UP Crime: उजड़ गया आशियाना – बाप बना कातिल

UP Crime: गांवों में आज भी ज्यादातर घरों में दिन ढलते ही रात का खाना बन जाता है. शाम के यही कोई साढ़े 6 बजे खाना खा कर सुरेंद्र सोने के लिए जानवरों के बाड़े में चला गया था. उस के जाने के बाद सुरेंद्र की पत्नी ममता, बेटा कुलदीप, दीपक, रतन और बहू प्रभा खाना खाने की तैयारी करने लगी थी. सभी खाने के लिए बैठने जा रहे थे कि तभी प्रभा के पिता फूल सिंह पाल, चाचा रामप्रसाद, भाई लाल सिंह उस के मौसेरे भाई टुंडा के साथ उन के यहां आ पहुंचे.

किसी के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कोई चापड़ लिए था तो कोई डंडा. उन्हें इस तरह आया देख कर घर के सभी लोग समझ गए कि इन के इरादे नेक नहीं हैं. वे कुछ कर पाते, उस से पहले ही उन्होंने प्रभा को पकड़ा और कुल्हाड़ी से उस की हत्या कर दी. प्रभा की सास ममता बहू को बचाने के लिए दौड़ी तो हमलावरों ने उसे भी कुल्हाड़ी से काट डाला.

ममता प्रभा की 9 महीने की बेटी को लिए थी, हत्यारों ने उसे छीन कर एक ओर फेंक दिया था. 2 लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद हमलावरों ने कुलदीप को पकड़ कर जमीन पर गिरा दिया. कुलदीप जान की भीख मांगने लगा तो फूल सिंह ने कहा, ‘‘कुलदीप, तुझे हम जान से नहीं मारेंगे, तुझे तो अपाहिज बना कर छोड़ देंगे, ताकि तू उम्र भर चलने को तरसे और अपनी बरबादी पर रोता रहे.’’

इतना कह कर फूल सिंह ने कुलदीप के दोनों पैर कुल्हाड़ी से काट दिए. सुरेंद्र की बुआ श्यामा और छोटेछोटे बच्चे चीखतेचिल्लाते रहे और गांव वालों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन गांव का कोई भी उन की मदद को नहीं आया. लोग अपनीअपनी छतों पर खड़े हो कर इस वीभत्स नजारे को देखते रहे.

कुछ ही देर में इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दे कर जिस तरह हमलावर आए थे, उसी तरह फरार हो गए. सुरेंद्र का घर खून से डूब गया था. 2 महिलाओं की खून से लथपथ लाशें पड़ी थीं, जबकि कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. हमलावरों के जाने के बाद गांव वाले जुटने शुरू हुए. खबर सुन कर सुरेंद्र और उस के मातापिता, भाई, चाचा आदि आ गए. लोमहर्षक नजारा देख कर वे सन्न रह गए.

सुरेंद्र ने पुलिस चौकी साढ़ को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव घटना की सूचना कोतवाली घाटमपुर को दे कर हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, भीम प्रकाश, प्रवेश मिश्रा, संजय कुमार के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

घटना की सूचना पा कर कोतवाली घाटमपुर के प्रभारी गोपाल यादव और सीओ जे.पी. सिंह गांव ढुकुआपुर के लिए चल पड़े थे. ढुकुआपुर से पुलिस चौकी 8 किलोमीटर दूर थी इसलिए पुलिस टीम को वहां पहुंचने में पौन घंटा लग गया. 3 लोगों को खून में लथपथ देख कर पुलिस हैरान रह गई. देख कर ही लग रहा था कि कि यह सब दुश्मनी की वजह से हुआ है.

2 महिलाओं की मौत हो चुकी थी. कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. पुलिस ने कुलदीप को स्वरूपनगर के एसएनआर अस्पताल भिजवाया. सूचना मिलने पर एसपी (देहात) अनिल मिश्रा भी वहां आ गए थे. पुलिस अधिकारियों ने आसपास के लोगों से घटना के बारे में जानना चाहा, लेकिन पुलिस के सामने किसी ने मुंह नहीं खोला. लोग अलगअलग बहाने बना कर वहां से खिसकने लगे. पुलिस समझ गई कि डर या किसी अन्य वजह से लोग कुछ भी बताने से कतरा रहे हैं.

हमलावरों ने सुरेंद्र की पत्नी ममता और बहू प्रभा की हत्या कर दी थी, जबकि बेटे कुलदीप के दोनों पैर काट दिए थे. पुलिस ने जब सुरेंद्र से पूछताछ की तो उस ने बताया कि यह सब कुलदीप की ससुराल वालों ने किया है. पुलिस ने सुरेंद्र पाल की ओर से फूल सिंह, उस के बेटे, भाई रामप्रसाद पाल, लाल सिंह, टुंडा उर्फ मामा और रामप्रसाद उर्फ छोटे के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 307, 452, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए कानपुर भिजवा दिया था.

इस लोमहर्षक कांड के बाद गांव में दहशत फैल गई थी. गांव वाले दबी जुबान से तरहतरह की बातें कर रहे थे. एसएसपी यशस्वी यादव ने सीओ जे.पी. सिंह को निर्देश दिए कि वह जल्द से जल्द हमलावरों को गिरफ्तार करें. सीओ ने तुरंत ही प्रभारी निरीक्षक गोपाल यादव और चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव के नेतृत्व में 2 टीमें गठित कीं.

पहली टीम में एसआई अखिलेश मिश्रा, कांस्टेबल धर्मेंद्र सिंह, प्रवेश बाबू और इरशाद अहमद को शामिल किया गया, जबकि दूसरी टीम में हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, अजय कुमार यादव और भीम प्रकाश को भी शामिल किया गया. चूंकि आरोपी अपने घरों से फरार थे, इसलिए पुलिस टीमें उन की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारने लगीं. आखिर सुबह होतेहोते पुलिस को सफलता मिल ही गई. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह और रामप्रसाद उर्फ छोटे को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो इस खूनी तांडव की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की प्रस्तावना पर लिखी हुई थी.

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर की एक तहसील है घाटमपुर. यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर बसा है एक गांव ढुकुआपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन गड़रियों की संख्या कुछ ज्यादा है. इसी गांव में सुरेंद्र सिंह पाल भी अपने परिवार के साथ रहता था. वैसे सुरेंद्र पाल का पुश्तैनी मकान गांव के बीचोंबीच था, लेकिन भाइयों में जब बंटवारा हुआ तो वह गांव के बाहर खाली पड़ी जमीन पर मकान बना कर रहने लगा.

सुरेंद्र के परिवार में पत्नी ममता के अलावा 3 बेटे, कुलदीप, दीपक और करण थे. कुलदीप पढ़ाई के साथ पिता के काम में भी हाथ बंटाता था.  सुरेंद्र के पड़ोस में ही फूल सिंह पाल का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 1 बेटी प्रभा थी. प्रभा और कुलदीप एक ही स्कूल में पढ़ते थे. दोनों आसपास ही रहते थे, इसलिए स्कूल भी साथसाथ आतेजाते थे. दोनों साथसाथ खेलते और पढ़ते हुए जवान हुए तो उन की दोस्ती प्यार में कब बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला.

कुलदीप और प्रभा का प्यार कुछ दिनों तक तो चोरीछिपे चलता रहा, लेकिन वह इसे ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिपा न सके. वैसे भी प्यार कहां छिप पाता है. दोनों के प्रेमसंबंधों की बात गांव के लोगों तक पहुंची तो लोग उन के बारे में चटखारे ले ले कर बातें करने लगे.

गांव वालों से होते हुए यह बात किसी तरह प्रभा और कुलदीप के घर वालों के कानों तक पहुंची तो फूल सिंह ने पत्नी रानी से बात कर के प्रभा पर पाबंदी लगा दी कि वह घर के बाहर अकेली नहीं जाएगी. कहते हैं, बंदिशें लगाने से मोहब्बत और बढ़ती है. प्रभा की कुलदीप से मुलाकात भले ही नहीं हो पा रही थी, लेकिन फोन के जरिए बात होती रहती थी.

चूंकि उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि वे प्यार में आने वाली हर रुकावट का विरोध करेंगे, इसलिए वे बगावत पर उतर आए. जमाने की परवाह किए बगैर अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचाने के लिए वे जनवरी, 2012 में अपनेअपने घरों को छोड़ कर हरियाणा के गुड़गांव शहर चले गए. गुड़गांव में कुलदीप का एक दोस्त रहता था. कुलदीप ने उसी की मदद से आर्यसमाज रीति से प्रभा के साथ विवाह भी कर लिया. दोस्त की मदद से उसे दिल्ली की एक फैक्ट्री में नौकरी भी मिल गई. इस के बाद कुलदीप दिल्ली में किराए पर कमरा ले कर प्रभा के साथ रहने लगा.

प्रभा के इस तरह भाग जाने से फूल सिंह की बहुत बदनामी हुई. उस ने 16 जनवरी, 2012 को थाना घाटमपुर में कुलदीप के खिलाफ प्रभा को बरगला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट में उस ने प्रभा को नाबालिग बताया था. मामला नाबालिग लड़की का था, इसलिए पुलिस ने सुरेंद्र पाल और उस के परिवार वालों पर शिकंजा कसा. मजबूरन कुलदीप को वापस जाना पड़ा.

चूंकि कुलदीप के खिलाफ पहले से रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए पुलिस ने कुलदीप को गिरफ्तार कर के पूछताछ की. प्रभा का मैडिकल परीक्षण कराया. मैडिकल में प्रभा की उम्र 18 साल से ऊपर निकली. वह संभोग की अभ्यस्त पाई गई.  प्रभा ने कुलदीप की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा था कि उस ने कुलदीप के साथ अपनी मरजी से जा कर शादी की थी. प्रभा ने सुबूत के तौर पर अपने और कुलदीप के शादी के फोटो भी दिखाए. लेकिन पुलिस ने उस की एक न सुनी और कुलदीप को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

मजिस्ट्रेट के सामने प्रभा के बयान कराए गए तो प्रभा ने वही सब कहा जो उस ने पुलिस के सामने चीखचीख कर कहा था. प्रभा के बयान और उस के बालिग होने की रिपोर्ट के मद्देनजर मजिस्ट्रेट ने प्रभा को उस की मरजी के अनुसार जहां और जिस के साथ जाने व रहने की इजाजत दे दी.

अदालत के फैसले के बाद प्रभा ने अपने घर के बजाय सासससुर के साथ जाने की इच्छा जताई तो पुलिस ने उसे कुलदीप के घर पहुंचा दिया. बेटी के इस फैसले से फूल सिंह और उस के धर वालों ने बड़ी बेइज्जती महसूस की. कुछ दिनों बाद कुलदीप भी छूट कर घर आ गया. माहौल खराब न हो, इसलिए कुलदीप प्रभा को ले कर फिर से दिल्ली चला गया. जनवरी, 2013 में प्रभा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने शिवानी रखा.

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा. शिवानी भी 9 महीने की हो गई. अपने मातापिता से भी कुलदीप के संबंध ठीक हो गए थे. वह अकसर घर वालों से फोन पर बातचीत करता रहता था. लेकिन फूल सिंह ने बेटी से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर लिए थे. कुलदीप बेटी का मुंडन संस्कार कराना चाहता था, इसलिए घर वालों से बात कर के वह पत्नी और बेटी को ले कर 9 अक्तूबर, 2013 को अपने गांव ढुकुआपुर आ गया.

सुरेंद्र पाल ने मुंडन संस्कार की सारी तैयारियां पहले से ही कर रखी थीं. 10 अक्तूबर को बड़ी धूमधाम से शिवानी का मुंडन संस्कार हुआ. प्रभा के मातापिता ने कुलदीप को अपना दामाद स्वीकार नहीं किया था. वह कुलदीप से खुंदक खाए बैठा था. इसलिए सुरेंद्र ने मुंडन कार्यक्रम में फूल सिंह और उस के परिवार वालों को नहीं बुलाया था.

गांव वाले मुंडन की दावत खा कर जब लौट रहे थे तो तरहतरह की बातें कर रहे थे. वे बातें फूल सिंह ने सुनीं तो उस का खून खौल उठा. उस ने उसी समय कुलदीप और उस के घर वालों को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया. इस बारे में उस ने मोहद्दीपुर थाना बकेवर में रहने वाले अपने भाई रामप्रसाद से सलाह- मशविरा कर के उसे भी शामिल कर लिया. अब इंतजार था, सुरेंद्र के मेहमानों के चले जाने का. 13 अक्तूबर को उस के यहां से सभी मेहमान चले गए. केवल सुरेंद्र की बुआ श्यामा रह गई थीं.

14 अक्तूबर, 2013 की शाम सुरेंद्र खाना खा कर घर से करीब 50 मीटर दूर जानवरों के बाड़े में सोने चला गया. उस की पत्नी ममता बच्चों को खाना खिलाने की तैयारी कर रही थी तभी फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद आदि कुल्हाड़ी, चापड़ और डंडे ले कर सुरेंद्र के घर में दाखिल हुए.

घर वाले कुछ समझ पाते उस से पहले उन्होंने प्रभा की हत्या की, क्योंकि उसी की वजह से समाज में उन की नाक कटी थी. ममता बहू को बचाने आई तो उन्होंने उसे भी काट डाला. उस के बाद कुलदीप के दोनों पैर काट दिए. इतना सब कर के वे फरार हो गए. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद उर्फ छोटे पाल से पूछताछ कर के सभी को जेल भेज दिया.

पुलिस ने टुंडा उर्फ मामा से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. पुलिस का कहना था कि उस का एक हाथ कटा था. एक हाथ से वह किसी पर हमला नहीं कर सकता. दूसरे पुलिस जब उस के घर फरीदपुर पहुंची तो वह घर पर ही सोता मिला था. अगर वह हत्या जैसे जघन्य अपराध में शामिल होता तो अन्य हमलावरों की तरह वह भी घर से फरार होता. वह आराम से अपने घर में नहीं सो रहा होता.

उधर सुरेंद्र का कहना है कि टुंडा घटना में शामिल था. पुलिस ने जानबूझ कर उसे छोड़ दिया. सच्चाई जो भी हो, इस लोमहर्षक कांड ने यह तो साबित कर दिया है कि लोग खुद को कितना भी आधुनिक कहें, लेकिन अभी उन की सोच नहीं बदली है. अगर फूल सिंह बेटी की पसंद को स्वीकार कर लेता तो उसे इस जघन्य अपराध के आरोप में जेल न जाना पड़ता. कथा लिखे जाने तक कुलदीप अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्र और जनचर्चा पर आधारित

Love Story: बहन का प्यार – यार बना गद्दार

Love Story: निश्चित जगह पर पहुंच कर अखिलेश उर्फ चंचल को प्रियंका दिखाई नहीं दी तो वह बेचैन हो उठा. उस बेचैनी में वह इधरउधर  टहलने लगा. काफी देर हो गई और प्रियंका नहीं आई तो वह निराश होने लगा. वह घर जाने के बारे में सोच रहा था कि प्रियंका उसे आती दिखाई दे गई. उसे देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. प्रियंका के पास आते ही वह नाराजगी से बोला, ‘‘इतनी देर क्यों कर दी प्रियंका. मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. अच्छा हुआ तुम आ गईं, वरना मैं तो निराश हो कर घर जाने वाला था.

‘‘जब प्यार किया है तो इंतजार करना ही पड़ेगा. मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं कि जब मन हुआ, आ गई. लड़कियों को घर से बाहर निकलने के लिए 50 बहाने बनाने पड़ते हैं.’’ प्रियंका ने तुनक कर कहा.

‘‘कोई बात नहीं, तुम्हारे लिए तो मैं कईकई दिनों तक इंतजार करते हुए बैठा रह सकता हूं. क्योंकि मैं दिल के हाथों मजबूर हूं,’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘प्रियंका, मैं चाहता हूं कि तुम आज कालेज की छुट्टी करो. चलो, हम सिनेमा देखने चलते हैं.’’

प्रियंका तैयार हो गई तो अखिलेश पहले उसे एक रेस्टोरेंट में ले गया. नाश्ता करने के बाद दोनों सिनेमा देखने चले गए.

सिनेमा देखते हुए अखिलेश छेड़छाड़ करने लगा तो प्रियंका ने कहा, ‘‘दिनोंदिन तुम्हारी शरारतें बढ़ती ही जा रही हैं. शादी हो जाने दो, तब देखती हूं तुम कितनी शरारत करते हो.’’

‘‘शादी नहीं हुई, तब तो इस तरह धमका रही हो. शादी के बाद न जाने क्या करोगी. अब तो मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ अखिलेश ने कान पकड़ते हुए कहा.

‘‘अब मुझ से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है. शादी तो मैं तुम्हीं से करूंगी.’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘फिर तो मुझे यही गाना पड़ेगा कि ‘शादी कर के फंस गया यार.’’’ अखिलेश ने कहा तो प्रियंका हंसने लगी.

प्रियंका उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार के मोहल्ला बाड़ूजई प्रथम के रहने वाले चंद्रप्रकाश सक्सेना की बेटी थी. वह ओसीएफ में दरजी थे. उन के परिवार में प्रियंका के अलावा पत्नी सुखदेवी, 2 बेटे संतोष, विपिन तथा एक अन्य बेटी कीर्ति थी. बड़े बेटे संतेष की शादी हो चुकी थी. वह अपनी पत्नी प्रीति के साथ दिल्ली में रहता था.

कीर्ति की भी शादी शाहजहांपुर के ही मोहल्ला तारोवाला बाग के रहने वाले राजीव से हुई थी. वह अपनी ससुराल में आराम से रह रही थी. गै्रजएुशन कर के विपिन ने मोबाइल एसेसरीज की दुकान खोल ली थी. जबकि प्रियंका अभी पढ़ रही थी. प्रियंका घर में सब से छोटी थी, इसलिए पूरे घर की लाडली थी. विपिन तो उसे जान से चाहता था.

प्रियंका बहुत सुंदर तो नहीं थी, लेकिन इतना खराब भी नहीं थी कि कोई उसे देख कर मुंह मोड़ ले. फिर जवानी में तो वैसे भी हर लड़की सुंदर लगने लगती है. इसलिए जवान होने पर साधारण रूपरंग वाली प्रियंका को भी आतेजाते उस के हमउम्र लड़के चाहत भरी नजरों से ताकने लगे थे. उन्हीं में एक था उसी के भाई के साथ मोबाइल एसेसरीज का धंधा करने वाला अखिलेश यादव उर्फ चंचल.

अखिलेश उर्फ चंचल शाहजहांपुर के ही मोहल्ला लालातेली बजरिया के रहने वाले भगवानदीन यादव का बेटा था. भगवानदीन के परिवार में पत्नी सुशीला देवी के अतिरिक्त 3 बेटे मुनीश्वर उर्फ रवि, अखिलेश उर्फ चंचल, नीलू और 2 बेटियां नीलम और कल्पना थीं. अखिलेश उस का दूसरे नंबर का बेटा था. भगवानदीन यादव कभी जिले का काफी चर्चित बदमाश था. उस की और उस के साथी रामकुमार की शहर में तूती बोलती थी.

रामकुमार की हत्या कर दी गई तो अकेला पड़ जाने की वजह से भगवानदीन ने बदमाशी से तौबा कर लिया और अपने परिवार के साथ शांति से रहने लगा. लेकिन सन 2002 में उस के सब से छोटे बेटे नीलू की बीमारी से मौत हुई तो वह इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सका और कुछ दिनों बाद उस की भी हार्टअटैक से मौत हो गई.

बड़ी बेटी नीलम का विवाह हो चुका था. पिता की मौत के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी बड़े बेटे रवि ने संभाल ली थी. वह ठेकेदारी करने लगा था. हाईस्कूल पास कर के अखिलेश ने भी पढ़ाई छोड़ दी और मोबाइल एसेसरीज का धंधा कर लिया. एक ही व्यवसाय से जुड़े होने की वजह से कभी विपिन और अखिलेश की बाजार में मुलाकात हुई तो दोनों में दोस्ती हो गई थी.

दोस्ती होने के बाद कभी अखिलेश विपिन के घर आया तो उस की बहन प्रियंका को देख कर उस पर उस का दिल आ गया. फिर तो वह प्रियंका को देखने के चक्कर में अकसर उस के घर आने लगा. कहने को वह आता तो था विपिन से मिलने, लेकिन वह तभी उस के घर आता था, जब वह घर में नहीं होता था. ऐसे में भाई का दोस्त होने की वजह से उस की सेवासत्कार प्रियंका को करनी पड़ती थी. उसी बीच वह प्रियंका के नजदीक आने की कोशिश करता.

उस के लगातार आने की वजह से विपिन से उस की दोस्ती गहरी हो ही गई, प्रियंका से भी उस की नजदीकी बढ़ गई. इस के बाद विपिन और अखिलेश ने मिल कर मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली एक नामी कंपनी की एजेंसी ले ली तो उन का कारोबार भी बढ़ गया और याराना भी. इस से उन का एकदूसरे के घर आनाजान ही नहीं हो गया, बल्कि अब साथसाथ खानापीना भी होने लगा था.

अब अखिलेश को प्रियंका के साथ समय बिताने का समय ज्यादा से ज्यादा मिलने लगा था. उस ने इस का फायदा उठाया. उसे अपने आकर्षण में ही नहीं बांध लिया, बल्कि उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. वह विपिन की अनुपस्थिति का पूरा फायदा उठाने लगा. विपिन के चले जाने के बाद केवल मां ही घर पर रहती थी. वह घर के कामों में व्यस्त रहती थी. फिर उसे बेटी पर ही नहीं, बेटे के दोस्त पर भी विश्वास था, इसलिए उस ने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वे दोनों क्या कर रहे हैं.

प्रियंका अपने भाई और परिवार को धोखा दे रही थी तो अखिलेश अपने दोस्त के साथ विश्वासघात कर रहा था. वह भी ऐसा दोस्त, जो उस पर आंख मूंद कर विश्वास करता था. उसे भाई से बढ़ कर मानता था. प्रियंका और अखिलेश क्या कर रहे हैं, किसी को कानोकान खबर नहीं थी. जबकि जो कुछ भी हो रहा था, वह सब घर में ही सब की नाक के नीचे हो रहा था.

संतोष की पत्नी प्रीति को बच्चा होने वाला था, इसलिए संतोष ने प्रीति को शाहजहांपुर भेज दिया. डिलीवरी की तारीख नजदीक आ गई तो उसे जिला अस्पताल में भरती करा दिया गया. प्रीति के अस्पताल में भरती होने की वजह से विपिन और उस की मां का ज्यादा समय अस्पताल में बीतता था.

छुट्टी न मिल पाने की वजह से संतोष नहीं आ सका था. उस स्थिति में प्रियंका को घर में अकेली रहना पड़ रहा था. विपिन को अखिलेश पर पूरा विश्वास था, इसलिए प्रियंका और घर की जिम्मेदारी उस ने उस पर सौंप दी थी. अखिलेश और प्रियंका को इस से मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. जब तक प्रीति अस्पताल में रही, दोनों दिनरात एकदूसरे की बांहों में डूबे रहे.

26 फरवरी, 2014 को प्रीति को जिला अस्पताल में बेटा पैदा हुआ था. खुशी के इस मौके पर अखिलेश ने 315 बोर के 2 तमंचे और 10 कारतूस ला कर विपिन को दिए थे. भतीजा पैदा होने पर दोनों ने उन तमंचों से एकएक फायर भी किए थे. बाकी 8 कारतूस और दोनों तमंचे अखिलेश ने विपिन से यह कह कर उस के घर रखवा दिए थे कि भतीजे के नामकरण संस्कार पर काम आएंगे. विपिन ने दोनों तमंचे और कारतूस अपने कमरे में बैड पर गद्दे के नीचे छिपा कर रख दिए थे.

विपिन पुलिस में भरती होना चाहता था, इसलिए रोजाना सुबह 5 बजे उठ कर जिम जाता था. वहां से वह 9 बजे के आसपास लौटता था. कभीकभी उसे देर भी हो जाती थी. 23 मार्च को विपिन 9 बजे के आसपास घर लौटा तो मां नीचे बरामदे में बैठी आराम कर रही थीं. भाभी प्रीति बच्चे के साथ सामने वाले कमरे में लेटी थी. उस ने कपड़े बदले और ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में सोने के लिए चला गया.

विपिन ने दरवाजे को धक्का दिया तो पता चला वह अंदर से बंद है. इस का मतलब अंदर कोई था. उस ने आवाज दी, लेकिन अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी तो अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर अखिलेश और प्रियंका खड़े थे. दोनों की हालत देख कर विपिन को समझते देर नहीं लगी कि अंदर क्या कर रहे थे. उन के कपड़े अस्तव्यस्त थे और वे काफी घबराए हुए थे.

विपिन के कमरे में घुसते ही प्रियंका निकल कर नीचे की ओर भागी. विपिन का खून खौल उठा था. उस ने गुस्से में अखिलेश को एक जोरदार थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘तुझे मैं दोस्त नहीं, भाई मानता था. मैं तुझ पर कितना विश्वास करता था और तूने क्या किया? जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया.’’

‘‘भाई, मैं प्रियंका से सच्चा प्यार करता हूं और उसी से शादी करूंगा.’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘वह मुझ से शादी को तैयार है.’’

‘‘तुम दोनों को पता था कि हमारी जाति एक नहीं है तो यह कैसे सोच लिया कि तुम्हारी शादी हो जाएगी?’’ विपिन गुस्से से बोला, ‘‘तुम ने जो किया, ठीक नहीं किया. मेरी इज्जत पर तुम ने जो हाथ डाला है, उस की सजा तो तुम्हें भोगनी ही होगी.’’

अखिलेश को लगा कि उसे जान का खतरा है तो उस ने जेब से 315 बोर का तमंचा निकाल लिया. वह गोली चलाता, उस के पहले ही विपिन ने उस के हाथ पर इतने जोर से झटका मारा कि तमंचा छूट कर जमीन पर गिर गया. अखिलेश ने तमंचा उठाना चाहा, लेकिन विपिन ने फर्श पर पड़े तमंचे को अपने पैर से दबा लिया.

अखिलेश कुछ कर पाता, विपिन ने बैड पर गद्दे के नीचे रखे दोनों तमंचे और आठों कारतूस निकाल कर उस में से एक तमंचा जेब में डाल लिया और दूसरे में गोली भर कर अखिलेश पर चला दिया. गोली अखिलेश के सीने में लगी. वह जमीन पर गिर गया तो विपिन ने एक गोली उस के बाएं हाथ और एक पेट में मारी. 3 गोलियां लगने से अखिलेश की तुरंत मौत हो गई.

अखिलेश का खेल खत्म कर विपिन नीचे आ गया. प्रियंका बरामदे में दुबकी खड़ी थी. उस के पास जा कर उस ने पूछा, ‘‘मैं ने सही किया या गलत?’’

प्रियंका ने जैसे ही कहा, ‘‘गलत किया.’’ विपिन ने उस की कनपटी पर तमंचे की नाल रख कर ट्रिगर दबा दिया. प्रियंका कटे पेड़ की तरह फर्श पर गिर पड़ी. इस के बाद उस ने एक गोली और चलाई, जो प्रियंका के सीने में बाईं ओर लगी. प्रियंका की भी मौत हो गई. प्रियंका को खून से लथपथ देख कर उस की मां और भाभी बेहोश हो गईं.

अखिलेश और प्रियंका की हत्या कर विपिन घर से बाहर निकला तो सामने पड़ोसी सचिन पड़ गया. सचिन से उस की पुरानी खुन्नस थी. उस ने उस की ओर तमंचा तान दिया. विपिन का इरादा भांप कर सचिन अपने घर के अंदर भागा. विपिन भी पीछेपीछे उस के घर में घुस गया. सचिन कहीं छिपता, विपिन ने उस पर भी गोली चला दी. गोली उस की कमर में लगी, जिस से वह भी फर्श पर गिर पड़ा.

सचिन के घर से निकल कर विपिन अपने एक अन्य दुश्मन सतीश के घर में घुस कर 2 गोलियां चलाईं. लेकिन ये गोलियां किसी को लगी नहीं. अब तक शोर और गोलियों के चलने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले इकट्ठा हो गए थे. लेकिन विपिन के हाथ में तमंचा देख कर कोई उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका. इसलिए विपिन एआरटीओ वाली गली में घुस कर आराम से फरार हो गया.

किसी ने कोतवाली सदर बाजार पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी थी. चंद मिनटों में ही कोतवाली इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. इस के बाद उन की सूचना पर पुलिस अधीक्षक राकेशचंद्र साहू, अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) ए.पी. सिंह, फोरेंसिक टीम और डाग स्क्वायड की टीम भी वहां आ गई थी.

पुलिस तो आ गई, लेकिन अपनी नौकरी पर गए चंद्रप्रकाश को किसी ने इस बात की सूचना नहीं दी. काफी देर बाद सूचना पा कर वह घर आए तो बेटी की लाश देख कर बेहोश हो गए. एक ओर बेटी की लाश पड़ी थी तो दूसरी ओर उस की और उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में बेटा फरार था.

सचिन की हालत गंभीर थी. इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत सरकारी अस्पताल भिजवाया. उस की हालत को देखते हुए सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने उसे कनौजिया ट्रामा सेंटर ले जाने को कहा. लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. तब उसे वसीम अस्पताल ले जाया गया. डा. वसीम ने उस का औपरेशन कर के फेफड़े के पार झिल्ली में फंसी गोली निकाली. इस के बाद उस की हालत में कुछ सुधार हुआ.

फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य उठा लिए. डाग स्क्वायड टीम ने खोजी कुतिया लूसी को छोड़ा. वह विपिन के घर से निकल कर सतीश के घर तक गई, जहां विपिन ने 2 गोलियां चलाई थीं. घटनास्थल के निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों को समझते देर नहीं लगी कि मामला अवैध संबंधों में हत्या का यानी औनर किलिंग का है.

पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज ने अखिलेश के बड़े भाई मुनीश्वर यादव की ओर से विपिन सक्सेना के खिलाफ अखिलेश और प्रियंका की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद विपिन की तलाश शुरू हुई.

26 मार्च की सुबह पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विपिन को पुवायां रोड पर चिनौर से पहले हाइड्रिल पुलिया के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस समय वह अपने चचेरे भइयों सुशील और लल्ला के पास चिनौर जा रहा था. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में विपिन ने पुलिस को बताया कि जिस यार को मैं भाई की तरह मानता था, उस ने मेरी इज्जत पर हाथ डाला तो मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं ने उस का खून कर दिया. घटना को अंजाम देने के बाद वह एआरटीओ वाली गली के पास से निकल रहे नाले में अखिलेश से छीना तमंचा और अपनी खून से सनी टीशर्ट निकाल कर फेंक दी थी.

खाली बनियान और जींस पहने हुए वह एआरटीओ गली से रोडवेड बसस्टैंड पहुंचा. यहां से उस ने निगोही जाने के लिए सौ रुपए में एक आटो किया. निगोही जाते समय रास्ते में उस ने दूसरा तमंचा फेंक दिया. निगोही से वह प्राइवेट बस से बरेली पहुंचा. बरेली में उस ने नई टीशर्ट खरीद कर पहनी. पूरे दिन वह इधरउधर घूमता रहा. रात को उस ने बरेली रेलवे स्टेशन से दिल्ली जाने के लिए टे्रन पकड़ ली.

दिल्ली में विपिन बड़े भाई संतोष के यहां गया. उसे उस ने पूरी बात बताई. संतोष को पता चल गया कि प्रियंका मर चुकी है, फिर भी वह उस के अंतिम संस्कार में शाहजहांपुर नहीं गया. संतोष को जब पता चला कि पुलिस विपिन की गिरफ्तारी के लिए घर वालों तथा रिश्तेदारों को परेशान कर रही है तो उस ने उसे घर भेज दिया.

26 मार्च को विपिन अपने चचेरे भाइयों के पास चिनौर जा रहा था, तभी पुलिस ने मुखबिरों से मिली सूचना पर गिरफ्तार कर लिया था. उस समय भी उस के पास एक तमंचा था.

पूछताछ में विपिन ने बताया था कि उस के पास कारतूस नहीं बचे थे. अगर कारतूस बचा होता तो वह खुद को भी गोली मार लेता. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस ने विपिन को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Punjab Crime: गर्भ में पल रहे बच्चे का सौदा करने वाला गिरोह

Punjab Crime: पंजाब के लुधियाना में औरतों का एक ऐसा गिरोह पकड़ा गया है, जो नवजात बच्चों की तो खरीदफरोख्त करता ही था, गर्भ में पलने वाले बच्चे का भी सौदा कर लेता था.

फोन पर दूसरी ओर से बारबार यही आवाज आ रही थी कि जिस नंबर पर आप बात करना चाहते हैं, वह या तो कवरेज एरिया से बाहर है या बंद है. लेकिन शामलाल ने हिम्मत नहीं हारी और थोड़ीथोड़ी देर पर वह उस नंबर को मिलाते रहे. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और दूसरी ओर घंटी बज उठी. उस समय शाम के साढ़े 4 बज रहे थे और तारीख थी 15 फरवरी, 2016. दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो शामलाल के कानों में किसी आदमी की भारी आवाज गूंजी, ‘‘हां जी बताइए, किस से बात करनी है, कहीं किसी गलत नंबर पर तो फोन नहीं मिला दिया? मैं तो आप को जानता नहीं.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने एकदम सही नंबर मिलाया है. काफी देर से कोशिश कर रहा हूं, तब कहीं जा कर आप का फोन लगा है.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन आप बोल कौन रहे हैं? आप को किस से बात करनी है?’’ दूसरी ओर से अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘दरअसल, हमारी पहली बार बात हो रही है, इस से पहले हमारी कभी बात नहीं हुई. आप मिस्टर तेजवीर सिंह बोल रहे हैं न?’’

‘‘देखिए, पहले आप अपने बारे में बताइए. उस के बाद किस काम के लिए फोन किया है, यह बताइए. और हां, मेरा यह नंबर आप को कहां से मिला?’’ दूसरी ओर से उसी अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘आप का नंबर आप के एक खास दोस्त काला ने मुझे दिया है.’’

‘‘कहां रहता है यह काला?’’

‘‘यहीं लुधियाना में, उस का पता बताऊं?’’

‘‘तब तो आप भी लुधियाना से ही बोल रहे होंगे?’’ इस बार दूसरी ओर से थोड़ा नरमी से पूछा गया.

‘‘जी हां, मैं लुधियाना से ही बोल रहा हूं. वर्धमान चौक के पास मेरी कोठी है और घंटाघर के सामने वाली बिल्डिंग में मेरा औफिस है. यहां मुझे सब ठेकेदार शामलाल के नाम से जानते हैं. काला आप की बड़ी तारीफें कर रहा था. कह रहा था कि आप मेरा काम चुटकी बजा कर करवा देंगे.’’

‘‘बताइए, आप की परेशानी क्या है?’’

‘‘ऐसा है कि मेरी शादी हुए 5 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अभी तक मैं बच्चे का मुंह देखने को तरस रहा हूं. मां न बन पाने की वजह से मेरी पत्नी भी डिप्रैशन का शिकार हो गई है. न कहीं आतीजाती है और न किसी से ज्यादा मिलतीजुलती है, गुमसुम सी अपने कमरे में पड़ी रहती है.’’

‘‘डाक्टर को नहीं दिखाया, आखिर बच्चा क्यों नहीं हो रहा?’’

‘‘बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखा दिया है, लेकिन कहीं से कोई फायदा नहीं हुआ. अब यही सोच रहे हैं कि किसी और का बच्चा ले कर पाल लें.’’

‘‘तो किसी अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लीजिए. इस में परेशानी क्या है?’’

‘‘आप की बात सही है, लेकिन मेरी पत्नी इस के लिए राजी नहीं है. क्योंकि ऐसा करने से उस पर बांझ की मोहर लग जाएगी. हमें तुरंत का जन्मा बच्चा चाहिए, जिस के बारे में मेरी पत्नी कह सके कि उसे उस ने पैदा किया है. इस बारे में मेरी काला से बात हुई तो उस ने कहा कि पैसा ले कर आप मेरा काम आसानी से कर देंगे.’’

‘‘आसानी से कैसे कर देंगे भाई? यह बहुत ही मुश्किल काम है. कई लोगों से संपर्क करना पड़ेगा. वैसे भी यह काम मैं सीधे नहीं कर सकता. जो भी करेंगी, डाक्टर साहब करेंगी. मैं उन से एक बार बात कर लेता हूं, उस के बाद आप को बताता हूं. और हां, काला ने आप को यह भी बताया ही होगा कि इस तरह के काम में काफी पैसा लगता है.’’

‘‘बताया है न. मैं ने उस से भी कहा था और आप से भी कह रहा हूं कि आप पैसों की जरा भी चिंता न करें. बस मेरा काम होना चाहिए. आप जितना भी पैसा मांगेंगे, मैं उस से ज्यादा दूंगा. पैसों की मेरे पास कोई कमी नहीं है. बस हां, बच्चा इस तरह का होना चाहिए कि देखने में अच्छे घर का लगे. खूबसूरत भी होना चाहिए.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम तो पेमेंट के हिसाब से बच्चा देते हैं. आप जैसा पेमेंट करेंगे, आप को वैसा ही बच्चा मिलेगा. मैं डाक्टर मैडम से बात करता हूं.’’ कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया.

फरवरी, 2016 के दूसरे सप्ताह में लुधियाना के डीसीपी डा. नरेंद्र भार्गव को अपने किसी माध्यम से सूचना मिली थी कि शहर में कुछ महिलाओं का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो किसी गरीब महिला के गर्भवती होने पर उस के पेट में पल रहे बच्चे (भ्रूण) को अच्छेखासे दामों में बेच कर आपराधिक धंधा कर के अच्छीखासी कमाई कर रहा है. दरअसल, महिलाओं का यह गिरोह बिना औलाद वाली महिलाओं को नवजात बच्चा बेच कर उन से अच्छीखासी रकम वसूल करता था.

यही नहीं, इस गिरोह के सदस्य उन गरीब औरतों के बारे में पता लगाती रहती थीं, जिन के कई बच्चे पहले से ही होते थे, इस के बावजूद वे गर्भवती हो जाती थीं. ऐसी महिलाओं को गर्भ ठहरने की खुशी कम, समस्या ज्यादा प्रतीत होती थी. ऐसी ही महिलाओं को पैसों का लालच दे कर वे औरतें उस का बच्चा पैदा होते ही ले कर बेऔलाद अमीर महिलाओं को अच्छेखासे दामों में बेच देती थीं. नरेंद्र भार्गव ने इस गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए एडिशनल डीसीपी (मुख्यालय) ध्रुव दहिया के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में सीआईए-2 के इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह, उन के रीडर सुखपाल सिंह, एएसआई सतनाम सिंह, हवलदार कुलवंत सिंह, राजेश कुमार, सिपाही दलजीत सिंह, होमगार्ड के जवान जितेंद्र कुमार एवं महिला सिपाही सुरेंद्र कौर को शामिल किया गया.

टीम नवजात बच्चों का सौदा करने वाले गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए भागदौड़ करने लगी. इसी के साथ इस टीम ने अपने मुखबिरों को भी सहेज दिया था. पुलिस टीम ने बहुत जल्दी इस गिरोह के बारे में पता कर लिया. उस में एक पुरुष भी शामिल था, जिस का नाम तेजवीर सिंह था. वही फोन पर ग्राहकों से बात कर के सौदा करता था. उस का मोबाइल नंबर भी पुलिस के हाथ लग गया था. इस के बाद एक आदमी को नकली ग्राहक बना कर नवजात बच्चा खरीदने के लिए तेजवीर सिंह को फोन किया गया. नकली ग्राहक ने अपना नाम रखा था- ठेकेदार शामलाल.

15 फरवरी, 2016 की शाम 4 बजे नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल की तेजवीर से बात हुई थी. 6 बजे तक कोई जवाब नहीं मिला तो शामलाल ने उसे दोबारा फोन किया. दूसरी ओर से तेजबीर ने छूटते ही कहा, ‘‘ऐसा है ठेकेदार साहब, मैं ने डाक्टर मैडम से बात कर ली है, उन्होंने आप के काम के लिए आगे की काररवाई शुरू कर दी है. मेरे सामने ही उन्होंने कई लोगों को फोन किए हैं.’’

‘‘आप को क्या लग रहा है, मेरा काम हो जाएगा न?’’ शामलाल ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘बिलकुल हो जाएगा जी. बस आप हमें थोड़ा समय दीजिए. मेरे पास कुछ बच्चे हैं, लेकिन उन में आप जैसा बच्चा चाहते हैं, वैसा नहीं है. आप के लिए हम एकदम गोराचिट्टा और सेहतमंद बच्चा देख रहे हैं, जो पहली ही नजर में अमीर घर का लगे. क्योंकि उसे बनाना भी तो अमीर घर की औलाद है.’’

‘‘यह बात आप ने एकदम सही कही. सुन कर मन इतना खुश हुआ कि अगर आप सामने होते तो डील की रकम से अलग लाख रुपए अभी निकाल कर इनाम के रूप में आप के हाथ में रख देता.’’

‘‘कोई बात नहीं ठेकेदार साहब, हम आप से इनाम जरूर लेंगे. लेकिन पहले आप के आदेश के अनुसार काम कर दूं. आप को ऐसा खूबसूरत बच्चा ला कर देंगे कि आप और आप की मेमसाहब देखते रह जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, अब यह बताओ कि बच्चा हमें कब मिल रहा है? मैं ने इस बारे में अपनी पत्नी को भी बता दिया है. इसलिए वह बारबार फोन कर के एक ही बात पूछ रही है कि बच्चा कब ला कर उस की गोद में डाल रहा हूं.’’

‘‘आप को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा ठेकेदार साहब. जैसे ही बच्चा हमारे पास पहुंचेगा, हम तुरंत आप को फोन कर के बता देंगे और उसी समय आप के पास तक बच्चे को पहुंचाने चल देंगे. बस आप कैश तैयार रखिएगा. डील फाइनल होते ही मैं आप को पैसे के बारे में बता दूंगा.’’

‘‘मैं ने कहा न कि आप को पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उम्मीद से कहीं ज्यादा पैसे मिलेंगे आप लोगों को.’’

फिलहाल बात यहीं खत्म हो गई.

इस के बाद उसी दिन रात 9 बजे तेजवीर सिंह का फोन आया. उस ने जल्दीजल्दी कहा, ‘‘निहायत खूबसूरत बच्चे की व्यवस्था हो गई है. हम उसे मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 से ले कर एक घंटे बाद यानी ठीक 10 बजे वर्धमान चौक पर पहुंच रहे हैं. इस के लिए आप को 5 लाख रुपए देने हैं, जो आप को कैश में लाना है. बच्चा अभी एक हफ्ते का भी नहीं हुआ है, उसे संभालने के लिए आप अपनी पत्नी को भी साथ ले आइएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं रुपए ले कर 10 बजे से पहले ही वर्धमान चौक के बाईं ओर वाले फुटपाथ पर अपनी पत्नी के साथ खड़ा रहूंगा.’’ नकली ग्राहक बने ठेकेदार शामलाल ने कहा.  इस के बाद फोन कट गया.

तेजवीर सिंह से फोन पर यह बातचीत सीआईए के औफिस से ही हो रही थी. इस बात की जानकारी डीसीपी नरेंद्र भार्गव को दी गई तो उन्होंने कहा, ‘‘किसी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर के वर्धमान चौक के पास पूरी फोर्स के साथ तैनात हो जाओ. नकली ग्राहक को ब्रीफकेस दे कर फुटपाथ पर खड़ा कर दो. उन लोगों के आने पर वह उन से बातचीत करे. गिरोह के बारे में पता चलते ही वह अपने फोन से तुम्हारे फोन पर मिस्डकाल करे. उस के बाद तुम अपनी टीम के साथ उन्हें घेर कर गिरफ्तार कर लो. और हां, नकली ग्राहक इस बात का भी ध्यान रखे कि उस समय बच्चा उन के पास मौजूद होना चाहिए.’’

‘‘जी हां, ऐसा ही होगा.’’ जितेंद्र सिंह ने कहा.

इस के बाद उन्होंने मुखबिरी को आधार बना कर एएसआई सतनाम सिंह से तहरीर ले कर भादंवि की धारा 370 एवं ह्यूमन ट्रैफिकिंग एक्ट की धारा 2 के तहत थाना डिवीजन नंबर 7 में अपराध क्रमांक 30 पर रिपोर्ट दर्ज करवा दी. इस के बाद अपनी पुलिस टीम के साथ नकली ग्राहक बने कथित ठेकेदार शामलाल को साथ ले कर वर्धमान चौक पहुंच गए. अब उन्हें इंतजार था तेजवीर सिंह के अगले फोन का. नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल को एक खाली ब्रीफकेस दे कर चौक के बाईं ओर फुटपाथ पर खड़ा कर दिया गया था. बाकी पुलिस टीम वहीं एक जगह छिप कर खड़ी हो गई थी. अपनी सरकारी गाड़ी बोलेरो पीबी 10 बीयू 8036 को भी उन्होंने छिपा दिया था.

ठीक 10 बजे तेजवीर सिंह ने शामलाल को फोन किया, ‘‘हां जी ठेकेदार साहब, हम वर्धमान चौक से थोड़ा पीछे हैं. बस 2 मिनट में पहुंच जाएंगे. आप पैसा ले कर पहुंच गए हैं न?’’

‘‘जी हां, मैं बताई गई जगह पर पैसों से भरा ब्रीफकेस लिए आप का ही इंतजार कर रहा हूं.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘ठीक है ठेकेदार साहब, बस 2 मिनट में हम भी पहुंच रहे हैं आप तक.’’ कह कर तेजवीर ने फोन काट दिया. शामलाल ने तुरंत इस बारे में जितेंद्र सिंह को उन के मोबाइल पर बता दिया, जिस से उन्होंने अपनी पुलिस टीम को सतर्क कर दिया. मुश्किल से 5 मिनट गुजरे होंगे कि सफेद रंग की मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 फुटपाथ के पास वहीं आ कर रुकी, जहां ब्रीफकेस लिए शामलाल खड़े थे. कार के रुकते ही शामलाल तेज कदमों से उस के पास पहुंच कर कार के अंदर देखा तो उस की ड्राइविंग सीट पर एक सरदार बैठा था और बगल वाली सीट पर एक औरत बैठी थी.

शामलाल को देखते ही सरदार ने खिड़की से सिर बाहर निकाल कर कहा, ‘‘आप ठेकेदार शामलाल हो न?’’

‘‘और आप तेजवीर सिंह?’’

‘‘जी, मैं ही तेजवीर हूं, मुझ से ही आप की फोन पर बात हुई थी. मैं ने आप की आवाज पहचान ली है. अच्छा, यह ब्रीफकेस मुझे दे दो, पूरे 5 लाख हैं न?’’

‘‘उस से ज्यादा हैं, लेकिन पहले बच्चा तो दो. उस के बाद ही पैसे मिलेंगे.’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. पिछली सीट पर देखो, कितना प्यारा बच्चा है.’’ कह कर तेजवीर ने कार के अंदर की लाइट जला दी.

शामलाल ने कार की उस रोशनी में पिछली सीट पर देखा तो वहां 2 औरतें बैठी थीं, जिन में से एक ने अपनी गोद में पड़े कपड़े को हटाया तो उस की गोद में बहुत ही खूबसूरत बच्चा लेटा दिखाई दिया. शामलाल ने खुशी का इजहार करते हुए कहा, ‘‘बच्चा तो ठीक वैसा ही है, जैसा मैं चाहता था.’’

‘‘तो जल्दी से बच्चा उठाइए और पैसे मेरे हवाले कीजिए.’’ तेजवीर ने इधरउधर देखते हुए कहा.

‘‘भई ये पैसे तो मैं आप के लिए ही लाया हूं. बस मेरी मिसेज जरा आ जाएं.’’

‘‘वह कहां हैं? उन्हीं को तो संभालना है यह छोटा सा बच्चा.’’

‘‘वह अपनी बहन को लेने गई हैं. बस आती ही होंगी. आप कहें तो मैं फोन कर के पूछ लूं.’’

‘‘बिलकुल पूछ लो.’’ तेजवीर ने जल्दी से कहा.

शामलाल ने तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह का नंबर मिला दिया. लेकिन उन्होंने बात करने के बजाय मिस्डकाल कर के छोड़ दिया. इस के बाद तेजवीर से कहा, ‘‘फोन रिसीव करने के बजाय काट दिया. इस का मतलब वह पास में ही हैं.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं. थोड़ा इंतजार कर लेते हैं.’’ कह कर तेजवीर ने कार का इंजन बंद कर दिया.

तभी पुलिस टीम ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया. तेजवीर को समझते देर नहीं लगी कि ठेकेदार शामलाल ने ग्राहक बन कर होशियारी से उसे फंसाया है. जितेंद्र सिंह ने बच्चे को एक महिला सिपाही के हवाले कर दिया और वहीं पूछताछ शुरू कर दी. सइस पूछताछ में तेजवीर ने जो बताया, उस के अनुसार, वह पंजाब के जिला मोगा के कस्बा धर्मकोट का रहने वाला था. उस की बगल वाली सीट पर उस की पत्नी रछपाल कौर बैठी थी. वह आरएमपी डाक्टर थी. कार की पिछली सीट पर जो 2 महिलाएं बैठी थीं, उन के नाम बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर थे.

बलजिंदर कौर लुधियाना के शिमलापुरी के रहने वाले जागीर सिंह की पत्नी थी, जबकि गुरमीत कौर फरीदकोट के जैतो मंडी के रहने वाले हरभजन सिंह की पत्नी थी. उन्होंने वहीं स्वीकार कर लिया था कि वे सभी नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त के अलावा गर्भ में पलने वाले बच्चों का भी सौदा करते थे. सीआईए केंद्र ला कर रात में पूछताछ करने के बजाय इन सभी के हवालात में बंद कर दिया गया था. अगले दिन चारों को लुधियाना के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अजयपाल सिंह की अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. बच्चे को अदालत के आदेश पर एक धार्मिक संस्थान के बाल संरक्षण केंद्र के हवाले कर दिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में गिरफ्तार चारों अभियुक्तों ने जो बताया, उस से जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान करने वाली थी. ये लोग नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त तो करते ही थे, ये गर्भ में पल रहे बच्चों तक का सौदा कर लेते थे. तेजवीर सिंह ड्राइवर था. वह टैक्सी के रूप में दूसरों की गाडि़यां चलाता था. अपनी कार खरीद कर उसे टैक्सी के रूप में चलाना उस का सपना था, जो अरसा बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो रहा था. उस की पत्नी रछपाल कौर आरएमपी (रजिस्टर्ड मैडिकल प्रैक्टीशनर) डाक्टर थी. घर के एक कमरे में उस ने अपना क्लिनिक खोल रखा था, लेकिन उस के यहां मरीज नाममात्र के ही आते थे. लिहाजा उन का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था.

करीब 2 साल पहले की बात है. बगल के गांव की एक औरत रछपाल की क्लिनिक पर आई. वह गर्भवती थी. वह इस अजन्मे बच्चे से छुटकारा चाहती थी. यानी वह अपना गर्भपात कराना चाहती थी. इस काम के लिए रछपाल कौर को अच्छाखासा पैसा मिल सकता था, लेकिन यह सब करने का उसे अनुभव नहीं था. फिर यह गैरकानूनी भी था. इसलिए वह ऐसा करने से घबरा रही थी. लेकिन उस की क्लिनिक पर मुश्किल से यह मरीज आया था, इसलिए वह उसे खाली हाथ लौटाना भी नहीं चाहती थी.

उस के दिमाग में एक तरकीब आई. उस ने उस औरत को सुझाव दिया कि वह गर्भ गिराने के बजाय अपने इस बच्चे को जन्म दे कर उसे दे दे. वह उसे सर्टिफिकेट दे देगी कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. उस ने सोचा कि इस के बाद वह बच्चा किसी बेऔलाद दंपत्ति को दे देगी. इस से वह जीव हत्या से भी बच जाएगी और किसी उदास परिवार को खुशियां मिल जाएंगी. उस औरत को रछपाल की बात जंच गई. रछपाल ने उस से जो कहा था, वह उस के लिए तैयार हो गई.

रछपाल ने औरत से बच्चे को जन्म देने के लिए कह तो दिया, लेकिन यह तय नहीं कर पाई थी कि वह उस बच्चे का करेगी क्या? इस के कुछ महीने बाद एक दिन रछपाल लुधियाना जा रही थी तो बस में उस की मुलाकात बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर से हो गई. तीनों एक ही सीट पर अगलबगल बैठी थीं. बातचीत शुरू हुई तो रछपाल ने उन्हें अपने बारे में बता कर उस महिला का किस्सा कह सुनाया. इस पर बलजिंदर और गुरमीत ने कहा, ‘‘वह बच्चा हमें दे देना, उस के लिए हम आप को एक लाख रुपए देंगे.’’

रछपाल की तो जैसे लौटरी लग गई. समय पर उस ने उस महिला की डिलिवरी करा कर उस से 2 हजार रुपए ले कर सर्टीफिकेट बना दिया कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. इस के बाद रछपाल ने बच्चा बलजिंदर और गुरमीत को दे कर एक लाख रुपए ले लिए. दरअसल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर का यही धंधा था. वे नवजात बच्चा खरीद कर उसे दोगुनीतिगुनी कीमत पर निस्संतान लोगों को बेच देती थीं. यही नहीं, वे गर्भवती गरीब औरतों को एडवांस दे कर उन के पेट में पल रहे बच्चों का भी सौदा कर लेती थीं.

उन के गिरोह में कई आशा वर्करों के अलावा 2 महिलाएं और शामिल थीं. उन में एक थी परमजीत कौर. वह लुधियाना के जमालपुर के रहने वाले देवेंद्र सिंह की पत्नी थी. दूसरी थी मधु वर्मा. वह लुधियाना के बसंतनगर के रहने वाले मंजीत सिंह की विधवा थी. इस के बाद बलजिंदर और गुरमीत ने रछपाल कौर को असलियत बता कर उसे भी अपने गिरोह में शामिल कर लिया. इस के बाद रछपाल ने अपने पति तेजवीर सिंह को एक पुरानी मारुति कार दिला कर उसे भी इसी धंधे से लगा दिया.

पुलिस पूछताछ में इन लोगों ने 7 नवजात बच्चों को बेचने और गर्भ में पल रहे कई बच्चों का सौदा करने की बात स्वीकार की थी. इसी पूछताछ में यह भी पता चला था कि गुरमीत कौर और बलजिंदर कौर एक बार इसी तरह के मामले में फरीदकोट पुलिस द्वारा पकड़ी गई थीं. दोनों जमानत पर छूटी थीं. फरीदकोट की अदालत में अभी भी उन पर मुकदमा चल रहा है. एक बार फिर तेजवीर सिंह, रछपाल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

उसी दिन समरासा चौक से परमजीत कौर और मधु वर्मा को भी हिरासत में ले लिया गया. उन्हें भी 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई. पूछताछ कर उन्हें भी अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस के अनुसार, इस गिरोह ने पंजाब में अपना अच्छाखासा नैटवर्क बना रखा था. पुलिस इन से जुड़े तमाम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. इन लोगों ने जो बच्चा नकली ग्राहक शामलाल को बेचना चाहा था, उसे जिला फाजिल्का के गांव आरनीया के एक परिवार से ढाई लाख रुपए में खरीदा था.

लुधियाना पुलिस के वहां पहुंचने तक वह परिवार भूमिगत हो गया था. लुधियाना पुलिस इस मामले के पीछे हाथ धो कर पड़ी है. वह इस गिरोह से जुड़े हर आदमी को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करना चाहती है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, ठेकेदार शामलाल बदला हुआ नाम है Punjab Crime

Bhopal Crime Story: आधी हकीकत आधा फसाना

Bhopal Crime Story: कुछ लोग प्राकृतिक रूप से किन्नर होते हैं, जबकि कुछ को किन्नर बनाया जाता है. अबरार उर्फ सारिका के साथ भी ऐसा ही कुछ था. फैशनेबल सारिका जब शहर की सड़कों पर निकलती थी तो मनचलों की तो छोडि़ए, कई शरीफजादों तक की नीयत डोल जाती थी. पुराने भोपाल के कैंची छोला इलाके की रहने वाली इस खूबसूरत लड़की के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. अलबत्ता कुछ लोगों को यह जरूर पता था कि सारिका हकीकत में लड़की नहीं, लड़का है, जिस का असली नाम अबरार है.

अबरार उर्फ सारिका भी उन लाखों लोगों में से एक था, जिस का जन्म तो लड़के के रूप हुआ था, लेकिन उस की शक्ल, सूरत, नजाकत और अदाएं लड़कियों जैसी थीं. आम बोलचाल की भाषा में ऐसे लोगों को किन्नर कहा जाता है. सारिका मूलरूप से कहां की रहने वाली थी, उस के मांबाप कौन थे, इस की जानकारी जिन लोगों को थी, उन में से अधिकांश अब जेल में हैं. कुछ दिनों पहले किन्नरों की एक टोली जो शहर में मंजू एंड पार्टी के नाम से जानी जाती थी, ने सारिका से ताल्लुक बढ़ाने के बाद झांसा दिया कि वह उन लोगों के साथ रहे और उन की टोली में शामिल हो जाए. काम के नाम पर उसे बधाई के समय बस उन के साथ डांस करना है. इस के एवज में उसे रोज 3 हजार रुपए मिलेंगे.

पेशकश बुरी नहीं थी. एक दिन में 3 हजार रुपए कमाना बड़ी बात थी, इसलिए सारिका मना नहीं कर पाई. मंजू एंड पार्टी भी उसे बेवजह इतना पैसा नहीं दे रही थी. दरअसल सारिका के जलवे और अदाएं देख कर पार्टी के सदस्यों को लगा था कि अगर वह भी उन के साथ आ जाए तो कमाई बढ़ जाएगी. वजह यह, हूबहू लड़कियों जैसे दिखने वाले किन्नरों की खासी पूछ रहती है. लोग इन पर पैसा लुटाने से परहेज नहीं करते. बातचीत के बाद सारिका ने टोली के साथ नाचनागाना शुरू कर दिया. साथसाथ काम करते हुए अभी कुछ ही दिन ही गुजरे थे कि सारिका पर शारीरिक रूप से किन्नर बनने का दबाव पड़ने लगा.

लेकिन सारिका के अंदर बैठे अबरार को यह मंजूर नहीं था. लिहाजा उस ने पूरी तरह किन्नर बनने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप कुछ दिनों बाद ही मंजू एंड पार्टी ने उस पर चोरी का इलजाम लगा दिया. लेकिन तब तक अच्छाखासा पैसा कमा चुकी सारिका पर इस इलजाम का कोई खास फर्क नहीं पड़ा. वह इस की वजह भी समझ रही थी. अपने अतीत को छिपाए रखने वाली सारिका बीती 9 फरवरी, 2016 को अचानक उस समय सुर्खियों में आई जब उस ने जहांगीराबाद थाने जा कर यह रिपोर्ट लिखाई कि आधा दरजन किन्नरों ने उसे अगवा कर के किन्नर बना दिया.

उस दिन बदहवास सी सारिका जब पुलिस मुख्यालय में एसपी अंशुमान सिंह के पास पहुंची तो धारीदार फुल शर्ट और काले रंग की हाफ पैंट पहने थी. उसे देख कर एसपी ने भी यही सोचा कि इस लड़की के साथ जरूर कोई ज्यादती हुई है. बाद में पूछताछ करने पर सारिका ने पुलिस वालों को जो कुछ बताया, वह न केवल दिलचस्प था, बल्कि चौंका देने वाला भी था. सारिका के मुताबिक करीब 5 दिन पहले 6 किन्नर उस के घर आए और उसे अगवा कर के सुरैया मुजरा किन्नर के घर ले गए.

सुरैया किन्नर समुदाय का मुखिया है, इसलिए भोपाल में उसे सभी जानते थे. वह विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका है. भोपाल का मंगलवारा इलाका किन्नरों की रिहाइश के लिए जाना जाता है. यहीं सुरैया मुजरा भी रहता है. सारिका ने आगे बताया कि किन्नर उसे मंगलवारा स्थित सुरैया के अड्डे पर ले गए और बेहोश कर दिया. 5 दिन बाद जब उसे होश आया तो उस का गुप्तांग गायब था. पूछने पर किन्नरों ने उसे बताया कि हम ने तुझे भी अपने जैसा बना दिया है.

सारिका उर्फ अबरार की जिंदगी में पहले से ही गमों की कमी नहीं थी, अब उसे यह बड़ा सदमा मिला था. वैसे किन्नर और उन की दुनिया उस के लिए नए और अनजाने नहीं थे. सच तो यह है कि धीरेधीरे उन की दुनिया उस की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही थी. ज्ञापन में उन्होंने बताया कि नकली किन्नरों के लीडर निम्मा और सुनील हैं. इन के ग्रुप में नैना, बुलबुल, तानिया, दिव्या, रूपाली, अलकिया, बिहारन, हिना, छमिया, बिल्लो, नेहा, रानी और सारिका शामिल हैं.

सारिका की बात सुन कर एसपी अंशुमान सिंह ने उसे रिपोर्ट लिखाने के लिए जहांगीराबाद थाने भेज दिया. जहां सारिका ने थाने में 6 किन्नरों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. इन में सब से ऊपर जो नाम थे, उन में प्रमुख थे सुरैया मुजरा, खुशी और काजल. मामला पुलिस तक पहुंच गया था, इसलिए किन्नर गुटों के बीच भीतरी तौर पर तलवारें खिंचने लगी थीं.

सारिका के साथ जहां घटना घटी थी, वह इलाका मंगलवारा थानाक्षेत्र में आता था, इसलिए इस केस को मंगलवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया गया. थाना पुलिस ने मैडिकल जांच के लिए सारिका को अस्पताल भेज दिया. इस दौरान सुरैया और उस के साथी किन्नर नेताओं, पत्रकारों, अफसरों और वकीलों के चक्कर काटते रहे. क्योंकि पुलिस ने आरोपी किन्नरों सुरैया, शिल्पा, सबा, नीतू और शबाब आदि के खिलाफ धारदार हथियार से जान लेने की कोशिश करने, बंधक बनाने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज कर लिया था.

उसी दिन खुद को असली बताने वाले नगर के किन्नरों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि कुछ नकली किन्नर नाचगा कर पैसा वसूल रहे हैं, जिस से उन की छवि भी बिगड़ रही है और रोजीरोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है. किन्नरों के एक गुट ने राजभवन जा कर राज्यपाल रामनरेश यादव के नाम एक ज्ञापन भी दिया था. सुरैया और उस के साथियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो गया तो गिरफ्तारी से बचने के लिए पांचों किन्नर फरार हो गए. लेकिन मुखबिर की सूचना पर सबा और नीतू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन का कहना था कि अबरार उर्फ सारिका अपनी मरजी से किन्नर बना है. पूछताछ के बाद गिरफ्तार हुए किन्नरों को जेल भेज दिया गया.

जो किन्नर फरार चल रहे थे, उन्होंने अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश प्रसाद मिश्रा की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने उन की जमानत की अर्जी खारिज कर दी. आखिरकार 24 फरवरी, 2016 को पुलिस ने किन्नर वाली गली से सुरैया और सबा को भी धर दबोचा. दोनों को अदालत में पेश कर के उन का पुलिस कस्टडी रिमांड लिया गया, ताकि उन से विस्तृत पूछताछ की जा सके.

पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. अब यह अदालत तय करेगी कि सारिका का गुप्तांग जबरन काटा था या इस में उस की कोई रजामंदी थी. और थी भी तो इस संबंध में कानून क्या कहता है. किन्नर जब इस तरह किसी का लिंग काट कर उसे किन्नर बनाते हैं तो कोई समारोह आयोजित नहीं करते और न ही पुलिस को सूचना देते हैं. असली किन्नर कौन और नकली किन्नर कौन, इस का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है.

बहरहाल इस घटना से मध्य प्रदेश सरकार की किन्नरों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिशों को झटका लगा है. पिछले साल किन्नर घरघर जा कर ताली बजाते सरकारी टैक्स वसूली करते नजर आए थे. इस साल उन्हें लोगों को हेलमेट पहनने के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. कुछ दूसरी सरकारी योजनाओं का भी प्रचारप्रसार उन से करवाया गया था. खास बात यह कि सरकार की ओर से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में उन के लिए अलग से स्टडी सेंटर खोलने की मंजूरी दी गई है.

इस लड़ाई के बाद किन्नरों का पुराना गुट तितरबितर हो गया है, जबकि एक नया गुट वजूद में आ रहा है. बहरहाल यह किन्नर वार कब, कैसे और कहां जा कर थमेगा, यह कह पाना मुश्किल है. Bhopal Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: दुष्कर्म में फंसे राजद विधायक राजवल्लभ यादव

True Crime Story: रूपम पाठक ने यौनशोषण करने वाले एक आरोपी विधायक राजकिशोर केसरी को खुद मौत के घाट उतार दिया था. जबकि दूसरे आरोपी विपिन राय को कोर्ट ने 10 साल की सजा सुना दी है.

10 मार्च, 2016 को बिहार के पूर्णिया जिले के अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन की अदालत खचाखच भरी थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन बहुचर्चित रूपम पाठक यौनशोषण कांड का फैसला सुनाया जाना था. इस केस में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी और उन का सहायक विपिन राय आरोपी थे. इसलिए वकीलों के अलावा अन्य तमाम लोग उस दिन अदालत में पहुंच कर माननीय न्यायाधीश द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

मामले में विधायक के फंसने के बाद दूसरी पार्टियों के नेताओं ने इसे बहुत तूल दिया था. इस केस के सहारे वे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रहे थे. बाद में इस केस में कई उतारचढ़ाव आए. यह पूरा मामला क्या था और विधायक राजकिशोर केसरी इस केस में कैसे फंसे, जानने के लिए हमें अतीत में जाना होगा. दरअसल, रूपम अपने पति और 2 बच्चों के साथ इंफाल में रहती थी. सन 2006 में वह अपने पति अशोक पाठक और बच्चों के साथ बिहार के पूर्णिया शहर आ गई और शहर के ओली टोला में राजहंस पब्लिक स्कूल खोल लिया.

सन 2007 में स्कूल के सालाना जलसे में उस ने चीफ गेस्ट के रूप में पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी को बुलाया. वहीं से रूपम और विधायक की जानपहचान बढ़ी. विधायक के साथ उन का सहायक विपिन राय भी जलसे में पहुंचा था. जलसे में विधायक ने स्कूल के विकास के लिए विधायक फंड से रकम देने का ऐलान किया था. रूपम राजकिशोर के उसी झांसे में फंस गई थी. उसे यह लालच हो गया कि विधायक की मदद से वह अपने स्कूल की काफी तरक्की कर सकती है, जिस से उस की आमदनी में काफी इजाफा हो जाएगा. जलसा खत्म होने के कुछ दिनों बाद जब रूपम विधायक से रुपए पाने के लालच में उन के मधुबनी वाले घर पहुंची तो वहां मौजूद उस के सहायक विपिन से उस ने बात की.

विपिन ने रूपम के सामने पेशकश रखी कि यदि उसे स्कूल के लिए आर्थिक मदद चाहिए तो उसे विधायक के साथ बिस्तर पर जाना होगा. रूपम ने मना किया तो विपिन ने उसे जबरन विधायक के कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया. कमरे में पहले से मौजूद विधायक ने रुपए देने के बहाने उस के साथ बलात्कार किया. इतना ही नहीं, जब वह विधायक के कमरे से निकली तो विपिन ने भी डराधमका कर उस के साथ मनमानी की. उस के बाद विपिन जबतब रूपम के घर पहुंचने लगा और उसे ब्लैकमेल करने लगा.

वह रूपम से कहता था कि जैसा वह कहता है, करती रहे नहीं तो सारे शहर में उस की बदनामी करा देगा. इसी डर से रूपम कई सालों तक उन दोनों के शोषण का शिकार होती रही. फिर हिम्मत जुटा कर रूपम ने 18 अप्रैल, 2009 को विधायक राजकिशोर केसरी और उन के सहयोगी विपिन राय पर पिछले 3 सालों से दुराचार करने का आरोप लगाया. रूपम ने इस की शिकायत तत्कालीन एसपी से की थी. शिकायत के आधार पर पूर्णिया के केहाट थाने में दोनों आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने सीजेएम कोर्ट में धारा-164 के तहत 18 जून, 2010 को रूपम का बयान रिकौर्ड कराया तो रूपम एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पलट गई. इस का लाभ विधायक को मिला.

फिर एसपी ने इस मामले की जांच कराई और विधायक पर लगाए गए आरोप को बेबुनियाद करार देते हुए 7 सितंबर, 2010 को सीजेएम कोर्ट में अपनी ओर से आखिरी रिपोर्ट फाइल करते हुए जांच को बंद कर दिया. इस के 10 दिनों बाद 16 सितंबर, 2010 को रूपम ने उसी कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर किया, जिस में उस ने 18 जून, 2010 को धारा-164 के तहत दिए बयान को दबाव में दिया गया बयान बताया. कोर्ट ने उस की पिटीशन मंजूर कर के सुनवाई के लिए 25 मार्च, 2011 की तारीख निश्चित कर दी.

इस के बाद इस केस में नया मोड़ तब आया, जब रूपम ने दिनदहाड़े विधायक राजकिशोर केसरी की चाकू मार कर हत्या कर दी. बात 4 जनवरी, 2011 की सुबह करीब सवा 9 बजे के आसपास की है. विधायक राजकिशोर केसरी अपने समर्थकों से अपने ही घर में बातचीत कर रहे थे. उसी दौरान शाल लपेटे रूपम वहां पहुंची. वह विधायक से बोली कि उसे उन से कुछ खास बात करनी है. विधायक ने सोचा कि शायद केस के बारे में कुछ बात करने आई होगी. इसलिए वह अपने समर्थकों के बीच से उठ कर उस के साथ किनारे की ओर बढ़ने लगे.

कुछ आगे बढ़ने के बाद रूपम ने अपना शाल हटाया और दनादन चाकू से विधायक के पेट पर वार करने लगी. खून से लथपथ विधायक घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े. आननफानन में उन के समर्थक उन्हें उठा कर सदर अस्पताल ले गए, लेकिन इलाज के दौरान सवा 10 बजे के करीब उन की मौत हो गई. विधायक के घर में घुस कर सुरक्षागार्डों और उन के समर्थकों के बीच रूपम ने उन की हत्या कर दी. रूपम जैसी पढ़ीलिखी महिला ने विधायक की हत्या कर जीवन भर जेल की सलाखों के पीछे रहने का फैसला आखिर क्यों किया? इस राज का खुलासा पुलिस और अदालत की काररवाई के दौरान हुआ.

पुलिस ने विधायक की हत्या के आरोप में रूपम पाठक को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. रूपम ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था कि वह विधायक के खिलाफ ठीक से कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती थी. उसे इस बात की आशंका थी कि विधायक की दबंगई की वजह से उसे न्याय नहीं मिल पाएगा, इसलिए उस ने खुद ही सजा देने का फैसला किया. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, उस में बताया गया था कि हृदय से जुड़ी एब्डोमिनल एरोटा नस (महाधमनी) के कट जाने की वजह से विधायक की मौत हुई थी. राजकिशोर केसरी सन 2000 में पहली बार विधायक बने थे.

उस के बाद वह 4 बार पूर्णिया विधानसभा सीट से जीते थे. इस हत्याकांड से बिहार की सियासत में हलचल मच गई थी. उस समय राज्य में जदयू और भाजपा की सरकार थी. सरकार दोनों के बेहतर तालमेल के साथ चल रही थी. भाजपा विधायक पर जब रूपम ने दुराचार और 3 सालों तक यौनशोषण का आरोप लगाया था तो भाजपा की काफी फजीहत हुई थी. इस मामले की जांच के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी खुद 30 मई, 2010 को पूर्णिया गए थे. हर भाजपा नेता यही रट लगा रहा था कि रूपम ने विधायक केसरी पर मनगढं़त आरोप लगा कर उन की छवि को खराब करने की कोशिश की थी.

विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद अदालत ने रूपम के प्रोटेस्ट पिटीशन से विधायक का नाम हटा दिया. करीब एक साल तक चले गवाहों के बयान के बाद चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने आरोपी विपिन राय के खिलाफ मामला संज्ञान में लिया. तब 19 मार्च, 2012 को विपिन राय ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. तब से ले कर इस केस की सुनवाई अदालत में होती रही. अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन ने इस केस का फैसला 10 मार्च 2016 को सुनाने का दिन मुकर्रर किया. इसलिए फैसले को जानने के लिए तमाम लोग अदालत में पहुंच गए थे.

विपिन के वकील जनार्दन प्रसाद ने कोर्ट में यह दलील दी कि आरोपी की आयु का खयाल रखते हुए उस के अपराध पर सहानुभूति बरती जाए और कम से कम सजा दी जाए. वहीं पीडि़ता रूपम पाठक के वकील ने आरोपी विपिन को कठोरतम सजा देने की मांग की थी. दोनों पक्षों को सुनने के बाद माननीय न्यायाधीश मोहम्मद एजाउद्दीन ने विपिन राय को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा के साथ 50 हजार रुपए का जुरमाना भी भरने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि जुरमाने की 80 फीसदी रकम पीडि़ता को दी जाए. उधर विधायक की हत्या के मामले में निचली अदालत ने रूपम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. वह भी जेल की रोटियां तोड़ रही है. फिलहाल रूपम भागलपुर जेल में कैद है.

विधायक ने सैक्स के चक्कर में फंस कर अपनी जान गंवाई. अब विपिन की जवानी भी अंधेरी कालकोठरी में कटेगी. वहीं रुपयों के लालच में फंस कर रूपम ने इज्जत और आगे की जिंदगी दोनों बरबाद कर ली. राजकिशोर की हत्या के बाद उन का परिवार, विपिन के जेल जाने के बाद उस का परिवार और रूपम को उम्रकैद मिलने के बाद उस का परिवार भी घर पर सजा भुगतने को मजबूर है. यानी अविवेक में उठाए गए कदम का खामियाजा तीनों के परिवार भुगत रहे हैं. True Crime Story

True Crime Story: प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल

True Crime Story: सुंदर पत्नी होने के बावजूद जसवीर सिंह अपने से आधी उम्र की लड़की के इश्क में फंस कर उस से शादी का वादा कर बैठा. पत्नी के रहते शादी नहीं हो सकती थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए उस ने जो किया, घर ही नहीं, जिंदगी भी बरबाद कर ली.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना भोजीपुरा का एक गांव है कैथोला बेनीराम. जसवीर अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. गांव का वह बेहद संपन्न किसान था. 22  नवंबर को वह बरेली शहर में रह कर पढ़ रहे अपने तीनों बच्चों से मिलने जाने लगा तो पत्नी गुरप्रीत से कहा कि चाहे तो वह भी साथ चल सकती है. गुरप्रीत को भी तीनों बच्चों से मिले काफी समय हो गया था, इसलिए उस ने सोचा कि वह भी चली जाए. एक तो बच्चों से मुलाकात हो जाएगी, दूसरे वहां से वह अपनी जरूरत के सामान भी खरीद लेगी.

गुरप्रीत तैयार हो गई तो जसवीर उसे मोटरसाइकिल से बरेली ले गया. पहले गुरप्रीत ने खरीदारी की, उस के बाद दोनों बच्चों से मिलने गई. मम्मीपापा को साथ आया देख कर बच्चे काफी खुश हुए. बच्चों से मिलने में उन्हें काफी देर हो गई. गुरप्रीत की इच्छा बच्चों को छोड़ कर घर आने की नहीं हो रही थी, लेकिन जब अंधेरा होने लगा तो जसवीर ने उस से घर चलने को कहा. गुरप्रीत को भी लगा कि देर करना ठीक नहीं है, इसलिए बच्चों को प्यार कर के वह पति के साथ मोटरसाइकिल से गांव की ओर चल पड़ी. जाड़े के दिनों में दिन छोटा होने की वजह से अंधेरा जल्दी घिर आता है. जसवीर जल्दी घर पहुंचना चाहता था, इसलिए वह खेतों के बीच बनी सड़क से तेजी से घर की ओर चला जा रहा था.

रास्ता सुनसान था. जैसे ही वह गांव के पास नत्थू मुखिया के खेतों के नजदीक पहुंचा, 2 मोटरसाइकिल सवारों ने उसे ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस के आगे अड़ा दी. मजबूरन जसवीर को अपनी मोटरसाइकिल रोकनी पड़ी. तभी एक और मोटरसाइकिल उस के पीछे आ कर इस तरह खड़ी हो गई कि वह उन लोगों से बच कर भाग न सके. दोनों मोटरसाइकिलों पर बैठे चारों लोग उतर कर उस के सामने आ गए. जसवीर कुछ समझ पाता, उन में से एक ने तमंचा निकाल कर उस पर गोली चला दी. गोली उसे लगने के बजाय उस के सिर को छूते हुए निकल गई. उस ने दूसरी गोली चलाई तो वह उसे लगने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी गुरप्रीत की कनपटी पर जा लगी. वह नीचे गिर कर तड़पने लगी.

सड़क से थोड़ी दूरी  पर जसवीर के चाचा नरेंद्र सिंह और मामा बलविंदर सिंह खेतों में पानी लगाए हुए थे. गोली चलने की आवाज सुन कर वे उस की ओर दौड़े तो उन्हें आते देख कर बदमाश भाग गए. जसवीर ने मोटरसाइकिल की हैडलाइट के उजाले में हमलावरों में से एक को पहचान लिया था. उस का नाम नबी बख्श था और वह उस से रंजिश रखता था. बाकी लोगों के चेहरों पर कपड़ा बंधा था, इसलिए वह उन्हें नहीं पहचान पाया था. बदमाशों के भाग जाने के बाद जसवीर चाचा और मामा की मदद से बुरी तरह से घायल गुरप्रीत को अस्पताल ले जा रहा था कि रास्ते में उस की मौत हो गई. लाश अस्पताल में ही छोड़ कर वह थाना भोजीपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी अनिल कुमार सिरोही को पूरी बात बताई.

अनिल कुमार सिरोही पुलिस बल ले कर जसवीर के साथ अस्पताल पहुंचे और लाश का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर जसवीर ने नबी बख्श और उस के 3 अज्ञात साथियों के खिलाफ जो तहरीर दी, उसी के आधार पर अपराध संख्या 637/2015 भादंवि की धारा 302/307 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद अनिल कुमार सिरोही ने नामजद नबी बख्श और उस के साथियों को पकड़ने के लिए एक टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई, कांस्टेबल धीरेंद्र सिंह, संजीव कुमार आदि को शामिल किया. इस का नेतृत्व वह खुद कर रहे थे. वह टीम के साथ नबी बख्श की तलाश में उस के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गया.

वह उसे हिरासत में ले कर थाने ले आए और जब उस से जसवीर पर जानलेवा हमला और उस की पत्नी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो उस ने कहा कि जिस समय जसवीर घटना को अंजाम देने की बात कर रहा है, उस समय तो वह कुछ लोगों के साथ अपने घर पर था. अनिल कुमार सिरोही ने जब नबी बख्श के बयान की उन लोगों से तसदीक की तो बात सही निकली. तब नबी बख्श ने कहा, ‘‘साहब, कुछ दिनों पहले औटो में बैठने को ले कर मेरा जसवीर से झगड़ा हुआ था. उस झगड़े में मारपीट भी हो गई थी. उसी मारपीट का बदला लेने के लिए जसवीर उसे और उस के साथियों को झूठे मुकदमे में फंसा रहा है.’’

अनिल कुमार सिरोही को नबी बख्श निर्दोष लगा तो उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. अब सवाल यह था कि नबी बख्श ने गुरप्रीत की हत्या नहीं की थी तो हत्या किस ने की थी? उस की जसवीर से क्या रंजिश थी? गुरप्रीत के हत्यारों को पकड़ने की पुलिस के सामने कठिन चुनौती थी. थाना भोजीपुरा पुलिस गुरप्रीत के हत्यारों की तलाश कर ही रही थी कि पंचायत चुनाव पड़ गए, जिस से इस मामले पर वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई.

चुनाव खत्म होते ही अनिल कुमार सिरोही गुरप्रीत के हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे कि 16 दिसंबर की शाम 4 बजे जसवीर घायल अवस्था में थाना भोजीपुरा पहुंचा. उस के पेट में गोली लगी थी, जहां से उस समय भी खून बह रहा था. संयोग से गोली एकदम किनारे लगी थी. एक तरह से वह मौत के मुंह में जाने से बालबाल बचा था. इस बार भी उस ने गोली मारने का आरोप नबी बख्श पर लगाया. जसवीर ने भले ही नबी बख्श पर आरोप लगा कर तहरीर दी थी, लेकिन थानाप्रभारी ने इस बार नामजद मुकदमा दर्ज कराने के बजाय अपराध संख्या 680/2015 पर भादंवि की 307 के तहत अज्ञात हमलावर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

एक तो अनिल कुमार ने नबी बख्श को छोड़ दिया था, दूसरे इस बार जब उस के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज नहीं किया तो जसवीर को यह बात बड़ी नागवार गुजरी, लेकिन वह कुछ करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए चुपचाप चला गया. अनिल कुमार सिरोही की समझ में नहीं आ रहा था कि जसवीर आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? वह जिस तरह हमलों में बारबार बचा जा रहा था, उस से उन्हें लगा कि कहीं वह खुद तो ऐसा नहीं कर रहा? जसवीर जिस तरह नबी बख्श पर आरोप लगा रहा था, उस से उन्हें उस पर शक हुआ.

गुरप्रीत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोली उसे कनपटी से सटा कर मारी गई थी. जबकि जसवीर का कहना था कि बदमाशों ने मोटरसाइकिल रुकवा दूर से उस पर और गुरप्रीत पर गोली चलाई थी. जसवीर और नबी बख्श के बयानों की सच्चाई पता लगाने के लिए उन्होंने दोनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स की जांच की तो जसवीर की काल डिटेल्स में 2 मोबाइल नंबर ऐसे मिले, जिन पर बहुत ज्यादा फोन किए गए थे. उन्होंने उन नंबरों की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो उसे देख कर उन्हें लगा कि यह सारा खेल जसवीर का ही खेला है.

उन्होंने सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई के नेतृत्व में कुछ पुलिस वालों को जसवीर को गिरफ्तार करने भेज दिया. गौरव बिश्नोई जसवीर के घर पहुंचे तो वह घर में ही मिल गया. वह उसे पकड़ कर थाने ले आए. अनिल कुमार सिरोही ने जसवीर से पूछताछ शुरू की तो एक बार फिर उस ने सारा आरोप नबी बख्श के ऊपर मढ़ने की कोशिश की, लेकिन जब उसे उस के दोस्त पिंकू उर्फ महेंद्र और उस की काल डिटेल्स और मोबाइल फोन की लोकेशन दिखाई गई तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने जो बयान दिया, उस के अनुसार गुरप्रीत की हत्या की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

बरेली के थाना भोजीपुरा के गांव कैथोला बेनीराम के रहने वाले लक्खा सिंह के बेटे जसवीर सिंह की गिनती इलाके के प्रतिष्ठित और संपन्न किसानों में होती थी. उस की सौ बीघा खेतों में लहलहाती फसल स्वयं उस की संपन्नता की कहानी बयां करती थी. हर साल गन्ने की खेती से उसे लाखों की रकम मिलती थी. 18 साल पहले उस की शादी बिलासपुर की रहने वाली गुरप्रीत कौर से हुई थी. गुरप्रीत बेहद खूबसूरत थी. उस की जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर जसवीर फूला नहीं समा रहा था. दूसरी ओर गुरप्रीत भी जसवीर जैसे बांके छैलछबीले नौजवान को जिंदगी के हमसफर के रूप में पा कर अपने मातापिता की पसंद पर गर्व कर रही थी कि जिन्होंने अपनी चांद जैसी गोरी और फूल जैसी खूबसूरत बेटी के लिए हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में एक सुखीसंपन्न दामाद ढूंढ़ा था.

जसवीर से शादी के बाद गुरप्रीत को ऐसा लगा, जैसे उस की सारी मनोकामना पूरी हो गई है. जसवीर के घर किसी चीज की कमी नहीं थी. गुरप्रीत पति से जिस भी चीज की मांग करती, वह उस की हर मांग को पलक झपकते पूरा कर देता था. क्योंकि पत्नी की खुशी में ही वह अपनी खुशी समझता था. उन का दांपत्य हंसीखुशी से गुजर रहा था. देखतेदेखते कई साल गुजर गए. इस बीच गुरप्रीत 3 बच्चों की मां बन गई. उस के तीनों बेटों के नाम गुरुशांत, रौकी और शैंकी थे. बच्चे जैसेजैसे बड़े हुए, जसवीर ने उन की पढ़ाई की व्यवस्था बरेली शहर के एक नामी स्कूल में कर दी. गुरप्रीत और जसवीर चाहते थे कि उन के तीनों बेटे पढ़लिख कर उन का नाम रौशन करें.

शादी के कुछ सालों बाद जसवीर के रंगढंग में बदलाव आने लगा तो गुरप्रीत को चिंता हुई, क्योंकि जसवीर शराब पीने के साथसाथ दूसरी औरतों में रुचि लेने लगा था. उस ने पति को खानदान की इज्जत की दुहाई देते हुए समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर पत्नी की बातों का कोई असर नहीं हुआ. वह हमेशा शराब और शबाब में डूबा रहने लगा.

गुरप्रीत ने पहले जसवीर को प्यार से समझाबुझा कर रास्ते पर लाने की कोशिश की, लेकिन जब उस की आदत में कोई सुधार नहीं हुआ तो वह उस की बुराइयों का विरोध करते हुए उस से लड़नेझगड़ने लगी. जसवीर अब तक इस सब का आदी हो चुका था, इसलिए गुरप्रीत का रोकनाटोकना उसे अच्छा नहीं लगता था. उस का मानना था कि वह उस की सारी जरूरतें पूरी कर देता है, उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देता है तो वह बेवजह उस के रास्ते में टांग अड़ाती है. मर्दों के तो 10 तरह के शौक होते हैं, फिर उस के पास कमी ही किस चीज की है. जब उस के पास इतनी दौलत है तो उसे जिंदगी में सारे शौक पूरे कर लेने चाहिए.

शादी के इतने सालों बाद और 3 बच्चे होने से गुरप्रीत में अब पहले वाली खूबसूरती नहीं रह गई थी. जबकि जसवीर कमउम्र की खूबसूरत लड़कियों के साथ मौजमस्ती करना चाहता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था. गुरप्रीत को गांव के किसी न किसी से पति की हरकतों के बारे में पता चल ही जाता था. उस समय तो वह पति की करतूतें सुन कर खून का घूंट पी कर रह जाती, लेकिन जब जसवीर घर आता तो वह उस की जम कर खबर लेती.

ऐसा रोजरोज होने से जसवीर का मन गुरप्रीत की ओर से उचट गया, अब वह घर आने से भी कतराने लगा. जबकि गुरप्रीत पति से पहले जैसा प्यार चाहती थी. लेकिन घर से बाहर मौजमस्ती कर के लौटे जसवीर के शरीर में इतनी ताकत नहीं होती थी कि वह पत्नी को संतुष्ट कर सके. वैसे भी अब उस की उम्र 55 साल के करीब थी. इस उम्र में वह जोश कहां होता है, जो जवानी के शुरुआती दिनों में होता है. नतीजतन गुरप्रीत कौर की सारी रात करवटों में बीत जाती.

अगले दिन वह पति की उलटीसीधी हरकतों का विरोध करते हुए उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश करती. लेकिन पत्नी के लाख विरोध के बावजूद जसवीर पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. वह वही करता था, जो उस के मन में आता था. दौलत के मद में चूर जसवीर अपनी अय्याशियों और शौक के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहता था. एक साल पहले उस की मुलाकात बरेली के थाना सीबीगंज के गांव जौहरपुर के रहने वाले ड्राइवर बालकराम से हुई. दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी तो एक दिन वह बालकराम के साथ उस के घर चला गया. वहां उस की सयानी बेटी शानू उस के सामने आई तो जसवीर की आंख फटी की फटी रह गई.

25 वर्षीया शानू हुस्न की साक्षात मूर्ति थी. दिलफेंक स्वभाव का जसवीर उस दिन के बाद किसी न किसी बहाने उस के घर जाने लगा. शानू को समझते देर नहीं लगी कि जसवीर उस की खूबसूरती का दीवाना हो चुका है और वह उस से नजदीकियां बढ़ाने को बेताब है. बातों ही बातों में शानू जान गई कि जसवीर मोटा असामी है. उसे लगा कि अगर किसी तरह वह उस की बातों में आ गया तो वह उस के पैसों पर न केवल पूरी जिंदगी ऐश करेगी, बल्कि उस की जायदाद की मालकिन भी बन सकती है. यह सोच कर उस ने जसवीर की उम्र की परवाह न कर के उस से प्रेम में डूबी मीठीमीठी बातें करने लगी.

शानू ने निकटता बढ़ाने के लिए अपना मोबाइल नंबर जसवीर को दे दिया. फिर जसवीर शानू से फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगा. कुछ ही दिनों में दोनों इतने नजदीक आ गए कि उन के बीच अंतरंग संबंध बन गए. जसवीर ने सूखा छावनी में हरिओम के घर में एक कमरा किराए पर ले रखा था. वहां उस का एक दोस्त पिंकू रहता था. पिंकू के साथ वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करता था. शानू से मिलने के लिए यह जगह एकदम सुरक्षित थी. जसवीर जब भी बरेली आता, शानू को फोन कर के वहीं बुला लेता.

जब शानू को विश्वास हो गया कि जसवीर पूरी तरह उस के प्यार की गिरफ्त में आ चुका है और अब वह उस से हर जायजनाजायज मांगे पूरी करवा सकती है तो एक दिन प्यार के हसीन पलों के बीच उस ने जसवीर के आगे शादी का प्रस्ताव  रख दिया. जसवीर को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई. उस ने शानू को आगोश में लेते हुए शादी के लिए हां कर दी. लेकिन उस ने यह भी कहा कि शादी के पहले उसे अपनी पत्नी गुरप्रीत को रास्ते से हटाना होगा. शानू जसवीर के मुंह से पत्नी की हत्या के बाद शादी की बात सुन कर खुश हो गई. इस के बाद वह जब भी जसवीर से मिलती, उस के ऊपर शादी के लिए दबाव जरूर डालती.

सितंबर में किसी तरह गुरप्रीत को पता चल गया कि जसवीर का संबंध बरेली की किसी लड़की से है तो वह उस पर उस लड़की से संबंध तोड़ने के लिए दबाव डालने लगी. लेकिन जसवीर तो उसे ही रास्ते से हटाना चाहता था. इसलिए उस ने गुरप्रीत की हत्या की तैयारी कर ली. वह पिंकू उर्फ महेंद्र के साथ शानू से मिलने जौहरपुर गया. पिंकू जसवीर की हर बात का राजदार था. शानू को ले कर वे सीबीगंज के परसाखेड़ा इंडस्ट्रियल एरिया पहुंचे, जहां तीनों ने गुरप्रीत को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. वहां से घर लौट कर जसवीर मौके की तलाश में लग गया. गुरप्रीत को विश्वास में लेने के लिए अब वह उस से प्यार से पेश आने लगा. जसवीर का बदला व्यवहार देख कर मासूम गुरप्रीत को लगा कि शायद जसवीर की अक्ल ठिकाने आ गई है. वह उस की बातों पर विश्वास करने लगी.

21 नवंबर को जसवीर ने गुरप्रीत से बच्चों से मिलने के लिए शहर चलने को कहा तो बच्चों से मिलने के लिए लालायित गुरप्रीत उस के साथ चलने को तैयार हो गई. इस के बाद जसवीर ने पिंकू को फोन कर के बता दिया कि वह कल गुरप्रीत को ले कर शहर आएगा, इसलिए वह उस की हत्या की पूरी तैयारी कर ले. 22 नवंबर को भी जसवीर ने सुबह पिंकू को फोन किया. इस के बाद अपनी योजना के अनुसार, वह सुबह 10 बजे गुरप्रीत को ले कर घर से निकला और फतेहगंज पश्चिमी होता हुआ मिलक पहुंचा. वहां जसवीर की मामी रहती थीं. कुछ देर वहां रुक कर वह फतेहगंज और सीबीगंज होता हुआ अपने बच्चों के पास छावनी हार्डमैन पहुंचा.

गुरप्रीत को बच्चों के पास छोड़ कर वह सूखा छावनी में पिंकू से मिला और उस से कहा कि वह शाम 6 बजे गुरप्रीत को अपनी मोटरसाइकिल से ले कर सोहरा होता हुआ घर की ओर जाएगा, वह नत्थू मुखिया के खेतों के पास उस से मिले. उसी सुनसान जगह पर गुरप्रीत की हत्या करनी है. पिंकू को गुरप्रीत की हत्या की योजना समझा कर जसवीर बच्चों के पास लौट आया. शाम 6 बजे वह गुरप्रीत के साथ वापस घर जाने के लिए निकला तो रास्ते में फतेहगंज पश्चिमी चौराहे पर रुका. वहां उस ने कृष्णा से गन्ने के रुपए लिए.

उसी बीच पिंकू पहले से तय योजना के अनुसार, अगरास जाने वाले रास्ते से कैथोला बेनीराम गांव के बाहर नत्थू मुखिया के खेतों के पास पहुंच गया और जसवीर के आने का इंतजार करने लगा. जसवीर वहां पहुंचा तो पिंकू ने उसे हाथ दे कर रोक लिया. जसवीर ने गुरप्रीत को मोटरसाइकिल से उतरने के लिए कहा. अपनी हत्या से अनजान गुरप्रीत मोटरसाइकिल से उतर कर खड़ी हो गई. इस के बाद जसवीर ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और कमर में खोंसा तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटा कर गोली चला दी.

गोली लगते ही गुरप्रीत गिर कर तड़पने लगी. इस के बाद पिंकू ने तमंचा निकाला और गुरप्रीत के सीने में गोली मार दी. इस के बाद पहले से तय योजना के अनुसार, पिंकू ने अपने तमंचे में दोबारा गोली भरी और जसवीर के कान के पास लगा कर गोली चला दी, ताकि पुलिस के सामने वह खुद को निर्दोष बता कर गुरप्रीत की हत्या का आरोप अपने पुराने दुश्मन नबी बख्श पर लगा सके. इस के लिए उस ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की.  जब पुलिस ने नबी बख्श को नहीं पकड़ा तो उस ने पेट के पास तमंचा सटा कर गोली मारी और थाने पहुंच गया. लेकिन पुलिस के सामने उस की यह चालाकी भी काम नहीं आई और वह पकड़ा गया.

अनिल कुमार सिरोही ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस का तमंचा नत्थू मुखिया के खेत के पास से बरामद कर लिया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने मुकदमे में पिंकू और शानू का नाम भी जोड़ दिया है. शानू को धारा 120बी का अभियुक्त बनाया गया है. कथा लिखे जाने तक पुलिस पिंकू और शानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. इस बीच अनिल कुमार सिरोही का तबादला हो गया था. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Superstition: समस्या समाधान के नाम पर ठगी

Superstition: हर समस्या के समाधान की गारंटी का दावा करने वाले तमाम छोटेमोटे तांत्रिक अंधविश्वासी लोगों को ठग रहे हैं, लेकिन शेष नारायण दुबे ने तो ऐसे लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए पूरा काल सेंटर ही चला रहा था.

42 वर्षीय इंदरजीत कौर अकसर बीमार रहती थी. तमाम डाक्टरों से उस का इलाज चला, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ. उस के पिता हरवंश सिंह एक सरकारी मुलाजिम थे. बेटी को ले कर वह बड़ा परेशान रहते थे. इंदरजीत कौर के अलावा उन के 2 बेटे भी थे. हरवंश सिंह दक्षिणी दिल्ली के नेहरूनगर में परिवार के साथ रहते थे. छोटा परिवार होने के बावजूद वह हमेशा परेशान रहते थे. उन की यह परेशानी बेटी इंदरजीत कौर को ले कर थी. अब तक शादी के बाद उसे ससुराल में होना चाहिए था, लेकिन बीमारी की वजह से उस की शादी नहीं हो पाई थी. इस के अलावा दूसरी परेशानी बड़े बेटे को ले कर थी, जो शादी के 8 सालों बाद भी बाप नहीं बन पाया था. तीसरी परेशानी छोटे बेटे को ले कर थी, जो अभी तक बेरोजगार था.

इंदरजीत कौर पिता को अकसर समझाती रहती थी कि वह चिंता न करें, सब ठीक हो जाएगा. लेकिन वह चिंता से उबर नहीं पा रहे थे. परिवार की जिम्मेदारी एक तरह से इंदरजीत ही संभाले थी. सन 2012 में हरवंश सिंह सेवानिवृत्त हुए तो फंड के उन्हें जो 15 लाख रुपए मिले, उन में से 12 लाख रुपए उन्होंने इंद्रजीत के नाम जमा करा दिए थे. इस पर बेटों ने कोई ऐतराज नहीं किया था.

रिटायर होने के कुछ ही महीने बाद हरवंश सिंह की मौत हो गई थी. उन के मरने के 4 महीने बाद ही उन की पत्नी की भी मौत हो गई. 4 महीने में ही मांबाप दोनों की मौत हो जाने से इंदरजीत को गहरा सदमा लगा था. उन के मरने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उसी पर आ पड़ी थी. हरवंश सिंह ने अपना एक फ्लैट कुसुमा को किराए पर दे रखा था. उन के मरने के बाद इंदरजीत ने वह फ्लैट खाली कराना चाहा तो उस ने फ्लैट खाली करने से साफ मना कर दिया, जिस का मुकदमा रोहिणी कोर्ट में चल रहा है.

इंदरजीत शारीरिक रूप से तो परेशान थी ही, मानसिक तौर पर भी परेशान रहने लगी थी. उस के छोटे भाई की उम्र 36 साल हो चुकी थी, उस की अभी तक न तो नौकरी लगी थी और न ही शादी हुई थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इन परेशानियों से कैसे निजात पाया जाए. 6 सितंबर, 2015 को इंदरजीत के मोबाइल फोन पर एक एसएमएस आया, जिस में लिखा था, ‘जानिए कैसे होगा आप की समस्या का समाधान? नौकरी, व्यापार में घाटा, शादी, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्यार में असफलता, शौतन से छुटकारा, मुठकरनी आदि समस्याओं के समाधान की 100 प्रतिशत गारंटी.’

इंसान तमाम तरह की परेशानियों से घिरा हो और कोशिश करने के बावजूद उस की मुश्किलें कम न हो रही हों तो इस तरह के मैसेज में उसे समस्याओं का हल दिखाई देने लगेगा. मैसेज के अंत में एक फोन नंबर भी दिया था. मैसेज पढ़ने के बाद इंदरजीत ने सोचा कि क्यों न वह एक बार उस फोन नंबर पर बात कर के देखे. शायद यहां उस की समस्याएं हल ही हो जाएं. इसी उम्मीद में इंदरजीत ने अपने फोन से मैसेज में दिए नंबर 012048823333 पर फोन किया.

दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो उस ने अपनी सारी समस्याओं के बारे में विस्तार से बता दिया. उधर से बाबा त्यागी, जिस ने फोन उठाया था, भरोसा दिया कि उस की समस्या का समाधान तो हो जाएगा, लेकिन वह एक घंटे बाद दोबारा करे. बाबा त्यागी ने दोबारा बात करने के लिए दूसरा फोन नंबर दे दिया था.

इंदरजीत कौर ने एक घंटे बाद बाबा द्वारा दिए नंबर पर फोन किया तो उधर से बाबा त्यागी ने कहा, ‘‘बच्चा, हम ने अपनी गद्दी पर बैठ कर अपने ईष्ट से बात कर ली है, पता चला है कि तुम परेशानियों से घिरी पड़ी हो.’’

‘‘हां बाबा, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’ इंदरजीत ने कहा.

‘‘तुम्हारे ऊपर दुष्ट प्रेतात्माओं के साथ एक भयानक जिन्न कब्जा जमाए है, इसी वजह से तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती. बच्चा अगर तुम ने इन से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं किया तो तुम्हारे घर में जल्दी ही 3 मौतें और हो सकती हैं.’’ तांत्रिक ने कहा.

‘‘मौतेंऽऽ,’’ इंदरजीत कौर ने घबरा कर पूछा, ‘‘किसकिस की?’’

‘‘तुम्हारे बड़े भाईभाभी और छोटे भाई की,’’ बाबा ने कहा, ‘‘अगर तुम इस कहर से बचना चाहती हो तो तुम्हें तुरंत पूजा करवानी होगी.’’

‘‘पूजा में कितना खर्च आएगा बाबा?’’

‘‘यही कोई 80-90 हजार रुपए.’’

घर की परेशानियों से छुटकारा के लिए इंदरजीत तैयार हो गई. उस ने कहा, ‘‘ठीक है बाबा, मैं पूजा कराने को तैयार हूं. आप तैयारी कीजिए. बताइए, पैसे ले कर कहां आना है?’’

‘‘तुम्हें मेरे पास आने की कोई जरूरत नहीं है. मैं तुम्हें आईसीआईसीआई बैंक का एक एकाउंट नंबर बता रहा हूं. तुम उसी में पैसे जमा कर के मुझे फोन कर दो. इस के बाद मैं पूजा शुरू कर दूंगा.’’ कह कर तांत्रिक ने आईसीआईसीआई बैंक का एकाउंट नंबर मैसेज कर दिया. अगले दिन यानी 7 सितंबर, 2015 को इंदरजीत कौर ने आईसीआईसीआई बैंक के एकाउंट में 80 हजार रुपए जमा करा कर तांत्रिक को फोन कर दिया. तांत्रिक ने बताया था कि पूजा श्मशान में होगी और पूरे 3 दिनों तक चलेगी.

पैसे जमा कराए एक महीने से ज्यादा हो गया, लेकिन इंदरजीत कौर को कोई फायदा नजर नहीं आया. उस ने बाबा को फोन किया तो फोन बाबा के बजाय उन के किसी चेले ने उठाया. उस का नाम सुनील कुमार था. उस ने कहा, ‘‘अभी तो बाबा पूजा करने उज्जैन गए हैं, वहां से एक महीने बाद लौटेंगे.’’

इंदरजीत कौर ने 2 बार फोन किया तो दोनों बार फोन सुनील ने ही रिसीव किया. उस ने दोनों बार वही बताया. इस के बाद उस ने जब भी फोन किया, फोन सुनील ने ही रिसीव किया. हर बार उस ने वही बहाना बना दिया.

आखिर एक दिन बाबा ने फोन रिसीव किया. उस ने कहा, ‘‘कहो बच्चा, कैसे हो?’’

‘‘बाबा, मैं जैसी पहले थी, वैसी ही अभी भी हूं. मुझे कोई फर्क नजर नहीं आया.’’ इंदरजीत ने कहा.

‘‘मैं तुम्हें फोन करने वाला था,’’ बाबा ने कहा, ‘‘मुझे लगा था कि दुष्ट आत्माएं काबू में आ गई होंगी, लेकिन वे इतनी दुष्ट हैं कि उन्हें काबू करने के लिए हमें बड़ी पूजा करनी पड़ेगी. अगर यह पूजा न की गई तो तुम्हारे यहां होने वाली मौतों को रोका नहीं जा सकता.’’

इंदरजीत कौर बुरी तरह घबरा गई. वह अपने घर को उजड़ता नहीं देखना चाहती थी, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘बाबा, बड़ी पूजा में कितना खर्च आएगा?’’

‘‘यही कोई एक लाख 30 हजार रुपए.’’ बाबा ने कहा.

इंदरजीत कौर ने अगले दिन अपने भारतीय स्टेट बैंक के खाते से एक लाख 30 हजार रुपए निकाल कर श्री शिवसेना समिति धार्मिक संस्थान के खाते में जमा करा दिए. एक सप्ताह बीत गया, लेकिन इंदरजीत कौर की एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ. उस ने बाबा को फोन किया तो फोन सुनील ने रिसीव किया. उस ने बताया कि बाबा अभी श्मशान में शव साधना कर रहे हैं.

एक दिन बाद बाबा त्यागी ने खुद इंदरजीत कौर को फोन कर के कहा, ‘‘मैं ने जो शव साधना की है, उस से दुष्ट आत्माएं तो हमारी गिरफ्त में आ गई हैं, लेकिन वह जिन्न अभी काबू में नहीं आया है. उस के लिए हमें एक विशेष तरह का अनुष्ठान करना होगा, जिस के लिए कामाख्या मंदिर से गुरुजी को बुलाना होगा. गुरुजी श्मशान में 11 दिनों तक अनुष्ठान करेंगे.’’

‘‘बाबा आप को जो भी करना है, जल्दी कीजिए. इस में कितना खर्च आएगा, यह बता दीजिए.’’

‘‘इस अनुष्ठान में करीब 3 लाख रुपए खर्च हो जाएंगे.’’ बाबा त्यागी ने कहा.

‘‘मैं कल ही 3 लाख रुपए आप के खाते में जमा करा दूंगी.’’ उस ने कहा और अगले दिन 3 लाख रुपए बाबा के बैंक खाते में जमा करा दिए.

अब तक इंदरजीत पूजा के नाम पर करीब 9 लाख रुपए बाबा के बताए बैंक खाते में जमा करा चुकी थी. पैसे जमा कराने के अगले दिन ही बाबा त्यागी ने फोन कर के कहा, ‘‘बेटा गजब हो गया, जो गुरुजी श्मशान में अनुष्ठान कर रहे थे, उन पर जिन्न ने हमला कर दिया. वह मरणासन्न हालत में हैं. उन का इलाज नहीं कराया गया तो उन की मौत हो सकती है. अगर उन की मौत हो गई तो इस का पाप तुम्हें ही लगेगा.’’

‘‘इस के लिए मुझे क्या करना होगा बाबा?’’

‘‘गुरुजी के इलाज के लिए संजीवनी बूटी मंगानी होगी, जिस पर 2 लाख रुपए का खर्च आएगा.’’

इंदरजीत कौर अब तक पूजा के नाम पर 12 लाख रुपए तांत्रिक बाबा त्यागी के खाते में जमा करा चुकी थी. लेकिन फायदा कुछ नहीं हुआ था, इसलिए उसे शक होने लगा था कि कहीं वह किसी ठग के जाल में तो नहीं फंस गई है. इसलिए उस ने 2 लाख रुपए जमा करा दिए. इंदरजीत कौर का छोटा भाई अपना कोई कारोबार शुरू करना चाहता था. उसे 8 लाख रुपए की जरूरत थी. उसी बीच उस ने बहन से ये रुपए मांगे तो उस ने रुपए बाबा त्यागी के खाते में जमा कराने की बात बता कर पैसे देने से मना कर दिया.

बहन की बात सुन कर छोटा भाई हैरान रह गया. उस ने अपना सिर पीट कर कहा, ‘‘पढ़ीलिखी होने के बावजूद दीदी तुम उस ढोंगी के जाल में कैसे फंस गईं? कम से कम मुझे तो बता देतीं. 3 साल से बाबा तुम्हें ठग रहा है और तुम ने कभी मुझ से चर्चा तक नहीं की.’’

‘‘क्या करूं भाई, उस ने मुझे इतना डरा दिया था कि मैं किसी से कुछ कह नहीं सकी.’’ कह कर इंदरजीत रोने लगी तो भाई ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘दीदी, तुम्हें अब पुलिस के पास जा कर उस ठग के खिलाफ रिपोर्ट लिखानी होगी. 12 लाख रुपए भले ही वापस न मिलें, लेकिन कम से कम उसे अपने किए की सजा तो मिलेगी.’’

छोटे भाई की बात इंदरजीत कौर की समझ में आ गई. 24 नवंबर, 2015 की शाम वह भाई के साथ थाना लाजपतनगर पहुंची और वहां मौजूद थानाप्रभारी रमेश कुमार कक्कड़ को पूरी बात बताई. इस के बाद इंदरजीत कौर की तहरीर पर थानाप्रभारी ने भादंवि की धारा 420/384/506134 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर डीसीपी मंदीप सिंह रंधावा को पूरे वाकये से अवगत करा दिया. एक पढ़ीलिखी महिला को जिस तरह से एक तांत्रिक ने ठगा था, उस से डीसीपी को लगा कि ढोंगी तांत्रिक बेहद शातिर है. उस तांत्रिक को गिरफ्तार करने के लिए उन्होंने एसीपी एस.के. केन के नेतृत्व में एक जांच टीम गठित कर दी, जिस में थानाप्रभारी रमेश कुमार कक्कड़, इंसपेक्टर मानवेंद्र सिंह, प्रवीण कुमार, एसआई अमित भाटी, हैडकांस्टेबल सुधाकर, कांस्टेबल नीरज, संतोष, सुधीर आदि को शामिल किया गया.

इंदरजीत कौर के पास बाबा त्यागी का केवल फोन नंबर था. रमेश कुमार कक्कड़ ने उस ठग तांत्रिक को इंदरजीत के माध्यम से ही घेरने की योजना बनाई. उन्होंने इंदरजीत से बाबा त्यागी को फोन कराया. बाबा ने फोन उठाया तो इंदरजीत ने कहा, ‘‘बाबा, अभी तक मुझे कोई फायदा नहीं हुआ. आप कुछ ऐसा कीजिए कि हमारे सारे दुख मिट जाएं. मैं इस के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं.’’

‘‘कामाख्या मंदिर वाले गुरुजी ने अनुष्ठान पूरा करने के बाद मुझे बताया था कि जिन्न और आत्माएं काबू में आ गई हैं. लेकिन जब तक तुम्हारे पिता का पिंडदान रामेश्वरम में नहीं कराया जाता, तब तक समस्याएं बनी रहेंगी.’’

‘‘तो फिर आप यह भी करवा दीजिए.’’

‘‘इस के लिए 33 ब्राह्मणों को यज्ञ के लिए रामेश्वरम ले जाना होगा. ब्राह्मणों का किराया, यज्ञ आदि पर कुल 1 लाख 80 हजार रुपए का खर्च आएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कल ही यह रकम दे दूंगी. लेकिन इस बार रकम बैंक में जमा नहीं करा सकती. क्योंकि मैं जब भी वहां पैसे जमा कराने जाती हूं, बैंक वाले पूछते हैं कि तुम इतनी बड़ीबड़ी रकम इस खाते में क्यों जमा कराती हो?’’ इंदरजीत कौर ने कहा.

बाबा त्यागी ने यूनियन बैंक औफ इंडिया का खाता नंबर दे कर उस में पैसे जमा कराने को कहा. इंदरजीत कौर थानाप्रभारी के कहे अनुसार काम कर रही थी. उन्होंने पैसे जमा कराने से मना किया तो शाम को बाबा त्यागी को फोन कर के इंदरजीत ने कहा, ‘‘बाबा, मैं बैंक में पैसे जमा कराने गई थी, बैंक वाले कह रहे थे कि इस खाते में 25 हजार रुपए से ज्यादा जमा नहीं कराए जा सकते. इसलिए आप कल अपना कोई आदमी भेज दीजिए, मैं उसे पूरे पैसे दे दूंगी.’’

‘‘ठीक है, कल सुबह मेरा आदमी तुम्हारे घर पहुंच जाएगा. तुम अपना पता मैसेज कर दो. लेकिन वह जिस टैक्सी से जाएगा, उस का किराया तुम्हें ही देना होगा.’’ बाबा त्यागी ने कहा.

‘‘यही ठीक रहेगा. आप उन्हें भेज दीजिए. मैं उन्हें किराए के पैसे भी दे दूंगी.’’ कह कर इंदरजीत कौर ने फोन काट दिया.

25 नवंबर, 2015 की सुबह थानाप्रभारी टीम के साथ आम कपड़ों में इंदरजीत कौर के घर के आसपास लग गए. सुबह 9 बजे के करीब एक टैक्सी इंदरजीत कौर के घर के सामने आ कर रुकी. टैक्सी से एक लड़का उतरा और इंदरजीत कौर के घर की डोरबैल बजा दी. इंदरजीत कौर ने दरवाजा खोला. युवक ने अपना नाम सुनील कुमार बताया. इंदरजीत कौर उसे ड्राइंगरूम में ले आई. थानाप्रभारी अंदर ही बैठे थे. इंदरजीत ने उसे पानी पिलाया तो ॐस ने कहा, ‘‘मैडम, पैसे जल्दी दे दीजिए. बाबा ने मुझे जल्दी बुलाया है. अभी हमें पूजा का सामान वगैरह भी खरीदना है.’’

इंदरजीत कौर ने अपने पर्स से थानाप्रभारी के हस्ताक्षर किए 5 हजार रुपए निकाल कर सुनील को देते हुए कहा, ‘‘पहले तुम टैक्सी के किराए के पैसे ले लो, बाकी के पैसे अभी दे रही हूं.’’

पैसे गिन कर जैसे ही सुनील ने अपनी जेब में रखे, थानाप्रभारी ने उसे पकड़ लिया. इशारा करने पर मकान के बाहर मौजूद पुलिसकर्मी भी अंदर आ गए. सुनील को पूछताछ के लिए थाने लाया गया. थाने में हुई पूछताछ में सुनील कुमार ने जो बताया, उस के बाद पुलिस ने उसी दिन उत्तर प्रदेश के महानगर गाजियाबाद की कालोनी राजनगर स्थित एक मकान में छापा मारा. वहां का नजारा देख कर पुलिस हैरान रह गई. वहां इस तरह के लोगों को फंसाने के लिए एक काल सेंटर चल रहा था. अलगअलग 12 केबिन बने थे, जिन में 5 लड़के और 7 लड़कियां बैठी थीं.

पुलिस को देख कर सभी के होश उड़ गए. उन्हीं के बीच एक भव्य औफिस बना था, जिस में शेष नारायण दुबे और पवन कुमार पांडेय नाम के 2 लोग बैठे थे. सुनील की निशानदेही पर पुलिस ने उन दोनों को हिरासत में ले लिया. इस के अलावा काल सेंटर में काम करने वाले लड़केलड़कियों को भी पूछताछ के लिए थाने लाया गया. थाने में हुई पूछताछ में पता चला कि ठगी का यह सारा मायाजाल शेष नारायण दुबे उर्फ बाबा त्यागी का रचा था.

32 वर्षीय शेष नारायण दुबे गाजियाबाद की इंदिरापुरम कालोनी में रहने वाले रामबहादुर दुबे का बेटा था. रामबहादुर पंडिताई करते थे. पिता की देखादेखी शेष नारायण कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस में कम खर्च में अच्छी आमदनी हो. उस ने अपने करीबी रिश्तेदार पवन कुमार पांडेय और सुनील कुमार से बात की तो उन्होंने तंत्रमंत्र के नाम पर ठगी का कारोबार करने की सलाह दी. इस के बाद शेषनारायण को बाबा त्यागी बना कर कारोबार शुरू भी कर दिया गया.

इन्होंने शहर के राजनगर में एक कमरा किराए पर लिया, जिस में उन्होंने दरजन भर कंप्यूटर लगा कर लड़कियों व लड़कों को नौकरी पर रख लिया. इस के बाद मोबाइल कंपनी से हजारों ग्राहकों के फोन नंबर और पते हासिल किए. उन में से रोजाना कुछ नंबरों पर कालसेंटर द्वारा समस्याओं के समाधान के मैसेज भेजे जाने लगे. हर कोई किसी न किसी समस्या से ग्रस्त होता ही है, इसलिए अंधविश्वासी लोग मैसेज में दिए फोन नंबर पर समस्या के समाधान के लिए फोन करने लगे ये लोग उन्हें परिवार के सदस्यों की मौत का भय दिखा कर बैंक खाते में मोटी रकम जमा करवाने लगे.

दिल्ली के लाजपतनगर के नेहरूनगर की रहने वाली इंदरजीत कौर को भी इन्होंने उस के भाइयों व भाभी की मौत का भय दिखा कर 12 लाख रुपए ठग लिए थे. पूछताछ में पता चला कि ये लोग अब तक करीब 3 सौ लोगों को इसी तरह ठग चुके हैं. इन के कालसेंटर पर नौकरी करने वाले लड़केलड़कियों को पुलिस ने हिदायत दे कर छोड़ दिया. शेष नारायण दुबे उर्फ बाबा त्यागी, पवन कुमार पांडेय और सुनील कुमार को 26 नवंबर, 2015 को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया है. पुलिस ने इन के कालसेंटर को सील कर दिया है. कथा लिखे जाने तक इन में से किसी की भी जमानत नहीं हुई थी. Superstition

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News: ट्यूटर ही निकला अपहर्त्ता

Crime News: रवि और उमेश   ने मोटी फिरौती  के लिए रिहान  का अपहरण तो  कर लिया, लेकिन  इस मामले में वे  पूरी तरह से  अनाड़ी थे. यही वजह  थी कि फिरौती पाने की  कौन कहे, वे उस की  हत्या में जेल पहुंच गए.

की नई बस्ती कालोनी में रहने वाले इकरामुल हक एक एनजीओ में मैनेजर थे, जिस की वजह से उन की समाज में अच्छी पकड़ थी. समाज के लोग भी उन का काफी सम्मान करते थे. लेकिन 21 नवंबर, 2015 को उन के परिवार में एक ऐसी घटना घटी कि वही नहीं, उन के घर तथा मोहल्ले वाले भी परेशान हो उठे.

दरअसल, हुआ यह कि उस दिन इकरामुल हक का 11 साल का बेटा रिहानुल हक उर्फ रिहान अचानक अपने घर के मुख्य दरवाजे के पास खेलतेखेलते गायब हो गया था. घर वालों ने उसे गली में इधरउधर देखा, लेकिन वह दिखाई नहीं दिया. दरवाजे के सामने खेलतेखेलते वह कहां गायब हो गया, यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी.

रिहानुल हक के गायब होने की जानकारी मोहल्ले वालों को हुई तो वे भी उसे ढूंढ़ने में मदद करने लगे. सभी ने मोहल्ले की गलीगली छान मारी, पर बच्चे का पता नहीं चला. इकरामुल हक उस समय नजीबाबाद स्थित संस्था के औफिस में थे. बेटे के लापता होने की जानकारी उन्हें मिली तो वह तुरंत घर के लिए चल पड़े. घर पहुंचने तक शाम हो चुकी थी. उन की पत्नी और घर के अन्य लोग चिंता में बैठे थे. इकरामुल हक ने अपने सभी रिश्तेदारों को फोन कर के बेटे के बारे में पूछा, पर कहीं से भी उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. देर रात तक उन्होंने बेटे को संभावित जगहों पर तलाशा, पर कोई नतीजा नहीं निकला.

पूरी रात घर के लोग परेशान होते रहे. सुबह होते ही इकरामुल हक रिश्तेदारों और मोहल्ले के कुछ लोगों के साथ शहर की कोतवाली पहुंचे. थानाप्रभारी डी.आर. आर्य को बच्चे के रहस्यमय ढंग से गायब होने की बात बता कर उस के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग की. बच्चे को गायब हुए 20 घंटे से ज्यादा हो चुके थे, इसलिए डी.आर. आर्य ने अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर लिया. उन्होंने इस मामले की जानकारी एसएसपी केवल खुराना को दी तो उन्होंने इस संवेदनशील मामले को सुलझाने के लिए 4 टीमें बनाईं.

पहली टीम में थानाप्रभारी डी.आर. आर्य के नेतृत्व में एसआई योगेंद्र कुमार, मदन सिंह विवट, कांस्टेबल मोहम्मद आसिफ को शामिल किया गया. दूसरी टीम काशीपुर के थानाप्रभारी वी.के. जेठा के नेतृत्व में और तीसरी टीम परतापपुर के चौकीइंचार्ज जसवीर सिंह चौहान के नेतृत्व में बनाई गई. चौथी टीम में एसओजी के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों को भी शामिल किया गया. चारों टीमों का नेतृत्व सीओ (काशीपुर) जी.सी. टम्टा कर रहे थे. एसएसपी ने पूरे केस की कमान एएसपी कमलेश उपाध्याय के हाथों सौंपी थी.

चारों पुलिस टीमें अलगअलग एंगल से इस मामले में लग गईं. चूंकि इकरामुल हक सम्मानित आदमी थे, इसलिए पुलिस को पूरी संभावना थी कि बच्चे का अपहरण फिरौती के लिए किया गया है. इस संभावना को देखते हुए पुलिस ने इकरामुल हक से कह दिया था कि अगर उन के पास किसी का फिरौती के लिए फोन आता है तो उन्हें किस तरह बात करनी है. इकरामुल हक ने पुलिस को बताया था कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं है. इस के बावजूद पुलिस मोहल्ले में और जहां वह नौकरी करते थे, वहां के लोगों से पूछताछ की. रिहान को गायब हुए कई दिन बीत गए, पर पुलिस को उस के बारे में कोई सुराग नहीं मिला, इस से घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी.

पुलिस रिहान की खोज में लगी थी, तभी जसपुर से एक और बच्चा गायब हो गया. उस बच्चे के गायब होने के बाद शहर में यह अफवाह फैल गई कि शहर में बच्चे उठाने वाला गैंग सक्रिय है. इस के बाद लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया. उन का पुलिस से भी विश्वास उठने लगा. पुलिस ने भी अपनी जांच बच्चा चोरी करने वाले गैंग की ओर मोड़ दी. बिजनौर, धामपुर, नजीबाबाद तक छानबीन की गई, लेकिन बच्चे का कुछ पता नहीं चला. आगे की जांच में पुलिस ने इकरामुल हक के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकाली. फुटेज में रिहान घर से निकलते हुए खुश दिखाई दे रहा था. उस के साथ उसे ट्यूशन पढ़ाने वाला रवि कुमार भी था.

पुलिस ने पूछताछ के लिए रवि कुमार को थाने बुला लिया. उस से भी पूछताछ की गई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस ने उसे दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया तो उस ने पुलिस को आत्महत्या की धमकी दे दी.  काफी खोजबीन के बाद भी जब रिहान का कहीं कुछ पता नहीं चला तो 28 नवंबर, 2015 को जसपुर वालों ने एएसपी कमलेश उपाध्याय का घेराव किया, साथ ही रिहान के जल्दी न मिलने पर आंदोलन करने की चेतावनी दी. इस चेतावनी के बाद एसओजी टीम ने जसपुर में डेरा डाल दिया. पुलिस अभी बच्चे की खोज में इधरउधर हाथपांव मार ही रही थी कि उसी बीच 21 दिसंबर, 2015 को रिहान के पिता को फिरौती का एक पत्र मिला. फिरौती के उस पत्र ने जांच की दिशा मोड़ दी.

पत्र में लिखा था, ‘बधाई हो आप का बेटा मिल गया. वह अभी जिंदा है. वह बारबार आप को याद कर रहा है. आप उसे सहीसलामत वापस पाना चाहते हैं तो दोपहर 12 बजे जसपुर से हरिद्वार को जाने वाली रोडवेज बस में एक बैग में 6 लाख रुपए रख दीजिए. जैसे हमें 6 लाख रुपए मिल जाएंगे, आप का बच्चा आप को सहीसलामत मिल जाएगा. अगर आप ने भूल से भी इस बात का जिक्र पुलिस से किया तो अपने बच्चे की मौत के आप खुद जिम्मेदार होंगे. इस पत्र को गंभीरता से लेना, क्योंकि आप के बच्चे की जिंदगी का सवाल है.’

इकरामुल हक नहीं चाहते थे कि उन के इकलौते बेटे की जिंदगी पर कोई आंच आए, इसलिए उन्होंने फिरौती के पत्र के बारे में पुलिस को कुछ नहीं बताया. उन्होंने एक बैग में 6 लाख रुपए भर कर अपने एक निजी संबंधी इकराम को दे दिए. इकराम वह पैसे ले कर दोपहर 12 बजे हरिद्वार जाने वाली परिवहन निगम की एक बस में बैठ गया. हरिद्वार डिपो में पहुंचते ही इकराम नोटों से भरा बैग सीट पर छोड़ कर नीचे उतर गया. काफी देर बाद भी जब कोई उस बैग को लेने नहीं आया तो इकराम ने इकरामुल हक को फोन कर के पूछा कि अब वह क्या करे?

जब पैसे लेने कोई नहीं आया तो इकरामुल हक ने पैसे ले कर उसे घर आने को दिया. इकराम वह बैग ले कर घर लौट आया. उधर पुलिस के शक की सुई बारबार रिहान को ट्यूशन पढ़ाने वाले रवि कुमार पर जा रही थी. लेकिन रिहान के घर वालों को रवि पर इतना विश्वास था कि वे पुलिस से यही कह रहे थे कि वह रवि को परेशान न करे. इस के बाद पुलिस ने रवि के बारे में खुफिया जानकारी इकट्ठी करनी शुरू कर दी. पुलिस को पता चला कि जिस दिन से रिहान लापता हुआ था, रवि का उसी दिन से मोबाइल बंद था. रिहान को रवि से बेहद लगाव था. लेकिन उस के लापता होने के कई दिनों बाद भी रवि रिहान के बारे में पूछने उस के घर नहीं गया.

रवि को जब लगने लगा कि पुलिस उस के पीछे पड़ी हुई है तो वह जसपुर छोड़ कर धामपुर चला गया. इकरामुल हक के घर से कुछ दूरी पर किसी के घर के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा था. पुलिस ने उस कैमरे की फुटेज देखी तो उस में काले रंग की एक स्कूटी, जिस का नंबर यूपी 020 एएल 9540 था, नजर आई. उस पर 2 लोग सवार थे. रिहान उन दोनों के बीच बैठा था. पुलिस ने वह वीडियो रिहान के घर वालों को दिखाई तो उन्होंने रिहान के आगेपीछे बैठे दोनों लोगों की पहचान रिहान के टीचर रवि कुमार और उस के मौसेरे भाई उमेश के रूप में की. उमेश जसपुर के छिपियान मोहल्ले में रहता था.

इस फुटेज को देखने के बाद पुलिस को पूरा विश्वास हो गया कि रिहान के अपहरण में रवि का ही हाथ है. इस के बाद रिहान के घर वालों को भी रवि कुमार पर शक हो गया था. पुलिस रवि की तलाश करने लगी तो पता चला कि वह धामपुर में किसी कोचिंग सेंटर में पढ़ा रहा है. इस के बाद पुलिस ने कांस्टेबल आसिफ और रिहान के मामा सरफराज को उस के पीछे लगा दिया. दोनों ही धामपुर के उस कोचिंग सेंटर पहुंच गए, जहां रवि पढ़ाता था. वह कोचिंग सेंटर किसी अनिल कुमार का था. रहस्य खुलवाने के लिए आसिफ और सरफराज ने स्टूडेंट बन कर उस कोचिंग सेंटर में 2 दिनों की डैमो क्लास अटैंड करने का फैसला लिया.

कांस्टेबल आसिफ ने क्लास अटैंड करने के बाद पहले दिन ही रवि कुमार से दोस्ती गांठ ली. 2 दिनों में ही वह उस से इतना घुलमिल गया कि आसिफ ने उस के पेट की सारी हकीकत निकाल ली. रवि आसिफ और सरफराज के बारे में नहीं जानता था. वह परेशान नजर आ रहा था, इसी का फायदा दोनों ने उठाया था. कांस्टेबल आसिफ ने सारी बातें थानाप्रभारी डी.आर. आर्य को बता दीं. इस के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस की निशानदेही पर उस के मौसेरे भाई उमेश को भी पुलिस ने पकड़ लिया.

दोनों से रिहान के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि रिहान का अपहरण उन्होंने ही किया था और अब वह इस दुनिया में नहीं है. उन दोनों से उस की लाश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उस की लाश आजमगढ़ के जंगल में है. रात में ही उन दोनों को ले कर पुलिस आजमगढ़ पहुंची. उस घने जंगल में रवि और उमेश वह जगह भूल गए, जहां उन्होंने रिहान की लाश छिपाई थी. वह पुलिस को जंगल में घुमाते रहे. सर्च लाइट में कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद आखिर एक जगह रिहान के कपड़े मिल गए. जहां पर कपड़े मिले थे उस जगह पर पहुंच कर रवि और उमेश को जगह याद आ गई.

वे पुलिस को जंगल में एक ऐसी जगह ले गए, जहां जमीन में एक बड़ी बिल बनी थी. उसी बिल में ही उन्होंने रिहान की लाश छिपाई थी. पुलिस ने उस बिल की खुदाई कराई तो उस में से एक कंकाल बरामद हुआ. वह कंकाल रिहान का ही हो सकता था. डेढ़ महीने में उस के शरीर को जंगली जानवर खा गए होंगे. 29 दिसंबर की सुबह पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई कर के कंकाल और उस के कपड़ों को अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद दोनों अभियुक्तों को ले कर जसपुर लौट आई. रेहान के घर वालों को उस की हत्या का पता चला तो घर में कोहराम मच गया.

पुलिस द्वारा दोनों अभियुक्तों से की गई पूछताछ में रिहान के अपहरण और हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

रवि उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के कस्बा नजीबाबाद निवासी गजराम का बेटा था. गजराम सरकारी स्कूल में अध्यापक थे. उन के 4 बच्चों में रवि सब से छोटा था. रवि ने बिजनौर के वर्धमान डिग्री कालेज से बीएससी की थी. इस के बाद वह नौकरी के लिए तैयारी करने लगा था. काफी कोशिश के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली तो वह अप्रैल, 2015 से जसपुर के एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगा. खाली समय में वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करता था. रवि कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से उसे अच्छी कमाई हो. वह सोचता था कि अगर वह अपना कोचिंग सैंटर खोल ले तो उस से उसे अच्छी कमाई हो सकती है. लेकिन कोचिंग सेंटर खोलने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. पैसे कहां से आएं, इस के लिए वह अपने दिमागी घोड़े दौड़ाने लगा.

उस के दिमाग में आया कि अगर वह किसी बच्चे का अपहरण कर के मोटी फिरौती ले कर अपना कोचिंग सेंटर खोल सकता है. उसे यह उपाय तो सही लगा, लेकिन पकड़े जाने के डर की वजह से वह किसी बच्चे के अपहरण का साहस नहीं कर पा रहा था. उस ने जब भी हिम्मत की, हर बार हिम्मत जवाब दे गई. इस बारे में उस ने अपने मौसेरे भाई उमेश से सलाह की. उमेश जसपुर के मोहल्ला छिपियान में रहता था. उस के पिता राकेश कुमार का कुछ साल पहले निधन हो चुका था. उस के बाद उस के यहां आर्थिक समस्या खड़ी हो गई थी. उस की मां घर का खर्च चलाने के लिए कुछ लोगों के घरों में काम करती थी.

उमेश थोड़ा बड़ा हुआ तो काशीपुर में एक कलर लैब में नौकरी करने लगा. परिवार की सीमित आमदनी थी, जिस से उस के शौक पूरे नहीं हो पाते थे. यही वजह थी कि जब रवि ने उस से किसी बच्चे के अपहरण के बारे में सलाह मांगी तो वह खुद यह काम करने के लिए तैयार हो गया. बिना मेहनत के अमीर बनने की बात आई तो वे सोचने लगे कि किस बच्चे को निशाना बनाया जाए. जिस के अपहरण से उन्हें मोटी रकम मिल जाए. उसी बीच रवि की निगाहों में रिहानुल हक उर्फ रिहान चढ़ गया. वह रिहान को ट्यूशन पढ़ाता ही था. उस के घर में उस की अच्छी पैठ भी थी.

एक तरह से रिहान के घर वाले उसे अपने घर का सदस्य मानते थे. रवि उसे उसी के घर में ट्यूशन पढ़ाने के बाद अपने साथ स्कूल भी ले जाता था. इसी वजह से उसे लगा कि रिहान का अपहरण करने से उस के घर वाले व अन्य लोग उस पर शक नहीं करेंगे. इस के बाद उस ने उमेश से बात की. रिहान के पिता अच्छी हैसियत वाले थे, इसलिए फिरौती में उन से मोटी रकम मिल सकती थी. वह उन का एकलौता बेटा था. योजना बनाने के बाद दोनों मौके की तलाश में लग गए.

21 नवंबर, 2015 को रवि और उमेश ने रिहान के अपहरण की योजना बनाई और स्कूटी ले कर उस के घर की ओर चल पड़े. रिहान अपने दरवाजे पर खड़ा था. उन्हें देखते ही वह उन के पास आ गया. रवि ने उसे स्कूटी पर बैठा लिया. उस के बैठते ही वे तुरंत वहां से निकल गए. रिहान ने उन से पूछा कि वे कहां जा रहे हैं तो रवि ने कह दिया कि वे घूमने जा रहे हैं. बच्चों को घूमना अच्छा लगता है. इसलिए जब वह पतरामपुर वाली रोड से होते हुए जंगल की तरफ चले तो जंगल देख कर रिहान खुश हो गया. उस समय वह अपने घर वालों को भूल गया.

रिहान को घुमातेफिराते उस से बातें करते वे शहर से 20 किलोमीटर दूर कालू सिद्ध की मजार से आगे अमानगढ़ के जंगल में पहुंच गए. यह जंगल जिला बिजनौर में पड़ता है. रवि और उमेश रिहान को नदी तक स्कूटी से ले गए. इस के बाद नदी पार कर के जंगल में चले गए. जंगल में रिहान डरने लगा. वह रोने लगा तो रवि ने उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था. वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगा तो कहीं कोई उस के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन न ले, रवि और उमेश डर गए.

उन्होंने उस के मुंह पर कपड़ा बांध दिया. वह कहीं भाग न जाए, इस के लिए उन्होंने उसे एक पेड़ से बांध दिया. इस के बाद वहीं बैठ कर आगे की योजना बनाने लगे. उसी बीच दम घुटने से रिहान की मौत हो गई. उस के मरने से दोनों बुरी तरह घबरा गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करें. फिरौती मांगने वाली बात उन के दिमाग से उड़ गई. उन्होंने जल्दी से उस के कपड़े उतारे और उसे वहीं किसी जानवर की बिल में डाल दिया. वहां से कुछ दूरी पर उस के कपड़े फेंक दिए.

रिहान को ठिकाने लगाने के बाद रवि ने 6 लाख की फिरौती के लिए इकरामुल हक के पते पर एक पत्र भेजा. उन्होंने फिरौती की रकम एक बैग में रख कर जसपुर से हरिद्वार को दोपहर 12 बजे जाने वाली बस में रखने को कहा. वह बस हरिद्वार करीब 4 बजे पहुंचती थी. इसलिए निर्धारित समय पर वह हरिद्वार के बसअड्डे पर खड़े हो कर जसपुर से आने वाली बस का इंतजार करने लगे. वह बस हरिद्वार बसअड्डे पर पहुंची तो उन्होंने देखा कि उस में से एक आदमी नहीं उतरा था. रवि को लगा कि शायद वह पुलिस वाला है, इसलिए बैग लेने के लिए वह बस में नहीं घुसा और उमेश को ले कर वहां से चला गया.

जब लोगों को पता चला कि रिहान की हत्या किसी और ने नहीं, उस के टीचर ने की है तो लोग हैरान रह गए. गांवसमाज के ही नहीं, राजनैतिक लोग भी सांत्वना देने इकरामुल हक के यहां आने लगे. जिस स्कूल में रिहान पढ़ता था, उस स्कूल की प्रधानाचार्य मीनाक्षी चौहान भी शोक प्रकट करने आईं. शहर के अन्य स्कूलों के बच्चों ने कैंडिल मार्च निकाला. कुमाऊं रेंज के डीआईजी ने मामले का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए तो एसएसपी केवल खुराना ने ढाई हजार रुपए का पुरस्कार दिया है. इस के अलावा एसएसपी ने कांस्टेबल मोहम्मद आसिफ को 1000 रुपए का नकद पुरस्कार दे कर उस के कार्य की सराहना की.

पूछताछ के बाद दोनों अभियुक्तों को पुलिस ने भादंवि की धारा 364ए/302/201 के तहत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस ने शव के अवशेष को फोरेंसिक जांच व डीएनए जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है. इस केस की जांच एसएसआई एस.सी. जोशी कर रहे हैं. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Inspirational Story: नीरजा के बलिदान की कहानी – फिल्मी नहीं जमीनी हकीकत

Inspirational Story: नीरजा भनोट ने अपनी जान दे कर 359 लोगों की जान बचाने का जो कारनामा किया था, वह उन की बेमिसाल बहादुरी थी. उन की इसी बहादुरी पर आधारित बायोपिक फिल्म बनी है ‘नीरजा’.

नि र्देशक राम माधवानी की फिल्म ‘नीरजा’ 19 फरवरी को रिलीज हो गई. नीरजा भनोट की जिंदगी और बलिदान पर आधारित इस बायोपिक में नीरजा भनोट की भूमिका सोनम कपूर ने निभाई है. सोनम ने अपनी ओर से अपने किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश की है. जब भी कोई बायोपिक बनती है, तो उस में कुछ मसाले डालना निर्मातानिर्देशक की मजबूरी होती है. क्योंकि इस के बिना फिल्म चलाना संभव नहीं है.

 

‘नीरजा’ लोगों को कितनी पसंद आई, कितनी सफल रही, फिल्म में कितना मसाला मिलाया गया, अगर कुछ देर के लिए इन बातों को दरकिनार कर दें तो यह सच है कि नीरजा एक बहादुर लड़की थी और उस ने अपनी जान की परवाह न कर के 359 लोगों की जान बचाई थी. संदर्भवश हम यहां नीरजा भनोट की असली कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं.

नीरजा का जन्म 7 सितंबर, 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था. उन के पिता हरीश भनोट हिंदुस्तान टाइम्स के जानेमाने पत्रकार थे. उन के 3 बच्चे थे, 2 लड़के अखिल और अनीश तथा एक बेटी नीरजा. एकलौती बेटी होने की वजह से नीरजा अपनी मां रमा भनोट और पिता हरीश भनोट की बहुत लाडली थी. पतिपत्नी उसे बेटों से भी ज्यादा चाहते थे, इसीलिए वे उसे लाडो कहते थे. नीरजा की शिक्षा चंडीगढ़ के सेक्रेड हार्ट कान्वेंट से शुरू हुई.

मार्च, 1974 में जब नीरजा करीब साढ़े 10 साल की थी और छठी कक्षा में पढ़ रही थी, हरीश भनोट का तबादला मुंबई हो गया. मुंबई में हरीश भनोट ने बेटी का दाखिला ख्यातनाम बौंबे स्कौटिश स्कूल में कराया. हाईस्कूल पास कर लेने के बाद नीरजा ने सेंट जेवियर कालेज में एडमिशन लिया और वहां से अर्थशास्त्र और सामाजिक विज्ञान विषयों से स्नातक की डिग्री ली.

कालेज के दिनों में एक दोपहर नीरजा अपनी फ्रैंड्स के साथ कालेज गेट के पास खड़ी थी. तभी ‘बांबे’ पत्रिका के संवाददाताओं और फोटोग्राफर्स की एक टीम वहां से गुजरी. उन लोगों की नजर नीरजा पर पड़ी तो उन्हें पत्रिका के नए शुरू हुए फीचर ‘दि गर्ल नैक्सट डोर’ के लिए नीरजा का चेहरा बिलकुल सटीक लगा. उन्होंने बात की तो नीरजा इस के लिए तैयार भी हो गईं. फलस्वरूप पत्रिका के आगामी अंक में फीचर के साथ पूरे पेज पर नीरजा का फोटो भी छपा. चित्र के नीचे कैप्शन था नीरजा भनोट. दाहिने गाल पर डिंपल, बास्केट बौल की रसिया और सेंट जेवियर में बीए की छात्रा.

इस तरह अचानक किसी पत्रिका में चित्र छप जाना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होती, मगर नीरजा के लिए यह उपलब्धि ही रही. क्योंकि यहीं से उस की मौडलिंग की शुरुआत हो गई. इस के बाद उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. करीब 3 सालों तक वह देश के कई प्रतिष्ठित उत्पादों बिनाका टूथपेस्ट, फोरहंस और गोदरेज आदि के विज्ञापनों में दूरदर्शन व सिनेमा के परदे पर दिखाई देती रहीं.

मौडलिंग में मिली अपार सफलता के बाद उन के पास सीरियल और फिल्मों के प्रस्ताव भी आने लगे. लेकिन इन प्रस्तावों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने से पहले ही नीरजा के सामने शादी का प्रस्ताव आ गया. मार्च, 1985 में वैवाहिक विज्ञापन के माध्यम से नीरजा का रिश्ता तय हुआ और वह शादी कर के ससुराल चली गईं. यह रिश्ता नीरजा के लिए जीवन की सब से बड़ी त्रासदी साबित हुई. 2 ही महीने में उन की ससुराल वालों की दहेज की नाजायज मांगें सामने आने लगीं.

यह न नीरजा को स्वीकार था न भनोट परिवार को. फलस्वरूप शादी के चंद महीनों बाद ही नीरजा को वापस उन के मायके भेज दिया गया. बाद में यह रिश्ता तलाक में बदल गया. इस बीच नीरजा भीतर तक छलनी हो चुकी थीं. ससुराल में बारबार मिले तानों ने उन का मन अवसाद से भर दिया था. जो अपमान उन्हें अपनी ससुराल में मिला था, उस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वहां निरंतर उन के वजूद को ललकारा जाता था. वह देश के जानेमाने पत्रकार की बेटी थीं, उन की अपनी खुद की भी एक अलग पहचान थी. पढ़ीलिखी तो थी ही, आकर्षक व्यक्तित्व भी था.

बहरहाल, तलाक के बाद नीरजा ने मौडलिंग से मुंह मोड़ लिया था. टीवी धारावाहिकों और फीचर फिल्म निर्माताओं को वह पहले ही मना कर चुकी थीं. हालांकि नीरजा को अपने पिता के घर में कोई कमी न थी, न ही किसी तरह की कोई परेशानी थी. फिर भी जीवन इतना सरल नहीं होता. आखिर सोचविचार कर उन्होंने नौकरी करने की ठान ली. नौकरी भी कोई आम तरह की नहीं, दूसरों से एकदम हट कर. एक ऐसी नौकरी जो केवल पैसा कमाने के लिए ही न हो, बल्कि जिस में आत्मसंतुष्टि का भी अहसास हो.

आखिर सोचविचार कर नीरजा ने ‘पेन एम’ में फ्लाइट अटैंडेंट की नौकरी के लिए आवेदन कर दिया. इस पद के लिए करीब 10 हजार युवकयुवतियों ने आवेदन किया था. जिन में कुल 80 लोगों को चुना जाना था. नीरजा का नाम भी उन्हीं 80 लोगों में आया. इस के बाद शुरू हो गया नीरजा के जीवन का एक अनोखा अध्याय.

जिस रोज से नीरजा ने पेन एम में काम करना शुरू किया, उसी दिन से हरीश भनोट अपनी पत्नी रमा व कुत्ते टिप्सी को ले कर नीरजा के उड़ान पर जाते वक्त उसे विदा करने जाया करते थे. इतना ही नहीं, उन की वापसी के वक्त भी ये सब उसे घर के दरवाजे पर ही खड़े मिलते थे. ऐसा कभी नहीं हुआ कि नीरजा को घर पहुंच कर डोरबैल बजानी पड़ी हो.

वक्त के साथ नीरजा का जीवन फिर से व्यवस्थित होने लगा था. पिछले जख्म भूल कर वह सामान्य होने की कोशिश करने लगी थीं. इस बीच उन्होंने कुछ शुभचिंतकों के समझाने पर मौडलिंग व अभिनय के छिटपुट कार्यों को भी थोड़ीबहुत तरजीह देना शुरू कर दिया था. 2 सितंबर, 1986 की सुबह नीरजा फ्रैंकफर्ट से वापस आई थी. अगले रोज वह दिन भर शूटिंग में व्यस्त रहीं. इस के अगले दिन उन्हें एक बड़ा असाइनमैंट मिला. उस सुबह 9 बजे वह शूटिंग पर गईं और रात में करीब 8 बजे घर लौटीं. घर पहुंच कर उन्होंने खुशी से चहकते हुए पिता को बताया कि उन्होंने पूरा दिन निर्देशक आयशा सयानी के साथ शूटिंग में बिताया था.

कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद नीरजा ने खाना खाया. फिर मां से पेन एम की पिकअप कार आने से डेढ़ घंटा पहले जगाने का कहते हुए सो गईं. पेन एम से सूचना मिली कि पिकअप कार नीरजा को लेने सवा एक बजे आएगी. अत: साढ़े 11 बजे उन्हें जगाने की प्रक्रिया शुरू हुई जो उन की मां के लिए एक कठिन कार्य था. गहरी नींद में सोई नीरजा को उठाने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी.

मौसम में हलकी ठंडक थी, फिर भी वह हमेशा की तरह ठंडे पानी से नहाई. तैयार होतेहोते नीरजा मां से बतियाती भी रहीं. 7 सितंबर को नीरजा का जन्मदिन था. इस अवसर पर कितने लोगों को बुलाने की बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इस बार वह घर पर रह कर सादे तरीके से जन्मदिन मनाएंगी. सवा एक बजे पिकअप कार उन्हें लेने आ पहुंची. बैग से लदी ट्रौली थामे नीरजा आत्मविश्वास के साथ चलती हुई फ्लैट से बाहर निकल गईं. जब वह कार में बैठ गईं तो मातापिता ने उन्हें हाथ हिला कर विदा किया. तब वे लोग कहां जानते थे कि वे अपनी लाडली बेटी को अंतिम यात्रा पर जाने के लिए विदा कर रहे हैं.

5 सितंबर, 1986 को शुक्रवार था. सुबहसुबह का वक्त. इतनी सुबह कि अभी मसजिदों में अजान के स्वर तक नहीं उभरे थे. कुछ ही देर पहले मुंबई से आया पेन एम विमान कराची की धरती पर उतरा था. और अब फिर से उड़ान भरने की तैयारी में था. विमान में सवार करीबकरीब सभी बच्चे सो रहे थे. केबिन में कुछ यात्री नींद में थे तो कुछ बैठे हुए चायकौफी की चुस्कियां ले रहे थे. वरिष्ठ परिचारिका होने के नाते नीरजा भनोट विमान में चहलकदमी कर रही थीं. विमान चलने में जब कुछ ही वक्त रह गया, तो नीरजा ने सीढि़यों के रास्ते आधुनिक हथियारों से लैस 4 व्यक्तियों को विमान में आते देखा. नीरजा को भांपते देर नहीं लगी कि वे आतंकवादी हैं. उन के हावभाव से लग रहा था कि संभवत: वे जहाज को हाईजैक करना चाहते हैं.

नीरजा ने सब से पहला काम यह किया कि वह इस की सूचना देने के लिए कौकपिट की ओर दौड़ पड़ीं. लेकिन इस के पहले ही एक आतंकवादी ने आगे बढ़ कर उन्हें बालों से पकड़ लिया. इस पर उन्होंने चिल्लाते हुए सांकेतिक भाषा में संभावित विमान अपहरण की घोषणा कर दी. एक अन्य परिचारिका नीरजा का हाईजैक कोड सुनते ही भाग कर इस की सूचना कौकपिट अधिकारियों को दे आई.

सूचना मिलते ही तीनों कौकपिट अधिकारी, पायलट और इंजीनियर विमान के आपातद्वार से कूद कर हवाईअड्डे के टर्मिनल में जा पहुंचे. नीरजा को जैसे ही उन लोगों के भागने की जानकारी हुई, उन्होंने बचाव अभियान की कमान खुद संभालने का निर्णय ले लिया.

अब तक उन्हें बालों से पकड़ने वाला आतंकवादी उन्हें धकेलते हुए विमान के कोने में ले गया था. इस बीच नीरजा संभल चुकी थीं. उन्हें मालूम था कि विमान में उस वक्त अन्य 13 कर्मचारियों के सहित करीब 400 यात्री सवार हैं. नीरजा ने पहला काम यह किया कि आतंकवादियों के साथ वार्ता शुरू कर दी. बातचीत में उन्होंने उन का मकसद जानने की कोशिश की, उन की मांगों के बारे में पता लगाने का प्रयास किया. इस बातचीत में आतंकी नेता ने यह बात पक्की तरह जाहिर कर दी कि विमान को अपहृत कर लिया गया है. उस ने यह भी कहा कि अगर उन की मांगें नहीं मानी गईं तो विमान में सवार सभी लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाएगा.

इस बात ने नीरजा को भीतर तक हिला कर रख दिया. उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि चाहे उन की खुद की जान क्यों न चली जाए, वह विमान में सवार किसी भी शख्स पर आंच नहीं आने देगी. उन्होंने किया भी यही. पूरे 17 घंटों तक जितना भी संभव था, नीरजा अकेली ही सारे यात्रियों की देखभाल करने का प्रयास करती रहीं. इस दौरान उन की मुसकान यात्रियों व अन्य विमानकर्मियों को इस बात पर आश्वस्त करती रही कि खतरा उतना बड़ा नहीं है, जितना उन्होंने सोच लिया था.

नीरजा की भावभीनी मुसकान से आभास होता था कि बस कुछ देर की बात है, फिर सब ठीक हो जाएगा. जबकि नीरजा जानती थीं कि भले ही वह अपनी सूझबूझ और चतुराई से वहां खूनखराबा नहीं होने दे रहीं, लेकिन वक्त गुजरने के साथ अन्य कई तरह की परेशानियां सामने आ सकती हैं. उन्हें और उन की सहयोगी परिचारिकाओं को उड़ान के तकनीकी पक्ष की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी. पावर जैनरेटर का ईंधन खत्म होता जा रहा था, जिस की वजह से वोल्टेज कम होने लगा था.

इस दौरान नीरजा शायद मन ही मन एक ही बात सोच रही थीं कि विमान के भीतर इस तरह की परेशानी पैदा होने से पहले ही वह किसी भी तरह यात्रियों को बाहर निकालने में सफल हो जाएं. वोल्टेज खत्म होते ही बच्चों का दम घुटने की आशंका थी.

तब तक नीरजा ने अपनी आत्मविश्वास भरी बातों से आतंकवादियों का भी मन मोह लिया था. यही वजह थी कि वे पहले की तरह डरानेधमकाने के बजाय अब उन से दोस्ताना लहजे में बातें करने लगे थे. उस वक्त नीरजा आतंकवादियों के नेता के बिलकुल करीब खड़ी थीं. इस बीच जरा सी देर पहले उन्होंने एक यात्री को पानी का गिलास दिया था. विमान के भीतर रोशनी काफी मंद हो गई थी. ठीक उसी वक्त अचानक जाने क्या हुआ कि विमान के भीतर गोलियों की तड़तड़ाहट शुरू हो गई.

दरअसल, अपने मंसूबे कामयाब न होते देख किसी बात पर खफा हो कर अपहर्ताओं ने फायरिंग शुरू कर दी थी. नीरजा को मौका मिला तो वह छलांग लगा कर विमान के इमरजेंसी द्वार के पास जा पहुंची. उन्होंने जल्दी से विमान का दरवाजा खोल कर 100 से ज्यादा यात्रियों को बाहर निकाल दिया. बच्चों को उन्होंने हाथों से उठाउठा कर बाहर किया. इस का नतीजा यह निकला कि आतंकवादियों के सरदार ने नीरजा के पास पहुंच कर उन के पेट में गोली दाग दी. तभी दूसरे आतंकी ने एक और गोली चलाई, जो नीरजा के हाथ में लगी.

इस आतंकवादी ने 2 बच्चों को भी निशाने पर ले लिया था. इस से पहले कि वे बच्चे गोलियों का शिकार होते, नीरजा ने उन के सामने पहुंच कर सारी गोलियां अपने जिस्म पर झेल लीं. नीरजा का समूचा शरीर गोलियों से छलनी हो गया था. बेतहाशा खून बह रहा था. इतना सब होने पर भी उन्होंने यात्रियों को आपातद्वार से कूदने के बारे में समझाना जारी रखा. इस के बाद की नीरजा की दास्तान केवल इतनी है कि उन्हें किसी तरह अस्पताल ले जाया गया, मगर तक तक वह इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थीं. उन की बहादुरी के विवरण कई दिनों तक दुनिया भर के समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर विस्तार से छपते रहे.

पूरे विश्व से असंख्य संवेदना संदेश भनोट परिवार के पास पहुंचे. उस वक्त विमान में फंसे यात्रियों ने पूरी घटना और नीरजा की दिलेरी का विवरण देते हुए अपने पत्रों में लिखा था कि यदि आज वे जीवित हैं तो नीरजा के पराक्रम की बदौलत. नीरजा की याद को ताजा रखने के लिए उन की स्मृति में अनेक लोगों ने पेड़ लगाए. कइयों ने अपनी बेटियों का नाम बदल कर नीरजा रख दिया. कई महानुभावों ने उन की बहादुरी पर कविताएं लिखीं. इन में चर्चित अंगरेजी कवि हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय भी थे.

असाधारण वीरता के लिए दिया जाने वाला ‘अशोक चक्र’ देश का सर्वोच्च पुरस्कार है. तब तक कुल 16 गैरसैनिकों को इस पुरस्कार से नवाजा गया था. 26 जनवरी, 1987 को नीरजा को मरणोपरांत जब यह सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया तो वह इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली देश की सब से कम उम्र की महिला थीं. अमेरिका की विश्वविख्यात संस्था ‘दि नैशनल सोसायटी औफ दि संस औफ दि अमेरिकन रेवोल्यूशन’ ने ‘हीरोइन नीरजा’ को विशेष उपाधि से सम्मानित करते हुए नीरजा के बारे में घोषित किया, ‘नीरजा ने क्रूरतम संकट के समक्ष अद्वितीय वीरता का परिचय देते हुए अपना बलिदान दे कर उन ऊंचे आदर्शों का पालन किया, जिन से हमारे देशभक्त पूर्वज अनुप्रमाणित हुए थे.’

पेन एम ने नीरजा को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने उद्गार कुछ इस तरह से सार्वजनिक किए, ‘अपनी असाधारण कर्त्तव्यपरायणता व निश्चित मृत्यु के समक्ष भी नीरजा ने अपनी निर्भयता व अथक प्रयासों से सैंकड़ों भयभीत यात्रियों और अपने सहकर्मियों को मौत के जबड़े से बाहर खींचा. अपना कर्त्तव्य निभाते हुए उन्होंने अपने जीवन का उत्सर्ग कर डाला. नीरजा का यह निस्वार्थ बलिदान और उन की निष्ठापूर्ण सेवाभावना मानवता के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी, इस में दो राय नहीं.’

पाकिस्तान की प्रमुख संस्था ‘कैदी सहायक सभा’ ने नीरजा को मरणोपरांत अपने प्रथम मानवता पदक ‘तमगा ए इंसानियत’ से नवाजा था.

इन के अलावा और भी बीसियों संस्थाएं थीं, बीसियों पुरस्कार थे, जिन के माध्यम से नीरजा की स्मृतियों को ताजा रखने के प्रयास किए गए थे. भारतीय डाक विभाग ने उन पर विशेष डाक टिकट जारी किया था. पिता हरीश भनोट ने ‘नीरजा भनोट पेन एम ट्रस्ट’ की स्थापना कर के वह पूरा पैसा इस ट्रस्ट के खाते में डाल दिया, जो उन्हें नीरजा के बलिदान के एवज में विभिन्न संस्थाओं से मिला था. यह खाता साढ़े 36 लाख रुपए की धनराशि से खोला गया था.

इस के तहत सामाजिक उत्थान के अन्य कार्यों के अलावा हर साल 2 ऐसी महिलाओं को ‘नीरजा भनोट अवार्ड’ से सम्मानित किया जाने लगा, जिन्होंने बहादुरी की अद्भुत मिसाल कायम करते हुए अन्य महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया हो. आज इस की गिनती देश के गौरवशाली पुरस्कारों में होती है. इस साल 26वें अवार्ड के रूप में यह पुरस्कार 13 जनवरी, 2016 को बंगलुरु की सुभाषिनी वसंत को दिया गया. इस बार यह पुरस्कार हासिल करने वाली वह अकेली महिला थीं.

उन्हें डेढ़ लाख रुपए नकद के साथ एक साइटेशन व एक ट्रौफी दी गई थी. इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने के लिए फिल्म ‘नीरजा’ की हीरोइन सोनम कपूर आई थीं. उल्लेखनीय है कि फौक्सस्टार स्टूडियोज के बैनर तले राम माधवानी के निर्देशन में निर्माता अतुल कासबेकर ने नीरजा के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्म का निर्माण किया है, जिस का टाइटल भी ‘नीरजा’ ही रखा गया है. इस फिल्म में शबाना आजमी, शेखर खजियानी, उदय चोपड़ा एवं अबरार जहूर के अलावा नीरजा के किरदार में सोनम कपूर हैं. यह फिल्म 19 फरवरी, 2016 को रिलीज हो चुकी है. Inspirational Story