दरवाजे के पार-भाग 4 : क्यों किया अपनों ने वार

मांभाइयों के कड़े प्रतिबंध के कारण सोना का आशीष से मिलन बंद हो गया. इस से सोना और आशीष परेशान हो उठे. दोनों मिलन के लिए बेचैन रहने लगे.

इधर मुन्नालाल की खोज भीमसागर पर समाप्त हुई. भीमसागर का पिता रामसागर दादानगर फैक्ट्री एरिया के मिश्रीलाल चौराहे के निकट रहता था. नहर की पटरी के किनारे उस का मकान था. रामसागर लकड़ी बेचने का काम करता था. उस का बेटा भीमसागर भी उस के काम में मदद करता था.

मुन्नालाल ने भीमसागर को देखा तो उसे सोना के लिए पसंद कर लिया. हालांकि सोना ने शादी से इनकार किया, लेकिन मुन्नालाल ने उस की एक नहीं सुनी. अंतत: सन 2017 के जनवरी महीने की 10 तारीख को सोना का विवाह भीमसागर के साथ कर दिया गया.

भीमसागर की दुलहन बन कर सोना ससुराल पहुंची तो सभी ने उसे हाथोंहाथ लिया. सुंदर पत्नी पा कर भीमसागर भी खुश था, वहीं उस के मातापिता भी बहू की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. सब खुश थे, लेकिन सोना खुश नहीं नहीं थी.

सुहागरात को भी वह बेमन से पति को समर्पित हुई. भीमसागर तो तृप्त हो कर सो गया, पर सोना गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही. न तो उस के जिस्म की प्यास बुझी थी, न रूह की.

उस रात के बाद हर रात मिलन की रस्म निभाई जाने लगी. चूंकि सोना इनकार नहीं कर सकती थी, सो अरुचि से पति की इच्छा पूरी करती रही.

घर वालों की जबरदस्ती के चलते सोना ने विवाह जरूर कर लिया था, पर वह मन से भीमसागर को पति नहीं मान सकी थी. अंतरंग क्षणों में वह केवल तन से पति के साथ होती थी, उस का प्यासा मन प्रेमी में भटक रहा होता था.

3-4 महीने तक सोना ने जैसेतैसे पति से निभाया, उस के बाद दोनों के बीच कलह होने लगी. कलह का पहला कारण सोना का एकांत में मोबाइल फोन पर बातें करना था. भीमसागर को शक हुआ कि सोना का शादी से पहले कोई यार था, जिस से वह चोरीछिपे एकांत में बातें करती है.

दूसरा कारण उस की फैशनपरस्ती तथा घर से बाहर जाना था. भीमसागर के मातापिता चाहते थे कि बहू मर्यादा में रहे और घर के बाहर कदम न रखे. लेकिन सोना को घर की चारदीवारी में रहना पसंद नहीं था. वह स्वच्छंद हो कर घूमती थी. इन्हीं 2 बातों को ले कर सोना का भीमसागर और ससुराल के लोगों से झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साल बीततेबीतते सोना ससुराल छोड़ कर मायके आ कर रहने लगी. गीता ने सोना को बहुत समझाया और ससुराल भेजने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं मानी. 6 महीने तक सोना घर में रही, उस के बाद उस ने गोविंद नगर स्थित एक स्कूल में आया की नौकरी कर ली. वह सुबह 8 बजे घर से निकलती, फिर शाम 5 बजे तक वापस आती. इस तरह वह मांबाप पर बोझ न बन कर खुद अपना भार उठाने लगी.

एक शाम सोना स्कूल से लौट रही थी कि दादानगर चौराहे पर उस की मुलाकात आशीष से हो गई. बिछड़े प्रेमी मिले तो दोनों खुश हुए. आशीष उसे नजदीक के एक रेस्तरां में ले गया, जहां दोनों ने एकदूसरे को अपनी व्यथाकथा सुनाई. बातोंबातों में आशीष उदास हो कर बोला, ‘‘अरमान मैं ने सजाए और तुम ने घर किसी और का बसा दिया.’’

सोना के मुंह से आह सी निकली, ‘‘हालात की मजबूरी इसी को कहते हैं. घर वालों ने मेरी मरजी के बिना शादी कर दी. मैं ने मन से उसे कभी पति नहीं माना. साल बीतते उस से मेरा मनमुटाव हो गया और मैं उसे छोड़ कर मायके आ गई.’’ आशीष मन ही मन खुश हुआ. फिर बोला, ‘‘क्या अब भी तुम मुझे पहले जैसा प्यार करती हो?’’

‘‘यह भी कोई पूछने की बात है. सच तो यह है कि मैं तुम्हें कभी भुला ही नहीं पाई. सुहागरात को भी तुम्हारी ही याद आती रही.’’ इस के बाद सोना और आशीष का फिर मिलन होने लगा. दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता भी बन गया. आशीष कभीकभी सोना के घर भी जाने लगा. गीता को आशीष का घर आना अच्छा तो नहीं लगता था, पर उसे मना भी नहीं कर पाती थी. हालांकि गीता निश्चिंत थी कि सोना की शादी हो गई है. अब आशीष जूठे बरतन में मुंह नहीं मारेगा. पर यह उस की भूल थी.

सोना के कहने पर आशीष ने अगस्त, 2019 में दबौली (उत्तरी) में किराए पर एक कमरा ले लिया. कमरा पसंद करने सोना भी आशीष के साथ गई थी.

उस ने मकान मालकिन को बताया कि सोना उस की पत्नी है. मकान में अन्य किराएदार थे, उन को भी आशीष ने सोना को अपनी पत्नी बताया था.

सोना अब इस कमरे पर आशीष से मिलने आने लगी. सोना के आते ही दरवाजा बंद हो जाता और शारीरिक मिलन के बाद ही खुलता. किसी को ऐतराज इसलिए नहीं होता था, क्योंकि उन की नजर में सोना उस की पत्नी थी.

आशीष के रूम में आतेजाते सोना को एक रोज एक फोटो हाथ लग गई, जिस में वह एक युवती और एक मासूम बच्चे के साथ था. इस युवती और बच्चे के संबंध में सोना ने आशीष से पूछा तो वह बगलें झांकने लगा. अंतत: उसे बताना ही पड़ा कि वह शादीशुदा है और तसवीर में उस की पत्नी व बच्चा है.

लेकिन मनमुटाव के चलते पत्नी घाटमपुर स्थित अपने मायके में रह रही है. यह पता चलने के बाद सोना का आशीष से झगड़ा हुआ. लेकिन आशीष ने किसी तरह सोना को मना लिया.

आशीष को लगा कि सच्चाई जानने के बाद सोना कहीं उस का साथ न छोड़ दे. इसलिए वह उस पर दबाव डालने लगा कि वह अपने पति को तलाक दे कर उस से शादी कर ले. लेकिन सोना ने यह कह कर मना कर दिया कि पहले तुम अपनी पत्नी को तलाक दो. तभी मैं अपने पति से तलाक लूंगी. इस के बाद तलाक को ले कर दोनों में अकसर झगड़ा होने लगा. 17 मार्च की दोपहर 12 बजे सोना दबौली स्थित आशीष के रूम पर पहुंची. आशीष ने उसे फोन कर के बुलाया था. सोना के आते ही आशीष ने रूम बंद कर लिया फिर दोनों में बातचीत होने लगी.

बातचीत के दौरान आशीष ने सोना से कहा कि वह अपने पति से तलाक ले कर उस से शादी कर ले, पर सोना इस के लिए राजी नहीं हुई. उलटे पलटवार करते हुए वह बोली, ‘‘पहले तुम अपनी पत्नी से तलाक क्यों नहीं लेते, एक म्यान में 2 तलवारें कैसे रहेंगी?’’

तलाक को ले कर दोनों में गरमागरम बहस होने लगी. बहस के बीच आशीष ने प्रणय निवेदन किया, जिसे सोना ने ठुकरा दिया. इस पर आशीष जबरदस्ती पर उतर आया और सोना के कपड़े खींच कर उसे अर्धनग्न कर दिया. सोना भी बचाव में भिड़ गई.

तलाक लेने से इनकार करने और शारीरिक संबंध न बन पाने से आशीष का गुस्सा आसमान पर जा पहुंचा. उस ने सामने अलमारी में रखी कैंची उठाई और सोना के पेट में घोंप दी.

सोना पेट पकड़ कर फर्श पर तड़पने लगी. उसी समय आशिष ने सोना के गले को कैंची से छेद डाला. सोना पेट पकड़ कर तड़पने लगी. उसी समय उस ने सोना के गले को कैंची से छेद डाला. कुछ देर बाद सोना ने दम तोड़ दिया.

सोना की हत्या करने के बाद आशीष ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद की और मकान के बाहर आ गया. बाहर आ कर उस ने सोना की भाभी ज्योति को सोना की हत्या की जानकारी दी, फिर फरार हो गया.

इस घटना का भेद तब खुला, जब मकान मालकिन पुष्पा पहली मंजिल पर स्थित आशीष के कमरे पर पहुंची. पुष्पा ने इस घटना की सूचना थाना गोविंद नगर को दे दी. जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या की बात सामने आई. 20 मार्च, 2020 को थाना गोविंद नगर पुलिस ने अभियुक्त आशीष सिंह को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट ए.के. सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दरवाजे के पार-भाग 3 : क्यों किया अपनों ने वार

वह ससुराल छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी. उस के बाद दोनों के बीच फिर से अवैध संबंध बन गए. सोना के कहने पर ही उस ने किराए का कमरा लिया था, जहां दोनों का शारीरिक मिलन होता था.

आशीष ने बताया कि घटना वाले दिन सोना 12 बजे आई थी. आशीष ने उस से कहा कि वह पति को तलाक दे कर उस से शादी कर ले. लेकिन वह नहीं मानी. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ. झगड़े के बीच आशीष ने यह सोच कर प्रणय निवेदन किया कि यौन प्रक्रिया में गुस्सा शांत हो जाता है, लेकिन सोना ने उसे दुत्कार दिया.

शादी की बात न मानने और प्रणय निवेदन ठुकराने की वजह से आशीष को गुस्सा आ गया और उस ने पास रखी कैंची उठा कर सोना के पेट में घोंप दी. फिर उसी कैंची से उस का गला भी छेद डाला. हत्या करने

के बाद वह फरार हो गया था. चूंकि आशीष सिंह ने सोना की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और पुलिस आला ए कत्ल भी बरामद कर चुकी थी, इसलिए थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने अजय ठाकुर उर्फ आशीष सिंह को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

कानपुर महानगर के पनकी थाना क्षेत्र में एक मोहल्ला है सराय मीता. मुन्नालाल सोनकर अपने परिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहता था. मुन्नालाल सोनकर नगर निगम में सफाई कर्मचारी था. उसे जो वेतन मिलता था, उसी से परिवार का भरणपोषण होता था.

मुन्नालाल अपनी बड़ी बेटी बरखा की शादी कर चुका था. बरखा से छोटी सोना 18 साल की हो गई थी. वह चंचल स्वभाव की थी. पढ़ाईलिखाई में मन लगाने के बजाए वह सजनेसंवरने पर ज्यादा ध्यान देती थी. नईनई फिल्में देखना, सैरसपाटा करना और आधुनिक फैशन के कपड़े खरीदना उस का शौक था. मुन्नालाल सीधासादा आदमी था. रहनसहन भी साधारण था. वह बेटी की फैशनपरस्ती से परेशान था.

सोना अपनी मां गीता के साथ दादानगर स्थित एक लोहा फैक्ट्री में काम करती थी. वहां से उसे जो वेतन मिलता था, उसे वह अपने फैशन पर खर्च करती थी. जिद्दी स्वभाव की सोना को बाजार में जो कपड़ा या अन्य सामान पसंद आ जाता, वह उसे खरीद कर ले आती. मातापिता रोकतेटोकते तो वह टका सा जवाब दे देती, ‘‘मैं ने सामान अपने पैसे से खरीदा है. फिर ऐतराज क्यों?’’

उस के इस जवाब से सब चुप हो जाते थे. सोना की अपनी भाभी ज्योति से खूब पटरी बैठती थी.

सोना दादानगर स्थित जिस लोहा फैक्ट्री में काम करती थी, आशीष सिंह उसी में सुपरवाइजर था. वह मूलरूप से जिला कानपुर के देहात क्षेत्र के कस्बा गजनेर का रहने वाला था. उस का घरेलू नाम अजय था. लोग उसे अजय ठाकुर कहते थे. उस के पिता गांव में किसानी करते थे. सोना लोहा फैक्ट्री में पैकिंग का काम करती थी.

निरीक्षण के दौरान एक रोज आशीष सिंह की निगाह खूबसूरत सोना पर पड़ी. दोनों की नजरें मिलीं तो दोनों कुछ देर तक आकर्षण में खोए रहे. जब आकर्षण टूटा तो सोना मुसकरा दी और नजरें झुका कर पैकिंग में जुट गई. नजरें मिलने का सुखद अहसास दोनों को हुआ.

अगले दिन सोना कुछ ज्यादा ही बनसंवर कर आई. आशीष उस के पास पहुंचा और इशारे से उसे अपने औफिस के कमरे में आने को कहा. वह उस के औफिस में आई तो आशीष ने उस से कुछ कहा, जिसे सुन कर सोना सकपका गई. वह यह कह कर वहां से चली गई कि कोई देख लेगा. सोना की ओर से हरी झंडी मिली तो आशीष बहुत खुश हुआ.

आशीष सिंह पढ़ालिखा हृष्टपुष्ट युवक था. वह अच्छाखासा कमा भी रहा था. लेकिन वह शादीशुदा और एक बच्चे का बाप था. उस की पत्नी से नहीं बनी तो वह घाटमपुर स्थित अपने मायके में रहने लगी थी. आशीष सिंह ने सोना से यह बात छिपा ली थी. उस ने उसे खुद को कुंवारा बताया था.

सोना सजीले युवक आशीष से मन ही मन प्यार करने लगी और मां से नजरें बचा कर आशीष से फैक्ट्री के बाहर एकांत में मिलने लगी. दोनों के बीच प्यार भरी बातें होने लगीं. धीरेधीरे आशीष सोना का दीवाना हो गया. सोना भी उसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी.

प्यार परवान चढ़ा तो देह की प्यास जाग उठी. एक रोज आशीष सोना को अपने दादानगर वाले कमरे पर ले गया, जहां वह किराए पर रहता था. सोना जैसे ही कमरे में पहुंची, आशीष ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. आशीष के स्पर्श से सोना को बहकते देर नहीं लगी. आशीष जो कर रहा था, सोना को उस की अरसे से तमन्ना थी. इसलिए वह भी आशीष का सहयोग करने लगी.

कुछ देर बाद आशीष और सोना अलग हुए तो बहुत खुश थे. इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. जब भी मन होता, शारीरिक संबंध बना लेते. आशीष कमरे में अकेला रहता था, जिस से दोनों आसानी से मिल लेते थे. लेकिन कहते हैं कि प्यार चाहे जितना चोरीछिपे किया जाए, एक न एक दिन उस का भेद खुल ही जाता है.

एक शाम सोना और गीता एक साथ फैक्ट्री से निकली तो कुछ दूर चल कर सोना बोली, ‘‘मां, मुझे गोविंद नगर बाजार से कुछ सामान लेना है. तुम घर चलो, मैं आ जाऊंगी.’’

गीता ने कुछ नहीं कहा. लेकिन उसे सोना पर संदेह हुआ. इसलिए उस ने सोना का गुप्तरूप से पीछा किया और उसे आशीष के साथ रंगेहाथ पकड़ लिया.

गीता ने सोना को फटकारा और भलाबुरा कहा. साथ ही प्रेम से सिर पर हाथ रख कर समझाया भी, ‘‘बेटी, आशीष ठाकुर जाति का है और तुम दलित की बेटी हो. आशीष के घर वाले दलित की बेटी को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. इसलिए मेरी बात मानो और आशीष का साथ छोड़ दो, इसी में हम सब की भलाई है.’’

गीता का पति मुन्नालाल सफाईकर्मी था और शराब पीने का आदी. स्वभाव से वह गुस्सैल था. इसलिए गीता ने सोना की असलियत उसे नहीं बताई. इस के बजाए उस ने पति पर सोना का विवाह जल्द से जल्द करने का दबाव बनाया. इसी के साथ गीता ने सोना का फैक्ट्री जाना भी बंद करा दिया और उस पर कड़ी नजर रखने लगी. उस ने अपनी बहू ज्योति तथा बेटों को भी सतर्क कर दिया था कि वह जहां भी जाए, उस के साथ कोई न कोई रहे.

इश्क, ईश्वर और राधा

साधारण परिवार में पलीबढ़ी राधा को न सिर्फ अपने परिवेश से नफरत थी, बल्कि गरीबी को भी वह अभिशाप समझती थी. लिहाजा होश संभालने के बाद से ही उस ने खुद को सतरंगी सपनों में डुबो दिया था. वह सपनों में जीने की कुछ यूं अभ्यस्त हुई कि गुजरते वक्त के साथ उस ने हकीकत को सिरे से नकार दिया.

हकीकत क्या है, वह जानना ही नहीं चाहती थी. मगर बेटी की बढ़ती उम्र के साथसाथ पिता श्रीकृष्ण की चिंताएं भी बढ़ती जा रही थीं.

राधा के पिता श्रीकृष्ण कन्नौज के तालग्राम थानाक्षेत्र के अमोलर गांव में रहते थे. वह मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे अपने परिवार का गुजारा कर रहे थे. परिवार में पत्नी गीता के अलावा 3 बेटियां थीं, पुष्पा, सुषमा और राधा. पुष्पा और सुषमा का उन्होंने विवाह कर दिया था. अब केवल राधा बची थी.

राधा अभी किशोरावस्था में ही थी, जब उस के पिता श्रीकृष्ण ने उस के लिए रिश्ता ढूंढना शुरू कर दिया था. वह बेटी के हाथ पीले कर के अपने फर्ज से मुक्ति पा लेना चाहते थे.

राधा अब तक यौवन की दहलीज पार कर चुकी थी. गेहुंआ रंग, छरहरी काया और बड़ीबड़ी आंखें उस का आकर्षण बढ़ाती थीं. कुल मिला कर वह आकर्षक युवती थी. उस के यौवन की चमकदमक से गांव के लड़कों की भी आंखें चुंधियाने लगी थीं. वे राधा के आगेपीछे मंडराने लगे थे. यह देख कर राधा मन ही मन खुश होती थी. लेकिन वह किसी को भी घास नहीं डालती थी.

आखिरकार उस के पिता ने अपनी कोशिशों के बूते पर उस के लिए एक लड़का तलाश कर लिया. उस का नाम ईश्वर दयाल था. वह कन्नौज के ही तिर्वा थानाक्षेत्र के मलिहापुर गांव का निवासी था. ईश्वर के पिता बच्चनलाल का देहांत हो चुका था. मां लक्ष्मी के अलावा उस के 2 बड़े भाई राजेश और राजवीर थे.

पिता की मृत्यु के बाद सभी भाई आपसी सहमति से बंटवारा कर के अलगअलग रह रहे थे. घर का बंटवारा जरूर हो गया था लेकिन उन के दिल अब भी नहीं बंटे थे. सुखदुख में सब साथ खड़े होते थे. भाइयों की तरह ईश्वर दयाल भी मेहनतमजदूरी करता था.

 

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उधर घर वालों ने करीब 8 साल पहले राधा का विवाह ईश्वर दयाल से कर जरूर दिया था लेकिन वह पति से खुश नहीं थी. इस की वजह यह थी कि राधा ने जिस तरह के पति के सपने संजोए थे, ईश्वर दयाल वैसा नहीं था.

वह तो एक सीधासादा इंसान था, जो अपने परिवार में खुश था और उस की दुनिया भी अपने परिवार तक ही सीमित थी. राधा की तरह वह न तो ऊंचे सपने देखता था और न ही उस की महत्त्वाकांक्षाएं ऊंची थीं. ऊपर से उसे पहननेओढ़ने, सजनेसंवरने का शौक भी नहीं था.

राधा को पति ईश्वर दयाल का सीधापन बहुत अखरता था. वह चाहती थी कि उस का पति बनसंवर कर रहे. उसे घुमाने ले जाए, सिनेमा दिखाए. मगर ईश्वर दयाल को यह सब करने में संकोच होता था. उस की यह मजबूरी राधा को नापसंद थी. लिहाजा उस का मन विद्रोह करने लगा.

वक्त गुजरता रहा. इसी बीच राधा 2 बेटियों और 1 बेटे की मां बन गई तो ईश्वर दयाल खुशी से फूला नहीं समाया. उसे लगा अब राधा अपनी जिद छोड़ कर गृहस्थी में रम जाएगी. लेकिन जिस नदी को हिलोरें लेनी ही हों, उसे भला कौन रोक सकता है.

ईश्वर दयाल से राधा की कामना का वेग थमा नहीं था. वह तो बस मौके की तलाश में थी. जब परिवार बढ़ा तो ईश्वर दयाल की जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं. वह सुबह काम पर निकलता तो शाम को ही घर आता.

ईश्वर दयाल के गांव में ही छोटेलाल रहता था. वह गांव का संपन्न किसान था. परिवार में उस की पत्नी श्यामा और 2 बेटियां और एक बेटा था. एक ही गांव में रहने के कारण ईश्वर दयाल और छोटेलाल की दोस्ती थी. दोनों ही शराब के शौकीन थे. उन की जबतब शराब की महफिल जम जाती थी.

अधिकतर छोटेलाल ही शराब की पार्टी का खर्चा किया करता था. एक दिन छोटेलाल मटन लाया. मटन की थैली ईश्वर दयाल को देते हुए बोला, ‘‘आज हम भाभी के हाथ का पका हुआ मटन खाना चाहते हैं.’’

‘‘हांहां क्यों नहीं, राधा बहुत स्वादिष्ट मटन बनाती है. एक बार तुम ने खा लिया तो अंगुलियां चाटते जाओगे. ’’ कहते हुए ईश्वर दयाल ने मटन की थैली राधा को पकड़ा दी. इस के बाद ईश्वर दयाल और छोटेलाल साथ लाई शराब की बोतल खोल कर बैठ गए.

बातें करते हुए छोटेलाल शराब तो ईश्वर दयाल के साथ पी रहा था लेकिन उस का मन राधा में उलझा हुआ था और निगाहें लगातार उस का पीछा कर रही थीं.

छोटेलाल को उस की खूबसूरती भा गई थी. जैसेजैसे नशा चढ़ता गया, वैसेवैसे उस की निगाहों में राधा का शबाब नशीला होता गया.

शराब का दौर खत्म हुआ तो राधा खाना परोस कर ले आई. खाना खा कर छोटेलाल ने राधा और उस के द्वारा बनाए गए खाने की दिल खोल कर तारीफ की. राधा भी उस की बातों में खूब रस ले रही थी. खाना खाने के बाद छोटेलाल अपने घर लौट गया.

इस के बाद तो ईश्वर दयाल के घर रोज ही महफिल सजने लगी. छोटेलाल ने राधा से चुहलबाजी करनी शुरू कर दी. राधा भी उस की चुहलबाजियों का जवाब देती रही. राधा की आंखों में छोटेलाल को अपने लिए चाहत नजर आने लगी थी. उस के अंदाज भी कुछ ऐसे थे जैसे कि वह खुद उस के करीब आना चाहती है.

दरअसल, राधा को छोटेलाल में वह सब खूबियां नजर आई थीं, जो वह चाहती थी. छोटेलाल अच्छे पैसे कमाता था और खर्च भी दिल खोल कर करता था. ऐसे में मन मार कर ईश्वर दयाल के साथ रह रही राधा के सपनों को नए पंख लग गए. छोटेलाल का झुकाव अपनी तरफ देख कर वह बहुत खुश थी.

हर रोज की मुलाकात के बाद वे दोनों एकदूसरे से घुलतेमिलते चले गए. छोटेलाल हंसीमजाक करते हुए राधा से शारीरिक छेड़छाड़ भी कर देता था. राधा उस का विरोध नहीं करती, बल्कि मुसकरा देती. हरी झंडी मिल जाने पर छोटेलाल राधा को जल्द से जल्द पा लेना चाहता था, इसलिए उस ने मन ही मन एक योजना बनाई.

एक दिन जब वह ईश्वर दयाल के साथ उस के घर में बैठा शराब पी रहा था तो उस ने खुद तो कम शराब पी लेकिन ईश्वर को जम कर शराब पिलाई. देर रात शराब की महफिल खत्म हुई तो दोनों ने खाना खाया. छोटेलाल ने भरपेट खाना खाया जबकि ईश्वर दयाल मुश्किल से कुछ निवाले खा कर एक तरफ लुढ़क गया.

छोटेलाल की मदद से राधा ने ईश्वर दयाल को चारपाई पर लेटा दिया. इस के बाद हाथ झाड़ते हुए राधा बोली, ‘‘अब इन के सिर पर कोई ढोल भी बजाता रहे तो भी यह सुबह से पहले जागने वाले नहीं.’’

फिर उस ने छोटेलाल की आंखों में झांकते हुए भौंहें उचकाईं, ‘‘तुम घर जाने लायक हो या इन के पास ही तुम्हारी चारपाई भी बिछा दूं.’’

छोटेलाल के दिल में उमंगों का सैलाब उमड़ पड़ा. वह सोचने लगा कि राधा भी चाहती है कि वह यहीं रुके और उस के साथ प्यार का खेल खेले. इसलिए बिना देर किए उस ने कहा, ‘‘हां, नशा कुछ ज्यादा हो गया है, मेरा भी बिस्तर लगा दो.’’

 

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इस के बाद राधा ने छोटेलाल के लिए भी चारपाई बिछा कर बिस्तर लगा दिया. वह खुद बच्चों के साथ दूसरे कमरे में सोने चली गई.

छोटेलाल की आंखों में नींद नहीं थी. उस की आंखों के सामने बारबार राधा की खूबसूरत काया घूम रही थी. उस के कई बार मिले शारीरिक स्पर्श से वह रोमांचित हुआ था.

उस स्पर्श की दोबारा अनुभूति पाने के लिए वह बेकरार था. ईश्वर दयाल की ओर से वह निश्चिंत था. इसलिए वह दबेपांव चारपाई से उठा और ईश्वर दयाल के पास जा कर उसे हिला कर देखा. उस पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह धड़कते दिल से उस कमरे की ओर बढ़ गया, जिस में राधा बच्चों के साथ सो रही थी.

कमरे में चारपाई पर बच्चे लेटे थे. जबकि राधा जमीन पर बिस्तर लगा कर लेटी थी. कमरे में जल रही लाइट को बंद कर के छोटेलाल राधा के पास जा कर बिस्तर पर लेट गया. जैसे ही उस ने राधा को बांहों में भरा तो वह दबी जुबान में बोली, ‘‘अब यहां क्यों आए हो, जाओ यहां से.’’

‘‘अब तुम को अपने प्यार का असली मजा देने आया हूं.’’ कह कर उस ने राधा को अपने अंदाज में प्यार करना शुरू कर दिया. इस के बाद तो मानो दो जिस्मों के अरमानों की होड़ लग गई. कपड़े बदन से उतरते गए और हसरतें बेलिबास होती गईं. फिर उन के बीच वह संबंध बन गया जो सिर्फ पतिपत्नी के बीच में होना चाहिए. एक ने अपने पति के साथ बेवफाई की थी तो दूसरे ने दोस्त के साथ दगाबाजी.

उस रात के बाद राधा और छोटेलाल एकदूसरे को समर्पित हो गए. राधा छोटेलाल के संग पत्नी धर्म निभाने लगी तो छोटेलाल ने भी राधा को अपना सब कुछ मान लिया.

राधा के संग रास रचाने के लिए छोटेलाल हर दूसरेतीसरे दिन ईश्वर दयाल के घर महफिल जमाने लगा. ईश्वर दयाल को वह नशे में धुत कर के सुला देता, उस के बाद राधा के बिस्तर पर पहुंच जाता. अब वह दिन में भी राधा के पास पहुंचने लगा था. उस के आने से पहले ही राधा बच्चों को घर के बाहर खेलने भेज देती थी. फिर दोनों निश्चिंत हो कर रंगरलियां मनाते थे.

13 जनवरी, 2020 को अचानक ईश्वर दयाल गायब हो गया. घर वालों ने उसे काफी तलाश किया. तलाश करने पर देर रात गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर कलुआपुर गांव के माध्यमिक विद्यालय के पास सड़क किनारे ईश्वर दयाल की लाश पड़ी मिली.

परिजनों ने जब लाश देखी तो फूटफूट कर रोने लगे. इसी बीच किसी ने घटना की सूचना कोतवाली तिर्वा को दे दी. सूचना पा कर इंसपेक्टर टी.पी. वर्मा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. पहली नजर में मामला एक्सीडेंट का लग रहा था. लाश के ऊपर किसी वाहन के टायर के निशान मौजूद थे.

लाश के पास ही एक गमछा पड़ा मिला. परिजनों से पूछा गया कि क्या वह गमछा ईश्वर दयाल का है, तो उन्होंने मना कर दिया. इंसपेक्टर टी.पी. वर्मा चौंके कि अगर ईश्वर दयाल की मौत एक्सीडेंट से हुई है तो किसी और का गमछा यहां कैसे आ गया. इस का मतलब यह कि ईश्वर दयाल की हत्या कर के उसे एक्सीडेंट का रूप दिया गया है. यह गमछा हत्यारे का है, जो जल्दबाजी में छूट गया है. इंसपेक्टर टी.पी. वर्मा ने उस गमछे को अपने कब्जे में ले लिया. फिर आवश्यक पूछताछ के बाद उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

इस के बाद 14 जनवरी, 2020 की सुबह 10 बजे ईश्वर दयाल की मां लक्ष्मी देवी की लिखित तहरीर पर इंसपेक्टर टी.पी. वर्मा ने थाने में अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

इंसपेक्टर टी.पी. वर्मा ने सर्वप्रथम घटना की रात घटनास्थल पर मौजूद रहे मोबाइल नंबरों की डिटेल्स निकलवाई. जब डिटेल्स सामने आई तो उस में कुछ नंबर ही थे. उन नंबरों में से 3 फोन नंबर ऐसे थे, जिन की लोकेशन एक साथ आ रही थी. उन नंबरों में एक नंबर मलिहापुर के छोटेलाल का था.

छोटेलाल के बारे में जानकारी जुटाई गई तो पता चला, उस की ईश्वर दयाल से गहरी दोस्ती थी. वह ईश्वर दयाल के घर आताजाता था. छोटेलाल के उस की पत्नी से अवैध संबंध थे.

इस के बाद इंसपेक्टर टी.पी. वर्मा ने 23 फरवरी, 2020 को राधा, उस के प्रेमी छोटेलाल, छोटेलाल के दोस्त गिरिजाशंकर और रिश्तेदार सुघर सिंह को गिरफ्तार कर लिया.

गिरिजाशंकर और सुघर सिंह के मोबाइल नंबर की लोकेशन छोटेलाल के फोन नंबर की लोकेशन के साथ मिली थी. इस के बाद कोतवाली में जब उन से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर के हत्याकांड की वजह भी बता दी.

छोटेलाल और राधा के बीच नाजायज संबंधों का सिलसिला अनवरत चल रहा था. लेकिन उस में खलल तब पड़ा, जब ईश्वर दयाल ने राधा के मोबाइल में छोटेलाल का नंबर देखा. इतना ही नहीं, हर रोज उस नंबर पर कईकई बार काफी देर तक बात की

गई थी.

यह देख कर ईश्वर दयाल का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने राधा से पूछा तो वह बहाने बनाने लगी. इस पर ईश्वर दयाल ने राधा की जम कर पिटाई कर दी.

उस पिटाई से राधा अपने पति ईश्वर दयाल के प्रति नफरत से भर उठी. इस के बाद ईश्वर दयाल उन दोनों के मिलने पर बाधक बनने लगा. दोनों किसी तरह मिलते भी तो वह उन का विरोध करता. इस पर राधा ने ईश्वर दयाल को अपनी जिंदगी से हमेशा के लिए हटाने का फैसला कर लिया.

उस ने छोटेलाल से कहा कि ईश्वर दयाल के रहते हम एक नहीं हो सकते. उस का इलाज करना ही पड़ेगा. फिर छोटेलाल ईश्वर दयाल को ठिकाने लगाने की जुगत में लग गया.

राधा ने अपनी मां गीता से बात की तो गीता भी अपनी बेटी के कुकृत्य में शामिल हो गई. गीता जानती थी कि छोटेलाल के साथ राधा ज्यादा खुश रहेगी. इसलिए वह उस का साथ देने को तैयार हो गई.

छोटेलाल ने अपने दोस्त गिरिजाशंकर निवासी भूलभुलियापुर थाना तिर्वा और रिश्तेदार सुघर सिंह से बात की. सुघर सिंह मैनपुरी जिले के थाना किसनी के गांव बसहत का रहने वाला था. इस समय वह कन्नौज की छिबरामऊ तहसील में रह रहा था. वह तहसील में कार्यरत चपरासी सरोज की मारुति वैन चलाता था.

छोटेलाल ने दोनों से बात कर के उन को ईश्वर दयाल की हत्या करने को तैयार कर लिया. उस के बाद योजना बना कर राधा और उस की मां गीता को बता दिया.

योजनानुसार, 13 जनवरी 2020 को सुघर सिंह चपरासी सरोज की मारुति वैन ले कर आ गया. उस में छोटेलाल और गिरिजाशंकर सवार हो गए. छोटेलाल ने ईश्वर दयाल को शराब पीने को बुलाया तो वह उस के पास आ गया. उसे छोटेलाल और गिरिजाशंकर ने पिछली सीट पर अपने बीच में बैठा लिया. इस के बाद सभी ने गांव से निकल कर कुछ दूरी पर शराब पी.

 

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ईश्वर दयाल के नशे में होने पर छोटेलाल और गिरिजाशंकर ने गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद कलुआपुर के माध्यमिक विद्यालय के पास पहुंच कर उस की लाश सड़क किनारे डाल दी. सुघर सिंह ने ईश्वर दयाल को कई बार कार के पहियों से कुचला, ताकि उस की मौत महज एक हादसा समझी जाए.

इसी बीच उधर आ रहे किसी दूसरे वाहन की लाइट उन पर पड़ी तो हड़बड़ी में वे लोग वैन में बैठ कर वहां से भाग निकले. इसी हड़बड़ी के कारण छोटेलाल का गमछा ईश्वर दयाल की लाश के पास गिर गया था. इसी से पुलिस को शक हो गया कि ईश्वर दयाल की हत्या की गई है.

अंतत: आरोपी कानून की गिरफ्त में आ गए. पुलिस ने उन की गिरफ्तारी के बाद हत्या में प्रयुक्त मारुति वैन नंबर यूपी78ई जे2368 और मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया.

आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी के बाद चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक राधा की मां गीता फरार थी. पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए प्रयासरत थी.॒

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, मई 2020

 

आशिकी में फना : परिवार बना प्रेमी का हत्यारा

अब्दुल मलिक का प्रौपर्टी डीलिंग का काम था, लेकिन कोरोना महामारी के चलते पूरे देश में लौकडाउन था. अब्दुल मलिक का औफिस भी बंद था. 4 अप्रैल, 2020 को शाम के वक्त वह घर में ही था कि उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया. अब्दुल मलिक ने स्क्रीन पर नजर डाली तो उस के चेहरे पर मुसकान दौड़ गई, नंबर उस की प्रेमिका सूफिया का था.

घर वालों के सामने वह प्रेमिका से खुल कर बात नहीं कर सकता था, लिहाजा कमरे से बाहर निकल गया. अब्दुल मलिक लखनऊ के थाना सआदतगंज के नौबस्ता मंसूरनगर में रहता था. उस की प्रेमिका सूफिया का घर उस के घर से करीब 100 मीटर दूर था.

बाहर जा कर वह सूफिया से धीरेधीरे बात करने लगा. सूफिया ने उसे बताया कि उस के अब्बू और भाई ने उस की पिटाई की है और वह उस से कुछ बात करना चाहते हैं. उन्होंने तुम्हें अभी घर बुलाया है, थोड़ी देर के लिए घर आ जाओ.

सूफिया की बात सुन कर अब्दुल मलिक परेशान हो गया. उस ने उसी समय फोन कर के अपने दोस्त अब्दुल वसी को बुलाया और मोटरसाइकिल पर दोस्त को ले कर सूफिया के घर पहुंच गया. सूफिया के घर उस के परिवार के लोगों के अलावा उस के ताऊ सुलेमान भी अपने दोनों बेटों रानू और तानू के साथ मौजूद थे.

अब्दुल मलिक और अब्दुल वसी जब वहां पहुंचे तो घर में शांति थी. वहां मौजूद सब लोग उन दोनों को इस तरह से देखने लगे जैसे उन्हें उन के ही आने का इंतजार हो. सूफिया भी अपने कमरे से बाहर निकल आई.

सूफिया के बाहर आते ही उस का भाई दानिश भड़क उठा. वह तेज आवाज में बोला, ‘‘अभी तुझे इतना समझाया था, तेरी समझ में कुछ नहीं आया जो यार की आवाज सुनते ही बाहर आ गई. लगता है तू ऐसे नहीं मानेगी. अब देखता हूं कि तुझे बचाने के लिए कौन आता है.’’

इतना कह कर वह सूफिया पर टूट पड़ा और कमरे में रखे डंडे से उस की पिटाई करने लगा. घर वालों ने कुछ देर पहले ही उस की काफी पिटाई की थी, जिस से उस का बदन दुख रहा था. फिर से पिटाई होने पर वह बुरी तरह कराहने लगी.

उस का दुख और कराहट अब्दुल मलिक से देखी नहीं गई. लिहाजा वह प्रेमिका को बचाने के लिए आगे आया. जैसे ही वह सूफिया को बचाने के लिए बढ़ा, तभी दानिश बहन को छोड़ अब्दुल मलिक पर टूट पड़ा.

सूफिया ने मलिक को बचाने का प्रयास किया तो उस के पिता उस्मान और ताऊ सुलेमान आ गए. उन दोनों ने सूफिया को धक्का दे कर अलग गिरा दिया. फिर वे दोनों भी मलिक पर टूट पड़े.

अपने दोस्त को बचाने के लिए वसी आगे आया तो सुलेमान के दोनों बेटे रानू और तानू ने अब्दुल वसी को दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. वे सब अब्दुल मलिक और वसी पर अपनी भड़ास उतार रहे थे. सूफिया लहूलुहान हो चुकी थी. इतने पर भी वह किसी तरह अपने प्रेमी को बचाने की कोशिश करती रही. पर उस की कोशिश नाकामयाब रही.

इसी दौरान अब्दुल वसी किसी तरह उन के चंगुल से छूट कर वहां से निकला. वहां से भाग कर वह सीधे थाना सआदतगंज पहुंचा, क्योंकि नौबस्ता मंसूरनगर इसी थाने के अंतर्गत आता है.

लौकडाउन वैसे ही पुलिस का सिरदर्द बना हुआ. जिस समय अब्दुल वसी सआदतगंज थाने पहुंचा, उस समय एडिशनल डीसीपी (वेस्ट) विकासचंद्र त्रिपाठी, एसीपी अनिल कुमार यादव के साथ सर्किल के पुलिसकर्मियों के साथ मीटिंग कर रहे थे.

अब्दुल वली ने यह जानकारी एडिशनल डीसीपी (वेस्ट) विकासचंद्र त्रिपाठी को दी. वह खुद भी घायल था. एडिशनल डीसीपी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए थानाप्रभारी को तुरंत मौकाएवारदात पर रवाना कर दिया.

इस के बाद वसी ने फोन कर के यह सूचना अपने दोस्त अब्दुल मलिक के पिता अब्दुल करीम को भी दे दी. उस्मान और उस के घर के लोगों द्वारा अपने बेटे की पिटाई करने की खबर सुन कर करीम भौंचक रह गए. वह भी परिवार के लोगों के साथ गुस्से में उस्मान के घर की तरफ दौड़े.

उस के घर वाले जब उस्मान के घर पहुंचे तो पहले ही वहां पुलिस मौजूद थी. लेकिन वहां का माहौल बड़ा गमगीन था. घर में अब्दुल मलिक और उस की प्रेमिका सूफिया की लाशें पड़ी थीं. दोनों ही लाशें खून से लथपथ थीं. खून लगे डंडों के अलावा वहां खून सनी ईंटें भी पड़ी थीं. लग रहा था कि दोनों की हत्या डंडों से पीटपीट कर की गई थी.

जवान बेटे की लाश देख कर अब्दुल करीम का कलेजा गले में आ गया. वह बिलखबिलख कर रोने लगे. पुलिस ने उस्मान से उन दोनों हत्याओं के बारे में पूछताछ की तो उस ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपनी बेटी सूफिया और अब्दुल मलिक की हत्या की है.

पुलिस ने उस्मान को उसी समय हिरासत में ले लिया. इस के बाद थानाप्रभारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी दे दी.

सूचना पा कर एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) विकासचंद्र त्रिपाठी और एसीपी अनिल कुमार यादव कुछ ही देर में मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी मौकामुआयना करने के बाद आरोपी उस्मान से पूछताछ की. पुलिस ने मौके से सारे सबूत अपने कब्जे में ले लिए.

अब्दुल मलिक की हत्या की सूचना मिलते ही उस के घर में जैसे कोहराम मच गया. उस की पत्नी तो रोतरोते बारबार बेहोश हो रही थी. महिलाएं किसी तरह उसे संभाले हुई थीं.

इस दोहरे हत्याकांड की खबर सुन कर मोहल्ले के कई लोग उस्मान के घर के सामने जमा होने लगे, लेकिन लौकडाउन की वजह से उन्हें एक साथ एकत्र नहीं होने दिया गया. अधिकांश को पुलिस ने उन के घर भेज दिया. मृतकों के परिवार के जो नजदीकी लोग वहां बचे थे, उन्हें सोशल डिस्टैंस की बात कह कर एकदूसरे से एक मीटर दूर खड़े रहने के निर्देश दिए.

जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने अब्दुल मलिक और सूफिया के शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए. उस्मान ने अपनी बेटी और उस के प्रेमी मलिक की हत्या खुद अकेले ही करने की बात कही थी, लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी कि अकेला आदमी 2 जनों की हत्या, वह भी डंडे से पीट कर कैसे कर सकता है. इसलिए पुलिस ने उस्मान से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सच्चाई उगल दी.

उस्मान ने बताया कि दोनों की हत्या में उस के साथ उस का बेटा दानिश भी था. पूछताछ में यह भी पता लगा कि इस दोहरे हत्याकांड में उस्मान का बड़ा भाई सुलेमान, सुलेमान के दोनों बेटे रानू व तानू भी शामिल थे.

मुस्तैदी दिखाते हुए पुलिस ने दानिश को भी उसी समय हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने सुलेमान के घर दबिश दे कर उसे व उस के बेटे रानू को भी हिरासत में ले लिया जबकि दूसरा बेटा तानू फरार हो गया था.

चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर पुलिस थाने ले आई. उन सब से अब्दुल मलिक और सूफिया की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो उन्होंने जो कहानी बताई, वह प्यार की बुनियाद पर रचीबसी निकली

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का एक थाना है सआदतगंज. शहर में स्थित इस थाने के अंतर्गत आता है नौबस्ता मंसूरनगर. यहीं पर अब्दुल मलिक अपनी पत्नी और 4 बच्चों के साथ रहता था. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था.

उस के घर से कोई 100 मीटर दूर उस्मान और सुलेमान रहते थे. अब्दुल मलिक के पिता अब्दुल करीम और सुलेमान की आपस में अच्छी दोस्ती थी. पारिवारिक संबंधों की वजह से उन का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

अब्दुल मलिक भी उन के यहां आताजाता था. वहीं पर उस की मुलाकात उस्मान की 19 वर्षीय बेटी सूफिया से हुई. सूफिया बहुत खूबसूरत थी. हालांकि 32 वर्षीय अब्दुल मलिक शादीशुदा था, लेकिन इस के बावजूद उस का मन सूफिया पर डोल गया. उस ने उस की छवि अपने दिल में बसा ली. यह करीब एक साल पहले की बात है.

सूफिया भी जवानी के उफान पर थी. उस की हसरतें उड़ने के लिए फड़फड़ा रही थीं. चूंकि अब्दुल मलिक शादीशुदा होने की वजह से इस मामले में अनुभवी था, लिहाजा उस ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से उसे अपने प्यार के जाल में फंसा लिया. इस तरह दोनों के बीच प्यार का सफर शुरू हो गया. लेकिन इस सफर का अंत क्या होगा, इस बात पर दोनों में से किसी ने भी गंभीरता से नहीं सोचा.

अब्दुल मलिक और उस्मान के पारिवारिक संबंधों की आड़ में उन का प्यार अमरबेल की तरह बढ़ता गया. दोनों के ही घर वालों ने अब्दुल मलिक और सूफिया की बातों को कभी शक के नजरिए से नहीं देखा.

बाद में जब अब्दुल मलिक का उस्मान के घर आनेजाने का सिलसिला ज्यादा बढ़ गया और उस के आने पर सूफिया की खुशी उस के चेहरे पर झलकने लगी तो उन्हें दोनों के संबंधों पर शक होने लगा.

दोनों की पोल एक दिन तब खुली जब दानिश के एक दोस्त ने दोनों को लखनऊ के गौतमबुद्ध पार्क में झाड़ी की ओट में बैठ कर बातचीत करते देख लिया. उस दोस्त ने यह बात सूफिया के भाई दानिश को बता दी. दानिश के लिए यह बेइज्जती वाली बात थी. लिहाजा उस ने इस बारे में अपनी अम्मीअब्बू को बता दिया.

इस के बाद सूफिया के घर वालों को यह बात समझने देर नहीं लगी कि अब्दुल मलिक का उन के घर आने का असली मकसद क्या है. बहरहाल, उन्होंने ज्यादा होहल्ला करने के बजाए सूफिया को ही समझाया. इस के अलावा उन्होंने अब्दुल मलिक के पिता अब्दुल करीम से भी इस बारे में शिकायत की.

चूंकि अब्दुल करीम सूफिया के ताऊ सुलेमान के दोस्त थे, इसलिए सुलेमान ने भी अब्दुल करीम से बात की. करीम ने बेटे मलिक को समझाया कि वह शादीशुदा और 4 बच्चों का बाप है, इसलिए इस तरह की हरकतों से बाज आए.

घर वालों के समझानेबुझाने पर अब्दुल मलिक और सूफिया कुछ दिनों तक नहीं मिले. हां, फोन पर बातें जरूर कर लेते थे. दोनों ने तय कर लिया था कि चाहे कोई भी उन के ऊपर बंदिशें लगाए, जुदा नहीं होंगे. उन का प्यार हमेशा बरकरार रहेगा.

अब्दुल मलिक ने जब उस्मान के घर जाना बंद कर दिया तो वे लोग समझ गए कि अब मलिक और सूफिया ने मिलनाजुलना छोड़ दिया है, जबकि हकीकत कुछ और ही थी. दोनों प्रेमियों के दिलों में प्यार की आग ठंडी नहीं पड़ी थी, बल्कि मुलाकात न होने पर उन की चाहत और बढ़ गई थी.

आखिर चोरीछिपे उन्होंने घर के बजाय रेस्टोरेंट आदि जगहों पर मिलना शुरू कर दिया था. लेकिन उन की यह लुकाछिपी ज्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रह सकी.

एक दिन सूफिया के भाई दानिश ने खुद अपनी बहन सूफिया को आलमबाग इलाके में अब्दुल मलिक की मोटरसाइकिल पर घूमते देख लिया. यह देख कर उस का खून खौल उठा, लेकिन उस समय वह कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि मलिक की मोटरसाइकिल आगे निकल गई थी.

उस दिन सूफिया जब घर लौटी तो दानिश ने उसे आड़ेहाथों लिया. बेटे की शिकायत पर उस के पिता उस्मान ने सूफिया की जम कर पिटाई की. इतना ही नहीं, उस ने बेटी को हिदायत दी कि अगर उस ने मलिक से मिलना नहीं छोड़ा तो अंजाम बुरा होगा.

उस्मान इस बात को नहीं जानता था कि प्यार पर जितना पहरा बैठाया जाता है, वह उतना ही मजबूत होता है. यही हाल अब्दुल मलिक और सूफिया के प्यार का था. वे तन से ही नहीं, मन से भी एकदूसरे के हो चुके थे.

यह बात अब्दुल मलिक की पत्नी को भी पता थी. उस ने भी अपने शौहर को बहुत समझाया पर उस ने पत्नी की बातों को तवज्जो नहीं दी. इस के बाद उस की बीवी ने उस से झगड़ना शुरू कर दिया. नतीजा यह निकला कि उस के प्रेम संबंध को ले कर घर में कलह रहने लगी.

मलिक को उस के घर वाले भी समझातेसमझाते हार चुके थे, पर उस ने सूफिया से मिलना नहीं छोड़ा. सूफिया ने भी घर वालों की परवाह न कर के अब्दुल मलिक के घर जाना शुरू कर दिया. सूफिया की इस जिद से उस के घर वाले भी तंग आ चुके थे. वे उसे समझाने के साथ उस की पिटाई करकर के उकता गए थे.

पूरे मोहल्ले में उन के घर की खूब बदनामी हो रही थी. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे में वे क्या करें. शनिवार 4 अप्रैल, 2020 की बात थी. दोपहर के बाद सूफिया अपने प्रेमी अब्दुल मलिक से मिलने उस के घर गई. यह जानकारी जब सूफिया के घर वालों को हुई तो उस के घर लौटने पर भाई और अब्बा ने उस की पिटाई की.

जानकारी मिलने पर सूफिया के ताऊ और उस के दोनों बेटे रानू और तानू भी सूफिया को समझाने के लिए पहुंच गए. सूफिया ने पिटने के बाद भी कह दिया कि चाहे उस की जान चली जाए, वह अब्दुल मलिक को नहीं छोड़ेगी. इस जिद पर उस के घर वालों ने उस की और पिटाई की.

सूफिया की जिद पर घर वाले समझ गए कि अब वह किसी भी कीमत पर मानने वाली नहीं है.

इस के लिए वह अब्दुल मलिक को ही कसूरवार मान रहे थे. उस की वजह से ही उन की इज्जत पूरे मोहल्ले में तारतार हो रही थी. इसलिए उन्होंने तय कर लिया कि वे मलिक को इस की सजा जरूर देंगे.

पिटाई के बाद सूफिया अपने कमरे में चली गई थी. इस के बाद घर के सभी लोगों ने योजना बनाई कि किसी बहाने से अब्दुल मलिक को बुला कर उसे ऐसी सजा दी जाए कि उस के घर वाले भी याद रखें.

योजना के अनुसार उन्होंने सूफिया से कहा कि तू अब्दुल मलिक को फोन कर के बुला ले. उस से भी पूछ लें कि वह शादीशुदा होने के बावजूद तुझ से शादी करने को तैयार है भी या नहीं.

अपने घर वालों की यह बात सुन कर सूफिया थोड़ी खुश हुई कि शायद घर वाले उस की शादी मलिक से कराने के लिए राजी हो गए हैं.

इसलिए उन के कहने पर उस ने प्रेमी अब्दुल मलिक को अपने घर बुला लिया. सूफिया के कहने पर अब्दुल मलिक अपने दोस्त वसी को मोटरसाइकिल पर बिठा कर सूफिया के घर पहुंच गया.

लेकिन सूफिया के घर वाले तो पूरी योजना बनाए बैठे थे. जैसे ही वह वहां पहुंचा, सभी उस पर डंडा ले कर टूट पड़े. किसी तरह वसी वहां से जान बचा कर भागा और सीधे थाने पहुंच गया. इसी दौरान उस्मान और उस के भाई सुलेमान व उन के बच्चों ने अब्दुल मलिक व सूफिया की डंडों से पीटपीट कर हत्या कर दी और ईंट मारमार कर उन के सिर फोड़ दिए.

चारों आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने अब्दुल करीम की शिकायत पर चारों आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 147, 323, 302, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

उन की निशानदेही पर पुलिस ने वारदात में प्रयुक्त 3 डंडे, ईंट भी बरामद कर ली.

चारों आरोपियों उस्मान, दानिश, सुलेमान और रानू को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें लखनऊ कारागार भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, मई 2020

प्यार की दावत : प्रेमी को मिला सबक

25 नवंबर, 2019 की बात है. उत्तर प्रदेश के गोंडा का रहने वाला रमेश गुप्ता घर में बिस्तर पर लेटा आराम कर रहा था. तभी अचानक उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन उठा कर काल रिसीव की, बात होने के बाद उस ने कपडे़ बदले और छोटे भाई सुरेश से यह कह कर चला गया कि मनोज के घर जा रहा है. अगर जरूरत हुई तो वह उन के घर पर रुक जाएगा. दरअसल, मनोज गुप्ता के ससुर बीमार थे, सुरेश उन की देखभाल के लिए उन के घर जाता रहता था. दोनों परिवारों के घ्निष्ठ संबंध थे.

रमेश को गए काफी देर हो गई. जब वह नहीं लौटा तो सुरेश ने समझा कि वह मनोज के घर रुक गए होंगे. रमेश जब 26 नवंबर की सुबह तक भी नहीं लौटा तो सुरेश ने मनोज गुप्ता को फोन किया तो उन्होंने बताया कि रमेश कल रात को उन के यहां आया ही नहीं था.

यह जान कर सुरेश को चिंता हुई. रमेश जहांजहां जा सकता था, सुरेश ने उन सभी जगहों पर उस की खोज की, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

30 वर्षीय रमेश गुप्ता अपने परिवार के साथ जिला गोंडा के थाना कोतवाली क्षेत्र में स्थित विष्णुपुरी कालोनी में रहता था. जब सुरेश रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से पूछपूछ कर परेशान हो गया तो उस ने 29 नवंबर को थाना कोतवाली जा कर भाई रमेश गुप्ता की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

कोतवाल आलोक राव ने सुरेश की तहरीर पर रमेश गुप्ता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने उस की तलाश के लिए आवश्यक काररवाई शुरू कर दी.

गोंडा शहर के ही सिविल लाइंस क्षेत्र में अफीम कोठी मोहल्ले में एक खाली मैदान है, जिस में तमाम झाडि़यां थीं. इस खाली मैदान में 2 दिसंबर को कुछ लोग गए तो वहां बदबू के तेज भभके उठ रहे थे.

लोगों ने खोजबीन शुरू की तो वहां एक सूखे कुएं में क्षतविक्षत अवस्था में लाश पड़ी देखी. वह कुआं मिट्टी से आधा पट चुका था, इसलिए चित अवस्था में पड़ी उस लाश का चेहरा स्पष्ट दिख रहा था. उन लोगों ने वह लाश पहचान ली. वह लाश विष्णुपुरी कालोनी के रहने वाले रमेश गुप्ता की थी.

रमेश के मकान से उस जगह की दूरी महज 200 मीटर थी. उन में से ही एक आदमी ने जा कर रमेश के भाई सुरेश गुप्ता को रमेश की लाश मिलने की सूचना दे दी.

सुरेश तुरंत मौके पर पहुंचा तो उस ने कुएं में पड़ी भाई की लाश पहचान ली. सुरेश ने कोतवाल आलोक राव को भाई की लश मिलने की सूचना दे दी.

सूचना पा कर इंसपेक्टर आलोक राव, एसएसआई राजेश मिश्रा आदि के साथ मौके पर पहुंच गए. मौके पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. इंसपेक्टर राव ने लाश कुएं से निकलवाई. लाश काफी सड़गल चुकी थी, इसलिए लाश का निरीक्षण करने पर मौत की वजह पता नहीं चल रही थी.

इसी बीच एसपी राजकरन नैयर और एएसपी महेंद्र कुमार भी मौके पर पहुंच गए. लाश का मुआयना करने के बाद उन्होंने रमेश के भाई सुरेश से पूछताछ की. सुरेश ने भाई की हत्या में उस की प्रेमिका मानसी का हाथ होने का शक जताया. वैसे भी अफीम कोठी मोहल्ले में ही 100 मीटर की दूरी पर मानसी चौरसिया का मकान था.

सुरेश से पूछताछ के बाद पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. फिर सुरेश की तहरीर पर मानसी चौरसिया के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर लिया.

इंसपेक्टर राव ने मृतक रमेश गुप्ता के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की तो पता चला कि 25 नवंबर की रात को उस के मोबाइल पर जो काल आई थी, वह मानसी चौरसिया के फोन नंबर से ही की गई थी.

अब मानसी से पूछताछ करनी जरूरी थी. लिहाजा 3 दिसंबर को इंसपेक्टर आलोक राव ओर एसएसआई राजेश मिश्रा ने महिला कांस्टेबल की मदद से मानसी को घर से पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. कोतवाली ला कर जब मानसी से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि रमेश की हत्या करने में उस के दूसरे प्रेमी अंकित सिंह, पिता रोहित चौरसिया और भाई दीपू चौरसिया ने साथ दिया था. पूछताछ के बाद मानसी ने रमेश की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा की नगर कोतवाली अंतर्गत रामचंद्र गुप्ता अपने परिवार के साथ रहते थे. रामचंद्र के परिवार में उन की पत्नी राजकुमारी और 2 बेटियों के अलावा 3 बेटे दिनेश, रमेश और सुरेश थे.

रामचंद्र प्राइवेट नौकरी करते थे. उन्होंने दिनेश का विवाह कर दिया था. दिनेश को विवाह के कुछ समय बाद ही चालचलन ठीक न होने पर रामचंद्र ने उसे घर से निकाल दिया. यह लगभग 8 साल पहले की बात है. इस समय दिनेश परिवार के साथ बस्ती जिले में रहता है. रामचंद्र ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह कर दिया था. रमेश और सुरेश अभी अविवाहित थे. रमेश ने बीए तक पढ़ाई की थी.

रामचंद्र के कूल्हे में रौड पड़ी थी. उस रौड की वजह से उन्हें इंफेक्शन हो गया था, जो कि किडनी और उस के आसपास फैल गया था. वह काफी समय से बीमार थे.

इस की वजह से उन की देखभाल बड़ा बेटा रमेश किया करता था. देखभाल करने के कारण रमेश कोई काम नहीं करता था. घर पर ही रहता था. जबकि सुरेश एक बैंक में मैनेजर के रहमोकरम पर काम करने लगा था.

विष्णुपुरी कालोनी से सटा अफीम कोठी मोहल्ला था. इसी मोहल्ले में रोहित चौरसिया परिवार के साथ रहता था. रोहित रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. उस की पत्नी जगदेवी का देहांत हो चुका था. रोहित के 2 बेटे दीपू चौरसिया और सूरज चौरसिया और एकलौती बेटी मानसी थी.

दीपक का रीमा नाम की युवती से विवाह हो चुका था. सूरज अविवाहित था और मुंबई में रहता था. मानसी ने इंटरमीडिएट तक शिक्षा ग्रहण की थी, इस के बाद उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो वह घर के रोजमर्रा के काम करने लगी.

रमेश और मानसी के मकान के बीच महज 200 मीटर की दूरी थी. दोनों एकदूसरे से परिचित थे. मानसी काफी महत्त्वाकांक्षी थी. छरहरी काया वाली मानसी को लड़कों से दोस्ती करना बहुत अच्छा लगता था. उस की वजह थी कि उस के नाजनखरे उठाने में लड़कों की लाइन लगी रहती थी. उन के साथ घूमने, मौजमस्ती के उसे खूब मौके मिलते थे.

रमेश मोहल्ले में ही घूमता रहता था, इसलिए वह मानसी के चालचलन से बखूबी वाकिफ था. उस ने भी मानसी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो मानसी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दोनों की दोस्ती धीरेधीरे रंग दिखाने लगी. वैसे भी दोस्ती प्यार की पहली सीढ़ी होती है. रमेश और मानसी दोनों यह सीढ़ी चढ़ चुके थे.

दोनों साथ में काफी समय बिताने लगे. उन के बीच मोबाइल पर भी बातें होती रहती थीं. जैसेजैसे समय गुजरने लगा, दोनों को अहसास होने लगा कि दोनों दोस्ती की सीमाओं को पार कर उस से भी आगे निकल चुके हैं. उन के दिलों में प्यार की उमंगें हिलारें मार रही थीं. दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा. यह भी तय कर लिया कि जीवन भर दोनों पतिपत्नी के रूप में साथसाथ रहेंगे.

दोनों ने विवाह करने की बात अपने घरों में की तो रमेश के घर वालों को तो शादी से कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन मानसी के पिता रोहित और भाई दीपू ने मना कर दिया. उन्होंने मानसी से कहा कि रमेश एक तो उन की जातिबिरादरी का नहीं और दूसरे वह निठल्ला है. कुछ कामधाम नहीं करता. ऐसे में शादी के बाद वह उसे कैसे रख पाएगा.

बाप की नसीहत बेटी के दिमाग में घर कर गई. मानसी ने अभी तक इस बारे में सोचा ही नहीं था. वह तो प्यार में इतनी डूब गई थी कि और कुछ सोचसमझ ही नहीं पा रही थी. बाप की नसीहत ने जैसे उस की आंखें खोल दी थीं.

अब उस ने रमेश से दूरी बनानी शुरू कर दी. लेकिन रमेश था कि उस का पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं था. इसी बीच मानसी की मुलाकात कुछ दूर जानकीनगर मोहल्ला निवासी अंकित से हो गई. अंकित अच्छा कमाता था. रमेश के मुकाबले हर लिहाज से अंकित मानसी को अच्छा लगा था. दोनों की मुलाकातें दिनोंदिन बढ़ने लगीं. दोनों के बीच की दूरियां कम होती गईं. मानसी अंकित के साथ बहुत खुश थी.

रमेश ने मानसी चौरसिया को अपने से दूरी बनाते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा. वह ऐसा क्यों कर रही है, यह जानने की उस ने कोशिश की तो उस के सामने हकीकत आते देर नहीं लगी.

रमेश को लगा कि दूसरा प्रेमी मिलते ही मानसी ने उस से किनारा कर लिया है. यह बात रमेश के दिमाग में बारबार कौंध रही थी. वह इसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. वह मानसी को हर हाल में पाना चाहता था. एक दिन रमेश ने मानसी से मिल कर उसे समझाया लेकिन मानसी नहीं मानी.

मानसी ने उसे बताया कि परिवार वाले उस से विवाह करने को तैयार नहीं हैं और वह अपने परिवार के खिलाफ नहीं जा सकती. इस पर रमेश ने सीधे कहा कि ऐसे में तुम्हें अपने घर वालों को मनाना चाहिए. लेकिन तुम ने तो दूसरा प्रेमी ही ढूंढ लिया. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.

मानसी को न मानते देख रमेश ने उसे धमकाया कि अगर उस ने उसे छोड़ कर किसी दूसरे को चुना तो उस के जो अश्लील फोटो उस के पास हैं, वह उन्हें वायरल कर देगा. रमेश के इतना कहने पर मानसी डर गई लेकिन उस ने हिम्मत कर के कह दिया कि वह अब उस की नहीं हो सकती.

इस के बाद मानसी के दिमाग में यही चलता रहता था कि कहीं रमेश उस के अश्लील फोटो को वायरल न कर दे. वह इसी डर में जी रही थी. ऐसे में उस ने रमेश को सबक सिखाने का फैसला कर लिया.

उस ने अपने दूसरी प्रेमी अंकित से कहा कि कुछ दिनों पहले रमेश ने धोखे से उस के कुछ अश्लील फोटो खींच लिए थे, उन के बल पर वह उसे ब्लैकमेल कर फोटो वायरल करने की धमकी दे रहा है.

मानसी ने अंकित से कहा कि उसे रोकने का एक ही तरीका है कि उसे मार दिया जाए. अंकित इस काम में उस का साथ देने को तैयार हो गया. उसे कहां और कैसे मारना है, इस पर दोनों ने विचार कर लिया.

इस के बाद दोनों को लगा कि वे दोनों इस काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पाएंगे. इस पर मानसी ने रमेश को ठिकाने लगाने के लिए अपने पिता और भाई को राजी करने का उपाय सोचा.

योजनानुसार मानसी ने रोते हुए अपने पिता रोहित चौरसिया और भाई दीपू को बताया कि रमेश के पास उस के कुछ अश्लील फोटो हैं. उन को वायरल कर के वह उस की जिंदगी बरबाद करना चाहता है.

यह सुन कर दोनों को मानसी और रमेश पर गुस्सा आया. पर पहले तो उन्हें रमेश को देखना था, क्योंकि उन के लिए मानसी की इज्जत यानी परिवार की इज्जत पहले थी. इज्जत बचाने की खातिर उस के पिता व भाई रमेश को सबक सिखाने को तैयार हो गए.

तब मानसी ने दोनों को बता दिया था कि इस सब में उस का एक दोस्त अंकित भी मदद करने को तैयार है. इस के बाद एक दिन मानसी ने अंकित को घर बुला लिया. फिर सब ने मिल कर रमेश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई.

25 नवंबर को मानसी के भाई दीपू की पत्नी रीमा अपने मायके गई हुई थी. योजनानुसार रात साढ़े 10 बजे मानसी ने फोन कर के रमेश को अपने घर बुलाया.

रमेश अपने भाई सुरेश से घर के सामने रहने वाले मनोज गुप्ता के यहां जाने की बात कह कर निकला और सीधे मानसी के घर पहुंच गया.  वहां मानसी, उस के पिता रोहित, भाई दीपू के अलावा अंकित भी मौजूद था.

रमेश के पहुंचने पर सब ने पहले उसे शराब पिलाई. शराब में पहले से ही जहरीला पदार्थ मिला दिया गया था. शराब में मिले जहर ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो रमेश की हालत बिगड़ने लगी. वह उठ कर जाने की कोशिश करने लगा तो सब ने मिल कर उसे दबोच लिया और गला दबा कर उसे मार डाला.

रमेश को मौत की नींद सुलाने के बाद रात एक बजे उस की लाश अपने घर के पीछे झाडि़यों से पटे खाली मैदान में बने सूखे कुएं में डाल दी. इस के बाद अंकित अपने घर चला गया.

लेकिन उन का गुनाह छिप न सका. मानसी चौरसिया ने सभी के नाम खोले तो इंसपेक्टर आलोक राव ने अंकित, रोहित चौरसिया और दीपू चौरसिया की गिरफ्तारी के लिए दबिश देनी शुरू कर दी. मानसी के हिरासत में लिए जाने के बाद ही तीनों अपने घरों से फरार हो गए थे.

पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अंकित ने 6 दिसंबर, 2019 को न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 8 दिसंबर को इंसपेक्टर राव ने दीपू चौरसिया को गिरफ्तार कर लिया. आवश्यक लिखापढ़ी के बाद अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक रोहित चौरसिया फरार चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. मनोज गुप्ता परिवर्तित नाम है.

सौजन्य- सत्यकथा, फरवरी 2020

छीन ली सांसों की डोर-भाग 3 : एकतरफा प्यार की सजा

ग्रामप्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा प्रिंस भी उसी के नक्शेकदम पर चल रहा था. पिता की ही तरह प्रिंस भी अभिमानी स्वभाव का था. जिसे चाहे वह उस से उलझ जाता था और मारपीट पर आमादा हो जाता था. वह जब भी चलता था उस के साथ 5-7 लड़कों की टोली चलती थी.

उस की टोली में नीरज तिवारी, सोनू तिवारी और दीपू यादव खासमखास थे. ये तीनों प्रिंस के लिए किसी भी हद तक जाने को हमेशा तैयार रहते  थे. इसीलिए वह इन पर पानी की तरह पैसा बहाता था.

घातक बनी एकतरफा मोहब्बत

प्रिंस रागिनी से एकतरफा मोहब्बत करता था. उसे पाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था जबकि रागिनी उस से प्यार करना तो दूर उस से बात तक करना उचित नहीं समझती थी.

रागिनी के प्यार में प्रिंस इस कदर पागल था कि उस ने खुद को कमरे में कैद कर लिया था. न तो यारदोस्तों से पहले की तरह ज्यादा मिलता था और न ही उन से बातें करता था. प्रिंस की हालत देख कर उस के दोस्त नीरज और दीपू परेशान रहने लगे थे. यार की जिंदगी की सलामती के खातिर तीनों दोस्तों ने फैसला किया कि चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, वह उस का प्यार यार के कदमों में ला कर डालेंगे.

नीरज, सोनू और दीपू तीनों ने मिल कर एक दिन रागिनी और सिया को स्कूल जाते समय रास्ते में रोक लिया. तीनों के अचानक से रास्ता रोकने से दोनों बहनें बुरी तरह से डर गईं, ‘‘ये क्या बदतमीजी है? तुम ने हमारा रास्ता क्यों रोका? हटो हमें स्कूल जाने दो.’’ रागिनी हिम्मत जुटा कर बोली.

‘‘हम तुम्हारे रास्ते से भी हट जाएंगे और तुम्हें स्कूल भी जाने देंगे, बस तुम्हें हमारी कुछ बातें माननी होंगी.’’ नीरज बोला.

‘‘न तो मैं तुम्हारी कोई बात मानूंगी और न ही सुनूंगी. बस तुम हमारा रास्ता छोड़ दो. हमें स्कूल के लिए देर हो रही है.’’ रागिनी नाराजगी भरे लहजे में बोली.

‘‘देखो रागिनी, ये किसी की जिंदगी और मौत की सवाल है. मेरी बात सुन लो, फिर चली जाना.’’ नीरज ने कहा.

‘‘मैं ने कहा न, मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनने वाली. क्या मुझे ऐसीवैसी लड़की समझ रखा है. जो राह चलते आवारा किस्म के लड़के के मुंह लगे.’’ रागिनी बोली.

‘‘देखो रागिनी, तुम्हारा गुस्सा अपनी जगह जायज है. मैं जानता हूं कि तुम ऐसीवैसी लड़की नहीं, खानदानी लड़की हो. लेकिन तुम ने मेरी बात नहीं सुनी तो मेरा भाई जो तुम से प्यार करता है, मर जाएगा. तुम उसे बचा लो.’’ नीरज रागिनी के सामेन गिड़गिड़ाया.

‘‘तुम्हारा भाई मरता है तो मेरी बला से. मैं उसे प्यार नहीं करती. एक बात कान खोल कर सुन लो कि आज के बाद इस तरह की वाहियात बात फिर मेरे सामने मत दोहराना, वरना इन का परिणाम बहुत बुरा होगा, समझे.’’ नीरज को खरीखोटी सुनाती हुई रागिनी और सिया चली गईं.

रागिनी की बातें नीरज के दिल को लग गई थी. उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि रागिनी उसे ऐसा जवाब दे सकती है. रागिनी की बातों से उसे काफी गहरा आघात पहुंचा था. चूंकि मामला उस के भाई के प्यार से जुड़ा हुआ था इसलिए उस ने रागिनी के अपमान को अमृत समझ कर पी लिया था. उस समय तो नीरज और उस के दोस्तों ने उसे कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन नीरज ये बात अपने तक सीमित नहीं रख सका.

उस ने घर जा कर यह बात प्रिंस से बता दी. भाई की बात सुन कर प्रिंस गुस्से से उबल पड़ा कि रागिनी की ऐसी मजाल जो उस ने उस के प्यार को ठुकरा दिया. अगर वो मेरे प्यार को ठुकरा सकती है तो मैं भी उसे जीने नहीं दूंगा. अगर वो मेरी नहीं हो सकती तो मैं किसी और की भी नहीं होने दूंगा.

प्रिंस के गुस्से को नीरज और उस के दोस्तों ने और हवा दे दी थी. रागिनी के प्यार में मर मिटने वाला जुनूनी आशिक प्रिंस ठुकराए जाने के बाद एकदम फिल्मी खलनायक बन गया था.

उस दिन के बाद से रागिनी जब भी कहीं आतीजाती दिखती थी, प्रिंस चारों दोस्तों के साथ मिल कर अश्लील शब्दों की फब्तियां कस कर उसे जलील करता, उसे छेड़ता रहता था. और तो और वह दोस्तों को ले कर उस के घर तक धमकाने के लिए पहुंच जाता था.

लिख दिया मौत का परवाना

प्रिंस के इस रवैये से उस के घर वाले परेशान हो गए थे. डर के मारे रागिनी ने घर से बाहर निकलना छोड़ दिया था. उस ने स्कूल जाना भी  बंद कर दिया था. प्रिंस का खौफ रागिनी के दिल में बैठ गया था. जब बात हद से आगे बढ़ गई तो रागिनी ने पिता जितेंद्र दुबे ने बांसडीह रोड थाने में प्रिंस और उस के दोस्तों के खिलाफ लिखित शिकायत की.

लेकिन प्रधान कृपाशंकर की राजनैतिक पहुंच की वजह से मामला वहीं रफादफा हो गया था. इस के बाद प्रिंस और भी उग्र हो गया. वह सोचता था कि जितेंद्र दुबे ने उस के खिलाफ थाने में शिकायत करने की जुर्रत कैसे की.

बात अप्रैल, 2017 की है. प्रिंस अपने तीनों दोस्तों नीरज, सोनू और दीपू यादव को ले कर जितेंद्र दुबे के घर गया और उन्हें धमकाया कि आज के बाद तुम्हारी बेटी रागिनी अगर स्कूल पढ़ने गई तो वो दिन उस की जिंदगी का आखिरी दिन होगा.

इस की धमकी के बाद रागिनी के घर वाले डर गए. उन्होंने उसे स्कूल भेजना बंद कर दिया. वह कई महीनों तक स्कूल नहीं गई.

इस वर्ष उस का इंटरमीडिएट था. स्कूल में परीक्षा फार्म भरे जा रहे थे. परीक्षा फार्म भरने के लिए वह 8 अगस्त, 2017 को छोटी बहन सिया के साथ स्कूल जा रही थी. पता नहीं कैसे प्रिंस को रागिनी के आने की खबर मिल गई और उस ने उस का गला रेत कर हत्या कर दी.

बहरहाल, पुलिस ने रागिनी हत्याकांड के नामजद 5 आरोपियों में से 2 आरोपियों प्रिंस और दीपू यादव को तो गिरफ्तार कर लिया. बाकी के 3 आरोपी प्रधान कृपाशंकर, नीरज तिवारी और सोनू फरार होने में कामयाब हो गए. आरोपियों को गिरफ्तार करने को ले कर मृतका की बड़ी बहन नेहा तिवारी सैकड़ों छात्रछात्राओं के साथ कलेक्ट्रेट परिसर पहुंची और धरने पर बैठ गई.

उन लोगों ने परिवार के सदस्यों को मिल रही धमकी के लिए पुलिस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया. कांग्रेस के नेता सागर सिंह राहुल ने भी लापरवाही बरतने के लिए पुलिस प्रशासन को कोसा. तब कहीं जा कर बाकी के आरोपियों प्रधान कृपाशंकर तिवारी, सोनू तिवारी और नीरज तिवारी ने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया.

कथा लिखे जाने तक पांचों में से किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. होनहार बेटी की मौत से पिता जितेंद्र दुबे काफी दुखी हैं. उन्होंने शासनप्रशासन से गुहार लगाई है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सरकारें यदि बेटियों की सुरक्षा नहीं कर सकतीं तो उन्हें पैदा होने से पहले ही कोख में मार देने की इजाजत दे दें, ताकि बेटियों को ऐसी जिल्लत और जलालत की मौत रोजरोज न मरना पड़े.        ?

  – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

छीन ली सांसों की डोर-भाग 2 : एकतरफा प्यार की सजा

पुलिस ने मामले की जांच की तो पता चला कि ग्रामप्रधान कृपाशंकर का बेटा प्रिंस सालों से रागिनी को तंग किया करता था. वह रागिनी से एकतरफा प्यार करता था. कई बार वह रागिनी से अपने प्यार का इजहार कर चुका था लेकिन रागिनी न तो उस से प्यार करती थी और न ही उस ने उस के प्रेम पर अपनी स्वीकृति की मोहर ही लगाई थी.

पहले तो रागिनी उस की हरकतों को नजरअंदाज करती रही. लेकिन जब पानी सिर के ऊपर जाने लगा तो उस ने अपने घर वालों को प्रिंस की हरकतों के बारे में बता दिया.

बेटी की परेशान जान कर जितेंद्र को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया. बात बेटी के मानसम्मान से जुड़ी हुई थी, भला वह इसे कैसे सहन कर सकते थे. वह उसी समय शिकायत ले कर ग्राम प्रधान कृपाशंकर तिवारी के घर जा पहुंचे. संयोग से कृपाशंकर घर पर ही मिल गए. जितेंद्र ने उन के बेटे की हरकतों का पिटारा उन के सामने खोल दिया. लेकिन कृपाशंकर ने उन की शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया. प्रधानी के घमंड में चूर कृपाशंकर तिवारी ने जितेंद्र को डांटडपट कर भगा दिया.

जितेंद्र दुबे ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रधान से उस के बेटे की शिकायत करनी उन्हें भारी पड़ जाएगी. अगर उन्हें इस बात का खयाल होता तो वह शिकायत कभी नहीं करते.

बाप ने दी बेटे को शह

शिकायत का परिणाम उल्टा यह हुआ कि शाम के समय जब प्रिंस कहीं से घूम कर घर लौटा तो कृपाशंकर ने उस से पूछा, ‘‘बांसडीह के पंडित जितेंद्र तुम्हारी शिकायत ले कर यहां आए थे. वे कह रहे थे कि उन की बेटी को आतेजाते तंग करते हो, क्या बात है?’’

इस पर प्रिंस ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘पापा, यह सब गलत है, झूठ है. मैं ने उस की बेटी के साथ कभी बदसलूकी नहीं की. मैं तो उस की बेटी को जानता तक नहीं, छेड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. मुझे बदनाम करने के लिए पंडितजी झूठ बोल रहे होंगे.’’

‘‘ठीक है, मैं जानता हूं बेटा. मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है कि तू ऐसावैसा कोई काम नहीं करेगा. वैसे मैं ने पंडितजी को डांट कर भगा दिया है.’’

‘‘ठीक किया पापा,’’ प्रिंस के होंठों पर जहरीली मुसकान उभर आई.

प्रिंस ने उस समय तो पिता की आंखों में धूल झोंक कर खुद को बचा लिया. पुत्रमोह में अंधे कृपाशंकर को भी बेटे की करतूत दिखाई नहीं दी. नतीजा यह हुआ कि प्रिंस की आंखों में दुबे की बेटी रागिनी के लिए नफरत और गुस्से का लावा फूट पड़ा. उसे लगा कि पंडित की हिम्मत कैसे हुई कि उस के घर शिकायत करने आ गया. प्रिंस ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. आखिर उस ने वही किया, जो उस ने मन में ठान लिया था.

दिनदहाड़े रागिनी की हत्या के बाद आसपास के इलाके में दहशत फैल गई थी. मामला बेहद गंभीर था, इसलिए एसपी सुजाता सिंह ने अपराधियों को गिरफ्तार करने के सख्त आदेश दिए. कप्तान का आदेश पाते ही एसआई बृजेश शुक्ल अपनी पुलिस टीम के साथ आरोपियों को तलाशने में जुट गए.

8 अगस्त, 2017 को पुलिस ने जिले से बाहर जाने वाले सभी रास्तों को सील कर दिया. पुलिस को इस का लाभ भी मिला. बलिया से हो कर गोरखपुर जाने वाली रोड पर 2 आरोपी प्रिंस उर्फ आदित्य तिवारी और दीपू यादव उस समय पुलिस के हत्थे चढ़ गए जब वह जिला छोड़ कर गोरखपुर जा रहे थे.

दोनों को गिरफ्तार कर के पुलिस उन्हें थाना बांसडीह रोड ले आई. दोनों आरोपियों से रागिनी दुबे की हत्या के बारे में गहनता से पूछताछ की गई. पहले तो प्रिंस ने पुलिस को अपने पिता की ताकत की धौंस दिखाई लेकिन कानून के सामने उस की अकड़ ढीली पड़ गई. आखिर दोनों ने पुलिस के सामने घुटने टेकने में ही भलाई समझी. उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया. बाकी के 3 आरोपी मौके से फरार हो गए थे.

दोनों आरोपियों से की गई पूछताछ और बयानों के आधार पर दिल दहला देने वाली जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

55 वर्षीय जितेंद्र दुबे मूलत: बलिया जिले के बांसडीह में 6 सदस्यों के परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां और 1 बेटा अमन था. निजी व्यवसाय से वह अपने परिवार का भरण पोषण करते थे. उन का परिवार संस्कारी था.

बेटियों पर गर्व था दुबेजी को

उन की तीनों बेटियां गांव में मिसाल के तौर पर गिनी जाती थीं, क्योंकि तीनों ही अपने काम से काम रखती थीं. वे न तो अनर्गल किसी दूसरे के घर उठतीबैठती थीं और न ही फालतू की गप्पें लड़ाती थीं. वे पढ़ाई के साथ घर के काम में भी हाथ बंटाती थीं. दुबेजी बेटियों को बेटे से कम नहीं आंकते थे. तभी तो उन की पढ़ाई पर पानी की तरह पैसा बहाते थे. बेटियां भी पिता के विश्वास पर हमेशा खरा उतरने की कोशिश करती थीं.

तीनों बेटियों में नेहा बीए में पढ़ती थी, रागिनी 11वीं पास कर के 12वीं में गई थी जबकि सिया 11वीं में थी. स्वभाव में रागिनी नेहा और सिया दोनों से बिलकुल अलग थी. रागिनी पढ़ाईलिखाई से ले कर घर के कामकाज तक सब में अव्वल रहती थीं. वह शरमीली और भावुक किस्म की लड़की थी. जरा सी डांट पर उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकलती थी.

बात 2015 के करीब की है. रागिनी और सिया दोनों सलेमपुर के भारतीय संस्कार स्कूल में अलगअलग कक्षा में पढ़ती थीं. उस समय रागिनी 10वीं में थी और सिया 9वीं में. दोनों बहनें घर से रोजाना बजहां गांव हो कर पैदल ही स्कूल के लिए जातीआती थीं. बजहां गांव के ग्राम प्रधान कृपाशंकर तिवारी का बेटा प्रिंस उर्फ आदित्य उन्हें स्कूल आतेजाते बड़े गौर से देखा करता था.

प्रिंस पहली ही नजर में रागिनी पर फिदा हो गया था. थी तो रागिनी साधारण शक्लसूरत की, मगर उस में गजब का आकर्षण था. रागिनी और सिया जब भी स्कूल जाया करती, वह उन के इंतजार में गांव के बाहर 2-3 दोस्तों के साथ खड़ा रहता था.

वह उन्हें तब तक निहारता रहता था जब तक रागिनी और सिया उस की आंखों से ओझल नहीं हो जाती थीं. जबकि दोनों बहनें उस की बातों को नजरअंदाज कर के बिना कोई प्रतिक्रिया किए स्कूल के लिए निकल जाती थीं.

ऐसा नहीं था कि दोनों बहनें उन के इरादों से अंजान थीं, वे उन के मकसद को भलीभांति जान गई थीं. रागिनी प्रिंस से जितनी दूर भागती थी, प्रिंस उतना ही उस की मोहब्बत में पागल हुआ जा रहा था.

17 वर्षीय आदित्य उर्फ प्रिंस उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के बजहां गांव का रहने वाला था. उस का पिता कृपाशंकर तिवारी गांव का प्रधान था. प्रधान तिवारी की इलाके में तूती बोलती थी. उस से टकराने की कोई हिमाकत नहीं करता था. जो उस से टकराने की जुर्रत करता भी था, वह उसे अपनी पौवर का अहसास करा देता था. उस की सत्ता के गलियारों में अच्छी पहुंच थी. ऊंची पहुंच ने प्रधान तिवारी को घमंडी बना दिया था.

बातूनी औरत की फितरत

शिक्षा ने भी यही किया था, इसलिए उस का प्रेमी रोजी सिंह…

पहली अगस्त, 2019 का दिन था. उस वक्त सुबह के लगभग 11 बज रहे थे. उत्तराखंड के जिला हरिद्वार की प्रसिद्ध दरगाह पीरान कलियर के थानाप्रभारी अजय सिंह उस वक्त थाने में ही थे. तभी उन के पास एक व्यक्ति आया.

उस व्यक्ति ने अपना नाम भरत सिंह, निवासी हबीबपुर नवादा बताते हुए कहा कि उस का छोटा भाई रोजी सिंह कल से लापता है. उसे सभी जगहों पर ढूंढ लिया है लेकिन कोई जानकारी नहीं मिल रही. उस का मोबाइल फोन भी कल से बंद आ रहा है.

‘‘उस की उम्र कितनी है और कैसे गायब हुआ?’’ थानाप्रभारी अजय सिंह ने पूछा.

‘‘सर, उस की उम्र यही कोई 20-22 साल है. वह हरिद्वार के सिडकुल क्षेत्र में स्थित एक फैक्ट्री में काम करता है. कल दोपहर बाद 3 बजे वह अपनी मोटरसाइकिल ले कर ड्यूटी पर जाने के लिए निकला था. उस ने जाते समय घर पर बताया था कि रात 11 बजे तक घर लौट आएगा. जब वह रात 12 बजे तक भी नहीं लौटा तो हम ने उसे फोन किया. लेकिन उस का फोन बंद मिला.’’

‘‘तुम्हारा भाई शादीशुदा था? उस की किसी से कोई रंजिश तो नहीं थी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘नहीं सर, रोजी अविवाहित था. अभी कुछ दिन पहले ही इमलीखेड़ा की एक लड़की के साथ उस की मंगनी हुई थी और रही बात दुश्मनी की तो सर, उस की ही नहीं बल्कि हमारे परिवार में किसी की भी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है.’’ भरत सिंह ने बताया.

‘‘आप अपने भाई का फोटो दे कर गुमशुदगी दर्ज करा दीजिए, हम अपने स्तर से उसे ढूंढने की कोशिश करेंगे.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

भाई की गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद भरत सिंह घर लौट आया. चूंकि मामला जवान युवक की गुमशुदगी का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसपी (देहात) नवनीत सिंह भुल्लर को दे दी. उन्होंने थानाप्रभारी को इस मामले की जांच के निर्देश दिए. लेकिन 2 दिन बाद भी थानाप्रभारी लापता रोजी सिंह के बारे में कोई जानकारी नहीं जुटा पाए तो एसपी (देहात) नवनीत सिंह भुल्लर ने सीओ चंदन सिंह बिष्ट के निर्देशन में एक टीम गठित कर दी.

टीम में थानाप्रभारी अजय सिंह, महिला थानेदार शिवानी नेगी व भवानीशंकर पंत, एएसआई अहसान अली सैफ आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने सब से पहले रोजी सिंह के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. जांच में पता चला कि उस के फोन की आखिरी लोकेशन उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर के बरला कस्बे में थी. इस के अलावा उस के मोबाइल से जिस नंबर पर आखिरी बार बात हुई थी, वह मोबाइल नंबर शिक्षा नाम की युवती का था, जो गांव हबीबपुर नवादा की ही रहने वाली थी.

शिक्षा से पूछताछ करनी जरूरी थी, इसलिए थानाप्रभारी ने शिक्षा को थाने बुलवा लिया. उस से एसआई शिवानी नेगी ने पूछताछ की तो वह कहती रही कि रोजी के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है और न ही उस का रोजी से कोई ताल्लुक है.

‘‘तुम झूठ बोल रही हो, रोजी से तुम्हारी कल भी बात हुई थी. इतना ही नहीं, तुम्हारी इस से पहले भी काफी देरदेर तक बातें होती थीं. अब तुम इतना और बता दो कि 30 जुलाई को रोजी के गायब होने के बाद तुम मुजफ्फरनगर जिले के बरला कस्बे में क्या करने गई थीं?’’

शिवानी नेगी के मुंह से बरला कस्बे का नाम सुनते ही शिक्षा सहम गई और अपना सिर नीचे कर के रोने लगी. एसआई शिवानी नेगी ने उसे सांत्वना दे कर चुप कराया. तभी शिक्षा सुबकते हुए बोली, ‘‘मैडम, रोजी इस दुनिया में नहीं है. उस की हत्या कर दी गई है. हत्या में उस के भाई रोहित, आदेश और उन का दोस्त रजत भी शामिल थे.’’

हत्या की बात सुन कर पुलिस अधिकारी चौंक गए. थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘रोजी की लाश कहां है?’’

‘‘उस की हत्या बरला के गन्ने के एक खेत में ले जा कर की गई थी. लाश भी वहीं पड़ी होगी.’’ शिक्षा ने बताया.

पुलिस ने शिक्षा की निशानदेही पर उस के भाइयों आदेश, रोहित और इन के साथी रजत को गिरफ्तार कर लिया.

सीओ चंदन सिंह ने यह जानकारी एसपी (देहात) नवनीत सिंह को दी तो उन्होंने लाश बरामद करने के लिए एक पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना कर दी.

इस के बाद थानाप्रभारी के नेतृत्व में एक टीम चारों अभियुक्तों को ले कर बरला पहुंच गई. उन्होंने वहां की पुलिस से संपर्क किया, फिर थानाप्रभारी आरोपियों को साथ ले कर बरला पैट्रोल पंप के पीछे गन्ने के खेत में पहुंचे.

चारों आरोपियों ने पुलिस को वह जगह दिखा दी, जहां पर उन्होंने रोजी सिंह को घेर कर उस की हत्या की थी. इस के बाद पुलिस ने उन चारों की निशानदेही पर गन्ने के खेत से रोजी का शव बरामद कर लिया.

रोजी के सिर का कुछ हिस्सा किसी जानवर ने खा लिया था, दूसरे गरमी की वजह से उस का शव काफी गल गया था. प्राथमिक काररवाई में बरला पुलिस द्वारा रोजी के शव का पंचनामा भरा गया.

घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने रोजी सिंह का शव पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल मुजफ्फरनगर भेज दिया.

अगले दिन हरिद्वार के एसएसपी सेंथिल अवूदई कृष्णराज एस. ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर चारों आरोपियों को मीडिया के सामने पेश किया और रोजी की हत्या का खुलासा कर दिया. अभियुक्तों से पूछताछ के बाद रोजी सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

शिक्षा रुड़की क्षेत्र के गांव नगला इमरती की रहने वाली थी. करीब 7 साल पहले उस की शादी हबीबपुर नवादा निवासी जोगेंद्र से हुई थी. 3 बच्चे होने के बाद भी उस का रूपयौवन बरकरार था. करीब 2 साल पहले पड़ोस के रहने वाले रोजी सिंह से उस का चक्कर चल गया था. रोजी सिंह अविवाहित था, जिस पर शिक्षा पूरी तरह से फिदा थी. दोनों अकसर खेतों में जा कर रंगरलियां मनाते थे.

जब उन दोनों के अवैध संबंधों की जानकारी शिक्षा के पति जोगेंद्र को हुई तो उस ने पत्नी को परिवार की इज्जत की दुहाई देते हुए बहुत समझाया, मगर वह नहीं मानी. उस के ऊपर तो रोजी सिंह के इश्क का जबरदस्त भूत सवार था. वह उस के साथ जीनेमरने की कसमें खा चुकी थी.

अंत में जोगेंद्र ने समाज में हो रही बदनामी के कारण शिक्षा को 25 मई, 2019 को घर से निकाल दिया. इस के बाद जोगेंद्र ने इस मामले की सूचना स्थानीय इमलीखेड़ा पुलिस चौकी को भी दे दी थी, मगर पुलिस ने मामले को पतिपत्नी विवाद बता कर जोगेंद्र को महिला हेल्पलाइन केंद्र रुड़की जाने की सलाह दी.

पति द्वारा घर से निकाल देने के बाद शिक्षा अपने मायके में जा कर रहने लगी. लेकिन उस का अपने प्रेमी रोजी सिंह से संपर्क बराबर बना रहा. फोन पर दोनों बात करते रहते थे और समय निकाल कर मिल भी लेते थे.

रोजी के कारण शिक्षा को पति से तो अलग होना ही पड़ा, साथ ही मायके में भी उसे काफी अपमान झेलना पड़ रहा था. मगर रोजी के प्रेम के कारण वह सब सहन कर रही थी. कुछ दिनों पहले शिक्षा को पता चला कि रोजी की मंगनी तय हो गई है. इस बारे में शिक्षा ने रोजी से बात की तो उस ने बताया कि घर वालों के दबाव में उसे शादी करनी पड़ रही है.

प्रेमी का यह जवाब सुन कर वह तिलमिला गई. उस के मन में रोजी के प्रति नफरत पैदा हो गई. क्योंकि जिस रोजी के कारण वह ससुराल से निकाली गई थी, वही रोजी उसे छोड़ कर किसी और लड़की का होने जा रहा था.

रोजी से नफरत होने के कारण शिक्षा ने एक भयानक निर्णय ले लिया. वह निर्णय था रोजी की हत्या का. इस योजना में उस ने अपने 2 भाइयों रोहित व आदेश और उन के दोस्त रजत को भी शामिल कर लिया.

फिर शिक्षा ने एक योजना के तहत 30 जुलाई, 2019 को रोजी को शाम के समय रुड़की में दिल्ली रोड पर स्थित सैनिक अस्पताल तिराहे पर पहुंचने को कहा. शिक्षा ने कहा कि हमें बरला कस्बे में एक तांत्रिक के पास चलना है. रोजी निर्धारित समय पर मोटरसाइकिल से सैनिक अस्पताल तिराहे पर पहुंच गया. वहीं पर शिक्षा उस का इंतजार कर रही थी. वह रोजी के पीछे बाइक पर बैठ कर बरला की ओर चल दी.

योजना के अनुसार, उस के दोनों भाई रोहित व आदेश और उन का दोस्त रजत दूसरी बाइक से रोजी का पीछा करते हुए चलने लगे. शिक्षा प्रेमी के साथ बरला के पैट्रोल पंप के पास पहुंच गई.

तब तक अंधेरा घिर चुका था. वहां पहुंचने पर शिक्षा ने रोजी से कहा कि हमें जिस तांत्रिक के पास जाना है, वह पैट्रोल पंप के पीछे जंगल में मिलेगा. रोजी ने अपनी बाइक जंगल की तरफ मोड़ दी. तभी पीछा करते हुए रोहित, आदेश व रजत भी वहां पहुंच गए. उन्हें देख कर रोजी समझ गया कि मामला गड़बड़ है. वह घबरा कर वहां से भागने की कोशिश करने लगा. मगर रोहित व आदेश ने रोजी को दबोच लिया. उन्होंने उस पर डंडे से हमला कर दिया.

रोजी के सिर पर डंडा लगने से वह लहूलुहान हो गया. इस के बाद रोहित व आदेश ने तुरंत रोजी के गले में गमछा डाल कर खींच दिया, जिस से रोजी की मौके पर ही मौत हो गई.

रोजी की मौत के बाद शिक्षा के दोनों भाइयों ने रोजी के शव को खींच कर पास के गन्ने के खेत में डाल दिया. इस के बाद वे लोग रोजी की बाइक, मोबाइल व गमछे को दिल्ली रोड स्थित मंगलौर के निकट फेंक कर घर आ गए.

पुलिस ने शिक्षा, रोहित, आदेश व रजत से पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 365, 302, 201, 34 के तहत केस दर्ज कर लिया. आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से 3 अगस्त, 2019 को उन्हें जेल भेज दिया गया.

रोजी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी पुलिस को मिल गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रोजी का शरीर ज्यादा गल जाने के कारण मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो पाया. इस मामले में डाक्टरों ने उस का विसरा व डीएनए सुरक्षित रख लिया था.

कथा लिखे जाने तक आरोपी शिक्षा, रोहित, आदेश व रजत जेल में थे. केस की आगे की जांच थानाप्रभारी अजय सिंह कर रहे थे.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य- सत्यकथा, अक्टूबर 2019