High Profile Murder Case : सवालों में उलझी मर्डर मिस्ट्री

High Profile Murder Case. बौलीवुड के जानेमाने संगीतकार जतिन-ललित और गायिका तथा नायिका सुलक्षणा पंडित एवं विजेयता पंडित की बहन तथा सेंट्रल कस्टम ऐंड एक्साइज कमिश्नर की पत्नी संध्या सिंह की हत्या के मामले में पुलिस ने उन के बेटे रघुवीर सिंह को मात्र परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया है. जबकि अभी यह भी पता नहीं है कि उस ने हत्या क्यों की थी

सुप्रीम कोर्ट ने रघुवीर सिंह की अग्रिम जमानत की अरजी खारिज कर दी तो मजबूरन उसे 16 दिसंबर, 2013 की दोपहर 2 बजे महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर स्थित क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के औफिस आ कर जांच अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा. क्योंकि इस के अलावा अब उस के पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा था.

इस तरह वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक श्रीपाद काले और उन की जांच टीम को नवी मुंबई के बहुचर्चित संध्या सिंह हत्याकांड के मामले में 1 साल 3 दिन बाद मृतका के बेटे रघुवीर सिंह को गिरफ्तार कर ने में एक महत्त्वपूर्ण कामयाबी मिल गई थी. क्योंकि उन का कहना था कि रघुवीर सिंह के खिलाफ उन के पास भले ही कोई ठोस सुबूत नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य सुबूत अवश्य हैं.

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जिन परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर रघुवीर सिंह को गिरफ्तार किया गया था, ये सुबूत क्राइम ब्रांच और नवी मुंबई पुलिस के पास पिछले 6 महीनों से थे. लेकिन अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए रघुवीर सिंह बारबार कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहा था, इसलिए पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी. वह जहां भी गया, जांच अधिकारियों ने परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर उस की अग्रिम जमानत का विरोध किया था. सभी अदालतों ने उन्हीं परिस्थितिजन्य घटनाओं को सुबूत माना और  उस की अग्रिम जमानत की अरजी खारिज कर दी.

पुलिस के पास रघुवीर सिंह के खिलाफ कोई ठोस सुबूत भले नहीं थे, लेकिन ये सुबूत उस ने खुद बारबार अदालत जा कर उपलब्ध करा दिए थे. गिरफ्तारी से बचने के लिए बारबार अदालत जा कर उस ने पुलिस का संदेह पुख्ता कर दिया था.

बारबार अदालात जा कर जो गलती रघुवीर सिंह ने की थी, कुछ ऐसी ही गलती नोएडा के डा. राजेश तलवार और नूपुर तलवार ने अपनी बेटी आरुषि और नौकर हेमराज हत्याकांड के मामले में की थी. इन दोनों ने भी बारबार अदालत जा कर संदेह को पुख्ता किया था. जबकि इस मामले में भी सीबीआई के पास मात्र परिस्थितिजन्य सुबूत ही थे, डाइरैक्ट एविडेंस नहीं थे. इसलिए सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट पेश की तो डाइरैक्ट एविडेंस न होने की अपनी मजबूरी अदालत को बता दी थी. अंतत: अदालत ने उसी क्लोजर रिपोर्ट को चार्जशीट मान कर मुकदमा चलाया और परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर ही दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

जिन 50 वर्षीया संध्या सिंह की हत्या के मामले में उन के बेटे रघुवीर सिंह को मुंबई की क्राइम ब्रांच यूनिट-6 ने गिरफ्तार किया है, वह नवी मुंबई के गार्डन सिटी कहे जाने वाले पौश इलाके के एनआरआई कौंप्लेक्स की इमारत नंबर-3 में अपने परिवार के साथ रहती थीं. उन के परिवार में पति जयप्रकाश सिंह के अलावा बेटी राजेश्वरी और बेटा रघुवीर सिंह था.

सेंट्रल एक्साइज कमिश्नर जयप्रकाश सिंह उन दिनों इंदौर में तैनात थे. बेटी राजेश्वरी सिंह मणिपाल यूनिवर्सिटी से जिओपौलिटिक्स ऐंड इंटरनेशनल रिलेशंस की मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रही थी. वह वहीं हौस्टल में रहती थी. जबकि बेटा रघुवीर सिंह अपनी गर्लफ्रैंड श्रेया के साथ मां के साथ ही रहता था. रघुवीर सिंह एक बिगड़ा हुआ नवाब था. लाडप्यार ने उसे इस कदर बिगाड़ दिया था कि उस पर किसी का अंकुश नहीं रह गया था. ड्रग एडिक्ट होने की वजह से मांबेटे में बिलकुल नहीं बनती थी. वह ड्रग के लिए अकसर मां संध्या सिंह से पैसे मांगता रहता था. मना करने पर वह उन से लड़ाईझगड़ा करता था. कई बार तो उस ने मां पर हाथ भी उठा दिया था.

संध्या सिंह जहां फिल्मों से जुड़े परिवार से थीं, वहीं उन के पति जयप्रकाश सिंह भी एक वीआईपी परिवार से थे. दोनों ही परिवार काफी संभ्रांत और प्रतिष्ठित थे. जयप्रकाश सिंह प्रशासनिक सेवा के अंतर्गत सेंट्रल कस्टम ऐंड एक्साइज कमिश्नर थे. कई सालों तक मुंबई में तैनात रहने के बाद उन का तबादला इंदौर हो गया था. उन के एक भाई मुंबई एयरपोर्ट के चीफ सिक्युरिटी अफसर थे तो एक अन्य भाई बंगलुरु में पुलिस कमिश्नर थे.

दूसरी ओर संध्या सिंह के दादा पंडित जसराज विश्वप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक थे तो उन के 2 भाई जतिन और ललित बौलीवुड में संगीतकार हैं. अभिनेत्री और गायिका सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित उन की छोटी बहनें हैं. संध्या सिंह को फिल्मों में काम करना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने फिल्मों से हट कर जयप्रकाश सिंह से शादी कर ली थी.

संध्या की जयप्रकाश सिंह से दुबई से भारत आते हुए हवाईजहाज में मुलाकात हुई थी. रास्ते में होने वाली बातचीत ने दोनों को इस कदर प्रभावित किया था कि उन में दोस्ती हो गई. दोनों ही प्रतिष्ठित और संपन्न परिवारों से थे, इसलिए उन की यह दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. इस के बाद दोनों ने शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ली.

यही संध्या 13 दिसंबर, 2012 की दोपहर को करीब 11 बजे अपने घर से 20 लाख के गहने ले कर बैंक के लौकर में रखने के इरादे से निकलीं तो लौट कर नहीं आईं. यह इलाका थाना एनआरआई के अंतर्गत आता था. जब संध्या सिंह की गुमशुदगी की सूचना थाना एनआरआई पुलिस को दी गई तो मामला बड़े और वीआईपी परिवार से जुड़ा होने के कारण वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजकुमार चाफेकर ने तत्काल इस बात की जानकारी उच्चाधिकारियों को दी और अपने सहायकों के साथ उन की तलाश में जुट गए.

मामला रसूखदार परिवारों से जुड़ा था, इसलिए नवी मुंबई के पुलिस आयुक्त अशोक शर्मा ने तत्काल योग्य और कुशल पुलिस अधिकारियों की 4 टीमें बना कर मामले की जांच में लगा दिया. इन टीमों में क्राइम ब्रांच, 2 पुलिस उपायुक्त और 7 वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक भी शामिल थे.

वरिष्ठ अधिकारियों के दिशानिर्देश में चारों टीमें संध्या सिंह की तलाश में जुट गईं. पूछताछ में पता चला था कि 13 दिसंबर, 2012 को संध्या सिंह 20 लाख के गहने ले कर नेरुल की अभ्युदय बैंक के लौकर में रखने के लिए घर से निकली थीं तो लौट कर नहीं आई थीं. वह घर से निकल रही थीं तो बेटे रघुवीर सिंह ने उन से बैंक तक छोड़ने को कहा था, लेकिन उन्होंने उस के साथ जाने से मना कर दिया था. इमारत से निकल कर वह आटो स्टैंड की ओर जा रही थीं, तभी उसी कौंप्लेक्स की इमारत नंबर 32 की रहने वाली उन की सहेली उमा गौर उन्हें मिल गईं. वह अपनी कार से दादर जा रही थीं. उन्होंने संध्या सिंह को अपनी कार में बैठा लिया था.

उमा गौर टीवी सीरियलों और फिल्मों में स्क्रिप्ट लिखने का काम करती थीं. संध्या सिंह से उन की जानपहचान तब हुई थी, जब उन की बहन की शादी थी. उन्हें बहन की शादी में आने वाले मेहमानों को ठहराने के लिए एक मकान की जरूरत थी. वह मकान की तलाश कर रही थीं, तभी उन्हें उसी कालोनी की भीमा शंकर इमारत में संध्या सिंह के खाली पड़े मकान के बारे में पता चला था. उमा ने संध्या सिंह से संपर्क किया और कुछ दिनों के लिए उन से अपना मकान देने को कहा.

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संध्या सिंह ने बिना किसी किराए के अपना वह मकान उन्हें दे दिया था. चूंकि संध्या सिंह फिल्में और सीरियल तो देखती ही थीं, इस के अलावा वह एक फिल्मी परिवार से जुड़ी थीं, इसलिए उमा और उन के बीच दोस्ती हो गई थी. यही वजह थी कि उस दिन वह किसी काम से दादर जा रही थीं तो रास्ते में संध्या सिंह को देख कर अपनी कार में बैठा लिया था. उन्होंने उन्हें अभ्युदय बैंक के सामने छोड़ा था.

सुबह 11 बजे की निकली संध्या सिंह जब शाम तक घर नहीं लौटी तो रघुवीर सिंह को मां की चिंता हुई. वह उन की तलाश में निकल पड़ा. उस ने कालोनी के एकएक आदमी से मां के बारे में पूछा. इस के बाद वह वहीं पास ही पामबीच कालोनी में रहने वाली अपनी मौसी सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित को फोन कर के मां के न लौटने की बात बताई.

सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित ने उसे धीरज रखने के लिए कहा. लेकिन जब रात भी बीत गई और संध्या सिंह घर नहीं लौटीं तो रघुवीर सिंह के साथसाथ सुलक्षणा पंडित और विजयेता पंडित को भी चिंता हुई. उन के भाई जतिन और ललित सांताक्रुज जुहू में रहते थे. उन्हें फोन कर के संध्या के बारे में पूछा गया, लेकिन वह वहां भी नहीं थीं.

उसी दिन शाम को रघुवीर सिंह ने अपने घर में ही दोस्तों की एक पार्टी रखी थी. लेकिन मां के अचानक गायब हो जाने से वह पार्टी में शामिल नहीं हो सका. उस के पार्टी में न जाने से उस पार्टी की जिम्मेदारी उस की गर्लफ्रेंड श्रेया ने संभाली थी.

संध्या सिंह को घूमने का शौक था. कभीकभी वह बिना किसी को बताए जहां मन होता था, चली जाती थीं. इसलिए सवेरा होने पर रघुवीर सिंह मुंबई एयरपोर्ट गया. वहां उस ने सिक्योरिटी पर तैनात अपने चाचा को पूरी बात बता कर मां कहीं बाहर तो नहीं गईं हैं, यह पता लगाने को कहा. लेकिन वहां से भी उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. अब तक संध्या सिंह के लापता होने की बात पूरे परिवार को पता चल चुकी थी. इसलिए पूरा परिवार अपनीअपनी तरह से संध्या सिंह की तलाश में जुट गया था.

16 दिसंबर, 2012 को संध्या सिंह के लापता होने की जानकारी जयप्रकाश सिंह को मिली तो वह तुरंत इंदौर से मुंबई आ गए. उन्होंने मुंबई आते ही घर वालों के साथ थाना एनआरआई जा कर 20 लाख रुपए के गहनों के साथ पत्नी संध्या की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. उन्होंने पत्नी के गायब होने का आरोप सीधे सीधे उसी पुलिस थाने में तैनात सहायक पुलिस निरीक्षक अनिल वेहराणी और अपनी एक मालिश करने वाली नौकरानी पर लगाया था.

इस की वजह यह थी कि 20 नवंबर, 2012 को जयप्रकाश सिंह के घर में चोरी हुई थी, जिस में संध्या सिंह के कुछ गहने चोरी चले गए थे. इस मामले की जांच अनिल वेहराणी ने की थी. जांच के दौरान बारबार घर आने और पूछताछ में संध्या सिंह से उन की अच्छी जानपहचान हो गई थी. यह जानपहचान तब और गहरी हो गई थी, जब उन्होंने उन की नौकरानी को गिरफ्तार कर के चोरी गए सभी गहने बरामद करा दिए थे.

इस से संध्या सिंह की नजरों में अनिल वेहराणी की इज्जत बढ़ गई थी. इस के बाद वह अकसर अनिल वेहराणी से फोन पर बातें करने लगी थीं. उन्होंने कई बार अनिल वेहराणी को अपने घर भी बुलाया था. जिस दिन संध्या सिंह गायब हुई थीं, उस दिन भी उन्होंने उमा गौर के मोबाइल से सहायक पुलिस निरीक्षक अनिल वेहराणी से काफी देर तक बातचीत की थी. संयोग से अगले दिन अनिल वेहराणी छुट्टी पर चले गए थे.

अनिल वेहराणी भले ही पुलिस अधिकारी थे, लेकिन उन पर जो आरोप लगा था, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था. लिहाजा पुलिस आयुक्त अशोक शर्मा ने इस मामले की जांच नवी मुंबई क्राइम ब्रांच (सीआईडी) के जौइंट पुलिस आयुक्त श्रीकांत पाठक को सौंप दी. उन्होंने सहायक पुलिस निरीक्षक अनिल वेहराणी के बारे में बड़ी बारीकी से जांच की, लेकिन उन के हाथ ऐसा कुछ भी नहीं लगा, जिस से वह संदेह के दायरे में आते.

नवी मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच (सीआईडी) हर पहलू से संध्या सिंह के गायब होने के रहस्य की जांच कर रही थी, लेकिन कहीं से भी कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा था. मामला वीआईपी परिवार का था, इसलिए महानगर से निकलने वाले सभी हिंदी और अंगरेजी अखबारों ने इस मामले को सनसनीखेज बना दिया था, जिस की वजह से जांच अधिकारियों पर उन के उच्चाधिकारियों का दबाव बढ़ता जा रहा था.

धीरेधीरे संध्या सिंह को लापता हुए डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन 2 पुलिस उपायुक्तों और 7 वरिष्ठ पुलिस निरीक्षकों की दौड़धूप का कोई परिणाम नहीं निकला था. इतना समय बीत जाने पर संध्या सिंह के पति जयप्रकाश सिंह और उन के घर वालों का धैर्य जवाब देने लगा. उन्हें लग रहा था कि पुलिस को जिस तरह से इस मामले की जांच करनी चाहिए, उस तरह नहीं कर रही है तो उन्होंने खुद एक प्रैस कौन्फ्रैंस कर के संध्या सिंह के बारे में जानकारी देने वाले को अपनी ओर से 5 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की. इसी के साथ राज्य के गृहमंत्री आर.आर. पाटिल से मिल कर संध्या सिंह की गुमशुदगी के मामले की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच और सीबीआई से कराए जाने की मांग की.

गृह राज्यमंत्री आर.आर. पाटिल पर उन की बातों का असर हुआ और उन्होंने मामले की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच को सौंप दी. क्राइम ब्रांच के जौइंट पुलिस कमिश्नर हिमांशु राय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस की जांच क्राइम ब्रांच यूनिट-6 के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक श्रीपाद काले को सौंपी. क्राइम ब्रांच यूनिट-6 संध्या सिंह की गुमशुदगी की जांच की रूपरेखा तैयार कर ही रही थी कि मामले ने एक नया मोड़ ले लिया.

दरअसल, 28 जनवरी, 2013 को  ब्रिटिश नागरिक पक्षी वैज्ञानिक माइकल जौन ओट्स ने नवी मुंबई पुलिस को पाम बीच स्थित डीपीएस स्कूल के पीछे एक नरकंकाल पड़े होने की सूचना दी थी. उन्होंने पुलिस को बताया था कि जब वह पनवेल स्थित कर्नाला पक्षी अभ्यारण्य जा कर पक्षियों के शोध के लिए फोटो खींच कर अपने तीनों साथियों के साथ पवई के लिए लौट रहे थे तो नवी मुंबई पाम बीच रोड स्थित समुद्र की खाड़ी के किनारे कुछ और पक्षियों को देखने के लिए रुक गए. पक्षियों को देखतेदेखते ही वे वहां के डीपीएस स्कूल के एकदम पीछे वाले हिस्से में खाड़ी के किनारे तक चले गए. वहां से वे लौट रहे थे तो एक  नरकंकाल से टकरा गए. उस दिन तो वे घर चले गए, लेकिन अगले दिन वे नवी मुंबई वापस आए तो इस की जानकारी थाना एनआरआई को दी.

यह जानकारी मिलते ही एक पुलिस टीम तत्काल वहां पहुंच गई. पुलिस ने घटनास्थल की जांच कर के उस नरकंकाल और सारी सामग्री इकट्ठा कर के कब्जे में ले लिया. पुलिस को वहां से एक नरमुंड, 7 हड्डियां, एक सोने की चेन, रुद्राक्ष की माला, बालों की विग, दांतों की कैप और एक सलवारकमीज मिली थी. इस सब की शिनाख्त के लिए पुलिस ने संध्या सिंह की बहन सुलक्षणा पंडित और उन के भाई ललित पंडित को बुला लिया. सुलक्षणा पंडित और ललित पंडित ने वहां मिले सारे सामानों को देख कर बताया कि यह सारा सामान उन की बहन संध्या सिंह का है. सामान की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने नरकंकाल का पंचनामा तैयार कर फोरैंसिक और डीएनए जांच के लिए भेज दिया.

संध्या सिंह की हत्या की गई है, नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर अशोक शर्मा द्वारा इस बात की पुष्टि करने के बाद जांच की दिशा बदल गई. क्राइम ब्रांच यूनिट-6 ने संध्या सिंह हत्याकांड की जांच नए सिरे से शुरू की. अब क्राइम ब्रांच के निशाने पर संध्या सिंह का परिवार था. उस ने संध्या सिंह के पति जयप्रकाश सिंह, बेटी राजेश्वरी सिंह, बेटे रघुवीर सिंह और उस के साथ लिव इन रिलेशन में रह रही श्रेया वर्मा से विस्तारपूर्वक पूछताछ की. इस पूछताछ में क्राइम ब्रांच ने बाकी लोगों को तो क्लीन चिट दे दी, लेकिन रघुवीर सिंह और उस की गर्लफ्रैंड श्रेया को सस्पेक्ट में रख लिया. इस के बाद रघुवीर सिंह और श्रेया  को बारबार पूछताछ के लिए चेंबूर क्राइम ब्रांच के औफिस में बुलाया जाने लगा.

इस के अलावा क्राइम ब्रांच पुलिस ने संध्या सिंह के सभी घर वालों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स और बैकग्राउंड के साथसाथ उन पहलुओं की भी जांच की, जिन पहलुओं को नवी मुंबई पुलिस ने अपनी जांच में दरकिनार कर दिया था. एनआरआई कौंप्लेक्स और अभ्युदय बैंक में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की गई. अभ्युदय बैंक के आसपास काम करने वालों को जब संध्या सिंह की फोटो दिखा कर पूछताछ की गई तो कुछ लोगों ने बताया कि फोटो में दिखने वाली जैसी एक महिला को उस दिन उन लोगों ने साड़ीब्लाउज में बैंक के पास से एक आटोरिक्शे में बैठते देखा था.

संध्या सिंह जिस कौंप्लेक्स में रहती थीं, उस के सामने आटो वालों की काफी भीड़ रहती थी. इन में कई आटो वाले ऐसे थे, जो संध्या सिंह को भलीभांति जानते थे. वे उन के यहां आतेजाते भी थे. उन में से कई आटो वालों से क्राइम ब्रांच ने सस्पेक्ट के तौर पर पूछताछ की.

उन में सभी आटो वाले तो निकल गए, लेकिन आटो ड्राइवर मोहम्मद आरिफ मेहंदी हसन फंस गया. क्योंकि उस की पृष्ठभूमि आपराधिक थी. 2009 में उस ने सुपारी ले कर 2 हत्याएं की थीं. इन में से एक भांडुप, मुंबई की एक महिला ने पैसे दे कर उस से अपने पति की हत्या करवाई थी तो दूसरी हत्या उस ने थाना चेंबूर में की थी. बैंक के आसपास वालों का कहना था कि आटो में बैठने वाली महिला साड़ीब्लाउज में थी, जबकि उमा गौर का कहना था कि उस दिन संध्या सिंह सलवारकमीज में थीं. उन के हाथ में एक छोटा सा बैग था.

पुलिस ने हसन को पूछताछ के लिए मात्र इसलिए रोका था, क्योंकि उस की आपराधिक पृष्ठभूमि थी. इस के अलावा उस सुबह की उस के मोबाइल फोन की लोकेशन भी अभ्युदय बैंक के पास की दिखा रही थी. संयोग से उस का घर भी एनआरआई कौंप्लेक्स के पास था. फोटो दिखाने पर लोगों ने यह भी कहा था कि फोटो वाली महिला को उन्होंने पानी की बोतल लिए आटो में बैठते देखा था. हसन से पूछताछ में पुलिस को कोई क्लू नहीं मिला तो पुलिस ने उसे दूसरे मामले में जेल भेज दिया.

क्राइम ब्रांच यूनिट-6 रघुवीर सिंह और उस की गर्लफ्रैंड श्रेया वर्मा से लगातार पूछताछ कर रही थी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ के अनुसार रघुवीर सिंह और श्रेया की कहानी एक अंधेरे कमरे से शुरू हुई थी, जो जल्दी ही लिव इन रिलेशन में बदल गई थी.

श्रेया वर्मा दिल्ली के एक प्रतिष्ठित परिवार की एकलौती संतान थी. वह आईटी करने मुंबई आई तो नवी मुंबई के खारघर के एक हौस्टल में रहने लगी. श्रेया जिस कमरे में रहती थी, उस में उस के साथ 5-6 अन्य लड़कियां भी रहती थीं. उन लड़कियों में से कुछ ड्रग्स लेती थीं. जब इस बात की जानकारी उस के मातापिता को हुई तो उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, प्यार से समझाया भी. उन्होंने उसे दिल्ली वापस आने को कहा तो उस ने मांबाप से वादा किया कि वह खारघर वाला हौस्टल छोड़ कर अपने लिए कहीं और मकान ले लेगी. लेकिन दिल्ली नहीं आएगी. उस की इस बात पर मांबाप राजी हो गए थे.

मांबाप से वादा करने के बाद श्रेया नए घर की तलाश में जुट गई. तभी उसे किसी से नेरुल की भीमा शंकर इमारत में रघुवीर सिंह के खाली पड़े फ्लैट के बारे में पता चला. श्रेया रघुवीर सिंह का वह फ्लैट देखने पहुंची तो पता चला कि बिजली का बिल जमा न होने के कारण वहां की बिजली काट दी गई थी. बिना बिजली वाले फ्लैट को लेने का कोई सवाल ही नहीं था.

चूंकि रघुवीर सिंह का संबंध एक रसूखदार परिवार से था, इसलिए बिजली का मामला शीघ्र निपट सकता था. इसलिए वह रघुवीर सिंह से मिली. उस ने रघुवीर सिंह को अपनी परेशानी बताई तो उस ने बिजली ठीक कराने में असमर्थता जाहिर करते हुए कहा कि उस के घर में एक बेडरूम खाली पड़ा है. अगर वह चाहे तो उस में रह ले. श्रेया ने कहा कि उस की मां संध्या सिंह उसे अपने घर में क्यों रहने देंगी तो रघुवीर सिंह ने कहा था कि वह पीछे के दरवाजे से आएगीजाएगी, मां को पता ही नहीं चलेगा कि वह वहां रह रही है.

यहीं से श्रेया की रघुवीर सिंह के घर में एंट्री हुई. लेकिन कुछ दिनों बाद एक दिन श्रेया का सामना संध्या सिंह से हो ही गया. संध्या सिंह के सामने पड़ने पर वह घबरा गई. लेकिन संध्या सिंह ने सहमी खड़ी श्रेया को डांटनेफटकारने के बजाए प्यार से उस के बारे में सब कुछ पूछा. इस के बाद उन्होंने उसे गलत आदतोें से दूर रहने की हिदायत दे कर अपने घर में रहने की इजाजत दे दी. एक ही घर में एक साथ रहते हुए रघुवीर सिंह और श्रेया करीब आ गए. इस के बावजूद श्रेया संध्या सिंह से हमेशा डरती रही.

रघुवीर सिंह और श्रेया से लगातार पूछताछ करने बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा तो पुलिस ने दोनों का नारको टेस्ट कराने का विचार किया. पुलिस इन्हें प्राइम सस्पेक्ट इसलिए मान रही थी, क्योंकि संध्या सिंह के गायब होने के समय यही दोनों उन के साथ थे. नारको टेस्ट के लिए पुलिस ने अदालत से इजाजत मांगी तो श्रेया तो नारको टेस्ट के लिए तैयार हो गई, लेकिन रघुवीर सिंह ने इस के लिए 6 अगस्त तक का समय मांगा. इसी के बाद वह अग्रिम जमानत के लिए अदालतों के चक्कर लगाने लगा.

जांच के दौरान क्राइम ब्रांच यूनिट-6 की पुलिस को संध्या सिंह के जानपहचान वालों से पता चला था कि रघुवीर सिंह का व्यवहार संध्या सिंह के प्रति कभी भी अच्छा नहीं रहा. वह अकसर उन से लड़ाईझगड़ा किया करता था. घटना के कुछ दिनों पहले भी किसी बात को ले कर मांबेटे में जोरदार झगड़ा हुआ था. रघुवीर सिंह ने मां को कुछ इस तरह मारा था कि उन की नाक से खून बहने लगा था. मामला एनआरआई पुलिस थाने तक पहुंचा था. तब इस मामले को शांत कराने के लिए संध्या सिंह के पति जयप्रकाश सिंह को इंदौर से मुंबई आना पड़ा था.

इसी तरह 3-4 साल पहले भी हुआ था. उस समय संध्या सिंह परिवार के साथ भीमा शंकर इमारत की चौथी मंजिल पर रहती थीं. किसी बात को ले कर रघुवीर सिंह का मां से झगड़ा हुआ तो वह उन्हें पीटने लगा. पीटते हुए वह उन्हें खिड़की से बाहर गिराने की कोशिश कर रहा था. यह सब देख कर संध्या सिंह की नौकरानी घबरा गई. वह जल्दीजल्दी से सीढि़यां उतर कर उसी इमारत में रहने वाली संध्या सिंह की एक घनिष्ठ सहेली को बुला लाई. उस सहेली ने किसी तरह संध्या सिंह को छुड़ाया. बेटे ने उन्हें इस तरह मारा था कि उन के मुंह का दाहिना हिस्सा सूज गया था.

संध्या सिंह की सहेली ने जब रघुवीर सिंह को उस की इस हरकत के लिए बुरी तरह डांटा तो जवाब में उस ने कहा था, ‘‘मुझे एक पंडित ने बताया है कि मेरी मां की मौत मेरे हाथों लिखी है.’’

तब संध्या सिंह की सहेली ने कहा, ‘‘अगर यह बात तुम्हारे पिता जयप्रकाश सिंह को पता चल गई तो वह तुम्हें छोड़ेंगे नहीं.’’

‘‘वह क्या करेंगे. वह खुद ही मां से लड़तेझगड़ते रहते हैं.’’ रघुवीर सिंह ने कहा था.

जिस दिन की यह बात है, उस दिन जयप्रकाश सिंह मुंबई में नहीं थे. 4-5 दिनों बाद वह मुंबई वापस आए तो संध्या सिंह की सहेली ने उस दिन की सारी बात उन्हें बताने के साथ यह भी बताया था कि रघुवीर सिंह को ड्रग्स देने के लिए नीग्रो इमारत में आते हैं.

पूछताछ में क्राइम ब्रांच यूनिट-6 को यह भी पता चला था कि संध्या सिंह के गायब होने के 2 दिन पहले उन की अलमारी से 30 हजार रुपए गायब हो गए थे. इन रुपयों के बारे में पूछने के लिए संध्या सिंह ने रघुवीर सिंह को फोन किया था. जांच टीम ने जब रघुवीर सिंह से इस बारे में पूछा था तो उस ने कहा था कि वे रुपए मां को उसी दिन दूसरी जगह मिल गए थे.

जबकि उस की गर्लफ्रैंड श्रेया ने पुलिस को कुछ और ही बताया था. उस का कहना था कि 11 और 12 दिसंबर, 2012 को उस ने रघुवीर सिंह की पर्स में हजार और 5 सौ के काफी नोट देखे थे. उस ने जब उस से उन रुपयों के बारे में पूछा था तो रघुवीर सिंह ने उसे बताया था कि वे रुपए उस के पिता ने कार रिपेयरिंग के लिए दिए थे. लेकिन जब जयप्रकाश सिंह से उन रुपयों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने रुपए देने की बात से मना कर दिया था. इसी क्रम में रघुवीर सिंह का एक और झूठ क्राइम ब्रांच ने पकड़ा था. उस ने क्राइम ब्रांच को मां के आभूषणों की जो सूची दी थी, लगभग वही आभूषण अभ्युदय बैंक के लौकर में मिले थे.

जबकि बैंक वालों का कहना था कि संध्या सिंह भले ही उस दिन आभूषण ले कर बैंक के बाहर तक आई थीं, लेकिन उस दिन न वह बैंक के अंदर आई थीं और न ही उस दिन उन्होंने अपना लौकर खोला था. इस का मतलब यह हुआ कि उन्होंने उन आभूषणों को 13 दिसंबर, 2012 के पहले लौकर में रखा था.

अब सवाल यह था कि जब उस दिन संध्या सिंह ने बैंक के लौकर में आभूषण रखे ही नहीं थे तो रघुवीर सिंह ने संध्या सिंह के साथ उन आभूषणों के गायब होने की शिकायत क्यों की थी? रघुवीर सिंह के दोस्तों ने पूछताछ में क्राइम ब्रांच टीम को बताया था कि जिस दिन संध्या सिंह गायब हुई थीं, उस दिन रघुवीर ने अपने घर में दोस्तों के लिए एक पार्टी रखी थी.

लेकिन उसी दिन पास ही उस की एक फ्रैंड अवंतिका की बर्थडे पार्टी थी. उसे और श्रेया को अवंतिका की बर्थडे पार्टी में ले जाने के लिए जब उस के कुछ दोस्त शाम 7 बजे उस के घर पहुंचे तो उन्हें उस के घर में धुआं ही धुआं दिखाई दिया. उन्होंने रघुवीर से उस धुएं के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि यह धुआं ब्राउन शुगर और गांजे का है. लेकिन जिस तरह उस के घर में वह धुआं भरा था, अमूमन इन दोनों ड्रग्स के जलाने से उतना धुआं नहीं उठता.

क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार, कई बार किसी लाश को डीकंपोज करने के लिए जब कैमिकल का इस्तेमाल किया जाता है तो इस तरह का धुआं उठता है. इस साल 28 जनवरी, 2013 को जब संध्या सिंह का नरकंकाल नेरुल के दिल्ली पब्लिक स्कूल के पीछे मिला था तो वह जला हुआ नहीं, बल्कि डीकंपोज हालत में था. आगे उस अधिकारी ने यह भी कहा कि हो सकता है, उस की यह धारणा गलत हो.

क्राइम ब्रांच यूनिट-6 द्वारा की गई पूछताछ में रघुवीर सिंह मां की हत्या के मामले में पूरी तरह से संदेह के घेरे में उस समय आ गया था, जब घर में काम करने वाले तमाम नौकरनौकरानियों, रघुवीर सिंह और उस की गर्लफ्रैंड श्रेया से विस्तारपूर्वक पूछताछ की गई थी.

नौकरनौकरानियों ने बताया था कि 13 दिसंबर को संध्या सिंह 11 बजे जब घर से निकली थीं, उस से आधा घंटा पहले करीब साढ़े 10 बजे रघुवीर सिंह अपनी गर्लफ्रैंड श्रेया के साथ कार से उसे आईटी की परीक्षा दिलाने के लिए खारघर जाने की बात कह कर घर से निकला था. श्रेया को खारघर छोड़ कर वह करीब साढ़े 11 बजे अकेला ही घर वापस आ गया था. आते ही उस ने घर में मौजूद सभी नौकरनौकरानियों से कहा था कि आज मैडम नहीं आएंगी, इसलिए वे लोग खाना खा लें.

इस के बाद साढ़े 12 बजे वह श्रेया को लाने के लिए खारघर चला गया था. 1 बजे जब श्रेया की छुट्टी हुई तो वह उसे साथ ले कर घर आने के बजाए उल्वे चला गया था. उल्वे नेरुल के पास ही है. वहां कुछ खापी कर वे घर आ गए थे.

जबकि क्राइम ब्रांच यूनिट-6 का अंदाजा है कि रघुवीर सिंह श्रेया को खारघर छोड़ कर अपनी कार से अभ्युदय बैंक पहुंचा होगा. उस दिन बैंक में रेनोवेशन चल रहा था, इसलिए संध्या सिंह को लगा होगा कि बैंक बंद है. वह बैंक के अंदर जाने के बजाए वापस आने के बारे में सोच रही थीं कि तभी रघुवीर सिंह वहां पहुंच गया होगा. वह उन्हें कार में बैठा कर उन की हत्या कर के शव को कार की डिक्की में छिपा कर घर लाया होगा.

घर में शव को डीकंपोज कर के उसे डीपीएस स्कूल के पास ले जा कर फेंक दिया होगा. क्राइम ब्रांच को उस दिन की संध्या सिंह के एक मोबाइल फोन की लोकेशन उल्वे की भी मिली थी.

रघुवीर सिंह पूरी तरह संदेह के घेरे में था, इस के बावजूद भी क्राइम ब्रांच यूनिट-6 उसे गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि वह एक हाईप्रोफाइल परिवार से था. लगभग डेढ़ दर्जन बार पूछताछ करने के बाद भी क्राइम ब्रांच टीम उस पर हाथ नहीं डाल पाई. रघुवीर सिंह गिरफ्तारी से बचने के लिए बारबार अदालत जा रहा था तो क्राइम ब्रांच यूनिट-6 इस का विरोध कर रही थी.

सुप्रीम कोर्ट से भी अग्रिम जमानत की अरजी खारिज हो गई तो मजबूरन रघुवीर सिंह को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस तरह रघुवीर सिंह पुलिस गिरफ्त में आ गया. लेकिन इसी के साथ तमाम सवाल भी उठ रहे हैं. रघुवीर सिंह ड्रग एडिक्ट था. वह आधे घंटे भी खड़ा नहीं रह सकता. ऐसे में उस ने अपनी मां संध्या सिंह की हत्या अकेले कैसे की? इस के बाद वह लाश को अकेले अपने घर से उतनी दूर कैसे ले गया? अगर उस ने यह हत्या की भी है तो निश्चित उस के साथ और लोग शामिल रहे होंगे. उस ने अपनी मां की हत्या क्यों की, अभी तक यह भी पता नहीं चला है. अब यह सब रघुवीर सिंह से पूछताछ के बाद ही पता चलेगा.

कथा लिखे जाने तक रघुवीर सिंह क्राइम ब्रांच यूनिट-6 की हिरासत में था.

इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

– मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित

Love Crime: कौंट्रैक्ट मैरिज

Love Crime: शादीशुदा और एक बेटी का बाप होने के बावजूद शाहिद ने नगमा बानो से प्यार ही नहीं किया, बल्कि नोटरी के सामने शादी भी कर ली. लेकिन इस के बाद उन दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि शाहिद ने नगमा का कत्ल कर दिया. महानगर मुंबई से सटे नवी मुंबई के उपनगर नेरुल सारसोले गांव का रहने वाला मनोज मेहेर थाना नेरुल पहुंचा तो काफी घबराया हुआ था. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. उस की हालत

देख कर ड्यूटी अफसर ने पूछा, ‘‘क्या बात है भई, तुम काफी परेशान लग रहे हो?’’

‘‘सर, बात ही ऐसी है,’’ इधरउधर की बात किए बगैर मनोज ने कहा, ‘‘सर, पाम बीच रोड पर स्थित सारसोले गांव के पास जंगल के बीच बने भगवान वामनदेव मंदिर की तरफ जाने वाली पगडंडी पर एक महिला की क्षतविक्षत लाश पड़ी है.’’

लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही ड्यूटी अफसर ने काररवाई करने के लिए अपने सहायक के नेतृत्व में एक पुलिस टीम घटनास्थल पर भेज दी. मनोज मेहेर की सूचना सही थी. लेकिन घटनास्थल पर पहुंचने पर पता चला कि जिस स्थान पर लाश पड़ी थी, वह स्थान उन के थानाक्षेत्र में नहीं था. वह स्थान थाना तुर्भे के अंतर्गत आता था. घटनास्थल पर आई पुलिस टीम ने मामले की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों को देने के साथसाथ थाना तुर्भे पुलिस को दे दी थी. इस के बाद उन्होंने मनोज मेहेर को भी थाना तुर्भे भेज दिया था. यह 4 जनवरी, 2015 की घटना थी.

मनोज जिस समय थाना तुर्भे पहुंचा, दिन के यही कोई 10, साढ़े 10 बज रहे थे. थाना नेरुल पुलिस से घटना की जानकारी मिल ही चुकी थी, इसलिए मनोज के पहुंचते ही थाना तुर्भे के सीनियर इंसपेक्टर शेखर वागड़े ने तत्काल सबइंसपेक्टर कासम नाइक को बुला कर घटना की शिकायत दर्ज कराई. इस के बाद घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को देने के साथ पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी. थाने की जरूरी काररवाई निपटा कर सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शेखर वागड़े सहयोगियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाना तुर्भे से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर था, इसलिए वहां पहुंचने में उन्हें 10-15 मिनट लगे. अब तक लाश पड़ी होने की खबर पूरे इलाके में फैल चुकी थी, इसलिए वहां काफी भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी.

घटनास्थल पर पहुंच कर पहले तो पुलिस टीम ने वहां इकट्ठा लोगों को हटाया, उस के बाद घटनास्थल और लाश का निरीक्षण शुरू किया. मृतका की उम्र 25 से 30 साल के बीच रही होगी. उस की हत्या गला काट कर की गई थी. लाश पहचानी न जा सके, इस के लिए चेहरे पर पैट्रोल डाल कर जला दिया गया था. लाश के पास ही बिसलेरी की एक खाली बोतल तथा माचिस की डिब्बी पड़ी थी. वहीं पर माचिस की तीलियां भी बिखरी थीं. बोतल से पैट्रोल की गंध आ रही थी. इस का मतलब था, लाश को जलाने के लिए उसी बोतल में पेट्रोल लाया गया था. पुलिस ने भीड़ से कुछ लोगों को बुला कर लाश की शिनाख्त करवाने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से साफ हो गया कि मृतका यहां की रहने वाली नहीं थी.

पुलिस अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रही थी कि नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एल. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह गायकवाड़, असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर विवेक मामाल, फोटोग्राफर और फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. फोटोग्राफर और फोरेंसिक टीम का काम खत्म होते ही पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद सीनियर इंसपेक्टर शेखर वागड़े को जांच के लिए दिशानिर्देश दे कर चले गए.

उच्चाधिकारियों के जाने के बाद सीनियर इंसपेक्टर शेखर वागड़े ने घटनास्थल पर मिली बोतल, माचिस की डिब्बी और तीलियों को कब्जे में ले कर घटनास्थल की औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर सीनियर इंसपेक्टर शेखर वागड़े ने अपने स्टाफ के साथ मीटिंग कर इस मामले की जांच असिस्टेंट इंसपेक्टर माधव सूर्यवंशी को सौंप दी.

जांच की जिम्मेदारी मिलते ही असिस्टेंट इंसपेक्टर माधव सूर्यवंशी ने सबइंसपेक्टर सुहास पाटिल, सदानंद सोनकांवले, कासम नाइक, सिपाही विजय सांलुके, प्रवीण विरारी, चंद्रकांत भोसले, चेतन साल्वी, दिलीप राठौर, धीरज कदम, लवकुश शिंगाड़े और संदीप पाटिल की टीम बना कर जांच शुरू कर दी. जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की पहचान. बिना शिनाख्त के जांच को आगे बढ़ाना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने शिनाख्त की कोशिश शुरू कर दी.

मृतका कौन थी, कहां की रहने वाली थी? यह पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने महिला के हुलिए सहित पूरी सूचना नवी मुंबई के सभी थानों को भेज दी. इस से उन्हें पूरी उम्मीद थी कि किसी न किसी थाने में मृतका की गुमशुदगी अवश्य दर्ज होगी. लेकिन उन की इस उम्मीद पर पानी फिर गया, क्योंकि किसी भी थाने में उस तरह की महिला की गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इसी इंतजार में 10 दिन बीत गए. जब शिनाख्त ही नहीं हो सकी तो मामले की जांच कैसे आगे बढ़ी.

दिन बीतने के साथ जांच अधिकारी माधव सूर्यवंशी की परेशानी बढ़ने लगी थी. क्योंकि अब उन पर अधिकारियों का दबाव पड़ने लगा था. एक बार फिर पूरी की पूरी टीम शिनाख्त की कोशिश में लग गई. इस बार शिनाख्त के लिए दायरा बढ़ा दिया गया. मृतका के हुलिया के साथ उस का फोटो भी नवी मुंबई के अलावा मुंबई पुलिस कमिश्नर औफिस, जनपद थाना, रत्नागिरी पुलिस कमिश्नर औफिस, पूना पुलिस कमिश्नर औफिस और ग्रामीण क्षेत्रों के थानों को भी भेज दिया गया.

इस बार उन की कोशिश रंग लाई और घटना के 15 दिनों बाद मृतका की शिनाख्त हो गई. मुंबई के चेंबूर के गोवड़ी के थाना देवनार में उस तरह की एक महिला की गुमशुदगी दर्ज थी. इस बात की जानकारी मिलते ही असिस्टेंट इंसपेक्टर माधव सूर्यवंशी अपनी टीम के साथ थाना देवनार जा पहुंचे. थाने में दर्ज गुमशुदगी के अनुसार गुमशुदा महिला का नाम नगमा बानो शाहिद अली कुरैशी था, जो कमला रामण गोवड़ी, शिवाजी नगर में रहती थी.

गुमशुदगी में दर्ज पते के आधार पर जांच टीम वहां पहुंची तो घर में गुमशुदा नगमा बानो की बूढ़ी मां रजिया बेगम मिलीं. पुलिस ने उन्हें मृतका की लाश के फोटो दिखाए तो वह फूटफूट कर रोते हुए बोलीं कि ये फोटो उन की बेटी नगमा बानो की लाश के हैं. पुलिस ने उन्हें धैर्य बंधाया और लाश दिखाने के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल ले गई. लाश देख कर उन्होंने शिनाख्त कर दी कि लाश उन की बेटी नगमा बानो की ही है तो पुलिस ने सारी औपचारिक  काररवाई पूरी करा कर लाश उन्हें सौंप दी.

मृतका की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस अब अपनी जांच को आगे बढ़ा सकती थी. जांच में तेजी लाते हुए पुलिस टीम सीधे नगमा बानो के घर पहुंची. पूछताछ में पता चला कि नगमा बानो अपनी बूढ़ी मां रजिया बेगम के साथ रहती थी. कुछ दिनों पहले उस ने अपने पति को छोड़ कर नवंबर, 2014 के पहले सप्ताह में प्रेमी शाहिद अली कुरैशी से नोटरी के सामने दूसरी शादी कर ली थी. निकाह के बाद वह शाहिद के साथ रहने लगी थी. लेकिन 3 जनवरी, 2015 को अचानक वह गायब हो गई. शाहिद अपने नातेरिश्तेदारों के साथ मिल कर उस की तलाश करता रहा, लेकिन नगमा का कुछ पता नहीं चला. चारों ओर से निराश हो कर 16 जनवरी, 2015 को रजिया बेगम ने शाहिद के साथ थाना गोवड़ी देवनार जा कर नगमा बानो की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. इस के बाद मामले की जांच में लगी पुलिस टीम को पता चला कि मृतका की शिनाख्त में इतनी देर क्यों लगी थी.

रजिया बेगम के बताए अनुसार, नगमा का दूसरा पति शाहिद अली कुरैशी अपनी पत्नी और बेटी के साथ कुर्ला के नेहरूनगर में रहता था तो पहला पति कसास में रहता था. जांच में लगी पुलिस टीम जब नगमा के दोनों पतियों की तलाश में उन के घर पहुंची तो पहला पति तो अपने घर में मिल गया, लेकिन दूसरा पति शाहिद अली कुरैशी घर से गायब था. पूछने पर उस की पत्नी ने बताया कि 2 दिनों पहले ही वह उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ की तहसील बलरामपुर स्थित अपनी ससुराल गया है. यह जान कर जांच टीम को एक झटका सा लगा. पत्नी और बेटी के होते हुए भी शाहिद ने दूसरी शादी की थी.

आज जब लापता नगमा बानो की तलाश के लिए उस की जरूरत थी तो वह गांव चला गया था. इस बात पर पुलिस टीम ने गंभीरता से विचार किया तो टीम को शाहिद पर संदेह हो गया. इस के बाद नगमा के पहले पति को घर जाने की इजाजत दे दी गई. शाहिद अली कुरैशी के गांव चले जाने की जानकारी सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शेखर वागड़े को दी गई तो उन्होंने सबइंसपेक्टर सुहास पाटिल के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम बना कर शाहिद अली कुरैशी के बारे में पता लगाने के लिए उस के गांव भेज दिया.

गांव पहुंच कर सबइंसपेक्टर सुहास पाटिल को पता चला कि शाहिद अली कुरैशी गांव आया तो था, लेकिन अगले ही दिन वह गुजरात होते हुए महाराष्ट्र की औद्योगिक नगरी तारापुर बोइसर के गणेशनगर में रहने वाले अपने बड़े भाई के यहां चला गया था. इस बात की जानकारी सबइंसपेक्टर सुहास पाटिल ने वहीं से सीनियर अधिकारियों को दे कर कुछ और स्टाफ की मांग की. क्योंकि वह वहां से सीधे तारापुर बोइसर के गणेशनगर जाना चाहते थे. उन्हें जरूरी पुलिस बल उपलब्ध करा दिया गया तो 26 जनवरी, 2015 को उन्होंने शाहिद को तारापुर बोइसर के गणेशनगर में रहने वाले उस के बड़े भाई के घर से गिरफ्तार कर लिया और मुंबई ला कर सीनियर अधिकारियों के सामने पेश कर दिया.

इस के बाद पूछताछ के लिए उसे नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान पहले तो शाहिद अली कुरैशी स्वयं को इस पूरे मामले से अनभिज्ञ और बेकुसूर बताता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उसे सवालों से घेरा तो उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने नगमा बानो से प्यार से ले कर उस की हत्या तक की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. 29 वर्षीय शाहिद अली कुरैशी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती का रहने वाला था. उस के पिता का नाम वाजिद अली कुरैशी था. उस के परिवार में मातापिता के अलावा एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन थी. बड़े भाई का विवाह हो गया तो वह पत्नी के साथ परिवार से अलग रहने लगा. कुछ दिनों बाद वह तारापुर बोइसर चला गया और वहां किसी कंपनी में नौकरी करने लगा.

शाहिद अली कुरैशी महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह घर की गरीबी से काफी दुखी था. पिता की गांव में थोड़ीबहुत जमीन थी, उसी पर खेती कर के किसी तरह गुजारा हो रहा था. थोड़ीबहुत आमदनी दूसरों के यहां मजदूरी से हो जाती थी. गरीबी की ही वजह से शाहिद पढ़लिख नहीं सका था. स्कूल न जाने की वजह से बचपन मटरगश्ती में बीता. थोड़ा समझदार हुआ तो पिता के साथ खेतों में काम करने लगा. शाहिद कामधाम करने लगा तो पिता ने बलरामपुर तहसील के रहने वाले अपने एक रिश्तेदार की बेटी से उस की शादी कर दी. साल भर में ही वह एक बेटी का बाप बन गया.

गांव में वह जितनी मेहनत करता था, उस हिसाब से उसे फायदा नहीं होता था. इसलिए वह भी बड़े भाई की तरह शहर जा कर कमाने के बारे में सोचने ही नहीं लगा, बल्कि घर वालों से इजाजत ले कर तारापुर बोइसर में रह रहे अपने बड़े भाई के पास चला गया. बड़े भाई के साथ रहते हुए उसे कोई मनमुताबिक काम नहीं मिला तो वह महानगर मुंबई आ गया. मुंबई के उपनगर कुर्ला में उस के गांव के कुछ लोग रहते थे, जो बढ़ईगिरी का काम करते थे. इस काम से उन की अच्छी कमाई हो रही थी. उन सब की आर्थिक स्थिति भी काफी ठीकठाक थी. शाहिद उन्हीं के साथ रह कर बढ़ईगिरी का काम सीखने लगा. अगर लगन हो तो कामयाबी मिलते देर नहीं लगती. कुछ ही दिनों में शाहिद बढ़ईगिरी के काम में माहिर हो गया तो फर्नीचर बनाने के छोटेबड़े ठेके लेने लगा. हाथ में पैसा आने लगा तो वह गांव से पत्नी और बेटी को ले आया.

उस ने कुर्ला के नेहरूनगर में किराए का मकान ले लिया था और उसी में परिवार के साथ रहने लगा था. आनेजाने के लिए उस ने एक मोटरसाइकिल भी ले ली थी. सन 2010 में उस ने चेंबूर के गोवड़ी के कमला रामण शिवाजीनगर के एक घर में फर्नीचर बनाने का ठेका लिया था. जिस घर में उस का काम चल रहा था, उस के ठीक सामने वाले मकान में रजिया बेगम अपनी 20 वर्षीया बेटी नगमा बानो के साथ रहती थीं. शाहिद अली कुरैशी उस की एक ही झलक में उस का दीवाना हो गया था. नगमा बानो जितनी स्वस्थ और खूबसूरत थी, उस से कहीं ज्यादा चंचल और आजादखयाल थी. वह जिस से भी एक बार बात कर लेती थी, वह उस का दीवाना हो जाता था.

ऐसा ही कुछ हाल शाहिद अली कुरैशी का भी हुआ था. शादीशुदा और एक बेटी का बाप होने के बावजूद वह अपने दिल पर काबू नहीं रख सका और नगमा बानो की ओर खिंचता चला गया. एक ही बिरादरी का होने की वजह से शाहिद ने नगमा की मां रजिया बेगम के दिल में अपने लिए जल्दी ही उचित स्थान बना लिया था. इस के बाद वह उस के घर आनेजाने लगा. रजिया बेगम उसे खूब मानती थीं. इस की एक वजह यह भी थी कि जरूरत पड़ने पर वह रजिया बेगम की आर्थिक मदद भी कर देता था. आनेजाने में वह नगमा को तरहतरह की चीजें भी ला कर दिया करता था.

20वें बसंत में कदम रख चुकी नगमा ने शाहिद के दिल की बात जल्दी ही भांप ली थी. शाहिद को अपनी ओर आकर्षित देख कर नगमा का भी झुकाव उस की ओर हो गया था. दोनों के दिलों में प्यार के अंकुर फूटे तो उन्हें मिलने में देर नहीं लगी. जल्दी ही वे घर के बाहर मिलनेजुलने और घूमनेफिरने लगे. कुछ दिनों बाद जब इस बात की जानकारी रजिया बेगम को हुई तो वह चिंतित हो उठीं. क्योंकि उन्हें पता था कि शाहिद शादीशुदा ही नहीं, एक बेटी का बाप भी है. इस के बावजूद भी उन की बेटी को गुमराह कर के उस ने अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. मामला काफी नाजुक था. नगमा और शाहिद की प्रेम की नाव 2 सालों में इतनी दूर चली गई थी कि रजिया के लिए उसे वापस लाना आसान नहीं था.

फिर भी रजिया बेगम ने बेटी को शाहिद के प्रेमजाल से निकालने की कोशिश शुरू कर दी, लेकिन सफल नहीं हुईं. मजबूर हो कर उस का निकाह करने का निश्चय किया. इस के बाद अपने रिश्तेदारों की मदद से कसादा घाट में रहने वाले एक युवक से उस का निकाह कर दिया. 2 सालों तक चली नगमा और शाहिद की प्रेम कहानी का अंत इस तरह हुआ तो शाहिद को काफी दुख हुआ. लेकिन एक न एक दिन यह होना ही था. पत्नी और बेटी के होते हुए भी वह नगमा के साथ धोखा कर रहा था. इसलिए नगमा को भूल कर अपनी पत्नी और बेटी में रम गया. शाहिद घरपरिवार वाला आदमी था, इसलिए उसे ज्यादा परेशानी नहीं हुई.

लेकिन नगमा स्वयं को पति के साथ व्यवस्थित नहीं कर पाई. उस के और उस के पति के बीच उस का पुराना प्रेमसंबंध आड़े आ गया. उसी की वजह से नगमा और उस के पति के बीच कलह रहने गई. धीरेधीरे यह कलह इस कदर बढ़ी कि निकाह के 5 महीने बाद ही नगमा पति से तलाक ले कर अपनी मां रजिया बेगम के पास आ गई. इस बात की जानकारी शाहिद को हुई तो वह फिर से नगमा से मिलनेजुलने लगा. दोनों को मिलतेजुलते काफी दिन हो गए तो नगमा शाहिद पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. शाहिद शादीशुदा और एक बेटी का बाप था, इसलिए उस के लिए दूसरी शादी करना आसान नहीं था. लेकिन उस ने नगमा का मन रखने के लिए कोर्ट में जा कर 100 रुपए के स्टांप पेपर पर नोटरी के सामने निकाह कर लिया.

निकाह करने के बाद कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चला, लेकिन बाद में शाहिद और नगमा के बीच भी कलह होने लगी. इस की वजह यह थी कि किसी ने नगमा को बताया था कि शाहिद से उस का निकाह एक कौंट्रैक्ट मैरिज है. शाहिद ने एक तरह से उसे धोखा दिया है. पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब यही बात उस की मां रजिया बेगम ने बताई तो उसे विश्वास हो गया. जबकि यही बात पहले मां ने कही थी, तब शाहिद के प्यार में अंधी नगमा की समझ में नहीं आई थी.

अपने निकाह की सच्चाई जान कर नगमा शाहिद की उपेक्षा करने लगी. उस का जब मन होता, वह घर से निकल जाती. शाहिद उस से मिलने आता तो वह घर में न मिलती. उस से मिलने के लिए शाहिद को घंटों इंतजार करना पड़ता. वह कहां जाती है, क्या करती है? इस बारे में शाहिद पूछता तो वह ठीक से जवाब भी न देती. कभीकभी शाहिद को उस से मिले बिना ही वापस जाना पड़ता. नगमा के इस बदले व्यवहार से शाहिद काफी तनाव में रहने लगा. उसे नगमा के चरित्र पर भी संदेह होने लगा. अब उसे लगने लगा कि नगमा उसे धोखा दे रही है. उस की जिंदगी में उस की जगह किसी और ने ले ली है. यह बात दिमाग में आते ही उसे नगमा से नफरत होने लगी. संदेह का जहर शाहिद के दिमाग में कुछ इस तरह बढ़ा कि वह नगमा को उस के किए का मजा चखाने के लिए वह एक खतरनाक फैसला ले बैठा.

यह फैसला लेने के बाद उस ने तेज धार वाला एक चाकू और एक बिसलेरी की बोतल में पैट्रोल भर कर मोटरसाइकिल की डिक्की में रख लिया. इस तरह तैयारी कर के वह मौके की तलाश में लग गया. 3 जनवरी, 2015 को नगमा उसे वाशी प्लाजा फ्लाईओवर ब्रिज के नीचे मिल गई. उस ने नगमा को प्यार से अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और नेरुल पाम बीच रोड सारसोले गांव के करीब ले गया. मोटरसाइकिल उस ने सड़क पर खड़ी कर दी और नगमा को साथ ले कर पैदल ही जंगल के बीच बने भगवान वामनदेव मंदिर की तरफ जाने वाली पगडंडी पर चल पड़ा.

जंगल के अंदर आ कर वह नगमा से उस की बेरुखी और घर से गायब रहने के बारे में पूछने लगा. नगमा ने उस के सवालों के जवाब सीधे नहीं दिए तो दोनों में झगड़ा होने लगा. झगड़े के दौरान शाहिद ने जोर से धक्का दे कर नगमा को गिरा दिया और चाकू निकाल कर जमीन पर गिरी नगमा का गला काट दिया. नगमा छटपटा कर मर गई तो उस ने साथ लाया पैट्रोल उस के चेहरे पर डाला और माचिस से आग लगा दी. इस के बाद वह अपने घर चला गया. घर आ कर उस ने नगमा के घर से गायब होने की बात उस की मां रजिया बेगम को बता कर उस के साथ उस के नातेरिश्तेदारों के यहां नगमा को ढूंढने का नाटक करता रहा. जब कई दिनों तक नगमा का कुछ पता नहीं चला तो स्वयं को बचाने के लिए थाने गया और उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

इस के बाद उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ स्थित अपनी ससुराल चला गया, जिस से पुलिस उस तक पहुंच न पाए. लेकिन वह जगह उसे सुरक्षित नहीं लगी, इसलिए वह वहां से भाग कर तारापुर बोइसर में रहने वाले अपने बड़े भाई के पास गणेशनगर चला गया. लेकिन पुलिस उस की तलाश करती हुई वहां भी पहुंच गई और उसे गिरफ्तार कर लिया. शाहिद अली पुत्र वाजिद अली कुरैशी के बयान के आधार पर असिस्टेंट इंसपेक्टर माधव सूर्यवंशी ने नगमा की हत्या का मुकदमा अपराध संख्या 02/2015 पर भादंवि की धारा 302, 201 के तहत दर्ज कर एक बार फिर उसे नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में तलौआ जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक शाहिद अली कुरैशी जेल में था. मामले का आरोप पत्र सबइंसपेक्टर सुहास पाटिल अपने सीनियर अधिकारी माधव सूर्यवंशी की देखरेख में तैयार कर रहे थे. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित