुराग मिल जाता. लेकिन क्राइम ब्रांच के जांच अधिकारी इस से निराश नहीं हुए, बल्कि दोगुने उत्साह से तफ्तीश में जुट गए.
पुलिस टीम मृतका का फोटो ले कर माहिम, सायन और धारावी क्षेत्र में आने वाले शाहूनगर पुलिस थाने से ले कर धारावी काला किला, पीला बंगला, केमकर चौक, नेताजी नगर, लक्ष्मीबाग, नाइक नगर जैसी बस्तियों में छानबीन में जुट गई.
इसी छानबीन के दौरान नवरात्र मंडल के एक कार्यकर्ता ने मृतका का फोटो देख कर असिस्टेंट इंसपेक्टर अनिल ढोले को बताया कि मृतका अपने पति के साथ राजीव गांधी नगर में रहती थी. लेकिन वह पिछले कई दिनों से लापता है. उस कार्यकर्ता के साथ अनिल ढोले जब राजीव गांधी नगर गए तो उन्हें पता चला कि मृतका का नाम रेखा गौतम था. लेकिन उस के घर के बाहर ताला लगा हुआ था.
पड़ोसियों ने बताया कि रेखा के पति का नाम संजय गौतम है. घटना वाले दिन रेखा अपने पति के साथ विरार स्थित जीवदानी माता का दर्शन करने गई थी. लेकिन रास्ते में वह अपने पति से बिछुड़ गई थी. उस के पति ने उसे बहुत खोजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली. संजय के बारे में पूछताछ करने पर उस के एक पड़ोसी ने बताया कि वह अपने रिश्तेदार के घर चला गया है.
जांच अधिकारी ने यह जानकारी सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटिल को दे दी. पाटिल के निर्देशन में इंसपेक्टर संजय सुर्वे और असिस्टेंट इंसपेक्टर अनिल ढोले ने पुलिस टीम के साथ संजय के उस रिश्तेदार के घर छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के लिए संजय को सीआईडी औफिस लाया गया.
पूछताछ में संजय कुमार गौतम ने खुद को बेगुनाह बताया. उस के अनुसार जिस दिन वह अपनी पत्नी रेखा को जीवदानी देवी के मंदिर ले कर निकला था, उस दिन लोकल ट्रेन में बहुत भीड़ थी. भीड़ की वजह से वह रेखा को महिला डिब्बे में चढ़ने के लिए कह कर खुद जेंट्स कंपार्टमेंट में चढ़ गया था.
विरार रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर जब वह रेखा के डिब्बे के पास गया तो वह वहां नहीं थी. उसे रेलवे प्लेटफार्म पर तलाश करने के बाद थकहार कर वह विरार पुलिस थाने पहुंचा, ताकि पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा सके. लेकिन वहां के अधिकारियों ने उसे यह कह कर वापस लौटा दिया कि वह बांद्रा रेलवे स्टेशन पुलिस में जा कर अपनी शिकायत दर्ज करवाए.
जब वह बांद्रा रेलवे स्टेशन पुलिस के पास गया तो वहां के पुलिस वालों ने यह कह कर मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया कि वह पहले अपने नातेरिश्तेदारों के यहां पता करे.
संजय गौतम ने अपनी पत्नी रेखा के गायब होने के बारे में जो कुछ बताया था, वह इंसपेक्टर संजय सुर्वे के गले नहीं उतरा. उस के चेहरे के हावभावों को देख कर उन्हें दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. उन्होंने जब संजय गौतम के साथ थोड़ी सी सख्ती बरती तो उन्हें पूरी की पूरी दाल ही काली नजर आई. संजय गौतम पुलिस के सवालों के सामने टूट गया. उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया. पूछताछ के दौरान संजय गौतम ने अपनी पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी.
28 वर्षीय संजय गौतम उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के गांव लालगंज का रहने वाला था. उस के पिता रघुनाथ प्रसाद गौतम गांव में टेलरिंग का काम करते थे. उन के व्यवहार की वजह से गांव में उन की काफी इज्जत और प्रतिष्ठा थी. वह सीधेसरल स्वभाव के व्यक्ति थे. संजय गौतम उन का एकलौता बेटा था. वह बीए पास था. इस के साथ ही वह टेलरिंग का काम भी जानता था और इस काम में पिता की मदद किया करता था.
रघुनाथ प्रसाद गौतम ने 3 फरवरी, 2014 को संजय की शादी पड़ोस के गांव की रेखा से कर दी. वह सुंदर सुशील लड़की थी. शादी के बाद रेखा ससुराल आ गई. संजय की तरह रेखा भी बीए पास थी. पतिपत्नी दोनों ही पढ़ेलिखे थे और महत्त्वाकांक्षी भी. इसलिए चाहते थे कि कहीं बाहर जा कर किसी बड़े शहर में रहें, जहां खूब पैसा कमा सकें. वैसे भी गांव में रह कर तो बस गुजरबसर ही हो सकता था.
शादी के कुछ दिनों बाद रेखा ने संजय को समझाया कि वह टेलरिंग का अच्छा कारीगर है. गांव में रह कर वह अपना टैलेंट बरबाद कर रहा है. अगर वह शहर में रह कर यही काम करे तो अच्छी आय हो सकती है. यह उन दोनों के भविष्य के लिए भी ठीक रहेगा और घरपरिवार के लिए भी. संजय को रेखा की यह बात ठीक लगी और वह इस बारे में गंभीरता से सोचने लगा.
सोचनेविचारने के बाद संजय जुलाई, 2014 में अपनी पत्नी रेखा को ले कर मुंबई आ गया. मुंबई के धारावी इलाके में संजय के गांव के कई लोग रहते थे, जिन की मदद से वह राजीव गांधी नगर की विश्वकर्मा चाल में किराए का एक कमरा ले कर पत्नी के साथ रहने लगा. उसी इलाके की एक टेलरिंग शौप में उसे नौकरी भी मिल गई.
मुंबई आने के बाद पतिपत्नी दोनों ही बहुत खुश थे. रेखा अपनी गृहस्थी संवारने में लगी थी. लेकिन इस दंपति की खुशी उस समय कलह में बदल गई जब एक दिन रेखा ने संजय गौतम को जलाने के लिए मजाक में कह दिया कि कालेज की पढ़ाई के दौरान उस का एक बौयफ्रैंड था, जिसे वह बहुत प्यार करती थी और उस से शादी करना चाहती थी.
यह मजाक रेखा को बहुत महंगा पड़ा. उस के इस मजाक ने संजय के दिमाग में संदेह का बीज बो दिया. धीरेधीरे इस बीज ने अंकुरित हो कर वृक्ष का रूप ले लिया.
उन दोनों के प्यार के बीच दरार पड़नी शुरू हो गई. संजय गौतम की दिनचर्या बदल गई. जहां वह रेखा पर प्यार के फूल बरसाता था, वहीं अब कांटा बन कर चुभने लगा था. बातबात में रेखा की उपेक्षा और उस से मारपीट करना उस के लिए आम बात हो गई थी. रेखा ने अपनी बात को मजाक बता कर उस से कई बार माफी भी मांगी, सफाई भी दी, लेकिन वह संजय गौतम के संदेह का समाधान नहीं कर पाई.
समय के साथसाथ रेखा के प्रति संजय गौतम का संदेह कम होने के बजाय दिनबदिन बढ़ता ही गया. इस का नतीजा यह हुआ कि पतिपत्नी के बीच वैमनस्य बढ़ता गया. अब संजय रेखा की हर बात पर नजर रखने लगा था. वह उसे फोन पर किसी से बात करते देखता तो उस से सैकड़ों सवाल कर डालता. यहां तक कि कई बार तो उस की पिटाई भी कर देता. उस के दिमाग में शक का कीड़ा इस तरह घर कर गया था कि पत्नी के प्रेम संबंध का पता लगाने के लिए वह अपने गांव और ससुराल भी गया.
वहां उस ने अपने परिचितों और कालेज के कुछ दोस्तों से मिल कर रेखा के बारे में जानकारी ली. लेकिन उसे ऐसी कोई बात पता नहीं चली और वह खाली हाथ मुंबई लौट आया. इस के बावजूद संजय गौतम के दिमाग से संदेह का भूत नहीं उतरा.
कहावत है कि पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास के धरातल पर टिका होता है, अगर विश्वास टूट जाए तो घरगृहस्थी को बिखरते देर नहीं लगती. ऐसा ही कुछ इस मामले में भी हुआ.
जब संजय के विश्वास की टूटन बढ़ती गई तो उस ने रेखा को अपनी जिंदगी से निकाल फेंकने का फैसला कर लिया. इस के लिए वह मन ही मन योजना भी बनाने लगा. इसी योजना के तहत उस ने रेखा की प्रताड़ना बढ़ा दी.
अपनी योजना के अनुसार, घटना के दिन संजय गौतम ने रेखा के चरित्र को ले कर उसे काफी मारापीटा. इतना ही नहीं, बाजार जा कर वह चूहे मारने की दवा ले आया और रात को साढ़े 8 बजे उसे जबरन वह दवा खिला दी.
दवा खाने के बाद जब रेखा की तबीयत खराब होने लगी तो संजय घर से बाहर चला गया. उधर रेखा को कई उल्टियां हुईं और छटपटाते छटपटाते उस ने दम तोड़ दिया.
कई घंटों के बाद जब संजय गौतम घर लौटा तो रेखा मर चुकी थी. अब संजय के सामने रेखा की लाश को ठिकाने लगाने की समस्या थी. सुबह होने के पहले अगर वह रेखा की लाश को ठिकाने नहीं लगाता तो इलाके में बात फैल जाने का डर था.
कुछ देर सोचने के बाद उस ने रेखा की लाश को 2 चादरों के बीच लपेट कर घर में पड़ी प्लास्टिक की छोटी बोरी में भर कर उस का मुंह बांध दिया. इस के बाद वह सुबह साढ़े 3 बजे लाश को कंधे पर रख कर बोरी को ओएनजीसी कार्यालय के सामने रखे बीएमसी के कचरे के डिब्बे में डाल आया.
सुबह जब कचरे का डिब्बा उठाने वाली बीएमसी की गाड़ी आई तो वह कचरा के साथ उस बोरी को भी उठा ले गई. इस तरह रेखा के शव वाली बोरी मुलुंड स्थित डंपिंग ग्राउंड में पहुंच गई.
दूसरी ओर रेखा की लाश को ठिकाने लगाने के बाद संजय गौतम ने अपने आसपास रहने वालों के बीच यह बात फैला दी कि जीवदानी देवी का दर्शन करने विरार जाते समय उस की पत्नी रेखा उस से बिछड़ गई है.
पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के अफसरों ने उसे गिरफ्तार कर नवघर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर गणेश गायकवाड़ और जांच अधिकारी इंसपेक्टर सुनील काले को सौंप दिया.
इंसपेक्टर सुनील काले ने अभियुक्त संजय गौतम से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत केस दर्ज किया और उसे महानगर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के जेल भेज दिया.
कथा लिखे जाने तक अभियुक्त संजय गौतम न्यायिक हिरासत में था.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
परमिंदर कौर जालंधर के पृथ्वीनगर के मकान नंबर एन-ए-28 में रहती थी. उस के पति इकबाल सिंह दुबई के बहरीन में रहते थे. वहां वह किसी विदेशी कंपनी में नौकरी करते थे. उस की 2 बेटियां थीं, बड़ी 30 वर्षीया कमलप्रीत कौर और छोटी 26 वर्षीया रंजीत कौर. बड़ी बेटी कमलप्रीत कौर की शादी उस ने सन् 2001 में न्यूबलदेवनगर के मकान नंबर 197 में रहने वाले सुरजीत सिंह के सब से छोटे बेटे गुरमीत सिंह के साथ कर दी थी.
रंजीत कौर की अभी शादी नहीं हुई थी. वह जालंधर के पटेल अस्पताल में स्टाफ नर्स थी और मां के साथ रहती थी. कमलप्रीत कौर के पति की मौत हो चुकी थी. वह अपनी 2 बेटियों, 12 वर्षीया खुशप्रीत कौर और 10 वर्षीया राजवीर कौर के साथ ससुराल में रहती थी.
4 मार्च, 2014 की दोपहर 2 बजे के लगभग कमलप्रीत कौर अपनी मैरून कलर की एक्टिवा स्कूटर से गई तो लौट कर नहीं आई. जब इस बात की जानकारी परमिंदर को हुई तो उस ने बेटी को फोन किया. कमलप्रीत के पास 2 फोन थे. दोनों ही फोनों की घंटी बजती रही, लेकिन फोन उठा नहीं. इस के बाद रात को दोनों फोन बंद हो गए.
अगले दिन सवेरा होते ही परमिंदर कौर बेटी की तलाश में निकल पड़ी. उस ने नातेरिश्तेदार, जानपहचान वालों के यहां ही नहीं, हर उन संभावित जगहों पर बेटी को तलाशा, जहां उस के मिलने की संभावना थी. लेकिन कमलप्रीत का कहीं पता नहीं चला.
कमलप्रीत का कहीं कुछ पता नहीं चला तो परमिंदर कौर ने जालंधर के थाना डिवीजन नंबर 8 में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. कमलप्रीत के ढूंढ़ने की जिम्मेदारी ड्यूटी पर तैनात एएसआई अजमेर सिंह को सौंपी गई. यह 4-5 अप्रैल, 2014 के मध्यरात्रि की बात है.
एएसआई अजमेर सिंह ने लापता कमलप्रीत कौर का हुलिया और उस की स्कूटर का नंबर वायरलेस द्वारा प्रसारित करवा दिया. इस के अलावा जिले के सभी थानों को सूचना दे कर कमलप्रीत कौर की तलाश में मदद मांगी. अगले दिन मुखबिरों को भी कमलप्रीत कौर के फोटो दे कर उस के बारे में पता लगाने को कहा गया.
लेकिन इस सब का कोई नतीजा नहीं निकला. चूंकि बीती रात से ही कमलप्रीत के दोनों फोन बंद थे, इसलिए एएसआई अजमेर सिंह ने कमलप्रीत के दोनों फोनों के नंबर एक सिपाही को दे कर ड्यूटी लगा दी थी कि वह लगातार दोनों नंबरों पर फोन करता रहे. उस सिपाही की मेहनत रंग लाई और शाम को कमलप्रीत के एक फोन की घंटी बज उठी.
उस ने यह बात एएसआई अजमेर सिंह को बताई तो उन्होंने अपने मोबाइल से कमलप्रीत के उस नंबर पर फोन मिला दिया तो इस बार फोन रिसीव कर लिया गया. फोन रिसीव करने वाले का नाम सुरेंद्र था. उस से कमलप्रीत कौर के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा, ‘‘मैं किसी कमलप्रीत कौर को नहीं जानता. यह फोन भी मेरा नहीं है. मैं बस से जालंधर से फगवाड़ा जा रहा था तो बस में सीट के नीचे से मुझे यह फोन मिला था.’’
कमलप्रीत का फोन लावारिस हालत में बस में मिला, यह बात एएसआई अजमेर सिंह की समझ में नहीं आई. अपना परिचय देते हुए उन्होंने सुरेंद्र को फोन के साथ थाने बुला लिया. थाने आ कर भी सुरेंद्र ने वही सब बताया, जो उस ने फोन पर बताया था. अजमेर सिंह ने सुरेंद्र से फोन ले कर जमा कर लिया. पूछताछ में उन्हें लगा कि सुरेंद्र सच बोल रहा है तो उन्होंने उसे जाने दिया.
शाम को सारी बातें अजमेर सिंह ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर विमलकांत को बताईं तो उन्होंने उन की मदद के लिए उन के नेतृत्व में एक टीम बना दी. यह पुलिस टीम लगातार दो दिनों तक कमलप्रीत कौर की तलाश करती रही, लेकिन कहीं से भी कोई सुराग नहीं मिला.
6 मार्च को कमलप्रीत की बहन रंजीत कौर ने थानाप्रभारी विमलकांत को फोन कर के बताया, ‘‘सर, मुझे संदेह है कि मेरी बहन कमलप्रीत कौर के गायब होने के पीछे उस के जेठ महेंद्र सिंह का हाथ हैं. क्योंकि वह मेरी बहन से दुश्मनी रखता था. मुझे पूरा विश्वास है कि उसी ने मेरी बहन को अगवा कर कहीं छिपा दिया है या फिर उस की हत्या कर दी है.’’
इस के बाद थानाप्रभारी ने रंजीत कौर को थाने बुला कर उस से एक तहरीर ले कर कमलप्रीत कौर के अपहरण का मुकदमा उस के जेठ महेंद्र सिंह के खिलाफ दर्ज करा दिया. महेंद्र सिंह गांव बलीना, दोआबा के गुरुद्वारा भगतराम में मुख्य ग्रंथी था. यह गुरुद्वारा साहिब गांव वालों के अधीन था. गांव वाले उसे पाठ अरदास व गुरुद्वारा की सेवा के लिए 4 हजार रुपए मासिक वेतन देते थे.
महेंद्र सिंह के रहने और खाने की भी व्यवस्था गुरुद्वारा साहिब की ओर से थी. इंसपेक्टर विमलकांत सीधे उस पर हाथ नहीं डालना चाहते थे. इसलिए वह उस के बारे में पूरी जानकारी जुटाने लगे. इस छानबीन में पता चला कि 4 भाइयों में महेंद्र सिंह दूसरे नंबर पर था, जबकि कमलप्रीत का पति गुरमीत सिंह चौथे नंबर पर सब से छोटा था.
लगभग 25 साल पहले महेंद्र सिंह का विवाह हुआ था. उस के 3 बच्चों में 2 बेटे और 1 बेटी थी. लगभग 10 साल पहले किन्हीं कारणों से उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. अब तक उस के बडे़ बेटे और बेटी की शादी हो चुकी थी. शादी के बाद उस का बेटा उस से अलग रहने लगा था. इस समय सिर्फ छोटा बेटा 14 वर्षीय गगनदीप सिंह ही उस के साथ रहता था.
थानाप्रभारी विमलकांत ने कमलप्रीत कौर की दोनों बेटियों, खुशप्रीत कौर और राजवीर कौर से भी पूछताछ की थी. उन्होंने बताया था कि उस दिन उन की मां दोपहर 2 बजे के आसपास ताऊ महेंद्र सिंह के बेटे गगनदीप के साथ अपनी स्कूटर से गई थीं. जाते समय उन्होंने कहा था कि वह ताऊ से पैसे लेने जा रही हैं.
थानाप्रभारी विमलकांत ने गगनदीप को बुला कर कमलप्रीत के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘चाची मेरे साथ आई जरूर थीं, लेकिन पठानकोट रोड पर फ्लाईओवर पर उन्होंने मुझ से कहा था कि तुम चलो, मैं थोड़ी देर में आ रही हूं.’’
थानाप्रभारी विमलकांत गगनदीप से पूछताछ कर ही रहे थे कि रंजीत कौर ने थाने आ कर अपना फोन दिखाते हुए कहा, ‘‘सर, 4 मार्च को मेरे फोन पर कमलप्रीत का यह मैसेज आया था, जिसे मैं ने आज पढ़ा है. देखिए सर, इस में उस ने क्या लिखा है?’’
थानाप्रभारी विमलकांत ने रंजीत का फोन ले कर वह मैसेज पढ़ा. वह 4 मार्च को 1 बज कर 20 मिनट पर आया था. मैसेज था, ‘‘मैं अपने जेठ के साथ जा रही हूं. मुझे कोई प्रौब्लम आए तो फौरन फोन उठा लेना.’’
अब तक की तफ्तीश से महेंद्र सिंह वैसे ही शक के घेरे में आ गया था, इस मैसेज से स्पष्ट हो गया कि कमलप्रीत कौर के लापता होने के पीछे किसी न किसी रूप में ग्रंथी महेंद्र सिंह का ही हाथ है. अब समय बेकार करना ठीक नहीं था, इसलिए थानाप्रभारी ने तुरंत उस के घर छापा मार दिया. लेकिन वह घर पर नहीं मिला.
थानाप्रभारी ने महेंद्र सिंह के पीछे मुखबिरों को लगा दिया इस के बाद उन्हीं की सूचना पर 7 मार्च को पठानकोट रोड चौक पर नाका लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई तो उस ने जल्दी ही स्वीकार कर लिया कि उसी ने कमलप्रीत की हत्या कर दी है.
लाश के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि कमलप्रीत की लाश को उस ने गुरुद्वारा साहिब के सीवर में फेंक दी है. महेंद्र के अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद इंसपेक्टर विमलकांत ने तुरंत इस बात की सूचना एडीसीपी (प्रथम) नरेश डोगरा तथा एसीपी सतीश मल्होत्रा को दे दी थी.
अधिकारियों की उपस्थिति में अभियुक्त ग्रंथी महेंद्र सिंह की निशानदेही पर गुरुद्वारा भगतराम के सीवर पाइप से मृतका कमलप्रीत कौर की लाश बरामद कर ली गई. लाश केवल अंदर के कपड़ों यानी ब्रा पैंटी में थी. इस से लोगों को लगा कि हत्या से पहले मृतका के साथ दुष्कर्म किया गया था.
इंसपेक्टर विमलकांत ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया और थाने आ कर कमलप्रीत के अपहरण के मुकदमे के साथ हत्या और लाश को खुर्द बुर्द करने की धाराएं जोड़ दीं.
अगले दिन यानी 8 मार्च को जेएमआईसी सिमरन सिंह की अदालत में महेंद्र सिंह को पेश कर के पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में महेंद्र ने जो बताया, वह इस प्रकार था.
महेंद्र सिंह ने पुलिस को बताया था कि उस ने छोटे भाई की पत्नी कमलप्रीत की हत्या इसलिए की है, क्येंकि उस ने उस के भाई गुरमीत सिंह की हत्या की थी. उस के प्रिंस और सत्ती से अवैध संबंध थे. इसी वजह से उस ने गुरमीत को जहर दे कर मार दिया था.
महेंद्र सिंह के बताए अनुसार, गुरमीत तनदुरुस्त और अच्छाखासा नौजवान था. उसे कोई बीमारी भी नहीं थी, इसलिए जिस दिन वह मरा था, उसी दिन उसे शक हो गया था कि उस के भाई गुरमीत की मौत स्वाभाविक नहीं थी. उसे साजिश रच कर मारा गया था. इस के बाद वह पता लगाने लगा. तब उसे पता चला कि गुरमीत की पत्नी कमलप्रीत के प्रिंस और सत्ती से अवैध संबंध थे.
इस के बाद महेंद्र सिंह कमलप्रीत पर नजर रखने लगा. इसी साल जनवरी के दूसरे सप्ताह में एक रात उस ने एक सपना देखा. सपने में गुरमीत ने आ कर उस से कहा था कि उसे जहर दे कर मारा गया था. यह काम कमलप्रीत ने अपने हाथों से किया था.
बस इसी के बाद से अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए महेंद्र मौके की तलाश में लग गया था. वह प्रिंस, सत्ती और कमलप्रीत की हत्या कर के अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता था. लेकिन 3-3 हत्याएं करना उस के वश की बात नहीं थी.
कमलप्रीत के मृतक पति गुरमीत सिंह की लाम्मा पिंड चौक के पास ‘राजा भांगड़ा ग्रुप’ के नाम से भांगड़ा पार्टी थी. वह शादीब्याह एवं अन्य अवसरों पर गाना व भांगड़ा करता था. उस का यह काम बहुत बढि़या चल रहा था. अपने इस काम से उस ने खूब पैसा कमाया, जिसे उस ने ब्याज पर उठा दिया था. 23 अक्टूबर को ज्यादा शराब पीने की वजह से उस की मौत हो गई थी. उस ने जो पैसा उठा रखा था, उस की मौत के बाद तमाम लोगों ने वापस नहीं किया था.
गुरमीत का पैसा बहुत लोगों ने दबा रखा है, यह महेंद्र सिंह को पता था. कमलप्रीत की हत्या करने से कुछ दिनों पहले उस ने कमलप्रीत को फोन किया कि गुरमीत ने बुलारा गांव के एक आदमी को डेढ़ लाख रुपए दे रखे थे. वह आदमी 3 किश्तों में वे रुपए लौटाना चाहता है.
कमलप्रीत जेठ की बात पर विश्वास कर के उस आदमी से मिलने को तैयार हो गई. तब महेंद्र ने रुपए दिलवाने के एवज में उस से 3 हजार रुपए कमीशन के तौर पर मांगे. कमलप्रीत ने उस की यह शर्त स्वीकार कर ली. इस के बाद महेंद्र ने बातचीत करने के लिए उसे गुरुद्वारा के अपने कमरे पर बुलाया. उस दिन बातचीत कर के कमलप्रीत घर लौट गई.
4 मार्च, 2014 को सुबह महेंद्र ने कमलप्रीत को फोन कर के अपने कमरे पर बुलाया. कमलप्रीत ने अकेली आने में असमर्थता व्यक्त की तो उस ने अपने बेटे गगनदीप को भेज दिया. कमलप्रीत गगनदीप के साथ किशनपुरा उस की बताई जगह पर एक्टिवा स्कूटर से पहुंची.
ग्रंथी महेंद्र सिंह वहां पहले से ही मौजूद था. वह उसे अपने साथ अपने कमरे पर ले गया. वहां कमरे में बंद कर के महेंद्र उस से अपने भाई गुरमीत की मौत के बारे में पूछने लगा. सपने की बात बता कर उस ने कहा कि उसी ने अपने अवैध संबंधों की वजह से गुरमीत को जहर दे कर मारा था.
कमलप्रीत ने रोते हुए कहा, ‘‘यह सब झूठ है. न तो मेरा किसी से अवैध संबंध है और न मैं ने तुम्हारे भाई की हत्या की है. जरा सोचो, मैं अपने पति की हत्या कर के स्वयं को क्यों विधवा बनाऊंगी. एक विधवा की जिंदगी क्या होती है, यह मुझ से ज्यादा और कौन जान सकता है. जिस प्रिंस और सत्ती पर तुम आरोप लगा रहे हो, वह मुझे अपनी बहन मानते हैं.’’
कमलप्रीत के रोने को महेंद्र सिंह ने ढोंग समझा. उस ने उसे डांटते हुए जान से मारने की धमकी दी तो कमलप्रीत डर गई और पति की हत्या की बात स्वीकार कर ली. इस के बाद उस ने एक कागज दे कर गुरमीत को जहर दे कर मारने की बात लिखने को कहा.
कमलप्रीत ने सोचा, लिख कर देने से वह उस का पीछा छोड़ देगा, इसलिए उस ने लिख दिया, ‘प्रिंस, सत्ती और मैं ने गुरमीत को शराब में सल्फास की गोलियां मिला कर पिला दी थीं, जिस से उस की मौत हो गई थी.’ दरअसल उस समय महेंद्र के सिर पर खून सवार था. उस की आंखों में हैवानियत नाचती देख कमलप्रीत डर गई थी और उस ने वह सब लिख दिया था, जो वह चाहता था.
कमलप्रीत द्वारा लिखी बात पढ़ कर महेंद्र की आंखों में खून उतर आया. उस ने बैड पर बैठी कमलप्रीत का गला पकड़ा और पूरी ताकत से दबा दिया. कमलप्रीत बैड पर गिर पड़ी. वह जिंदा न रह जाए, इस के लिए उस ने उस के गले में पड़ी चुन्नी को लपेट कर पूरी ताकत से कस दिया. इस के बाद लाश को वहीं कमरे में बंद कर के उस के दोनों फोन ले कर वह रामा मंडी, जालंधरअमृतसर रोड पर गया और लुधियाना जाने वाली बस की सीट के नीचे रख कर वापस आ गया.
इस के बाद कमलप्रीत का स्कूटर ले जा कर उस ने जालंधर कैंट के रेलवे स्टेशन की पार्किंग में खड़ा कर दिया. स्टेशन से लौटतेलौटते रात के 8 बज चुके थे. अब उसे लाश को ठिकाने लगाना था. लाश को ठिकाने लगाने से पहले उस ने कमलप्रीत की सलवार कमीज को कैंची से काट कर शरीर से अलग कर दिया.
उन कपड़ों को जला कर उस ने उस की राख को ले जा कर जेहला गांव के निकट गुरुद्वारे के पास खेतों में फेंक दिया, ताकि कोई सुबूत न रहे. उस के कमरे पर आतेआते गांव में सन्नाटा पसर चुका था. उस ने कमलप्रीत की लाश उठाई और गुरुद्वारा में बने सीवर में डाल दिया. इस तरह से कमलप्रीत की हत्या कर के उस ने सारे सुबूत मिटा दिए. लेकिन उस ने कुछ ऐसी गलतियां कर दी थीं, जिस की वजह से वह पुलिस गिरफ्त में आ गया था.
महेंद्र से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर विमलकांत ने प्रिंस और सत्ती को थाने बुला कर पूछताछ की. उन का कहना था कि वे कमलप्रीत को अपनी बहन मानते थे और भाई की तरह उस के छोटे मोटे काम कर दिया करते थे. मृतका कमलप्रीत की मां और बहन तथा पड़ोसियों ने भी उन की बात को सच बताया.
थानाप्रभारी ने एक बार फिर महेंद्र से पूछताछ की तो इस बार उस ने कमलप्रीत की हत्या की जो कहानी बताई, वह कुछ और ही निकली.
दरअसल, मृतक गुरमीत का कामधंधा बहुत अच्छा चल रहा था, जिस से महेंद्र उस से जलता था. गुरमीत का पृथ्वीनगर में एक मकान था, जो काफी कीमती था. महेंद्र उसे हथियाना चाहता था. इसीलिए उस ने कमलप्रीत के प्रिंस और सत्ती से अवैध संबंधों की बात फैला कर कमलप्रीत की हत्या कर दी, ताकि उस मकान को वह हासिल कर सके.
इंसपेक्टर विमलकांत ने महेंद्र की निशानदेही पर कमलप्रीत की एक्टिवा स्कूटर, मोबाइल फोन और वह कैंची भी बरामद कर ली थी, जिस से उस ने उस के कपड़े काटे थे. तमाम पुलिस काररवाई पूरी कर के महेंद्र सिंह को एक बार फिर 10 मार्च, 2014 को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मृतका कमलप्रीत कौर की दोनों बेटियां खुशप्रीत कौर और राजवीर कौर अपनी मौसी रंजीत कौर के पास रह रही थीं.
– कथा पुलिस सूत्रों व मृतका के परिजनों द्वारा बातचीत पर आधारित
संतोष ने पत्नी को मजबूरी में गांव भेज तो दिया था लेकिन उस के जाने के बाद वह भी परेशान हो गया था. अब उसे खाना खुद ही बनाना पड़ता था. काम में व्यस्त रहने से वह इतना थक जाता था कि कभी बिना खाना खाए ही सो जाता था.
उसे बच्चों की भी याद आ रही थी. स्कूल से भी खबर आ रही थी कि आखिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं आ रहे हैं? संतोष का मन करता कि वह बच्चों को ले आए, लेकिन पत्नी की चरित्रहीनता याद आते ही वह अपना विचार बदल देता.
जब गुडि़या को गांव से कानपुर आने का मौका नहीं मिला तो राजू संतोष को मनाने तथा उस से फिर से दोस्ती करने का प्रयास करने लगा. लेकिन संतोष उसे झिड़क देता था. एक दिन उस ने कह दिया, ‘‘तू आस्तीन का सांप है. अब मैं तेरे झांसे में नहीं आऊंगा. मैं ने तुझे भाई जैसा मानसम्मान दिया, पर तूने मुझे ही डंस लिया.’’
‘‘बड़े भैया, मुझे अपनी गलती का अहसास है. बस मुझे एक बार माफ कर दो, फिर ऐसी गलती दोबारा नहीं करूंगा.’’
राजू ने बारबार मिन्नत की तो संतोष का दिल पसीज गया. फिर से दोस्ती बहाल हो जाने पर उस दिन दोनों ने दोस्ती के नाम पर फिर से जाम पर जाम टकराए. राजू ने अपनी कामयाबी की जानकारी गुडि़या को दी तो उस के मन में आस जगी कि संतोष अब उसे अपने पास बुला लेगा.
उन्हीं दिनों संतोष वायरल फीवर की चपेट में आ गया. राजू ही उसे अस्पताल ले गया. राजू ने संतोष को सलाह दी कि वह भाभी को बुला ले तो उस की सही तरीके से देखभाल हो जाएगी. संतोष ने पहले तो मुंह बनाया फिर कुछ सोच कर गुडि़या को फोन कर बताया कि वह बीमार है, अत: बच्चों के साथ जल्दी आ जाए.
पति की बात सुन कर गुडि़या खुशी से उछल पड़ी. उस ने फटाफट अपना सामान बांध कर बच्चों को तैयार किया और दूसरे दिन कानपुर आ गई. गुडि़या की सेवा से संतोष ठीक हो गया और बच्चे भी स्कूल जाने लगे.
राजू और गुडि़या कुछ दिनों तक तो अंजान बने रहे, उस के बाद फिर से दोनों का चोरीछिपे मिलन शुरू हो गया. गुडि़या के आने के बाद राजू संतोष से किए गए अपने वादे को भूल गया.
एक रोज संतोष की अपनी कंपनी में ही तबीयत खराब हो गई. उस का बदन बुखार से तप रहा था इसलिए वह दोपहर के समय ही कंपनी से घर की ओर चल दिया. दरवाजे पर पहुंचते ही उस ने आवाज लगाई, ‘‘गुडि़या, दरवाजा खोल.’’
कई बार दरवाजा खटखटाने के बाद गुडि़या ने दरवाजा खोला. वह कमरे में पहुंचा तो उस ने खिड़की से किसी को भागते देखा. पत्नी से पूछा तो वह साफ मुकर गई. लेकिन गुडि़या के उलझे बाल, बिस्तर की हालत तो कुछ और ही बयां कर रही थी.
वह समझ गया कि जरूर इस का यार राजू यहां से भागा है. यानी इस ने अपने यार से मिलना बंद नहीं किया है. गुस्से में संतोष ने गुडि़या की चोटी पकड़ कर पूछा, ‘‘बता, तेरे साथ कमरे में कौन था? सचसच बता वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’
गुडि़या घबरा तो गई, लेकिन फिर संभलते हुए बोली, ‘‘कोई भी नहीं था. तुम्हें जरूर कोई वहम हुआ है. तुम्हारी तबीयत शायद ठीक नहीं है.’’
गुडि़या ने हमदर्दी जताई तो संतोष को लगा कि शायद उसे बुखार है, इसलिए गलतफहमी हुई है. लेकिन उस का मन बारबार कह रहा था कि कमरे के अंदर राजू था जो उस के साथ सोया था. उस रात राजू को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहा.
संतोष के मन में शक पैदा हुआ तो फिर बढ़ता ही गया. अब तो संतोष राजू की मौजूदगी में भी गुडि़या की पिटाई कर देता. राजू बीचबचाव करने आता तो उसे झिड़क देता.
गुडि़या राजू की दीवानी थी, इसलिए उसे न तो पति की परवाह थी और ही परिवार के इज्जत की. इसी दीवानगी में एक दिन गुडि़या ने राजू से कहा, ‘‘तुम्हारी वजह से संतोष मुझे मारता पीटता है और तुम दुम दबा कर भाग जाते हो. आखिर तुम कैसे प्रेमी हो, कुछ करते क्यों नहीं?’’
‘‘घर का मामला है भाभी, मैं कर भी क्या सकता हूं.’’ राजू ने मजबूरी जाहिर की तभी गुडि़या बोली, ‘‘विरोध तो कर सकते हो. मुझ पर उठने वाला उस का हाथ तो मरोड़ सकते हो.’’
‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकता भाभी. क्योंकि तुम पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. फिर भी मैं तुम्हारी बात पर गौर करूंगा.’’ राजू ने कहा.
28 नवंबर, 2018 की रात संतोष यह कह कर घर से निकला कि वह अपनी ड्यूटी पर जा रहा है. संतोष चला गया तो गुडि़या ने राजू से मोबाइल पर बात की, ‘‘राजू तुम फटाफट आ जाओ. आज तो मौज ही मौज है. वह घर पर नहीं है. पूरी रात अपनी है. जम कर मौजमस्ती करेंगे.’’
रात 12 बजे के आसपास राजू खिड़की के रास्ते गुडि़या के कमरे में पहुंच गया. गुडि़या ने एक कमरे में अपने बच्चों को सुला दिया था. दूसरे कमरे में गुडि़या सजीसंवरी बैठी थी. आते ही राजू ने गुडि़या को अपने बाहुपाश में लिया और दोनों जिस्मानी भूख मिटाने लगे.
इधर सुबह 5 बजे संतोष घर आया. वह कमरे के पास पहुंचा तो उस ने कमरे के अंदर हंसने की आवाजें सुनीं. संतोष का माथा ठनका, वह समझ गया कि कमरे के अंदर गुडि़या और राजू ही होंगे.
गुस्से में उस ने दरवाजा पीटना शुरू किया तो कुछ देर बाद गुडि़या ने दरवाजा खोला, तो उस ने खिड़की से कूदते राजू को देख लिया था. संतोष ने गुस्से में गुडि़या के बाल पकड़े और उसे जमीन पर गिरा दिया. फिर वह उसे लातघूंसों से पीटने लगा.
अचानक संतोष की नजर कमरे में रखी कुल्हाड़ी पर पड़ी. उस ने कुल्हाड़ी उठाई और ताबड़तोड़ कई वार गुडि़या के सिर और गरदन पर किए. गुडि़या खून से लथपथ हो कर जान बख्श देने की गुहार लगाने लगी.
शोर सुन कर बच्चे भी जाग गए लेकिन पिता का रौद्र रूप देख कर वे सहम गए. फिर भी कृष्णा ने बाप के हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और बोला, ‘‘पापा, मम्मी को मत मारो. हम लोगों को रोटी कौन देगा.’’
कहते हुए कृष्णा कुल्हाड़ी ले कर घर के बाहर भागा.
उस ने पड़ोस में रहने वाली रेखा आंटी को बताया कि उस के पापा उस की मम्मी को कुल्हाड़ी से मार रहे हैं. रेखा भागीभागी गुडि़या के कमरे में पहुंची. गुडि़या की उस समय सांसें चल रही थीं. रेखा पुलिस को फोन करने कमरे से बाहर आई तो संतोष ने कमरे में रखा फावड़ा उठा लिया और जोरदार वार कर के गुडि़या को मौत के घाट उतार दिया. हत्या करने के बाद संतोष भागा नहीं बल्कि पत्नी के शव के पास बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.
इधर रेखा निषाद ने पड़ोसियों व थाना अरमापुर पुलिस को सूचना दे दी. खबर मिलते ही अरमापुर थानाप्रभारी आर.के. सिंह भी वहां आ गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर मृतका के पति संतोष व उस के बच्चों से बात की.
संतोष ने हत्या का जुर्म कबूलते हुए पुलिस अधिकारियों को बताया कि उस की पत्नी बदचलन थी, इसलिए उसे मार दिया. उसे हत्या का कोई अफसोस नहीं है. मृतका के बच्चों ने बताया कि मां की हत्या उस के पिता संतोष ने उन की आंखों के सामने की थी. उन्होंने मां को बचाने का प्रयास भी किया था, लेकिन बचा नहीं सके. पड़ोसी रेखा भी हत्या की चश्मदीद गवाह बनी.
थाना अरमापुर के इंसपेक्टर आर.के. सिंह ने मृतका गुडि़या के शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया. फिर रेखा निषाद को वादी बना कर संतोष निषाद के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. पोस्टमार्टम के बाद शव को मृतका के मातापिता को सौंप दिया गया. कृष्णा, नंदिनी व लाडो को भी पालनपोषण के लिए नानानानी अपने साथ ले गए.
30 नवंबर, 2018 को पुलिस ने अभियुक्त संतोष निषाद को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. सभी बच्चे अपनी ननिहाल में थे.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
इन्हीं दिनों संतोष खेतों की देखभाल के लिए एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने गांव चला गया. गुडि़या को यह मौका अच्छा लगा तो उस ने एक रोज रात में राजू को अपने कमरे पर रोक लिया. खाना खाने के बाद एक चारपाई पर राजू लेट गया और दूसरी पर गुडि़या.
राजू सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. उस का मन भाभी गुडि़या की तरफ ही लगा हुआ था. तभी आधी रात के बाद गुडि़या अपनी चारपाई से उठ कर उस के पास आ लेटी. इस के बाद तो राजू की खुशी का ठिकाना न रहा. वह गुडि़या से बोला, ‘‘क्या हुआ भाभी?’’
‘‘डर लग रहा था, इसलिए तुम्हारे पास चली आई.’’ गुडि़या ने उस से सटते हुए कहा.
‘‘डर लग रहा है तो लाइट जला दूं क्या?’’ राजू ने पूछा.
‘‘नहीं, लाइट जलाने की अब कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि अब तुम मेरे पास हो.’’ कहते हुए वह उस से लिपट गई.
राजू गुडि़या की मंशा समझ चुका था. वह भी जवान था. गुडि़या के स्पर्श से उस के शरीर में भी सरसराहट दौड़ गई थी. फिर जब गुडि़या ने उसे उकसाया तो ऐसे में भला वह कैसे शांत रह सकता था. नतीजतन दोनों ने ही उस रात अपनी हसरतें पूरी कीं.
उस दिन के बाद राजू और गुडि़या अकसर कामलीला रचाने लगे. राजू अपनी अधिकांश कमाई गुडि़या व उस के बच्चों पर खर्च करने लगा. उस के घर आने का विरोध संतोष न करे, इसलिए वह उस की भी आर्थिक मदद करने लगा.
इस के अलावा संतोष जब भी शराब पीने की इच्छा जताता तो राजू उसे ठेके पर ले जाता और शराब पिलाता. इतना ही नहीं, राजू अब गुडि़या के घरेलू काम में भी हाथ बंटाने लगा. राशन लाना, बच्चों को स्कूल छोड़ना तथा शाम को सब्जी लाना उस की दिनचर्या बन गई थी.
संतोष जब गांव चला जाता तो राजू रात में उस के घर रुकता और फिर दोनों रात भर रंगरलियां मनाते. राजू जब संतोष के साथ उस के घर आता तब तो कोई बात नहीं थी, लेकिन उस की गैरमौजूदगी में जब वह अकसर उस के घर पड़ा रहने लगा तो पड़ोसियों के मन में शंका पैदा होने लगी. धीरेधीरे मोहल्ले में गुडि़या और राजू के संबंधों की चर्चा फैल गई.
एक दिन संतोष को उस के पड़ोसी रामसिंह भदौरिया ने अपने पास बुला कर कहा, ‘‘संतोष, तुम रातदिन काम में व्यस्त रहते हो और घर आ कर नशे में डूब जाते हो. कभी अपने घर की तरफ भी ध्यान दिया करो कि तुम्हारे यहां कौन आता है कौन जाता है. तुम्हें कुछ पता भी है?’’
‘‘चाचा, मेरे घर में तो सब ठीक चल रहा है. अगर कोई गड़बड़ है तो बताओ. हमें आप की बात पर पूरा भरोसा है.’’ संतोष ने पूछा.
‘‘वह जो तुम्हारा दोस्त राजू है न, वह ठीक नहीं है. तुम घर पर नहीं होते तब वह तुम्हारे घर आता है. बच्चों को पैसे दे कर घर के बाहर भेज देता है. फिर तुम्हारे घर का दरवाजा बंद हो जाता है. पूरे मोहल्ले में तुम्हारी बीवी और राजू के नाजायज संबंधों की चर्चा हो रही है और तुम कान बंद किए बैठे हो.’’ राम सिंह ने बताया.
संतोष निषाद को जब यह बात पता चली तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने इस बारे में पत्नी व राजू से बात की तो दोनों ने साफ कह दिया कि ऐसी कोई बात नहीं है. गुडि़या ने कहा कि राजू उस की मदद करता है, इसलिए पड़ोसी जलते हैं. घर में झगड़ा कराने के लिए वे तुम्हारे कान भर रहे हैं.
संतोष ने उस समय तो पत्नी की बात पर विश्वास कर लिया और फिर कुछ दिनों के लिए जरूरी काम से अपने गांव चला गया. लगभग एक सप्ताह बाद जब वह गांव से लौटा तो घर में राजू मौजूद था. उस समय राजू और गुडि़या हंसीठिठोली और शारीरिक छेड़छाड़ कर रहे थे.
अब उसे विश्वास हो गया कि राम सिंह चाचा ने जो बात उसे बताई थी, वह सच थी. यह देख कर संतोष का पारा चढ़ गया. उसी समय उस ने गुडि़या की जम कर पिटाई कर दी. मौका पा कर राजू वहां से खिसक गया.
अगले दिन संतोष जब अपनी ड्यूटी पर पहुंचा तो कंपनी में उसे राजू मिल गया. संतोष ने राजू को वहीं पर खूब फटकारा. राजू ने उस समय उस से माफी मांग ली, पर बाद में राजू और गुडि़या पहले की तरह मिलते रहे. किसी न किसी तरह संतोष को इस की जानकारी मिलती रही.
पत्नी की इस बेवफाई से संतोष टूट गया था. वह शराब तो पहले भी पीता था लेकिन अब और ज्यादा पीने लगा. उसे गुडि़या से इतनी अधिक नफरत हो गई थी कि उस ने उस से बातचीत तक करनी बंद कर दी.
लेकिन जिस दिन राजू घर के पास दिख जाता था, उस दिन गुस्से से संतोष का खून खौल जाता था. राजू को ले कर गुडि़या से उस की तकरार होती थी. नौबत मारपीट तक आ जाती थी. पूरा मोहल्ला जान गया था कि झगड़े की जड़ राजू और गुडि़या के अवैध संबंध हैं.
इस के बाद तो खुल्लमखुल्ला पूरे मोहल्ले में दोनों के संबंधों की चर्चा होने लगी. इस से संतोष की खूब बदनामी हो रही थी. तब संतोष ने राजू के घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया. गुडि़या अपने से 10 साल छोटे प्रेमी राजू की दीवानी थी. वह किसी भी हाल में उस से अलग नहीं होना चाहती थी.
पति के चौकस हो जाने पर गुडि़या भी सतर्क हो गई. गुडि़या को जब भी मौका मिलता था, वह फोन कर के राजू को बुला लेती थी. पड़ोसियों को भनक न लगे, इस के लिए वह राजू को कमरे के पीछे खुलने वाली खिड़की से अंदर बुलाती थी, फिर शारीरिक मिलन के बाद वह उसी खिड़की से चला जाता था.
लेकिन सतर्कता के बावजूद एक रोज पड़ोसन रेखा निषाद ने राजू को खिड़की के रास्ते गुडि़या के घर में जाते देख लिया. उस ने यह बात संतोष को बताई तो उस का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. उस ने गुडि़या की जम कर पिटाई की और दूसरे दिन बच्चों सहित गुडि़या को अपने गांव वाले घर भेज दिया. गुडि़या ने गांव पहुंचने की जानकारी राजू को दे दी.
गुडि़या के गांव जाने पर राजू परेशान रहने लगा. अब दोनों की बात मोबाइल पर ही हो पाती थी. राजू गुडि़या पर दबाव बनाने लगा कि वह किसी न किसी बहाने से वापस आ जाए. उस के बिना उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. गुडि़या राजू को आश्वासन देती कि अभी उचित समय नहीं है. संतोष का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तब वह उस से बात कर के आ जाएगी.
नीरज को घर से गए 24 घंटे से भी ज्यादा हो गए और उस का कुछ पता नहीं चला तो उस की पत्नी रूबी ने थाना पंतनगर जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. इस के बाद उस के घर से गायब होने की जानकारी अपने सभी नातेरिश्तेदारों को देने के साथसाथ ससुराल वालों को भी दे दी थी.
नीरज के इस तरह अचानक गायब हो जाने की सूचना से उस के घर में कोहराम मच गया. नीरज के गायब होने की जानकारी उस के मामा को हुई तो वह भी परेशान हो उठे. उस समय वह गांव में थे. उन्होंने अपने बहनोई यानी नीरज के पिता रघुनाथ ठाकुर एवं उस के बड़े भाई को साथ लिया और महानगर मुंबई आ गए.
नीरज की पत्नी रूबी ने उन लोगों को बताया कि उस दिन वह घर से 250 रुपए ले कर निकले तो लौट कर नहीं आए. जब उन्हें गए 24 घंटे से भी ज्यादा हो गए तो उस का धैर्य जवाब देने लगा. उस ने थाना पंतनगर जा कर उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी और सभी को उन के घर न आने की जानकारी दे दी.
नीरज के इस तरह अचानक गायब हो जाने से उस के पिता रघुनाथ ठाकुर, बड़ा भाई और मामा रमाशंकर चौधरी परेशान हो उठे. सभी लोग मिल कर अपने तरीके से नीरज की तलाश करने लगे.
वे मुंबई में रहने वाले अपने सभी नातेरिश्तेदारों के यहां तो गए ही, उन अस्पतालों में भी गए, जहां ऐक्सीडैंट के बाद लोगों को इलाज के लिए ले जाया जाता है. आसपास के पुलिस थानों में भी पता किया, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर नीरज बिना कुछ बताए क्यों और कहां चला गया.
बेटे के अचानक गायब होने की चिंता और भागदौड़ में पिता रघुनाथ ठाकुर बीमार पड़ गए. एक दिन सभी लोग नीरज के बारे में ही चर्चा कर रहे थे, तभी रूबी ने अपने मामा ससुर रमाशंकर चौधरी से कहा, ‘‘परसों आधी रात को जब मैं शौचालय गई थी तो मुझे लगा कि वह शौचालय के गड्ढे से कह रहे हैं कि ‘रूबी मैं यहां हूं…’ उन की आवाज सुन कर मैं चौंकी.’’
मैं शौचालय के गड्ढे के पास यह सोच कर गई कि शायद वह आवाज दोबारा आए. लेकिन आवाज दोबारा नहीं आई. थोड़ी देर मैं वहां खड़ी रही, उस के बाद मुझे लगा कि शायद मुझे वहम हुआ है. मैं कमरे में आ गई.’’
अंधविश्वासों पर विश्वास करने वाले नीरज के मामा रमाशंकर चौधरी ने अपनी मौत का सच बताने वाली तमाम प्रेत आत्माओं के किस्से सुन रखे थे, इसलिए उन्हें लगा कि अपनी मौत का सच बताने के लिए नीरज की आत्मा भटक रही है. कहीं वह शौचालय के गड्ढे में तो गिर कर नहीं मर गया.
सुबह उठ कर वह शौचालय के गड्ढे के ऊपर रखे ढक्कन को देख रहे थे, तभी शौचालय की साफ सफाई करने वाला प्रशांत उर्फ ननकी फिनायल की बोतल ले कर आया और उस के आसपास फिनायल डालने लगा. उन्होंने पूछा, ‘‘भई यहां फिनायल क्यों डाल रहा है?’’
‘‘आज यहां से कुछ अजीब सी बदबू आ रही है. इसलिए सोचा कि फिनायल डाल दूंगा तो बदबू खत्म हो जाएगी.’’ प्रशांत ने कहा.
प्रशांत की इस बात से रमाशंकर को लगा कि कहीं सचमुच तो नहीं नीरज इस गड्ढे में गिर गया. शायद इसी वजह से बदबू आ रही है. वह तुरंत शौचालय के गड्ढे के ढक्कन के पास पहुंच गए. उसे हटाने के लिए उन्होंने उस पर जोर से लात मारी तो संयोग से वह टूट गया.
ढक्कन के टूटते ही उस में से इतनी तेज दुर्गंध आई कि रमाशंकर चौधरी को चक्कर सा आ गया. 5 मिनट के बाद उन्होंने अपनी नाक पर कपड़ा रख कर उस गड्ढे के अंदर झांका तो उन्हें सफेद कपड़े में लिपटी कोई भारी चीज दिखाई दी. उसे देख कर उन्हें यही लगा, यह भारी चीज किसी की लाश है. उन्होंने यह बात रूबी को बताने के साथसाथ शौचालय के संचालक नरेनभाई सोलंकी को भी बता दी. यह 27 मार्च, 2014 की बात थी.
इस के बाद रमाशंकर चौधरी सीधे थाना पंतनगर जा पहुंचे. उन्होंने पूरी बात ड्यूटी पर तैनात सबइंसपेक्टर देवेंद्र ओव्हाल को बताई तो उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी अपने अधिकारियों को दे दी.
इस के बाद वह अपने साथ हेडकांस्टेबल चंद्रकांत गोरे, किशनराव नावडकर, प्रशांत शिर्के, कांस्टेबल संतोष गुरुव और पंकज भोसले को साथ ले कर सहकारनगर मार्केट स्थित न्यू सुविधा सुलभ शौचालय पहुंच गए.
पुलिस टीम के घटनास्थल तक पहुंचने तक वहां काफी भीड़ लग चुकी थी. सबइंस्पेक्टर देवेंद्र ओव्हाल ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्हें भी लगा कि गड्ढे में पड़ी चीज लाश ही है तो उन्होंने उसे निकलवाले के लिए फायरब्रिगेड के कर्मचारियों को बुला लिया.
फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने जब सफेद चादर में लिपटी उस चीज को निकाला तो वह सचमुच लाश थी. लाश इस तरह सड़ चुकी थी कि उस की शिनाख्त नहीं हो सकती थी.
लेकिन लाश के हाथ में जो घड़ी बंधी थी, उसे देख कर रमाशंकर चौधरी और रूबी ने बताया कि यह घड़ी तो नीरज ठाकुर की है. नीरज कई दिनों से गायब था, इस से साफ हो गया कि वह लाश नीरज की ही थी.
सबइंस्पेक्टर देवेंद्र ओव्हाल अपने साथी पुलिसकर्मियों के साथ लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि शौचालय के गड्ढे में लाश मिलने की सूचना पा कर परिमंडल-6 के एडिशनल पुलिस कमिश्नर महेश धुर्ये, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर विलास पाटिल, सीनियर इंसपेक्टर निर्मल, इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर, असिस्टैंट इंसपेक्टर सकपाल और प्रदीप दुपट्टे भी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने सरसरी नजर से घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के घटना की जांच की जिम्मेदारी सीनियर इंसपेक्टर निर्मल को सौंप दी.
सीनियर इंसपेक्टर निर्मल ने सहकर्मियों की मदद से घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए घाटकोपर स्थित राजावाड़ी अस्पताल भिजवा दिया.
इस के बाद थाने लौट कर सीनियर इंसपेक्टर निर्मल ने इस मामले की जांच इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर को सौंप दी. इस के बाद जितेंद्र आगरकर ने उन के निर्देशन में जांच की जो रूपरेखा तैयार की, उसी के अनुरूप जांच शुरू कर दी गई.
सब से पहले तो उन्होंने मृतक नीरज ठाकुर के घर वालों के साथसाथ न्यू सुविधा सुलभ शौचालय के संचालक नरेनभाई सोलंकी को भी पूछताछ के लिए थाने बुला लिया.
नीरज के घर वालों तथा न्यू सुविधा सुलभ शौचालय के संचालक नरेनभाई सोलंकी ने जो बताया, जांच अधिकारी इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर को मृतक की पत्नी रूबी पर संदेह हुआ. उन्होंने उस पर नजर रखनी शुरू कर दी. उन्होंने देखा कि पति की मौत के बाद किसी औरत के चेहरे पर जो दुख और परेशानी दिखाई देती है, रूबी के चेहरे पर वैसा कुछ भी नहीं था.
इसी से उन्हें आशंका हुई कि किसी न किसी रूप में रूबी अपने पति की हत्या के मामले में जरूर जुड़ी है. लेकिन इतने भर से उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था. इसलिए वह उस के खिलाफ ठोस सुबूत जुटाने लगे.
सुबूत जुटाने के लिए उन्होंने रूबी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाने के साथ न्यू सुविधा सुलभ शौचालय के आसपास रहने वालों से गुपचुप तरीके से पूछताछ की तो उन्हें रूबी के खिलाफ ऐसे तमाम सुबूत मिल गए, जो उसे थाने तक ले जाने के लिए पर्याप्त थे.
लोगों ने बताया था कि रूबी और नीरज के बीच अकसर लड़ाई झगड़ा होता रहता था. यह लड़ाई झगड़ा शौचालय पर ही काम करने वाले संतोष झा को ले कर होता था. क्योंकि रूबी के उस से अवैध संबंध थे.
इस के बाद इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर ने न्यू सुविधा सुलभ शौचालय पर काम करने वाले प्रशांत कुमार चौधरी और मृतक नीरज ठाकुर की पत्नी रूबी को एक बार फिर पूछताछ के लिए थाने बुला लिया.
इस बार दोनों काफी डरे हुए थे, इसलिए थाने आते ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. रूबी ने बताया कि उसी ने प्रेमी संतोष झा के साथ मिल कर नीरज की हत्या की थी. हत्या में प्रशांत ने भी उस की मदद की थी. इस के बाद रूबी और प्रशांत ने नीरज की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.
35 वर्षीय नीरज ठाकुर मूलरूप से बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना सफरा का रहने वाला था. उस के परिवार में मातापिता, एक बड़ा भाई और एक बहन थी. उम्र होने पर सभी बहनभाइयों की शादी हो गई. नीरज 3 बच्चों का पिता भी बन गया. इस परिवार का गुजरबसर खेती से होता था.
जमीन ज्यादा नहीं थी, इसलिए परिवार बढ़ा तो गुजरबसर में परेशानी होने लगी. बड़ा भाई पिता रघुनाथ ठाकुर के साथ खेती कराता था, इसलिए नीरज ने सोचा कि वह घर छोड़ कर किसी शहर चला जाए, जहां वह चार पैसे कमा सके.
घर वालों को भला इस बात पर क्या ऐतराज हो सकता था. उन्होंने हामी भर दी तो 5 साल पहले घर वालों का आशीर्वाद ले कर नीरज नौकरी की तलाश में महानगर मुंबई पहुंच गया. वहां सांताक्रुज ईस्ट गोलीवार में उस के मामा रमाशंकर चौधरी रहते थे. उन का अपना स्वयं का व्यवसाय था. वह मामा के साथ रह कर छोटेमोटे काम करने लगा.
कुछ दिनों बाद उस की मुलाकात न्यू सुविधा सुलभ शौचालय के संचालक नरेनभाई सोलंकी से हुई तो घाटकोपर, थाना पंतनगर के सहकार नगर मार्केट स्थित न्यू सुविधा सुलभ शौचालय की उन्होंने जिम्मेदारी उसे सौंप दी. आधुनिक रूप से बना यह शौचालय काफी बड़ा था. उसी के टैरेस पर कर्मचारियों के रहने के लिए कई कमरे बने थे, उन्हीं में से एक कमरा नीरज ठाकुर को भी मिल गया.
न्यू सुविधा सुलभ शौचालय से नीरज को ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. जब उसे लगा कि वह शौचालय की आमदनी से परिवार की जिम्मेदारी उठा सकता है तो गांव जा कर वह पत्नी रूबी और बच्चों को भी ले आया. क्योंकि वह बच्चों को पढ़ालिखा कर उन का भविष्य सुधारना चाहता था.
नीरज परिवार के साथ न्यू सुविधा सुलभ शौचालय के टैरेस पर बने कमरे में आराम से रह रहा था. जिंदगी आराम से गुजर रही थी. लेकिन जैसे ही उस की जिंदगी में उस का दोस्त संतोष झा दाखिल हुआ, उस की सारी खुशियों में ग्रहण लग गया.
संतोष झा उसी के गांव का रहने वाला उस का बचपन का दोस्त था. वह मुंबई आया तो उस ने उसे अपने पास ही रख लिया. गांव का और दोस्त होने की वजह से संतोष नीरज के कमरे पर भी आताजाता था. वह उस की पत्नी रूबी को भाभी कहता था. इसी रिश्ते की वजह से दोनों में हंसीमजाक भी होता रहता था.
इसी हंसीमजाक में पत्नी बच्चों से दूर रह रहा संतोष धीरे धीरे रूबी की ओर आकर्षित होने लगा. मन की बात उस के हावभाव से जाहिर होने लगी तो रूबी को भांपते देर नहीं लगी कि उस के मन में क्या है. उसे अपनी ओर आकर्षित होते देख रूबी भी उस की ओर खिंचने लगी. इस से संतोष का साहस बढ़ा और वह कुछ ज्यादा ही रूबी के कमरे पर आनेजाने लगा.
घंटों बैठा संतोष रूबी से मीठीमीठी बातें करता रहता. रूबी को उस के मन की बात पता ही थी, इसलिए वह उस से बातें भी वैसी ही करती थी.
संतोष की ओर रूबी के आकर्षित होने की सब से बड़ी वजह यह थी कि नीरज जब से उसे मुंबई लाया था, उसी छोटे से कमरे में कैद कर दिया था. उस की दुनिया उसी छोटे से कमरे में कैद हो कर रह गई थी.
नीरज अपने काम में ही व्यस्त रहता था, ऐसे में उस का कोई मिलने जुलने वाला था तो सिर्फ संतोष. वही उस के सुखदुख का भी खयाल रखता था और जरूरतें भी पूरी करता था. क्योंकि नीरज के पास उस के लिए समय ही नहीं होता था. संतोष ही उस के बेचैन मन को थोड़ा सुकून पहुंचाता था.
संतोष शादीशुदा ही नहीं था, बल्कि उस के बच्चे भी थे. उसे नारी मन की अच्छी खासी जानकारी थी. अपनी इसी जानकारी का फायदा उठाते हुए वह जल्दी ही रूबी के बेचैन मन को सुकून पहुंचाते पहुंचाते तन को भी सुकून पहुंचाने लगा.
रूबी को उस ने जो प्यार दिया, वह उस की दीवानी हो गई. अब उसे नीरज के बजाय संतोष से ज्यादा सुख और आनंद मिलने लगा, इसलिए वह नीरज को भूलती चली गई.
मर्यादा की कडि़यां बिखर चुकी थीं. दोनों को जब भी मौका मिलता, अपने अपने अरमान पूरे कर लेते. इस तरह नीरज की पीठ पीछे दोनों मौजमस्ती करते रहे. लेकिन पाप का घड़ा भरता है तो छलक ही उठता है. उसी तरह जब संतोष और रूबी ने हदें पार कर दीं तो एक दिन नीरज की नजर उन पर पड़ गई. उस ने दोनों को रंगरलियां मनाते अपनी आंखों से देख लिया.
नीरज ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सात जन्मों तक रिश्ता निभाने का वादा करने वाली पत्नी एक जन्म भी रिश्ता नहीं निभा पाएगी. संतोष तो निकल भागा था, रूबी फंस गई. नीरज ने उस की जम कर पिटाई की. पत्नी की इस बेवफाई से वह अंदर तक टूट गया. बेवफा पत्नी से उसे नफरत हो गई.
इस के बाद घर में कलह रहने लगी. नीरज ने रूबी का जीना मुहाल कर दिया. रोजरोज की मारपीट और लड़ाई झगड़े से तो रूबी परेशान थी ही, आसपड़ोस में उस की बदनामी भी हो रही थी. वह इस सब से तंग आ गई तो इस से निजात पाने के बारे में सोचने लगी. उसे लगा, इस सब से उसे तभी निजात मिलेगी, जब नीरज न रहे. फिर क्या था, ठिकाने लगाने की उस ने साजिश रच डाली.
अपनी इस साजिश में रूबी ने अपने ही शौचालय पर काम करने वाले प्रशांत चौधरी को यह कह कर शामिल कर लिया कि नीरज ठाकुर के न रहने पर वह न्यू सुविधा सुलभ शौचालय को चलाने की जिम्मेदारी उसे दिलवा देगी. इस के अलावा वह उसे 50 हजार रुपए नकद भी देगी.
न्यू सुविधा सुलभ शौचालय चलाने की जिम्मेदारी और 50 हजार रुपए के लालच में प्रशांत नीरज की हत्या में साथ देने को तैयार हो गया. इस तरह रूबी ने अपने सुहाग का सौदा कर डाला.
10 मार्च, 2014 की शाम नीरज ठाकुर ढाई सौ रुपए ले कर किसी काम से 2 दिनों के लिए बाहर चला गया. 12 मार्च की रात में लौटा तो पहले से रची गई साजिश के अनुसार शौचालय के टैरेस पर गहरी नींद सो रहे नीरज के दोनों पैरों को प्रशांत ने कस कर पकड़ लिया तो संतोष उस की छाती पर बैठ गया.
नीरज अपने बचाव के लिए कुछ कर पाता, उस के पहले ही रूबी ने सब्जी काटने वाले चाकू से उस का गला रेत दिया. कुछ देर छटपटा कर नीरज मर गया तो तीनों ने उस की लाश को सफेद चादर में पलेट कर टैरेस से नीचे फेंक दिया. इस के बाद तीनों नीचे आए और शौचालय के गड्ढे का ढक्कन खोल कर लाश उसी में डाल दी. इस के बाद ढक्कन को फिर से बंद कर दिया गया.
नीरज की हत्या कर के संतोष डोभीवली चला गया तो प्रशांत और रूबी अपने अपने कमरे पर चले गए. रूबी ने अपना अपराध छिपाने के लिए अगले दिन थाना पंतनगर जा कर पति की गुमशुदगी भी दर्ज करा दी. लेकिन पुलिस की पैनी नजरों से वह बच नहीं सकी और पकड़ी गई.
रूबी से नीरज की हत्या की पूरी कहानी सुनने के बाद इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर संतोष झा को गिरफ्तार करने पहुंचे तो पता चला वह अपने गांव भाग गया है. एक पुलिस टीम तुरंत उस के गांव के लिए रवाना हो गई. संयोग से वह गांव में मिल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के मुंबई ले आई. मुंबई आने पर उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया.
इंसपेक्टर जितेंद्र आगरकर ने रूबी, संतोष झा और प्रशांत चौधरी से पूछताछ के बाद भादंवि की धारा 302, 202 के तहत मुकदमा दर्ज कर तीनों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें आर्थर रोड जेल भेज दिया गया.
— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के सिंगरा थाना क्षेत्र में एक गांव है बड़गांव. कल्लू निषाद अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे रमेश, दिनेश, संतोष के अलावा एक बेटी थी उमा. कल्लू किसान था. खेती की आय से परिवार चलता था.
समय बीतते कल्लू ने अपने सभी बच्चों की शादियां कर दीं. तीनों भाइयों ने पिता के रहते ही घर और खेती की जमीन का बंटवारा भी कर लिया. भाईबहनों में संतोष सब से छोटा था. उस का विवाह गुडि़या से हुआ था. गुडि़या के पिता रघुवीर निषाद गाजीपुर जिले के सुहावल गांव के रहने वाले थे. गुडि़या से शादी कर के संतोष बहुत खुश था.
बंटवारे के बाद संतोष के पास खेती की इतनी जमीन नहीं बची थी जिस से परिवार का गुजारा हो सके. फिर भी सालों तक हालात से उबरने की जद्दोजहद चलती रही.
धीरेधीरे वक्त गुजरता गया और इस गुजरते वक्त के साथ गुडि़या एक बेटे कृष्णा और 2 बेटियों की मां बन गई. गुडि़या 3 बच्चों की मां भले ही बन गई थी, लेकिन उस की देहयष्टि से ऐसा लगता नहीं था.
वह पति को अकसर खेती के अलावा कोई और काम करने की सलाह देती थी. लेकिन संतोष खेतीकिसानी में ही खुश था. बाहर जा कर नौकरी करने की बात न मानने पर संतोष का पत्नी के साथ झगड़ा होता रहता था.
संतोष अपनी जमीन पर खेती करने के साथसाथ दूसरों की जमीन भी बंटाई पर लेता था. तब कहीं जा कर परिवार का भरणपोषण हो पाता था. अगर बाढ़ या सूखे से फसल चौपट हो जाती तो उस के पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं बचता था. इस सब के चलते जब संतोष पर कर्ज हो गया तो उस ने गांव छोड़ दिया.
संतोष ने अपने गांव के कुछ लोगों से सुन रखा था कि कानपुर उद्योग नगरी है और वहां नौकरी आसानी से मिल जाती है. संतोष भी नौकरी की तलाश में कानपुर शहर पहुंच गया. वहां कई दिनों तक भागदौड़ करने के बाद संतोष को पनकी स्थित एक रिक्शा कंपनी में काम मिल गया. वह रिक्शा कंपनी किराए पर रिक्शा भी चलवाती थी.
संतोष मेहनती व ईमानदार था. जल्द ही उस ने वहां अपनी अच्छी छवि बना ली, उस की लगन और मेहनत को देख कर मालिक ने उसे किराए पर चलने वाले रिक्शों के चालकों से किराया वसूलने की जिम्मेदारी सौंप दी. इस के साथ ही वह किराए के रिक्शों की भी मरम्मत भी करता था. ज्यादा कमाने के चक्कर में संतोष नौकरी के बाद खुद भी रिक्शा चला लेता था.
संतोष महीने-2 महीने में कानपुर से घर लौटता था और 2-3 दिन घर रुक कर कानपुर चला जाता था. गुडि़या उन दिनों उम्र के उस दौर से गुजर रही थी, जब औरत को पुरुष की नजदीकियों की ज्यादा जरूरत होती है. एक बार संतोष घर आया तो गुडि़या ने उस से कहा कि बच्चों की अब पढ़ने की उम्र है. गांव में रह कर पढ़ नहीं पाएंगे, अत: उसे व बच्चों को साथ ले चले.
संतोष को गुडि़या की बात सही लगी. उस ने पत्नी को आश्वासन दिया कि जब वह अगली बार आएगा, तो उसे व बच्चों को अपने साथ ले जाएगा. संतोष कानपुर पहुंच कर कमरे की खोज में जुट गया. काफी कोशिश के बाद उसे अरमापुर में किराए पर कमरा मिल गया.
कमरा मिल जाने के बाद वह पत्नी व बच्चों को कानपुर शहर ले आया. बच्चों का दाखिला उस ने अरमापुर के सरकारी स्कूल में करा दिया. गुडि़या शहर आई तो उस के रंगढंग ही बदल गए. वह खूब सजसंवर कर रहने लगी. अपने व्यवहार की वजह से उस ने आसपड़ोस की महिलाओं से भी अच्छे संबंध बना लिए थे.
संतोष जिस रिक्शा कंपनी में काम करता था, उसी में राजू नाम का युवक भी काम करता था. हालांकि राजू संतोष से कई साल छोटा था, फिर भी दोनों में खूब पटती थी. दोनों साथसाथ लंच करते थे. जरूरत पड़ने पर राजू संतोष की आर्थिक मदद भी कर देता था.
राजू पनकी स्थित रतनपुर कालोनी में अकेला रहता था. वैसे वह मूलरूप से इटावा जिले के अजीतमल गांव का रहने वाला था. उस के मातापिता की मृत्यु हो चुकी थी और भाइयों से उस की पटती नहीं थी. इसलिए कानपुर आ कर रिक्शा कंपनी में काम करने लगा था.
एक दिन संतोष ने राजू को बताया कि आज उस के बेटे कृष्णा का जन्मदिन है. उस ने किसी और को तो नहीं बुलाया लेकिन उसे जरूर आना है. अपनेपन की इस बात से राजू खुश हुआ. उस ने कहा, ‘‘संतोष भैया, मैं शाम को जरूर आऊंगा. शाम की पार्टी भी मेरी तरफ से रहेगी.’’
राजू दिन भर काम में व्यस्त रहा. शाम होते ही वह अपने घर पहुंचा और अच्छे कपड़े पहने. फिर सजसंवर कर संतोष के घर पहुंच गया. राजू के पहुंचने पर संतोष बहुत खुश हुआ. उस ने राजू का अपनी पत्नी से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा अच्छा दोस्त और हमदर्द है.
गुडि़या ने मुसकरा कर राजू का स्वागत किया और बोली, ‘‘यह आप के बारे में बताते रहते हैं और बहुत तारीफ करते हैं.’’
गुडि़या ने राजू की आवभगत की. राजू भी गुडि़या की खूबसूरती में खो गया. कुल मिला कर गुडि़या पहली ही नजर में राजू के दिलोदिमाग पर छा गई.
इस के बाद वह किसी न किसी बहाने संतोष के साथ उस के घर जाने लगा. वह जब भी घर जाता, बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें जरूर ले कर आता. बच्चों को उन की मनपसंद चीजें मिलने लगीं तो वह ‘चाचा चाचा’ कह कर उस से घुलमिल गए.
जल्दी ही राजू ने संतोष के घर में अपनी पैठ बना ली. राजू का घर आना बच्चों को ही नहीं, बल्कि गुडि़या को भी अच्छा लगता था. राजू की लच्छेदार बातें उसे खूब भाती थीं. धीरेधीरे गुडि़या के मन में भी राजू के प्रति चाहत बढ़ गई.
एक रोज गुडि़या कमरे के बाहर खड़ी धूप में बाल सुखा रही थी, तभी अचानक राजू उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. गुडि़या ने उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछा, ‘‘अरे तुम, इस तरह अचानक, क्या ड्यूटी नहीं गए?’’
‘‘ड्यूटी गया तो था भाभी, पर तुम्हारी याद आई तो चला आया.’’ राजू ने मुसकरा कर जवाब दिया. उस दिन राजू को गुडि़या बहुत ज्यादा खूबसूरत लगी. उस की निगाहें गुडि़या के चेहरे पर जम गईं. यही हाल गुडि़या का भी था. राजू को इस तरह देखते हुए गुडि़या बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो मुझे? क्या पहली बार देखा है? बोलो, किस सोच में डूबे हो?’’
‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो देख रहा था कि खुले बालों में आप कितनी सुंदर लग रही हैं. वैसे एक बात कहूं, आप के अलावा पासपडोस में और भी हैं, पर आप जैसी सुंदर कोई नहीं है.’’
‘‘बस…बस रहने दो. बहुत बातें बनाने लगे हो. तुम्हारे भैया तो कभी तारीफ नहीं करते. काम के बोझ से इतने थके होते हैं कि खाना खा कर बिस्तर पर लुढ़क जाते हैं और अगर उन से कुछ कहो तो किसी न किसी बात को ले कर झगड़ने लगते हैं.’’
‘‘अरे भाभी, औरत की खूबसूरती सब को रास थोड़े ही आती है. भैया तो लापरवाह हैं. शराब में डूबे रहते हैं, इसलिए तुम्हारी कद्र नहीं करते.’’ राजू बोला.
‘‘तू तो मेरी बहुत कद्र करता है? हफ्ते बीत जाते हैं, झांकने तक नहीं आता. जा बहुत देखे हैं तेरे जैसे बातें बनाने वाले.’’ गुडि़या उसे उकसाते हुए बोली.
‘‘मुझे सचमुच आप की बहुत फिक्र है भाभी. यकीन न हो तो परख लो. अब मैं आप की खैरखबर लेने जल्दीजल्दी आता रहूंगा. छोटाबड़ा जो भी काम कहोगी, मैं करूंगा.’’ राजू ने गुडि़या की चिरौरी सी की.
राजू की यह बात सुन कर गुडि़या खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘तू आराम से चारपाई पर बैठ. मैं तेरे लिए चाय बनाती हूं.’’
थोड़ी देर में गुडि़या 2 कप चाय और प्लेट में बिस्कुट व नमकीन ले आई. दोनों पासपास बैठ कर गपशप लड़ाते हुए चाय पीते रहे और चोरीछिपे एकदूसरे को देखते रहे. दोनों के ही दिलोदिमाग में हलचल मची हुई थी. सच तो यह था कि गुडि़या गबरू जवान राजू पर फिदा हो गई थी. वह ही नहीं, राजू भी मतवाली भाभी का दीवाना बन गया था.
दोनों के दिल एकदूसरे के लिए धड़के तो नजदीकियां खुदबखुद बन गईं. इस के बाद राजू अकसर गुडि़या से मिलने आने लगा. गुडि़या को उस का आना अच्छा लगता था. जल्द ही वह एकदूसरे से खुल गए और दोनों के बीच हंसीमजाक होने लगा.