प्यार पर टूटा पंचायत का कहर – भाग 2

सोनी की एक झलक पाने के लिए वह बेताब था. पागलदीवानों की तरह वह यहांवहां भटकता फिरता था. उस की हालत देख कर मां जेलस देवी काफी परेशान रहती थी. मां ने भी बेटे को काफी समझाया कि उस ने जो किया, उसे समाजबिरादरी कभी मान्यता नहीं दे सकती. रिश्ते के बुआभतीजे की शादी को कोई स्वीकार नहीं करेगा. बेहतर है, तुम इसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ.

मगर हिमांशु मां की बात को मानने को तैयार नहीं था. उधर सोनी ने भी अपनी मां से कह दिया कि वह हिमांशु के अलावा किसी और लड़के से शादीनहीं करेगी. मां ने बहुत समझाया लेकिन प्रेम में अंधी सोनी की समझ में नहीं आया. वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

मां भी क्या करती, जब समझातेसमझाते वह थक गई तो उस ने कुछ भी कहना छोड़ दिया. काफी देर बाद सोनी की समझ में आया कि उसे आजादी पानी है तो पहले घर वालों को विश्वास दिलाना होगा कि वह हिमांशु को पूरी तरह भूल चुकी है. घर वालों को जब उस पर विश्वास हो जाएगा तब वह इस का फायदा उठा कर हिमांशु तक पहुंच सकती है. अगर एक बार वह उस के पास पहुंच गई तो उसे कोई रोक नहीं पाएगा.

ये दिमाग में विचार आते ही सोनी का चेहरा खिल उठा और वह घडि़याली आंसू बहाते हुए मां की गोद में जा कर समा गई, ‘‘मां मुझे माफ कर दो. वाकई मुझ से बड़ी भूल हो गई थी. मैं ने आप की बात नहीं मानी, इसलिए आप के मानसम्मान को ठेस पहुंची. मेरी ही वजह से आप को और पापा को बेइज्जती का सामना करना पड़ा. पता नहीं ये सब कैसे हो गया. बताओ अब मैं क्या करूं.’’

‘‘देख बेटी, सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते. फिर तू तो मेरा अपना खून है.’’ मां ने सोनी को समझाया, ‘‘मैं तो कहती हूं बेटी कि जो हुआ उसे बुरा सपना समझ कर भूल जा. तेरी शादी मैं अच्छे से अच्छे खानदान में करूंगी.’’

उस के बाद मांबेटी एकदूसरे के गले मिल कर पश्चाताप के आंसू पोंछती रहीं. मां को विश्वास में ले कर सोनी मन ही मन खुश थी. उस के होंठों पर एक अजीब सी कुटिल मुसकान थिरक उठी थी.

मांबाप को भी जब पक्का यकीन हो गया कि सोनी ने हिमांशु से बात तक करनी बंद कर दी है तो उन्होंने धीरेधीरे उस के ऊपर की पाबंदी हटा ली. पिता परमानंद अब उस के लिए लड़का ढूंढने लगे ताकि वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकें.

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परमानंद को इस बात की जरा भी भनक नहीं थी, उन की बेटी मांबाप की आंखों में धूल झोंक रही है. जबकि उस की योजना प्रेमी के साथ फुर्र हो जाने की है.

योजना मुताबिक, सोनी ने मां के सामने ननिहाल जाने की इच्छा प्रकट की तो मां उसे मना नहीं कर सकी. सोचा कि बेटी ननिहाल घूम आएगी तो मन भी बदल जाएगा. यही सोच कर सितंबर, 2016 में उसे बेटे के साथ ननिहाल भेजवा दिया.

ननिहाल पहुंचते ही सोनी आजाद पंछी की तरह हो गई. उस ने हिमांशु को फोन कर दिया कि वह ननिहाल में आ गई है. यहां उस पर किसी तरह की कोई पाबंदी या बंदिश नहीं है. इसलिए वह यहां आ कर उस से मिल सकता है. यह खबर मिलते ही हिमांशु उस की ननिहाल पहुंच गया.

महीनों बाद दोनों एकदूसरे से मिले थे. उन्होंने पहले जी भर कर एकदूसरे को प्यार किया. उसी वक्त सोनी ने हिमांशु से कह दिया कि वह उस के बिना जी नहीं सकती. वो उसे यहां से कहीं दूर ऐसी जगह ले चले, जहां उन के अलावा कोई तीसरा न हो. हिमांशु भी यही चाहता था कि सोनी को ले कर वह इतनी दूर चला जाए, जहां अपनों का साया तक न पहुंच सके.

सोनी घर से भागने के लिए हिमांशु पर दबाव बनाने लगी. प्यार के सामने विवश हिमांशु यार दोस्तों से कुछ रुपयों का बंदोबस्त कर के उसे ले कर दिल्ली भाग गया. परमानंद को जब पता चला तो वह आगबबूला हो उठा. उस ने हिमांशु और उस के घर वालों के खिलाफ कजरैली थाने में बेटी के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया.

अपहरण का मुकदमा दर्ज होते ही कजरैली  थाने की पुलिस सक्रिय हुई. पुलिस ने हिमांशु के घर पर दबिश दी. हिमांशु घर से गायब मिला तो पुलिस हिमांशु की मां जेलस देवी को थाने ले आई. उस से सख्ती से पूछताछ की लेकिन वह कुछ नहीं बता पाई. तब पुलिस ने जेलस देवी को घर भेज दिया.

कई महीने बाद भी जब सोनी का पता नहीं चला तो पुलिस हिमांशु और सोनी को हाजिर कराने के लिए जेलस देवी पर बारबार दबाव बनाती रही. कहीं से यह बात हिमांशु को पता चल गई कि पुलिस उस की मां को बारबार परेशान कर रही है. तब 8 महीने बाद हिमांशु सोनी को ले कर घर लौट आया.

सोनी ने अदालत में हाजिर हो कर न्यायाधीश के सामने यह बयान दिया कि वह बालिग हो चुकी है. अपनी मनमरजी से कहीं आजा सकती है. उसे अच्छेबुरे का ज्ञान है. अब रही बात मेरे अपहरण करने की तो मैं अपने मरजी से ननिहाल गई थी. वहीं रह रही थी, हिमांशु ने मेरा अपहरण नहीं किया था. बल्कि मैं अपनी मरजी से कहीं गई थी. हिमांशु निर्दोष है.

भरी अदालत में सोनी के बयान सुन कर परमानंद और उन के साथ आए लोग दंग रह गए, क्योंकि उस ने हिमांशु के पक्ष में बयान दिया था. सोनी के बयान के आधार पर अदालत ने उसे मुक्त दिया.

यह सब सोनी की वजह से ही हुआ था. इसलिए परमानंद भीतर ही भीतर जलभुन कर रह गया. उस समय तो उस ने समझदारी से काम लिया. वह सोनी को ले कर घर आ गया और हिमांशु अपने घर चला गया. घर ला कर परमानंद ने सोनी को बंद कमरे में खूब मारापीटा. फिर उसे उसी कमरे में बंद कर के बाहर से ताला लगा दिया.

इस के बाद परमानंद ने ठान लिया कि हिमांशु की वजह से ही पूरे समाज में उस के परिवार की नाक कटी है, इसलिए वह उसे ऐसा सबक सिखाएगा कि सब देखते रह जाएंगे. वह धीरेधीरे गांव के लोगों को भी हिमांशु के खिलाफ भड़काने लगा कि उस की वजह से ही पूरे गांव की बदनामी हुई है.

घर से निकलते ही – भाग 2

प्रदीप उस का जरा भी विरोध नहीं कर पाता था. इस का कारण था कि वह घर का काफी खर्च अपने सिर उठाए हुए थी. वह उस से अधिक कमाई कर रही थी. उसे लगता था कि जैसे वह घरपरिवार की झंझटों से फ्री हो गई हो.

दूसरी तरफ प्रदीप सुस्त मिजाज का आलसी इंसान था. उस के पास कोई ठोस कामधंधा नहीं था. जो कुछ काम जानता था, वह कोरोना की भेंट चढ़ गया था. ज्योति की निगाह में वह एकदम निखट्टू था.

प्रदीप उसी के पास के गांव का रहने वाला 35-36 का था. हालांकि वह हंसमुख, मिलनसार और स्वभाव का सरल व्यक्ति था. वह ज्योति की तरह खुले विचारों का नहीं था.

यही कारण था कि ज्योति हर समय उस की नाक में दम किए रहती थी. प्रदीप ने मात्र इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. वह एक समय में बंटाई पर खेतीबाड़ी किया करता था. वही उस के परिवार के लिए आमदनी का जरिया था.

परिवार में उस का बड़ा भाई महेंद्र सिंह था. बनी गांव के संतोष सिंह की बेटी ज्योति के साथ उस का विवाह साल 2012 में हुआ था. उस ने भी इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. पढ़ाई के दरम्यान ही उस के दिमाग में आत्मनिर्भर बनने की बात बैठ गई थी. वह नौकरी करना चाहती थी.

विवाह के बाद उस के सपने एक तरह से मिटने लगे थे. जल्द ही बेटी की मां बन गई. फिर 2 साल बाद बेटा पैदा हुआ. 2 साल बाद उस ने एक और बच्चे को जन्म दिया.

शादी के कुछ साल बाद से ही उस का मन घर से बाहर निकल कर काम करने के लिए बेचैन रहता था. 5-6 सालों में घर का खर्च भी बढ़ने लगा था. इस के लिए उस ने पति को मना लिया कि वह शहर में कहीं काम तलाश करेगी.

वह प्रदीप के साथ सासससुर से नजर बचा कर कंपनियों में काम की तलाश में लगी रहती थी. प्रदीप पर भी नौकरी खोजने के लिए दबाव डालती थी. कई बार इस बात को ले कर उन के बीच बहस भी हो जाती थी.

पति लगने लगा निठल्ला

इस बहस और विवाद के चलते ज्योति ने प्रदीप को निठल्ला कह कर ताने मारने शुरू कर दिए थे. वह कहती थी, ‘‘खुद तो निठल्ले पडे़ रहते हो. अगर तुम्हारी बहुत जानपचान है तो मुझे भी किसी स्कूल या कंपनी में 8-10 हजार की नौकरी का इंतजाम क्यों नहीं करवा देते हो?’’

इस ताने से तंग आ कर प्रदीप ने ईरिक्शा चलाने का निर्णय ले लिया. उस ने अपने बड़े भाई महेंद्र सिंह के एक परिचित की मदद से मोहनलाल गंज से 50 हजार रुपए में एक ईरिक्शा निकलवा लिया. बाकी की किस्त बन गई थी.

महेंद्र की मदद से प्रदीप रिक्शा चलाने लगा था. गांव से शहर तक आनेजाने की सवारियां होती थीं. उन में स्कूल जाने वाली लड़कियां और गांव के मजदूर भी होते थे.

दोपहर तक फेरे लगाने के बाद बैटरी चार्ज करने के लिए घर चला आता था. दोबारा 3 बजे निकलता था और शाम के 7 बजे तक वापस आ जाता था. मोहनलालगंज के धनवारा गांव तक आने के कारण उस की आमदनी ठीकठाक होने लगी थी.

कुछ महीने गुजर जाने के बाद ज्योति फिर से पति पर दबाव बनाने लगी कि उसे शहर में कोई काम दिलवा दे या कोई छोटामोटा धंधा ही करवा दे. उस ने तर्क दिया कि अब तो ईरिक्शा भी है. शाम को साथसाथ उस पर वापस लौट आएगी. प्रदीप को उस का सुझाव पसंद आया और उस ने हामी भर दी. वह पत्नी के लिए काम की तलाश करने लगा.

ज्योति के कहने पर ही प्रदीप ने बड़ी बेटी और बेटे को मोहनलालगंज के एक स्कूल में दाखिला करवा दिया था. प्रदीप को रिक्शा चलाते हुए करीब 9 महीने निकल गए. उस की बाकी किस्तें भी चुका दीं. उन्हीं दिनों उस की जानपहचान दारोगा खेड़ा निवासी जोगेंद्र सिंह चौहान से हो गई. वह उस के ननिहाल से रिश्ते में ममेरा भाई लगता था.

उन्नाव जिले के सोहरामऊ के गांव बल्लूखेड़ा का मूल निवासी जोगेंद्र 40 साल का हट्टाकट्टा मर्द था. मजबूत कदकाठी के साथसाथ आकर्षक व्यक्तित्व का था. वह  उन दिनों बंथरा थाना क्षेत्र में एक नेटवर्किंग कंपनी में काम करता था. इस कारण वह अलग से किराए का कमरा ले कर रह रहा था.

इस कंपनी में उस की मार्केटिंग टीम थी. टीम के लड़केलड़कियों और शादीशुदा औरतें घरघर जा कर सदस्य बनाने का काम करती थीं.

प्रदीप ने अपनी पत्नी ज्योति के बारे में जोगेंद्र सिंह से बात की. जोगेंद्र ने अपने फुफेरे भाई के आग्रह को गंभीरता से लिया. उस की सीनियर से सिफारिश कर ज्योति को भी कंपनी में काम मिल गया.

संयोग से ज्योति जोगेंद्र सिंह के अंडर में काम करने लगी. जोगेंद्र लड़कियों के रोजमर्रा के उपयोग की चीजों की सप्लाई का काम स्वयं करता था.

इस तरह ज्योति मन लगा कर काम करने लगी. कहने को तो जोगेंद्र उस का रिश्ते में जेठ लगता था, लेकिन बहुत जल्द ही उस से घुलमिल गई. उसे नाम ले कर बुलाने लगी और साथसाथ उठनेबैठने लगी.

लिवइन में रहकर बेटी और बहू पर बुरी नजर – भाग 2

एक दिन जैसे ही पूनम के पिता पुरोहिताई में घर से बाहर निकले तो एक पड़ोसी ने टोका, ‘‘क्यों पंडितजी, बेटी का ब्याह घर में बैठने के लिए किए थे? समाज में कोई मानमार्यादा है या नहीं?’’

दरवाजे की ओट में बैठी पूनम अपने बेटी को दूध पिला रही थी. पिता से इस तरह की गई बात उसे चुभ गई. उस के पिता ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन एक नजर उसे देखते हुए तेज कदमों निकल गए.

अगले दिन ही पड़ोस की चाची आई और मांबाबूजी को ताना मारती हुई बोली, ‘‘का हो पंडिताइन नतिनी के बयाह ताही करबहूं की?’’

‘‘ऐसा काहे बोलती हो? अभी नतनी 3 महीना के है.’’

‘‘पूनम के दूल्हा कहां है? बेटी जन्म लेवे पर कोय हालचाल लेवे नहीं आया, ऐही से कहलियो. हमर बात के बुरा मता मानिह…’’

‘‘आइथिन कैसे नय! दिल्ली यहीं है? आबेजाय में खरचा हय…समय लाग हय…तोर बेटिया के ससुराल सुलतानपुर जैसन थोड़े हय कि कुछो गाड़ीघोड़ा से घंटा भर में आ जाय.’’ पूनम की मां ने जवाब दिया.

पूनम को अपने पड़ोस में चाची की बात बहुत बुरी लगी. उस के जाते ही वह बोली, ‘‘माई गे 1000 रुपया के इंतजाम कर दे हम दिल्ली जायम.’’

‘‘तू दिल्ली जयबे? कैसे? दूल्हा के पता मालूम हउ?’’ पूनम की मां बोली.

‘‘हां गे माई, ससुराल से अबे घड़ लक्ष्मी नगर बोललथिन.’’ पूनम बोली.

‘‘कहां खोजवहीं? पूनम की मां ने प्रश्न किया.

‘‘कल्लू के साथे रह हथिन न! उ ओहजे मदर डेरी के बगल में काम कर हथिन.’’ पूनम ने मां को समझाया.

‘‘अच्छा आवे दे बाबूजी के… सांझ के बोलवउ.’’ मां ने कहा.

पूनम की मां ने उसे आश्वासन दिया. शाम को जैसे ही पंडित जी आए, उन्होंने पूनम के बारे बात की. पहले तो वह यह सुन कर तमतमा गए. सिर्फ इतना कह पाए, ‘अकेले गोदी में बच्चा के ले कर कैसे जाएगी?’

इस पर पूनम की मां ने ही बताया कि मोहल्ले का एक लड़का 2 दिन बाद दिल्ली जा रहा है. उस के साथ पूनम जा सकती है. वह भरोसे का लड़का है. वहीं लक्ष्मी नगर में ही पढ़ता है. उस से बात भी कर ली है.

‘‘जब तुम मांबेटी ने पहले से ही मन बना लिया है तो मुझ से पूछने की क्या जरूरत?’’ पंडितजी बोले.

‘‘जाय खातिर कुछ पैसा चाहिए.’’

‘‘अच्छाअच्छा! केतान में हो जयतइ?’’ पंडितजी के इतना कहने पर कमरे के बाहर दरवाजे पर कान लगाए पूनम के चेहरे पर चमक आ गई. वहीं से बोल पड़ी, ‘‘जादे नय बाबूजी एक हजार रुपया, 3 सौ रुपया हमारो पास हकय.’’

‘‘अरे ओतना में की होतव…साथ में बच्चा हकउ… ओकर चिंता मत कर…आजे यजमान के हिंआ से दक्षिणा के पैसा मिललउ है…ले देख तो एकरा में केतना है?’’ यह कहते हुए पंडितजी ने कमर से खोंसी हुई छोटी सी थैली निकाल कर पूनम को दे दी. पूनम थैली ले कर उन के सामने ही 10, 20, 50, 100 के नोट और सिक्के निकाल कर गिनने लगी, ‘‘1800 रुपया.’’

‘‘सिक्का गिन…’’

‘‘350 रुपया.’’

‘‘सब रख ले. खुदरा पैसा है, रास्ता में काम अइतव…थैली भी रख ले…कल्हे बउवा और तोरा लगी नया कपड़ा ला देवअ.’’ पंडितजी बोले.

‘‘जी बाबूजी!‘‘ बोलती हुई पंडितजी के गले लग गई. उस की आंखों से आंसू आ गए.

‘‘अगे अभीए काहे रावे हें…जाय में अभी 2 दिना बाकी हकउ.’’ कह कर उस की मां अपनी आंचल से पूनम के गालों पर आए आंसू पोछने लगी.

…और फिर पूनम 2 दिन बाद भागलपुर से नई दिल्ली को आने वाली विक्रमशिला एक्सप्रेस से जाने के लिए जमालपुर जंक्शन स्टेशन पर आ गई थी. उस ने जनरल का टिकट ले लिया था. संयोग से उसी ट्रेन से जाने वाले लड़के का कोच जनरल डिब्बे से सटा हुआ था. ट्रेन समय से जमालपुर से चल दी थी.

ट्रेन सुबहसुबह नई दिल्ली आ गई थी. पूनम के साथ आए लड़के की मदद से पांडव नगर स्थित मदर डेयरी पहुंच गई. लड़का वहां से अपने ठहरने वाली जगह चला गया, जबकि पूनम ने कल्लू के बारे में पता करने लगी.

कल्लू तो मिल गया, लेकिन उस ने बताया कि उस का पति सुखदेव तिवारी अब उस के साथ नहीं रहता है. वह गाजियाबाद की किसी फैक्ट्री में काम करता है, इसलिए वहीं रहने चला गया है.

पूनम की गोद में नवजात बच्चा देख कर कल्लू ने पूछा, ‘‘तुम्हारा कोई और रहने का ठिकाना है?’’

पूनम ने ‘न’ में सिर हिला दिया. इस पर कल्लू उस से अपने किराए के कमरे पर ले गया, जो पास में ही था. छोटे से कमरे में ही एक स्लैब पर स्टोव और कुछ बरतन थे. कल्लू ने कहा अभी यहीं थोड़ा आराम कर ले. पहले वह उस के लिए इधर ही कहीं कोई कमरा दिलवा देगा. फिर सुखदेव के बारे में पता करेगा.

शाम को जब कल्लू अपने कमरे पर आया तब साफसुथरा घर देख कर चौंक गया. स्लैब पर करीने से धुले बरतन सजे हुए थे. स्टोव भी चमक रहा था. बिछावन ढंग से बिछे हुए थे. इधरउधर बिखरे कपड़े अलमारी में तह लगाए गए थे. बच्ची सो रही थी.

कल्लू खुश हो कर बोला, ‘‘अरे वाह! तुम ने तो हमारे घर को चमका दिया. यही होता है किसी औरत के घर में आने का असर. बच्ची ने दूध पिया? तुम ने कुछ खाया?’’

‘‘हां, नीचे दुकान से दूध लाई थी, आटा भी लाई. आलू यहीं थे. खाना पका दिया है है, परोस दूं?’’ पूनम झेंपती हुई बोली.

‘‘अरे इतना सब कुछ कर लिया?’’ कल्लू बोला.

‘‘…दूध भी बचा है, चाय पीनी हो तो बोलिए?’’ पूनम बोली.

‘‘मैं ने तुम्हारे लिए भी पास में ही एक कमरा देख लिया है, चलो दिखाए देता हूं.’’ कल्लू बोला.

‘‘पहले कुछ खा लीजिए.’’ पूनम बोली.

‘‘आ कर खाऊंगा…पहले कमरा देख लेता हूं…’’ कल्लू बोला.

‘‘जी अच्छा!’’ पूनम बोली.

संयोग से उन लोगों की आवाज सुन कर सो रही बच्ची भी जाग गई.

कविता : अपनी ही पत्नी की हत्या करने पर क्यों मजबूर हुआ विभाष

विभाष ने पक्का निश्चय कर लिया कि भले ही उसे नौकरी छोड़नी पड़े, लेकिन अब वह दिल्ली में बिलकुल नहीं रहेगा. संयोग अच्छा था कि उसे नौकरी नहीं छोड़नी पड़ी. मैनेजमेंट ने खुद ही उस का लखनऊ स्थित ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया.

विभाष के लिए यह दोहरी खुशी इसलिए थी, क्योंकि उस की पत्नी लखनऊ में ही रहती थी. ट्रांसफर का और्डर मिलते ही विभाष जाने की तैयारी में जुट गया, उस ने पैकिंग शुरू कर दी. वह एकएक कर के सामान बैग में रख रहा था. उस के पास एक दरजन से भी ज्यादा शर्ट थीं. उन्हें रखते हुए उसे अंदाजा हो गया कि उस के पास लगभग हर रंग की शर्ट है. लेकिन उन में नीले रंग की शर्टें कुछ अधिक ही थीं. क्योंकि अवी यानी अवनी को नीला रंग ज्यादा अच्छा लगता था.

शुरूशुरू में जब वह अवनी से मिलने जाता था, हमेशा नई शर्ट पहन कर जाता था. अवनी उस के सिर के बालों में अंगुलियां फेरते हुए कहती थी, ‘‘विभाष, नीली शर्ट में तुम बहुत स्मार्ट लगते हो.’’

अवनी के बारबार कहने की वजह से ही नीला रंग उस की पसंद बन गया था. शर्टों को देखतेदेखते उस ने अपना हाथ सिर पर फेरा तो उसे अजीब सा लगा. वह अपना घर खाली कर रहा था, वह रसोई का सारा सामान समेट चुका था. फ्रीज में रखा जूस और ब्रेड भी खत्म हो गई थी. डाइनिंग टेबल पर रखी फलों की टोकरी भी खाली थी.

सब चीजों को खाली देख कर उस से अपने भरे हुए बैग की ओर देखा. उस के मन में आया कि घर खाली करने में वह जितना समय लगाएगा, उसे उतनी ही देर होगी. अभी उस के बहुत काम बाकी था, जिस के लिए उसे काफी दौड़भाग करनी थी.

अभी उस ने बैंक का अपना खाता भी बंद नहीं कराया था. लेकिन इस के लिए वह परेशान भी नहीं था. क्योंकि उस में कोई ज्यादा रकम नहीं थी. थोड़े पैसे पडे़ थे. लेकिन एक बार बैंक मैनेजर से मिलने का उस का मन हो रहा था. बैंक मैनेजर से ही नहीं, अवनी से भी. दिल्ली आ कर उस ने नोएडा में अपनी नौकरी जौइन की थी. तब फाइनेंस मैनेजर गुप्ताजी ने उसे बैंक के खासखास कामों की जिम्मेदारी सौंप दी थी, जो उस ने बखूबी निभाई थी.

विभाष की कार्यकुशलता देख कर ही उसे बैंक के बड़े काम सौंपे गए थे. बैंक मैनेजर मि. शर्मा से उस की अच्छी पटती थी. शर्माजी ने ही उस का परिचय अवनी से कराया था. इस के बाद बैंक के कामों को ले कर उस की अवनी से अकसर मुलाकात होने लगी, जो धीरेधीरे बढ़ती गई.

विभाष और बैंक अधिकारी अवनी की ये मुलाकातें जल्दी ही दोस्ती में बदल गईं. कभीकभी दोनों बैंक के बाहर भी मिलने लगे. उन की इन मुलाकातों में अवनी की अधिक उम्र, 3 साल के बेटे की मां होना और विधवा होने के साथसाथ लोगों की कानाफूसी भी आड़े नहीं आई. उन की दोस्ती और प्यार गंगा में तैरते दीए की तरह टिमटिमाता रहा.

मजे की बात यह थी कि दोनों का एक शौक मेल खाता था, कौफी पीने का. उन्हें जब भी मौका मिलता, अट्टा मार्केट स्थित कौफीहाउस में कौफी पीने पहुंच जाते. कौफी पीते हुए दोनों न जाने कितनी बातें कर डालते. उन में मनीष की यादें भी होती थीं. मनीष यानी अवनी का पति.

ध्रुव की मस्ती का खजाना भी कौफी की सुगंध में समाया होता था. मनीष के साथ शादी और उस की छोटीछोटी आदतों का विश्लेषण भी कौफी की मेज पर होता था. कभीकभी दोनों चुपचाप एकदूसरे को ताकते हुए कौफी की चुस्की लेते रहते.

उस समय दोनों के बीच भले ही मौन छाया रहता, लेकिन दिल कोई मधुर गीत गाता रहता. अवनी के गालों पर आने वाली लटों को विभाष एकटक ताकता रहता. उन लटों से वह कब खेलने लगा उसे पता ही नहीं चला.

मनीष की बातें करते हुए अवनी के चेहरे पर जो भाव आते, वे विभाष को बहुत अच्छे लगते थे. ऐसे में एक दिन उस ने कहा भी था, ‘‘अवनी, तुम्हारी बातों और आंखों में बसे मनीष को मैं अच्छी तरह पहचान गया हूं. लेकिन अब तुम्हारे जीवन में विभाष धड़कने लगा है.’’

यह सुन कर अवनी की आंखों में अनोखी चमक आ गई थी. उस ने कहा था, ‘‘विभाष, मेरी और मनीष की शादी घर वालों की मरजी से हुई थी. पर हमारे प्यार के लय में लैला मजनूं जैसी धड़कनें थीं.’’ यह कहतेकहते उस की आवाज गंभीर हो गई थी. उस ने आगे कहा था, ‘‘मेरा ध्रुव मेरे लिए मनीष के प्यार की भेंट है. अब वही मेरे जीवन का आधार है.’’

विभाष की शादी कुछ दिनों पहले ही हुई थी. उस की पत्नी लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएड कर रही थी. इसलिए वह विभाष के साथ दिल्ली नहीं आ सकी थी. वैसे भी यहां विभाष की नईनई नौकरी थी. वह यहां अच्छी तरह जम कर, अपना फ्लैट ले कर पत्नी को लाना चाहता था.

अब उसे पत्नी के बिना एक पल भी रहना मुश्किल लगने लगा था. एक दिन अवनी ने उस से पूछा भी था, ‘‘तुम यहां से पत्नी के लिए क्या ले जाओगे?’’

जवाब देने के बजाए विभाष अवनी को एकटक ताकता रहा. उसे इस तरह ताकते देख अवनी खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘अरे मेरे बुद्धू राम, तुम यहां से जा रहे हो तो पत्नी के लिए कुछ तो ले जाओगे. उसे क्या पसंद है?’’

‘‘उसे रसगुल्ला बहुत पसंद है.’’ विभाष ने कहा.

अवनी और जोर से हंसी, किसी तरह हंसी को रोक कर उस ने कहा, ‘‘अरे रसगुल्ला तो पेट में जा कर हजम हो जाएगा. तुम्हें नहीं लगता कि कोई ऐसी चीज ले जानी चाहिए, जो महिलाओं को अच्छी लगती हो.’’

विभाष को असमंजस में फंसा देख कर अवनी मुसकरा कर रह गई. कुछ दिनों बाद अवनी ने एक बढि़या सी हरे रंग की साड़ी ला कर विभाष को देते हुए कहा, ‘‘इसे अपनी पत्नी के लिए ले जाइए, उन्हें बहुत अच्छी लगेगी.’’

विभाष कुछ देर तक उस साड़ी को हैरानी से देखता रहा. उस के बाद अवनी पर नजरें जमा कर पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि यह रंग मेरी पत्नी को बहुत पसंद है?’’

‘‘तुम्हारी बातों से.’’ अवनी ने सहज भाव से कहा.

थोड़ी देर तक विभाष कभी साड़ी को तो कभी अवनी को देखता रहा. वह अवनी की दी गई भेंट को लेने से मना नहीं कर सकता था, इसलिए साड़ी ले कर अपने औफिस बैग में रख ली. धीरेधीरे दोनों में नजदीकियां बढ़ती गईं. यह नजदीकी कोई और रूप लेती, उस के पहले ही विभाष ने वह समाचार ‘प्रेमिका के लिए पत्नी की हत्या’ पढ़ा. ऐसे में उस का घर ही नहीं जिंदगी भी बिखर सकती थी.

वह भूल गया था कि यहां रह कर वह अवनी से दूर नहीं रह सकता. इसीलिए उस ने वापस जाने का निर्णय लिया था. उस के बौस उस के काम से खुश थे. इसलिए उसे अपने लखनऊ स्थित औफिस में शिफ्ट कर दिया था. इस तरह उस की नौकरी भी बची रहती और वह अपनी पत्नी के पास भी पहुंच जाता.

उस ने अलमारी से अवनी द्वारा दी गई साड़ी निकाली. कुछ देर तक साड़ी को देखने के बाद उस ने जैसे ही बैग में रखी, डोरबेल बजी. कौन हो सकता है. उस ने सब के पैसे तो दे दिए थे. अपने जाने की बात भी बता दी थी.

उस ने दरवाजा खोला तो सामने अवनी को खड़ा देख हैरान रह गया. वह इस वक्त आ सकती है, उसे जरा भी उम्मीद नहीं थी, इसीलिए वह उसे अंदर आने के लिए भी नहीं कह सका. अवनी उस का हाथ पकड़ कर अंदर ले आई. विभाष उसे देखने के अलावा कुछ कह नहीं सका.

अवनी के अंदर आते ही जैसे एक तरह की सुगंध ने उसे घेर लिया. उस सुगंध ने उस के मन को ही नहीं, बल्कि देह को. खास कर आंखें को घेर लिया था. उस का मन अभी भी मानने को तैयार नहीं था कि अवनी उस के कमरे में उस के साथ मौजूद है. जबकि अवनी उस का हाथ थामे उस के समने खड़ी थी.

सुगंध उस की आंखों में भरी थी, जो मन को लुभा रही थी. क्योंकि अवनी एक मस्ती भरे झोंके की तरह थी. वह कब खुश हो जाए और कब नाराज, अंदाजा लगाना मुश्किल था. तभी उसे कुछ दिनों पहले की बात याद आ गई.

अचानक एक दिन अवनी ने कौफी पीने जाने से मना कर दिया था. ऐसा क्यों हुआ, विभाष अंदाजा भी नहीं लगा सका. उस ने भी अवनी से कौफी पीने चलने का आग्रह नहीं किया. कुछ कहे बगैर वह वहां से चला गया. जहां वह हमेशा कौफी पीता था, वहीं गया.

अवनी ने कौफी पीने से मना कर दिया था, इसलिए कौफी पीने का उस का भी मन नहीं हुआ. आखिर में बगैर कौैफी पिए ही वह घर लौट आया. विभाष इतना ही सोच पाया था कि अवनी रसोई के पास आ कर बोली, ‘‘कौफी है या वो भी खत्म कर दी?’’

अब तक विभाष को घेरने वाली मनपसंद सुगंध हट गई थी. उस ने आंखें झपकाते हुए कहा, ‘‘नहीं…नहीं, कौफी की शीशी अपनी जगह पर रखी है.’’

कहता हुआ विभाष अवनी के पीछेपीछे किचन में आ गया. उस ने किचन की छोटी सी अलमारी से सारा सामान समेट लिया था.

लेकिन कौफी की शीशी और चीनी रखी थी. उस में से कौफी की शीशी निकाल कर अवनी के हाथ में रख दी. अवनी कौफी बनाने लगी तो वह बाहर आ गया. अवनी कौफी के कप ले कर कमरे में आई तो विभाष वहां नहीं था. उसे कौफी की सुगंध बहुत पसंद थी. वह वहां से चला गया, यह सोचते हुए अवनी कौफी से निकलती भाप को देखती रही.

पलभर बाद विभाष हांफता आया तो उस के हाथों में मोनेको और मेरी गोल्ड बिस्किट के पैकेट थे. अवनी ने कहा, ‘‘आज तो बिना बिस्किट के भी चल जाता.’’

‘‘जो आदत है, वह है. उस के बिना कैसे चलेगा?’’ विभाष ने कहा.

‘‘तुम्हारे बिना तो अब चलाना ही पड़ेगा.’’ अवनी ने कहा.

इसी के साथ दोनों की नजरें मिलीं, जैसे बिना गिरे कोई चीज व्यवस्थित हो जाए. उसी तरह उन की नजरें व्यवस्थित हो गई थीं. अवनी ने पूछा, ‘‘अभी तुम्हारी कितनी पैकिंग बाकी है?’’

‘‘लगभग हो ही गई है.’’

‘‘तो आज आखिरी बार साथ बैठ कर कौफी पी लेते हैं.’’ कहते हुए अवनी कौफी के दोनों कप ले कर बालकनी में आ गई. वहां पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर बैठते हुए अवनी ने कहा, ‘‘तुम्हें यहां आए कितने दिन हुए?’’

विभाष ने कौफी की चुस्की लेते हुए कहा, ‘‘करीब 1 साल.’’

‘‘मुझे अच्छी तरह याद है. तुम्हें यहां आए 11 महीने 10 दिन हुए हैं.’’ अवनी ने कहा.

विभाष ने कोई जवाब नहीं दिया. क्योंकि वह जानता था कि बैंक अधिकारी अवनी का जोड़नाघटाना गलत नहीं हो सकता. अवनी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम जब भी आए, अपनी जानपहचान को गिनो तो एक लंबा अरसा हो गया, लेकिन देखा जाए तो यह कोई बहुत लंबा अरसा भी नहीं है.

‘‘तुम्हारे आने से जिंदगी जीने के लिए मुझे एक साथी मिल गया था. मैं मनीष की यादों के साथ जी रही थी और आज भी जी रही हूं. पर तुम से दोस्ती होने के बाद हमारी यानी मेरी और मनीष की यादों का बुढापा जाता रहा. हम कितनी बार कौफी हाउस में साथसाथ बैठे, ध्रुव को ले कर पार्क में बैठे. वहां बैठ कर डूबते सूरज को साथसाथ देखते रहे. कितने मनपसंद काम साथसाथ किए.’’

‘‘अवनी, तुम यह बातें इस तरह बता रही हो, जैसे कविता पढ़ रही हो.’’ विभाष ने कहा. उसे अवनी के मुंह से यह सब कहना अच्छा लग रहा था.

‘‘अपनी दोस्ती भी तो एक कविता की ही तरह है.’’ अवनी ने आंख बंद कर के कहा.

‘‘मुझे लगता है कि अपनी इस दोस्ती को कविता की ही तरह रखना है तो हमारा अलग हो जाना ही ठीक है.’’

इतना कह कर अवनी खड़ी हो गई. विभाष ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बात को ठीक से समझ नहीं सका. जरा अपनी बात को इस तरह कहो कि समझ में आ जाए.’’

‘‘विभाष, तुम ने मुझे जितने भी दिन दिए, वे मेरे लिए यादगार रहेंगे. मैं ने तुम्हें अपने मन मंजूषा में संभाल कर रख लिया है. यह थोड़ा मनपसंद समय और लंबा खिंचता तो उसे समय की नजर लग सकती थी. उस में न जाने कितनी झूठी सच्ची बातों और घटनाओं का टकराव होता. तुम्हारी शादी अनीशा से हुई है. तुम सुख से उस के साथ अपना जीवन व्यतीत करो. मैं अपनी जिंदगी मनीष की यादों और ध्रुव को पालने- पोसने में बिता लूंगी.

‘‘वादा करो कि तुम मुझे कभी ईमेल नहीं करोगे. जब कभी मेरी याद आए, अनीशा का हाथ पकड़ कर अस्त होते सूर्य को देखना और प्यार की छोटीछोटी कविताएं पढ़ कर सुनाना. अपना जीवन सुखमय बनाना.’’ इतना कह कर अवनी ने विभाष के गाल पर हल्के से चुंबन करते हुए कहा, ‘‘विभाष, मुझे तो प्यार की मीठी कविता होना है, महाकाव्य नहीं.’’

पहचान : मां की मौत के बाद क्या था अजीम का हाल – भाग 2

उस ने राबिया से कहा, ‘‘अभी मैं तुम्हें यहां से सामान दे दूं तो नैशनल रजिस्टर में नाम दर्ज का अलग ही बखेड़ा खड़ा होगा. तुम्हारे परिवार का नाम छूटा है इस पहचान रजिस्टर में.’’

‘‘क्या करें, हम भी उन 40 लाख समय के मारों में शामिल हैं, जिन के सरकारी रजिस्टर में नागरिक की हैसियत से नाम दर्ज नहीं हैं. अब्बा नहीं हैं. जिंदगी जीने के लाले पड़े हुए हैं. नाम दर्ज करवाने के झमेले कैसे उठाएं?’’

‘‘ठीक है, तुम लोग पास ही के सरकारी स्कूल में बने शरणार्थी शिविरों में रह रहे हो न. मैं काम खत्म कर के 6 बजे तक सामान सहित वहां पहुंच जाऊंगा. तुम फिक्र न करो, मैं जरूर आऊंगा?’’

शिविर में आ कर राबिया की आंखें घड़ी पर और दिल दरवाजे पर अटका रहा. 2 कंबल, चादर और खानेपीने के सामान के साथ नीरद राबिया के पास पहुंच चुका था.

अम्मी तो धन्यवाद करते बिछबिछ जाती थीं. राबिया ने बस एक बार नीरद की आंखों में देखा. नीरद ने भी नजरें मिलाईं. क्या कुछ अनकहा सा एकदूसरे के दिल में समाया, यह तो वही जानें, बस, इतना ही कह सकते हैं कि धनसिरी की इस बाढ़ ने भविष्य के गर्भ में एक अपठित महाकाव्य का बीज ला कर रोप दिया था.

शरणार्थी शिविर में रोज का खाना तो दिया जाता था लेकिन नैशनल रजिस्टर औफ सिटिजन्स में जिन का नाम नहीं था, बिना किसी तकरार के वे भेदभाव के शिकार तो थे ही, इस मामले में आवाज उठाने की गुंजाइश भी नहीं थी क्योंकि स्थानीय लोगों की मानसिकता के अनुरूप ही था यह सबकुछ.

बात जब गलतसही की होती है, तब यह सुविधाअसुविधा और इंसानियत पर भी रहनी चाहिए. लेकिन सच यह है कि लोगों की तकलीफों को करीब से देखने के लिए हमेशा एक अतिरिक्त आंख चाहिए होती है.

बेबसी, अफरातफरी, इतिहास की खूनी यादें, बदले की झुलसाती आग, अपनेपरायों का तिकड़मी खेल और भविष्य की भूखी चिंता. राबिया के पास इंतजार के सिवा और कुछ न था.

नीरद जबजब आ जाता, राबिया, अजीम और उन की अम्मी की सांसें बड़ी तसल्ली से चलने लगतीं, वरना वही खौफ, वही बेचैनी.

राबिया नीरद से काफीकुछ कहना चाहती, लेकिन मौन रह जाती. हां, जितना वह मौन रहती उस का अंतर मुखर हो जाता. वह रातरातभर करवटें लेती. भीड़ और चीखपुकार के बीच भी मन के अंदर एक खाली जगह पैदा हो गई थी उस के. राबि?या के मन की उस खाली जगह में एक हरा घास का मैदान होता, शाम की सुहानी हवा और पेड़ के नीचे बैठा नीरद. नीरद की गोद में सिर रखी हुई राबिया. नीरद कुछ दूर पर बहती धनसिरी को देखता हुआ राबिया को न जाने प्रेम की कितनी ही बातें बता रहा है. वह नदी, हां, धनसिरी ही है. लेकिन कोई शोर नहीं, बदला नहीं, लड़ाई और भेदभाव नहीं. सब को पोषित करने वाली अपनी धनसिरी. अपनी माटी, अपना नीरद.

आज शाम को किराए के अपने मकान में लौटते वक्त आदतानुसार नीरद आया. नीरद के यहां आते अब महीनेभर से ऊपर होने को था.

राबिया एक  कागज का टुकड़ा झट से नीरद को पकड़ा उस की नजरों से ओझल हो गई.

अपनी साइकिल पर बैठे नीरद ने कागज के टुकड़े को खोला. असमिया में लिखा था, ‘‘मैं असम की लड़की, तुम असम के लड़के. हम दोनों को ही जब अपनी माटी से इतना प्यार है तो मैं क्या तुम से अलग हूं? अगर नहीं, तो एक बार मुझ से बात करो.’’

नीरद के दिल में कुछ अजीब सा हुआ. थोड़ा सा पहचाना, थोड़ा अनजाना. उस ने कागज के पीछे लिखा, ‘‘मैं तुम्हारी अम्मी से कल बात करूंगा?’’ राबिया को चिट्ठी पकड़ा कर वह निकल गया.

चिट्ठी का लिखा मजमून पढ़ राबिया के पांवों तले जमीन खिसक गई. ‘‘पता नहीं ऐसा क्यों लिखा उस ने? कहीं शादीशुदा तो नहीं? मैं मुसलिम, कहीं इस वजह से वह गुस्सा तो नहीं हो गया? क्या मैं ने खुद को असमिया कहा तो बुरा मान गया वह? फिर जो भी थोड़ाबहुत सहारा था, छिन गया तो?’’

राबिया का दिल बुरी तरह बैठ गया. बारबार खुद को लानत भेज कर भी जब उस के दिल पर ठंडक नहीं पड़ी तो अम्मी के पास पहुंची. उन्हें भरसक मनाने का प्रयास किया कि वे तीनों यहां से चल दें. जो भी हो वह नीरद को अम्मी से बात करने से रोकना चाहती थी.

अम्मी बेटी की खुद्दारी भी समझती थीं और दुनियाजहान में अपने हालात भी, कहा, ‘‘बेटी, बाढ़ से सारे रास्ते कटे पड़े हैं. कोई ठौर नहीं, खाना नहीं, फिर जिल्लत जितनी यहां है, उस से कई गुना बाहर होगी. जान के लाले भी पड़ सकते हैं. नन्हे अजीम को खतरा हो सकता है. तू चिंता न कर, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शाम को कुछ रसद के साथ नीरद हाजिर हुआ और सामान राबिया को पकड़ा कर अम्मी के पास जा बैठा. अम्मी का हाथ अपने हाथों में ले कर उस ने कहा, ‘‘राबिया की वजह से आप से और अजीम से जुड़ा. अब मैं सचमुच यह चाहता हूं कि आप तीनों मेरे साथ गुवाहाटी चलें. जब मेरा यहां का काम खत्म हो जाए तब मैं आप सब से हमेशा के लिए बिछुड़ना नहीं चाहता. गुवाहाटी में मैं राबिया को एक एनजीओ संस्था में नौकरी दिलवा दूंगा. अजीम का दाखिला भी स्कूल में हो जाएगा. आप सिलाई वगैरह का कोई काम देख लेना. और रहने की चिंता बिलकुल न करिए. वहां हमारा अपना घर है. आप को किसी चीज की कोई चिंता न होने दूंगा.’’

राबिया की तो जैसे रुकी हुई सांस अचानक चल पड़ी थी. बारिश में लथपथ हवा जैसे वसंत की मीठी बयार बन गई थी. अम्मी ने नीरद के गालों को अपनी हथेलियों में भर कर कहा, ‘‘बेटा, जैसा कहोगे, हम वैसा ही करेंगे. अब तुम्हें हम सब अपना ही नहीं, बल्कि जिगर का टुकड़ा भी मानते हैं.’’

अजीम यहां से जाने की बात सुन नीरद की पीठ पर लद कर नीरद को दुलारने लगा. नीरद ने राबिया की ओर देखा. राबिया मारे खुशी के बाहर दौड़ गई. वह अपनी खुशी की इस इंतहा को सब पर जाहिर कर शर्मसार नहीं होना चाहती थी जैसे.

महीनेभर बाद वे गुवाहाटी आ गए थे. नीरद के दोमंजिला मकान से लगी खाली जगह में एक छोटा सा आउटहाउस किस्म का था, शायद माली आदि के लिए. छत पर ऐसबेस्टस था. लेकिन छोटा सा 2 कमरे वाला हवादार मकान था. बरामदे के एक छोर पर रसोई के लिए जगह घेर दी गई थी. वहां खिड़की थी तो रोशनी की भी सहूलियत थी. पीछे छोटा सा स्नानघर आदि था. एक अदद सूखी जमीन पैर रखने को, एक छत सिर ढांपने को, बेटी राबिया की एनजीओ में नौकरी, अजीम का सरकारी स्कूल में दाखिला और खुद अम्मी का एक टेलर की दुकान पर सिलाई का काम कर लेना- इस से ज्यादा उन्हें चाहिए भी क्या था.

पर बात यह भी थी कि उन के लिए इतना पाना ही काफी नहीं रहा. नैशनल रजिस्टर औफ सिटिजन्स का सवाल तलवार बन कर सिर पर टंगा था. अगर जी लेना इतना आसान होता तो लोग पीढ़ी दर पीढ़ी एक आशियाने की तलाश में दरबदर क्यों होते? क्यों लोग अपनी कमाई हुई रोटी पर भी अपना हक जताने के लिए सदियों तक लड़ाई में हिस्सेदार होते? नहीं था इतना भी आसान जीना.

अभी 3-4 दिन हुए थे कि नीरद की मां आ पहुंची उन से मिलने. राबिया की मां ने सोचा था कि वे खुद ही उन से मिलने जाएंगी, लेकिन नीरद ने मना कर दिया था. जब तक वे दुआसलाम कर के उन के बैठने के लिए कुरसी लातीं, नीरद की मां ने तोप के गोले की तरह सवाल दागने शुरू किए.

‘‘नीरद ढंग से बताता कुछ नहीं, आप लोग हैं कौन? धर्मजात क्या है आप की? आप की बेटी रोज कहां जाती है? नीरद ने किराया कुछ बताया भी है या नहीं? हम ने यह घर माली के लिए बनवाया था. अब जब तक आप लोग हो, मेरा बगीचा फिर से सही कर देना. वैसे, हो कब तक आप लोग?’’

अम्मी ने हाथ जोड़ दिए, कहा, ‘‘दीदी, नीरद बड़ा अच्छा बच्चा है. बाढ़ में हमारा घरबार सब डूब गया. समय थोड़ा सही हो जाए, चले जाएंगे.’’

सिर से पांव तक राबिया की अम्मी को नीरद की मां ने निहारा और कहा, ‘‘घरवालों के सीने में मूंग दल कर बाहर वालों पर रहमकरम कर रहा है, अच्छा बच्चा तो होगा ही.’’

बिना तलाक के तलाकशुदा – भाग 2

दोस्तों की इस बात से आसिफ ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उसे लगा कि शबाना से निकाह कर के उस ने बहुत बड़ी गलती की थी. उस दिन के बाद से आसिफ शबाना से उखड़ाउखड़ा रहने लगा. उसे शबाना में हजार कमियां नजर आने लगीं. बातबात में वह उस की पिटाई करने लगा. उस की इस पिटाई से शबाना का 2 बार गर्भपात हो गया.

शबाना परेशान थी कि इस तरह पिटते हुए जिंदगी कैसे बीतेगी? पति का व्यवहार काफी तकलीफ देने वाला था. परेशान हो कर उस ने पिता को फोन कर दिया कि दिल्ली आ कर वह उसे ले चलें. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और शबाना को एटा ले गए. घर पहुंच कर शबाना ने मांबाप को पति द्वारा प्रताडि़त करने की सारी बात बता दी.

अब तक समरुद्दीन को कहीं से पता चल चुका था कि शादी से पहले आसिफ किसी शादीशुदा औरत को भगा ले गया था. पुलिस ने उसे चंडीगढ़ में गिरफ्तार किया था. लेकिन आसिफ के नाना इसलाम ने किसी तरह से उसे जेल जाने से बचा लिया था. उस के बाद आननफानन में शबाना से उस का निकाह करा दिया गया था. इस से समरुद्दीन को लगा कि उस के साथ धोखा हुआ है.

society

आसिफ मोटी बीवी शबाना से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा. कुछ दिनों बाद वह शबाना को ले आया. शबाना एक बार फिर गर्भवती हो गई. घर वाले बेटा होने की उम्मीद कर रहे थे. शबाना को लगा कि अगर बेटा न हुआ तो उस पर होने वाले अत्याचार बढ़ जाएंगे. समय पर शबाना को बेटा ही हुआ, लेकिन वह दिव्यांग था. उस का नाम आतिश रखा गया.

दिव्यांग बेटा पैदा होने की वजह से शबाना पर होने वाले अत्याचार बढ़ गए थे. सास ने कह दिया था कि दिव्यांग बच्चे पैदा करने वाली बहू के साथ उस के बेटे का कोई भविष्य नहीं है. अब वह अपने बेटे के लिए चांद सी बहू लाएगी.

‘‘तो फिर मेरा क्या होगा अम्मी?’’ शबाना ने पूछा तो अफसरी ने कहा, ‘‘तुझे तलाक दे देगा और क्या होगा. मेरा बेटा मर्द है, जवान है, 4-4 शादियां कर सकता है.’’

‘‘नहीं, यह गलत है.’’ शबाना ने कहा तो अफसरी ने आसिफ से कहा, ‘‘तोड़ दे इस के हाथपैर. अब यह हमें बताएगी कि क्या गलत है और क्या सही है.’’

आसिफ जानवरों की तरह शबाना पर टूट पड़ा. इस के बाद बातबात पर उस की पिटाई होने लगी. शबाना समझ नहीं पा रही थी कि वह अब क्या करे? दिव्यांग बेटा पैदा होने के बाद आसिफ बेलगाम हो गया था. अलीदराज और अफसरी अकसर फैक्ट्री में रहते थे. ऐसे में आसिफ बाजारू लड़कियों को घर ला कर शबाना के सामने ही कमरे में बंद हो जाता था. विरोध करने पर उस की पिटाई करता और उसे घर से निकाल देने की धमकी देता.

आसिफ शबाना को इतना परेशान कर देना चाहता था कि वह खुद ही घर छोड़ कर चली जाए. क्योंकि उस के लिए दूसरी बीवी की तलाश शुरू हो गई थी.

आसिफ अपने दोस्तों को घर बुला कर उन के साथ शराब पीता. उस के दोस्तों ने नशे में एक दो बार शबाना से छेड़छाड़ भी की. शबाना ने इस बात की शिकायत आसिफ से की तो उस ने कहा, ‘‘अगर तू मेरे दोस्तों के साथ सो जाएगी तो तेरा क्या बिगड़ जाएगा.’’

पति इतना गिर सकता है, शबाना ने सोचा भी नहीं था. शौहर की हरकतें बरदाश्त से बाहर होती जा रही थीं. शबाना समझ गई कि आसिफ उस से छुटकारा पाना चाहता है. वह बुरी तरह फंसी हुई थी. वह कुछ कर भी नहीं सकती थी. संयोग से उसी बीच वह गर्भवती हो गई. इस की जानकारी होते ही आसिफ ने कहा, ‘‘तुझे यह बच्चा गिरवाना होगा, वरना तू फिर से दिव्यांग बच्चे को जन्म देगी. हमें तो स्वस्थ बेटा चाहिए.’’

शबाना ने पति को बहुत समझाया, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा. शबाना पिता को बुला कर उन के साथ मायके चली गई. वह ससुराल के बजाय मायके में ही बच्चे को जन्म देना चाहती थी. लेकिन अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि वह इस बच्चे को पैदा नहीं होने देंगे. उसी बीच आसिफ के लिए बरेली की एक लड़की तलाश कर ली गई थी. फरवरी, 2016 में आसिफ ससुराल पहुंचा और ससुर समरुद्दीन से कहा कि वह शबाना को ले जाना चाहता है.

लेकिन समरुद्दीन ने शबाना को विदा करने के बजाय कहा कि वह उन लोगों के खिलाफ अदालत में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज कराएंगे. ससुर के तेवर से आसिफ डर गया. उस ने माफी मांगते हुए कहा, ‘‘मुझ से जो गलती हुई, उसे माफ कर दें. अब मैं शबाना को कुछ नहीं कहूंगा.’’

आखिर समरुद्दीन ने कुछ लोगों को बुलाया तो उन के सामने आसिफ ने आश्वासन दिया कि अब वह शबाना को अच्छी तरह रखेगा. इस के बाद समरुद्दीन ने शबाना को विदा कर दिया.

इंसाफ में देर है पर अंधेर नहीं

ऐसा लग रहा है यह कोई अपराध नहीं, बल्कि फिल्मी कहानी है. अगर कोई निर्माता इस पर फिल्म बनाने का निर्णय ले ले तो हैरानी भी नहीं होनी चाहिए. घटना की शुरुआत या अंत कुछ भी कह लें, जबलपुर के थाना कैंट के बिलहरी मोहल्ले से हुई, जो मंडला रोड पर स्थित है. यहां अनुसूचित जाति के लोग ज्यादा रहते हैं. ज्यादा नहीं, अब से कुछ साल पहले तक बिलहरी एक गांव हुआ करता था. लेकिन धीरेधीरे यहां लोग बसने लगे तो यह जबलपुर के कैंट इलाके का प्रमुख मोहल्ला इस लिहाज से हो गया, क्योंकि यहां आसपास के गांव वालों के अलावा दूसरे शहरों और राज्यों के भी लोग आ कर बसने लगे थे.

कुछ लोगों को छोड़ दें तो बिलहरी में रह रहे ज्यादातर लोग मेहनतमजदूरी कर रोज कमानेखाने वाले हैं और कच्चे मकानों या झुग्गियों में रहते हैं. रोजाना कई लोग आ कर इस इलाके में बसते हैं और फिर धीरेधीरे यहीं के हो कर जबलपुरिया कहलाने लगते हैं.

रोजगार की तलाश में ऐसा ही एक जोड़ा अप्रैल, 2015 में जबलपुर आया तो बिलहरी में किराए का मकान ले कर रहने लगा. पति का नाम मयूर मलिक था और पत्नी का रिंकी शर्मा. रहने का ठिकाना मिल गया तो मयूर इधरउधर काम करने लगा. कुछ दिनों बाद उसे एक दुकान में नौकरी मिल गई. जल्दी ही उन के यहां एक बेटा भी हो गया.

रिंकी हालांकि हंसमुख और मिलनसार स्वभाग की थी, लेकिन अड़ोसपड़ोस में उस का कम ही उठनाबैठना था. रोज होने वाली बातचीत में उस ने पड़ोसियों से अपने बारे में बताया था कि वह और मयूर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के एक गांव के रहने वाले हैं.

शादी के बाद रोजगार की तलाश में दोनों जबलपुर आ गए हैं. आमतौर पर वहां रहने वालों में बाहर से आए परिवारों की औरतें भी घरगृहस्थी चलाने के लिए मजदूरी या घरों में झाड़ूपोंछा, बरतन आदि का काम करती थीं, पर रिंकी ने ऐसा कुछ नहीं किया तो इस की एक खास वजह थी.

उस खास वजह का पता 9 मई, 2017 को तब पता चला, जब थाना कैंट के थानाप्रभारी मनजीत सिंह दलबल के साथ उस के घर पहुंचे. पुलिस को देख कर स्वाभाविक रूप से हलचल मचनी ही थी. मोहल्ले वाले सवालिया नजरों से एकदूसरे को देखने लगे कि आखिर हुआ क्या है? रिंकी और मयूर मलिक तो किसी झगड़ेफसाद में भी नहीं पड़ते थे.

किसी को अंदाजा नहीं था कि सीधेसादे दिखने और लगने वाले रिंकी और मयूर एक हैरतंगेज फसाद खड़ा कर यहां रह रहे थे, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. इसलिए जिस ने भी सुना, आंखें फाड़े हैरानी से यही कहा कि ‘हे भगवान! इतना बड़ा धोखा और जुर्म. कैसे लोग हैं ये?’

रिंकी और मयूर को थाना कैंट लाया गया. उन के गुनाह से परदा उठ चुका था. उन का गुनाह ऐसा था, जिस के बारे में मनजीत सिंह तो दूर, आला अफसरों ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी होता है. सचमुच उन दोनों ने जो किया था, हैरान करने वाला था.

थाने में सिर झुकाए बैठी बेबस और थकीहारी रिंकी ने जो कहानी बताई, वह वाकई रहस्य और रोमांच से भरपूर थी, जिसे सुन कर हर किसी को उस आदमी पर तरस आया था, जिस का नाम मनोज शर्मा था. रिंकी की शादी बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के गांव सरैया के रहने वाले मनोज शर्मा से फरवरी, 2015 में हुई थी. सरैया गांव थाना गुरका में आता है.

ससुराल में कुछ दिनों तक रहने के बाद एक दिन रहस्यमय तरीके से रिंकी गायब हो गई. उस की गुमशुदगी की खबर जब उस के पिता चंद्रशेखर शर्मा और मां बबीता को लगी तो उन्होंने थाने में रिपोर्ट लिखाई कि उन के दामाद मनोज और उस के घर वालों ने दहेज के लालच में उन की बेटी की हत्या कर दी है. यही नहीं, उन्होंने रिंकी की लाश भी पुलिस के सामने पेश कर दी थी, जो पूरी तरह से पहचान में नहीं आ रही थी.

पुलिस ने इस मामले में यकीन शायद इसलिए कर लिया था, क्योंकि खुद लड़की के मांबाप ने लाश की पहचान की थी. लिहाजा दहेज मांगने और हत्या के जुर्म में मनोज को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जिस की सुनवाई अदालत में चल रही थी.

मनोज की मां ललिता देवी को यकीन नहीं हो रहा था कि उन का सीधासादा बेटा अपनी पत्नी की हत्या कर सकता है. वह पुलिस वालों के सामने खूब रोईंगिड़गिड़ाईं, पर सब बेकार गया. तजुर्बेकार ललिता को बहू की हरकतें पहले दिन से ही संदिग्ध लग रही थीं. पर बेटा जेल में था और उस पर हत्या का आरोप था, इसलिए उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह बेटे की बेगुनाही कैसे साबित करें.

मां का दिल मां का होता है. उस की ममता और हिम्मत किसी सबूत की मोहताज नहीं होती. अपनी औलाद को खतरे में पड़ी देख कर उस की हिम्मत और बढ़ जाती है. ललिता ने ठान लिया था कि जैसे भी हो, बेटे की बेगुनाही साबित कर उसे जेल और हत्या के कलंक से मुक्त कराएंगी.

कानून की निगाहों में रिंकी मर चुकी थी. उस का अंतिम संस्कार भी हो चुका था. उस का हत्यारा पति अपने किए की सजा भुगत रहा था. जबकि ललिता का दिल बारबार यही कह रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. पुलिस वालों को धोखा हुआ है. यही बात जब जानपहचान और नातेरिश्तेदार दोहराते तो उन का दिल डूबने लगता.

उन की समझ में एक बात यह नहीं आ रही थी कि अगर रिंकी मरी नहीं है तो वह लाश किस की थी, जिसे रिंकी समझ कर अंतिम संस्कार किया गया था. कम पढ़ीलिखी ललिता का दिमाग अब जासूसों सरीखा सोचने लगा था कि मुमकिन है कि इस साजिश में समधीसमधन के साथ रिंकी भी शामिल रही हो. लेकिन वे ऐसा क्यों करेंगे, यह सवाल भी अकसर मुंह बाए उस के सामने खड़ा रहता था.

आखिर तर्कों पर ममता भारी पड़ी और ललिता ने रिंकी का इतिहास यानी शादी के पहले की जिंदगी के बारे में खंगालना शुरू किया. उन्हें पहली बार में ही चौंकाने वाली बात यह पता चली कि रिंकी मयूर मलिक नाम के युवक को चाहती थी और यह बात हर कोई जानता था. उम्मीद की पहली किरण जागी तो दूसरी भी जल्द ही मिल गई. पता चला कि मयूर मलिक तभी से गायब है, जब से रिंकी की हत्या की बात कही गई थी. वह कहां है, यह किसी को नहीं मालूम था.

अब ललिता ने अपना पूरा ध्यान बहू के प्रेमी पर लगा दिया कि वह कहीं तो होगा और कभी न कभी तो अपने घर वालों से या फिर चंद्रशेखर और बबीता से संपर्क करेगा.

शक सच निकला. आखिरकार मई के पहले हफ्ते में ललिता को कहीं से पता चल गया कि मयूर मलिक उन की बहू रिंकी के साथ जबलपुर के बिलहरी इलाके में रह रहा है. देर न करते हुए उन्होंने यह जानकारी थाना सरैया पुलिस को दे दी.

पहली बार पुलिस ने ललिता की बात को गंभीरता से लिया और थानाप्रभारी ने तुरंत एएसआई शत्रुघ्न शर्मा की अगुवाई में एक टीम बना कर जबलपुर रवाना कर दिया. जबलपुर पहुंच कर शत्रुघ्न शर्मा ने थाना कैंट पहुंच कर थानाप्रभारी मनजीत सिंह को सारी बात बताई तो वह भी हैरान रह गए.

वह सोच कर रोमांचित थे कि अगर ऐसा है तो यह एक विरला मामला है. फौरन तैयारी कर के जब वह बिलहरी स्थित रिंकी के घर पहुंचे तो वाकई उन का सामना उस जिंदा लाश या औरत रिंकी शर्मा से हुआ, जो दुनिया और कानून की निगाह में 2 साल पहले मर चुकी थी. मयूर मलिक को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

रिंकी ने तुरंत स्वीकार कर लिया कि वह मनोज से शादी होने से पहले मयूर से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी जबरदस्ती मनोज से कर दी थी. मनोज को वह मन से अपना पति नहीं स्वीकार पाई, जिस से ससुराल में उस का मन नहीं लगा.

यहां तक बात कतई हैरानी की या नई नहीं थी कि शादी के बाद लड़कियां अपने प्यार को भूल नहीं पातीं. ऐसे में वे भाग जाती हैं या फिर राज खुलने पर पति की निगाह में पत्नी का सम्मान और प्यार हासिल नहीं कर पातीं.

यही रिंकी के साथ हुआ. एक दिन मौका पा कर वह मयूर के साथ भाग गई और जबलपुर जा कर रहने लगी. अपनी नईनवेली पत्नी की गुमशुदगी के बारे में मनोज कुछ कर पाता, उस के पहले ही सासससुर ने उस पर परिवार सहित दहेज मांगने का आरोप लगा कर हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने भी उसे जेल भेज दिया. जेल में वह यही सोचता रहा कि आखिरकार उस का गुनाह क्या है?

इधर चंद्रशेखर शर्मा और बबीता ने बेटी की गलती को ढंकने के लिए एक लाश का इंतजाम किया और रोरो कर पुलिस वालों को यकीन दिला दिया कि लाश उन की बेटी रिंकी की है. साफ दिख रहा है कि पुलिस ने  इस मामले में घोर लापरवाही बरती, जिस का खामियाजा निर्दोष मनोज को भगुतना पड़ा.

अभी इस मामले में एक अहम राज खुलना बाकी है. चंद्रशेखर और बबीता ने जिस लाश को रिंकी की लाश बताया था, उस की व्यवस्था उन्होंने कहां से की थी? कथा लिखे जाने तक दोनों फरार थे, इसलिए इस का पता नहीं चल सका था. अब उन की गिरफ्तारी के बाद ही पूरी तसवीर साफ होगी.

बात वाकई हैरान करने वाली है कि मनोज अपनी उस पत्नी की हत्या के आरोप में 2 साल जेल में रहा, जिस की हत्या हुई ही नहीं थी. अगर यह रहस्य न खुलता तो उस की हत्या के जुर्म में उसे मुमकिन है उम्रकैद या फांसी की सजा हो जाती. अगर ललिता देवी भागदौड़ कर के उसे नहीं बचातीं तो जरूर मनोज अंधे कानून की बेरहमी का शिकार हो जाता.

इस घटना ने अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘अंधा कानून’ के उस दृश्य की याद दिला दी, जिस में अमिताभ बच्चन भरी अदालत में खलनायक अमरीश पुरी की हत्या कर देता है और अदालत उसे सजा नहीं दे पाती, क्योंकि वह उसी खलनायक की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा पहले ही भुगत चुका था.

हालांकि अब यह कहने में भी हर्ज नहीं है कि इंसाफ की चौखट पर देर है, अंधेर नहीं.

प्यार और इंतकाम के लिए मौत की अनोखी साजिश – भाग 2

सुलझने के बजाय उलझने लगी पुलिस की जांच

एसएचओ उपेंद्र कुमार ने हेमा की गुमशुदगी का मामला दर्ज करवा कर एसआई उपेंद्र को जांच सौंप दी. एसआई उपेंद्र ने गुमशुदगी के मामले में की जाने वाली औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद उस शोरूम में जा कर पूछताछ की, जहां हेमा काम करती थी.

वहां पता चला कि शाम को वह निकल गई थी, उस के बाद उस ने कोई संपर्क नहीं किया. दिक्कत यह थी कि हेमा का फोन लगातार बंद आ रहा था.

हेमलता चौधरी मूलरूप से मथुरा जिले की रहने वाली थी. शादी हो चुकी थी, लेकिन एक बच्चा होने के बाद पति ने उसे गलत चालचलन का आरोप लगा कर बिना बच्चे के घर से निकाल दिया था.

पति से अलग होने के बाद बेसहारा हुई हेमलता सूरजपुर इलाके में सुनारों वाली गली में बड़ी बहन मुमतेश के पास आ गई, जो वहां अपने परिवार के साथ रहती थी. गुजरबसर के लिए हेमा कुछ महीना पहले ग्रेटर नोएडा के गौर सिटी मौल के वेन हुसैन शोरूम में सेल्सगर्ल की नौकरी करने लगी.

इधर, एसआई उपेंद्र ने जब गुमशुदगी की जांच को आगे बढ़ाते हुए हेमा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस के फोन की आखिरी लोकेशन बढपुरा गांव में रविंद्र भाटी के घर पर थी.

काल डिटेल्स की जांच से यह भी पता चला कि उस की आखिरी बातचीत जिस नंबर पर हुई थी, वह नंबर बुलंदशहर में रहने वाले किसी अजय ठाकुर का था. अजय ठाकुर की लोकेशन भी उस वक्त बढ़पुरा में वहीं पाई गई, जहां हेमलता के फोन की थी.

एसआई उपेंद्र सब से पहले बढ़पुरा में रविंद्र भाटी के घर पहुंचे. वहां पहुंचने के बाद पता चला कि 12 नवंबर की रात तो परिवार की बेटी पायल ने खुदकुशी कर ली थी.

एसआई उपेंद्र समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर हेमलता इतनी दूर वहां किस से मिलने आई थी. क्योंकि पायल के दोनों भाई भी इस बात से इंकार कर चुके थे कि वो हेमा को जानते हैं.

पायल के परिवार व गांव वालों के बयानों की तसदीक करने के लिए जब एसआई उपेंद्र दादरी थाने गए तो वहां यह बात साफ हो गई कि पायल ने वाकई खुदकुशी की थी.

दादरी पुलिस ने उन्हें पायल की लाश के फोटो भी दिखाए, जिस में उस का चेहरा व गरदन बुरी तरह जल कर वीभत्स हो गए थे. उसे देख कर कोई पहचान ही नहीं सकता था कि लाश किस लड़की की है.

एसआई उपेंद्र अजय ठाकुर की तलाश में बुलंदशहर पहुंचे. अजय ठाकुर मूलरूप से बुलंदशहर में सिकंदराबाद के महेपा जागीर गांव का रहने वाला था. अजय ठाकुर खेतीबाड़ी करता था. भरेपूरे संयुक्त परिवार के युवक अजय ठाकुर के परिवार में मातापिता और भाईबहनों के अलावा पत्नी सुमन और 5 व 3 साल के 2 बेटे थे.

परिवार वालों से एसआई उपेंद्र ने जब अजय के बारे में पूछा तो पता चला कि अजय भी 12 नवंबर, 2022 से ही लापता है. वह 12 नवंबर को घर से नोएडा जाने की बात कह कर बाइक से निकला था, उस के बाद से घर नहीं लौटा. इतना ही नहीं, उस के फोन जबजब काल की गई तो बंद मिला.

अजय के लापता होने पर घर वालों ने उस की हत्या की आशंका जताते हुए सिकंदराबाद थाने में 14 नवंबर, 2022 को उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

एसआई उपेंद्र ने जब सिकंदराबाद थाने जा कर इस बात की तसदीक की तो अजय ठाकुर के परिवार की बात सही पाई गई.

तकनीकी जांच से मिले कुछ सुराग

इस के बाद तो एसआई उपेंद्र के लिए हेमा चौधरी की गुमशुदगी एक रहस्य भरी फिल्म बन गई. क्योंकि हेमा तक पहुंचने के जिस संपर्क सूत्र तक पुलिस पहुंच रही थी, पता चलता कि या तो उस की मौत हो चुकी है या वो लापता है.

26 नवंबर को बिसरख थाने के एसएचओ का तबादला हो गया और नए एसएचओ के रूप में इंसपेक्टर अनिल राजपूत ने थाने का कार्यभार संभाला. उन्होंने जब थाने में लंबित विवेचनाओं की जानकारी ली तो एसआई उपेंद्र के पास हेमा चौधरी की गुमशुदगी के बारे में पता चला.

मामला बेहद दिलचस्प था. एसएचओ अनिल राजपूत ने एसआई उपेंद्र की मदद के लिए कांस्टेबल राजीव कुमार, अनिल कुमार, शिवांक ढालिया, सरविंद्र कुमार और महिला कांस्टेबल ज्योति की टीम बना दी.

साथ ही टीम को हेमा चौधरी के अलावा अजय ठाकुर और पायल भाटी के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाने और अजय ठाकुर के फोन को सर्विलांस पर लगवाने का आदेश दिया.

इस का सुखद परिणाम जल्द ही सामने आया. पायल, हेमा और अजय पाल की काल डिटेल्स खंगालने के बाद सामने आया कि अजय और पायल कई महीनों से एकदूसरे को जानते थे. दोनों के बीच कई बार लंबीलंबी बातचीत होती थी. पिछले कुछ दिनों से अजय हेमा से भी उस के फोन पर बातचीत कर रहा था.

इतना ही नहीं, 12 नवंबर की रात पायल, हेमा और अजय की लोकेशन एक साथ होना इस बात का साफ इशारा था कि एक मौत और 2 गुमशुदगी का आपस में कोई न कोई संबंध जरूर है. क्योंकि 3 लोग जिन में 2 महिलाएं थीं, एक रात को साथ थे.

इन में से एक महिला खुदकुशी कर लेती है. उस की भी पहचान नहीं होती, पहचान भी परिवार द्वारा कपड़ों से की जाती है. इस के बाद बाकी 2 लोग लापता पाए जाते हैं. ये सारे संयोग कई सवाल खड़े कर रहे थे.

काल डिटेल्स और सर्विलांस की मदद से पुलिस को जल्द ही इस बात का पता चल गया कि अजय का फोन कभी स्विच्ड औफ हो जाता है तो कभी काम करने लगता है.

12 नवंबर, 2022 के बाद जब भी अजय का मोबाइल फोन इस्तेमाल हुआ, उस से कुछ खास नंबरों पर ही बात हुई. उन में से एक नंबर ऐसा भी था जो अजय के नाम पर ही रजिस्टर्ड था, लेकिन उस की लोकेशन भी अजय के पुराने नंबर के साथ ही थी.

जांचपड़ताल के बाद एसआई उपेंद्र को यह भी पता चला कि अजय अपने बैंक एकाउंट से नेट बैंकिग के जरिए ट्रांजैक्शन कर रहा है. इस का मतलब साफ था कि वो सहीसलामत है. लेकिन हेमलता के बारे में जानने के लिए पुलिस का अजय तक पहुंचना जरूरी था.

प्यासी दुल्हन : प्रेमी संग रची साजिश – भाग 2

रंजना थोड़ी देर उन मैलेकुचैले कपड़ों को देखती रही, उस के बाद सिर हिलाते हुए बोली, ‘‘नहीं.’’

‘‘इसे पहचानो.’’ एक अंगूठी दिखाते हुए टीआई ने कहा.

‘‘हां साहब, यह तो मेरी ही अंगूठी है. मैं ने ही पति को ठीक करवाने के लिए दी थी. इस का घिसा हुआ नग ठीक वैसे ही है, आप को कहां मिली?’’ रंजना बोली.

‘‘तुम्हारे पति की अंगुली से.’’ टीआई ने कहा.

‘‘मतलब?’’

‘‘इधर आओ मेरे साथ, लेकिन इस कुरते को एक बार फिर से देखो.’’ यह कह कर टीआई श्वेता मौर्या ने उस के सामने कुरते को अब पूरी तरह फैला दिया था.

‘‘अरे यह तो मेरे पति का ही कुरता है. इस की एक जेब फटी हुई है.’’ रंजना बोली.

‘‘इस का मतलब मेरा अनुमान सही था कि हो न हो वह लाश रामसुशील पाल की ही है.’’ वह बोलीं.

‘‘कहां हैं मेरे पति?’’ रंजना ने पूछा.

‘‘तुम्हीं ने तो बताया था कि वह 2 दिन पहले रीवा गया है. तो फिर तुम ही बताओ न वह कहां होगा.’’

‘‘मुझे कुछ नहीं मालूम.’’ रंजना ने कहा.

‘‘उस की मौत हो चुकी है. उस की किसी ने हत्या कर दी है, वह भी डेढ़ साल पहले. उस की लाश अब मिली है, एकदम से सूखी हुई, कंकाल की तरह.’’

टीआई की यह बात सुन कर रंजना रोने लगी, तभी टीआई ने उस के गालों पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिए. डपटती हुई बोलीं, ‘‘बताओ, तुम ने अपने पति की हत्या क्यों की?’’

‘‘मैं ने? नहीं तो मैं ने कुछ नहीं किया. मैं भला क्यों..?’’ रंजना सुबकती हुई बोलने लगी.

‘‘तुम ने ही अपने पति की हत्या की है. देवर से तुम्हारे नाजायज संबंध हैं. इस बारे में गांव के कई लोग जानते हैं. तुम्हारा पति भी जानता था.’’

‘‘क्या कहती हो मैडमजी?’’ रंजना बोली.

‘‘तुम ने उस की बौडी को भूसे में छिपा कर भी रखा. यह देख कुरते की एक जेब में अभी भी कुछ भूसा है. गांव वालों से भी तुम्हारे भूसे वाले घर से मांस के सड़ने की गंध की शिकायत मिल चुकी है.’’ कहते हुए टीआई श्वेता मौर्या ने पास में खड़े पुलिसकर्मियों को निर्देश दिया, ‘‘यह ऐसे नहीं बताएगी, इस की ढंग से खातिरदारी करो, तभी सच बोलेगी.’’

सख्ती की बात सुनते ही रंजना डर गई. बोली, ‘‘बताती हूं, सब कुछ बताऊंगी, मुझे और मत पीटो.’’

इस के बाद रंजना पाल ने अपने पति रामसुशील की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की चाशनी में तरबतर निकली—

मध्य प्रदेश के रीवा जिले के थाना मऊगंज के गांव उमरी श्रीपत का रहने वाला रामसुशील पाल एक साधारण किसान था. उस के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. परिवार में वह अकेला था. उस की पत्नी की कुछ साल पहले बीमारी से मौत हो गई थी.

उस के 2 चाचा की नजर उस की जमीन पर थी. उन्होंने कुछ जमीन पहले से ही जबरदस्ती अपने कब्जे में कर ली थी. बाकी की जमीन पर भी वे नजर गड़ाए हुए थे. इस के चलते काफी विवाद चल रहा था. आए दिन उन के बीच लड़ाईझगड़े होते रहते थे.

उन के सामने रामसुशील अकेला पड़ जाता था. उस के अलावा कोई दूसरा घर संभालने वाला भी नहीं था. उम्र भी 40 पार करने वाली थी. इसलिए उसे अपने घर की चिंता सता रही थी. बिरादरी वाले उस के लिए कई बार रिश्ता ले कर आए, लेकिन उस की उम्र अधिक होने के चलते उस की दोबारा शादी नहीं हो रही थी.

एक दिन उस की शादी की मंशा पूरी हो गई. पास के गांव के गरीब परिवार की 20 वर्षीय रंजना पाल का रिश्ता आया तो उस ने तुरंत हां कर दी, रंजना उस से उम्र में काफी छोटी थी.

सुहागरात को मिली मायूसी

रामसुशील से रंजना की शादी तो हो गई, लेकिन नईनवेली पत्नी ने उस की मर्दानगी का परीक्षण सुहागरात को ही कर लिया था. उस ने अपनी सहेलियों से सुहागरात की जो रंगीन बातें सुनी थीं, वैसा उस ने कुछ भी नहीं पाया. इसलिए वह मायूस हो गई.

उसे संतुष्टि सिर्फ इस बात को ले कर थी कि घर में खानेपीने की मौज थी और पहननेओढ़ने की कोई कमी नहीं थी. पति भी उस का दिल रखने वाला मिला था. परिवार में न सास थी और ननद भाभी की कोई चिकचिक सुनने को मिलती थी.

रामसुशील सुंदर पत्नी पा कर बहुत खुश था, लेकिन इस चिंता में भी रहता था कि वह उसे चाचा के परिवार से दूर कैसे रखे. उसे खेती के काम से अकसर शहर जाना होता था, लेकिन जब भी लौटता था तब पत्नी रंजना के लिए कोई न कोई उपहार जरूर खरीद लाता था.

वह रंजना को खुश रखना चाहता था. उस की इच्छा होती थी कि वह जब घर आए तब रंजना सजीसंवरी मिले. मुसकराती रहे. जुबान पर कोई शिकायत न रहे. फिर भी वह रंजना की एक शिकायत दूर नहीं कर पाता था. वह शिकायत संतोषजनक यौन संबंध की थी. रंजना जी भर कर सैक्स का आनंद नहीं उठा पाती थी, जिस से कई बार वह खीझ तक जाती थी.

वह मन मसोस कर रह जाती थी. एक बार उस ने पति से शहर जा कर मर्दानगी बढ़ाने वाली दवाई लाने के लिए कहा. किंतु रामसुशील शर्म से इस के लिए दुकान पर नहीं जा सका. इस बारे में वह अपने दोस्तों से कुछ भी कहने से हिचकता था.

धधक रही थी जिस्म की आग

उस के दिमाग में हमेशा चाचा द्वारा जमीनजायदाद पर कब्जे की बात ही घूमती रहती थी. इस तनाव में वह रात को पत्नी से सिर दबाने को कहता, सिर में तेल की मालिश करवाता और उसे बाहों में ले कर सो जाता था.

रंजना पति की इस आदत से परेशान हो गई थी. उसे जल्द ही महसूस होने लगा था कि उस की जिंदगी नर्क बन चुकी है. एक तरफ देह की आग ठंडी नहीं हो पा रही थी, दूसरी तरफ गांव में किसी से भी हंसनेबोलने तक पर पति ने कई तरह की पाबंदियां लगा रखी थी. इस के लिए उस ने पासपड़ोस के बच्चे और बुजुर्ग महिलाओं को मुखबिरी के लिए लगा रखा था. वे उसे रंजना के दिनभर की गतिविधियों की खबर कर देते थे. और फिर रंजना से रामसुशील गुस्सा हो जाता था.

इस का नतीजा यह हुआ कि जल्द ही दोनों के बीच का प्यार परवान चढ़ने के बजाय तकरार में बदल गया. एक दिन की बात है. सुबहसुबह रामसुशील से भूसाघर में बिखरे भूसे को ठीक करने को ले कर बहस हो गई थी. पति गुस्से में बोलता हुआ चला गया था. वह उदास मन से अपने खेत की ओर जा रही थी, उसी वक्त बगल के खेत में काम कर रहा उस का चचेरा देवर गोपाल बोल पड़ा, ‘‘क्या बात है भाभी, भैया गुस्से में जा रहे थे. अगर मेरे लायक कोई काम हो तो मुझे बताओ.’’

रंजना ने पहली बार पति के छोटे चाचा के बेटे गोपाल से बात की थी. इस से पहले वह उसे देख कर सिर्फ मुसकरा देता था.

‘‘कुछ नहीं, भूसाघर में भूसे को ऊपर चढ़ाना था, उसी पर मुझे डांट दिया.’’ रंजना कुछ बात छिपाती हुई बोली.

‘‘कोई बात नहीं भाभी मैं कर देता हूं, आखिर मैं कोई गैर तो हूं नहीं.’’ गोपाल बोला.

‘‘नहीं…नहीं, रहने दो मैं खुद कर लूंगी. वैसे तुम्हारा नाम क्या है?’’ रंजना बोली.

‘‘जी भाभी गोपाल, वैसे आप गोपू कह कर बुला सकती हैं.’’

‘‘अभी तुम यहां से जाओ, बुढि़या हमें बतियाते हुए देख रही है,’’ रंजना बोली और अपने घर आने के लिए मुड़ गई.

गोपाल थोड़ी तेज आवाज में बोला, ‘‘भाभी, मैं आ रहा हूं भूसाघर के पास.’’