Punjab National Bank Scam: पीएनबी घोटाला – मिलीभगत की असली कहानी

Punjab National Bank Scam: किसी हिंदी फिल्म की शुरुआत के लिए भी शायद यह अति नाटकीय सीन लगे और निर्देशक आंख में इतने धूलझोंकू सीन को फिल्माने से मना कर दे, जैसी हकीकत पंजाब नैशनल बैंक की मुंबई स्थित ब्रेडी हाउस ब्रांच घोटाले से सामने आई है. जैसा कि बैंक के एमडी सुनील मेहता बताते हैं, ‘यह सब 2011 से ही चल रहा था और 3 जनवरी 2018 को 11,360 करोड़ रुपए के घोटाले के रूप में सामने आया.’

अब सामने कैसे आया, जरा यह भी देख लीजिए. कई महीने पहले नीरव मोदी के कुछ अधिकारी पंजाब नैशनल बैंक की ब्रैंडी हाउस शाखा पहुंचे. उन्होंने बैंक के मैनेजर से कहा कि उन्हें हांगकांग से कुछ सामान मंगाना है. सामान मंगाने के लिए उन्होंने बैंक से एलओयू यानी लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी करने को कहा. उन्होंने ये लेटर औफ अंडरटेकिंग हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक और एक्सिस बैंक के नाम पर जारी करने की गुजारिश की.

भारत में लेटर औफ अंटरटेकिंग का मतलब यह होता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय बैंक या किसी भारतीय बैंक की अंतरराष्ट्रीय शाखा कारोबारी का अपना बैंक का साखपत्र जारी करता है, जिस का मतलब यह होता है कि आप इन साहब को इन की बताई हुई पार्टी को इतनी रकम का भुगतान कर दें. ये यह रकम 90 दिनों या अधिकतम 180 दिनों में लौटा देंगे. अगर ऐसा नहीं होता तो इस की भरपाई हम (यानी एलओयू या साखपत्र जारी करने वाला वाला बैंक) कर देंगे. यह शौर्ट टर्म लोन होता है.

इस लेटर के आधार पर कोई भी कंपनी दुनिया के किसी भी हिस्से में राशि को निकाल सकती है. इन एलओयू का इस्तेमाल ज्यादातर आयात करने वाली कंपनियां, विदेशों में भुगतान के लिए करती हैं. लेटर औफ अंडरटेकिंग किसी भी कंपनी को लेटर औफ कंफर्ट के आधार पर दिया जाता है. लेटर औफ कंफर्ट का मतलब होता है कि उसे कंपनी के स्थानीय बैंक की ओर से जारी किया गया है,यह उस कारोबार के लिए होता है, जो हो रहा होता है. यहां पीएनबी से यह गारंटी देने को कहा गया कि वह हांगकांग स्थित उन बैंकों को दे दे जिन का नाम ऊपर लिखा गया है.

पीएनबी ने हांगकांग में मौजूद इलाहाबाद बैंक को 5 और एक्सिस बैंक को 3 लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए. हांगकांग से करीब 280 करोड़ रुपए का सामान इंपोर्ट किया गया. कुछ महीने गुजर गए यानी वह पीरियड निकल गया, जितने दिनों बाद एलओयू के आधार पर भुगतान होना था.

अब 18 जनवरी को नीरव मोदी के कुछ अधिकारियों के साथ जिन बैंकों को एलओयू जारी किया गया था, उन के कुछ लोग बैंक पहुंचते हैं. वे अपने इंपोर्ट दस्तावेज दिखाते हुए कहते हैं कि पैसों का भुगतान कर दिया जाए. लेकिन अब वह बैंक मैनेजर नहीं है, जो इन के जारी करने के समय था. अत: वह कहता है कि जितना भी पैसा विदेश में भेजना है, उतना नकद जमा करना पड़ेगा.

कंपनियों के अधिकारियों ने फिर लेटर औफ अंडरटेकिंग दिखाया और उस के आधार पर पेमेंट करने को कहा. बैंक ने जब इन एलओयू की जांच शुरू की तो उन के होश उड़ गए. क्योंकि बैंक के रिकौर्ड में तो इन 8 लेटर औफ अंडरटेकिंग का कहीं जिक्र ही नहीं था. मतलब बैंक ने बिना कोई गारंटी लिए, बिना कुछ गिरवी रखे लेटर औफ अंडरटेकिंग जारी कर दिए थे. संक्षेप में यही पीएनबी घोटाला है, जिसे हीरा व्यापारी नीरव मोदी और उस के मामा मेहुल चौकसी ने अंजाम दिया है.

हकीकत पता चली तो मालूम हुआ घोटाला अरबों का है

बहरहाल, इस हकीकत के उजागर होने के बाद पीएनबी को तात्कालिक रूप से 280 करोड़ और जब पूरे मामले को खंगाला गया तो पता चला कि 11,360 करोड़ रुपए की चपत लग चुकी थी. इस के पता चलते ही पीएनबी के एमडी के मुताबिक, तुरंत संबंधित जांच एजेंसियों को इस की जानकारी दी गई. मगर सवाल यह है कि जब एलओयू मुंहजुबानी वायदे पर नहीं जारी किए जाते, बल्कि इस के पीछे कोई मजबूत गारंटी होती है तो फिर नीरव मोदी के मामले में ऐसा कैसे हुआ? आखिर कौन है ये नीरव मोदी?

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नीरव मोदी हीरे की ज्वैलरी का बहुत बड़ा कारोबारी है, जोकि इस खुलासे के पहले ही समझा जाता है कि 1 जनवरी 2018 को 4 बड़े बड़े सूटकेसों के साथ हिंदुस्तान छोड़ चुका है, जिस के बारे में भारत सरकार के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि वह गया कहां या कहां है?

यह अलग बात है कि वह बैंक को लेटर भी लिख रहा है और धमकी भी दे रहा है. बहरहाल, ग्लैमर की दुनिया में भी इस 48 वर्षीय शख्स की खूब धाक थी. उस के नाम यानी ‘नीरव मोदी’ के नाम से हीरों का बड़ा ब्रांड है. कहा जाता है कि मेहमानों को लुभाने के लिए वह पेड़ों को भी हीरों से जड़ देता है. मौडल्स नीरव मोदी के करोड़ों के गहने पहन कर इतराती हैं. फिल्म एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा से ले कर सिद्धार्थ मल्होत्रा तक नीरव मोदी के लिए विज्ञापन कर चुके हैं.

48 साल के नीरव की तीन कंपनियां हैं, जिन में एक हीरों का कारोबार करने वाली ‘फायरस्टार डायमंड’और दूसरी खुद उसी के नाम की ‘नीरव मोदी’. इन्हीं 2 कंपनियों के जरिए ये घोटाला हुआ, जिस की तह में है महत्त्वाकांक्षा.

नीरव अपने ब्रांड, नीरव मोदी को दुनिया का सब से बड़ा लग्जरी ब्रांड बनाना चाहता था. वह दुनिया की डायमंड कैपिटल कहे जाने वाले बेल्जियम के एंटवर्प शहर के मशहूर डायमंड ब्रोकर परिवार से ताल्लुक रखता है. एक वक्त ऐसा था कि वह खुद ज्वैलरी डिजाइन नहीं करना चाहता था, लेकिन पहली ज्वैलरी डिजाइन करने के बाद उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

नीरव मोदी भारत की उस एकमात्र भारतीय ज्वैलरी ब्रांड का मालिक है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है. उस के डिजाइन किए गए गहने हौलीवुड की हस्तियों से ले कर देशी धनकुबेरों की पत्नियों तक की शोभा बढ़ाते रहे हैं. उस के द्वारा डिजाइन किया गया गोलकोंडा नेकलेस 2010 में नीलामी के जरिए 16.29 करोड़ में बिका था. जबकि 2014 में उस के द्वारा डिजायन किया एक हीरा 50 करोड़ रुपए में नीलाम हुआ था.

अपनी ज्वैलरी ब्रांड के दम पर ही वह फोर्ब्स की भारतीय धनकुबेरों की 2017 की सूची में 84वें नंबर पर मौजूद था. उस की माली हैसियत लगभग 12 हजार करोड़ रुपए की है, जबकि माना जा रहा है कि उस की निजी कंपनी 149 अरब रुपए के आसपास की है. दिल्ली में नीरव मोदी का शोरूम डिफेंस कालोनी में है.

इस धनकुबेर ने जो घोटाला किया, उस के संबंध में पंजाब नैशनल बैंक से जो हकीकत बाहर आई है, वह यह है कि बैंक ने एलओयू जारी नहीं किए, बल्कि बैंक के 2 कर्मचारियों ने चोरी से फरजी एलओयू बना कर दिए. इन कर्मचारियों के पास स्विफ्ट सिस्टम का कंट्रोल था, जो 200 देशों की बैंकिंग गतिविधियों के लिए आधिकारिक तकनीक है.

बैंकों की दुनिया का यह एक अति सीक्रेट अंतरराष्ट्रीय कम्युनिकेशन सिस्टम है. यह दुनिया के सभी बैंकों को आपस में जोड़ता है. इस स्विफ्ट सिस्टम से जो संदेश जाते हैं, वो उत्कृष्ट तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कोड में भेजे जाते हैं. एलओयू भेजना, खोलना, उस में बदलाव करने का काम इसी सिस्टम के जरिए किया जाता है. इसी कारण से जब इस सिस्टम के जरिए किसी बैंक को संदेश मिलता है तो उस बैंक को पता होता है कि ये आधिकारिक और सही संदेश है.

लेकिन नीरव को भेजे गए दस्तावेजों में असल में बैंक का कोई दस्तावेज था ही नहीं यानी इस के साथ बैंक ने उस व्यापारी को कोई लिमिट नहीं दी थी, ब्रांच मैनेजर ने स्विफ्ट सिस्टम से इसे भेजने वाले को कोई कागज हस्ताक्षर कर के नहीं दिया कि इसे आगे भेजा जाए. उन्होंने चुपचाप एलओयू भेज दिया. जबकि इस माध्यम से आए किसी संदेश पर कभी कोई बैंक शक नहीं करता. लेकिन बात यह है कि किसी सिस्टम को संभालने वाला आखिर कोई न कोई व्यक्ति ही तो होता है.

सब कुछ हुआ बैंककर्मियों की मदद से

माना जा रहा है कि पीएनबी में इस काम को करने वाले 2 लोग थे, एक क्लर्क जो इस में डेटा डालता था और दूसरा अधिकारी जो इस जानकारी की आधिकारिक पुष्टि करता था. दोनों मिल कर नीरव के लिए काम करते थे. यही नहीं अब पता चला है कि ये दोनों कई सालों तक इसी डेस्क पर काम कर रहे थे, जोकि नहीं होना चाहिए था. इस पद पर काम करने वालों की अदलाबदली होती रहनी चाहिए.

एक और बात है कि स्विफ्ट सिस्टम कोर बैंकिंग से नहीं जुड़ा था. क्योंकि कोर बैंकिंग में पहले एलओयू बनाया जाता है और फिर वह स्विफ्ट के मैसेज से चला जाता है. इस कारण कोर बैंकिंग में एक कौन्ट्रा एंट्री बन जाती है कि अमुक दिन बैंक ने अमुक राशि का कर्ज देने की मंजूरी दी है तो अगले दिन जब बैंक का मैनेजर अपनी फाइलें यानी बैलेंसशीट देखता तो उसे पता चल जाता है कि बैंक ने बीते दिन कितने कर्जे की मंज़ूरी दी है.  लेकिन इस मामले में स्विफ्ट कोर बैंकिंग से जुड़ा हुआ नहीं था.

इन दोनों ने फरजी मैसेज को स्विफ्ट से भेजा, मैसेज भी गायब कर दिया और इस की कोर बैंकिंग में एंट्री नहीं की तो कुछ पता भी नहीं चला.  बैंक का पूरा सिस्टम कैसे बाईपास हो गया, अगर कोई चोर कोई निशान या सबूत ना छोड़े तो उसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. खासकर तब जब कोई संदेह भी नहीं कर रहा है.

कोई संदेह करे तो इस मामले में जांच की जा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ हुआ ही नहीं. वो एक बैंक से पैसे लेते रहे और दूसरे को चुकाते रहे. आज 50 मिलियन के एलओयू खोले, जब तक अगले साल इसे चुकाने की बारी आई तो उन्होंने तब तक 100 मिलियन के और करा लिए. अब उन्होंने पहले लिए गए 50 मिलियन चुका दिए और अगला कर्ज़ किसी और बैंक से ले लिया गया.  इस प्रकार से ये लेनदेन महीनों तक चलता रहा.

सवाल है कि इस पूरे खेल का माटरमाइंड कौन है? जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही है पता चल रहा है कि इस घोटाले का सूत्रधार नीरव मोदी नहीं बल्कि कोई और ही था. यह नीरव की अमेरिकन पत्नी एमी थी, जिस ने इस बड़े घोटाले की साजिश रची. यही नहीं, घोटाले का मास्टरमाइंड होने के साथ साथ नीरव के अमेरिका भागने के साजिश के पीछे भी एमी का ही दिमाग बताया जा रहा है.

माना जा रहा है कि यह बैंकिंग घोटाला हनीट्रैप के जरिए अंजाम दिया गया है. कुछ मौडल्स के जरिए बैंक के उच्च अधिकारियों को घोटाले में शामिल किया गया था. इन मौडल्स को हनीट्रैप के लिए कोऔर्डिनेट करने का काम एमी मोदी का था, जो नीरव मोदी और बौलीवुड के बीच एक कड़ी का काम कर रही थी.

वास्तव में पीएनबी की ब्रेडी फोर्ड ब्रांच के जिस पूर्व डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी को 17 फरवरी, 2018 को गिरफ्तार किया गया, 2013 में उस का ट्रांसफर इस ब्रांच से किया जाना था, जिसे रुकवा दिया गया. इस के बाद  2015 में 5 साल पूरे होने पर भी उस का ट्रांसफर ब्रांच से नहीं किया गया. सीबीआई अब ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि किस के इशारे पर शेट्टी का ट्रांसफर रोका गया.

वास्तव में गोकुलनाथ शेट्टी के ट्रांसफर को रुकवाने में भी मौडल्स और हनीट्रैप का इस्तेमाल हुआ. गोकुलनाथ शेट्टी ने एक बड़ा खुलासा किया है. उस के मुताबिक यह पूरा मामला पीएनबी के बड़े अधिकारियों की जानकारी में था. सीबीआई की तरफ से डायमंड किंग नीरव मोदी और गीतांजलि जेम्स के प्रमोटर मेहुल चौकसी के खिलाफ शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की गई है.

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी इस घोटाले के मुख्य आरोपी हैं और उन्हें देखते ही पकड़ने के लिए लुकआउट नोटिस भी जारी किया जा चुका है. विदेश मंत्रालय ने नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का पासपोर्ट निलंबित कर दिया है और इन के विदेशों के आउटलेट्स पर भी कारोबार न करने का आदेश दिया जा चुका है. रिजर्व बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि इस घोटाले में फंसी राशि का बोझ पीएनबी को खुद उठाना पड़ेगा.

सीबीआई जांच तो कर सकती है, पर पैसा नहीं ला सकती

यह मामला जनवरी में पकड़ा गया और 29 जनवरी, 2018 को इस की जांच सीबीआई से करवाने का अनुरोध किया गया. दूसरे सभी बैंकों ने सारी जिम्मेदारी पीएनबी पर ही डाली है कि उस की तरफ से जारी लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) को सही मानते हुए नियमों के मुताबिक, संबंधित उद्योगपतियों की कंपनियों को फंड उपलब्ध कराए जा रहे थे. ऐसे में घाटा पूरी तरह से पीएनबी को उठाना पड़ेगा.

आरबीआई के सूत्रों का कहना है कि पीएनबी पर सख्ती दिखा कर देश के सभी बैंकों के सामने एक उदाहरण पेश करने की जरूरत है.

अगर यह मान भी लिया जाए कि दूसरे बैंक इस में शामिल थे, तब भी इस की शुरुआत पीएनबी की उस शाखा से हो रही थी, जहां से नीरव मोदी व अन्य रत्न व आभूषण कारोबारियों को नियमों की अनदेखी कर के हीरेमोती आयात करने के लिए लेटर औफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी किए जा रहे थे. इसलिए यह घाटा पीएनबी को ही उठाना चाहिए. घोटाले की राशि 11,360 करोड़ रुपए की है, जो पीएनबी के पूरे बाजार पूंजीकरण का तकरीबन एक तिहाई है.

नीरव ने राजस्थान में बिखेरी हीरों की चमक

देश के सब से बड़े बैंकिंग घोटाले को अंजाम देने वाले नीरव मोदी का राजस्थान से गहरा नाता रहा है. नीरव मोदी की कंपनी गीतांजलि जेम्स की जयपुर में 3 फैक्ट्रियां हैं. इन में 2 फैक्ट्रियां जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में और एक सीतापुरा सेज में है. इन में आभूषण बनाने का काम होता है.

इस कंपनी के प्रमोटर मेहुल चौकसी हैं. इन फैक्ट्रियों पर 15 फरवरी को ईडी ने छापे मारे. इस के अगले दिन जयपुर में 2 अन्य ठिकानों पर ईडी ने छापे मारे. इन पांचों जगहों से 10 करोड़ 44 लाख करोड़ रुपए के हीरे, रंगीन रत्न, जवाहरात और आभूषण जब्त किए गए. साथ ही महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी जब्त किए गए. कंपनी का एक बैंक खाता फ्रीज किया गया. इस खाते में एक करोड़ से ज्यादा की रकम जमा थी.

इस बैंकिंग घोटाले में भरतपुर की लक्ष्मण मंदिर शाखा के मुख्य प्रबंधन आर.के. जैन और सर्किल कार्यालय में कार्यरत अधिकारी पी.सी. सोनी को भी निलंबित कर दिया गया है. ये दोनों अधिकारी मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे थे. बैंक प्रबंधन उन सभी अधिकारियों पर काररवाई कर रहा है, जो 2011 से अब तक मुंबई की ब्रेडी हाउस शाखा में कार्यरत रहे हैं.

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बैंक प्रबंधन को शक है कि इन में कोई अधिकारी भले ही घोटाले में शामिल न हो, लेकिन जांच को प्रभावित कर सकता है. आर.के. जैन ब्रेडी हाउस शाखा में सन 2012 से 2015 तक सेकंड इंचार्ज के रूप में कार्यरत रहे थे. वे भरतपुर की रणजीत नगर कालोनी के रहने वाले हैं. पी.सी. मीणा अप्रैल, 2011 से नवंबर 2011 तक मुंबई की इसी शाखा में कार्यरत थे. वहां वे कौन्ट्रैक्टर औडिटर के पद पर कार्यरत थे. ये दोनों अधिकारी स्केल 4 के थे.

हीरे के कारोबार में पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाला नीरव मोदी भव्य पार्टियों व रईसों के साथ रहने का शौकीन है. उस ने करीब 2 साल पहले जोधपुर में अपने हीरों की चमक से लोगों को चकाचौंध कर दिया था. नीरव मोदी ने अपने ब्रांड के 5 साल पूरे होने पर मारवाड़ के ताज के रूप में मशहूर जोधपुर के उम्मेद भवन में देशविदेश की नामी हस्तियों के साथ 2 दिन के जश्न का आयोजन किया था.

इस आयोजन में फैशन डिजाइनर राघवेंद्र, कविता राठौड़, मनीष मल्होत्रा, योहानन, मिशेल पूनावाला, इशिता, राज, दीप्ति सालगांवकर, चिराग, तनाज जोशी, लीजा हेडन, निखिल व इलिना मेशवानी सहित देशविदेश की नामी मौडल्स ने भाग लिया था. इस जश्न में जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह भी खासतौर से शरीक हुए थे. नीरव मोदी ने इस मौके पर अपने ब्रांड के तहत तैयार किए गए हीरों के आभूषणों की प्रदर्शनी भी लगाई थी. इस प्रदर्शनी के दौरान देशविदेश की टौप मौडल्स ने नीरव के हीरे के आभूषण पहन कर कैटवाक किया था.

काश ! तभी चेत जाते

वैसे देश के बैंकिंग क्षेत्र को हिला देने वाले पीएनबी घोटाले की शुरुआत 2013 में इलाहाबाद बैंक की निदेशक मंडल की बैठक में ही हो गई थी. नई दिल्ली में हुई उस बैठक में गीतांजलि ज्वैलर्स के मालिक मेहुल चौकसी को 550 करोड़ रुपए देने को मंजूरी दी गई थी. मेहुल चौकसी रिश्ते में घोटालेबाज नीरव मोदी के मामा हैं.

बाद में मामाभांजे ने मिल कर बैकों को हजारों करोड़ का चूना लगाया. चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान किया गया था. इलाहाबाद बैंक पीएनबी सहित देश के 4 अन्य सरकारी बैंकों को लीड करता है. आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और गीतांजलि, नक्षत्र और गिन्नी ज्वैलरी चेन चलाने वाले मेहुल चौकसी मूलत: गुजरात के हैं. दोनों मुंबई में रहते हैं.

नई दिल्ली के होटल रेडिसन में 14 सितंबर, 2013 को इलाहाबाद बैंक के निदेशक मंडल की बैठक हुई. इस में भारत सरकार की ओर से नियुक्त निदेशक दिनेश दुबे ने चौकसी को 550 करोड़ लोन देने का विरोध किया.

16 सितंबर को इस बैठक की जानकारी दुबे ने भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर के.सी. चक्रवर्ती को दी. इस के बाद बैंक अधिकारियों को तलब भी किया गया, लेकिन इस के बावजूद मेहुल चौकसी को बैंक की हांगकांग शाखा से भुगतान कर दिया गया.

सवाल है अब पीएनबी एक झटके में इस राशि को किस तरह से उठाएगा. पीएनबी को इस राशि को इसी तिमाही में अपनी बैलेंसशीट में दिखाना होगा. इस बारे में पीएनबी, वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच विचारविमर्श शुरू हो चुका है.

सूत्रों के मुताबिक एक सीधा उपाय यह है कि फिलहाल सरकार की तरफ से पीएनबी को दी जाने वाली पूंजीकरण की राशि बढ़ा दी जाए. दूसरा रास्ता यह है कि केंद्रीय बैंक की तरफ से पीएनबी के लिए विशेष उपाय किए जाएं.

क्योंकि छापों से जो 5100 और इस के बाद 650 करोड़ पकडे़ जाने के दावे किए गए वे सब झूठे हैं. मुश्किल से 1000 करोड़ ही बरामद होंगे.

रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी आए सीबीआई के शिकंजे में

डायमंड कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के बाद कानपुर की रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी भी अचानक सुर्खियों में आ गए. आरोप है कि उन्होंने कई बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाया था.

रोटोमैक एक जानीमानी कंपनी है. इस कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी ने इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, बैंक औफ इंडिया सहित कई सरकारी बैंकों से करीब 2919 करोड़ रुपए का लोन लिया था. यह लोन लेने के बाद उन्होंने न तो इस का ब्याज चुकाया और न ही मूलधन. बल्कि वह खुद भी सामने आने से बचते रहे. पिछले कुछ दिनों से इस बात की भी खबरें आनी शुरू हो गई थीं कि विक्रम कोठारी देश छोड़ कर जा चुके हैं.

सूद और मूलधन न मिलने पर पिछले साल बैंक औफ बड़ौदा ने विक्रम कोठारी को विलफुल डिफाल्टर घोषित कर दिया था. जब विक्रम कोठारी को इस बात की जानकारी हुई तो वह इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.बी. भोसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने उन की याचिका मंजूर कर ली.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने बैंक को आदेश दिया कि विक्रम कोठारी की कंपनी को विलफुल डिफाल्टर लिस्ट से बाहर किया जाए. बैंक को माननीय हाईकोर्ट का आदेश मानने के लिए बाध्य होना पड़ा.

विक्रम कोठारी के खिलाफ बैंक द्वारा सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी थी. सीबीआई को कोठारी की तलाश थी. 18 फरवरी को विक्रम कोठारी कानपुर में एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के लिए आए थे. सीबीआई को पता चला तो उस ने 19 फरवरी की रात 1 बजे उन के घर पर छापा मार कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

2500 करोड़ का विलफुल डिफाल्टर चढ़ा सीबीआई के हत्थे

बैंकों से हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लो और विदेश भाग जाओ. इस तरह की प्रवृत्ति वाले उद्योगपतियों की संख्या भारत में बढ़ती जा रही है. ऐसे उद्योगपति यह काम एक सोचीसमझी साजिश के तहत करते हैं. उन के फरार हो जाने के बाद बैंक और सरकार लकीर पीटती रह जाती हैं.

जिस तरह विजय माल्या बैंकों के 5600 करोड़ रुपए ले कर फरार हो गया, उसी तरह भारत के ही एक और उद्योगपति कैलाश अग्रवाल भी बैंकों से करीब ढाई हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले कर फरार हो गए थे. देश के सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से एक कैलाश अग्रवाल को सीबीआई ने 5 अगस्त, 2017 को गिरफ्तार किया था.

वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर्स कैलाश अग्रवाल और उन के पार्टनर किरण मेहता ने चेन्नै स्थित इंडियन बैंक से 330 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. इस के अलावा उन्होंने एक सोचीसमझी साजिश के तहत अन्य बैंकों से भी 1593 करोड़ रुपए कर्ज लिए. सन 2007 से 2012 के बीच इन्होंने कई बैंकों से वरुण इंडस्ट्रीज और इस की सहयोगी कंपनी वरुण जूल्स के नाम पर 10 सरकारी बैंकों से करीब 1242 करोड़ रुपए का कर्ज लिया.

कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता ने सरकारी बैंकों के अलावा प्राइवेट बैंक्स, फाइनेंस कंपनियों से भी लोन लिया. शेयर्स के बदले बाजार से भी इन्होंने काफी पैसा उठा लिया. लोन की राशि उन्होंने नहीं चुकाई, जिस से सन 2013 में ये डिफाल्टर हो गए. बैंकों ने इन के पास कई नोटिस भेजे, पर ये दोनों यहां होते, तब तो मिलते. दोनों कभी के विदेश जा चुके थे. मार्च 2013 में इंडियन बैंक एंप्लाइज एसोसिएशन द्वारा तैयार की गई विलफुल डिफाल्टर्स की सूची में इन दोनों उद्योगपतियों का नाम भी शामिल था. इंडियन बैंक की शिकायत पर सीबीआई ने वरुण इंडस्ट्रीज के प्रमोटर कैलाश अग्रवाल और किरण मेहता के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और फरजीवाड़े का केस दर्ज कर लिया.

सीबीआई ने जांच की तो पता चला कि ये दोनों सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर्स में से हैं. सब से बड़े विलफुल डिफाल्टर सूरत के डायमंड कारोबारी हैं, जिन पर 7 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. दूसरे नंबर पर लंदन भागे विजय माल्या का नाम आता है, जिन पर 5600 करोड़ रुपए का कर्ज है. कैलाश अग्रवाल भी अपने साथी किरण मेहता के साथ दुबई भाग गए थे. तब से सीबीआई इन के पीछे लगी थी. 5 अगस्त, 2017 को कैलाश अग्रवाल जब दुबई से भारत लौटे, तो सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

सरकार बैंकों को दे चुकी है ढाई लाख करोड़ से ज्यादा

कारपोरेट फ्रौड और बैड लोन की वजह से बैंकों की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है. पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए सरकार प्रयासरत है. सरकार पिछले 11 सालों में बैंकों को ढाई लाख करोड़ से ज्यादा दे चुकी है, इस के बावजूद बैंक एनपीए से उबर नहीं पा रहे हैं.

बजट बनाते समय वित्त मंत्रियों के सामने 2 बड़ी समस्याएं होती हैं. पहली खर्च की जरूरत पूरी करना जिस से सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं को सुधारा जा सके और दूसरी  राजकोषीय घाटे को कम करना. क्योंकि टैक्स का कलेक्शन काफी नहीं होता. इन के अलावा हाल के सालों में वित्त मंत्रालय के सामने एक और नई चुनौती उभर कर सामने आई है और वह चुनौती है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संभालने की.

पिछले 11 सालों में देश के 3 वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, पी. चिदंबरम और अरुण जेटली पब्लिक सेक्टर बैंकों को एनपीए से उबारने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए दे चुके हैं. यह राशि सरकार द्वारा इस साल ग्रामीण विकास के लिए आवंटित की गई राशि के दोगुने से ज्यादा है.

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एसबीआई सहित अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एनपीए के कारण पिछले 2 वित्त वर्ष से घाटे में हैं. बताया जाता है कि इस वित्त वर्ष में भी बैंकों के हालात सुधरते नहीं दिख रहे. भारतीय स्टेट बैंक ने पिछले 18 सालों में पहली बार तिमाही घाटा दर्ज किया.

यही हाल बैंक औफ बड़ौदा का है. सरकारी बैंकों का मानना है कि मुद्रा समेत कई सरकारी योजनाओं के लिए कर्ज देना पड़ रहा है, इस से भी स्थिति बिगड़ी है. जबकि आम लोगों का मानना है कि जब करोड़ों रुपए कर्ज के बकाएदार बैंकों को कर्ज नहीं लौटाएंगे तो बैंकों की स्थिति दयनीय तो होगी ही. Punjab National Bank Scam

Serial Killer: खौफनाक इरादों वाले सीरियल किलर्स

Serial Killers: भारत के कुछ खौफनाक सीरियल किलर्स के अपराधों के तौर तरीके और उन के द्वारा अंजाम दी गई वारदातों के बारे में सुन कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उन्होंने अपने शैतानी दिमाग से डर की जो दहशत फैलाई थी, उस से न केवल सामान्य लोगों की जिंदगी आतंक और भय से गुजरने लगी थी, बल्कि पुलिस महकमा भी सकते में आ गया था.

वैसे अपराधियों को कानूनी शिकस्त मिली, वे सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए. बावजूद इस के नए सिरे से अपराध की घटनाएं होती रहीं. वैसे खूंखार अपराधियों की बात करें तो उन में रमन राघव, चार्ल्स शोभराज, साइनाइड मोहन, देवेंद्र शर्मा, मोहिंदर सिंह पंढेर, एम. जयशंकर, डाक्टर डेथ और संतोष पोल के नाम प्रमुख हैं.

इन  में से कई अपराधियों पर फीचर फिल्में और टीवी सीरियल भी बन चुके हैं. जबकि एक सच्चाई तो यह भी है कि फिल्मों में उन के कुकर्मों और अपराधों को जितनी शिद्दत के साथ फिल्माया गया, वे उस से कहीं अधिक खूंखार और खौफनाक थे.

वैसे अपराधी देश के विभिन्न हिस्सों के रहे हैं. महानगर से ले कर छोटेमोटे कस्बाई इलाकों तक में उन का खौफ बना रहा है. उन में अधिकतर के अपराध सैक्स, हत्या और रेप जैसी वारदातों के रहे हैं.

रमन राघव : एक साइको किलर

मुंबई में 1960 के दशक का दौर था. तब बंबई नाम के इस महानगर में देश के कोनेकोने से लोग रोजगार की तलाश के लिए लगातार आ रहे थे. उन का वहां कोई ठौरठिकाना नहीं था, फिर भी उन के आने का सिलसिला बना हुआ था. वे महानगर में जहांतहां किसी तरह से रहने की जगह बनाते जा रहे थे, जहां सिर्फ सिर छिपाने की जगह थी. दैनिक क्रिया के लिए सार्वजनिक शौचालय थे. नहानेधोने के लिए भी वैसी खुले में कोई जगह थी. सोने के लिए सड़कों का फुटपाथ भी उन के लिए कम पड़ने लगा था.

रोजगार का इंतजाम हो जाने के बाद लोग जैसेतैसे चकाचौंध की जिंदगी में किसी तरह से गुजारा कर ले रहे थे. उन में अधिकतर गरीब और मजदूर किस्म के लोगों के छोटेछोटे परिवार थे. उन के नसीब में घरेलू परदा और सुरक्षा नाम मात्र की थी. वे कब किसी घटना या दुर्घटना के शिकार हो जाएं, कहना मुश्किल था. उन में या फिर उन से बाहर अपराधी किस्म के लोग भी थे, जिन की नजर भोलीभाली लड़कियों और अकेली औरतों पर रहती थी. ऐसा ही एक व्यक्ति रमन राघव था.

उस के बारे में बहुत अधिक रिकौर्ड तो नहीं है, सिवाय इस के कि उस ने कई जघन्य अपराध किए. हालांकि तब यह माना गया था कि वह दक्षिण भारत का रहने वाला था. 1965-66 के समय में मुंबई में फुटपाथ पर सोने वाले लोगों की हत्याओं की खबरों ने मुंबई पुलिस की नाक में दम कर रखा था. गरीब बस्तियों में उस के नाम का भय बना हुआ था. उस के ताबड़तोड़ अपराध ने सभी को सन्न कर दिया था. पुलिस उस के हुलिए तक से अनजान थी.

रात के अंधेरे में जब किसी बेसहारे की मौत हो जाती थी, तब पुलिस मरने वाले की शिनाख्त तो कर लेती थी, लेकिन उस हत्यारे तक नहीं पहुंच पाती थी. पुलिस को सभी कत्ल में एक जैसे तरीके के अलावा और कुछ नहीं मालूम हो पाया था. वह तरीका था लोगों के सिर पर किसी भारी चीज से हमला किया जाना. हत्यारा एक ही वार में व्यक्ति को मौत की नींद सुला देता था.

सिर्फ एक साल के अंदर ही करीब डेढ़ दरजन लोगों पर इस तरह के जानलेवा हमले हुए थे, जिन में 9 लोग मारे गए थे. इस अनजान हमलावर को पकड़ने में मुंबई पुलिस पूरी तरह से नाकाम थी. लोग शाम होते ही अपनेअपने घरों की ओर लौटने लगे थे. स्थिति यहां तक आ गई थी कि लोग अपनी सुरक्षा के लिए साथ में लकड़ी या डंडा रखने लगे थे. उस के बाद कुछ समय तक वारदातें नहीं हुईं.

पुलिस जांच में जुटी थी और कई घायलों की मदद से इस हमलावर का स्केच बनवाया गया, जिस के आधार पर मुंबई क्राइम ब्रांच पुलिस के 27 अगस्त, 1968 को इस खूंखार हत्यारे रमन राघव को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. पुलिस पूछताछ में उस ने बताया कि 3 साल के अपने आपराधिक जीवन में करीब 40 लोगों को मौत के घाट उतार चुका था. जबकि पुलिस का मानना था कि यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है. पुलिस ने पूछताछ में यह भी पाया कि रमन ने फुटपाथ पर सोए बुजुर्ग महिला, पुरुष, युवा और बच्चों सभी को अपना शिकार बनाया.

पूछताछ के दौरान पुलिस ने जब उस की मैडिकल जांच करवाई, तब डाक्टरों के पैनल ने उसे मानसिक रूप से विकृत बताया. फिर निचली अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद उसे मौत की सजा सुना दी. इस सब के बीच रमन राघव ने सजा के खिलाफ कोई अपील भी नहीं की. हाईकोर्ट ने 3 मनोवैज्ञानिकों के पैनल से उस के मानसिक स्तर की फिर से जांच कराई.

मनोचिकित्सकों के पैनल द्वारा किए गए कई घंटों के इंटरव्यू के बाद निष्कर्ष निकला कि वह दिमागी रूप से बीमार है. ऐसे में उस की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. इस के बाद उसे पुणे की यरवदा जेल में भेज दिया गया, जहां कई सालों तक उस का इलाज भी चला. साल 1995 में साइको किलर रमन राघव की किडनी की बीमारी के चलते सस्सून अस्पताल में मौत हो गई.

साल 2016 में उस की जीवनी पर एक हिंदी फिल्म ‘रमर 2.0’ भी बनी थी, जिस में मुख्य भूमिका रघुवीर यादव ने निभाई थी. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी एक अहम किरदार में थे.

डा. देवेंद्र शर्मा : बेरहमी से 100 जानें लेने वाला हैवान

सीरियल किलर डा. देवेंद्र शर्मा की हैवानियत को दिल्ली, गुड़गांव, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोग 2 दशक बाद भी याद कर सिहर जाते हैं. उस के खौफनाक किस्सों में किडनी रैकेट, फरजी गैस एजेंसी और कारों की चोरी के कारनामे आज भी सब की जुबान पर हैं. लोगों का कहना है कि उस ने 100 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिन में कैब ड्राइवर और दूसरी गाडि़यों के ड्राइवर थे. उन की लाशों को यूपी की मगरमच्छों वाली नहर में फेंक दिया था.

साल 2002 और 2004 के बीच उस के कारनामे ज्यादा चर्चित हुए. वह कारें और दूसरे वाहनों को चुराया करता था. उस ने करीब 40 ड्राइवरों को मौत के घाट उतार दिया था. हैरानी की बात यह थी कि वह एक आयुर्वेदिक चिकित्सक था. अपने पेशे से अलग लगातार आय के अन्य साधनों पर नजर रखे हुए था. हत्याओं में से 50 को कुबूल करने के बाद उसे 2008 में मौत की सजा सुना दी गई थी. वह ऐसा सीरियल किलर था, जो 50 कत्ल करने के बाद उस की गिनती भूल गया था. बाद में उस ने माना कि वह 100 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है.

वह 2004 में पकड़ा गया था. फिर जेल में अच्छे बर्ताव के कारण उसे जनवरी 2020 में 20 दिन की पैरोल मिली थी. पैरोल खत्म होने के बाद भी वह जेल नहीं पहुंचा बल्कि वह दिल्ली के मोहन गार्डन में छिप कर रहने लगा. यहां वह एक बिजनसमैन को चूना लगाने वाला था, लेकिन पुलिस को उस के यहां होने की भनक लगी और आखिर में उसे पकड़ लिया गया. दिल्ली में पकड़े गए देवेंद्र को किडनी मामले का अपराधी करार दिया गया था.

देवेंद्र शर्मा डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजस्थान में निजी प्रैक्टिस करता था. उस में उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितने कि वह उम्मीद किए हुए था. साल 1984 में देवेंद्र शर्मा ने आयुर्वेदिक मेडिसिन में अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर के राजस्थान में क्लीनिक खोला था. फिर 1994 में उस ने गैस एजेंसी के लिए एक कंपनी में 11 लाख रुपए का निवेश किया था. लेकिन कंपनी अचानक गायब हो गई, फिर नुकसान के बाद उस ने 1995 में फरजी गैस एजेंसी खोल ली.

उस के बाद शर्मा ने एक गैंग बनाया, जो एलपीजी सिलेंडर ले कर जाते ट्रकों को लूट लेता था. इस के लिए वे लोग ड्राइवर को मार देते और ट्रक को भी कहीं ठिकाने लगा देते. इस दौरान उस ने गैंग के साथ मिल कर करीब 24 मर्डर किए. वह अपने पेशे से ही जुड़ कर पैसा कमाने का काम करने लगा. उस के पास उन मरीजों की संख्या अच्छीखासी थी, जिन की किडनी खराब हो चुकी थी. उन्हें वह आयुर्वेदिक दवाइयां दिया करता था. उस ने उपचार करते हुए देखा कि बहुतों की दोनों किडनियां खराब हैं, जिसे ट्रांसप्लांट करने की जरूरत है.

फिर क्या था, देवेंद्र शर्मा किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह में शामिल हो गया. वह किडनी डोनर का इंतजाम करने लगा. कार के ड्राइवर को इस का निशाना बनाया और उन्हें मार कर जरूरतमंदों को उस की किडनी बेच कर मोटा पैसा बनाने लगा. इस काम में उसे दोहरा लाभ हुआ. किडनी बेचने के साथसाथ देवेंद्र शर्मा ने लूटी हुई कारों से भी पैसे कमाए. उस ने 7 लाख रुपए प्रति ट्रांसप्लांट के हिसाब से 125 ट्रांसप्लांट करवाए. ड्राइवर की बौडी को नहर में फेंकने के बाद कैब को यूज्ड कार बता कर बेच देता.

वह फरजी गैस एजेंसी भी चलाने लगा. अपनी फरजी गैस एजेंसी के लिए जब उसे सिलेंडर चाहिए होते तो वह गैस डिलिवरी ट्रक को लूट लेता था और उस के ड्राइवर को मार देता था. देवेंद्र ने पूरी गैंग तैयार कर रखी थी. वे गाडि़यों की लूट से ले कर लाश को  ठिकाने लगाने के लिए उसे उत्तर प्रदेश में कासगंज स्थित हजारा नहर में फेंक दिया करता था. इस नहर में बड़ी संख्या में मगरमच्छ रहते हैं.

साइनाइड किलर मोहन : 20 महिलाओं की हत्या

सीरियल किलर मोहन कुमार को साइनाइड किलर के नाम से भी जाना जाता है. मोहन कुमार को 20 महिलाओं की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने के बाद, वह उन्हें गर्भनिरोधक गोलियां खिलाता था. दरअसल, वे गर्भनिरोधक गोलियां नहीं, बल्कि साइनाइड की गोलियां हुआ करती थीं. उस ने ये जुर्म साल 2005 से 2009 के बीच किए थे. उस के बारे में कहा जाता है कि वह कई बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय घोटालों में भी शामिल था. उसे दिसंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

मोहिंदर सिंह पंढेर : निठारी हत्याकांड

साल 2005 और 2006 के बीच दिल्ली के नोएडा इलाके में निठारी हत्याकांड काफी चर्चा में रहा था. इस खौफनाक घटना की पूरे देश में बहुत चर्चा हुई. मोहिंदर सिंह पंढेर और सुरिंदर कोली दोनों पर निठारी में 16 से अधिक बच्चों की हत्या और बलात्कार का आरोप था.मोहिंदर सिंह पंढेर दिल्ली के नोएडा का एक धनी व्यापारी था. 2005 से 2006 के बीच निठारी गांव के 16 लापता बच्चों की खोपड़ी उस के घर के पीछे एक नाले में मिली थी. उस इलाके के सभी लापता बच्चों की लाशें पंढेर के घर के पास ही मिली थीं.

पुलिस ने पंढेर और उस के नौकर सुरिंदर कोली को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर रेप, नरभक्षण और मानव अंगों की तस्करी का आरोप लगाया गया था. कुछ आरोप सही थे तो कई अफवाहें भी थीं. कोली और पंढेर दोनों को 2017 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

एम. जयशंकर : रेप और मर्डर

एम. जयशंकर पर 30 महिलाओं से रेप और 15 महिलाओं की हत्या का आरोप था. उस ने 2008 से 2011 के बीच रेप और हत्या की घटनाओं को अंजाम दिया था. उस ने तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 30 बलात्कार, 15 हत्याएं और कई डकैती की घटनाओं को अंजाम दिया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बंगलुरु की एक जेल में बंद कर दिया गया था. हालांकि उसे  मानसिक रूप से बीमार भी बताया गया था. बाद में जेल से भागने के कई असफल प्रयासों के बाद एम. जयशंकर ने 2018 में आत्महत्या कर ली थी.

डाक्टर डेथ : महिलाओं को जिंदा दफनाने वाला

वैसे दुनिया भर में डाक्टर को प्राणरक्षक माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के सातारा में एक ऐसा डाक्टर सामने आया, जिसे ‘डाक्टर डेथ’ का नाम दिया गया. इस डाक्टर की कहानी इतनी खौफनाक थी कि उस के कारनामे उजागर होते ही सभी चौंक पड़े थे. डाक्टर ने पुलिस को बताया कि उस ने 5 औरतों को जिंदा दफना दिया था उन की कब्रों के ऊपर नारियल के पेड़ भी लगा दिए थे.

डाक्टर डेथ के इस सनकी रवैए का खुलासा 2016 में तब हुआ, जब उसे पुलिस ने एक कत्ल के मामले में गिरफ्तार किया था. महाराष्ट्र के पुणे से करीब 120 किलोमीटर दूर सातारा में रहने वाले इस कातिल डाक्टर की पहचान संतोष पोल के रूप में की गई थी. कातिल डाक्टर ने पुलिस को अपने कुबूलनामे में बताया कि वह साल 2003 से ऐसी वारदातों को अंजाम देता आया है.

संतोष पोल पेशे से एलेक्ट्रोपैथ डाक्टर था और उस के पास बैचलर औफ इलैक्ट्रोहोमियोपैथी मैडिसिन एंड सर्जरी (बीईएमएस) की डिग्री थी. इस के अलावा उस ने मुंबई के घोटवडेकर अस्पताल में 8 साल तक नौकरी भी की थी. वहां काम करने वाले वरिष्ठ डाक्टरों का मानना था कि वह मैडिकली सर्टिफाइड नहीं था. संतोष खुद को डाक्टर बताने के साथसाथ समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट भी बताता था.

साल 2016 में वेलम गांव की आंगनबाड़ी कार्यकत्री मंगला जेधे लापता हो गई. उस के परिजनों ने इस का आरोप संतोष पर लगा दिया था. शिकायत में नामजद होने के बाद पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन सबूत नहीं होने की वजह से उसे छोड़ दिया गया. मामले की चल रही जांच में सामने आया कि मंगला के फोन की आखिरी लोकेशन संतोष पोल के फार्महाउस के पास दिखी और मंगला का फोन ज्योति नाम की नर्स के पास से बरामद किया गया.

इस के बाद पूछताछ में ज्योति ने बताया कि संतोष पोल ने ही मंगला जेधे की हत्या की और उस के शव को दफना दिया. उधर संतोष को जैसे ही यह सब पता चला तो वह मुंबई भाग गया. ज्योति के द्वारा बताई गई जगह पर खुदाई की गई, तो एक कंकाल बरामद हुआ और लैब रिपोर्ट्स में साबित हो गया कि वह कंकाल मंगला जेधे का ही था. गिरफ्तारी के बाद संतोष ने बताया कि उस ने 13 सालों में 5 महिलाओं और एक पुरुष की हत्या की है. इस के बाद पुलिस के जरिए चारों महिलाओं के कंकाल बरामद कर लिए गए, लेकिन एक पुरुष का कंकाल बरामद नहीं हुआ.

संतोष ने उस की लाश नदी में फेंक दी थी. उस ने बताया कि वह महिलाओं को नशे का इंजेक्शन देता था, फिर नशे की हालत में रहने के दौरान ही उन्हें फार्महाउस में दफना देता था. साथ ही लाशों के सड़ने की गंध छिपाने के लिए उस ने कुछ मुर्गियां भी पाल रखी थीं. पुलिस ने इस ‘डाक्टर डेथ’ के घर से नशीली दवाएं, इंजेक्शन, ईसीजी मशीन और आरटीआई से जुड़े कुछ दस्तावेज बरामद किए थे.

संतोष ने बताया था कि वह हर हत्या के बाद एक जेसीबी बुलाता था और नारियल के पेड़ों को लगाने के लिए गड्ढे खुदवाता था, लेकिन इन गड्ढों में लाशें दफना कर उन के ऊपर नारियल के पेड़ लगा दिया करता था. Serial Killer

Canada: प्यार पर कोई जोर नहीं

Canada: विदेश में रह रहे गुरजिंदर ने अगर भारतीय सभ्यता से इतर वेस्टर्न कल्चर अपना कर अपनी प्रेमिका मेपल को उसी नजरिए से देखा होता तो आज मेपल जिंदा होती और उसे जेल में उम्रकैद भी न काटनी पड़ती. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया और…

रोज की तरह 28 सितंबर, 2011 को भी मेपल बटालिया सुबह यूनिवर्सिटी जाने के लिए तैयार हुई तो बड़ी बहन रोजलीन ने कहा, ‘‘आज मैं ने कार अच्छे से साफ कर दी है, कई दिनों से साफ नहीं हुई थी न. तू मेरा एमपी-3 प्लेयर भी ले जा. म्यूजिक सुनते हुए ड्राइविंग में बड़ा मजा आता है.’’

‘‘ठीक है दीदी, लेकिन मुझे यूनिवर्सिटी जल्दी पहुंचना है. क्लास से पहली स्टडी भी करनी है. मुझे म्यूजिक का ज्यादा शौक है नहीं, सिर्फ खाली समय में खुद को हल्का महसूस करने के लिए सुन लेती हूं.’’ मेपल ने कहा.

‘‘चल ठीक है, अब देर मत कर.’’ रोजलीन ने कहा.

मेपल किताबें और पर्स ले कर कार में बैठी और यूनिवर्सिटी चली गई. वह कनाडा के सुर्रे की साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में हेल्थ साइंस ग्रैजुएशन की प्रथम वर्ष की छात्रा थी.  मेपल ही नहीं, उस का पूरा परिवार कनाडा का नागरिक था. लेकिन वे मूलरूप से भारत के रहने वाले थे. मेपल भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में पैदा हुई थी. उस के परिवार में पति हरकीरत उर्फ हैरी बटालिया, मां सरबजीत, 2 बड़ी बहनें रोजलीन उर्फ रोजी और सिमरन थीं.

मुंबई में रहने के दौरान हरकीरत ड्राइवर की नौकरी कर के किसी तरह परिवार को पाल रहे थे. आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. मेपल 3 महीने की थी, तभी हरकीरत के किसी दोस्त ने उस से कहा कि यहां रह कर उस की आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं होने वाला है. उस की 3 बेटियां हैं, उन्हें पढ़ानेलिखाने और शादी करने में ही उस की जिंदगी खप जाएगी. फिर भी वह पैसों के अभाव में न बेटियों को अच्छी शिक्षा दिला पाएगा और न अच्छे घरों में उन की शादियां कर पाएगा.

‘‘तो फिर क्या करूं?’’ हरकीरत ने पूछा था.

‘‘तू कनाडा चला जा. उसे तो मिनी पंजाब कहा जाता है. तुझे वहां कोई न कोई रोजगार मिल ही जाएगा. कुछ नहीं होगा तो टैक्सी चला कर अच्छी कमाई कर लेगा. वहां रह कर बेटियों को अच्छी तरह पढ़ा भी लेगा और अच्छे घरों में उन की शादियां भी कर देगा.’’ दोस्त ने कहा.

‘‘भाई, तू कह तो ठीक रहा है, मेरे कई रिश्तेदार वहां हैं. जब वे गए थे, खस्ताहाल थे, अब दौलत में खेल रहे हैं. मैं भी कोशिश करता हूं.’’ हरकीरत ने कहा.

और फिर किसी तरह कोशिश कर के हरकीरत परिवार सहित कनाडा चला गया. कुछ दिनों तक उस ने वहां टैक्सी चलाई, उस के बाद अपना रोजगार कर लिया. धीरेधीरे रोजगार बढ़ा तो आर्थिक स्थिति बेहतर होती गई. बेटियों का अच्छे स्कूल में एडमिशन करा दिया. उस की दोनों बड़ी बेटियां पढ़ाई में बस ठीकठाक कही जा सकती थीं. लेकिन सब से छोटी मेपल काफी तेज दिमाग की थी. वह स्कूल की हर तरह की गतिविधियों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. हरकीरत को अपनी इस बेटी से काफी उम्मीदें थीं. मेपल पढ़ाई में जितनी तेज थी, उतनी ही खूबसूरत भी थी. हंसमुख और खुले विचारों की भी थी.

अपनी दोनों बहनों के मुकाबले मेपल का हाथ भी ज्यादा खुला था. वह खुल कर खर्च करती थी. उस का कहना था कि जिंदगी खुल कर जीने के लिए है. एकएक पल ऐसा जीना चाहिए कि यादगार बन जाए. स्कूल में उस की दोस्ती लड़कियों से ही नहीं, तमाम लड़कों से भी थी. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मेपल ने डाक्टर बनने के लिए हेल्थ साइंस में एडमिशन लिया था. लेकिन वह सिर्फ स्टूडेंट ही नहीं थी, मौडल और अभिनेत्री भी थी. वह मौडलिंग तो कर ही रही थी, ‘डायरी औफ विंपी किड’ फिल्म में छोटी सी भूमिका भी की थी. सेंट्रल सिटी मौल द्वारा आयोजित मौडल खोज प्रतियोगिता में हिस्सा ले कर वह फाइनल राउंड तक पहुंच गई थी. उस का फाइनल होना अभी बाकी था.

मेपल यूनिवर्सिटी पहुंची तो पार्किंग में ही उस की एक दोस्त मिल गई. दोनों पार्किंग की एक बैंच पर बैठ कर पढ़ाई कर करने लगीं. अचानक मेपल किताब ले कर उठी और टहलते हुए पढ़ने लगी. उसी बीच उस से कूछ दूरी पर एक कार आ कर रुकी. कार से 2 लड़के उतरे. कार चला रहे युवक ने इधरउधर देखा और स्वचालित आधुनिक रिवौल्वर से मेपल पर गोलियां चला दीं. गोलियों की गूंज से कैंपस गूंज उठा. गोलियों की आवाज सुन कर मेपल की सहेली दौड़ कर जब तक उस के पास पहुंचती, वह लहूलुहान हो जमीन पर गिर चुकी थी. गोलियां चलाने वाला लड़का अपने साथी के साथ कार से भाग गया था.

यूनिवर्सिटी स्टाफ, प्रोफेसर, स्टूडेंट एकत्रित हो गए. घटना की सूचना पुलिस को भी दे दी गई थी. सुर्रे सिटी के तमाम पुलिस अधिकारी कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच गए थे. एंबुलैंस द्वारा मेपल को सिटी अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. घटना की सूचना मेपल के पिता हरकीरत को भी दे दी गई थी. वह पत्नी और बड़ी बेटी रोजलीन के साथ अस्पताल पहुंचे. इस के बाद लाश का पोस्टमार्टम कराया गया. उस के बाद लाश उन्हें सौंप दी गई. 8 अक्तूबर को उन्होंने डल्टास रिवर के किनारे उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पूरा परिवार मेपल की मौत से काफी दुखी था.

पुलिस को मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोलियां थोड़ी दूर से चलाई गई थीं. 2 गोलियां उस के दिल के करीब, एक पेट में, एक माथे पर तथा एक गरदन पर लगी थी. ये पांचों गोलियां एक ही रिवौल्वर से चलाई गई थीं. हमलावर कौन थे? यह किसी को पता नहीं था. उस समय यूनिवर्सिटी कैंपस स्थित पार्किंग में खास चहलपहल नहीं थी. 2-4 स्टूडेंट ही इधरउधर थे. क्योंकि उस समय यूनिवर्सिटी के क्लास शुरू होने में काफी देर थी. मेपल, उस की सहेली और जो अन्य स्टूडेंट थे, वे पढ़ने की गरज से समय से पहले आ गए थे. वहां के शांत वातावरण में ठीक से पढ़ाई हो जाती थी.

मेपल की सहेली बस इतना ही बता पाई थी कि पढ़तेपढ़ते अचानक मेपल उठी और टहलते हुए पढ़ने लगी. अचानक गोलियां चलने की आवाज से वह चौंकी. जब उसे लगा कि गोलियां उसी पर चलाई गई हैं तो वह उस की ओर भागी. जब उस ने पलट कर देखा तो हमलावर कार में बैठ रहे थे. इसलिए उस ने सिर्फ उन की पीठ देखी थी, शक्ल नहीं. करीब 50 पुलिस अधिकारी इस मामले की जांच में लगे थे. मेपल के दोस्त सायर से पूछताछ की गई. उस ने बताया, ‘‘मेपल समझदार और खुशमिजाज लड़की थी. सालों से उस का प्रेमसंबंध पंजाबी समुदाय के गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी से था, जो उस की हत्या के कुछ दिनों पहले ही टूटा था. गुरजिंदर उस का पहला प्रेम था.

प्रेमसंबंध टूटने के बाद दोनों के बीच तनाव चल रहा था. गुरजिंदर अकसर उस का पीछा करता था. हत्या से पहले 24 सितंबर, 2011 को मेपल ने सुर्रेटिम होर्टंस में गुरजिंदर धालीवाल पर हमले का आरोप लगाया था. उस ने अपने बयान में कहा था कि जिस समय वह अपने एक बौयफ्रैंड के साथ कौफी शौप में थी तो गुरजिंदर वहां पहुंच गया था. लड़ाईझगड़ा करते हुए वह मारपीट पर उतारू हो गया था. उस ने उसे देख लेने की धमकी भी दी. बाद में मेपल ने अपने बयान वापस ले लिए थे, जिस से गुरजिंदर पर कोई केस नहीं चला था.’’

हरकीरत ने भी गुरजिंदर पर शक जाहिर किया था. गुरजिंदर शक के दायरे में था. लेकिन उस से पूछताछ से पहले पुलिस यूनिवर्सिटी में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देख लेना चाहती थी. फुटेज में यह तो दिख रहा था कि मेपल की हत्या में 2 युवकों का हाथ है, जो कार से वहां आए थे. लेकिन उस फुटेज से उन की पहचान करना आसान नहीं था.

पुलिस ने गुरजिंदर को हिरासत में ले लिया. उस से लंबी पूछताछ की गई, लेकिन उस के चेहरे के हावभाव और बातों से जरा भी नहीं लग रहा था कि उस ने किसी की हत्या की है. पुलिस के पास उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत भी नहीं थे, इसलिए उसे छोड़ दिया गया. लेकिन पुलिस उस की चोरीछिपे निगरानी करती रही. पुलिस ने मेपल और गुरजिंदर के मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स भी निकलवाई थी. इस से भी किसी खास आधार पर गुरजिंदर को दोषी करार नहीं दिया जा सकता था.

हालांकि कामयाबी नहीं मिल रही थी, फिर भी पुलिस हार मानने को तैयार नहीं थी. मेपल जिस मौडल खोज प्रतियोगिता में भाग ले रही थी, उस का फिनाले 15 अक्टूबर, 2011 को होना था. मेपल के विजेता बनने की संभावना थी. कहीं किसी प्रतिद्वंद्वी ने उस की हत्या न करा दी हो, पुलिस ने इस की भी जांच की. दूसरी ओर आयोजकों ने मेपल की हत्या से दुखी हो कर प्रतियोगिता को जनवरी तक के लिए टाल दिया था.

धीरेधीरे 5 महीने बीत गए, मेपल की हत्या की गुत्थी नहीं सुलझी. पुलिस ने तमाम अपराध करने वालों से भी पूछताछ कर ली थी, ड्रग्स रैकट से भी जोड़ कर छानबीन की गई थी, पर कोई तथ्य हाथ नहीं लगा था. न तो मेपल किसी तरह के ड्रग्स की आदी थी और न ही उस के किसी दोस्त के ड्रग्स गिरोह से किसी प्रकार के संबंध थे. कहीं ये सैक्स माफियाओं का काम न हो, इस दृष्टि से भी जांच की गई थी, लेकिन सारी कोशिशें बेकार गई थीं.

मेपल की हत्या को एक साल गुजर गया. 28 सितंबर, 2012 को उस की पहली बरसी थी. बरसी वाले दिन सुर्रे पार्क में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जिस में करीब 2 सौ लोगों ने भाग ले कर मेपल को श्रद्धांजलि दी. इस सभा में लोगों ने कामना की कि उस का हत्यारा जल्द से जल्द पकड़ा जाए, ताकि उस की आत्मा को शांति मिल सके.

इसी आयोजन में हरकीरत बटालिया ने बटालिया परिवार की ओर से मेपल स्कौलरशिप मेमोरियल फंड्स की स्थापना की घोषणा की. इस संस्था की ओर से साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी, जिस में मेपल पढ़ती थी, में आर्ट्स और हेल्थ साईंस पढ़ने वाली आर्थिक रूप से कमजोर लड़कियों की अर्थिक मदद का ऐलान किया गया. बटालिया परिवार की ओर से इस संस्था में 50 हजार डालर की राशि दान स्वरूप दी गई. इस संस्था में सामाजिक कार्य करने वाले तथा व्यवसाई भी दान कर सकते थे.

इस के अलावा उन्होंने पुलिस से लिखित रूप से मेपल के हत्यारे को पकड़ने की अपील करने के साथ अब तक की गई कोशिशों के लिए धन्यवाद भी दिया. पुलिस के लिए मेपल हत्याकांड पहेली बना हुआ था. पुलिस ने हर तरकीब अपना ली थी, पर कोई सुराग नहीं मिला था. लेकिन उस के मुखबिर अब भी मुस्तैद थे और गुरजिंदर तथा उस के खास दोस्तों की अभी तक निगरानी रखी जा रही थी. आखिर पुलिस को एक दिन सफलता मिल ही गई. 1 दिसंबर की रात गुरजिंदर का 22 वर्षीय दोस्त गुरसिमर बेदी एक बार में दोस्तों के साथ शराब पी रहा था. तभी उस के मुंह से निकला, ‘‘देखो, एक साल पहले हम ने कितनी होशियारी से मेपल की हत्या की कि आज तक पुलिस कोई सुराग नहीं लगा पाई.’’

अगली ही टेबल पर बैठे पुलिस के मुखबिर ने यह बात सुन ली. उस ने तुरंत पुलिस को फोन कर के बुला लिया. मुखबिर के इशारे पर गुरसिमर को पकड़ लिया गया. खुद को पुलिस से घिरा देख वह घबरा गया और उस का सारा नशा उतर गया. उस की समझ में आ गया कि अब बचना मुश्किल है. उसे पुलिस स्टेशन लाया गया, जहां सीधे पूछा गया कि मेपल बटालिया की हत्या किस ने की और क्यों की?

बिना किसी लागलपेट के गुरसिमर ने सच बोल दिया, ‘‘मेपल की हत्या गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी ने की थी. उस के साथ मैं भी था. मैं ने ही उसे वह रिवौल्वर उपलब्ध कराई थी, जिस से मैपल को गोली मारी गई थी. उस ने यह हत्या क्यों की, यह मुझे मालूम नहीं. मैं तो उस का साथ दोस्ती की वजह से देने को तैयार हो गया था. मेरी समझ में अभी तक नहीं आया कि दोनों गहरे दोस्त थे, एकदूसरे को प्यार भी करते थे, इस के बावजूद उस ने मेपल की हत्या कर दी?’’

‘‘इस समय वह कहां मिलेगा?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘अपने घर पर.’’ गुरसिमर ने कहा.

गुरसिमर बेदी को साथ ले कर पुलिस ने गुरजिंदर के घर छापा मारा. उस समय रात के साढ़े 12 बज रहे थे. वह अपने बैडरूम में सो रहा था. उस के घर वालों से उस के बारे में पूछा गया तो उन्होंने पूछा, ‘‘आप लोग उसे क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘एक साल पहले उस ने एक लड़की की हत्या की थी. उसी अपराध में उसे गिरफ्तार करना है.’’ एक पुलिस अधिकारी ने कहा.

‘‘वह ऐसा कतई नहीं कर सकता, आप को कोई गलतफहमी हुई है. वह एक होनहार और नेक चालचलन वाला लड़का है.’’ उस के पिता ने कहा.

घरवालों की लाख कोशिश के बावजूद पुलिस गुरजिंदर को गिरफ्तार कर के पुलिस स्टेशन ले आई. वह बारबार कहता रहा, ‘‘मैं ने मेपल की हत्या नहीं की. मैं तो उसे दिल की गहराई से प्यार करता था. भला मैं उस की हत्या कैसे कर सकता हूं.’’

गुरसिमर को उस के सामने बैठा कर एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘इस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है और सबूत भी दे दिए हैं. तुम्हारे पास बचाव का अब कोई रास्ता नहीं है. सच्चाई स्वीकार करने में ही तुम्हारी भलाई है.’’

‘‘मैं ने किसी की हत्या नहीं की.’’ गुरजिंदर अपनी बात पर अड़ा रहा.

‘‘ठीक है, अब लाई डिटेक्टर से ही पता चलेगा कि तुम सच बोल रहे हो या झूठ?’’ पुलिस अधिकारी ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया.

इस के बाद गुरजिंदर घबरा गया. झूठ के सहारे आगे चलना उसे कठिन लगा. ऐसे में उसे सच बोल देना ही ठीक लगा. उस ने कहा, ‘‘हां, मैं ने ही की है मेपल की हत्या. मैं उस की हत्या करना नहीं चाहता था. मैं तो उस के साथ सारी जिंदगी बिताना चाहता था, लेकिन उस ने काम ही ऐसा किया कि मजबूर हो कर मुझे उस की हत्या करनी पड़ी.’’

19 वर्षीया मेपल बटालिया जिस एंवर करिक सैकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी, उसी में गुरजिंदर भी पढ़ता था. मेपल जब हाईस्कूल में पढ़ रही थी, तभी उस की मुलाकात गुरजिंदर से हुई थी. दोनों ने एकदूसरे को आकर्षित किया तो उन के बीच दोस्ती हो गई. बाद में उन्हें पता चला कि उन के परिवार एकदूसरे से परिचित हैं. इस से दोस्ती और भी गहरी हो गई. दोनों का एकदूसरे के घर भी आनाजाना होने लगा. दोनों की मम्मियां अकसर साथसाथ शौपिंग के लिए जाती थीं.

मेपल चंचल स्वभाव की थी, जबकि गुरजिंदर गंभीर और शर्मीला. विपरीत स्वभाव का होने के बावजूद दोनों में खूब पटती थी. मेपल सैकेंडरी में पहुंची तो दोनों का आकर्षण और बढ़ गया. गुरजिंदर यूनिवर्सिटी में पहुंच गया था. नजदीकी तो पहले से ही थी. अब दोनों इस दोस्ती को एक रिश्ते का नाम देना चाहते थे. गुरजिंदर शर्मीले स्वभाव की वजह से दिल की बात जुबान पर नहीं ला पाया. पर मेपल ने पहल करते हुए एक दिन प्रपोज कर दिया, ‘‘क्या मेरे साथ डेट पर चलोगे?’’

दोनों अकसर साथसाथ घूमते थे, पर डेट पर जाने का अर्थ दूसरा ही था. इसलिए मेपल के प्रस्ताव पर गुरजिंदर शरमा गया. उस ने मुसकरा कर सिर हिला दिया. छुट्टी के दिन दोनों ने डेट पर जाने का प्रोग्राम बनाया. गुरजिंदर अपनी कार से उसे डोनियाल पार्क ले गया, जहां वे एकांत में बैठ कर बातें करने लगे. अचानक मेपल ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुझ से प्यार करते हो?’’

गुरजिंदर इधरउधर देखने लगा. उसे जवाब न देते देख मेपल ने अपना प्रश्न दोहराया. इस पर उस ने सिर्फ यही कहा, ‘‘क्या तुम…?’’

‘‘पहले तुम बताओ, सवाल पहले मैं ने किया है तो जवाब पहले तुम दोगे.’’ मेपल ने शरारती अंदाज में कहा.

‘‘अगर मैं हां कहूं तो.’’ गुरजिंदर ने कहा.

‘‘ऐसे नहीं, मुझे प्रपोज करो.’’ मेपल बोली.

‘‘मुझे प्रपोज करना नहीं आता.’’ गुरजिंदर अब भी शरमा रहा था.

‘‘अच्छा बाबा, मैं ही प्रपोज करती हूं, मैं तुम से बेहद बेहद प्यार करती हूं.’’ मेपल ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मैं भी तुम से प्यार करता हूं. साथ ही वादा करता हूं कि हमेशा इसी तरह प्यार करता रहूंगा.’’ गुरजिंदर ने कहा.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से खुल गए. उन की बातचीत का अंदाज बदल गया. उन के होंठ भी कई बार आपस में टकराए, पर उन्होंने इस से आगे की हद पार नहीं की. इस के बाद मेपल और गुरजिंदर ज्यादा से ज्यादा एकदूसरे के करीब रहने लगे. उन के घर वालों को उन के प्यार का पता नहीं था. उन्हें तो सिर्फ यही मालूम था कि दोनों अच्छे दोस्त हैं.

मेपल ने सेकेंडरी पास कर के साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में हेल्थ साइंस में एडमिशन ले लिया. वहीं वह मौडलिंग भी करने लगी. वहीं से उसे लघु फिल्म ‘डायरी औफ विंपी किड’ में एक भूमिका मिल गई. इस से उस के हौसले और बढ़ गए. वह अकसर मौडलिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी. इस के बावजूद उस ने पढ़ाई को नजरअंदाज नहीं किया. वह पढ़ाई को भी पूरा समय देती थी. वहीं गुरजिंदर ग्रैजुएशन पूरा कर के पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगा था.

प्यार की नींव विश्वास पर टिकी होती है. दोनों के बीच विश्वास था भी पर गुरजिंदर का विश्वास उस दिन डगमगा गया, जब उस ने मेपल को एक अन्य युवक के साथ यूनिवर्सिटी में हाथ में हाथ डाले घूमते देख लिया. उस दिन वह मेपल से मिलने यूनिवर्सिटी गया था. यह उसे अच्छा नहीं लगा, इसलिए निराश मन से वह बिना मिले ही लौट गया. जब दोनों दूसरे दिन मिले तो गुरजिंदर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हारे साथ कौन लड़का था?’’

‘‘क्लास में पढ़ता है. हम दोनों में अच्छी दोस्ती है. पर तुम्हें मेरा उस के साथ घूमना बुरा क्यों लगा, यह तो आम बात है.’’ मेपल ने कहा.

गुरजिंदर उस के जवाब से संतुष्ट नहीं था. उस ने कहा, ‘‘मुझे यह अच्छा नहीं लगता. मैं नहीं चाहता कि कोई तुम्हें छुए भी.’’

बात आईगई हो गई. कुछ दिनों बाद गुरजिंदर कौफी शौप में कुछ दोस्तों के साथ गया तो वहां एक प्राइवेट केबिन में उस की नजर चली गई. वहां मेपल किसी लड़के के साथ अश्लील मुद्रा में बैठी थी. यह देख कर वह गुस्से से कांपने लगा. उस ने उस केबिन में जा कर दोनों को भलाबुरा कहने के साथसाथ मेपल से अपना कौमार्य टेस्ट कराने को कहा. उस ने कहा कि उसे शक है कि उस के कई लड़कों से शारीरिक संबंध हैं.

इस पर मेपल खुद पर काबू नहीं रख पाई. वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम कौन होते हो मुझ पर इस तरह का इल्जाम लगाने वाले. किस हक से तुम मुझे कुंवारेपन का टेस्ट कराने को कह रहे हो. हमारे बीच प्यार है, हम ने शादी नहीं की, जो तुम इस तरह हक जता रहे हो.’’

‘‘लेकिन मैं तो तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने की सोच बैठा हूं.’’ गुरजिंदर ने कहा.

‘‘यह तुम्हारी सोच है, जरूरी नहीं कि मेरी भी यही सोच हो. मैं जिंदगी को बांधना नहीं चाहती. मैं खुल कर जीने में विश्वास रखती हूं. तुम्हें अच्छा नहीं लगता तो तुम अपना रास्ता अलग कर सकते हो.’’ मेपल ने दो टूक जवाब दिया.

गंभीर स्वभाव का गुरजिंदर बौखला गया. पर उस ने खुद पर संयम रखा. 24 सितंबर, 2011 को उस ने मेपल को उसी लड़के के साथ फिर देखा तो खुद पर काबू नहीं रख पाया और दोनों से उलझ पड़ा. वह मारपीट तक पर उतारू हो गया. उस का यह रूप देख कर मेपल ने इस की शिकायत पुलिस से कर दी, पर दूसरे दिन उस ने अपनी शिकायत वापस ले ली. हां, उस ने गुरजिंदर को चेतावनी जरूर दी कि आइंदा वह उस की जिंदगी में दखल न दे, वरना परिणाम अच्छा नहीं होगा.

‘‘परिणाम किस का अच्छा होगा, किस का बुरा यह तो अब पता चलेगा.’’ गुरजिंदर बड़बड़ाया.

उस ने मेपल को सबक सिखाने की योजना बना कर अपने दोस्त गुरसिमर बेदी से बात की. गुरजिंदर ने उस से सहयोग मांगा तो वह तैयार हो गया. उस ने साथ देने का वादा तो किया ही, साथ ही उस के कहे अनुसार एक रिवौल्वर का इंतजाम भी कर दिया. इस के बाद उस ने मेपल पर नजर रखनी शुरू कर दी. 28 सितंबर, 2011 को मेपल यूनिवर्सिटी के लिए घर से निकली तो दोनों उस का पीछा करते हुए वहां पहुंच गए और मौका देख यूनिवर्सिटी कैंपस में कार रोक कर गुरजिंदर ने उस पर गोलियां चला दीं और भाग खड़े हुए. मेपल के मरने की खबर गुरजिंदर को अपने घर वालों से मिल चुकी थी, क्योंकि वे मेपल के अंतिम संस्कार में गए थे, पर वह मेपल के घर शोक जताने भी नहीं गया.

पुलिस ने शक के आधार पर उसे हिरासत में भी लिया, पर वह झूठ बोल कर शक के दायरे से निकल गया. अंत में साल भर बाद उस का गुनाह सामने आ गया और वह पकड़ा गया. गुरजिंदर और गुरसिमर को सुर्रे सिटी कोर्ट में पेश किया गया, वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. 17 सितंबर, 2012 को अगली पेशी पर गुरजिंदर के वकीलों ने उसे निर्दोष बताते हुए सबूत भी दिए, पर कोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया.

30 अप्रैल, 2013 को पुलिस ने दोनों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी. चार्जशीट, गवाह और सबूतों के आधार पर कोर्ट ने दोनों को दोषी करार दिया. यह संयोग ही था कि 28 सितंबर, 2011 को मेपल की हत्या हुई थी और 28 सितंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए गुरजिंदर धालीवाल उर्फ गैरी को साजिश रचने व हत्या करने के आरोप में 19 साल की सश्रम कारावास की सजा तथा उस के साथी गुरसिमर बेदी को साजिश में शामिल होने और हथियार मुहैया कराने के आरोप में 8 साल की सजा सुनाई.

कथा लिखे जाने तक 15 नवंबर, 2015 को गुरजिंदर के वकील ने जमानत की अर्जी कोर्ट में लगाई थी, पर कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए अर्जी खारिज कर दी थी. Canada

Crime News: कविता रैना हत्याकांड – कत्ल जो बन गया पहेली

Crime News: कविता रैना की हत्या पुलिस के लिए एक पहेली बन गई थी. इस पहेली को सुलझाने में 4 आईपीएस अधिकारी, 5 थानों की पुलिस, क्राइम ब्रांच और 200 पुलिस कर्मचारी लगे. आज तक का यह सब से महंगा और जटिल केस अब मध्य प्रदेश पुलिस अकादमी में पढ़ाया जाएगा.

कविता रैना की हत्या इंदौर पुलिस के लिए मिस्ट्री बन कर रह गई थी. एक ऐसा रहस्य, जिस का कोई भी सिरा ढूंढे नहीं मिल रहा था. सिरा मिला तो लेकिन 107 दिन बाद, वह भी तब जब 5 आईपीएस अफसरों सहित 200 पुलिस कर्मियों ने खानापीना भूल कर 20-20 घंटे काम किया. 177 लोगों से गहन पूछताछ की, डेढ़ लाख मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स की छानबीन की गई.

20 से ज्यादा बार मर्डर का ट्रायल किया गया.  1500 से ज्यादा मकानों और लगभग 200 गोदामों का चप्पाचप्पा छाना गया. 117 बुलेट मोटरसाइकिलों और 150 कारों को जांचा परखा गया. 100 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई. 5 थानों की पुलिस के साथसाथ क्राइम ब्रांच को भी लगाया गया. यहां तक कि अजय देवगन, तब्बू स्टारर फिल्म ‘दृश्यम’ को कई बार इसलिए देखा गया कि कहीं हत्यारे ने फिल्म के नायक की तरह ही कोई दांव न खेला हो.

कविता रैना की हत्या की कहानी सुलझी तो लेकिन इंदौर पुलिस के लिए एक ऐसा इतिहास बन कर जो अब पुलिस अकादमी में पढ़ाया जाएगा. अपने पति संजय रैना, सास कांता रैना और 2 बच्चों बेटे ध्रुव और बेटी यशस्वी के साथ 81/2 सेक्टर-बी, मित्रबंधु नगर में रहती थीं कविता रैना. मित्रबंधु नगर इंदौर के कनाडि़या रोड पर है. कविता के पति संजय रैना एमिल फार्मास्युटिकल कंपनी में एरिया सेल्स मैनेजर थे. पहले कविता भी एक स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ जाने की वजह से उन्होंने 2 साल पहले पढ़ाना छोड़ दिया था. फिलहाल वह घर में रह कर महिलाओं के ब्लाउज वगैरह सिलने का काम करती थीं. ब्लाउज सिलने में उन्हें एक्सपर्ट माना जाता था.

कविता के पति संजय रैना अधिकांशत: कंपनी के कामों में व्यस्त रहते थे. इसलिए घरबार के छोटेमोटे काम भी कविता को करने  होते थे. इस के लिए उन्होंने एक्टिवा स्कूटी ले रखी थी. कविता की बेटी यशस्वी एक कान्वेंट स्कूल में पहली क्लास में पढ़ती थी. वह रोजाना स्कूल बस से आतीजाती थी. बस स्टाप बहुत ज्यादा दूर नहीं था. कविता सुबह को बेटी को स्कूटी से ले जा कर बस में बैठा आती थीं और दोपहर को खुद ही बस स्टाप से ले आती थीं.

24 अगस्त, 2015 की दोपहर को डेढ़ बजे यशस्वी की बस मित्रबंधु नगर के शर्मा स्वीट्स के सामने वाले स्टाप पर आकर रुकी तो अन्य बच्चों के साथ यशस्वी भी उतर गई. सभी बच्चों की मां या घर का कोई सदस्य उन्हें लेने आए थे, लेकिन यशस्वी की मां कविता रैना वहां नहीं आई थीं.

पिछले 3 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मां यशस्वी को लेने स्टाप पर नहीं आई हों. मां को वहां न देख यशस्वी रुंआसी हो गई. कविता के पड़ोस में ही रहने वाली जया अपने बच्चे को लेने बस स्टाप पर आई थीं. उन्होंने यशस्वी को रुंआसी खड़ी देखा तो उसे समझाया, ‘‘हो सकता है तुम्हारी मां किसी काम में उलझ गई हों, चलो मैं तुम्हें घर छोड़ दूंगी.’’

जया आंटी पड़ोस में ही रहती थीं. यशस्वी उन्हें जानती थी, इसलिए वह उन के साथ घर आ गई. यशस्वी को अकेला आया देख दादी कांता रैना ने पूछा, ‘‘तेरी मां नहीं पहुंची स्टाप पर? यहां से तो वह एक दस पर ही निकल गई थी.’’

‘‘मां वहां नहीं थीं, मैं आंटी के साथ आ गई.’’ यशस्वी ने बताया तो दादी बोली, ‘‘चल कोई बात नहीं, हो सकता है किसी काम में उलझ गई हो.’’ कांता रैना पोती की ड्रैस वगैरह चेंज कराने में लग गईं. बात वहीं समाप्त हो गई.

चूंकि कविता घर के कामों से बाहर जाती रहती थीं, इसलिए कांता रैना ने तो यह बात आसानी से मान ली कि वह किसी काम में उलझ गई होगी, लेकिन यह बात यशस्वी के गले नहीं उतर रही थी. इस की वजह यह थी कि 3 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मां उसे लेने स्टाप पर न पहुंची हों. संजय रैना उस दिन एक मीटिंग के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल गए थे. उन्होंने नाश्ता तक नहीं किया था. दोपहर को लंच करने वह घर आए तो यशस्वी ने उन्हें बताया कि मां उसे लेने न तो बसस्टाप पर पहुंचीं और न ही अभी तक लौटी हैं. यह जान कर संजय रैना हैरान रह गए. उन्होंने कविता के मोबाइल पर फोन किया तो पता चला उन का मोबाइल घर में ही है. तब तक कविता को गए 2 घंटे हो चुके थे.

संजय को चिंता हुई तो वह खाना छोड़ कर कविता को ढूंढने निकल पड़े. उन्होंने कविता को हर जगह ढूंढा, लेकिन उन का कोई पता नहीं चला. रिश्तेदारों और परिचितों को फोन भी किए पर कविता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. हर ओर से निराश हो कर उन्होंने थाना कनाडि़या में कविता की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी. पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट तो दर्ज कर ली, लेकिन संजय जानते थे कि हालफिलहाल कुछ होने वाला नहीं है. इसलिए वह रिश्तेदारों और मित्रों के साथ कविता को खोजते रहे. कविता को लापता हुए 2 दिन हो गए लेकिन उन का कहीं कोई पता न चला.

इस से सब ने अनुमान लगाया कि कविता के साथ कोई अनहोनी हो गई है. 26 अगस्त को देवास के पास एक युवती की जली हुई लाश मिली तो पुलिस ने शिनाख्त के लिए संजय रैना को भी बुलाया क्योंकि उन्होंने पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. लाश पहचानने की स्थिति में नहीं थी. कपड़े वगैरह भी नहीं थे. संजय ने अनुमान से ही कह दिया कि हो सकता है वह उन की पत्नी की लाश हो. पुलिस ने इसे सत्य मान कर उन से हस्ताक्षर भी करवा लिए. यह खबर सुन कर संजय के घर में कोहराम मच गया. पूरा परिवार रोनेधोने लगा. तभी खबर आई कि थाना भंवर कुआं क्षेत्र में 3 इमली चौराहे के पास वाले गंदे नाले में 2 बोरों में एक महिला की 6 टुकड़ों में कटी लाश मिली है.

दरअसल, कचरा बीनने वाले 2 लड़कों ने नाले में 2 बोरे पड़े देखे थे, जिन में से बदबू आ रही थी. उन्होंने यह बात लोगों को बताई और लोगों ने पुलिस को. सूचना मिलते ही थाना भंवरकुआं के थानाप्रभारी राजेंद्र सोनी पुलिस टीम के साथ वहां जा पहुंचे जहां बोरे पड़े थे. दोनों बोरों को नाले से निकाल कर खुलवाया गया तो उन में एक औरत की नग्न लाश निकली. आश्चर्यजनक बात यह थी कि लाश 6 टुकड़ों में कटी हुई थी. इस के अलावा मृतका के सीने पर चाकुओं के 2 निशान भी थे. साथ ही सिर पर भी एक घाव था. पुलिस ने लाश के टुकड़ों को जोड़ा ताकि मृतका की पहचान कराई जा सके.

पुलिस ने लाश को पहचानने के लिए संजय रैना को भी बुलाया. उन्होंने लाश के टुकड़े देखे तो हाथ पर गुदे टैटू और कंधे के तिल को देख कर बताया कि लाश उन की पत्नी कविता की है. पुलिस ने फोरेंसिक एक्सपर्ट सुधीर शर्मा को भी बुला रखा था. उन्होंने लाश को सूक्ष्म यत्रों से देख कर बताया कि मृतका की हत्या 24 अगस्त को ही कर दी गई थी. जबकि उस के शरीर को काफी बाद में इलेक्ट्रिक कटर से काटा गया था. यह बात लाश के कटने के निशानों और हड्डियों के काटने की शेप से पता चली.

प्राथमिक काररवाई के बाद लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए एमवाई अस्पताल भेज दिया गया. इस के साथ ही थाना भंवरकुआं में अज्ञात लोगों के विरुद्ध हत्या का केस दर्ज कर लिया गया. एक सीधीसादी पारिवारिक गृहणी के साथ इस तरह का पाशविक कृत्य किसी के गले नहीं उतर रहा था. मित्रबंधु नगर के निवासी इसे ले कर बहुत गुस्से में थे. उन का गुस्सा पुलिस पर भी था क्योंकि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी उस ने कोई खास काररवाई नहीं की थी.

यही वजह थी कि पोस्टमार्टम के बाद जब कविता का शव मिल गया तो मित्रबंधु नगर के लागों ने शव को बंगाली चौराहे पर रख कर चक्का जाम कर दिया. इस पर डीआईजी संतोष कुमार, एसपी (पूर्व) ओ.पी. त्रिपाठी, एसपी (पश्चिम) डी. कल्याण चक्रवर्ती, एसपी (सिटी) शशिकांत कनकने और एडीशनल एसपी (क्राइम ब्रांच) विनयपाल ने बंगाली चौराहे पर आ कर लोगों को समझाया. साथ ही आश्वासन भी दिया कि जल्दी ही हत्यारों को पकड़ लिया जाएगा.

पुलिस के अनुरोध और आश्वासन पर लोगों ने धरना खत्म कर दिया. उसी दिन कविता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पुलिस का अनुमान था कि कविता रैना के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया होगा और उस के बाद उन की हत्या कर दी गई होगी. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस की यह धारणा गलत साबित हुई. कविता के साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ था. उन की मौत सिर पर लगी गंभीर चोट और सीने पर हुए चाकू के वारों से हुई थी. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कविता की लाश के टुकड़े चाकू वगैरह से नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक कटर से किए गए थे. अलबत्ता सीने पर चाकू के 2 निशान जरूर पाए गए.

इस से पुलिस को संदेह हुआ कि ऐसा काम कोई करीबी ही कर सकता था. इस की वजह यह थी कि कविता की हत्या और शरीर के टुकड़े किसी एकांत जगह पर ही किए जा सकते थे और ऐसी जगह वह किसी करीबी के साथ ही जा सकतीं थीं. यह किसी प्रेम प्रसंग का मामला भी हो सकता था और पतिपत्नी के झगड़ों का प्रतिफल भी. संभावना यही थी कि इस के पीछे कविता के पति संजय रैना का हाथ हो सकता है.

पुलिस की प्राथमिक पूछताछ में यह बात सामने आई कि घटना वाले दिन कविता अपनी बेटी यशस्वी को बस स्टाप से लाने के लिए 1 बज कर 10 मिनट पर घर से निकली थीं. यशस्वी की बस स्टाप पर 1 बज कर 40 मिनट पर आई थी. जब बस स्टाप पर पहुंची थी तब कविता वहां नहीं थीं. इस का मतलब कविता के गायब होने का रहस्य 1 बज कर 10 मिनट से 1 बज कर 40 मिनट के बीच ही छिपा था. घर से बस स्टाप के बीच ज्यादा दूरी नहीं थी. पुलिस ने इस सवा किलोमीटर के रास्ते पर तमाम लोगों से पूछताछ की, लेकिन किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं बताया जिस से यह माना जाता कि कविता का अपहरण हुआ था.

पुलिस ने बस स्टाप के सामने वाली दुकान शर्मा स्वीट्स पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज भी देखी, लेकिन कविता कहीं नजर नहीं आईं. इस से अनुमान लगाया गया कि वह किसी परिचित के साथ ही गई होंगी, बाद में उसी ने उन का कत्ल कर दिया होगा. इसी के मद्देनजर पुलिस ने सब से पहले कविता के पति संजय रैना को शक के दायरे में रख कर पूछताछ करने का मन बनाया. इस की वजह यह थी कि संजय ने एक गलत लाश की पहचान अपनी पत्नी के रूप में कर दी थी.

पूछताछ से पहले संजय रैना की घटना वाले दिन की गतिविधियों के बारे में पता लगाया गया. साथ ही उन की काल डिटेल्स भी निकलवाई गई. पासपड़ोस के लोगों और उन के परिचितों से भी पूछताछ की गई. पूछताछ में संजय रैना की मां कांता रैना को भी शामिल किया गया. इस पूछताछ में पता चला कि कविता रैना घरेलू महिला थीं. उन के और संजय के बीच किसी बात को ले कर कोई मतभेद नहीं था. कविता की किसी से कोई दुश्मनी या झगड़ा भी नहीं था. वह मिलनसार महिला थीं. कांता रैना ने बताया कि कविता घर पर ब्लाउज सिलने का काम करती थीं.

घटना वाले दिन उन्हें 2 ब्लाउज सिल कर शाम तक देने थे, इसलिए यशस्वी को ले कर उन्हें जल्दी लौट आना चाहिए था, लेकिन वह नहीं लौटी थीं. इस पूछताछ में यह बात भी निकल कर आई कि संजय को कोई मनोरोग था, जिस के लिए वह खुद इंजेक्शन लिया करते थे. इस बारे में संजय रैना से बात की गई तो उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ समय पहले मानसिक प्रौब्लम हुई थी. डाक्टर ने उन्हें इंजेक्शन लगाना सिखा कर घर पर ही इंजेक्शन लगाने को कहा था. उन्होंने डाक्टर के पेपर भी पुलिस को दिखाए. इस से पुलिस संतुष्ट हो गई.

संजय रैना की घटना वाले दिन की गतिविधियों और उन की काल डिटेल्स में पुलिस को कुछ संदिग्ध नहीं मिला. पुलिस ने संजय के 2 सहकर्मियों पीयूष और विक्रांत परमार से भी पूछताछ की, जो कभीकभी उन के घर आया करते थे. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच बड़नगर से कविता के पिता रामनारायण जालवाल, मां तेजूबाई, दोनों भाई लखन व ठाकुर तथा दोनों बहनें सुनीता और सीमा भी आ चुके थे. पुलिस ने रामनारायण, तेजूबाई और उन के बेटों से अलग पूछताछ की. उन का कहना था कि संजय रैना से कविता को कोई शिकायत नहीं थी. दोनों के बीच खूब प्यार था. यह संभव नहीं है कि संजय ने कविता को कोई नुकसान पहुंचाया हो.

पुलिस ने बहन सीमा और उस के पति ओमप्रकाश कुमावत से भी अलग से पूछताछ की. ओमप्रकाश कुमावत का पालदा में एंब्रायडरी का काम था. ओमप्रकाश और सीमा को उन के घर पालदा भी ले जाया गया. लेकिन इस से कोई नतीजा नहीं निकला. जब कहीं से कोई बात न बनी तो डीआईजी संतोष कुमार ने एएसपी देवेंद्र पाटीदार, सीएसपी बिट्टू सहगल, सीएसपी पारुल बेलापुरकर, शशिकांत कनकने, एएसपी विनयपाल और इंसपेक्टर सोमा मलिक के नेतृत्व में पुलिस की 8 टीमें बनाईं. इन आठों  टीमों को अलगअलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

जांच के जो अहम बिंदू तय किए गए उन में मुख्य थे, उस सवा किलोमीटर रास्ते की हर नजरिए से गहन जांच करना जो कविता के घर और स्कूल बस के स्टाप के बीच था. क्योंकि कविता उसी रास्ते से लापता हुई थीं. साथ ही एक टीम को उस रास्ते में पड़ने वाली दुकानों या मकानों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगालनी थीं.

एक टीम को संजय रैना और कविता के करीबियों से पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई तो एक को उन लोगों का पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई जो कविता के संपर्क में रहते थे. एक टीम को कविता के चरित्र या किसी प्रेमप्रसंग वगैरह का भी पता लगाने को कहा गया. एक टीम इस काम पर भी लगाई गई कि वह कविता के बस स्टाप के बीच पड़ने वाले सभी मोबाइल टावरों के संपर्क में आने वाले मोबाइल फोनों के नंबर एकत्र करे और कालडिटेल्स से उन में संदिग्ध नंबर ढूंढे.

एक टीम को उस टीचर जो 2 साल पहले कविता के साथ पढ़ाती थी और उस स्कूल के संचालक से भी पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिस के स्कूल में ये दोनों पढ़ाती थीं. दूसरी टीम को यशस्वी को बस स्टाप से लाने वाली महिला और उस महिला से पूछताछ की जिम्मेदारी सौंपी गई जिस ने कविता को बस स्टाप की ओर जाते देखा था. साथ ही उस महिला से भी पूछताछ करने को कहा गया जिस के ब्लाउजों का आर्डर कविता को उसी दिन शाम तक देना था.

पुलिस टीम ने पता लगाया तो जानकारी मिली कि कविता अपनी पड़ोसी निशा यादव के साथ रेहान अली के स्कूल में पढ़ाती थीं. वहां से पहले कविता ने पढ़ाना छोड़ा था और फिर एक साल बाद निशा ने. कविता के स्कूल की नौकरी छोड़ने की वजह यह थी कि एक तो उन की बेटी यशस्वी स्कूल जाने लगी थी और उसे बस स्टाप पर छोड़ने और लेने जाना होता था. दूसरे वह बहुत अच्छे ब्लाउज सिलना जानती थी और स्कूल के वेतन से ज्यादा पैसे घर पर ही कमा सकती थीं.

पुलिस ने निशा और स्कूल संचालक दोनों से पूछताछ की. उन दोनों ने बताया कि उन के बीच किसी तरह का कोई मतभेद या विवाद नहीं था. कविता ने अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ी थी. नौकरी छोड़ने के बाद रेहान अली से उन का कोई संपर्क नहीं रहा था. निशा से भी कविता का किसी तरह का कोई मतभेद नहीं था. जिस महिला सुमित्रा यादव ने कविता को बसस्टाप की ओर जाते देखा था, उस का कहना था कि घर से स्टाप तक का ज्यादातर रास्ता सुनसान रहता था, उस ने कविता को वैभवनगर कौर्नर पर पीपल के पेड़ के पास देखा था.

पीपल के पेड़ के आगे बस स्टाप तक भीड़भाड़ रहती थी इसलिए उस से आगे कविता के अपहरण की कोई संभावना नहीं थी. यह बात बताने वाली सुमित्रा यादव निशा की सास थी. पुलिस उसे वैभव नगर के कौर्नर वाले पीपल के पेड़ के पास तक भी ले गई. पुलिस ने नंदिनी नागर नाम की उस महिला से भी पूछताछ की जिस के ब्लाउज के और्डर कविता को शाम तक देने थे. उस ने बताया कि वह कविता से केवल ब्लाउज सिलवाती थी, इस से अलावा उन से उस का कोई संबंध या संपर्क नहीं था. रक्षाबंधन पास था. इसलिए उस ने कविता से शाम तक ब्लाउज देने को कहा था.

संजय रैना ने बताया था कि जिस दिन कविता गायब हुई थी उस दिन एक काली स्कार्पियो उन के घर के सामने से गुजरी थी, थोड़ी देर बाद वह तेजी से वापस लौट गई थी. साथ ही उस दिन एक बोलेरो को भी कालोनी में घूमते देखा गया था. हो सकता है, उन गाडि़यों में बैठे लोग स्थित का जायजा लेने आए हों. इस पर पुलिस ने उस इलाके के मकानों के आगे लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखीं और उस स्कार्पियो व बोलेरो को पहचानने की कोशिश की.

इस के अलावा उस शर्मा स्वीट्स के कैमरे की फुटेज भी दोबारा देखी गई जिस के सामने स्कूल का बस स्टाप था. उस फुटेज में कविता तो कहीं नजर आईं अलबत्ता वहां 2 बाइकों पर सवार 4 युवक और एक संदिग्ध वैन जरूर खड़ी दिखाई दी. पुलिस ने उन मोटर साइकिल सवारों, वैन और स्कार्पियो की खोजबीन शुरू की. पुलिस ने उन टावरों के अंतर्गत आने वाले 7000 मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स की भी गहनता से जांच की जो कविता के घर से यशस्वी के बस स्टाप के बीच पड़ते थे. घटना वाले दिन कविता के मोबाइल पर महज 2 फोन काल आई थीं. इन में एक उन के पति संजय की थी और दूसरी एक बुटीक से आई थी.

पूछताछ में संजय ने बताया कि उस दिन वह काम के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल गए थे, इसलिए उन्होंने फोन कर के पत्नी से कहा था कि दोपहर का खाना घर आ कर ही खाएंगे. जिस शृंगार बुटिक से फोन आया था, वह मीना नाम की महिला का था, जो वैभवनगर बस स्टाप के निकट था. पूछताछ में उस ने बताया कि कविता ने एक सूट सिलने को दिया था, उसी के लिए उसे फोन किया गया था.

कविता के घर के सामने ही एक यादव का घर था, जो शादियों में शामियाने वगैरह लगाने का काम करता था, उस के पास उत्तर प्रदेश और बिहार के दर्जन भर से ज्यादा लड़के काम करते थे. पुलिस ने संदेह के आधार पर उन सभी लड़कों को हिरासत में ले कर पूछताछ की और उन के मोबाइल चेक किए. लेकिन वे सब निर्दोष थे.

इस के अलावा कविता से मिलने वालों, गैस सिलेंडर सप्लाई करने वाले, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, कूड़ा उठाने वाले, दूध वाले, सब्जी वाले, फेरी वालों और इलाके के धोबी तक से पूछताछ की गई. संजय रैना का परिवार पहले भागीरथपुरा में किराए के मकान में रहता था. 4 साल पहले यह परिवार मित्रबंधु नगर में अपने मकान में शिफ्ट हो गया था. पुलिस ने भागीरथपुरा से मित्रबंधु नगर तक कविता के जानपहचान वालों को खोजखोज कर पूछताछ की.

जांच में यह बात भी सामने आई कि कविता पिछले एक साल में 177 लोगों से मिली थीं, जिन में परिचित व रिश्तेदार भी थे और ऐसे लोग भी, जिन से कविता का कोई काम पड़ा था. इन सभी 177 लोगों से पूछताछ के बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा. पूछताछ में यह भी पता चला कि 28 जुलाई को कविता जब अपनी सास और बेटी के साथ एक्टिवा से पलासिया चौराहे के पास से गुजर रही थीं तो एक बुलेट मोटरसाइकिल वाले ने पीछे से आ कर उन की एक्टिवा को टक्कर मार दी थी. कविता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. उस वक्त बात वहीं समाप्त हो गई.

लेकिन कविता जब पत्रकार कालोनी के चौराहे पर पहुंचीं तो उसी बाइक वाले ने फिर से उन की एक्टिवा में टक्कर मार दी. इस बार कविता, उन की सास कांता और बेटी यशस्वी गिर गई. बाइक सवार शराब पिए हुए था. कविता को गुस्सा आया तो उन्होंने उस की चप्पल से पिटाई कर दी. लोगों ने भी इस मामले में उन का ही साथ दिया. यह बात सामने आई तो पुलिस ने सोचा कि कहीं उस मोटरसाइकिल वाले ने ही रंजिशन उन का अपहरण कर के उन की हत्या न कर दी हो. इस के बाद पुलिस ने शहर के 117 बुलेट मोटरसाइकिल चलाने वालों की जांच की. लेकिन उन में कोई भी संदिग्ध नहीं निकला.

अभी कारों और बुलेट मोटरसाइकिलों की जांच चल ही रही थी कि 30 अगस्त को कविता की एक्टिवा एमपी09एस एएस5271 पुलिस को मिल गई. यह  एक्टिवा पिछले 7 दिन से नौलखा बस स्टैंड की पार्किंग में खड़ी थी. पुलिस ने पार्किंग की देखभाल करने वाले से पूछताछ की तो उस ने बताया कि स्कूटी को 24 अगस्त को रात साढ़े 8 बजे राजू नाम का एक व्यक्ति खड़ा कर गया था. पर्ची लेते वक्त उस ने 30 रुपए दे कर तीसरे दिन आने को कहा था, लेकिन वह लौट कर नहीं आया.

पार्किंग के केयरटेकर ने बताया कि उस ने राजू से स्कूटी लौक न करने को कहा था ताकि जरूरत होने पर उसे दूसरी जगह खड़ा किया जा सके. लेकिन राजू नहीं माना और स्कूटी को लौक कर के चाबी अपने साथ ले गया. पार्किंग में बाहर की ओर सीसीटीवी कैमरा लगा था. उम्मीद थी कि उस की सीसीटीवी  फुटेज में राजू का चेहरा दिखाई दे सकता है. लेकिन यहां भी पुलिस को मात खानी पड़ी. सीसीटीवी कैमरे के सामने एक लाइट लगी थी, जिस की वजह से राजू का फोटो नहीं आ पाया था. अलबत्ता पार्किंग के केयरटेकर से पूछ कर उस का स्केच जरूर बनवाया जा सकता था. पुलिस ने यही काम कर लेना बेहतर समझा.

इस काम में टेक्नीकल और साइंटिफिक टीमें भी लगी थीं. उन्होंने जब एक्टिवा की जांच की तो उस पर खून के धब्बे पाए गए. इस से अनुमान लगाया गया कि कविता की लाश के टुकड़े उसी की एक्टिवा पर रख कर नाले में फेंके गए होंगे. लेकिन पुलिस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि हत्यारे को कविता की एक्टिवा को इस तरह सुरक्षित रखने की क्या जरूरत थी? क्योंकि वह चाहता तो काम हो जाने के बाद कविता के कपड़ों और जेवरों की तरह एक्टिवा को भी गायब कर सकता था या फिर उसे कहीं दूर दूसरी जगह खड़ा कर सकता था.

इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे ने बसस्टैंड पर एक्टिवा यह सोच कर खड़ी की होगी कि पुलिस यह सोचे कि कविता बस में बैठ कर कहीं गई होंगी. लेकिन कविता की लाश मिलने से पुलिस की यह सोच न बन सकी. कविता की लाश के टुकड़े नग्नावस्था में मिले थे. जबकि घर से जाते समय वह पीले रंग की साड़ी ब्लाउज और कुछ गहने पहने हुए थीं.

इस से अनुमान लगाया गया कि हत्यारे ने उन के कपड़े जला दिए होंगे और गहने अपने पास रख लिए होंगे. एक्टिवा को सुरक्षित जगह खड़ा करना भी हत्यारे की मानसिकता को दर्शा रहा था. यानी वह कविता के गहनों और एक्टिवा का मोह पाले हुए था. इस से पुलिस को एक बार फिर कविता के करीबियों पर शक हुआ. इस के लिए गोपनीय और खुले दोनों ही रूप से कविता के कई करीबी लोगों की जांच की गई. लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला.

इस बीच पुलिस टीमें 6 पीएसटीएन (पब्लिक स्विच्ड टेलीफोन नेटवर्क) के माध्यम से डेढ़ लाख से ज्यादा मोबाइल फोनों का डाटा खंगाल चुकी थी. केवल इतना ही नहीं बल्कि हत्यास्थल की तलाश में इमली चौराहे से ले कर नेमावर रोड तक 6 किलोमीटर के दायरे में सारे मकान और गोदाम भी छान लिए गए थे.

अधिकारी गूगल पर एक एक मकान या गोदाम को टिक करते और पुलिस टीम उस जगह की जांच करती. इस तरह पुलिस ने 1500 मकान और 200 गोदाम छाने. लेकिन कहीं से कुछ नहीं मिला. लाश के टुकड़े जिन बोरियों में मिले थे, उन का प्रिंट तो धुंधला था लेकिन यह पता चल गया था कि उन में से एक बोरी चाय की पत्ती की थी और दूसरी कैमिकल की. इस बात को ध्यान में रख कर पालदा औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों और गोदामों की सर्चिंग की गई.

इन्वेस्टीगेशन के दौरान ही पुलिस की निगाह महेश बैरागी पर जम गई. महेश बैरागी  उस मीनाबाई का पति था, जिसे कविता ने 18 जुलाई 2015 को अपना सूट सिलने के लिए दिया था. महेश बैरागी अपनी पत्नी मीनाबाई और 2 बच्चों तनिष्क और तेजस के साथ मूसाखेड़ी क्षेत्र के आलोकनगर में रहता था. साथ में उस की साली पूजा भी रहती थी. महेश के बारे में पता चला कि पहले मूसाखेड़ी चौराहे पर उस की मोबाइल रिचार्ज की दुकान थी. बाद में उस ने मोबाइल रिचार्ज की दुकान बंद कर दी थी.

मीनाबाई ने वैभवनगर मेन रोड पर शृंगार बुटिक के नाम से लेडीज कपडे़ सिलने की दुकान खोल रखी थी. कभीकभी वहां महेश भी बैठा करता था. बाद में 20 अगस्त से उस ने वहीं पास में साडि़यों की दुकान खोल ली थी. ताज्जुब की बात यह थी कि 28 अगस्त को उस ने वह दुकान बंद कर दी थी. घटना वाले दिन कविता के फोन पर शृंगार बुटिक से ही फोन किया गया था. हालांकि पुलिस ने मीनाबाई और महेश बैरागी से पहले भी पूछताछ की थी. इतना ही नहीं महेश बैरागी हर धरनेप्रदर्शन में भी शामिल हुआ था और एक 2 बार कविता के घर शोक जताने भी गया था. कई बार वह कविता के घर वालों के साथ थाने भी आया था.

पुलिस ने जब मीना से पूछा कि घटना वाले दिन वह 12 बजे से 2 बजे के बीच कहां थी, तो वह संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई. कविता को उस ने कब फोन किया था, यह भी वह ठीक से नहीं बता पाई. इस से पुलिस को महेश बैरागी पर शक हुआ. वैसे भी उस का पिछला रिकौर्ड कुछ ठीक नहीं था. संदेह हुआ तो पुलिस ने महेश बैरागी को थाने बुला कर पूछताछ की. उस से लगातार 20-22 दिन तक पूछताछ की जाती रही. लेकिन वह पुलिस के सवालों के सही जवाब देता रहा. वैसे भी उसे किडनी की बीमारी थी, जिस से वह परेशान हो जाता था. इसलिए पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी.

पुलिस की टीमें कविता की हत्या के मामले में लगातार 107 दिन तक पूछताछ करती रही. पुलिस ने कोई भी ऐसा एंगल नहीं छोड़ा, जहां जरा सी भी संभावना रही हो. 177 लोगों से गहन पूछताछ की गई. करीब 100 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गईं. 1500 मकान और 200 गोदाम छाने गए, लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला.

कहते हैं, पाप सिर चढ़ कर बोलता है. अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो कोई न कोई गलती कर ही बैठता है. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. कविता के मर्डर के 107 दिन बाद पुलिस को एक लीड मिली. एक किराना व्यापारी ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी दुकान के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगवा रखा है. महेश बैरागी उस के पास आया था और 24 अगस्त की फुटेज मांग रहा था. यह पता चलते ही 9 दिसंबर, 2015 को पुलिस ने महेश बैरागी को उस के मूसाखेड़ी क्षेत्र के आलोक नगर से उठा लिया. थाने ला कर उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने मान लिया कि कविता का कत्ल उस ने ही किया था.

महेश बैरागी ने बताया कि कविता रैना के घर से 400 मीटर की दूरी पर उस की पत्नी मीना का बुटिक था. कविता पर उस की निगाहें कई महीने से जमी थीं. उसे उम्मीद तब बंधी जब 18 जुलाई को कविता ने उस की पत्नी मीनाबाई के बुटिक पर अपनी नेट की साड़ी से सूट सिलवाने को दिया था. इस के बाद कविता सूट के चक्कर में बुटिक पर आने लगी थी. वह तभी आती थीं जब बेटी को लेने बस स्टाप पर आती थीं. महेश बैरागी कोशिश करता था कि जब वह आएं तो बुटिक पर मौजूद रहे. मीना को वह किसी न किसी बहाने वहां से भेज देता था. इस तरह महेश कविता को एक महीने तक टालता रहा. उस ने उन्हें डिलीवरी के लिए 18 अगस्त की डेट दी थी.

महेश बैरागी कई महीने से कविता को देख रहा था और उन पर उस का दिल आ गया था. कविता से उस की जो बातें हुई थीं, उस से उसे पता चला कि वह सूट कम और साड़ी ज्यादा पहनती थीं. इसी बात को ध्यान में रख कर उस ने 20 अगस्त को पत्नी के बुटिक के पास ही साड़ी की दुकान खोल ली. उसे उम्मीद थी कि कविता साड़ी देखने के लिए उस की दुकान पर जरूर आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

महेश बैरागी यह जानता था कि कविता दोपहर में अपनी बेटी को लेने बस स्टाप पर आती हैं. उसी समय वह मीनाबाई के बुटिक पर भी आती हैं. उस ने कविता को 18 अगस्त की सूट की डिलीवरी डेट थी. इसलिए बहाने से उस ने अपनी पत्नी मीनाबाई को घर भेज दिया और खुद बुटिक पर बैठ गया. उस दिन करीब एक बज कर 20 मिनट पर कविता आईं तो उस ने कह दिया, ‘‘आप का सूट अभी तैयार नहीं हुआ है, सिलने के लिए कारीगर के पास गया हुआ है. 2-4 दिन में सिल जाएगा तो हम आप को फोन कर देंगे.’’

इसी बहाने उस ने कविता का मोबाइल नंबर भी ले लिया. उस दिन कविता लौट कर बस स्टाप पर चली गईं. बाद में वह बेटी को ले कर घर चली गईं. 24 अगस्त को महेश बैरागी ने अपनी साड़ी की दुकान नहीं खोली. इस की जगह वह बुटिक पर बैठ गया. वहां 2 लोगों का कोई काम नहीं था, इसलिए मीनाबाई घर चली गई. उस के जाते ही महेश ने कविता के मोबाइल पर काल कर के कहा, ‘‘आप का सूट तैयार है, आ कर ले लीजिएगा.’’

सूट के चक्कर में ही कविता घर से 10 मिनट पहले निकलीं. उन्होंने सोचा था कि पहले सूट लेंगी और फिर बस स्टाप से बेटी को. इसलिए पहले वह मीनाबाई के बुटिक पर पहुंची. वहां महेश बैरागी बैठा था. कविता ने सूट के बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘आप का सूट तो तैयार है, लेकिन आप को मेरे साथ आईडीए कालोनी चलना पड़ेगा. सूट कारीगर के पास है.’’

सूट सिलने के लिए दिए हुए एक महीने से ज्यादा हो गया था. कैसा बना है, यह देखने की भी उत्सुकता थी. यशस्वी की बस के आने में थोड़ा समय था. इसलिए कविता ने चलने के लिए हां कर दी. कविता की स्वीकृति मिलते ही महेश ने अपनी मोटरसाइकिल उठा ली. कविता के पास स्कूटी थी ही. दरअसल, महेश ने पहले ही पूरी तैयारी कर रखी थी. आजादनगर की आईडीए कालोनी में उस के एक दोस्त टीकम देवड़ा का फ्लैट था. इस फ्लैट की एक चाबी महेश बैरागी के पास रहती थी.

आईडीए कालोनी के फ्लैट नंबर एफ-20 के पास पहुंच कर महेश बैरागी ने अपनी मोटर साइकिल खड़ी कर दी. कविता ने भी स्कूटी स्टैंड पर लगा दी. इस के बाद महेश कविता को फ्लैट नंबर एफ-20 में ले गया. फ्लैट में जरूरत का सारा सामान था. महेश ने कविता से कहा, ‘‘आप बैठिए, मैं कारीगर को बुलाता हूं.’’

कविता सोफे पर बैठ गईं तो महेश ने दरवाजे की कुंडी बंद कर दी और कविता के पास आ कर घुटनों के बल बैठते हुए बोला, ‘‘मैं आप को बहुत चाहने लगा हूं. आप की खूबसूरती ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी है. प्लीज एक बार मेरी इच्छा पूरी कर दो. जिंदगी भर आप की सेवा करूंगा.’’

यह सुनते ही कविता आगबबूला हो गईं. इस के बावजूद महेश बैरागी ने उन के साथ हाथापाई और छेड़छाड़ करने की कोशिश की. लेकिन जब कविता ने काबू न दिया तो महेश बैरागी ने कमरे में पड़ा लोहे का पाइप उठा कर उन के सिर पर दे मारा. वार जोरदार था. कविता के सिर से खून निकलने लगा और वह वहीं ढेर हो गईं. अब स्थिति करो या मरो की हो गई थी. अपनी जान बचाने के लिए कविता को ठिकाने लगाना जरूरी था. इस के लिए महेश बैरागी ने पहले से तैयार चाकू से उन के सीने पर 2 वार किए. फलस्वरूप कविता की इहलीला खत्म हो गई.

कविता मर चुकी थीं. बैरागी जानता था कि कविता के घर न पहुंचने पर खोजबीन भी होगी और बात पुलिस तक भी पहुंचेगी. इसलिए उस ने वहां से अपनी मोटरसाइकिल हटाना जरूरी समझा. फ्लैट का ताला बंद कर के उस ने कविता की एक्टिवा ओट में खड़ी कर दी और अपनी बाइक ले कर दुकान पर चला गया.

महेश बैरागी ने कविता का कत्ल तो कर दिया, लेकिन उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि लाश को कैसे ठिकाने लगाए. शाम तक वह इसी मुद्दे पर सोचता रहा. सोचविचार कर उस ने एक इलेक्ट्रिक कटर का इंतजाम किया. 24 की रात को टीकमदेवड़ा के फ्लैट पर पहुंच कर सब से पहले उस ने कविता के सारे कपड़े उतार कर जलाए और उन की राख टायलेट पौट में डाल कर फ्लश कर दी. जेवर उस ने अपने पास रख लिए.

इस के बाद उस ने घर से साथ लाए इलेक्ट्रिक कटर से कविता की लाश के 6 टुकड़े किए और फ्लैट में पड़ी 2 बोरियों में भर दिए. तत्पश्चात वह दोनों बोरों को बारीबारी से कविता की स्कूटी पर रख कर इमली चौराहे के पास वाले नाले में फेंक आया. फ्लैट से खून वगैरह उस ने साफ कर दिया था. 24 अगस्त की रात साढ़े 8 बजे महेश बैरागी कविता की स्कूटी ले कर नौलखा बस स्टैंड पहुंचा और अपना नाम राजू बता कर 3 दिन के लिए स्कूटी पार्किंग में खड़ी कर दी. पार्किंग के केयरटेकर के कहने के बावजूद उस ने स्कूटी की चाबी अपने पास ही रखी. ऐसा उस ने इसलिए किया ताकि बाद में पता चलने पर पुलिस यही समझे कि कविता स्कूटी वहां खड़ी कर के किसी के साथ बस में बैठ कर कहीं चली गई होंगी.

2 दिन बाद यानी 26 अगस्त को जब कविता की लाश के टुकड़े मिल गए और लोगों ने बंगाली चौराहे पर धरनाप्रदर्शन किया तो वह उस में भी शामिल हुआ. इतना ही नहीं बल्कि वह कविता के घर और उन के घर वालों के साथ थाने भी गया. जब महेश बैरागी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया तो पुलिस ने उसे 10 दिसंबर, 2015 को जिला न्यायालय के कोर्ट नंबर 14 में न्यायाधीश संजय श्रीवास्तव की अदालत पर पेश कर के 15 दिसंबर तक के पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. इस के साथ ही इस साजिश में शामिल महेश बैरागी की पत्नी मीनाबाई और दोस्त टीकम देवड़ा को भी गिरफ्तार कर लिया. उन दोनों पर साक्ष्य छिपाने का आरोप था.

महेश बैरागी की निशानदेही पर उस के घर से कविता का वह सूट, जिस की वजह से उन की जान गई थी, भी बरामद हो गया. साथ ही वह लोहे का पाइप और चाकू भी बरामद कर लिया गया, जिस से कविता की हत्या की गई थी. लाश के टुकड़े करने वाला इलेक्ट्रिक कटर भी बरामद हो गया. पुलिस ने टीकम के फ्लैट से खून के नमूने भी उठाए. साथ ही महेश का खून ले कर डीएनए जांच के लिए भी भेजा. इस के अलावा उस से 3 सिम भी बरामद हुए.

टीकम देवड़ा के बारे में पता चला कि जिस फ्लैट में कविता की हत्या की गई थी, उस में वह पिछले 2 सालों से किराए पर रह रहा था. वह सुबह को चोईथराम सब्जीमंडी में और शाम को मूसाखेड़ी सब्जीमंडी में पौलीथिन सप्लाई करने का काम करता था. दोपहर में वह घर में ही रहता था. उस के घर कोई नहीं आताजाता था. इसी से अनुमान लगाया गया कि वह इस अपराध में बराबर का भागीदार रहा होगा. जबकि मीनाबाई को हत्या से जुड़ी सूचनाएं छुपाने का अपराधी माना गया.

महेश बैरागी के बारे में पता चला कि उस की पत्नी मीना उस की सगी मौसी की बेटी थी. उस से उस ने प्रेमविवाह किया था. यह जानकारी भी मिली कि वह अय्याश तबीयत का था और क्रिमनल माइंडेड भी. उस की दूसरी मौसी की बेटी रेखा, जो बेटमा की रहने वाली थी, 2009 में उस के घर से गायब हो गई थी. रेखा अपने पति हेमंत उर्फ बबलू के साथ महेश के घर रह रही थी. उन दोनों को महेश ने ही बुला कर अपने साथ रखा था. रेखा की गुमशुदगी संयोगितागंज थाने में दर्ज हुई थी. पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार उस वक्त महेश ने पुलिस को मिठाई के डिब्बे पर लिखा एक पत्र सौंपा था. उस ने बताया था कि वह रेखा का लिखा पत्र है. इस पत्र में लिखा था कि वह अपनी मर्जी से वसीम के साथ जा रही है.

बाद में जब पुलिस ने वसीम से इस सिलसिले में बात की तो उस ने बताया कि रेखा से उस का कोई संबंध नहीं था. अलबत्ता रेखा के पति बबलू ने महेश पर संदेह जाहिर करते हुए कहा था कि रेखा ने उसे सुहागरात को ही बता दिया था कि महेश के साथ उस के पुराने संबंध हैं. जिस दिन रेखा गायब हुई थी उस दिन महेश बबलू को चायपत्ती बेचने के काम के सिलसिले में बागली (देवास) ले गया था. बहाना बना कर वह स्वयं घर लौट आया था. जबकि बबलू को उस ने रात को वहीं रुकने को कहा था. उस समय महेश बैरागी की पत्नी मीना ने भी अपने पति पर शक जाहिर किया था, लेकिन बाद में वह पलट गई थी और वसीम का नाम ले दिया था. अब पुलिस एक बार फिर रेखा के गायब होने वाली फाइल खोलने की सोच रही है. रेखा की मां माया को अब भी महेश बैरागी पर ही शक है.

महेश बैरागी पर शर्मा नाम के एक व्यक्ति का मकान हड़पने का भी आरोप है. यह आलोक नगर का वही मकान है, जिस में वह पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. यह मकान उस ने किराए पर लिया था और बाद में फर्जी दस्तावेज बनवा कर मकान पर कब्जा कर लिया था. मकान मालिक को उस ने मारपीट कर भगा दिया था. अब पुलिस उस के खिलाफ मकान पर जबरन कब्जा करने का भी केस दर्ज करेगी. सन 2012 में संयोगितागंज थाने की पुलिस ने उस के आलोकनगर वाले घर से उसे अश्लील सीडी बनाते हुए भी पकड़ा था. बाद में 2013 में वह एक महिला से अश्लील बात करने के आरोप में भी पकड़ा गया था.

बहरहाल, जितना जटिल कविता मर्डर केस था, उतना ही जटिल महेश बैरागी का करेक्टर भी है. उस की पूरी हकीकत विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगी. Crime News

 

Dehradun Crime: काल बनी एक बहू

Dehradun Crime: फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही चंचल बेहद खूबसूरत और पढ़ीलिखी थी. फौजी पति की दूरियों की वजह से वह संजय के प्रेम में उलझ गई. सास ने उसे संभालने की कोशिश की तो संजय चंचल के साथसाथ करोड़ों की प्रौपर्टी के चक्कर में ऐसा अंधा हुआ कि उस ने चंचल के साथ मिल ऐसी खतरनाक साजिश रची कि…

कमला जोशी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 25 किलोमिटर दूर थाना प्रेमनगर के संपन्न गांव श्यामपुर में रहती थीं. उन के परिवार में 2 बेटे बड़ा राजेंद्र और छोटा दीपक था. दोनों बेटों का वह विवाह कर चुकी थीं. राजेंद्र खेतीबाड़ी संभालता था, जबकि दीपक भारतीय सेना में नौकरी कर रहा था. दीपक की पत्नी चंचल कमला के पास ही रहती थी. वह देहरादून में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी. वह स्कूटी से आतीजाती थी.

कमला जोशी के पास करोड़ों की प्रौपर्टी थी. घर से लगी रही उन की 4 बीघा जमीन थी, देहरादून में भी उन्होंने प्लौट खरीद रखा था. उन का परिवार वैसे तो खुशहाल था, लेकिन उन्हें एक बात की हमेशा फिक्र लगी रहती थी. दरअसल राजेंद्र का विवाह उन्होंने 7-8 साल पहले कर दिया था, लेकिन अनबन के चलते एक साल बाद ही उस का पत्नी से तलाक हो गया था. राजेंद्र का एक बेटा था भास्कर, जिसे उस ने अपने पास ही रख लिया था. 7 वर्षीय भास्कर परिवार में सभी का लाडला था.

कमला उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी थीं. वह चाहती थीं कि किसी भी तरह बड़े बेटे की गृहस्थी दोबारा बस जाए तो उन की जिम्मेदारी पूरी हो जाए. इस से एक तो राजेंद्र को सहारा मिल जाता और भास्कर को मां का प्यार. उन की छोटी बहू चंचल सुंदर होने के साथसाथ पढ़ीलिखी और समझदार थी. वह हर तरह से परिवार के सभी सदस्यों का खयाल रखती थी. थोड़ी परेशानी तब होती थी, जब चंचल दीपक के पास चली जाती थी.

दीपक की तैनाती उड़ीसा में थी. नवंबर के दूसरे सप्ताह में भी चंचल दीपक के पास चली गई थी. बड़े बेटे का घर बसाने के लिए कमला ने अपने कई नातेरिश्तेदारों से कह रखा, लेकिन उस की उम्र और एक बेटा होने की वजह से कोई उस से रिश्ता करने को तैयार नहीं था. इस के बावजूद कमला ने प्रयास नहीं छोड़ा. आखिरकार किसी ने उन्हें पिथौरागढ़ में एक रिश्ता बताया. कमला इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं. अपने स्तर से उन्होंने जो जानकारियां जुटाईं, उस हिसाब से लड़की और उस का परिवार दोनों ही बहुत अच्छे थे.

बातचीत हो जाने के बाद कमला ने वादा कर लिया कि वह जल्द ही लड़की देखने आएंगी. दीपक अपनी मां और भाई से बात करता रहता था. 27 नवंबर, 2015 की सुबह उस ने राजेंद्र के मोबाइल पर फोन किया तो उस की बात कमला से हुईं. उन्होंने उसे बताया कि वे लोग रास्ते में हैं और लड़की देखने के लिए पिथौरागढ़ जा रहे हैं. कमला ने बताया था कि उन के साथ राजेंद्र और भास्कर भी हैं. मां के साथ हुई दीपक की यह आखिरी बातचीत थी. क्योंकि उस ने शाम के वक्त मां के मोबाइल पर फोन किया तो वह स्विच औफ मिला. इस के बाद रात से सुबह हो गई, लेकिन दीपक की मां से दोबारा बात नहीं हो सकी.

इस से उस की चिंता बढ़ गई. उस ने किसी तरह पता कर के लड़की वालों के यहां पिथौरागढ़ फोन किया तो पता चला कि वे वहां पहुंचे ही नहीं थे, जबकि वे लोग उन का इंतजार कर रहे थे. दीपक ने अपने नातेरिश्तेदारों को भी फोन किए, पर घर वालों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. उस का मन तरहतरह की आशंकाओं से घिरने लगा. वे घर भी वापस नहीं पहुंचे थे. दीपक इस से परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वे लोग गए तो कहां गए.

कुछ नहीं सूझा तो उस ने छुट्टी ली और पत्नी चंचल के साथ अगले दिन घर पहुंच गया. जब वह अपने स्तर से उन की खोजबीन में नाकाम रहा तो उस ने स्थानीय थाना प्रेमनगर में अपनी मां, भाई और भतीजे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. दीपक ने एसएसपी डा. सदानंद दाते से भी मिल कर परिवार को खोजने की गुजारिश की. पुलिस ने खोजबीन शुरू की तो पता चला कि 28 नवंबर को उन की कार नंबर – यूके 07 एपी 5359 उत्तर प्रदेश के रामपुर जनपद के बिलासपुर इलाके में लावारिस हालत में पाई गई थी.

दीपक ने पुलिस को बताया कि राजेंद्र कार चलाना नहीं जानते थे. पिथौरागढ़ जाने के लिए वे कोई ड्राइवर कर के गए होंगे. लेकिन उन के साथ ड्राइवर कौन गया था, यह उसे पता नहीं था. एसपी (सिटी) अजय कुमार के निर्देश पर पुलिस ने बिलासपुर पहुंच कर कार की जांचपड़ताल की. कार में सभी सामान सुरक्षित था. बारीकी से जांच की गई तो उस में एक्सिस बैंक के एटीएम की एक परची मिली. वह उपनगर काशीपुर की थी. इस से अनुमान लगाया गया कि काशीपुर में उन्होंने एटीएम का इस्तेमाल किया होगा. सदानंद दाते ने एक पुलिस टीम काशीपुर के लिए रवाना कर दी. पुलिस  ने एटीएम के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी.

इस फुटेज से पता चला कि राजेंद्र और उस की मां कमला करीब 8 मिनट एटीमए केबिन में रहे थे. बाद में उन के पास एक लंबातगड़ा युवक भी आया था, जिस से उन्होंने कुछ बात की थी. संभावना थी कि वही ड्राइवर रहा होगा. हालांकि उस का चेहरा बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं था, लेकिन पुलिस को उम्मीद थी कि उस के जरिए अब जोशी परिवार के लापता होने का सुराग मिल जाएगा. लेकिन यह उम्मीद ज्यादा नहीं टिक सकी, पता चला कि वह वहां का सिक्योरिटी गार्ड था. इस से केवल यह पता चला कि जोशी परिवार काशीपुर तक सुरक्षित था.

जोशी परिवार रहस्यमय हालात में कहां लापता हो गया, कोई नहीं जानता था. इसी बीच ऊधमसिंहनगर में सितारगंज के सिडकुल के पास एक बच्चे का शव पड़ा मिला. शव मुख्य सड़क से करीब 30 मीटर अंदर झाडि़यों में मिला था. शव मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी सी.एस. बिष्ट मौके पर पहुंचे. बच्चे की हत्या गरदन काट कर की गई थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एएसपी टी.डी. वैला भी घटनास्थल पर पहुंचे.

मौके पर पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस ने उस के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस की सूचना मिलने पर दीपक भी सितारगंज पहुंचा. शव देख कर वह बिलख पड़ा. वह शव उस के भतीजे भास्कर का था. सितारगंज पुलिस ने बच्चे की हत्या, अपहरण और साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. जो जोशी परिवार लापता था. उस में से एक बच्चे भास्कर की हत्या की जा चुकी थी. उन की कार भी बरामद हो चुकी थी. जबकि कमला और राजेंद्र का कुछ पता नहीं था. ऊधमसिंहनगर के एसएसपी केवल खुराना ने इस मामले की तह तक जाने और गहनता से जांच कर ने के लिए एएसपी टी.डी. वैला, एएसपी काशीपुर कमलेश उपाध्याय और सीओ खटीमा लोकजीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस की 3 टीमों का गठन किया.

लेकिन उन्हें घटना के तार देहरादून से जुड़े होने का अंदेशा था. सब से अहम बात यह थी कि राजेंद्र जिस ड्राइवर को अपने साथ ले कर गया होगा, वह कार ड्राइवर कौन था, यह पता लगाना जरूरी था. ड्राइवर का पता चलने पर ही अहम सुराग मिल सकते थे. पुलिस ने जोशी परिवार के आसपास रहने वालों से भी पूछताछ की, लेकिन ड्राइवर के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सका. ड्राइवर को उन्होंने हायर किया था या कोई जानपहचान वाला चालक था, इस बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा था. हां, यह आशंका जरूर प्रबल हो गई थी कि जोशी परिवार किसी बड़ी साजिश का शिकार हुआ है. भास्कर का शव मिलने के बाद राजेंद्र और उस की मां के जीवित होने की उम्मीद कम ही रह गई थी.

पुलिस ने दीपक और उस की पत्नी चंचल से भी पूछताछ की, लेकिन उन्होंने किसी से भी कोई रंजिश होने से इंकार कर दिया. जोशी परिवार के पास करोड़ों की पारिवारिक जमीन थी. यह पूरी प्रौपर्टी कमला के नाम थी. इस नजरिए की गई जांच में सामने आया कि प्रौपर्टी को ले कर भी किसी से किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं था. ड्राइवर का पता लगाने के लिए पुलिस ने राजेंद्र के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल की, लेकिन उस में भी कोई नंबर ऐसा नहीं मिला, जो किसी ड्राइवर का रहा हो.

राजेंद्र के मोबाइल में आखिरी काल पिथौरागढ़  से आई थी. पुलिस वहां पहुंची तो वह उस लड़की के पिता का नंबर था, जिसे जोशी परिवार देखने जा रहा था. उन्होंने बताया कि राजेंद्र का फोन 27 नवंबर को सिर्फ यह बताने के लिए आया था कि वे लोग उन के यहां आ रहे हैं. इस के बाद राजेंद्र से चाहकर भी उन का कोई संपर्क नहीं हो सका था. पुलिस के सामने अब 2 तरह की आशंकाएं थीं. एक तो यह कि इस परिवार की हत्याएं लूटपाट के लिए की गई थीं और दूसरी यह कि कार ड्राइवर ने ही उन लोगों के साथ कुछ गलत किया हो. इस बात को ध्यान में रख कर दोनों जिलों देहरादून और ऊधमसिंहनगर की पुलिस ने कई संदिग्ध लोगों से पूछताछ की.

लेकिन कोई सुराग नही मिल सका. मामला उलझ कर रह गया था. वारदात का मोटिव समझ से परे था. जोशी परिवार की खुले तौर पर किसी से कोई रंजिश नहीं थी और न ही कोई दूसरा ऐसा विवाद जिस के लिए परिवार को ही लापता कर दिया जाता. नि:संदेह इस घटना को साजिश के तहत अंजाम दिया गया था. पुलिस ने राजेंद्र के पूर्व ससुराल वालों से भी पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस जांचपड़ताल में जुटी थी, परंतु कहीं से कोई सुराग हाथ नहीं लग रहा था.

पुलिस ने शक के आधार पर काम करती है. परिवार की समाप्ति पर कमला की करोड़ों की प्रौपर्टी का दीपक ही एकलौता वारिस था. यह भी संभव था कि उस के इशारे पर ही किसी रहस्यमय तरीके से इस मामले को अंजाम दिया गया हो. आज के दौर में प्रौपर्टी को ले कर हत्याएं हो जाना कोई नई बात नहीं है. अपने ही अपनों के खून के प्यासे बन जाते हैं. प्रौपर्टी के एंगल पर पुलिस ने दीपक को भी शक के दायरे में रख कर 5 दिसंबर को उस से गहन पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस किसी नतीजे पर पहुंच पाती, इस से पहले गुत्थी और ज्यादा उलझ गई. एसएसपी केवल खुराना के निर्देश पर पुलिस ने 7 दिसंबर को उस स्थान के आसपास कांबिग कर के खोजबीन शुरू की, जहां भास्कर का शव मिला था. इस खोजबीन में उत्तर दिशा की झाडि़यों से पुलिस को 2 शव और मिले. दोनों शव बुरी तरह सड़गल चुके थे. कपड़ों के आधार पर उन की शिनाख्त कमला और राजेंद्र के रूप में की गई. पुलिस ने दोनों शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड में पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि हत्याओं को किस ने और क्यों अंजाम दिया? ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी, जिस के लिए 3 हत्याएं कर दी गईं. ड्राइवर का अब तक कुछ पता नहीं चल सका था.

जबकि वही मुख्य संदिग्ध भी था. वह सुपारी किलर भी हो सकता था और किसी लुटेरे गिरोह का सदस्य भी. दीपक व उस की पत्नी किसी रंजिश की बात से इनकार कर चुके थे. इस मामले की जांच में स्पैशल औपरेशन गु्रप की टीम को भी लगा दिया गया. देहरादून व ऊधमसिंहनगर पुलिस की 10 टीमें केस के खुलासे में जुट गईं. पुलिस के शक की सुई ड्राइवर पर ही टिकी थी. क्योंकि कुछ ऐसे ड्राइवर भी होते हैं, जो दिखावे के लिए तो कार चलाने का काम करते हैं, लेकिन किसी गिरोह के साथ मिल कर अपराध को अंजाम देते हैं.

देहरादून से सितारगंज के बीच कई सुनसान इलाके थे, लेकिन हत्यारों ने उसी स्थान को क्यों चुना, यह भी एक बड़ा सवाल था. ऐसा प्रतीत होता था कि हत्या पूर्व नियोजित थी और शातिराना अंदाज में तीनों को ठिकाने लगा दिया गया था. पुलिस के पास हत्या की जांच के लिए 3 बिंदु प्रमुख थे. एक ड्राइवर, दूसरा संपत्ति और तीसरा प्रेम प्रसंग. संपत्ति के मामले में पुलिस दीपक से खूब घुमाफिरा कर गहन पूछताछ कर चुकी थी. वह खुद को बेकसूर बता रहा था. उस के खिलाफ पुलिस को कोई सबूत भी नहीं मिला था. ड्राइवर के गुनाहगार और राजदार होने के शक में भी कई लोगों से पूछताछ की जा चुकी थी.

जांच कर रही पुलिस ने इस बार नजरिया बदल कर प्रेम के एंगल पर भी काम करना शुरू किया. इस के लिए कुछ रिश्तों को खंगालना शुरू किया गया. इस कड़ी में घर की छोटी बहू यानी दीपक की पत्नी चंचल पर जांच केंद्रित की गई. पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स की जांचपड़ताल शुरू की तो पुलिस चौंकी. दरअसल घटना वाले दिन उस के मोबाइल पर एक नंबर से कुछ एसएमएस किए गए थे, जिस नंबर से एसएमएस किए गए थे, वह श्यामपुर के ही संजय पंत का था.

संजय पंत जोशी परिवार के पड़ोस में ही रहता था. इस पर पुलिस ने संजय के मोबाइल की लोकेशन की जांच की तो उसे यह देख कर झटका लगा कि घटना वाले दिन उस की लोकेशन राजेंद्र के मोबाइल के साथसाथ सितारगंज तक गई थी. इस से साफ था कि घटना वाले दिन वह उन के साथ था. चंचल और संजय मोबाइल पर अकसर बातें किया करते थे. काल डिटेल्स इस की गवाही दे रही थी. इस का मतलब संजय और चंचल का जरूर कोई गहरा कनेक्शन था.

गुत्थी सुलझती नजर आई तो पुलिस बिना देरी किए देहरादून पहुंची. संजय को पकड़ लिया गया. देहरादून के एसपी (सिटी) अजय कुमार के निर्देश पर चंचल को भी हिरासत में ले लिया गया. उन दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस ऊधमसिंहनगर आ गई. पुलिस ने दोनों के मोबाइल ले कर चेक किए तो उन में से घटना वाली तारीख के एसएमएस नदारद थे. जाहिर था कि उन्होंने एसएमएस डिलीट कर दिए थे. पुलिस ने दोनों से गहराई से पुछताछ की तो उन्होंने जो बताया, सुन कर पुलिस के भी रोंगटे खड़े हो गए.

जोशी परिवार का कातिल संजय पंत था और इस साजिश में चंचल भी शामिल थी. दोनों के अवैध रिश्ते और संपत्ति का लालच इतने बड़े कांड की वजह बन गया था. किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक बहू पूरे परिवार के लिए काल बन जाएगी. करीब डेढ़ साल पहले संजय और चंचल की नजरें चार हुई थीं, धीरेधीरे दोनों का झुकाव एकदूसरे की तरफ हो गया था. चंचल का पति दूर रहता था, संजय ने इस बात का फायदा उठाया और अपनी मीठीमीठी बातों से चंचल को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हो गया.

चंचल को भी पति से दूरियां खलती थीं. भविष्य की परवाह किए बिना दोनों ने प्रेम की पींगे बढ़ानी शुरू कर दीं. संजय किसी न किसी बहाने से कमला के घर आनेजाने लगा. एक ही गांव और पड़ोसी होने से उस का इस तरह आना कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी. वक्त गुजरता रहा. संजय और चंचल मुलाकातों के अलावा मोबाइल पर भी बातें किया करते थे. दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार कर चुके थे. एक दौर ऐसा भी आया, जब उन के बीज मर्यादा की दीवार गिर गई. यूं तो हर नजरिए से उन का रिश्ता अवैध था, लेकिन उन दोनों को इस में खुशियां मिल रही थीं.

चंचल काफी पढ़ीलिखी थी. उस की समझदारी पर पूरे परिवार को गर्व था. कमला ने जमाना देखा था. बहू के रंगढंग उन से छिप नहीं सके. उन्होंने एक दिन चंचल को समझाया, ‘‘संजय का हमारे घर ज्यादा आनाजाना ठीक नहीं है बहू. मैं सबकुछ जान कर भी अंजान नहीं रह सकती. तुम खुद को सुधार लो, इसी में परिवार की भलाई है.’’

चंचल जैसे इस के लिए पहले से तैयार थी. यह एक सच है कि ऐसी गलतियां कर ने वाला इंसान अपनी कारगुजारियों को छिपाने के लिए झूठ बोलने लगता है और इसी के चलते वह काफी शातिर भी हो जाता है. वह जानती थी कि एक न एक दिन यह नौबत आ कर रहेगी. अच्छा इंसान वही होता है, जो अपनी गलती स्वीकार कर के उसे सुधार ले, लेकिन चंचल ने उल्टा दांव चला. वह हैरान हो कर बोली, ‘‘यह आप क्या कह रही हैं मांजी? आप को इतनी घटिया बातें सोचते हुए शरम नहीं आई?’’

‘‘सोचना क्या, मैं सब देख रही हूं.’’ कमला गुस्से से बोलीं.

‘‘सच देखतीं तो आप ऐसा नहीं बोलतीं. ऐसा कुछ भी नहीं है, जैसा आप सोच रही हैं. अपने दिमाग से इस तरह की बातों को निकाल दीजिए.’’

‘‘सच्चाई तो कड़वी लगती है बहू, लेकिन मैं ने तुम्हें समझाना अपना फर्ज समझा. मैं तुम्हारी हरकतों से अपने परिवार को बदनाम नहीं होने दूंगी.’’ बहू के शातिराना रुख से हैरान कमला ने चेतवानी भरे लहजे में कहा.

उन्होंने अगले दिन संजय को भी समझाया कि वह उन के यहां ज्यादा न आया करे. पतन की राहें बहुत रपटीली होती हैं. कुछ दिनों तो दोनों दूर रहे, लेकिन बहुत जल्द दोनों पुराने ढर्रे पर उतर आए. संजय रात के वक्त भी छिपतेछिपाते आने लगा. जो गलतियां करता है, वह कहीं न कहीं लापरवाह भी हो जाता है. एक रात कमला ने उन दोनों को पकड़ा तो उन्हें जम कर फटकारा. संजय चुपचाप वहां से खिसक गया. कमला ने चंचल को खरीखोटी सुनाई, ‘‘मैं ने सोचा था चंचल कि तू मेरी बातों से संभल जाएगी, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर चला गया है. अब मैं यह सब बरदाश्त नहीं कर सकती. मुझे इस बारे में दीपक से बात करनी पड़ेगी.’’

चंचल रंगेहाथों पकड़ी गई थी. उस के पास कहनेसुनने को कुछ नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात उस के पति तक पहुंचे. उस ने कमला से माफी मांग कर कभी कोई गलती न करने की कसम खाई. सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. कमला ने भी वक्त के साथ बहू को माफ कर दिया. बेटे को दु:ख न पहुंचे, इसलिए वह इन बातों को दबा गईं. संजय का आनाजाना भी कम हो गया. अपने किए पर वह भी माफी मांग चुका था. कुछ दिनों की सावधानी के बाद दोनों अब देहरादून जा कर एकदूसरे से मिलने लगे. चंचल फैशन डिजाइनिंग के कोर्स के लिए जाती थी. इसी बहाने वह संजय से मिल लेती थी. मोबाइल पर भी वह बातें और एसएमएस किया करते थे. अब दोनों को ही परिवार के लोग बाधा लगने लगे थे.

अपने अवैध रिश्ते में संजय और चंचल एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खा चुके थे. संजय दुष्ट और अपराध करने वाला युवक था. चंचल पूरी तरह उस के रंग में रंगी हुई थी. उन के प्रेमप्रसंग में कमला व राजेंद्र बड़ी बाधा थे, गनीमत यह थी कि ये बातें अभी दीपक को नहीं पता थी. संजय चाहता था कि अपने और चंचल के बीच की हर दीवार को गिरा कर न सिर्फ उस से विवाह कर ले, बल्कि करोड़ों की प्रौपर्टी भी उस की हो जाए. उस ने इस बारे में चंचल से बात की तो उस ने भी अपनी स्वीकृति दे दी.

इस के बाद संजय इसी बारे में सोचने लगा. उस ने रुपयों का इंतजाम कर के 30 हजार रुपए में सितारगंज के रहने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के युवक अनिल कुमार से एक माउजर खरीद लिया. संजय व चंचल चाहते थे कि हत्याएं इतनी सफाई से की जाएं कि किसी को उन के ऊपर जरा भी शक न हो. वे दोनों जानते थे कि कमला राजेंद्र के लिए लड़की देखने के लिए पिथौरागढ़ जाने वाली हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर वह पहले ही अपने पति के पास उड़ीसा चली गई. उड़ीसा जाने के बावजूद वह संजय के संपर्क में बनी रही.

संजय ने उस से वादा किया कि अगर कमला पिथौरागढ़ गईं तो वह सभी का काम तमाम कर देगा. संजय ने अपनी योजना को अंजाम देने के लिए कमला और राजेंद्र से मेलजोल और बढ़ा लिया. उसे पता चला कि 27 नवंबर को उन्हें पिथौरागढ़ जाना है. राजेंद्र को ड्राइवर की जरूरत थी. उस ने इस बारे मं सजय से कहा तो वह खुद उन के साथ जाने को तैयार हो गया. संजय कार चलाना जानता था. कमला और राजेंद्र को इस बात की खुशी हुई कि संजय उन के लिए अपना समय निकाल रहा है.

27 नवंबर को वह उन्हें कार से ले कर पिथैरागढ़ के लिए निकला. संयोगवश उसे किसी ने भी उन के साथ जाते नहीं देखा. संजय ने अपने पास माउजर और एक चाकू रख लिया. ये लोग हरिद्वार पहुंचे तो दीपक का फोन आया और उस ने मां से बात की. इस के बाद संजय ने बहाने से राजेंद्र का मोबाइल लिया और उस का सिम ढीला कर दिया, जिस से उस का नेटवर्क चला गया. राजेंद्र टैक्नोलौजी के मामले में कमजोर था, इसलिए उस ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. संजय नहीं चाहता था कि किसी का फोन आए और वह लोग उस के साथ होने के बारे में कुछ बता दें. वे काशीपुर पहुंचे तो राजेंद्र ने एटीएम से कुछ पैसे निकाले.

इस बीच संजय ने 2 बार चंचल से 4-4 मिनट बात की. इस के बाद जंगल का रास्ता सुनसान था. कमला और भास्कर कार में सो रहे थे, जबकि राजेंद्र जाग रहा था. सिडकुल के पास पहुंच कर संजय ने कार रोक दी. राजेंद्र ने उस से कार रोकने की वजह पूछी तो उस ने कहा कि उसे थकान हो रही है. कुछ देर रुक कर चलेंगे. संजय कार से नीचे उतर गया. राजेंद्र भी नीचे उतर गया. बाहर से कार के अंदर कोई आवाज न जाए, इसलिए संजय ने कार के शीशे बंद कर दिए.

संजय बात करते हुए बहाने से राजेंद्र को कुछ दूर ले गया और माउजर से उस के सिर में गोली मार दी. राजेंद्र ने तुरंत ही दम तोड़ दिया. संजय उसे खींच कर झाडि़यों में ले गया और लाश को छिपा दिया. इस बीच उस ने राजेंद्र की जेब से मोबाइल निकाल कर उसे स्विच्ड औफ कर दिया. इस के बाद वह कमला जोशी के पास पहुंचा और उन्हें बताया कि राजेंद्र झाडि़यों के पीछे बैठ कर शराब पी रहा है और आने से मना कर रहा है. यह सुन कर कमला जोशी उस के साथ चल दीं. मौका पाते ही संजय ने उन्हें भी गोली मार दी.

दोनों शव ठिकाने लगा कर वह कार ले कर थोड़ा दूर आगे गया और एक जगह पर कार रोक कर भास्कर को जगा कर अपने साथ झाडि़यों की तरफ ले गया. संजय हैवान बन चुका था. उस ने चाकू निकाल कर मासूम भास्कर की पहले गरदन काटी और फिर उस के पेट पर वार किए. भास्कर ने तड़प कर दम तोड़ दिया. हत्या कर के तीनों की लाशें ठिकाने लगाने के बाद उस ने यह बात चंचल को एसएमएस कर के बता दी. कमला ने बैग में जो आभूषण लड़की को देने के लिए रखे थे, वह उस ने खुद कब्जा लिए. उस ने एक थैले में आभूषण, चाकू व माउजर रखा और आगे जा कर कलमठ में जंगल में एक स्थान पर गड्डा खोद कर उसे छिपा दिया.

इस के बाद वह रुद्रपुर होते हुए बिलासपुर पहुंचा और सड़क किनारे कार छोड़ कर बस से देहरादून चला गया. हत्या का मामला ठंडा हो जाने के बाद चंचल और संजय की योजना दीपक को भी ठिकाने लगाने की थी. लेकिन उस से पहले ही वे पुलिस के शिकंजे में आ गए. संजय की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हथियार और आभूषण बरामद करने के साथ ही पुलिस ने माउजर बेचने वाले अनिल को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत भेज दिया गया.

चंचल के अविवेक ने जहां एक भरेपूरे परिवार को उजाड़ दिया, अंधे प्यार और लालच ने संजय को भी जुर्म की राह पर धकेल दिया. दोनों ने मर्यादाओं का खयाल किया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. चंचल के पति दीपक का कहना था कि उसे नहीं लगता कि उस की पत्नी का हत्या में कोई हाथ है. वह पूरे कांड का मास्टरमाइंड संजय को मानता है. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. Dehradun Crime

 

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Crime Story: रविंद्र का दिल दोस्त की पत्नी परमजीत पर आया तो वह उस पर विदेश से कमा कर लाई दौलत लुटाने लगा. परिणामस्वरूप उस ने परमजीत को तो पा लिया, लेकिन दोस्त को गंवा कर…

जगतार सिंह में भले ही लाख बुराईयां रही हों, लेकिन उस में एक सब से बड़ी अच्छाई यह थी कि उसे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो, वह शाम के 7, साढ़े 7 बजे तक घर जरूर लौट आता था. जिस किसी को उस से मिलना होता या कोई काम करवाना होता, वह शाम 7 बजे के बाद उस का इंतजार उस के घर पर करता था. जगतार सिंह पंजाब बिजली बोर्ड में नौकरी करता था. लेकिन न जाने क्यों आज से 5-6 साल पहले उस ने अपनी यह नौकरी छोड़ दी और घर पर रह कर स्वतंत्र रूप से बिजली मरम्मत का काम करने लगा था. उस के इलाके के ज्यादातर किसान बिजली बोर्ड के बजाय उस पर ज्यादा भरोसा करते थे.

इसीलिए दूरदूर तक के गांवों में जब किसी की घर की बिजली या ट्यूबवेल की मोटर खराब होती, लोग बिजली बोर्ड में शिकायत करने के बजाय जगतार को ले जा कर अपना काम करवाना ज्याद बेहतर समझते थे. एक तो इस से उन का समय बच जाता था, दूसरे जगतार की भी रोजीरोटी अच्छी तरह से चल रही थी. 25 अगस्त, 2015 की शाम जब जगतार अपने निश्चित समय पर घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों को चिंता हुई. इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. क्योंकि उस का फोन बंद बता रहा था. जब रात 10 बजे तक भी वह घर नहीं लौटा तो उस के घर वाले परेशान हो उठे.

जगतार सिंह का मोबाइल बंद था, इसलिए बात नहीं हो पा रही थी. उस की पत्नी परमजीत  कौर, बड़ा भाई गुरबख्श सिंह तथा गांव के कुछ अन्य लोग उस की तलाश में निकल पड़े थे. रात करीब 11 बजे अचानक उस का फोन मिल गया. उस की पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी से उस की बात हो गई. इस के बाद उस ने सभी को बताया कि जगतार अपने दोस्तों के साथ कहीं बैठा खापी रहा है. चिंता की कोई बात नहीं है, थोड़ी देर में वह घर आ जाएगा. जगतार अपने किन दोस्तों के साथ बैठा खापी रहा है, यह उस ने नहीं बताया था.

बहरहाल, जगतार से बात हो जाने के बाद घर वालों की चिंता कुछ कम हो गई. लेकिन फोन पर कहने के बावजूद जगतार रात को घर नहीं आया. उस के बाद से उस का फोन बंद हो गया तो सुबह तक बंद ही रहा. अगले दिन यानी 26 अगस्त, 2015 को किसी ने बताया कि गांव नरीकोकलां स्थित पंचायती अनाज मंडी स्टोर की ट्यूबवेल की हौदी में जगतार सिंह की लाश पड़ी है. पंचायती अनाज मंडी जगतार के गांव सहिके से करीब 4-5 किलोमीटर दूर थी. लाश पड़ी होने की सूचना मिलने पर गांव के सरपंच, उस की पत्नी, भाई और गांव के कुछ लोग नरीकोकलां जा पहुंचे. वहां एक ट्यूबवेल की पानी की हौदी में जगतार की लाश पड़ी थी.

उस के सिर और पैर पर मामूली चोटों के निशान थे. लाश को ट्रैक्टर की ट्रौली पर लाद कर उस के गांव सहिके लाया गया. जगतार के पास अपना स्कूटर था, जिस से वह गांवगांव जा कर लोगों का बिजली का काम करता था. काफी तलाशने पर भी उस का स्कूटर वहां नहीं मिला. यही नहीं, उस के औजार और मोबाइल फोन भी नहीं मिला. बहरहाल, गांव आ कर जब घर और गांव वालों ने कहा कि यह साफसाफ हत्या का मामला और इस की सूचना पुलिस को देनी चाहिए तो उस की पत्नी परमजीत कौर उर्फ पम्मी ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि वह इस बात की सूचना पुलिस को कतई नहीं देना चाहती.

क्योंकि पुलिस को सूचना दी गई तो वह लाश को कब्जे में ले कर उस का पोस्टमार्टम कराएगी. वह नहीं चाहती कि मरने के बाद उस के पति की लाश को काटपीट कर दुर्दशा की जाए. जगतार के बड़े भाई गुरबख्श सिंह और सरपंच ने परतजीत को काफी समझाया कि पोस्टमार्टम होने से पता चल जाएगा कि जगतार की मौत क्यों और कैसे हुई है? लेकिन परमजीत अपनी बात पर अड़ी रही. उस का कहना था कि जगतार की मौत बिजली का करंट लगने से हुई होगी, इसलिए पोस्टमार्टम की कोई जरूरत नहीं है.

सरपंच ही नहीं, घर तथा गांव वाले कहते रह गए, लेकिन परमजीत ने किसी की नहीं सुनी. मजबूर हो कर गांव वालों ने पुलिस को सूचित किए बगैर ही जगतार सिंह का अंतिम संस्कार करा दिया. पंजाब के जिला संगरूर का एक कस्बा है अमरगढ़. इसी कस्बे से लगभग 8 किलोमीटर दूर गांव है सहिके. गुरनाम सिंह इसी गांव के रहने वाले थे. उन की 7 संताने थीं, जिन में 3 बेटे और 4 बेटियां थीं. बड़ा बेटा गुरबख्श सिंह सेना से रिटायर्ड हो कर गांव में ही रहता था. उस से छोटा था जगतार, जो बिजली मरम्मत का काम करता था और गांव में ही रहता था. उस से छोटा था अवतार सिंह, जिस की जून, 1999 में मौत हो गई थी.

उस की मौत कैसे हुई, इस बात का पता आज तक नहीं चला. गुरनाम सिंह की भी मौत हो चुकी है. गांव में अब सिर्फ 2 भाई, फौजी गुरबख्श सिंह और जगतार सिंह ही रहते थे. दोनों के मकान भले ही अलगअलग थे, लेकिन आमनेसामने थे. सन 1994 में जगतार का विवाह परमजीत कौर से हुआ था. उस के 2 बच्चे थे, 19 साल की बेटी हरप्रीत कौर और 14 साल का बेटा. परमजीत कौर ने जिद कर के पति का अंतिम संस्कार भले ही करा दिया था, लेकिन फौजी गुरबख्श सिंह के मन में हर समय यही बात घूमा करती थी कि आखिर परमजीत ने जगतार की लाश का पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराने दिया. यह एक ऐसा संदेह था, जो उसे किसी भी तरह से चैन नहीं लेने दे रहा था.

जगतार के अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी हो गईं तो परमजीत अपने मायके मलेरकोटला चली गई. इस के बाद तो वह पूरी तरह से आजाद हो गई. कभी वह संगरूर चली जाती तो कभी अमरकोट. उसे न पति की मौत का दुख था और न अब बच्चों की कोई परवाह रह गई थी. यह सब देख कर फौजी गुरबख्श सिंह को और ज्यादा दुख होता. जब नहीं रहा गया तो उन्होंने सरपंच के साथ मिल कर निजी तौर पर परमजीत कौर के बारे में छानबीन की तो उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया. परमजीत की हरकतों से मन का संदेह बढ़ता गया तो 8 सितंबर को वह सरपंच को साथ ले कर थाना अमरगढ़ जा पहुंचे.

सारी बात उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर संजीव गोयल को बताई तो उन्होंने भी संदेह व्यक्त किया कि उन के भाई की मौत बिजली का करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है. संजीव गोयल ने गुरबख्श सिंह की पूरी बात सुन कर उन की शिकायत दर्ज करा कर उन्हें पूरा विश्वास दिलाया कि वह जल्दी ही जगतार की मौत के रहस्य से परदा उठा देंगें. इस मामले में संजीव गोयल के सामने समस्या यह थी कि मर चुके जगतार सिंह का अंतिम संस्कार हो चुका था. कोई इस तरह का सबूत भी नहीं था कि उसी के आधार पर वह इस मामले की जांच करते.

अब जो भी सबूत जुटाए जा सकते थे, वे सिर्फ पूछताछ कर के ही जुटाए जा सकते थे. इसलिए उन्हें लगा कि सब से पहले मृतक जगतार की पत्नी परमजीत कौर से ही पूछताछ करनी चाहिए. उन्होंने सहिके जा कर परमजीत कौर से जगतार सिंह की मौत के बारे में पूछा तो उस ने उन से भी कहा कि उन की मौत बिजली का करंट लगने से हुई थी. उस दिन वह पंचायती मंडी के उस ट्यूबवेल की मोटर ठीक करने गए थे. मोटर ठीक करते हुए उन्हें करंट लगा और वह हौदी में गिर गए, जिस से उन की मौत हो गई.

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन तुम ने इस बात की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? तुम्हें ऐसी क्या जल्दी थी कि बिना पोस्टमार्टम कराए ही तुम ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया?’’ संजीव गोयल ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने सोचा कि आज नहीं तो कल उन का अंतिम संस्कार कराना ही है, इसलिए मैं ने देर करना उचित नहीं समझा और उन का अंतिम संस्कार करा दिया.’’

‘‘अच्छा जगतार की अस्थियां कहां हैं?’’ संजीव गोयल ने पूछा.

‘‘उन्हें तो मैं ने श्रीकीरतपुर साहिब में प्रवाह दी हैं.’’

‘‘मतलब, तुम ने सारे सबूत मिटा दिए, कुछ भी नहीं छोड़ा. खैर, फिर भी मैं सच्चाई का पता लगा ही लूंगा.’’ संजीव गोयल ने कहा.

इस के बाद उन्होंने अन्य लोगों से पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्हें पता चला कि जगतार के मरने के बाद से परमजीत कौर को न बच्चों की कोई चिंता है और न उस की मौत का जरा भी दुख है. उसे देख कर कहीं से भी नहीं लगता कि 10-15 दिन पहले ही उस के पति की मौत हुई है. बहरहाल, उस दिन की पूछताछ में सरपंच ने ही नहीं, गांव के जिस किसी से उन्होंने पूछा, सभी ने यही आशंका व्यक्त की कि जगतार की मौत करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है और उस की हत्या में कहीं न कहीं से परमजीत का हाथ जरूर है.

इसी पूछताछ में संजीव गोयल को गांव वालों से पता चला कि परमजीत कौर के घर रविंद्र उर्फ रवि तथा जुगराज का काफी आनाजाना था. हत्या वाले दिन यानी 25 अगस्त की शाम जगतार को उन्हीं दोनों के साथ टोरिया गांव की ओर जाते देखा गया था. संजीव गोयल थोड़ा और गहराई में गए तो पता चला कि परमजीत कौर और रविंद्र के बीच जरूर कुछ चल रहा है. इस के तुरंत बाद उन के एक मुखबिर ने उन्हें बताया कि परमजीत कौर को उस ने रविंद्र के साथ मलेरकोटला की ओर जाते देखा था. उन के हाथ में बैग थे, जिस से यही लगता है कि वे गांव छोड़ कर कहीं जा रहे हैं.

यह सूचना मिलते ही संजीव गोयल ने समय गंवाना उचित नहीं समझा और तुरंत जीप से पीछा कर के रास्ते में ही रविंद्र और परमजीत कौर को गिरफ्तार कर के थाने ले आए. फौजी गुरबख्श सिंह के बयान के आधार पर रविंद्र, जुगराज और परमजीत कौर को नामजद कर के जगतार की हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर पूछताछ शुरु की गई. 10 सितंबर, 2015 को संजीव गोयल ने रविंद्र और परमजीत को सक्षम अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान रविंद्र की निशानदेही पर मृतक जगतार का स्कूटर और मोबाइल फोन बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर दोनों को एक बार फिर अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें संगरूर की जिला जेल भेज दिया गया. मृतक जगतार के भाई फौजी गुरबख्श सिंह, सरपंच एवं गांव वालों तथा अभियुक्तों से की गई पूछताछ में जगतार की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह परमजीत कौर के पतन की कहानी थी. जगतार सिंह और रविंद्र बचपन के दोस्त थे. उन का खेलनाकूदना, खानापीना बचपन से अब तक साथ रहा. जवान होने पर भी दोनों ज्यादातर साथ ही रहते थे. रविंद्र सिंह उर्फ रवि पड़ोसी गांव मुंडिया के रहने वाले काका सिंह का बेटा था.

सवेरा होते ही रविंद्र जगतार के गांव सहिके आ जाता या फिर जगतार उस के गांव मुंडिया पहुंच जाता. जवान होने पर दोनों की शादियां ही नहीं हो गईं, बल्कि वे एकएक बेटी के बाप भी बन गए. जगतार बिजली मरम्मत का काम करता था, जबकि रविंद्र निठल्ला घूमते हुए आवारागर्दी किया करता था. बचपन से ही उस की काम करने की आदत नहीं थी. लगभग 8 साल पहले वह अपने एक रिश्तेदार के पास विदेश चला गया, जहां 3 साल रहा. वहां से लौटा तो उस के पास ढेर सारे रुपए थे.  वह कार से जगतार से मिलने उस के घर गया तो उस के लिए भी ढेर सारे महंगे उपहार ले गया था. रविंद्र के ठाठबाट देख कर जगतार की पत्नी परमजीत खूब प्रभावित हुई.

उस दिन के बाद जगतार का घर शराब का अड्डा बन गया. रोज महफिलें सजने लगीं. रविंद्र के साथ उस का दोस्त जुगराज भी आता था. वह गांव शेरखां वाला के रहने वाले राम सिंह का बेटा था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद परमजीत अभी जवान और खूबसूरत लगती थी. उस की मांसल देह किसी को भी दीवाना बना सकती थी. रविंद्र पहले से ही उस का दीवाना था. इसीलिए विदेश से लौटने पर परमजीत को खुश करने के लिए वह उस के लिए भी तरहतरह के महंगे उपहार खरीद कर लाने लगा.

एक दिन जब जगतार की गैरमौजूदगी में उस ने परमजीत कौर का हाथ पकड़ कर कहा कि वह उस से प्यार करने लगा है और उस के लिए पागल हो गया है तो परमजीत खुशीखुशी उस के आगोश में समा गई. इस की वजह यह थी कि वह भी तो रविंद्र और उस की कमाई की दीवानी थी. रविंद्र और परमजीत के बीच अवैधसंबंध तो बन गए, लेकिन जगतार के घर पर रहने की वजह से उन्हें मिलने का अवसर कम ही मिल पाता था. इस का उपाय रविंद्र ने यह निकाला कि जगतार की उस ने मलेरकोटला में बिजली बोर्ड में नौकरी लगवा दी.

वह सुबह नौकरी पर जाता तो रात में ही लौटता. उस के नौकरी पर जाते ही रविंद्र उस के घर पहुंच जाता. यह लगभग रोज का नियम बन गया. रविंद्र परमजीत कौर पर दोनों हाथों से रुपए लुटा रहा था. वह उस के इस तरह खर्च करने से बहुत खुश थी. शायद इसी वजह से उस ने रविंद्र के कहने पर उस के दोस्त जुगराज से भी संबंध बना लिए थे. अब परमजीत एक ही समय में अपने 2 प्रेमियों, रविंद्र और जुगराज को खुश करने लगी थी.

सब कुछ बढि़या चल रहा था कि मोहल्ले में उड़तेउड़ते यह खबर किसी दिन जगतार के कानों तक पहुंच गई. इस के बाद उस ने मलेरकोटला छोड़ दिया और घर पर ही रहने लगा. उसी बीच किसी दिन उस ने परमजीत कौर, रविंद्र और जुगराज को रंगेहाथों पकड़ लिया. उस समय परमजीत कौर और रविंद्र ने माफी मांग कर बात संभाल ली. जगतार ने भी उन्हें माफ कर दिया. लेकिन वे चोरीछिपे मिलते रहे.

परमजीत कौर को इस तरह चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उस ने रुआंसी हो कर कहा, ‘‘देखो रविंद्र, इस तरह चोरीछिपे मिलना मुझे अच्छा नहीं लगता. अगर इस बार हम पकड़े गए तो जगतार माफ नहीं करेगा. तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो तो मुझे भगा ले चलो या फिर जगतार का कोई इंतजाम कर दो.’’

रविंद्र परमजीत की देह का इतना दीवाना था कि उस से बिछुड़ने की कल्पना से ही डरता था. इसलिए उस ने परमजीत कौर के साथ मिल कर जगतार को ही रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस योजना में उस ने जुगराज को भी शामिल कर लिया. 25 अगस्त की शाम रविंद्र ने जगतार के साथ खानेपीने का कार्यक्रम बनाया. यह महफिल उन्होंने सहिके गांव से 4 किलोमीटर दूर खेतों में जमाई. शराब पीने के दौरान रविंद्र और जुगराज ने बातोंबातों में जगतार को कुछ ज्यादा ही शराब पिला दी.

जब जगतार संतुलन खोने लगा तो दोनों उसे ले कर पंचायती मंडी के पास आ गए और वहां उस की जम कर पिटाई की. उस के बाद गला घोंट कर उस की हत्या कर दी और लाश ट्यूबवेल की हौदी में फेंक कर परमजीत को फोन कर दिया कि उन्होंने जगतार की हत्या कर दी है. इस के बाद परमजीत कौर ने घटनास्थल पर जा कर खुद देखा कि जगतार सचमुच मर चुका है या वे झूठ बोल रहे हैं. जगतार की लाश देख कर उसे विश्वास हो गया तो वह गांव लौट आई. जगतार की हत्या के समय वह इतना बेचैन थी कि मात्र एक घंटे में उस ने कई बार रविंद्र को फोन कर के पूछा था कि काम हो गया या नहीं?

यह बात संजीव गोयल को तब पता चली, जब उन्होंने परमजीत कौर और रविंद्र के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. रविंद्र और परमजीत को जेल भेज कर संजीव गोयल ने इस हत्याकांड के तीसरे अभियुक्त जुगराज की तलाश शुरू की तो 16 सितंबर, 2015 को उन्होंने उसे भी संगरूर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी स्वीकार कर लिया कि जगतार की हत्या में रविंद्र के साथ वह भी शामिल था.

पूछताछ के बाद संजीव गोयल ने 17 सितंबर को जुगराज को भी अदालत में पेश किया, जहां से उसे भी जेल भेज दिया गया. जगतार की मौत के बाद उस के बच्चे अकेले रह गए थे. अब वे अपने फौजी ताऊ गुरबख्श सिंह के साथ रह रहे हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Uttar Pradesh Crime: अंधविश्वास का नतिजा

Uttar Pradesh Crime: तंत्रमंत्र की क्रियाओं या अंधविश्वास से किसी का भला नहीं होता, फिर भी अंधविश्वासी लोग ऐसे चक्करों में पड़ जाते हैं. अगर वक्त रहते जफर ने तंत्रमंत्र की राह छोड़ कर अपनी घरगृहस्थी पर ध्यान दिया होता तो वह न होता जो हुआ…

जफर हुसैन उर्फ चांद बाबू के सिर पर धर्म का उन्माद सवार रहता था. वह तरहतरह की तंत्र क्रियाएं करता रहता है, यह पूरा गांव जानता था. इसी वजह से कोई उसे तांत्रिक कहता था तो कोई पागल तो कोई कुछ और. गांव के लोगों से उस के ताल्लुकात अच्छे नहीं थे. इस की वजह यह थी कि वह छोटीछोटी बातों पर गुस्सा हो जाता था. वादविवाद की स्थिति में लोगों को तांत्रिक क्रियाओं की धमकी देना उस की आदत में शुमार था. लिबास भी वह ढोंगियों और पाखंडियों जैसा पहनता था. उस की इन अजीबओगरीब हरकतों से गांव वाले भी अंधविश्वास का शिकार हो गए कि उसे नाराज करने से उन का कोई अनिष्ट हो सकता है. यही वजह थी कि लोग उस से मेलजोल बढ़ाने से कतराते थे.

जफर उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के भोजीपुरा थाना के गांव मैमोर में रहता था. उस के परिवार में पत्नी नईम बानो के अलावा 4 बच्चे, 7 साल का फरहान, 5 साल की फरहीन, 4 साल का फयाज और 1 साल का फमान. जफर का वास्ता चूंकि लोगों से कम था, इसलिए दूसरे लोग भी उस पर कम ही ध्यान देते थे. लेकिन एक दोपहर जफर के घर से आने वाली चीखनेचिल्लाने की आवाजों ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया.

उस के दरवाजे पर पहुंचे लोगों ने अंदर का नजारा देखा तो ठिठक गए. उन्होंने बाहर खड़े हो कर देखा, जफर अपनी बेटी फरहीन को बुरी तरह पीट रहा था. डरीसहमी मासूम बच्ची उस के चंगुल के छूटने के लिए छटपटा रही थी. नईम बानो बेटी को बचाने के लिए उस के साथ धक्कामुक्की कर रही थी.

‘‘इस ने मेरी सारी तांत्रिक क्रिया खराब कर दी. मेरा अच्छा वक्त आने वाला था, लेकिन इस ने उसे खत्म कर दिया. यह मेरी बेटी नहीं, बल्कि इस के अंदर किसी शैतानी आत्मा का साया है.’’ जफर फरहीन को प्रताडि़त करते हुए बड़बड़ा रहा था.

‘‘क्या बकवास कर रहे हो तुम?’’ नईम बानो चिल्लाई तो वह उसे समझाने वाले अंदाज में बोला, ‘‘यह हकीकत है बानो, इस ने शैतानी हरकत की है. मैं इसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’ कहते हुए वह बेटी को बेरहमी से पीटने लगा. नईम बानो तेजतेज चिल्लाने लगी. नईम ही नहीं, फरहीन भी चिल्ला रही थी, ‘‘अब्बू, मुझे छोड़ दो, मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘कैसे छोड़ दूं. तू फरहीन नहीं, बल्कि ऐसा शैतान है, जो मेरी जिंदगी को तबाह कर देना चाहता है. मेरी तांत्रिक क्रिया को फेल करना चाहता है. अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूं. चूल्हे के पास ही तेरी कब्र बना दूंगा.’’

जफर गुस्से में बड़बड़ा रहा था. उस के सिर पर जैसे खून सवार था. डर की वजह से जफर के बाकी बच्चे बरामदे में पड़े तख्त के नीचे छिप गए थे. बाप की ही तरह वे भी हरे व काले रंग का खास लिबास पहने हुए थे और उन के सिर पर वैसे ही रंग का कपड़ा बंधा था.

यह नजारा देख रहे लोग चिल्लाए, ‘‘जफर, पागल हो गया है तू. मार ही डालेगा क्या बच्ची को?’’

जफर ने उन की तरफ घूर कर देखते हुए कहा, ‘‘खबरदार, मेरे बीच कोई मत आना वरना भस्म कर दूंगा.’’

इस के साथ ही उस ने मासूम फरहीन का सिर जमीन पर पटकना शुरू कर दिया. उस का दिल जरा भी नहीं पसीजा. नईम बानो हैवान बने शौहर से फरहीन को बचाने आई तो उस ने उसे धक्का दे कर दूर कर दिया. फरहीन के सिर से खून बह निकला. कुछ देर के लिए उस का शरीर छटपटाया और फिर शांत हो गया. यह देख कर नईम बानो बदहवास हो गई. बाहर खड़ा कोई शख्स अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा सका. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर पड़ोस में रहने वाले जफर के चाचा वली हुसैन भी वहां आ पहुंचे.

उस जगह का नजारा देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह घर के अंदर दाखिल हो कर जफर के नजदीक पहुंचे तो उस ने उन पर चाकू से हमला कर दिया. वली हुसैन वापस दरवाजे पर आ गए. लोग तमाशबीन बने देखते रहे. जबकि जफर पालथी मार कर फरहीन के पास बैठ गया. डरीसहमी पत्नी व दोनों बच्चे भी उस के पास बैठ गए. जफर मन ही मन कुछ बुदबुदाने लगा.

दिल दहला देने वाले इस हैरतअंगेज नजारे ने गांव वालों के रोंगटे खड़े कर दिए. इस बीच घटना की खबर पा कर स्थानीय मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच गए. लेकिन कोई भी घर के अंदर घुसने की हिम्मत नहीं जुटा सका. गांव के चौकीदार मुकेश ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी अनिल सिरोही, एसआई अखिलेश सिंह और कुछ अन्य पुलिसकर्मी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने जफर को हिरासत में ले लिया. वह पुलिस की पकड़ से छूटने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘मुझे क्यों पकड़ रहे हो? मैं ने तो शैतान का कत्ल किया है. मेरी बेटी तो अभी कुछ देर में जिंदा हो जाएगी. मैं उसे जिंदा कर दूंगा.’’

मामला संगीन था. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी धर्मवीर को भी दे दी थी. बाद में पुलिस अधीक्षक (देहात) ब्रजेश श्रीवास्तव भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस ने मौका मुआयना किया और पंचनामा भर कर बच्ची के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. आरोपी के घर का माहौल बिलकुल अजीब था. वहां तंत्र क्रियाओं का कई तरह का सामान मौजूद था. पुलिस ने संदिग्ध चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. फिर उस की पत्नी, बच्चों और गांव वालों से पूछताछ की.

यह घटना किसी को भी झकझोर सकती थी. पुलिस आरोपी को थाने ले आई और उस से विस्तृत पूछताछ की. जफर से हुई पूछताछ व ग्रामीणों के बयानों के बाद अंधविश्वास के साए में जी रहे एक ऐसे शख्स की कहानी निकल कर सामने आई, जिस ने अंधविश्वास में डूब कर अपने परिवार को तो तबाह कर ही दिया था, साथ ही अपना भविष्य भी बरबाद कर लिया था.

जफर उन नौजवानों में से था, जो बिना मेहनत किए बड़ेबड़े ख्वाब देखते हैं. सालों पहले जफर का विवाह नईम बानो के साथ हुआ तो वह परिवार से अलग हो गया. वक्त के साथ वह 3 बच्चों का पिता बन गया. जफर के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. बस किसी तरह छोटेमोटे काम कर के वह परिवार की गाड़ी खींच रहा था. काम के बाद उस का बाकी का वक्त यारदोस्तों में बीतता था. गनीमत यह थी कि वह किसी बुरी आदत का शिकार नहीं था. जफर जब भी दोस्तों के बीच बैठता था, बड़ीबड़ी खयाली बातें किया करता था.

गांवदेहात के इलाकों में अंधविश्वास के अनेक रोचक किस्से होते हैं. समाज का मनोविज्ञान है कि लोग अंधविश्वास के किस्सों को रहस्य के साथ बड़ी रुचि से सुनाते हैं. इन किस्सों पर लोगों के बीच चर्चा होती है. अंधविश्वास के नकारात्मक पहलुओं पर इतनी चर्चा नहीं होती, जितनी कि इत्तेफाकिया सही हो जाने वाले मामलों की होती है. इसे लोग चमत्कार भी समझते हैं. फलस्वरूप अंधविश्वास की कहानियां बचपन से ही दिमाग में बैठनी शुरू हो जाती हैं. जफर भी अंधविश्वास का शिकार था. दोस्तों के बीच वह ऐसे किस्सों को दिल लगा कर सुनता और दिनचर्या की बातों और जीवन में आने वाली बाधाओं को अंधविश्वास से जोड़ कर देखता है.

जफर किसी भी परेशानी का शिकार होता तो वह सीधा किसी बाबा या तांत्रिक के पास जा पहुंचता. तांत्रिक उस के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उस से रुपए ऐंठ कर कभी ताबीज पकड़ा देते तो कभी भभूत. बच्चों को कोई बीमारी होती तो भी वह चिकित्सकों से ज्यादा बाबाओं पर भरोसा करता था. उसे यह समझाने वाला कोई नहीं था कि अंधविश्वास के आईने में वह यथार्थ को न भुलाए. दरअसल सुझाव का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान होता है. यह व्यक्ति के उद्देश्य, मत, विचार एवं जीवन में भी परिवर्तन लाता है. बशर्ते सुझाव सही और उसे मानने वाला अच्छेबुरे का फर्क करना जानता हो.

जफर ने आजीविका चलाने के लिए एक बैंडबाजा मंडली में काम करना शुरू कर दिया था. इस से जो कमाई होती थी, उसी से उस का घर चलता था. इस काम में उसे आमदनी कम थी, लिहाजा वह किसी चमत्कार की उम्मीद किया करता था. तांत्रिकों के संपर्क में आने के बाद वह खुद भी अजीब ढंग से जिंदगी जीने लगा था. इस के बावजूद उस के हालत जस के तस थे. वह चाहता था कि उस के हालात अच्छे हों और जिंदगी आसान सी हो जाए.

इंसान का व्यवहार तब बदल जाता है? जब उस की उम्मीदें पूरी नहीं होतीं. जफर जिन उम्मीदों को पाले हुए था, वे मेहनत के बलबूते ही पूरी हो सकती थीं. जबकि वह अंधविश्वास में पड़ कर चमत्कार की चाहत पाले बैठा था. बैंडबाजे के काम से गुजर मुश्किल हो गई, तो जफर ने एक चिटफंड कंपनी में बतौर एजेंट काम करना शुरू कर दिया. इस से उस की पारिवारिक स्थिति थोड़ी सुधरी. उस ने अपनी जानपहचान वाले लोगों का रुपया तो कंपनी में लगवाया ही, अपनी कमाई भी उस में निवेश कर दी. यह कंपनी अपनी आकर्षक स्कीमों के जरिए तय वक्त पर लोगों को उन के निवेश का बड़ा फायदा देने का वादा करती थी. बाजारों में ऐसी चिटफंड कंपनियों की भरमार है, जो लोगों को बड़ेबड़े सपने दिखा कर रुपया बंटोरती हैं.

अधिकांशत: इन का शिकार वे लालची लोग होते हैं, जो कम वक्त में रईस बनने के सपने देखते हैं. उन्हें लगता है कि बैठेबिठाए ही उन की रकम बढ़ जाएगी, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं नहीं है. ऐसी कंपनियां मोटी रकम एकत्र होते ही चंपत हो जाती हैं. जफर जिस कंपनी में काम करता था, उस ने भी एक दिन ऐसा ही किया. कंपनी के लापता होते ही जफर दोराहे पर आ खड़ा हुआ. लोगों ने भी उस से रुपए मांगने शुरू कर दिए. इस से वह परेशान रहने लगा. परेशानी के इसी दौर में अंधविश्वास के शिकार जफर ने फिर पाखंडी तांत्रिकों का सहारा लेने की सोची.

वह तांत्रिकों से मिला तो उन लोगों ने उसे कुछ टोनेटोटके समझा दिए. साथ ही बताया कि वह सब्र से काम ले, बहुत जल्द उस की जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी. जफर के लिए यह सब किसी सुखद सपने जैसा था. इस के बाद वह लोगों से कहने लगा कि अब बहुत जल्द उस का वक्त बदलने वाला है. बेरोजगार होने के बाद जफर के पास कोई काम नहीं बचा था. वह नौजवान था. वह चाहता तो कोई भी काम कर के अपने पारिवारिक हालात को संवार सकता था, लेकिन अंधविश्वास ने उसे बुरी तरह जकड़ रखा था. निठल्ला होने की वजह से वक्त उस के लिए महायातना बन गया. कमाई धेले की नहीं थी, नतीजतन बच्चों के भूखे मरने की नौबत आ गई.

नईम बानो ने अपने पिता को खबर की. उस का मायका पीलीभीत, जहानाबाद क्षेत्र के गांव चका में था. खबर मिलते ही उस के पिता मोहम्मद अनवार मैमोर आ गए. उन्होंने रुपए दे कर मदद तो की ही, साथ ही वह जफर को समझाया भी, ‘‘बेटा, मेरी बात को गलत मत समझना. मेरी सलाह है कि कोई कामधंधा ढूंढ लो.’’

‘‘मैं बहुत जल्द सब ठीक कर दूंगा.’’ जफर ने खयाली अंदाज में आत्मविश्वास से जवाब दिया. मोहम्मद अनवार ने उस से कहा, ‘‘अगर तुम्हें ऐतराज न हो तो मैं बानो और बच्चों को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाता हूं. जब हालात सुधर जाएं तो तुम इन्हें ले आना.’’

इस बात पर जफर भड़क गया, ‘‘नहीं, यह मुझे हरगिज मंजूर नहीं है.’’

अनवार ने अपनी बात पर अडिग रहने की कोशिश की तो जफर ने चेतावनी दी कि अगर वह बच्चों को ले गए तो वह मौत को गले लगा लेगा. दामाद का इस तरह का व्यवहार देख कर अनवार बुझे मन से वापस चले गए. जफर अंधविश्वास में पूरी तरह डूब चुका था. वह तंत्र क्रियाओं में लीन रहता था. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया था. कोई उस पर किसी तरह की टिप्पणी कर देता तो वह बुरी तरह भड़क जाता. इस के अलावा वह लोगों से छोटीछोटी बातों पर झगड़ने लगता था.

उस की इस तरह की आदत से एक तरफ जहां लोग उस से कतराने लगे थे, वहीं उस ने भी सब से दूरियां बना ली थीं. लोग तब उस से और भी डरने लगे, जब उस ने अपने चचेरे भाई मोहम्मद हुसैन से झगड़ा होने पर एक रात उस की मोटरसाइकिल को आग लगा दी और प्रचारित किया कि उस ने तंत्रमंत्र के बल पर ऐसा किया है. नईम बानो अनपढ़ महिला थी. जफर ने उसे व बच्चों को भी अपने रंग में रंग लिया था. इसी तरह वक्त बीतता गया. टोनेटोटकों से न हालात सुधरने थे और न सुधरे. जफर अजीब सी गफलत में रहने लगा. उसे लगने लगा कि उस के परिवार पर कोई शैतानी साया है, जो उसे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. आर्थिक हालात दिनबदिन बिगड़ते जा रहे थे. जफर के घर के आर्थिक हालात मोहल्ले वालों से भी छिपे नहीं थे. वे मदद करने का प्रयास करते तो जफर उन्हें गालियां दे कर भगा देता.

स्थिति बिगड़ती गई तो उस ने एक तांत्रिक क्रिया करने का फैसला किया. इस के लिए उस ने सब से पहले पूरे परिवार के लिए काले व हरे रंग के कपड़े सिलवाए. इन कपड़ों को सभी को पहना कर वह घर में तरहतरह की क्रियाएं करता. बच्चों के सिर पर वह टोपीनुमा एक कपड़ा बंधवा देता. उस ने एक दिन पत्नी व बच्चों को समझाते हुए कहा, ‘‘किसी के भी सिर से एक सप्ताह तक यह कपड़ा नहीं उतरना चाहिए, वरना बहुत बुरा हो जाएगा. यह कपड़ा बंधा रहा तो जल्द ही मेरा वक्त सुधर जाएगा.’’

घर में पत्नी और बच्चे उस के हुक्म के गुलाम थे. सब ने ऐसा ही किया. वह बच्चों के साथ घर में घंटो बैठ कर अजीबअजीब क्रियाएं करता रहता. बच्चों व पत्नी के घर से निकलने पर भी उस ने पाबंदी लगा दी थी. 2 अक्तूबर, 2015 की दोपहर का वक्त था. जफर अपनी तंत्र क्रिया में लीन था. इसी बीच नईम बानो खाना बनाने लगी. फरहीन घर में खेलते हुए मां के पास रोटी लेने चली गई. जैसे ही वह रोटी लेने के लिए झुकी, उस के सिर से दुपट्टेनुमा बंधा कपड़ा हट गया. जफर की नजर उस पर गई तो वह आगबबूला हो उठा,‘‘यह क्या किया तू ने, सिर से दुपट्टा कैसे हट गया?’’

‘‘गलती हो गई अब्बू.’’ फरहीन ने डर कर जवाब दिया. यह सुन कर जफर गुस्से में बोला, ‘‘तू जरूर वही शैतानी साया है, जो मुझे आगे नहीं बढ़ने दे रहा. अच्छा हुआ तू पकड़ में आ गया. आज मैं तुझे सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’

इस के साथ ही जफर ने मासूम फरहीन को पीटना शुरू कर दिया. उस का भयानक रूप देख कर फरहीन के भाई पिटाई के डर से तख्त के नीचे छिप गए. नईम बानो ने बेटी को बचाने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन जफर ने आखिर उसे बेरहमी से मार ही डाला. पूछताछ में पता चला कि जफर की इस कहानी से पुलिस भी हैरान थी. आर्थिक परेशानियों और अंधविश्वास की वजह से जफर की हालत पागलों जैसी हो गई थी. पुलिस ने उस के खिलाफ गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया. अगले दिन उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

जफर ने मेहनत कर के जिंदगी को संवारा होता और अंधविश्वास में न पड़ा होता तो ऐसी नौबत कभी न आती. कथा लिखे जाने तक जफर की जमानत नहीं हो सकी थी. उस की पत्नी व बच्चे नातेरिश्तेदारों की रहमोकरम पर पल रहे थे. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Kahani: गुनाह जो माफी लायक नहीं

Crime Kahani: कोकीन की लत लग जाने से रोनाल्ड के ऊपर काफी कर्ज हो गया था. इस कर्ज को उतारने और अपनी लत को पूरा करने के लिए उस ने प्रेमिका के साथ जो घिनौना अपराध किया, वह सचमुच माफी के लायक नहीं है.

रात के साढ़े 11 बजे बौब फ्लारडे घर लौटा तो दरवाजे पर उस ने पत्नी को इंतजार करते पाया. उसदिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, इसलिए उसे हैरानी हुई. वह कुछ कहता, उस से पहले ही पत्नी ने पूछा, ‘‘तान्या कहां है?’’

‘‘तान्या?’’ फ्लारडे ने जवाब देने के बजाय चौंक कर सवाल किया, ‘‘क्या तान्या अभी तक घर नहीं आई है?’’

‘‘नहीं, मुझे तो लग रहा था कि तुम उसे साथ ले कर आओगे?’’ मिसेज फ्लारडे ने कहा.

‘‘हां, इरादा तो यही था. उसे क्लब के बाहर छोड़ते हुए मैं ने कहा भी था कि पार्टी खत्म होने पर मैं उसे लेने आ जाऊंगा, पर उस ने मना कर दिया था. उस ने कहा था कि वह अपनी किसी सहेली के साथ घर आ जाएगी.’’

‘‘उस का क्या, तुम्हें सोचना चाहिए था. जवान बेटी का इतनी रात गए घर से बाहर रहना क्या ठीक है?’’ मिसेज फ्लारडे ने चिंता व्यक्त की.

‘‘हमारी बेटी समझदार है, किसी सहेली के यहां चली गई होगी. चलो, उस के मोबाइल पर फोन कर के पूछते हैं कि वह कहां है?’’

बौब फ्लारडे ने ड्राइंगरूम में जा कर वहां रखे लैंडलाइन फोन से तान्या के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन उस के मोबाइल का स्विच औफ था, इसलिए बात नहीं हो सकी. उन्होंने कई बार फोन किया, हर बार जवाब यही मिला कि फोन का स्विच औफ है. बौब फ्लारडे परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी रात को वह बेटी को ढूंढ़ने कहां जाएं. जवान बेटी थी, कहीं कोई हादसा न पेश आ गया हो?

यह सोच कर उन का कलेजा कांप उठा. उन्होंने तुरंत जूलियन बिस्त्रे क्लब को फोन किया. पार्टी वहीं थी. काफी देर तक घंटी बजने के बाद फोन उठा तो फ्लारडे ने बेचैनी से पूछा, ‘‘हैलो, बिस्त्रे क्लब?’’

‘‘जी, कहिए?’’ दूसरी तरफ से किसी ने कहा.

‘‘तुम्हारे यहां शाम को स्कूली बच्चों की एक पार्टी थी, क्या वह खत्म हो गई?’’

‘‘पार्टी तो कब की खत्म हो गई, सब बच्चे चले भी गए हैं.’’

‘‘क्या कोई लड़की अभी…?’’ फ्लारडे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए कि दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘अब यहां कोई नहीं है, सिवाय मेरे.’’

‘‘तुम वहां क्या कर रहे हो?’’ फ्लारडे ने पूछा.

‘‘मैं यहां का चौकीदार हूं,’’ उस व्यक्ति ने तल्खी से कहा, ‘‘शायद अब यह बताने की जरूरत नहीं होगी कि मैं यहां क्या कर रहा हूं?’’

‘‘तुम मेरी बात का बुरा मन गए,’’ फ्लारडे ने विनम्रता से कहा, ‘‘माफ करना, मैं अपनी बेटी को ले कर परेशान हूं. उस का नाम तान्या है, क्या उसे किसी के साथ देखा है?’’

‘‘सौरी, पार्टी के बाद कौन किस के साथ गया, इस की जानकारी मुझे नहीं है. मेरी ड्यूटी तो क्लब बंद होने के बाद शुरू होती है.’’ चौकीदार ने कहा और फोन काट दिया.

इस के बाद फ्लारडे को ऐनी की याद आई. वह तान्या के साथ ही पढ़ती थी. पार्टी में वह भी गई थी. वह फ्लारडे के खास दोस्त और उन के रेस्तरां के खानसामा के पार्टनर थौमस को बेटी थी. उन्होंने थौमस को फोन किया. पता चला कि वह तो सवा 11 बजे ही घर आ गई थी. उस समय वह सो रही थी. वहां से भी मायूसी ही हाथ लगी. अब एक और व्यक्ति बचा था, जो तान्या के बारे में जानकारी दे सकता था. वह था स्कूल का वार्डन नेड कैली. उसी की निगरानी में स्कूल के बच्चों की यह फेयरवेल पार्टी आयोजित की गई थी.

फ्लारडे ने नेड को फोन किया. काफी देर बाद उस ने फोन रिसीव किया तो फ्लारडे ने जब उसे बताया कि तान्या अभी तक घर नहीं पहुंची है तो वह चौंका. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैं क्लब से घर के लिए निकला था तो वह क्लब में ही थी.’’

‘‘क्या तुम पार्टी खत्म होने से पहले ही चले गए थे?’’

‘‘दरअसल, 11 बजे मेरी पत्नी का फोन आया तो मुझे वहां से निकलना पड़ा. लेकिन तब तक पार्टी खत्म हो चुकी थी. काफी बच्चे जा भी चुके थे. मुझे लगा कि बच्चे समझदार हैं, इसलिए मैं ने उन की सुरक्षा की जरूरत महसूस नहीं की. बहरहाल आप परेशान मत होइए, मैं आ रहा हूं.’’

करीब आधे घंटे बाद नेड आ पहुंचा. इस बीच फ्लारडे ने अपने कुछ परिचितों और तान्या की सहेलियों को फोन कर के उस के बारे में पता किया था, लेकिन कहीं से उस के बारे में कुछ पता नहीं चला था.फ्लारडे नेड को अपना शुभचिंतक मानता था और उस पर विश्वास भी करता था. इसीलिए उसे तान्या का ट्यूटर भी नियुक्त किया था. नेड के आते ही वह अपने आंसू नहीं रोक सका और रोते हुए बोला, ‘‘यह क्या हो गया नेड, कहां है मेरी बेटी?’’

‘‘धीरज रखो मि. फ्लारडे. तान्या मिल जाएगी. मेरे खयाल से पुलिस को इत्तिला कर देनी चाहिए.’’

13 जून, 2003 की रात करीब 3 बजे फ्लारडे और नेड पास ही स्थित हाईवे पुलिस चौकी पहुंचे और ड्यूटी औफिसर को तान्या की फोटो दे कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत शहर के सभी पुलिस स्टेशनों में तान्या का फोटो सहित हुलिया प्रेषित कर उस की तलाश में सहयोग की अपील की. तान्या दक्षिण अफ्रीका के रैडबर्ग सिटी, जोहानेसबर्ग के रहने वाले बौब फ्लारडे की एकलौती संतान थी. 18 साल की खूबसूरत तान्या चंचल और हंसमुख स्वभाव की थी. वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. पढ़ाई के साथसाथ वह पिता के रेस्तरां में भी उन का हाथ बंटाती थी.

उस की लगन और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश को देखते हुए फ्लारडे उसे बतौर मैनेजर ट्रेनिंग दे रहे थे, ताकि वह अपने व्यवसाय को अच्छी तरह संभाल सके. उस के दोस्तों की संख्या ज्यादा नहीं थी. उस का किसी लड़के से प्रेम संबंध भी नहीं था. सुबह 8 बजे फ्लारडे फिर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. उसे उम्मीद थी कि पुलिस को तान्या के बारे में कुछ न कुछ पता चल ही गया होगा. तब तक चौकीइंचार्ज महिला इंसपेक्टर क्रिस्टीले सटीन होवे अपनी ड्यूटी पर आ चुकी थीं. उन्होंने तान्या की गुमशुदगी के बारे में सारी जानकारी ले ली थी. क्रिस्टीले ने फ्लारडे को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तान्या को खोजने की हर मुमकिन कोशिश करेंगी.

ठीक उसी समय किसी हेनीर रीडर ने फोन पर सूचना दी कि डैरनवुड स्थित हिलबरोव झील पर एक पेड़ के नीचे एक लड़की की लाश पड़ी है. क्रिस्टीले तुरंत सहकर्मियों के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं. उन्होंने फ्लारडे को भी साथ ले लिया था. वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. वहां एक लड़की की लाश औंधे मुंह पड़ी थी. लाश पर कुछ मिट्टी और पेड़ के सूखे पत्ते पड़े थे, जिन्हें हटा कर क्रिस्टीले लाश का निरीक्षण करने लगीं. मृतका के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. उस की उम्र 17-18 साल थी. उस के पूरे शरीर पर चोटों के निशान थे, गले में नायलौन की रस्सी बंधी थी. संभवत: उसे उसी रस्सी से गला घोंट कर मारा गया था.

मृतका की हालत देख कर ही पता चला रहा था कि उस के साथ हत्या से पूर्व कई लोगों द्वारा दुष्कर्म किया गया था. उस की हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. क्रिस्टीले को वह लाश तान्या की लगी, इसलिए उन्होंने अब तक फ्लारडे को लाश नहीं दिखाई थी. लाश को चादर से ढक कर सिर्फ उस का चेहरा फ्लारडे को दिखाया गया तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस के इस तरह रोने से ही साफ हो गया कि लाश उस की बेटी तान्या की थी. आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टपार्टम के लिए भिजवा दिया गया. इस के बाद फ्लारडे से जब पूछा गया कि उसे किसी पर शक है तो उस ने रोते हुए स्पष्ट कहा कि उसे नहीं लगता कि उस की बेटी ने आज तक किसी का कुछ बिगाड़ा है. वह बेहद मासूम थी. उस की संगत भी गलत नहीं थी. जाने किस ने उस की बेटी के साथ…?

जब तान्या के ट्यूटर नेड कैली के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह ऐसा कतई नहीं कर सकता. लेकिन पुलिस को उसी पर शक था. इस का कारण यह था कि उस की उम्र अभी 25-26 साल थी. वह तान्या के स्कूल का वार्डन होने के साथसाथ ट्यूटर भी था. तान्या खूबसूरत लड़की थी. संभव था कि पढ़ाई के दौरान दोनों के बीच नजदीकी बढ़ने के साथ शारीरिक संबंध भी बन गए हों. इस के बाद किसी बात को ले कर दोनों के रिश्ते में खटास आ गई हो और नेड ने दुष्कर्म कर के उस की हत्या कर दी हो. यह भी संभव था कि नेड तान्या से एकतरफा प्रेम करने लगा हो और तान्या ने उस के प्रेम को स्वीकार न किया हो. बदले में उस ने जबरदस्ती कर के उस का कत्ल कर दिया हो?

लेकिन तान्या की हत्या करना अकेले नेड के बस की बात नहीं थी. इसलिए इस मामले में उस के कुछ अन्य साथी भी रहे होंगे. नेड ने उन्हें दौलत और तान्या के कुंवारे जिस्म को भोगने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया होगा. उसी दिन शाम को तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, मरने से पहले तान्या से 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. वह पुरुष संसर्ग की आदी नहीं थी. उस के शरीर पर किसी तेजधार हथियार से वार किए गए थे. उस के साथ मारपीट की गई थी, उस के बाद नायलौन की रस्सी से गला घोंट कर उस की हत्या की गई थी. उस की मौत दम घुटने से हुई थी. उस के गले पर रस्सी के निशान थे.

फ्लारडे को नेड पर विश्वास था. इस के बावजूद नेड को शक के आधार पर पुलिस चौकी बुला कर कई दौर में पूछताछ की गई. इस पूछताछ में कोई भी तथ्य सामने नहीं आया, जिस से उस पर किए जाने वाले शक की पुष्टि होती. पूछताछ में पता चला कि कुछ समय पहले ही उस की शादी हुई थी. उस की पत्नी काफी सुंदर थी. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. नजदीकी होने के बावजूद नेड कभी तान्या के प्रति गलत विचार मन में नहीं लाया. तान्या को ही नहीं, किसी भी लड़की को उस ने बुरी नजरों से नहीं देखा. वह स्कूल का वार्डन था और अपने कर्तव्य का निर्वाह ईमानदारी से कर रहा था. नेड से पता चला कि घटना वाली रात तान्या पार्टी में अकेली आई थी. क्लब से जाते समय उस ने तान्या को पार्टी में देखा था.

तान्या के दुष्कर्म और हत्याकांड की गुत्थी उलझती जा रही थी. अब जांच के लिए 2 ही चीजें बची थीं, एक तान्या का मोबाइल फोन और दूसरा जुलियन बिस्त्रे क्लब. तान्या के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. उस से पता चला कि घटना की रात तान्या ने न तो किसी को अपने मोबाइल से फोन किया था और न ही उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. हां, उस ने रात करीब डेढ़ बजे अपनी एक सहेली को एसएमएस जरूर भेजा था कि मैं सुरक्षित हूं. वहीं रात भर उस का मोबाइल बंद था, लेकिन उस के मोबाइल सेटर का सिमकार्ड बदला गया था.

इस से भी कोई सार्थक जानकारी नहीं मिली. अब क्लब को जांच का लक्ष्य बनाया गया. जुलियन बिस्त्रे क्लब शहर के बीचोबीच स्थित था. पुलिस टीम ने 13 जून, 2003 को क्लब में हुई पार्टी व अन्य गतिविधियों की जांच की. इस जांच में पता चला कि तान्या ने रात करीब 11 बजे क्लब से एक फोन किया था. टेलीफोन एक्सचेंज से पता चला कि वह फोन रोनाल्ड एडवर्ड ग्रीम्सली को किया गया था. रोनाल्ड का पता भी मिल गया था. वह फोंटने ब्ल्यू स्थित एक छोटे से मकान में रहता था. कुछ पुलिसकर्मी उस के घर भेजे गए तो वहां ताला बंद मिला. आसपड़ोस वालों को भी उस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उन लोगों को सिर्फ इतना पता था कि वह किसी विज्ञापन फिल्में बनाने वाली कंपनी में काम करता था.

रोनाल्ड पूरी तरह शक के घेरे में आ गया था. फ्लारडे से रोनाल्ड के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया, ‘‘हां, एक बार तान्या ने मुझे उस से मिलवाया था. उस ने कहा था कि वह उस का अच्छा दोस्त है. लेकिन तान्या को मैं ने उस के साथ कहीं आतेजाते नहीं देखा था.’’

शहर भर की सभी उन फिल्म कंपनियों को खंगाला गया, जो मुख्य तौर पर विज्ञापन फिल्में बनाती थीं. इस बीच रोनाल्ड के घर जब भी दबिश दी गई, दरवाजे पर ताला ही लटका मिला. पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. आखिर 18 जुलाई, 2003 को वह पुलिस की पकड़ में आ गया. उस से पूछताछ की जाने लगी तो वह चुप रहा. वह एक शब्द भी नहीं बोला. लेकिन उस के चेहरे के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह किसी राज को दिल की गहराई में छिपाए है. जब उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला गया तो उस ने बेहद गंभीर स्वर में सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘हां, मैं गुनहगार हूं. मैं ने ही तान्या के साथ दुष्कर्म किया है और फिर गला दबा कर उसे मार दिया है.’’

काफी कोशिश के बाद भी उस ने यह नहीं बताया कि उस ने ऐसा क्यों किया? तान्या की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि उस के साथ 3 लोगों ने दुष्कर्म किया था. संभवत: वे भी उस की हत्या में शामिल थे. लेकिन रोनाल्ड ने इस बारे में जुबान नहीं खोली. इस से यही लगा कि या तो रोनाल्ड बेहद शातिर है या फि वह किसी से डरासहमा है. खैर, अपराध स्वीकार करने के बाद रोनाल्ड को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. लेकिन तान्या के साथ दुष्कर्म और उस की हत्या का कारण रहस्य ही बना रहा.

रोनाल्ड ने जेल में कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की. एक बार उस ने ब्लेड से अपने हाथ की नसें काट डालीं तो दूसरी बार चादर से गला घोंटने की कोशिश की. दोनों बार उसे बचा लिया गया, लेकिन मानसिक तनाव की वजह से वह कोमा में चला गया. इस के बाद बैरक में रखे उस के सामान की तलाश ली गई तो उस में एक पत्र मिला, जिस में उस ने तान्या के पिता फ्लारडे को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘‘मुझे 13 जून के लिए माफ कर देना. खुद को जीवित रखने के लिए मुझे तान्या की हत्या करनी पड़ी थी.’’

इस पत्र ने केस को और पेचीदा बना दिया था. शायद यह उस का सुसाइड नोट था. इस से लगता था कि रोनाल्ड की कोई मजबूरी रही होगी, जिस की वजह से उस ने तान्या की हत्या की थी, वरना वह ऐसा करना नहीं चाहता था. अब पुलिस को इसी तथ्य को उजागर करना था, लेकिन रोनाल्ड कोमा में था. करीब 2 महीने बाद रोनाल्ड कोमा से बाहर आया तो उसे देख कर लगता था कि वह काफी हताश है, अपराधबोध में जकड़ा हुआ है. उस से जब हमदर्दी जताते हुए उस की दुखती रग को दबाया गया तो सचाई उस के मुंह से बाहर आ गई.

उस ने नजरें नीची कर के कहा, ‘‘मैं पिछले 9 सालों से कोकीन का आदी था. इसी वजह से अकसर मेरे पास पैसों की तंगी रहती थी. नशे के सौदागरों का काफी कर्ज मुझ पर चढ़ गया था.’’ इतना कह कर रोनाल्ड रुका. फिर उस ने एक लंबी सांस ले कर आगे कहा, ‘‘उस दिन मेरे पास कोकीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. नशे के बिना मैं काफी बेचैनी महसूस कर रहा था. मैं चुटकी भर कोकीन के लिए कोकीन बेचने वालों के सामने गिड़गिड़ाया, पर उन्होंने नहीं दी. उलटा कर्ज चुकाने को कहा और धमकी दी कि अगर मैं ने उन के पैसे नहीं दिए तो वे मुझे मार डालेंगे. तब कोकीन और कर्ज की खातिर मैं ने उन से एक डील कर ली.’’

‘‘कैसी डील?’’ इंसपेक्टर क्रिस्टीले ने पूछा.

रोनाल्ड ने चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू भरे थे. वह बोझिल आवाज में बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि अगर मैं किसी लड़की के साथ अपनी ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे दूं तो न केवल वे मेरा सारा कर्ज माफ कर देंगे, बल्कि मुझे नशे की लत को पूरा करने के लिए काफी पैसे भी देंगे. नशे की लत और जिंदगी की चाहत ने मुझे हैवान बना दिया. मैं ने अपनी ही चाहत को दागदार कर के उस की हत्या कर दी.’’

इतना कह कर रोनाल्ड फफकफफक कर रोने लगा. यहां जानने वाली बात यह है कि लड़कों से दूर भागने वाली तान्या करीब 6 महीने पहले रोनाल्ड से मिली थी. तान्या ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा था कि उस के दिल में हलचल सी मच गई थी. उस ने इस के पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था. रोनाल्ड की नजर भी उसी पर जमी थी. पहली नजर और पहली मुलाकात में ही तान्या और रोनाल्ड एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

तान्या की तरह रोनाल्ड भी सभ्य व संस्कारी था, पर उस में एक कमी यह थी कि उसे कोकीन के नशे की लत लग गई थी. बस, इसे छोड़ कर उस में और कोई कमी नहीं थी. उस की इस आदत को तान्या नहीं जान पाई थी. दोनों अकसर मिलने लगे थे. लेकिन मिलने में वे इतनी सावधानी बरतते थे कि कभी किसी को उन के प्यार का पता नहीं चल सका.

रोनाल्ड थोड़ा सामान्य हुआ तो उस ने आगे कहा, ‘‘13 जून को कोकीन न मिलने की वजह से मेरी सांसें घुटी जा रही थीं. हाथपांव कांप रहे थे. मौत नजदीक आती दिखाई दे रही थी. पार्टी के बाद तान्या ने मुझ से मिलने का वादा किया था. रात करीब 11 बजे तान्या का फोन आया तो मुझे जैसे जिंदगी मिलती नजर आई. मेरा जमीर उस पल मर गया और मैं ने एक ऐसा फैसला ले लिया, जिस के बारे में मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. मैं इंसान से हैवान बन गया. कुछ सोच कर मैं उसे लेने क्लब चला गया और मैं उसे ले कर अपने घर आ गया.’’

रोनाल्ड ने तान्या के आने की जानकारी कोकीन सप्लाई करने वाले नाइजीरियन सौदागरों को दे दी थी. उस ने कोकीन की एक पुडि़या के लिए उन से वादा कर लिया था कि वह प्रेमिका के साथ ब्ल्यू फिल्म बना कर उन्हें दे देगा. तान्या रोनाल्ड के घर पहुंची तो उन नाइजीरियन युवकों को देख कर डर गई. लेकिन अब तो वह फंस चुकी थी. उन्होंने उस से कपड़े उतारने को कहा तो उस ने अपने प्रेमी रोनाल्ड की तरफ देखा. वह समझ नहीं पा रही थी कि रोनाल्ड को यह क्या हो गया है?

तान्या ने विरोध किया तो नाइजीरियन युवकों ने उस के साथ मारपीट की. इस के बाद चाकू की नोक पर उस के हाथपैर बांध कर सोफे पर डाल दिया. रोनाल्ड उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा तो वे उस की फिल्म बनाने लगे. रोनाल्ड के बाद उन दोनों ने भी तान्या के साथ जबरदस्ती की. अब तक तान्या अधमरी सी हो चुकी थी. उस के जीवित रहने से तीनों फंस सकते थे, इसलिए वहां पड़ी नायलौन की रस्सी से उस का गला घोंट दिया गया.

इस के बाद तीनों रात के अंधेरे में तान्या की लाश को झील के पास स्थित एक पेड़ के नीचे फेंक आए. दोनों नाइजीरियन अपना कैमरा ले कर चले गए तो रोनाल्ड को होश आया. वह कांप उठा कि उस ने यह क्या कर डाला? मगर अब क्या हो सकता था. वह पुलिस के डर से छिपता भागता रहा, लेकिन कब तक भागता फिरता, आखिर पकड़ा गया. इस के बाद पुलिस ने दोनों नाइजीरियन युवकों को पकड़ने की काफी कोशिश की, लेकिन वे पकड़े नहीं जा सके. 2 सालों तक मुकदमा चला.

17 जुलाई, 2005 को जोहानेसबर्ग कोर्ट के जज बेनडस्टन ने दुष्कर्म, हत्या, चोरी और अश्लील फिल्म बनाने के आरोप में रोनाल्ड को 18 साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई. इस बीच रोनाल्ड का नशा छुड़ाने का इलाज भी चलता रहा. सजा के दौरान रोनाल्ड की कोकीन की लत छूट गई. जेल में वह ज्यादातर बाइबल पढ़ता रहता था. उस के चालचलन के मद्देनजर जेल प्रशासन ने उस की सजा कम करने की गुजारिश की, लेकिन रोनाल्ड ने अपने ऊपर किसी तरह का रहम न किए जाने की बात कही.

उस का कहना था कि उस ने जो गुनाह किया है, उस के लिए उसे मौत की सजा मिलनी चाहिए.  अब वह आत्मग्लानि का बोझ ले कर जीना नहीं चाहता. उस के चालचलन को देखते हुए फरवरी, 2015 में उस की बाकी सजा माफ करते हुए कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया. लेकिन 25 मार्च, 2015 को उस ने कोर्ट से अपील की कि उसे मौत की सजा दे दी जाए. लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इस के बाद 14 मई, 2015 को उस ने दोबारा अपील की है कि उसे ताउम्र कैद की सजा दी जाए. उस की इस अपील पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है. Crime Kahani

 

Ghaziabad Crime News: अमीर बनने की चाहत

Ghaziabad Crime News: दीपक और संदीप दोनों रातोंरात अमीर बनने का ख्वाब देखते थे. अपने इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने क्राइम सीरियल देख कर एक शेयर कारोबारी के बेटे का अपहरण कर लिया. लेकिन उन का यह अपराध उन्हें जेल ले गया.

उत्तर प्रदेश के जनपद गाजियाबाद के पौश इलाके राजनगर एक्सटेंशन की वीवीआईपी सोसाइटी में 30 नवंबर, 2015 की सुबह हड़कंप मचा हुआ था. इस की वजह वह थी कि इस सोसाइटी में रहने वाले कारोबारी विवेक महाजन का बेटा रहस्यमय ढंग से गायब हो गया था. दरअसल उन का 13 वर्षीय बेटा जयकरन 29 नवंबर की दोपहर सोसाइटी में ही बने मैदान में खेलने के लिए गया था. इसी बीच वह लापता हो गया था. जब वह शाम तक घर नहीं पहुंचा तो घर वालों को चिंता हुई. चिंताओं के बादल तब और गहरे हो गए, जब यह पता चला कि जयकरन का मोबाइल भी स्विच्ड औफ है.

परिचितों और जयकरन के दोस्तों के यहां भी उस की खोजबीन की जा चुकी थी. लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं लग पा रहा था. थकहार कर विवेक महाजन ने स्थानीय थाना सिंहानी गेट में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस ने उन्हें नातेरिश्तेदारों के यहां खोजबीन करने की सलाह दे कर जयकरन का फोटो और हुलिया नोट कर लिया था.

विवेक महाजन के परिवार में पत्नी अमिता के अलावा 2 ही बच्चे थे, बेटी संस्कृति और बेटा जयकरन. अमिता पेशे से डाक्टर थीं, उन का अपना नैचुरोपैथी क्लिनिक था. जयकरन शहर के ही एक पब्लिक स्कूल में कक्षा 8 में पढ़ रहा था. उस के लापता होने से अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. पूरी रात जयकरन का इंतजार होता रहा. लेकिन न तो वह आया और न ही उस के मोबाइल पर संपर्क हो सका. चिंताओं के बीच किसी तरह रात बीत गई. 30 नवंबर की सुबह सूरज की रेशमी किरणों से नई उम्मीदों का उजाला तो हुआ, लेकिन महाजन परिवार की उदासी और परेशानी ज्यों की त्यों बनी रही.

करीब सवा 10 बजे अमिता के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने बुझे मन से मोबाइल की स्क्रीन को देखा तो उस पर जयकरन का नंबर डिस्प्ले हो रहा था. उन्होंने झट से फोन का बटन दबा कर के कान से लगाया, ‘‘ह…ह…हैलो जयकरन बेटा, कहां है तू?’’

‘‘घबराओ नहीं डाक्टर साहिबा, जयकरन हमारे पास सलामत है.’’ किसी अनजबी की आवाज सुन कर अमिता के दिल की धड़कनें बढ़ गईं और आवाज गले में अटक सी गई, ‘‘अ…अ…आप कौन, मेरा बेटा कहां है? उस से मेरी बात कराइए.’’ अमिता ने कहा.

लेकिन फोन करने वाला ठंडे लहजे में बोला, ‘‘इतनी भी क्या जल्दी है, बेटे से बात करने की. अभी एक ही रात के लिए तो दूर हुआ है. बाई द वे वह बिल्कुल ठीक है. हम पूरा खयाल रख रहे हैं उस का.’’

कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘रही हमारी बात तो इतना बताना ही काफी है कि आप लोग फटाफट 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो. जैसे ही 2 करोड़ दे दोगे, बेटा तुम्हें मिल जाएगा.’’

यह सुन कर अमिता के होश उड़ गए. वह समझ गईं कि उन के बेटे का अपहरण हुआ है. वह गिड़गिड़ाईं, ‘‘देखो प्लीज, तुम मेरे बेटे को छोड़ दो.’’

उन की बेबसी पर फोनकर्ता ने पहले ठहाका लगाया, फिर वह कठोर लहजे में बोला, ‘‘कहा तो है छोड़ देंगे. तुम रकम का इंतजाम करो. हम तुम्हें दोबारा फोन करेंगे.’’ थोड़ा रुक कर वह आगे बोला, ‘‘और हां, पुलिस को फोन करने की गलती कतई मत करना, वरना तुम्हारा बेटा टुकड़ों में मिलेगा.’’

‘‘तुम लोग गलत कर रहे हो. हम पर रहम करो, प्लीज मेरे बेटे को छोड़ दो.’’

अमिता ने कहा तो दूसरी ओर से फोन कट गया. उन्होंने काल बैक की, लेकिन तब तक मोबाइल फोन स्विच्ड औफ हो चुका था. जयकरन के अपहरण की बात से महाजन परिवार में कोहराम मच गया. सोसाइटी के लोग भी एकत्र हो गए. विवेक महाजन ने इस की सूचना पुलिस को दी तो पुलिस विभाग तुरंत हरकत में आ गया. मामला एक हाईप्रोफाइल कारोबारी के बच्चे के अपहरण का था, लिहाजा कुछ ही देर में थानाप्रभारी रणवीर सिंह विवेक महाजन के घर पहुंच गए. बाद में एसएसपी धर्मेंद्र यादव, एसपी (सिटी) अजयपाल शर्मा व सीओ विजय प्रताप यादव भी वहां आ गए.

यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि जयकरन का अपहरण फिरौती के लिए किया गया था. अपहर्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. ऐसे में पुलिस के सामने जयकरन को बचाना बड़ी चुनौती थी. मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व डीआईजी आशुतोष कुमार ने सतर्कता के साथ अविलंब काररवाई निर्देश दिए. एसएसपी धर्मेंद्र यादव ने जयकरन की सकुशल रिहाई के लिए एसपी अजयपाल शर्मा के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम में थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच के प्रभारी अवनीश गौतम व उन की टीम को भी शामिल किया गया. इस बीच पुलिस ने जयकरन की गुमशुदगी को अपहरण में तरमीम कर के अज्ञात अपहर्ताओं के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया था.

पुलिस ने जयकरन का मोबाइल नंबर ले कर सर्विलांस पर लगा दिया. पुलिस को उम्मीद थी कि सीसीटीवी की मदद से संभवत: कोई ऐसा सुराग मिल जाएगा, जिस से यह पता चल जाएगा कि जयकरन को कालोनी के बाहर कब और कैसे ले जाया गया. लेकिन पुलिस की यह उम्मीद तब टूट गई, जब पता चला कि वीवीआईपी सोसाइटी में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे हैं. इस बीच पुलिस इतना अंदाजा जरूर लगा चुकी थी कि जयकरन के अपहरण में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ है, जिसे वह पहले से जानता रहा होगा. क्योंकि अगर उसे जबरन ले जाया गया होता तो शोरशराबा होता या घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी मिल जाता.

पुलिस ने जयकरन के घर वालों और अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस आगे बढ़ पाती. पुलिस ने जयकरन के दोस्तों और सोसाइटी के संदिग्ध लोगों के बारे में पूछताछ की तो एक चौंकाने वाली जानकारी मिली. एक व्यक्ति ने बताया, ‘‘सर, 2 लड़के हैं जो अब नहीं दिख रहे. वे दोनों जयकरन के दोस्त भी हैं.’’

‘‘कौन हैं वे?’’ पुलिस अधिकारी ने पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया, ‘‘दीपक और संदीप. दोनों सोसाइटी में ही किराए पर अकेले रहते हैं. रात और सुबह 9 बजे तक तो दोनों यहीं पर थे, लेकिन अब नहीं दिख रहे हैं.’’

यह पता चलने पर पुलिस उन दोनों के फ्लैट पर पहुंची, लेकिन वहां ताला लटका हुआ था. इस से पुलिस को उन पर थोड़ा शक हुआ. उन के बारे में ज्यादा कोई कुछ नहीं जानता था. बस इतना ही पता चला कि वे दोनों 2 महीने पहले ही सोसाइटी में रहने के लिए आए थे. दोनों बहुत मिलनसार थे और बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते थे. जयकरन को चूंकि क्रिकेट का बहुत शौक था, इसलिए उस की उन से अच्छी जानपहचान थी.

‘‘वे दोनों काम क्या करते थे?’’

‘‘नहीं पता सर.’’

पुलिस के शक की सूई उन दोनों के इर्दगिर्द घूमने लगी. तभी एक युवक ने अपना मोबाइल आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘यह देखिए सर, दीपक का फोटो.’’ फोटो पर नजर पड़ते ही एसपी अजयपाल शर्मा चौंके. उस में दीपक अपने हाथ में अवैध पिस्टल लिए हुए था. दरअसल दीपक ने वह फोटो व्हाट्सएप ग्रुप में खुद ही पोस्ट की थी. पुलिस ने पहली नजर में ही ताड़ लिया कि पिस्टल अवैध थी. इस से पुलिस का शक उन दोनों पर और भी बढ़ गया. पुलिस ने पूछताछ कर के दीपक का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया.

इस सनसनीखेज मामले की जांच में तत्परता दिखाना बहुत जरूरी था. क्योंकि अपहर्ता जयकरन को नुकसान पहुंचा सकते थे. दोपहर होतेहोते पुलिस को जयकरन के मोबाइल की काल डिटेल्स भी मिल गई. उस से पता चला कि उस की अंतिम लोकेशन दिल्ली-मेरठ रोड स्थित औद्योगिक क्षेत्र में थी. इस के बाद मोबाइल बंद हो गया था. जबकि जयकरन के मोबाइल से फिरौती के लिए जो काल की गई थी, वह वहां से करीब 15 किलोमीटर दूर गालंद क्षेत्र से की गई थी. मोबाइल से सिर्फ एक वही काल हुई थी. इस के बाद मोबाइल बंद कर दिया गया था.

इस का मतलब अपहर्ता बेहद चालाक थे. उन्होंने फिरौती के लिए न सिर्फ जयकरन के फोन का इस्तेमाल किया था, बल्कि स्थान भी बदल दिया था. संदिग्ध गतिविधियों के चलते पुलिस ने दीपक को रडार पर ले लिया. उस के मोबाइल की जांच से पता चला कि वह मोदीनगर क्षेत्र का रहने वाला था. जांच के दौरान यह बात भी पता चली कि वह अपनी मां के साथ राजनगर स्थित छोटे बच्चों के रौयल किड्स प्ले स्कूल में रहता था. उस की मां चूंकि स्कूल में ही कर्मचारी थी, इसलिए इस परिवार को स्कूल में रहने के लिए जगह मिली हुई थी.

पुलिस को दीपक के 2 और नजदीकियों के ठिकाने पता चले. इन में एक था संदीप. उस के मोबाइल की लोकेशन जयकरन के मोबाइल की लोकेशन से मैच हो रही थी. संदीप के बारे में पुलिस तत्काल कोई खास जानकारी नहीं जुटा सकी. शक में मजबूती आते ही पुलिस सतर्क हो गई. अगर दीपक ही अपहर्ता था तो यह भी संभव था कि उस ने जयकरन को स्कूल स्थित घर पर ही छिपा कर रखा हो.

पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श कर के अविलंब स्कूल में दबिश डालने का निर्णय लिया. एसपी अजयपाल शर्मा के नेतृत्व वाली टीम रौयल किड्स स्कूल पहुंची. उस वक्त दोपहर के 3 बजे थे. स्कूल के बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी. अचानक पुलिस को वहां आया देख स्कूल की संचालिका रिचा सूद सकते में आ गईं. पुलिस को दीपक की मां अनीता भी वहीं मिल गईं. दीपक के बारे में पूछताछ करने पर वह बुरी तरह घबरा गईं.

‘‘दीपक कहां है?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘घर पर.’’ बताते हुए उस ने स्कूल कैंपस में पीछे की तरफ इशारा कर के बताया. वहां क्वार्टर बना हुआ था. पुलिस दनदनाती हुई वहां पहुंची तो वहां पहुंचते ही वह हुआ, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. घर के अंदर से अचानक गोलियां चलनी शुरू हो गईं.

संभवत: क्वार्टर में मौजूद लोगों को अपनी घेराबंदी का अंदाजा हो गया था. इस पर पुलिसकर्मियों ने भी हथियार थाम कर पोजीशन ले ली. कुछ मिनटों तक दोनों तरफ से रुकरुक कर कई राउंड गोलियां चलीं. इस से आसपास के क्षेत्र में दहशत फैल गई और लोग एकत्र हो गए. पुलिसकर्मियों की निगाहें क्वार्टर पर जमी थीं. तभी ट्रैक सूट पहने एक युवक ने तेजी से क्वार्टर का दरवाजा खोला और बिजली जैसी फुरती से फायरिंग करता हुआ भागा. पुलिस ने उसे चेतावनी दी, ‘‘रुक जाओ, वरना गोली मार देंगे.’’

युवक ने एक  पल के लिए पीछे पलट कर देखा और फिर भागने लगा. इस पर पुलिस ने एक गोली उस के बाएं पैर पर दाग दी. गोली लगते ही वह नीचे गिर गया. उस के गिरते ही पुलिसकर्मियों ने उसे घेर लिया. पुलिस को उम्मीद थी कि वह दीपक होगा, लेकिन उस ने अपना नाम संदीप बताया.

‘‘जयकरन कहां है?’’ जवाब में उस ने घर की तरफ इशारा कर दिया. पुलिस हथियार तान कर घर के अंदर दाखिल हुई, तो भौचक्की रह गई. पिस्टल से लैश 2 और युवक वहां मौजूद थे. लेकिन वह घबराए हुए थे. जयकरन एक कोने में बैठा थरथर कांप रहा था. उस के हाथपैर बंधे हुए थे.n पुलिस ने दोनों युवकों को गिरफ्त में ले कर जयकरन को बंधनमुक्त कराया. अपहर्ताओं को गिरफ्तार कर के जयकरन को सकुशल बरामद करना पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी थी. मौके से गिरफ्तार किए गए दोनों युवकों में एक दीपक व दूसरा उस का छोटा भाई बिट्टू था.

उन के कब्जे से पुलिस ने तीन पिस्टल, उन के मोबाइल व जयकरन का मोबाइल भी बरामद कर लिया. बेटे की बरामदगी की सूचना पर विवेक महाजन और उन की पत्नी भी मुठभेड़स्थल पर आ गए. जयकरन बहुत डरासहमा था. इस बीच पुलिस घायल युवक संदीप को अस्पताल ले गई. पुलिस दीपक व बिट्टू को थाने ले आई. पुलिस ने डरीसहमी स्कूल संचालिका रिचा सूद, दीपक की मां अनीता और उस के सब से छोटे भाई आयुष को भी पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस द्वारा गिरफ्तार युवकों व घायल संदीप से विस्तृत पूछताछ की गई तो राह से भटके युवाओं द्वारा रचित अपराध की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

दीपक का प्लेसमेंट एजेंसी का कमीशन पर आधारित काम था. उस के परिवार में मां अनीता के अलावा उस के छोटे भाई बिट्टू व आयुष थे. दीपक के पिता की वर्षों पहले मृत्यु हो गई थी. अनीता मेहनती और हिम्मती महिला थीं. उन्होंने परिवार को चलाने के लिए छोटीमोटी नौकरियां कर के बेटों को इस उम्मीद में पढ़ायालिखाया कि वे जिम्मेदारियां उठा कर घर को संभाल लेंगे. लेकिन इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और है.

अनीता ने आर्थिक तंगियां भी देखी थीं और जमाने की कठोरता भी. वह मोदीनगर की भूपेंद्र कालोनी में रहती थीं. बाद में उन्होंने रौयल किड्स स्कूल में नौकरी कर ली थी. स्कूल परिसर में ही बने क्वार्टर में उन के रहने का भी इंतजाम हो गया तो वह तीनों बेटों के साथ वहां चली आईं. वहां आ कर दीपक ने एक कंपनी में कमीशन के आधार पर काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन यह काम उसे छोटा लगता था. इंसान की ख्वाहिशें आसमान को छूती हों तो उसे अपनी प्रगति बहुत छोटी नजर आती है. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह अपने काम से संतुष्ट नहीं था.

उस के पास अपनी एक सैकेंड हैंड कार थी. इसी दौरान उस की दोस्ती संदीप से हो गई. संदीप मूलरूप से मेरठ जनपद के कस्बा लावड़ का रहने वाला था और गाजियाबाद में किराए पर रहता था. वह एक इंस्टीट्यूट में बच्चों को कोचिंग देता था. वह भी अमीर बनने के सपने देखता था.  2 इंसानों की सोच यदि समान हों तो उन के ताल्लुकात गहरे होते देर नहीं लगती. दीपक व संदीप की दोस्ती भी वक्त के साथ गहरा गई. दोनों जब भी साथ बैठते, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की बात करते. दीपक अपनी प्लेसमेंट एजेंसी खोलना चाहता था. जबकि संदीप की ख्वाहिश थी कि उस का अपना कोचिंग सैंटर हो. इन कामों के लिए मोटी रकम चाहिए थी, लेकिन दोनों में से किसी के पास पैसा नहीं था.

कमउम्र में ही वे बड़ी महत्वाकांक्षाओं के शिकार थे. एक दिन दोनों साथ बैठे तो दीपक बोला, ‘‘कभी हमारे भी सुनहरे दिन आएंगे क्या?’’

‘‘इतना सीरियस क्यों है भाई, यह तो इंसान के अपने हाथ में है.’’ संदीप ने शांत लहजे में कहा तो दीपक मन मसोसते हुए बोला, ‘‘अपने हाथ में होता तो कब का बड़ा आदमी बन जाता. कभीकभी मन करता है कि कोई बड़ा हाथ मार कर एक ही झटके में जिंदगी संवार दूं.’’

‘‘अब की है तूने काम की बात. सोचता तो मैं भी यही हूं. तू कहे तो कुछ ऐसा करें, जिस से सारे संकट जड़ से मिट जाएं.’’ संदीप ने कहा तो दीपक बोला, ‘‘दोनों मिल कर कुछ बड़ा प्लान करते हैं. इस शहर में बड़ेबड़े रईस हैं, वे किस काम आएंगे.’’

‘‘वे क्या हमें आ कर पैसा देंगे?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘बिलकुल देंगे, लेने का हुनर आना चाहिए.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘इतना भोला भी मत बन,  अरे जब हम किसी के जिगर के टुकड़े को कब्जे में लेंगे, तो वह खुद ही तो आ कर पैसा देगा.’’ दीपक का आशय समझते ही संदीप की आंखों में चमक आ गई.

‘‘ठीक है, कुछ ऐसा प्लान करते हैं कि किसी का अपहरण कर के मोटी रकम वसूल कर ली जाए.’’

‘‘इस के लिए हमें बहुत सोचना होगा.’’ संदीप ने कहा.

उस दिन के बाद दोनों का फितरती दिमाग सरपट दौड़ने लगा. अगले कुछ दिनों में ही दोनों ने किसी रईस आदमी के बच्चे का अपहरण करने की योजना बना ली. दोनों इस काम को बेहद चतुराई से करना चाहते थे. वे क्राइम के सीरियलों और ऐसी फिल्मों के शौकीन थे, जिन की पटकथा पुलिस को चौंका देने वाली होती थी. शहर के बारे में उन्हें अच्छी जानकारी थी.

उन दोनों ने अपने शिकार की तलाश के लिए वीवीआईपी सोसाइटी का चुनाव कर लिया. योजना के तहत उन्होंने अगस्त महीने में वहां फ्लैट किराए पर ले लिया. इस दौरान दोनों अपना कामधंधा छोड़ कर भविष्य के सपने बुनने लगे. उन के पास अब आमदनी का कोई जरिया नहीं था. दोनों कमउम्र में ही अंजाम की परवाह किए बिना गलत राह पर चल निकले थे. संदीप अपने घर से आजाद था, जबकि दीपक अपनी मां के नियंत्रण से बाहर था.

सोसायटी में रहते हुए उन्होंने अपने सौफ्ट टारगेट की तलाश शुरू कर दी. वे घूमतेफिरते और मैदान में जा कर बच्चों का क्रिकेट देखते और उन के साथ खुद भी क्रिकेट खेलते. जयकरन को क्रिकेट का जुनून था. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त क्रिकेट में ही बीतता था. जयकरन किशोर था, लेकिन वह अपने से बड़ी उम्र के लड़कों से भी दोस्ती करने का इच्छुक रहता था. क्रिकेट के मैदान में ही उस की मुलाकात दीपक व संदीप से हुई. इस के बाद उन की अकसर बातेंमुलाकातें होने लगीं. कुछ ही दिनों में बातोंबातों में दोनों ने जयकरन का फैमिलीग्राउंड जान लिया. उम्र का बड़ा फांसला होने के बावजूद तीनों दोस्त बन गए.

दीपक व संदीप को जयकरन सब से अच्छा शिकार लगा. उन्हें लगा कि उस के पिता शेयर कारोबारी हैं और मां डाक्टर, इसलिए वे मुंहमांगी मोटी रकम दे देंगे. इस बात को दिमाग में रख कर उन्होंने जयकरन से मेलजोल बढ़ाया और बाद में उस के सहारे उस के घर में भी एंट्री कर ली. अपनी मीठीमीठी बातों और भोलेपन के नाटक से उन्होंने विवेक व अमिता से भी मुलाकात कर ली. कालोनी के अन्य लोगों से भी वे घुलमिल कर रहते थे. वे नहीं चाहते थे कि उन पर किसी को जरा भी शक हो. दरअसल वे अपना काम पूरी प्लानिंग के साथ करना चाहते थे. कुछ इस तरह की पुलिस उन की परछाईं भी न छू सके.

दीपक व संदीप की नजरों में सोसाइटी के यूं तो कई बच्चे थे. लेकिन उन्होंने मन ही मन सोच लिया कि जयकरन को विश्वास में ले कर आसानी से उस का अपहरण किया जा सकता है. दोनों ने विचारविमर्श कर के तय कर लिया कि एक दिन वे जयकरन का अपहरण कर के उस के पिता से फिरौती की मोटी रकम वसूल करेंगे. वे इस बारे में दिनरात सोचते रहते थे. बड़ा भाई किसी आदर्श की तरह होता है. दीपक को भी मेहनत, लगन और ईमानदारी की जिंदगी से अपने छोटे भाइयों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था, लेकिन हुआ इस का उलटा. उस ने बिट्टू को भी अपनी प्लानिंग बता कर उसे अपने साथ मिला लिया.

इस दौरान उन्होंने एक बदमाश के माध्यम से 3 अवैध पिस्तौलों का इंतजाम भी कर लिया. दीपक ने अपने मोबाइल पर वाट्सएप का एक ग्रुप बना रखा था, जिस में जयकरन व कालोनी के कुछ अन्य किशोर भी शामिल थे. दीपक ने यह सब भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने के लिए किया था.

29 नवंबर को रविवार था. जयकरन को मैच खेलने जरूर आना था. इसी दिन उन्होंने जयकरन का अपहरण करने का फैसला कर लिया. उन्होंने सोच लिया कि जयकरन को वे अपने किड्स स्कूल के क्वार्टर में ही ले जाएंगे. उस दिन किड्स स्कूल भी बंद था, इसलिए जयकरन को उन्होंने वहां रखने की सोची. रोजाना की भांति वे जयकरन से मिले. जयकरन दोपहर में क्रिकेट खेल कर घर जाने लगा तो दीपक ने उसे अपने पास बुलाया, ‘‘जयकरन, आओ हमारे साथ. अभी 20 मिनट में वापस आते हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो भैया?’’

‘‘अभी थोड़ा घूम कर आते हैं. हमें किसी से पैसे लेने हैं. साथ ही घूमना भी हो जाएगा. आज तो वैसे भी संडे है. तुम भी फ्री हो.’’ संदीप ने बात घुमाते हुए कहा.

जयकरन उन पर भरोसा करता था. वैसे भी वह बच्चा था. आने वाले खतरे से अनजान जयकरन उन के साथ कार में बैठ गया. इत्तफाक से उन्हें किसी ने नहीं देखा. दीपक उसे ले कर सीधे स्कूल के अंदर क्वार्टर पर पहुंचा. कमरे में पहुंचते ही दीपक व संदीप अपनी असलियत पर आ गए.

जयकरन को दहशतजदा करने के लिए उन्होंने उसे पीटना शुरू कर दिया और उसे बता दिया कि पैसे के लिए उन्होंने उस का अपहरण किया है. जयकरन ‘भैया…भैया’ करता रहा, लेकिन उन्होंने डरेसहमे जयकरन के हाथपैर बांध दिए. उस का मोबाइल छीन कर उन्होंने स्विच्ड औफ कर दिया. अनीता घर पहुंची तो यह देख कर उन्होंने विरोध किया. तब दीपक मां से दुर्व्यवहार पर उतर आया, ‘‘इस मामले में बहस मत करो मां, वरना इस के साथ तुम्हें भी गोली मार दूंगा. मैं यह सब करने के लिए मजबूर हूं. बस तुम लोग एक 2 दिन चुपचाप रहो.’’

बेटे के इस रवैए से अनीता भी घबरा गई. दीपक ने सब से छोटे भाई आयुष को डरधमका दिया. जयकरन को घर में छोड़ कर दोनों सोसाइटी चले गए. वहां जयकरन की ढूंढ़ मची तो वे भी चिंतित हो कर उसे खोजने का ढोंग करने लगे. उधर रात में बिट्टू ने जयकरन को खाना खिलाया. जयकरन का मन तो नहीं था, लेकिन डर की वजह से उस ने खाना खा लिया.

अगली सुबह संदीप व दीपक स्कूल स्थित घर आ गए. दीपक ने जयकरन को धमकाते हुए समझाया, ‘‘एकदो दिन में हम तुम्हारी बात तुम्हारे पापा से कराएंगे.’’

‘‘ज…ज…जी भैया.’’ दहशत में आए जयकरन ने डर से हां में हां मिलाई.

‘‘पता है क्या कहोगे?’’ दीपक ने पूछा तो जयकरन ने इनकार में गरदन हिलाई. इस पर दीपक ने उसे समझाया, ‘‘तुम कहना कि पापा अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो इन लोगों को 2 करोड़ रुपए दे दो, वरना ये लोग मुझे मार डालेंगे.’’

‘‘भैया, जैसा आप कहोगे, मैं वैसा ही कह दूंगा.’’ जयकरन ने डर कर जवाब दिया.

उस दिन सोमवार था. स्कूल भी खुलना था. जयकरन शोर न मचाए, इस के लिए दीपक ने नाश्ता करा कर उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. यह इंजेक्शन दीपक ने अपने एक दोस्त के माध्यम से 500 रुपए में खरीदा था. पुलिस मोबाइल के जरिए उन्हें पकड़ न सके, इसलिए उन्होंने अपने मोबाइल का इस्तेमाल नहीं किया.

बिट्टू को फिरौती के लिए फोन करने के लिए जयकरन का मोबाइल ले कर 15 किलोमीटर दूर भेजा गया. वहां से 2 करोड़ की फिरौती का फोन कर के वह वापस आ गया. बिट्टू से फोन कराना इसलिए जरूरी था, क्योंकि जयकरन के घर वाले दीपक व संदीप की आवाज पहचानते थे. तीनों ने तय कर लिया था कि उन्होंने फिरौती की रकम की शुरुआत 2 करोड़ से की है तो सौदेबाजी होने पर करोड़ तो मिल ही जाएंगे.

इस से भी ज्यादा खतरनाक योजना उन्होंने यह बनाई कि रकम मिलते ही वे जयकरन की हत्या के बाद लाश को हरिद्वार ले जा कर ठिकाने लगा देंगे. जयकरन चूंकि उन्हें पहचानता था, इसलिए उसे जिंदा छोड़ना उन के लिए खतरनाक था. हरिद्वार में दीपक का एक चाचा रहता था. दीपक ने उसे भी फोन कर के इशारों से अपनी बात समझा दी थी. रकम मिलने तक वह जयकरन को इसलिए जिंदा रखना चाहते थे, ताकि विश्वास दिलाने के लिए उस के घर वालों से उस की बात कराई जा सके. उन्होंने यह भी सोच लिया था कि यदि रकम नहीं मिली तो भी जयकरन को मार देंगे. दोनों ही सूरतों में जयकरन का मरना तय था.

उधर फिरौती का फोन पहुंचते ही सोसायटी में पुलिस की गतिविधियां बढ़ गईं. शाम तक उन्होंने मौके की नजाकत परखने का निर्णय लिया. उन्हें दोबारा शाम को फोन करना था, इसलिए इंतजार करने लगे. इन लोगों ने अपनेअपने मोबाइल औफ कर लिए थे. उन्हें उम्मीद थी कि पुलिस जयकरन का मोबाइल दूसरी जगह इस्तेमाल करने की वजह से धोखा खा कर दिशा भटक जाएगी, लेकिन उन तक नहीं पहुंच पाएगी, यह उन की अपनी सोच थी. शक की बिनाह पर वह शिकंजे में आ गए.

उधर पूछताछ के बाद स्कूल संचालिका व आरोपियों की मां को छोड़ दिया गया. स्कूल में क्या कुछ चल रहा था, रिचा सूद वाकई इस से पूरी तरह अंजान थीं. पुलिस ने अपहरण में प्रयुक्त कार भी बरामद कर ली. अगले दिन यानी 1 दिसंबर को प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने संदीप को डिस्चार्ज करा लिया.

पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अपने से बड़ी उम्र के युवकों से दोस्ती करने की आदत ही जयकरन को भारी पड़ गई थी. वहीं दीपक, संदीप व बिट्टू ने राह से भटकने के बजाय मेहनत की राह अपना कर जिंदगी को संवारने की कोशिश की होती तो उन का भविष्य चौपट होने से बच जाता. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल में थे और उन की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस दीपक के चाचा की तलाश कर रही थी. Ghaziabad Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: शिल्पा शेट्टी के – परिवार को ठगने वाला बाबा

Crime Story Hindi: योगगुरु बाबा रामदेव के तथाकथित शिष्य देवेंद्र ने मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के परिवार के अलावा भी कई लोगों को ठगा था. लेकिन जब उस के कारनामों की पोल खुली तो हर कोई दंग रह गया. चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर लंबे बाल रखने वाला वह लंबातगड़ा शख्स खुद को पहुंचा हुआ बाबा बताता था. मैडिकल साइंस को चुनौती देने वाले रोगों को भी वह ठीक करने का दावा करता था. सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह खुद को करोड़ों का कारोबार करने वाले ट्रस्ट पतंजलि के योगगुरु बाबा रामदेव का शिष्य भी बताता था, साथ ही वह बौलीवुड की मशहूर अदाकारा शिल्पा शेट्टी के साथसाथ कई और विख्यात हीरोइनों से अपने खास ताल्लुकात बताया करता था.

उस के कई नाम थे और उस का सब से बड़ा हथियार था धर्म. यही वजह थी कि तमाम लोग उस के मुरीद थे, लेकिन जब उस की करतूतों का खुलासा हुआ तो उस की हकीकत जान कर हर कोई दंग रह गया. वास्तव में वह महाठग था. उस ने न सिर्फ शिल्पा शेट्टी के परिवार से एक करोड़ रुपए से ज्यादा ठग लिए थे, बल्कि अन्य कई लोगों को भी चूना लगाया था. इस शख्स का नाम था देवेंद्र कुमार योगी उर्फ देवेंद्र कुमार आचार्य उर्फ योगी महाराज उर्फ स्वामी कृष्णदेव योगी. इस तथाकथित योगी का उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद स्थित हस्तिनापुर इलाके में आश्रम था. गेरुआ व सफेद वस्त्र धारण करने वाला यह बाबा धर्म के नाम पर लोगों को अपना मुरीद बनाता था.

लोगों को धर्म के नाम पर किस तरह बहलाफुसला कर काबू में लाया जाता है, यह हुनर वह बखूबी जानता था. इस के लिए वह सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेता था. वैसे भी समाज में ऐसे अंधविश्वासियों की कोई कमी नहीं है, जो अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं. देवेंद्र के कई चेलेचपाटे गांवगांव जा कर उस का प्रचार किया करते थे. वह लोगों को योग सिखाने के साथसाथ खुद को कैंसर स्पैशलिस्ट भी बताता था. वैसे तो उस के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन वह दावा करता था कि जिस मर्ज का इलाज डाक्टर नहीं कर सकते, उस का इलाज वह कर देगा.

वह जिन मर्जों को दूर करने की बात करता था, उन में गुप्तरोग, दमा, अस्थमा, हृदय रोग, थायराइड, एनीमिया, साइनस, किडनी स्टोन, शुगर, प्रोस्टेट, पाइल्स, कोरोनरी आर्टरीज, मोटापा, कब्ज, आर्थराइटिस, ब्लड प्रेशर व जोड़ों का दर्द आदि रोग शामिल थे.

धनी भक्तों के घर जा कर वह योगा क्लास चलाता था. वह अपनी फीस भक्तों की हैसियत के हिसाब से निर्धारित करता था. आश्रम में आने वाले भक्तों को वह अपनी कामयाबियों के मनगढ़ंत किस्से सुना कर प्रभावित करता था. उस ने खुद को कारोबारी बाबा के रूप में पहचान बना चुके बाबा रामदेव का खास शिष्य घोषित किया हुआ था. उस के अनुसार, वह पिछले 10 सालों से बाबा से जुड़ा हुआ था. अपने इस दावे को सच साबित करने के लिए उस ने बाबा रामदेव के साथ वाली अपनी कई तसवीरें आश्रम की दीवारों पर टांग रखी थीं.

रौबरुतबे के लिए इतना ही काफी नहीं था. वह फिल्म हीरोइन शिल्पा शेट्टी समेत उन के पूरे परिवार को अपना भक्त बताता था. शिल्पा शेट्टी और उन के परिवार के साथ भी उस ने कई तसवीरों को दीवार पर सजा रखा था. वह अपने भक्तों को बताता था कि जब वह मुंबई जाता है तो प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, करिश्मा कपूर, बिपाशा बसु, सोनाक्षी सिन्हा, अनिल कपूर, रितिक रोशन जैसे कई हीरोहीरोइन उस से मिलने आते हैं. वे लोग अपने कई काम उस के कहे अनुसार करते हैं और टेलीफोन पर बराबर संपर्क में रहते हैं.

साधारण लोग सोचते थे कि जब इतने बड़ेबड़े स्टार बाबा के भक्त हैं तो फिर वे क्यों पीछे रहें. भक्तों की बढ़ती कतार के साथ उस के चेहरे की रौनक बढ़ जाती थी. उस के भक्त बाबा को खुशीखुशी रुपयापैसा भी देते थे. देवेंद्र की दुकान ठीक जमी हुई थी कि 20 नवंबर, 2015 को मुंबई के वरसोवा थाने के सबइंसपेक्टर भारत शिवाजी के नेतृत्व में पुलिस टीम की छापेमारी से खलबली मच गई. दरअसल मुंबई में बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी व गबन का मामला दर्ज था. पुलिस ने बाबा देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया.

इस के साथ ही उस की कलई खुली तो उस के भक्त भी सिर थाम कर बैठ गए, क्योंकि हकीकत हैरान करने वाली थी. बाबा कोई छुटभैया नहीं, बल्कि महाठग निकला. उस ने हीरोइन शिल्पा शेट्टी के मातापिता से 1 करोड़ 20 लाख रुपए की रकम ठगी थी. कानून का फंदा कसते ही देवेंद्र हक्काबक्का रह गया. वजह यह कि शायद उसे इस की कतई उम्मीद नहीं थी.

दरअसल, देवेंद्र ने जनवरी, 2014 में एक कारोबारी के माध्यम से शिल्पा के पिता सुरेंद्र शेट्टी व मां सुनंदा शेट्टी से जानपहचान बढ़ाई. बाबा के लिबास और धर्म की बड़ीबड़ी बातों से वह उस के झांसे में आ गए. इस के बाद वह अकसर उन के घर आनेजाने लगा. उस ने उन से खुद को रामदेव का खास शिष्य व आयुर्वेदिक औषधियों का बड़ा जानकार बताया था. उस ने उन्हें सपना दिखाया कि औषधियों का बड़ा कारोबार किया जा सकता है. उस के झांसे में आए सुरेंद्र शेट्टी ने उसे मोटी रकम दे दी. दिखावे के लिए देवेंद्र ने मुंबई में औफिस भी खोल लिया था.

देवेंद्र जब शिल्पा के घर जाता था तो प्रभाव जमाने के लिए श्वेत वस्त्रों के साथ ही लकड़ी की खड़ाऊ पहन कर जाता था. जबकि हकीकत में वह फैशनपरस्त था. वह जींस टीशर्ट पहन कर डांस बारों से ले कर सिनेमाघरों तक में मौजमस्ती करता था. शिल्पा का परिवार उस की इस हकीकत से अनजान था. दवा सप्लाई के नाम पर जब उस ने धीरेधीरे एक करोड़ से ज्यादा की रकम झटक ली तो एक दिन वह चुपके से बोरियाबिस्तर समेट कर अपने मूल ठिकाने पर आ गया. शिल्पा शेट्टी के परिवार की एक लग्जरी कार भी वह अपने साथ ले आया था. ठगी का अहसास होने पर शिल्पा के पिता ने वरसोवा थाने में बाबा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था.

आश्रम आ कर देवेंद्र ने अपना काम ठीक से जमा लिया था. उस ने योग के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया, जिस पर विदेशी मौडल्स की कई उत्तेजक तसवीरें लगाईं. फेसबुक पेज पर उस ने खुद को योग अध्यापक घोषित कर रखा था. देवेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही उस की ठगी के कारनामे खुलने लगे. उस ने कई लोगों को चूना लगाया था. अजय ठाकुर नामक एक युवक से उस ने पीसीएस परीक्षा में चयन करवाने के नाम पर 10 लाख रुपए मांगे थे. उन्होंने उसे पेशगी के तौर पर 4 लाख रुपए दे भी दिए थे. लेकिन चयन के नाम पर बाबा टरकाने का काम करता रहा. इस के अलावा कई बड़े व्यापारियों को भी उस ने यह कह कर चूना लगाया था कि वह उन के किसी प्रोग्राम में शिल्पा शेट्टी को बुलवा देगा.

चूंकि शिल्पा और उन के परिवार के साथ उस के फोटोग्राफ थे, इसलिए लोग भरोसा कर लेते थे. पुलिस का कहना है कि देवेंद्र ने कई और लोगों को ठगने की प्लानिंग कर रखी थी. पुलिस इस बाबा को जेल भेज चुकी है. पुलिस कस्टडी में उस ने दावा किया कि वह रामदेव के ट्रस्ट पतंजलि से जुड़ा है. देवेंद्र कोई अकेला ठग नहीं है. समाज में ऐसे लोगों की भरमार है, जो धर्म के नाम पर लोगों को बहका कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. जरूरत है ऐसे ठगों को पहचान कर उन से सावधान रहने की. Crime Story Hindi