शबाना ससुराल आ गई. ससुराल में 10-15 दिन तो ठीक से गुजरे, लेकिन उस के बाद उसे फिर से प्रताडि़त किया जाने लगा. शबाना के 3 माह के गर्भ को अफसरी गिराने में जुट गई. वह उसे तरहतरह की दवाएं खिलाने लगी. आसिफ भी उस के साथ मारपीट करने लगा.
परेशान हो कर शबाना ने पिता को फोन कर के सारी बात बता दी. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और थाना संगम विहार में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत की एक प्रति उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग को भी भेज दी. यह मामला साकेत स्थित महिला सेल में पहुंचा. वहां सुनवाई भी हुई, पर कोई फैसला नहीं हुआ.
अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि उन्हें शबाना से छुटकारा पाना है. अब उसे उस के पिता समरुद्दीन से भी मिलने नहीं दिया जाता था. चूंकि शबाना गर्भवती थी, इसलिए आसिफ उसे तलाक भी नहीं दे सकता था. क्योंकि इसलाम में गर्भवती महिला को तलाक नहीं दिया जा सकता. उन्होंने मौलवियों से मशविरा कर के एक योजना बनाई और उसी योजना के तहत समरुद्दीन से कहा कि वह 11 जून, 2016 को पंचायत में आ कर अपनी बात कहें.
11 जून, 2016 को अलीदराज की फैक्ट्री में पंचायत बैठी. समरुद्दीन भी उस पंचायत में पहुंचे. शबाना भी अपने बच्चों के साथ पंचायत में आई. पंचों के पूछने पर शबाना ने कहा कि वह आसिफ के साथ रहना चाहती है, पर वह उस के साथ मारपीट न करे. परंतु आसिफ ने कहा कि अब वह उसे तलाक देना चाहता है. इस पर पंचों ने कहा कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता.
शबाना और समरुद्दीन परेशान थे. आखिर एक सादे कागज पर दोनों से जबरदस्ती दस्तखत करा लिए गए. फिर उसी कागज पर अलगअलग रहने का समझौता तैयार किया गया. उस में जो लिखा गया, उस के अनुसार मनमुटाव की वजह से शबाना और आसिफ एक साथ नहीं रहना चाहते. अत: दहेज का 30 हजार रुपए का चैक शबाना को दिया जाता है. इस के अलावा 5 हजार रुपए इद्दत के दौरान का खर्च भी दिया जाता है.
समझौते में यह भी लिखा गया था कि दोनों बच्चे अलीशा और आतिश आसिफ के पास रहेंगे. पंचायत में आसिफ ने शबाना से कह दिया कि वह समझ ले कि उस का तलाक हो चुका है. उस के दोनों बच्चे उस के पास ही रहेंगे. शबाना कहती रही कि उस के बच्चे उसे दे दिए जाएं, लेकिन किसी ने उस की एक नहीं सुनी और बापबेटी को जबरन बाहर निकाल दिया गया.
शबाना पिता के साथ एटा आ गई. मां रजिया को जब पता चला कि बेटी को उस के पति ने छोड़ दिया है तो उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. गर्भवती बेटी की हालत भी खराब थी. आखिर रजिया ने अपने आंसू पोंछ कर बेटी को संभाला.
पंचायत ने आसिफ से कहा था कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता, लेकिन बच्चा पैदा होने के बाद वह फोन कर के 3 तलाक कह सकता है. यही योजना बना कर इद्दत के दौरान दिया जाने वाला भरणपोषण का खर्च आसिफ ने 5 हजार रुपए पहले ही दे दिए थे.
इस के बाद आसिफ ने समझ लिया कि उस का तलाक हो चुका है. बस कहना भर बाकी है. लेकिन शबाना और उस के मांबाप आसिफ और उस के घर वालों को सबक सिखाना चाहते थे.
इस संबंध में समरुद्दीन एडवोकेट मोहम्मद इरफान से मिले. समझौता देख कर उन्होंने कहा कि किसी भी दृष्टि से शबाना और आसिफ का तलाक नहीं हुआ है. इसलिए शबाना को अपने पति से बच्चे और भरणपोषण का खर्च पाने का पूरा हक है.
एडवोकेट मोहम्मद इरफान ने 24 नवंबर, 2016 को शबाना की तरफ से मुकदमा दायर करा दिया. शबाना ने 4 दिसंबर, 2016 को एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अहमद रखा गया. वह पूरी तरह से स्वस्थ है. जुलाई, 2017 में आसिफ ने बरेली की किसी लड़की से निकाह कर लिया. शादी की बात सुन कर शबाना काफी दुखी हुई. मांबाप के समझाने पर शबाना ने खुद को संभाला और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस ली.
शबाना आसिफ से अपने बच्चों की वापसी का और भरणपोषण का मुकदमा लड़ रही है. उस का कहना है कि सौतेली मां उस के बच्चों को कभी खुश नहीं रख सकेगी. 9 अगस्त, 2017 को उस ने परिवार न्यायालय एटा में सैक्शन 10 के अंतर्गत गार्जियन ऐंड वार्ड्स एक्ट का केस दायर कर दिया है.
22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. शबाना खुश है कि अब आसिफ उसे कम से कम 3 तलाक तो नहीं दे सकता. वह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ कर उस से अपने बच्चे और गुजाराभत्ता ले लेगी. वह एक चरित्रहीन शौहर के पास जाने के बजाय अकेली रह कर स्वाभिमान के साथ जीने का प्रण कर चुकी है.
शराब के लिए पैसे नहीं दिए तो दे दिया तलाक
बिहार के जिला बेगूसराय के थाना वीरपुर की पश्चिमी पंचायत क्षेत्र में मोहम्मद शकील अपनी पत्नी रूबेदा खातून के साथ रहता था. दोनों का विवाह 22 साल पहले हुआ था और घर में 6 बच्चे थे.
शकील शराब का लती था, मजबूरी में रूबेदा ही जैसेतैसे परिवार का भरणपोषण करती थी. बिहार में नीतीश सरकार ने शराब पर पाबंदी लगाई तो शराबियों को दिन में तारे नजर आने लगे.
लेकिन शराब ऐसी चीज है, जो पाबंदी के बावजूद भी बंद नहीं होती. लोग बेचनेखरीदने के नएनए रास्ते खोज लेते हैं. गुजरात की तरह बिहार का भी हाल है. मोहम्मद शकील ने भी शराब मिलने का अड्डा तो खोज लिया, पर उसे ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ने लगी. एक दिन जब शकील ने रूबेदा से पैसे मांगे तो उस ने पैसे देने से इनकार कर दिया.
इस से शकील आपे से बाहर हो गया और गुस्से में रूबेदा को 3 बार तलाक बोल कर उस से रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दिया. घबरा कर रूबेदा ने पासपड़ोस के लोगों को हकीकत बताई. वे लोग जानते थे कि शकील आए दिन रूबेदा के साथ मारपीट करता है.
वे रूबेदा का साथ देने के वादे के साथ उसे थाना वीरपुर ले गए. जहां रूबेदा ने पूरी बात थानाप्रभारी बाबूलाल को बताई. थानाप्रभारी ने 15 अगस्त, 2017 को रूबेदा की ओर से शकील के खिलाफ उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया. लेकिन तलाक के मामले में वह भी कुछ नहीं कर सकते थे. बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद रूबेदा और उस के 6 बच्चों का भविष्य अंधकारमय होने से बच गया.
आला हजरत के खानदान की बहू भी 3 तलाक के फेर में
कोई सोच भी नहीं सकता कि 3 तलाक के चक्कर में बरेली के आला हजरत खानदान की बहू रही निदा खान मौत के आगोाश में जाने से बामुश्किल बच पाई है. 5 मई, 2017 को निदा जब अपने वालिद के घर थी, तभी करीब दर्जन भर गुंडों ने घर में घुस कर तोड़फोड़ की. निदा को कमरे में बंद कर के ताला लगा दिया गया था, इसलिए वह बच गई. बाकी घर वालों के साथ गुंडों ने मारपीट की.
बदमाश जातेजाते धमकी दे कर गए कि निदा बच नहीं पाएगी. निदा को उस के पति ने 3 तलाक कह कर घर से निकाल दिया था. इस मामले को ले कर निदा अदालत गई. उस का केस तो दर्ज हो गया, लेकिन बदले में दुश्मनी भी मिली.
निदा के भाई मोइन खान का कहना है कि जब एक दिन वह और निदा अदालत से घर लौट रहे थे तो रास्ते में कुछ बाइक सवारों ने उन के साथ बदसलूकी की और केस वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी. इस के बाद उन के घर पर गुंडे आए थे. निदा अपनी लड़ाई तो लड़ ही रही है, साथ ही अपने जैसी महिलाओं की मदद भी करती है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से निदा खुश है. उसे न्याय मिल सकेगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा.



