Crime News: अपहरण के चक्कर में फंस गया मुंबई का किंग

Crime News:15 मई, 2017 की सुबह की बात है. समय 11-साढ़े 11 बजे सीकर जिले के शहर फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार अपनी ज्वैलरी की दुकान पर थे. उन की पत्नी पार्वती और बेटा ध्रुव ही घर पर थे. बेटी वर्षा किसी काम से बाजार गई थी. उसी समय अच्छी कदकाठी का एक सुदर्शन युवक उन के घर पहुंचा. उस के हाथ में शादी के कुछ कार्ड थे. युवक ने ललित के घर के बाहर लगी डोरबेल बजाई तो पार्वती ने बाहर आ कर दरवाजा खोला. युवक ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘नमस्ते आंटीजी, पोद्दार अंकल घर पर हैं?’’

पार्वती ने शालीनता से जवाब देते हुए कहा, ‘‘नमस्ते भैया, पोद्दारजी तो इस समय दुकान पर हैं. बताइए क्या काम है?’’

‘‘आंटीजी, हमारे घर में शादी है. मैं कार्ड देने आया था.’’ युवक ने उसी शालीनता से कहा.

युवक के हाथ में शादी के कार्ड देख कर पार्वती ने उसे अंदर बुला लिया. युवक ने सोफे पर बैठ कर एक कार्ड पार्वती की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आंटीजी, यह कार्ड पोद्दार अंकल को दे दीजिएगा. आप लोगों को शादी में जरूर आना है. बच्चों को भी साथ लाइएगा.’’

पार्वती ने शादी का कार्ड देख कर कहा, ‘‘भैया आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आंटीजी, आप नहीं पहचानतीं, लेकिन पोद्दार अंकल मुझे अच्छी तरह से पहचानते हैं.’’ युवक ने कहा.

पार्वती ने घर आए, उस मेहमान से चायपानी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘चायपानी के तकल्लुफ की कोई जरूरत नहीं है, आंटीजी. अभी एक कार्ड आप के भांजे अश्विनी को भी देना है. मैं उन का घर नहीं जानता. आप अपने बेटे को मेरे साथ भेज देतीं तो वह उन का घर बता देता. कार्ड दे कर मैं आप के बेटे को छोड़ जाऊंगा.’’

बाहर तेज धूप थी. इसलिए पार्वती बेटे को बाहर नहीं भेजना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आप कार्ड हमें दे दीजिए. शाम को अश्विनी हमारे घर आएगा तो हम कार्ड दे देंगे.’’

पार्वती की बात सुन कर युवक ने मायूस होते हुए कहा, ‘‘कार्ड तो मैं आप को दे दूं, लेकिन पापा मुझे डांटेंगे. उन्होंने कहा है कि खुद ही जा कर अश्विनी को कार्ड देना.’’

युवक की बातें सुन कर पार्वती ने ड्राइंगरूम में ही वीडियो गेम खेल रहे अपने 13 साल के बेटे ध्रुव से कहा, ‘‘बेटा, अंकल के साथ जा कर इन्हें अश्विनी का घर बता दे.’’

ध्रुव मां का कहना टालना नहीं चाहता था, इसलिए वह अनमने मन से जाने को तैयार हो गया. वह युवक ध्रुव के साथ घर से निकलते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू आंटीजी.’’

ध्रुव और उस युवक के जाने के बाद पार्वती घर के कामों में लग गईं. काम से जैसे ही फुरसत मिली उन्होंने घड़ी देखी. दोपहर के साढ़े 12 बज रहे थे. ध्रुव को कब का घर आ जाना चाहिए था. लेकिन वह अभी तक नहीं आया था. पार्वती ने सोचा कि ध्रुव वहां जा कर खेलने या चायपानी पीने में लग गया होगा. हो सकता है, अश्विनी ने उसे किसी काम से भेज दिया हो. यह सोच कर वह फिर काम में लग गईं.

थोड़ी देर बाद उन्हें जब फिर ध्रुव का ध्यान आया, तब दोपहर का सवा बज रहा था. ध्रुव को घर से गए हुए डेढ़ घंटे से ज्यादा हो गया था. पार्वती को चिंता होने लगी. 10-5 मिनट वह सेचती रहीं कि क्या करें. कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने पति ललित पोद्दार को फोन कर के सारी बात बता दी. पत्नी की बात सुन कर ललित को भी चिंता हुई. उन्होंने पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘ध्रुव कोई छोटा बच्चा नहीं है कि कहीं खो जाए या इधरउधर भटक जाए. फिर भी मैं अश्विनी को फोन कर के पता करता हूं.’’

ललित ने अश्विनी को फोन कर के ध्रुव के बारे में पूछा तो अश्विनी ने जवाब दिया, ‘‘मामाजी, मेरे यहां न तो ध्रुव आया था और ना ही कोई आदमी शादी का कार्ड देने आया था.’’

अश्विनी का जवाब सुन कर ललित भी चिंता में पड़ गए. वह तुरंत घर पहुंचे और पार्वती से सारी बातें पूछीं. उन्होंने वह शादी का कार्ड भी देखा, जो वह युवक दे गया था. कार्ड पर लियाकत सिवासर का नाम लिखा था. ललित को वह शादी का कार्ड अपने किसी परिचित का नहीं लगा. उन्होंने कार्ड पर लिखे मोबाइल नंबरों पर फोन किया तो वे नंबर फरजी निकले.

ललित को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. उन के मन में बुरे ख्याल आने लगे. उन्हें आशंका इस बात की थी कि कहीं किसी ने पैसों के लालच में ध्रुव का अपहरण न कर लिया हो. इस की वजह यह थी कि वह फतेहपुर के नामीगिरामी ज्वैलर थे. राजस्थान के शेखावटी इलाके में उन का अच्छाखासा रसूख था. बेटे के घर न आने से पार्वती का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

ललित ने अपने कुछ परिचितों से बात की तो सभी ने यही सलाह दी कि इस मामले की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए. इस के बाद दोपहर करीब ढाई बजे ललित ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. पार्वती से पूछताछ की गई. शुरुआती जांच से यही नतीजा निकला कि ध्रुव का अपहरण किया गया है.

अपहर्त्ता प्रोफेशनल अपराधी हो सकते थे. क्योंकि रात तक फिरौती के लिए किसी अपहर्त्ता का फोन नहीं आया था. पुलिस को अनुमान हो गया था कि अपहर्त्ता ने ध्रुव के अपहरण का जो तरीका अपनाया था, उस से साफ लगता था कि उन्होंने रेकी कर के ललित पोद्दार के बारे में जानकारियां जुटाई थीं.

पुलिस ने फिरौती मांगे जाने की आशंका के मद्देनजर पोद्दार परिवार के सारे मोबाइल सर्विलांस पर लगवा दिए. लेकिन उस दिन रात तक ना तो किसी अपहर्त्ता का फोन आया और ना ही ध्रुव को साथ ले जाने वाले उस युवक के बारे में कोई जानकारी मिली. पुलिस ने ललित के घर के आसपास और लक्ष्मीनारायण मंदिर के करीब स्थित उस की दुकान के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, लेकिन उन से पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ.

पुलिस को अब तक केवल यही पता चला था कि ललित पोद्दार के घर जो युवक शादी का कार्ड देने आया था, उस की उम्र करीब 30 साल के आसपास थी. वह सफेद शर्ट पहने हुए था. अगले दिन सीकर के एसपी राठौड़ विनीत कुमार त्रिकमलाल ने ध्रुव का पता लगाने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दिशानिर्देश दिए. इस के बाद पुलिस ने उस शादी के कार्ड को आधार बना कर जांच आगे बढ़ाई.

परेशानी यह थी कि शादी के कार्ड पर किसी प्रिंटिंग प्रैस का नाम नहीं लिखा था, जबकि हर शादी के कार्ड पर प्रिंटिंग प्रैस का नाम जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि राजस्थान सरकार ने बालविवाह की रोकथाम के लिए यह कानूनी रूप से जरूरी कर दिया है. पुलिस ने शादी के कार्ड छापने वाले प्रिंटिंग प्रैस मालिकों से बात की तो पता चला कि उस कार्ड में औफसेट पेंट का इस्तेमाल किया गया था.

उस पेंट का उपयोग फतेहपुर में नहीं होता था. सीकर में प्रिंटिंग प्रैस वाले उस का उपयोग करते थे. इस के बाद पुलिस ने सीकर, चुरू और झुंझुनूं के करीब डेढ़ सौ प्रैस वालों से पूछताछ की. इस जांच के दौरान एक नया तथ्य यह सामने आया कि ध्रुव के अपहरण से 4 दिन पहले से उसी के स्कूल में पढ़ने वाला छात्र अंकित भी लापता था. अंकित चुरू जिले के रतनगढ़ शहर का रहने वाला था. वह फतेहपुर के विवेकानंद पब्लिक स्कूल में पढ़ता था और हौस्टल में रहता था. गर्मी की छुट्टी में वह रतनगढ़ अपने घर गया था. वह 12 मई को दोपहर करीब सवा बारह बजे बाल कटवाने के लिए घर से निकला था, तब से लौट कर घर नहीं आया था.

तीसरे दिन आईजी हेमंत प्रियदर्शी एवं एसपी राठौड़ विनीत कुमार ने ध्रुव के घर वालों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि ध्रुव का जल्द से जल्द पता लगा लिया जाएगा. उसी दिन यानी 17 मई को अपहर्त्ता ने ललित पोद्दार को फोन कर के बताया कि उन के बेटे ध्रुव का अपहरण कर लिया गया है. उन्होंने ध्रुव की उन से बात करा कर 70 लाख रुपए की फिरौती मांगी.

उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर पुलिस को बताया तो बच्चे को मार दिया जाएगा. ललित ने समझदारी से बातें करते हुए अपहर्त्ता से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि नोटबंदी को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. भाइयों, परिवार वालों और रिश्तेदारों से पैसे जुटाने के लिए समय चाहिए. चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 70 लाख रुपए इकट्ठे नहीं हो पाएंगे. बैंक से एक साथ ज्यादा पैसा निकाला तो पुलिस को शक हो जाएगा.

ललित ने अपहर्ता को अपनी मजबूरियां बता कर यह जता दिया कि वह 70 लाख रुपए नहीं दे सकते. बाद में अपहर्ता 45 लाख रुपए ले कर ध्रुव को सकुशल छोड़ने को राजी हो गए. अपहर्ताओं ने फिरौती की यह रकम कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर पहुंचाने को कहा. लेकिन बाद में वे फिरौती की रकम मुंबई में लेने को तैयार हो गए.

ललित का मोबाइल पहले से ही पुलिस सर्विलांस पर लगा रखा था. पुलिस को अपहर्ता और ललित के बीच हुई बातचीत का पता चल गया. इसी के साथ पुलिस को वह मोबाइल नंबर भी मिल गया, जिस से ललित को फोन किया गया था.

इसी बीच पुलिस ने शादी के उस कार्ड की जांच एक्सपर्ट से कराई तो पता चला कि वह एविडेक प्रिंटर से छपा था. शेखावटी के सीकर, चुरू व झुंझुनूं जिले में करीब 60 एविडेक प्रिंटर थे. इन प्रिंटर मालिकों से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह कार्ड नवलगढ़ के एक प्रिंटर से छपवाया गया था. उस प्रिंटर के मालिक से पूछताछ में पता चला कि वह कार्ड फतेहपुर के किसी आदमी ने उस के प्रिंटर पर छपवाया था. उस आदमी से पूछताछ में पुलिस को अपहर्त्ता युवक के बारे में कुछ सुराग मिले.

इस के अलावा पुलिस ने 15 मई को ललित पोद्दार के मकान के आसपास घटना के समय हुई सभी मोबाइल कौल को ट्रेस किया. इस में मुंबई का एक नंबर मिला. यह नंबर साजिद बेग का था. काल डिटेल्स के आधार पर यह भी पता चल गया कि साजिद के तार फतेहपुर के रहने वाले अयाज से जुड़े थे.

जांच में यह बात भी सामने आ गई कि अपहर्ता मुंबई से जुड़ा है. इस पर पुलिस ने फतेहपुर से ले कर विभिन्न राज्यों के टोल नाकों पर जांच की और उन नाकों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस में सब से पहले शोभासर के टोल पर सफेद रंग की एसेंट कार पर जयपुर का नंबर मिला. अगले टोल नाके मौलासर पर इसी कार पर महाराष्ट्र की नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. आगे के टोल नाकों पर उसी कार पर अलगअलग नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. जांच में ये सारे नंबर फरजी पाए गए.

सीकर के एसपी ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर से बात कर के ध्रुव के अपहरण की पूरी जानकारी दे कर अपराधियों को पकड़ने में सहायता करने का आग्रह किया. इसी के साथ एसपी के दिशानिर्देश पर एडिशनल एसपी तेजपाल सिंह ने 3 टीमें गठित कर के 3 राज्यों में भेजी. सब से पहले रामगढ़ शेखावाटी के थानाप्रभारी रमेशचंद्र को टीम के साथ मुंबई भेजा गया. यह टीम मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के साथ मिल कर आरोपियों की तलाश में जुट गई.

फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह ने लगातार जांच कर के ध्रुव के अपहरण में साजिद बेग और फतेहपुर के रहने वाले अयाज के साथ उस के संबंधों के बारे में पता लगाया.

एसपी ध्रुव के घर वालों को सांत्वना देने के साथ यह भी बताते रहे कि उन्हें अपहर्ता को किस तरह बातों में उलझा कर रखना है, ताकि पुलिस बच्चे तक पहुंच सके. पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश और एक टीम पश्चिम बंगाल भी भेजी गई. पुलिस को संकेत मिले थे कि अपहर्ता धु्रुव को ले कर मुंबई, कोलकाता या कानपुर जा सकते हैं.

लगातार भागदौड़ के बाद सीकर पुलिस ने मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की मदद से 21 मई की आधी रात के बाद मुंबई के बांद्रा  इलाके से ध्रुव को सकुशल बरामद कर लिया. पुलिस ने उस के अपहरण के आरोप में साजिद बेग को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया था. इस के अलावा उस की 2 गर्लफ्रैंड्स को भी गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने वह एसेंट कार भी बरामद कर ली, जिस से ध्रुव का अपहरण किया गया था. सीकर पुलिस 22 मई की रात ध्रुव और आरोपियों को ले कर मुंबई से रवाना हुई और 23 मई को फतेहपुर आ गई.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में मुंबई से साजिद बेग और उस की गर्लफ्रैंड्स यास्मीन जान और हालिमा मंडल को गिरफ्तार किया था. पूछताछ के बाद फतेहपुर के रहने वाले अयाज उल हसन उर्फ हयाज को गिरफ्तार किया गया. इस के बाद सभी आरोपियों से की गई पूछताछ में ध्रुव के अपहरण की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

साजिद बेग पेशे से सिविल इंजीनियर था. वह बांद्रा, मुंबई में मछली बाजार में रहता था. उसे हिंदी, अंग्रेजी व मारवाड़ी का अच्छा ज्ञान था. वह मूलरूप से फतेहपुर का ही रहने वाला था. उस के दादा और घर के अन्य लोग मुंबई जा कर बस गए थे. फतेहपुर में साजिद का 2 मंजिला आलीशान मकान था. वह फतेहपुर आताजाता रहता था. उस की पत्नी भी पढ़ीलिखी है. उस का एक बच्चा भी है.

मुंबई स्थित उस के घर पर नौकरचाकर काम करते हैं. उस के पिता के भाई और अन्य रिश्तेदार भी मुंबई में ही रहते हैं. इन के लोखंडवाला, बोरीवली सहित कई पौश इलाकों में आलीशान बंगले हैं. वह मुंबई में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम करता था. मौजमस्ती के गलत शौक और व्यापार में घाटा होने की वजह से साजिद कई महीनों से आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस पर करीब 30 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. इसलिए वह जल्द से जल्द किसी भी तरीके से पैसे कमा कर अपना कर्ज उतारना चाहता था.

करीब 2 महीने पहले साजिद ने फतेहपुर के रहने वाले अपने बचपन के दोस्त अयाज उल हसन उर्फ हयाज को मुंबई बुलाया. वह 5 दिनों  तक मुंबई में रहा. इस बीच साजिद ने उस से पैसे कमाने के तौर तरीकों के बारे में बात की. इस पर अयाज ने कहा कि फतेहपुर में किसी का अपहरण कर के उस के बदले में अच्छीखासी फिरौती वसूली जा सकती है. हालांकि उस समय यह तय नहीं हुआ था कि अपहरण किस का किया जाएगा.

साजिद ने अयाज को यह कह कर फतेहपुर वापस भेज दिया कि वह किसी ऐसी पार्टी का चयन करे, जिस से मोटी रकम वसूली जा सके. अयाज फतेहपुर आ कर योजना बनाने लगा. अयाज ने पिछले साल फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार के मकान पर पेंट का काम किया था. इसलिए उसे ललित के घरपरिवार की सारी जानकारी थी. उस ने साजिद को ललित के बारे में बताया.

इस के बाद दोनों ने ललित के बेटे ध्रुव के अपहण की योजना बना ली. उसी योजना के तहत शादी का फरजी कार्ड नवलगढ़ से छपवाया गया. इस के बाद कार्ड से कैमिकल द्वारा प्रिंटिंग प्रैस का नाम हटा दिया गया. योजनानुसार साजिद 10 मई को मुंबई से कार ले कर फतेहपुर आ गया और दरगाह एरिया में रहने वाले अपने दोस्त अयाज से मिला. इस के बाद ध्रुव के अपहरण की योजना को अंतिम रूप दिया गया.

15 मई को शादी का कार्ड देने के बहाने साजिद ललित के घर से उस के बेटे धु्रव को अश्विनी के घर ले जाने की बात कह कर साथ ले गया और उसे घर के बाहर खड़ी एसेंट कार में बैठा लिया. उस ने धु्रव से कहा कि गाड़ी में पैट्रोल नहीं है, इसलिए पहले पैट्रोल भरवा लें, फिर अश्विनी के घर चलेंगे.

फतेहपुर में पैट्रोल पंप से पहले ही साजिद ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी तो ध्रुव को शक हुआ. वह शीशा खोल कर ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगा. इस पर साजिद ने उसे कोई नशीली चीज सुंघा दी, जिस से वह बेहोश हो गया.

ध्रुव को बेहोशी की हालत में पीछे की सीट पर सुला कर साजिद अपनी कार से मुंबई ले गया. बीचबीच में टोलनाकों से पहले उस ने 5 बार कार की नंबर प्लेट बदलीं.

साजिद ने अपहृत ध्रुव को मुंबई में अपनी 2 गर्लफ्रैंड्स के पास रखा. इन में एक गर्लफ्रैंड यास्मीन जान मुंबई के चैंबूर में लोखंड मार्ग पर रहती थी. तलाकशुदा यास्मीन को साजिद ने बता रखा था कि वह कुंवारा है. उस ने उसे शादी करने का झांसा भी दे रखा था. साजिद ने यास्मीन को धु्रव के अपहरण के बारे में बता दिया था. यास्मीन फिरौती में मिलने वाली मोटी रकम से साजिद के साथ ऐशोआराम की जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी. इसलिए उस ने साजिद की मदद की और धु्रव को अपने पास रखा.

साजिद की दूसरी गर्लफ्रैंड हालिमा मंडल मूलरूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी. वह पिछले कई सालों से बांद्रा इलाके में बाजा रोड पर रहती थी. उस के 2 बच्चे हैं. साजिद मुंबई पहुंच कर ध्रुव को सीधे हलिमा के घर ले गया था. उस ने उसे ध्रुव के अपहरण के बारे में बता दिया था. हालिमा ने भी फिरौती में मोटी रकम मिलने के लालच में साजिद का साथ दिया और ध्रुव को अपने पास रखा. वह ध्रुव को नींद की गोलियां देती रही, ताकि वह शोर न मचा सके.

फेसबुक पर एक पोस्ट में खुद को मुंबई का किंग बताने वाला साजिद इतना शातिर था कि ललित पोद्दार से या अयाज से बात करने के बाद मोबाइल स्विच औफ कर लेता था, ताकि पुलिस उसे ट्रेस न कर सके. ध्रुव को जहां रखा गया था, वहां से वह करीब सौ किलोमीटर दूर जा कर नए सिम से फोन करता था, ताकि अगर किसी तरह पुलिस मोबाइल नंबर ट्रेस भी कर ले तो उसी लोकेशन पर बच्चे को खोजती रहे.

साजिद के बताए अनुसार, टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देख कर उस ने ध्रुव के अपहरण की साजिश रची थी. सीरियलों को देख कर ही उस ने हर कदम पर सावधानी बरती, लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई. जबकि उस ने पुलिस से बचने के तमाम उपाय किए थे.

23 मई को पुलिस ध्रुव को ले कर फतेहपुर पहुंची तो पूरा शहर खुशी से नाच उठा. पुष्पवर्षा और आतिशबाजी की गई. 9 दिनों बाद बेटे को सकुशल देख कर पार्वती की आंखों से आंसू बह निकले. पिता ललित पोद्दार ने बेटे को गले से लगा कर माथा चूम लिया. सालासर मंदिर में लोगों ने फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह का सम्मान किया.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में साजिद के अलावा यास्मीन जान, हालिमा मंडल और फतेहपुर निवासी अयाज को गिरफ्तार किया था. फतेहपुर के एक अन्य युवक की भी इस मामले में भूमिका संदिग्ध पाई गई. इस के अलावा उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर नसरत उर्फ नागा उर्फ चाचा का नाम भी ध्रुव के अपहरण में सहयोगी के रूप में सामने आया है.

नसरत उर्फ नागा उत्तर प्रदेश के सिमौनी का रहने वाला था. वह फिलहाल मुंबई के गौरी खानपुर में रहता है. साजिद काफी समय से उस के संपर्क में था. उस के साथ नागा भी आया था. उस ने नागा को सीकर में ही छोड़ दिया था.

ध्रुव के अपहरण के बाद नागा साजिद के साथ हो गया था. दोनों ध्रुव को ले कर मुंबई गए थे. नागा पर उत्तर प्रदेश और मुंबई में हत्या के 3 मामले और लूट, चाकूबाजी, हथियार तस्करी, गुंडा एक्ट आदि के दर्जनों मामले दर्ज हैं. वह हिस्ट्रीशीटर है. कथा लिखे जाने तक सीकर पुलिस इस मामले में नागा की तलाश कर रही थी. Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: मधुर व सईद जाफरी – सफल प्रेम असफल संबंध

Love Story: सईद जाफरी ने फिल्मों में भले ही कोई भी भूमिका निभाई हो, हकीकत में वह शाही मिजाज के अभिनेता थे. इतने शाही कि शराब पीने के लिए वह अपना चांदी का गिलास जेब में रखते थे. बड़ीबड़ी पार्टियों में वह उसी में शराब पीते थे. लेकिन यह सफल चरित्र अभिनेता अपने दांपत्य जीवन में असफल था.

सन 1985 में रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘सागर’. इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था, खासकर इस के गानों को. इस की कई वजहें थीं. इन में पहली वजह तो थी फिल्म ‘बौबी’ के बाद डिंपल कपाडि़या की ऋषि कपूर के साथ वापसी. दूसरी वजह थी प्रेमत्रिकोण, जिस में नायक रवि (ऋषि कपूर) विदेश से लौट कर एक मछुआरन लड़की मोना को चाहने लगता है. दरअसल उसे पता नहीं होता कि राजा यानी कमल हासन मोना से बचपन से प्यार करता है. बाद में जब हकीकत पता चलती है तो दोस्ती की खातिर वह अपने प्यार को कुरबान कर देता है.

इस फिल्म के हिट होने से यह बात साफ हो गई थी कि किसी घिसेपिटे कथानक पर भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है. बशर्ते उस में अभिनय करने वाले कलाकार दमदार अभिनय करें. फिल्म में रवि की दादी कमलादेवी एक औद्योगिक घराने की मालकिन दिखाई गई थीं, जिन के चेहरे, वेशभूषा और हावभाव से संपन्नता साफ झलकती थी. यह बात उन की बरदाश्त के बाहर थी कि उन का एकलौता पोता एक गरीब मछुआरन से प्यार करे.

यही वजह थी कि रवि और मोना को अलग करने के लिए उन्होंने तरहतरह के हथकंडे अपनाए. यहां तक कि आखिर में उन के आदमी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, जिस में ऋषिकपूर को बचाने में कमल हासन की जान चली जाती है. लेकिन मरतेमरते वह डिंपल का हाथ ऋषिकपूर के हाथों में दे जाते हैं.

फिल्म में कमला देवी यानी दादी का यह किरदार मधुर जाफरी ने निभाया था, जिन्हें दर्शक नाम से भले नहीं जानते थे, लेकिन उन के अभिनय से काफी प्रभावित हुए थे. मधुर जाफरी हिंदी फिल्मों का कोई खास जानापहचाना चेहरा नहीं था, लेकिन इस फिल्म में सशक्त अभिनय के चलते वह दर्शकों के दिल में बस गई थीं. आमतौर पर इस तरह के किरदार ललिता पवार या सुषमा सेठ जैसी अभिनेत्रियां निभाती आई थीं, ऐसी स्थिति में दर्शक खुद से यह सवाल पूछने से रोक नहीं पाए कि आखिर ऋषि कपूर की दादी का किरदार निभाने वाली यह ऐक्ट्रेस कौन है?

इस फिल्म में मधुर जाफरी ऐंग्लो इंडियन सी लगीं, जिन्हें अपनी दौलत पर काफी गुरूर और गुमान था. इसी के चलते वह गरीबों और गरीबी से नफरत करती थीं. यह मधुर जाफरी कोई और नहीं, हाल ही में दिवंगत हुए मशहूर अभिनेता सईद जाफरी की पहली पत्नी थीं, जिन्होंने एक संपन्न एवं क्रूर दादी की भूमिका इसलिए सहजता से निभाई, क्योंकि वह इस किरदार के लिए एकदम फिट थीं. सन 1933 में दिल्ली के एक संपन्न कायस्थ परिवार में पैदा हुईं मधुर परंपराओं और आधुनिकता का अद्भुत मेल थीं. उन के दादा को अंगरेजों से राय बहादुर का खिताब मिला था. वह शाही परिवार से भले नहीं थीं, लेकिन उन का रहनसहन और ठाठबाट किसी शाही परिवार से कम नहीं था.

यह वह दौर था, जब अंगरेज शासकों से नजदीकियां रखने वाले परिवारों की समाज में एक अलग पहचान हुआ करती थी. वे बड़ेबड़े बंगलों में शानोशौकत से रहते थे, बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमते थे. इस तरह के लोग आमतौर पर कला या साहित्य प्रेमी होते थे. उन की लड़कियां बौबकट बाल रख सकती थीं और स्कर्ट पहन कर सड़कों पर घूम सकती थीं, विदेशी कुत्तों को सड़कों पर घुमाया करती थीं. वे फर्राटे से अंगरेजी बोलती थीं. उन के लिए स्कूल और कालेज की शिक्षा इसलिए जरूरी होती थी, क्योंकि समाज में उन्हें अपनी अलग पहचान कायम करनी होती थी. इस तरह के परिवार मध्यमवर्गीय परिवारों के आदर्श हुआ करते थे. रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय होते थे.

मधुर इस का अपवाद इसलिए नहीं रह पाईं, क्योंकि बंदिशें न होते हुए भी उन्होंने कायस्थ परिवारों के संस्कार यथासंभव ढोए. वह बेइंतहा खूबसूरत और प्रतिभावान थीं. अभिनय और नाटकों के प्रति उन का लगाव बचपन से ही था, लेकिन बाद में वह एक इंटरनेशनल शैफ के रूप में जानी गईं. पहले कानपुर और फिर दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मधुर स्थाई रूप से दिल्ली में बस गईं. देश आजाद हो चुका था, लेकिन सामाजिक माहौल बहुत ज्यादा नहीं बदला था, बल्कि विभाजन के वक्त हुए हिंदूमुसलिम दंगों की वजह से कड़वाहट बढ़ गई थी. मधुर को इस सब से कोई सरोकार नहीं था, उन की दुनिया तो नाटकों और पढ़ाईलिखाई तक सिमटी रहती थी. अपनी दोनों बड़ी बहनों ललिता और कमल के साथ वह दिल्ली की सड़कों पर घूमतीं तो किसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थीं.

मधुर के दादा राय बहादुर राजनारायण का अपना अलग रसूख और रुतबा था. लेकिन घर से बाहर और अंदर एक नई संस्कृति और संस्कार पनप रहे थे, जिन में शिक्षा के साथसाथ दीगर शौक पूरे करने की आजादी सभी सदस्यों को थी. दिल्ली के क्वीन मेरी हायर सैकेंडरी स्कूल की छात्रा रहते मधुर ने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू किया तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. जिस अभिजात्य वर्ग की वह थीं, वह अंगरेजी नाटकों खासतौर से विलियम शेक्सपियर को ज्यादा पसंद करता था. तब ऐसे ही नाटक ज्यादा खेले जाते थे. सन 1951 आतेआते वह एक कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने लगी थीं.

18 साल की यह नवयौवना अभी तक प्यार के अहसास से अछूती थी. दिल्ली की कई नामी कला संस्थाओं के साथसाथ मधुर अब तक आकाशवाणी से भी जुड़ गई थीं, जो उस समय एक उपलब्धि की बात मानी जाती थी. सन 1953 में दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज से मधुर ने बीए कर लिया तो घर में उन की शादी की बात चलने लगी.

लेकिन इस बीच 2 सालों में मधुर काफी बदल चुकी थीं, क्योंकि उन्हें सईद जाफरी नाम के एक मुसलिम युवक से प्यार हो गया था. उन का यह प्यार एकदम या पहली नजर का नहीं था, बल्कि धीरेधीरे परवान चढ़ा था. खुद मधुर को भी इस का पता काफी बाद में चला था. पंजाब के मलेरकोटला में सन 1929 में पैदा हुए सईद की पहचान मूलत: ब्रिटिश अभिनेता की रही थी. मुसलिम पंजाबी परिवार के सईद भी उस समय दिल्ली में एक कलाकार के रूप में संघर्ष कर रहे थे. वह आकाशवाणी से जुड़े थे. वहीं उन की मुलाकात मधुर से हुई थी.

केवल मधुर और उन की रुचियों में ही समानता नहीं थी, बल्कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी मेल खाती थी. सईद के पिता डा. हामिद हुसैन जाफरी अपने जमाने के मशहूर फिजीशियन थे. वह उत्तर प्रदेश के कई शहरों के सरकारी अस्पतालों में पदस्थ रहे थे. सईद के नाना खान बहादुर फैजल ईमान मलेरकोटला रियासत के दीवान थे. इस नाते उन की भी नजदीकियां ब्रिटिश शासकों और अधिकारियों से थीं.

सईद के पास भी न आत्मविश्वास की कमी थी और न पैसों की. स्कूली जीवन से ही वह रंगमंच से जुड़े हुए थे. वह भी एक खूबसूरत युवक थे, सुर्ख गुलाबी रंगत, चौड़ा माथा, झूलते घुंघराले बाल उन की शख्सियत में चार चांद लगाते थे. उन के बोलने का अंदाज भी हर किसी को लुभाता था. उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंगरेजी भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले सईद जाफरी ने स्कूल और कालेज में नाटक कर के खूब तारीफ हासिल की थी. तब के हिंदी फिल्मों के अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और मोतीलाल के वह मुरीद थे और उन की फिल्में देख उन की नकल उतारा करते थे.

सईद जाफरी बेशक महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभावान थे, लेकिन खुद को साबित करने के लिए उन्हें संघर्ष भी खूब करना पड़ा. कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें दिल्ली ले आया, जहां उन के सामने रहने और खाने की समस्या थी. इस के लिए उन्होंने सन 1951 में आकाशवाणी में 250 रुपए महीने वेतन पर नौकरी कर ली. हालांकि यह वेतन उन के लिए पर्याप्त नहीं था, लेकिन इतना भी कम नहीं था कि वह गुजरबसर न कर पाते. शुरुआती दिनों में वह आकाशवाणी के पीछे पार्क में बनी बैंच पर सोते थे. एक दिन उन्हें इस हालत में देख कर आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर मसानी मेहरा ने उन्हें वाईएमसीए में 30 रुपए महीने पर एक कमरा किराए पर दिला दिया.

आकाशवाणी में नौकरी करते हुए ही ‘द ईगल हैज टू हैड्स’ नाटक के दौरान उन की मुलाकात मधुर से हुई थी. वह उन के साथ प्रमुख भूमिका में थीं. मधुर सईद के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थीं. सईद उन से ज्यादा पढ़ेलिखे थे. उन्होंने सन 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया था. उन के अंदर अभिनय का कीड़ा कुलबुला रहा था, जिस की वजह से वह सरकारी नौकरी में नहीं गए थे.

पहले मधुर और सईद की निकटता बढ़ी, फिर धीरेधीरे उन की यह निकटता कब प्यार में तब्दील हो गई, दोनों को ही पता नहीं चला. अभिनय में पारंगत दोनों युवा कलाकार अपनेअपने अव्यक्त तरीके से रोमांस कर रहे थे. संस्कारी परिवार से होने की वजह से मधुर पहल नहीं कर पा रही थीं. दूसरी ओर अपने पिता की गोरखपुर की नियुक्ति के दौरान महंतों और मठों में हिंदू धर्म को नजदीक से देख चुके सईद भी उन्हें प्रपोज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें पूरा विश्वास था कि मधुर के घर वाले इस रिश्ते के लिए कभी राजी नहीं होंगे.

लेकिन प्यार हो चुका था. मधुर और सईद दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित गेलार्ड रेस्टोरेंट, जिस में अनगिनत प्रेमकथाओं की पटकथा लिखी गई थी, में घंटों बैठ कर थिएटर, सिनेमा और दुनियाजहान की बातें किया करते थे. लेकिन इजहार की बात आते ही दोनों हिचकिचा जाते थे. इस में धर्म ही नहीं, समाज और देश के हालात भी आड़े आ रहे थे. दोनों एकदूसरे को जाननेसमझने लगे थे, पसंद करने लगे थे और प्यार भी करने लगे थे. यह सच है कि प्यार एक मियाद से ज्यादा खामोश नहीं रह सकता.

सन 1955 में मधुर को राडा (रायल एकेडमी औफ ड्रामेटिक आर्ट) में काम करने के लिए अमेरिका जाने का प्रस्ताव मिला तो सईद खुद को रोक नहीं पाए और एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने मधुर के घर वालों से शादी की इच्छा व्यक्त कर दी. उम्मीद के मुताबिक जवाब ना में मिला, लेकिन वजह धर्म नहीं, बल्कि कमाई बताई गई. मधुर के घर वालों, खासतौर पर पिता जो खुद पिता की मौत के बाद आर्थिक परेशानियां झेल चुके थे का खयाल था कि एक कलाकार इतना नहीं कमा सकता कि उन की बेटी को सुखी रख सके.

लेकिन उन के जवाब से सईद निराश नहीं हुए. वह भी अमेरिका चले गए और अपने दिल की बात, जिसे मधुर सालों से जानती थीं, कह दी. मधुर को पता था कि घर वाले तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने भी वही जवाब दिया. लेकिन सईद समझ रहे थे कि मधुर का यह इनकार दिल से नहीं है. प्रेमिका की दुविधा वह समझ रहे थे. अनमने मन से न कहने के बावजूद मधुर ने उन के सामने राडा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा. बहुत कुछ हासिल करने से पहले सईद मधुर को पा लेना चाहते थे, जिन में उन्हें एक नेक और प्यार करने वाली उदार पत्नी दिख रही थी. बचपन से ही पिता के साथ उत्तर प्रदेश में शहरशहर भटक चुके सईद की ख्वाहिश अपना घर बसाने की थी, कमोवेश यही इच्छा मधुर की भी थी.

आखिर एक दिन हैरतअंगेज तरीके से दोनों ने शादी कर ली और हनीमून मनाने न्यूयार्क चले गए. मधुर सचमुच सईद को बहुत चाहती थीं और शायद इसीलिए उन्होंने अपना नाम सईद की इच्छा के मुताबिक बदल कर मेहरुन्निमा रख लिया था. एक औरत किस हद तक समर्पित होती है, इस से सईद पहली बार रूबरू हुए थे. औरत के समर्पण के बारे में कला और साहित्य की बड़ीबड़ी किताबों में उन्होंने काफी कुछ पढ़ा और सुना था, लेकिन उस सब को खुद की जिंदगी में उतरते देखा तो निहाल हो उठे. प्यार में एक औरत इतनी सहजता से अपना नाम, जाति, धर्म और पहचान सब कुछ बदलने को तैयार हो जाती है, यह उन्होंने मधुर के समर्पण भाव से ही जाना.

दोनों के पास काम की कमी नहीं थी. लंदन, अमेरिका और भारत घूम कर नाटक करते हुए इन का दांपत्य जीवन शुरू हुआ, जिस में वक्त की कमी के चलते रोमांस शायद उतना नहीं रह गया था, जितना एक नवदंपति में होना चाहिए. इस के बाद भी दोनों संतुष्ट और खुश थे और भविष्य के लिए बहुत सा पैसा कमा लेना चाहते थे. उसी दौरान दोनों मशहूर फिल्मकार इस्माइल मर्चेंट के संपर्क में आए, जिन्हें ऐसे ही प्रतिभाशाली कलाकारों की जरूरत थी. दोनों शिद्दत के साथ मर्चेंट से जुड़ गए और इस्माइल आइवरी प्रोडक्शन के लिए काम करने लगे.

शादी के एक साल बाद ही बेटी जिया पैदा हुई. 2 सालों के अंतर से मीरा और सकीना हुईं. लगातार मां बनने के कारण मधुर जितना थिएटर से दूर होती गईं, सईद उतना ही काम में व्यस्त होते गए. उन्हें पहले के मुकाबले नाम और पैसा ज्यादा मिलने लगा था. इस दौरान अमेरिका और लंदन में रहते हुए उन्हें मुकम्मल शोहरत और दौलत मिली, जिस के लिए वह कोशिश कर रहे थे.

बेटियों की परवरिश कर रहीं मधुर ने पूरी तरह से काम नहीं छोड़ा था. वह शौकिया ही सही, पहले की तरह यात्रा संस्मरण लिख रही थीं, इसी के साथ वह भारतीय व्यंजनों पर लिखने का काम भी करने लगी थीं. यह उन का बचपन से पसंदीदा काम था. जिंदगी एक ढर्रे पर आ कर ठहर गई थी, जिस में बेटियों की किलकारियां, मासूम शरारतें और जिया के पहली बार स्कूल जाने का अनुभव था. लेकिन इस बीच पति का साथ कम होता गया था. सईद लगातार व्यस्त होते जा रहे थे, लेकिन अच्छी बात यह थी कि वह कामयाब हो रहे थे.

सईद पत्नी, बच्चों और खुद पर खुले हाथों खर्च करने वालों में थे. उन के शौक अब परवान चढ़ते जा रहे थे, जिस में महंगे सूट, सिगरेट और महंगी शराब खास थे. लेकिन वह खुद समझ नहीं पा रहे थे कि ये साधारण सफलताएं उन्हें उदंड क्यों बना रही हैं? वह बेवजह चिड़चिड़े होते जा रहे थे. इंगलैंड और अमेरिका से उन का मन ऊबने लगा था, लिहाजा उन्होंने भारत वापस आने का फैसला ले लिया. मेहरुन्निमा इस फैसले से असहमत नहीं थी. सन 1961 में वे दिल्ली वापस आए और भारत सरकार के टूरिस्ट औफिस में बतौर पब्लिसिटी औफिसर नौकरी कर ली.

लेकिन सईद और मधुर के बीच अब सन्नाटा सा पसरने लगा था. सईद ब्रिटिश संस्कृति से प्रभावित थे, जबकि मधुर उन की तरह पाश्चात्य सभ्यता की दीवानी  नहीं थीं. सईद पत्नी में बदलाव देखना चाहते थे और इस के लिए उन पर दबाव भी बना रहे थे. वैसे तो मधुर एक आज्ञाकारी पत्नी थीं, लेकिन उन्हें दबाव सहन करने की आदत नहीं थी. अपनी तरफ से उन्होंने पूरी कोशिश की कि कोई विवाद और कलह न हो, पर ऐसा होने लगा था.

कुछ दिनों बाद सईद और मधुर की मुलाकात एक बार फिर इस्माइल मर्चेंट और उन के सहयोगी आइवरी से हुई और फिल्मों पर काम शुरू हो गया. अब मधुर के पास ज्यादा वक्त था, लिहाजा मौके भी उन्हें ही ज्यादा मिले. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि मधुर का नाम सईद से ज्यादा चलने लगा था. हां, उन की पूछ जरूर बढ़ रही थी. इस के बावजूद सईद उन से पहले की तरह संतुष्ट नहीं थे. जबकि असंतुष्ट रहने की वजह भी उन की समझ में नहीं आ रही थी. मधुर से वह कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखने लगे थे, पर वे उम्मीदें किस तरह की हैं और उन से हासिल क्या होगा, यह वह नहीं समझ पा रहे थे.

अलगाव के बीज अंकुरित हो उठे थे. दोनों ही अभिजात्य और कुलीन पृष्ठभूमि से थे, लिहाजा उन के बीच का तनाव भी अभिजात्य और कुलीन था, जिस से बचने की वे जितनी ज्यादा कोशिश कर रहे थे, उतना ही ज्यादा उस की गिरफ्त में आते जा रहे थे. किशोरवय की मेलमुलाकातें, कनाट प्लेस का घूमनाफिरना, गेलार्ड में घंटों एकदूसरे के साथ बैठ कर बातें करना, दीवानों की तरह एकदूसरे को चाहना और डूब कर प्यार करना, गुजरे कल की बातें हो चली थीं.

खटपट शुरू हुई और मुंह खुले तो सन 1966 में दोनों का तलाक हो गया. यह सईद का पुरुषोचित अहं था या फिर शादी से पहले मधुर और उन के अभिभावकों के सामने शादी के लिए गिड़गिड़ाने का प्रतिशोध या ग्लानि, यह तय कर पाना मुश्किल था. उधर मधुर जैसी पत्नी के लिए जिंदगी के वे दिन बेहद कठिन दिन थे. क्योंकि पति ही उन के लिए सब कुछ था. बेटियां छोटी थीं और उन्हें मां के साथसाथ पिता की भी जरूरत थी. लेकिन बात नहीं बनीं. विधिवत तलाक के बाद दोनों अलग हो गए. बेटियां मां के साथ ही रहीं. हैरानी की बात यह थी कि इस तलाक से न सईद टूटे और न ही मधुर विचलित हुईं. इस के बजाए दोनों और ज्यादा ऊर्जा से अपनेअपने कामों में लग गए.

मधुर ने पाक कला पर लिखना शुरू किया तो अमेरिका और इंगलैंड में उन की रैसिपीज को हाथोंहाथ लिया गया. परंपरागत भारतीय व्यंजनों पर उन्होंने पूरी शृंखला लिख डाली, जिस का ताजा संस्करण भारतीय शाकाहारी करी है. पत्रपत्रिकाओं से ले कर टेलीविजन तक मधुर शैफ के रूप में दिखने लगीं. आज भी वह चर्चित और लोकप्रिय शैफों की रोल मौडल हैं. दूसरी ओर मधुर से तलाक के बाद सईद जाफरी जेनिफर ईरीन सोरेल नाम की अमेरिकन महिला से प्यार करने लगे थे, जो पेशे से फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर थी.

वह वैसी ही थी जैसी छवि जाफरी उस में देखना चाहते थे. इस बार उन्होंने प्रपोज करने और शादी का फैसला लेने में देर नहीं की. उन्होंने तलाक के तुरंत बाद शादी कर ली. सईद एक कलाकार जरूर थे, लेकिन उन के दिल में आममर्दों की तरह यह ख्वाहिश भी कहीं दबी थी कि अब मधुर पछताएगी, उन्हें याद करेगी और उन के पास आ कर गिड़गिड़ाएगी.

लेकिन हुआ इस का उलटा. शादी के चंद महीनों बाद ही जेनिफर ने जता दिया कि उसे पति की उतनी परवाह नहीं है, जितनी एक पत्नी को होनी चाहिए. महत्त्वाकांक्षी जेनिफर को अपने काम की फिक्र ज्यादा रहती थी, सईद की बिलकुल नहीं. भारतीय और पाश्चात्य पत्नियों में कितना फर्क है, यह बात सईद की समझ में आ गई थी, लेकिन अब पछतावे के सिवाय उन के पास कुछ नहीं था. फिर भी सईद ने हिम्मत नहीं हारी. सईद को स्टेज कलाकार के रूप में वह सब नहीं मिला था, जो व्यावसायिक हिंदी फिल्मों में काम कर के मिला.

70 के दशक से ले कर 2015 तक उन्होंने सौ से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में अभिनय किया और सभी में खासे सराहे गए. पैसा भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिला. गांधी फिल्म में वल्लभभाई पटेल की भूमिका में उन्होंने मानों पटेल के रौबीले व्यक्तित्व को साकार कर दिया था. शुरुआती फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से ही उन्होंने जता दिया था कि वह बेहद मंझे और सधे अभिनेता हैं, जिस की संवाद अदायगी की अपनी खास शैली है, जिस के चेहरे के हावभाव किसी दूसरे पेशेवर ऐक्टर से ज्यादा बेहतर तरीके से बदलते हैं. शतरंज के खिलाड़ी में सईद जाफरी ने संजीव कुमार के सामने शतरंज खेलते हुए उन से कमतर अभिनय नहीं किया था. ‘हिना’ से ले कर ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर ही दम लिया.

सईद जाफरी ने फिल्म इंडस्ट्री के तमाम दिग्गजों के साथ काम किया और हर फिल्म में बेहतर से बेहतर अभिनय कर के पहले से ज्यादा वाहवाही लूटी. ‘चश्मेबद्दूर’ और ‘मासूम’ जैसी दर्जनों फिल्मों में वह एकदम अलग रोल में थे. इस के बावजूद वह हर चुनौतीपूर्ण भूमिका में खरे उतरे. सईद जाफरी बेशक बेहतरीन कलाकार थे. लेकिन उन के बारे में यह बात गिनेचुने लोग ही जानते थे कि वह एक असफल पति हैं. मधुर को तलाक दे कर वह जिंदगी भर पछताते रहे. खुद उन का मानना था कि जेनिफर की बेरुखी उन्हें अकसर मेहरुन्निमा की याद दिलाती रही, जो एक आज्ञाकारी नेक और उदार पत्नी थीं. तलाक के 7 सालों बाद उन्होंने कहीं शैफ मधुर जाफरी के बारे में पढ़ा और उन की तसवीर देखी तो चौंक पड़े और उन से मिलने अमेरिका जा पहुंचे, जहां मधुर सेनफोर्ड एलन से शादी कर के दोबारा घरगृहस्थी बसा चुकी थीं.

सईद से तलाक के करीब 3 सालों बाद उन्होंने दोबारा शादी का फैसला लिया था. इस की अहम वजह बेटियों को पिता का प्यार दिलाना था. इस मामले में सेनफोर्ड मधुर से किए अपने वादे पर एकदम खरे उतरे थे. मधुर का दूसरी शादी का फैसला सईद की तरह न गलत था, न चयन में कोई त्रुटि. सईद जब उन से मिलने पहुंचे तो मधुर ने मिलने से साफ मना कर दिया, पर तीनों बेटियों जिया, मीरा और सकीना ने एक बार उन से मिलना जरूर मुनासिब समझा. मुनासिब इसलिए नहीं कि उन्हें सईद से कोई लगाव था, बल्कि इसलिए कि वे सईद को बताना चाहती थीं कि उन के नए पिता दुनिया के बेहतरीन पिता हैं और वह जानते हैं कि सच्चा प्यार क्या होता है. मम्मी जैसी थीं, उन्हें वैसा ही उन्होंने स्वीकार कर लिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में पूरी मदद की.

यह सईद जाफरी की जिंदगी का सब से कड़वा दिन था. जब संतान पिता को अच्छाबुरा सिखाने और समझाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि दुनिया और रिश्तेनाते हमेशा आप के मुताबिक नहीं चलते, क्योंकि आप उन के मुताबिक नहीं चले थे. मधुर के प्रति अपनी क्रूरता को स्वीकारना बताता है कि सईद जाफरी में कन्फैशन की हिम्मत थी, जो आमतौर पर लोगों में नहीं होती. उस दिन सईद की समझ आया कि शायद वह किसी को प्यार नहीं करते, इसलिए कोई उन्हें प्यार नहीं करता.

एक कामयाब रंगमंचीय और फिल्मी कलाकार की इस हालत पर तरह खाया जा सकता है, जिस का जिम्मेदार भी वह खुद ही था. लेकिन दाद उन की चाहत को भी देनी पड़ेगी कि वह अपनी पहली पत्नी मधुर को कभी भुला नहीं पाए. सईद ने बेहद स्वस्थ मन से माना कि दांपत्य में जीवनसाथी को बदलने की कोशिश से ही रिश्ता टूटता है. शायद मधुर के प्रति इसी चाहत का नतीजा था कि फिल्म ‘सागर’, जिस में वह डिंपल कपाडि़या के पिता के रोल में थे. सेट पर आमनासामना होने पर मधुर ने कभी सिर उठा कर उन्हें देखने की जहमत नहीं उठाई, न ही जरूरत महसूस की. लेकिन सईद ने मधुर को जरूर जी भर के देखा होगा. ठीक वैसे ही, जैसे कभी आकाशवाणी और कनाट प्लेस में देखा करते थे. इसलिए अपनी तमाम फिल्मों में सागर उन के लिए ज्यादा अहम थी.

बीते 14 नवंबर को जब सईद की भतीजी शाईन अग्रवाल ने उन की मौत की खबर सोशल मीडिया के जरिए दी तो बौलीवुड में उन्हें नजदीक से जानने वाले कलाकारों ने यह जरूर सोचा होगा कि जरूरी नहीं कि एक सफल अभिनेता सफल पति भी हो. Love Story

 

Hindi stories: मैं कहा आ गई

Hindi stories: नरगिस जो सोच कर दिलशाद बेगम का कोठा छोड़ कर भागी थी, जब उसे वैसा ही माहौल भाई के घर में भी मिला तो उसे लगा, इस से अच्छा तो दिलशाद बेगम का कोठा ही था. अंतर सिर्फ इतना है कि यहां डांस को आर्ट कहा जाता है और वहां मुजरा.

सिसिगरेट का लंबा कश खींच कर गुलजार खां बोला, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं तुम से फिर कह रहा हूं, शरीफों का खून बड़ा बेएतबार होता है. किसी दिन खट्टा खाओगी. मेरी मेहनत बेकार जाएगी.’’

‘‘गुलजार खां, उसे पढ़ने का शौक था, मैं ने पढ़ने बैठा दिया. बस, इतनी सी बात है. आंखें दिखाते ही सिर से पांव तक कांप जाती है.’’

‘‘मगर तुम यह क्यों भूल जाती हो कि पढ़नेलिखने से अच्छाईबुराई में तमीज करना आ जाता है. जिस दिन ऐसा हो गया, समझो, गई हाथ से.’’

‘‘समझ में नहीं आता, तुम्हारी इस बात पर हंसूं या कहकहे लगाऊं. जितने तमाशाई हमारे यहां आते हैं, माशाअल्लाह सब पढ़ेलिखे होते हैं. अच्छे खानदानों से भी होते होंगे, लेकिन सफेद कपड़े पहन कर कीचड़ में आ जाते हैं. नरगिस कीचड़ में कमल सी है.’’

‘‘तमाशा देखना अलग बात है, तमाशा बनना अलग. वे सब तमाशा देखने आते हैं, तमाशा बनने नहीं. नरगिस की बात और है.’’

‘‘पैदा किए की तो खैर मोहब्बत होती ही है, मगर पालने की मोहब्बत भी कम नहीं होती. 4 साल की उम्र से पाला है उसे.’’

‘‘बेचारी तुम्हीं को अपनी मां समझती है,’’ गुलजार खां ने दांत निकालते हुए कहा. फिर एकदम संजीदा हो गया, ‘‘अच्छा, यह बताओ, तुम से उस ने कभी अपने बाप का नाम पूछा है?’’

‘‘हां, बचपन में पूछती थी, मगर अब शायद समझ गई है कि इस बाजार में बाप नहीं, सिर्फ मां होती हैं.’’

‘‘अगर उसे मालूम हो जाए कि उस का कोई बाप भी है और तुम उस की मां नहीं हो तो सोचो, क्या होगा?’’

‘‘यह तो मैं बाद में सोचूंगी, पहले तुम यह बताओ कि तुम्हें आज हुआ क्या है?’’

‘‘हुआ यह है कि मुझे 20 हजार रुपए की जरूरत है.’’

‘‘मैं तुम्हें नरगिस की कीमत से बहुत ज्यादा दे चुकी हूं.’’

‘‘वह तो मुझे मिल चुकी है. अब मैं इस राज को छिपाने के लिए थोड़े से पैसे मांग रहा हूं. तुम्हें नहीं मालूम, किसी राज को छिपाना कितना मुश्किल होता है.’’

‘‘अब तुम्हें देने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है,’’ दिलशाद बेगम गुर्राई, ‘‘और हां, इस घमंड में मत रहना कि तुम नरगिस को मेरे खिलाफ भड़का दोगे. मैं ने कच्ची गोलियां नहीं खेलीं. मैं तुम्हारी तरफ से उस के दिल में इतना जहर भर चुकी हूं कि अब वह तुम्हारी सूरत से भी नफरत करती है.’’

‘‘सोच लो, दिलशाद बेगम.’’

‘‘सोच लिया. यह कोठा यूं ही नहीं चला रही हूं.’’

दिलशाद बेगम के लहजे में इतना विश्वास था कि गुलजार खां खुशामद पर उतर आया, ‘‘दिलशाद बेगम, मैं ने तुम्हारी कितनी खिदमत की है और तुम हो कि मामूली सी रकम के लिए इनकार कर रही हो.’’

‘‘इनकार नहीं कर रही, तुम्हारी धमकियों का जवाब दे रही हूं.’’

‘‘धमकियां कैसी? मैं तो मजाक कर रहा था. लाओ, जल्दी से रकम निकालो.’’

‘‘एक शर्त पर. आइंदा तुम मेरे पास रकम लेने नहीं आओगे.’’

‘‘मंजूर है.’’

‘‘तुम बैठो, मैं अभी आई.’’ कह कर दिलशाद बेगम अपने कमरे में चली गईं.

आगे क्या होता है, यह देखने या सुनने की नरगिस को जरूरत नहीं थी. वह उलटे कदमों वापस हुई और घर से बाहर निकल गई. उस की हालत उस परिंदे की तरह थी, जिस के पर काट कर तेज हवा में उसे छोड़ दिया गया हो. उस ने ये बातें इत्तिफाक से सुन तो ली थीं, लेकिन उसे यह मालूम नहीं था कि सच्चाई का रहस्योद्घाटन कितना कष्टदायक होता है. कल तक वह कितनी मजबूत थी. आज रेत की दीवार की तरह बैठी जा रही थी. अगर गुलजार खां उस से यह बात कहता तो शायद वह कभी यकीन न करती. लेकिन दिलशाद बेगम, जिसे अब तक वह अपनी मां समझती रही थी, उस ने खुद कबूल किया था कि वह उस की मां नहीं है.

नरगिस इस बाजार की गंदगी को कबूल कर चुकी थी. वह यहां पैदा हुई है तो यहीं के आदाब उस पर सजेंगे. उसे कभी भूले से अपने बाप का खयाल आया भी था तो वह यह सोच कर हंस दी थी कि इस बाजार में किसे यह नेमत मिलती है, जो उसे मिलेगी. लेकिन जैसे ही उस पर राज खुला कि वह किसी की अमानत है, उसे खयानत के अहसास ने बेचैन कर दिया. वह अब तक अपने बाप का नाम डुबोती रही है. लेकिन कौन बाप? गुलजार खां ने यह तो बताया ही नहीं. कहीं वह जल्दी तो वहां से नहीं हट गईं? शायद उस ने बाद में नाम भी बताया हो.

गली में उस वक्त सन्नाटा था. इक्कादुक्का लोग चलफिर रहे थे. इन गलियों में तो रातें जागती हैं, दिन सोते हैं. उस वक्त भी दरोदीवार ऊंघ रहे थे. अगर सुगरा उसे बुला कर न ले गई होती तो वह भी इस वक्त सो रही होती. सुगरा उस के पड़ोस में रहती थी और नरगिस की तरह वह भी तालीम की मंजिल से गुजर रही थी. सुगरा और वह एक ही उस्ताद से नाच की तालीम हासिल कर रही थीं.

नरगिस इन्हीं खयालों में गुम थी कि उसे गुलजार खां आता दिखाई दिया.

‘‘गुलजार खां.’’ नरगिस ने उसे हौले से पुकारा.

‘‘हूं, क्या है?’’

‘‘तुम कल मुझ से मिल सकते हो?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस, ऐसे ही.’’ नरगिस ने इठलाते हुए कहा.

‘‘मैं आज ही एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर जा रहा हूं.’’

‘‘मेरी खातिर एक दिन के लिए रुक नहीं सकते?’’ नरगिस फिर इठलाई.

नरगिस ने उस से कभी सीधे मुंह बात नहीं की थी. उस ने अदाएं दिखाईं तो गुलजार खां के मुंह में पानी आ गया, ‘‘चल, तू कहती है तो रुक जाता हूं, लेकिन बात क्या है?’’

‘‘कल ही बताऊंगी.’’ नरगिस ने कहा और भागती हुई घर में चली गई.

नरगिस घर में दाखिल हुई तो दिलशाद बेगम उस के इंतजार में थी. दिलशाद बेगम उसे देखते ही गुर्राई, ‘‘कहां थीं तुम?’’

नरगिस का जी चाहा कि उस से भी ज्यादा जोर से चीख कर कहे, ‘तुम यह पूछने वाली कोन होती हो?’ लेकिन अभी इस का वक्त नहीं आया था. इसलिए बोली, ‘‘जरा देर के लिए सुगरा के पास गई थी.’’

‘‘खबरदार, जो कल से तू ने एक कदम भी बाहर निकाला.’’

‘‘अच्छा अम्मां.’’

‘‘और यह भी सुन लो. बहुत पढ़ चुकी. मैं कल मास्टर साहब को मना कर दूंगी. सिर्फ उस्तादजी आएंगे. हमारा रिश्ता किताबों से नहीं, घुंघरुओं से है. उसी में मन लगाओ.’’

नरगिस ने यह भी नहीं पूछा कि यह जुल्म क्यों कर रही हो? उस ने किसी प्रतिक्रिया का इजहार किए बगैर सिर झुका कर अपने कमरे का रास्ता लिया. अब उसे यह सोचना था कि वह हालात से समझौता कर ले या उस माहौल से बगावत कर के यहां से निकल जाए, लेकिन यहां से निकल कर कहां जाए? इस का फैसला गुलजार खां से मुलाकात के बाद ही किया जा सकता था. रात को नरगिस सोने के लिए लेटी तो नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. जिस बिस्तर पर वह शौक से लेटती थी, आज गंदगी का अहसास हो रहा था. उसे अपनेआप से घिन आ रही थी. सोचतेसोचते जैसे किसी ने उस के जेहन में कोई झरोखा खोल दिया.

उस ने उस झरोखे से बाहर झांक कर देखा. शादी का घर था, मेहमानों से भरा हुआ शोर था. 4 साल की एक बच्ची सुर्ख रंग के कपड़े पहने, तितली की तरह इधर से उधर घूमती फिर रही थी. फिर उस के जी में न जाने क्या आया कि अकेली घर से बाहर आ गई. सामने गुब्बारे वाला खड़ा था. वह उस के करीब जा कर खड़ी हो गई और हसरतभरी नजरों से गुब्बारों की तरफ देखने लगी.

‘‘गुब्बारा लोगी?’’ एक आदमी ने उस के करीब आ कर बड़े प्यार से पूछा.

‘‘पैसे नहीं हैं.’’ वह बोली.

‘‘पैसे मैं दिए देता हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

‘‘नहीं, अम्मा कहती हैं, किसी से पैसे नहीं लेते.’’

‘‘गैरों के लिए कहा होगा, मैं तो चचा हूं तुम्हारा.’’

बच्ची राजी हो गई. गुब्बारे वाला इतनी देर में आगे बढ़ चुका था. वह उस की उंगली थामे आगे बढ़ती रही. फिर क्या हुआ था? नरगिस ने याददाश्त के झरोखे में झांक कर देखा, दूर तक अंधेरा फैला हुआ था. रेल की सीटी की आवाज आई. वह रो रही थी. फिर चुप हो कर सो गई. अम्मा का चेहरा तो कुछकुछ याद भी था, अब्बा तो बिलकुल याद नहीं थे.

नरगिस को ताज्जुब हो रहा था कि अब तक उसे ये बातें क्यों याद नहीं आई थीं. खयाल तक नहीं आया था इन बातों का. गुलजार खां, तू ने यह क्या कर दिया? ऐसी बातें मेरे कानों में क्यों डाल दीं? मैं गफलत की नींद सो रही थी, तू ने मुझे क्यों जगा दिया? क्या मैं अब जिंदगीभर सो सकूंगी? जो बिछड़ गए, जिंदा भी होंगे? जिंदा हुए भी तो मुझे मिलेंगे कैसे?

दिन निकल गया. नरगिस सोई कब थी कि जागती. उस ने अपने मंसूबे के मुताबिक जरूरी तैयारी की और गुलजार खां का इंतजार करने लगी. दोपहर के करीब जब दिलशाद बेगम अपने कमरे में सो रही थी, गुलजार खां आ गया. वह उस वक्त आया ही इसलिए था कि दिलशाद बेगम सो रही होगी.

‘‘गुलजार खां, तुम अम्मा से पैसे मांग रहे थे?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘हां, मांगे तो थे, लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’’

‘‘किसी ने भी बताया हो, मगर यह बात सही तो है न?’’

‘‘कह तो रहा हूं सही है.’’

‘‘क्या जरूरत आ पड़ी?’’

‘‘मेरी बेटी की शादी है. उस की मां को मैं तलाक दे चुका हूं. बेटी से भी नहीं मिलता, लेकिन है तो मेरा खून. उस की शादी का सुना तो मैं ने सोचा, कोई जेवर बनवा दूं,. कुछ हक मेरा भी तो है.’’

‘‘क्या तुम अपनी बेटी से बहुत मोहब्बत करते हो?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘मोहब्बत तो मुझे मालूम नहीं, किस बला का नाम है, लेकिन उस की शादी का सुना तो दिल चाहा कि मैं भी उस के लिए कुछ करूं.’’

‘‘जिसे खुश करने के लिए अपना सब कुछ कुरबान करने को जी चाहे, वही महबूब होता है. इसी जज्बे का नाम मोहब्बत है.’’

‘‘होगा, मुझे क्या?’’ गुलजार खां लापरवाही से बोला.

‘‘तुम अपनी बेटी से मिलते तो हो नहीं, बरसों से तुम ने उसे देखा भी नहीं होगा?’’

‘‘मिलने या न मिलने से क्या होता है. बेटी तो है वह मेरी.’’

‘‘वह भी तुम से मोहब्बत करती होगी?’’

‘‘क्यों नहीं करती होगी?’’

‘‘फिर तुम से मिलने क्यों नहीं आती?’’

‘‘अपनी मां के डर से. उस की मां बड़ी जालिम है.’’

‘‘मैं भी अपनी मां के डर से अपने बाप से नहीं मिलती.’’

‘‘कौन सी मां?’’ गुलजार खां अनजाने तौर पर पूछ बैठा.

‘‘दिलशाद बेगम और कौन?’’ नरगिस ने इत्मीनान से जवाब दिया.

‘‘हां, मगर बाप… बाप कौन है तुम्हारा?’’

‘‘यही पूछने के लिए तो मैं ने तुम्हें बुलाया है.’’

‘‘दिमाग खराब है क्या?’’ गुलजार खां ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं क्या ठेकेदार हूं तुम्हारे बाप का, और यह ठेकेदारी कबूल कर भी ली तो इस बाजार में किसकिस के बाप को तलाश करता फिरूंगा?’’

‘‘अगर नहीं मालूम तो छोड़ो.’’ कह कर नरगिस अपनी जगह से उठी और जेवर का डिब्बा ला कर गुलजार खां के सामने रख कर बोली, ‘‘ये कुछ जेवर हैं.’’

‘‘वह तो मैं भी देख रहा हूं, मगर तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘गुलजार खां, तुम ये जेवर अपनी बेटी को दे दो.’’

‘‘ये…ये… सब मेरा मतलब है, ये सब ले लूं?’’ गुलजार खां ने बेसब्री से जेवर की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘‘नहीं, ऐसे नहीं.’’

‘‘फिर कैसे?’’

‘‘मुझे जिस घर से उठाया था, उस घर की निशानदेही कर दो. मेरा बाप भी तो मेरी शादी के लिए पैसे जमा करता फिर रहा होगा. उस की मेहनत ठिकाने लगा दो…’’

‘‘मेरा क्या वास्ता तुम्हारे बाप से…?’’

‘‘अब कोई फायदा नहीं गुलजार खां, मुझे वह गुब्बारे वाला याद आ गया है, जिस के पीछेपीछे मैं चली थी. वह आदमी तुम ही थे, जिस ने मेरी उंगली थाम कर कहा था, ‘गुब्बारा लोगी?’ तुम गुब्बारा तो नहीं दिला सके, यह कोठा दिला दिया.’’

‘‘ऐ लड़की, लानत भेज अपनी याददाश्त पर. मैं ऐसे घटिया काम नहीं करता.’’

‘‘गुलजार खां, मैं ने दिलशाद बेगम से तुम्हारी बातचीत सुन ली है. अब तुम सीधी तरह मुझे मेरे बाप का नाम बता दो.’’

‘‘मैं ऐसी बेहूदा बातों का जवाब नहीं देता. हिम्मत है तो दिलशाद बेगम से पूछो.’’

‘‘गुलजार खां, सोच लो. तुम्हारे 2 लफ्जों की कीमत ये सारे जेवर हैं.’’

गुलजार खां के चेहरे का रंग बदलने लगा. लगता था, जैसे वह किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले सोचने की क्रिया से गुजर रहा है.

‘‘गुलजार खां, तुम ने जिंदगी में शायद ही कोई नेक काम किया हो. आज एक नेकी कमा लो. जरा सोचो, तुम्हारी बेटी इतने जेवर देख कर कितनी खुश होगी.’’ नरगिस ने उस की गैरत को झिंझोड़ा.

‘‘अगर दिलशाद बेगम को मालूम हो गया, तो…?’’

‘‘फिक्र मत करो. तुम्हारा नाम कहीं नहीं आएगा. तुम्हारा नाम लेने के लिए मैं यहां रहूंगी ही नहीं.’’

‘‘लेकिन मैं तुम्हें क्या बताऊं? इतना अरसा गुजर गया, मुझे कुछ याद नहीं रहा.’’

‘‘सोचो, गुलजार खां, सोचो. जेहन पर जोर डालो. याद करो. कुछ तो याद होगा.’’

‘‘सच्ची बात तो यह है कि मैं तुम्हारे बाप को जानता तक नहीं. वह मकान तक मुझे याद नहीं, जहां से मैं ने तुम्हें उठाया था.’’

‘‘वह शहर तो याद होगा.’’

‘‘हां, शहर याद है. मोहल्ला भी याद आ जाएगा, लेकिन मकान, यह मुश्किल है.’’

‘‘शहर और मोहल्ला ही बता दो.’’

‘‘मैं ने तुम्हें मुलतान से उठाया था और मोहल्ले का नाम था मुमताजाबाद. इस के सिवा मुझे कुछ याद नहीं.’’

नरगिस के तनबदन में आग लग रही थी. उस का दिल चाह रहा था कि गुलजार खां का मुंह नोच ले. उस का मुजरिम उस के सामने था, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती थी.

‘‘अब तुम क्या करोगी?’’ गुलजार खां ने पूछा.

‘‘करना क्या है. मुलतान जाऊंगी. मुमताजाबाद में कोई तो जानता होगा कि 15 साल पहले वहां किस की दुनिया उजड़ी थी. कुछ तो मालूम होगा. कुछ भी कर लूंगी, मगर अब यहां नहीं रहूंगी.’’

नरगिस बोलती रही और गुलजार खां डिब्बे से जेवर निकाल कर कंधे पर पड़े रूमाल में बांधता रहा. उस ने तमाम जेवर समेटे और खामोशी से बाहर निकल गया. अब नरगिस सोच रही थी कि यहां से कैसे निकले? जिस घर में उस ने 15 बरस काट दिए थे, अब वहां 15 मिनट गुजारना भी मुश्किल था.

अगले दिन सुबह हुई, फिर दोपहर हुई और फिर पूरे बाजार में यह खबर फैल गई कि नरगिस भाग गई.

दिलशाद बेगम को रहरह कर गुलजार खां की बात याद आ रही थी. उस ने कहा था, ‘ज्यादा ढील मत दो, वरना खट्टा खाओगी.’ ठीक कहता था. खा लिया खट्टा. ऐसी हर्राफा निकली कि कानोंकान खबर नहीं होने दी और भाग गई.

नरगिस ने एक बड़ी चादर से अपने जिस्म को अच्छी तरह लपेटा हुआ था. दिन का वक्त था, इसलिए चहलपहल जरा कम थी. वह गली से निकली और जिधर मुंह उठा, पैदल चल दी. वह गली से निकलते ही तांगे में बैठ सकती थी, लेकिन खामख्वाह तांगे वाले के फिकरों का निशाना बनना नहीं चाहती थी. जब उसे यकीन हो गया कि वह बहुत दूर निकल आई है तो उस ने एक तांगे वाले को हाथ दिया.

‘‘स्टेशन चलोगे?’’

‘‘क्यों नहीं चलेंगे, सवारियां कहां है?’’ तांगे वाले ने पूछा.

‘‘मैं अकेली हूं.’’ नरगिस बोली.

‘‘बैठिए.’’

नरगिस तांगे की पिछली सीट पर बैठ गई. तांगे वाले ने चाबुक लहराई और घोड़े ने कदम उठा दिए.

‘‘स्टेशन जा रही हैं, तो किसी दूसरे शहर भी जा रही होंगी, लेकिन यों खाली हाथ…?’’

नरगिस का जी चाहा कि उसे डांट दे, लेकिन यह सोच कर गुस्सा पी गई कि बातचीत के दौरान शायद कोई मतलब की बात हाथ लग जाए, ‘‘मेरी सास रावलपिंडी से सवार हुई होंगी. मेरा सामान उन्हीं के पास है.’’

‘‘लेकिन इतनी जल्दी क्यों जा रही हैं? गाड़ी आने में पूरे 2 घंटे बाकी हैं.’’

‘‘मेरी घड़ी खराब थी.’’

 

तांगे वाले ने इस बार कोई नया सवाल नहीं उठाया. समझ में नहीं आता था कि वह नरगिस के स्पष्टीकरण से आश्वस्त हो गया है या मायूस हुआ था. स्टेशन आ गया तो उस ने अजीब अंदाज में कहा, ‘‘लो बीबी, स्टेशन आ गया. तुम तो शायद पहली बार यहां आई होगी?’’

नरगिस कुछ नहीं बोली. तांगे वाला पैसे ले कर चलता बना, नरगिस हैरान खड़ी थी. उसे यह तो मालूम था कि टिकट लेना होता है, लेकिन टिकट कहां से मिलेगा, यह मालूम नहीं था. उस ने एक कुली से पूछा और टिकट लेने के लिए कतार में खड़ी हो गई. मुलतान का टिकट लिया और प्लेटफार्म पर पहुंच गई.

गाड़ी आने में अभी काफी देर थी. प्लेटफार्म पर लोगों की भीड़ देख कर उसे बड़ी खुशी हुई. अगर उसे कोई ढूंढने आया भी तो इस भीड़ में छिपना बहुत आसान होगा, नरगिस ने सोचा और एक खानदान के साथ इस तरह मिल कर बैठ गई, जैसे उसी खानदान का हिस्सा हो.

आहिस्ताआहिस्ता भीड़ बढ़ती जा रही थी. शायद गाड़ी आने वाली थी. नरगिस ने चादर से मुंह निकाल कर रेल की खाली पटरियों की तरफ देखा. फिर अचानक उस की आंखों ने जैसे कोई खौफनाक दृश्य देख लिया. वही तांगे वाला, जो उसे ले कर आया था, उसे आता हुआ नजर आया. उस के अंदाज से मालूम हो रहा था, जैसे वह किसी को ढूंढ रहा हो. नरगिस के दिल में एक खौफ ने सिर उठाया, ‘हो न हो, वह मुझे घर से भागी हुई लड़की समझ रहा हो.’

नरगिस ने फौरन चादर उतारी और बिछा कर उस पर आराम से बैठ गई. उसे मालूम था कि तांगे वाला उसे चादर से ही पहचानता है. उस ने चेहरा इतने गौर से नहीं देखा था कि उसे पहचान सकता. हुआ भी वही. तांगे वाला उस के करीब से गुजरा. लेकिन वह उसे पहचान नहीं सका. इतनी देर में गाड़ी आने का शोर मच गया और नरगिस भी दूसरे मुसाफिरों की तरह गाड़ी की तरफ लपकी. जिस खानदान के साथ वह बैठी थी, उसी के साथ एक जनाने डिब्बे में दाखिल हो गई. उस ने चादर फिर ओढ़ ली और एक तरफ सिमट कर खड़ी हो गई.

‘‘अकेली हो?’’ अचानक एक बूढ़ी औरत ने पूछा.

‘‘हां.’’ नरगिस बोली.

‘‘यहां बैठ जाओ.’’ बुढि़या अपनी जगह से थोड़ा सा खिसक गई.

नरगिस उस के करीब जा बैठी.

‘‘कहां जा रही हो?’’ बूढ़ी औरत ने पूछा.

‘‘मुलतान.’’

‘‘अच्छा है, साथ रहेगा. मैं भी मुलतान जा रही हूं.’’

अभी ये बातें हो रही थीं कि तांगे वाला 2 जनाना पुलिसवालियों के साथ डिब्बे में दाखिल हुआ. अब चादर उतारने का वक्त नहीं था. नरगिस ने बूढ़ी औरत से कहा, ‘‘मेरे पीछे बदमाश लगे हैं. आप उन से कह दीजिए कि मैं आप की बहू हूं. बाकी बात मैं आप को बाद में बताऊंगी.’’

बुढि़या अभी गौर ही कर रही थी कि तांगे वाले ने इशारे से बताया कि यही है वह लड़की.

एक पुलिसवाली उस के करीब आई, ‘‘ऐ, क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘शाजिया.’’ नरगिस ने जानबूझ कर गलत नाम बताया.

‘‘घर से भाग कर आई हो?’’

‘‘दिमाग तो ठीक है आप का? मेरी सास बैठी हैं. इन से पूछ लें, मैं कैसे आई हूं.’’

अब बुढिया को याद आया. नरगिस ने क्या कहा था और अब उसे क्या करना है, ‘‘वाह, भई वाह. एक तो तुम मर्द को ले कर जनाना डिब्बे में घुस आई हो, ऊपर से मेरी बहू पर इल्जाम लगा रही हो. वर्दी में न होती तो चोटी पकड़ कर मारती.’’

बुढि़या चीखी तो अन्य औरतों की भी हिम्मत हुई. तांगे वाले की मौजूदगी पर औरतों ने ऐसा शोर मचाया कि वह दरवाजे पर तो खड़ा ही था, घबरा कर नीचे उतर गया. पुलिसवालियां भी इस सूरतेहाल से घबरा गईं और 2-4 सवाल करने के बाद वे भी रफूचक्कर हो गईं.

बुढि़या नरगिस के लिए बड़ी मददगार साबित हुई. उसी बीच गाड़ी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया और तेज रफ्तार से दौड़ने लगी. नरगिस की परेशानी कुछकुछ दूर हो गई थी. लिहाजा वह अपने खयालों में खो गई. घर और घर वालों के बारे में सोचतेसोचते नरगिस की आंखों के कोने भीग गए.

‘‘अब मुलतान आने वाला है,’’ बूढ़ी औरत ने कहा, ‘‘संभल कर बैठ जाओ. मेरा बेटा मुझे लेने आएगा. सिर ढांप कर उस के सामने आना. वह गुस्से का जरा तेज है.’’

‘‘अच्छा मांजी.’’ नरगिस ने बूढ़ी को मां कह कर मुखातिब किया.

नरगिस को रहरह कर उस बूढ़ी औरत पर प्यार आ रहा था. वह बूढ़ी औरत थोड़ी ही देर में उसे मां जैसी लगने लगी थी. वह सोच रही थी, यह बूढ़ी या तो कामयाब ड्रामा कर रही है या फिर वाकई इतनी स्नेहशील है. इस के साथ जो लोग रहते होंगे, खुशकिस्मत होंगे. वे लड़कियां कितनी नसीब वाली होंगी, जो इस की सरपरस्ती में रहती होंगी. गाड़ी की रफ्तार कम हो गई थी. कुछ औरतें यह कहती हुई उठीं कि मुलतान आ रहा है. नरगिस ने भी साथ लाए हुए कपड़ों की पोटली संभाली. इस के सिवा उस के पास कोई और सामान था ही नहीं.

मुलतान आ गया. उस वक्त रात हो रही थी और नरगिस को मुमताजाबाद के सिवा पते के नाम पर कुछ भी मालूम नहीं था. न मकान नंबर मालूम था, न बाप या भाई में से किसी का नाम. वह सोच रही थी कि काश, यह रात उसे उस बूढ़ी औरत के साथ गुजारनी नसीब हो जाए. फिर सुबह वह मुमताजाबाद चली जाएगी, लेकिन अपनी जुबान से वह कैसे कहती?

गाड़ी से उतर कर नरगिस जैसे ही प्लेटफार्म पर खड़ी हुई, बूढ़ी औरत ने कहा, ‘‘इतनी रात को कहां घर ढूंढती फिरोगी? सुबह चली जाना. अभी मेरे साथ चलो. तुम्हें अभी अपनी कहानी भी तो मुझे सुनानी है. ऐ, वह लो, मेरा बेटा आ गया.’’ बूढ़ी ने नरगिस का हाथ इस तरह थाम रखा था, जैसे उसे डर हो कि इस भीड़ का फायदा उठा कर वह गायब न हो जाए.

एक नौजवान लड़का तेजी के साथ आया और उस बूढ़ी औरत के पास जो छोटा सा संदूक था, उसे उठा कर एक तरफ को चल दिया. नरगिस भी उस बूढ़ी औरत के साथसाथ चलती हुई स्टेशन के बाहर आ गई. बाहर तांगा तैयार था. लड़के ने सामान तांगे पर रखा. इस का मतलब था, उसी तांगे पर बैठना है. बूढ़ी औरत ने नरगिस का हाथ थामा और तांगे में बैठ गई.

‘‘अम्मां यह कौन है?’’ लड़के ने पूछा.

‘‘क्या खबर कौन है?’’ बूढ़ी औरत ने मजाक के अंदाज में कहा.

‘‘मखौल न किया करो. तुम्हारे साथ आई है. तुम्हीं को मालूम नहीं कौन है?’’

‘‘सच्ची बात तो यही है. अब घर चल कर पूछूंगी. वैसे तुझे इस से क्या? चुप बैठा रह.’’

रास्तेभर उन तीनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई. कभीकभी लड़का पीछे पलट कर देख लेता था. नरगिस को अंदाजा हो रहा था कि वह शहर लाहौर के मुकाबले छोटा है. एक बार फिर इस खयाल ने उसे घेर लिया कि वह आज बहुत सालों बाद अपने शहर में है. बूढ़ी का मकान शायद स्टेशन से काफी फासले पर था. तांगा बहुत देर तक चलता रहा. तब कहीं मकान आया, जहां उस बूढ़ी औरत को उतारना था. उस घर में उस बूढ़ी के अलावा 3 औरतें और थीं. उस के 3 बेटे थे, 2 बहुएं थीं और एक बेटी थी, जो लड़का उन्हें ले कर आया था, वह कुंवारा था.

‘‘पहले नहा कर कपड़े बदलो, फिर खाना खाएंगे. उस के बाद तुम्हारी कहानी सुनूंगी.’’ बूढ़ी औरत ने नरगिस से कहा.

इन सब कामों से निपटने के बाद वह बूढ़ी औरत नरगिस को ले कर एक कमरे में चली गई. बोली, ‘‘हो सकता है, तुम्हारी कहानी में कोई ऐसी बात हो, जो सब के सुनने की न हो, इसलिए मैं तुम्हें यहां ले आई. अब सुनाओ, तुम कौन हो और तुम पर क्या बीती है?’’

नरगिस ने शुरू से अब तक की अपनी पूरी कहानी उसे सुना दी.

‘‘बस, इतनी सी बात पर परेशान हो?’’ बूढ़ी औरत बोली.

‘‘मांजी, यह इतनी सी बात है? मैं किसी शरीफ घराने में रहने के लायक हूं?’’

‘‘क्यों, क्या हो गया तुम्हें? तुम जहां भी रही, उस में तुम्हारा क्या कसूर? तुम तो शरीफ घरानों की लड़कियों से भी शरीफ हो. वे तो अच्छेभले माहौल में भी बिगड़ जाती हैं और तुम उस गंदगी से बच कर निकल आई.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप, भाईबहन?’’

‘‘अल्लाह फजल करेगा. मेरा बेटा सरफराज, जो हमें स्टेशन से ले कर आया है, पत्रकार है. अखबार वालों के बड़े लंबे हाथ होते हैं. मैं उस से कहूंगी, वह ढूंढ़ निकालेगा.’’

‘‘मुझे आप एक बार मुमताजाबाद ले चलें. शायद मैं अपना घर पहचान लूं.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं… मैं कल ही तुम्हें ले जाऊंगी. मेरी एक मिलने वाली वहां रहती है.’’

इस के बाद नरगिस इस तरह सोने के लिए लेट गई, जैसे चांदरात को बच्चे ईद के इंतजार में सोते हैं.

उस बूढ़ी के साथ सुबह मुमताजाबाद पहुंचते ही नरगिस की आंखें उस के हाथों से निकल गईं. आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं लेते थे. उसे महसूस हो रहा था, जैसे वह 4 साल की बच्ची है. घर का रास्ता भूल गई है और रास्ते में खड़ी रो रही है.

‘‘हौसला करो बेटी. क्या सड़क पर तमाशा बनोगी. लोग कहेंगे, मैं तुम्हें चुरा कर ले जा रही हूं.’’ बूढ़ी ने समझाया.

नरगिस ने आंसुओं को हौसले की मुट्ठी में बंद किया और बूढ़ी के साथसाथ चलने लगी. किसी गली में भी उसे यह महसूस नहीं हुआ कि वह यहां पहले भी आ चुकी है. हर मकान को भूखों की तरह देखती हुई चल रही थी.

बड़ी बी उसे ले कर एक से दूसरी, तीसरी और चौथी गली में घूमती रही. कई गलियां घूमने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘भई, तुम तो जवान हो, मेरी टांगें जवाब दे गईं. आधा मुमताजाबाद रह गया है. वह फिर कभी देख लेंगे. अब चल कर कुछ देर बैठते हैं. मैं ने कहा था न मेरी एक मिलने वाली यहां रहती है. चलो, वहां चलते हैं.’’

‘‘चलिए.’’ नरगिस बेदिली से बोली.

वहां जाते हुए नरगिस ने एक जगह को बड़े गौर से देखा. फिर वह एकदम से चीखी, ‘‘अम्मा, यह है मेरा घर. मुझे याद आ गया. यही तो है. मुझे तुम यहां ले चलो. मुझे सब याद आ गया. यही है मेरा घर.’’

बूढ़ी चौंकी, ‘‘यही तो है वह मकान, जहां मैं तुझे लाने वाली थी, इसी में तो मेरी वह जानने वाली रहती है. चलो, पहचान लेना, वरना मैं उन से खुद पूछ लूंगी.’’

दोनों अंदर चली गईं. अंदर एक औरत सिल पर मसाला पीस रही थी. एक औरत अपने बच्चे को लिए बैठी थी. वे अंदर पहुंचीं तो 4 नौजवान लड़कियां कमरे से निकल कर सेहन में आ गईं.

‘‘आओ खाला, बहुत दिनों बाद आईं.’’ उस औरत ने कहा, जो मसाला पीस रही थी.

‘‘हां, तू तो बहुत आ गई मेरे यहां.’’ बूढ़ी औरत ने ताना दिया.

 

नरगिस दीवानों की तरह एकएक दीवार को ताक रही थी. उसे यह भी खयाल नहीं आया कि वह वहां मेहमान बन कर आई है. वह भाग कर जीने की तरफ गई. बिलकुल ऐसा ही जीना था. इस में अब दरवाजा लग गया है, मगर यह तो बाद में भी लग सकता है. उस वक्त नहीं होगा, लेकिन ये लोग तो कोई और हैं. फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, जैसे मैं यहां आ चुकी हूं?

औरतें उसे गौर से देख रही थीं और इशारों से पूछ रही थीं, यह कौन है? नरगिस इन सब से बेपरवाह कोनेखुदरे झांकती फिर रही थी. कुछ कोने उस के लिए अजनबी थे. कुछ हिस्से ख्वाब की तरह नजर आ रहे थे. यकीन नहीं आ रहा था, मगर उस का दिल कहता था, इस घर में कोई खास बात जरूर है.

‘‘खाला, यह कौन है?’’ एक औरत ने पूछा.

‘‘है एक बेचारी. बचपन में अगवा हो गई थी. अब 15 सालों बाद किसी तरह भाग कर आई है. इतने से बच्चे को याद रहता है. घंटाभर से मुझे लिए फिर रही है. हर मकान को समझ बैठती है, यही उस का घर है.’’ बूढ़ी ने कहा.

‘‘अल्लाह इस की मुश्किल आसान करे. इसे इस के मांबाप से मिलवाए.’’

सब ने ‘आमीन’ कहा. इतनी देर में नरगिस भी आ कर बैठ गई. उसे देख कर सब चुप हो गए.

‘‘अम्मा, यहां से चलो. यहां मेरा जी घबराता है.’’ नरगिस ने कहा.

‘‘तू तो जिद कर के यहां आई थी, अब जी घबराने लगा.’’

‘‘अच्छा आप बैठें. मैं जा रही हूं.’’

‘‘अरी सुन तो, मैं भी चल रही हूं. अच्छा बहन, फिर आऊंगी. यह लड़की तो हवा के घोड़े पर सवार है.’’ बूढ़ी ने कहा और बुरका संभाल कर उठ गई.

‘‘क्या हुआ, मकान देख लिया?’’ बूढ़ी ने रास्ते में पूछा.

‘‘नहीं, यह वह घर नहीं है, लेकिन न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है, जैसे यही है.’’

‘‘तू जी हलकान मत कर. मैं आज ही सरफराज से कहूंगी. वह सब पता लगा देगा.’’

‘‘नहीं अम्मा, दुनिया की भीड़ में गुम हो कर कोई नहीं मिलता. इंसान हो या मकान, सब गुम हो जाते हैं.’’

‘‘अल्लाह की जात से मायूस नहीं होते बेटी.’’

‘‘अच्छा एक बात बताइए.’’

‘‘पूछ बेटी.’’

‘‘अगर मेरे घर वाले मुझे नहीं मिले तो आप मुझे अपने घर में रख लेंगी? मैं आप की नौकरी करूंगी.’’

‘‘कैसी बातें करती है बेटी, तू काहे को नौकरी करने लगी? तू तो मेरी बेटी जमीला की तरह है. खैर से तेरे वारिस तुझे मिल जाएं. अगर नहीं मिलते तो तू भी मेरी जमीला है.’’

बड़ी बी ने सरफराज से जिक्र किया तो उस ने वादा किया कि वह नरगिस के सरपरस्तों की तलाश के लिए जो कुछ होगा, करेगा.

 

नरगिस को यहां रहते हुए 3 दिन हो गए थे. एक नई जिंदगी से उस का परिचय हुआ था. उस ने पहली बार शरीफ घरों के आदाब देखे थे. उसे पहली बार अहसास हुआ था कि घर की दहलीज हर एक के लिए नहीं होती. इन औरतों की आंखों में जो शरमोहया थी, नरगिस ने पहले नहीं देखी थी. चिराग जलने के बाद यहां पराए मर्दों के कदमों की आवाजें नहीं गूंजती थीं. औरतें मुसकराती थीं, कहकहे नहीं लगाती थीं. सिरों पर आंचल न भी हो, तो लगता था, शरमोहया का साया सिर पर है.

नमाज की चौकी पर बैठी हुई बड़ी बी रहमत का फरिश्ता लगती थीं. शौहरों के सामने दस्तरख्वान सजाती हुई बीवियां, भाइयों से जिद करती हुई बहनें कितनी अच्छी, कितनी प्यारी लगती थीं.

सरफराज बराबर कोशिश में लगा हुआ था. आखिरकार एक दिन वह कामयाब हो गया. उस ने बड़ी बी के सामने एक अखबार रखते हुए कहा, ‘‘पहचानिए तो, किस की तसवीर है?’’

‘‘कोई बच्ची है, जमीला को दिखाओ.’’

‘‘अम्मा, यह उसी लड़की की बचपन की तसवीर है, जो आप के घर में ठहरी है.’’

‘‘नरगिस की?’’ हैरानी से बड़ी बी की आंखें फैल गईं.

‘‘हां, इस का उस वक्त का नाम नजमा था. नरगिस बाद में रखा गया होगा.’’

‘‘मगर यह कैसे मालूम हुआ कि यह नरगिस की ही तसवीर है.’’

‘‘अम्मा, मैं ने 15 साल पहले के अखबार खंगाले. दरअसल मुझे यकीन था कि नरगिस के वालिदैन ने गुमशुदगी का इश्तिहार जरूर दिया होगा. वही हुआ. यह इश्तिहार मुझे नजर आ गया. इस में जो पता दिया गया है, वह मुमताजाबाद का है. यह भी लिखा है कि शादी के हंगामे में किसी संगदिल ने इसे अगवा कर लिया था. नरगिस ने भी यही बताया था. तसदीक उस वक्त हो जाएगी, जब हम उस पते पर जाएंगे, जो इस इश्तिहार में दिया गया है.’’

‘‘देखें, तो अपनी बच्ची की तसवीर,’’ बड़ी बी ने अखबार उठा लिया, ‘‘ऐ हां, है तो यह नरगिस ही. वही नाक, वही नक्शा. हाथ टूटें उस के, जिस ने उसे उस के मांबाप से जुदा किया.’’ फिर बड़ी बी ने नरगिस को आवाज दी, ‘‘नरगिस, जरा इधर तो आ.’’

‘‘जी अम्मा.’’ नरगिस लगभग दौड़ती हुई आ गई.

‘‘मैं तुझे एक चीज दिखाऊंगी, लेकिन तू वादा कर कि रोएगी नहीं.’’

‘‘नहीं रोऊंगी.’’ नरगिस बोली.

‘‘यह देख, क्या है?’’ बड़ी बी ने अखबार में छपी हुई तसवीर पर उंगली रखते हुए कहा.

‘‘तसवीर है किसी की.’’ नरगिस बोली.

‘‘किसी की नहीं, तुम्हारी तसवीर है.’’

अब नरगिस की समझ में आया, वह क्या दिखाना चाहती हैं. उस ने तसवीर देखी. ऊपर ‘गुमशुदा की तलाश’ और नीचे मुमताजाबाद का पता छपा हुआ था.

नरगिस कुछ देर तक उस तसवीर को गौर से देखती रही, फिर चीख मार कर बेहोश हो गई.

जब तक नरगिस होश में आई, तब तक सरफराज तय कर चुका था कि वह पहले खुद उस के मांबाप के पास जाएगा. जो लड़की तसवीर को देख कर बेहोश हो सकती है, वालिदैन को देख कर खुशी से मरने के करीब पहुंच जाएगी.

‘‘जब पता चल ही गया है तो आप मुझे वहां ले चलें. अम्मा, आप को भी ले कर चलूंगी. अपनी मां को बताऊंगी कि यह न होतीं तो मैं आप तक कभी न पहुंच सकती. अम्मा, पहले उन्हें यह बताइएगा नहीं कि मैं नजमा हूं. जरा वह भी तो बेताब हों. उन से कह दीजिएगा कि पता मालूम हो गया है. अब आप की बेटी 2-4 दिनों बाद मिलेगी. देख लेना अम्मा, खुशामद करेंगे और मेरे अब्बा कि बस, नजमा को आज ही ले आओ. मैं दिल ही दिल में खूब हंसूंगी उन पर. बेचारों को ज्यादा मत सताना. थोड़ी देर में बता देना कि नजमा यह क्या खड़ी है. बड़ा मजा आएगा.’’

नरगिस ये हवाई किले बना रही थी, जबकि सरफराज का मशविरा था कि वह अकेला जाएगा. हीलहुज्जत के बाद नरगिस तैयार हो गई और सरफराज अपनी वालिदा को ले कर मकान ढूंढ़ने चला गया.

‘‘यह तू मुझे कहां ले आया?’’ बड़ी बी ने मकान को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा.

‘‘अखबार में इसी मकान का नंबर छपा है.’’ सरफराज ने अखबार देखते हुए कहा.

‘‘लेकिन यह तो शाहिदा का मकान है. मेरी सहेली है. मैं तो नरगिस को ले कर यहां आ चुकी हूं.’’

‘‘अच्छा, मगर पता तो यही है.’’

‘‘सरफराज,’’ बड़ी बी ने सरगोशी की, ‘‘नरगिस भी इस मकान को देख कर चौंकी थी. शायद उस की याददाश्त ने सही निशानदेही की थी. हो सकता है, शाहिदा का नरगिस से वाकई कोई ताल्लुक हो.’’

‘‘चलिए, मालूम करते हैं. अकसर यह भी होता है कि गुम हो जाने वाली लड़कियों के रिश्तेदार उन्हें कबूल करने से कतराते हैं. अगर ऐसा हुआ तो हमें सख्त जद्दोजहद करनी पड़ेगी.’’

‘‘कैसी जद्दोजहद? मैं शाहिदा की जान को आ जाऊंगी. बच्ची का इस में क्या कसूर? बस तुम इतना खयाल करना कि यह जिक्र न आने पाए कि नरगिस अब तक तवायफ के कोठे पर थी. मैं कोई और बहाना तलाश लूंगी.’’

बड़ी बी अंदर चली गईं. कुछ देर बाद सरफराज को भी बुला लिया गया.

‘‘आप इस बच्ची को जानती हैं?’’ सरफराज ने शाहिदा को अखबार दिखाते हुए पूछा.

शाहिदा ने गौर से तसवीर को देखा और इनकार में सिर हिला दिया.

‘‘गौर से देखिए, कुछ याद कीजिए,’’ सरफराज ने जोर दिया, ‘‘यह 15 साल पुरानी तसवीर है.’’

‘‘नहीं बेटा, मैं इस को नहीं जानती.’’ शाहिदा ने फिर इनकार किया.

‘‘अच्छा यह बताइए, 15 साल पहले आप के घर में कोई बच्ची गुम हुई थी?’’

‘‘अल्लाह न करे. ऐसा हादसा तो कभी पेश नहीं आया.’’

‘‘फिर यह इश्तिहार कैसा है? इस में तो आप ही के घर का पता है.’’

‘‘कमाल है,’’ सरफराज किसी सोच में डूब गया, ‘‘अच्छा, यह बताइए, आप के यहां हाजी फरीद अहमद किस का नाम है?’’

‘‘किसी का भी नहीं. मेरे शौहर का नाम तो अब्दुल हमीद था.’’

सरफराज को अपनी सारी मेहनत बेकार जाती हुई नजर आ रही थी. अचानक उस के जेहन में एक खयाल बिजली की तरह कौंधा.

‘‘आप इस मकान में कब से हैं?’’ उस ने पूछा.

‘‘तकरीबन 12 साल से.’’

‘‘हूं,’’ सरफराज ने चुटकी बजाई, ‘‘यह इश्तिहार है 15 साल पहले का. इस का मतलब है, आप से पहले इस मकान में कोई और रहता था और वह थे हाजी फरीद अहमद यानी नरगिस के वालिद. उन्होंने किसी वजह से यह मकान आप को बेच दिया और यहां से चले गए.’’

‘‘हां, यही होगा.’’

‘‘आप मुझे मकान के कागजात दिखा सकती हैं?’’

‘‘बात क्या है? हमें पूरी तरह समझाओ.’’

‘‘मैं बताती हूं,’’ बड़ी बी ने कहा, ‘‘उस रोज जो लड़की मेरे साथ आई थी, यह तसवीर उसी की है. बचपन में वह गुम हो गई थी. शायद मैं ने तुम्हें बताया भी था. उस रोज वह यहां आई थी तो इस मकान को देख कर चौंकी भी थी. अब हमें उस के मांबाप की तलाश है. कागजात से यह मालूम हो जाएगा कि यह मकान वाकई हाजी फरीद का था, जो नरगिस के बाप हैं. यह तस्दीक हो जाए तो सरफराज उन्हें भी तलाश कर लेगा.’’

‘‘अच्छा, मैं कागजात ले कर आती हूं.’’

सरफराज ने कागजात देखे. मकान वाकई हाजी फरीद अहमद के नाम पर था, लेकिन बेचने वाले रशीद अहमद और हमीद अहमद थे, जिन की वल्दियत हाजी फरीद अहमद मरहूम लिखी हुई थी. इस का मतलब था कि हाजी साहब का इंतकाल हो गया था और उन के बेटों यानी नरगिस के दोनों बड़े भाइयों ने यह मकान बेच दिया था.

‘‘मामला बिलकुल साफ है. हम नरगिस के वारिसों के बहुत करीब पहुंच चुके हैं. अब गुत्थी सिर्फ यह है कि वे दोनों शख्स इस वक्त कहां हैं? मुलतान में या मुलतान के बाहर? अगर मुल्क में ही हैं तो मैं उन्हें जरूर तलाश लूंगा.’’

अगले दिन सरफराज ने पूरे मुल्क के अखबारों में टेलीप्रिंटर से यह खबर पहुंचा दी कि 15 साल पहले गुम होने वाली बच्ची नजमा वल्द हाजी फरीद मरहूम, जिस के भाइयों के नाम रशीद अहमद और हमीद अहमद हैं, हमारे पास मौजूद है और अपने भाइयों को तलाश रही है. ये लोग खबर को पढ़ते ही हम से संपर्क करें. इसी किस्म का इश्तिहार उस ने टीवी को भी दिया.

तीसरे दिन सरफराज के पास टेलीफोन आया, ‘हम ने खबर पढ़ी. हम कल आप के पास आ रहे हैं.’

यह टेलीफोन कराची से रशीद अहमद की तरफ से था. दूसरे दिन रशीद अहमद और उस की बेगम सरफराज के घर पहुंच गए. उस के लिबास और हुलिए से जाहिर हो रहा था कि वे निहायत दौलतमंद हैं. सरफराज को यह देख कर इत्मीनान हुआ कि दौलतमंद होने के बावजूद रशीद अपनी गुमशुदा बहन को भूला नहीं था. उस के चेहरे पर घबराहट और खुशी के मिलेजुले भाव साफ बता रहे थे कि वे नरगिस से मिलने के लिए बेचैन हैं.

‘‘पहले यह साबित कीजिए कि आप ही रशीद अहमद वल्द हाजी फरीद अहमद हैं.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘मुझे मालूम था कि आप यह सबूत जरूर चाहेंगे, इसलिए मैं अपना पासपोर्ट साथ ले आया हूं. इस के अलावा मैट्रिक का सर्टीफिकेट भी है. मैं ने मैट्रिक मुलतान से ही किया था. अब्बाजी की तसवीर भी है, जिस में हम दोनों भाई उन के साथ बैठे हुए हैं. और एक सब से अहम सबूत यह है कि नजमा की जो तसवीर उस वक्त अखबार में छपी थी, वह मेरे अलबम में थी, जो मैं अपने साथ लाया हूं, यह देखिए.’’

‘‘आप ने इस तसवीर को बहुत संभाल कर रखा है.’’ सरफराज ने तसवीर को देखते हुए कहा.

‘‘क्यों न रखते साहब. कोई दिन ऐसा नहीं गया, जब हम ने इसे याद न किया हो. एक ही तो हमारी बहन थी. वह भी ऐसी, जो हम दोनों भाइयों के जवान होने के बाद पैदा हुई थी. मेरे छोटे भाई हमीद की शादी पर ही वह गुम हुई थी. उसे कहांकहां नहीं ढूंढ़ा हम ने. अब्बाजी तो ऐसे बिस्तर से लगे कि फिर उठ ही न सके. मां भी कुछ अरसे बाद ही हम से रूठ गईं. नजमा क्या गई, हमारा तो घर ही उजड़ गया. हम दोनों भाइयों का दिल भी उचाट हो गया. लिहाजा हम ने वह मकान बेच दिया. हमीद तो बाहर निकल गया. आजकल जापान में है. मैं कराची चला गया. अब वह मिली है तो ऐसे वक्त कि अम्माजी…’’ उस की आवाज आंसुओं में बह गई. वह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘रशीद साहब, हौसला रखिए. अल्लाह ने इतनी बड़ी खुशी दी है कि आप का दामन भर जाएगा. उसे समेटिए और खुदा का शुक्रिया अदा कीजिए. मैं नजमा को बुलाता हूं.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘ठहरिए सरफराज साहब, मैं यह कैसे यकीन कर लूं कि वह नजमा मेरी बहन ही है?’’

‘‘इस की गवाही आप का दिल दे रहा है. आप के आंसू शहादत दे रहे हैं.’’

‘‘वह तो है, लेकिन मैं एक इत्मीनान करना चाहता हूं.’’

‘‘फरमाइए.’’

‘‘हमारे घर में एक मुर्गा था, जो कटखना हो गया था. उस ने नजमा की पीठ पर चोंच मार दी थी. जख्म बहुत दिन पका था और कंधे से कुछ नीचे निशान छोड़ गया था. वह निशान अब भी होगा.’’

‘‘यकीनन होगा.’’ सरफराज ने कहा.

‘‘आप मेरी बेगम को अंदर से जाइए. यह उस निशान को देख लेंगी. फिर कोई शक नहीं रहेगा.’’

‘‘बेशक.’’

रशीद अहमद की बेगम अंदर चली गई. कुछ देर बाद वह इस खुशखबरी के साथ बाहर आई कि निशान मौजूद है. रशीद अहमद की आंखें एक बार फिर भीग गईं.

‘‘आप लोग बैठें. मैं नजमा को ले कर आता हूं.’’ सरफराज ने कहा और कमरे से निकल गया.

रशीद अहमद की आंखें दरवाजे पर लगी थीं. उसे सांस लेने की फुरसत भी नहीं थी. पलक झपकाना भूल गया था. फिर कुछ आउट हुई. सरफराज की वालिदा के साथ नरगिस कमरे में दाखिल हुई. रशीद अहमद अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. कुछ देर दोनों भाईबहन एकदूसरे को देखते रहे, फिर जैसे नरगिस को होश आ गया.

‘‘भाई जान.’’ उस ने कहा और दौड़ कर रशीद अहमद के गले से लग कर रोने लगी. रोरो कर मन कुछ हलका हुआ तो पूछा, ‘‘अम्मा को नहीं लाए और अब्बाजी भी नहीं आए?’’

‘‘तू घर चल, सब से मुलाकात हो जाएगी. अभी तो मैं और तेरी भाभी आए हैं तुझे लेने.’’

‘‘मुझे अम्मा बहुत याद आती हैं. मुझे जल्दी से घर ले चलें.’’

‘‘चलते हैं. जरा इन लोगों का शुक्रिया अदा कर लूं.’’

‘‘भाईजान, इन का शुक्रिया जरूर अदा कीजिए. ये न होते तो और न जाने कितने दिन ठोकरें खाती.’’ कह कर नरगिस फिर रोने लगी.

‘‘रशीद साहब, यह मेरी वालिदा हैं.’’ सरफराज ने बड़ी बी का परिचय कराया.

‘‘मांजी, मैं किस मुंह से आप लोगों का शुक्रिया अदा करूं.’’

‘‘शुक्रिया कैसा बेटा, तुझे तेरी बहन मिल गई, हमें तो खुदा ने एक जरिया बनाया था. तेरी बहन बहुत प्यारी है. इस का खयाल रखना. इसे कोई तकलीफ न पहुंचे.’’

‘‘यह मेरी जान है मांजी. मेरे पास अल्लाह का दिया सब कुछ है. मैं इसे सोने में तौल दूंगा.’’

‘‘बेटा, बहनें मोहब्बत की भूखी होती हैं, दौलत की नहीं.’’ बड़ी बी ने कहा.

‘‘मैं आप की नसीहत याद रखूंगा.’’

‘‘मैं अपनी बच्ची को तैयार कर दूं. आप की अमानत है, ले जाइएगा.’’

बड़ी बी नरगिस को अंदर ले गईं. तैयार करने का तो बहाना था. उन्हें दरअसल उसे यह नसीहत करनी थी, ‘‘मेरी एक बात याद रखना. अपने अतीत को भूल जाना. कभी किसी पर जाहिर मत करना कि तुम कोठे पर रही हो. यह ऐसी तोहमत है, जो तुम्हारे भाई की मोहब्बत को आधा कर देगी. भाई अगर बर्दाश्त कर भी लेगा तो भाभी आज नहीं, तो कल तुम्हें ताने जरूर देगी.’’

‘‘लेकिन भाई पूछेंगे जरूर कि 15 साल कहां रही? किस माहौल में जवान हुई? मैं उन से क्या कहूंगी?’’

‘‘बेटी, यह तुम्हारी मरजी पर निर्भर है. तुम समझदार हो. कोई कहानी गढ़ लेना. इसी में तुम्हारी बेहतरी है.’’

‘‘ठीक है, अम्मा. मैं समझ गई.’’

‘‘अब जाओ अपने भाई के साथ.’’

‘‘आप लोग मुझे बहुत याद आएंगे.’’

‘‘अरे, तुम्हें वहां ऐसा प्यार मिलेगा कि भूल जाएगी. फिर भी अगर मैं याद आऊं तो चली आना मुझ से मिलने. कराची कौन सा दूर है.’’

नरगिस उस घर से इस तरह रुखसत हुई, जैसे कोई बेटी अपनी मां के घर से ससुराल जाती है.

नरगिस ने सोचा भी नहीं था कि रशीद भाई इतने दौलतमंद होंगे. वह उन का मकान देख कर हैरान रह गई. उन की कोठी, कमरों की सजावट, अमीराना ठाठबाट, ये सब चीजें उस के लिए विस्मयकारी थीं. उसे भाई से मिलने की खुशी तो थी ही, भाई को खुशहाल देख कर उस का दिल और भी ज्यादा खुश हुआ.

घर पहुंचते ही वह एक बार फिर जानपहचान की मंजिल से गुजरी. रशीद अहमद की 2 बेटियां और एक बेटा था. बेटियां तो नरगिस की तरकीबन हमउम्र थी, लेकिन बेटा छोटा था. नरगिस के पहुंचते ही इमराना उस से मिलते आई, ‘‘हैलो.’’

‘‘यह मेरी बड़ी बेटी इमराना है,’’ रशीद ने परिचय कराया, ‘‘तुम से कोई 2 साल बड़ी होगी.’’

इस के बाद एक और लड़की अंदर दाखिल हुई. उस का नाम फरहाना था. बेटे का नाम इमरान था.

नरगिस उन लड़कियों को देख कर ज्यादा खुश नहीं हुई. उन के कपड़े, तराशे हुए बाल और लज्जाहीनता उस के लिए निराशाजनक थी. उसे पहली नजर में अंदाजा हो गया कि इस घर का रहनसहन अंग्रेजी तर्ज का है, लेकिन यह कोई ऐसी खराब बात नहीं थी. बड़े घराने ऐसे ही जिंदगी गुजारते हैं.

औचारिक परिचय के बाद रशीद अहमद नरगिस से मुखातिब हुए, ‘‘इतने दिनों कहां रहीं? तुम पर गुजरी क्या? कुछ हमें भी तो बताओ.’’

‘‘हां, नजमा, कुछ तो बताओ.’’ भाभी बोलीं.

नरगिस ने अपनी कहानी सुनाई, लेकिन कुछ तब्दीली के साथ, ‘‘भाईजान, मुझे तो कुछ याद नहीं रहा था. यह कहानी मरते वक्त मुझे मेरे मोहमिन (उपकारी) ने सुनाई. उस ने मुझे बताया कि कोई शख्स तुम्हें मुलतान से लाहौर ले आया था. जाहिर है कि किसी गलत इरादे से ले कर आया होगा. लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था. वह अभी रेलवे स्टेशन से बाहर आया था कि उस पर दिल का दौरा पड़ा. जिस ने मुझे पालापोसा, टैक्सी चलाता था. खैर, जब उस शख्स को हार्टअटैक हुआ तो उस ने टैक्सी को हाथ दिया. टैक्सी में बैठने से पहले ही उसे यकीन हो गया था कि वह अब बचेगा नहीं. उस ने मुझे सुपुर्द कर अटकअटक कर उस के अब्बू का पता बताया कि वह मुझे वहां पहुंचा दे.

‘‘उस के मरने के बाद उस ने बहुत चाहा कि मुझे मेरे घर पहुंचा दे, लेकिन उस के दिल में बेईमानी आ गई. उस वक्त वह बेऔलाद था. उस की अपनी बेटी मेरे आने के बाद पैदा हुई. उस ने और उस की बीवी ने तय किया कि जब खुदा ने यह तोहफा उसे दिया है तो वे हमें वापस नहीं करेंगे.

‘‘भाईजान, उस ने मरते वक्त मुझ से माफी मांगी और दरख्वास्त की कि उस की मौत के बाद मैं अपने घर चली जाऊं और अगर वह बच गया तो खुद मुझे मेरे घर छोड़ जाएगा. लेकिन मौत ने उसे मोहलत नहीं दी. इस से भी ज्यादा गजब यह हुआ कि उस ने सिर्फ यह बताया था कि मेरा घर मुमताजाबाद, मुलतान में है. इस से पहले कि वह मकान नंबर या अब्बा का नाम बताता, उस की रूह उड़ गई. यह भी हो सकता है कि इतने दिन गुजर जाने के बाद वह यह मालूमात भूल ही गया हो. उसे सिर्फ मुमताजाबाद याद रह गया हो.’’

‘‘उस बेहूदा आदमी ने तुम्हें हम से जुदा कर दिया और तुम उसे मोहसिन कहती हो. सोचो, अगर वह उसी वक्त तुम्हें हमारे पास ले आता तो आज यह दिन देखने को नहीं मिलता.’’ रशीद अहमद ने गुस्से से कहा.

‘‘मैं उसे इसलिए मोहसिन कहती हूं कि उस ने अपनी मौत से पहले मेरी हकीकत मुझे बता कर मुझ पर एहसान किया. अगर वह न बताता तो आज मैं वहां होती, जहां से अगर वापस आती तो आप मुझे अपनी बहन जानते हुए भी कबूल करने से इनकार कर देते.’’

नरगिस ने आगे बताया, ‘‘अब यह बताना जरूरी नहीं कि अब मेरा वहां रहना मुश्किल नहीं रहा था. मैं उन के घर से निकली और मुलतान का टिकट ले कर गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी में मुझे सरफराज की वालिदा मिल गई. फिर जो कुछ हुआ, वह सरफराज साहब आप को बता ही चुके हैं.’’

नरगिस को कराची आते ही यह खबर मिल चुकी थी कि उस के वालिदैन का इंतकाल हो चुका है. अब रशीद भाईजान ही उस के सब कुछ हैं. उस की खुशी आधी रह गई थी, लेकिन यह खुशी फिर भी थी कि अब वह एक शरीफ घर में शरीफाना जिंदगी गुजारेगी.

 

नई जगह थी, इसलिए सुबह जल्दी ही नींद टूट गई. सुबह से कुछ पहले ही वह बिस्तर से उठी. जब से वह बड़ी बी के घर आई थी, नमाज की पाबंद हो गई थी. नमाज अदा की और फिर लौन में आ कर टहलने लगी. कुछ देर बाद वह वापस आ गई. घर में अभी तक सब लोग सो रहे थे. नरगिस कुछ देर अपनी जिंदगी पर गौर करती रही. कोई व्यस्तता तो थी नहीं. लेटेलेटे नींद आ गई. आंख खुली तो घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे. नरगिस घबरा कर उठी और एक बार फिर हाथमुंह धो कर बाहर निकली तो भाई रशीद को अकेले नाश्ता करते देखा.

नरगिस ने सलाम करने के बाद कहा, ‘‘मैं तो समझ रही थी, आप औफिस जा चुके होंगे.’’

‘‘अरे, अपना औफिस है. तेरा भाई किसी का मुलाजिम तो है नहीं. आओ, तुम भी नाश्ता कर लो.’’ रशीद बोला.

‘‘इमराना और फरहाना कहां हैं?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘उन्हें कालेज जाना होता है, 8 बजे चली गई होंगी.’’

‘‘और इमरान?’’

‘‘उस की मत पूछो. बरखुरदार नींद के ऐसे शौकीन हैं कि दोपहर की शिफ्ट में दाखिला लिया है. वह 11 बजे उठेंगे.’’

‘‘भाभी को तो नाश्ते की मेज पर होना चाहिए था. आप अकेले नाश्ता कर रहे हैं.’’

‘‘वह रात को देर तक जागती हैं. उन्हें कहीं जाना तो होता नहीं. अपनी मर्जी से उठती हैं. हमारी मुलाकात शाम की चाय पर होती है या रात के खाने पर.’’

नरगिस सोच में पड़ गई. यह कैसा घर है, जहां लोग एकसाथ बैठ कर नाश्ता भी नहीं करते. हर शख्स अपनी अलग जिंदगी गुजार रहा है.

रशीद अहमद ने नाश्ता किया और तैयार होने के लिए ड्रेसिंगरूम में चले गए. तैयार हो कर आए तो नरगिस भी नाश्ता कर चुकी थी.

‘‘अच्छा नजमा, मैं औफिस जा रहा हूं. तुम्हारी खातिर दोपहर को आ जाऊंगा. उस वक्त तक तुम्हारी भाभी भी उठ जाएंगी. तुम उन से गपशप करना.’’

नरगिस अपने भाई को छोड़ने दरवाजे तक गई और उस वक्त तक वहां खड़ी रही, जब तक ड्राइवर ने गाड़ी गेट से बाहर नहीं कर ली. यह पहला मौका था, जब कोई रशीद अहमद को छोड़ने दरवाजे तक आया था.

इतने बड़े घर में नरगिस अकेली घूमती रही. अल्लाहअल्लाह कर के 11 बजे इमरान सो कर उठा. उठते ही उस ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया. मजबूरन उस की मां को भी उठना पड़ा. मांबेटे जल्दीजल्दी तैयार हुए. इमरान ने नाश्ता किया और स्कूल चला गया.

थोड़ी देर में रशीद अहमद आ गए. उन्हें देख कर बीवी चौंकी, ‘‘आप आज इतनी जल्दी आ गए.’’

‘‘भई, मैं ने सोचा, नजमा अकेली बोर हो रही होगी. इमरानाफरहाना आ जाएं तो कहीं घूमने निकलते हैं.’’

इमराना और फरहाना आ गईं. दोपहर का खाना सब ने मिल कर खाया. नरगिस को खुशी हो रही थी कि नाश्ते पर न सही, खाने पर तो सब मौजूद हैं.

‘‘कराची बाद में घूमेंगे, पहले तुम लोग नजमा को घर तो दिखा दो.’’ खाने के बाद रशीद अहमद ने बेटियों से कहा.

‘‘अच्छा डैडी.’’ उन्होंने बेदिली से कहा और नरगिस को ले कर चली गई. तमाम कमरे दिखाने के बाद वे उसे एक हौलरूपी कमरे में ले गईं. उस कमरे में कालीन के सिवा कोई फर्नीचर नहीं था. संगीत के जितने वाद्य हो सकते हैं, सब उस कमरे में मौजूद थे. तबले की जोड़ी, हारमोनियम, ड्रम, गिटार. क्या था, जो वहां नहीं था. एक कोने में घुंघरू पड़े हुए थे. नरगिस को फुरेरी आ गई. उसे बहुत दिनों बाद दिलशाद बेगम का कोठा याद आ गया.

‘‘यह सब क्या है इमराना?’’ नरगिस ने भयभीत आवाज में पूछा.

‘‘यह हमारा बालरूम है. यहां हम डांस करते हैं, संगीत सुनते हैं, शोर मचाते हैं, मौज उड़ाते हैं. यह साउंडप्रूफ कमरा है. यहां हम कितना ही शोर मचाएं, बाकी घर वाले डिस्टर्ब नहीं होते.’’

‘‘तुम लोग डांस करती हो?’’ नरगिस को जैसे यकीन नहीं हुआ.

‘‘हां, आप को भी दिखाएंगे किसी दिन. फरहाना तो ऐसा नाचती है कि बिजली भी क्या कौंधेगी. डैडी कहते हैं, पहले तालीम पूरी कर लो, वरना फिल्मों के दरवाजे तो उस के लिए हर वक्त खुले हैं.’’

नरगिस पर हैरतों के पहाड़ टूट रहे थे. तमाशबीनों के सिवा यहां तो सब कुछ दिलशाद बेगम के कोठे की तरह था.

नरगिस सोच रही थी. अगर वह यह सब कुछ न देखती तो अच्छा था. वह तो किसी पाकीजा माहौल की तलाश में आई थी, मगर यह सब क्या है? उस ने सोचा, वह इस माहौल को बदलने की कोशिश करेगी. शरीफ घरों का नक्शा उस के जेहन में कुछ और था, जो यहां नहीं था.

‘‘घर देख आईं नजमा?’’ रशीद अहमद ने पूछा.

‘‘जी, आप का घर बहुत पसंद आया.’’ उस की आवाज में छिपे व्यंग्य को रशीद अहमद महसूस नहीं कर सका.

‘‘आओ, अब तुम्हें कराची घुमाने चलते हैं.’’ रशीद अहमद ने कहा. उस के बाद इमराना और फरहाना से कहा कि वे भी चलें. इमराना और फरहाना लिबास बदल कर चलने को निकलीं तो नरगिस की आंखें झुक गईं. जींस की पतलून पर ऊंचीऊंची शर्ट्स पहने वे बिलकुल लड़का लग रही थीं.

नरगिस बोली, ‘‘तुम लोगों ने यह क्या लिबास पहना है? क्या इसी तरह बाहर जाओगी?’’

‘‘क्यों…? इस लिबास में क्या है?’’ इमराना ने तैश में आ कर कहा.

‘‘यह लिबास शरीफ लड़कियों पर अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘क्या हम शरीफ लड़कियां नहीं हैं? आप इसलिए आई हैं हमारे घर कि हमारी ही बेइज्जती करें?’’

‘‘यह बेइज्जती नहीं, लड़कियों पर दुपट्टा सजता है.’’

‘‘बसबस, अपनी नसीहत अपने पास रखें. डैडी, मैं यह बेइज्जती बरदाश्त नहीं कर सकती. मैं नहीं जाती, आप लोगों के साथ.’’

‘‘मैं भी नहीं जाऊंगी.’’ फरहाना ने बहन का साथ दिया.

‘‘तुम लोग क्यों इतनी जज्बाती होती हो? नजमा इस तरह के लिबास की आदी नहीं. कुछ दिन यहां रहेगी तो सीख जाएगी. खुद भी यही लिबास पहना करेगी.’’

नरगिस का मुंह लटक गया. वह समझ रही थी कि भाई उस की तारीफ करेंगे और बेटियों को डांटेंगे कि कैसा लिबास पहन कर आ गईं, मगर वह तो उलटे उन की हिमायत कर रहे थे. भाभी अलग मुंह बनाए खड़ी थीं. अब नरगिस के बिगड़ने का सबब ही नहीं था. उस ने माफी मांग ली, ‘‘मुझे माफ कर दो इमराना. भाईजान ठीक कहते हैं. मैं इस लिबास की आदी नहीं हूं न, इसलिए यह बात कह दी. आओ, घूमने चलें.’’

बुझे मन से दोनों बहनें उस के साथ चल दीं.

अगले दिन नरगिस ने सुना कि मास्टर साहब आए हैं तो उस के तालीम के शौक ने सिर उभारा, ‘‘भाईजान, मैं भी मास्टर साहब के पास जा कर बैठ जाऊं?’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. मैं इंटरकौम पर कहता हूं, इमराना दरवाजा खोल देगी, तुम जाओ.’’ रशीद बोला.

‘‘मगर वह है किस कमरे में?’’

‘‘बालरूम में, और कहां.’’

‘‘जी अच्छा, मैं जाती हूं.’’

नरगिस ने सोचा, मास्टर साहब से वह खुद बात करेगी. मास्टर साहब तैयार हो गए तो भाई से कह कर  कल से खुद भी पढ़ना शुरू कर देगी. नरगिस ने दरवाजे को धक्का दिया. दरवाजा खुला हुआ था. रोम, अतोम, ततोम, तना, तरा, री… अंदर से आवाजें आ रही थीं. नरगिस उन आवाजों से अवगत थी. यह किस किस्म की पढ़ाई है. वह डरतेडरते अंदर गई. जिन्हें वह मास्टर साहब कह रही थी, वह उस्तादजी थे. उन से इमराना और फरहाना संगीत की तालीम हासिल कर रही थीं. नरगिस के लिए उस घर में यह एक और नई बात थी. उस्तादजी ने नरगिस की तरफ देखा और गाना बंद कर दिया.

‘‘यह लड़की कौन है?’’

‘‘डैडी की बहन हैं.’’

‘‘आज से पहले तो नजर नहीं आईं?’’

‘‘अभी तो आई हैं मुलतान से.’’

‘‘अच्छा चलो, तुम सबक दोहराओ.’’

नरगिस एक तरफ सिमट कर बैठ गई. सबक फिर शुरू हो गया.

थोड़ी देर बाद मास्टर साहब रुखसत हो गए और दूसरे उस्तादजी के आने का वक्त हो गया. अब नाच की महफिल जम गई. नरगिस को बारबार महसूस हो रहा था, जैसे वह दिलशाद बेगम के कोठे पर बैठी है. उसी रात 11 बजे की बात है. इमराना ने नरगिस से कहा, ‘‘आओ, तुम्हें अपने दोस्तों से मिलाऊं.’’

नरगिस खुशीखुशी उस के साथ चली गई. बालरूम में महफिल जमी हुई थी. नरगिस का खयाल था, इमराना की सहेलियां होंगी, लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा था, 4 लड़के बैठे थे.

डेक बज रहा था, फरहाना नाच रही थी. चारों लड़के सोफे पर बैठे दाद दे रहे थे. नरगिस ने सोचा, तमाशबीनों की कसर थी इस घर में, अब यह भी पूरी हो गई. सिर्फ नोट नहीं बरसाए जा रहे हैं. बाकी सब वही है, जिस से बच कर वह यहां आई थी. उसे यों लगा, जैसे सब कुछ वही है, सिर्फ कोठा बदल गया है. अब यह उस के बर्दाश्त से बाहर था. वह गुस्से से उठी और सीधे भाई के पास कमरे में पहुंच गई.

‘‘भाईजान, यह क्या माहौल बनाया है आप ने?’’

‘‘क्या हो गया?’’ रशीद अहमद घबरा कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं अभी बालरूम से आ रही हूं,’’ नरगिस ने बताया, ‘‘फरहाना डांस कर रही है और वह भी लड़कों के सामने.’’

‘‘ओह,’’ रशीद अहमद बुरी तरह हंसने लगा, ‘‘बस इतनी सी बात है? उन लोगों ने एक म्युजिकल ग्रुप बनाया है. प्रोग्राम करते हैं. किसी प्रोग्राम की रिहर्सल कर रहे होंगे.’’

‘‘भाईजान, आप की नजर में यह कोई बात ही नहीं है. लोग मुजरा देखने घरों से दूर जाते हैं, मगर यहां तो घर ही में मुजरा हो रहा है.’’

‘‘नजमा,’’ रशीद जोर से चीखा, ‘‘खबरदार, मेरी बच्चियों के शौक को मुजरा कहती हो? मैं ने तो सुन लिया, लेकिन सोचो, इमराना या फरहाना ने सुन लिया होता तो उन के दिलों पर क्या गुजरती. तुम्हारी भाभी पार्टी में गई हैं. अगर वह होतीं तो कितना बिगड़तीं तुम पर.’’

‘‘लेकिन भाईजान, क्या मैं सच नहीं कर रही हूं?’’

‘‘बिलकुल नहीं. म्यूजिक एक आर्ट है और मेरी बच्चियां आर्टिस्ट हैं. यह आर्ट उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाएगा.’’

‘‘नाम बदलने से मुजरा आर्ट बन सकता है, लेकिन रहेगा तो मुजरा ही.’’

‘‘क्या बेवकूफी की रट लगा रखी है. बड़े घरानों में इसे बुरा नहीं समझा जाता. अब तुम बड़े घर में आ गई हो. एडजस्ट होने की कोशिश करो.’’

‘‘बहुत अच्छा, भाईजान.’’

नरगिस सोच रही थी, क्या दिलशाद बेगम का कोठा भी बड़ा घर था? क्या वह घर छोड़ कर उस ने गलती की है? क्या वह एडजस्ट नहीं हो सकी थी? क्या वहां से आना उस की गलती थी?

बहुत दिनों बाद उस रात नरगिस फिर रोई. ये आंसू खुशी के नहीं, पछतावे के थे. नरगिस से नजमा बनने का पछतावा. अब उस ने तय किया कि वह इस घर के मामलों में दखल नहीं देगी.

दूसरे दिन शाम को घर में भूचाल आ गया. नौकरचाकर भागेभागे फिर रहे थे. शायद कोई अहम मेहमान आने वाले थे. मुमकिन है, इमराना या फरहाना में से किसी का रिश्ता आया हो. भाभी की जुबानी मालूम हुआ कि टीवी के प्रोड्यूसर फरहाना से मुलाकात के लिए आए हैं. कोई ड्रामा तैयार हो रहा है. वह फरहाना को उस में शामिल करना चाहते हैं.

नरगिस तो वहां जा कर नहीं बैठी, लेकिन जब वे चले गए तो भाभी ने उसे बताया, ‘‘शुक्र है, फरहाना की मेहनत वसूल हो गई. प्रोड्यूसर ने बताया कि वह एक ड्रामा तैयार कर रहे हैं, जिस में 2-3 मुजरे पेश किए जाएंगे. फरहाना उस ड्रामे में तवायफ बन कर मुजरा करेगी. अब देखना, कैसी शोहरत होती है उस की.’’

नरगिस जहर का घूंट पी कर रह गई.

प्रोड्यूसर और अदाकारों का आनाजाना बढ़ने लगा. फरहाना के दिमाग भी अर्श को छू रहे थे. सीधे मुंह बात ही नहीं करती थी. उठतेबैठते प्रोड्यूसर की तारीफें, अदाकारों के किस्से. फिर उस ड्रामे की शूटिंग शुरू हो गई. फरहाना रात गए वापस आती. सुबह होते ही फिर चली जाती.

 

उसी बीच जापान से नरगिस का दूसरा भाई हमीद आ गया था. नरगिस भाई की मोहब्बत में गुम हो गई. नरगिस ने उस से भी दबेदबे लफ्जों में फरहाना की शिकायत की, लेकिन उस का कहना भी यही था कि इस में कोई हर्ज नहीं है, यह मौडर्न जमाना है. और उस को नापसंद करने वाले दकियानूसी हैं. हमीद कुछ दिन रहने के बाद वापस चला गया. नरगिस फिर जैसे होश में आ गई. उसे होश आया तो मालूम हुआ, ड्रामा मुकम्मल हो गया है.

‘‘आज फरहाना का मुजरा प्रसारित होगा.’’ भाभी ने नरगिस को बताया.

पूरा घर टीवी के सामने मौजूद था. रशीद अहमद बारबार घड़ी की तरफ देख रहे थे. वक्त हुआ और ड्रामा शुरू हो गया. फिर वह सीन आया, जिस में मुजरा पेश किया जाना था. प्रोड्यूसर ने हकीकत का रंग भरने के लिए असली वेश्या बाजार में शूटिंग की थी. फरहाना बता रही थी, ‘‘यह सेट नहीं है, असली कोठा है.’’

चंद उच्छृंखल किस्म के जवान तकियों से टेक लगाए बैठे थे. बूढ़ी नायिका पानदान खोले बैठी थी. इतनी देर में फरहाना कैमरे के सामने आई. दाग की एक गजल पर उस ने नाचना शुरू किया. एक नौजवान बारबार उठता था और फरहाना शरमा कर कलाई छुड़ा लेती थी और फिर नाच शुरू हो जाता था.

‘‘वेलडन फरहाना.’’ डांस खत्म होने के बाद रशीद अहमद ने बेटी को मुबारकबाद दी.

‘‘खुदा करे, यह सीन मशहूर हो जाए.’’ भाभी ने बेटी को मुबारकबाद दी.

इमराना तो खुशी से फरहाना के गले लग गई.

नरगिस इस धूमधाम से बेपरवाह सोच रही थी. यह कैसा इंकलाब है. मैं कोठे पर सिखलाई जाने के बावजूद वहां नाच नहीं सकी, भाग आई. एक शरीफ घर की लड़की वहां पहुंच कर नाच आई. वही लोग, जो तवायफ को गाली समझते हैं, तवायफ की तरह नाचने पर अपनी बेटी को मुबारकबाद दे रहे हैं.

उस दिन तो फरहाना को होश ही नहीं था, लेकिन दूसरे दिन उस ने नरगिस से पूछा, ‘‘नजमा फूफी, कैसा था मेरा डांस?’’

‘‘डांस तो बाद की बात है, पहले यह बताओ कि उस वक्त तुम में और किसी तवायफ में कोई फर्क था?’’ नरगिस ने पूछा.

‘‘फर्क नहीं रहने दिया, यही तो मेरा कमाल था.’’ फरहाना ने जवाब दिया.

‘‘तुम करो तो कमाल. यही कमाल तवायफ करें तो समाज गाली देता है.’’

‘‘इसलिए कि तवायफ आर्टिस्ट नहीं होती.’’ फरहाना ने दलील दी.

‘‘बहुत खूब. मगर यह क्यों भूलती हो कि वे तुम से बड़ी आर्टिस्ट होती हैं. तुम से बेहतर नाच सकती हैं.’’

‘‘गलत. तवायफ तमाशबीनों को खुश करने की अदाएं जानती हैं, नाच क्या जानें?’’

‘‘तमाशबीनों को तो तुम ने भी खुश किया. देखा नहीं, तुम्हारे डैडी और तुम्हारी मम्मी कैसे खुश हो रहे थे. हालांकि उन्हें फिक्रमंद होना चाहिए था.’’

‘‘यह महज अदाकारी थी.’’

‘‘तवायफ भी तो अदाकारी करती है.’’

‘‘आप कहना क्या चाहती हैं?’’

‘‘यही कि उस वक्त तुम में और किसी तवायफ में कोई फर्क नहीं था, सिवाय इस के कि तुम अदाकारा भी थीं.’’

‘‘ऐसी घटिया सोच पर मैं इस के अलावा आप से क्या कह सकती हूं कि आप अनपढ़, जाहिल और गंवार हैं. आप इस फन की एबीसी भी नहीं जानतीं और चली हैं आलोचना करने.’’

‘‘जहां तक जानकारी की बात है फरहाना, तो मैं बता सकती हूं कि तुम ने कहांकहां गलती की है.’’

‘‘जिन उस्तादों से मैं ने सीखा है, उन की आप को हवा भी नहीं लगी है. पांव उठा कर चलना आता नहीं, चली हैं मेरी गलतियां निकालने.’’

‘‘मैं तुम्हारी गलतफहमी दूर कर दूं?’’

‘‘क्या करेंगी आप?’’

‘‘उस गजल की रिकौर्डिंग है तुम्हारे पास, जिस पर तुम नाची थीं?’’

‘‘है.’’

‘‘बालरूम में चलो और उसे बजाओ.’’

फरहाना की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या होने वाला है. उस ने कैसेट को प्लेयर में रख दिया और देखने लगी कि क्या होता है.

नरगिस का बदन हरकत में आया और उस के अंगों ने शायरी शुरू कर दी. वह नाच रही थी और फरहाना उसे हैरानी से देख रही थी. जिसे वह जाहिल, गंवार कह रही थी, वह उस वक्त माहिर नर्तकी नजर आ रही थी. फरहाना ने कई बार अपनी आंखों को मसला, लेकिन यह हकीकत थी, ख्वाब नहीं था.

‘‘फरहाना, इसे कहते हैं नाच.’’

‘‘नजमा फूफी, आप ने यह डांस कहां सीखा?’’

‘‘इसे छोड़ो कि यह डांस कहां सीखा, यह पूछो कि मैं ने इस वक्त डांस क्यों किया? तुम न भी पूछो तो मैं तुम्हें बताऊंगी. मैं ने यह अदना सा नमूना इसलिए पेश किया कि तुम यह जान लो कि नाच सिर्फ तवायफ पर सजता है. तुम घर की जन्नत छोड़ कर दोजख तक जाओगी, लेकिन नाच फिर भी नहीं आएगा. यह नाच मैं ने यह बताने के लिए किया है कि मैं नाच सकती हूं, लेकिन मैं इस पर फख्र नहीं करती. फख्र करती हूं शराफत के उस आंचल पर, जो इस वक्त भी मेरे सिर पर है. आर्ट के नाम पर खुद को धोखा मत दो. तुम्हारा आर्ट हमारी शराफत और पाकीजगी है, जो तुम कहीं रख कर भूल गई हो. तुम्हें नाच इसलिए नहीं आ सकता, क्योंकि तुम तवायफ बनने की अदाकारी तो कर सकती हो, पर वह जख्म कैसे खाओगी, जो तवायफ के दिल पर रोज लगते हैं. अब भी वक्त है, लौट आओ. इसलिए कि तवायफ जब बगावत करती है तो किसी शरीफ घराने में पनाह लेती है. तुम बगावत करोगी तो कहां जाओगी? कुछ सोचा? सोच लो तो मुझे बता देना.’’

फरहाना सोचती तो क्या, उस ने तो पूरे घर में ऐलान कर दिया कि उस ने एक आर्टिस्ट खोज लिया है. यह खबर रशीद अहमद तक कैसे नहीं पहुंचती. रशीद ने पूछा, ‘‘सुना है, तुम डांस बहुत अच्छा करती हो?’’

‘‘मजबूरियां जब हद से बढ़ जाएं तो नाच बन जाती हैं.’’ नरगिस बोली.

‘‘तुम्हें यह फन भी आता है, मुझे मालूम ही नहीं था.’’

‘‘मालूम होता भी कैसे, मेरे कदम तो भाई की चारदीवारी में हैं.’’

‘‘फन और खुशबू को छिपे नहीं रहना चाहिए. तुम कहो तो मैं कोशिश करूं. एमडी से ले कर चेयरमैन तक सब से परिचय है.’’

‘‘अब मुझ में भागने की हिम्मत नहीं है.’’

‘‘यह तुम किस किस्म की बातें कर रही हो? सोचो तो, तुम्हारी तसवीरें अखबारों की जीनत बनेंगी. मशहूर हो जाओगी. तुम्हारे साथ मेरी शोहरत भी होगी.’’

नरगिस को लगा, जैसे उस का भाई नहीं, गुलजार खां सामने खड़ा है, जो फिर एक शरीफ घर की लड़की को उठाने आ गया है. वह गौर से उन्हें देख रही थी.

‘‘मगर तुम ने यह फन सीखा कहां से?’’ रशीद ने पूछा.

‘‘सुन सकेंगे?’’

‘‘अरे भई, यकीनन किसी अच्छे उस्ताद का नाम आएगा, सुनेंगे क्यों नहीं.’’

‘‘मेरी उस्ताद थीं दिलशाद बेगम और मैं ने यह फन लाहौर की हीरा मंडी (वेश्या बाजार) में 15 साल की लगातार मेहनत से सीखा है.’’

‘‘क्या… तो तुम…?’’

‘‘हां, भाईजान, मैं तवायफ थी और शराफत की तलाश में अपने वारिसों के साए में पनाह लेने आई थी.’’

‘‘आहिस्ता बोलो. किसी ने सुन लिया तो क्या कहेगा. मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी.’’

‘‘कह दीजिएगा, फरहाना की तरह अदाकारी कर रही है.’’

‘‘खामोश, मेरी बेटी का नाम अपने साथ न लो. अगर तुम पहले यह सब कुछ बता देतीं तो मैं अपने घर के दरवाजे बंद कर लेता. वैसे भी तुम हमारे लिए मर चुकी थीं.’’

‘‘तो बंद कर लीजिए. यों भी मुझे जिस घर की तलाश थी, यह वह घर नहीं है.’’

‘‘दरवाजे अब बंद करूंगा तो दुनिया से क्या कहूंगा?’’

‘‘कह दीजिएगा कि तवायफ थी, निकाल दिया.’’

‘‘बहुत खूब, मैं अपने मुंह पर खुद कालिख मल दूं.’’

‘‘मैं अगर आप के मशविरे पर अमल कर के आर्ट के नाम पर नाचने का प्रदर्शन करूं, तो आप का मुंह सलामत रहेगा?’’

‘‘वह और बात होगी.’’

‘‘मगर इस तरह मेरे मुंह पर कालिख मल जाएगी. दिलशाद बेगम कहेगी, शाबाश, नरगिस बेगम, शाबाश. तू ने कोठा छोड़ दिया, पेशा नहीं छोड़ा. जो काम मैं तुम से नहीं ले सकी, तेरे सगे भाई ने ले लिया.’’

रशीद सिर झुका कर अपने कमरे में चला गया और नरगिस अपने कमरे में आ गई.

दोपहर का वक्त था. सब अपनेअपने कमरों में थे. नरगिस खामोशी से उठी. ड्राइंगरूम में रखी हुई रशीद अहमद की तसवीर अपनी चादर में छिपाई और खामोशी से बाहर आ गई.

‘‘बीबीजी आप…’’ दरबान ने पूछा.

‘‘हां, मैं जरा पड़ोस में जा रही हूं. कोई पूछे तो बता देना.’’

नरगिस सड़क पर आई और एक टैक्सी को हाथ दे कर रोका, ‘‘स्टेशन चलो.’’

स्टेशन पहुंच कर नरगिस ने एक कुली से बुकिंग औफिस का पता पूछा. चंद औरतें खिड़की के सामने खड़ी थीं. वह भी खड़ी हो गई.

‘‘कहां की टिकट दूं?’’

‘‘मुलतान.’’

टिकट ले कर गाड़ी का वक्त पूछा और प्लेटफार्म पर आ गई. आज वह फिर एक गुलजार खां से, एक दिलशाद बेगम से बच कर भाग रही थी. हरम गेट, मुलतान- अपनी मांजी के पास. Hindi stories

   लेखक – डा. साजिद अमजद  

Love Story: प्यार नहीं, जिद

Love Story: अगर कोई लड़की किसी लड़के से दोस्ती कर ले और दोनों की दोस्ती गहरा जाए तो इस का मतलब यह नहीं है कि वह लड़के को प्यार करने लगी है. ज्यादातर लड़के ऐसी गलतफहमी पाल लेते हैं. सिद्धार्थ के साथ भी ऐसा ही हुआ, जिस का अंजाम डारिया को तो भुगतना ही पड़ा, वह भी जेल चला गया.

दुनिया में हर आदमी ख्वाब देखता है. कुछ सोते में तो कुछ जागते में. लेकिन यह भी सच है कि किसी के ख्वाब पूरे हो जाते हैं तो किसी के टूट कर किरचाकिरचा बिखर जाते हैं. कहने का अभिप्राय यह है कि ख्वाबों के मामले में सब खुशनसीब नहीं होते. डारिया यूरिएवा प्रोकीना के साथ भी कुछ ऐसा ही था. किशोर होते ही डारिया का झुकाव संगीत की ओर हो गया था. उस ने सुना था कि संगीत के मामले में भारत अग्रणी देश है, जहां बड़ेबड़े संगीतज्ञ रहते हैं. संगीतज्ञों के घराने हैं. इसलिए उस ने मन बना लिया था कि समय आने पर वह भारत जा कर संगीत की शिक्षा लेगी.

यही वजह थी कि 22 वर्ष की होते ही वह मन में संगीत सीखने की इच्छा लिए भारत आ गई. डारिया ने भारत के बारे में जैसा सुना था, ठीक वैसा ही पाया. उस ने यहां की ढेरों यादों को अपने दिलोदिमाग में संजो कर रख लिया. इन यादों को वह कभी खोना नहीं चाहती थी. 6 महीने के दौरान उस ने भारत के कई मनमोहक पर्यटकस्थल घूम लिए थे. इस के साथ ही उस ने संगीत के सुरों को अपनी नाजुक उंगलियों और मीठी आवाज से साधने की कला भी सीख ली थी.

डारिया मूलरूप से बुलगारिया के प्रमुख शहर वारना की रहने वाली थी. समुद्र किनारे बसे इस खूबसूरत शहर के समुद्री बीच पर देशीविदेशी पर्यटकों का खूब आवागमन रहता है. डारिया यूरी प्रोकीना की बेटी थी. यूरी के परिवार में पत्नी एंटोनिना प्रोकीना के अलावा 2 ही बेटियां थीं, जिन में बड़ी थी जेन प्रोकीना और छोटी डारिया. डारिया का परिवार साधन संपन्न था. उस ने रूस की राजधानी मास्को स्थित मास्को यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल की थी. पढ़ाई के दौरान ही उस ने रूस की नागरिकता भी ले ली थी. बाद में इसी यूनिवर्सिटी में वह रिसर्च स्कौलर हो गई.

इस के लिए उसे 60 हजार यूरो मिलते थे. मास्को में वह सावेटेक्सिया क्षेत्र स्थित स्ट्रीट नंबर 21 के फ्लैट नंबर 22 में रह रही थी. उस का आवागमन दोनों देशों के बीच बना रहता था. इसी दौरान वह भारत आई थी. दरअसल, डारिया ने भारत के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. इसी से उसे यहां के प्रति लगाव पैदा हुआ. मई, 2015 में उस का यह ख्वाब साकार हुआ. भारत में कई जगहों का भ्रमण करने के बाद उस ने अपना ठिकाना उत्तर प्रदेश की पर्यटक नगरी वाराणसी को बनाया. डारिया की खूबसूरत यादों की एक कड़ी सिद्धार्थ श्रीवास्तव भी था.

सिद्धार्थ का परिवार बनारस के लंका थानाक्षेत्र की नंदनगर कालोनी के मकान नंबर 37 में रहता था. साधनसंपन्न श्रीवास्तव परिवार की रीढ़ पूर्व एक्साइज कमिश्नर हृदयनाथ श्रीवास्तव थे. सिद्धार्थ उन का पोता था. सिद्धार्थ के पिता प्रदीप श्रीवास्तव का दूध का कारोबार था. उन के परिवार में पत्नी वीना के अलावा 2 बेटे थे, जिन में सिद्धार्थ छोटा था. सिद्धार्थ बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में बैचलर औफ म्यूजिक (बीम्यूज) तृतीय वर्ष का छात्र था. उस से मुलाकात के बाद डारिया उस के घर पर ही पेइंगगैस्ट के रूप में रहने लगी थी. भारत भ्रमण का उस का 6 महीने का सफर यादगार रहा. अब वह भारत की अपनी यादों के साथ 18 नवंबर को अपने देश वापस जाने की तैयारी कर रही थी. उस ने अपनी एयर टिकट भी बुक करा ली थी.

यादें खूबसूरत ही रहें तो बेहतर हैं. तकलीफ तब होती है, जब या तो वे कड़वाहट में तब्दील हो जाएं या फिर कोई गहरा जख्म देने वाला तूफान उन से टकरा जाए. डारिया को भी अचानक एक ऐसे भयानक तूफान से रूबरू होना पड़ा, जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. 2 नवंबर, 2015 की रात डारिया घर की छत पर बिछे तख्त पर मच्छरदानी लगा कर सो रही थी. रात बीत चुकी थी और भोर होने वाली थी. तड़के तकरीबन 4 बजे का वक्त था, जब डारिया की तेज चीखें सुन कर प्रदीप श्रीवास्तव की नींद खुल गई.

प्रदीप, उन की पत्नी वीना व बेटा सचिन दौड़ कर ऊपर पहुंचे तो डारिया रोतेरोते चिल्ला रही थी, ‘‘हैल्प…हैल्प…प्लीज हैल्प मी.’’ उसे देख कर सभी के पैरों तले से जमीन खिसक गई. डारिया के चेहरे, शरीर की खाल और कपड़ों से गंधयुक्त धुंआ निकल रहा था. श्रीवास्तव परिवार समझ गया कि उस पर किसी ने तीक्ष्ण तेजाब से हमला किया है. एकाएक किसी को कुछ सुझाई नहीं दिया तो वह डारिया को उठा कर नीचे बाथरूम में लाए और उस के जले हिस्से को पानी से धोया. इस बीच वह अचेत हो गई थी. आननफानन में वह उसे ले कर बीएचयू अस्पताल पहुंचे और प्राईवेट वार्ड में भर्ती करा दिया.

इस की सूचना उन्होंने पुलिस को दे दी थी. घटना जितनी गंभीर थी, उतनी ही दिल दहला देने वाली भी. मामला विदेशी युवती पर तेजाब डालने का  था. सूचना पा कर लंका॒ थानाप्रभारी संजीव कुमार मिश्र मय पुलिस बल के मौके पर पहुंच गए. उन्होंने अपने अधिकारियों को इस घटना से अवगत कराया तो एसएसपी आकाश कुलहरि, एसपी (सिटी) सुधाकर यादव और सीओ डी.पी. शुक्ला भी वहां आ पहुंचे. जिस बिस्तर पर डारिया पर तेजाब डाला गया था, उस का आधा हिस्सा जल कर काला पड़ चुका था. मौके से पुलिस को तेजाब का जग मिला, जो आधा भरा हुआ था. फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को भी मौके पर बुलवाया गया. पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर बिस्तर व जग को अपने कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस अस्पताल पहुंची. तब तक जिलाधिकारी राजमणि यादव भी वहां आ गए थे.

डारिया की हालत नाजुक थी. तेजाब से उस के चेहरे से ले कर पैर तक का दायां हिस्सा 45 प्रतिशत तक जल चुका था. डाक्टर उस का प्राथमिक उपचार कर रहे थे. इसलिए उस से तत्काल पूछताछ नहीं की जा सकती थी. पुलिस ने प्रदीप आदि से पूछताछ कर के युवती का ब्यौरा जुटाया. उस के कमरे से उस की दोहरी नागरिकता वाले पासपोर्ट भी मिल गए. घटना को ले कर अधिकारी असमंजस की स्थिति में थे. उन्हें आरंभ में ही लग गया था कि हमले के पीछे कोई बड़ा कारण है, लेकिन वह कारण आखिर क्या है, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था.

पुलिस का अनुमान था कि हमलावर या तो पीडि़ता को जानता था या फिर किसी ने निजी खुन्नस के चलते किसी को पैसा दे कर यह काम कराया था. जो भी रहा हो, यह काम करने या कराने वाले का मकसद युवती का चेहरा बिगाड़ना था. चिकित्सकों की इजाजत पर पुलिस ने डारिया से पूछताछ की तो उस ने इस के लिए सिद्धार्थ श्रीवास्तव को जिम्मेदार बताया. पुलिस ने सिद्धार्थ के परिजनों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वह घटना के बाद से ही लापता है. वे लोग डारिया की चीखें सुन कर छत पर गए थे. उन्हें नहीं पता कि हमले के पीछे सिद्धार्थ का हाथ है या नहीं?

एक तो शहर में तेजाब को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की यह बड़ी घटना थी, दूसरे घटना की शिकार हुई युवती विदेशी थी. इन दोनों ही बातों ने पुलिस की चिंता बढ़ा दी थी. कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण, जोन के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) अमरेंद्र सेंगर और पुलिस उप महानिरीक्षक एस.के. भगत ने अपने अधीनस्थ अफसरों को आरोपी को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए. विदेशी युवती का प्रकरण होने की वजह से इस की गूंज प्रदेश मुख्यालय से ले कर दिल्ली तक पहुंची तो प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने डीजीपी जगमोहन यादव से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ले कर डारिया का उपचार सरकारी खर्चे पर कराने के निर्देश दिए.

दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से रूस व बुल्गारिया के दूतावासों को इस घटनाक्रम का ब्यौरा प्रेषित कर दिया गया. इस बीच पुलिस ने डारिया के बयानों पर महिला एसआई संजू सरोज के माध्यम से लिखित तहरीर के आधार पर धारा 326 (ए) के अंतर्गत नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया.

मामले की गंभीरता के मद्देनजर आरोपी को जल्द गिरफ्तार करना जरूरी था. एसएसपी आकाश कुलहरि ने थानाप्रभारी संजीव कुमार मिश्र को आरोपी की तलाश में जुट जाने को कहा. थानाप्रभारी ने आरोपी सिद्धार्थ की तलाश में कई स्थानों पर दबिश डाली, लेकिन वह हाथ नहीं आ सका. फिर भी पुलिस उस की सुरागसी में लगी रही. शाम को एक मुखबिर से पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी सिद्धार्थ को कुछ देर पहले बसस्टैंड के पास घूमते देखा गया है.

सूचना मिलते ही संजीव कुमार ने एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में एसआई संजय कुमार सिंह, एसआई महेंद्रराम प्रजापति, कांस्टेबल अखिलेश कुमार व संजय कुमार को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने बसस्टैंड पहुंच कर सिद्धार्थ की तलाश शुरू कर दी. पुलिस चूंकि आरोपी के घर से उस का फोटो ले चुकी थी, इसलिए उसे पहचानने में देर नहीं लगी. पुलिस ने पीछे से जा कर उसे दबोच लिया.

सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना लंका ले आई. संजीव कुमार ने उस की गिरफ्तारी की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी. पुलिस ने सिद्धार्थ से पूछताछ की तो उस ने बिना किसी सख्ती के अपना जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस ने उस से विस्तृत पूछताछ की तो दोस्ती व एकतरफा प्यार की वजह से डारिया को हमेशा के लिए अपना बनाने का ख्वाब देखने वाले हारे हुए जुनूनी प्रेमी की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई.

दरअसल डारिया टूरिस्ट वीजा पर 1 मई, 2015 को भारत आई थी. पहले वह हिमाचल प्रदेश की वादियों में घूमी, फिर वाराणसी आ गई. डारिया का एक हमवतन दोस्त एलेक्जेंडर भी वाराणसी आया हुआ था. एक शाम दोनों गंगा घाट पर घूम रहे थे, तभी डारिया के कानों में टकराई बांसुरी की मधुर धुन ने जैसे उस के मन में मिठास घोल दी. उस ने घूम कर देखा तो एक युवक बांसुरी की धुन में खोया हुआ था. दोनों उस के नजदीक पहुंचे और उस की जम कर तारीफ की. यह युवक सिद्धार्थ श्रीवास्तव था.

बांसुरी बजाने का शौकीन सिद्धार्थ अक्सर गंगा किनारे चला जाया करता था और बांसुरी बजाने का अभ्यास करता था. उस दिन भी वह इसीलिए वहां गया था. डारिया की तारीफ से सिद्धार्थ बहुत खुश हुआ. इसी बीच तीनों के बीच औपचारिक परिचय हुआ. डारिया बांसुरी की धुन सुन कर जिस अंदाज से खिलखिला कर उस के पास आई थी, उसी अंदाज में वापस भी चली गई. लेकिन पहली ही मुलाकात में उस ने सिद्धार्थ के दिल के तारों को झंकृत कर दिया था.

डारिया खुद भी संगीत सीखना चाहती थी. सिद्धार्थ उसे भला लड़का लगा. इसलिए अगले दिन वह फिर गंगा किनारे उसी स्थान पर गई. सिद्धार्थ उस दिन भी वहां मौजूद था. डारिया ने संगीत के प्रति अपने लगाव की बात सिद्धार्थ को बताई तो उसी दिन से उन के बीच बातों और मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया. रफ्तारफ्ता उन की दोस्ती गहराती गई. डारिया होटल में ठहरी थी. एक दिन सिद्धार्थ ने उस से कहा, ‘‘डारिया, तुम्हें यदि अपने इस दोस्त पर भरोसा हो तो तुम मेरे यहां पेइंगगैस्ट बन कर रह सकती हो. इस से तुम्हें संगीत सीखने में भी आसानी होगी.’’

सिद्धार्थ का प्रस्ताव अच्छा था. संगीत सीखने की ललक की वजह से उस ने इस के लिए स्वीकृति दे दी. बनारस में अनेक सैलानी कईकई महीने रुकते हैं. होटल चूंकि महंगे पड़ते हैं, इसलिए कई बार वे होटल के बजाय पेइंगगैस्ट बन कर लोगों के यहां रुक जाते हैं. यह साधारण सी बात थी. सिद्धार्थ एक दिन डारिया को अपने घर ले गया और उस ने उस का परिचय अपने घर वालों से कराया. डारिया का स्वभाव सभी को पसंद आया. सिद्धार्थ की सहमति पर डारिया को बतौर पेइंगगैस्ट रहने के लिए एक कमरा दे दिया गया.

वह श्रीवास्तव परिवार के साथ रह कर संगीत सीखने लगी. डारिया को प्राकृतिक सौंदर्य से बहुत प्यार था. वह जी भर कर घूमना चाहती थी. वह खुले विचारों वाली युवती थी. इस बीच उस का दोस्त एलेक्जेंडर भी कहीं घूमने जा चुका था. वैसे भी वे दोनों अलगअलग आए थे. डारिया सिद्धार्थ के साथ सिक्किम, दार्जिलिंग और लेह घूमने के लिए गई. दोनों जहां भी जाते थे, एक साथ ही ठहरते थे. इस दौरान दोनों दोस्ती से उपजे वक्ती प्यार की वजह से एकदूसरे के बेहद नजदीक आ गए थे. नजदीकियों की रोशनी थोड़ी और फैली तो डारिया के दिल में क्या है? बिना यह जानेसमझे सिद्धार्थ ने मन ही मन डारिया को अपनी जिंदगी का हमसफर बनाने का फैसला कर लिया.

चूंकि डारिया की रजामंदी के बिना यह संभव नहीं था, इसलिए अच्छे वक्त के इंतजार में उस ने वक्ती तौर पर अपने जज्बातों को जब्त कर के रखना ही बेहतर समझा. यह बात अलग थी कि डारिया के लिए यह रिश्ता केवल और केवल वक्ती था. कई जगहों पर घूम कर सिद्धार्थ और डारिया सितंबर में वाराणसी आ गए. इस बीच डारिया ने बांसुरी, हारमोनियम और तबले पर संगीत सीखने का अभ्यास कर लिया था. वह अपना ज्यादातर वक्त संगीत के रियाज और किताबें पढ़ने में बिताती थी. सिद्धार्थ के दिल में चूंकि कुछ और था, इसलिए वह उस का ख्याल रखने में दिनरात एक कर रहा था. एक तरह से वह उस पर अपना हक भी समझने लगा था, जबकि डारिया उसे एक घनिष्ठ दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी.

डारिया श्रीवास्तव परिवार से काफी घुलमिल गई थी. उस का दोस्त एलेक्जेंडर सिक्किम गया हुआ था. उस ने डारिया को वहां आने को कहा, तो वह अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में अकेली ही उस के पास चली गई और एक सप्ताह बाद वापस आई. सिद्धार्थ के दिल में उस के लिए एकतरफा प्यार का जुनून था. उस के इस तरह जाने से उसे गुस्सा तो आया. लेकिन उस ने अपनी नाराजगी प्रकट नहीं की. सिद्धार्थ जिद्दी व गुस्सैल प्रवृत्ति के विकार का शिकार था. उस के घर वाले उस का इलाज भी करा रहे थे. डारिया और सिद्धार्थ के बीच चूंकि संबंधों के मामले में कभी भी खुल कर बात नहीं हुई थी, इसलिए दोनों ही एकदूसरे की भावनाओं और अंदरूनी सोच को नहीं समझ पाए थे.

डारिया अब अपने देश वापस जाना चाहती थी. इस बारे में वह अपने घर वालों से अकसर बात भी करती थी. एक दिन जब वह अपनी मां से मोबाइल पर बात कर रही थी तो सिद्धार्थ कमरे में आ गया. कुछ देर बातें कर के डारिया ने चहकते हुए कहा, ‘‘एक सरप्राइज है माम, आई कम बैक होम. बट आफ्टर सम डेज. ओके बाय.’’ कहते हुए उस ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. वह बहुत खुश थी. उस का अंतिम वाक्य सुन कर सिद्धार्थ को करंट सा लगा. एकाएक वह तनाव में आ गया. वह उस के नजदीक जा कर बोला, ‘‘कहां जाने की बात कर रही थीं डारिया?’’

‘‘अपनी कंट्री.’’ उस ने हंस कर जवाब दिया.

‘‘व्हाट?’’ सिद्धार्थ ने चौंक कर पूछा तो डारिया ने उस की तरफ देखा, ‘‘इतना हैरान क्यों हो रहे हो सिद्धार्थ? अपने देश तो मैं जाऊंगी ही.’’

सिद्धार्थ अपने दिल की बात छिपाते हुए बोला, ‘‘यह बात नहीं है, दरअसल मैं चाहता हूं कि तुम अभी कुछ दिनों और यहां रहो.’’

‘‘बट व्हाय? मैं यहां हमेशा के लिए तो कतई नहीं आई थी.’’

‘‘तुम नहीं जानती, तुम्हारे बिना मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा.’’

‘‘सौरी डियर, मुझ से रुकने की बात मत करो. ऐसा नहीं हो सकता.’’

‘‘तुम चाहो तो सब हो सकता है.’’

‘‘उदास नहीं होते बेबी, दिस इज नौट बिग मैटर.’’ कहने के साथ ही डारिया उस की बातों को हंसी में टाल गई. जबकि सिद्धार्थ के साथ ऐसा नहीं हो सका.

उस दिन से सिद्धार्थ की चिंता का दौर शुरू हो गया. वह अजीब से तनाव में रहने लगा. उस की रातों की नींद उड़ गई. दरअसल वह मन ही मन फैसला कर चुका था कि वह डारिया को अपनी दुलहन बनाएगा. वह सोचता था कि डारिया इतने दिनों साथ रही है. उस के दिल में भी उस के लिए जगह होगी. वह पति के रूप में उसे अपना कर हमेशा के लिए भारत में बस जाएगी. इसलिए अब उस ने जल्द से जल्द अपने दिल की बात उस से करने का मन बना लिया.

इस बीच डारिया भारत को अलविदा कह कर जाने की तैयारी करने लगी थी. उस ने एक एजेंट के जरिए 18 नवंबर की अपनी टिकट भी बुक करा ली थी. यह बात पता चलने पर सिद्धार्थ बौखला गया. एक दिन वह डारिया के कमरे में आया तो उस की आंखों व चेहरे पर उदासी के बादल मंडरा रहे थे. उस की परेशानी छिपने वाली नहीं थी. उस ने डारिया से कहा, ‘‘मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं डारिया.’’

‘‘क्या?’’ डारिया ने आंखों में आंखें डाल कर पूछा तो वह बोला, ‘‘हमारा धर्म, संस्कार और देश भले ही अलग हों, लेकिन मेरे दिल ने सिर्फ तुम्हारी धड़कन को महसूस किया है. मैं तुम्हें सच्चा प्यार करता हूं. जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो, मैं ने अपनी हर खुशी और हर गम को तुम से जोड़ कर देखा है. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि तुम हमेशा के लिए यहीं रह जाओ.’’

‘‘कैसी बात कर रहे हो सिद्धार्थ? मैं यहां शादी करने नहीं, घूमने के लिए आई थी.’’

‘‘लेकिन…’’ उस ने कुछ कहना चाहा तो डारिया ने उसे बीच में ही टोक दिया, ‘‘प्लीज सिद्धार्थ, रिश्ते अपनी जगह हैं, लेकिन मैं ने इस बारे में कभी नहीं सोचा.’’

‘‘अब तो सोच सकती हो?’’

‘‘सौरी सिद्धार्थ.’’

‘‘तुम्हारे जाने से मैं बहुत दुखी हो जाऊंगा.’’ सिद्धार्थ ने कहा तो डारिया उसे समझाते हुए बोली, ‘‘मैं तुम से दूर नहीं जा रही सिद्धार्थ. महसूस कर के देखना, मुझे हरदम अपने साथ पाओगे. मैं तो यहां सिर्फ घूमने आई थी. मेरा लक्ष्य तुम नहीं थे. मुझे यहां तुम जैसा अच्छा दोस्त मिला, यह मेरे लिए खुशी की बात है. हमारी दोस्ती की डोर इतनी कमजोर नहीं, जो दूरियों से टूट जाए.’’

‘‘प्लीज एक बार शादी के बारे में सोच लो. मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा.’’ सिद्धार्थ ने गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा तो वह उस के प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए बोली, ‘‘नेवर सिद्धार्थ, यह सच है कि मैं तुम्हारे साथ रही. तुम ने मेरा खयाल भी रखा. इसे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी. थैंक्यू सो मच.’’

सिद्धार्थ के सपने जैसे एक झटके में चकनाचूर हो गए. उसे डारिया से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. अब जैसेजैसे दिन बीत रहे थे, सिद्धार्थ और भी परेशान होता जा रहा था. वह दिनरात डारिया के बारे में सोचता और वक्त बेवक्त उसे मनाने की कोशिश भी करता, लेकिन हर बार डारिया का जवाब ना ही होता. डारिया उस की उदासी की वजह जानती थी, लेकिन उस की अपनी मजबूरी थी. इस से सिद्धार्थ बुरी तरह चिढ़ गया. प्यार की नाकामी ने उस के दिल में नफरत का सैलाब भर दिया. गुस्सैल प्रवृत्ति का होने से इस में और भी इजाफा हुआ.

उसे लगा कि डारिया ने उस के साथ बेवफाई की है और उसे अपनी खूबसूरती पर घमंड है. अगर वह उस की बात नहीं मानेगी तो वह भी उसे किसी के काबिल नहीं छोड़ेगा. उस की हालत पागलों जैसी हो गई. आखिर सिद्धार्थ ने डारिया पर तेजाब से हमला करने का फैसला कर लिया. इंटरनेट पर उस ने खतरनाक एसिड के बारे में जानकारी जुटाई और शहर में उस की दुकान का पता भी खोजा. 6 नवंबर को उस ने गांधीनगर मार्केट स्थित कैमिकल की एक दुकान से 750 रुपए में ढाई लीटर सल्फ्युरिक एसिड खरीद कर अपने पास रख लिया. यह एसिड एक जार में था. 12 नवंबर की शाम उस ने डारिया से अंतिम बार कहा, ‘‘डारिया एक बार फिर सोच लो.’’

लेकिन वह उस की बात से चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम पागल हो गए हो सिद्धार्थ.’’

‘‘पागल ही सही, मुझे सोच कर जवाब दे देना.’’ कहते हुए वह उस के कमरे से बाहर निकल गया.

रात में डारिया छत पर सोने के लिए चली गई. वह खुली छत पर बिस्तर लगा कर सोती थी. डारिया तो अपने घर जाने के सपने लिए नींद के आगोश में चली गई. लेकिन सिद्धार्थ की आंखों से नींद कोसों दूर थी. उसे पूरी रात नींद नहीं आई. वह तड़के छत पर पहुंचा. डारिया उस वक्त सो रही थी. उस ने उसे जगाया. डारिया ने आंखे मलते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है सिद्धार्थ?’’

‘‘क्या सोचा तुम ने जाने के बारे में?’’ सिद्धार्थ ने कठोरता से पूछा तो उस के इरादे से अंजान अलसाई डारिया बोली, ‘‘ओफ्हो तुम अब भी इसी बात को ले कर बैठे हो. मुझे जाना है यार.’’ कहने के साथ वह दोबारा लेटने लगी, लेकिन तभी बिजली की सी गति से सिद्धार्थ के हाथ हरकत में आ गए. उस ने पीछे की तरफ किया हुआ अपना हाथ आगे किया और जग में लिया हुआ तेजाब डारिया की तरफ उछाल दिया.

इस के बाद वह चीते की सी फुर्ती से भाग गया. यह सब अप्रत्याशित था. तेजाब गिरते ही डारिया दर्द से बिलबिला उठी. उस के हलक से दर्दनाक चीखें निकलने लगीं. इस के बाद ही सिद्धार्थ के घर वाले दौड़ कर ऊपर पहुंचे थे और उसे अस्पताल में दाखिल कराया था. सिद्धार्थ चूंकि घर में नजर नहीं आ रहा था, इसलिए घर वालों को उस पर शक तो था, पर वह इस बात को छिपाए रहे. बाद में जब डारिया ने उस का नाम पुलिस को बताया तो उन्होंने सिद्धार्थ के फरार होने की बात पुलिस को बता दी. उधर सिद्धार्थ दिनभर इधरउधर छिपता घूमता रहा. घूमतेघूमते शाम को वह बस स्टैंड पहुंचा. उस ने शहर को हमेशा के लिए छोड़ देने का फैसला कर लिया था. लेकिन इस से पहले ही वह पुलिस के शिकंजे में आ गया. सिद्धार्थ की करतूत पर हर कोई हैरान था.

अगले दिन यानी 14 नवंबर को रूसी दूतावास के अधिकारी बनारस पहुंचे और पीडि़त डारिया से मिले. दूतावास के जरिए ही उस के घर वालों को हादसे की जानकारी दी गई. वे लोग चाहते थे कि बेहतर उपचार के लिए बेटी अपने देश आ जाए. गृह मंत्रालय के निर्देश पर डाक्टरों की एक टीम डारिया को एयर एंबुलैंस के जरिए दिल्ली ले गई और उसे सफदरजंग अस्पताल में भरती करा दिया.

डाक्टरों ने जांच की तो पता चला कि डारिया की बाईं आंख की रोशनी पूरी तरह जा चुकी है. विदेश मंत्रालय के अधिकारी वाराणसी से उस का सामान ले गए. इस के बाद डारिया को उस के परिजनों की इच्छानुसार विदेशी दूतावास के जरिए उस के देश भेज दिया गया. केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की है कि डारिया के इलाज का खर्चा भारत सरकार उठाएगी. इस बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने भी डारिया के नाम 5 लाख रुपए का एक चैक भारत सरकार को भेज दिया था. उधर आरोपी के दादा हृदयनाथ श्रीवास्तव का कहना था कि वह डारिया के लिए खुद नेत्रदान करने को तैयार हैं.

हमले से आहत डारिया का कहना था कि वह सिद्धार्थ से एक बार मिल कर पूछना चाहती है कि क्या किसी से दोस्ती या उस पर विश्वास करना गलत है? उस ने पुलिसकर्मियों से कहा कि सिद्धार्थ को माफ कर दिया जाए. सिद्धार्थ उस का अच्छा दोस्त है. डारिया ने यह भी कहा कि भारत एक अच्छा देश है. वह भविष्य में भी यहां आती रहेगी.

इधर पुलिस ने आरोपी सिद्धार्थ से विस्तृत पूछताछ व जरूरी कागजी औपचारिकताओं को पूरा कर के जिला अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा तैयार करने तक आरोपी जेल में था. पुलिस उस के खिलाफ चार्जशीट तैयार करने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की काररवाई करने की तैयारी कर रही थी.

डारिया से सिद्धार्थ को पहचानने की भूल हो गई थी. दूसरे सिद्धार्थ डारिया की दोस्ती और संबंधों को प्यार समझ कर उस के साथ दुनिया बसाने का ख्वाब देखने लगा था. अगर दोनों पहले ही एकदूसरे को ठीक से परख लेते तो न डारिया दर्दनाक हादसे से रूबरू होती और न सिद्धार्थ का भविष्य खराब होता. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों

Hindi stories: जुर्म का रिश्ता

Hindi stories: चोरीडकैती करने वाली लैला को रौनी से प्यार हुआ तो वह साथियों से धोखा करने लगी. भला उस के साथी यह धोखेबाजी कैसे बरदाश्त करते, परिणामस्वरूप वह मारी गई.

सीनियर पुलिस इंसपेक्टर से मिलने का समय ले कर मैं ने फोन रखा ही था कि रौनी आ गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. इस का मतलब था कि वह किसी मुसीबत में था. उस ने आते ही कहा, ‘‘कौफी का वक्त है, मंगवा लो.’’

मैं ने कौफी का और्डर दे दिया. उस ने कुरसी पर करवट बदलते हुए कहा, ‘‘दोस्त, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं, जिस से मेरा दिल हलका हो जाए.’’

रौनी ऊंचा, स्मार्ट और पूरा आदमी था. वह काला सूट पहने था. रौनी अपनी बात कहे, उस से पहले मैं थोड़ा अपने बारे में बता दूं. मैं एक प्राइवेट डिटैक्टिव हूं. इस इमारत की दूसरी मंजिल पर मेरा औफिस है. उसी मंजिल पर रौनी का भी औफिस है. वह एक साइकियाट्रिस्ट था. उस के पास ज्यादा लोग नहीं आते थे, पर जो आते, वे बड़े लोग होते थे. वह उन्हीं लोगों से इतनी रकम ऐंठ लेता था कि उसे पैसों की कोई तकलीफ नहीं होती थी, क्योंकि उन के सेशन काफी चलते थे.

रौनी अपने काम में परफेक्ट था, क्योंकि जो लोग उस के पास आते थे, वे कहीं और नहीं जाते थे. उस के पास समय की कमी नहीं होती थी, इसलिए दिन में 1-2 चक्कर वह मेरे औफिस के जरूर लगा लेता था. उस की बातें बड़ी दिलचस्प और असरदार होती थीं. उस के न आने पर मुझे उस की कमी महसूस होती थी. आज मैं थोड़ा मसरूफ था. मेरा दिमाग एक उलझन में फंसा था. उस समय मेरे सामने सब से बड़ा मसला गहनों की दुकानों में होने वाली डकैतियां थीं. मेरे एक ज्वैलर क्लाइंट ने अपनी दुकान पर होने वाली डकैती के बारे में पता लगाने का काम मुझे सौंप रखा था.

इसी बात को ले कर मैं ने सीनियर पुलिस इंसपेक्टर मेहता से बात की थी. उस ने आज ही मुझे थाने बुलाया था. रौनी ने मुझे सोच में डूबा देख कर कहा, ‘‘सच में मैं बहुत परेशान हूं. मेरी दोस्त लैला का कुछ पता नहीं चल रहा है, न कोई फोन, न कोई सूचना.’’

लैला काम क्या करती थी, यह मुझे पता नहीं था, लेकिन इतना जरूर पता था कि वह क्रिस्टल बौल में लोगों को उन का भविष्य बता कर बेवकूफ बनाया करती थी. वह बेहद खूबसूरत और हंसमुख लड़की थी. हां, उस की ड्रैसिंग कुछ अजीब होती थी. वह काला या सुरमई रंग का रेशमी लबादानुमा चोंगा पहनती थी. उस के बाल पौनीटेल में बंधे होते थे. हाथों में ढेर सी मोटीमोटी चांदी की चूडि़यां कानों में बड़ीबड़ी बालियां और हमेशा होंठों पर गहरी लिपस्टिक लगाए रहती थी.

मैं ने रौनी से कहा, ‘‘हो सकता है रौनी, वह किसी काम से कहीं बाहर चली गई हो और तुम्हें बता न पाई हो?’’

‘‘नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे बिना बताए वह कहीं नहीं जा सकती.’’

‘‘यह भी हो सकता है कि वह किसी क्लाइंट को प्रभावित करने के लिए कुछ खास कर रही हो और उसे फुरसत न मिल रही हो.’’

मैं ने यह बात इसलिए कही थी, क्योंकि मुझे पता चला था कि वह भविष्य बता कर अच्छेभले लोगों को उल्लू बना रही थी. मेरा तो यह भी सोचना था कि वह रौनी को भी उल्लू बना रही थी. प्यार वगैरह सब ढोंग था. रौनी का प्यार तो सच्चा था, पर मुझे लैला पर जरा भी भरोसा नहीं था.

लेकिन यह सब मैं रौनी से नहीं कह सकता था. मैं ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘तुम परेशान बिलकुल मत हो, निश्चित वह कहीं काम में फंसी है. जल्दी ही वह तुम्हें खबर देगी.’’

‘‘नहीं, मेरा दिल बेचैन है. परसों रात हम मिलने वाले थे. मैं उस के फ्लैट पर गया, लेकिन वह वहां नहीं मिली. कल और आज मैं ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने फोन नहीं उठाया. पता नहीं क्या बात है? तुम प्राइवेट जासूस हो, मेरी गुमशुदा महबूबा को ढूंढने का केस ले लो प्लीज.’’

‘‘क्या तुम ने लैला की गुमशुदगी थाने में दर्ज करा दी है?’’

‘‘नहीं, क्या मुझे उस की गुमशुदगी की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए?’’

‘‘अगर, सच में वह गायब है तो अवश्य दे देनी चाहिए.’’ मैं ने कहा.

दरअसल, मैं उस का केस लेना नहीं चाहता था, क्योंकि मेरा खयाल था कि लैला जानबूझ कर उस से मिलना नहीं चाह रही है. नहीं तो वह जरूर खबर करती. जाहिर है, ऐसी सूरत में मेरी भागदौड़ बेकार जाती. रौनी ने कहा, ‘‘यह मत समझना कि मैं मुफ्त में काम कराऊंगा. मैं तुम्हें इस की पूरी फीस दूंगा.’’

‘‘मेरा खयाल है कि हमें जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए. हो सकता है, जल्द ही वह तुम्हें सूचना दे.’’

मेरा इंसपेक्टर से मिलने का समय हो गया था, इसलिए मैं ने खड़े होते हुए कहा, ‘‘मुझे एक जरूरी काम से पुलिस स्टेशन जाना है. मैं वहां पता करूंगा कि उस के साथ कोई हादसा तो नहीं हो गया. इस बीच तुम उस के दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन कर के पता कर लो.’’

उस ने इत्मीनान की सांस ली. हकीकत में मैं इस मामले को ले कर जरा भी परेशान नहीं था. मैं पुलिस स्टेशन चला गया. इंसपेक्टर मेहता ने मुझे बैठा कर कहा, ‘‘मि. रुस्तम, मसला यह है कि गहनों की दुकानों में लगातार होने वाली चोरियों ने हमें परेशान कर रखा है. मेरा खयाल है, ये सारी वारदातें एक ही सिलसिले की कडि़यां हैं, पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिल रहा है, जिस से तफतीश आगे बढ़ सके.’’

‘‘यह अंदाजा आप ने कैसे लगा लिया कि ये वारदातें एक ही सिलसिले की कडि़यां हैं? यह भी तो हो सकता है कि कोई एक ही आदमी हो, जो अलगअलग जगहों पर वारदात कर रहा हो?’’

‘‘ऐसा सोचने की वजह यह है कि एक तो ये सारी वारदातें दिन में हुई हैं, दूसरे लूटे गए गहने एकदम से गायब हो गए हैं. उन्हें कहीं बेचा भी नहीं गया. हम इस पर कड़ी नजर रखे हुए हैं. इस से यही लगता है कि यह किसी एक गिरोह का या एक आदमी का काम है.’’

इंसपेक्टर मेहता होशियार और तेजतर्रार पुलिस अफसर थे. वह जरा भी घमंडी और मगरूर नहीं थे. प्राइवेट जासूसों से भी अच्छे से मिलते थे, इसलिए मेरी उन से अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. आज हमारी मुलाकात का यही मकसद था कि वह इस उलझे हुए केस में मेरी सलाह और मदद चाहते थे. मैं ने पूछा, ‘‘मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’’

‘‘मैं ने कुछ लोगों को पकड़ रखा है. वे इन डकैतियों में शामिल हो सकते हैं, पर काफी कोशिश के बाद भी मैं उन से कुछ मालूम नहीं कर सका हूं. शायद आप उन से काम की कोई बात उगलवा सकें.

उन के औफिस से निकल कर मैं हवालात की ओर बढ़ा था कि बरामदे में पड़ी बैंच पर मुझे रौनी की महबूबा लैला बैठी दिखाई दी. 2-3 बार वह रौनी के साथ मेरे औफिस में आई थी, इसलिए मैं उसे पहचानता था. वह थोड़ी तिरछी बैठी थी, इसलिए शायद उस ने मुझे नहीं देखा. मैं ने मेहता से पूछा, ‘‘इस औरत को जानते हो?’’

‘‘नहीं, पहले कभी नहीं देखा.’’

पहले जिस आदमी को मेरे सामने लाया गया, उस का नाम नरेन था. वह ज्वैलरी की एक दुकान में काम करता था. उस दुकान में भी डकैती हो चुकी थी. उस ने वारदात के 2 दिन पहले वहां से नौकरी छोड़ दी थी. उस से पूछताछ करने पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस का डकैती से कोई संबंध नहीं है. दूसरा आदमी सीधासादा नौजवान बब्बन था, बातचीत से ही वह बेकसूर लग रहा था. तीसरा आदमी लंबे चेहरे वाला जिमी था. उस का कहना था कि इस शहर में आए उसे बस 2 हफ्ते ही हुए हैं. वह यहां अपनी बीमार मां को देखने आया था, जो एक नर्सिंगहोम में एडमिट थी. उस ने मेरी हर बात के जवाब ठीक दिए थे, इसलिए उस पर शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

फिर भी मैं ने नर्सिंगहोम में भरती उस की मां से मिलने का फैसला किया. लेकिन इस से कुछ खास फायदा नहीं हुआ. उस की मां काफी बूढ़ी थी. वह व्हीलचेयर पर बैठी थी, जिसे एक नर्स धकेल रही थी. मैं ने अपना परिचय दिया तो वह मुसकराने लगी. मैं ने कहा, ‘‘मिसेज जेसिका मैं यहां सिर्फ यह पता करने आया हूं कि यहां आप की ठीक से देखभाल हो रही है या नहीं?’’

वह सिर्फ मुसकराती रही.

मैं ने आगे पूछा, ‘‘आप के कितने बच्चे हैं, क्या आप को देखने आते हैं?’’

उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, मेरे 6 बच्चे हैं.’’

‘‘क्या आप उन के नाम बता सकती हैं.’’

‘‘जौर्ज, साबू, सरीन, रौकी, मेरिन और पवन.’’

‘‘क्या उन में किसी का नाम जिमी भी है?’’

‘‘हां है न, वह बहुत अच्छा लड़का है.’’

‘‘लेकिन अगर जिमी को मिला लेते हैं तो आप के 7 बच्चे हो जाते हैं.’’

‘‘तो फिर 7 ही होंगे.’’

‘‘अच्छा, एक बार उन के नाम फिर से बताइए.’’

‘‘जिमी, पवन, जौन, सुरेश, बाबू, रीता, मेरिन.’’

मैं समझ गया कि बुढि़या का दिमाग ठीक नहीं है. मैं ने नर्सिंगहोम के रिसेप्शन से पता किया तो बताया गया कि जिमी के हुलिए का एक आदमी अकसर उस से मिलने आता रहता था. यह भी पता चला कि बुढि़या से मिलने तमाम लोग आते रहते थे. वह किसी को बेटा कहती थी तो किसी को बेटी.

जवान पोतेपोतियां भी उस से मिलने आते थे. इन की सारी तादाद पता नहीं थी. मेरे खयाल में जेसिका इस मामले में खुशनसीब थी. इतने लोग उस से मिलने आते थे और उस का खयाल रखते थे. शायद बुढ़ापे की वजह से उस की याददाश्त ठीक नहीं थी. कई बार तो उसे मिलने आने वाले बेटेबेटी या पोते का नाम क्या है, यही नहीं याद होता था? सब का प्यार मिलने की वजह से हर वक्त उस के होंठों पर मुसकान खिली रहती थी.

मैं रौनी से बचता हुआ अपने औफिस पहुंच गया. अगर मैं उसे यह बता देता कि मैं ने लैला को थाने में बैठी देखा था तो वह मेरी जान खा लेता. सवाल करकर के परेशान कर देता, इसलिए मैं उस से नहीं मिला.

रात को मैं अपने अपार्टमैंट में सो रहा था कि फोन की घंटी बजी. आंख खुली तो देखा रात के 2 बज रहे थे. फोन उठाना मेरी मजबूरी थी. दूसरी तरफ से रौनी की परेशान आवाज सुनाई दी, ‘‘रुस्तम, पुलिस मेरे अपार्टमैंट की तलाशी ले रही है, तुम जल्दी से आ जाओ.’’

‘‘क्यों, पुलिस तुम्हारे अपार्टमेंट की तलाशी क्यों ले रही है?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘पता नहीं, ये लोग कुछ बता भी नहीं रहे हैं. दोस्त तुम फौरन आ जाओ. तुम पुलिस के साथ काम करते हो, मुमकिन है तुम इस मामले में मेरी कुछ मदद कर सको. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है?’’

यह बात मेरी भी समझ में नहीं आई थी. आखिर पुलिस रौनी के फ्लैट की तलाशी क्यों ले रही थी? मैं उसे अच्छी तरह से जानता था, वह एक शरीफ आदमी था.

उस की मदद करना जरूरी था, इसलिए मैं उसी वक्त घर से निकल पड़ा. 10 मिनट में मैं उस की बिल्डिंग में पहुंच गया. उस समय इंसपेक्टर मेहता फ्लैट से निकल रहा था. मुझे देख कर बोला, ‘‘हैलो रुस्तम, आखिरकार हम ने इसे पकड़ ही लिया?’’

‘‘क्या…?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, पूरा माल तो नहीं, फिर भी अलगअलग दुकानों से चोरी के कुछ गहने जरूर बरामद हुए हैं. समझ लो केस खुल गया. पुलिस स्टेशन आ जाओ, मैं तुम्हें सब विस्तार से बता दूंगा.’’

मैं कुछ कहना चाहता था, तभी एएसआई और सिपाही रौनी को हथकड़ी लगा कर मेरे सामने से गुजरे, उस ने नाइटसूट पर कोट पहन रखा था, पैरों में स्लीपर थे. मुझे देख कर वह दुखी हो कर बोला, ‘‘प्लीज, मेरी मदद करो, मैं बेकसूर हूं रुस्तम.’’

पुलिस वाले उसे ले कर चले गए. मैं ने इंसपेक्टर मेहता से कहा, ‘‘मुझे लगता है, आप ने गलत आदमी को पकड़ लिया है?’’

‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो? इस के फ्लैट से चोरी का कुछ माल बरामद हुआ है.’’

‘‘एक बात मेरी समझ में यह नहीं आ रही है कि तुम्हें  इस पर क्यों शक हुआ?’’

‘‘रौनी के घर में जो औरत साफसफाई का काम करती है, उस ने अखबारों में गहनों की दुकानों में होने वाली डकैतियों के बारे में पढ़ा था. आज शाम को थाने आ कर उसी ने बताया कि उस ने रौनी के घर में कई जगहों पर गहनों के डिब्बे छिपे हुए देखे हैं, जिन में गहने रखे हैं.’’

मैं ने मेहता से कहा कि रौनी इस तरह का आदमी नहीं है. वह शरीफ और कानून पसंद आदमी है. इंसपेक्टर मेहता भी मुझ से सहमत थे, पर गहने उस के घर से बरामद हुए थे. हो सकता था, इस में उस का हाथ न हो. मैं ने कहा, ‘‘मुझे लगता है, उसे किसी ने फंसाने की कोशिश की है?’’

‘‘पर वह कौन हो सकता है? उस ने ऐसा क्यों किया?’’

उसी समय मेरी जेहन में लैला का खयाल आया. उसे मैं ने थाने के बरामदे में बैठी देखा था. मैं ने यह बात मेहता से पूछी तो उस ने कहा, ‘‘हां, सुबह जब तुम ने उस के बारे में पूछा था तो मैं ने पता किया कि वह थाने क्यों आई थी? उस ने बताया कि वह जिमी का इंतजार कर रही थी. मेरा खयाल है कि वह जिमी की गर्लफ्रैंड है, क्योंकि जब जिमी पहुंचा था तो उन दोनों में बातचीत भी हुई थी. झगड़े जैसी आवाजें भी आई थीं. बाद में वह उसी के साथ चली गई थी.’’

‘‘मुझे यकीन था कि वह रौनी और इस केस के बीच की कड़ी थी. हमें सख्त पूछताछ करनी होगी.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं अपने आदमियों को लैला और जिमी की तलाश में भेजता हूं.’’ मेहता ने कहा.

रौनी को पुलिस से रिहा करा कर मैं घर आ गया. मैं ने मेहता से वादा किया था कि किसी भी वक्त रौनी को हाजिर करने की जिम्मेदारी मेरी है. उस ने भी कहा था कि लैला के मिलते ही वह मुझे सूचना देगा.

दूसरे दिन रौनी जब मेरे औफिस आया तो उस की हालत काफी खराब थी. उस के बाल बिखरे हुए थे, चेहरा  उजड़ा हुआ था. वह दुखी हो कर बोला, ‘‘यह कितनी खराब बात थी कि पुलिस वाले मुझे मुजरिमों की तरह हथकड़ी लगा कर ले गए.’’

‘‘रौनी, तुम्हारे घर से चोरी के गहने बरामद हुए थे. उन्हें यह तो करना ही था. शुक्र करो कि तुम्हें रिहाई मिल गई, सवाल यह है कि तुम्हारे घर चोरी के गहने आए कैसे?’’

‘‘मुझे इस बारे में कुछ खबर नहीं है. तुम्हें तो पता है कि मैं ज्यादातर घर से बाहर रहता हूं. मुझे खुद हैरानी हो रही है कि मेरे घर किस ने और क्यों वे गहने रखे?’’

‘‘लैला के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है, क्या यह मुमकिन है?’’

उस ने मेरी बात काट कर कहा, ‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकती. उस के पास चोरी के गहने कहां से आएंगे? तुम उस पर क्यों शक कर रहे हो?’’

‘‘क्या तुम उस के अतीत के बारे में जानते हो? उस की हर गतिविधि की जानकारी तुम्हें रहती है?’’

‘‘क्यों, उस की ऐक्टीविटीज जानना जरूरी है?’’

‘‘तभी तो कोई बात तुम दावे से कह सकते हो. किसी इंसान के बारे में कुछ कहने के लिए उस का अतीत, वर्तमान और बैकग्राउंड जानना जरूरी है और उसे गहनों का शौक भी बहुत है.’’

‘‘मैं उस के बारे में बस इतना जानता हूं कि उस की बूढ़ी मां यहां के एक नर्सिंगहोम में भरती है.’’

‘‘एक मिनट, उस की मां का नाम क्या है? और वह किस नर्सिंगहोम में भरती है?’’

उस ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘न तो मुझे उस की मां का नाम पता है, न नर्सिंगहोम का.’’

‘‘क्या  उस के बहुत सारे भाईबहन हैं?’’

‘‘भाईबहन का उस ने जिक्र ही नहीं किया मुझ से.’’

मेरे दिमाग में अजीब सी हलचल मची हुई थी, जिस ने मुझे बेचैन कर रखा था.

दोपहर को एक संदिग्ध आदमी से पूछताछ चल रही थी. मुझे देखते ही मेहता ने कहा, ‘‘पिछली रात तुम्हारे दोस्त के फ्लैट से जो गहने हमें मिले थे, उन्हें 2-3 दुकानदारों ने पहचान लिया है. उन्हीं की दुकान के थे. बस इस के आगे तफतीश नहीं बढ़ रही है.’’

‘‘लैला का क्या हुआ? उस से कोई काम की बात पता चली?’’

‘‘नहीं, हम उसे अभी तक तलाश नहीं सके.’’

‘‘तुम ने कहा था कि कल उस ने जिमी से बात की थी और उसी के साथ गई थी तो जिमी को पकड़ कर उस से लैला के बारे में क्यों नहीं पूछते?’’

‘‘मेरे दिमाग में यह बात आई तो थी, लेकिन जिमी भी लापता है.’’ मेहता ने कहा.

मैं ने उसे जिमी की मां से मुलाकात के बारे में बता कर कहा कि रौनी बता रहा था कि लैला की मां भी किसी नर्सिंगहोम में भरती है. तभी फोन बज उठा. उस के चेहरे पर चिंता उभर आई. कुछ अच्छी खबर नहीं थी. बताया गया कि लैला की लाश एक कूड़ेदान में पड़ी मिली है, उसे पिछली रात ही मारा गया है. मैं एक ठंडी सांस भर कर रह गया. यकीनन लैला की मौत रौनी के लिए एक बड़ा सदमा थी. उस ने आगे कहा, ‘‘उस की मां का नाम जेसिका है. वह यहां एक नर्सिंगहोम में भरती है, मेरा खयाल है हमें उस से मिलना चाहिए. शायद उस से कुछ काम की बातें पता चल सकें. उसे उस की बेटी की मौत की इत्तला भी देनी है.’’

जेसिका से काम की कोई बात पता चल सकेगी, मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी. हो सकता है बेटी की मौत की खबर सुन कर वह कुछ कहे या नौर्मल हो जाए. जब हम नर्सिंगहोम पहुंचे, जेसिका के कमरे में ताला लगा था. हम ने नर्स से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘वह यहीं कहीं घूम रही होगी. थोड़ी देर पहले अपनी व्हीलचेयर पर यहीं बरामदे में घूम रही थी.’’

पर हमें जेसिका कहीं नहीं मिली. हम ने उन से डुप्लीकेट चाबी ले कर कमरा खोला तो कमरे की सारी चीजें बिखरी पड़ी थीं, मेज की दराजें खुली थीं, सामान बाहर पड़ा था. 2 दिन पहले उस ने जो गाउन पहन रखा था, वह भी फर्श पर पड़ा था. बिस्तर भी अस्तव्यस्त था. हम सब हैरान थे, क्योंकि वह तो डिसएबल थी. वह ऐसा कर नहीं सकती थी. किसी की मदद के बगैर उसे कुछ करना मुमकिन नहीं था. अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी, मैं तेज कदमों से नर्सिंगहोम के सामने की तरफ बढ़ा. सीढि़यों के करीब पहुंच कर मैं ने खिड़की से बाहर झांका. उस समय हम दूसरी मंजिल पर थे.

नीचे इमारत के सामने मुझे जेसिका दिखाई दे गई. वह जल्दीजल्दी 2 सूटकेस एक टैक्सी के पिछले दरवाजे से ठूंसने की कोशिश कर रही थी. जल्दी से वह टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गई. इस बीच मेहता और नर्स भी मेरे करीब आ गए थे. उन दोनों ने भी जेसिका को देख लिया था.

मेहता ने पूछा, ‘‘क्या यही जेसिका है?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, यही जेसिका है.’’

नर्स दांत भींचते हुए गुस्से में बोली, ‘‘मैं इस कमबख्त को मजबूर समझ कर 2 महीने से इस की व्हीलचेयर धकेल रही थी. यह तो मुझ से भी तेज चल सकती है.’’

मेहता ने मोबाइल निकाल कर टैक्सी के औफिस फोन कर के पूछा कि जो टैक्सी इरोज नर्सिंगहोम से सवारी उठा रही है, वह कहां के लिए बुक की गई है?

पता चला कि वह टैक्सी एयरपोर्ट जाने के लिए बुक की गई थी. उन्होंने उसी समय थाने फोन कर के ड्यूटी औफिसर से कहा कि इस नंबर की टैक्सी का तुरंत पीछा किया जाए, साथ ही बारीकी से मिसेज जेसिका का हुलिया बता कर कहा गया कि जैसे ही यह औरत टैक्सी से उतरे, उस की निगरानी की जाए.’’

इस में कोई शक नहीं कि मेहता एक जहीन अफसर थे. उन्होंने बड़ी होशियारी से पूरी सिचुएशन को हैंडल किया और उन्होंने तुरंत एयरपोर्ट फोन कर के वहां के सिक्यूरिटी अफसर से बात की. उन्होंने जेसिका का हुलिया बता कर कहा कि इसे या इस के किसी साथी को प्लेन में सवार न होने दिया जाए. मेहता की ज्यादा दिलचस्पी उन दोनों सूटकेसों में थी, जो जेसिका ने कार में ठूंसे थे. नर्सिंगहोम से निकल कर मेहता की गाड़ी एयरपोर्ट के लिए चल पड़ी थी. मुझे उम्मीद थी कि हम टाइम पर एयरपोर्ट पहुंच जाएंगे और हमेशा मुसकराने वाली बुढि़या का ड्रौपसीन देख लेंगे, जिस की बेजान टांगे एकदम ठीक हो गई थीं.

मेहता ने वायरलैस स्विच औन कर लिया था और अपने आदमियों से मिलने वाली खबरें एयरपोर्ट के सिक्यूरिटी अफसर को देने लगा कि जेसिका की टैक्सी एयरपोर्ट पार्किंग में दाखिल हो रही है. उस का स्वागत करने को तैयार रहें. हम खुशनसीब निकले कि जब हम लोग एयरपोर्ट पहुंचे, मिसेज जेसिका टैक्सी से उतर रही थीं, साथ ही मेहता के बंदे भी पहुंच चुके थे. जेसिका दोनों हाथों से सूटकेस संभाले टिकट काउंटर की ओर बढ़ी. उस के बाद वह वेटिंग लाउंज की ओर बढ़ी. वहां भीड़ में मिसेज जेसिका की उस के बच्चों से मुलाकात हो गई. वे सब के सब जवान और अधेड़ उम्र के थे.

जैसे ही स्पीकर पर कहा गया कि मुसाफिर जहाज पर पहुंच जाएं, वे सब लाउंज के दरवाजे की तरफ बढ़े. उसी समय मेहता के सहयोगियों और एयरपोर्ट के सिक्यूरिटी अफसर ने आगे बढ़ कर उस हंसतीमुसकराती फैमिली को अपने घेरे में ले लिया. उन में से 1-2 ने भागने की कोशिश की, लेकिन वे पकड़ लिए गए. उसी समय हम सब भी वहां पहुंच गए. मैं ने उन में से कुछ को पहचान लिया. जिमी और नरेन, उस में वह आदमी भी था, जिस ने चोरी से पहले नौकरी छोड़ दी थी और बब्बन भी था. बाकी लोगों को मेहता ने पहचान लिया. ज्वैलरी डकैती के केस में वह उन से पूछताछ कर चुका था और उन्हें बेगुनाह समझ कर छोड़ दिया था.

बूढ़ी जेसिका के होंठों की मुसकराहट गायब हो चुकी थी. वह गालियां बकते हुए अपनी औलादों को डांट रही थी कि उन लोगों की लापरवाही की वजह से पुलिस उन के पीछे लग गई, यह उन की भूल थी. मेहता के सिपाहियों ने सूटकेस अपने कब्जे में ले लिए. सूटकेस जाते देख कर जेसिका गुस्से से पागल हो उठी. वह पुलिस वालों के विरोध में बोल रही थी. उन के खिलाफ कानूनी काररवाई की धमकी दे रही थी. हमें यकीन था कि शहर की दुकानों से लूटे गए गहने उन्हीं दोनों सूटकेसों में हैं. इसलिए इन सब को गिरफ्तार करने के लिए कहा गया. अंदाजा था, लैला का मर्डर भी उन्हीं लोगों ने किया था.

जब उन सब को हथकडि़यां पहनाई जाने लगीं तो वे सब खुद को बेगुनाह साबित करते हुए बुरी तरह चीखनेचिल्लाने लगे. उन की मां बचीखुची गालियां दे कर उन्हें चुप कराने लगी. पुलिस स्टेशन पहुंच कर बारीबारी से सब से अलगअलग पूछताछ की गई. पता चला कि लैला के कत्ल के बाद जिमी ने ही जेसिका और अन्य लोगों को वहां से भाग चलने के लिए मजबूर किया था. जब जेसिका सारे गहने समेट कर भाग रही थी, तभी हमारी नजर उस पर पड़ गई थी, सारे साथी एयरपोर्ट पर मिल कर फरार होने वाले थे.

अब मेरी सब से बड़ी मुश्किल यह थी कि पेपर में खबर छपने से पहले ये सारी बातें रौनी को कैसे बताऊं? यह सब जान कर उसे कितना दुख होगा और लैला की मौत की खबर तो उसे पागल कर देगी. मैं ने अपने औफिस में उसे बुला कर अच्छे तरीके से सारी बातें बताईं. यह सब सुन कर वह एकदम से शौक्ड रह गया था. उस ने अपने आप पर कंट्रोल किया, दुखी हो कर बोला, ‘‘रुस्तम, मैं ने जिंदगी में पहली बार किसी से मोहब्बत की थी, वह भी बहुत ज्यादा. उस का अंजाम कितना दुखद हुआ. मुझे पता नहीं था कि वह ऐसी होगी और इस तरह मारी जाएगी.’’

मैं जानता था कि उसे बड़ा गहरा सदमा लगेगा. इस क्राइसिस से निकलने में उसे वक्त लगेगा. फिर भी मैं ने उस का दुख कम करने के लिए कहा, ‘‘हो सकता है, उस का बचपन गरीबी में गुजरा हो, हालात से तंग आ कर उस ने चोरी के रास्ते पर कदम बढ़ाए हो, हम कह नहीं सकते. वह किन हालात में चोर बनी, अब उसे भूलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.’’

रौनी ने एक ठंडी सांस भर कहा, ‘‘हां, शायद तुम ठीक कह रहे हो. वह दिल की बहुत अच्छी थी, बहुत चाहने वाली. पता नहीं किस मजबूरी ने उसे गलत राह पर डाल दिया था.’’

पर यह हकीकत अपनी जगह थी कि वह एक मुजरिम थी. मजे की बात यह थी कि उन सारे लोगों में किसी का किसी से कोई आपसी रिश्ता नहीं था. ये सभी गहनों की दुकानों को लूटने के लिए आपस में मिल बैठे थे. वे अन्य शहरों में भी इसी किस्म की वारदात कर चुके थे. उन सभी को एक गिरोह में समेटने वाली जेसिका थी. वह इस गिरोह की सरगना थी. उस की प्लानिंग और हिदायत पर ही वे वारदात करते थे. गिरोह में कुल 10 लोग थे. लैला भी इस गिरोह में शामिल थी. लेकिन यहां आने के बाद उस की नीयत बदल गई. वह अपने हिस्से के गहने नर्सिंगहोम में भरती जेसिका के पास जमा कराने के बजाय गायब करने लगी. गहने जमा करने के लिए उन्होंने कितनी सेफ जगह ढूंढी थी-नर्सिंगहोम.

लैला की इस हरकत की वजह शायद रौनी था, वह उस से सचमुच मोहब्बत करने लगी थी. वह कुछ माल जमा कर के रौनी को अपनी मोहब्बत से मजबूर कर के किसी अंजान शहर भाग जाना चाहती थी, जहां वह चैन की जिंदगी गुजार सके. चोरी के गहने बेच कर उसे अच्छीखासी रकम मिल सकती थी. लेकिन उस ने अभी तक रौनी को अपने मंसूबे से आगाह नहीं किया था. उसे यह भी नहीं बताया था कि वह चोरी किए गए गहने उस के फ्लैट में छिपा रही है. जेसिका को शक हो गया था कि लैला चोरी किए गए पूरे गहने उस के पास जमा नहीं कर रही है.

उस ने गैंग के दूसरे आदमियों को उस की निगरानी पर लगा दिया था. जिमी ने गहनों के बारे में पता लगाने के लिए सख्ती की तो लैला अपनी जान से हाथ धो बैठी. जुर्म करने के लिए ये सभी एक रिश्ते में बंधे थे. उन की सरगना जेसिका उन की मां का रोल एक अपाहिज औरत के रूप में बहुत अच्छे से कर रही थी. पकड़े जाने पर सारे रिश्ते बिखर गए. Hindi stories

 

Crime Story: अपमान के बदले – ले ली भाई, भाभी और पत्नी की जान

Crime Story: रामप्रकाश को जब पता चला कि उस की पत्नी के बड़े भाई से संबंध हैं तो उसे पत्नी से ही नहीं, बड़े भाई से भी नफरत हो गई. लेकिन उस ने जो किया, क्या वैसा करना ठीक था. रामप्रकाश जैसे ही घर के पीछे की ओर गया, पीछे से रामपाल ने आ कर बड़े भाई को अकेले में पा कर लगभग फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘भइया, आज मैं आप से बड़े भइया राजकुमार के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘अंबर (रामपाल को घर में सभी अंबर कहते थे) तुम्हारे और बड़े भइया के बीच हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है, अब क्या हो गया?’’ रामप्रकाश ने पलट कर जवाब में कहा.

‘‘पहले तो वह कह रहे थे कि मेरी शादी में सारा खर्च वह करेंगे. लेकिन गहने बनवाने लगे तो 40 हजार रुपए मुझ से ले लिए. उस समय मैं ने पिंटू से 70 हजार रुपए ले कर उस में से 40 हजार रुपए उन्हें दिए थे. अब वह अपने पैसे मांग रहा है. मैं ने भइया से कुछ रुपए देने को कहा तो उन्होंने मुझे गाली दे कर भगा दिया.’’

‘‘अंबर, तुम भइया का स्वभाव अच्छी तरह जानते हो. उन की आदत ही ऐसी है. इस में नाराज होने की कोई बात नहीं है.’’ रामप्रकाश ने छोटे भाई रामपाल को समझाने के उद्देश्य से कह.

लेकिन रामपाल समझने के बजाय रामप्रकाश को भी बड़े भाई राजकुमार के खिलाफ भड़काते हुए बोला, ‘‘तुम भइया को जितना सीधा समझते हो, वह उतने सीधे हैं नहीं. तुम तो उन की ओर से आंखें मूंदे हुए हो, इसलिए उन की बुराई तुम्हें दिखाई नहीं देती. गांव वाले क्या कहते हैं, तुम्हें पता है? पूरे गांव में चर्चा है कि रंजना भाभी और बड़े भइया के बीच गलत संबंध है.’’

रामपाल का इतना कहना था कि रामप्रकाश को गुस्सा आ गया. वह थोड़ी ऊंची आवाज में बोला, ‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है अंबर, तुम झूठ कह रहे हो. भइया ऐसा काम नहीं कर सकते. उन पर इस तरह का घिनौना आरोप लगा कर तुम मेरी नजरों में गिर गए.’’

‘‘अगर तुम सच देखना चाहते हो तो जब बड़े भइया तुम्हें और आशा भाभी को किसी रिश्तेदार के यहां भेजें तो रात में अचानक आ कर तुम देख लेना, बड़े भइया और भाभी रंजना एक साथ मिलेंगी.’’ रामपाल ने ने भी थोड़ी ऊंची आवाज में कहा.

छोटे भाई उस की इस बात से नाराज हो कर पैर पटकता हुआ रामप्रकाश चला गया. उस के पीछेपीछे रामपाल भी चला गया. रामपाल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना माल के गांव थावर में अपने बड़े भाइयों राजकुमार और रामप्रकाश के साथ रहता था. राजकुमार मूलरूप से लखनऊ के ही थाना मलिहाबाद के गांव चौसझा का रहने वाला था. 20 साल पहले वह अपना गांव छोड़ कर थावर आ गया था और यहीं रहने लगा था. यहां वह अपनी क्लिनिक चलाता था. उस ने बीयूएमएस की डिग्री ले रखी थी.

उस की क्लिनिक ठीकठाक चलने लगी थी तो उस ने अपने दोनों भाइयों रामप्रकाश और रामपाल को भी यहीं बुला लिया था. इस तरह तीनों भाई एक साथ रहने लगे थे. राजकुमार ही पूरे परिवार की देखभाल करता था. उस के दोनों ही भाई उम्र में उस से काफी छोटे थे.

राजकुमार की शादी आशा के साथ हुई थी. शादी के कई सालों के बाद भी जब उसे खुद की कोई संतान नहीं हुई तो उस ने सन 2006 में अपनी साली रंजना की शादी अपने छोटे भाई रामप्रकाश से करा दी थी. शादी के बाद रंजना को 2 बेटे, 6 साल का तुषार, 3 साल का ईशान और 4 माह की एक बेटी अनिष्का थी. रंजना ब्यूटीपार्लर का कोर्स किए हुए थी, इसलिए राजकुमार ने उसे घर के ही एक कमरे में ब्यूटीपौर्लर खुलवा दिया था.

कुछ दिनों पहले राजकुमार ने अपने सब से छोटे भाई रामपाल की शादी कराई थी. उस की शादी में उन्होंने करीब एक लाख रुपए के गहने बनवाए थे. शादी के समय राजकुमार ने रामपाल से कहा था कि शादी के खर्च में वह भी कुछ मदद करे. तब राजपाल ने इधरउधर से पैसों का जुगाड़ कर के राजकुमार को दिए थे.

न जाने क्यों राजकुमार और उस की पत्नी आशा रामपाल को पसंद नहीं करते थे. रामपाल को इस बात का अहसास भी था. भाईभाभी के इस व्यवहार से उसे लगता था कि भइया मंझले भाई रामप्रकाश और उस की पत्नी रंजना को ही अपनी सारी जायदाद देंगे. रामपाल में कुछ बुरी आदतें थीं, जिस की वजह से उस ने कई लोगों से कर्ज ले रखा था. कर्ज चुकाने के लिए वह जब भी बड़े भाई राजकुमार से पैसे मांगता, वह उसे बेइज्जत कर के भगा देता था.

रामपाल ने मंझले भाई रामप्रकाश के मन में शंका का बीज डाल दिया था. एक दिन रामप्रकाश की रिश्तेदारी में शादी थी. राजकुमार ने अपनी पत्नी आशा से कहा कि वह रामप्रकाश और दोनों बेटों को ले कर शादी में चली जाए. आशा ने वैसा ही किया. रामप्रकाश ने अपनी पत्नी रंजना से भी शादी में चलने को कहा तो उस ने सुबह ब्यूटीपौर्लर खोलने का बहाना कर के शादी में जाने से मना कर दिया.

इस बात से रामप्रकाश की शंका यकीन में बदल गई. उसे रामपाल की बात सच लगी. वह भाभी आशा और दोनों बेटों को ले कर शादी में चला तो गया, लेकिन सभी को वहां छोड़ कर रात में चुपके से घर आ गया. घर पहुंच कर उस ने पत्नी रंजना और बड़े भाई राजकुमार को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. इस के बाद उसे पत्नी रंजना और बड़े भाई से नफरत हो गई.

इस के बाद वह बड़े भाई से बदला लेने के लिए छोटे भाई रामपाल से मिल गया. अपने अपमान का बदला लेने के लिए दोनों भाइयों ने बड़े भाई की हत्या की योजना बना डाली. 5 नवंबर की रात करीब ढाई बजे रामपाल मोटरसाइकिल से थावर पहुंचा. योजना के अनुसार, रामप्रकाश ने घर का दरवाजा पहले से ही खोल रखा था. रामपाल घर में घुसा और क्लीनिक में हंसिया और बांका ले कर छिप गया.

इस के बाद रामप्रकाश ने पीठ में दर्द होने की बात कह कर रंजना को इंजेक्शन लाने के लिए कहा. रंजना जैसे ही उठ कर क्लीनिक की ओर गई, वहां छिपे रामपाल ने उसे पकड़ लिया और ब्यूटीपौर्लर वाले कमरे में घसीट ले गया. उस के पीछेपीछे रामप्रकाश भी वहां पहुंच गया. इस के बाद दोनों ने उसे खत्म कर दिया. इस के बाद दोनों पहली मंजिल पर गए, जहां राजकुमार पत्नी आशा के साथ सो रहा था.

दोनों ने पहले आशा पर वार किया. आशा की चीख से राजकुमार जाग गया तो दोनों उस पर टूट पड़े. जब रामपाल और रामप्रकाश को लगा कि दोनों मर गए हैं तो रामप्रकाश ने बांका और हंसिया घर के बाहर फेंक दिया और रामपाल को भाग जाने के लिए कहा. जब रामपाल भाग गया तो वह दरवाजा खोल कर चिल्लाने लगा कि घर में बदमाश घुस आए हैं. शोर सुन कर गांव वाले इकट्ठा हो गए. उस समय राजकुमार कराह रहा था, लेकिन अस्पताल ले जाते समय उस की मौत हो गई. रामप्रकाश ने गांव के ही 2 लोगों, राजाराम और प्रेमरैदास के खिलाफ हत्या का शक जताते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने जांच की तो नामजद लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला.

मोहनलालगंज के सांसद कौशल किशोर ने तो इस हत्याकांड का परदाफाश करने के लिए पुलिस पर दबाव डाला तो गांव वालों ने भी सड़क जाम कर के पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की. तब लखनऊ के एसएसपी राजेश कुमार पांडेय ने थाना माल के थानाप्रभारी विनय तिवारी, एसएसआई गणेश तिवारी, क्राइम ब्रांच के भगवान सिंह, अनिल सिंह चंदेल और हमीदउल्ला की एक टीम बनाई, जिस का नेतृत्व मलिहाबाद के सीओ जावेद खान को सौंपा.

आखिर 4 दिनों के बाद 9 नवंबर को इस टीम ने राजकुमार, आशा और रंजना की हत्या के आरोप में राजकुमार के दोनों सगे भाई रामप्रकाश और रामपाल को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में रामपाल और रामप्रकाश ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दरअसल, जब पुलिस घटनास्थल पर पहुंची थी तो वहां लूट का कोई सबूत नहीं मिला था. आसपड़ोस वालों ने बदमाशों के आनेजाने की भी आवाज नहीं सुनी थी. रामपाल जब वहां पहुंचा था तो उसे देख कर ही लग रहा था कि वह अभीअभी नहा कर आया है. उस के बाल भी गीले थे. नहाने वाली जगह पर भीगा तौलिया मौजूद था. उस पर खून के कुछ दाग भी लगे थे.

रामप्रकाश ने बताया था कि बदमाशों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया था, लेकिन जब पुलिस ने गांव वालों से पूछा कि घर का दरवाजा किस ने खोला था तो कोई सामने नहीं आया. इस से पुलिस को लगा कि हत्या में घर वालों का ही हाथ है. बाद में पूछताछ में ये बातें सामने आ गईं.

पूछताछ में रामप्रकाश ने कहा, ‘‘मैं भाभी आशा को बहुत मानता था. वह हमें भी बेटे की तरह मानती थीं. रंजना उन की सगी छोटी बहन थी. उन्हें रंजना की हत्या में मेरे शामिल होने का पता चलता तो वह हमारे खिलाफ हो जातीं. रंजना ने जो किया था, मुझे उस बात से उस से चिढ़ हो गई थी. इस हालत में न चाहते हुए भी मुझे भाभी की हत्या करनी पड़ी.’’

पूछताछ के बाद पुलिस ने रामपाल और रामप्रकाश को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था, कथा लिखे जाने तक दोनों भाई जेल में थे. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Terrorism News: शूट आउट लश्करेतैयबा

Terrorism News: लश्करेतैयबा का आतंकी अबु कासिम धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को तो भटकाता ही था, खुद भी आतंकी वारदातों को अंजाम देता था. अपने आतंकी कारनामों की ही वजह से वह लश्करेतैयबा के चीफ हाफिज सईद का खास बन गया था. आखिर भारतीय सुरक्षा बलों ने उसे मार गिराया

जम्मूकश्मीर में पाकिस्तान की ओर से नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे गांवों की ओर की जाने वाली फायरिंग से भारतपाक सीमा पर हलचल बढ़ी हुई थी. पाकिस्तान कभी गोलियां दाग रहा था तो कभी मोर्टार. इस तरह पाकिस्तान द्वारा इस साल अब तक करीब 300 बार सीज फायर का उल्लंघन किया जा चुका था. इस तरह की फायरिंग के पीछे 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक बौखलाहट और दूसरी भारतीय सेना का ध्यान बंटा कर दुर्गम पहाड़ी इलाकों से हथियारों के जखीरे से लैश प्रशिक्षित आतंकवादियों को सीमा पार कराना.

भारतीय सुरक्षा बलों के लिए कुख्यात व प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्करेतैयबा के आतंकी एक बड़ी चुनौती बने हुए थे. जम्मूकश्मीर पुलिस व सेना के जवान उन का मुकाबला कर रहे थे. इस के चलते जंगलों में चलाए गए औपरेशन के तहत सुरक्षा बलों ने लश्कर के कई आतंकियों को मार गिराया था और 2 को जिंदा पकड़ने में सफलता हासिल की थी.

जम्मूकश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों की कमान लश्कर के टौप कमांडर अबु कासिम उर्फ अब्दुल रहमान के हाथों में थी. अबु शातिर और बेहद खूंखार किस्म का था. उस के दिलोदिमाग में हिंदुस्तान के प्रति नफरत का जहर भरा था. सुरक्षाबलों को चकमा देने में माहिर अबु खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों का दुश्मन नंबर वन था. वह आतंकी हमलों का न सिर्फ प्लानर था, बल्कि खुद भी हमले करने से नहीं चूकता था. पाकिस्तान की पनाह में बैठे एक करोड़ डौलर के इनामी रहे लश्कर के चीफ मोस्ट वांटेड आतंकवादी हाफिज सईद व हिज्बुल मुजाहिदीन के सुप्रीमो सैयद सलाहुद्दीन से उस का सीधा संपर्क था.

अबु कासिम धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को भड़का कर न सिर्फ ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजता था, बल्कि हिज्बुल मुजाहिदीन व अन्य आतंकी संगठनों के बीच तालमेल की भूमिका भी निभाता था. प्रशिक्षित आतंकियों को भारत की सीमा में घुसपैठ कराने में उस की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी. अबु कासिम के कारनामों के चलते उस के सिर पर नेशनल इन्वैस्टीगेशन एजेंसी (आईएनए) व जम्मूकश्मीर पुलिस ने 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित किया हुआ था. 5 सालों से आतंक का पर्याय बने 20 लाख के इनामी कासिम को सुरक्षा बलों ने घेरने की कोशिशें तो कई बार कीं, लेकिन हर बार वह अत्याधुनिक हथियारों से बारूद उगलता चकमा दे कर फरार हो गया था.

एक बात और, खुद को महफूज रखने के लिए अबु कासिम अपने इर्दगिर्द चौबीसों घंटे हथियारबंद आतंकियों की एक टीम रखता था. 28 अक्तूबर, 2015 के आखिरी सप्ताह में भारतीय खुफिया एजेंसियों को जो पुख्ता इनपुट मिलने शुरू हुए थे, वे चौंकाने वाले थे. पता चला था कि लश्कर के जेहादी आतंकी अबु कासिम के इशारे पर किसी बड़े हमले की फिराक में हैं. सूचना के अनुसार अबु कासिम अपने 7-8 साथियों के साथ उत्तरी कश्मीर के बंडीपोरा जिले से करीब 5 किलोमीटर दूर बुटु के जंगलों में छिपा था. एजेंसियों के लिए यह चिंता की बात थी.

आईएनए चीफ शरद कुमार, सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह, बीएसएफ के डाइरेक्टर जनरल शरद कुमार पाठक व सीआरपीएफ के डीजी प्रकाश मिश्रा जम्मूकश्मीर के डीजीपी के. राजेंद्र कुमार व आईजी एस.जे.एम. गिलानी ने अपने अधीनस्थों के साथ एक मीटिंग की. इस के बाद शाम 5 बजे सेना की एक बटालियन, सीआरपीएफ की 18वीं बटालियन और जम्मूकश्मीर पुलिस ने संयुक्त रूप से फूलपू्रफ प्लानिंग के साथ विशेष सर्च औपरेशन शुरू कर दिया.

पहाड़ी इलाके में घेराबंदी करनी शुरू कर दी गई. लेकिन आतंकियों को शायद इस की भनक लग गई, इसलिए उन्होंने सुरक्षा बलों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जवानों ने भी इस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए फायरिंग शुरू कर दी. फिजाओं में गोलियों की गूंज बहने लगी. सेना की 14 राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) बटालियन के जवान समोद चौधरी जांबाजी दिखा कर आतंकियों से नजदीक से लोहा ले रहे थे. भारतीय जवान का यह कदम आतंकियों पर भारी पड़ रहा था, लेकिन उसी दौरान आतंकियों की तरफ से आई कई गोलियां समोद के शरीर में समा गईं.

गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद समोद मुकाबला करते रहे. अंत में जब शरीर ने साथ नहीं दिया तो वह गिर पड़े. उन्हें तत्काल चिकित्सा के लिए ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन की सांसें थम गईं. आतंकियों की तरफ से कुछ देर के लिए गोलियों की तड़तड़ाहट बंद हो गई. सुरक्षा बल अबु कासिम की चकमा देने की फितरत से वाकिफ थे. लेकिन इस बार वह उस की चालाकियों को नाकाम कर देना चाहते थे. औपरेशन लंबा चल सकता था. धरपकड़ के लिए पैरा कमांडों, खोजी कुत्ते और हैलीकौप्टर भी लगा दिए गए थे. रात भर रहरह कर गोलियां चलती रहीं.

आतंकी गोलियां चलाते हुए आगे बढ़ रहे थे. इसी तरह वे समीपवर्ती कुलगाम के जंगलों तक पहुंच गए. वे पहाडि़यों व पेड़ों की आड़ से चकमा दे रहे थे. रुकरुक कर रातभर मुठभेड़ चलती रही. तड़के आतंकियों की तरफ से गोलियां चलनी बिल्कुल बंद हो गईं. इस के बावजूद कवरिंग फायर के बीच सुरक्षा बल आगे बढ़ते रहे. वहीं पर उन्हें एक आतंकी की लाश पड़ी मिली. उस पर नजर पड़ते ही टीम कैप्टन खुशी से चिल्ला पड़े, ‘‘वैलडन सर, औपरेशन सफल रहा.’’

उन की खुशी का मतलब था कि मारा गया आतंकवादी कोई और नहीं, अबु कासिम था. उस के साथी भाग निकले थे. कासिम लश्कर का बड़ा कमांडर था. लिहाजा उस की मौत बहुत बड़ी कामयाबी थी. इस सूचना का सुरक्षा बलों के हैडक्वार्टर तक फ्लैश कर दिया गया. कासिम की मौत लश्कर चीफ का दायां हाथ टूटने जैसी थी. उस के शव को कब्जे में ले लिया गया. सूचना मिलने पर राजधानी दिल्ली से खुफिया एजेंसियों की टीमें भी कश्मीर के लिए रवाना हो गईं. उस दिन कासिम के अन्य साथियों की तलाश में सर्चिंग औपरेशन चलाया गया, लेकिन वे हाथ नहीं आ सके.

मुठभेड़ में मारे गए अबु कासिम के गुनाहों की फेहरिश्त बहुत लंबी थी. वह दरजनों आतंकी वारदातों में शरीक होने के साथ उन का मास्टरमाइंड रहा था. पाकिस्तान के बहावलपुर का रहने वाला कासिम कई सालों पहले आतंकी संगठन लश्करेतैयबा में शामिल हुआ था और वहां से प्रशिक्षण हासिल कर के आतंक फैलाने के लिए भारत की सीमा में दाखिल हो गया था. कासिम तेजतर्रार व टीम पर नियंत्रण रखने वाला युवक था. अपनी इसी विशेषता से उस ने कश्मीर के कुछ युवकों को भी संगठन में शामिल कर लिया था. हाफिज सईद उस के कामों से खुश हो कर उस की तारीफें कर के उस के दिल में नफरत के शोले भड़काता रहता था.

अबु कासिम घुसपैठ कर के भारत आता और दोगुनी ताकत से अपने मिशन में जुट जाता. सुरक्षा बल उस के दुश्मन नंबर वन थे. वह उन पर गोलियां चलाने में जरा भी देर नहीं करता था. उस के आतंक का लंबाचौड़ा काला इतिहास है. सन 2012 में उस का नाम सुर्खियों में तब आया था, जब पंथा चौक बेमिना बाईपास पर उस ने अपने साथियों के साथ एक सैन्य काफिले पर हमला कर दिया था. इस के बाद वह ताबड़तोड़ हमले करने व कराने लगा. लश्कर चीफ हाफिज सईद यही चाहता था. उस के कारनामों से खुश हो कर सईद ने उसे कश्मीर का टौप कमांडर बना दिया था.

इस के अलावा अबु कासिम को हिज्बुल मुजाहिदीन व अन्य आतंकी संगठनों के आतंकियों के बीच तालमेल बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी थी, जिसे वह बखूबी निभा रहा था. कासिम की ताकत बढ़ी तो उस ने वारदातें भी बढ़ा दीं. साथियों के पकड़े जाने पर भारतीय खुफिया एजेंसियों तक भी उस के कमांडर बनने की खबर पहुंच गई. 24 जून, 2013 को कासिम ने साथियों के साथ श्रीनगरबारामूला हाईवे पर फिर से सेना के काफिले पर हमला किया, जिस में 8 जवान शहीद और 11 जवान घायल हो गए. कासिम ही निर्देश पर पाकिस्तानी आतंकी अबु हमजा व अबु उस्मान ने कदलबल इलाके में 18 जुलाई, 2013 को शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान, सौरा के पूर्व निदेशक डा. जलालुद्दीन व उन के अंगरक्षक की हत्या कर दी.

13 अगस्त, 2013 को कासिम के डिप्टी कमांडर अबु दुजाना ने शौकत अहमद लोन के साथ मिल कर पांपोर के गालंदर इलाके में पुलिस दल पर गोलियां चलाईं, जिस में 2 पुलिसकर्मी शहीद हो गए. आतंकी उन की एक एके-47 राइफल भी ले गए. कासिम के इशारे पर ही बड़गाम में 2 दिसबर, 2013 को आतंकी लतीफ, रियाज व अबु उमर ने चाडूरा के तत्कालीन थानाप्रभारी को मौत के घाट उतार दिया था. उस का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा था. उसी के इशारे पर लश्कर आतंकी अबु हांजुला ने 4 मार्च, 2014 को पुलवामा अदालत परिसर में कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी.

इस के बाद अबु कासिम ने 11 अगस्त, 2014 को पांपोर के निकट बीएसएफ के काफिले पर हमला कर दिया था. इस हमले में एक डिप्टी कमांडेंट समेत 6 जवान घायल हुए थे. सन 2014 में ही उस ने कैसर मौला में एक सैनिक और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी थी. कासिम के आतंकी मंसूबे बढ़ रहे थे. वह धर्म के नाम पर स्थानीय युवकों को भी बरगला कर आतंकवाद की टे्रनिंग के लिए लश्कर के शिविरों में भेज रहा था. उस की बढ़ती गतिविधियों के चलते एनआईए व कश्मीर पुलिस ने उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया था.

शातिर कासिम ने भी अपनी रणनीति में बदलाव कर दिया. अब वह हमलों की प्लानिंग तैयार करने लगा. प्लानिंग के तहत ही उस ने अपने साथी नावेद उस्मान उर्फ कासिम व मोमीन उर्फ मोहम्मद नौमान याकूब को सुरक्षा बल के किसी काफिले पर हमला करने के लिए तैयार किया. 5 अगस्त, 2015 को सुबह तकरीबन 7 बजे ऊधमपुर स्थित उत्तरी कमांड मुख्यालय से बीएसएफ की बस जम्मूश्रीनगर हाईवे पर जा रही थी. बस में कई जवान सवार थे. बस जैसे ही नरसू नाले के नजदीक पहुंची, सड़क किनारे घात लगाए बैठे नावेद व मोमीन अचानक सामने आ गए.

पहले उन्होंने बस के दाएं टायरा पर गोली मार कर पंक्चर किया, उस के बाद औटोमैटिक राइफल से बस पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी. पंक्चर हो जाने की वजह से बस रुक गई थी. उसी बीच उन्होंने हैंडग्रेनेड से बस पर हमला कर दिया. इस से बस के शीशे चूर हो कर हवा में बिखर गए. बस चालक घायल हो गया. इस अप्रत्याशित हमले ने सुरक्षा बलों को संभलने का मौका नहीं दिया. बस में सवार जवान रौकी के पास राइफल थी. हैंडग्रेनेड से उस के कई साथी जख्मी हो गए थे. आतंकियों के इरादे वह भांप चुका था. इसलिए तेजी से खड़े हो कर उस ने बस का दरवाजा बंद कर लिया और उस की आड़ में खिड़की से मोर्चा ले कर जवाबी फायरिंग शुरू कर दी, जिस में एक आतंकी मारा गया.

मरने वाला आतंकी मोहम्मद नौमान याकूब उर्फ मोमीन था. दूसरा आतंकी गोलियां बरसता रहा. उस की कई गोलियां रौकी के शरीर में भी धंस चुकी थीं. वह सुरक्षा बलों पर गोलियां चला जरूर रहा था, लेकिन साथी की मौत पर उस के मन में भी डर बैठ गया था, इसलिए वह गोलियां चलातेचलाते भाग गया. साहस का परिचय देते हुए रौकी ने अपने साथियों को बचा लिया था, लेकिन वह खुद और एक अन्य जवान शुभेंदु राय इस मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. आननफानन में हैडक्वार्टर व स्थानीय थाना चिनैनी को सूचना दी गई. घायल जवानों को अविलंब अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन दोनों की ही मौत हो गई.

सुरक्षा बलों ने फरार हुए आतंकी की तलाश शुरू कर दी. यह बड़ा हमला था. इस ने खुफिया एजेंसियों व सुरक्षा बलों को दहला कर रख दिया था. बीएसएफ के आईजी राकेश शर्मा, डीआईजी पुलिस सुरेंद्र गुप्ता, एसएसपी सुलेमान चौधरी समेत पुलिस प्रशासनिक व सैन्य अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए थे. विशेष कमांडो दस्ते को भी बुला लिया गया था, जो हेलीकौप्टर से फरार हुए आतंकी को खोजने लगे. आतंक नावेद गांव के रास्ते की तरफ भागा था. उस ने रास्ते में मिले 2 ग्रामीणों देशराज व रमेश को राइफल की नोक पर अपने बस में कर के कहा, ‘‘चुपचाप मुझे रास्ता दिखाओ, वरना यहीं मार डालूंगा.’’

उस की धमकी से दोनों ग्रामीण बुरी तरह डर गए थे. वे नावेद को पहाड़ी की तरफ ले जाने लगे. थोड़ा आगे पहुंच कर नावेद ने 2 और युवकों, राकेश शर्मा और विक्रमजीत शर्मा को अपने कब्जे में ले लिया. आगे चल कर एक और युवक नावेद के कब्जे में आ गया. यह नावेद की रणनीति का हिस्सा था. उस का सोचना था कि यदि उस की घेराबंदी होगी तो बंधक ग्रामीणों की आड़ उसे बचा लेगी.

तकरीबन 2 किलोमीटर चल कर नावेद अचानक रुक गया. आसमान में मंडराते हैलीकौप्टर की आवाज सुन कर उसे रुकना पड़ा. वह हैलीकौप्टर विशेष कमांडो दस्ते का था. इस बीच बंधक बने 3 लोग चकमा दे कर भाग निकले थे. इस बीच राकेश और विक्रमजीत समझ गए थे कि आतंकी के हाथ में हथियार जरूर है, लेकिन वह घबराया हुआ है. शरीर से भी वह ज्यादा ताकतवर नहीं दिखता था.

आंखों ही आंखों में दोनों ने इशारा किया और हिम्मत दिखा कर नावेद पर टूट पड़े. उस की रायफल छीन कर उन्होंने एक तरफ फेंक दी और शोर मचाना शुरू कर दिया. उन्होंने नावेद को पकड़ कर पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस के पहुंचने तक उन्होंने उसे पकड़े रखा. पुलिस ने नावेद को अपने कब्जे में ले लिया. नावेद ने ही पुलिस को बताया कि मारा गया आतंकी मोमीन पाकिस्तान के बहावलपुर निवासी मोहम्मद याकूब का बेटा था.

नावेद का जिंदा पकड़ा जाना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि थी. भारत में 26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमलों के आतंकी अजमल आमिर कसाब के बाद जिंदा पकड़ा गया दूसरा आतंकी नावेद था. बाद में नावेद को जम्मू स्थित जौइंट इंट्रोगेशन सेंटर (जेआईसी) लाया गया, जहां उस से सुरक्षा एजेंसियों व पुलिस ने हर एंगल से संयुक्त पूछताछ की. एनआईए चीफ शरद कुमार ने भी कश्मीर पहुंच कर नावेद से पूछताछ की. इस पूछताछ में सामने आया कि आतंकी नावेद भी धर्म के नाम पर भटका हुआ युवक था.

20 वर्षीय नावेद पाकिस्तान के फैसलाबाद जिले का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का युवक था. आवारगी के चलते वह कुछ युवकों के माध्यम से लश्कर में शामिल हो गया था. नावेद की उम्र कम थी. आतंकी संगठनों को जल्दी बहकावे मे आने वाले ऐसे युवकों की तलाश रहती है. नावेद को रुपएपैसे का लालच दे कर धर्म के नाम पर जुनूनी बना दिया गया. जब वह दिमागी तौर पर पूरी तरह संगठन का हिस्सा बन गया तो परिवार से नाता तोड़ कर आतंकी ट्रेनिंग कैंप में चला गया. मोमीन से उस की मुलाकात वहीं हुई. मोमीन हाफिज सईद का सुरक्षागार्ड रह चुका था. बाद में उसे युवकों को ट्रेनिंग देने का काम सौंपा गया था.

मोमीन और नावेद अन्य साथियों के साथ कश्मीर में पुंछ सेक्टर से दाखिल हुए थे और यहां आ कर कासिम के इशारे पर काम करने लगे थे. पुलिस ने नावेद से पूछताछ के बाद बुलेटपू्रफ वाहन से उसे विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस हमले का मास्टरमाइंड अबु कासिम था. वह सुरक्षा बलों के निशाने पर था. सरगरमी से उस की तलाश की जाने लगी. तमाम जांच एजेंसियां कासिम के पीछे लग गई थीं. सूचना मिल रही थी कि कुछ आतंकवादी कासिम के इशारे पर बड़ी वारदात को अंजाम देने के इरादे से सीमा में दाखिल हो चुके हैं. इस के मद्देनजर जंगलों में सघन सर्चिंग औपरेशन शुरू कर दिया गया.

इसी कड़ी में बारामूला जिले के रफियाबाद के हमाम मरकूट के जंगलों में एक बार फिर 26 अगस्त को कासिम से सुरक्षा बलों की मुठभेड़ हो गई. 20 घंटे तक चली इस भीषण मुठभेड़ में अगले दिन तक 3 आतंकवादियों को मार गिराया गया. एक आतंकवादी की गोलियां खत्म हो गईं. साथियों के शव देख कर वह घबरा गया और बचने के लिए जंगल में पहाड़ों के बीच बनी एक गुफा के अंदर छिप गया. सुरक्षा बलों के लिए अच्छी बात यह थी कि वह फिदायीन नहीं था, वरना खुद को भी गोली या बम से उड़ा सकता था. जिस गुफा में वह घुसा था, सुरक्षा बलों ने उस गुफा को घेर लिया. गुफा के दूसरी तरफ कोई रास्ता नहीं था. उसे बाहर निकालने के लिए गुफा के अंदर आंसू गैस का गोला व मिर्ची बम फेंके गए.

इन के धुंए से आंखों में तेज जलन के साथ आंसू निकलते हैं और सांस लेना मुश्किल हो जाता है. करीब 10 मिनट बाद अपने हाथ ऊपर किए सलवारकुरती पहने वह आतंकी बाहर निकल आया. उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. उसे हिरासत में ले लिया गया. मुठभेड़स्थल से 5 एके 47 राइफलें, 2 यूबीजीएल (ग्रेनेड लांचर), 2 जीपीएस, एक नक्शा और स्मार्टफोन सहित भारी मात्रा में गोलाबारूद बरामद हुआ.

लेकिन कासिम इस बार भी भाग निकला. चंद दिनों के अंदर एक और जिंदा आतंकवादी को पकड़ने की यह बड़ी कामयाबी थी. उच्च सैन्यधिकारी व उत्तरी कश्मीर के डीआईजी गरीबदास भी मौके पर पहुंचे. उस ने अपना नाम सज्जाद अहमद उर्फ अबु उबैदुल्ला उर्फ फहदुल्ला उर्फ अब्दुल्ला बताया. उस की उम्र 22 साल थी.  पूछताछ में इस आतंकी ने कई बड़े खुलासे किए. उस के अनुसार सैन्य शिविरों पर जो 3 आतंकवादी मारे गए थे, उन के नाम अबुतल्लाह, अबु कातल व अबु उस्मान थे. सज्जाद को कई दौर की पूछताछ के बाद अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. उस से भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलीं.

अबु कासिम अभी भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए सब से बड़ा खतरा बना था. राज्य पुलिस के आतंकरोधी दस्ते के होनहार इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ डार कासिम के खिलाफ चल रहे मिशन के तहत उस के मूवमैंट को ट्रैक कर रहे थे. इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ डार आतंकियों से लोहा लेने के लिए चर्चित थे.

2 महीने बाद 7 अक्तूबर को उन्हें सूचना मिली कि कासिम बांदीपोरा के जंगलों में छिपा है. वह पुलिस दल के साथ वहां पहुंच गए. उसे घेरने व जिंदा पकड़ने का प्रयास किया गया. जबरदस्त मुठभेड़ हुई, लेकिन वह चकमा देने में कामयाब रहा. इस मुठभेड़ में इंसपेक्टर मोहम्मद अल्ताफ शहीद हो गए. अल्ताफ की शहादत के बाद उस के खिलाफ सघन अभियान जारी रहा. आखिर में वह मारा गया.

अब सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि कासिम जैसे आतंकी के मारे जाने पर लश्कर गुट की कमर टूटेगी. आतंकियों के ऐसे अंजाम से युवा भी उस के बहकावे में आने से बचेंगे. जम्मू कश्मीर के डीजीपी के. राजेंद्र कुमार ने बताया कि कासिम का मारा जाना आतंकवाद पर काफी प्रभाव डालेगा. कथा लिखे जाने तक पुलिस पकड़े गए आतंकवादियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर रही थी और संयुक्त औपरेशन के जरिए अन्य आतंकियों की खोजबीन में जुटी थी. Terrorism News

—कथा पुलिस व सैन्य सूत्रों पर आध

Bhopal Crime News: जब एक मजबूर मर्द से हो गई एक बड़ी गलती

Bhopal Crime News: 21 अप्रैल, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना मिसरोद के थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह कुशवाह गश्त से लौट कर क्वार्टर पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि 35-36 साल का एक आदमी उन के सामने आ खड़ा हुआ. उस के सीने से खून रिस रहा था. ऐसा लग रह था, जैसे उसे चाकू मारे गए हों, पर ठीक से लगे न हों. वहां गहरे घाव के बजाय गहरे खरोंच के निशान थे. उसे देख कर राजबहादुर सिंह को यह आपसी मारपीट का मामला लगा.

उस व्यक्ति ने अपना नाम सौदान सिंह कौरव बताया था. राजबहादुर सिंह ने थाने आने की वजह पूछी तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं कौशलनगर के पास रहता हूं. आज रात 3 बजे 4 लोग मेरे घर में घुस आए और मेरी पत्नी मंगला से जबरदस्ती करने लगे. मैं ने और मेरी पत्नी ने विरोध किया तो उन्होंने हम दोनों की बुरी तरह से पिटाई कर दी. उस मारपीट में मेरी पत्नी को अधिक चोट लगी, जिस से वह बेहोश हो गई है.’’

घायल मंगला की मौत हो सकती थी, इसलिए थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह ने तुरंत एसआई राजकुमार दांगी को कौशलनगर भेजा. वहां पहुंच कर पता चला कि मकान की दूसरी मंजिल पर सौदान सिंह पत्नी मंगला और 2 बच्चों के साथ रहता था. राजकुमार कमरे पर पहुंचे तो देखा सामने पलंग पर मंगला लेटी थी. उन्होंने उसे नजदीक से देखा तो लगा वह मर चुकी है.

उन्होंने इधरउधर देखा तो कमरे की स्थिति देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वहां किसी तरह का झगड़ा या मारपीट हुई थी. संदेह हुआ तो उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह को दे दी. मामला लूट और दुष्कर्म की कोशिश के साथ हत्या का था, इसलिए राजबहादुर सिंह ने तुरंत यह बात एसपी सिद्धार्थ बुहुगुणा एवं एसडीओपी अतीक अहमद को बताई और खुद सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.

राजबहादुर सिंह ने एक गहरी नजर सौदान सिंह के चेहरे पर डाली तो उन्हें उस के चेहरे पर छाए दुख के बादल बनावटी लगे. उन्हें अब तक की अपनी पुलिस की नौकरी में इतना तो अनुभव हो ही चुका था कि आदमी पत्नी के मरने पर किस तरह दुखी होता है.

उन्होंने सौदान सिंह के शरीर पर लगे चाकू के घावों को ध्यान से देखा तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी बहुत चालाक और मक्कार है. उस के घाव किसी दूसरे द्वारा मारे गए चाकू के नहीं हैं, इन्हें उस ने खुद चाकू मार कर बनाया है. लेकिन उन्होंने उस पर कुछ जाहिर नहीं होने दिया.

उन्होंने मकान का निरीक्षण किया तो 2 कमरों के उस के मकान में बाहर के कमरे में डबलबैड के आकार का लंबाचौड़ा बिस्तर जमीन पर था. इस के अलावा किचन में भी एक बिस्तर जमीन पर ही लगा था. उस की ओर इशारा करते हुए राजबहादुर सिंह ने पूछा, ‘‘इधर कौन सोया था?’’

‘‘साहब, मैं यहीं सोता हूं.’’ सौदान सिंह ने कहा.

‘‘तुम यहां सोए थे तो तुम्हें घटना के बारे में कैसे पता चला?’’crime news

‘‘साहब, बाहर के कमरे में शोर हुआ तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं उठ कर वहां पहुंचा तो देखा 4 युवक मेरी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर रहे थे. वह उन का विरोध कर रही थी. मैं ने मंगला को बचाने की कोशिश की तो उन्होंने चाकू से मेरे ऊपर हमला कर दिया. अपने मकसद में सफल होते न देख उन्होंने मंगला पर भी हमला कर दिया.’’ सौदान ने कहा.

‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, वे तो मेरे मातापिता के पास लटेरी में हैं.’’

सौदान सिंह के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मंगला की हत्या का आरोपी उन के सामने खड़ा है. क्योंकि बच्चे घर में होते तो वह पत्नी की हत्या नहीं कर सकता था. इस के अलावा उस ने जो अलग बिस्तर लगाया था, बच्चों के होने पर माना जाता कि एकांत पाने के लिए लगाया होगा. लेकिन जब बच्चे घर पर नहीं हैं तो अलग बिस्तर लगाने की क्या जरूरत थी?

पड़ोसियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि रात में किसी ने किसी तहर का शोरशराबा या चीखपुकार नहीं सुनी थी. राजबहादुर सिंह ने एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा को सारी जानकारी दी तो उन्होंने सौदान सिंह को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.

राजबहादुर सिंह ने सौदान सिंह के मातापिता तथा मंगला के घर वालों को उस की हत्या की खबर दे दी थी. इस के बाद लाश का बारीकी से निरीक्षण कर घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. मंगला की हत्या की खबर पा कर सौदान सिंह का बड़ा भाई गोपाल सिंह तो भोपाल आ गया था, लेकिन मंगला के मायके से कोई नहीं आया था. राजबहादुर सिंह ने एक बार फिर सौदान सिंह से पूछताछ की, लेकिन मंझे हुए खिलाड़ी की तरह उस ने इस बार भी वही सारी बातें दोहरा दीं, जो वह पहले बता चुका था.

राजबहादुर सिंह ने कमरों के निरीक्षण में देखा था कि जिस कमरे में मंगला सोई थी, उस की कुंडी सहीसलामत थी. उसे बाहर से हाथ डाल कर नहीं खोला जा सकता था. सौदान सिंह ने बताया था कि रात को सोते समय बाहर वाला दरवाज अंदर से बंद था. राजबहादुर सिंह ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘रात को सोते समय दरवाजा अंदर से बंद था न?’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘दरवाजा अंदर से बंद था तो वे लोग अंदर कैसे आए, क्या तुम ने दरवाजा खोल कर उन्हें अंदर बुलाया था?’’

‘‘नहीं…नहीं साहब, मैं तो अंदर वाले कमरे में सो रहा था.’’ सौदान सिंह ने घबरा कर कहा.

‘‘तो क्या दरवाजा मंगला ने खोला था?’’

‘‘हो सकता है, उसी ने खोला हो?’’ सौदान सिंह के मुंह से यह जवाब सुन कर राजबहादुर सिंह ने कहा, ‘‘इस का मतलब उन चारों को मंगला ने बुलाया था. अगर उन्हें उस ने बुलाया था तो उस ने शोर क्यों मचाया, उस की रजामंदी से चारों चुपचाप अपना काम कर के जा सकते थे.’’

सौदान सिंह थानाप्रभारी की इस बात का जवाब नहीं दे सका तो उन्होंने डांट कर कहा, ‘‘जो सच्चाई है, उसे खुद ही बता दो, वरना पुलिस सच्चाई उगलवाएगी तो तुम्हारी क्या हालत होगी, शायद तुम नहीं जानते. वैसे सच्चाई का पता हम सभी को चल चुका है. लेकिन हम तुम्हारे मुंह से हकीकत सुनना चाहते हैं कि तुम ने अपनी पत्नी की हत्या क्यों और कैसे की है?’’

सौदान सिंह तुरंत राजबहादुर सिंह के पैरों पर गिर कर रोते हुए बोला, ‘‘साहब, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही मंगला की हत्या की है. साहब उस ने मुझे इस तरह मजबूर कर दिया था कि हत्या के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. मैं मर्द हूं साहब, कितनी बेइज्जती सहता. बेइज्जती से तंग आ कर ही मैं ने उस की हत्या की है.’’

इस के बाद सौदान सिंह ने मंगला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

सौदान सिंह मध्य प्रदेश के जिला विदिशा के थाना लटेरी के गांव सुनखेड़ा का रहने वाला था. प्राइमरी तक पढ़ा सौदान गांव में पिता के सथ कारपेंटर का काम करता था. इस के अलावा खेती की थोड़ी जमीन भी थी. इस तरह कुल मिला कर उस के परिवार की आराम से गुजरबसर हो जाती थी. सौदान सिंह मातापिता के साथ खुश था. कोई 12 साल पहले उस की शादी भिंड की रहने वाली मंगला के साथ हो गई. पत्नी ने आते ही उस की जिंदगी बदल दी. वह इंटर तक पढ़ी थी. वह थी भी थोड़ी खूबसूरत. इसलिए उस के मित्र उस से जलने लगे थे.

जबकि सौदान उस से शादी कर के पछता रहा था. इस की वजह यह थी कि मंगला स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह आजादी में विश्वास करती थी और ऐश की जिंदगी जीने की शौकीन थी. मंगला को अपनी सुंदरता का अहसास तब हुआ, जब गांव के लड़के उस के घर के चक्कर लगाने लगे. अपनी खूबसूरती का अहसास होते ही वह उन्हें अपनी खूबसूरती की झलक दिखा कर परेशान करने लगी थी. तभी घर वालों ने उस की शादी कर दी थी और इस तरह वह ससुराल आ गई.

ससुराल में मंगला सासससुर के रहते बिना सिर ढके से बाहर नहीं निकल सकती थी. जबकि स्वच्छंदता के लिए घर से बाहर जाना जरूरी था. इस के लिए मंगला ने अपने लिए पति के साथ शहर जाने का रास्ता निकाला. सौदान सिंह से ज्यादा पढ़ीलिखी और उस से अधिक सुंदर होने की धौंस दे कर मंगला ने कहा, ‘‘मैं इस गांव में तुम्हारे साथ कब तक रह कर अपनी जिंदगी बेकार करूंगी. शहर चलो, गांव में कुछ नहीं रखा है. यहां रह कर हम न अपने लिए और न बच्चों के लिए 2 पैसे बचा पाएंगे. शहर में कमा कर कुछ जमा कर लेंगे.’’

लेकिन सौदान सिंह गांव में रहने वाले अपने मांबाप को छोड़ कर शहर नहीं जाना चाहता था. पर मंगला की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. पत्नी के कहने पर 3 साल पहले सौदान सिंह भोपाल आ गया और कौशलनगर में किराए का मकान ले कर रहने लगा. उस ने टाइल्स लगाने का काम सीखा और इसे ही रोजीरोटी का साधन बना लिया.

सौदान सिंह अपने इस काम से इतना कमा लेता था कि उस की गृहस्थी अच्छे से चल रही थी. उस का सोचना था कि गांव से शहर आ कर मंगला सुधर जाएगी, लेकिन हुआ इस का उलटा. मंगला भोपाल आ कर सुधरने की कौन कहे, शहर आ कर उस की चाहतों ने और भी ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी. उसे यहां कोई कुछ कहने टोकने वाला नहीं था.

2 बच्चों की मां होने के बावजूद उसे जवानी के न याद आ गए थे. एक ही इशारे में वह मनचलों को घायल कर देती थी. वहां भी मंगला ने अपने चाहने वालों की लाइन लगा दी थी. इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं. सौदान सिंह को जब पत्नी की हरकतों का पता चला तो उस ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी, पर उस पर न पति के समझाने का असर हुआ न डांटनेफटकारने का. क्योंकि वह तो उसे गंवार, जाहिल और मंदबुद्धि ही नहीं समझती थी, बल्कि बातबात में कम पढ़ेलिखे होने का ताना भी मारती थी.

दरअसल, मंगला पति पर हावी हो कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी. लेकिन सौदान सिंह अकसर मंगला को टोकता रहता था.  आखिर खीझ कर मंगला ने सौदान सिंह को नीचा दिखाने का निर्णय कर अपने आशिकों को उस के सामने ही घर बुलाने लगी. यही नहीं, उस के सामने वह प्रेमियों के साथ बैडरूम में चली जाती थी.

इतने से भी उसे संतोष नहीं होता था. वह उसी के सामने मोबाइल पर अपने चाहने वालों से अश्लील बातें करती थी. सौदान सिंह मर्द था, पत्नी की इन गिरी हुई हरकतों से उसे गुस्सा तो बहुत आता था, पर बच्चों के बारे में सोच कर उस गुस्से को पी जाता था. पहले मंगला पति की ही उपेक्षा करती थी, लेन बाद में वह बच्चों की भी उपेक्षा करने लगी थी. वह सुबह ही काम पर चला जाता था. उस के जाने के बाद मंगला आशिकों के साथ घूमने निकल जाती थी. अगर बाहर नहीं जाती तो मोबाइल पर ही घंटों अपने चाहने वालों से बातें करती रहती थी.

ऐसे में मंगला को बच्चों के खानेपीने की भी चिंता नहीं रहती थी. अगर सौदान सिंह कुछ कहता तो वह उस से मारपीट करने पर उतारू हो जाती थी. कई बार तो उस पर हाथ भी उठा दिया था. मंगला को प्रेमियों से मिलने में किसी तरह की परेशानी न हो, इस के लिए उस ने नौकरी कर  ली. यह नौकरी उस के एक प्रेमी चंदेश ने लगवाई थी.

चंदेश हीरा कटाई की उस कंपनी में पहले से नौकरी करता था, उसी की सिफारिश पर मंगला को यह नौकरी मिली थी. इसी नौकरी की आड़ में मंगला और चंदेश की रासलीला आसानी से चल रही थी.

नौकरी लग जाने के बाद मंगला सौदान सिंह को और भी ज्यादा जलील करने लगी थी. वह उस से कहती थी कि हीरे की कद्र जौहरी ही करते हैं.

इधर मंगला का एक पुराना प्रेमी अमन भी आने लगा था. वह उस का शादी से पहले का प्रेमी था. शादी से पहले ही उस के मंगला से अवैध संबंध थे. अमन जब भी आता था, उस के घर पर ही रुकता था. मंगला के बारे में जब मोहल्ले की महिलाओं को पता चला तो वे उस के बारे में तरहतरह की बातें करने लगीं.

इस बदनामी से बचने के लिए सौदान सिंह ने मंगला से गांव चलने को कहा तो उस ने उसे धकियाते हुए कहा, ‘‘तुझे गांव जाना हो तो जा, मैं अब यहीं रहूंगी. मुझे अब तेरी जरूरत भी नहीं है.’’

धीरेधीरे मंगला की तानाशाही बढ़ती जा रही थी, जिस से सौदान सिंह काफी परेशान रहने लगा था. वह कईकई दिनों तक उसे अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह जब भी उस के पास जाता, वह डांट कर कहती, ‘‘गंदे, जाहिल, तेरे शरीर से बदबू आती है. तू मेरे पास मत आया कर.’’crime news

सौदान सिंह को दुत्कार कर उस के सामने ही मंगला अपने प्रेमियों से हंसहंस कर अश्लील बातें करने लगी. पत्नी की इन हरकतों से तंग आ कर सौदान सिंह ने प्रण कर लिया कि अब इसे खत्म कर देगा. क्योंकि अगर अब यह उस की नहीं रही तो वह उसे किसी और के लिए भी नहीं छोड़ेगा. यही सोच कर उस ने 5 दिन पहले बच्चों को दादादादी के पास लटेरी पहुंचा दिया.

20 अप्रैल की रात खाना खा कर पतिपत्नी लेट गए. बच्चे घर पर नहीं थे, इसलिए सौदान सिंह ने मंगला से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. लेकिन तभी मंगला के किसी प्रेमी का फोन आ गया. सौदान ने मंगला के हाथ से मोबाइल छीन कर फोन काटना चाहा तो उस ने उसे तमाचा मार दिया. पतिपत्नी में झगड़ा होने लगा. सौदान सिंह ने गलती स्वीकार करते हुए एक बार फिर उस से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. इस पर मंगला ने कहा, ‘‘अपनी औकात देखी है गंदी नाली के कीड़े. मेरे साथ संबंध बनाने के बारे में तूने सोच कैसे लिया. मैं तुझे अपना शरीर अब कभी नहीं छूने दूंगी.’’

मंगला की इस बात से सौदान सिंह हैरान रह गया. उस ने उसी समय तय कर लिया कि आज ही वह उसे खत्म कर देगा. उस ने लेट कर आंखें मूंद लीं. उस के बगल में लेटी मंगला अपने प्रेमी से फोन पर अश्लील बातें करती रही. करीब 45 मिनट तक मंगला ने फोन पर गंदीगंदी बातें कीं, जिन्हें सौदान सिंह सुनता रहा. मंगला फोन काट कर सो गई. करीब 3, साढे़ 3 बजे सौदान उठा और पलंग के नीचे छिपा कर रखी लोहे की रौड निकाल कर पूरी ताकत से उस के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में वह बेहोश हो गई. उसी बेहोशी की हालत में मंगला के सीने पर बैठ कर उस ने उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

पुलिस से बचने के लिए सौदान सिंह ने सीने पर चाकू मार कर घाव किए और थाने पहुंच कर पुलिस को लूट और जबरदस्ती की झूठी कहानी सुना दी. अपने बचाव के लिए उस ने दूसरे कमरे में खुद ही बिस्तर बिछाया था. थानाप्रभारी ने सौदान सिंह की निशानदेही पर वह रौड बरामद कर ली थी, जिस से मंगला की हत्या की गई थी. पूछताछ और सारे साक्ष्य जुटा कर थाना मिसरौद पुलिस ने पत्नी के हत्यारे सौदान सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Bhopal Crime News

Lucknow Crime News: बेइज्जत करना पड़ा भारी

Lucknow Crime News: बेइज्जतमहत्त्वाकांक्षी नंदिनी पति को छोड़ कर लखनऊ में प्रौपर्टी का कारोबार करने के साथसाथ सैक्स रैकेट भी चलाने लगी थी. यही सैक्स का कारोबार उस की जान का दुश्मन बन गया.

9 सितंबर की दोपहर लखनऊ के थाना इंदिरानगर की राहुल विहार कालोनी में रोज की तरह सब ठीकठाक चल रहा था कि अचानक सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यां कालोनी के एक मकान के सामने आ कर रुकीं तो लोग किसी अनहोनी की आशंका से घरों से बाहर निकल आए. घटना पंकज कुमार सिंह के मकान में घटी थी, जिसे इंदिरानगर के सेक्टर 17 के मकान नंबर 646 में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी ने किराए पर ले रखा था. पुलिस के पहुंचते ही उत्सुकतावश भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए थे.

दरअसल, उस मकान में किराए पर रहने वाली नंदिनी तिवारी को गोली मारे जाने की सूचना थाना इंदिरानगर पुलिस को उस के बेटे मनीष ने दी थी. उसी की सूचना पर पुलिस वहां पहुंची थी. दिनदहाड़े महिला को गोली मारे जाने की सूचना पा कर डीआईजी डी.के. चौधरी, एसएसपी राजेश पांडेय, सीओ (गाजीपुर) दिनेश पुरी और थानाप्रभारी धीरेंद्र यादव पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए थे.

पुलिस अधिकारी मकान के बाहरी कमरे को पार कर के पीछे वाले कमरे में पहुंचे तो बैड के पास पड़ी कुरसी पर 45-46 वर्षीया नंदिनी तिवारी घायल पड़ी थी. उस का सिर दाईं ओर झुका था. सिर के नीचे गरदन के ऊपरी हिस्से पर घाव था. इस के अलावा पीठ पर भी गहरा घाव था. इन घावों से बहा खून फर्श पर फैला था. अनुमान लगाया गया कि गोली काफी नजदीक से खड़े हो कर मारी गई थी, जो गरदन से घुस कर पीठ से निकल गई थी.

नंदिनी की सांसें चलती हुई महसूस हुईं तो पुलिस उसे लोहिया अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद धीरेंद्र यादव ने पुलिसिया काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. बैड पर चाय के कप रखे थे, जिन में सिगरेट के कई टुकड़े पड़े थे. इस का मतलब हत्यारे एक से अधिक थे और मृतका के परिचित थे. कमरे में ही कई मोबाइल फोन टूटे पड़े थे, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. कुर्सी के पास ही नंदिनी का मंगलसूत्र टूटा पड़ा था. मकान का कोनाकोना खंगाला गया, लेकिन हत्यारों से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला. मकान में फर्नीचर न के बराबर था. ड्राइंगरूम में एक तख्त, फ्रिज और टीवी था. दूसरे कमरे में डबलबैड और अलमारी थी, जिस में कपड़े और कौस्मैटिक्स का सामान रखा था. जिस बैडरूम में हत्या हुई थी, उस में एक बैड, कुर्सी और अलमारी थी. अलमारी में कपड़े थे.

इन के अलावा तीनों कमरों से शराब की बोतलें, डिब्बे और भारी मात्रा में आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं, जिस से अंदाजा लगाया गया कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. इस का मतलब उसी धंधे से जुड़े किसी आदमी से उस का विवाद हो गया था, जिस में उस की हत्या हो गई थी. पुलिस अधिकारियों ने नंदिनी के बेटे मनीष से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की मां नंदिनी उस के और भाई संदीप के साथ इंदिरानगर के सेक्टर 17 में रहती थी. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करती थी. 3 महीने पहले उस ने यह मकान किराए पर लिया था. इस में वह दिन में एक बार जरूर आती थी.

इस मकान में उस की परिचित एक महिला पुनीता उर्फ खुशी करीब एक महीने से पति संजय यादव और बेटे के साथ रह रही थी. लगभग ढाई बजे खुशी और एक अन्य महिला सोनिया मेहरोत्रा ने आ कर उसे घटना की सूचना दी थी. सोनिया एलआईसी एजेंट थी. वह चौक में पान वाली गली में रहती थी. नंदिनी को गोली मारी गई तो खुशी और सोनिया घर में ही मौजूद थीं, इस का मतलब हत्या उन के सामने हुई थी. इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने खुशी और सोनिया से पूछताछ की. खुशी ने बताया कि लगभग डेढ़ बजे 2 लड़के आए तो नंदिनी उन्हें ले कर पीछे वाले कमरे, जो बैडरूम था, में चली गईं.

उन के कहने पर वह उन के लिए चायनाश्ता भी दे आई. लगभग 2 बजे सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद ले कर मिलने आई तो नंदिनी के व्यस्त होने की वजह से वह बाहरी कमरे, जो ड्राइंगरूम था, में रुक गई और उस के साथ बैठ कर टीवी देखने लगी. कुछ देर बाद नंदिनी ने आवाज दे कर उन्हें बैडरूम में अपने पास बुला लिया. उस समय नंदिनी की दोनों लड़कों से कहासुनी हो रही थी. दोनों लड़कों ने उसे और सोनिया को एक तरफ खड़ा कर दिया और उन में से एक लड़के ने जेब से पिस्तौल निकाल कर नंदिनी को गोली मार दी. उन्होंने उन्हें भी गोली मारने की कोशिश की, लेकिन किसी कारण से गोली नहीं चली.

इस के बाद उन लड़कों ने उन के और नंदिनी के गहने तथा मोबाइल छीन लिए. मोबाइलों को तो उन्होंने तोड़ कर वहीं फेंक दिए और बाहर से कमरा बंद कर के भाग गए. कमरे में बने रोशनदान से किसी तरह वह निकल कर बाहर आई और कमरा खोल कर सोनिया को निकाला. इस के बाद उस ने घटना की सूचना मनीष को दी. सोनिया ने खुशी की बात की पुष्टि की. उस ने बताया कि वह नंदिनी को 6 साल से जानती थी. उस ने नंदिनी का बीमा किया था. इस के बाद नंदिनी ने उस से कई लोगों का बीमा करवाया था. आज वह जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई थी, तभी यह घटना घट गई. इस के बाद खुशी और सोनिया ने दोनों अज्ञात हत्यारों का जो हुलिया बताया था, उस के हिसाब से उन की उम्र 22-23 साल रही होगी.

अब तक फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड आ गए थे. फोरैंसिंक टीम घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने में लग गई. डौग स्क्वायड का खोजी कुत्ता कमरे से निकल कर बाहर आया और कालोनी की गलियों में घूमता हुआ करीब 2 सौ मीटर दूर बनी झोपड़पट्टी के पास जा कर रुक गया. आसपास के लोगों से भी पूछताछ की गई, लेकिन उन से भी कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लग सका.

थाने से चंद कदमों की दूरी पर यह घटना घटी थी. नंदिनी के घर से थाने के लिए 2 रास्ते थे. एक तो काफी खराब था, दूसरा पक्का था. दोनों रास्तों पर सीसीटीवी कैमरे तलाशे गए, लेकिन कहीं भी कैमरा लगा नहीं मिला. हत्यारों के थाने के सामने से निकलने के बारे में सोच कर थाने के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज खंगाली गई तो उस में भी ऐसा कोई आदमी नजर नहीं आया, जैसा हुलिया खुशी और सोनिया ने बताया था.

पुलिस ने घर वालों, सभी करीबियों तथा परिचितों के मोबाइल नंबर ले लिए. इस के बाद थाने आ कर धीरेंद्र यादव ने मृतका के बेटे मनीष तिवारी की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. सोनिया और खुशी को बुला कर उन के बताए अनुसार, हत्यारों के स्कैच बनवाए गए. अब तक की जांच में पता चला था, नंदिनी अपने पति अजय तिवारी से 19 सालों से अलग रह रही थी. अजय बिहार के सीवान जिले में नौकरी करता था. नंदिनी के बेटे मनीष ने अपने पिता को घटना की खबर न दे कर लखनऊ में ही रहने वाले अपने मौसीमौसा को खबर दी थी.

घटना की खबर पा कर सभी रिश्तेदार पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए थे. रिश्तेदारों ने अजय को भी नंदिनी की हत्या की सूचना दी थी, पर वह नहीं आया था. पोस्टमार्टम के बाद शव मिलने पर बेटों ने रिश्तेदारों की मदद से उस का अंतिम संस्कार कर दिया था. अगले दिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में गोली मारने से पहले नंदिनी के साथ मारपीट किए जाने की भी पुष्टि हुई. नंदिनी की गरदन के पीछे ऐसे निशान पाए गए थे, जो उस के साथ हुई मारपीट की तरफ इशारा कर रहे थे.

धीरेंद्र यादव ने नंदिनी के तीनों मोबाइल नंबरों को चेक किया. उस के वाट्सएप नंबर वाले मोबाइल पर कई लड़कियों के ऐसे फोटो और मैसेज मिले, जिस से उस के गलत कामों में लिप्त होने के संकेत मिल रहे थे. घटनास्थल से मिली आपत्तिजनक चीजों और मोबाइल से मिले फोटो से लग रहा था कि नंदिनी सैक्स रैकेट चलाती थी. सोशल मीडिया द्वारा भेजे गए संदेशों से भी लग रहा था कि नंदिनी के कई लड़कियों से संपर्क थे. पुलिस ने जब नंदिनी के बड़े बेटे संदीप का मोबाइल चेक किया तो उस के मोबाइल में भी कई लड़कियों के फोटो मिले, जो उस ने वाट्सएप से दूसरों को भेजे थे.

पुलिस ने नंदिनी के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में जिन नंबरों पर नंदिनी की ज्यादा बातचीत होती थी, उन नंबरों को अलग कर लिया गया. उन नंबरों की घटना के दिन की लोकेशन देखी गई. जिस नंबर की लोकेशन घटनास्थल के नजदीक की थी. उन का रिकौर्ड देखा गया. उन नंबरों में से एक नंबर की लोकेशन पहले इंदिरानगर और फिर खुर्रमनगर की थी. उस नंबर से घटना के दिन नंदिनी के नंबर पर फोन भी आया था.

उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड निवासी अभिषेक कनौजिया का निकला. थानाप्रभारी ने अभिषेक के कालेज का पता कर के कालेज से उस की फोटो निकलवाई. इस बात की भनक अभिषेक और उस के किसी करीबी को भी नहीं लगने दी गई. वह फोटो उन्होंने खुशी और सोनिया को दिखाया तो उन्होंने उसे पहचान लिया. वह दोनों हत्यारों में से एक था और उसी ने नंदिनी की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस ने अभिषेक के घर पर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. 12 सितंबर को धीरेंद्र यादव ने एक गुप्त सूचना पर गोमतीनगर में हुसडि़या पुल के पास से अभिषेक कनौजिया को उस के एक साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया.

अभिषेक के साथ गिरफ्तार हुए युवक का नाम विनय चौहान था और वह गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. अभिषेक से पूछताछ की गई तो उस ने विनय के साथ मिल कर नंदिनी की हत्या करने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने हत्या के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. नंदिनी बिहार के सीवान जिले की रहने वाली थी. उस के पति अजय तिवारी कृषि विभाग में नौकरी करते थे. उन के 2 बेटे थे, संदीप और मनीष. नंदिनी पहले तो ठीकठाक थी, लेकिन 2 बेटों के होने के बाद उस में अचानक आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया था. इस की वजह थी, उस की संगति कुछ अमीर घर की महिलाओं से हो गई थी.

वे महिलाएं दिल खोल कर पैसे खर्च करती थीं और ठाठ से रहती थीं. संगति का असर तो होना ही था. नंदिनी को भी उन महिलाओं की तरह पैसे खर्च करने की आदत पड़ गई. वैसे भी साथ में रह कर खर्च करना ही पड़ता है. इस फिजूलखर्ची को ले कर नंदिनी की पति से रोज कहासुनी होने लगी. अजय ने उसे काफी समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. रोजरोज झगड़े होने लगे तो नंदिनी को अजय के साथ रहना दुश्वार लगने लगा. आखिर उस ने अजय से अलग होने का फैसला कर लिया.

अजय ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन वह भी नंदिनी की हरकतों से आजिज हो चुका था. इसलिए वह भी अलग होने को तैयार हो गया. अजय ने उसे एक निश्चित रकम दे कर पीछा छुड़ा लिया. दोनों बेटों के साथ नंदिनी 1996 में लखनऊ आ गई. यहां उस ने जानकीपुरम के सेक्टर 3 में एक तीनमंजिला मकान नंबर 407 खरीद लिया और उसी में अपने दोनों बेटों के साथ रहने लगी. उस ने घर में किराएदार भी रख लिए, जिस से उस का खर्च चलने लगा. लखनऊ में उस ने कुछ परिचितों की मदद से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया. यहां पारा थानाक्षेत्र में उस के बहनोई रहते थे, उन से भी उसे मदद मिलती थी.

धीरेधीरे नंदिनी का काम चल निकला. इस काम से उसे अच्छा मुनाफा होेने लगा. जल्दी ही उस का परिचय रसूखदारों, नेताओं और अधिकारियों से हो गया. महिला होने का उसे फायदा भी काफी मिला. हाईसोसायटी के लोगों में उठनाबैठना शुरू हुआ तो तरहतरह के लोगों से उस का वास्ता पड़ने लगा. नंदिनी उन के साथ रह कर शराब भी पीने लगी. वह अमर सिंह की पार्टी से भी जुड़ गई, जिस में उसे महिला लोकमंच का नगर अध्यक्ष बना दिया गया.

हाईसोसायटी में 2 चीजें प्रसिद्ध होती हैं, एक शराब और दूसरी शबाब. इस की वजह यह है कि ऐसे लोगों के पास पैसों की कमी तो होती नहीं. जब इंसान के पास अथाह पैसा होता है तो उस में ऐब आ ही जाते हैं. इन में सब से बड़े ऐब शराब और शबाब हैं. इन चीजों की जानकारी नंदिनी को भी हो गई. उस ने देखा, इस काम में बैठेबिठाए जितना पैसा मिलता है, उतना किसी काम में नहीं है. कमाई देख कर नंदिनी ने इस काम को अपनाने का फैसला कर लिया. उस के संपर्क में कुछ ऐसी लड़कियां थीं, जो पैसों की खातिर कुछ भी करने को तैयार थीं. नंदिनी ने उन से बात की तो वे चोरीछिपे यह काम करने को तैयार हो गईं. कुछ घंटों में हजारों कमाने की चाहत में वे लड़कियां इस दलदल में उतर गईं.

लड़कियों के आने के बाद नंदिनी उन की डीलिंग करने लगी. अपने संबंधों का फायदा उठा कर वह लोगों को पैसों के बदले लड़कियां होटलों या उन के बताए ठिकाने पर उपलब्ध कराने लगी. उस का यह धंधा दिन दूना रात चौगुना तरक्की करने लगा. इसी बीच नंदिनी ने देखा कि कई ग्राहक ऐसे होते हैं, जो होटलों में जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते. ऐसे लोगों के लिए नंदिनी ने इंदिरानगर के सेक्टर 17 में मकान नंबर 646 किराए पर ले लिया. यह मकान एलआईसी में नौकरी करने वाले विनोद सिंह का था. इसी मकान में लोगों को लड़कियां मुहैया कराती थी. नंदिनी ग्राहकों से मिले रुपयों से 25 प्रतिशत लड़कियों को देती थी, बाकी खुद रख लेती थी.

इस के बाद वह अपने बेटों के साथ इंदिरानगर वाले मकान में शिफ्ट हो गई. यहां आने के बाद उस ने सैक्स वाला धंधा बंद कर दिया. उस ने जानकीपुरम वाला अपना मकान किराए पर उठा दिया था. धंधे के लिए उस ने राहुलविहार में एक मकान किराए पर ले लिया. वह अपना काम इतने गुपचुप ढंग से करती थी कि किसी को खबर नहीं लगती थी. उस के बेटों तक को इस बात की खबर नहीं थी कि उन की मां ने और भी कोई मकान किराए पर ले रखा है. थोड़ेथोड़े समय पर वह मकान  बदल देती थी.

चूंकि वह प्रौपर्टी डीलिंग के धंधे से जुड़ी थी, इसलिए उस के घर बड़ेबड़े लोगों का आनाजाना लगा रहता था. इस की वजह से आसपास के लोगों को उस पर शक नहीं होता था. यही वजह थी कि वह कभी पकड़ी नहीं गई. कोई भी मकान किराए पर लेने पर मकानमालिक सत्यापन कराता तो वह पाकसाफ निकलती. इसलिए आसानी से उसे मकान किराए पर मिल जाता था. दूसरी ओर नंदिनी के दोनों बेटे अपनी मां के कार्य से अंजान अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहे थे. इस समय बड़ा बेटा संदीप माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से मासकौम की पढ़ाई कर रहा है तो छोटा मनीष पीसीएस की तैयारी कर रहा है. नंदिनी ने स्पीक एशिया जैसी कंपनी में भी अपना पैसा लगा रखा था.

उस ने कई बीमे भी करा रखे थे. ये सारे बीमे उस ने चौक की पान वाली गली निवासी सोनिया मेहरोत्रा से कराए थे. 35 वर्षीया सोनिया एलआईसी एजेंट थी. उस का पति आजाद मेहरोत्रा भी एलआईसी एजेंट था. सोनिया के नंदिनी से इतने घनिष्ठ संबंध थे कि नंदिनी ने अपनी पहुंच से उसे कई मालदार आसामियों के बीमे कराए थे. लखनऊ के गोमतीनगर थानाक्षेत्र के विनीत खंड में अभिषेक कनौजिया उर्फ विस्सू रहता था. वह बाराबंकी के एक कालेज से बीकौम की पढ़ाई कर रहा था. उस के पिता अनिल कुमार कनौजिया लेखाविभाग में क्लर्क थे. कालेज के कुछ मित्रों की संगत में पड़ कर अभिषेक ने गलत राह पकड़ ली थी.

वह इतना खूबसूरत नहीं था कि कालेज की लड़कियां उस की ओर आकर्षित होतीं. दोस्तों के बीच हमेशा लड़कियों के बारे में बातें होती रहती थीं, लेकिन लड़कियों का सान्निध्य मिलना तो दूर, उन लोगों की तरफ कोई देखती तक नहीं थी. सभी दोस्त शराब और पोर्न फिल्मों के शौकीन थे. महंगे स्मार्टफोन पास में होने के कारण सोशल मीडिया के जरिए वे एकदूसरे को अश्लील फोटो व वीडियो क्लिप भेजते रहते थे. अभिषेक के कुछ दोस्त अपने तन की गरमी शांत करने के लिए कालगर्ल्स के पास भी जाने लगे थे.

कालगर्ल्स से मिलने वाले आनंद को वे दोस्तों के सामने आ कर बढ़ाचढ़ा कर बताते, जिस से अभिषेक के मन में भी वह आनंद पाने की चाहत जाग उठी. इस के लिए उस ने अपने बहराइच निवासी एक दोस्त सलमान से बात की तो उस ने उस की मुलाकात नंदिनी तिवारी से करा दी. सलमान नंदिनी के यहां मौजमस्ती करने जाता रहता था. अभिषेक की मुलाकात नंदिनी से हुई तो वह हर हफ्ते उस के यहां जाने लगा. नंदिनी उसे उस की पसंद की लड़की 2 घंटे के लिए अपने ही घर में उपलब्ध करा देती थी, बदले में उस से 8 से 10 हजार रुपए ले लेती थी. अभिषेक नंदिनी के मकान में शराब पीता और पसंद की हुई लड़की के साथ रंगरलियां मनाता.

धीरेधीरे अभिषेक ने इस मौजमस्ती में अपने सारे रुपए उड़ा दिए. जब उस के पास पैसे नहीं रहे तो उस ने दूसरों से कर्ज लेना शुरू कर दिया. वह शराब और सैक्स का इतना आदी हो गया था कि इन दोनों के बिना रह नहीं सकता था. कर्ज में लिए गए रुपए भी खत्म हो गए. ऐसी हालत में जब वह बिना पैसों के नंदिनी के यहां जाता तो नंदिनी उसे लड़कियों के सामने ही दुत्कारने लगती. जून, 2015 में नंदिनी ने किराए पर मकान दिलाने वाले ब्रोकर का पैंफ्लेट देखा तो उस में लिखे मोबाइल नंबर पर फोन किया और किराए का मकान दिलाने को कहा. उस ब्रोकर ने मूलरूप से सीतापुर निवासी प्रौपर्टी डीलर विनीत से नंदिनी को मिलवाया.

नंदिनी ने प्रौपर्टी डीलर विनीत को अपनी आईडी के तौर पर आधार कार्ड की छायाप्रति दी और कहा कि उस के पति बाहर नौकरी करते हैं और उस के 2 बच्चे हैं, जो स्कूल में पढ़ते हैं. यह झूठ बोल कर नंदिनी ने किसी तरह प्रौपर्टी डीलर को झांसे में ले लिया, जिस के बाद उस प्रौपर्टी डीलर ने नंदिनी को इंदिरानगर थानाक्षेत्र के राहुल विहार में पंकज कुमार सिंह का मकान 10 हजार रुपए मासिक किराए पर दिला दिया. मकान मालिक पंकज सिंह हरिद्वार में नौकरी करता था और परिवार के साथ रहता था. पंकज का भाई इंदिरानगर में रहता था, उसे ही हर महीने किराया देने की बात तय हुई.

इस मकान की देखभाल और आने वाले मेहमानों की आवभगत के लिए नंदिनी ने 8 अगस्त को पुनीता उर्फ खुशी को रख लिया. 30 वर्षीया खुशी नंदिनी के जानकीपुरम वाले मकान के पड़ोस में रहती थी. वहीं उस का नंदिनी से परिचय हुआ था. मूलरूप से बिहार निवासी पुनीता उर्फ खुशी तिवारी ने सीतापुर के संदना थानाक्षेत्र निवासी संजय यादव उर्फ छोटू से विवाह किया था. उस का 3 साल का बेटा था. संजय लखनऊ के विकासनगर थानाक्षेत्र की एक कपड़े की दुकान पर काम करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो देर रात लौटता था.

इस मकान में 3 कमरे थे, जिन में से 2 कमरे बैडरूम और एक कमरा ड्राइंगरूम बना दिया गया. जो मिलने आता था, उसे ड्राइंगरूम में बैठा दिया जाता था और दोनों बैडरूम लोगों को लड़कियों के साथ मौजमस्ती के लिए मुहैया कराए जाते थे. नंदिनी इस मकान में अकसर दिन में आती थी, कभीकभी रात में भी रुक जाती थी.दूसरी ओर नंदिनी के तानों से आजिज अभिषेक ने उसे सबक सिखाने की ठान ली थी. उस ने अपनी मोटरसाइकिल खरगापुर निवासी सुरेंद्र बहादुर को 20 हजार रुपए में बेच दी और उसी पैसों से उस ने एक पिस्तौल खरीदी.

इस के बाद उस ने अपने दोस्त विनय चौहान से बात की. वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. विनय गोमतीनगर में विनय खंड में रहता था. वह ताज होटल में वेटर था, लेकिन इधर उस ने नौकरी छोड़ दी थी.  9 सितंबर की सुबह अभिषेक ने नंदिनी को मिलने के लिए फोन किया तो उस ने उसे बुला लिया. लेकिन उस ने उसे अपने लिए वोदका शराब की एक बोतल लाने को कहा. अभिषेक ने नंदिनी के लिए वोदका शराब और अपने दोनों के लिए बीयर के 2 केन खरीदे. इस के बाद वह विनय के साथ औटो से नंदिनी के इंदिरानगर के राहुल विहार वाले मकान पर पहुंच गया.

अभिषेक ने नंदिनी के सामने आते ही पैर छुए. नंदिनी उन दोनों को ले कर बैडरूम में चली गई. उसी बीच उस ने खुशी से चायनाश्ता दे जाने के लिए कहा. नंदिनी से अभिषेक बातें करने लगा. खुशी चाय बना कर दे गई. तीनों ने चाय पी. इस के 15 मिनट बाद नंदिनी ने शराब पी तो अभिषेक और विनय ने बीयर पी. नंदिनी ने उन दोनों की बीयर में अपनी थोड़ी शराब भी डाल दी. तभी सोनिया जन्माष्टमी का प्रसाद देने आई. नंदिनी को 2 लड़कों से बातें करते देख वह ड्राइंगरूम में बैठ कर टीवी देखने लगी. जब शराब का नशा चढ़ा तो नंदिनी ने अभिषेक को ताना मारा कि उस के पास रुपए नहीं है तो वह क्यों चला आता है.

इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. नंदिनी से अभिषेक ने मारपीट की तो उस ने ड्राइंगरूम में बैठी खुशी और सोनिया को कमरे में बुला लिया. उस ने दोनों को कमरे में एक किनारे खड़ा कर दिया. विनय ने उन्हें कवर किया तो अभिषेक ने जेब से पिस्टल निकाल कर खड़ेखड़े कुर्सी पर बैठी नंदिनी को पास से गरदन के ऊपरी हिस्से में गोली मार दी, जो कि पीठ से बाहर निकल गई. नंदिनी घायल अवस्था में बेहोश हो गई. अभिषेक ने नंदिनी, खुशी और सोनिया के मोबाइल ले कर तोड़ दिए. अभिषेक को उन दोनों से खतरा नहीं था, क्योंकि वे उसे पहचानती नहीं थीं. फिर उन्हें कमरे में बंद कर के दोनों वहां से बाहर निकले और औटो से चले गए.

कमरे में एसी लगाने के लिए रोशनदान में गत्ता लगा हुआ था, जिसे हटा कर खुशी बाहर निकली और कमरे का दरवाजा खोल कर सोनिया को बाहर निकाला. इस के बाद उन्होंने नंदिनी के बेटे मनीष को घटना की सूचना दी. धीरेंद्र यादव ने अभियुक्तों की निशानदेही पर अंसल से हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल बरामद कर ली. खुशी और सोनिया से हुई लूट की बात पुलिस जांच में गलत निकली. आवश्यक काररवाई के बाद दोनों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. Lucknow Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Social stories: एक नया कौंसेप्ट भाबीजी घर पर हैं

Social stories: आजकल टीवी मनोरंजन का सब से बड़ा साधन है. लेकिन टीवी पर अच्छे मनोरंजक प्रोग्राम कभीकभी ही नजर आते हैं. ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ऐसा सीरियल है, जिसे हर दृष्टि से मनोरंजक कहा जा सकता है. साथ ही सोद्देश्य भी.

टी वी जिसे दूरदर्शन के जमाने में बुद्धू बक्सा कहा जाता था, अब बुद्धू नहीं रहा. बुद्धू इसलिए नहीं क्योंकि अब यह स्मार्ट बन कर मोटी कमाई करने लगा है. लाखों लोगों की रोजीरोटी चलाने लगा है. और हां, अच्छे पढ़ेलिखों को बेवकूफ भी बनाने लगा है. कमाई को देखते हुए अब कभी के इस बुद्धू बक्से पर दर्जनों इंटरटेनमेंट चैनल आ गए हैं. न्यूज चैनलों की तो भरमार है ही. टीवी पर तमाम प्रोग्राम बने हैं, बन रहे हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लेकिन अपनेअपने कंटेंट के हिसाब से चलते सब हैं. वैसे यह सब भी चैनल्स पर निर्भर करता है कि किस प्रोग्राम को कितने दिन चलाना है, दर्शकों पर नहीं. अब कलर्स के ‘बालिका वधू’ को ही ले लीजिए, जो एक अच्छे उद्देश्य, अच्छी कहानी और अच्छे कलाकारों के साथ शुरू हुआ था.

लोगों ने इसे पसंद भी किया लेकिन अब बोझ से लगने वाले इस सीरियल को चैनल रबर की तरह खींचे जा रहा है. टीआरपी से भी उसे कोई लेनादेना नहीं. कहानी तो मूल कहानी से भटक कर कहीं से कहीं चली ही गई, कलाकार भी वक्तवक्त पर बदलते रहते हैं. शुरू की बालिका वधू भी अब जवान हो गई.

ऐसा नहीं है कि दूरदर्शन या दूसरे चैनल्स पर अच्छे प्रोग्राम्स नहीं आते. कई यादगार सीरियल्स आए. दूरदर्शन के ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’, ‘ये जो जिंदगी’, ‘कथा सागर’ और ‘तमस’ को भला कौन भूल सकता है. जहां सवाल दूसरे इंटरटेनमेंट चैनल्स का है तो उन पर सिर्फ इंटरटेनमेंट (उन के हिसाब से) रचा जाता है. इस इंटरटेनमेंट में अगर आप समाज या परिवार के लिए कोई मैसेज ढूंढने लगें तो यह सिर्फ एक छलावा ही साबित होगा. अलबत्ता भव्यता जरूर आप को प्रभावित करेगी.

भव्यता इसलिए क्योंकि यह व्यवसाय का एक हिस्सा है. विज्ञापन देने वाली कंपनियों को अपना प्रचार कर के अपने प्रोडक्ट बेचने होते हैं. जाहिर है, सौंदर्य प्रसाधन सजीधजी महिलाओं को देख कर खरीदे जाते हैं और घरेलू प्रोडक्ट जगमगाते बड़ेबड़े घरों को देख कर पसंद किए जाते हैं. इस चक्कर में सीरियल्स की कहानी कहीं गौण हो जाती है, रह जाते हैं गोलगोल घूमते दृश्य. रियलिटी शोज और कौमेडी शोज का हाल भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन के अपने अलग दर्शक होते हैं. जहां सवाल कौमेडी शोज का है तो इन में दर्शकों को हंसाने के नाम पर ज्यादातर अश्लीलता ही परोसी जाती है. लाफ्टर चैलेंज, कौमेडी सर्कस सीरीज, कौमेडी क्लासेज, कौमेडी नाइट्स बचाओ जैसे कौमेडी शोज में ह्यूमर नाममात्र का और अश्लीलता अधिक नजर आती थी.

हां, कपिल शर्मा का ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ अपने कौंसेप्ट और कपिल की माइंड औफ प्रजेंस की वजह से कामयाब जरूर रहा. लेकिन अब इस में भी सेंस और ह्यूमर की कमी नजर आने लगी है. कह सकते हैं कि इस से भी अब दर्शकों का मोह भंग होने लगा है. इसी सब के बीच 2 मार्च, 2015 से एंड टीवी पर एक शो शुरू हुआ है, ‘भाबीजी घर पर हैं’. कौमेडी टच वाले इस शो में लंपटपन तो है लेकिन सेंस औफ ह्यूमर भी है. खास बात यह है कि इस शो में कलाकारों का चयन बहुत सोचसमझ कर किया गया है.

मसलन, शिल्पा शिंदे यानी अंगूरी सीधीसादी खूबसूरत महिला के रूप में एक अलग ही तरह का करेक्टर है, जो अंगरेजी के शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाती. जब उस का पति जगमोहन तिवारी या लंपट पड़ोसी विभूति नारायण मिश्रा उस के गलत उच्चारण को सही करते हैं तो अनायास उस के मुंह से निकल जाता है ‘सही पकड़े हैं’. सही मायनों में देखा जाए तो यही तीन शब्द अंगूरी के करेक्टर की जान हैं.

वैसे बात बोलने के अंदाज की हो, अदाओं की हो या फिर चलनेफिरने की. निस्संदेह शिल्पा शिंदे ने अपने करेक्टर के लिए बहुत मेहनत की होगी. सीरियल की दूसरी महिला यानी अनीता भाभी का करेक्टर भी भूमिका के हिसाब से कम नहीं है. ग्रूमिंग क्लास चलाने वाली यह महिला स्टाइलिश भी है और अपने निठल्ले पति विभूति को अपने कंट्रोल में भी रखती है. यह भूमिका सौम्या टंडन ने निभाई है जो पहले ही कई शो कर चुकी हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ के सब से मंझे हुए कलाकार हैं आशिफ शेख, जो करीब 65 फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं. अंगरेजी, उर्दू और हिंदी तीनों ही भाषाओं पर उन की अच्छी पकड़ है. विभूति नारायण मिश्रा की भूमिका को वह एक लंपट पति के रूप में बखूबी निभा रहे हैं. अंगूरी के पति जगमोहन तिवारी की भूमिका रोहिताश गौड़ ने निभाई है. रोहिताश भी दर्जनों फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ का कौंसेप्ट दरअसल इस अधार पर रखा गया है कि पत्नी भले ही कितनी खूबसूरत और सुशील क्यों न हो, लंपट पति पड़ोसी की पत्नी पर लाइन मारने से बाज नहीं आता. इस सीरियल में भी कुछ ऐसा ही है. विभूति नारायण मिश्रा की नजर मनमोहन तिवारी की पत्नी अंगूरी पर है और मनमोहन तिवारी की निगाह विभु की पत्नी अनीता पर. जाहिर है, दोनों ही लंपट स्वभाव के हैं, लेकिन अंदर ही अंदर संस्कारी भी हैं. इसी वजह से दोनों में से कोई भी अपने मन की बात नहीं कह पाता. दूसरी ओर दोनों महिलाएं पूरी तरह संस्कारी भी और अपनेअपने पतियों को प्यार करने वाली भी हैं. इसलिए जरूरत पड़ने पर दोनों मिल कर अपने ढंग से बिगड़े हुए पतियों को लाइन पर भी लाती हैं.

इस सीरियल का तानाबाना पड़ोसी की पत्नी पर नजर रखने वाले पतियों की पंचलाइन के साथ बुना गया है. कहानी कोई एक नहीं है. हर दूसरे तीसरे एपीसोड के बाद कहानी बदल जाती है. विषय भी सामाजिक और आम आदमी की जिंदगी से जुडे़ होते हैं, जिन्हें चंद कलाकारों के माध्यम से रोचक बनाने की कोशिश की जाती है. पृष्ठभूमि चूंकि कानपुर की रखी गई है, इसलिए ज्यादातर जगहों पर स्थानीय भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है. छोटी सी जगह, दो मामूली से घरों, चाय की दुकान और एक गली को सेट बना कर ऐसा धारावाहिक खड़ा करना जिसे सब पसंद करें, आसान नहीं है.

विभूति नारायण मिश्रा और मनमोहन तिवारी, जिस का कच्छेबनियान का बिजनैस है, एकदूसरे को कभी नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं तो कभी एकदूसरे को उस की बीवी की नजरों में गिराने की, ताकि वे एकदूसरे की बीवी की नजरों में श्रेष्ठ बन जाएं. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं मात खानी पड़ती है. कहानी को आगे बढ़ाने के लिए सीरियल में बीचबीच में दूसरे करेक्टरों को भी लाया जाता है. इन में एक करेक्टर है सक्सेना, जिस ने खुद को पागल घोषित कर रखा है और पागलपन के लिए बिजली के शाक लेता है. कोई उसे थप्पड़ मारता है तो वह ‘आई लाइक इट’ बोलता है यानी उसे पिटने से शाक मिलता है जो उसे अच्छा लगता है.

उस का बोलने का अंदाज और मासूमियत भरी हास्यप्रद बातें सहज ही प्रभावित करती हैं. दूसरा करेक्टर है दरोगा हप्पू सिंह का, जिस के माथे पर तेल वाले बालों की लटें लटकी रहती हैं. दरोगा हप्पू सिंह जब अपने 9-9 ठैंया बच्चों और प्रेग्नेंट बीवी के नाम पर न्यौछावर मांगता है तो उस के इस अंदाज में रिश्वत मांगना नहीं, बल्कि हास्य का पुट ज्यादा नजर आता है. उस के इस तरह रिश्वत मांगने पर कानूनव्यवस्था पर गुस्सा नहीं आता बल्कि हप्पू सिंह पर प्यार आता है. हप्पू सिंह का उठतेबैठते ‘अरे दादा’ बोलना भी एक अलग तरह का हास्य और चुटीलापन पैदा करता है. साथ ही अनीता को गोरी मैम कहना भी, जिसे सुन कर विभूति नारायण मिश्रा चिढ़ता है.

कहानी आगे बढ़ाने के लिए दो छिछोरों मलखान और टेका के अलावा एक सब्जी वाले को भी रखा गया है, जिन के रोल तो खास नहीं हैं, पर मन को भाते हैं. लेखक ने अपनी कल्पना का कमाल दिखाया है 2 करेक्टरों को रचने में. इन में एक है रिक्शावाला पेलू जिस के चेहरे पर कोई भाव नहीं आता, जो बोल नहीं सकता. अलबत्ता कुछ पूछने पर वह अपने कानों पर बंधे अंगोछे से कागज की परची निकाल कर देता है जिस पर कुछ न कुछ चुटीला लिखा होता है. मानो उसे पहले ही पता हो कि उस से क्याक्या पूछा जा सकता है. पेलू का करेक्टर बिना भाव, बिना कुछ बोले भी बहुत कुछ कह जाता है.

दूसरा करेक्टर है मनमोहन तिवारी की मां का जो कहीं दूर अलग रहती हैं और अपनी बहू अंगूरी को बहुत प्यार करती हैं. तिवारी मां से बहुत डरता है जबकि अंगूरी मां को ही पति के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है. तिवारी की मां भले ही एक फ्रेम में नजर आती है, पर वह उसी में ऐसा कुछ कर जाती है कि हास्य खुद उभर आता है. मसलन छज्जे पर खड़े हो कर अंगूरी से बतियाना, तिवारी को बैल कहना, बात खत्म होते ही उस के हाथ से टकरा कर कोई चीज नीचे गिरना, नीचे किसी का चिल्लाना और उस का तुरंत वहां से हट जाना, जैसी बातें अलग तरह का हास्य पैदा करती हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ में कहींकहीं तो इतने अच्छे पंच होते हैं जो मानव मन पर गहरे तक असर करते हैं. मसलन, इस सीरियल के एक एपिसोड में अनीता भाभी ब्लड डोनेशन कैंप लगाती है. उस के पति के अलावा सभी अनीता को प्रभावित करने के लिए ब्लड डोनेट करते हैं. उस का खास आशिक तिवारी तो 2 बार बेहोश हो जाने के बाद भी कई बार ब्लड डोनेट करता है.

इस मामले में दरोगा हप्पू सिंह भी पीछे नहीं रहता. वह एक कैदी का 2 बोतल खून निकलवा कर ले आता है और उसे अपना बताता है. उधर कैदी कहता है, ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, लेकिन आजकल तो लोग खून चूस कर भी आजाद नहीं करते.’

यह बात नेताओं और अफसरों के लिए बहुत सटीक है.

खास बात यह है कि दो लंपट पुरुषों और उन की पत्नियों के इर्दगिर्द बुनी गई सामाजिक सरोकार वाली इस सीरियल की कहानियों में भले ही कुछ खास न हो पर अश्लीलता बिलकुल नहीं है. हां, चुटीलापन जरूर है जो दर्शकों को बांधे रखता है. कई सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी इस में नजर आता है. किसी भी विषय को इस तरह संदेश के साथ हास्य में बांध देना हंसीखेल नहीं है. आज के समय में जब अच्छे सीरियल्स देखने को नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में यह सीरियल ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ताजे हवा के झोंके की तरह है जो मनोरंजन की प्राणवायु देता है. साथ ही यह भी बताता है कि भव्यता से इतर कम संसाधनों में भी अच्छा काम किया जा सकता है. बस करने वाला चाहिए.  Social stories