प्रेमिका से छुटकारा पाने की शातिर चाल – भाग 3

हेमंत दिमाग से माधुरी के साथ खेल रहा था, जबकि वह दिल की खुशी के चक्कर में अच्छाबुरा सोचे बिना डगमगा गई. वह उसे अपने इशारों पर नचा रहा था. माधुरी उस की हर बात मानती थी और हद दरजे का विश्वास करती थी. हेमंत के कहे अनुसार, माधुरी राहुल के साथ भागी भी और शादी भी कर ली. दोनों पकड़े भी गए. उन्हें पकड़वाने में हेमंत ने ही अहम भूमिका निभाई थी.

उस ने माधुरी से पीछा छुड़ाने की योजना मन ही मन पहले ही तैयार कर ली थी. इतना सब तमाशा होने के बाद वह घर आई तो उस ने हेमंत को शादी की बात याद दिलाई. बदनामी, परिवार की डांटफटकार माधुरी ने सिर्फ हेमंत से शादी करने के लिए सही थी. हेमंत उसे प्यार से समझाबुझा कर पीछा छुड़ाने के बजाए उस के सपनों को और भी ऊंचाई दे कर बरगलाने का काम करता रहा. उस के कहने पर माधुरी राहुल से पिता के मोबाइल से बातें करती रही.

22 दिसंबर को हेमंत ने माधुरी से कहा था कि अगले दिन वह घर से निकल कर गांव के बाहर तय जगह पर पहुंच जाए. उसे लगता था कि माधुरी ऐसा नहीं करेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. माधुरी उस के झूठे प्यार में अंधी हो चुकी थी. वह उस खेत पर पहुंच गई, जहां उस ने पहुंचने को कहा था. माधुरी ने यह बात हेमंत को फोन कर के बता भी दी. वह खेत गांव के किसान डंकारी सिंह का था. हेमंत ने पहले ही तय कर लिया था कि उसे क्या करना है. माधुरी उस के गले की फांस बन चुकी थी. शाम करीब 4 बजे वह खेत पर पहुंचा और माधुरी को कंबल तथा बाजार से ला कर खाना दे आया.

हेमंत ने उसे समझाने के बजाए बरगलाते हुए कहा, ‘‘माधुरी, मैं माहौल देख लूं. पहले तो राहुल को जेल भिजवाना जरूरी है. उस के बाद हम निकल चलेंगे. लेकिन तब तक तुम्हें यहीं रहना होगा.’’

माधुरी ने इस कड़ाके की ठंड में वह रात अकेली खेतों में बिताई. हेमंत उस के लिए खाना पहुंचाता रहा. किसी को उस पर शक न हो, इस के लिए वह माधुरी के घर वालों के साथ खड़ा रहा और उन्हें राहुल के खिलाफ भड़काता रहा. 2 दिन बीत गए. अब माधुरी को खेत में रहना मुश्किल लगने लगा. आखिर उस के सब्र का बांध टूट गया.

तीसरे दिन यानी 26 दिसंबर की शाम माधुरी हेमंत से चलने की जिद करने लगी तो प्यार जताने के बहाने उस ने दुपट्टे से उस का गला कस दिया. हेमंत का यह रूप देख कर माधुरी के होश उड़ गए. बचाव के लिए विरोध करते हुए उस ने हाथपैर भी चलाए, लेकिन हेमंत ने गले में लिपटा दुपट्टा पूरी ताकत से कस दिया था, जिस से छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या कर के हेमंत ने अपने और माधुरी के मोबाइल का सिमकार्ड तोड़ दिया और घर आ गया. रात को वह बहाने से निकला और गड्ढा खोद कर लाश को दफना दिया. इस के बाद वह सामान्य जिंदगी जीने लगा.

लोगों के शक से बचने के लिए वह अपने काम पर भी जाता और माधुरी के पिता के साथ बैठ कर माधुरी को ले कर फिक्र भी जताता. हेमंत को पूरा विश्वास था कि वह कभी पकड़ा नहीं जाएगा. उसे लगता था कि दबाव में आ कर पुलिस राहुल और उस के दोस्तों को जेल भेज देगी. उस के बाद माधुरी की खोजबीन ठंडे बस्ते में चली जाएगी. इसीलिए उस ने माधुरी के घर वालों को पुलिस अधिकारियों के यहां प्रदर्शन करने के लिए उकसाया था.

यह अलग बात थी कि एसपी सुजाता सिंह की समझ से पुलिस ने किसी दबाव में काम नहीं किया और वह पकड़ में आ गया. यह भी सच है कि अगर पुलिस बारीकी से जांच न करती तो हेमंत कभी पकड़ा न जाता. उस की फरेबी फितरत और हैवानियत ने पूरे गांव को हैरान कर दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. माधुरी हेमंत जैसे शातिर के झांसे में न आई होती और बिना डगमगाए अपने भविष्य को संवारने में लगी होती तो यह नौबत कभी न आती.

हेमंत जैसे लोग अपनी घिनौनी सोच को पूरी करने के लिए भोलीभाली लड़कियों को फंसाने का काम करते हैं. जरूरत है, लड़कियों को ऐसे लोगों से सावधान रहने की.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अल्हड़पन के दीवानों का हश्र

20 साल की रूबी लखनऊ के आशियाना इलाके में नौकरी करती थी. देखने में वह बहुत सुंदर भले ही नहीं थी, पर उस में चुलबुलापन जरूर था. यानी सांवले रंग में भी तीखापन, जो सहज ही किसी को भी अपनी ओर खींच लेता था. दिल खोल कर बात करने की उस की अदा से सब को लगता था कि रूबी उसे ही दिल दे बैठी है.रूबी अपने गांव से शहर आई थी. उसे अपने हुनर से ही गुजरबसर करने लायक जमीन तैयार करनी थी. वह बहुत सारे लोगों से मिलतीजुलती थी, जिन में से एक आनंद भी था. उम्र में वह रूबी से करीब 10 साल बड़ा था. इस के बाद भी रूबी और आनंद की आपस में गहरी दोस्ती हो गई.

रूबी काम पर जाती तो उसे लाने ले जाने का काम आनंद ही करता था. रूबी को भी इस से सहूलियत होती थी. उसे वक्तबेवक्त आनेजाने में कोई डर नहीं रहता था. एक तरह से रूबी को ड्राइवर और गार्ड दोनों मिल गए थे.

दोस्ती से शुरू हुई यह मुलाकात धीरेधीरे रंग लाने लगी. वक्त के साथ दोनों के संबंध गहराने लगे. आनंद चाहता था कि रूबी केवल उस के साथ ही रहे पर रूबी हर किसी से बातें करती थी. उस के खुलेपन से बातें करने से हर किसी को लगता था कि रूबी उस की खास हो गई है.

आनंद और रूबी का चक्कर चल ही रहा था कि वह इंद्रपाल के संपर्क में आ गई. इंद्रपाल उस के साथ काम करता था. अब रूबी कभीकभी आनंद के बजाय इंद्रपाल के साथ आनेजाने लगी. आनंद और इंद्रपाल में अंतर यह था कि इंद्रपाल रूबी की उम्र का ही था.

सीतापुर जिले का रहने वाला इंद्रपाल नौकरी करने के लिए लखनऊ आया था. आनंद को रूबी और इंद्रपाल का आपस में घुलनामिलना पसंद नहीं आ रहा था. वह सोच रहा था कि किसी दिन रूबी को समझाएगा.

एक दिन रूबी और इंद्रपाल शाम को आशियाना के किला चौराहे पर चाट के ठेले पर खड़े पानीपूरी खा रहे थे. रूबी को पानीपूरी बहुत पसंद थी. इत्तफाक से आनंद ने दोनों को देख लिया तो उसे गुस्सा आ गया.

जब रूबी आनंद से मिली तो उस ने कहा, ‘‘तुम आजकल अपने नए दोस्त से कुछ ज्यादा ही घुलमिल रही हो. यह मुझे पसंद नहीं है. अगर मुझ में कोई कमी हो तो बताओ, लेकिन तुम्हारा इस तरह से किसी और के साथ समय गुजारना मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘तुम भी क्याक्या सोचते रहते हो, हम दोनों केवल साथी हैं. कभीकभी उस के साथ घूमने चली जाती हूं, इस से तुम्हारेमेरे संबंधों में कोई फर्क नहीं पड़ेगा. तुम परेशान मत हो.’’

‘‘देखो, तुम्हें फर्क भले न पड़ता हो पर मुझे पड़ता है. मैं इसे सहन नहीं कर सकता. मेरे जानने वाले कहते हैं कि देखो तुम्हारे साथ रहने वाली रूबी अब किसी और के साथ घूम रही है.’’

‘‘लोगों का क्या है, वे तो केवल बातें बनाना जानते हैं. तुम उन की बातों पर ध्यान ही मत दो. तुम मुझ पर यकीन नहीं कर रहे, इसलिए लोगों की बातें सुन रहे हो.’’

‘‘रूबी, मैं ये सब नहीं जानता. बस मुझे तुम्हारा उस लड़के के साथ रहना पसंद नहीं है. जिस तरह से तुम उस के साथ घूमने जाती हो, उस से साफ लगता है कि तुम मुझ से कुछ छिपा रही हो.’’

रूबी ने आनंद से बहस करना उचित नहीं समझा. वह चुपचाप वहां से चली गई. उसे आनंद का इस तरह से बात करना पसंद नहीं आया. वह मन ही मन सोचने लगी कि आनंद से कैसे पीछा छुड़ाया जाए.

यही बात आनंद भी सोच रहा था. आनंद रूबी के चाचा से मिला और उसे रूबी और इंद्रपाल के बारे में बताया. यह बात उस ने कुछ इस तरह से बताई कि रूबी के चाचा उस पर बहुत नाराज हुए.

जब रूबी ने उन की एक नहीं सुनी तो वह बोले, ‘‘रूबी, अगर तुम्हें मेरी बात नहीं माननी तो नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाओ. इस तरह से बदनामी कराने से कोई फायदा नहीं है.’’

रूबी समझ गई थी कि उस के चाचा भी आनंद की बातों में आ गए हैं. कुछ कहनेसुनने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, इसलिए वह चुप रही. अगले दिन रूबी ने यह बात इंद्रपाल को बताई. इंद्रपाल ने कहा कि रूबी हम यह दोस्ती नहीं तोड़ सकते. मुझे कोई डर नहीं है, जब तक तुम नहीं चाहोगी, हमें कोई अलग नहीं कर सकता.

रूबी को पता था कि आनंद अपनी बात का पक्का है. वह अपनी जिद को पूरा करने के लिए कोई भी काम कर सकता है. उसे चिंता इस बात की थी कि इंद्रपाल और आनंद के बीच कोई झगड़ा न हो जाए. वह दोनों के बीच कोई गलतफहमी पैदा नहीं करना चाहती थी.

रूबी ने इंद्रपाल से दूरी बनानी शुरू कर दी. यह बात इंद्रपाल को हजम नहीं हो रही थी. एक दिन उस ने रूबी से न मिलने का सबब पूछा तो रूबी ने ठीक से कोई जवाब नहीं दिया.

इस के बाद इंद्रपाल अकसर रूबी से बात करने की कोशिश में जुटा रहा. कई बार उस ने बात करने के लिए जोरजबरदस्ती भी करनी चाही. इस पर रूबी ने कहा, ‘‘मैं यह नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें कोई परेशानी हो. बेहतर है, तुम मुझ से दूर ही रहो.’’

रूबी पर निगाह रख रहे आनंद को लगा कि इंद्रपाल उस की राह का कांटा बन गया है. यह बात उस ने रूबी को भी नहीं बताई. आखिर आनंद के मन में इंद्रपाल को रास्ते से हटाने की एक खतरनाक योजना बन गई.

इस योजना के लिए उसे रूबी की मदद की जरूरत थी ताकि वह इंद्रपाल को एकांत में बुला सके. लेकिन रूबी इस के लिए तैयार नहीं थी. इस पर आनंद ने उसे समझाया कि इंद्रपाल को केवल समझाना चाहता है. इस पर रूबी इंद्रपाल को बुलाने के लिए तैयार हो गई.

15 जून, 2018 की बात है. रूबी ने फोन कर के इंद्रपाल को किला चौराहे पर मिलने के लिए बुलाया. इंद्रपाल के लिए रूबी का बुलाना बहुत बड़ी खुशी की बात थी. वह बिना कुछ सोचेसमझे किला चौराहे पर पहुंच गया. इस के बाद रूबी बातचीत करने के बहाने उसे बिजली पासी किला के जंगल ले गई, वहां पहले से ही आनंद, आलोक, अविनाश, गौरव, विकास और सुधीर घात लगाए बैठे थे.

इंद्रपाल को अकेला देख कर सब के सब उस पर टूट पड़े. जब मारपीट में इंद्रपाल बेसुध हो गया तो उसे गला दबा कर मार डाला. बाद में शव की पहचान छिपाने के लिए पैट्रोल डाल कर उसे जला भी दिया गया.

अगले दिन उस की लाश थाना आशियाना पुलिस को मिली. पुलिस ने आईपीसी की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के मामले की छानबीन शुरू की. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रपाल के घर सीतापुर जानकारी दी गई.

उस के पिता राजाराम यादव लखनऊ आए और अपने बेटे का दाहसंस्कार करने के बाद वह पुलिस के साथ अपराधियों की खोज में लग गए. थानाप्रभारी आशियाना जितेंद्र प्रताप सिंह ने मामले की छानबीन शुरू की. सीओ (कैंट) तनु उपाध्याय और एसपी (नौर्थ लखनऊ) अनुराग वत्स इस मामले की छानबीन में मदद कर रहे थे.

पुलिस ने इंद्रपाल के मोबाइल फोन की छानबीन की तो फोन में रूबी का नंबर मिला. नंबर की डिटेल्स से पता चला कि दोनों के बीच बहुत ज्यादा बातचीत होती थी. घटना के दिन भी रूबी के फोन से इंद्रपाल के फोन पर बात की गई थी. इस से पुलिस को मामले का सुराग मिलता दिखा.

पुलिस को अपनी छानबीन में यह भी पता चला कि रूबी के चाचा ने उसे इंद्रपाल से मिलने के लिए मना किया था और नौकरी छुड़वा दी थी. एसपी नौर्थ अनुराग वत्स ने बताया कि इंद्रपाल को धोखे से बुलाया गया था. पहचान छिपाने के लिए उस के चेहरे को जलाने की कोशिश की गई थी.

सीओ (कैंट) तनु उपाध्याय ने बताया कि जब पुलिस ने पूरी छानबीन कर ली तो रूबी से घटना के बारे में पूछा गया. रूबी ने शुरुआत में तो बहानेबाजी की पर पुलिस ने जब उसे सबूत दिखाए तो उस ने अपना अपराध कबूल कर लिया.

24 जून, 2018 को कथा लिखे जाने तक आनंद पकड़ से बाहर था. बाकी सभी आरोपी जेल भेजे जा चुके थे. रूबी का अल्हड़पन दोनों पर भारी पड़ा. एक की जान गई और दूसरा फरार है. थानाप्रभारी आशियाना जितेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि उसे जल्द ही पकड़ लिया जाएगा.

लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने इस ब्लाइंड मर्डर स्टोरी का परदाफाश करने के लिए सभी पुलिस कर्मचारियों को बधाई दी. पुलिस ने रूबी के साथ आनंद के साथियों आलोक, अविनाश, गौरव, विकास और सुधीर को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पति की प्रेमिका का खूनी प्यार – भाग 3

पुणे जाने के बाद बृजेश और एकता ने कैटरिंग का काम शुरू किया. शुरूशुरू में उन के लिए यह काम कठिन था लेकिन धीरेधीरे सब ठीक हो गया. उन की और परिवार की मेहनत से थोड़े ही दिनों में उन का यह कारोबार चल निकला. उन्होंने पुणे की कई आईटी कंपनियों में अपनी एक खास जगह बना ली थी.

उन कंपनियों के खाने के डिब्बों की जिम्मेदारी उन के ऊपर आ गई थी. उन के खाने में जो टेस्ट था, वह किसी और के डिब्बों में नहीं था.

काम बढ़ा तो पैसा आया और पैसा आया तो उन के परिवार का रहनसहन बदल गया. उन्होंने पुणे के पौश इलाके की धनदीप बिल्डिंग में 3 फ्लैट किराए पर ले लिए. 2 फ्लैट बिल्डिंग की पहली मंजिल पर थे तो एक दूसरी मंजिल पर था. दूसरी मंजिल के फ्लैट को उन्होंने अपना बैडरूम बनाया. पहली मंजिल का एक फ्लैट उन्होंने अपने दोनों बच्चों और पिता के लिए रखा.

दूसरे फ्लैट को उन्होंने खाने का मेस बना लिया. मेस में काम करने के लिए नौकर और नौकरानी भी रख ली थी, जो खाना बनाने और टिफिन तैयार करने का काम किया करते थे. सुबह की चायनाश्ता पूरा परिवार साथसाथ नीचे वाले फ्लैट में करता था.

बृजेश के शादीशुदा होने की जानकारी जब संध्या पुरी को हुई तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. क्योंकि वह बृजेश को दिलोजान से चाहती थी. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस शख्स पर उस ने अपना तन, मन और धन सब कुछ न्यौछावर कर दिया, वह 2 बच्चों का बाप है.

संध्या को इस का बहुत दुख हुआ. वह ऐसे धोखेबाज को सबक सिखाना चाहती थी, लेकिन वह दिल्ली से फरार हो चुका था.

संध्या हार मानने वालों में से नहीं थी. उस ने निश्चय कर लिया कि वह बृजेश भाटी को ढूंढ कर ही रहेगी. इस के लिए भले ही उस के कितने भी पैसे खर्च हो जाएं. लिहाजा वह अपने स्तर से बृजेश को तलाशने लगी.

उस की कोशिश रंग लाई. उसे फरवरी 2017 में पता चल गया कि बृजेश इस समय पुणे में अपने परिवार के साथ रह रहा है. वह उस के पास पुणे चली गई. वहां वह उस के घर वालों से भी मिली. पहले तो बृजेश ने संध्या को पहचानने से इनकार कर दिया लेकिन जब उस ने अपने तेवर दिखाए तो वह लाइन पर आ गया.

संध्या ने जब शादी की बात कही तो उस ने शादी करने से इनकार कर दिया. उस समय बृजेश की पत्नी एकता ने संध्या को बुरी तरह बेइज्जत कर के घर से निकाल दिया था.

इस से नाराज और दुखी हो कर संध्या दिल्ली लौट आई. बृजेश को सबक सिखाने के लिए उस के खिलाफ उत्तम नगर थाने में बलात्कार और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. रिपोर्ट दर्ज हो जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने बृजेश भाटी को पुणे से गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया. करीब डेढ़ महीने जेल में रहने के बाद वह जमानत पर बाहर आ गया तो संध्या पुरी ने उस से अपनी कार और पैसों की मांग शुरू कर दी.

इस पर बृजेश भाटी के परिवार वालों और संध्या पुरी में जम कर तकरार हुई थी. तब संध्या ने धमकी दी कि अगर उस की कार और पैसे वापस नहीं मिले तो पूरे परिवार को नहीं छोड़ेगी. भाटी परिवार ने इसे संध्या पुरी की एक कोरी धमकी समझा था.

बृजेश भाटी से छली जा चुकी संध्या पुरी ने भाटी परिवार को सबक सिखाने का फैसला कर लिया. वह उसे साकार करने में जुट गई थी. वह जिस तरह तड़प रही थी, उसी तरह धोखेबाज बृजेश को भी तड़पते देखना चाहती थी. इस काम में उस के एक जानपहचान वाले शख्स ने उस की मदद की. उस ने संध्या को आपराधिक प्रवृत्ति वाले शिवलाल उर्फ शिवा बाबूलाल राव से मिलवाया.

पकड़ में आई हत्या कराने वाली प्रेमिका

संध्या पुरी बृजेश भाटी की पत्नी एकता भाटी की हत्या कराना चाहती थी. इस के लिए उस ने शिवलाल उर्फ शिवा को मोटी सुपारी दी. सुपारी लेने के बाद शिवा अपने बेटे मुकेश उर्फ मोंटी राव के साथ पुणे पहुंच गया.

पुणे आ कर दोनों ने पहले बृजेश भाटी के घर की पूरी रेकी की और घटना के दिन उन्होंने पुणे मार्केट से एक मोटरसाइकिल चुरा ली और सुबहसुबह आ कर एकता भाटी को अपना निशाना बना कर वहां से भाग निकले. वे शहर से बाहर निकल जाना चाहते थे. लेकिन पुलिस के सक्रिय होने से वह पुणे में ही रह गए थे.

उन्हें पता था कि पुणे से शाम साढ़े 5 बजे दिल्ली के लिए झेलम एक्सप्रैस जाती है. इसी ट्रेन से उन्होंने दिल्ली भाग जाना उचित समझा, इसलिए शाम 4 बजे तक उन्होंने सारसबाग के एक होटल में समय बिताया.

फिर वे प्लेटफार्म नंबर 3 पर खड़ी झेलम एक्सप्रैस में चढ़ने को हुए तो उन का सामना पुलिस से हो गया. शिवलाल ने शक होने पर गोली चला दी, जिस से इंसपेक्टर गजानंद पवार घायल हो गए.

शिवलाल उर्फ शिवा बाबूलाल राव और मुकेश उर्फ मोंटी राव से पूछताछ करने के बाद क्राइम ब्रांच की एक टीम संध्या पुरी को गिरफ्तार करने दिल्ली निकल गई. 26 नवंबर, 2018 को दिल्ली में उत्तम नगर पुलिस की सहायता से संध्या पुरी को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस संध्या को पुणे ले गई.

पूछताछ के बाद संध्या पुरी ने पूरी कहानी बता दी.॒पुलिस ने संध्या पुरी, शिवलाल और उस के बेटे मुकेश उर्फ मोंटी को कोर्ट में पेश कर के यरवदा जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में बंद थे. आगे की जांच चंदन नगर थानाप्रभारी राजेंद्र मुलिक कर रहे थे.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्यार का आधा-अधूरा सफर – भाग 3

कन्हैयालाल रात भर उलझन में रहे. इस बीच उन्होंने कई बार शिवांगी का फोन मिलाया, लेकिन उस से संपर्क नहीं हो सका. कारण उस का मोबाइल फोन बंद था. सुबह 10 बजे कन्हैयालाल थाना दिबियापुर पहुंचे और नागेंद्र व उस के पिता जितेंद्र यादव के खिलाफ बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि उन की बेटी शिवांगी को जल्द से जल्द बरामद किया जाए. साथ ही उसे बहलाफुसला कर भगा ले जाने वालों के खिलाफ सख्त काररवाई की जाए.

चूंकि मामला लड़की के अपहरण का था, इसलिए दिबियापुर पुलिस सक्रिय हो गई और शिवांगी को बरामद करने के लिए नागेंद्र के गांव बाला का पुरवा (खागा) में छापा मारा, लेकिन घर पर न तो नागेंद्र शिवांगी थे और न ही नागेंद्र का पिता जितेंद्र. घर पर नागेंद्र की मां माया देवी और चाचा राजेंद्र थे. उन को पुलिस से ही जानकारी मिली कि नागेंद्र शिवांगी को बहलाफुसला कर ले गया है.

राजेंद्र ने अपने बड़े भाई जितेंद्र से मोबाइल पर बात की तो पता चला कि वह ट्रक ले कर कोलकाता आए हैं. राजेंद्र ने उन्हें नागेंद्र की नादानी तथा घर पर पुलिस आने की जानकारी दी तो वह घबरा गए. पुलिस भी पूछताछ कर के वापस चली गई.

जितेंद्र यादव ने मोबाइल पर नागेंद्र से बात की तो पता चला कि वह कानपुर में गडरियनपुरवा स्थित अपने कमरे में है. जितेंद्र ने उसे उस की हरकत पर जम कर लताड़ा, साथ ही बताया कि शिवांगी के पिता ने उन दोनों के खिलाफ दिबियापुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी है. इसलिए वह शिवांगी को उस के घर छोड़ आए.

थाने में रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी नागेंद्र व शिवांगी को मिली तो दोनों घबरा गए. लेकिन पिता के कहने के बावजूद नागेंद्र शिवांगी को उस के घर छोड़ने नहीं गया.

नागेंद्र को डर सताने लगा कि शिवांगी और उस की तलाश में पुलिस कानपुर में उस के कमरे पर भी आ सकती है. इसलिए वह 4 सितंबर को अपने कमरे में ताला लगा कर शिवांगी के साथ वैष्णो देवी दर्शन के लिए कटरा के लिए रवाना हो गया. वैष्णो देवी पहुंच कर दोनों ने देवी के दर्शन किए और दोनों ने साथसाथ जीने मरने की कसम खाई.

दर्शन के बाद दोनों ने देवी की चुनरी के साथ फोटो खिंचवाई. नागेंद्र ने शिवांगी की मांग में सिंदूर भर कर उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया. शिवांगी ने बाजार से चूड़ी, बिंदी व अन्य सामान खरीदा. वापस लौट कर दोनों कटरा के एक होटल में रुके. इस होटल में वे मात्र एक दिन रुके. उस के बाद वापस कानपुर के लिए रवाना हो गए.

11 सितंबर, 2019 की रात नागेंद्र और शिवांगी वाया लखनऊ कानपुर सेंट्रल स्टेशन पहुंचे. वहां नागेंद्र ने सोचा कि गांव जा कर मां का आशीर्वाद ले आए. यही सोच कर दोनों रामादेवी चौराहा पहुंच गए. यहां से उन्हें खागा के लिए बस पकड़नी थी.

नागेंद्र अभी बस का इंतजार कर ही रहा था कि उस के मोबाइल की घंटी बजी. काल उस के पिता जितेंद्र की थी. नागेंद्र ने काल रिसीव की तो जितेंद्र बोला, ‘‘नागेंद्र, क्या तू मुझे जेल भिजवा कर ही मानेगा. पुलिस घर पर बारबार दबिश दे रही है. तेरी नादानी ने हम सब को मुश्किल में डाल दिया है. समझ में नहीं आता क्या करूं.’’

फोन पर पिता की बात सुन कर नागेंद्र गहरी सोच में डूब गया. उस की हालत देख कर शिवांगी ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, तुम सोच में क्यों डूब गए? किस का फोन था?’’

‘‘पिताजी का फोन था. शिवांगी समझ में नहीं आता कि क्या करूं. घर जाता हूं तो पुलिस पकड़ लेगी. तुम्हें

तुम्हारे घर छोड़ता हूं तब भी मैं पकड़ा जाऊंगा. तुम तो पिता के घर होगी, लेकिन मैं जेल की सलाखों के पीछे दिन गुजारूंगा.’’ वह बोला.

‘‘नहीं नागेंद्र, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगी. मैं तुम्हें जेल नहीं जाने दूंगी.’’ शिवांगी भावुक हो कर बोली.

‘‘तब तो एक ही उपाय है शिवांगी.’’ उस ने कहा.

‘‘वह क्या?’’ शिवांगी ने पूछा.

‘‘हम एक साथ जी नहीं सकते तो एक साथ मर तो सकते हैं. इस जनम हमारा मिलना नहीं हो सका तो अगले जनम में जरूर होगा.’’ नागेंद्र मायूस हो कर बोला.

‘‘तुम ठीक कहते हो.’’

बातों के बाद दोनों ने रेल पटरी की ओर कदम बढ़ा दिए. वे रामादेवी ओवरब्रिज के नीचे रेल पटरी पर पहुंचे ही थे कि हावड़ा की ओर जाने वाली राजधानी एक्सप्रैस आ गई. ड्राइवर ने दोनों को हाथ डाले देखा तो सीटी बजाई लेकिन वे दोनों नहीं हटे.

रेलगाड़ी उन्हें रौंदती हुई निकल गई. हालांकि ड्राइवर ने आकस्मिक ब्रेक लगाए और गाड़ी भी रुकी लेकिन तब तक दोनों के शरीर टुकड़ों में बंट चुके थे.

12 सितंबर की सुबह लोगों ने रेल पटरी  के किनारे 2 शव पड़े देखे. इस के बाद सूचना पा कर थाना चकेरी पुलिस घटनास्थल पहुंची और शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की.

नागेंद्र व शिवांगी द्वारा आत्महत्या कर लेने की जानकारी जब दिबियापुर पुलिस को लगी तो उस ने चकेरी पुलिस से संपर्क किया. फिर जांच के बाद पुलिस ने उस मुकदमे को खारिज कर दिया, जिस में नागेंद्र व उस के पिता को आरोपी बनाया गया था. थाना चकेरी पुलिस ने भी प्रेमी युगल आत्महत्या प्रकरण को अपने रिकौर्ड में दर्ज किया था लेकिन बाद में फाइल बंद कर दी.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नैतिकता से परे : प्यार में लिया बदला – भाग 3

2-4 दिन बाद ही दयावती अपने पति के साथ सिपाहीराम के यहां कमरा देखने पहुंच गई. कमरा पसंद आने पर वह मकान मालिक को किराए का एडवांस दे आई. हालांकि सिपाहीराम रामकिशन से अनजान था, वह उसे कमरा देने में आनाकानी करता रहा. लेकिन जब आलोक ने कहा कि वह रामकिशन को जानता है, इस के बाद ही उस ने उसे कमरा दिया.

दयावती अपने पति के साथ सिपाहीराम के यहां आ कर रहने लगी. चूंकि दयावती आलोक से पहले से काफी घुलीमिली थी, इसलिए उसे नई जगह पर एडजस्ट होने में कोई दिक्कत नहीं हुई. सिपाहीराम ने घर में ही परचून की दुकान खोल रखी थी. मोहल्ले के लोगों को सिपाहीराम की दुकान से रोजमर्रा की जरूरतें आसानी से सुलभ हो जाती थीं. आलोक की जमानत पर सिपाहीराम ने रामकिशन को दुकान का सामान उधार देना शुरू कर दिया था.

सिपाहीराम की इस सहानुभूति से दयावती भी उस में ज्यादा रुचि लेने लगी थी. सिपाहीराम उस की हर परेशानी को दूर करने के लिए तैयार रहता था. दयावती को सिपाहीराम के मकान में रहते 2-3 महीने बीत चुके थे. वह धीरेधीरे सिपाहीराम की तरफ आकर्षित होती गई. दयावती ने सिपाहीराम के मन की खोट पहचान ली थी.

बहकी हुई औरतों को पराए मर्दों की तरफ आकर्षित होते देर नहीं लगती. दयावती को भी सिपाहीराम को आकर्षित करने में ज्यादा समय नहीं लगा.

लेकिन दयावती और आलोक के अंतरंग संबंधों की बात भी सिपाहीराम से छिपी न रह सकीं. समय ने करवट बदली और दयावती व आलोक की मुलाकातें फिर से होने लगीं. वहां रहने के दौरान दोनों एकदूसरे के प्रति पूर्णतया समर्पित रहने लगे.

उधर सिपाहीराम भी दयावती को चाहने लगा था, लेकिन उस के मकान में रह रही महिलाओं की दिन में होने वाली चहलपहल से उसे दयावती से बात करने और मिलने का मौका नहीं मिल पाता था.

एक बार की बात है. आलोक अपने पैतृक गांव फरेंदा जाने की तैयारी कर चुका था. मौका पा कर दयावती ने आलोक को रोकते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे और तुम्हारे भाई रामकिशन के लिए पूड़ीकचौड़ी बना रही हूं. तुम अपने कमरे में जा कर लेटो, मैं खाना बना कर लाती हूं. खाना खा कर तुम गांव चले जाना.’’

आलोक अपने कमरे का दरवाजा बंद कर चुका था. वह वापस आ कर दयावती के कमरे में जा कर लेट गया. कुछ ही देर में दयावती थाली में खाना परोस कर आलोक के सामने आ खड़ी हुई. आलोक उस समय खाना खा रहा था.

एक दूसरी किराएदार महिला ने आलोक को दयावती के कमरे में खाना खाते देखा तो वह सुलग उठी. वह अपनी भड़ास निकालते हुए उस के गैस चूल्हे के पास खड़ी हो कर बोली, ‘‘अब तो गैरमर्दों को भी खाना खिलाने की जरूरत पड़ने लगी. अपना खर्च तो पूरा होता नहीं, गैरमर्दों को घर में बिठा कर खाना खिलाया जाता है.’’

इस के बाद वह महिला सीधी सिपाहीराम के पास गई और कहने लगी, ‘‘दयावती के यहां बाहरी लोगों की खूब आवभगत होती है, कभी तुम्हें एक कप चाय के लिए पूछा है उस ने?’’

यह बात सुन कर सिपाहीराम दयावती के कमरे के सामने जा कर खड़ा हो गया, क्योंकि राजवती के मुंह से यह बात सुन कर सिपाहीराम आगबबूला हो उठा था. सिपाहीराम उम्रदराज बेशक था, लेकिन वह दयावती को चाहता था. उस दिन उस ने दयावती से कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उसे इस बात की तसदीक हो गई कि दयावती उसे न चाह कर आलोक को ज्यादा चाहती है.

यही गांठ सिपाहीराम के मन में घर कर गई. सिपाहीराम यह बात भलीभांति समझ गया कि दयावती और आलोक के संबंध पतिपत्नी जैसे हैं.

आलोक और दयावती की निकटता मकान मालिक सिपाहीराम की आंखों में कांटा बन कर खटकने लगी. उस ने कई बार आलोक कुमार को समझाया भी कि वह शरीफ आदमी बन कर रहे. दयावती का चक्कर छोड़ दे. लेकिन आलोक ने उस की बातों पर गौर नहीं किया.

आखिर सिपाहीराम ने उसे रास्ते से हटाने की अपनी क्रूर योजना बना ली. इस योजना में उस ने कनक सिटी के मोनू पांडेय, बबलू प्रजापति और सलेमपुर पतौरा के कल्लू उर्फ हिमांशु गुप्ता, संतोष और अरुण यादव को शामिल कर लिया.

उस दिन 12 अक्तूबर, 2019 को सिपाहीराम ने साढ़े 9 बजे रात को शराब मंगाई और आलोक को भी इस पार्टी में शामिल कर लिया. उस के सभी साथियों ने मिल कर शराब पी.

शराब पीने के बाद योजनानुसार खूब विवाद हुआ. फिर सिपाहीराम के साथियों ने मिल कर उस की दुकान पर ही आलोक को ईंटों से कुचल कर लहूलुहान कर दिया. उस के बाद उन्होंने फोन कर के एंबुलेंस बुला ली.

वे उसे ऐरा अस्पताल की ले गए. एंबुलेंस के ड्राइवर ने कहा कि वह इस घायल आदमी को सरकारी अस्पताल के अलावा और कहीं नहीं ले जाएगा. तब उन्होंने सरकारी अस्पताल के गेट पर एंबुलेंस रुकवा ली और मरणासन्न अवस्था में आलोक को अपनी बाइक से लाद कर मलीहाबाद थाना क्षेत्र की ओर ले गए. दूसरी बाइक पर उस के अन्य साथी भी थे.

इन लोगों ने तिलसुगा गांव के निकट नाले के किनारे जा कर घायल आलोक को फेंक दिया.

वहीं उस की मौत हो गई. इस के बाद मकान मालिक सिपाहीराम ने खुद को पाकसाफ दिखाने के लिए अपहरण करने की सूचना रूबी के भाई को दे दी.

थानाप्रभारी त्रिलोकी सिंह ने सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस फरार आरोपी संतोष सिंह के संभावित स्थानों पर दबिश दी, लेकिन वह फरार था. अंतत: 22 अक्तूबर, 2019 को मुखबिर की सूचना पर आरोपी संतोष सिंह लोधी भी उन के हत्थे चढ़ गया. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

एक ऐसी भी औरत : बनाए कई आशिक

बीना कानपुर शहर के मोहल्ला दीनदयालपुरम की केडीए कालोनी निवासी मेवालाल की बड़ी बेटी थी. बीना के अलावा उस की 2 और बेटियां थीं. बेटियों से छोटा एक बेटा था करन. मेवालाल की पत्नी कुसुम घरेलू महिला थी जबकि वह फेरी लगा कर कपड़े बेचा करता था.

बीना जवान हो चुकी थी. मेवालाल चाहता था कि कोई सही लड़का मिल जाए तो वह उस के हाथ पीले कर दे. थोड़ी खोजबीन के बाद उसे कानपुर देहात के कस्बा मूसानगर निवासी भीखाराम का बड़ा बेटा रामबाबू पसंद आ गया. भीखाराम के पास 3 बीघा खेती की जमीन थी और कस्बे के मुर्तजा नगर में अपना मकान भी था.

रामबाबू व उस के घर वालों ने जब खूबसूरत बीना को देखा तो वह उन्हें पसंद आ गई. बीना को देख कर भीखाराम बिना किसी दहेज के बेटे की शादी करने के लिए तैयार हो गया. अंतत: सामाजिक रीतिरिवाज से 10 जून, 2008 को बीना और रामबाबू का विवाह हो गया. इस शादी से रामबाबू भले ही खुश था लेकिन बीना खुश नहीं थी. इस की वजह यह थी कि बीना ने जिस तरह पढ़ेलिखे और स्मार्ट पति के सपने संजोए थे, रामबाबू वैसा नहीं था.

बीना ससुराल में हफ्ते भर रही, पर वह पति के साथ भावनात्मक रूप से नहीं बंध सकी. हफ्ते बाद वह मायके आई तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. कुसुम ने कारण पूछा तो वह रोआंसी हो कर बोली, ‘‘मां, तुम लोगों ने सिर्फ ये देखा कि वे दहेज नहीं मांग रहे, पर यह नहीं देखा कि लड़का कैसा है.’’

‘‘सब कुछ तो है उन के पास, तुझे किस चीज की कमी है. तुझे तो पता है कि अभी तेरी 2 बहनें और हैं. हमें उन्हें भी ब्याहना है.’’ कुसुम ने अपनी मजबूरी जाहिर की तो बीना चुप हो गई.

मां के इस जवाब के बाद बीना ने हालात से समझौता कर लिया. वह ससुराल में पति के साथ रहने लगी. ससुराल का वातावरण दकियानूसी था. बातबात पर रोकटोक होती थी. पति की कमाई भी सीमित थी, जिस के कारण बीना को अपनी इच्छाएं सीने में ही दफन करनी पड़ती थीं.

वक्त के साथ बीना 2 बच्चों शिवम और शिवानी की मां बन गई. परिवार बढ़ा तो खर्चे भी बढ़ गए. जब बीना को लगा कि रामबाबू की कमाई से घर का खर्च नहीं चल पाएगा तो उस ने पति को कानपुर शहर जा कर नौकरी या कोई काम करने की सलाह दी. पत्नी की यह बात रामबाबू को भी ठीक लगी.

रामबाबू का एक दोस्त था सजीवन, जो कानपुर शहर की योगेंद्र विहार कालोनी में रहता था. वह किसी फैक्ट्री में काम करता था. कहीं काम दिलाने के संबंध में उस ने सजीवन से बात की. सजीवन ने उसे सुझाव दिया कि वह साइकिल मरम्मत का काम शुरू करे. पंक्चर लगाने आदि से उसे अच्छी कमाई होने लगेगी.

रामबाबू को दोस्त की सलाह पसंद आ गई, उस ने खाडे़पुर कालोनी मोड़ पर साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली और योगेंद्र विहार कालोनी में एक कमरा किराए पर ले कर रहने लगा.

रामबाबू का साइकिल रिपेयरिंग का काम अच्छा चलने लगा. पैसा आने लगा तो रामबाबू पत्नी और बच्चों को भी शहर ले आया. शहर आ कर बीना खुश थी. शहर आने के बाद वह बनसंवर कर रहने लगी. बीना ने घर के पास ही स्थित शिशु मंदिर में बच्चों का दाखिला करा दिया. बच्चों को स्कूल भेजने व लाने का काम वह खुद करती थी.

पिंटू नाम का एक युवक रामबाबू की दुकान पर अपनी साइकिल रिपेयर कराने आता था. पिंटू बर्रा 8 में रहता था और नौबस्ता स्थित एक प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करता था. पिंटू की रामबाबू से दोस्ती हो गई. जरूरत पड़ने पर रामबाबू पिंटू से पैसे भी उधार ले लेता था. कभीकभी दोनों साथ बैठ कर शराब भी पी लेते थे. पीनेपिलाने का खर्च पिंटू ही उठता था.

एक दिन पिंटू दुकान पर आया तो रामबाबू बोला, ‘‘पिंटू, आज मेरे बेटे शिवम का जन्मदिन है. मेरी तरफ से आज तुम्हारी दावत है. शाम को फैक्ट्री से सीधे घर आ जाना, भूलना मत.’’

‘‘ठीक है, मैं जरूर आऊंगा.’’ कहते हुए पिंटू फैक्ट्री चला गया. शाम को पिंटू गिफ्ट ले कर रामबाबू के घर पहुंच गया. रामबाबू उस का ही इंतजार कर रहा था. उस ने पिंटू को गले लगाया फिर पत्नी को आवाज दी, ‘‘बीना, देखो तो कौन आया है.’’

बेटे का जन्मदिन होने की वजह से बीना पहले से ही सजीधजी थी. पति की आवाज सुन कर वह आ गई. वह पिंटू की ओर देख कर बोली, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘भाभीजी, जब मैं आप के घर कभी आया ही नहीं तो पहचानेंगी कैसे? मैं रामबाबू भैया का दोस्त हूं, नाम है पिंटू.’’ वह बोला.

पिंटू की बीना से यह पहली मुलाकात थी. पहली ही मुलाकात में बीना पिंटू के दिलोदिमाग पर छा गई. रामबाबू ने पिंटू की खूब खातिरदारी की. उस समय बीना भी मौजूद रही. इस के बाद पिंटू ने ठान लिया कि वह किसी भी तरह बीना को हासिल कर के रहेगा.

वह उसे हासिल करने का प्रयास करने लगा. पिंटू जानता था कि बीना तक पहुंचने का रास्ता रामबाबू ही है. अत: उस ने रामबाबू को शराब का आदी बनाने की सोची. इसी के चलते वह शराब की बोतल ले कर रामबाबू के घर जाने लगा. घर में दोनों बैठ कर शराब पीते फिर खाना खाते. इस बीच पिंटू की निगाहें बीना के जिस्म पर ही गड़ी रहती थीं. शराब के नशे में पिंटू कभीकभी बीना से मजाक व छेड़खानी भी कर लेता था.

बीना जल्द ही पिंटू के आने का मकसद समझ गई थी. वह बीना की आर्थिक मदद भी करने लगा. बच्चों की जरूरत का सामान और खानेपीने की चीजें भी लाने लगा. धीरेधीरे पिंटू ने अपने अहसानों व लच्छेदार बातों से बीना के दिल में जगह बना ली. अब बीना भी पिंटू से खुल कर हंसनेबोलने लगी थी.

एक दिन बीना सजधज कर बाजार के लिए घर से निकलने वाली थी, तभी पिंटू आ गया. वह बीना को एकटक देखता रहा, फिर बोला, ‘‘भाभी बनठन कर किस पर बिजली गिराने जा रही हो?’’

‘‘मक्खनबाजी बंद करो, अभी मुझे कहीं जाना है. बाद में बात करेंगे. ओके…’’ कहते हुए बीना बाजार के लिए चल दी. पिंटू भी वहां से चला गया.

एक दिन बीना का पति रामबाबू मूसानगर गया हुआ था और बच्चे स्कूल. बीना घर के काम निपटाने के बाद बच्चों को स्कूल से लाने की तैयारी कर रही थी, तभी पिंटू आ गया. इस अकेलेपन में पिंटू खुद को रोक नहीं सका और उस ने बीना को अपनी बांहों में भर लिया. बीना ने कसमसा कर हलका प्रतिरोध किया, लेकिन पिंटू की पकड़ मजबूत थी सो वह छूट नहीं सकी.

हकीकत में बीना पिंटू की बांहों में एक अकल्पनीय सुख महसूस कर रही थी. यही वजह थी कि उस के सोए हुए अरमान जाग उठे. वह भी पिंटू से अमरबेल की तरह लिपट गई. इस के बाद उन्माद के तूफान में उन की सारी मर्यादाएं बह गईं.

उस दिन बीना तो मर्यादा भूल ही गई थी, पिंटू भी भूल गया था कि वह अपने दोस्त की गृहस्थी में आग लगा रहा है. जल्दी ही बीना पिंटू के प्यार में इतनी दीवानी हो गई कि वह पति से ज्यादा प्रेमी का खयाल रखने लगी. पिंटू भी अपनी कमाई बीना पर खर्च करने लगा. बीना जो भी डिमांड करती, पिंटू उसे पूरी करता. रामबाबू उन दोनों के मिलन में बाधक न बने, इसलिए पिंटू रामबाबू को शराब की दावत दे कर उस का विश्वासपात्र दोस्त बना रहता था.

ऐसे रिश्तों को ज्यादा दिनों तक छिपा कर नहीं रखा जा सकता, देरसबेर पोल खुल ही जाती है. जब पिंटू का रामबाबू की अनुपस्थिति में बीना के यहां ज्यादा आनाजाना हो गया तो पड़ोसियों को शक होने लगा. कालोनी में उन के संबंधों को ले कर कानाफूसी शुरू हो गई. किसी तरह बात रामबाबू के कानों तक भी पहुंच गई. रामबाबू अपने दोस्त पिंटू पर अटूट विश्वास करता था, इसलिए उस ने सुनीसुनाई बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन उस के मन में शक का कीड़ा जरूर कुलबुलाने लगा.

शक के आधार पर एक रोज रामबाबू ने बीना से पिंटू के बारे में पूछा तो वह तुनक कर बोली, ‘‘पिंटू तुम्हारा दोस्त है. तुम्हीं उसे ले कर घर आए थे. वह आता है तो मैं उस से हंसबोल लेती हूं. पासपड़ोस के लोग जलते हैं, पड़ोसियों की झूठी बातों में आ कर तुम भी मुझ पर शक करने लगे.’’

‘‘मैं शक नहीं कर रहा, केवल पूछ रहा हूं.’’ रामबाबू प्यार से बोला.

‘‘पूछना क्या है, अगर तुम्हें मुझ से ज्यादा पड़ोसियों की बातों पर भरोसा है तो पिंटू को घर आने से मना कर दो. लेकिन सोच लो, पिंटू हमारी मदद भी करता है और तुम्हारी पार्टी भी. तुम्हारी कमाई से मकान का किराया, बच्चों की फीस और घरगृहस्थी का खर्च क्या चल पाएगा?’’

पत्नी की बात पर विश्वास कर रामबाबू शांत हो गया.

एक दिन रामबाबू दुकान पर गया और काम भी किया. लेकिन 2 घंटे बाद उसे लगा कि बदन टूट रहा है और बुखार है. वह दुकान बंद कर के घर पहुंच गया. कमरा अंदर से बंद था. कुंडी खुलवाने के लिए उस ने जंजीर की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि तभी उसे कमरे के अंदर से पत्नी के हंसने की आवाज आई. रामबाबू ने अपना हाथ रोक लिया. उस ने दरवाजे की झिर्री से देखा तो दंग रह गया. उस की पत्नी आपत्तिजनक स्थिति में थी.

रामबाबू का खून खौल उठा. लेकिन उस समय वह बोला कुछ नहीं. वह कुछ देर जड़वत खड़ा रहा. फिर खटखटाने पर दरवाजा खुला तो उसे देख कर बीना व पिंटू अपराधबोध से कांपने लगे. दोनों ने रामबाबू से माफी मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का वादा किया.

दोनों को माफ करने के अलावा रामबाबू के पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. पत्नी की बेवफाई से रामबाबू को गहरी ठेस लगी थी. उसे अब अपनी इज्जत बचानी थी, इसलिए उस ने कानपुर शहर छोड़ कर घर जाने का निश्चय कर लिया.

बीना को घर वापस जाने की बात पता चली तो उस ने बच्चों की पढ़ाई का सवाल उठाया. लेकिन रामबाबू मानने को तैयार नहीं हुआ. पत्नी और बच्चों को साथ ले कर वह मूसानगर स्थित अपने घर आ गया. रामबाबू खेतीकिसानी व मजदूरी कर के बच्चों का पालनपोषण करने लगा. उस ने दोनों बच्चों का दाखिला कस्बे के प्राइमरी स्कूल में करा दिया.

बीना के गांव चले जाने के बाद पिंटू परेशान हो उठा. उसे बीना की याद आने लगी. पिंटू से जब नहीं रहा गया तो वह बीना की ससुराल पहुंच गया. वहां रामबाबू ने उसे बेइज्जत किया और बीना से नहीं मिलने दिया. इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. पिंटू आता और बेइज्जत हो कर वापस हो जाता.

कुछ महीने ससुराल में रहने के बाद बीना ने विरोध शुरू कर दिया. दरअसल बीना ससुराल में कैदी जैसा जीवन व्यतीत कर रही थी. घर से बाहर निकलने पर पाबंदी थी, जबकि वह स्वतंत्र विचरण करना चाहती थी. साथ ही वह अभावों से भी जूझ रही थी.

एक दिन बीना ने रामबाबू से साफ कह दिया कि वह शहर जा कर खुद कमाएगी और अपना व बच्चों का पालनपोषण करेगी. रामबाबू ने विरोध किया लेकिन वह नहीं मानी. बीना ससुराल छोड़ कर कानपुर शहर चली गई.

नौबस्ता थाने के अंतर्गत धोबिन पुलिया कच्ची बस्ती में किराए पर मकान ले कर वह अकेली ही रहने लगी. उस ने नौकरी के लिए दौड़धूप की तो उसे आवासविकास नौबस्ता स्थित एक प्लास्टिक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई.

नौकरी मिल जाने के बाद बीना अपने दोनों बच्चों को भी साथ रखना चाहती थी. लेकिन रामबाबू ने बच्चों को उस के साथ भेजने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन बच्चों के लिए उस का मन तड़पता तो वह जबतब बच्चों से मिलने जाती और उन्हें खर्चा दे कर चली आती. कभीकभी वह बच्चों से मोबाइल पर भी बात कर लेती थी.

पिंटू को जब पता चला कि बीना वापस कानपुर शहर आ गई है तो उस ने फिर से बीना से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. पर बीना ने उसे पहले जैसी तवज्जो नहीं दी.

बीना जिस प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करती थी, वहीं पर 25-26 साल का सुनील भी काम करता था. सुनील बीना के घर से कुछ दूरी पर कच्ची बस्ती में ही रहता था.

बीना और सुनील हंसमुख स्वभाव के थे, इसलिए दोनों में खूब पटती थी. छुट्टी वाले दिन वह सुनील के साथ घूमने भी जाती थी, सुनील उसे चाहने लगा था.

धीरेधीरे सुनील और बीना नजदीक आते गए और दोनों में नाजायज संबंध बन गए. सुनील सुबह बीना के घर आता. दोनों साथ चायनाश्ता करते और फिर साथसाथ फैक्ट्री चले जाते. शाम को भी सुनील बीना का घर छोड़ देता. कभीकभी वह बीना के घर रुक जाता, फिर रात भर दोनों मौजमस्ती करते.

बीना के सुनील के साथ संबंध बन गए तो उस ने पहले प्रेमी पिंटू को भाव देना बंद कर दिया. अब पिंटू जब भी उस के पास आता तो बीना विरोध करती. वह उसे घर में शराब पीने को भी मना करती.

पिंटू को वह अपने पास फटकने नहीं देती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि बीना में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया. उस ने गुप्त रूप से पता किया तो सच्चाई सामने आ गई. उसे पता चल गया कि बीना के सुनील से संबंध बन गए हैं.

सुनील को ले कर बीना और पिंटू में झगड़ा होने लगा. पिंटू बीना पर दबाव डालने लगा कि वह सुनील का साथ छोड़ दे लेकिन बीना इस के लिए तैयार नहीं थी. प्रेमिका की इस बेवफाई से पिंटू परेशान रहने लगा.

10 फरवरी, 2018 को पिंटू रात 8 बजे शराब के ठेके से बोतल खरीद कर बीना के घर पहुंचा तो वहां सुनील मौजूद था. सुनील वहां से चला गया तो पिंटू ने बीना से सुनील के बारे में पूछा. बीना ने उसे सब कुछ सच बता दिया. इस पर पिंटू को गुस्सा आ गया.

पिंटू ने तेज धार वाला चाकू साथ लाया था. उस ने चाकू निकाला और उस की गरदन पर वार कर दिया. बीना जमीन पर गिर गई. उस के बाद पिंटू बीना के सीने पर बैठ गया और यह कहते हुए उस की गरदन रेत दी कि बेवफाई की सजा यही है. बीना की हत्या करने के बाद पिंटू ने शराब पी फिर बाहर से दरवाजे की कुंडी बंद कर फरार हो गया.

11 फरवरी की सुबह सुनील बीना के घर पहुंचा तो दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद थी. वह कुंडी खोल कर कमरे में गया तो उस के होश उड़ गए. फर्श पर बीना की खून से सनी लाश पड़ी थी. सुनील ने पहले पासपड़ोस के लोगों फिर थाना नौबस्ता पुलिस को सूचना दी.

सूचना पाते ही नौबस्ता थानाप्रभारी अखिलेश जायसवाल पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने महिला की हत्या की सूचना अपने अधिकारियों को दे दी. कुछ देर बाद ही एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा, एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा वहां पहुंच गए.

मृतका की उम्र 32 वर्ष के आसपास थी. फोरैंसिक टीम ने भी मौके पर जांच की. पुलिस अधिकारियों ने सूचना देने वाले सुनील तथा मृतका के पति रामबाबू से पूछताछ की. रामबाबू ने पत्नी की हत्या का शक अपने दोस्त पिंटू करिया पर जताया. रामबाबू की तहरीर पर पुलिस ने पिंटू करिया के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया और उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी.

शाम करीब 5 बजे नौबस्ता थानाप्रभारी अखिलेश जायसवाल ने मुखबिर की सूचना पर पिंटू करिया को नौबस्ता के दासू कुआं के पास से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने सहज ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि बीना ने उस के साथ विश्वासघात किया था. इसी खुन्नस में उस ने उसे मार डाला.

पुलिस ने पिंटू की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून सने कपड़े भी बरामद कर लिए. पूछताछ के बाद पुलिस ने 12 फरवरी, 2018 को उसे कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी.

 -कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्यार की सूली पर लटकी अंजली – भाग 3

अंजलि की यह बात राकेश को बुरी नहीं लगी, बल्कि उसे उस पर और भी प्यार उमड़ आया था. अंजलि की एक खास सहेली खुशबू थी, वह अपने दिल की हर बात उसी से शेयर करती थी. उस ने उसे यह भी बता दिया था कि राकेश उस पर फिदा है.

राकेश ने जब देखा कि उस की दाल नहीं गल रही है तो उस ने उस की सहेली खुशबू को पटा कर उसे सीढि़यां बनाया. राकेश ने खुशबू से अंजलि तक अपने प्यार का पैगाम भिजवा दिया.

खुशबू ने अंजलि के सामने राकेश की ऐसी जोरदार वकालत की कि उस ने राकेश के प्यार को स्वीकृति दे दी. पते की बात यह थी कि राकेश ने खुशबू से भी अपने शादीशुदा होने की बात छिपा ली थी. खुशबू के जरिए राकेश और अंजलि एकदूसरे के करीब आए. दोनों ही एकदूसरे से प्रेम करने लगे थे.

राकेश अंजलि का पहला प्यार था. उस का प्रेम निश्छल और पाकीजा था. वह उसे जीजान से प्यार करने लगी थी. जबकि राकेश शातिर और छलिया था. उसे अंजलि से नहीं बल्कि उस के गोरे बदन से प्रेम था. वह सिर्फ उस के जिस्म का भूखा था और जिस्मानी रिश्ता बना कर उसे छोड़ देना चाहता था.

इस के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार था. उस ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो अंजलि उस के इस प्रस्ताव को ठुकरा नहीं सकी और शादी के लिए हां कर दी. इधर अंजलि के मांबाप ने उस की शादी झांसी के एक इंजीनियर के साथ पक्की कर दी थी. यह बात अंजलि को तब पता चली जब उसे गोदभराई की तारीख बताई गई. यह सुन कर अंजलि को झटका लगा. अपने प्यार की बात वह मांबाप से बताने ही वाली थी कि उसे अपनी शादी तय होने की खबर मिल गई.

राकेश ने धोखा किया था अंजलि के साथ

अंजलि अपनी शादी तय होने वाली बात राकेश को बताने ही जा रही थी कि उसे राकेश के शादीशुदा होने की बात पता चली. यह जान कर अंजलि को बड़ा दुख हुआ. अपने साथ होने वाले इस धोखे की बात पता चलते ही अंजलि टूट सी गई और परेशान रहने लगी. उसे राकेश से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह उसे इतना बड़ा धोखा दे सकता है.

प्यार में धोखा खाने के बाद अंजलि टूट सी गई थी. फरवरी, 2019 में उस की गोदभराई थी. गोदभराई में अंजलि घर आई तो जरूर थी, लेकिन उसे इस शादी से कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. शादी को ले कर जो उत्साह उस के चेहरे पर होना चाहिए था, वह नदारद था. इसे मांबाप के साथ उस की बहनों ने भी महसूस किया था. खैर, गोदभराई की रस्म पूरी होने के बाद 5 मई, 2019 को अंजलि की शादी की तारीख पक्की हुई थी. इत्तफाक से उस तारीख पर चुनाव होना था, इसलिए शादी की तारीख आगे बढ़ा दी गई. गोदभराई की रस्म पूरी होने के बाद अंजलि नौकरी पर लौट आई थी.

प्यार में धोखा खाने के बाद अंजलि का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. वह हमेशा उदास रहती थी. अंजलि को अकेली या उदास देख कर उस के मकान मालिक की दोनों बेटियां रिया और सीमा उस के पास जा कर बैठ जाती थीं. दोनों के आ जाने से अंजलि का मन लग जाता और थोड़ा समय अच्छे से कट जाया करता था.

20 मई, 2019 को स्कूलों में 45 दिन का ग्रीष्मकालीन अवकाश हुआ. छुट्टी होते ही विद्यालय के सभी अध्यापक अपनेअपने घर चले गए. अंजलि की सहेली खुशबू भी अपने घर आ गई थी. अंजलि ने भी 22 मई को घर जाने की तैयारी कर ली थी.

21 मई, 2019 के दिन अंजलि के कमरे पर कई लोग आतेजाते रहे. दोपहर बाद जब अंजलि काम से फारिग हुई तो रोज की तरह रिया और सीमा उस के कमरे में चली गईं. तीनों बैठ कर घंटों इधरउधर की बातें करती रहीं. साढ़े 3 बजे के करीब दोनों बहनें अपने कमरे में वापस लौट आई थीं.

क्या रहस्य बन कर रह जाएगी अंजलि की मौत

रिया और सीमा के वहां से जाने के बाद अंजलि के पास उस की छोटी बहन मनोरमा का फोन आया था. वह उस से पूछ रही थी कि विद्यालय में छुट्टियां हो गई हैं, घर कब आ रही हो. उस ने छोटी बहन से कहा कि आज शाम को घर के लिए रवाना होऊंगी.

इस के बाद अंजलि फोन पर ही रोने लगी. मनोरमा ने उस से रोने की वजह पूछी तो उस ने फोन पर कुछ नहीं बताया. बस इतना ही कहा कि घर आने के बाद सब बताऊंगी. इस के बाद फोन कट गया. इस के ठीक आधे घंटे बाद रहस्यमय तरीके से अंजलि के कमरे से धुएं का बड़ा गुबार उठा. बाद में रहस्यमय तरीके से पंखे से झूलती उस की लाश मिली.

बहरहाल, मोहना पुलिस की करतूत से बेसिक शिक्षा अधिकारी राम सिंह भी आहत हैं. बीएसए राम सिंह ने आरोप लगाया कि मंगलवार 21 मई को जब घटना की जानकारी हुई तो वह शाम करीब 6 बजे गौहनिया स्थित अंजलि यादव के कमरे पर पहुंचे. वहां मौजूद एक दरोगा ने उन्हें नीचे ही रोक दिया. जब उन्होंने परिचय दिया तब जा कर परिसर में बैठने की अनुमति दी गई. एसपी डा. धर्मवीर सिंह से बात करने के बाद उन्हें कमरे में जाने दिया गया.

वहां पर 5 पुलिस वाले बैठे हुए थे. शव के गले में लोहे का तार बंधा हुआ था. पैर जंजीर से बांधा गया था. सवाल यह है कि अगर अंजलि को आत्महत्या करनी थी तो उस ने गला व पैर क्यों बांधा था. फिर उस ने दरवाजे पर बाहर ताला कैसे लगा लिया.

इस सवाल का जवाब पुलिस के पास नहीं था. सवाल सुन कर पुलिस का बस इतना ही कहना था कि पुलिस हत्या और आत्महत्या दोनों पहलू पर जांच कर रही है. इस के लिए स्वाट टीम को भी लगा दिया गया है. महिला पुलिस भी अलग से जांच कर रही है. दोषियों को किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.

उधर 24 मई, 2019 को राज्य महिला आयोग की सचिव अंजू चौधरी ने शिक्षिका अंजलि यादव कांड का संज्ञान लिया. आयोग की टीम ने गौहनिया बाजार स्थित घटनास्थल का निरीक्षण किया. पूरे मामले को संदिग्ध मानते हुए महिला आयोग ने प्रदेश सरकार से उच्चस्तरीय जांच करने की अनुशंसा की.

आयोग की सचिव अंजू चौधरी ने पहले दिन से ही इस मामले को आत्महत्या मानने पर पुलिस विभाग को आड़े हाथों लिया. उन्होंने फोन पर परिजनों से बात की और उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन दिया.

खैर, अंजलि की मौत पूरी तरह रहस्य बन कर रह गई है. उस ने आत्महत्या की या किसी ने उस की हत्या कर के आत्महत्या का रूप दिया, पुलिस दोनों पहलुओं से जांच कर रही है.

अंजलि से राकेश के प्रेम संबंध थे, यह सच था. उस ने उसे धोखा दिया, यह भी सच था. पुलिस ने राकेश को अंजलि को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के आरोप में जेल भेज दिया. शायद पुलिस ने यह इसलिए किया होगा कि जनाक्रोश को शांत किया जा सके.

कथा लिखे जाने तक पुलिस अंजलि कांड की गुत्थी को सुलझाने में जुटी हुई थी. क्या पुलिस इस गुत्थी को सुलझा पाएगी, यह अभी कहा नहीं जा सकता. द्य

—कथा में रिया और सीमा परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दुलहन पर लगा दांव : क्या माया और रवि की साजिश पूरी हो पाई – भाग 3

‘‘मेरी बात समझने की कोशिश करो, माया.’’ माया के सामने रवि हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मैं घर वालों के सामने बेबस हूं. मुझे उन के सामने झुकना ही पड़ा.’’ रवि ने माया को समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम तो जानती हो, मैं भी तुम से कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जीने की कल्पना तक नहीं कर सकता.’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम्हें जो भी करना हो करो, लेकिन मैं तुम्हारी शादी नहीं होने दूंगी.’’ माया ने रवि को धमकाया. रवि माया को काफी देर तक समझाता रहा. लेकिन माया ने रवि की शादी की बात स्वीकार नहीं की. उस ने खुल कर धमकी दी कि अगर उस ने किसी और से शादी की तो इस का अंजाम उसे भुगतना पड़ेगा.

उस दिन के बाद से रवि ने न तो माया से बात की और न ही मिला. माया ने सपने में भी नहीं सोचा था कि रवि उसे धोखा देगा और किसी दूसरी लड़की से शादी रचा लेगा. उस की बेवफाई से माया घायल नागिन सी बन गई. उस के सीने में बदले की आग धधकने लगी. यह मई 2018 की बात थी.

माया रवि से बदला लेने के लिए भले ही घायल नागिन बन गई थी, लेकिन उस की जुदाई में उस से कहीं ज्यादा तड़प रही थी. रवि भी माया से मिलने के लिए विरह की आग में जल रहा था. अंतत: उस से रहा नहीं गया और एक महीने बाद वह माया के पास लौट आया. सारे गिलेशिकवे भुला कर माया ने उसे प्यार के आंचल में छिपा लिया ताकि उन के प्यार को जमाने की नजर न लग जाए.

रवि ने माया से कहा कि मांबाप की खुशी के लिए वह सुलेखा से शादी तो जरूर करेगा, लेकिन उसे कभी पत्नी का दर्जा नहीं देगा और मौका मिलते ही उसे सदा के लिए अपने रास्ते से हटा देगा. रवि की बात पर माया ने सहमति जता दी. रवि की शादी के बाद सुलेखा को रास्ते से हटाने के लिए माया शादी से पहले ही योजना बनाने में जुट गई.

बहरहाल, वह दिन भी आ गया जिस का रवि और माया को इंतजार था. 15 जुलाई, 2018 को रवि की शादी सुलेखा के साथ हो गई. सुलेखा मायके से विदा हो कर ससुराल आ गई.

दूसरी ओर माया का आनाजाना बंद हो जाने से ईर्ष्या की आग में जल रही थी. रवि भले ही माया के पास नहीं जा रहा था, लेकिन फोन से दोनों की अकसर बातें हो जाती थीं. माया उसे बारबार उस का वादा याद दिलाती रहती थी. रवि उस से कह देता था कि जल्द ही अपना वादा पूरा करेगा.

शादी के 4-5 दिन बाद रवि के घर से सब मेहमान चले गए. घर पूरी तरह खाली हो गया. 21 जुलाई, 2018 की दोपहर रवि चुपके से माया से मिलने उस के घर जा पहुंचा. उस वक्त घर में माया के अलावा कोई नहीं था. उस के तीनों बच्चे स्कूल गए हुए थे.

पहले तो दोनों ने मौके का भरपूर फायदा उठाया. फिर रवि और माया अपनी पहले से तैयार योजना पर बात की. रवि ने माया से कहा कि आज रात सुलेखा को हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाएगा. मेरे फोन का इंतजार करना. जैसे ही मैं फोन करूं, धारदार हथियार ले कर मेरे घर आ जाना. घर का दरवाजा खुला रहेगा.

रात 10 बजे के करीब सुलेखा पति, सास, ससुर और देवरों को खाना खिला कर पति के साथ पहली मंजिल पर सोने चली गई. उसे क्या पता था कि आज की रात उस पर भारी पड़ने वाली है. खैर, पतिपत्नी बातें करतेकरते कब सो गए, पता ही नहीं चला.

रात 1 बजे के करीब रवि की आंखें खुल गईं. उस ने देखा, सुलेखा गहरी नींद में सो रही थी. रवि मोबाइल लेकर आहिस्ता से बिस्तर से नीचे उतरा और दरवाजा खोल कर बाहर चला गया. तभी सुलेखा की आंखें खुल गईं. उस ने पति से इतनी रात गए बाहर जाने के बारे में पूछा तो रवि ने कहा कि बाथरूम जाना है, अभी आता हूं.

रवि घर से बाहर निकल आया और फोन कर के माया को बता दिया कि रास्ता साफ है, आ जाओ. थोड़ी देर बाद रवि बाहर से लौट आया और फिर सोने का नाटक करने लगा. करीब 30 मिनट बाद माया 2 महिलाओं के साथ रवि के घर पहुंच गई.

माया इन महिलाओं को सुरक्षा के लिए लाई थी. उन्हें उस ने बाहर ही रोक दिया था. माया स्वयं चुपके से सीढि़यों के सहारे रवि के कमरे में दाखिल हो गई. उसे रवि के घर का कोनाकोना पता था.

सुलेखा रवि के बगल में सोई हुई थी. माया ने साथ लाए धारदार ब्लेड से सुलेखा के गले, चेहरे और आंख पर वार किए. साथ ही उस का गला दबाने का भी प्रयास किया. अचानक हुए हमले से सुलेखा के मुंह से दर्दनाक चीख निकल गई.

पत्नी की चीख सुन कर सोने का बहाना कर रहा रवि उठ बैठा. तब तक नीचे से रवि के दोनों भाई विक्की और शुक्कर ऊपर कमरे में पहुंच गए. विक्की और शुक्कर को देख माया डर गई, क्योंकि रवि का पूरा गेम ही उलटा पड़ गया था.

जैसे ही माया वहां से भागी, विक्की और शुक्कर ने उसे दौड़ा कर पकड़ लिया और उसे मारनेपीटने लगे. किसी को शक न हो, सोच कर रवि भी भाइयों के साथ जा मिला और मौका देख कर माया को लातथप्पड़ मारने लगा.

माया के गिरफ्तार हो जाने के बाद उस से महिला थाने में एसओ विमला ने पूछताछ की. माया ने सुलेखा की हत्या की योजना का खुलासा कर दिया कि कैसे उस ने अपने प्रेमी रवि के साथ मिल कर सुलेखा की हत्या की योजना बनाई थी. उस के बयान पर पुलिस ने उस के प्रेमी और सुलेखा के पति रवि को पत्नी की हत्या की कोशिश करने का मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तार कर लिया.

कथा लिखे जाने तक दोनों प्रेमीप्रेमिका रवि राउत और माया जेल में बंद थे. बेटे की करतूत पर मांबाप को काफी दुख पहुंचा. स्वस्थ हो चुकी सुलेखा ससुराल से मायके लौट गई. उस रात माया के साथ आई 2 महिलाओं का पता नहीं चल सका.  ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मोहब्बत के खूनी अंत की हैरतअंगेज कहानी

मध्य प्रदेश के इंदौर के थाना चंदननगर के रहने वाले 21 साल के सलमान शेख के अचानक लापता हो जाने से उस के घर वाले काफी परेशान थे. वह फैब्रिकेशन का काम करता था. घर से काम के लिए निकला सलमान घर नहीं लौटा तो 9 जनवरी, 2017 को उस के बड़े भाई तौकीर शेख ने थाना चंदननगर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. गुमशुदगी दर्ज कराते समय उस ने अपने घर के सामने रहने वाले रऊफ खान और उस के ड्राइवर सद्दाम पर भाई के गायब करने का शक जाहिर किया था.

रऊफ खान बड़ीबड़ी बिल्डिंगों की मरम्मत एवं रंगाईपोताई का ठेका लेता था. उस के यहां पचासों मजदूर काम करते थे. सलमान भी पहले उस के यहां नौकरी करता था. लेकिन साल भर पहले उस ने सलमान को अपने यहां से नौकरी से निकाल दिया था.

रऊफ खान संपन्न आदमी था. वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका था. उस की पहुंच भी ऊंची थी, इसलिए बिना किसी ठोस सबूत के पुलिस उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी.

पुलिस ने लापता सलमान शेख के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि सलमान की सब से ज्यादा और लंबीलंबी बातें रऊफ की पत्नी शबनम से हुई थीं. रऊफ के नौकरी से निकाल देने के बाद भी उस की शबनम से बातें होती रही थीं. इन बातों से थाना चंदननगर पुलिस को लगा कि शायद इसी वजह से सलमान के घर वाले रऊफ खान पर शक जाहिर कर रहे थे.

उन्होंने सलमान के भाई तौकीर से रऊफ और उस के रिश्तेदारों के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस के कई नजदीकी रिश्तेदार धार जिले के धरमपुरी में रहते हैं. तौकीर की इस बात पर उन्हें 5 दिनों पहले धरमपुरी में मिली लाश की बात याद आ गई.

दरअसल, 10 जनवरी, 2017 को धार जिला के थाना धरमपुरी के थानाप्रभारी के.एस. साहू को फोन द्वारा बेंट संस्थान के जंगल में लाश पड़ी होने की खबर मिली थी. अधिकारियों को सूचना दे कर वह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. वहां एक लाश पड़ी थी, जिस का सिर काफी क्षतविक्षत था. शायद जंगली जानवरों ने उसे नोचखसोट डाला था. उस का गुप्तांग भी कटा हुआ था. लाश की स्थिति देख कर थानाप्रभारी को लगा कि यह हत्या प्रेमप्रसंग में की गई है. क्योंकि प्रेमप्रसंग में अकसर इसी तरह हत्याएं की जाती हैं.

पुलिस ने लाश की शिनाख्त के लिए जब मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट की जेब से एक पर्स मिला, जिस में एक लड़के और लड़की की तसवीर के अलावा हिसाब की एक डायरी और तंबाकू की एक पुडि़या मिली. उस में कुछ ऐसा नहीं था, जिस से मृतक की पहचान हो सकती.

मृतक के गले में तुलसी की एक माला पड़ी थी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि लाश किसी हिंदू की है. लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो के.एस. साहू ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद लाश की शिनाख्त के लिए इस की जानकारी अपने जिले में ही नहीं, आसपास के जिलों में भी दे दी थी. उसी जानकारी के आधार पर थाना चंदननगर के थानाप्रभारी को जब पता चला कि रऊफ की रिश्तेदारी धरमपुरी में है तो उन्हें लगा था कि वह लाश सलमान शेख की हो सकती है.

उन्होंने तत्काल लापता सलमान शेख के घर वालों को थाना धरमपुरी जाने की सलाह दी. तौकीर पिता के साथ थाने पहुंचा तो पता चला कि लाश तो दफना दी गई है. थानाप्रभारी के.एस. साहू ने लाश के सामान को दिखाया तो उन्होंने उस में रखी एक अंगूठी देख कर कहा कि वह लाश सलमान शेख की थी, पर यह तुलसी की माला उन का बेटा क्यों पहनेगा?

के.एस. साहू तुरंत समझ गए कि हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए उसे तुलसी की माला पहना कर उस का गुप्तांग काट दिया था. पुलिस को भ्रमित करने के लिए ही हत्यारों ने जेब में लड़की और लड़के की फोटो भी रखी थी. हत्यारों ने गलती यह की थी कि वे सलमान शेख की अंगूठी निकालना भूल गए थे. अंगूठी से ही उस की लाश की पहचान हो गई थी.

लाश की पहचान होने के बाद अगले दिन उपजिलाधिकारी के आदेश पर सलमान शेख का शव निकलवा कर उस के घर वालों को सौंप दिया गया था. घर वालों ने सलमान की लाश ला कर इंदौर के एक कब्रिस्तान में दफना दिया था. सलमान की लाश मिलने की सूचना पा कर उस के परिचितों और दोस्तों ने थाना चंदननगर में धरना दे कर हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग की थी.

एक ओर जहां मृतक सलमान शेख के घर वालों और परिचितों ने पुलिस पर हत्यारों को गिरफ्तार करने का दबाव बना रखा था, वहीं मुखबिर से मिली जानकारी ने थानाप्रभारी को चौंका दिया था. मुखबिर ने बताया था कि सलमान को आखिरी बार रऊफ खान के ड्राइवर सद्दाम के साथ देखा गया था.

इस के बाद थाना चंदननगर पुलिस ने शबनम और सद्दाम को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन दोनों ही कुछ भी बताने को तैयार नहीं थे. चूंकि पुलिस के पास दोनों के खिलाफ ठोस सबूत थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से थोड़ी सख्ती की और उन्हें काल डिटेल्स दिखाई तो दोनों ने ही असलियत उगल दी.

सद्दाम ने स्वीकार कर लिया कि शबनम भाभी से सलमान शेख के संबंध थे, जिस से नाराज हो कर रऊफ खान ने सलमान की हत्या की योजना बनाई थी. इस योजना में उस के अलावा रऊफ के भतीजे गोलू उर्फ जफर और जावेद भी शामिल थे.

इस के बाद उस ने सलमान शेख की हत्या की जो कहानी सुनाई, उस के अनुसार थाना चंदननगर पुलिस ने जावेद, रऊफ खान, गोलू उर्फ जफर के अलावा थाना धरमपुरी पुलिस की मदद से धरमपुरी के रहने वाले रऊफ के एक रिश्तेदार को भी गिरफ्तार किया था. बाद में इन सब को भी थाना धरमपुरी पुलिस को सौंप दिया गया था, जहां इन सब से की गई पूछताछ में सलमान की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इंदौर के थाना चंदननगर में रहने वाला 21 साल का सलमान अब्दुल लतीफ शेख का बेटा था. उस के घर के सामने ही रऊफ खान का घर था, जो बिल्डिंगों की मरम्मत और पुताई का ठेका लेता था. इस के लिए उस के पास तमाम मजदूर काम करते थे. सलमान पढ़लिख कर कमाने लायक हुआ तो अब्दुल लतीफ शेख के कहने पर रऊफ खान ने उसे भी अपने यहां काम पर रख लिया था.

सलमान रऊफ का पड़ोसी था ही, इसलिए उस का रऊफ के घर पहले से ही आनाजाना था. लेकिन जब वह उस के यहां काम करने लगा तो उस का आनाजाना कुछ ज्यादा ही हो गया. जिस की वजह से रऊफ की पत्नी शबनम से उस की कुछ ज्यादा ही पटने लगी. उन का रिश्ता भी कुछ ऐसा था. सलमान शबनम को भाभी कहता था, इसलिए खुल कर हंसीमजाक होता था.

रऊफ खान का काम बड़ा था, इसलिए उस का दिन भागदौड़ में ही बीत जाता था. चूंकि सलमान पड़ोसी था, इसलिए घर के कामों के लिए वह ज्यादातर उसे ही भेजता था. घर के कामों के साथसाथ सलमान शबनम के छोटेमोटे निजी काम भी कर दिया करता था. शबनम खूबसूरत भी थी और उम्र में भी रऊफ खान से छोटी थी. सलमान उस के हमउम्र था. इसी आनेजाने में ही युवा सलमान की नजरें शबनम के गदराए यौवन पर जम गईं. फिर तो जब भी उसे मौका मिलता, वह शबनम से ऐसा मजाक करता कि वह शरम से लाल हो उठती. औरतों को मर्दों की नजरें पहचानने में देर नहीं लगती. शबनम ने भी सलमान की नजरों से उस का इरादा भांप लिया.

पहले तो शबनम ने उस की नजरों से बचने की कोशिश की, लेकिन खुद से भी कमउम्र के आशिक की दीवानगी ने उसे बचने नहीं दिया, उस की दीवानगी उसे अच्छी लगने लगी तो वह उस के सामने अपने छिपे अंगों को इस तरह दिखाने लगी, जैसे सलमान जो देख रहा है, उस से वह अंजान है.

सलमान ने जो कुछ अब तक नहीं देखा था, शबनम से वह देखने को मिला तो वह ज्यादा से ज्यादा उस के करीब रहने की कोशिश करने लगा. सलमान की चाहत की आग में शबनम कुछ ज्यादा ही पिघलने लगी और धीरेधीरे खुद ही उस की होती चली गई. उस बीच रऊफ खान विधानसभा का चुनाव लड़ रहा था. इसलिए वह चुनाव में इस कदर व्यस्त हो गया कि न उसे काम का खयाल रहा और न पत्नीबच्चों का.

उस ने सभी कर्मचारियों को चुनाव प्रचार में लगा रखा था. ऐसे में उस ने सलमान को घर के कामों की जिम्मेदारी सौंप दी थी. इस बीच उस ने रातदिन शबनम भाभी की सेवा की. उस सेवा के फलस्वरूप एक दिन सलमान ने उसे बांहों में भर लिया. शबनम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम तो बड़े दिलेर निकले, तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. मुझे बांहों में भरते हुए तुम्हें डर नहीं लगा. तुम्हारे भाईजान ने देख लिया तो सीधे सूली पर चढ़ा देंगे.’’

‘‘भाभीजान, मैं ने तुम से मोहब्बत की है. मोहब्बत करने वाले किसी से नहीं डरते.’’

‘‘तुम भाईजान के गुस्से को तो जानते ही हो, एक ही बार में सारा इश्क उतार देंगे.’’

‘‘भाभीजान, क्यों मोहब्बत के मूड को बिगाड़ रही हो.’’

‘‘मैं तो मजाक कर रही थी.’’ शबनम ने कहा और सलमान से लिपट गई. इस के बाद दोनों तभी अलग हुए, जब उन के तनमन की आग ठंडी हो गई. इस के बाद दोनों को जब भी मौका मिलता, तन की आग के दरिया में डूब कर आपस में सुख बांट लेते.

सलमान को अब शबनम की जुदाई पल भर के लिए भी बरदाश्त नहीं होती थी. वह चाहता कि शबनम हमेशा उस की आंखों के सामने रहे. लेकिन यह संभव नहीं था. फिर भी वह हर पल उसी की यादों में खोया रहता और उस से मिलने का मौका ढूंढता रहता. अकसर वह दोपहर में काम छोड़ कर शबनम से मिलने उस के घर पहुंच जाता.

सलमान के इस तरह काम छोड़ कर जाने से रऊफ को उस पर शक हुआ तो उस ने कर्मचारियों से उस के बारे में पूछा. पता चला कि सलमान उस की पत्नी से फोन पर घंटों बातें करता है, अकसर दोपहर में उसी से मिलने भी जाता है. रऊफ ने जब इस बात पर ध्यान दिया तो पता चला कि सलमान और शबनम के बीच कुछ चल रहा है. इस के बाद वह दोनों पर नजर रखने लगा. आखिर एक दिन उस ने सलमान को पत्नी से फोन पर बातें करते पकड़ लिया तो उस ने सलमान की पिटाई कर के काम से निकाल दिया.

सलमान को इस से कोई फर्क नहीं पड़ा. वह रऊफ के घर के ठीक सामने ही रहता था. मौका निकाल कर वह शबनम से मिल ही लेता था. फोन पर उन की बातें होती ही रहती थीं. जब रऊफ को पता चला कि अब भी सलमान और शबनम मिलते हैं तो उसे डर सताने लगा कि अगर शबनम सलमान के साथ भाग गई तो समाज में वह मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा, क्योंकि एक तरह से सलमान उस का नौकर था. उस के पास पैसा था और ऊंची राजनीतिक पहुंच भी. इसलिए उस ने सलमान को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

रऊफ ने सलमान को इंदौर से करीब 150 किलोमीटर दूर ले जा कर धार जिले के धरमपुरी इलाके के जंगल में हत्या करने की योजना बनाई, ताकि पुलिस किसी कीमत पर उस की लाश को न पा सके. अपनी इस योजना में उस ने अपने ड्राइवर सद्दाम, भतीजे गोलू उर्फ जफर और जावेद को शामिल किया.

योजना तो बन गई, लेकिन अब सलमान को धरमपुरी के जंगल तक ले कैसे जाया जाए, इस पर विचार किया गया. वह आसानी से जाने वाला नहीं था. आखिर एक तरकीब निकाली गई और इस काम के लिए ड्राइवर सद्दाम को तैयार किया गया. उस ने सद्दाम से कहा कि वह सलमान को शबनम से मिलाने के बहाने धरमपुरी के जंगल तक ले चले.

योजना के अनुसार, 8 जनवरी, 2017 को सद्दाम सलमान से मिला. सद्दाम ने उस से शबनम से मिलाने की बात कही तो वह फौरन तैयार हो गया. क्योंकि पिछले कई सप्ताह से वह शबनम से मिल नहीं पाया था. सद्दाम सलमान को अपने साथ ले कर चला तो कई लोगों ने सलमान को उस के साथ जाते देख लिया था. धरमपुरी के जंगल में पहुंच कर सलमान ने शबनम के बजाए गोलू, जावेद और रऊफ खान को देखा तो समझ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है.

वह कुछ कहता या भाग पाता, उस से पहले ही सभी ने उसे पकड़ लिया और उस की पिटाई शुरू कर दी. पिटाई करने के बाद उस के गले में रस्सी डाल कर कस दिया तो उस की मौत हो गई. इस के बाद पहचान छिपाने के लिए उस का चेहरा ईंट से कुचल दिया गया. उस के कपड़े उतार कर गुप्तांग काट दिया गया, ताकि उस के धर्म का पता न चल सके.

गले में तुलसी की माला डाल कर उस की पैंट की जेब में एक लड़के और लड़की की फोटो भी डाल दी. उन्होंने पुलिस को गुमराह करने के लिए किया तो बहुत कुछ, लेकिन उन का अपराध छिप न सका और वे पकडे़ गए.

सलमान की हत्या करने के बाद रऊफ ने गोलू और सद्दाम को रात में ही इंदौर भेज दिया था, जबकि खुद जावेद के साथ अपनी बहन के यहां धरमपुरी में रुक गया था, ताकि किसी को शंका न हो. वह अगले दिन इंदौर आ गया और अपने काम में लग गया.

रऊफ और उस के साथियों को पूरा भरोसा था कि पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन पुलिस उन तक पहुंच ही गई. इस तरह उन की उम्मीदों पर पानी फिर गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक शबनम, रऊफ खान, सद्दाम, जावेद और गोलू जेल में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित