Hindi Kahani: छिताई का कन्यादान

Hindi Kahani: राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. वह दिन में अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. दोनों का प्रेम अमर था. लेकिन सुलतान अलाउद्दीन ने छिताई पर नजर डाली तो सब कुछ गड़बड़ा गया. इस के बावजूद दोनों मिल कर ही रहे.

सुलतान अलाउद्दीन खिलजी बुरी तरह फंस गया था. उसे गुमान नहीं था कि यादव राजा रामदेव की दासियां इतनी तेज हैं कि उड़ती चिडि़यों को पहचान ही नहीं लेतीं, जमीन से उन के कान भी काट लेती हैं. अलाउद्दीन अपना नाम सुन कर भागना चाहता था, मगर वह औरत जो दासी मालूम पड़ती थी, उस से अधिक फुर्तीली निकली. उस ने अपनी कमर में बंधी कमंद को भागने वाले पर निशाना लगा कर फेंका. भागने वाला कमंद में फंस कर रह गया. उस की मुश्कें कस चुकी थीं और वह अपनी कमर में एक ओर बंधे नेजे को निकाल नहीं पा रहा था.

तब तक वह औरत एकदम रूबरू आ खड़ी हुई. बोली, ‘‘कटारी मेरे पास भी है बादशाह सलामत. हथियार मत इस्तेमाल कीजिए वरना पछताइएगा. मैं जरा भी आवाज दूंगी तो हमारे सिपाही दौड़े आएंगे. आप के इस तरह पकड़े जाने पर आप की फौज को भागने का रास्ता न मिलेगा, जान लीजिए.’’

अलाउद्दीन खूब अच्छी तरह जानता था कि वह चालाक औरत एकदम सही कह रही थी. उस के पकड़े जाते ही लड़ाई का पासा पलट जाएगा. चाहे बाद में दिल्ली की फौज उसे छुड़ा ले, इस राज्य को नूस्तनाबूद कर दे, मगर उस पर जो धब्बा लग जाएगा, वह फिर न मिटेगा. यह भी हो सकता है कि राजा रामदेव उसे हाथियों से कुचलवा दें या भयानक खाई में फेंकवा दें. वह एकबारगी सिहर उठा. उस ने अपनी हेकड़ी में अकेले इधर आ कर कितनी बड़ी गलती की है. राघो (राघव) चेतन से अलाउद्दीन का प्रस्ताव सुन कर राजा रामदेव का उबल पड़ना बिलकुल वाजिब था.

राघव ने मना किया था कि वह सांप के बिल में न घुसे. मगर सुलतान को अपनी सूझबूझ और बहादुरी पर कुछ ज्यादा ही इत्मीनान हो गया था. अब वह क्या कर सकता था, सिवाय गिड़गिड़ाने के. न जाने यह शैतान की खाला क्या गुल खिलाएगी?

चापलूसी और चालाकी में अदाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप तो बेकार नाराज हो रही हैं. मैं तो शिकार करने आया था. सोचा, कोई परिंदा है. इसी वास्ते लपका था. बताइए, मैं आप की क्या खिदमत कर सकता हूं?’’

उस दासी ने, जिस का नाम मैनरूह था, जवाब दिया, ‘‘सेवा तो हमारे महाराज आप को बताएंगे. मैं क्या बताऊंगी? बस, अब आप चले चलिए चुपचाप.’’

बड़ी आजिजी से अलाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप खामखा नाराज हो रही हैं. शाम हो रही है. मुझे नमाज पढ़ना है. आप जानती हैं. मशहूर है, मैं दीन ईमान का पाबंद और मजहबी सुलतान हूं. मैं इस वक्त खजाने के साथ तो नहीं आया. मगर मेरा ईमान मेरे साथ है. मैं आप को रानी बना दूंगा. जितनी चाहिए, दौलत मैं आप को दे दूंगा. गले का हार बतौर इत्मीनान अभी दे दूंगा. बस मुझे आजाद कर दीजिए.’’

दासी मैनरूह ने सख्ती से उत्तर दिया, ‘‘सुलतान, माफ करना, जिस इंसान को जिस चीज की भूख होती है, उसे वही हर कदम पर याद आती है. आप के पास अगर सही मायने में दौलत होती तो आप मुझे यह लालच न देते. मेरे महाराज ने आज तक किसी को इस तरह का लालच नहीं दिया, क्योंकि देवगिरि देवताओं और ऋषियों का बसाया है. यहां जीने वाली ताउम्र रानी रहती है. मुझे क्या कमी है, जो आप मुझे देंगे? आप को महाराज के सामने जरूर ले जाऊंगी. वही न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन एकदम घबरा उठा. उसे यह अंदाज हो गया था कि यह दासी गरीब हो या न हो, मगर अपने मजहब में और अपने स्वामी राजा रामदेव में विश्वास रखती है. उस ने चट दूसरा पासा फेंका, ‘‘आपा जान, आप ने मेरी बात समझी नहीं. मैं आप को आप के ईमान से रत्ती भर नहीं डिगाना चाहता. आप सोचिए, एक बहन के जरिए एक सुलतान को बेबस बना कर दरबार में पेश किया जाए तो क्या उस के लिए यह डूब मरने की बात नहीं है? मैं इसी तालाब में कूद कर जान दे दूंगा, मगर अपनी शान में हरगिज बट्टा नहीं लगने दूंगा. आप मुझे जिंदगी नहीं दे सकतीं, तो क्या? आप मेरी मौत नहीं रोक सकतीं. अगर ऐसा हो गया तो आप को आप की सौगंध है, आप हमेशा अपने पाप में झुलसती रहेंगी. एक मजहबी सुलतान को आप ने बिना लड़े या चेतावनी दिए धोखे से पकड़ लिया है.’’

मैनरूह एक बार कांप गई. अगर अलाउद्ीन तालाब में कूद पड़ा, या उस ने हीरा चूस लिया या सीने में छुरी घोंप ली और मर गया तो इस का पाप किसे लगेगा? उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं नहीं, तुम हमारे महाराज का भेद लेने यहां आए थे. मैं पेश कर दूंगी. वही तुम्हारा न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन के मन में उम्मीद जगी. बोला, ‘‘अगर मुझे भेद लेने के लिए आना होता तो खुद अकेले बिना तलवार क्यों आता? मैं तो आप लोगों के ईमान को जानता हूं. आप कभी किसी निहत्थे को नहीं छुएंगे. यह आप के धरम का कौल है. भेद लेने के वास्ते मैं भेष बदल कर अपने लोगों को भेजता. मैं तो बस चिडि़यों का शिकार करता हुआ यहां आया था. आप ने देखा होगा बड़ी बी.’’

मैनरूह बोली, ‘‘मैं तो बस यही जानती हूं कि आप का न्याय अब हमारे महाराज करेंगे.’’

अलाउद्दीन ऐसे उछला, जैसे वह कमंद सहित लहराते तालाब में कूद जाएगा. कहने लगा, ‘‘बस, मैं ने जान लिया. मेरी जिंदगी आज तक की थी. मेरी मौत का पाप आप के सिर. अलविदा.’’

मैनरूह फिर घबराई. बोली, ‘‘सुलतान, आप उतावले क्यों हैं? मैं महाराज के पास ले चलती हूं.’’

अलाउद्दीन रुआंसा हो कर बोला, ‘‘अगर महाराज के सामने जा सकता तो आप से दया की भीख क्यों मांगता? आप को अपनी बहन बनाया. आप अपने बड़े भाई की इज्जत को खाक मत कीजिए. आप यही चाहती हैं कि मैं घेरा उठा लूं. मैं अपनी फौज ले कर यहां से चला जाऊंगा.’’

मैनरूह चाहती तो यही थी. खुद महाराज रामदेव भी यही चाहते थे. मगर मैनरूह महाराज की प्रजा ही नहीं थी, बल्कि राजकुमारी छिताई की दासी भी थी. सब से बढ़ कर वह एक औरत होने से उस की पीड़ा को जानती थी. उस ने रुखाई से कहा, ‘‘बहन बनाया है तो यही मेरी इच्छा नहीं है. इस से भी बड़ी इच्छा है. वह पूरी होनी हो तो बताऊं.’’

अलाउद्दीन के बहुत आग्रह करने पर उस ने कहा, ‘‘राजकुमारी छिताई मेरी बेटी की तरह है. आप भी उसे अपनी बेटी मानिए और दोस्ती कर के तब आदर से जाइए.’’

अलाउद्दीन एकदम आसमान से गिरा. छिताई ही नहीं मिली तो इस जद्दोजहद से क्या हासिल? तो भी वह आजाद तो होना ही चाहता था. उस का खून खौल रहा था. मगर किसी तरह इस खूसट औरत को टालना भी था. उस ने कहा, ‘‘जब तुम कहती हो तो इस में कौन सी मुश्किल है. मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं.’’

मैनरूह अलाउद्दीन से भी चालाक निकली. दृढ़ता से बोली, ‘‘बादशाह, इस में एतबार की तो नहीं, इत्मीनान की बात है. आप उस मसजिद की ओर रूबरू हो कर कुरान पाक की कौल ले कर कहिए कि छिताई को मैं अपनी बेटी मानता हूं. तभी मैं हुजूर को छोड़ पाऊंगी.’’

अलाउद्दीन दांत पीस कर रह गया. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. अंधेरा होता जा रहा था. चारों तरफ वे परिंदे हौसले से बोल रहे थे, जिन का शिकार करने वह आया था. लगा, जैसे वे उस की बेबसी पर कलरव कर रहे हों. क्यों वह इस शहर की चहारदीवारी में आया? उसे क्या मालूम था कि यादव राजा रामदेव तो सीधा है, मगर उस के कारकुन बाज की मानिंद चालाक हैं. वह इस एकांत बाग में चिडि़यों का शिकार खेलने लगा. शिकार के बजाय शैतान की खाला गले पड़ी, जिसे इसलाम के सब कायदेकानून मालूम हैं. अगर इस ने इस वक्त राजा रामदेव के सामने उसे खड़ा कर दिया तो बेशक वह उस के सर को कलम करा देगा.

अपनी लड़की के बारे में राघव चेतन की बात सुन तो वह बिफर रहा होगा. सुलतान ने हड़बड़ा कर मसजिद की तरफ मुंह किया और बोला, ‘‘मैं अपने रसूल व कुरान पाक की कसम उठाता हूं, मैं हमेशा छिताई को अपनी बेटी की मानिंद मानूंगा.’’

यह सुन कर मैनरूह बहुत खुश हुई. उस ने झुक कर सलाम किया और सविनय अपनी गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगते हुए सुलतान के बंधन खोल दिए. आजाद होते ही एक बार फिर अलाउद्दीन का खून खौल उठा. उस के जी में आया, कमर के नेजे को निकाल कर अभी इस औरत को मार डाले. मगर उस ने अपने को रोका. अगर यह एक बार भी चीखी तो दर्जनों लोग आ कर अलाउद्दीन को पकड़ लेंगे. अगर न भी चीख पाए तो उस के खून के कुछ धब्बे उस के कपड़ों पर पड़ेंगे, जिस से बादशाह फिर खतरे में पड़ सकता है. किले की घेरेबंदी में होने से तमाम चौकसी चारों तरफ होगी. खून का घूंट पी कर सुलतान बोला, ‘‘बड़ी बी, आप ने वही किया, जो आप का फर्ज था. अब आप मुझे महफूज बाहर निकलने में मदद कीजिए.’’

मैनरूह ने फिर क्षमा मांगी. बोली, ‘‘आप ने मुझे बहन कहा तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आप की सहायता करूं. बस आप कुछ बोलिएगा नहीं. मुझे सब पहचानते हैं. मुझे कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

मैनरूह चलने लगी. पीछे चलते सुलतान को फिर नेजे का खयाल कौंधा. मगर उस ने मन मार लिया. उल्टे उस ने एक मोती की माला निकाली और मैनरूह को नजर करनी चाही. मगर उस सजग दासी ने कान पकड़ कर कहा, ‘‘हुजूर, आप ने मुझे बहन का रिश्ता बख्शा, मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

बारबार कहने पर भी दासी ने स्वीकार नहीं किया. बोली, ‘‘जब आप दिल्ली बुलाएंगे तो ले लूंगी.’’

सचमुच मैनरूह का सब अदब कर रहे थे. उस ने गेट खुलवाया. शहर के फाटक से बाहर होते ही अलाउद्दीन जो भागा तो उस ने अपनी छावनी में जा कर ही दम लिया. वहां उस की खोज हो रही थी. उस शाम जो गुजरी, उस ने ताउम्र किसी के सामने उस का खुलासा नहीं किया. उस ने इस बात का बारबार शुक्र अदा किया कि पकड़ लिए जाने पर भी मैनरूह ने उस की बिना किसी को कानोंकान खबर हुए रिहाई करा दी थी.

जब अलाउद्दीन ने खापी लिया तो राघव चेतन लौट आया. बादशाह को बाखैरियत देख कर उस की जान में जान आई. उस की आपबीती बहुत खराब थी. राजा रामदेव आपे से बाहर हो गया था. किसी म्लेच्छ को कन्यादान करना उस की कल्पना के बाहर था. तो भी उस ने दूत के नाते राघव चेतन को जाने दिया था. दूतियां उस के बाद लौटीं. उन्होंने बताया कि औरों की तरह रामदेव के रनिवास में भी सब मरने को तैयार हैं, परंतु मुसलमानों के हाथ में पड़ने को नहीं. चित्तौड़ में पद्मिनी के जौहर और रणथंभौर में राजपूतों के बलिदान को वह भूला नहीं था. जब छिताई नहीं मिलनी है तो घेरा डालने से क्या फायदा? देवगिरि को लूटने का काम तो वह बरसों पहले ही कर चुका था. सोते समय वह सारी बातों पर विचार करने लगा.

कई साल हो गए. उस ने पहलेपहल नुसरत खां को सेनापति बना कर देवगिरि को खूब लूटा था. फिर वह राजा रामदेव को भी दोस्ती का लालच दे कर दिल्ली ले गया था. बीती बातें उस के मन में कौंध रही थीं…

पराजय की चिंता में राजा रामदेव ने दौलत देने में कसर नहीं की थी. अलाउद्दीन रामदेव को मोहरा बना कर दक्खिन की अकूत दौलत, जो दक्खिनी राजाओं के पास थी, हासिल करना चाहता था. रामदेव बूढ़ा हो रहा था, सोचता था कि अलाउद्दीन से आश्रय पा कर वह पड़ोसी राजाओं को दबा सकेगा. अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपने सिपहसालार उलूम खां को राजा के स्वागत में भेजा था और दरबार में खूब आवभगत की थी.

दरबार के स्वागतसत्कार, ठाठबाट और रागरंग में 3 साल बीत गए. रामदेव को पता ही नहीं चला. जब देवगिरि से रानी का दूत आया तो उसे होश हुआ. राजकुमारी छिताई समय के साथ सयानी होती जा रही है. राजा के अनुरोध को अलाउद्दीन मान गया. विदाई के समय राजा ने देवगिरि के राजप्रासाद को सज्जित कराने की दृष्टि से एक चित्रकार की मांग की, क्योंकि दिल्ली के महलों में चित्रकारी देख कर वह प्रफुल्लित हुआ था. सुलतान ने अपना खास चित्रकार साथ भेजा. लौट कर राजा ने जब बेटी को देखा तो चौंका. 3 साल में ही राजकुमारी कितनी यौवन संपन्न हो गई थी.

राजा ने पुराने भवनों के साथ नए प्रासाद का भी निर्माण करा कर पौराणिक ग्रंथों के विविध प्रसंगों को अपनी इच्छा से चित्रित कराया. चित्रकार नए चित्रों में नए रंग भरता तथा नई आकृतियां अंकित करता रहता था. मन में बसे चित्रों की छवि को वह तूलिका के जादू से अधिक ललित, जीवंत एवं मनोहर बना कर प्रस्तुत कर देता था. एक दिन वह तन्मय हो कर चित्र बना रहा था कि उस की दृष्टि पार्श्व के द्वार पर गई. दमकते सौंदर्य तथा छलकते यौवन की साक्षात स्वामिनी खड़ी थी. उस ने बहुत सुंदरता को सिरजा था, मगर आज विधाता की इस चपल, नवल तथा विरल सृष्टि को निहार कर चकित रह गया था. जिस तन्मयता से वह चित्र की सृष्टि में लीन था, उतना ही वह लालित्य की देवी उस क्षणक्षण संवरती कृति को निहारने में खोई थी.

जैसे ही चित्रकार का ध्यान भंग हुआ और उस ने पीछे देखा, वैसे ही वह सुंदरी जल में फिसलती मीन की तरह अंतराल में विलीन हो गई. चित्रकार के मन में उस अनुपम सौंदर्य को चित्रित करने की लालसा घर कर गई. चित्रकार को यह आभास हो गया था कि वह राजकुमारी छिताई थी. चित्रकार दरबार के साथ ही अंत:पुर में भी चित्र बना रहा था. अतएव उस ने फिर से उस दमकते सौंदर्य का दर्शन कर लिया और इस बार उस ने पूरी सजगता से चुपचाप छिताई की छवि अपनी तूलिका से उतार ली और चित्र को अपने पास रख लिया.

इस बीच राजा ने बेटी हेतु वर की तलाश जारी रखी. उस ने पुत्री का विवाह द्वारसमुद्र के राजा भगवान नारायण के पुत्र राजकुमार सौंरसी के साथ निश्चित कर दिया. चित्रांकन का कार्य समाप्त होने के पश्चात विवाह का मंडप सजाया गया और विवाह कार्य सकुशल संपन्न हो गया. राजकुमारी पति के साथ डोली में ससुराल चली गई. चित्रकार भी पुरस्कार पा कर और अपने स्वामी हेतु उपहार ले कर दिल्ली चला गया. कुछ ही दिनों बाद प्रिय पुत्री के बिना घर सूना पा कर राजा रामदेव ने छिताई को बुला लिया. छिताई और सौंरसी, दोनों देवगिरि आ गए. वैभव और दुलार की कमी न थी. युवक सौंरसी रात्रि में छिताई के साथ रमण करता और दिन में ऊबने लगता तो आखेट के लिए निकल जाता.

राजा रामदेव दामाद को अनजाने क्षेत्र में अकेले जाने से रोकते थे. मगर नवयौवन के अल्हड़पन में सौंरसी परवाह नहीं करता था. एक दिन मृग के पीछे घोड़ा दौड़ाता वह जंगल में घुस गया. मृग आश्रय पा कर एक आश्रम में घुस गया. आश्रमवासी बाहर निकल आए और दयावश राजकुमार से मृग को छोड़ देने का अनुरोध किया. राजकुमार जोश में था. उस ने हिरण को नहीं छोड़ा. तब उस आश्रमवासी ने कुपित हो कर कहा, ‘‘जैसे तुम ने मृगी को दुखी किया है, उसी प्रकार तुम जिस स्त्री के मोह में पड़े हो, वह दूसरे पुरुष के वश में पड़ेगी और तुम दुख भोगोगे.’’

सुन कर सौंरसी अवाक रह गया. उस के प्रार्थना करने पर आश्रमवासी बोले, ‘‘तुम पश्चाताप करोगे तो तुम्हारा दुख दूर होगा.’’

सौंरसी लौट तो आया मगर उस का मन शंकित रहने लगा. उस ने आखेट पर जाना एकदम बंद कर दिया. इस से छिताई और राजा प्रसन्न रहने लगे. राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. अब दिन में वह अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां भी होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. सौंरसी ने अपनी प्रणयिनी छिताई को वीणा सिखाना शुरू किया. धीरेधीरे संगीत ने उन की संगति में ऐसा माधुर्य घोल दिया कि लययुक्त स्वरलहरियां उन के एकांत की निर्विघ्न साधना बन गईं. सुख के ये सरकते दिन आनंद के नित नूतन सोपान बनते चले गए.

उधर चित्रकार जब काम पूरा कर के दिल्ली पहुंचा तो उस ने राजा रामदेव के व्यवहार की प्रशंसा करते हुए राजा के उपहार बादशाह अलाउद्दीन को दिए. अलाउद्दीन ने अपने मित्र की प्रशंसा की. एक दिन अवसर पा कर चित्रकार ने एकांत में संजो कर बनाए और रखे गए राजकुमारी छिताई के चित्र को सम्राट अलाउद्दीन को दिखाया.

बादशाह एकटक उसे निहारते हुए कल्पना के नवीन संसार में विलुप्त हो गया. उस ने तय कर लिया कि ऐसी सुकुमारी सुंदरी कन्या का भोग अवश्य करना चाहिए. वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि आक्रमण किस बहाने किया जाए क्योंकि अपनी खुशी से तो अपनी ब्याहता कन्या अथवा पत्नी न राजा रामदेव दे पाते और न सौंरसी. जब उसे पता चला कि सौंरसी और छिताई देवगिरि में हैं तो उसे लगा कि देवगिरि पर इस समय आक्रमण से जहां छिताई मिलेगी, वहीं फिर से दौलत हासिल होगी.

अत: उस ने प्रकट में बहाना बनाया कि उसे अपने मित्र राजा रामदेव को देखे बहुत दिन हो गए हैं और वह उन्हें लड़की के ब्याह पर बधाई देगा. इस बहाने के कारण उसे राजा ने बीच में रोकने का प्रयास नहीं किया. वह देवगिरि आया और राजधानी को चारों तरफ से घेर लिया. राजा कुछ समझ न सका. परंतु देवगिरि दुर्ग की दुर्गमता के आगे अलाउद्दीन की एक न चली. अत: अब अलाउद्दीन ने छिताई को उसे सौंपने पर घेराबंदी उठाने की शर्त पेश की तो राजा ही नहीं, पूरी प्रजा इस अपमान पर भड़क उठी.

परिणामस्वरूप युद्ध छिड़ गया. सौंरसी वहां फंस गया था और विशेष क्रोध में था. अत: उस के नेतृत्व में देवगिरि के वीर आतताई पर टूट पड़े. अनेक वीर मारे गए. अलाउद्दीन के साधन बड़े थे और वह दूसरे स्थानों से सेना मंगा कर क्षति को पूरी कर लेता था. इसलिए देवगिरि सेना बारबार आक्रमण कर के भी विजयी नहीं हो पाती थी. परंतु जैसे आज देवगिरि दुर्ग की रक्षा व्यवस्था 7 सौ वर्षों के बाद भी रोमांचित कर देती थी, उसी तरह उस समय भी वह अपराजेय थी. इस से अलाउद्दीन पूरी कोशिश के बावजूद जीत न सका.

महीने पर महीने बीत रहे थे. किले में रसद और सैन्य बल की प्रतिदिन कमी होती जा रही थी. अतएव राजा ने विचार प्रकट किया कि सौंरसी और छिताई को किसी तरह सुरक्षित निकाल कर और निश्चिंत हो कर अत्याचारी अलाउद्दीन पर टूट पड़ा जाए. पहले तो सौंरसी रणक्षेत्र से हटने को कतई तैयार न था. उसे उस शाप की भी याद थी कि दुर्ग से बाहर निकलते ही कहीं छिताई आक्रामकों के हाथ न पड़ जाए. परंतु जब उसे सैनिकों की कमी बताई गई तो वह इस शर्त पर अकेले बाहर जाने को तैयार हो गया कि वह अपने राज्य द्वारसमुद्र जा कर वहां की सेना लाएगा और बाहरभीतर दोनों तरफ से अलाउद्दीन पर जोरदार आक्रमण किया जाएगा.

सौंरसी को भेष बदलना पड़ा था. उस ने अपने सारे राजकीय शृंगार छिताई को सौंप दिए. तरुण पतिपत्नी एकदूसरे पर मर मिटने की कसम खाते हुए विलग हुए. जब तक नीचे उतरता हुआ सौंरसी दिखाई दिया, छिताई देखती रही. फिर सिसकते हुए उस ने अपने भी सारे आभूषण उतार दिए और तपस्विनी का जीवन जीने लगी. कई दिनों बाद जब सुलतान को सौंरसी के निकल जाने की खबर मिली तो वह आशंकित हो गया कि कहीं छिताई भी उस के साथ फुर्र न हो गई हो. अलाउद्दीन को यह भी उम्मीद बंधी कि सौंरसी के चले जाने से वृद्ध राजा लाचार हो गया होगा. अत: उसे पुरानी दोस्ती की याद दिला कर छिताई मांग ली जाए.

इस से दोस्ती स्थाई हो जाएगी. छिताई के दुर्ग में होने का सही पता करने के लिए महिला गुप्तचर भेजे गए. जब इत्मीनान हो गया तो अलाउद्दीन ने विशेष कुटनी दूतियों को छिताई के पास भेजा जो उसे सौंरसी से विमुख कर के सुलतान की तरफ ललचा सकें. लेकिन दूतियां छिताई पर कोई प्रभाव न डाल सकीं. वे यह खबर ले आईं कि छिताई प्रतिदिन राम सरोवर आती है. अलाउद्दीन को चित्तौड़ और रणथंभौर में सौंदर्य के प्रति अपनी आसक्ति को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिला था. अत: यहां वह विशेष सजग था.

सुलतान ने अपने एक ब्राह्मण दरबारी राघव चेतन को छिताई सौंपने के आग्रह के साथ राजा रामदेव को समझाने भेजा. ब्राह्मण होने से यह अंदेशा नहीं था कि दूत राघव चेतन का वध होगा. साथ ही अलाउद्दीन ने दूतियों को हिंदू साध्वी का रूप बना कर भेजा जो छिताई को फिर से राजी करें. अलाउद्दीन ने अपनी एक योजना मन में बना ली थी. उसे छिताई को देखे बिना चैन नहीं था. अतएव राघव चेतन के सेवक के रूप में वह खुद परकोटे के भीतर प्रवेश कर गया. राघव चेतन दरबार में गया. दूतियां रनिवास की ओर गईं. सुलतान रामसरोवर में छिताई के दर्शन करने आने की प्रतीक्षा करने लगा. आसपास का वातावरण रमणीय था और तरहतरह के पंछी जलक्रीड़ा कर रहे थे. सुलतान ने समय बिताने के लिए पंछियों का शिकार करना शुरू कर दिया, जिस में वह इतना रम गया कि जब छिताई सखियों सहित आई तो वह जान न सका.

पंछियों के आर्तनाद तथा बेबस कलरव से आकृष्ट हो कर छिताई तो दर्शन कर के चली गई, किंतु मैनरूह को उस ने कारण पता लगाने भेजा. मैनरूह ने सुलतान को छिताई की बेटी मानने की ईमान से कौल उठाने की बात मनवा कर मुक्त किया. सुलतान ने घेरा उठा लिया और लौटने की तैयारी करने लगा.

मैनरूह ने पूरी घटना राजा रामदेव को बता दी. वह प्रसन्न हुआ कि मुसीबत टली. उस ने दासी की खूब प्रशंसा की. जलने वाले हर दरबार में होते हैं. सौंरसी की अनुपस्थिति में जो प्रधान सेनापति थे, उन्होंने इस में भी अलाउद्दीन शासक की कोई चाल बताई. उन्होंने कहा कि दासी की बातों पर विश्वास कर के वे अलाउद्दीन की पकड़ में आ जाएंगे. उन्होंने यहां तक डींग मारी कि जब सुलतान हारने वाला है तो वह शराफत की आड़ में बचना चाहता है. उन्होंने दासी के विरुद्ध काररवाई करने को कहा. यदि वह सचमुच सुलतान था तो उसे किसी भी शर्त पर छोड़ने के बजाय पकड़ कर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए था. अत: या तो दासी झूठी है या सुलतान.

प्रधान सेनापति की बातों से लोग असमंजस में पड़ गए. सचमुच यह अजीब बात थी कि इतना बड़ा सुलतान निपट अकेले वाटिका में आए, फंसे और निकल जाए. प्रधान सेनापति चित्तौड़, गुजरात और रणथंभौर में अलाउद्दीन की मक्कारियों का विवरण देते हुए जोर देने लगे कि सुलतान की यह भी कोई जालसाजी है. अतएव देवगिरि को युद्ध करना चाहिए. अन्य दरबारी भी सशंकित थे. पुराना पापी पाप छोड़ भी दे तो शक उस का पीछा नहीं छोड़ता. सब की आशंका एवं आक्रोश से राजा को कहना पड़ा कि मैनरूह को अलाउद्दीन ने बहन कहा है तो एक बार आजमाइश की जाए. बात सही है तो उस के कहने पर अलाउद्दीन फिर से घेरा डाल दे.

दासी के माध्यम से सुलतान को खबर मिली. सेनापति की आज्ञा से देवगिरि के सैनिकों ने आक्रमण जारी रखा. इस पर सुलतान का क्रोध उबल पडा़. उस ने फिर से मोर्चे बांधे. अबकी बार लड़ाई प्रतिष्ठा की थी. अलाउद्दीन ने अपनी योजना के अनुसार शह दी. छिताई जहां दर्शन के निमित्त आती थी, वह स्थान मुख्य दुर्ग तथा उस की खाई के बाहर था. अलाउद्दीन के कमंद के सहारे उस जगह आहिस्ताआहिस्ता अपने सैनिक उतारे और उन्हें पेड़ों पर छिप कर बैठा दिया. रक्षकों का ध्यान बंटाने के लिए दुर्ग की दूसरी ओर शोरगुल के साथ आग जलवा दी.

दूसरे दिन जब छिताई आई तो अलाउद्दीन के छिपे सैनिक उस की टोली पर टूट पड़े. छिताई के साथ आई 40 दासियां मार डाली गईं. दूसरी तरफ निकटस्थ फाटक पर अलाउद्दीन के सैनिक पूरे वेग से टूट पड़े. छिताई पकड़ ली गई और सुलतान के सामने पेश की गई. छिताई एकदम भावशून्य हो गई थी. सुलतान ने उसे दिलासा दिया कि वह छिताई को बेटी की तरह रखेगा. कह तो दिया मगर छिताई के ललित सौंदर्य को सम्मुख पा कर एक बार सुलतान का चित्त चंचल हो उठा. मगर अपने कौल को याद कर के वह सहम गया.

छिताई के पीछे कुटनियां लगा दी गईं, जो उसे सजनेधजने और पथभ्रष्ट होने के लिए तैयार करें. छिताई ने उन का मर्म समझते ही आंखकान मूंद लिए. अब उस ने खाना तो दूर, पानी पीना भी छोड़ दिया. उस ने प्रतिज्ञा की कि उस विधर्मी महल में अनशन कर के वह प्राण त्याग देगी. जब यह खबर बादशाह को मिली तो वह खुद छिताई के पास आया और उसे समझाने की कोशिश की.

छिताई ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया और अपने हठ पर अडिग रही. छिताई का चेहरा बुझ गया और कंचनवत शरीर की कांति मलीन हो गई थी. सुलतान को लगा कि यदि और देर हुई तो छिताई मर जाएगी. तब उस ने छिताई को अपने विश्वस्त राघव के महल में भेज दिया. अलाउद्दीन ने उस की सुरक्षा की इस आशय से अलग व्यवस्था की कि भविष्य में समय बदलने पर उस का मन भी बदल जाए. साथ लाई उस की वीणा भी मन बहलाने के लिए भेज दी.

उधर जब सौंरसी तैयारी के साथ देवगिरि वापस पहुंचा तो उसे छिताई के अपहरण की सूचना मिली. यह आघात वह सहन न कर सका. उस ने दुर्ग, सेना, महल, राजपाट सब त्याग दिया. उस की दशा एक बार तो विक्षिप्त की भांति हो गई. वह जंगल में चला गया और उस ने वैरागी रूप धर लिया. जो मिला, खा लिया और इधरउधर घूमने लगा. वह छिताई की हर ओर खोज करने लगा. अपने असह्य वियोग की करुणा को उस ने वीणा में झंकृत करना आरंभ किया.

संगीत अन्य कलाओं की भांति साधना है जो भावातिरेक में स्वरों को चमत्कार के रूप में प्रकट करता है. भावों की गहनता कला को साधना के सोपानों से सिद्धि के शिखर का स्पर्श करा देती है. जब छिताई की अतृप्त स्मृति को सौंरसी वीणा के विराट सुरों से तृप्त करने का प्रयास करता तो प्रतीत होता जैसे अदृश्य से दृश्य हो रहा हो. एकांत में सौंरसी के वीणा वादन पर पशुपक्षी स्तब्ध हो कर मुग्ध हो जाते. पुष्प झूमने लगते. प्रकृति थिरकने लगती. वैरागी सौंरसी रुकता नहीं था, टोह लेतेलेते मंजिल की ओर बढ़ा जाता था.

वियोगी हृदयों की भी कोई अनजानी आहट होती होगी. भावी प्रेरणावश सौंरसी दिल्ली पहुंच गया. उस ने एक उपवन में डेरा डाला. प्रात: संध्या अथवा जब उस को भावोद्वेग होता, वह वीणा के तार छेड़ देता. तब बटोही थम जाते. पखेरू चित्रलिखित बन जाते और जल का निर्झर संगत करने लगता था.

उधर अलाउद्दीन ने छिताई के पास इस लालसा से वीणा भेज दी थी कि वह जब प्रकृतिस्थ होगी तो मन बहलाएगी. राघव चेतन के महल में वह कुछ संयमित तो हुई, परंतु स्वाभाविक न बन सकी. राघव चेतन की बातों तथा प्रेरक आशावादिता से वह शरीर संरक्षण हेतु कुछ खानेपीने लगी, मगर वीणा को उस ने हाथ नहीं लगाया. यह वही वीणा थी, जिस पर सौंरसी ने उसे वीणा बजाना सिखाया था. वह वीणा को छेड़ती तो न थी, परंतु उसे छोड़ती भी नहीं थी. वह वीणा उसे प्रियतम की सुधि दिलाती रहती थी.

सुलतान छिताई की वीणा सुनना चाहता था. मगर अन्यमनस्का छिताई उन तारों पर अंगुली नहीं रखती थी. अंत में बादशाह की आज्ञा से दिल्ली के प्रसिद्ध वीणावादक गोपाल नायक छिताई को वीणा झंकार की शिक्षा देने हेतु भेजे गए. सुलतान ने वादा किया कि जिस दिन छिताई वीणावादन करेगी, गोपाल नायक को मुंहमांगा ईनाम मिलेगा.

गोपाल नायक ने बारंबार चेष्टा की. गायन और वादन से छिताई में छिपे कलाकार को जगाने की चेष्टा की परंतु सफल न हुए. अलबत्ता दोनों कलाकारों ने एकदूसरे में अंतर्निहित कला को पहचान लिया. परस्पर सहानुभूति भी हुई. गोपाल नायक छिताई की यातना को समझते थे. छिताई कम से कम एक बार वीणा बजा कर उन की प्रतिष्ठा सुलतान की निगाह में बढ़ाना चाहती थी, मगर कर न सकी.

अंत में उस ने वह वीणा स्वयं गोपाल नायक को दे दी. उस ने कहा, ‘‘गुरुजी, इसे रख लीजिए. शायद कभी वे आएंगे तो देख कर पहचान तो लेंगे अपनी वीणा को. फिर वे इसे बजाएंगे अवश्य. जब उन के हाथ से वीणा बजेगी तो कितना ही शोर हो, मैं सो भी रही होऊं तो इस वीणा के सुरों को पहचान कर जान लूंगी.’’

दिल्ली में सौंरसी के वीणा वादन की अलौकिकता की ख्याति बढ़ रही थी. उस ने भी संगीतज्ञ एवं वीणावादक गोपाल की पारंगतता के विषय में सुना. सौंरसी गोपाल नायक के घर गया. गोपाल नायक ने सम्मानपूर्वक अपने कक्ष में बैठाया. वार्ता करते हुए सौंरसी ने वहां छिताई द्वारा प्रदत्त अपनी वीणा देखी तो उसे बजाने की अभिलाषा व्यक्त की. जैसे ही सौंरसी ने उस वीणा के सुर झनझनाए तो वे चिरपरिचित स्वर छिताई के कानों में गूंज उठे.

उसे प्रियतम के आगमन का आभास हो गया. वह भावातिरेक में विह्वल हो उठी. सुलतान की पाबंदियों के चलते वह अपने स्वामी से मिल नहीं सकती थी. गोपाल नायक इस कौशल से वीणा बजाने और सौंरसी के उत्साह से जान गए कि यह युवक छिताई की प्रियतम है. उन्होंने उसे राघव चेतन की मार्फत सुलतान से मिलने की सलाह दी, परंतु छिताई के विषय में कुछ नहीं बताया.

योगी वेश में सौंरसी राघव चेतन से मिला और उन से सुलतान से मिलाने की प्रार्थना की. राघव योगी की वीणा वादन कला तथा व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ. उस ने योगी की भेंट दरबार में सुलतान से कराई. योगी ने बताया कि वह दक्षिण में सिंहल से आया है और उस का सब कुछ दिल्ली के बाहर के उद्यान में छिन गया है. सुलतान को आश्चर्य हुआ, क्योंकि उद्यान में कोई आताजाता न था. फिर योगी के पास ऐसी क्या संपत्ति होगी जो कोई छीनेगा.

योगी की बातें रहस्यमय लगीं तो भी अलाउद्दीन ने उसे परखने की दृष्टि से वीणा बजाने को कहा. योगी ने सिर झुका कर अनुरोध किया कि सुलतान यदि एक बार उद्यान में दरबार लगाएं तो उसे उस का खोया सब कुछ मिल जाएगा. वहीं वह वीणा भी बजाएगा. सुलतान मुसकराया.

उद्यान के सुरम्य वातावरण में दरबार का आयोजन किया गया. सुलतान ने अनुभव किया कि योगी का वीणा वादन शुरू होते ही दिल गुलाब के फूल की तरह खिल उठा. फिजा खुशगवार होने लगी. लगा, जैसे कुदरत ने नींद से जाग कर अंगड़ाई ली हो. पशुपक्षी एकत्रित होने लगे. जब तक वीणा बजती रही, पूरा दरबार, पशुपक्षी, पेड़पौधे सब चुपचाप सुनते रहे. वीणा वादन खत्म होने पर सुलतान बोल उठा, ‘‘मरहबा! क्या खूब!’’

उसे छिताई से अपना वादा याद आया. इस वीणा पर भी यदि छिताई ने वीणा नहीं बजाई तो वह बहरी हो चुकी होगी. उस ने राघव चेतन से छिताई को वीणा सहित बुला लाने का आदेश दिया. जब तक छिताई आ नहीं जाती, उस ने योगी को वीणा बजाने का आदेश दिया. सुलतान ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी वीणा से छिताई की तकलीफ दूर हो जाए तो तुम जो मांगोगे, तुम्हें ईनाम दिया जाएगा.’’

सौंरसी तन्मय हो कर बजाने लगा. दूर से आती हुई छिताई ने जब वीणा की वह चिरपरिचित स्वरलहरी सुनी तो उस का दिल उछलने लगा. छिताई के पांव स्वचालित से उठने लगे. जब उस ने सौंरसी को देखा, तो दाढ़ीमूंछ, केश तथा जोगिया भेष के बावजूद पहचान गई. फिर तो प्रच्छन्न आह्लाद का ज्वार उमड़ आया. मुखमंडल प्रफुल्लता की आभा से दीप्त हो उठा. सारी सभा उस की इस असाधारण मन:स्थिति से प्रमुदित हो उठी.

राघव चेतन ने वीणा निकाली. गोपाल नायक ने उसे ला कर बीच सभा में छिताई के सामने वादन की स्थिति में प्रस्तुत कर दिया. आनंद की उदात्त लहरियां सौंरसी तथा छिताई के मानस में गूंज रही थीं. आंखों के मिलते ही वे एकदूसरे को पहचान ही नहीं गए, बल्कि उन में वियोग का संताप, उलाहना, यातना, सब आनंद में परिवर्तित हो गए. उस आनंद में संगीत सुख की वर्षा बन निर्झर सा फूट पड़ा.

अनजाने में छिताई ने सौंरसी की दी हुई वीणा को उठा लिया. लगा कि वह सुहाग के दिनों की पारंगतता को पुन: प्राप्त कर चुकी है. न जाने कब तक दोनों एकदूसरे की ओर अपलक निहारते हुए वीणा बजाते रहे. पशुपक्षी एकटक उन्हें देख रहे थे. संगीत के ताल पर मोर नाचने लगे. मृग थिरकने लगे. लगता था, जैसे वीणा की स्वर लहरियों से सब अलौकिक हो उठा हो.

धीरेधीरे सौंरसी ने वीणा की गति धीमी की. छिताई ने भी साथ दिया. जब उन्होंने वीणा वादन रोका तो पूरी सभा सन्नाटे से करतल ध्वनि में बदल गई. सुलतान ने छिताई को इतनी उत्फुल्ल कभी नहीं देखा था. छिताई ने वीणा ही नहीं बजाई, उस ने अपनी कला और उल्लास से पूरी सभा को आह्लादित कर दिया था. सुलतान को अपना वादा याद आया. उस ने सौंरसी से पूछा, ‘‘तुम्हारा ईनाम पक्का. बताओ, तुम्हें क्या चाहिए. आज हमें पता चला कि मौसीकी भी एक तरह की इबादत है. और छिताई, हम ने तुम्हारी बारीकियों को भी परखा. गजब का हुनर है तुम दोनों में.’’

सौंरसी बुत बना बैठा रहा. वीणा वैसे ही पकड़े रहा. एकटक सुलतान को देखता रहा. सुलतान ने फिर शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘जोगी, बताओ तुम क्या चाहते हो? तुम जो मांगोगे, वह तुम्हें मिलेगा.’’

जोगी ने अदब से सिर झुकाया, मुसकराया. फिर फरमाया, ‘‘मान्यवर, आप मुझे वचन देते हैं?’’

अलाउद्दीन की पारखी नजरों ने परख लिया था कि वे दोनों एकदूसरे के निकट रहे हैं. तुरंत उसे शक हो गया कि यही सौंरसी है. परंतु सभा के सम्मुख वह दो बार पूर्व ही वचन दे चुका था. उस ने बेसाख्ता कह दिया, ‘‘बेशक, हम अपनी बात पर कायम रहेंगे. अपना ईनाम मांगो.’’

जोगी ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘श्रीमान, मुझे छिताई को ही दान में दे दीजिए.’’

सुलतान कुछ बोले, इस के पहले ही छिताई आर्तस्वर में, जिस में संयोग का आवेग और विरह की विवशता निहित थी, सिसकती हुई अपने पति के चरणों में गिर पड़ी. सुलतान ने एक बार सभा को देखा, फिर राघव चेतन को निहारते हुए बोला, ‘‘पंडित, वो क्या कहते हैं, तुम्हारे मजहब में? हां, कन्यादान. जोगी, तुम चाहे जो भी हो, मैं छिताई को तुम्हें कन्यादान करता हूं.’’

सौंरसी ने उठ कर 3 बार बंदगी की. पूरी सभा में वाहवाह, बाखूब, वल्लाह, आमीन की आवाजें गूंज उठीं. सुलतान ने हंसते हुए फरमाया, ‘‘मगर मैं ने बेटी को तो कुछ दिया ही नहीं. छिताई, बताओ, तुम क्या चाहती हो?’’

कुछ लोग कठोर अलाउद्दीन की इस दरियादिली पर चकित थे. चित्तौड़ और रणथंभौर के किलों को पत्थर के खंडहरों में तब्दील करने वाले अलाउद्दीन ने सब के सामने छिताई को अपनी बेटी पुकारा था. सौंरसी तथा छिताई की तपस्या ने पत्थर को भी पिघला दिया था. संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था. छिताई ने सिसकते हुए, हाथ जोड़ कर भूमि पर सिर रखा. बोली, ‘‘हे सम्राट, हे पिता, मुझे आप का बस आशीर्वाद चाहिए. आप ने मुझे सब कुछ दे दिया.’’

सौंरसी ने विनयपूर्वक अपना वास्तविक परिचय तथा छिताई को अपनी परिणीता बताया. पूरी सभा इस अद्भुत जोड़ी पर स्नेह की वर्षा करने लगी. अलाउद्दीन ने शाही ढंग से छिताई और सौंरसी की विदाई की. देवगिरि पहुंचने पर दोनों का भव्य स्वागत हुआ. छिताई ने अपने धैर्य से विजय प्राप्त की थी. कुछ दिन वहां रह कर दोनों द्वारसमुद्र चले गए. कोई 5 सौ वर्ष पूर्व कवि नारायण दास ने ‘छिताई वार्ता’ प्रेम काव्य की रचना की थी, जिस का विवरण डाक्टर राजमल वोरा ने अपनी पुस्तक ‘देवगिरि के यादव राजा’ में उल्लिखित किया है. Hindi Kahani

लेखक – जगदीश जगेश   

 

UP News: खत्म हो गया खूबसूरत रिश्ता

UP News: परिवार पैसों से नहीं, प्यार से खुश रहता है, जिस के लिए संयम, विवेक, समर्पण और आपसी तालमेल जरूरी है. डा. विशाल यही नहीं कर पाए, जिस की वजह से आज वह पत्नी को प्रताडि़त कर मौत के मुंह तक पहुंचाने के आरोप में जेल में हैं.

किसी परिवार की खुशहाली का मूल आधार सिर्फ दौलत ही नहीं, त्याग, समर्पण, विश्वास, आपसी प्यार, अपनापन और भावनाओं का संगम होना जरूरी है. जहां यह सब नहीं होता, वहां खुशियां पानी के बुलबुले और कोहरे जैसी होती हैं. जिस तरह कुछ वक्त के बाद बुलबुला अपना वजूद खो देता है और कोहरा छंट जाता है, कुछ वैसा ही खुशियों के साथ होता है. दौलत की चकाचौंध से प्यार करने वालों की अन्य मामलों में झोलियां खाली ही रह जाती हैं, क्योंकि पैसा जरूरतों को तो जरूर पूरी कर देता है, लेकिन वह सब नहीं दे पाता, जो खुशहाल जिंदगी के लिए जरूरी होता है.

राजेश कौड़ा इन बातों को अच्छी तरह जानतेसमझते थे. व्यवहारकुशल राजेश के लिए उन का अपना परिवार ही पूरी दुनिया था. वह सरकारी मुलाजिम थे. हर आम आदमी की तरह वह भी चाहते थे कि उन के परिवार में खुशियों के जुगनू हमेशा रोशनी बिखेरते रहें. इसी सोच के समुद्र में उन्होंने प्यार, समर्पण और जिम्मेदारियों की किश्ती को हमेशा चलाया था. राजेश कौड़ा उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के मोहल्ला अरविंदपुरी के रहने वाले थे. परिवार के संचालन व बच्चों की संस्कारपूर्ण परवरिश में गृहणियों का बड़ा योगदान होता है. उन की पत्नी प्रेमलता ने इस काम को दिल के साथसाथ दिमाग से पूरा किया. उन की 3 बेटियां, शालिनी, सोनिया और शिवानी थीं. बच्चे मातापिता के लिए अनमोल पूंजी की तरह होते हैं, जिसे वे अपने ढंग से सहेज कर रखते हैं.

राजेश की मानसिकता ऐसी नहीं थी कि बेटियों के साथ कोई भेदभाव करते. वह इस से पूरी तरह मुक्त थे. ज्ञान की रोशनी दुनिया के हर खजाने से ज्यादा अनमोल होती है. वह इस बात को जानते और समझते थे. इसी वजह से उन्होंने बेटियों को बेटा समझा और उन्हें शिक्षा की आजादी दी. परिवार का माहौल, मातापिता के विचार, संस्कार और जिम्मेदारियां अच्छी हों तो उस का असर बच्चों पर पड़ता ही है. कोड़ा दंपत्ति की बेटियां न सिर्फ उन की उम्मीदों पर खरी उतरीं, बल्कि उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल कर के उन का नाम भी रोशन किया. उन में एमबीबीएस, एमडी की पढ़ाई करने वाली शालिनी गोल्ड मैडलिस्ट थी. तीनों बेटियां पढ़लिख कर कामयाब हुईं तो उन्होंने एकएक कर के सभी का विवाह कर दिया.

शालिनी का विवाह मेरठ शहर के ही थाना सदर बाजार के पौश इलाके थापरनगर में विशाल से हुआ था. विशाल खुद भी डाक्टर थे. उन्होंने विदेश से मैडिकल की पढ़ाई की थी. उन के पिता डा. सी.एल. आर्य की गिनती नामी डाक्टरों में होती थी. वह सादगी पसंद अच्छे स्वभाव के डाक्टर थे. कोठी के बाहरी हिस्से में ही वह ‘आर्य चेस्ट क्लीनिक’ चलाते थे. उन के परिवार में पत्नी वीना आर्य के अलावा एक बेटी थी सपना, जिस का विवाह हो चुका था. शालिनी का विवाह विशाल के साथ सन 2002 में हुआ था. विवाह और उस की खुशियां बसंत ऋतु की तरह होती हैं, जिस में हजारों रंगबिरंगे फूल एक साथ खिल कर जिंदगी को महका देते हैं. जीवन के इस पायदान पर अनोखी मादकता होती है. लगता है, वह पल ठहर जाए और खुशियों का घरौंदा आबाद रहे.

लेकिन यह सिर्फ खूबसूरत सोच भर होती है, वास्तविकता में ऐसा कतई नहीं होता. इस के पीछे आईने की तरह साफ वजह यह होती है कि एक तो वक्त अपनी चाल नहीं छोड़ता, दूसरे जिंदगी कभी घुमावदार होती है तो कभी सीधी. समय अपनी गति से चलता रहा. समय के साथ शालिनी 2 बेटियों, वर्णिका और निकिता की मां बनी. शालिनी और उस के पति विशाल भी डा. सी.एल. आर्य की क्लिनिक में ही मरीजों को देखते थे. क्लिनिक के बोर्ड पर तीनों का संयुक्त नाम था. आर्य परिवार के पास नाम, दौलत और शोहरत, सभी कुछ था. अच्छी जिंदगी के लिए यह सब खुशनसीब लोगों के पास ही होता है या यूं कहें कि इस तरह की जिंदगी के लिए न जाने कितने लोग तरसते हैं.

आधुनिकता के दौर में चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे कुछ ऐसी हकीकतें होती हैं, जो सामाजिक तौर पर प्रत्यक्ष नजर नहीं आतीं. बहुत से घरों की दीवारों की पीछे न जाने कितने तूफान चल रहे होते हैं. यानी सिर्फ दौलत और शोहरत देख कर यह अंदाजा लगाना कठिन होता है कि वहां सब खुश हैं. डा. आर्य के परिवार में भी कुछ ऐसा ही था. हंसमुख स्वभाव की शालिनी बेहद मृदुभाषी थी. उस के इस स्वभाव को न सिर्फ मरीज, बल्कि आसपास के लोग भी पसंद करते थे. उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य स्वभाव के जितने अच्छे थे, उन की पत्नी वीना ठीक इस के उतना ही विपरीत थीं. तेजतर्रार वीना हर बात पर टीकाटिप्पणी करना और परिवार को अंगुलियों पर नचाना अपना हुनर समझती थीं.

ऐसी बातों का दायरा हद से ज्यादा फैल जाए तो घर की शांति को ग्रहण लग जाता है. उन की इन बुरी आदतों का शिकार शालिनी भी हो चुकी थी. पढ़ेलिखे होने के बावजूद डा. विशाल और उन की मां वीना आर्य रूढि़वादी सोच और कुरीतियों का शिकार थीं. उन्हें शालिनी से शिकायत थी कि उस ने बेटे को जन्म नहीं दिया. इस के अलावा दहेज से ले कर छोटीछोटी बातों पर बतंगड़ बन जाना आम बात हो गई थी. ऐसी बातें खुशियों पर ग्रहण लगाने वाली होती हैं. शालिनी कभी झगड़े का तो कभी मारपीट का शिकार हो जाती थी, लेकिन पिता के घर से मिले संस्कार उसे बांधे रखते थे.

इस के अलावा एक बात यह भी थी कि डा. सी.एल. आर्य बहू शालिनी को बेटी की तरह मानते थे. वह बहू की काबलियत और व्यवहार की कद्र करते थे. सामाजिक अच्छाइयों और बुराइयों का भी उन्हें खयाल था. जब भी झगड़े के हालात उत्पन्न होते थे, डा. आर्य शालिनी की ढाल बन कर खड़े हो कर मामले को शांत करा देते थे. शालिनी की अपनी बहनों और मातापिता से बातें होती रहती थीं. इन कड़वाहटों से वे भी वाकिफ थे, लेकिन मामला चूंकि बेटी की ससुराल का था, इसलिए किसी प्रकार का वे हस्तक्षेप नहीं करते थे. बहुत सी बातों को खामोशी के धागों से शालिनी अपने होंठों को सिल लेती थी. शालिनी की परेशानी तब और बढ़ गई, जब उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य की मौत हो गई.

कौडा दंपति ने शालिनी को नाजों से पाला था. हर मातापिता चाहते हैं कि उन की बेटी ससुराल में खुश रहे. वे भी ऐसा ही चाहते थे, लेकिन शालिनी के मामले में ऐसा नहीं हो सका था. वह बेटी को समझाते हुए वैवाहिक जीवन का वास्ता दे कर परिवार को संभालने की नसीहतें दिया करते थे. उसे भी परिवार के संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का खयाल था. अब तक शालिनी की बड़ी बेटी वर्णिका नौवीं कक्षा में आ चुकी थी, जबकि उस से छोटी निकिता पांचवीं कक्षा में थी. वक्त अपनी गति से चल रहा था. बुरा वक्त किसी की जिंदगी में कब दस्तक दे दे, इस बात को कोई नहीं जानता. शालिनी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

30 अगस्त, 2015 की सुबह करीब साढ़े 11 बजे शालिनी की बेटी वर्णिका का अपनी नानी प्रेमलता के पास फोन आया तो वह चौंकीं. वजह यह थी कि उस ने बताया था कि घर में झगड़ा हो रहा है. उस के पिता और दादी मम्मी को परेशान कर रहे हैं. बेटी को ले कर पहले से ही चिंतित कौड़ा दंपति पर यह खबर बिजली बन कर गिरी. प्रेमलता ने यह बात पति को बताई तो वह मेरठ में ही रहने वाली अपनी बहन उमा और बहनोई राजकुमार को साथ ले कर कुछ ही देर में बेटी की ससुराल थापरनगर पहुंच गए.

उस वक्त घर में महाभारत छिड़ा हुआ था. उन लोगों का इस तरह अचानक आना विशाल और वीना को नागवार गुजरा. वीना उन की आवभागत करने के बजाय बेरुखी से बोली, ‘‘भाईसाहब, आप को इस तरह नहीं आना चाहिए, यह हमारे घर का मामला है.’’

राजेश हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘माफ कीजिए बहनजी, कौन पिता चाहता है कि उस की बेटी दुखी रहे. फिक्र तो सभी को होती है. आप लोग मेरी बेटी को इस तरह परेशान करते हैं, यह ठीक नहीं है. ऐसी क्या भूल हो गई हमारी बेटी से?’’

इस पर वीना हाथ नचा कर बोलीं, ‘‘हमें आप को यह बताने और समझाने की जरूरत नहीं है, आप यहां से चले जाएं तो बेहतर होगा.’’

राजेश को बेटी की ससुराल में अपने साथ इस तरह के रूखे और अपमानजनक व्यवहार की उम्मीद नहीं थी. वह शर्मिंदा हो गए. अपने सामने पिता की इस तरह बेइज्जती होते देख शालिनी की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘पापा, आप चले जाइए. यहां तो यह रोज का हाल है.’’

राजेश का दिल नहीं माना. उन्होंने विशाल से कहा, ‘‘बेटा, अपने पविर को संभाल कर रखो. बुजुर्गों ने कहा है कि रोजरोज की कलह अच्छी नहीं होती. वैसे तो यह आप के घर का मामला है, लेकिन बड़ा होने के नाते तुम्हें समझा तो सकता ही हूं.’’

राजेश का इस तरह समझाना विशाल को कांटे की तरह चुभा. वह भी बेरुखी से ही पेश आया. उस ने कहा, ‘‘हम सब संभाल लेंगे पापाजी, आप चिंता न करें. मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. प्लीज, आप यहां से चले जाइए.’’

राजेश मन मसोस कर वहां से चले आए. मातापिता बेटी को ससुराल में सुखी रहने की उम्मीद करते हैं, लेकिन वहां जो हालात थे, उन्होंने राजेश और उन की पत्नी को चिंता में डाल दिया था. हंसमुख स्वभाव की बेटी कब गंभीर हो गई थी, उन्हें पता ही नहीं चला था. उन्होंने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. उन्हें क्या पता था कि इस से भी बुरा होने वाला है. उसी रात करीब 2 बजे किसी व्यक्ति ने फोन कर के उन्हें बताया कि उन की बेटी को जहर दे दिया गया है. उसे जबरदस्ती इंजेक्शन लगा कर मारने की कोशिश की गई है. इस सूचना ने उन की नींद उड़ा दी. आननफानन में उन्होंने अपने नातेरिश्तेदारों को फोन किया और धड़कते दिल से शालिनी के घर जा पहुंचे. वहां पता चला कि शालिनी को जसवंतराय अस्पताल ले जाया गया है.

सभी लोग जसवंतराय अस्पताल पहुंचे. शालिनी की हातल गंभीर थी और उसे आईसीयू में भरती कराया गया था. डा. विशाल तब तक वहीं था, लेकिन उन लोगों को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. बातचीत में उस की ससुराल वालों से झड़प हो गई तो वह भाग निकला. घटना की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना मिलते ही थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी राजेंद्रपाल सिंह मौके पर पहुंच गए.

शालिनी का इलाज कर रहे डाक्टरों का कहना था कि उस के शरीर में सल्फास की प्रकृति का जहर है. उस के हाथ, कमर व अन्य जगहों पर चोट के भी निशान थे. इस का मतलब उस के साथ मारपीट भी की गई थी. राजेश परिवार के हालातों से वाकिफ थे. शालिनी की इस हालत के लिए उस की ससुराल वाले जिम्मेदार थे. उन्होंने हत्या का आरोप लगा कर हंगामा शुरू कर दिया. शालिनी की हालत बेहद नाजुक थी. उसे वेंटीलैटर पर रखा गया था. वह बोलने की स्थिति में नहीं थी. घर वाले परिवार के हालात और उत्पीड़न का हवाला दे कर सल्फास या जहरीला इंजेक्शन जबरन लगाने का आरोप लगा रहे थे.

एसएसपी डी.सी. दुबे को इस हाईप्रोफाइल मामले की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस को निष्पक्ष काररवाई के निर्देश दिए. इस बीच शालिनी की बेटियों को ननिहाल भेज दिया गया. अपने मरीजों के लिए संवेदनशील रहने वाली डा. शालिनी खुद मौत से लड़ रही थी. जहर उस के शरीर में पूरी तरह घुल चुका था. डाक्टर उसे बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे, लेकिन अथक प्रयास के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. करीब 28 घंटे मौत से लड़ कर शालिनी की सांसों की डोर टूट गई. इस से उस के परिवार में कोहराम मच गया. अस्पताल में पूछताछ में पता चला कि शालिनी को वहां सीने व पेट दर्द की शिकायत के बहाने भरती कराया गया था.

पुलिस ने राजेश की तहरीर पर पुलिस ने अपराध संख्या 414/15 पर भादंवि की धारा 307, 328, 504, 506 व दहेज अधिनियम की धारा 498ए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद शालिनी के शव के पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. अब तक डा. विशाल और शालिनी की सास वीना, दोनों ही कोठी में ताला लगा कर फरार हो चुके थे. शालिनी की मौत से हर कोई आहत और आक्रोशित था. पोस्टमार्टम के बाद 1 सितंबर को गमगीन माहौल में उस के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. शालिनी की बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. कभी दुलहन के रूप में बेटी को विदा करने वाले राजेश कौड़ा ने सोचा भी नहीं था कि उन्हें होनहार बेटी की अर्थी को कंधा देना पड़ेगा.

इस बीच लोगों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर जाम लगा दिया. मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक (नगर) ओमप्रकाश सिंह ने जल्द गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर जाम खुलवाया. पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया तो ये टीमें मांबेटे की तलाश में लग गईं. अगले दिन शालिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. उस की मौत शरीर में जहर घुलने से हुई थी. लीवर, किडनी से ले कर शरीर के हर अंग में जहर फैल गया था. उस के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाने का निशान था. डाक्टर ने पुलिस के कहने पर जांच के लिए बिसरा सुरक्षित रख लिया था. बाद में उसे जांच के लिए आगरा स्थित फोरैंसिंक लैब भेज दिया गया था.

उधर पुलिस ने आरोपियों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी थी, लेकिन वे हत्थे नहीं चढ़ रहे थे. विशाल विदेश भाग सकता था, इस आशंका के तहत लुकआउट नोटिस जारी करा दिया गया था. विशाल का मोबाइल स्विच औफ था. उस की काल डिटेल्स से पता चला कि उस के कई लड़कियों और महिलाओं से संबंध थे. शालिनी के घर वालों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे से भी मुलाकात की. 4 सितंबर को शालिनी की तेहरवीं की रस्म में आर्य परिवार की छोड़ो, उन का कोई रिश्तेदार तक नहीं आया था.

गिरफ्तारी न होने से शालिनी के घर वालों में गुस्सा था. आरोपियों का कुछ पता नहीं चल रहा था. शालिनी के परिजनों ने 5 सितंबर को विशाल की कोठी पर उस के और वीना के कातिल होने संबंधी पोस्टर चस्पा कर के धरना दे दिया. पुलिस ने गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर धरना खत्म कराया. पुलिस को बिसरा रिपोर्ट का इंतजार था. इस बीच पुलिस ने अदालत से दोनों आरोपियों का गैर जमानती वारंट हासिल कर लिया. देखतेदेखते कई दिन बीत गए. मामला मीडिया की सुर्खियां बना था.

शालिनी की बिसरा जांच रिपोर्ट आ गई. उस में एल्यूमिनियम फास्फाइड (सल्फास) नामक जहर के अंश पाए गए थे. उसे जहर दिया गया था या उस ने मानसिक दबाव में खुद खाया था, इस का जवाब गिरफ्तारी के बाद ही मिल सकता था. अभियुक्तों की गिरफ्तारी को ले कर लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने कैंडल मार्च निकाले और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर से भी मुलाकात की. पुलिस विशाल तक भले पहुंच नहीं पा रही थी, लेकिन अदालत से उस के घर की कुर्की का वारंट हासिल कर के चस्पा जरूर कर दिया था. पुलिस से बचने के लिए अपनी गिरफ्तारी पर स्टे हेतु विशाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अरजी लगाई, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया.

आखिर 16 सितंबर को डा. विशाल की फरारी का पटाक्षेप हो गया. उसे पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह अदालत में आत्मसमर्पण करने जा रहा था. विशाल से विस्तृत पूछताछ की गई. शालिनी के घर वालों और विशाल से पूछताछ में जो कहानी निकल कर आई, वह आर्थिक संपन्न परिवार में  घरेलू हिंसा के सामाजिक कलंक व उजले चेहरों के पीछे की चौंकाने वाली हकीकत थी. शालिनी होनहार थी. एमबीबीएस की पढ़ाई में वह अपने बैच की टौपर रही. इस के लिए उसे गोल्ड मैडल भी मिला. इस के साथ ही वह बालीबौल की भी अच्छी खिलाड़ी थी. राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले कर उस ने कई इनाम जीते थे. डाक्टर की डिग्री हासिल करने के साथ ही कौड़ा दंपति ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी थी.

शालिनी खूबसूरत होने के साथ होशियार थी, इसलिए थोड़े प्रयास के बाद 12 साल पहले उन्होंने शालिनी का रिश्ता डा. सी.एल. आर्य के एकलौते बेटे डा. विशाल में तय कर दिया. आर्थिक रूप से संपन्न डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव और आचरण के व्यक्ति थे. समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चेस्ट स्पैशलिस्ट के रूप में उन का नाम था. समाज में उन्हें इज्जत की नजरों से देखा जाता था. राजेश को लगा कि वह खुशनसीब हैं, जो उन्हें बेटी के लिए इतना अच्छा रिश्ता मिल गया. उन्होंने सोचा कि हमपेशा पति के साथ शालिनी खुश रहेगी.

रस्मी बातचीत के बाद शालिनी और विशाल ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. राजेश के परिवार को पहला झटका तब लगा, जब श्रीमती वीना आर्य ने दहेज की ख्वाहिश जाहिर की. दहेज को भले ही बुराई, कुप्रथा, कानून के खिलाफ कहा जाए, लेकिन यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि दहेज समाज में परंपरा बन गया है. शादियों में लाखोंकरोड़ों खर्च किए जाते हैं. कभी लड़के वालों की मांग पर तो कभी सामाजिक दिखावे के लिए तो कभी हैसियत के अनुसार. राजेश ने भी अपनी हैसियत के अनुसार शहर के एक बड़े फार्महाउस में 1 नवंबर, 2002 को धूमधाम से विवाह समारोह आयोजित कर के भारी मन से बेटी को विदा कर दिया. इस विवाह में उन्होंने 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए.

हर लड़की की तरह शालिनी ने भी मन में ढेरों उमंगे और सपने लिए ससुराल में पहला कदम रखा. विवाह का एक साल हंसीखुशी से बीत गया. ससुर के क्लीनिक में ही शालिनी ने प्रैक्टिस शुरू कर दी. शालिनी ने बेटी को जन्म दिया तो सास के अरमानों पर जैसे पानी फिर गया. वह बेटे की ख्वाहिश रखती थीं. बहुत जल्द उन्होंने ताने देने शुरू कर दिए तो सास की बातें शालिनी के हृदय पर तीर की तरह चुभने लगीं. इतना ही नहीं, उन्होंने नवजात बेटी के पालनपोषण से भी इंकार कर दिया. डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे. वह बहू का पक्ष लेते तो वीना उन्हें भी आड़े हाथों लेती, ‘‘यह तुम्हारी बहू है बेटी नहीं, जो इस का पक्ष लेते हो.’’

डा. आर्य समझाने की कोशिश करते, ‘‘बहू भी बेटी समान होती है वीना, तुम्हें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए.’’

डा. आर्य कहते जरूर थे, लेकिन उन की इस तरह की बातें वह एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थीं. शालिनी ने सास की आए दिन होने वाली तानेबाजियों की शिकायत पति विशाल से की. उसे उम्मीद थी कि वह उस के दिल के घावों पर सहानुभूति का फीहा रखेगा, लेकिन उस ने भी अपनी मां का समर्थन कर के उसे निराश कर दिया. वीना आर्य दानदहेज से भी नाखुश थीं. इसे ले कर भी वह ताने मारने लगीं थीं.

शालिनी एक बार मायके आई तो हमेशा खिलखिलाने वाली बेटी का बुझा चेहरा देख कर राजेश और प्रेमलता को लगा कि वह बीमार रही है. उन्होंने उस के दुखी और उदास रहने की वजह पूछी तो मातापिता के प्यारभरे बोलों से टूटी हुई शालिनी के सब्र का बांध टूट गया. कंपकंपाते होंठों से उस ने आपबीती कह सुनाई. कौड़ा दंपति ने बेटी को समझाया, विवाह के बाद बहुत कुछ सहना पड़ता है.

शालिनी ने एक बार फिर बच्चे के नवजीवन की तैयारी की तो वीना खुश हुई कि इस बार जरूर बेटा होगा. यह बात अलग थी कि उन के अरमानों पर एक बार फिर पानी फिर गया. शालिनी को दोबारा भी बेटी हुई तो उन पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाने लगा. हर रोज लगता था, जैसे पति और सास अपने दिलों की भड़ास निकालते हैं. उन के शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतरते थे. समय बीतता गया. शालिनी बेटियों को बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि वे पढ़लिख कर नाम रोशन करें. उधर बेटी का जीवन सुखद रहे, यह सोच कर राजेश कौड़ा ने कुछ रस्मी अवसरों पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार वीना आर्य को नकद रुपए भी दिए.

इस बीच डा. सी.एल. आर्य कैंसर से पीडि़त हो गए. ऐसे बुरे वक्त में विशाल ने पिता को उपेक्षित सा कर दिया. शालिनी ने एक अच्छी बहू का फर्ज निभा कर उन की खूब सेवा की. बेटे से ज्यादा उन्होंने शालिनी पर नाज किया. विशाल उन की कसौटी पर काबिल बेटे के तौर पर खरा नहीं उतरा. शालिनी को अपनी विरासत का सही उत्तराधिकारी मान कर उन्होंने अपनी करोड़ों की संपति का बड़ा हिस्सा उस के नाम कर दिया.

यह परिवार में विवाद की नई वजह बन गया. एक साल पहले डा. सी.एल. आर्य इस दुनिया से विदा हो गए. ससुर की मौत के बाद तो शालिनी के लिए प्रताड़नाओं का जैसे दौर ही शुरू हो गया. पति और सास को उस से मारपीट करने में कोई गुरेज नहीं था. शालिनी अपनी सोच सकारात्मक रखती थी. उस ने सोचा कि वक्त के साथ उन का व्यवहार सुधर जाएगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ. विशाल और वीना किसी दूसरी ही मिट्टी के बने थे. उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. शालिनी की किस्मत में शायद दुख ही दुख लिखे थे. सन 2015 में वीना और विशाल ने शालिनी से नई मांग शुरू कर दी कि वह अपने पिता से दोनों बेटियों के नाम 10-10 लाख रुपए की एफडी कराने को कहे.

राजेश कौड़ा रिटायर हो चुके थे. उन की हैसियत ऐसी नहीं थी. शालिनी इस बात को जानती थी. जब यह आए दिन की बात हो गई तो शालिनी ने दबी जबान से अपनी मां से यह बात कही. बेटी की खुशी के लिए उन्होंने किसी तरह 2 लाख रुपए नकद दे दिए. आर्थिक संपन्न होने के बावजूद वीना और विशाल के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी. वह अपनी मांग पर अड़े रहे.

शालिनी परिवार की अनेक बातों को कड़वा घूंट समझ कर पी जाती थी और मायके में नहीं बताती थी. वह नहीं चाहती थी कि मातापिता को उस के कारण कोई दुख पहुंचे. जीवन घिसटता हुआ सा चल रहा था. मानसिक प्रताड़ना झेलना जैसे शालिनी की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं. घर का माहौल अशांत हो चुका था. बातचीत भी गालीगलौज से की जाती थी. दुत्कार और उत्पीड़न हदों को लांघ रहा था. पतिपत्नी के बीच अक्सर तनाव रहता था.

उा. विशाल अक्सर अकेले ही विदेश घूमने चला जाता था. वह सिंगापुर, पेरिस, स्वीटजरलैंड और मलेशिया जाता था. वह क्यों जाता था, यह शालिनी को बताना जरूरी नहीं समझता था. एक मायने में वह पिता की दौलत पर मौज करने वाला बेटा था. काम में उस का मन कम ही लगता था. विशाल की लड़कियों से दोस्ती थी. शालिनी इस का विरोध करती तो उस की आवाज को दबाने के लिए उस के साथ मारपीट की जाती.

शालिनी सहनशील थी, लेकिन तनाव के बीच घुटघुट कर जी रही थी. बेटियों की खातिर वह अपने परिवार को किसी भी सूरत में टूटने नहीं देना चाहती थी. शालिनी उस बंधन को निभा रही थी, जो वक्त के साथ खोखला सा हो गया था. खुशियां जैसे उस से रूठ चुकी थीं. वह दर्द के दरिया में सफर कर रही थी. आसपड़ोस के लोगों को बाहरी तौर पर सब ठीक लगता था, लेकिन अंदर भूचाल चल रहा था. वह अपना दिन मरीजों में बिता देती थी. उस का स्वभाव अच्छा था. मरीजों के प्रति वह संवेदनशील रहती थी, इसलिए मरीज उसे ही दिखाना पसंद करते थे. उस की शोहरत काबिल डाक्टर के रूप में हो रही थी. डा. विशाल इस बात से बहुत चिढ़ता था. मौका मिलते ही वह अपनी इस भड़ास को निकाल भी देता था. कहते हैं कि अति का अंत कभी सुखद नहीं होता.

30 अगस्त रविवार के दिन जब झगड़ा ज्यादा बढ़ गया और शालिनी से मारपीट की जाने लगी तो उस की बेटी वर्णिका ने घबरा कर अपनी नानी को फोन कर दिया. राजेश कौड़ा वहां आए, लेकिन उन्हें अपमानित कर के वापस कर दिया गया. घर का माहौल काफी खराब हो चुका था. बात घर से बाहर न जा पाए, शालिनी को मनाने के उद्देश्य से विशाल शालिनी और बच्चों को ले कर मूवी दिखाने गया. रात में वे वापस आए तो घर में फिर विवाद हो गया. इस के बाद कुछ ऐसा हुआ कि बुरी खबर मिलने के बाद राजेश कौड़ा ने बेटी को अस्पताल में पाया. चाह कर भी वह उसे बचा नहीं सके.

पुलिस ने विशाल को साथ ले कर कोठी का मुआयना किया, लेकिन वहां सल्फास की शीशी या सीरींज नहीं मिली. पूछताछ के बाद पुलिस ने विशाल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. विशाल का कहना था कि उस ने पत्नी को नहीं मारा. वह अपनी बेटियों के लिए उसे जिंदा रखना चाहता था. शालिनी खुद भी बेटियों के लिए जिंदा रहना चाहती थी.

कथा लिखे जाने तक विशाल की जमानत नहीं हो सकी थी, जबकि पुलिस वीना आर्य की सरगरमी से तलाश कर रही थी. शालिनी की दोनों बेटियां अपने ननिहाल में रह रही थीं. डा. शालिनी को जहर दिया गया या उन्होंने खुद खाया, यह तो जांच के बाद ही स्पट होगा, लेकिन आर्थिक संपन्नता के बावजूद संबंधों की कड़वाहट से संयम, विवेक और समर्पण के अभाव में एक परिवार तो बिखर ही गया. मासूम बच्चियां भी उस की त्रासदी झेलने को विवश हो गई हैं. UP News

(कथा पात्रों से बातचीत व पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Hindi stories: तवायफ का प्यार

Hindi stories: समाज की यही सोच है कि तवायफ सिर्फ पैसों से प्यार करती है, लेकिन कजरी अपने प्रेमी जावेद के बेटे को जिस तरह पालपोस कर बड़ा कर रही है, उस से साफ साबित होता है कि तवायफ के अंदर भी दिल होता है, जो किसी से प्यार भी कर सकता है.

शहर के बीच बने उस प्रमुख बाजार में काफी रौनक थी. सड़क किनारे दोनों ओर दुकानें बनी थीं तो उन के ऊपर रहने के लिए मकान बने थे. उन मकानों पर जाने के लिए दुकानों के बराबर सीढि़यां बनी थीं. यह बात अलग थी कि उन पर चढ़ने से ज्यादातर लोग कतराते थे. मकानों की रैलिंग और खिड़कियों पर रंगबिरंगी भड़काऊ पोशाक व चेहरोें पर गाढ़ा मेकअप पोते लड़कियां खड़ी रहती थीं. सड़क पर आनेजाने वाले लोग कनखियों से उन की ओर देखते तो आंखों व हाथों को नचा कर इशारे कर दिया करती थीं. जहां वे रह रही थीं, वहां की भाषा में वे तवायफों के कोठे थे.

नीचे जो बाजार थी, वहां कपड़े, राशन, हार्डवेयर, चाय आदि की दुकानें थीं. ये कोठे अंगरेजों के जमाने से भी पहले से आबाद थे. लोग समाज से नजरें चुराने की नाकाम कोशिश करते हुए सीढि़यां चढ़ जाया करते थे और उसी अंदाज में तेजी से उतर कर बाजार की भीड़ का हिस्सा बन कर ओझल हो जाया करते थे. मुद्दतों से यही सिलसिला चला आ रहा था. सीढि़यों से कोठे तक न जाने कितनी यादें, किस्से और कद्रदानों के राज दफन थे. उन कोठों की चारदीवारियों ने कई तवायफों की इठलाती जवानी और उन की रेशमी जुल्फों में बड़ेछोटे धन्नासेठों को उलझते देखा था. जिन चेहरों का आकर्षण लोगों को अपनी तरफ खींचता था, उन्हें वक्त के साथ बेरौनक होते हुए भी देखा था.

ऐसी जगहों की खास बात यह होती है कि जब सूरज अपनी रेशमी लालिमा बिखेरता है, तब एकदम उलट सुबह वहां अलसाई हुई होती है, लेकिन रातें इस तरह आबाद होती हैं, जैसे वहां सुबह का आगाज हुआ हो. शाम का धुंधलका जैसे ही दस्तक देता है, वैसे ही घुंघरुओं और सुरताल की आवाज फिजा में बहनी शुरू हो जाती है. तवायफों के नृत्य और उन के इर्दगिर्द दायरा बनाने के शौकीन खुदबखुद अपनीअपनी पसंद के कोठे पर चले जाते थे. ऐसे शौकीनों में रानी मौसी के कोठे पर कजरी का नाम खूब मशहूर था. जब वह खूबसूरत लिबास में आ कर महफिल में अपने चांद से चेहरे से घूंघट उठाती तो लोगों की सांसें थम जाया करती थीं.

वह बला की सुंदर थी. खूबसूरती के साथ वह सुरताल व नृत्य की कला के संगम में पूरी तरह पारंगत थी. वह नाचनागाना शुरू करती तो कद्रदानों की फरमाइशें बढ़ जाया करती थीं. इतना ही नहीं, वे खुश हो कर उस पर नोटों की जैसे बरसात करते थे. जितने भी नोट उस पर लुटाए जाते, वे उस की मौसी की थैली में समा जाते थे. यह बात उसे अखरती नहीं थी, क्योंकि रानी से उस का खून का रिश्ता था. वह उस की सगी मौसी थी. उस शाम भी साफसफाई के बाद कोठे के बरामदेनुमा कमरे को लड़कियों ने करीने से सामान लगा कर सजा दिया था. जगहजगह इत्र भी लगा दिया था, जिस की भीनीभीनी खुशबू पूरे कमरे में फैल रही थी. हारमोनियम वादक और तबला, ढोलक उस्ताद तयशुदा जगह पर बैठ कर रियाज में मशगूल हो गए थे.

कद्रदानों के बैठने के लिए सोफा था और नीचे सलीके से मैरून रंग का खूबसूरत कालीन बिछा दिया गया था. कमर व हाथ टिकाने के लिए सिरहाने पर मसनद लगा दिए गए थे. धीरेधीरे लोगों का आना शुरू हुआ तो रानी ने दिलकश मुसकान से उन का स्वागत किया.

‘‘तशरीफ लाइए, हुजूर.’’ रानी अपने पुराने चाहने वालों को ज्यादा तवज्जो दिया करती थी. इस की खास वजह भी थी. वे उस की आमदनी का बड़ा जरिया थे. ऐसे लोग शानोशौकत दिखा कर पैसे तो लुटाते ही थे, साथ ही खुश हो कर अलग से भी कुछ पैसे दे जाया करते थे. महफिल की तैयारी पूरी हो चुकी थी. एक पुराना कद्रदान रानी से मुखातिब हुआ, ‘‘कजरी को बुलाइए मौसी, सच पूछिए तो हम उसी के दीदार के लिए आते हैं.’’

‘‘मेहरबानी आप की. ऊपर वाला आप की हसरतों को बरकरार रखे.’’ मौसी ने शोखी से कहा और एक लड़की को इशारे से कजरी को बुलाने के लिए कह दिया.

कमरे में सरगोशियां थीं. कुछ लम्हों के बाद कजरी दाखिल हुई तो खामोशी पसरी और सभी की निगाहें उसी पर टिक गईं. कजरी ने लाल रंग का सुर्ख रेशमी लिबास पहना हुआ था. कमरे में जल रहीं लाइटों की रौशनी में उस के लिबास पर टांके गए सफेद, पीले व गुलाबी रंग के सितारे जगमगा रहे थे. धीरेधीरे चल कर कजरी बीच में आ कर खड़ी हो गई. एक लड़की ने आगे बढ़ कर पीतल के घुंघरुओं का जोड़ा उस के पैरों में बांध दिया. कजरी ने अपनी गोरी कलाइयों में कोहनी से आधा नीचे तक रंगबिरंगी चमकीली चूडि़यां पहनी हुई थीं.

अगले लम्हों में कजरी ने मोर की तरह पंख फैलाने के अंदाज में कलाइयों को आगे बढ़ा कर उन में कंपन कर के चूडि़यों को खनकाया तो एक पुरानी गजल के साथ सुरताल शुरू हो गई. सभी एकटक उसे ही निहार रहे थे. शबाबनुमा महफिल के आगाज से मौसी खुश थी, लेकिन चंद मिनटों में ही उस की खुशी मायूसी में बदल गई. क्योंकि पारखी मौसी ने यह बात पकड़ ली कि उस दिन कजरी की थिरकन में वह बात नहीं थी, जो और दिनों में हुआ करती थी. ढोलक व तबले की ताल तो बराबर थी, लेकिन कजरी के कदमों के साथ घुंघरुओं की खनक बदली सी लग रही थी.

उस की आवाज में भी उदासी थी. मौसी ने कद्रदानों के चेहरों पर गौर किया, वे भी उतने खुश नहीं थे. साफ लग रहा था कि कजरी का मन उस समय कहीं और था. गजल का दौर खत्म हुआ तो कजरी ने नए मेहमानों की तरफ रुख कर के दोनों हाथों से घूंघट पलट दिया. उस दिन उस का चेहरा बेनूर था. मानो सारे जहां की उदासी वहां सिमट आई थी. जल्दी से मेहमानों को सलाम कर के वह अपने कमरे में चली गई. अन्य लड़कियों ने भी नृत्य दिखाए, लेकिन उस दिन की महफिल बेरौनक ही रही. मेहमान नाखुशी से गए. मेहमानों की बेरुखी देख कर मौसी भी नाखुश थी. उस दिन पहली मर्तबा कजरी ने सभी को निराश किया था.

मेहमानों के रुखसत होते ही मौसी सीधे कजरी के कमरे में पहुंची. वह बिस्तर पर उदास बैठी नींद के आगोश में समाए मासूम बच्चे को निहार रही थी. मौसी उस के बराबर में बैठ कर बोली, ‘‘खुद को दर्द से उबार ले कजरी, तेरी वजह से आज पहली बार महफिल वीरान सी रही है.’’

‘‘कोशिश तो कर रही हूं मौसी.’’ कजरी ने उदासी से कहा.

‘‘जरा सोच इस तरह जिंदगी कैसे कटेगी? तू जो आज कमा लेगी, वह कल तेरे ही बुढ़ापे में काम आएगा.’’ मौसी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने जमाना देखा है कजरी. तवायफ की जवानी तो सुंदर बगीचे जैसी होती है, जिस पर भंवरे दूरदूर से आ कर मंडराते हैं, लेकिन बुढ़ापा तो उजड़ा चमन किसी दोजख की तरह होता है.’’

‘‘मैं क्या करूं मौसी? जावेद की याद मेरे दिल से नहीं निकलती.’’ कजरी बोली.

‘‘बेटा, यादें जाने के लिए नहीं होतीं. फिर इस का मतलब यह भी तो नहीं कि हम अतीत को याद करकर के खुद को ही परेशान कर लें. जावेद की मोहब्बत की निशानी तो तेरे पास है.’’ मौसी ने फिर समझाया.

‘‘यही तो सहारा है मौसी.’’ कहते हुए कजरी ने बच्चे को उठा कर अपने सीने से चिपका लिया.

‘‘अपने लिए न सही, कम से कम इस बच्चे की खातिर तो दर्द से निकल जा. इसे पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बना. जिस दिन यह काबिल हो जाएगा, तू अपनी मोहब्बत पर नाज करेगी,’’ मौसी बोली, ‘‘अब तू आराम कर. इस बारे में हम कल सुबह बात करेंगे. इस के बाद कजरी उस 4 महीने के बच्चे के साथ सो गई.’’

अगले दिन दोपहर के वक्त कजरी रोजमर्रा की भांति खिड़की पर बैठी थी, लेकिन उसे बाजार सूना लग रहा था. जावेद को वह बाजार की भीड़ में दूर से पहचान लेती थी. उस के लिए निगाहों में बेकरारी होती थी. यादों के साए मंडराए तो उस ने खिड़की के कपाट बंद कर दिए और सिसकियां भरने लगी.

मौसी ने नजदीक आ कर उस के आंसू पौंछे और प्यार से गले लगा कर समझाया, ‘‘कब तक गम मनाएगी पगली. जाने वाले कभी लौट कर नहीं आया करते.’’ मौसी की बातें उस के दिल पर फाहा रख देती थीं, ‘‘हम तवायफें हैं बेटा. दर्द से हमारा करीब कर रिश्ता होता है. अब तू काम में मन लगा कर बच्चे की परवरिश की सोच.’’

मौसी की बातें ठीक थीं. चंद रोज में ही कजरी का उस बच्चे से गहरा रिश्ता हो गया था. उस का नाम अकरम था. वह हर तरह से उस का खयाल रखती और अपने से चिपकाए रखती. अकरम उस की मोहब्बत की निशानी था. कजरी ने सोच लिया था कि अब वह उस के लिए मां का हर फर्ज निभाएगी.  4 महीने का अकरम उस की मोहब्बत की निशानी तो था, लेकिन वह उस की अपनी औलाद नहीं था. वह बिन ब्याही मां भी नहीं थी. बावजूद इस के मां होने के सभी अहसास से वह रूबरू हो गई थी. वक्त की अजीब चाल से वह जिस किरदार में पहुंची थी, उस के पीछे भी एक रोचक कहानी थी—

दरअसल, कजरी खानदानी तवायफ थी. 15 साल पहले उस के घर वालों ने उसे उत्तर प्रदेश के एक बड़े शहर में उस की मौसी रानी के पास भेज दिया था. रानी का अपना कोठा था. किसी तवायफ का अपना कोठा होना बिरादरी में बड़ी बात होती है. पूरे तवायफ बाजार में रानी का रुतबा था. कजरी को वह बेटी की तरह मानती थी. रानी के चाहने पर ही कजरी को उस के पास भेजा गया था. कुछ ही दिनों में कजरी वहां के माहौल में रचबस गई थी. रानी के कोठे पर यूं तो और लड़कियां भी थीं, लेकिन कजरी उन में सब से ज्यादा खूबसूरत और नाचगाने की कला में पारंगत थी.

कुछ ही दिनों में कजरी कोठे के सारे तौरतरीके जान गई. जल्दी ही कजरी का जादू रानी के कोठे पर आने वाले लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा. तवायफों की सच्ची मोहब्बत दौलत होती है. कजरी आई तो रानी की झोली में नोटों की जैसे बारिश होने लगी. कजरी उस की सगी बहन की बेटी थी, इसलिए पैसे का बंटवारा भी नहीं होता था. मौसी ने कह दिया था कि उस के कोठे की उत्तराधिकारी कजरी ही होगी. कजरी के चर्चे ऐसे हुए कि कद्रदान भी वहां आने लगे.

कजरी अपने पेशे की हकीकत जानती थी. ऐसा नहीं था कि वहां आने वाले सभी लोग नाचगाने के ही शौकीन होते थे. बहुतों की ख्वाहिश उस से आगे होती थी. तब मोटी रकम के बदले मौसी उन के कदमों को बढ़ा देती थी. कजरी जानती थी कि आज नहीं तो कल, उसे यह सब अपनाना ही पड़ेगा, क्योंकि यह उस के खानदान की परंपरा रही थी. रानी मौसी उसे अपने खानदान में नानी के जमाने तक के रोमांचक किस्से भी सुनाया करती थी.

रानी का ताल्लुक जिस जाति से था, वहां तवायफ होना कोई बुरी बात नहीं थी. वह बताती थी कि किस तरह धन्नासेठों से ले कर बड़े जमींदार तक उस के मुरीद थे. दरअसल उस की मां रेशमाबाई का ऐसा नाम था, जिन की महफिल में 5 सौ मील से भी लोग चल कर आते थे. उन्हें विशेष मौकों पर अपने यहां इज्जत से बुलाया जाता था. उन के लिए बैलगाड़ी या घोड़ाबग्गी भेजी जाती थी. उस जमाने में रईस लोगों के पास यातायात का यही साधन होता था. जिस के पास बैलों की जोडि़यां होती थीं, दूरदूर के गांवों तक उन का नाम होता था.

रेशमा के पास तबला व हारमोनियम वाले अपने उस्ताद थे. उन की उंगलियों की थिरकन से निकलने वाला संगीत महफिल में चारचांद लगा दिया करता था. मशालों, लालटेन व मिट्टी के तेल वाले हंडों की रौशनी में महफिल पूरे अदब से सजती थी. नक्काशीदार सुराहियों में मदिरा भर कर मेहमानों को पीतल के बेलुओं व कटोरों में परोसा जाता था. रेशमाबाई जब लहरा कर नाचती थी तो रात जैसे जवान हो जाती थी. लोगों के दिलों में चटक कर जैसे कलियां सी खिलती थीं. हर कोई बेसाख्ता कह उठता था, ‘‘वाह, रेशमाबाई, कमाल कर दिया तुम ने.’’

महफिल में फिर नाचगाने की फरमाइश होती तो रेशमा पानी पी कर फिर नए सुरताल पर थिरकने लगती. रेशमा ने जमाना देखा था. उन्होंने अपने सामने जवानों को बूढ़ा व बच्चों को जवान होते देखा था. दोनों ही पीढि़यां उन की कला की कद्रदान थी. रेशमा महफिलों से अशर्फियां ले कर निकलती थीं. खास बात यह थी कि इस तरह के चंद अवसरों को छोड़ कर महफिल में फूहड़ता नहीं होती थी. इस की वजह यह थी कि रईस लोग अमीराना तरीके से अदब से रहते थे. तवायफ होने का मतलब उन्हें बेइज्जत करना नहीं था. रेशमाबाई ने कला के दम पर ही दौलत और शोहरत कमाई थी. दरजनों तवायफों ने उन्हें अपनी उस्ताद मान कर कला के हुनर सीखे थे.

घुंघरू बांध कर तबले पर थिरक देना भर ही उन के लिए कला नहीं थी. कितनी थाप पर कितनी बार पैरों, कमर, गरदन व कलाइयों में थिरकन हो, इस तक का हिसाब पारखी नजरों व उंगलियों पर रखा जाता था. जरा सी गलती होने पर वह टोक देती थीं, ‘‘अपने कदमों को ताल से मिलाओ बेटियों, वरना मेरा नाम भी खराब कर दोगी. लोग कहेंगे कि रेशमा जैसी उस्ताद की चेलियां बढि़या नहीं नाचतीं.’’

वह समझाती थीं कि हुस्न के साथ कला भी जरूरी है. जो कला के फन में माहिर होता है वह कभी भूखा नहीं मरता. कुदरत कला को तब और भी निखार देती है, जब कोई उस के लिए दिल से जिए. बारबार गलती करने पर सजा भी दी जाती थी. दरअसल जिसे उस्ताद समझा जाता था, उसे बहुत इज्जत बख्शी जाती थी. दूसरे शब्दों में मातापिता से भी ज्यादा अधिकार उस्ताद या गुरु के पास होते थे. उस्ताद के कहे शब्द पत्थर की लकीर हुआ करते थे. उस के खिलाफ जाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था.

रेशमा अपने साथ एक पानदान जरूर रखती थी. वह कांसे का बना था. उस पर खूबसूरत नक्काशी के साथ मूंगे भी जड़े थे, जिस में अलगअलग आकार के खाने बने थे. उस में पका कर फेंटा गया सुर्ख कत्था, छाली (सुपारी), खुशबूदार इलायची और गीले कपड़े में गोलाई से बांध कर पान रखे होते थे. जो लड़की नानी को उस्ताद मानती थीं, वे उस में साफ सुपारियां सरौते से कतर कर रख दिया करती थीं.

वह बताती थी कि पानदान उन की मां के जमाने का था. दूर कस्बे का एक पंसारी नानी की कला का मुरीद था. एक पोटली में वह ताजा सुपारियां दे जाया करता था. वह कहता था, ‘‘रेशमा तुम्हारे लिए ताजा सुपारियों के ढेर से ये नगीने निकाल कर लाता हूं. मैं ने अपने तिजारती को बोला हुआ है कि मुझे माल एकदम बेहतरीन चाहिए.’’

तब रेशमा खुश हो कर कहतीं, ‘‘हां, हां खूब समझती हूं. रेह लाए हो या नहीं?’’

‘‘गुस्ताखी माफ, वह तो भूल ही गया. अगली बार आऊंगा तो ले आऊंगा.’’ रेह दरअसल कपड़े धोने वाली मिट्टी थी. पहले साबुन नहीं था और देहात के इलाकों में लोग कपड़े धोने में इसी मिट्टी का इस्तेमाल किया करते थे.

रेशमा नामी पंसारी के आने का मकसद खूब समझती थी. वह ऐसे वक्त ही आता था, जब वह लड़कियों को कला सिखा रही होती थी. कुछ देर बैठ कर वह चला जाता था. तब के बड़े दुकानदार, तिजारत करने वाले सूदखोर भी हुआ करते थे, जो अपने बहीखातों में न जाने कितनों की मजबूरियां कैद किए रखते थे. रेशमा के पास आने वाले उस पंसारी की पहचान सूदखोर के रूप में भी थी. जातेजाते एक दिन उस ने कहा, ‘‘रेशमा, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताना.’’

‘‘सेवा तो है पंसारी बाबू.’’ रेशमा ने झट से कह दिया.

उस ने एकदम अधीर हो कर पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘तुम जितनी बार यहां आया करो, उतनी बार अपने बहीखाते से किसी गरीब की मजबूरियों को आजाद कर दिया करो.’’ रेशमा के इतना कहने पर उस व्यापारी को मानो झटका सा लगा. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरा पेशा ही ऐसा है तो क्या करूं.’’

‘‘पेशा तो हमारा भी है, लेकिन लोगों की दुआएं भी ले लिया करो. बुरे वक्त में काम आया करती हैं.’’ यह सुनते ही खिन्नतापूर्ण मौन धारण कर के वह चला गया था.

शादियों के मौकों पर रेशमा की व्यस्तता बढ़ जाती थी. दरअसल शादियां पहले महज एक रात या दिन की नहीं होती थीं. बारातें एकएक सप्ताह रुका करती थीं. इस दौरान उन की खूब आवभगत हुआ करती थी. खाना ढाक के चौड़े सूखे पत्तों से बनी पत्तलों पर परोसा जाता था. चावलकढ़ी के साथ मोटे अनाज की बनी रोटियों का चलन था. चावल के साथ गन्ने के रस से बनी शक्कर व खांड भी होती थी. उड़द की धुलवां दाल व गेहूं की रोटियां तो बिरले ही बनाते थे. एक तो उन की पैदाइश कम थी, दूसरे महंगे भी होते थे. मीठे  में बूंदी के लड्डू, गन्ने के रस की खीर, कलाकंद और हलवा बनता था. खाने के साथ मट्ठे के सन्नाटे (रायते) का भी खूब चलन था.

बड़ा हो या छोटा, सभी लोग जमीन पर बैठ कर खाना खाते थे. उस जगह को पहले झाड़ू से बुहारा जाता था. फिर पानी के छींटे मार कर सूत या जूट से बुनी हुई पट्टियां बिछाई जाती थीं. कतारबद्ध बैठ कर खाना खाने वाले लोगों के इस समूह को पंगत कहते थे. सभी खाना एक साथ शुरू करते थे और एक साथ उठते थे. कोई अपना खाना खा कर बीच में ही उठ जाए तो इसे अच्छा नहीं माना जाता था. एक पंगत के उठने के बाद फिर से झाड़ू लगा कर पानी का छिड़काव किया जाता. फिर पट्टियों को झाड़ कर बिछाया जाता था. मिट्टी के मटकों, शहतूत की टहनियों (शाखाओं) से बने टोकरों व कागज की रद्दी से बनी पल्लियों (बड़ेछोटे आकार के बरतन का रूप) से खाना परोसा जाता था. खाना भट्ठियों पर तांबे, पीतल के बरतनों व लोहे की कड़ाहियों में पकता था.

उस जमाने की सादगी में लोगों में इतना मेलजोल था कि सभी एकदूसरे के मेहमानों की सेवा में जुट जाते थे. पड़ोसियों के बीच मनमुटाव या कोई भेदभाव नहीं होता था. छलकपट से दूर लोगों में आपसी प्रेम बहुत होता था. बड़ेबुजुर्गों को इतनी इज्जत बख्शी जाती थी कि धमाचौकड़ी मचाते व गलती करते बच्चे छिप जाया करते थे या एकदम शरीफ बन कर दुआसलाम करते थे. उन्हें डांटे जाने व घर पर शिकायत होने का डर होता था. यदि कोई जना बच्चे की गलती की शिकायत उस के मांबाप से करता था तो मातापिता नाराज नहीं होते थे, बल्कि खुश होते थे कि कोई अपना ही बच्चों की गलतियां बता रहा है.

मेहमानों के मनोरंजन के लिए महफिलें सजाई जाती थीं. अपनीअपनी हैसियत के अनुसार तवायफों को बुलाया जाता था. रेशमा ऐसी ही महफिलों में व्यस्त हो जाती थी. समय के साथ नानी के कदम बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे थे. अब वह सिर्फ एक उस्ताद बन कर रह गई थीं. उन्होंने अपना पंसदीदा फूलों के छापे वाला चूड़ीदार लहंगा, जिस में रंगबिरंगे गोटे लगे थे, कोटी (कमर के ऊपर का ब्लाउजनुमा कपड़ा) व ओढ़नी (दुपट्टे का रूप) पुराने संदूक में सहेज कर रख दिया था. बरसात के बाद सीलन दूर करने के लिए वह उन्हें धूप दिखा दिया करती थीं. आभूषणों में कंठा, हार, कड़े, पायल, माथे का टीका व तगड़ी भी उन के पास थी. तगडि़यां अधिकांश चांदी की होती थीं, जिन्हें लहंगे के ऊपर कमर पर सजाते हुए पहना जाता था. अपनी बेटियों को उन्होंने कला सिखा दी थी. रानी मौसी भी उन में से एक थी.

कजरी नाचगाना बचपन से ही सीखती आई थी. वह जवानी की दहलीज पर पहुंची तो उसे मौसी के पास भेज दिया गया था. तवायफों को एक सबक यह भी दिया जाता था कि मोहब्बत जैसी गिरफ्त से दूर रहो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि उन में दिल या नाजुक भावनाएं नहीं होती. यह बात अलग थी कि कजरी के दिल पर अब तक किसी ने दस्तक नहीं दी थी. जिंदगी के किसी मोड़ पर किस को किस से मोहब्बत हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कोठे पर आने वाले नए कद्रदानों में एक कद्रदान से उस की भी नजरें चार हो गईं. उस का नाम जावेद था. नौजवान जावेद उसी शहर का बाशिंदा था. एक दिन वह कजरी से बोला, ‘‘मेरे पास इतनी दौलत तो नहीं है, जो तुम्हें उस से खुश रखूं, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए चाहत है.’’

कजरी ने उस की बात हंसते हुए एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी थी.

जावेद का कोठे पर आने का सिलसिला शुरू हो गया. कजरी समझ गई कि वह उस पर डोरे डालने की कोशिश कर रहा है. उस की आंखों में एक अजीब सी कशिश होती थी. इसी कशिश ने ताकीदों के बावजूद कजरी के दिल पर दस्तक दे दी. यह सोच कर परेशान भी थी कि तवायफों से लोग इस तरह तो दिली रिश्ता कायम नहीं करते. वह पैसा फेंक कर तमाशा देख कर चले जाते हैं. वह तवायफ थी. उस की शख्शियत किसी को इस कदर प्रभावित कर रही थी. यह अजीब सी ही बात थी. उलझन तब वाकई बहुत बढ़ जाती थी, जब आप को पता हो कि सामने वाला जान कर भी अंजान बन रहा है. कजरी ने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की.

दूसरी तरफ जावेद ने सोचा कि कभी तो कजरी उस की चाहत कबूल कर लेगी. उस के पास जाते समय उस के दिल में उम्मीद का एक दीया रौशन होता था, लेकिन वापसी तक दिल में अंधेरा ही होता था. रौशनी और अंधेरे का यह खेल कई दिनों तक चलता रहा. जावेद के इस जुनून को देख कर कजरी उस से बातें कर लिया करती थी. बातों से ही उसे पता चला कि जावेद शादीशुदा है. यह बात साफगोई से जावेद ने उसे खुद बताई थी. कजरी ने उसे समझाया जरूर कि वह उस के ज्यादा चक्कर में न पड़े, लेकिन जावेद की भावनाओं ने उस पर ऐसा असर डाला कि वह भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी.

हालांकि वह यह भी जानती थी कि उस की मोहब्बत किसी मुकाम पर नहीं पहुंचेगी, क्योंकि न तो वह अपना पेशा छोड़ सकती थी और न जावेद समाज में उसे अपना सकता था. फिर भी वह जावेद को अपने दिल से नहीं निकाल पा रही थी. दिलों में उठते अरमानों का सिलसिला चाहत के दरख्त के अंतिम छोर पर पहुंचा तो जावेद ने एक दिन उसे दिल की बात बताने का फैसला कर लिया.

एक दिन वह कजरी के पास आया. कुछ देर बातचीत कर के वह जाने लगी तो वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘कजरी मेरी बात सुनो.’’

‘‘फरमाइए?’’ कजरी ने अदा के साथ कहा.

‘‘मैं तुम से दिली मोहब्बत करता हूं.’’ जावेद ने एक ही बार में मन की बात कह दी.

कजरी ने नजाकत के साथ अपने होंठों पर प्यारी मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘यह तो हम बहुत पहले से जानते हैं. हम इसे कबूल कर लेते हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ वह आश्चर्य से उस का चेहरा देखते हुए बोला.

‘‘तुम निकाहशुदा शख्स हो.’’ कजरी बोली.

‘‘वह ठीक, लेकिन यकीन मानो मैं इस मोहब्बत की खातिर अपनी बीवी का दिल नहीं दिखाऊंगा.’’ जावेद ने साफसाफ बता दिया.

कजरी जानती थी, जावेद दिल से नेक इंसान है. वह उसे समझा कर भी थक चुकी थी. न जाने कौन से पल थे, जो सारी बातें जानने के बावजूद उस की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई थी. कोई रास्ता न देख उस ने मोहब्बत कबूल कर ली थी.

इस के बावजूद उस ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘तवायफ के कोठे पर आते हो, जानते हो जमाना क्या कहेगा?’’

जावेद आशिकाना अंदाज में अपने सीने पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जमाना चाहे कुछ भी कहे, मुझे इस की चिंता नहीं.’’ वह मुसकरा कर बोला, ‘‘एक और बात कहूं कजरी?’’

‘‘बिलकुल.’’ लंबी सांस लेते हुए कजरी ने कहा.

‘‘मैं अपनी मोहब्बत को ताजिंदगी आबाद रखूंगा.’’

उस की बातें सुन कर कजरी के पास कहने को कुछ नहीं रहा. क्योंकि जावेद की मोहब्बत में कोई स्वार्थ नहीं था. इसी तरह उन की मोहब्बत आगे बढ़ती रही. मोहब्बत के पक्षी की उड़ान कितनी ऊंची होती है, आज तक कोई नहीं जान पाया. वैसे तो जावेद रोजाना ही कजरी से मिलने आता था, पर एक बार कई दिनों तक वह उस के पास नहीं आया तो उसे चिंता सताने लगी. जावेद के इंतजार में वह हर रोज खिड़की के सामने बैठ जाया करती. सड़क पर आनेजाने वाले लोगों में उस की नजरें जावेद को तलाशती थीं. लेकिन उस की आंखें थक जाती थीं. वह दिखाई नहीं देता.

वह एक अजीब कशमकश के दौर से गुजर रही थी. उसे यह तक नहीं पता था कि जावेद रहता कहां है. उस ने अपने दिल को समझाया कि यदि पता भी होता तो भी वह शायद उस की दहलीज पर नहीं जा पाती. इस से उस की बीवी की नजरों में छिपा रिश्ता उजागर होने से तूफान खड़ा हो सकता था. तकरीबन 15 दिनों बाद उसे जावेद आता दिखाई दिया तो उस की आंखों को जैसे करार मिला. वह ऊपर आया तो वह अपनेपन से शिकायत लहजे में बोली, ‘‘कहां थे इतने दिन? मुझे कितनी फिक्र हो रही थी.’’

‘‘मेरी तबीयत खराब थी कजरी. तुम से मिलने की बेकरारी मुझे भी बेचैन करती थी, लेकिन बुखार ने जैसे शरीर की जान ही निकाल ली थी.अब चलने के काबिल हुआ तो चला आया.’’

‘‘पता है जावेद, मैं ने कभी किसी के लिए इतनी तड़प महसूस नहीं की, जो तुम्हारे लिए की है.’’

जावेद को उस की नरगिसी आंखों में बेपनाह मोहब्बत का दरिया तैरता नजर आ रहा था. वक्त के साथ उन की मोहब्बत का सिलसिला चलता रहा. एक दिन जावेद उस के पास आया तो दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं. जावेद ने मोहब्बत से कजरी को अपनी बांहों के दायरे में ले लिया. कजरी का सारा शरीर रोमांचित हो गया. मोहब्बत की पनाह में सिर रखा तो जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में खो गई. जावेद के प्यार की कशिश दिनबदिन उसे उस के नजदीक ले जा रही थी.

उस की मोहब्बत का किस्सा मौसी से छिपा नहीं रहा. वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘ऐसे चक्कर में ना पड़ कजरी.’’

तब कजरी सफाई देती, ‘‘मौसी वह दिल का अच्छा है और वाकई मुझ से मोहब्बत करता है.’’

इस पर मौसी ने हंस कर कहा, ‘‘देख बेटी, हम ठहरीं तवायफें. हमारे लिए दिल से की गई मोहब्बत किसी ग्रहण की तरह होती है. तुम यह ग्रहण अपनी जिंदगी में क्यों लगा रही हो. हमारे नसीब में पाक मोहब्बत नहीं होती.’’ मौसी इतने पर ही नहीं रुकी, ‘‘पहले मोहब्बत फिर शादी. अरे पगली हम सदा सुहागनें होती हैं. शादियां नहीं करतीं, लेकिन सोलह शृंगार करती हैं. वह इसलिए कि हमारे कद्रदान खुश रहें. हमारे पास आते रहें.’’

जावेद की मोहब्बत पा कर कजरी बेहद खुश थी. ऊपर वाले ने उसे जैसे खुशियों से नवाज दिया था. खुशियों के बीच कभीकभी अंधेरे साए भी मंडरा जाया करते हैं. अनहोनी जैसे शिद्दत से उन के पीछे आ रही थी. एक दिन कजरी को एक आदमी ने आ कर बताया, ‘‘जावेद का ऐक्सीडैंट हो गया है. अस्पताल में उस की हालत नाजुक है और तुम्हें अपने पास बुलाया है.’’

यह सुन कर एक लम्हे के लिए कजरी के हवास उड़ गए. उस का कलेजा धक्क से रह गया. उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था. उस ने रानी मौसी को साथ लिया और बताए गए अस्पताल पहुंच गई. पता चला कि जावेद अपनी बीवी और 4 महीने के फूल से बेटे के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था, तभी दुर्घटना का शिकार हो गया था. जावेद और उस की बीवी बुरी तरह घायल थे, जबकि बेटा सहीसलामत था. यह हालत देख कर कजरी की आंखों में आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था. जावेद की हालत बिगड़ती जा रही थी.

वह लगातार कजरी को निहारे जा रहा था. कुछ इस तरह जैसे अलविदा कहने से पहले कोई किसी को जी भर कर निहार लेना चाहता था. उस ने कजरी से कहा, ‘‘कजरी, मैं शायद न बच पाऊं, लेकिन तुम मुझ से एक वादा करो.’’

‘‘क्या?’’ कजरी ने पूछा.

‘‘मेरा अपना तो कोई नहीं है. मुझे व मेरी बीवी को यदि कुछ हो जाए तो तुम मेरे बेटे अकरम की हमारे मजहब के हिसाब से बेहतर परवरिश कर देना.’’

कजरी के लिए सब कुछ बुरे ख्वाब जैसा था. वक्त जैसे थम सा गया था. कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुछ देर बाद जावेद और उस की बीवी ने दम तोड़ दिया. जावेद की इस तरह हुई मौत कजरी पर बिजली बन कर गिरी थी. मौसी के शब्द भी जैसे कानों में गूंज रहे थे कि तवायफों के नसीब में पाक मोहब्बत नहीं हुआ करती. जावेद के दूरदराज के रिश्तेदार थे. खबर मिलने पर वे भी आ गए थे. उन्होंने ही जावेद और उस की बीवी को नमाज ए जनाजा के बाद सुपुर्द ए खाक कर दिया. जावेद ने जो आखिरी ख्वाहिश जाहिर की थी, उस पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं था.

कजरी ने अकरम को अपना लिया. जावेद की जुदाई के गम में ही वह आंसू बहाती थी. और तभी से रात की महफिल में घुंघरुओं की खनक जाती रही. गम दिलोदिमाग पर काबिज था, इसलिए महफिल बेरौनक हो गई थी. मौसी ने उसे समझाने की भरसक कोशिश की. कजरी ने किसी तरह खुद को संभाल लिया. इस के बाद उस के दिल में किसी शख्स के लिए मोहब्बत की धड़कन जैसे हमेशा के लिए बंद हो गई. कजरी तवायफ थी. यह उस का खानदानी पेशा था. उस के हिसाब से उसे छोड़ा नहीं जा सकता था और वह छोड़ना भी नहीं चाहती थी.

क्योंकि उस के पास कमाई का और कोई जरिया नहीं था. हालांकि वह नहीं चाहती थी कि कोठे के माहौल में अकरम की परवरिश हो. वह उसे पढ़ाना चाहती थी. इसलिए जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो कजरी ने उस का दाखिला शहर के एक नामी स्कूल में करा दिया. स्कूल में हौस्टल भी था, जहां दूरदूर से आए बच्चे रह कर पढ़ते थे. अपने माहौल से दूर रखने के लिए उस ने अकरम को हौस्टल में रख दिया. उस की मां के रूप में अपना नाम लिखाया. कजरी हफ्तापंद्रह दिन में अकरम से मिलने जाया करती थी. वह उसे घुमाने भी ले जाती थी.

वह उस की परवरिश मुसलिम रीतिरिवाज से कर रही थी. बाजारों की रौनक ईद की नजदीकी का ऐलान करती तो वह अकरम को बाजार भी घुमाती. अकरम की खुशियों में ही उस की खुशियों की दुनिया सिमटी हुई थी. अकरम के मनपसंद के कपड़े सिलवाए जाते और ईद पर सिवइयां बना कर मुंह मीठा कराया जाता. मुसलिम रस्मोरिवाज को अकरम अच्छे से समझ सके, इसलिए वह बीचबीच में उसे मदरसे में तालीम भी दिलाती. ईद पर ईदगाह पर अकरम कजरी के साथ ही नमाज अदा करने जाया करता.

समय अपनी गति से चलता रहा. वह अपने पेशे से जो कमाती, उसी से बेटे की फीस भरती और उस के बाकी खर्चे उठाती. समाज से वह यह राज छिपाने की कोशिश करती रही कि उस की मोहब्बत की निशानी नामी स्कूल में पढ़ रहा है. वह नहीं चहती थी कि अकरम की पढ़ाई में उस की वजह से कोई परेशानी आए. अकरम बड़ा हो गया था. वह सीबीएसई बोर्ड में पढ़ाई करते हुए हाईस्कूल में आ गया था.

अकरम का वार्षिक परीक्षाफल आया तो पता चला कि उस ने अपनी कक्षा में टौप किया है. बेटे की इस उड़ान से कजरी बेहद खुश थी. बेटा उस की उम्मीदों पर खरा उतरा था. खुशियों और नाखुशियों की दस्तक वक्त के हाथ में होती है. इंसान कठपुतली बनता है और वक्त सब तय कर देता है. कजरी भी वक्त की इस चाल का शिकार हुई. अकरम के स्कूल में कोई नहीं जानता था कि अकरम की मां कजरी का पेशा क्या है? लेकिन एक दिन यह राज बेपर्दा हुआ तो कजरी के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

दरअसल, वह अकरम का रिजल्ट लेने उस के स्कूल गई थी. वहां छात्रों की भीड़ थी. अकरम टौपर छात्र था. उस की फोटो के साथ कब कजरी का फोटो भी खिंच गया. यह उसे पता ही नहीं चला. वह फोटो अखबार में छपा तो रात के अंधेरे में मुंह छिपा कर कजरी के कोठे पर जाने वाले उजले चेहरे वालों ने उसे पहचान लिया. बस, यहीं से जैसे कयामत की बुनियाद रख दी गई. लोगों की फितरत होती है, वह इस तरह की बातों को सामने लाने में पूरी जान लगा देते हैं. मनोविज्ञान के हिसाब से यह एक बीमारी है. यह बात स्कूल प्रबंधन तक पहुंचा दी गई.

कथित सभ्य समाज के लोगों के तर्क थे कि इस से उन के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. वह किसी तवायफ के बेटे के साथ अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकते. यह बात अलग थी कि ऐसी तवायफों के पहलू में ही हजारोंलाखों कथित सभ्य लोग समाज में मुंह छिपा कर अपने गम मिटाया करते हैं. नोटों की खनक पर उन्हें एक रात की दुलहन बना कर मोहब्बत बरसाते हैं.

कायदे से तो कजरी की तारीफ होनी चाहिए थी कि उस ने गलीच समझे जाने वाले ऐसे पेशे में रह कर भी बेटे की जिंदगी को रोशन कर दिया था. परंतु हुआ इस का उलटा. स्कूल प्रबंधन ने कजरी को स्कूल बुला कर कहा, ‘‘माफ करना, हमें आप के बेटे को स्कूल से निकालना होगा.’’

‘‘ऐसा मत कीजिए. मेरा बच्चा तो नर्सरी से आप के यहां पढ़ रहा है. वह होनहार है.’’ आहत कजरी ने हाथ जोड़ लिए.

‘‘तब हमें पता नहीं था.’’

कजरी की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘क्या मैं इंसान नहीं हूं या मेरा बेटा इंसान नहीं है? कौन कहता है कि तवायफ के बेटे को पढ़ने का हक नहीं है? मैं उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती हूं. मैं तो पहले ही अपने कलेजे के टुकड़े को दूर रखे हुए हूं. ऊपर से आप इस तरह की बात कह रहे हैं.’’

कजरी की बातें अपनी जगह ठीक थीं, लेकिन उन्हें मानने को कोई तैयार नहीं था. स्कूल प्रबंधन ने उस की एक न सुनी.

‘‘मुझे थोड़ा वक्त दीजिए.’’ कह कर कजरी वहां से चली आई. उस का अपमान हुआ था, लेकिन वह जिस पेशे में थी, उस में मानअपमान के उस के लिए कोई मायने नहीं थे. कजरी एक सामाजिक संस्था की संचालक को जानती थी. कजरी की वह बहुत इज्जत करती थी. अकरम के दाखिले में भी उन्होंने ही भूमिका निभाई थी. कजरी ने नई मुसीबत उन्हें बताई.

कजरी की समस्या बड़ी जटिल थी. फिर भी उन्होंने वादा किया कि उस का बेटा उसी स्कूल में पढ़ेगा. कोई भी उसे जबरदस्ती नहीं निकाल सकेगा. सामाजिक संस्था संचालिका स्कूल गई. तर्कवितर्क के बीच उन की स्कूल प्रबंधन के साथ हंगामा हुआ. स्कूल के पास टौपर छात्र को निकालने की कोई मजबूत वजह नहीं थी. एनजीओ की दखल के बाद उन्हें अपना निर्णय बदलना पड़ा. अकरम हौस्टल में ही रहा.

उम्र और वक्त ने अकरम को भी समझदार बना दिया था. उस ने कजरी से कभी अपने पिता का नाम नहीं पूछा. शायद उसे अंदाज हो गया था कि तवायफों के बच्चों के पिता नहीं हुआ करते. समय चक्र और स्कूल में हुई बेरुखी की घटना से आहत अकरम जान चुका था कि उस की मां का पेशा इज्जत का नहीं है. एक दिन वह कजरी की गोद में सिर रख कर बोला, ‘‘आप को पता है कि मैं काबिल बन कर सब से पहला क्या काम करूंगा.’’

‘‘क्या?’’ कजरी आश्चर्य से बोली.

‘‘आप को इस माहौल से निकालूंगा.’’

उस की बात और प्यार से कजरी की आंखें नम हो गईं, ‘‘मैं अपने हालात से खुश हूं अकरम. बस, तू कामयाब हो जा.’’

कजरी अकरम की हर वह ख्वाहिश पूरी करती है, जिस का वह तलबगार होता है. वह मातापिता दोनों का प्यार उसे दे रही है. उस की जिंदगी का एक ही बड़ा मकसद है कि अकरम बड़ा हो कर एक अच्छा इंसान बने. कजरी का किरदार वाकई बहुत ऊंचा है, लेकिन उस के पेशे की पहचान उसे आगे नहीं आने दे रही. वह जानती है कि समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा. बेटे के भविष्य की फिक्र भी उस के कदमों को थामे रखती है. वह असल जिंदगी में मां नहीं बनी, लेकिन उस में एक मां का अहसास है. दिल में प्यार है और समर्पण भी.

कजरी अकरम को बताना नहीं चाहती कि वह उस की असल मां नहीं है. वह नहीं चाहती कि उस के बेटे का दिल टूटे. ढोलक की थाप और घुंघरुओं के शोर में जिम्मेदारी और मोहब्बत का वादा उस के कानों में गूंजता है. कजरी ने अपनी मोहब्बत और मां के फर्ज के लिए जो कर दिया, वह वाकई प्रशंसनीय है. जो लोग कजरी की इस हकीकत को जानते हैं, वे उस की दिल से इज्जत करते हैं. Hindi stories

—कथा सच्ची घटना पर आधारित, पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.    (सभी फोटो: मौडलिंग)

 

True Crime Story: तेजाब की आंच से ताउम्र झुलसेंगे आरोपी

True Crime Story:अपनी प्रेमिका लावण्या को पाने के लिए हरदीप ने दोस्त के साथ मिल कर तेजाब कांड को अंजाम दिया. इस कांड के बाद उसे प्रेमिका तो नहीं मिली, लेकिन अदालत से ऐसी सजा जरूर मिल गई कि ताउम्र वह प्रेमिका से नहीं मिल सकेगा.

राकेश रेखी पंजाब पुलिस के रिटायर्ड एसपी देशराज के बेटे थे. मोहाली की फेज-1 मार्केट में रुद्राक्ष ग्रुप इमीग्रेशन नाम से उन की एक कंपनी थी. उन के दफ्तर में कई युवकयुवतियां काम करते थे. धार्मिक विचारों के राकेश जब भी माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाते, अपने औफिस के कुछ कर्मचारियों को भी साथ ले जाते थे. पहली सितंबर, 2011 को भी एक कार्यक्रम बना कर अपनी फोर्ड आईकान कार नंबर सीएच03जे 2042 से माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर के लिए निकले. इस बार भी वह अपने साथ औफिस से 4 जनों को ले गए थे. कार वह खुद चला रहे थे.

स्टाफ की 25 वर्षीया स्वातिका उन के बगल वाली सीट पर बैठी थी, जबकि 24 वर्षीया शिवालिका कार की पिछली सीट पर थी. स्टाफ के 2 लोग शेर खान और नवनीत इन के पीछे दूसरी गाड़ी में आ रहे थे. राकेश को अपनी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना था, इसलिए वह राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर मोहाली और खरड़ के बीच स्थित एक पैट्रोल पंप पर चले गए. उस समय शाम के करीब 5 बजे थे, वह अकसर उसी पैट्रोल पंप पर कार में पैट्रोल भरवाने जाते थे. पैट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद पेमेंट करने के लिए उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे किया कि तभी उन के ऊपर जैसे कहर बरपा गया.

विपरीत दिशा से 2 बाइक सवार उन की कार के पास पहुंचे. आगे वाले ने हैलमेट लगा रखा था, जबकि दूसरा बिना हैलमेट के था. उस के हाथ में 5 लीटर की कैन थी, जिस का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ था. जो शख्स कैन पकड़े था, वह राकेश के एकदम पास आ गया. राकेश को यह सब अजीब सा लगा. वह उस से कुछ बोलने को हुए, तभी उस युवक ने कैन में भरा तरल पदार्थ कार के अंदर बैठी युवतियों पर फेंक दिया. तरल पदार्थ फेंक कर वह युवक उसी बाइक से फरार हो गया. इस के बाद तो कार के भीतर चीखपुकार मच गई.

राकेश भी कराह उठे. कार का दरवाजा खोल कर वह बाहर आ गिरे थे. वह दर्द से तड़प रहे थे. कार के अंदर बैठी दोनों युवतियां भी चीखतीचिल्लाती हुई कार से बाहर निकल आई थीं. जरा सी देर में बात साफ हो गई कि बाइक सवारों द्वारा उन पर जो तरल पदार्थ डाला गया था, वह तेजाब था. उन का मुख्य निशाना वह लड़की थी, जो राकेश के बगल वाली सीट पर बैठी थी. वही तेजाब से सब से ज्यादा झुलसी थी. इस घटना के बाद पैट्रोल पंप पर भी अफरातफरी मच गई. कार में से बह कर तेजाब फर्श पर फैलने लगा था, जिस पर पैट्रोल पंप कर्मियों ने फोम डाल दी, ताकि अफरातफरी में वहां कोई फिसल कर न गिरे. पैट्रोल पंप कर्मियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी और तीनों घायलों को पीजीआई अस्पताल ले गए.

सूचना मिलते ही थाना बलौंगी के थानाप्रभारी भूपेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. बाद में खरड़ के डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क और मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद राकेश के कर्मचारी शेर खान और पैट्रोल पंप कर्मियों से घटना के बारे में पूछताछ की. घायलों से मिलने के लिए पुलिस अधिकारी पीजीआई अस्पताल भी गए और शेर खान की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली. एसपी ने इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई.

पुलिस ने पैट्रोल पंप पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच शुरू की. इस में बाइक और उस पर सवार 2 लोग दिखाई तो दे रहे थे, मगर न तो बाइक का नंबर साफ पढ़ने में आ रहा था और न ही उस पर बैठे लड़के किसी की पहचान में आ रहे थे. घटना की सूचना पा कर राकेश की कंपनी के कई कर्मचारी अस्पताल और थाने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई तो उन्होंने बताया कि तेजाब फेंकने वाला युवक उन के औफिस में काम करने वाली स्वातिका का बौयफ्रैंड हो सकता है. इस वारदात में स्वातिका भी झुलस चुकी थी, इसलिए पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि शायद उस लड़के ने प्यार में नाकाम होने पर स्वातिका को निशाना बनाया होगा.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि स्वातिका का वह कथित बौयफ्रैंड पहले गुड़गांव में काम करता था, बाद में वह डेरा बस्ती की किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. लेकिन इन दिनों उस के चंडीगढ़ में काम करने की जानकारी मिली. बिना नामपते के उस के पास पहुंचना आसान नहीं था. पुलिस ने स्वातिका की सहेलियों से इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि स्वातिका की उस लड़के से बोलचाल थी, वह उसे प्रपोज भी करने लगा था लेकिन स्वातिका उसे खास पसंद नहीं करती थी. फिर वह अकसर उसे परेशान करने लगा था. स्वातिका ने जब उस के प्रति अपना रुख सख्त किया तो वह उसे देख लेने की धमकियां भी देने लगा था.

पुलिस ने उन सभी सहेलियों से कहा कि वह उस के कथित बौयफ्रैंड का नामपता जुटाने में पुलिस का सहयोग करें. संदर्भवश बता दें कि 80 के दशक में सर्वथा पहली बार यह तेजाबकांड सुर्खियों में तब आया था, जब मध्यप्रदेश के जिला जबलपुर में एक सिरफिरे ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब उड़ेला था. उसे अपनी प्रेमिका पर शक था कि उस के संबंध किसी और से हैं. हालांकि उस समय निजी न्यूज चैनल नहीं थे, इस के बावजूद भी इस घटना से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद तो देश भर में इस तरह की घटनाएं जैसे आम हो गईं. मजबूरन सरकार को तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

खैर, इस ताजा केस में तेजाब के हमले से 3 लोग घायल हो गए. स्वातिका 80 प्रतिशत, शिवालिका 10 प्रतिशत और राकेश रेखी 40 प्रतिशत झुलस चुके थे. तीनों पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में भरती थे. पुलिस अभी तक उन के बयान नहीं ले पाई थी. फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा था कि यह एकतरफा प्यार का मामला है. साफ नजर आ रहा था कि स्वातिका के उन्मादी प्रेमी का निशाना वही थी, बाकी दोनों तो उस के साथ बैठे होने की वजह से लपेटे में आ गए थे. स्वातिका के कथित प्रेमी का पता लगाने को पुलिस ने अपने मुखबिर भी सक्रिय कर दिए थे. मुखबिरों से ही पता लग गया कि जिस शख्स ने तेजाब फेंका था, उस का नाम भावेश है और वह चंडीगढ़ के सेक्टर-49 का रहने वाला है.

एसएसपी के आदेश पर सीआईए इंसपेक्टर गुरचरन सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम भावेश की तलाश में उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर सीआईए टीम ने भावेश को चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. रातभर उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पता चला कि वह भारतीय जीवन बीमा निगम में एजेंट था. डेढ़ साल पहले स्वातिका भी एलआईसी की उसी शाखा में एजेंट थी. एक ही जगह काम करने की वजह से दोनों की आपस में मुलाकात होती रहती थी.

उसी दौरान भावेश ने स्वातिका से प्यार का इजहार कर दिया. स्वातिका ने साफ कह दिया कि वह प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर, अपने संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती है. लेकिन भावेश तो जैसे उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. तब स्वातिका ने परेशान हो कर एलआईसी का काम ही करना बंद कर दिया. इस के बाद वह राकेश रेखी के यहां नौकरी करने लगी. भावेश को जब पता चला तो वह उस का वहां भी पीछा करने लगा. अपनी एकतरफा प्यार की कहानी तो भावेश ने तमाम शिद्दत से सुना दी. लेकिन पुलिस द्वारा अपने सभी तरीकों से पूछताछ कर लेने पर भी वह यही दोहराता रहा कि स्वातिका पर तेजाब फेंकने में उस का कोई हाथ नहीं है.

उस ने भावुक हो कर कहा था, ‘‘सर, स्वातिका को मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं. उसे नुकसान पहुंचाने की तो मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस के साथ ऐसी दुश्मनी निभाने की हिमाकत किस ने की.’’

गहन पूछताछ कर के इंसपेक्टर गुरचरन सिंह को वह बेकुसूर लगा तो उन्होंने हिदायत दे कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने जिस एंगल से जांच करनी शुरू की थी, वहां से कोई सफलता नहीं मिल पाई. पुलिस ने स्वातिका के घर वालों से भी बात की, लेकिन वहां से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से एक खास जानकारी मिली. उस सूचना पर पुलिस ने काम किया तो 16 सितंबर, 2011 को 2 ऐसे आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिन्होंने पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही इस तेजाब कांड को अंजाम दिया था.

उन्होंने बताया कि उन का निशाना कोई और न हो कर राकेश रेखी था. दोनों लड़कियां तो राकेश के साथ कार में बैठी होने की वजह से लपेटे में आ गई थी, जिस का उन्हें भारी अफसोस हुआ. उन दोनों से की गई पूछताछ से जो खुलासा हुआ वह इस तरह से था कि गांव देसूमाजरा के रहने वाले हरदीप सिंह उर्फ दीपा और जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू आपस में गहरे दोस्त थे. बिट्टू अपना निजी कारोबार करता था और दीपा मोहाली के कस्बे कुराली में अपना नशामुक्ति केंद्र चलाता था. एक बार एक औरत अपने शराबी पति के साथ उस की शराब छुड़ाने की दरकार को ले कर दीपा के नशामुक्ति केंद्र आई. वह औरत इतनी खूबसूरत थी कि पहली ही नजर में हरदीप उर्फ दीपा का उस पर दिल आ गया. खूबसूरती के अनुरूप उस का नाम भी निहायत खूबसूरत था— लावण्या.

हरदीप अभी कुंवारा था और लावण्या शादीशुदा थी. उस से बात करने के बाद हरदीप अपने दिल पर काबू नहीं रख सका. लावण्या तो जैसे सीधे उस के दिल में उतर कर उस के तनमन को सराबोर कर गई थी.  उस के पति को हरदीप ने अपने नशामुक्ति केंद्र में भरती कर लिया. इस के बाद वह लावण्या से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा. उसे विश्वास में लेने के लिए उस ने उसे यह गारंटी दे दी थी कि आने वाले चंद महीनों में वह उस के पति में इतना सुधार कर देगा कि वह कभी शराब को हाथ नहीं लगाएगा. हरदीप की बात सुन कर लावण्या बहुत खुश हुई. बाद में वह 4-5 दिन पर पति के हालचाल जानने के लिए उस के नशामुक्ति केंद्र आने लगी. बीच में भी वह फोन कर के हरदीप से पति की जानकारी लेती रहती थी.

इस तरह लावण्या और हरदीप एकदूसरे के करीब आते गए. नशेड़ी पति के बजाय उस का झुकाव हरदीप की तरफ बढ़ता गया. लावण्या राकेश लेखी की कंपनी में काम करती थी. लावण्या का पति पुराना नशेड़ी था. इसलिए उस का नशा इतनी जल्दी नहीं छूट सकता था. इसलिए हरदीप को भरोसा था कि इस बीच वह लावण्या को अपने प्रेमजाल में फांस कर उस के पति से तलाक दिलवा कर उसे अपनी बना लेगा. इस तरह दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. लावण्या ने एक दफा हरदीप को मुलाकात का समय दे दिया. हरदीप निश्चित जगह पर उस का इंतजार करने लगा. काफी देर इंतजार के बाद भी वह उस से मिलने नहीं आई. हरदीप ने जब उसे फोन किया तो उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. इस से हरदीप को गुस्सा आ गया.

अगले दिन लावण्या ने ही हरदीप को फोन कर के मुलाकात न हो पाने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि उस का बौस राकेश रेखी मां चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाता है तो कंपनी के कुछ कर्मियों को अपने साथ ले जाता है. इस के लिए कोई इनकार नहीं करता. इस दफा उस ने एकदम अंतिम समय पर उसे साथ चलने को कहा. वह उसे मना नहीं कर पाई और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर उस के साथ चली गई. अभी तक तो हरदीप को अपनी प्रेमिका लावण्या पर नाराजगी थी. पर जब उसे पता चला कि इस में गलती लावण्या की नहीं, बल्कि उस के बौस राकेश रेखी की है तो उस का खून खौल उठा. राकेश जब भी कहीं बाहर जाते तो लावण्या को अपने साथ जरूर ले जाते थे.

इस से हरदीप राकेश को अपना जानी दुश्मन समझने लगा. मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. इस बारे में अपने खास दोस्त जगवंत सिंह बिट्टू से बात की तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. दोनों ने राकेश को सबक सिखाने के लिए एक फूलपू्रफ योजना बना ली. हरदीप ने मोहाली की एक दुकान से तेजाब खरीदा. फिर उसे ऊपर से कटी हुई कैन में डाल लिया, ताकि वह आसानी से डाला जा सके. फिर योजना को अंजाम देने का मौका ढूंढने लगा. उसे पता चला कि पहली सितंबर को राकेश ने चिंतपूर्णी देवी जाने का प्रोग्राम बनाया है और इस बार वह लावण्या के बजाय अन्य लोगों को ले जा रहे हैं.

हरदीप औफिस से राकेश के निकलने का इंतजार करने लगा. वह मौका उसे पैट्रोल पंप पर उस समय मिल गया, जब राकेश ने पैट्रोल के पैसे देने के लिए खिड़की खोली. लेकिन जैसे ही उस ने राकेश को निशाना बना कर तेजाब फेंका, राकेश ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया, जिस से निशाना अगली सीट पर बैठी स्वातिका बन गई. राकेश के बजाय दोनों युवतियों के जख्मी होने का हरदीप को बहुत अफसोस हुआ. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ पूरी कर पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

उधर अस्पताल में भरती देहरादून की रहने वाली स्वातिका की हालत बिगड़ती जा रही थी. इन्फैक्शन बढ़ जाने के कारण 19 सितंबर को उस की अस्पताल में ही मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस केस में धारा 302 भी बढ़ा दी. तेजाब की वजह से राकेश रेखी की एक आंख की रोशनी चली गई और उन के जिस्म पर इतनी सर्जरी हुई कि इस की गिनती उन्हें भी नहीं मालूम. बिना सहारे के वह कहीं आजा भी नहीं सकते. 90 दिनों के भीतर पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह की अदालत में चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को तमाम तवज्जो दे कर सुना और सभी साक्ष्यों को विधिपूर्वक जांचापरखा. अभियोजन पक्ष की ओर से 48 गवाहों ने अपने बयान अदालत में दर्ज करवाए. 27 मई, 2015 को इस केस का फैसला सुना दिए जाने की उम्मीद थी. दोनों अभियुक्तों को सुबह ही अदालत में बैठा दिया गया था. उस दिन इस चर्चित केस की सुनवाई कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई. अदालत के भीतरबाहर दोनों पक्षों की हिफाजत के लिए बाऊंसरों की भरमार थी. पुलिस द्वारा भी अदालत में आनेजाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. किसी को भी बिना पर्याप्त चैकिंग व पूछताछ के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था. राकेश रेखी अभी तक भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. वह अपने वकीलों के साथ अदालत में हाजिर थे.

सक्षम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह ने उस दिन दोनों अभियुक्तों को धारा 302 एवं 307 का दोषी करार देते हुए 29 मई को सजा सुनाए जाने की बात कही. तब तक के लिए दोषियों को वापस जेल भिजवाने के आदेश दिए. 3 पुलिसकर्मी दोनों अभियुक्तों को ले कर कोर्ट रूम से बाहर निकले. वहां मीडिया के कुछ लोग खड़े थे, जिन्हें देखते ही दोनों अभियुक्तों ने पुलिस वालों से अपने हाथ छुड़वा कर मीडियाकर्मियों पर ही हमला बोल दिया. इस हमले में फोटो जर्नलिस्ट अमित वालिया की इन्होंने काफी पिटाई कर दी. बाद में इस पत्रकार ने इस संबंध में न केवल पुलिस को शिकायत दी, बल्कि अदालत को भी घटना के बारे में लिख कर दिया.

बहरहाल, 29 मई, 2015 को विद्वान एवं सक्षम जज परमिंदरपाल सिंह ने हरदीप सिंह उर्फ दीपा व जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू को उक्त केस में ताउम्र कैद की सजा के अलावा 5-5 लाख रुपयों का जुरमाना भी किया. इस राशि में 4.60 लाख रुपए मृतका के परिजनों व 4.60 लाख राकेश रेखी को अदा करने के साथ 80 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा कराने के आदेश दिए. 29 मई, 2015 को दोनों अभियुक्तों को सजा सुनाई जानी थी. उस दिन मोहाली अदालत का परिदृश्य बाकी दिनों से एकदम अलग था. चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. दोनों अभियुक्तों के परिजन व अनेक दोस्त भी वहां पहुंचे थे. राकेश की हालत दयनीय थी, इस के बावजूद भी 50 बाउंसरों के घेरे में वहां आए हुए थे. वह अदालत के फैसले से बहुत खुश हुए.

उन का कहना था कि जिस लड़ाई को वह पिछले 4 सालों से जारी रखे हुए थे, उस का परिणाम संतोषजनक निकला. जिन लोगों ने एक युवती की जान लेने के साथ उन्हें जिंदा लाश बना कर रख दिया, उसे देखते हुए ऐसी सख्त सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

लावण्या नाम परिवर्तित है.

Emotional Story: मोहब्बत की मिसाल

Emotional Story: मुगल बादशाह शाहजहां अपनी बेगम मुमताज महल को बहुत प्यार करते थे, उस प्यार की निशानी के रूप में उन्होंने ताजमहल बनवाया था. उसी तरह अपनी बीवी से मोहब्बत करने वाले कादरी भी गांव में छोटा सा ताजमहल बनवा रहे हैं. सफेद कुरतापाजामा और सिर पर गोल टोपी लगाए फैजुल हसन कादरी गांव पहुंचे तो उन से मिलने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा. उन से मिल कर गांव का हर आदमी खुश था. गांव वाले उन की बातें सुनने के लिए उत्सुक थे. इस की वजह यह थी कि कादरी प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिल कर गांव लौटे थे. उन से मिलने आने वालों में बच्चों से ले कर बुजुर्ग तक थे. उन में से किसी बुजुर्ग ने कहा, ‘‘कादरी भाई, तुम ने वाकई गांव का नाम रोशन कर दिया. ऊपर वाला तुम्हें लंबी उम्र बख्शे.’’

कादरी ने पलभर के लिए थकी आंखों से उन्हें देखा, उस के बाद आहिस्ता से बोले, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है अनवर मियां, मैं ने कुछ नहीं किया, जो कुछ किया है, ऊपर वाले ने किया है?’’

‘‘तुम ने क्या किया है कादरी भाई, यह हम लोगों से ज्यादा और कौन जान सकता है. तुम्हारी यही सादगी तो सब को पसंद है.’’ कादरी के एक हमउम्र ने आगे बढ़ कर उन के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आप ही हो, जिस की बदौलत आज हमारे गांव को एक नई पहचान मिली है, वरना हमारे इस अदने से गांव को कौन जानता था. विकास का रास्ता खुल गया है. अब हमारे गांव का तेजी से विकास होगा, यह कोई छोटी बात है. यह सब आप की वजह से ही हुआ है. आप न होते तो यह कतई मुमकिन न होता.’’

दरअसल, कादरी के मुख्यमंत्री से मिलने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गांव का विकास कराने की सरकारी घोषणा कर दी थी, इसलिए गांव वाले खुश थे और उन का हालचाल जानने आए थे. हालचाल जानने के बाद किसी ने कहा, ‘‘अब तो अपने कादरी भाई का नाम बदल देना चाहिए.’’

‘‘क्यों?’’ किसी ने हैरानी से पूछा.

‘‘कादरी भाई मुगल बादशाह शाहजहां भले न सही, लेकिन हमारे लिए तो यह आज के शाहजहां ही हैं. शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में जो काम किया था, आज वही काम यह भी कर रहे हैं.’’ उस आदमी ने कहा.

उम्र के आखिरी पड़ाव का सफर तय कर रहे 82 वर्षीय फैजुल हसन कादरी उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के दिल्लीबदायूं राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 93 के किनारे बसे गांव कसेर कलां के रहने वाले हैं. यहां उन की चरचा इस वजह से की जा रही है, क्योंकि वह अपनी मरहूम बेगम तजुम्मली की याद में गांव में एक मिनी ताजमहल बनवा रहे हैं. अपनी जिंदगी भर की कमाई तो उन्होंने उस में लगा ही दी है, अपना ख्वाब पूरा करने के लिए वह गुजारे के लिए मिलने वाली पैंशन भी उसी पर खर्च कर रहे हैं. इस की मुख्य वजह यह है कि वह अपनी बेगम से बहुत मोहब्बत करते थे. इसीलिए उस की याद में वह कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिसे जमाना याद करे.

कादरी की कोई औलाद नहीं थी. लोगों ने उन से बहुत कहा था कि जब पहली बीवी से बच्चे नहीं हो रहे हैं तो वह दूसरा निकाह कर लें. उन का मजहब भी इस की इजाजत देता था, लेकिन उन्हें यह कतई मंजूर नहीं था कि उन की बीवी को उन से मिलने वाली मोहब्बत बंट जाए, इसलिए उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी. आज उसी बेगम की याद में वह ताजमहल बनवा रहे हैं. बेगम की मोहब्बत और ताजमहल बनाने को ले कर ही वह देशविदेश की सुर्खियों में ऐसे आए कि प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी एक बड़े समारोह में उन से मिल कर उन्हें सम्मानित किया और उन की बीवी के प्रति ऐसी मोहब्बत देख कर उन के मुरीद हो गए.

मुख्यमंत्री ने न सिर्फ कादरी के अधूरे ताजमहल को पूरा कराने का वादा किया, बल्कि गांव का विकास कराने की भी घोषणा कर दी. यह 28 अगस्त, 2015 की बात थी. फैजुल हसन कादरी के इस मुकाम पर पहुंचने की एक अलग ही कहानी है. कादरी परमाणु विद्युत उपकेंद्र के रूप में मशहूर नजदीकी कस्बा नरौरा के पोस्टऔफिस में नौकरी करते थे. वह सादगी पसंद नेकदिल इंसान थे. उन की इसी नेकदिली की वजह से उन्हें समाज में इज्जत की नजरों से देखा जाता था. लोगों की मदद करना और उन के दुखसुख में शामिल होना, उन की आदत में शुमार था.

सालों पहले उन का निकाह तजुम्मली के साथ हुआ था. तजुम्मली भी उन्हीं की तरह सीधीसादी थीं. आपस में दोनों एकदूसरे से बेहद प्यार करते थे. उन की जिंदगी में बस एक ही गम था कि शादी के 20 सालों बाद भी उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था. यह ऐसा गम था, जो कादरी को भी सालता था और तजुम्मली को भी. तजुम्मली जब भी उदासी के भंवर में होतीं तो अकसर कहती, ‘‘पता नहीं क्या बदनसीबी थी, जो मैं आप को एक औलाद नहीं दे सकी.’’

ऐसे में कादरी उसे दिलासा देते, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है तजुम्मली, औलाद न होने से मेरे लिए तुम्हारी अहमियत कम नहीं हो जाती. मैं तुम से बेइंतहा मोहब्बत करता हूं. फिर उदास होने से क्या फायदा.’’

मामला जब इस तरह का हो तो समाज के लोग, जानपहचान वाले और नातेरिश्तेदार भी बातें बनाने लगते हैं. लोग तरहतरह के मशविरे देने लगते हैं. कादरी और तजुम्मली के साथ भी ऐसा ही हुआ था, लेकिन उन्होंने उन बातों पर जरा भी गौर नहीं किया. सब से अहम बात यह थी कि कादरी हर सूरत में अपनी बेगम के साथ थे. कादरी जब उम्र में थे तो उन के नजदीकी अकसर उन्हें सलाह देते थे कि इस हालत में लोग तलाक दे कर या फिर बिना तलाक के ही दूसरा निकाह कर लेते हैं. औलाद के लिए उन्हें भी दूसरा निकाह कर लेना चाहिए. लेकिन उन का जमीर इस के लिए गवाही नहीं देता था. क्योंकि वह सचमुच तजुम्मली से मोहब्बत करते थे. इसलिए दूसरी शादी कर के वह उन का दिल कतई नहीं तोड़ना चाहते थे.

इस पर लोग उन्हें ताना भी मारते थे कि बीवी से मोहब्बत तो हर कोई करता है, क्या उन की मोहब्बत अनोखी है. लेकिन कादरी ने साफ कह दिया कि कुछ भी हो, वह दूसरा निकाह बिलकुल नहीं करेंगे. रही बात अनोखी मोहब्बत की तो यह उन का दिल जानता है. इसे जताने से क्या फायदा. वह पत्नी को कतई नहीं छोड़ सकते. नातेरिश्तेदार, गांव वालों ने इस तरह न जाने कितनी बार उन्हें निकाह की सलाह दी, लेकिन कादरी ने कभी किसी की न सुनी और न मानी.

कादरी जिस मजहब से थे, उन्हें निकाह की आजादी थी. इस के लिए पहली बीवी की रजामंदी भी कोई मायने नहीं रखती थी. वह ऐसे लोगों को जानते थे, जो शौकिया कई बीवियों के शौहर बनने का ख्वाब देखते थे. कादरी के पास माकूल वजह भी थी. बच्चे न होने पर वह दूसरा निकाह आसानी से कर सकते थे. यह डर तजुम्मली को सालता भी रहता था. कलेजे पर पत्थर रख कर वह भी कादरी से कहती थीं, ‘‘जब सभी दूसरे निकाह के लिए कह रहे हैं तो आप दूसरा निकाह कर क्यों नहीं लेते?’’

‘‘तुम्हारे ताल्लुक उन लोगों से नहीं, मेरे साथ हैं. मैं तुम्हारा शौहर हूं, तुम से मोहब्बत करता हूं. मुझे तुम्हारा दिल तोड़ने से बेहतर है मैं बेऔलाद ही रहूं.’’

‘‘फिर भी…’’ तजुम्मली ने आगे कुछ कहना चाहा तो कादरी ने उन्हें बीच में ही टोक दिया, ‘‘अब बस करो और आइंदा इस मसले पर कोई बात भी मत करना.’’

वक्त अपनी गति से आगे बढ़ता रहा. इस मसले पर कादरी ने न कभी बेगम की सुनी और न दुनियाजहान की. वह अपने इरादों पर अटल रहे. जिंदगी को उस के असल रूप में स्वीकार कर के वह बेहद खुश थे. कई मौकों पर तजुम्मली के प्रति उन की मोहब्बत साफ झलकती थी, जिस की लोग मिसालें भी दिया करते थे. बच्चे न होने पर भी उन्होंने बीवी को नहीं छोड़ा था, यह छोटी बात नहीं थी. सरकारी मुलाजिम होने के चलते कादरी को ठीकठाक तनख्वाह मिलती थी, उस से आराम से उन की जिंदगी बसर हो रही थी. इस के अलावा उन के पास खेती की जमीन भी थी.

देखतेदेखते जिंदगी का लंबा सफर गुजर गया. बुढ़ापे की तरफ उन के कदम बढ़ चुके थे. कादरी नौकरी से रिटायर हो गए. इसी बीच तजुम्मली को गले के कैंसर की बीमारी ने घेर लिया. कादरी ने न सिर्फ उन का इलाज कराया, बल्कि खूब सेवा भी की. वक्त की अपनी चाल होती है. मौत एक कड़वी हकीकत है. तमाम कोशिशों के बाद दिसंबर, 2011 में तजुम्मली का इंतकाल हो गया.

तजुम्मली कादरी की जिंदगी का सब से बड़ा सहारा थीं. बेगम की रुख्सती ने उन्हें गमजदा कर दिया. अपनों का बिछड़ना सभी को बहुत दर्द देता है. वक्त ही धीरेधीरे इस की भरपाई करता है. कादरी भी धीरेधीरे इस से उबरे. उन्होंने तजुम्मली की यादों को जिंदा रखने और अपनी मोहब्बत जताने के लिए कुछ अलग करने की ठानी. कादरी जानते थे कि मुगल सल्तनत के शहंशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में आगरा में संगमरमर का ताजमहल बनवाया था. दुनिया के अजूबों में शुमार ताजमहल मोहब्बत की बेजोड़ निशानी के रूप में दुनिया भर में मशहूर है. कादरी न शाहजहां थे, न उन के पास इतनी दौलत थी कि उस तरह का कोई अजूबा बनवा सकते. फिर भी वह इसी से मिलताजुलता ऐसा कुछ करना चाहते थे, जिस से जमाना उन्हें याद रखे.

बेगम की मौत ने उन्हें न सिर्फ तनहा, बल्कि मायूस भी कर दिया था. जिंदगी भर उन्होंने बेगम से पाक मोहब्बत की थी. लोग इस की मिसालें भी दिया करते थे. शायद इसीलिए कादरी ने मन ही मन ठान लिया कि वह भी अपनी बेगम की याद में शाहजहां की तरह ही ताजमहल बनवाएंगे. गांव के किनारे उन की 6 बीघा जमीन थी. वहीं तजुम्मली को दफन कर कब्र बनाई गई थी. वहीं पर 24 सितंबर, 2012 को कादरी ने ताजमहल की तरह छोटा ताजमहल बनवाना शुरू कर दिया. जब गांव वालों को इस का पता चला तो हौसलाअफजाई करने के बजाय वे उन का मजाक उड़ाने लगे. कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि वह अपनी कमाई बेकार में क्यों खर्च कर रहे हैं. जोड़ कर रखें, बुढ़ापे में दवादारू में काम आएगी.

कादरी का कहना था कि मौत तो बिना पैगाम के आती है. वह किस के लिए पैसे जोड़ कर रखें. उन के लिए तो बीवी ही दौलत थी, वह रही नहीं. अब उस की यादों के सहारे ही जिंदा हैं. उस के नाम पर जो भी करेंगे, वही कम है. कादरी ऐसी बातों पर बहुत कम ध्यान देते थे. क्योंकि उन्होंने अपने इरादों को मजबूत लहरों पर सवार कर दिया था. इंसान का जुनून ही उसे मनचाहे मुकाम तक पहुंचाता है. वह जो चाहता है, कर सकता है. कादरी का जिद और जुनून ही था कि पत्नी की याद में बनने वाले ताजमहल में उन्होंने अपनी जिंदगीभर की कमाई लगा दी थी. जमीन बेची और अपनी बेगम के गहने भी बेच कर लगा दिए. इस तरह करीब 15 लाख रुपए खर्च कर दिए.

लेकिन उन का सपना पूरा नहीं हुआ. इमारत तो बन कर तैयार हो गई, लेकिन उस में संगमरमर लगाने और फिनिशिंग का काम नहीं हो सका. कादरी की मोहब्बत का लोग लोहा मान गए थे. उन की मोहब्बत की मिसालें दी जाने लगीं. उन की मोहब्बत की निशानी मिनी ताजमहल चर्चा में आया तो लोग उसे देखने के लिए आने लगे. ताज को पूरा करने की उन की ख्वाहिश लोगों से छिपी नहीं थी. इसलिए कुछ लोगों ने उन के सामने प्रस्ताव रखा कि वे पैसों से मदद कर के रुका काम पूरा करा दें. लेकिन खुद्दारी दिखा कर उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि यह उन की मोहब्बत है, लिहाजा वह इस में किसी को शामिल नहीं करना चाहते.

कादरी की उम्र का आखिरी पड़ाव चल रहा है. ताजमहल पूरी तरह बनने से पहले वह खुद न चल बसें, इस आशंका के चलते उन्होंने ताजमहल के अंदर बनी तजुम्मली की कब्र के बराबर में अपने लिए कब्र खुदवा कर छोड़ दी. यही नहीं, लोगों से कह भी दिया कि उन के इंतकाल के बाद उन्हें तजुम्मली के बराबर में ही दफन किया जाए. कादरी को पेंशन मिलती है. खर्च से जो भी पैसा बचता है, वह उसे ताजमहल बनवाने में लगा देते हैं. उन्होंने अपने घर की बिजली का कनेक्शन भी कटवा दिया है, जिस से बिल के भी पैसे बच जाएं. वह उन पैसों को भी ताजमहल के निर्माण में लगा रहे हैं.

पत्नी की मोहब्बत में ताजमहल बनवाने की चर्चाएं मीडिया द्वारा देश में ही नहीं, विदेश तक पहुंच गईं. इस के बाद कादरी का ताजमहल देखने और कवरेज के लिए यूरोप के वेल्जियम से पत्रकार मैक्स, मिस विक्टोरिया, जर्मनी की पत्रकार क्लाडिया एंड्रिस ही नहीं, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज चैनल के अलावा ब्रिटेन और पाकिस्तान तक के पत्रकार आए. कादरी का ताजमहल मीडिया में सुर्खियां बन गया तो इस की जानकारी जिलाधिकारी बी. चंद्रकला को भी हुई. उन्होंने तमाम जानकारियां जुटाईं और उसी बीच प्रदेश सरकार ने विशिष्टता का प्रदर्शन करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित करने का एक कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया तो जिलाधिकारी ने कादरी का नाम भी शासन को भेज दिया.

जिलाधिकारी ने तहसीलदार विजय कुमार को मौकामुआयना करने के साथ कादरी से मिलने के भी निर्देश दिए थे. संयोग से शासन ने कादरी के नाम को स्वीकृति दे दी. इस के बाद जिलाधिकारी बी. चंद्रकला ने कादरी को मुलाकात के लिए बुलवाया. कादरी ने ख्वाहिश जाहिर की कि वह अपनी खेती की जमीन सरकार को दान दे कर वहां बालिकाओं के लिए एक इंटर कालेज बनवाना चाहते हैं. दरअसल, कादरी को यह बात हमेशा से खटकती रही थी कि उन के गांव की लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है. इसी वजह से लड़कियां चाह कर भी नहीं पढ़ पातीं. इसीलिए वह चाहते थे कि अगर उन के गांव में ही कोई कालेज बन जाए तो गांव की लड़कियां आराम से पढ़ाई कर सकेंगी. उन की इस बात को भी सरकार तक पहुंचा दिया गया.

एक दिन कादरी को सूचना मिली कि उन्हें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लखनऊ जाना है तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. 28 अगस्त को कादरी लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे. कादरी की मोहब्बत का किस्सा सुन कर और उन के मिनी ताजमहल की तसवीर देख कर मुख्यमंत्री उन की मोहब्बत के कायल हो गए. मुख्यमंत्री ने कादरी को सम्मानित करने के साथसाथ, उन के अधूरे ताजमहल को पूरा कराने का भी आश्वासन दिया.

इसी के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कसेर कलां गांव को श्री जनेश्वर मिश्र ग्राम योजना में शामिल करने की घोषणा भी कर दी. इस योजना के तहत गांव के विकास के लिए प्रतिवर्ष 40 लाख रुपए मिला करेंगे. इस के अलावा यह भी वादा किया कि गांव में बलिका इंटर कालेज के लिए आगामी वित्तीय वर्ष में बजट स्वीकृत कर दिया जाएगा. अब कादरी खुश हैं कि एक दिन उन की ताजमहल पूरा होने की तमन्ना जरूर पूरी हो जाएगी.

पूरी जिंदगी चाय से परहेज करने वाले कादरी बीवी की मौत के बाद से अपना खाना खुद ही बनाते हैं. अब कादरी की तबीयत ठीक नहीं रहती. लेकिन उन के सिर पर ऐसा जुनून सवार है कि वह हर वक्त ताजमहल के रूप में अपने ख्वाब को पूरा करने की ही सोचते रहते हैं. अपने आशियाने से वह हर रोज उसे देखते हैं और उस की खूबसूरती की उम्मीद किया करते हैं. कादरी को उम्मीद है कि एक दिन उन का भी ताज संगमरमर से चमकता नजर आएगा.

आगरा से लगभग 130 किलोमीटर दूर कादरी का ताज आज दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है. अब उन के ताजमहल को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी आने लगे हैं. जब कोई देशीविदेशी आदमी कादरी के ताजमहल को देखने आता है तो वह बहुत खुश होते हैं. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन की मोहब्बत को एक दिन इस तरह लोग जानने लगेंगे. Emotional Story

—कथा कादरी के साक्षात्कार पर आधारित.

 

True Crime Story: जयपुर की रेव पार्टी – बेटे के कंलक से आहत गुलाबो

True Crime Story: अपने कालबेलिया डांस से दुनिया भर में पहचान बनाने वाली गुलाबो की नृत्य कला वाकई अनूठी है. इसी के बूते पर उस ने दौलत और शोहरत अर्जित की, लेकिन उस के बेटे भवानी सिंह ने फार्महाउस पर रेव पार्टी कर के मां को शर्मसार तो किया ही, कानून के पचड़े में भी फंसा दिया.

उस दिन तारीख थी 31 अगस्त. रात काफी गहरा गई थी. घड़ी की सूइयों ने कुछ ही देर पहले 12 बजाए थे. कैलेंडर के हिसाब से 1 सितंबर की तारीख शुरू हो चुकी थी. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास राव अपने सरकारी आवास पर बैडरूम में लेटे सोने की तैयारी कर रहे थे. दिन भर की भागदौड़ और औफिस में लंबी सिटिंग से वह बुरी तरह थक चुके थे. बैडरूम की दीवार पर लगे टीवी पर दिन भर की खबरें चल रही थीं. उस समय करीब सभी चैनलों पर सब से ज्यादा चर्चित शीना मर्डर केस और इंद्राणी की खबरें आ रही थीं. हालांकि शीना मर्डर केस 2-3 दिनों से मीडिया में हौट बना हुआ था. उस दिन नई बात यह थी कि इंद्राणी कोर्ट में बेहोश हो गई थीं.

सीनियर आईपीएस औफिसर होने के नाते जंगा के दिमाग में इंद्राणी केस को ले कर कई तरह के सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. साथ ही वह आजकल के सामाजिक पतन के बारे में भी सोच रहे थे. उन की सोच का दायरा उन हाईप्रोफाइल लोगों के इर्दगिर्द सिमटा था, जो धनदौलत, अय्याशी और शोहरत के लिए अपने खून के रिश्तों को भी तारतार करने में पीछे नहीं रहते.

टीवी बंद कर के राव बिस्तर पर लेट गए और आंखें मूंद कर सोने का प्रयास करने लगे. तभी उन के मोबाइल पर एक काल आई. नंबर अनजाना था. फिर भी उन्होंने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘पुलिस कमिश्नर साहब बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हां, मैं पुलिस कमिश्नर बोल रहा हूं.’’ राव ने शालीनता से कहा.

‘‘सर, जयपुर में एक नामी महिला के फार्महाउस पर रेव पार्टी हो रही है, जिस में विदेशी महिलाएं भी आई हुई हैं. उन के साथ कई युवक हैं, सब के सब पैसे वालों की बिगड़ी औलादें.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘आप कौन बोल रहे हैं और यह पार्टी हो कहां रही है?’’ पुलिस कमिश्नर ने फोन करने वाले से पूछा.

‘‘सर, मुझे अपना शुभचिंतक समझ लीजिए. नाम बताने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि आप के पास मेरा मोबाइल नंबर आ गया है. मैं जानता हूं, आप को झूठी सूचना दूंगा तो मुझे हवालात जाना पड़ेगा.’’ फोन करने वाले ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘सर, आप जगह पूछ रहे हैं, जो बताना जरूरी है. यह रेव पार्टी हरमाड़ा में सीकर रोड से निकलने वाली नींदड़ जयरामपुरा रोड पर हो रही है. वहां कई गाडि़यां भी खड़ी हैं.’’ कह कर सूचना देने वाले ने फोन काट दिया.

जंगा श्रीनिवास राव अनुभवी पुलिस औफिसर थे. वे फोन करने वाले की विश्वासपूर्वक कही गई बातों से ही समझ गए कि सूचना गलत नहीं है. फोन करने वाले ने केवल अपना नाम छिपाया था, नंबर नहीं इसलिए विश्वास किया जा सकता था कि सूचना सही है. नवधनाढ्य वर्ग में आजकल तरहतरह की नैतिकअनैतिक पार्टियों का चलन बढ़ रहा है. जयपुर राजस्थान का महानगर है, देश भर में हीरेजवाहरात का सब से बड़ा कारोबार जयपुर में ही होता है. कालेसफेद धंधों से अथाह पैसा कमाने वालों की संख्या रोजाना बढ़ रही है. जयपुर के चारों ओर छोटेबड़े तमाम फार्महाउस हैं.

राजनेताओं से ले कर आला अफसरों, बड़े व्यापारियों और कारोबारियों के फार्महाउसों पर आए दिन छोटीमोटी पार्टियां होती रहती हैं. लेकिन जयपुर में रेव पार्टी का आयोजन कभीकभार ही सुनने में आता है. इसलिए रेव पार्टी की सूचना पर राव ने तुरंत काररवाई करने का फैसला कर लिया. उन्होंने अपने अधीनस्थ 5 अधिकारियों को शौर्ट नोटिस पर अपने घर बुला लिया. रात करीब डेढ़ बजे तक पांचों अधिकारी पुलिस कमिश्नर के बंगले पर पहुंच गए. जंगा ने उन अधिकारियों को मोबाइल पर मिली सूचना के बारे में बताते हुए कहा कि तुरंत काररवाई करनी है.

अगर गैरकानूनी रूप से कोई पार्टी हो रही है तो कोई कितना भी बड़ा आदमी हो, उसे पकड़ने में हमें जरा भी नहीं झिझकना है. इसी के साथ पुलिस कमिश्नर ने पांचों अधिकारियों को अलगअलग थानों से 70-75 जवानों की टीम बना कर छापा मारने के निर्देश दिए. पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर पांचों अधिकारियों ने फोन कर के अपने अधीनस्थ थानाप्रभारियों को तुरंत एकएक पुलिस टीम बनाने को कहा. साथ ही उन्हें यह भी निर्देश दिए कि वह हरमाड़ा थाना इलाके में नींदड़-जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास पहुंच जाएं. कुछ ही देर में जयपुर के विभिन्न थानों से अलगअलग टीमों के साथ पुलिस की गाडि़यां दौड़ पड़ीं. दूसरी ओर पुलिस कमिश्नर के बंगले से निकल कर पांचों अधिकारी भी गणेश मंदिर के पास पहुंच गए. उस समय तक रात के लगभग 3 बज चुके थे.

जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास कई फार्महाउस बने हुए हैं. एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) करण शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की टीमें गणेश मंदिर के आसपास के फार्महाउसों की टोह लेती हुई आगे बढ़ने लगीं. कुछ ही देर में पुलिस को सड़क किनारे एक फार्महाउस के अंदर कई गाडि़यां खड़ी नजर आईं. फार्महाउस में बाहर ज्यादा रोशनी नहीं थी. अंदर की ओर केवल एक बल्ब जल रहा था, लेकिन अंदर से तेज धूमधड़ाके की आवाजें आ रही थीं. पुलिस दल ने अपनी गाडि़यां कुछ दूर रोक दीं और फार्महाउस का बाहर से जायजा लिया. मेनगेट अंदर से बंद था. पुलिस दल को 2-3 लोग अंदर अंधेरे में पेड़ों के आसपास खड़े नजर आए. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि अंदर जरूर कोई न कोई पार्टी चल रही है और ये लोग बाहर की निगरानी के लिए खड़े हैं.

एडिशनल डीसीपी ने अपने साथी अधिकारियों और जवानों से तुरंत एक्शन लेने को कहा. देखते ही देखते 70 से ज्यादा पुलिस जवानों ने फार्महाउस को घेर लिया. कुछ जवान गेट फांद कर अंदर दाखिल हो गए. उन्होंने सब से पहले अंधेरे में निगरानी कर रहे लोगों को दबोचा. इस के बाद उन्होंने मेनगेट खोल कर अधिकारियों को अंदर बुला लिया. पुलिस अफसर जब फार्महाउस के अंदर एक विशाल हाल में पहुंचे तो दंग रह गए. वहां तमाम युवक डीजे की धुन पर झूम रहे थे. तेज आवाज में अंगरेजी संगीत बज रहा था. डांस के नाम पर झूमने वाले सभी युवक नशे में थे.

शराब की बोतलें खुली हुई थीं. वहां मौजूद सभी युवक बरमूडा टीशर्ट पहने हुए थे और पूरी मस्ती के मूड में थे. उन के साथ एक विदेशी युवती भी मौजूद थी. उस समय पार्टी पूरे शबाब पर थी. सारे युवा अपनेअपने तरीके से मौजमस्ती कर रहे थे. उन में से कई तो मदमस्त हो कर थिरक रहे थे. पुलिस को देखते ही पार्टी में भगदड़ मच गई. नशे में झूमते युवा इधरउधर भागने लगे. पुलिस ने भागदौड़ कर के 26 युवकों को पकड़ लिया. साथ ही पार्टी में शामिल फिनलैंड की एक युवती भी पकड़ी गई. पुलिस ने मौके से महंगी शराब की बोतलें, चरस, गांजा, एनर्जी ड्रिंक्स, शक्तिवर्धक दवाएं और आपत्तिजनक सामान के अलावा कार तथा 13 हाईपावर बाइकें जब्त कीं. पुलिस की इस काररवाई के  दौरान पार्टी में एंजौय कर रहे कई युवा अंधेरे का फायदा उठा कर इधरउधर भाग कर आसपास के फार्महाउसों में उगी फसलों में छिप गए.

फार्महाउस से पकड़े गए सभी लोगों को पुलिस हरमाड़ा थाने ले आई. वहां एडिशनल डीसीपी ने पकड़े गए युवकों से पूछताछ शुरू की तो उन्हें बड़ा झटका लगा. यह फार्महाउस अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना गुलाबो का था. दुनिया भर में अपने कालबेलिया डांस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली वही गुलाबो, दौलत और शोहरत जिस के कदम चूमती थी. स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी जिसे अपनी बहन मानते थे. कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी जिसे ननद मानती हैं. पकड़े गए युवाओं में गुलाबो का बेटा भवानी सिंह भी था.

पूछताछ में पता चला कि फिनलैंड की रहने वाली 24 वर्षीया युवती तरू आरियो नेपाल में अपने पुरुष मित्र के पास आई थी. तरू ने नेपाली मित्र से भारत घूमने की इच्छा जताई तो उस ने अपनी व्यस्तता के बारे में बता कर तरू आरियो को अपने एक नेपाली साथी के साथ भारत भेज दिया. तरू टूरिस्ट वीजा पर हिमाचल होते हुए राजस्थान आई थी. राजस्थान में कई जगह घूमने के बाद वह पुष्कर पहुंची थी. पुष्कर से उसे वही नेपाली युवक इस रेव पार्टी में जयपुर ले आया था. पुलिस ने पकड़े गए युवाओं की मैडिकल जांच कराई, ताकि यह पता चल सके कि उन्होंने नशे के लिए कौनकौन से ड्रग लिए थे?

आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने हर्षित कौशिक, ऋषि कौशिक, सुनील मोतियानी, आकाश रोचवानी, भवानी सपेरा, अभिमन्यु, उवेश करणी, चिराग मीणा, हर्ष शेखावत, विजय प्रकाश, आलविन, राजेंद्र सैनी, पूर्व सिंह राठौड़, मुकेश धानका, कदीर, अक्षत स्थापक, आशीष भावन, प्रखर मिश्रा, श्रेय वर्मा, विशाल चंदानी, गौरव, राज शर्मा, सर्वोत्तम शर्मा, हर्ष को एनडीपीएस एक्ट में और फिनलैंड निवासी युवती तरू ओरियो को शांतिभंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए युवकों में कई निजी कालेजों के छात्र भी थे. पुलिस ने हरमाड़ा थाने में मुकदमा दर्ज कर के उस में गुलाबो को भी नामजद किया. पुलिस ने 1 सितंबर को सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया.

अदालत ने 25 युवकों को जेल भेज दिया, जबकि विदेशी युवती को जमानती मुचलके पर छोड़ दिया गया. गुलाबो के बेटे भवानी सपेरे का पुलिस ने 2 दिनों का रिमांड लिया, ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. बाद में उसे भी जेल भेज दिया गया. पुलिस को गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि रेव पार्टी का आयोजन गुलाबो के बेटे भवानी ने किया था. यह पार्टी भवानी के दोस्त ऋषि कौशिक ने अपने जन्मदिन की आड़ में आयोजित की थी. पकड़े गए युवक भवानी और ऋषि के जानकार थे. पुलिस के सामने यह बात भी आई कि पार्टी में आए युवाओं को भवानी ने ही स्मैक, गांजा सहित अन्य नशीले पदार्थ उपलब्ध कराए थे. पुलिस को इस फार्महाउस पर पहले भी इस तरह की पार्टियां आयोजित होने की बातें पता चली है.

भवानी की गिरफ्तारी पर पुलिस ने पुष्टि करने के लिए गुलाबो को फोन किया. गुलाबो ने पुलिस को बताया कि वह अपने भाई को राखी बांधने के लिए पुष्कर गई थी. इसी दौरान उस के बेटे भवानी का फोन आया था. उस ने कहा था कि वह रात को अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में जाएगा. इस पर गुलाबो ने भवानी को रात में जल्दी घर पहुंचने की ताकीद की थी. गुलाबो का कहना है कि भवानी ने उस से झूठ बोला और गलत गतिविधि में पकड़ा गया. अगर उस ने गलती की है तो उसे सजा मिलनी चाहिए.

बेटे भवानी के इस तरह अपने ही फार्महाउस पर आयोजित रेव पार्टी में पकड़े जाने से गुलाबो को बड़ा झटका लगा. झटका इसलिए कि उस ने जीवन भर अपनी कला और मेहनत के बल पर दुनिया में जो नाम और शोहरत हासिल की थी, वह सब बेटे भवानी ने एक ही दिन में मिट्टी में मिला दी थी. बेटे की करतूतों पर गुलाबो की परेशानी स्वाभाविक ही थी. राजस्थान के कालबेलिया समुदाय में सन 1960 में जन्मी गुलाबो अपने मातापिता की सातवीं संतान थी. गुलाबो का असली नाम धनवंतरि है. गुलाबो नाम उस के पिता ने दिया था. जन्म के एक घंटे बाद ही परिजनों ने उसे दुत्कार दिया था, लेकिन परिवार की ही एक बेऔलाद आंटी ने उसे गोद ले लिया था. गुलाबो का बचपन मातापिता की उपेक्षा और आर्थिक तंगी में गुजरा.

सपेरा परिवार से होने के कारण गुलाबो सांपों के बीच खेलतीकूदती हुई बड़ी हुई. कई बार उस ने सांपों का जूठा दूध पी कर अपनी भूख मिटाई. घरपरिवार में सांप व बीन रहती थी, इसलिए वह 2 साल की उम्र से ही बीन की धुन पर डांस करने लगी थी. जैसेजैसे वह बड़ी होती गई, उस के सपेरा नृत्य में निखार आता गया. डांस में अपने शारीरिक लोच के कारण वह बचपन से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगी थी. 12 साल की उम्र में गुलाबो ने अजमेर जिले के पुष्कर में आयोजित ऊंट महोत्सव में पहली बार हजारों देसीविदेशी पर्यटकों के सामने कालबेलिया नृत्य की अपनी कला का प्रदर्शन किया.

राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से किए गए काफी प्रयासों के बाद गुलाबो के घर वालों ने उसे स्टेज पर परफौरमेंस की अनुमति दी थी. गुलाबो के घर वालों का कहना था कि कालबेलिया समाज के लोग स्टेज पर परफौरमेंस नहीं करते. गुलाबो ने पुष्कर में अपनी नृत्यकला दिखाने के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वह पुष्कर से जयपुर, फिर दिल्ली और इस के बाद दुनिया के तमाम बड़े देशों में अपने डांस का जादू बिखेरती चली गई. इसी दौरान सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने विदेशों में भारत की अच्छी छवि बनाने के लिए फेस्टिवल औफ इंडिया सीरीज शुरू कराई.

इसी सीरीज में अपने नृत्य के बल पर गुलाबो ने राजीव गांधी और सोनिया गांधी का दिल जीत लिया. इस के बाद से राजीव गांधी गुलाबो को अपनी बहन मानने लगे थे. राजीव गांधी की अकाल मौत के बाद सोनिया गांधी ने भी गुलाबो पर स्नेह बनाए रखा. इसी दौरान गुलाबो की शादी सोहन नाथ से हो गई. सोहननाथ कालबेलिया समुदाय से नहीं था, लेकिन बाद में वह कालबेलिया समाज में कनवर्ट हो गया. शादी के बाद गुलाबो जयपुर आ कर शास्त्रीनगर में मकान बना कर रहने लगी.  दुनिया भर में डांस की परफौरमेंस से गुलाबो के पास शोहरत के साथ पैसा भी आया.

पैसा आया तो गुलाबो ने जयपुर में सीकर रोड स्थित नींदड़-जयरामपुरा रोड पर एक जमीन खरीद ली. बाद में इस जमीन को उस ने फार्महाउस के रूप में विकसित कर लिया. कालांतर में गुलाबो के 5 बच्चे हुए. गुलाबो रियलिटी शो बिग बौस के पांचवें सत्र की प्रतिभागी भी रह चुकी है. फिल्म अभिनेता संजय दत्त की मेजबानी वाला यह सीजन 2 अक्तूबर, 2011 से 7 जनवरी, 2012 तक प्रसारित किया गया था. इस सीजन के दिवाली स्पैशल एपिसोड की शुरुआत अभिनेता सलमान खान की मेजबानी से हुई थी. इस सत्र की विजेता अभिनेत्री जूही परमार रही थीं.

गुलाबो आज राजस्थान ही नहीं, भारतीय कला संस्कृति की रोल मौडल है. वह इंटरनेशनल कल्चर एवं म्यूजिक सर्किट का एक हिस्सा है. इतना ही नहीं, वह कई फिल्मों में मशहूर अभिनेताओं के साथ अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन भी कर चुकी है. पिछले दिनों गुलाबो ने राजस्थान के चर्चित भंवरी केस पर बनी फिल्म में एक आइटम नंबर भी किया था. इस आइटम नंबर में गुलाबो के साथ उस की 3 बेटियों ने भी अपनी नृत्य कला दिखाई है. गुलाबो हर साल डेनमार्क के कोपेनहेगन में बच्चों को डांस का प्रशिक्षण देने जाती है.

गुलाबो के डांस में बिजली जैसी तेजी और शरीर में गजब की लचक है. सलमासितारों से जड़े काले लहंगे पर कांचली कुर्ती और ओढ़नी ओढ़ कर गुलाबो जब संगीत की धुन पर फिरकी की तरह तेजी से घूमते हुए कालबेलिया डांस करती है तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. गुलाबो कालबेलिया डांस का प्रशिक्षण स्कूल खोलना चाहती है, लेकिन फिलहाल बेटे भवानी की करतूत से उसे गहरा झटका लगा है. इस से उबरने में उसे समय लगेगा. True Crime Story

Crime Story: बड़े लोगों के बड़े बडें राज

Crime Story: शीना बोरा के कत्ल की कहानी तमाम रहस्यों में उलझी हुई है. कुछ रहस्य सुलझ गए हैं तो कुछ सुलझ जाएंगे. लेकिन यह रहस्य शायद ही सुलझ पाए कि इतने धनाढ्य और नामीगिरामी परिवार की होते हुए भी इंद्राणी मुखर्जी ने ऐसा क्यों किया? दौलत के लिए तो यह हो नहीं सकता, क्योंकि दौलत तो उन के कदम चूमती थी. फिर क्या रहस्य था शीना की हत्या का?

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया को मुंबई में अवैध हथियारों की खरीदफरोख्त से जुड़ी एक गुप्त सूचना मिली थी. इस संबंध में अपराधियों की धरपकड़ करतेकरते एक ऐसा कार ड्राइवर पुलिस के हत्थे चढ़ा, जिस से 7.66 एमएम की एक पिस्टल बरामद हुई. बरामद पिस्टल की मिल्कीयत की बाबत वह कोई सबूत पेश नहीं कर सका, न ही उस के पास हथियार रखने का कोई लाइसेंस था. उस का कहना था कि वह पिस्टल उसे एक जगह लावारिस पड़ा मिला था. पुलिस ने उस से सघन पूछताछ की. इस पूछताछ में की गई सख्ती उस से बरदाश्त नहीं हुई तो उस ने एक ऐसे सनसनीखेज अपराध का खुलासा कर दिया, जिस के बारे में सुनते ही पुलिस वालों के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

उस ड्राइवर का नाम था श्यामवर राय. पुलिस द्वारा उस के अन्य अपराधों के बारे में पूछे जाने पर श्यामवर राय ने बताया कि उस ने कभी कोई अपराध नहीं किया. अलबत्ता कत्ल के एक मामले में अपनी मालकिन को सहयोग जरूर दिया था. श्यामवर राय ने पूछताछ में जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिस दुविधा में पड़ गई, वजह यह थी कि वह एक निहायत संगीन अपराध था और एक जानीमानी हस्ती से जुड़ा था. वह जिस कत्ल के बारे में पुलिस को बता रहा था, उस में मुख्य रूप से एक ऐसी औरत का हाथ था, जो न केवल मीडिया जगत की जानीमानी हस्ती थी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खासा रुतबा रखती थी.

सन 2008 में उस का नाम दुनिया की 50 पावरफुल महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था. इस के अलावा भी उस के नाम के साथ अन्य कई उपाधियां जुड़ी थीं. पूछताछ में ड्राइवर श्यामवर राय ने सीधेसीधे बताया कि उस महिला ने एक अन्य आदमी के साथ मिल कर अपनी छोटी बहन को मौत के घाट उतारा था और उस का शव रायगढ़ के जंगल में ले जा कर जला दिया था. बाद में उसे वहीं दफन कर दिया गया था. लेकिन बिना पर्याप्त सबूतों के उस महिला पर हाथ डालना आसान नहीं था. वैसे भी यह बात 3 साल से ज्यादा पुरानी थी.

महाराष्ट्र पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी राकेश मारिया अपनी योग्यता और आपराधिक केसों को प्रोफेशनल तरीके से हल कर के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए जाने जाते रहे हैं. इस का एक कारण यह भी रहा कि कोई भी आपराधिक मामला हल करने में उन्होंने कभी हड़बड़ी या जल्दबाजी नहीं की. वांछित अपराधी पर भी उन्होंने तभी हाथ डाला, जब उस के खिलाफ पर्याप्त सबूत हाथों में आ गए. इस केस में तो आरोपी का कद इतना बड़ा था कि बिना सही सबूतों के उस पर हाथ डालने का मतलब था, अपनी नौकरी से हाथ धोना. इसलिए राकेश मारिया ने एकएक कदम फूंकफूंक कर रखने का फैसला किया.

राकेश मारिया 30 सितंबर, 2015 को पुलिस कमिश्नर पद से मुक्त होने जा रहे थे. इसलिए वह चाहते थे कि मुंबई पुलिस कमिश्नर पद के बचेखुचे दिन बिना किसी दागधब्बे के अमनचैन से निकल जाएं. यह केस फूलप्रूफ तरीके से हल करने के लिए मारिया ने डीसीपी धनंजय कुलकर्णी के अलावा कुछ अन्य काबिल अफसरों और पुलिस कर्मचारियों की टीम बनाई. यह टीम मामले की तह में जा कर दोषियों के खिलाफ सबूत जुटाने में जुट गई. मारिया पलपल की खबर रख रहे थे. इस काम में उन्हें 3 महीने तो लगे, लेकिन उन्होंने कत्ल का केस हल करने के लिए वांछित सबूत जुटा लिए.

मीडिया जगत की जानीमानी हस्ती पीटर मुखर्जी ने सन 1993 से 2007 तक स्टार इंडिया के साथ काम किया था. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘सास भी कभी बहू थी’ जैसे सीरियल को अस्तित्व में लाने का श्रेय उन्हें भी दिया गया था. यह केस पीटर मुखर्जी की पत्नी इंद्राणी मुखर्जी से ही जुड़ा था. दरअसल, इंद्राणी बोरा पहले मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज में बतौर एचआर कंसल्टेंट काम करती थी. वह निहायत ही खूबसूरत औरत थी. कहते हैं कि एक कौकटेल पार्टी में किसी ने पीटर और इंद्राणी का परिचय करवाया तो इंद्राणी ने बेतकल्लुफी से पीटर के गले लगते हुए कहा कि वह उन्हें न केवल पहले से जानती है, बल्कि एक सफल आदमी के रूप में उन्हें पसंद भी करती है.

इंद्राणी के बात करने के खुले लहजे और उस की खूबसूरती ने पीटर का मन कुछ इस तरह मोह लिया कि वह उसे पाने के लिए लालायित हो उठे. पीटर किसी अन्य औरत के साथ पार्टी में आए थे, जिसे वहीं छोड़ कर वह इंद्राणी के साथ चले गए. इस के बाद तो जैसे दोनों लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे. बाद में नवंबर, 2002 में दोनों ने शादी कर ली. उस समय पीटर 46 साल के तलाकशुदा अधेड़ थे, जबकि इंद्राणी 30 साल की थी यानी पीटर से 16 साल छोटी.

इंद्राणी ने पीटर से खुद को सिंगल मदर बता कर कहा था कि उस ने अपने आत्मसम्मान की वजह से अपने अभिभावकों से रिश्ता तोड़ रखा है. पीटर के कहने पर इंद्राणी अपनी 5 साल की बेटी विधि को भी घर में ले आई, जिसे पीटर ने विधिवत अपनी दत्तक पुत्री बना लिया. सन 2007 में जब पीटर ने स्टार को छोड़ा तो यह कंपनी स्टार इंडिया, स्टार ग्रुप और स्टार एंटरटेन इंडिया नाम की 3 कंपनियों में बंट गई. पीटर मुखर्जी को स्टार ग्रुप का सीईओ बनाया गया और एंटरटेन इंडिया का सीईओ बनाया गया समीर नायर को. इस बीच पीटर व इंद्राणी ने मिल कर आईएनएक्स मीडिया कंपनी की स्थापना कर ली थी. दरअसल यह कदम इंद्राणी के लिए ही उठाया गया था.

हकीकत में शादी के बाद धीरेधीरे इंद्राणी ने पीटर मुखर्जी की जिंदगी पर पूरी तरह कब्जा कर लिया था. उस की जिस्मानी मादकता में खोए पीटर भी उसी के इशारों पर नाच रहे थे. पीटर के स्टार ग्रुप छोड़ने से 1 साल पहले ही इंद्राणी ने विधिवत आईएनएक्स कंपनी की चेयरपरसन का काम संभाल लिया था. साथ ही उस ने अन्य कई चैनल भी लांच करने की योजना बनानी शुरू कर दी थी. पीटर और इंद्राणी ने आईएनएक्स कंपनी को बड़े पैमाने पर लांच करने की बात कह कर देशविदेश की विज्ञापन कंपनियों से अपार धन एकत्र किया. देखतेदेखते ये लोग 800 करोड़ की संपत्ति के मालिक बन गए. मीडिया जगत में दोनों का खूब रुतबा तो था ही.

चेयरपरसन होने के नाते चूंकि इंद्राणी ही कंपनी का सारा काम देख रही थी, इसलिए उसे तमाम अवार्ड भी मिले और उस की पर्सनैलिटी पर लेखफीचर भी छपने लगे. कई बार टीवी पर भी उस के इंटरव्यू आए. इंद्राणी कुछ तो कुदरतन खूबसूरत थी, कुछ वह खूब बनठन कर रहा करती थी. फलस्वरूप पार्टियों में उस के व्यक्तित्व का अलग ही आकर्षण होता था. वह सब से खुल कर बातें करने में भी परहेज नहीं करती थी. साथ ही वह डांस भी बहुत अच्छा किया करती थी. यहां तक कि कभीकभी वह गीत वगैरह सुना कर भी महफिल में रंग जमा देती थी.

इत्तफाकन अगर वह किसी पार्टी में न पहुंच पाती तो अन्य लोग सब से ज्यादा उसी के बारे में पूछताछ करते थे. वैसे भी उस के बारे में यह बात मशहूर थी कि जिंदगी को सही मायनों में जीना है तो इस का गुर इंद्राणी मुखर्जी से सीखो. मुखर्जी परिवार संपन्न परिवार था. उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. पैसा तो जैसे इस परिवार के आंगन में बरसता था. सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था. तभी अचानक एक दिन एक लड़की शीना बोरा और लड़का मिखाइल पूछतेपूछते मुखर्जी परिवार के घर आ पहुंचे. उन दोनों को देख कर इंद्राणी पहले तो चौंकी, फिर उस ने पीटर को बताया कि ये दोनों उस के छोटे भाईबहन हैं.

यह जान कर पीटर ने उन दोनों की काफी आवभगत की और उन्हें अपने साथ ही रहने को कहा. इंद्राणी ने उन के रहने की अलग व्यवस्था करवा दी. सन 2010 में पीटर व इंद्राणी कुछ समय के लिए इंग्लैंड चले गए. वापस लौट कर वे फिर से अपनी खुशहाल जिंदगी में रम गए. इंद्राणी ने अपने भाईबहन की बात करना पहले ही बंद कर दिया था. पीटर मुखर्जी ने एकाध बार पूछा तो उस ने बताया कि मिखाइल अपना कारोबार जमाने में व्यस्त हो गया है, जबकि शीना को अमेरिका में अच्छी नौकरी मिल गई है. पीटर पत्नी की हर बात पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे. इस बार भी उन्हें इंद्राणी की बात पर कोई संदेह नहीं हुआ.

वक्त अपनी रफ्तार से गुजर रहा था कि अचानक एक रोज…

उस दिन अगस्त, 2015 की 26 तारीख थी. पीटर मुखर्जी अपनी पत्नी इंद्राणी के साथ वरली स्थित अपने निवास पर थे. सुबह का वक्त था. डोरबेल बजने पर घर के नौकर ने दरवाजा खोला तो सामने मुंबई पुलिस खड़ी थी. इंद्राणी को बुला कर एक महिला सबइंसपेक्टर ने आगे आ कर कहा, ‘‘मैडम, हमारे अफसरों को किसी केस के सिलसिले में आप से बात करनी है. कृपया आप हमारे साथ अभी थाने चलें.’’

इंद्राणी मुखर्जी मीडिया जगत से जुड़ी एक बड़ी हस्ती थी. वह पता नहीं कितने पुलिस अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों से अकसर मिला करती थी. वे तमाम लोग उसे निजी रूप से जानते थे. इसलिए इंद्राणी के लिए आम लोगों की तरह पुलिस से भयभीत होने जैसा कुछ नहीं था. वह बेझिझक बेपरवाह पुलिस की गाड़ी में बैठ कर उन के साथ चली गई. थाना खार में पहुंच कर उसे बताया गया कि उसे उस की बहन शीना बोरा के कत्ल और उस की लाश को खुर्दबुर्द करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. इस संबंध में उस के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 (हत्या) व 201 (सबूत नष्ट करने) के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया जा चुका है.

इस के साथ ही पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के बारे में उस के पति पीटर मुखर्जी को भी सूचित कर दिया. पीटर मुखर्जी यह सुन कर अचंभित रह गए कि शीना का कत्ल कर दिया गया है और इस का इलजाम इंद्राणी पर है. उन्होंने कहा कि इंद्राणी ने अगर वाकई ऐसा किया है तो उस ने निहायत ही घिनौना काम किया है. इस के बावजूद उन्होंने पत्नी की मदद के लिए वकीलों का इंतजाम कर दिया.  पुलिस थाना खार में थोड़ीबहुत मनोवैज्ञानिक पूछताछ करने के बाद उसी रोज कस्टडी रिमांड के लिए इंद्राणी को बांद्रा स्थित मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया.

इंद्राणी की ओर से महानगर के 2 जानेमाने वकीलों ने उस के बचाव में अदालत में पेश हो कर कहा कि उन की मुवक्किला को झूठे केस में फंसाया जा रहा है. किसी ने अगर शीना का कत्ल कर दिया था तो इस में इंद्राणी मुखर्जी का क्या कसूर? वकीलों का कहना था कि इस मामले में पुलिस के पास उन की संलिप्तता का कोई प्रमाण नहीं है. वैसे भी वह मीडिया जगत की एक सम्मानित महिला हैं न कि कोई पेशेवर अपराधी. इसलिए अदालत को उसे पुलिस रिमांड में न दे कर तुरंत जमानत पर रिहा कर देना चाहिए.

माननीय दंडाधिकारी ने इंद्राणी के वकीलों की दलील सुनने के साथसाथ पुलिस का पक्ष भी सुना और उन के द्वारा पेश किए गए तथ्यों को भी जांचापरखा. इस के बाद अदालत ने पुलिस को इंद्राणी का रिमांड दे दिया. पुलिस ने इंद्राणी मुखर्जी को 5 दिनों तक कस्टडी रिमांड में रख कर शीना बोरा की हत्या के बारे में पूछताछ की. लेकिन इंद्राणी भी कम नहीं थी. पुलिस के तमाम हथकंडों के आगे न तो वह झुकी और न ही डरी. अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को मानने से उस ने साफ इनकार कर दिया. वह पुलिस को यही समझाने का प्रयास करती रही कि शीना मरी नहीं, अमेरिका में नौकरी कर रही है. हां, पिछले कुछ अरसे से वह उस के संपर्क में नहीं है, न ही उस के पास उस का कौंटेक्ट नंबर या पता वगैरह है.

इंद्राणी द्वारा पुलिस को बताए अनुसार, किसी बात पर शीना से उस की बहस हो गई थी, जिस से नाराज हो कर वह 3 साल पहले अमेरिका चली गई थी. वहीं से उस ने एक बार फोन कर के बताया था कि अमेरिका में उसे बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है, इसलिए अब वह दोबारा कभी उस के पास इंडिया नहीं आएगी. इंद्राणी आसानी से काबू में नहीं आ रही थी. वह एक ही रट लगाए हुए थी कि इस केस में उस के किसी दुश्मन के कहने पर उसे गलत तरीके से फंसाया जा रहा है. इंद्राणी से उस का अपराध कबूल करवाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था.

दूसरा कोई चारा न देख पुलिस ने ड्राइवर श्यामवर राय को ला कर उस के सामने खड़ा कर दिया. वह पहले ही से कस्टडी रिमांड में चल रहा था. उसे सामने देख इंद्राणी को कंपकंपी छूट गई. पुलिस के मुताबिक इस के बाद इंद्राणी ने शीना की हत्या करने की बात कबूल करते हुए कई राज खोले. पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने उसी दिन पत्रकारों को बताया कि शीना असलियत में इंद्राणी की बहन न हो कर बेटी थी. जुलाई, 2012 में जब वह 22 वर्ष की थी, उस की हत्या कर दी गई. अपनी ही बेटी के कत्ल का तानाबाना इंद्राणी ने खुद ही बुना था. शीना को ब्रांदा से सूमो गाड़ी पर अपहृत कर के मुंबई के दूरवर्ती इलाके रायगढ़ में एक सुनसान जगह पर ले जाया गया.

गाड़ी में शीना और इंद्राणी के अलावा ड्राइवर श्यामवर राय व संजीव खन्ना नामक शख्स थे. ड्राइवर ने इंद्राणी मुखर्जी के मुंह से इस शख्स का नाम सुन लिया था, मगर उसे यह नहीं मालूम हो पाया था कि दोनों का आपस में रिश्ता क्या था. बकौल पुलिस आयुक्त मारिया इंद्राणी ने पूछताछ में बताया कि उस ने शीना को रायगढ़ के फार्महाउस में होने वाली पार्टी में शामिल होने के बहाने से बुलाया था. शीना की हत्या मुंबई से दूर खोपोली सड़क मार्ग पर एक सुनसान जगह पर गला दबा कर की गई, फिर रायगढ़ के जंगल में पैट्रोल छिड़क कर शव को न केवल जलाया गया, बल्कि उसे वहीं गड्ढा खोद कर दफन भी कर दिया गया.

पुलिस कमिश्नर का यह बयान मीडिया के जरिए लोगों के सामने आया तो पूरे देश की नजरें इसी खबर पर टिक गईं. यह मुंबई महानगर का हाईप्रोफाइल केस था, जो अनैतिक संबंध, रिश्तों में धोखे और पैसों के लालच में उलझी किसी थ्रिलर स्टोरी की तरह सामने आता दिखाई दे रहा था. 27 अगस्त को पुलिस ने संजीव खन्ना को गिरफ्तार कर लिया. पता चला वह इंद्राणी का पूर्व पति था. खन्ना से की गई पूछताछ में पता चला कि उस की और इंद्राणी की मुलाकात 1980 के दशक में मेघालय की राजधानी शिलांग में तब हुई थी, जब इंद्राणी हायर एजुकेशन के सिलसिले में वहां रह रही थी.

पूछताछ में संजीव खन्ना ने पुलिस को बताया कि इंद्राणी के पिता एक बड़े कारोबारी थे. उस से उन का परिचय गुवाहाटी में अपना कारोबार जमाते समय हुआ था. इस संबंध में उन्होंने खन्ना की काफी मदद की थी. उन की बेटी इंद्राणी से खन्ना का इस से पहले ही परिचय हो चुका था, जो वक्त के साथ प्रेम में बदल गया था. बाद में दोनों ने आपस में शादी कर ली थी. इसी बीच मिखाइल ने पुलिस को यह बयान दे कर चौंका दिया कि वह इंद्राणी मुखर्जी का भाई नहीं, बल्कि बेटा है. अलबत्ता वह अपने पिता का नाम नहीं बता पाया. फिर भी उस ने यह बात पूरा जोर दे कर कही कि निश्चित रूप से उस की बहन शीना की हत्या हुई है, लेकिन इस संबंध में कुछ सनसनीखेज खुलासे वह तब करेगा, जब मुंबई पुलिस इस केस की अपनी छानबीन पूरी कर लेगी.

पुलिस के हवाले से यह बात भी सामने आई कि शीना के संबंध पीटर मुखर्जी की पहली पत्नी शबनम से पैदा बेटे राहुल मुखर्जी के साथ थे और दोनों शादी करना चाहते थे. यह बात सामने आने पर पीटर मुखर्जी ने अफसोस जाहिर करते हुए केवल इतना ही कहा कि वह सोच भी नहीं सकते थे कि उन के परिवार में इतना कुछ घट जाएगा और उन्हें पता भी नहीं चलेगा. इंद्राणी के बारे में भी अब तक यह तथ्य सामने आ गया था कि उस ने खुद को सिंगल मदर बता कर जब पीटर मुखर्जी से शादी की थी तो एक नहीं, कई झूठ बोले थे. उन में सब से बड़ा झूठ तो यही था कि उस ने अपनी औलादों मिखाइल व शीना को बेटाबेटी की जगह अपना भाईबहन बताया था.

अब यह बात भी सामने आई कि पीटर मुखर्जी से पहले भी इंद्राणी 2 शादियां कर चुकी थी. उस के पहले पति का नाम था सिद्धार्थ दास, जबकि संजीव खन्ना उस का दूसरा पति था. सिद्धार्थ से उसे बेटी शीना व बेटा मिखाइल पैदा हुए थे और संजीव खन्ना से बेटी विधि, जिसे पीटर मुखर्जी ने दत्तक पुत्री बना लिया था. रहस्यों से भरी किसी फिल्म की तरह पीटर के सामने नईनई बातें आ रही थीं. मीडिया के लोग उन से असलियत जानने को उन के घर के चक्कर लगाने लगे. आखिर परेशान हो कर पीटर को अपना बयान जारी करना पड़ा, ‘मैं पूरी तरह सदमे में हूं. अब तक मैं शीना को इंद्राणी की बहन मानता आया था और मिखाइल को उस का भाई. अब पता चल रहा है कि दोनों उस की अपनी औलाद थे.

‘शीना जब भारत नहीं आ रही थी तो मेरे बेटे राहुल ने मुझ से कहा था कि पापा कुछ गड़बड़ है. उस ने एक बार मुझे यह बताने की कोशिश भी की थी कि शीना असल में इंद्राणी की बेटी हो सकती है. लेकिन मैं ने उस की बात को खारिज कर दिया था. दूसरों की जिंदगी से जुड़ी सनसनीखेज कहानियां सुनना और पढ़ना जितना खुशगवार लगता है, उतना ही मुश्किल होता है अपने जीवन में इस तरह की कहानी से रूबरू होना.’

इस बीच पुलिस ने श्यामवर की निशानदेही पर रायगढ़ के जंगल से बरामद शीना की हड्डियों को मुंबई के जेजे अस्पताल में सुरक्षित रखवा दिया था. श्यामवर राय के अनुसार शीना की हत्या के बाद इंद्राणी मुखर्जी व संजीव खन्ना ने उसे चुप रहने के लिए बहुत बुरी तरह से धमकाया था, साथ ही मुंह बंद रखने के लिए उसे 50 हजार रुपए भी दिए थे.

पुलिस प्रवक्ता के अनुसार, श्यामवर राय इस अपराध में सीधे तौर पर शामिल नहीं था. इंद्राणी मुखर्जी का वह निजी ड्राइवर था. वह उस के दबंग स्वभाव से अच्छी तरह परिचित था. साथ ही वह यह भी जानता था कि इंद्राणी के बहुत ऊंचे संबंध थे, जिन के चलते वह किसी के खिलाफ कुछ भी करवा सकती थी. उस ने पुलिस को बताया कि उस की मालकिन अपने पति पीटर मुखर्जी को भी जूती की नोक पर रखती थी और उन्हें जराजरा सी बात पर बुरी तरह लताड़ देती थी. घर में एक तरह से इंद्राणी मुखर्जी का ही एकछत्र राज था. इन्हीं वजहों से श्यामवर राय अपनी मालकिन से बहुत डरता था. हालांकि शीना की हत्या के बाद उस का कई बार मन हुआ कि वह इस बारे में पुलिस को बता दे.

लेकिन वह इंद्राणी मुखर्जी के खिलाफ जाने का साहस कभी नहीं जुटा पाया. अब जबकि इंद्राणी मुखर्जी व संजीव खन्ना खुद सलाखों के पीछे हैं तो श्यामवर पुलिस संरक्षण में पूरी तरह इन के खिलाफ खड़ा हो गया था. वैसे भी उन के खिलाफ खड़े होने में ही उस की भलाई थी. संजीव खन्ना कोलकाता में केबल नेटवर्क का कारोबार करता था. उस के पास फाइनैंस का ज्यादा इंतजाम नहीं था और उस का बिजनैस भी घाटे में जा रहा था. 24 अप्रैल, 2012 को शीना के मर्डर के बाद एकदम से उस के खाते में इतनी बड़ी रकम आ गई थी कि रातोंरात उस ने अपने डूबते कारोबार को संभाल लिया था.

इस के साथ ही उस ने कोलकाता के चौरंगी लेन क्षेत्र में 1500 वर्गफुट के एरिया में  ‘1658 बार ऐंड किचन’ नाम से नया काम भी शुरू कर दिया था. इस काम में उस का एक पार्टनर भी था अजय रावला, जो उस की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत हो गया था. इस के अलावा भी खन्ना ने पश्चिम बंगाल के बावाली शहर में अपना एक हेरिटेज रिजौर्ट बना रखा था. हालांकि यह बात पूरी तरह साफ थी कि खन्ना के पास अचानक इतनी बड़ी धनराशि कहां से आ गई थी कि उस ने अपना डूबता हुआ कारोबार संभालने के साथसाथ नए काम भी शुरू कर दिए थे. लेकिन पुलिस इस बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थी. सिवाय इस के कि शीना की हत्या में संजीव खन्ना भी उतना ही कसूरवार था, जितना कि इंद्राणी मुखर्जी.

शीना मर्डर केस की जांच आगे तो बढ़ रही थी, लेकिन बुरी तरह उलझीउलझी सी स्थिति में. यहां तक कि हत्या का मकसद तक साफ रूप से सामने नहीं आ रहा था. सही परिणाम सामने आते न देख 27 अगस्त, 2015 को पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने इस केस की जांच का जिम्मा पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने थाने में बैठ कर केस के तीनों अभियुक्तों से खुद पूछताछ की. साथ ही उन्होंने इंद्राणी मुखर्जी के सौतेले बेटे राहुल मुखर्जी को भी वहां बुलवा लिया था. उस से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में संजीव खन्ना ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि जब अपराध हुआ, तब वह अपने किसी काम से मुंबई आया था. यहां आ कर वह इंद्राणी के कहने पर उस की कार में बैठ गया था और कार चलते ही वह सो गया था. उसे नहीं मालूम कि उस की नींद के दौरान कार में या कार के बाहर क्या हुआ.

संजीव खन्ना ने पुलिस कमिश्नर मारिया को बताया, ‘‘सर, मेरी व इंद्राणी की बेटी विधि अमेरिका में पढ़ रही है. विधि को पीटर मुखर्जी ने गोद ले रखा है. शीना का पीटर के बेटे राहुल से अफेयर था. दोनों लिवइन रिलेशनशिप में भी रहे थे. इसे ले कर इंद्राणी शीना से बहुत नाराज थी. सो उस ने अपने ड्राइवर से मिल कर शीना की हत्या कर दी.’’

लेकिन पुलिस के थोड़ा सख्ती करते ही उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने मकसद के बारे में बताया कि विधि इंद्राणी की बेटी थी और शीना भी उसी की बेटी निकल आई थी. ऐसी स्थिति में उस के न रहने से इंद्राणी की प्रौपर्टी में उस का हिस्सा विधि को मिल जाता. राहुल मुखर्जी से एक घंटा पूछताछ करने के बाद उसे वापस घर भेज दिया गया था. 12 घंटे बाद उसे फिर से पूछताछ के लिए थाना खार में बुलवाया गया. पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने उस से खुद सवाल किए. दरअसल वह जानना चाहते थे कि एक बरस से अधिक तक शीना के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद वह एकाएक उस की ओर से बेफिक्र क्यों हो गया था? उस ने इस संबंध में पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई?

राहुल को वरली व खार के उन फ्लैटों में भी ले जाया गया, जहां शीना और वह साथसाथ रहे थे. शीना का भाई मिखाइल अभी तक चुप था, अब उस ने भी टीवी पर आ कर सीधेसीधे साफ कहना शुरू कर दिया कि उस के पास ऐसे पक्के सबूत हैं, जो इंद्राणी मुखर्जी को शीना का कातिल करार देने के लिए काफी हैं. मिखाइल गुवाहाटी में रहता था. पुलिस ने वहां पहुंच कर उस से पूछताछ की. उस ने कुछ टेप व फोटो वगैरह पुलिस को दिए. साथ ही अपना बयान दर्ज करवाने के अलावा यह भी बताया कि शीना के साथसाथ इंद्राणी उसे भी मार देना चाहती थी. इतना ही नहीं, अभी भी उसे उस की ओर से जान का खतरा है.

मिखाइल ने पुलिस को शीना का बर्थ सर्टिफिकेट भी दिया, जिस पर उस के मातापिता के नाम वाले कौलम में उस के नानानानी उपेंद्र कुमार बोरा व दुर्गारानी बोरा का नाम दर्ज था. शीना की जन्मतिथि थी 11 फरवरी, 1989. मिखाइल उस से बड़ा था, उस के अभिभावक भी उस के नानानानी ही थे. बरसों पहले शीना को जन्म देने के बाद इंद्राणी ने शीना और मिखाइल को अपने मातापिता के पास छोड़ कर सिद्धार्थ दास से शादी कर ली थी. अभी तक सब को यही पता था कि पीटर मुखर्जी ही इंद्राणी के पति थे. अब यह बात सामने आई कि पीटर से पहले उस ने संजीव खन्ना से शादी की थी, जिस से शादी के बाद उस ने बेटी विधि को जन्म दिया था. संजीव से पहले उस ने सिद्धार्थ दास से शादी की थी.

इंद्राणी का आचरण बेहद उलझा हुआ था, पुलिस ने फिलहाल इसी को खंगालने की सोची. देखा जाए तो इंद्राणी का पूरा जीवन अय्याशी, मक्कारी और झूठी महत्त्वाकांक्षाओं से भरा था. वह जिंदगी में सब कुछ हासिल करने के लिए ऊंची से ऊंची उड़ान भरना चाहती थी, जिस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहती थी. जहां जरा सा फायदा नजर आया, वहां उस ने अपना जिस्म दांव पर लगाने में भी झिझक नहीं की.  वैसे इंद्राणी का मूल नाम था परी. अपने मांबाप की एकलौती संतान थी वह. परी के पिता का पहले अच्छाभला कारोबार था, जिस के घाटे में चले जाने की वजह से वह कुंठित हो गए थे. पत्नी से भी अनबन रहने लगी थी.

औलाद के रूप में उन के यहां एक बेटी ही थी परी, जिस पर गुस्सा उतारने के लिए वह उसे जराजरा सी बात पर पीटने लगते थे. कई बार तो उसे मारपीट कर कमरे में बंद कर दिया जाता था. एक बार परेशानी की हालत में वह घर से भाग गई. लेकिन स्टेशन पर गाड़ी में बैठने से पहले ही वह पिता द्वारा पकड़ ली गई. उस रोज उस की इतनी पिटाई हुई कि वह 2 बार तो बेहोश हो गई. बहरहाल, जैसेतैसे परी ने स्कूली शिक्षा पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए उसे शिलांग भेज दिया गया, जहां उस के कदम बहके और 1988 में उस ने महज 17 साल की उम्र में कुंवारी मां के रूप में मिखाइल को जन्म दिया. फिर 1989 में शीना पैदा हो गई. इस के बाद दोनों बच्चों को अपने मांबाप की गोद में डाल कर वह अपनी खुद की बनाई राह पर निकल पड़ी. इस नई राह पर उस ने अपना नाम रखा इंद्राणी.

इंद्राणी ने सब से पहले शादी की अपने से दोगुनी उम्र के वकील से, जो ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई. इस के बाद शिलांग में उस की मुलाकात सिद्धार्थ दास से हुई. दोनों ने विवाह भी किया, लेकिन कुछ ही दिनों में दोनों का तलाक हो गया. फिर वापस गुवाहाटी पहुंच कर उस ने साहिल नाम के लड़के से प्रेम विवाह किया. उस के साथ भी इंद्राणी का रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया. उस ने मामूली सी अनबन पर उसे भी तलाक दे दिया. तदनंतर गुवाहाटी से कोलकाता आ कर इंद्राणी ने एक निजी फर्म में काम किया, जहां उस की मुलाकात कारोबारी संजीव खन्ना से हुई. खन्ना को अपने प्रेमजाल में फंसा कर इंद्राणी ने उस से शादी कर ली, जिस से उसे बेटी विधि पैदा हुई.

खन्ना के साथ भी उस की शादी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई. अंतत: उस ने संजीव खन्ना को भी तलाक दे दिया और नन्हीं विधि को ले कर मुंबई चली आई. मुंबई में इंद्राणी को अच्छी नौकरी मिली तो नए पति के रूप में पीटर मुखर्जी भी मिल गए. अब उस के लिए आसमान को छूने के रास्ते खुल गए थे. स्टार पति के साथ वह खुद भी स्टार बन गई थी. हालांकि इंद्राणी की कारगुजारियों के चलते पीटर भी बदनाम होने लगे थे. खैर, पुलिस की निरंतर पूछताछ अभी भी जारी थी. इस बार की पूछताछ में इस बात का सनसनीखेज खुलासा हुआ कि कत्ल किए जाते वक्त शीना 2 माह की गर्भवती थी. इस संबंध में राहुल मुखर्जी के मामा शालीन सिंह ने देहरादून में पत्रकारों को बताया कि राहुल व शीना के रिश्ते को उन की बहन शबनम व मां सीमा सिंह ने भी मंजूरी दे दी थी.

पीटर मुखर्जी की पहली ससुराल देहरादून के बदीपुर इलाके में है, जहां उन की पहली पत्नी शबनम का गुलएशबनम नाम से फार्महाउस है. इस से कुछ ही दूरी पर उन की मां सीमा सिंह का शंकर सदन नाम से बंगला है. बकौल शालीन सिंह सन 2011 में राहुल के साथ शीना जब शबनम के फार्महाउस पर आई थी तो राहुल ने अपनी मां के सामने उस से शादी की बात रखी थी. इस पर शबनम ने अपनी मां और उन्हें सलाहमशविरे के लिए वहां बुला लिया था. शालीन सिंह के अनुसार, शीना सभी को बहुत पसंद आई थी. वैसे भी वह और राहुल पतिपत्नी की तरह रह रहे थे. इसलिए उन सब ने इस शादी के  लिए हामी भर दी थी. अगले दिन राहुल शीना को ले कर मुंबई चला गया. इस के बाद उस की कोई खबर नहीं आई थी.

पुलिस हिरासत में अपना गुनाह कबूल करते हुए संजीव खन्ना ने पुलिस से पूरा सहयोग करने की बात कहते हुए घटनास्थल पर जा कर शीना की कुछ हड्डियां बरामद करवा दीं. यहां से उस का एक दांत भी मिला. देहरादून से पुलिस ने शीना का पासपोर्ट भी बरामद कर लिया था. पुलिस ने हड्डियां, खोपड़ी व दांत वगैरह डीएनए परीक्षण के लिए सुरक्षित रख लिए थे. दरअसल इस केस में दोषियों को सजा दिलवाने के लिए अहम भूमिका फोरैंसिक प्रमाण ही निभा सकते थे. 29 अगस्त को पुलिस ने वह कार भी बरामद कर ली, जिस का इस्तेमाल शीना के मर्डर में हुआ था.

इस के बावजूद इस केस में कोई भी बात पूरी तरह खुल कर सामने नहीं आ रही थी. यही वजह थी कि लोगों को पुलिस की तफ्तीश पर जरा भी विश्वास नहीं हो पा रहा था. इसे ले कर पुलिस की किरकिरी भी हो रही थी. इसी बीच रायगढ़ के तत्कालीन एसपी आर.डी. शिंदे संदेह के घेरे में आ गए. महाराष्ट्र के डीजीपी संजीव दयाल ने बताया कि 2012 में शीना का शव मिलने पर लापरवाही बरतने वाले किसी भी पुलिसकर्मी अथवा अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा. उल्लेखनीय है कि तब रायगढ़ पुलिस ने जंगल से जला हुआ शव और सूटकेस मिलने पर न तो हत्या का कोई केस दर्ज किया था और न ही जले हुए शव का पोस्टमार्टम करवाया था.

30 अगस्त को इंद्राणी के गैरेज से ठीक वैसा ही सूटकेस मिला, जैसा कि शीना के शव के टुकड़े रखने के लिए इस्तेमाल किया गया था. पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस सूटकेस में मिखाइल की हत्या कर के उस के शव के टुकड़े रखे जाने थे. बताते चलें कि मिखाइल पहले ही यह दावा कर चुका था कि शीना से भी पहले इंद्राणी की योजना उस की हत्या करने की थी. 31 अगस्त को पुलिस रिमांड खत्म हो रहा था. अभी तक की पूछताछ से पुलिस खुद भी संतुष्ट नहीं थी. रिमांड बढ़ाने के अनुरोध के साथ इंद्राणी, संजीव व श्यामवर को फिर से बांद्रा मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पेश किया गया तो पुलिस रिमांड की अवधि 5 सितंबर, 2015 तक के लिए बढ़ा दी गई.

इस केस में हर दिन नएनए खुलासे हो रहे थे. 2 सितंबर को सिद्धार्थ दास ने कोलकाता में कुछ पत्रकारों से संपर्क कर के कहा, ‘‘शीना मर्डर केस के बारे में अखबारों और टीवी चैनलों से पता चला तो मैं सच्चाई पर पड़ा परदा उठाने को मजबूर हुआ हूं. इंद्राणी से न तो मेरी कानूनी तौर पर और न ही किसी मंदिर में शादी हुई थी. हम दोनों 1986 से 1989 तक लिवइन रिलेशनशिप में पतिपत्नी की तरह जरूर रहे थे. इसी दौरान हमारे 2 बच्चे मिखाइल और शीना पैदा हुए थे. मैं ही इन दोनों का जैविक पिता हूं. हां, इंद्राणी ने वाकई अगर शीना की हत्या की है तो निश्चित ही उसे फांसी की सजा होनी चाहिए. मैं डीएनए टेस्ट करवा कर पुलिस की हर तरह की मदद करने को तैयार हूं.’’

इसी दिन पीटर को भी पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया, जहां उन्हें देखते ही इंद्राणी रोने लगी. इन दोनों को आमनेसामने बिठा कर पुलिस ने पीटर से उन की फाइनैंशियल ट्रांजेक्शंस की जानकारी मांगी, जो उन्होंने विस्तारपूर्वक दे दी. पीटर से पुलिस ने निरंतर 12 घंटों तक पूछताछ की. पीटर के सामने इंद्राणी ने एक बार फिर हत्या का अपना जुर्म स्वीकार किया. इसी दौरान शीना की एक डायरी भी सामने आई, जिस का हर पन्ना भावुकता से भरा था. इंद्राणी के बारे में उस ने एक जगह लिखा था, ‘मुझे नहीं पता कि मां मुझे याद करती है या नहीं, लेकिन वह मेरी मां है, मैं उन्हें चाहती हूं. वह दुनिया की सब से हसीन औरत हैं, एकदम फिल्मी हीरोहन लगती हैं. लेकिन उन की फितरत ऐसी है कि मैं उन्हें डायन कहना पसंद करूंगी.’

4 सितंबर को इस केस में बड़ा खुलासा यह हुआ कि रायगढ़ से मिली खोपड़ी का मिलान शीना के फेशियल रीकंस्ट्रक्शन से हो गया. 5 तारीख को रिमांड समाप्ति पर इंद्राणी, संजीव व श्यामवर को फिर से अदालत में पेश कर के 7 सितंबर तक इन का कस्टडी रिमांड बढ़वा लिया गया. रिमांड की इस अवधि में पुलिस ने कुछ ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल किया कि शीना मर्डर केस की सारी सच्चाई पूरी तरह खुल कर सामने आ गई: दरअसल, इंद्राणी के लिए हर रिश्ता एक सीढ़ी था, जिस के सहारे वह आसमान की ऊंचाइयां छूना चाहती थी. सामने वाले को धोखा देना उस की फितरत में शुमार था.

दिल से तो वह किसी को भी पसंद नहीं करती थी, न अपने किसी प्रेमी या पति को और न ही अपनी औलादों को. उसे तो अपना मतलब निकालना आता था, इस के लिए सामने वाला उस के जिस्म को भले ही किसी भी तरह से क्यों न रौंद जाए. शायद इसीलिए संजीव खन्ना को तलाक दे दिए जाने के बावजूद उस ने उस से रिश्ता खत्म नहीं किया था. इंद्राणी द्वारा पुलिस को बताए अनुसार, वह अगर तेजतर्रार थी तो शीना भी कम नहीं थी. दोनों जब भी मिलतीं, दोनों का आपस में खूब झगड़ा होता था. मिखाइल भी हमेशा अपनी बहन का ही साथ देता था.

इंद्राणी ने पुलिस को बताया, ‘‘दरअसल, शीना मेरे कई राज जानती थी, जिन के आधार पर वह मुझे ब्लैकमेल किया करती थी. इस के बदले वह मुझ से एक बड़ा फ्लैट चाहती थी. मैं चूंकि उस से नफरत करती थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने की सोचने लगी थी. यह नफरत तब और बढ़ गई, जब शीना ने पीटर के बेटे राहुल से ताल्लुकात बढ़ा कर उस से शादी की घोषणा कर दी. जबकि एक तरह से वह उस का भाई था. यह जान कर मैं उस के प्रति नफरत से भर उठी. राहुल से उसे गर्भ भी ठहर गया था.’’

बकौल इंद्राणी उस ने शीना को खत्म करने की सोची. फिर उस के दिमाग में आया कि इस सूरत में मिखाइल आसमान सिर पर उठा लेगा. अत: इंद्राणी ने उसे भी मौत की नींद सुलाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने संजीव खन्ना को बुलवा कर उस से मिल कर अपनी खूनी योजना तैयार की. पीटर मुखर्जी उन दिनों विदेश गए हुए थे. योजना बना कर इन लोगों ने मिखाइल को इंद्राणी के वरली वाले फ्लैट पर बुला कर उसे अपने साथ एक पार्टी में चलने को कहा. साथ ही बताया कि रास्ते में शीना के कालेज से उसे भी साथ ले चलेंगे.

इस बीच इंद्राणी ने जहर मिला कोल्डड्रिंक का गिलास मिखाइल के सामने रखते हुए उसे पी लेने को कहा. मिखाइल को चूंकि इंद्राणी पर पहले ही संदेह था, अत: उस ने कहा कि वह वहीं बैठ कर आराम से कोल्डड्रिंक पीता है, तब तक वे लोग जा कर शीना को ले आएं. पार्टी में जाने को उसे तैयार होने में समय भी तो लगेगा. इंद्राणी व संजीव उस की बातों में आ कर शीना को लेने चले गए. उन के जाने के बाद मिखाइल चुपचाप वहां से निकल गया. शीना को घर ला कर इन्होंने पहले वही जहर मिला कोल्डड्रिंक पिलाया, फिर उस का गला घोंट दिया. बाद में उस के शव को अच्छे कपड़े पहना कर उस का मेकअप कर दिया. इंद्राणी ने उस के होंठों पर चटकीली लाल लिपस्टिक लगा कर आंखों पर गहरे रंग का चश्मा चढ़ा दिया.

इस के बाद कार की पीछे वाली सीट पर बैठ कर इंद्राणी ने अपनी बगल वाली सीट पर शीना के शव को बैठी अवस्था में रखते हुए उस का सिर अपने कंधे पर इस तरह टिका लिया, मानो वह थक कर सो गई हो. उस के दूसरी तरफ संजीव खन्ना बैठा. ड्राइवर श्यामवर राय को बाद में बुलाया गया. इस तरह पूरे फिल्मी अंदाज में इन लोगों ने मुंबई से 85 किलोमीटर दूर रायगढ़ के जंगलों में जा कर शीना के शव के टुकड़े किए. तत्पश्चात उन टुकड़ों को अपने साथ लाई खाली अटैची में भर कर एक गड्ढे में डाला और जला दिया. इस के बाद इन लोगों की इसी तरह मिखाइल को मारने की योजना भी थी.

पीटर से भी अब तक लगातार पूछताछ होती रही थी, मगर जब ये बातें प्रमाणों के साथ सामने आईं तो उन्हें क्लीनचिट दे दी गई. 7 सितंबर को पुलिस रिमांड की समाप्ति पर तीनों अभियुक्तों को फिर से अदालत पर पेश कर के 21 सितंबर, 2015 तक के लिए न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इस बीच शीना की हड्डियों का डीएनए इंद्राणी और मिखाइल से मैच होने की रिपोर्ट आ गई थी. जब इस बात को ले कर विवाद बढ़ा कि राकेश मारिया को शीना मर्डर केस की जांच से हटाने के लिए उन्हें डीजी होमगार्ड्स बनाया गया है तो महाराष्ट्र सरकार ने इस की जांच सीबीआई को सौंप दी है. Crime Story

 

Crime Stories: सीरियल किलर बलदेव

Crime Stories: मांबाप की उपेक्षा का शिकार बलदेव सिंह लोगों की सेवा कर के पैसा कमाना चाहता था, लेकिन सेवा से पैसा नहीं मिला तो उस ने 2 लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद तो उस ने हत्याओं का ऐसा सिलसिला चलाया कि…

कुछ दिनों पहले देश के प्रमुख अखबारों में एक समाचार प्रमुखता से छपा था कि देश में एक ऐसा सीरियल किलर गिरोह सक्रिय है, जो अब तक सौ से भी ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार चुका है. आगे भी न जाने कितने लोगों की हत्याएं कर सकता है. गिरोह में कितने सदस्य हैं, इस की किसी को खबर नहीं थी. वे हत्याएं क्यों कर रहे थे, इस का भी कुछ पता नहीं चल रहा था. कहीं लगता था कि हत्या लूटपाट के लिए की गई है तो कहीं कुछ और ही नजर आ रहा था. कत्ल करने का तरीका जरूर पता चल गया था. पहले वे मारने वाले को विश्वास में लेते थे, उस के बाद उसे एकांत में ले जा कर उस का टेंटुआ दबा कर मौत के घाट उतार देते थे.

मजे की बात यह थी कि हत्यारों ने कहीं कोई सुराग नहीं छोड़ा था. उन्हें हत्या करते भी किसी ने नहीं देखा था. कहीं कैमरे में भी उन का यह कारनामा नहीं कैद हुआ था. मुंबई में इस गिरोह के एक सदस्य के पकड़े जाने की जानकारी जरूर मिली थी, लेकिन उस से भी विस्तार से कुछ पता नहीं चला था. शायद मुंबई पुलिस गिरोह के सभी सदस्यों को गिरफ्तार करने के बाद ही इस अमानवीय कांड के रहस्य से परदा हटाना चाहती थी. मुंबई पुलिस अपने हिसाब से मामले की जांच कर रही थी कि पंजाब की एक घटना ने अचानक इस पूरे रहस्य से परदा हटा दिया.

4 जून, 2015 को लुधियाना के थाना डिवीजन नंबर 6 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर कंवरजीत सिंह को उन के मुखबिर से सूचना मिली कि कलगीधर रोड पर शिमलापुरी की गली नंबर 17 के मकान नंबर 5740 में रहने वाले बलवीर सिंह का बेटा इंदर सिंह देखने में तो सीधासादा साइकिल रिपेयर करने वाला गुरसिख है. लेकिन असलियत में वह बहुत खतरनाक अपराधी है. संदेह है कि वह कई हत्याओं में शामिल रहा है. मुखबिर की इस सूचना पर कंवरजीत सिंह को याद आया कि उस आदमी को तो उन्होंने कई बार थाने बुला कर उस से थोड़ीबहुत पूछताछ की थी.

इस पूछताछ में उन्हें कभी नहीं लगा था कि वह किसी हत्या में शामिल रहा होगा. धरमकरम की बातें करने वाले उस आदमी से जो छोटेमोटे अपराध हो गए थे, उस के लिए उस ने अफसोस जाहिर करते हुए यही कहा था कि अब उस ने अपनी जिंदगी वाहेगुरु को समर्पित कर दी है. किसी भी तरह का अपराध करने की कौन कहे, अब वह किसी का मन दुखाने की भी नहीं सोचता. वह सच्चाई की राह पर चलना चाहता है. कुछ भी था, मुखबिर की सूचना को न एकदम से झुठलाया जा सकता था और न ही इस बात को हलके में लिया जा सकता था. इसलिए कंवरजीत सिंह ने एसआई राजविंदर सिंह को भेज कर उस आदमी को थाने बुलवा लिया. वह आसानी से चला भी आया.

थाने में इंदर सिंह से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह पुलिस को बहकाता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया तो अचानक उस ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘साहब, जब किसी आदमी का बुरा वक्त आता है तो उस के हाथों ऐसेऐसे काम हो जाते हैं, जिन्हें करने के बारे में उस ने कभी सोचा भी नहीं होता.’’

‘‘तो तुम्हारे हाथों ऐसे कौन से गलत काम हो गए, जिन्हें करने के बारे में तुम ने कभी सोचा भी नहीं था?’’ एसआई राजविंदर सिंह ने पूछा.

इंदर सिंह की इन बातों से राजविंदर सिंह को थोड़ी हैरानी हुई थी. उस समय वह 2 सिपाहियों के साथ उस से सहज रूप से बात कर रहे थे. शुरुआती पूछताछ चल रही थी.

इसी शुरुआती पूछताछ में राजविंदर सिंह उसे बातों में उलझा कर धीरेधीरे मनोवैज्ञानिक ढंग से मुद्दे की बात पर इस तरह ले आए कि उस ने ऐसा अपराध स्वीकार कर लिया कि सुन कर दोनों सिपाहियों सहित राजविंदर सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजविंदर सिंह के सवालों के जवाब में इंदर सिंह ने कहा था, ‘‘गलत तो गलत ही है साहब, हम आदमी पर आदमी मारते गए, जो भी हत्थे चढ़ा, टेंटुआ दबा कर उसे ऊपर पहुंचा दिया. कभी हिसाब लगाने की कोशिश ही नहीं की कि हम ने कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया है.’’

इंदर सिंह के इस अपराध स्वीकारोक्ति के बाद राजविंदर सिंह उसे सिपाहियों की निगरानी में छोड़ कर सीधे थानाप्रभारी के पास पहुंचे. राजविंदर की बात सुन कर कंवरजीत सिंह भी सकते में आ गए. इस का मतलब मुखबिर की सूचना एकदम सही थी. उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी लुधियाना के डीसीपी नवीन सिंगला को दे कर उन से दिशानिर्देश मांगे. नवीन सिंगला ने कहा, ‘‘इस तरह की बातें करने वाले का या तो दिमाग हिला होता है या फिर वह बहुत शातिर किस्म का होता है. इसलिए उस आदमी से ज्यादा सख्ती करने के बजाय मनोवैज्ञानिक तरीके से ही पूछताछ जारी रखो. अगर वह लुधियाना के किसी हत्या के मामले के बारे में बताए तो उसे विधिवत गिरफ्तार कर लो.’’

कंवरजीत सिंह राजविंदर के साथ इंदर सिंह से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में इंदर सिंह ने जो बताया, उस से उस की कहानी इस तरह से सामने आई: इंदर सिंह, जिस ने अपना असली नाम बलदेव सिंह बताया, जिला लुधियाना की तहसील जगराओं की चुंगी नंबर 5 के पास स्थित मोहल्ला अगवाड़गुजरां का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हरभजन सिंह था. उस के मांबाप ने उस का नाम बलदेव सिंह रखा था. 4 भाइयों में बलदेव दूसरे नंबर पर था. बड़े भाई निहाल सिंह और उस से छोटे डिंपल सिंह का विवाह हो चुका था. लेकिन उस की और सब से छोटे जस्सा सिंह की शादी नहीं हुई थी.

सातवीं पास करने के बाद बलदेव ने वैल्डिंग का काम सीखा और एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. जब तक वह बाहर रहता, खुश रहता. लेकिन घर आते ही उस की खुशी गायब हो जाती. इसलिए उस का मन घर में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि उस के पिता जराजरा सी बात पर उस की मां की पिटाई करते रहते थे, जो उस से बरदाश्त नहीं होता था. पिता ने घर में इस तरह अपना दबदबा बना रखा था कि घर में उस से कुछ कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी. कह तो बलदेव सिंह भी कुछ नहीं पाता था, लेकिन उसे यह बात खलती बहुत थी. एक दिन उस के पिता किसी बात पर उस की मां को मारनेपीटने लगे तो उस से बरदाश्त नहीं हुआ और उस ने आगे बढ़ कर पिता का हाथ पकड़ लिया.

इस बात पर पिता ने तो उसे मारापीटा ही, मां ने भी उसे ही डांट कर उस की गलती निकाली. यही नहीं, पिता ने घर से निकल जाने को कहा तो उस के इस फैसले में मां ने भी उसी का साथ दिया. इस के बाद उस घर में रहना बलदेव सिंह को ठीक नहीं लगा और उस ने हमेशा के लिए अपना घर छोड़ दिया. इधरउधर भटकता हुआ एक दिन वह हिमाचल प्रदेश के सुप्रसिद्ध मणिकर्ण गुरुद्वारा पहुंचा. वहां रहते हुए संगतसेवा में उस का मन कुछ इस कदर रमा कि उस ने वहीं रहने का मन बना लिया. उसे वहां रहते हुए धीरेधीरे 6 साल बीत गए.

एक बार वहां इस तरह का एक ऐसा धार्मिक जत्था आया, जो देश के सभी धर्मस्थलों की यात्रा पर निकला था. मणिकर्ण में रहते हुए बलदेव सिंह को काफी अरसा गुजर गया था, इसलिए अन्य धर्मस्थलों को देखने की चाह में वह उस जत्थे के साथ आगरा चला गया. वहां गुरु का ताज गुरुद्वारा उसे इस कदर पसंद आया कि वह वहीं रुक गया और संगतों की सेवा करने लगा. यहां मुंबई का रहने वाला एक लंगड़ा एक अन्य लड़के के साथ गुरुद्वारा के जानवरों की सेवा करता था. रोजरोज मिलने से बलदेव की उन से दोस्ती हो गई. कुछ ही दिनों में उन की यह दोस्ती घनिष्ठता में बदल गई. इस की वजह यह थी कि तीनों की पारिवारिक स्थितियां करीबकरीब एक जैसी थीं.

बलदेव की तरह उन दोनों के घरों में भी उन के मांबाप के बीच झगड़ा रहता था. इन्हीं झगड़ों से परेशान हो कर वे भी घर से भाग आए थे. एक दिन तीनों ने सलाह की कि क्यों न वे मिल कर शहर में एक कमरा ले लें, जहां से आराम से सो सकें. इस के बाद उन्होंने आगरा शहर में वाजिब किराए पर एक कमरा ले लिया. इस के बाद वे दिन भर गुरुद्वारा में सेवाकार्य करते और खापी कर रात में अपने कमरे पर आ कर आराम से सो जाते. उन के पास जो थोडे़बहुत पैसे थे, उन से उन्होंने कमरे का पहले महीने का किराया दे दिया था. आगे के लिए उन के पास पैसे नहीं थे. गुरुद्वारा में उन की सेवा के बदले मुफ्त में खाने और ठहरने की सुविधा थी. इस के अलावा उन्हें वहां से कोई तनख्वाह वगैरह नहीं मिलती थी.

एक तरह से किराए का कमरा ले कर उन्होंने बेकार ही अपना खर्च बढ़ा लिया था. पैसों की दिक्कत आई तो सलाहमशविरा कर के उन्होंने उस का भी हल निकाल लिया. दरअसल, दिन भर तो गुरुद्वारा में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती ही थी, रात में भी बाहर से आए लोगों की अच्छीखासी संख्या वहां ठहरा करती थी. इसलिए वहां के सभी कमरे प्राय: भरे रहते थे. ऐसे में बलदेव और उस के दोस्तों को अक्सर गुरुद्वारा के प्रांगण में फर्श पर सोना पड़ता था. इसी वजह से उन्होंने शहर में किराए का कमरा लिया था. पैसे की दिक्कत हल करने के लिए उन्होंने योजना यह बनाई कि रात में गुरुद्वारा से चलते समय वह ऐसे 2-3 लोगों को अपने साथ कमरे पर ले आएंगे, जिन्हें वहां कमरा नहीं मिला हुआ होगा. कमरे पर ला कर वे उन की खूब सेवा करेंगे, जिस के बदले में वे उन से कुछ बख्शीश मांग लिया करेंगे.

इस के बाद उन्होंने एक दंपति को अपने साथ ले जाने के लिए राजी कर लिया. उन्होंने उन्हें अपने कमरे पर ला कर उन की खूब सेवा की. उस दंपति ने भी अपना हक मानते हुए उन से सेवा तो खूब करवाई, लेकिन सुबह चलते समय बख्शीश के नाम पर उन्हें कुछ नहीं दिया. जबकि उन के पास पैसों की कमी नहीं है, इस बात का अंदाजा बलदेव और उस के साथियों को हो गया था. दंपति के इस रवैए पर उन्हें गुस्सा आ गया. परिणामस्वरूप उन्होंने पतिपत्नी को पकड़ कर उन के टेंटुए दबा दिए. दोनों को मौत के घाट उतार कर उन का सारा पैसा और अन्य कीमती सामान ले लिया.

बिना किसी योजना के अचानक उन लोगों ने 2 कत्ल कर दिए थे. परेशान होना लाजिमी था. पुलिस पकड़ कर जेल में डाल देती. पुलिस से बचने के लिए लाशों को कमरे में बंद कर के उन्होंने बाहर से ताला लगाया और बस से मथुरा चले गए. वहां से पीलीभीत जाने के लिए उन्होंने बसअड्डे से एक टैक्सी की. अब तक कत्ल करने की उन की घबराहट पूरी तरह खत्म हो चुकी थी. अब उन्हें लगने लगा था कि पैसा कमाने का यह बढि़या और आसान तरीका है. टैक्सी में लंगड़ा आगे ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा था. बलदेव और दूसरा साथी पीछे वाली सीट पर बैठे थे.

तीनों में दोस्ती जरूर थी, लेकिन अभी तक वे एकदूसरे के निजी जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. सही बात तो यह थी कि अभी उन्हें एकदूसरे के नाम तक पता नहीं थे. वे एकदूसरे को बाबाजी कह कर पुकारते थे. हालांकि बाद में बलदेव को एक का नाम बलजिंदर मालूम हो गया था. मथुरा के बसअड्डे से चल कर टैक्सी करीब एक किलोमीटर गई होगी कि तीनों ने एकदूसरे को आंखों का इशारा किया और टैक्सी रुकवा ली. बलजिंदर ड्राइवर के ठीक पीछे बैठा था. टैक्सी के रुकते ही उस ने ड्राइवर के गले में रस्सी डाली और कसना शुरू कर दिया. लंगड़े और बलदेव ने ड्राइवर को तब तक पकड़े रखा, जब तक वह मर नहीं गया. उस की तलाशी में उस के पास उन्हें मात्र 8 सौ रुपए मिले.

सुनसान जगह पर लाश को फेंक कर टैक्सी लंगड़ा चलाने लगा. कोई 7-8 किलोमीटर दूर जाने पर एक टै्रक्टर ट्रौली से कार का एक्सीडेंट हो गया. तब कार को वहीं छोड़ कर वे बस से अमरियां की ओर चल पड़े. अमरियां से करीब 20 किलोमीटर दूर एक कस्बे में बस रुकी तो उन्होंने बस छोड़ दी और एक टैक्सी किराए पर ले ली. इस के ड्राइवर को भी पहले की तरह रास्ते में मार कर लाश गड्डे में फेंक दी और कार ले कर चले गए. इस ड्राइवर की जेब से उन्हें मात्र 3 सौ रुपए मिले थे.अमरियां शहर में इन्होंने खायापिया. ये किसी छोटी जगह पर रुकना चाहते थे. अमरियां से थोड़ा आगे बढ़े होंगे कि टैक्सी का बोनट झटके से खुल गया और उस की विंडस्क्रीन टूट कर बिखर गई.

टैक्सी को उसी हालत में वहीं छोड़ कर वे एक ट्रक से अमरियां लौट आए और वहां से पीलीभीत की ओर चले गए. वहां से इन्हें कारसेवा वालों की बस मिल गई, जिस से ये पंजाब चले गए. पंजाब पहुंच कर लंगडे के कहने पर उसे मोरिंडा फतेहगढ़ रोड पर स्थित रेलवे फाटक पार करते ही खुले में पड़ने वाले संतों के एक डेरे पर उतार दिया गया. जबकि बलजिंदर और बलदेव पहले लुधियाना गए और फिर वहां से अमृतसर चले गए. अमृतसर में दोनों हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा में सेवा करते हुए अपना समय बिताने लगे. यहां एक दिन उन की मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई, जो उन दिनों मणिकर्ण गुरुद्वारे में सेवा किया करता था, जब ये भी वहां सेवा कर रहे थे.

वह आदमी पेशे से पेंटर था, शहर में उस की अपनी दुकान थी. एक दिन वह बलदेव और बलजिंदर को अपनी दुकान पर ले गया, जहां उन्होंने उसे लूटने की नीयत से उस का टेंटुआ दबा दिया. मारने के बाद उस की सोने की चेन, अंगूठियां और नकदी लूट कर उसी के स्कूटर से वे लुधियाना आ गए. यहां गिल चौक इलाके के एक आदमी को बलजिंदर ने वह स्कूटर बेच दिया, साथ ही यहीं पर रहने का तय कर लिया. लुधियाना के कोटमंगलसिंह इलाके में उन्होंने किराए पर कमरा ले लिया. मकान मालिक बुजुर्ग औरत थी. एक दिन उन्हें मौका मिला तो उन्होंने गला घोंट कर उसे भी मार दिया.

यहां लूटपाट करने के बाद दोनों एक संत के डेरे पर जा कर वहां आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा करने लगे. लुधियाना में ही बलदेव की एक दूर की रिश्तेदार रहती थीं. 15 दिनों बाद वह बलजिंदर को साथ ले कर उस से मिलने चला गया. पहले भी वह उन के यहां जाता रहता था. लेकिन तब उस की सोच इस तरह की नहीं थी. जिंदगी के प्रति अब उस का नजरिया बदल चुका था. बलदेव की उस रिश्तेदार देविंदर कौर के गले में पहनी सोने की मोटी चेन और कानों में लटकते कीमती झुमके देख कर बलजिंदर के हाथों में खुजली होने लगी. उस ने आव देखा न ताव, गले में डाल रखे दुपट्टे से ही देविंदर कौर का काम तमाम कर दिया. इस के बाद बलदेव ने उस के सारे गहने उतार लिए.

यहां से भाग कर दोनों हुजूर साहिब चले गए, जहां उन्हें पुराना सेवादार गुलजार सिंह मिल गया. इस के बाद तीनों एकसाथ मुंबई चले गए. वहां वे चूडि़यां बनाने वाली फैक्ट्री में काम करने लगे. एक महीने बाद बलदेव अकेला दिल्ली आ गया और फर्नीचर का काम करने लगा. दिल्ली में उसे किसी अखबार से पता चला कि मुंबई में बलजिंदर एक फैक्ट्री मालिक की हत्या के आरोप में गोरेगांव पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है. उस में छपे समाचार में यह भी लिखा था कि पुलिस की पूछताछ में उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर 105 लोगों से अधिक की हत्याएं करने की बात कबूली है. इस से बलदेव सिंह को यह सोच कर घबराहट होने लगी कि बलजिंदर ने कहीं उस का नाम तो नहीं ले लिया.

डर की वजह से वह गुरुद्वारा शीशगंज में जा कर रहने लगा. कुछ दिनों बाद उसे वहां एक ऐसा बुजुर्ग जोड़ा मिला, जिन का जवान बेटा कई सालों पहले उन से नाराज हो कर कहीं चला गया था. उस की तलाश में वे मारेमारे फिर रहे थे. आंखों से भी उन्हें कम दिखाई देने लगा था. कुदरत का खेल देखो कि बलदेव की शक्लसूरत और कदकाठी उन के बेटे से हूबहू मेल खा रही थी. उसे देखते ही उन्होंने जिद पकड़ ली कि वही उन का खोया बेटा है. पतिपत्नी बलदेव से मिन्नत करने लगे कि वह गुस्सा थूक दे और उन के साथ घर लौट चले. इस बुजुर्ग दंपति का नाम था बलबीर कौर और सरदार बलबीर सिंह. ये लुधियाना के कलगीधर रोड पर शिमलापुरी की गली नंबर 17 के म.नं. 5740 के रहने वाले थे. उन के बेटे का नाम था इंदर सिंह.

बलदेव सिंह उन्हें बिलकुल नहीं जानता था. लेकिन उसे लगा कि कुदरत ऐसा खेल खेल कर शायद उसे बचाना चाहती है. वह उस बुजुर्ग दंपति के साथ उन का बेटा इंदर सिंह बन कर लुधियाना आ गया. उस ने तय कर लिया था कि अब वह कभी कोई अपराध नहीं करेगा. यहां भी दुर्भाग्य ने उस का साथ नहीं छोड़ा. इंदर सिंह भी छोटेमोटे अपराधों में पुलिस में वांछित था. इसी डर से वह भगौड़ा हुआ था. उस के मांबाप के मन में न जाने कैसे यह बात बैठ गई थी कि वह उन की किसी बात पर खफा हो कर घर छोड़ कर चला गया था.

पुलिस को जब उस के घर आने की खबर मिली तो उसे थाने में बुलाया जाने लगा. इस बात का पुलिस को कभी अंदाजा नहीं था कि वह इंदर सिंह न हो कर उस का हमशक्ल है. चूंकि उस के खिलाफ दर्ज मामले ज्यादा गंभीर नहीं थे, इसलिए पुलिस उसे थाने बुला कर थोड़ीबहुत पूछताछ कर के समझाबुझा कर घर भेज देती थी. लेकिन जब उस के सीरियल किलर होने की जानकारी मिली तो पुलिस ने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से विस्तृत पूछताछ की. तब उस ने अपना अपराध स्वीकार करने में देर नहीं लगाई. इस पूछताछ से लुधियाना में हुए 2 कत्ल के मामले भी हल हो गए. जहां तक 105 से अधिक कत्ल करने संबंधी छपे समाचार का सवाल था तो इस बारे में उस ने पुलिस को यही बताया कि इस के विधिवत खुलासा बलजिंदर ही कर सकता है.

लुधियाना में हुए कत्ल के मामलों में बलजिंदर भी वांछित था, इसलिए पुलिस ने 22 अगस्त, 2015 को उसे ट्रांजिट रिमांड पर लुधियाना ले आने का प्रयास किया. लेकिन मुंबई पुलिस का कहना है कि इस बारे में जब तक महाराष्ट्र सरकार की अनुमति नहीं मिल जाती, इतने खौफनाक अपराधी को मुंबई से बाहर नहीं भेजा जा सकता. इस दौरान बलदेव सिंह को 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर रख कर गहन पूछताछ की गई. उस के बाद लुधियाना पुलिस ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से अन्य जगहों की पुलिस उस के द्वारा अपने यहां किए गए अपराध संबंधी पूछताछ करने के लिए ट्रांजिट रिमांड पर ले जा रही है.

पंजाब पुलिस बलदेव सिंह का डोजियर देश के अन्य तमाम राज्यों को भेज कर उन के यहां उस के बताए तरीके से हुई हत्याओं की सूची तैयार कर रही है. पुलिस का कहना है कि बलदेव सिंह ने जितने कत्ल किए हैं, उन सब का ब्यौरा सिलसिलेवार बताना, उस के लिए संभव नहीं है. वैसे उस का कहना है कि वह जिस भी शहर में गया है, वहां उस ने कम से कम 5-7 हत्याएं तो की ही हैं. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Family Crime: जीजा से जब लड़े नैन

Family Crime: दिल्ली जल बोर्ड में नौकरी करने वाला संजीव कौशिक अपनी पत्नी अंजू कौशिक को हर तरह से खुश रखता था. वह जो भी मांग करती, संजीव उसे जल्द से जल्द पूरी करने की कोशिश करता था. इस के बावजूद भी अंजू उसे पहले की तरह प्यार नहीं करती. आए दिन पति के प्रति उस का व्यवहार बदलता जा रहा था. बेटे के भविष्य को देखते हुए संजीव अपने घर में कलह नहीं करना चाहता था पर अंजू उस की बात को गंभीरता से समझने की कोशिश नहीं कर रही थी.

संजीव फरीदाबाद की ग्रीनफील्ड कालोनी का रहने वाला था. दिल्ली ड्यूटी करने के बाद जब वह घर पर पहुंचता तो घर वाले अंजू के बारे में बताते कि वह बेलगाम हो कर अकेली पता नहीं कहांकहां घूमती है. संजीव इस बारे में जब पत्नी से पूछता तो वह उलटे उस से झगड़ने पर आमादा हो जाती थी. इस के बाद संजीव को भी गुस्सा आ जाता तो वह उस की पिटाई कर देता था. इस तरह उन दोनों के बीच आए दिन झगड़ा होने लगा.

संजीव अपने स्तर से यही पता लगाने की कोशिश करने लगा कि आखिर उस की पत्नी का किस के साथ चक्कर चल रहा है. पर उसे इस काम में सफलता नहीं मिल सकी. आखिर इसी साल जनवरी महीने में जब अंजू घर से भाग गई तो हकीकत सामने आई. पता चला कि अंजू के अपने ही ननदोई यानी संजीव के बहनोई राजू के साथ ही नाजायज संबंध थे.

जबकि संजीव का शक किसी मोहल्ले वाले पर था, लेकिन उसे क्या पता था कि उस का बहनोई ही आस्तीन का सांप बना हुआ है. अंजू जब राजू के साथ भागी थी तो अपने बेटे को भी साथ ले गई थी. तब संजीव ने फरीदाबाद के सेक्टर-7 थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. इस के करीब एक महीने बाद अंजू को करनाल से बरामद किया गया था.

घर लौटने के बाद अंजू ने अपने किए की पति से माफी मांगी और भविष्य में राजू से न मिलने का वादा भी किया था. संजीव ने उसे माफ कर फिर से स्वीकार कर लिया. लेकिन कहते हैं कि चोर चोरी भले छोड़ दे लेकिन हेराफेरी नहीं छोड़ता. यही हाल अंजू का भी था.

कुछ दिनों तक तो अंजू ठीक रही लेकिन जब उसे अपने ननदोई यानी प्रेमी राजू की याद आती तो वह बेचैन रहने लगी. उधर राजू भी अंजू से मिलने के लिए बेताब था.

दोनों ही जब एकदूसरे से मिलने के लिए मचलने लगे तब वे चोरीछिपे मिलने लगे. संजीव को जब पता चला तो उस ने पत्नी को समझाया पर वह नहीं मानी.

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वैसे भी जब किसी महिला के एक बार पैर फिसल जाते हैं तो वह रोके से भी नहीं रुकते. क्योंकि अवैध संबंधों की राह बड़ी ही ढलवां होती है. उस राह पर यदि कोई एक बार कदम रख देता है तो उस का संभलना मुश्किल होता है. यही हाल अंजू का हुआ.

संजीव अंजू के चालचलन से बहुत परेशान हो चुका था. उस की वजह से उस की रिश्तेदारियों में ही नहीं, बल्कि मोहल्ले में भी बदनामी हो रही थी. पत्नी को समझासमझा कर वह हार चुका था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह ऐसी बदचलन पत्नी का क्या करे. पत्नी की वजह से वह तनाव में रहने लगा.

17 मार्च, 2018 को भी किसी बात को ले कर संजीव का पत्नी से झगड़ा हो गया. उस समय उस का 15 वर्षीय बेटा मनन अपने ताऊ के यहां था. झगड़े के दौरान अंजू ने ड्रेसिंग टेबल से कैंची निकाल कर पति पर हमला कर दिया. बचाव की कोशिश में संजीव की छोटी अंगुली (कनिष्ठा) कट गई. अंगुली कटने पर संजीव के हाथों से खून टपकने लगा.

इस के बाद संजीव को गुस्सा आ गया. उस ने पत्नी से कैंची छीन कर उसी कैंची से उस की गरदन पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए. उस ने उस की गरदन पर तब तक वार किए, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. इस के बाद उस ने उस की गरदन काट कर अलग कर दी.

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पत्नी की हत्या करने के बाद संजीव ने खून से सने अपने हाथपैर साफ किए और कपड़े बदल कर उस ने कहीं भाग जाने के मकसद से एक बैग में अपने कुछ कपड़े भर लिए. फिर वह अपने बड़े भाई के पास गया. वहां मौजूद बेटे ने बैग के बारे में पूछा तो उस ने बता दिया कि इस में कपड़े हैं जो धोबी को देने हैं. फिर वह वहां से चला गया.

दोपहर करीब एक बजे मनन जब घर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. उस ने पड़ोसियों से अपनी मां के बारे में पूछा तो कुछ पता नहीं चला. पिता को फोन मिलाया तो वह भी बंद मिला. तब उस ने फोन कर के अपने ताऊ को वहां बुला लिया.

ताऊ ने शक होने के बाद पुलिस को सूचना दी. पुलिस जब वहां पहुंची तो आसपास के लोग जमा थे. कमरे का ताला तोड़ कर पुलिस जब कमरे में गई तो बैडरूम में अंजू की लाश पड़ी थी, जिस का सिर धड़ से अलग था. फिर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पत्नी की हत्या करने के बाद संजीव 3 दिनों तक इधरउधर घूमता रहा. बाद में उसे लगा कि चाहे वह कितना भी छिपा रहे, पुलिस एक न एक दिन उसे गिरफ्तार कर ही लेगी. यही सोच कर उस ने खुद ही न्यायालय में आत्मसमर्पण करने का फैसला ले लिया और 21 मार्च, 2018 को फरीदाबाद न्यायालय में पहुंच कर आत्मसमर्पण कर दिया.

कोर्ट ने इस की सूचना डीएलएफ क्राइम ब्रांच को दे दी. तब क्राइम ब्रांच के इंचार्ज अशोक कुमार कोर्ट पहुंच गए. उन्होंने संजीव कौशिक को गिरफ्तार कर पूछताछ की, जिस में संजीव ने अपना अपराध स्वीकार कर पत्नी की हत्या में प्रयुक्त कैंची आदि पुलिस को बरामद करा दी. पुलिस ने संजीव कौशिक से पूछताछ के बाद उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Family Crime

Hindi Crime Stories: परिवार में अपराध – हादसे का दर्द, मुकदमे का बोझ

Hindi Crime Stories: पारिवारिक अपराध घरपरिवार पर दोहरी मुसीबत ले कर आते हैं. एक तरफ परिवार को नुकसान उठाना होता है, तो वहीं दूसरी तरफ जेल में बंद परिवार के सदस्य को सजा से बचाने के लिए जेल से ले कर कचहरी तक परिवार के बचे लोगों को दौड़ना पड़ता है. वकील और पुलिस के चक्कर में फंस कर केवल पैसा ही नहीं,  समय भी बरबाद होता है.

कितने गरीब परिवारों को अपने घर और जमीन तक बेचने या गिरवी रखने पड़ते हैं. परिवार का जेल गया सदस्य जब तक जेल से बाहर आता है, तब तक उस का बचा हुआ परिवार टूट कर बिखर चुका होता है. देश की न्याय प्रणाली की भारीभरकम कीमत ने ज्यादातर भारतीयों की पहुंच से इस को दूर कर दिया है. बहुत से मामलों में सजा पाए लोग लोअर कोर्ट से आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात सोच ही नहीं सकते.

बेंगलुरु के गैरसरकारी संगठन ‘एक्सेस टू जस्टिस’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 90 फीसदी अपील करने वाले वे लोग हैं, जो साल में 3 लाख रुपए से कम कमाते हैं. अपील पर आने वाला उन का औसत खर्च एक बार का 16 हजार रुपए हो जाता है.

आंकड़ों से अलग कचहरी में आने वाले खर्च और परेशानियों की हकीकत बहुत अलग होती है. परेशानी की बात यह है कि परिवार में बढ़ते तनाव, जरूरतों और इच्छाओं के चलते अपराध की वारदातें बढ़ रही हैं.

ऐसी वारदातें 25 साल से 35 साल की उम्र में ज्यादा होती हैं. इस समय  नौजवान अपने कैरियर में कामयाबी की तरफ बढ़ रहा होता है. यहां पर अपराध की वारदातों में फंस कर पूरा परिवार तबाह हो जाता है. घरों में होने वाले ऐसे अपराध की सब से बड़ी वजह नाजायज संबंध या पारिवारिक तनातनी होती है.

पिता की मौत, मां को जेल

लखनऊ, उत्तर प्रदेश की बक्शी का तालाब तहसील के इंटौजा थाने के गोहनाखुर्द गांव में रामस्वरूप रावत अपनी पत्नी कुसुमा, मां बिट्टो, 5 साल के बेटे संजय और 3 साल की बेटी रीना के साथ रहता था. रामस्वरूप रावत की शादी 7 साल पहले रामधीन पुरवा की रहने वाली कुसुमा से हुई थी.

इसी गांव में भानुप्रताप सिंह भी रहता था. वह ईंटभट्ठा का मालिक था. उस के 2 ईंटभट्ठे थे. उस का एक भट्ठा प्रताप ब्रिक फील्ड के नाम से गोहनाखुर्द गांव में था और दूसरा बिसवा में था.

रामस्वरूप भानुप्रताप के यहां काम करता था. इस वजह से उस की पत्नी कुसुमा का भी वहां पर आनाजाना होता रहता था.

कुसुमा देखने में खूबसूरत थी. उस में कुछ ऐसा खिंचाव था, जो भानुप्रताप को पसंद आ गया. वह जिस अंदाज से कुसुमा को देखता था, वह अंदाज कुसुमा को पसंद था. जब दोनों तरफ से रजामंदी हो, तो रिश्ता बनते देर नहीं लगती.

अब भानुप्रताप कुसुमा के पति की ओर कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगा था. उस ने आम का 2 बीघा बाग खरीदा और उस की रखवाली करने का काम रामस्वरूप को दे दिया.

नतीजतन, रामस्वरूप दिनरात घर से बाहर ही रहता. भानुप्रताप भी रामस्वरूप की माली मदद करने लगा था.

रामस्वरूप को यह पता नहीं था कि कुसुमा और भानुप्रताप के बीच संबंध हैं. इधर मौके का फायदा उठा कर कुसुमा और भानुप्रताप अब रोज ही संबंध बनाने लगे थे.

एक दिन रामस्वरूप ने कुसुमा और भानुप्रताप को आपत्तिजनक हालत में देख लिया था, पर भानुप्रताप के डर और झिझक के चलते उस ने उन से कुछ नहीं कहा. पर अब वह इन दोनों पर नजर भी रखने लगा था.

एक दिन रामस्वरूप गांव से बाहर था, तब कुसुमा और भानुप्रताप मिले. कुसुमा ने बताया कि किस तरह से उस का पति उसे अब परेशान करने लगा है. कुसुमा और भानुप्रताप ने तय कर लिया कि अब रामस्वरूप को रास्ते से हटाना ही पड़ेगा.

एक दिन भानुप्रताप ने अपने 2 साथियों और कुसुमा को साथ ले कर रामस्वरूप की उस समय हत्या कर दी, जब वह आम के बाग में सो रहा था, लेकिन बहुत से उपाय करने के बाद भी पुलिस से यह अपराध छिपा नहीं.

पुलिस ने रामस्वरूप की लाश को गड्ढे से खोद कर बरामद कर लिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबा कर हत्या करने का मामला सामने आया.

पुलिस ने धारा 302 के तहत कुसुमा, भानुप्रताप, बबलू और लल्लू के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. कुसुमा, भानुप्रताप और बबलू को पुलिस ने फौरन पकड़ लिया, जबकि लल्लू फरार हो चुका था. पुलिस की पूरी छानबीन और पुख्ता सुबूतों के आधार पर ही तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया. पिता की मौत और मां के जेल चले जाने के बाद 5 साल का बेटा संजय और 3 साल की बेटी रीना अनाथ हो गए.

केवल कुसुमा का परिवार ही नहीं, बल्कि भानुप्रताप का परिवार भी तबाह हो गया. उस ने अपनी मेहनत और लगन से ईंटभट्ठे के जिस कारोबार को जमाया था, वह बरबाद हो गया. अब उस की जमानत से ले कर मुकदमे तक में लाखों रुपए बरबाद हो रहे हैं.

10 साल की सजा

बक्शी का तालाब, लखनऊ के रहने वाले वंशीलाल ने अपनी बेटी शिवदेवी की शादी सत्यपाल के साथ की थी. शादी के बाद ही सत्यपाल और उस के घर वालों ने शिवदेवी से मोटरसाइकिल और सोने की चेन की मांग शुरू कर दी.

दहेज की मांग पूरी न होने पर 8-9 अक्तूबर, 2015 को उन लोगों ने शिवदेवी को सोते समय जला दिया. 13 अक्तूबर को इलाज के दौरान अस्पताल में शिवदेवी की मौत हो गई.

शिवदेवी के पिता ने अपनी बेटी के पति सत्यपाल और जेठ सत्यवान के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया.

अदालत ने सत्यवान के खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाया, तो उसे मुकदमे से बरी कर दिया और पति सत्यपाल को 10 साल की सजा और 15 हजार रुपए का जुर्माना देने का फैसला सुनाया.

अदालत ने यह भी कहा कि जुर्माने में से 10 हजार रुपए वादी यानी शिवदेवी के पिता को दिए जाएं.

हत्या की इस वारदात में 2 परिवार तबाह हो गए. बेटी की मौत का दर्द लिए जी रहा पिता इस फैसले से खुश नहीं था. उसे लग रहा है कि उस की बेटी की हत्या करने वालों को वैसी सजा नहीं मिली, जैसी उस की बेटी ने भोगी.

वह इस मामले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाना चाहता है, पर माली तौर पर मजबूर है. सोने की चेन और मोटरसाइकिल से ज्यादा कीमत शिवदेवी की हत्या में फंसे उस के पति सत्यपाल के परिवार ने थाना और कचहरी के चक्कर में खर्च कर डाली.

लखनऊ के ही थाना गोसाईंगंज क्षेत्र में रहने वाले महादेव ने 9 मई, 2015 को अपनी बेटी रानी की शादी हरिश्चंद्र से की थी. एक लाख रुपए के दहेज की मांग को ले कर हरिश्चंद्र अपनी पत्नी रीना को तंग करता था. इस से परेशान हो कर महादेव अपनी बेटी को ससुराल से मायके ले आया. कुछ दिन बाद हरिश्चंद्र अपनी ससुराल आया और पत्नी को विदा करा कर ले गया. उस ने कहा कि वह उसे दोबारा परेशान नहीं करेगा.

14 फरवरी, 2016 को रीना की हत्या हो गई. रीना की लाश रस्सी से लटकी मिली. उस के घर वालों का आरोप था कि रीना को मार कर रस्सी से लटकाया गया है.

पुलिस ने हत्या के आरोपी पति की जमानत की अपील खारिज कर दी और उसे सुनवाई तक जेल में रहना होगा.

इस तरह दहेज कानून के तहत लोग सालोंसाल से जेलों में बंद हैं. पैरवी में हर पेशी पर घर वालों को वकीलों से ले कर जेल मुलाजिमों तक को पैसा देना पड़ता है.

जायदाद की जगह जेल

लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने 2 बेटों संजय और रणविजय के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह का आम का बाग था, जिस की कीमत करोड़ों में थी.

मुन्ना के बड़े बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी. सुशीला के 2 बच्चे, 4 साल की बेटी और डेढ़ साल का बेटा थे. वह पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इसलिए उस ने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिए, जिस से वह शादी न करे.

सुशीला को डर था कि देवर की शादी के बाद उस की पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक हो जाएगा.

यह बात जब मुन्ना सिंह को पता चली, तो वे अपने छोटे बेटे की शादी कराने की कोशिश करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिंता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उस की मदद नहीं करेगा. तब उस ने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया.

जब शिवम पूरी तरह से उस के काबू में आ गया, तो उस ने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिए कहा. शिवम जब इस के लिए तैयार नहीं हुआ, तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रुपए देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात मुन्ना सिंह आम की फसल बेच कर घर आए. इस के बाद खाना खा कर आम के बाग में सोने के लिए चले गए. वे अपने पैसे हमेशा साथ ही रखते थे.

सुशीला ने शिवम को फोन कर के गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेंद्र को भी ले आया था. तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली.

मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पैर पहुंच कर तीनों ने उन को दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल डाल दिया. सुशीला ने उन के पैर पकड़ लिए और शिवम व राघवेंद्र ने उन को काबू में किया, जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गए. वहीं पर दोनों ने गमछे से गला दबा कर उन की हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया. एसओ विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की.

पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना सिंह के संबंध अपने बेटों से अच्छे नहीं थे.

इस बीच गांव में यह पता चला कि सुशीला का देवर रणविजय और चचेरे देवर शिवम से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल फोन की काल डिटेल देखनी शुरू की, तो पता चला कि सुशीला ने उस दिन शिवम से देर रात तक बात की थी.

पुलिस ने शिवम का फोन देखा, तो उस में राघवेंद्र का नंबर मिला. इस के बाद पुलिस ने राघवेंद्र, शिवम और सुशीला से अलगअलग बात की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उस के देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था.

सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे, तो वह अकेली पूरी जायदाद की मालकिन बन जाएगी, पर पुलिस को सच का पता चल चुका था.

जायदाद के लालच में फंसी बहू जेल चली गई. उस के डेढ़ साल के बेटे को बिना कुसूर जेल जाना पड़ा.

जिस जायदाद को पा कर वह ऐश की जिंदगी जीना चाहती थी, उसी को बेच कर घर वाले थानाकचहरी के चक्कर लगाएंगे.

एक नजर में मुकदमों का खर्च

बेंगलुरु के एक गैरसरकारी संगठन ‘एक्सैस टू जस्टिस’ की एक रिपोर्ट में मुकदमों पर होने वाले खर्चों को दिखाने का काम किया गया है. औसतन मुकदमों में इंसाफ मिलने में एक से 5 साल तक का समय लग जाता है. तमाम लोगों के पास अपनी जमानत देने का भी पैसा नहीं होता, जिस वजह से वे जेल में ही पड़े रहते हैं. पैसे की कमी में लोग लोअर कोर्ट से हाईकोर्ट में नहीं जा पाते हैं. कई बार पैसों का इंतजाम करने में घरजमीन तक बिक जाते हैं. सब से बड़ी परेशानी यह है कि मुवक्किल के प्रति वकीलों में जवाबदेही की कमी होती है.

24 राज्यों की 305 जगहों पर 9329 लोगों के बीच किए गए सर्वे में पता चलता है कि 48 फीसदी परिवार 3 लाख सालाना कमाई करने वाले मध्यम वर्ग के होते हैं. एक लाख से कम कमाई वाले 43 फीसदी परिवार मुकदमेबाजी में उलझे हैं. 3 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले केवल 10 फीसदी परिवार ही मुकदमेबाजी में उलझे हैं.

सर्वे में यह भी पता चला है कि 66 फीसदी मामलों में जमीन और जायदाद के मुकदमे होते हैं. 80 हजार करोड़ रुपए हर साल खर्च होते हैं. 84 फीसदी मुकदमे मर्दों की तरफ से होते हैं, जबकि 15 फीसदी मुकदमे औरतों की ओर से होते हैं.

44 फीसदी सामान्य वर्ग के लोग मुकदमा दर्ज करते हैं. 34 फीसदी पिछड़ा वर्ग और 14 फीसदी दलित जातियों के लोग मुकदमा दर्ज करते हैं.

सालाना एक लाख रुपए से कम आमदनी वाले मुकदमे पर 10 हजार रुपए, एक लाख से 3 लाख सालाना आमदनी वाले 16 हजार रुपए, 3 लाख से 5 लाख सालाना आमदनी वाले 26 हजार रुपए और 5 लाख से 10 लाख सालाना आमदनी वाले 25 हजार रुपए मुकदमों पर खर्च करते हैं. Hindi Crime Stories