97 करोड़ की पुरानी करेंसी का खेल

आनंद खत्री का नाम पूरे कानपुर क्या देश भर के कारोबारी लोगों के बीच जानापहचाना है. उन की कई पीढि़यां कपड़ा कारोबार से जुड़ी रही हैं. कपड़ा व्यापार के साथ आनंद ने होटल और रियल एस्टेट का बिजनैस भी शुरू कर दिया था.

बीती 16 जनवरी की सुबह जब आनंद के सभी ठिकानों पर पुलिस की टीम के साथ आयकर और रिजर्व बैंक के अधिकारियों ने छापेमारी की तो पूरा कानपुर सकते में रह गया. शहर भर में यह बात तेजी से फैली.

हर आदमी यही सोच रहा था कि ऐसा क्या हो गया, जिस से आनंद खत्री के यहां पुलिस ने इतनी बड़ी काररवाई की है. कानपुर वासियों की आंखें तब खुली की खुली रह गईं, जब उन्हें पता चला कि आनंद खत्री के यहां से 97 करोड़ की पुरानी करेंसी वाले नोट मिले हैं. पुलिस ने जब गाडि़यों में बक्से लादने शुरू किए तो छापे का सच सामने आ गया.

नोटबंदी के एक साल बाद उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी कानपुर में 97 करोड़ की पुरानी करेंसी मिलना आश्चर्य की बात थी, क्योंकि पूरे देश में इतनी बड़ी संख्या में पुराने नोट बरामद होने का यह पहला मामला था.

नोटबंदी लागू होने के दिन 500 रुपए के 1716.6 करोड़ नोट और 1 हजार के 8 करोड़ नोट बाजार में थे. इस तरह से 15.44 लाख करोड़ के नोट प्रचलन में थे. इन में से 15.28 लाख करोड़ के नोट रिजर्व बैंक के पास वापस आ गए पर करीब 1 फीसदी नोट वापस नहीं आए. मतलब 16050 करोड़ रुपए के हजार और 5 सौ के नोट वापस नहीं आए.

रिजर्व बैंक इन नोटों को कालाधन मान कर चल रही थी. रिजर्व बैंक, आयकर विभाग सहित कुछ दूसरे विभागों के साथ मिल कर इन पैसों को तलाशने का काम कर रही है. मनी चेंजर व मल्टीनेशनल कंपनियों पर नजर रखने के दौरान आयकर विभाग को पता चला कि हैदराबाद और कानपुर में एनआरआई के जरिए पुरानी करेंसी को बदलने का काम हो रहा है.

crime story a corrupt game of 97 years old currency

यह जानकारी मिलने के बाद रिजर्व बैंक के 4 अफसरों की अगुवाई में आयकर और पुलिस विभाग ने कानपुर में खोजबीन शुरू की. पुलिस को यह पता चल गया था कि मनी चेंजर के इस गेम में कानपुर के नामी उद्योगपति आनंद खत्री की भूमिका संदेह के घेरे में है.

आनंद खत्री कानपुर के बड़े उद्योगपति हैं. कपड़े के बिजनैस के अलावा वह होटल संचालन और बिल्डर का काम भी करते हैं. प्रभावशाली आनंद खत्री के ऊपर हाथ डालना आसान नहीं था. ऐसे में पुख्ता जानकारी मिलनी जरूरी थी.

आनंद खत्री का परिवार कई पीढि़यों से कानपुर में कपड़ों का कारोबार करता आ रहा है. उन के पिता श्यामदास खत्री कानपुर में कपड़ा कमेटी के सदस्य रह चुके थे. उन का विभिन्न तरह के कपड़ों का थोक कारोबार था.

आनंद खत्री के 6 भाई हैं. आनंद अपने 3 भाइयों गोवर्धन, तुलसीदास और हरीश के साथ मिल कर काहू कोठी में कपड़ों का कारोबार देखते हैं. यहीं से वह प्रौपर्टी रीयल एस्टेट और होटल का कारोबार भी देखते हैं. पुलिस पूरे मामले में पक्की खबर होने के बाद ही आनंद खत्री पर हाथ डालने का साहस कर सकी.

आयकर विभाग के पास पुख्ता सबूत थे कि आनंद खत्री अपने साथियों के साथ मिलीभगत से मनी चेंजर का काम करते हैं. आनंद खत्री के नेटवर्क में कई ऐसे ब्रोकर थे, जो कमीशन ले कर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश में रीयल एस्टेट कारोबारियों और बिजनैसमैन से पुराने नोट ले कर उन्हें नए नोटों में बदलने का काम कर रहे थे. इस के बदले वह मनी चेंजर ब्रोकर को कमीशन देते थे.

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दिल्ली और हैदराबाद से भी पुराने नोटों को नए में बदला जाना था. पुराने नोटों को दिल्ली और हैदराबाद ले जाने के 3 रास्ते थे. पहला रूट कानपुर से वाराणसी-कोलकाता-हैदराबाद का था, दूसरा रास्ता वाराणसी-बागपत-मीरजापुर वाया दिल्ली का था और तीसरा रूट दिल्ली से कोलकाता का.

पुलिस ने बताया कि नोट बदलने के इस खेल में नेपाल का कनेक्शन भी सामने आया है. पुलिस को आनंद खत्री के साथ काम करने वाले हैदराबाद निवासी कुटेश्वर के मोबाइल संदेश भी मिल गए, जिस में नोट बदलवाने संबंधी कई मैसेज थे. अब पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे कि मनी चेंज का बड़ा खेल कानपुर में खेला जा रहा है.

16 जनवरी, 2018 को कानपुर पुलिस, आयकर विभाग और रिजर्व बैंक की टीम ने संयुक्त रूप से आनंद खत्री के कई ठिकानों पर छापेमारी की तो 96.44 करोड़ के पुराने नोट पकड़ में आ गए. ये नोट 80 फीट रोड और गुमटी नंबर 5 स्थित होटलों और आनंद खत्री के घर में बक्सों में भरे मिले.

पुलिस टीम की अगुवाई आईजी आलोक कुमार, एसएसपी अखिलेश कुमार, एसपी पश्चिम डा. गौरव ग्रोवर, एसपी पूर्व अनुराग आर्या सहित कई अधिकारियों ने की. पुलिस ने स्वरूपनगर थाने को अपना औफिस बना लिया था.

टीम को पुरानी करेंसी का तो पता चल चुका था, पर यह बात समझ नहीं आ रही थी कि इस करेंसी को कहां और कैसे खपाया जा रहा था. ऐसे में पुलिस ने नेपाल पुलिस के साथ मिल कर इस मामले को हल करने का प्रयास किया. पुलिस को लग रहा था कि नेपाल के जरिए ही पुरानी करेंसी नई करेंसी में बदली जा रही होगी.

आनंद खत्री के पास 40 से ज्यादा प्रौपर्टीज के दस्तावेज मिले. जबकि कैश में 3 करोड़ की जगह केवल 2 लाख रुपए ही मिले. शोरूम में कपड़े का भारी स्टौक मिला, जिस का मिलान करना कठिन काम था.

पुलिस ने आनंद खत्री के परिवार के लोगों से भी पूछताछ की. प्रौपर्टी के 40 दस्तावेज में से कई दूसरों के नाम पर निकले. पुलिस को बताया गया कि आनंद प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त का काम करते हैं. ये दस्तावेज उन लोगों के हैं, जिन्होंने अपनी प्रौपर्टी बेचने के लिए दस्तावेज उन्हें दिए थे. पुलिस को यह बात समझ नहीं आई, इसलिए वह इस की तहकीकात में लग गई.

पुलिस ने इस मामले में 16 लोगों को गिरफ्तार किया. इन में आंध्र प्रदेश की रहने वाली महिला राजेश्वरी सहित लखनऊ के अनिल यादव, आनंद, मोहित, संतोष, संजय, संतकुमार, ओंकार, अनिल, रामाश्रय, संजय कुमार, धीरेंद्र गुप्ता, संजीव अग्रवाल, मनीष अग्रवाल और अली हुसैन प्रमुख थे.

अनिल यादव लखनऊ में रहता था. उस ने खुद को समाजवादी पार्टी के एक बडे़ नेता का करीबी बताया. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. ये लोग आपस में मिल कर इस खेल को अंजाम देते थे. नोटों की गिनती करना और कहानी का राजफाश करना सरल नहीं था.

ऐसे में नोटों की गिनती के काम को पूरा करना पहली जरूरत थी. मंगलवार 16 जनवरी से रिजर्व बैंक के 4 बड़े अधिकारियों के साथ यह काम शुरू हुआ.

2 बड़ी मशीनों से 4 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद नोटों की गिनती शुरू हुई, जिस में कुल 96 करोड़ 62 लाख रुपए के नोट निकले. सीओ कोतवाली अजय कुमार ने सारे नोट अलगअलग बक्सों में बंद करा दिए. पकड़े गए लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, षडयंत्र रचने की धारा और एबीएन एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज की गई. आरोपी 17 जनवरी की शाम कोर्ट में पेश किए गए, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अपना ही तमाशा बनाने वाली एक लड़की – भाग 1

राजस्थान में कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. कई जगह पारा माइनस तक पहुंच गया था. ऐसी ठंड में 10 जनवरी को  सुबह करीब 5 बजे जयपुर में पुलिस कंट्रोल रूम के फोन की घंटी बजी. सुबहसुबह कंट्रोल रूम में हीटर पर हाथ सेंक रहे ड्यूटी अफसर ने फोन उठाया. दूसरी ओर से किसी लड़की ने रोते हुए धीमी सी आवाज में कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘हां बोलिए, मैं पुलिस कंट्रोल रूम से ड्यूटी अफसर बोल रहा हूं.’’

‘‘सर, मेरे साथ 4 लड़कों ने गैंगरेप किया है. रेप के बाद वे लड़के मुझे एमएनआईटी के पास फेंक गए हैं. मेरे कपड़े भी फटे हुए हैं.’’ लड़की ने सुबकते हुए कहा, ‘‘सर, उन बदमाशों ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. मुझे कहीं का नहीं छोड़ा.’’

गैंगरेप की बात सुन कर ड्यूटी अफसर ने लड़की से उस का नामपता पूछ कर उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘तुम वहीं रुको, हम पुलिस की गाड़ी भेज रहे हैं.’’

सुबहसुबह गैंगरेप की सूचना मिलने पर कंट्रोल रूम में मौजूद पुलिसकर्मी परेशान हो उठे थे. ड्यूटी अफसर ने तुरंत वायरलैस संदेश दे कर पैट्रोलिंग पुलिस टीम को मौके पर जाने को कहा. इस के बाद पुलिस अधिकारियों को वारदात की सूचना दी गई. एमएनआईटी यानी मालवीय नैशनल इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी राजस्थान का जानामाना इंस्टीट्यूट है, जो जयपुर के बीच मालवीय नगर, झालाना डूंगरी में स्थित है.

कड़ाके की ठंड में सुबह 5 बजे लोगों का घर में रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं होता. लेकिन ठंड हो या गरमी, पुलिस को तो अपनी ड्यूटी करनी ही होती है. सूचना पा कर जयपुर (पूर्व) के पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए.

एमएनआईटी के सामने पुलिस अधिकारियों को वह लड़की मिल गई. उस के कपड़े फटे हुए थे और वह ठंड से कांप रही थी. उस के बदन पर काफी कम कपड़े थे. वह केवल एक कार्डिगन पहने थी, जिस से सर्दी से बचाव संभव नहीं था. उस ने बताया कि उस के साथ 4 लड़कों ने सामूहिक दुष्कर्म किया है. लड़की की हालत देख कर पुलिस अधिकारियों को उन दरिंदों पर बहुत गुस्सा आया.

पुलिस अधिकारियों ने लड़की को सांत्वना दे कर पुलिस की गाड़ी में बिठाया और सदर थाने ले गए. थाने पहुंच कर सब से पहले अर्दली से उस लड़की के लिए गरमागरम चाय मंगवाई गई, साथ ही एक महिला कांस्टेबल से उस की गरम जैकेट ले कर लड़की को पहनने को दी गई, ताकि ठंड से उस का बचाव हो सके. कमरे में हीटर भी जला दिया गया, ताकि कुछ गरमाहट आ सके.

चाय पी कर और जैकेट पहन कर लड़की के शरीर में कुछ गरमाहट आई. लड़की कुछ सामान्य हुई तो पुलिस अधिकारियों ने उस से वारदात के बारे में पूछा. लड़की ने बताया कि उस का नाम उर्वशी है और वह जयपुर के जगतपुरा में अपने पिता व भाई के साथ रहती है. वे लोग कुछ महीने पहले ही जयपुर आए हैं. जबकि मूलरूप से उस का परिवार उत्तर प्रदेश के मैनपुरी का रहने वाला है. उर्वशी ने आगे बताया कि वह 9 जनवरी को अलवर में स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (एसएससी) की प्रतियोगी परीक्षा दे कर ट्रेन से जयपुर वापस आई थी.

ट्रेन से जयपुर जंक्शन पर उतर कर वह शाम करीब सवा 7 बजे स्टेशन से बाहर निकली. उसे जगतपुरा स्थित अपने घर जाना था. इस के लिए वह किसी सवारी का इंतजार कर रही थी, तभी एक औटो वाला जगतपुरा की आवाज लगाता हुआ सुनाई दिया. उस ने औटो वाले से पूछा कि जगतपुरा फाटक चलोगे तो उस ने कहा, ‘‘20 रुपए लगेंगे.’’

वह उस औटो में बैठ गई. औटो में पहले से ही 3 लड़के बैठे थे. औटो वाला सिंधी कैंप, नारायणसिंह सर्किल से होते हुए 2-3 घंटे तक घुमाता रहा. बाद में वह उसे एक ग्राउंड में ले गया, जहां उन लोगों ने उस के कपड़े फाड़ दिए. इस के बाद औटो में बैठे तीनों लड़कों और औटो वाले ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म करने वाले 2 लड़के आपस में एकदूसरे का नाम संदीप और ब्रजेश ले रहे थे. उन दरिंदों ने उसे जान से मारने की नीयत से एक बोतल में भरा सफेद रंग का पेय भी पिलाया. वह पेय पीने के बाद उस ने उल्टी कर दी. लड़कों की उम्र 20-25 साल थी. बाद में वे चारों उसे औटो में बैठा कर अनजान जगह पर छोड़ गए.

जाने से पहले उन लड़कों ने उसे धमकी दी थी कि उन्होंने उस की वीडियो क्लिप बना ली है, किसी को बताया तो वे नेट पर डाल देंगे. उन सब के जाने के बाद उस ने वहां एक राहगीर से पूछा तो उस ने बताया कि यह जगह एमएनआईटी के पास है. इस के बाद वह एक बुजुर्ग की मदद से बस शेल्टर पर पहुंची और पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन किया.

इतनी सर्द सुबह उर्वशी के साथ हुई दरिंदगी की दास्तां सुन कर पुलिस अधिकारियों की आंखों में खून उतर आया. अधिकारियों ने उर्वशी से पूछ कर उस के घर वालों को सूचना दे कर उन्हें थाने बुलवा लिया. बेटी के साथ हुई दरिंदगी की बात जान कर उर्वशी के पिता फफकफफक कर रो पड़े. वह कुछ बोल नहीं पाए. पता चला कि वह मानसिक रूप से कमजोर थे. उर्वशी का छोटा भाई भी पिता के साथ थाने आया था.

पुलिस ने उर्वशी से उस के साथ दरिंदगी की लिखित रिपोर्ट ले कर सदर थाने में भादंवि की धारा 328, 367, 376डी व 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. सदर थाने में रिपोर्ट इसलिए दर्ज की गई, क्योंकि लड़की का अपहरण रेलवे स्टेशन इलाके से हुआ था. हालांकि उर्वशी जहां मिली थी, वह इलाका जवाहरनगर सर्किल थाने के तहत आता था.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस उर्वशी को बनीपार्क स्थित सेटेलाइट अस्पताल ले गई. अस्पताल में उस की बोर्ड से मैडिकल जांच कराई गई. जांच में उस के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई.

नए साल के पहले पखवाड़े में राजधानी जयपुर में शाम को युवती का अपहरण करने के बाद रात भर उस से सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पुलिस अधिकारियों को हिला दिया था. जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने इस घटना को गंभीरता से लिया. उन्होंने अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर जयपुर (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन में जयपुर कमिश्नरेट, जयपुर पश्चिम एवं जयपुर पूर्व के अधिकारियों की टीमें गठित कर दीं.

प्रफुल्ल कुमार ने पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) अशोक कुमार गुप्ता के नेतृत्व में पुलिस उपायुक्त (पूर्व) कुंवर राष्ट्रदीप, पुलिस उपायुक्त (अपराध) विकास पाठक, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) रतन सिंह, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (पूर्व) हनुमान सहाय मीणा, सहायक पुलिस आयुक्त (सदर) नीरज पाठक, प्रशिक्षु आईपीएस सुश्री तेजस्विनी गौतम, सहायक पुलिस आयुक्त (झोटवाड़ा) आस मोहम्मद, सहायक पुलिस आयुक्त राजपाल गोदारा, थानाप्रभारी (चौमूं) जितेंद्र सिंह सोलंकी, थानाप्रभारी (हरमाड़ा) लखन सिंह खटाना, थानाप्रभारी (सदर) रड़मल सिंह, थानाप्रभारी (करघनी) अनिल जसोरिया, थानाप्रभारी (बनीपार्क) धर्मेंद्र शर्मा सहित एक दरजन थानाप्रभारियों के नेतृत्व में अलगअलग टीमें बना कर जांच शुरू कर दी.

पुलिस को सब से पहले उस औटो वाले का पता लगाना था, जिस में बैठ कर उर्वशी ने जाने की बात कही थी. इस के बाद उस जगह का पता लगाना था, जहां उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ था. इसी के साथ उर्वशी से दरिंदगी करने वाले संदीप और ब्रजेश सहित अन्य आरोपियों का पता लगाना था.

पुलिस ने जांच शुरू करते हुए सब से पहले रेलवे स्टेशन और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग खंगाली. एक रिकौर्डिंग में उर्वशी रेलवे स्टेशन से बाहर जाती नजर आ रही थी. रेलवे स्टेशन के बाहर 3 जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे, लेकिन वे खराब थे.

100 करोड़ की फिरौती का फंडा – भाग 1

22 जुलाई, 2017 की शाम को फिरोजाबाद के राजातालाब आर्किड ग्रीन के रहने वाले संजीव गुप्ता की पत्नी सारिका गुप्ता 2-3 लोगों के साथ टुंडला कोतवाली पहुंची तो कोतवाली प्रभारी अरुण कुमार सिंह हैरान ही नहीं हुए, बल्कि उन्हें किसी अनहोनी की आशंका भी हुई. क्योंकि वह सारिका गुप्ता को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. उस के पति संजीव गुप्ता शहर के जानेमाने व्यवसायी थे.

सारिका गुप्ता सीधे अरुण कुमार सिंह के पास पहुंची थी. उन्होंने उसे सामने पड़ी कुरसी पर बैठने के लिए कह कर आने की वजह पूछी तो उस ने जो बताया, सुन कर वह दंग ही नहीं रह गए, बल्कि परेशान भी हो उठे. उस ने बताया था कि साढ़े 5 बजे के करीब उस के पति संजीव गुप्ता अपने होटल सागर रत्ना से अपनी मीटिंग खत्म कर के सीधे घर आने वाले थे.

लेकिन अब तक वह न घर पहुंचे हैं और न ही उन का फोन मिल रहा है. जब भी उन्हें फोन किया जाता है, फोन बंद बताता है. इतना सब बता कर उस ने आशंका भी व्यक्त की कि कहीं उन का अपहरण तो नहीं हो गया है.

बहरहाल, अरुण कुमार सिंह ने सारिका से तहरीर ले कर उसे आश्वासन दिया कि पुलिस जल्दी ही उस के पति को ढूंढ निकालेगी. जबकि वह जानते थे कि यह काम इतना आसान नहीं है.

संजीव गुप्ता शहर का जानामाना नाम था. फिरोजाबाद शहर के राजातालाब इलाके की आर्किड ग्रीन में उस की शानदार कोठी थी, जहां कई महंगी कारें खड़ी रहती थीं. शहर के होटल सागर रत्ना में ही नहीं, कई स्कूलों में भी उस की हिस्सेदारी थी. इस के अलावा वह ब्याज पर पैसा उठाने के साथसाथ करोड़ों की कमेटी और सोसायटी चलाता था, जिस में शहर के ही नहीं, आसपास के शहरों के भी बड़ेबड़े लोग शेयर डालते थे.

ऐसे आदमी का गायब होना पुलिस के लिए परेशानी ही थी. पैसे वाला आदमी था, उस का अपहरण भी हो सकता था, इसलिए अरुण कुमार सिंह ने तुरंत इस बात की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी. अपहरण की आशंका को ध्यान में रख कर तुरंत शहर की नाकाबंदी कराते हुए शहर भर की पुलिस को सतर्क कर दिया गया.

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रात भर पुलिस अपने हिसाब से संजीव गुप्ता की तलाश करती रही, लेकिन कुछ पता नहीं कर पाई. अगले दिन यानी 23 जुलाई को सारिका गुप्ता एक बार फिर कोतवाली पहुंची और शक के आधार पर नीता पांडेय, उस के पति प्रदीप पांडेय और अमित गुप्ता तथा कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध क्रमांक 641/2017 पर भादंवि की धारा 364ए, 506, 120बी के तहत नामजद मुकदमा दर्ज करा दिया.

उन्होंने पुलिस को अपने मोबाइल में 2 मैसेज भी दिखाए, जो उन के पति के ही फोन से आए थे. उन संदेशों में उन से संजीव गुप्ता की रिहाई के लिए सौ करोड़ की फिरौती मांगी गई थी. फिरौती न देने पर संजीव गुप्ता को मौत के घाट उतारने की धमकी दी गई थी.

यह मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने संजीव गुप्ता के दोनों मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगवा दिए, साथ ही सुरक्षा की गरज से संजीव की कोठी पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया. एसएसपी अजय कुमार पांडेय ने पुलिस की कई टीमें बना कर संजीव की तलाश में लगा दिया. इस के साथ एसटीएफ की भी एक टीम बना कर इस मामले में लगा दी गई थी.

पुलिस ने संजीव के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर अलीगढ़, दिल्ली, नोएडा, चंडीगढ़, जम्मूकश्मीर तक उस की खोज की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. उस के मोबाइल का स्विच औफ रहता था, बस थोड़ी देर के लिए औन होता था. उसी के हिसाब से जो लोकेशन मिलती थी, पुलिस वहां पहुंच जाती थी.

24 जुलाई को सारिका के मोबाइल पर एक बार फिर संदेश आया कि कोठी पर पुलिस क्यों तैनात है, पुलिस को वहां से हटवाओ. सारिका ने यह संदेश पुलिस अधिकारियों को दिखाया तो कुछ पुलिस वालों को वहां से हटा दिया गया, लेकिन पूरी तरह से पुलिस नहीं हटाई गई.

संजीव गुप्ता को गायब हुए 3 दिन हो चुके थे. यह घटना शहर में चर्चा का विषय बनी हुई थी. ज्यादातर लोगों का कहना था कि संजीव का अपहरण नहीं हुआ, बल्कि वह खुद ही कहीं छिपा बैठा है. दूसरी ओर संजीव की पत्नी और भांजे विप्लव गुप्ता ने संजीव के अपहरण का आरोप नीता पांडेय पर लगाया ही नहीं था, बल्कि शक के आधार पर मुकदमा भी दर्ज करा दिया था.

नीता का पति प्रदीप पांडेय समाज कल्याण विभाग में वरिष्ठ लिपिक था. भाजपा का जिला संगठन ब्राह्मण समाज ही नहीं, सरकारी कर्मचारी भी प्रदीप पांडेय और नीता पांडेय के साथ थे. इसलिए पुलिस नीता पांडेय, उस के पति प्रदीप पांडेय और अनिल गुप्ता के खिलाफ कोई काररवाई नहीं कर पा रही थी.

पुलिस द्वारा की गई जांच के अनुसार, नीता पांडेय का आरओ और बोतलबंद पानी का व्यवसाय था. उन्होंने सन 2015 में संजीव गुप्ता से 15 लाख रुपए ब्याज पर लिए थे, जिस का ब्याज पहले ही काट कर संजीव ने उसे 10 लाख 80 हजार रुपए दिए थे. इस के बाद जबरदस्ती उस से 25 लाख रुपए की कमेटी डलवाई थी. बाद में ब्याज जोड़ कर वह उस से 60 लाख रुपए मांगने लगा था.

नीता ने इतना रुपया देने से मना किया तो संजीव जबरदस्ती वसूल करने की कोशिश करने लगा. मजबूर हो कर नीता ने 1 जुलाई, 2017 को भादंवि की धारा 406, 452, 504, 506 एवं 6 के तहत संजीव, दीपक और विप्लव गुप्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था. जबकि दोनों के बीच झगड़ा अप्रैल से ही चल रहा था.

यह मामला सुर्खियों में तब आया, जब नीता पांडेय ने जिलाधिकारी से संजीव गुप्ता द्वारा धमकी देने की शिकायत के साथ ब्याज पर पैसे उठाने की शिकायत कर दी थी. जिलाधिकारी ने एसपी (सिटी) और एसडीएम को इस मामले को सुलझाने का आदेश दिया था. लेकिन बुलाने पर भी संजीव समझौते के लिए नहीं आया.

धीरेधीरे नीता पांडेय और संजीव गुप्ता का विवाद इतना बढ़ गया कि यह प्रदेश के डीजीपी और मुख्यमंत्री तक पहुंच गया. ऐसे में कुछ और लोग नीता के साथ आ गए थे, जिन्हें कमेटी का अपना पैसा डूबता नजर आ रहा था. संजीव गुप्ता शहर का बड़ा आदमी ही नहीं, रसूख वाला भी था. उस के सामने हर किसी के आने की हिम्मत नहीं थी.

सपा सरकार के समय उस का अलग ही रुतबा था. लेकिन सत्ता बदलते ही उस का रुतबा जाता रहा. उस की कमेटी और सोसायटी का व्यवसाय शहर ही नहीं, अन्य शहरों तक फैला था, जिस की वजह से लगभग रोज ही होटल में पार्टियां होती रहती थीं, जिस में बड़ेबड़े लोग शामिल होते थे.

इसी संजीव गुप्ता की वापसी के लिए 100 करोड़ की फिरौती मांगी जा रही थी. यह हैरान करने वाली बात थी. पुलिस को भी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. 22 जुलाई की शाम को संजीव गायब हुआ था और 23 जुलाई की रात एक बज कर 40 मिनट पर 100 करोड़ की फिरौती का संदेश उस की पत्नी के फोन पर वाट्सऐप द्वारा आ गया था. यह भी संदेह पैदा करने वाली बात थी.

100 करोड़ की फिरौती की वजह से ही यह मामला राजधानी लखनऊ तक पहुंच गया था. विधान परिषद में भी मामला उठाया गया गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सख्त आदेश था कि इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाया जाए, इसीलिए इस मामले को सुलझाने में पुलिस जीजान से जुटी थी.

इसी का नतीजा था कि पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि संजीव गुप्ता की कार अलीगढ़ के गभाना में खड़ी है. उस का मोबाइल फोन औन तो होता था, पर बहुत थोड़ी देर के लिए. फिर भी उस की जो लोकेशन मिलती थी, पुलिस उसी ओर भागती थी. अब तक की भागदौड़ से पुलिस को लगने लगा था कि यह अपहरण का मामला नहीं है. यह योजना बना कर किया गया अपहरण का नाटक है.

चांद की चाहत में थानेदार – भाग 1

जकिया चौहान 13 जून, 2017 को अपने घर पर ही थी. उस का घर जोधपुर शहर में चौपासनी हाउसिंग बोर्ड सोसाइटी में था. यह सोसाइटी पुलिस थाने से करीब सौ मीटर की दूरी पर है. जकिया जिस मकान में रहती थी, उस के भूतल पर उस का ब्लैक मैजिक कैफे चलता था और पहली मंजिल पर वह रहती थी.

उस दिन शाम के समय उस के पास थानाप्रभारी कमलदान चारण का फोन आया. कमलदान चारण जोधपुर शहर के राजीव गांधी नगर के थानाप्रभारी थे. उन्होंने जकिया से कहा, ‘‘मैं आज शाम को आऊंगा, घर पर ही रहना, एंजौय करेंगे.’’

‘‘साहबजी, यह भी तो बता दो कि कितने बजे आओगे?’’ जकिया ने पूछा.

‘‘यही कोई 8-साढ़े 8 बजे तक आ जाऊंगा.’’ उन्होंने कहा.

‘‘ठीक है साहब, मैं इंतजार करूंगी.’’ कहते हुए जकिया के चेहरे पर कुटिल मुसकान उभर आई. थानाप्रभारी से बात खत्म होने के बाद जकिया ने तुरंत अपने मोबाइल से एक नंबर डायल किया. दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो उस ने कहा, ‘‘सरजी, मैं जकिया बोल रही हूं. उस थानाप्रभारी ने आज रात 8-साढ़े 8 बजे घर आने को कहा है. मुझे बड़ा डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है. तुम बस इतना ध्यान रखना कि वह तुम से किसी बात पर नाराज न होने पाए.’’ दूसरी तरफ से कहा गया.

‘‘ठीक है सरजी.’’ कह कर जकिया ने फोन काट दिया.

इस के बाद जकिया सोच में डूब गई. उस ने गणपत को फोन किया. गणपत उस के ब्लैक मैजिक कैफे में काम करता था. उस समय वह कैफे में ही था, इसलिए 2 मिनट में ही पहली मंजिल पर पहुंच गया.

गणपत के आते ही जकिया ने कहा, ‘‘आज वह आशिक थानेदार आ रहा है. तुम सब चीजों का ध्यान रखना. किसी तरह की कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए.’’

जकिया कमलदान चारण को थानेदार कहती थी. गणपत ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘मैडम, आप पूरी तरह बेफिक्र रहें. कोई गड़बड़ नहीं होगी. सारा काम ठीक तरीके से हो जाएगा.’’

अपनी बात कह कर गणपत कैफे में चला गया. जकिया अपने बैड पर लेट गई. लेटेलेटे वह थानेदार कमलदान चारण से करीब 10 दिनों से चल रही मुलाकातों और बातों के बारे में सोचती रही. फिर उस ने थानेदार द्वारा भेजे गए वाट्सऐप मैसेज को पढ़ा. मैसेज पढ़ कर उस की आंखों में गुस्सा तैर आया. लेकिन उस ने खुद को किसी तरह संयमित किया और उठ कर घर के छोटेमोटे काम निपटाने लगी.

रात करीब पौने 8 बजे गणपत जकिया के कमरे में आया. उस ने उसे सारी बातें समझा कर उसे पहली मंजिल पर ही अन्य कमरे में छिपा दिया. इस के बाद उस ने बैड पर फैला छोटामोटा सामान हटा कर ढंग से रख दिया. बैड की चादर करीने से बिछाई और कुरसी पर बैठ कर आशिक थानाप्रभारी का इंतजार करने लगी.

रात करीब साढ़े 8 बजे थानाप्रभारी कमलदान चारण का फोन आया, ‘‘जकिया डार्लिंग, मैं आ गया हूं.’’

‘‘ठीक है, सीढ़ी वाला गेट खुला हुआ है. आप सीधे पहली मंजिल पर आ जाइए.’’ जकिया ने कहा.

लगभग एक मिनट बाद थानाप्रभारी जकिया के कमरे में दाखिल हुए. आते ही उन्होंने दरवाजे की सिटकनी लगा दी. वह एकदम फ्री मूड में नजर आ रहे थे. उन्होंने टीशर्ट और जींस पहन रखी थी. उन्हें कमरे में रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए जकिया ने कहा,‘‘आइए जनाब, हम आप का ही इंतजार कर रहे थे.’’

‘‘जानम, इंतजार तो हम आप का कर रहे थे.’’ थानेदार ने जकिया की हथेली अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘लेकिन कोई बात नहीं, इंतजार का भी अपना अलग ही मजा है. आखिर आज वह इंतजार खत्म हो जाएगा.’’

चारण ने जकिया का हाथ छोड़ कर कुरसी के बजाय बैड पर बैठते हुए कमरे में चारों ओर पुलिसिया नजरें दौड़ाईं. उस के बाद हंसते हुए कहा, ‘‘भई, इस कमरे में कोई कैमरा वगैरह तो नहीं लगा रखा?’’

‘‘थानेदार साहब, आप भी कैसी बातें करते हैं?’’ जकिया ने अपने चेहरे पर मधुर मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘मैं क्या आप को कोई चालबाज हसीना नजर आती हूं? इस कमरे में न तो कोई कैमरा लगा है और न ही कोई दूसरा आदमी है. यहां केवल आप हैं और मैं हूं.’’

‘‘ये हुई न बात,’’ चारण ने जकिया को अपने पास आने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘जकिया, तुम सचमुच बड़ी समझदार हो.’’

‘‘साहबजी, मुझे इस जमाने ने समझदार बना दिया है, वरना मैं तो कहां दुनियादारी जानती थी.’’ जकिया ने कमलदान चारण को अपनी बातों में उलझाते हुए कहा, ‘‘इसी दुनियादारी के कारण मैं ने अपने पति को छुड़वाने के लिए आप को एक लाख रुपए नकद और एक लाख रुपए का चैक दे दिया था. अरे हां, आज आप मेरा वह एक लाख रुपए का चैक वापस करने वाले थे, उस का क्या हुआ?’’

कमलदान चारण ने जेब से चैक निकाल कर जकिया को दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो, चैक तो मैं ले आया हूं. लेकिन यह चैक दूंगा तभी, जब तुम मुझे खुश कर दोगी.’’

जकिया ने खुद को उस की गिरफ्त से छुड़ाते हुए कहा, ‘‘साहब, ऐसी भी क्या जल्दी है. इतनी गरमी में आए हो, पहले कुछ ठंडा या गरम पी लो. बताओ, क्या लोगे, कोल्ड कौफी या हौट कौफी?’’

‘‘हौट तो तुम हो ही,’’ थानेदार ने जकिया की कमसिन देह को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘तुम कह रही हो तो कोल्ड कौफी पी लेंगे. और हां, तुम्हारे कैफे में तो हुक्का बार भी चलता है. आज किसी अच्छे से फ्लेवर का हुक्का पिला दो तो तुम्हारे साथ का मजा दोगुना हो जाएगा.’’

‘‘साहबजी, हुक्का आप को फिर कभी पिलवा दूंगी.’’ जकिया ने कहा, ‘‘आज तो आप कोल्ड कौफी से ही काम चला लीजिए.’’

कह कर जकिया ने अपने मोबाइल फोन से एक नंबर डायल किया. दूसरी तरफ से फोन रिसीव किया गया तो जकिया ने कहा, ‘‘2 कोल्ड कौफी भेज दो.’’

कमलदान चारण जकिया को अपनी बांहों में लेने को बेचैन था. जकिया उस की बेचैनी को समझ रही थी. उस ने जकिया का हाथ थामा तो उस ने कहा, ‘‘थोड़ा सब्र कीजिए साहब, वेटर कौफी ले कर आता होगा, पहले कौफी तो पी लें.’’

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया तो जकिया ने कहा, ‘‘शायद कौफी ले कर आ गया.’’

जकिया दरवाजा खोलने के लिए उठी. उस ने जैसे ही दरवाजा खोला, 4-5 हट्टेकट्टे आदमी सीधे कमरे में घुस आए. उन में से एक अधेड़ उम्र के आदमी ने बैड पर बैठे थानाप्रभारी कमलदान चारण से कहा, ‘‘हम भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) से हैं.’’

एसीबी की टीम को देख कर कमलदान चारण के मन में छाई सारी उमंगें और रंगीनियां पलभर में गायब हो गईं. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह समझ नहीं पाया कि अचानक यह सब कैसे हो गया?

जकिया ने कहा, ‘‘यही है वह थानेदार, जो मेरी अस्मत लूटने मेरे घर पर आया है.’’

बंटी और बबली ले डूबा लालच – भाग 1

राजस्थान की राजधानी जयपुर (पश्चिम) में एक थाना है विश्वकर्मा. 5 जनवरी, 2023 को इसी थाने के एसएचओ रमेश सैनी अपने कार्यालय में बैठे थे. इंसपेक्टर रमेश सैनी कुछ फाइलों का अध्ययन कर रहे थे. तभी अर्दली ने आ कर सैल्यूट मारा और कहा, ‘‘सर, दीपक माहेश्वरी नामक बिजनेसमैन आप से मिलने आए हैं.’’

‘‘कहां हैं दीपकजी, उन्हें अंदर भेजो और चायपानी भी.’’ इंसपेक्टर रमेश सैनी ने अर्दली को आदेश दिया.

अर्दली सैल्यूट मार कर वापस मुड़ा और कार्यालय से बाहर जा कर बिजनेसमैन दीपक माहेश्वरी को ले आया.

एसएचओ रमेश सैनी ने सामने पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया और नमस्ते का जवाब दे कर कहा, ‘‘पधारिए दीपकजी. कहिए क्या बात है? आप के चेहरे से लग रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं.’’

सुन कर दीपक कुरसी में जैसे धंस गए. वह बोले, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मुझे कोई व्यक्ति ब्लैकमेल कर रहा है. वह करीब 26 लाख रुपए तो ऐंठ चुका है. अब फिर से 23 लाख रुपए की डिमांड कर रहा है. रुपए नहीं देने पर बदनाम करने की धमकी दे रहा है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं और क्या नहीं. मैं ने 2 बार उन की मांग यह सोच कर मान ली थी कि समाज में इज्जत चली जाएगी. अब लग रहा है कि ब्लैकमेलर मुझे जीते जी ऐसे ही झूठ के बल पर आए दिन ब्लैकमेल करते रहेंगे. आप मेरी रिपोर्ट दर्ज कर उन के खिलाफ काररवाई करें और उन ठगों से मुझे बचाएं.’’

‘‘आप मुझे विस्तार से बताएं कि मामला क्या है, तभी कुछ किया जा सकता है.’’ एसएचओ सैनी ने बिजनेसमैन दीपक को धैर्य बंधाया.

तब तक अर्दली चायपानी ले आया था. चायपानी के बाद बिजनेसमैन दीपक माहेश्वरी ने बताया, ‘‘सर, मेरा नाम दीपक माहेश्वरी (47) है. मैं मुखर्जी कालोनी, शास्त्रीनगर, जयपुर का रहने वाला हूं. मेरी विश्वकर्मा में रोड नंबर-9 पर साइन बोर्ड बनाने की फैक्ट्री है.

‘‘फैक्ट्री में काम करने वाले वर्करों को मैं परिवार के सदस्यों की तरह मानता हूं. मेरा खुशहाल परिवार है. करोड़ों का वार्षिक टर्नओवर है. सब कुछ ठीक चल रहा था कि मुझे 2 नवंबर, 2022 को फैक्ट्री के गार्ड ने एक लेटर दिया. गार्ड ने कहा कि यह पत्र कल रात 8 बजे एक आटो ड्राइवर दे गया था.

‘‘मैं ने उस बंद लिफाफे को खोल कर औफिस में पढ़ा. वह एक धमकी भरा पत्र था. उस पत्र में मेरा और मेरी कंपनी की महिला कर्मचारी का नाम लिखा हुआ था. हम दोनों जहांजहां साथ गए थे, उन स्थानों के बारे में लिखा हुआ था. लेटर में लिखा था, ‘आप मुझे 10 लाख रुपए दे दो. नहीं तो मैं आप की निजी जानकारियां उजागर कर दूंगा.’ लेटर में शाम 7 बजे 10 लाख रुपए से भरा बैग विद्याधर नगर स्थित कपड़ों के शोरूम के सामने पेड़ के नीचे छोड़ने के लिए लिखा था.

‘‘मैं बदनामी के डर से शाम को 10 लाख रुपए दे आया. सोचा था कि बला टली. मगर 15 दिन बाद दोबारा गार्ड के जरिए लेटर 15 नवंबर 2022 को मिला. उस पत्र में लिखा था, ‘जो रुपए दिए गए, उस में साढ़े 7 लाख रुपए ही मिले हैं. ढाई लाख रुपए कम दिए हैं. उस के एवज में अब साढ़े 4 लाख रुपए देने होंगे. अगर कंपनी के उस व्यक्ति की जानकारी चाहिए तो 10 लाख रुपए और लगेंगे. साढ़े 14 लाख रुपए उसी जगह पर उसी तरीके से पहुंचा देना. इस के साथ ही 25-25 हजार के 3 लिफाफे भी बैग में रखना.’

‘‘कहे अनुसार दोबारा 15.25 लाख रुपए ब्लैकमेलर तक पहुंचा दिए. कंपनी के व्यक्ति की जानकारी के लिए ब्लैकमेलर के लेटर का मैं इंतजार करता रहा. 26 दिसंबर, 2022 को मुझे गार्ड ने एक और लिफाफा पकड़ाया. उस में कुछ प्रश्न-उत्तर लिख कर कंपनी के व्यक्ति के नहीं मिलने और जानकारी नहीं होने के बारे में लिखा.

‘‘उस के बारे में बताने के लिए 23 लाख रुपए की और डिमांड की गई. मैं ने ब्लैकमेलर की बताई जगह पर रुपए की जगह एक लेटर लिख कर डाल दिया. लेटर में कंपनी के व्यक्ति के बारे में जानकारी मांगी.

‘‘ब्लैकमेलर ने 2 जनवरी, 2023 को पत्र के जरिए धमकी दी कि अगर आप मुझे पैसे नहीं दोगे तो मैं आप की सभी प्राइवेट जानकारियां आउट कर दूंगा. आप की चालाकी पर हम घटना को अंजाम देने में एक मिनट नहीं सोचेंगे. जान गंवा बैठोगे. उस ने 25 लाख रुपए का बैग 4 जनवरी, 2023 को उसी जगह रखने को कहा.

‘‘उसी दिन ब्लैकमेलर के बताए एड्रेस पर फिर रुपए की जगह मैं लेटर डाल कर आया. मैं ने उस पत्र में लिखा कि पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण अभी मैं आप का काम नहीं कर पा रहा हूं. मैं रात एक बजे आप के बताए अनुसार इसी जगह पर आप का काम कर दूंगा.

‘‘सर, ब्लैकमेलर मुझ से 26 लाख रुपए ऐंठ चुके हैं और 23 लाख रुपए और मांग रहे हैं. मैं आज आप की शरण में आया हूं. आप ही मेरी मदद कर इन ब्लैकमेलर ठगों से बचाएं.’’

इतनी विस्तार से घटना सुना कर दीपक माहेश्वरी चुप हो गए. एसएचओ रमेश सैनी ने दीपक माहेश्वरी की तहरीर पर अज्ञात ठगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएचओ ने घटना की जानकारी डीसीपी वंदिता राणा को भी दे दी.

खिलाड़ियों का खिलाड़ी : भ्रष्टाचार की कहानी – भाग 1

इसी साल जनवरी की बात है. देश की नामी कंपनी एसपीएमएल इंफ्रा लिमिटेड (पुराना नाम सुभाष प्रोजैक्ट्स ऐंड मार्केटिंग लिमिटेड) के गुड़गांव के सैक्टर-32 स्थित औफिस के लैंडलाइन पर फोन आया तो औपरेटर ने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘गुड मौर्निंग एसपीएमएल.’’

दूसरी ओर से फोन करने वाले ने रौबीली आवाज में कहा, ‘‘मैं एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) जयपुर से एसपी शंकरदत्त शर्मा बोल रहा हूं.’’

‘‘यस सर, बताइए, हमारी कंपनी आप की क्या सेवा कर सकती है?’’

‘‘आप की कंपनी के डाइरेक्टर ऋषभ सेठी अभी फरार हैं, इसलिए किसी जिम्मेदार आदमी से मेरी बात कराइए.’’ दूसरी ओर से उसी तरह रौबीली आवाज में कहा गया.

‘‘सर, सेठी साहब तो नहीं हैं, लेकिन उन के रिश्तेदार औफिस में आए हुए हैं. आप कहें तो उन से बात करा दूं?’’ औपरेटर ने फोन करने वाले से नम्रता से पूछा.

‘‘सेठी के रिश्तेदार का नाम क्या है?’’ फोन करने वाले ने पूछा.

‘‘सर, उनका नाम सनी पांड्या है. आप कहें तो मैं आप की उन से बात करा दूं.’’ औपरेटर ने कहा.

‘‘ठीक है, आप मिस्टर सनी पांड्या से मेरी बात कराइए.’’ फोन करने वाले ने कहा.

औपरेटर ने इंटरकौम द्वारा सनी पांड्या को बता कर लाइन दे दी कि जयपुर से एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा उन से बात करना चाहते हैं. लाइन कनेक्ट होते ही फोन करने वाले ने पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘‘पांड्या साहब, आप ऋषभ सेठी के रिश्तेदार हैं, इसलिए आप को तो पूरे मामले का पता ही होगा?’’

‘‘साहब, मुझे ज्यादा तो पता नहीं है कि क्या मामला है. सिर्फ इतना पता है कि जयपुर एंटी करप्शन ब्यूरो कुछ जांच कर रही है.’’ सनी पांड्या ने कारोबारी अंदाज में कहा.

‘‘पांड्या साहब, ऐसा कैसे हो सकता है कि आप को मामले की जानकारी न हो. आप से कुछ बात करनी है. आप अपना मोबाइल नंबर बताइए.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘साहब, मेरा मोबाइल नंबर आप नोट कर लीजिए,’’ पांड्या ने अपना मोबाइल नंबर बताते हुए कहा, ‘‘लेकिन मेरा इस मामले में किसी तरह का कोई लेनादेना नहीं है.’’

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‘‘वह तो मुझे पता है कि आप का इस मामले में कोई लेनादेना नहीं है,’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं आप के रिश्तेदार के भले की बात करने वाला हूं. खैर, मैं आप को बाद में फोन करता हूं.’’

इतना कह कर फोन काट दिया गया. फोन कटने के बाद पांड्या साहब सोचने लगे कि एसीबी के एसपी साहब ने फोन क्यों किया? कुछ देर तक वह इसी विषय पर सोचते रहे. उन्हें पता था कि एसपीएमएल इंफ्रा कंपनी राजस्थान के जलदाय विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को रिश्वत दे कर काम कराने के आरोप में फंसी हुई है.

अभी पांड्या इसी मसले पर विचार कर रहे थे कि उन के मोबाइल पर फोन आया. उन्होंने फोन रिसीव किया तो फोन करने वाले ने कहा, ‘‘पांड्या साहब, मैं जयपुर से एसीबी का एसपी शंकरदत्त शर्मा बोल रहा हूं. उस समय एक जरूरी फोन आ गया था, इसलिए बात नहीं हो सकी थी.’’

‘‘जी बताइए, कैसे याद किया?’’ पांड्या ने पूछा.

‘‘एसपीएमएल कंपनी का जो मामला एसीबी में चल रहा है, उस की जांच मैं ही कर रहा हूं,’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं इस मामले को रफादफा कर सकता हूं. रिश्वत देने के प्रकरण से ऋषभ सेठी और कंपनी के अन्य डाइरेक्टरों के नाम भी इस मामले से निकाल दूंगा.’’

‘‘सर, इस के लिए हमें क्या करना होगा?’’ पांड्या ने पूछा.

‘‘इस के लिए आप को 10 करोड़ रुपए देने होंगे.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘सर, यह रकम तो बहुत ज्यादा है.’’ पांड्या ने कहा.

‘‘आप के रिश्तेदार सेठीजी करोड़ों रुपए के बिल पास कराने के लिए इंजीनियरों को लाखोंकरोड़ों रुपए की घूस दे देते हैं. फिर आप को 10 करोड़ रुपए ज्यादा कैसे लग रहे हैं?’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘सर, ऐसी बात नहीं है,’’ पांड्या ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘इतनी बड़ी रकम हम नहीं दे सकेंगे.’’

‘‘ठीक है, आप को एक दिन की मोहलत देता हूं. आप ऋषभ सेठी से बात कर लें,’’ फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं आप को कल फिर फोन करूंगा. तब बता देना कि क्या विचार है.’’

इस के बाद फोन कट गया. पांड्या फिर सोच में डूब गए. उन्हें बड़ा अजीब लग रहा था कि एसपी स्तर का एक आईपीएस अधिकारी खुद फोन कर के उन से मामला रफादफा करने के लिए 10 करोड़ रुपए घूस मांग रहा था. जिस नंबर से पांड्या के मोबाइल पर फोन आया था, उस नंबर के बारे में उन्होंने पता कराया.

अरबों रुपए के टर्नओवर वाली एसपीएमएल कंपनी के अधिकारियों के लिए किसी फोन नंबर के बारे में पता कराना चुटकी बजाने जैसा काम था. कुछ ही देर में उन्हें पता चल गया कि एसीबी के एसपी शंकरदत्त शर्मा के मोबाइल नंबर से ही उन के मोबाइल पर फोन आया था.

अब शक करने जैसी कोई बात नहीं थी. उन्होंने कंपनी के अधिकारियों से बात की. उस के बाद तय किया गया कि अगर एसपी साहब मामला रफादफा करने की बात कह रहे हैं तो उन से बात आगे बढ़ाई जाए.

अगले दिन सनी पांड्या को एसपी साहब के फोन का इंतजार था. जैसे ही एसपी शंकरदत्त शर्मा का फोन आया, उन्होंने तुरंत फोन रिसीव कर लिया तो दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘पांड्या साहब कैसे हैं? मैं एसपी शंकरदत्त शर्मा बोल रहा हूं.’’

‘‘मैं तो ठीक हूं साहब,’’ पांड्या ने कहा, ‘‘मैं ने कंपनी के अधिकारियों से बात की है. अगर आप मामला रफादफा करते हैं तो वे ज्यादा से ज्यादा 2 करोड़ रुपए दे सकते हैं.’’

‘‘पांड्या, शायद तुम्हारी कंपनी के अधिकारियों को पुलिस की ताकत का अहसास नहीं है. अभी तो कंपनी के 2 ही एजीएम गिरफ्तार हुए हैं. जल्दी ही ऋषभ सेठी और केशव गुप्ता भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे. उस के बाद तुम्हें पता चलेगा कि हम लोग क्या चीज हैं.’’ फोन करने वाले ने धमकाते हुए कहा.

‘‘साहब, बाद का किस ने देखा है. जो होना है, होता रहेगा. लेकिन फिलहाल हम 2 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं दे सकेंगे.’’ पांड्या ने कहा.

‘‘पांड्या, काम करने के तो मैं 10 करोड़ रुपए ही लूंगा, बाकी तुम्हारी मरजी है.’’ दूसरी ओर से फोन करने वाले ने दोटूक लहजे में कहा.

‘‘साहब, हमारी हैसियत इतनी ही है.’’ पांड्या ने विनती करते हुए कहा.

‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा.’’ कह कर दूसरी ओर से फोन काट दिया गया.

इस बारे में क्या हुआ, यह जानने से पहले हम थोड़ा आगे की कहानी जान लें, जिस के लिए हमें करीब एक साल पीछे जाना होगा. आइए जानें कि शंकरदत्त शर्मा किस मामले की बात कर रहे थे.

मसाज पार्लर की आड़ में जिस्म का धंधा – भाग 1

राजवीर अपने दोनों हाथ जैकेट की जेब में डाले बारबार झुक कर अपनी दाईं ओर झांक रहा था. शायद उसे अपने गंतव्य स्थान तक जाने के लिए किसी बस का इंतजार था. उसे बस स्टाप पर खड़े 15 मिनट हो गए थे, लेकिन उस नंबर की बस अभी तक नहीं आई थी, जिस की राजवीर को जरूरत थी.

अभी कुछ समय और गुजरा था कि बस स्टाप पर एक दुबलीपतली युवती पर्स हिलाती हुई आई और राजवीर के पास खड़ी हो गई. राजवीर ने उस पर उचटती सी नजर डाली. उस युवती ने पीले रंग का टौप और आसमानी रंग की जींस पहन रखी थी. गले में उस के लाल रंग का शाल पड़ा था जो शायद दिखाने के लिए था. क्योंकि ऐसे सर्द मौसम में शाल को गले में न डाल कर ओढ़ लेना बेहद जरूरी होता है. गले में डालना तो फैशन दिखाने जैसा हुआ.

राजवीर को उस के पहनावे से कुछ लेनादेना नहीं था. उस का ध्यान उस के चटख मेकअप की तरफ गया. उस के चेहरे पर पाउडर पुता था. आंखों में गहा काजल और होंठों पर गहरी लिपस्टिक थी. देखने में युवती सुंदर थी ही, उस चटख मेकअप ने उसे और भी खूबसूरत बना दिया था.

उस का शरीर बेशक दुबलापतला था, लेकिन देह में गजब का आकर्षण था, जो किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लेने के लिए काफी था. वह हाथ में पकड़े पर्स को अब भी हिला रही थी.

युवती राजवीर के थोड़ा और करीब सरक आई. उस के पतलेपतले होंठ हिले, ‘‘आप किस बस का इंतजार कर रहे हैं?’’ उस ने सुरीली आवाज में बेतुका प्रश्न किया.

‘‘आप को कौन सा नंबर चाहिए?’’ राजवीर ने उलटा सवाल कर दिया.

‘‘जो भी आ जाए, मुझे दिल्ली गेट तक जाना है.’’ युवती ने मुसकरा कर बताया.

‘‘खड़ी रहिए, 15-20 मिनट से कोई बस यहां नहीं आई है.’’ राजवीर ने इस बार जेब से हाथ निकाल कर जैकेट की अंदरूनी जेब में सिगरेट की डब्बी ढूंढते हुए इत्मीनान से कहा.

सिगरेट की डब्बी निकाल कर उस ने सिगरेट निकाली और होंठों से लगाई. अभी वह उसे जलाने ही वाला था कि एक बस आती नजर आई. राजवीर ने सिगरेट जल्दी से डब्बी में रखी और डब्बी अपनी जैकेट के हवाले कर के बस का नंबर देखने लगा. बस का नंबर 405 था जो पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेश्न की ओर जा रही थी.

राजवीर तुरंत बस में चढ़ गया. बस खाली थी, इसलिए राजवीर को आराम से सीट मिल गई. अभी वह सीट पर बैठा ही था कि वही युवती आ कर उस के बगल वाली सीट पर बैठ गई.

‘‘मैं आप के पास बैठ रही हूं, आप को कोई ऐतराज तो नहीं है न?’’ उस ने राजवीर के चेहरे पर नजरें जमा कर पूछा.

‘‘मुझे क्यों ऐतराज होगा, आप जहां मरजी वहां बैठिए.’’ राजवीर ने कहा और थोड़ा सा विंडो की तरफ सरक गया.

युवती इत्मीनान से बैठ गई. बस चल पड़ी. राजवीर विंडो से बाहर देखने लगा था तभी उस ने महसूस किया कि युवती उस के कंधे पर अपना कंधा रगड़ रही है. राजवीर के शरीर में नारी स्पर्श से सनसनाहट सी होने लगी. आखिर था तो वह मर्द ही. वह उस युवती की तरफ धीरे से सरका.

वह युवती हौले से मुसकराई. फिर फुसफुसा कर बोली, ‘‘मेरा नाम मोहिनी है. आप का?’’

‘‘सुनील,’’ राजवीर ने झूठ बोला.

‘‘चलोगे?’’ मोहिनी ने पूछा.

‘‘कहां?’’ राजवीर ने धड़कते दिल से पूछा. वह समझ चुका था कि युवती पेशेवर कालगर्ल है, तभी पूछ रही है.

‘‘जहां मैं ले चलूं.’’

‘‘क्या खर्च करना पड़ेगा?’’

‘‘सिर्फ 5 सौ.’’

‘‘ज्यादा है, मेरी जेब में इस वक्त 3 सौ रुपया है.’’

‘‘3 सौ…’’ मोहिनी के स्वर में निराशा भर गई, ‘‘ढाई सौ तो कमीशन में गया, बचा 50 रुपया.’’ वह होंठों में बड़बड़ाते हुए हिसाब जोड़ने लगी, लेकिन उस के शब्द राजवीर के कानों में पड़ गए. वह चौंकन्ना हो गया.

दरअसल, राजवीर पुलिस का मुखबिर था. पुलिस को ऐसी ही अहम जानकारियां दे कर ईनाम पाने का वह काम करता था. कुछ मन ही मन सोच कर उस ने पूछा, ‘‘ढाई सौ किसे दोगी?’’

‘‘मसाज पार्लर के मालिक को,’’ मोहिनी के मुंह से निकल गया. फिर वह बात को घुमाने के लिए बोली, ‘‘तुम्हारे पास कोई जगह होती तो पूरे 3 सौ रुपए मुझे ही मिलते.’’

राजवीर गंभीर हो गया, ‘‘मेरे पास जगह नहीं है, लेकिन तुम निराश मत होओ, मैं तुम्हें 5 सौ ही दूंगा.’’

‘‘अब 2 सौ कहां से आएंगे?’’ मोहिनी ने पूछा.

‘‘बस से उतर कर मैं एटीएम से निकाल लूंगा.’’

‘‘ओह! फिर तो बात बन जाएगी, मैं तुम्हें पार्लर में ले कर चलूंगी.’’ मोहिनी खुश होते हुए बोली.

दिल्ली गेट आने वाला था. राजवीर के साथ मोहिनी ने भी सीट छोड़ी और दोनों स्टैंड पर बस से उतर गए. राजवीर ने एक एटीएम से कुछ रुपए निकाल कर जेब में डाले. एक 5 सौ का नोट उस ने पैंट की जेब में डाल लिया और एटीएम के बाहर खड़ी मोहिनी के पास आ गया, ‘‘पैसे यहीं दूं या…’’

‘‘तुम्हें खुश कर दूंगी तभी पैसे लूंगी,’’ मोहिनी मुसकरा कर बोली, ‘‘चलो, सामने से पहाड़गंज का आटो कर लेते हैं.’’

‘‘चलो,’’ राजवीर ने मोहिनी का नरम गुदाज हाथ पकड़ कर कहा. उन दोनों ने सड़क पार करने के लिए जेब्रा क्रासिंग की तरफ कदम बढ़ा दिए.

19 नवंबर, 2022 को रात के 11 बज कर 20 मिनट का समय रहा होगा, थाना पहाड़गंज के एसएचओ रविंद्र कुमार तोमर एक फाइल देख रहे थे. दरवाजे पर आहट पा कर उन्होंने गरदन घुमाई.

दरवाजे पर खड़े शख्स को वह बखूबी पहचानते थे. रात के वक्त उस का यहां आना अकारण नहीं हो सकता, यह सोच कर ही वह फाइल बंद कर के एक तरफ सरकाते हुए बोले, ‘‘आओ राजवीर, इस वक्त कैसे आए?’’

12 लाख के पैकेज वाले बाल चोर – भाग 1

19 जून, 2017 को मनोज चौधरी की बेटी की शादी थी. वह रीयल एस्टेट के एक बड़े कारोबारी हैं. गुड़गांव में उन का औफिस है. उन्होंने बेटी की शादी एक संभ्रांत परिवार में तय की थी. अपनी और वरपक्ष की हैसियत को देखते हुए उन्होंने शादी के लिए दक्षिणपश्चिम दिल्ली के बिजवासन स्थित आलीशान फार्महाउस ‘काम्या पैलेस’ बुक कराया था.

बेटी की शादी के 3 दिनों बाद ही उन के बेटे की भी शादी थी. बेटे की लगन का दिन भी 19 जून को ही था, इसलिए उस का कार्यक्रम भी उन्होंने वहीं रखा था.

मनोज चौधरी की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र के लोगों से अच्छी जानपहचान थी, इसलिए बेटे की लगन और बेटी की शादी में सैकड़ों लोग शामिल हुए थे. मेहमानों के लिए उन्होंने बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी थी. वह आने वाले मेहमानों का बड़ी ही गर्मजोशी से स्वागत कर रहे थे.

बारात के काम्या पैलेस में पहुंचने से पहले ही उन्होंने बेटे की लगन का कार्यक्रम निपटा दिया था. इस के बाद जैसे ही बारात पहुंची, मनोज चौधरी और उन के घर वालों ने धूमधाम से उस का स्वागत किया. रीतिरिवाज के अनुसार शादी की सभी रस्में पूरी होती रहीं. रात करीब पौने 12 बजे फेरे की रस्में चल रही थीं. उस समय तक बारात में आए ज्यादातर लोग सो चुके थे. ज्यादातर मेहमान खाना खा कर जा चुके थे.

फेरों के समय केवल कन्या और वरपक्ष के खासखास लोग ही मंडप में बैठे थे. मंडप के नीचे बैठा पंडित मंत्रोच्चारण करते हुए अपना काम कर रहा था. जितने लोग मंडप में बैठे थे, पंडित ने सभी की कलाइयों में कलावा बांधना शुरू किया. वहां बैठे मनोज चौधरी ने भी अपना दाहिना हाथ पंडित की ओर बढ़ा दिया. कलावा बंधवाने के बाद उन्होंने पंडित को दक्षिणा दी. तभी उन का ध्यान बगल में रखे सूटकेस की तरफ गया. सूटकेस गायब था.

सूटकेस गायब होने के बारे में जान कर मनोज चौधरी हडबड़ा गए. वह इधरउधर सूटकेस को तलाशने लगे, क्योंकि उस सूटकेस में 19 लाख रुपए नकद और ढेर सारे गहने थे.

कलावा बंधवाने में उन्हें मात्र 4 मिनट लगे थे और उतनी ही देर में किसी ने उन का सूटकेस उड़ा दिया था. परेशान मनोज चौधरी मंडप से बाहर आ कर सूटकेस तलाशने लगे. इस काम में उन के घर वाले भी उन का साथ दे रहे थे. सभी हैरान थे कि जब मंडप में दरजनों महिलाएं और पुरुष बैठे थे तो ऐसा कौन आदमी आ गया, जो सब की आंखों में धूल झोंक कर सूटकेस उड़ा ले गया.

बहरहाल, वहां अफरातफरी जैसा माहौल बन गया. जब उन का सूटकेस नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना देने के साथ लैपटौप से औनलाइन रिपोर्ट दर्ज करा दी. कुछ ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुुंच गई. पुलिस कंट्रोल रूम से मिली सूचना के बाद थाना कापसहेड़ा से भी पुलिस काम्या पैलेस पहुंच गई. मनोज चौधरी ने पूरी बात पुलिस को बता दी.

चूंकि मामला एक अमीर परिवार का था, इसलिए पुलिस अगले दिन से गंभीर हो गई. दक्षिणपश्चिम जिले के डीसीपी सुरेंद्र कुमार ने थाना कापसहेड़ा पुलिस के साथ एंटी रौबरी सेल को भी लगा दिया. उन्होंने औपरेशन सेल के एसीपी राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर सतीश कुमार, सुबीर ओजस्वी, एसआई अरविंद कुमार, प्रदीप, एएसआई राजेश, महेंद्र यादव, राजेंद्र, हैडकांस्टेबल बृजलाल, उमेश कुमार, विक्रम, कांस्टेबल सुधीर, राजेंद्र आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने सब से पहले फार्महाउस काम्या पैलेस में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इन में एक फुटेज में एक छोटा बच्चा मनोज चौधरी के पास से सूटकेस उठा कर बाहर गेट की ओर ले जाता दिखाई दिया. इस के कुछ सैकेंड बाद दूसरा बच्चा भी उस के पीछेपीछे जा रहा था. उस के बाद काले रंग की टीशर्ट पहने एक अन्य लड़का सीट से उठ कर उन दोनों के पीछे जाता दिखाई दिया. सभी फुरती से बाहरी गेट की तरफ जाते दिखाई दिए थे.

पुलिस ने उन तीनों बच्चों के बारे में मनोज चौधरी और उन के घर वालों से पूछा. सभी ने बताया कि ये तीनों लड़के उन के परिवार के नहीं थे. ये शाम 8 बजे के करीब काम्या पैलेस में आए थे. कार्यक्रम में ये बहुत ही बढ़चढ़ कर भाग ले रहे थे. डीजे पर भी ये ऐसे नाच रहे थे, जैसे शादी इन के परिवार में हो रही है. जब ये परिवार की लड़कियों और महिलाओं के डीजे पर जाने के बावजूद भी वहां से नहीं हटे तो परिवार के एक आदमी ने इन से डीजे से उतरने के लिए कहा था.

मनोज ने पुलिस को बताया कि छोटा वाला बच्चा महिलाओं के कमरे के पास भी देखा गया था. वह समझ रहे थे कि ये बच्चे शायद किसी मेहमान के साथ आए होंगे. बहरहाल, उन्होंने उन की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया था और उसी बच्चे ने उन का सूटकेस साफ कर दिया था. उन के कार्यक्रम में जो फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर थे, उन के द्वारा खींचे गए फोटो में भी वे बच्चे दिखाई दिए थे.

पुलिस टीम ने उन्हीं फोटो की मदद से सूटकेस चोरों का पता लगाना शुरू किया. पुलिस ने वे फोटो अलगअलग लोगों को दिखाए. उन फोटो को पहचान तो कोई नहीं सका, पर कुछ लोगों ने यह जरूर बता दिया कि ये बच्चे मध्य प्रदेश के हो सकते हैं.

एटीएम कार्ड की क्लोनिंग, विदेशी ठगों का मायाजाल

इसी 25 फरवरी की बात है, दोपहर का समय था. जयपुर के महेशनगर पुलिस थाने में ड्यूटी अफसर अपनी सीट पर बैठे थे, तभी करीब 22-24 साल का एक युवक थाने पहुंचा. वह सीधा ड्यूटी अफसर के पास पहुंचा और अपना परिचय दे कर बोला, ‘‘सर, मेरा नाम महेशराज मीणा है और मैं महेशनगर में रहता हूं.’’

‘‘बताइए, थाने कैसे आना हुआ?’’ ड्यूटी अफसर ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बैंक खाते से 15 हजार रुपए निकाल लिए गए, जबकि एटीएम कार्ड मेरे पास है.’’ महेशराज ने घबराए लहजे में कहा, ‘‘साहब, मेरे मोबाइल पर ट्रांजैक्शन का मैसेज आया, तब पता चला कि मेरे खाते से पैसे निकल गए हैं.’’

ड्यूटी अफसर ने महेशराज को कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पास मैसेज कब आया?’’

‘‘साहब, मैसेज तो आज ही आया है.’’ महेशराज ने कहा, ‘‘आश्चर्य की बात यह है कि आज मैं किसी एटीएम से पैसे निकालने भी नहीं गया, फिर भी मेरे एकाउंट से 15 हजार रुपए निकल गए.’’

ड्यूटी अफसर महेशराज से उस के खाते से पैसे निकलने के बारे में जानकारी ले रहे थे, इसी दौरान 2-3 और लोग थाने पहुंच गए. ड्यूटी अफसर ने उन लोगों के आने का कारण पूछा तो पता चला महेश की तरह उन के एकाउंट से भी पैसे निकल गए हैं.

थाने पहुंचे दिनेश कुमार ने बताया कि उस के खाते से 20 हजार रुपए निकाल लिए गए हैं. चंद्रलता नवल ने 40 हजार रुपए निकलने की बात बताई. अर्जुन अग्रवाल के खाते से भी 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

ड्यूटी अफसर इन लोगों से बातचीत कर ही रहे थे कि 2 लोग और थाने पहुंच गए. इन में कमलेश कुमारी मीणा ने बताया कि उस के खाते से 10 हजार रुपए निकाले गए हैं जबकि प्रदीप ने 20 हजार रुपए निकलने की बात कही. इस तरह उस दिन 3-4 घंटे में ही 10-11 लोग इस तरह की शिकायत ले कर थाने पहुंचे कि उन के खाते से बिना एटीएम कार्ड के रकम निकाल ली गई. ड्यूटी अफसर ने इन लोगों से अलगअलग बात कर के तह में जाने की कोशिश की तो पता चला कि इन लोगों के खाते से रकम दिल्ली में निकाली गई थी.

यह बात भी सामने आई कि ये सभी ट्रांजैक्शन उस दिन दोपहर 1 से 2 बजे के बीच हुए थे. पीडि़त लोगों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने कुछ दिनों पहले महेशनगर फाटक और 80 फुटा रोड पर लगे 3 एटीएम से पैसे निकाले थे. इस के बाद एटीएम से कोई ट्रांजैक्शन नहीं किया था.

ड्यूटी अफसर को मामला गंभीर लगा. उन्होंने थानाप्रभारी जयसिंह और अपने उच्चाधिकारियों को इस तरह के मामले होने की सूचना दी. इसी के साथ पुलिस ने सभी पीडि़तों से लिखित में रिपोर्ट ले ली. पुलिस ने इन लोगों को जल्द से जल्द अपने एटीएम कार्ड ब्लौक करवाने की भी हिदायत दी, ताकि उन के खाते से और रकम न निकाली जा सके.

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उस दिन शाम तक 10 ऐसे पीडि़तों ने महेशनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. इन लोगों के खातों से करीब ढाई लाख रुपए निकाले गए थे. इस में 3 हजार रुपए से ले कर 40 हजार रुपए तक की रकम शामिल थी. इन पीडि़तों में 2 बैंक कर्मचारी भी शामिल थे. भारतीय स्टेट बैंक में सहायक चेतराम मीणा के खाते से दिल्ली में आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम से 30 हजार रुपए निकाल लिए गए थे. बैंक कर्मचारी अतेंद्र मीणा के खाते से भी 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

जयपुर पुलिस कमिश्नरेट की क्राइम ब्रांच भी सक्रिय हो गई. महेशनगर थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच ने पीडि़तों से बातचीत की तो यह बात साफ हो गई कि इन वारदातों को एटीएम कार्ड की क्लोनिंग कर के अंजाम दिया गया था. क्योंकि सारे पीडि़त जयपुर के थे. वे दिल्ली गए भी नहीं थे और दिल्ली के एटीएम से उन के खातों से पैसे निकाल लिए गए थे.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू भी नहीं की थी कि अगले दिन यानी 26 फरवरी को सुबह से ही महेशनगर थाने पर लोगों का जमावड़ा होने लगा. ये लोग भी अपने खाते से रकम निकाले जाने की शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचे थे. उस दिन शाम तक 28 पीडि़त और सामने आ गए. इन में राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला के वैज्ञानिक सुशील शर्मा के खाते से 3 बार में 10-10 हजार रुपए निकाले गए थे. चार्टर्ड एकाउंटेंट गजेंद्र शर्मा ने पुलिस को बताया कि उन्होंने 21 फरवरी को जयपुर के किशनपोल बाजार स्थित पीएनबी के एटीएम से 5 हजार रुपए निकाले थे. इस के 3 घंटे बाद ही उन के खाते से 10,500 रुपए निकालने का मैसेज आ गया.

सीए गजेंद्र शर्मा के भाई देवेंद्र शर्मा के खाते से 4 बार में 38 हजार रुपए निकाल लिए गए थे. इन के अलावा मीना कंवर के खाते से 16 हजार, देवेंद्र सिंह के खाते से 25 हजार, चंद्रप्रकाश शर्मा के खाते से 40 हजार, रामप्रताप शर्मा के खाते से 30 हजार, सरमया थौमस के खाते से 40 हजार, मयंक गौड़ के खाते से 18,500, चुन्नीलाल गुप्ता के खाते से 40 हजार रुपए निकाले गए.

इस के अलावा सुशीला तंवर के खाते से 40 हजार, सुशील कुमार राज के खाते से 30 हजार, सुशीला राठौड़ के खाते से 5 हजार, अजय कुमार के खाते से 2 हजार, योगेंद्र कुमार के खाते से 26500, दुर्गेश दवे के खाते से 5 हजार, लख्मीचंद के खाते से 40 हजार, राखी सिंह के खाते से 30 हजार, ललतेश सिंह के खाते से 70 हजार और रामअवतार बुनकर के खाते से 40 हजार रुपए सहित अन्य कई लोगों के खातों से भी पैसे निकाले गए थे.

2 दिन में 38 लोगों के बैंक खातों से रकम निकाले जाने से पुलिस भी हैरान थी. पुलिस ने जांच शुरू की तो सामने आया कि बदमाशों ने महेशनगर में 80 फुटा रोड पर एसबीआई, पीएनबी और इंडसइंड बैंक के एटीएम में स्किमर लगाए थे. ये स्किमर 24 फरवरी तक लगे हुए थे, क्योंकि उन्हीं एटीएम कार्ड धारकों के पैसे निकाले गए, जिन्होंने एक सप्ताह के भीतर इन एटीएम से ट्रांजैक्शन किया था. इन से डाटा चोरी कर 2 दिन में करीब 40 लोगों के खातों से 7 लाख रुपए से ज्यादा निकाल लिए गए थे. जांच में पता चला कि बदमाशों ने क्लोन कार्ड से दिल्ली में जनकपुरी व पालम इलाके में रकम निकाली थी.

पुलिस ने उन तीनों एटीएम के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज बैंक प्रबंधकों से मांगी. इस के अलावा सभी पीडि़तों से उन के एटीएम कार्ड के पासवर्ड बदलने को भी कहा. पीडि़तों के संबंधित बैंक खातों का स्टेटमेंट, उन्होंने 2 महीने में किसकिस एटीएम से पैसे निकाले थे, आदि की जानकारी एकत्र की. बदमाशों ने दिल्ली में जिसजिस एटीएम से रकम निकाली, उन की वीडियो फुटेज हासिल करने के लिए एक टीम दिल्ली भेजने का निर्णय लिया गया.

लगातार पीडि़तों के सामने आने से यह संख्या बढ़ती जा रही थी. करीब एक सप्ताह में ही जयपुर के महेशनगर, जवाहर सर्किल, बजाजनगर व ज्योतिनगर पुलिस थाने में इस तरह की वारदात के 88 मामले दर्ज हो गए. इन में पीडि़तों से 27 लाख 32 हजार रुपए से ज्यादा की धोखाधड़ी की गई थी.

जयपुर काफी समय से साइबर ठगों के निशाने पर रहा है. दिल्ली, नोएडा, झारखंड व छत्तीसगढ़ के ठग आए दिन बैंक अधिकारी या बीमा अधिकारी बन कर अथवा अन्य कोई प्रलोभन दे कर लोगों के बैंक खातों से ठगी करते रहे हैं.

नोटबंदी के बाद कैशलेस का प्रचलन बढ़ने से साइबर ठगों को अपना शिकार ढूंढने में आसानी हो गई है. जयपुर कमिश्नरेट में सन 2011 में साइबर क्राइम के केवल 88 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2012 में यह संख्या घट कर 74 रह गई. इस के बाद 2013 में साइबर क्राइम के 123, सन 2014 में 373, सन 2015 में 574, सन 2016 में 531 और 2017 में 643 मामले दर्ज हुए.

अब साइबर क्राइम का नया रूप सामने आ गया था. एटीएम कार्ड की क्लोनिंग के जरिए फरजी एटीएम कार्ड तैयार कर के इतनी बड़ी संख्या में लोगों से धोखाधड़ी के सामने आने पर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल चिंतित हो उठे. उन्होंने अपने मातहत अधिकारियों की बैठक बुलाई और बदमाशों का जल्द से जल्द पता लगाने को कहा.

कमिश्नर अग्रवाल ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन और पुलिस उपायुक्त (अपराध) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में एक टीम गठित की. इस टीम में क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर मुकेश चौधरी, महेश नगर थानाप्रभारी जय सिंह, महेश नगर थाने के सबइंसपेक्टर सुनील, क्राइम ब्रांच के सबइंसपेक्टर धर्म सिंह और मनोज कुमार के साथ कई कांस्टेबलों को शामिल किया गया.

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पुलिस टीम ने संबंधित बैंकों से रिकौर्ड हासिल किया. एटीएम बूथों की सीसीटीवी फुटेज जांची. आवश्यक तकनीकी जांचपड़ताल के बाद एक टीम दिल्ली भेजी गई. इस के अलावा पुलिस ने देश भर में ऐसे गिरोहों की जानकारी जुटाई, जो एटीएम कार्ड की क्लोनिंग के अपराध से जुड़े रहे हैं.

इस में पता चला कि एक गिरोह के बदमाशों ने पिछले साल देहरादून में एटीएम कार्ड के क्लोन बना कर जयपुर से रुपए निकाले थे. इस मामले में देहरादून एसटीएफ ने गिरोह के मास्टरमाइंड रामवीर को सितंबर 2017 में पुणे से गिरफ्तार किया था. रामवीर हरियाणा के बहादुरगढ़ का रहने वाला था. इस गिरोह में महिलाएं भी थीं.

उधर जयपुर से दिल्ली गई पुलिस टीम ने उन एटीएम की वीडियो फुटेज हासिल की, जिन से जयपुर के लोगों के एटीएम कार्ड की क्लोनिंग कर के रकम निकाली गई थी. इन फुटेज के आधार पर पुलिस ने 7 मार्च को दिल्ली से 3 विदेशी साइबर ठगों को पकड़ लिया.

इन में रोमानिया के काटनेस्कू, डुयिका बोगडन निकोलेई और सियोबानू शामिल थे. ये तीनों पर्यटक वीजा पर दिल्ली आए थे और वापस रोमानिया जाने की तैयारी में थे.

दरअसल, पुलिस को जयपुर में एटीएम की वीडियो फुटेज में हेलमेट पहने लोग स्किमर लगाते नजर आए थे. इन फुटेज में उन के चेहरे नहीं दिख रहे थे. हां, शरीर का अंदाजा हो रहा था. दिल्ली में पुलिस ने जो वीडियो फुटेज हासिल किए, उन में इन के चेहरे साफ दिखाई दिए. चेहरों से पता चला कि ये बदमाश विदेशी हैं. इस पर पुलिस ने वीजा खंगाले तो फोटो और वीडियो फुटेज से इन का मिलान हो गया. इस के बाद पुलिस ने इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने इन तीनों विदेशी साइबर ठगों से करीब 53 लाख 50 हजार रुपए नकदी के अलावा क्लोनशुदा विभिन्न बैंकों के 5 एटीएम कार्ड, एक मल्टीपरपज कार्ड रीडर, एक हौटस्पौट, एक स्पाई कैमरा, एक माइक्रो चिप, एक लैपटौप, 4 काले रंग के मास्क, एक कैप, 2 पासपोर्ट व आईडी, 4 मोबाइल फोन आदि बरामद किए.

इन विदेशी ठगों से पूछताछ में पुलिस को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा, क्योंकि ये केवल टूटीफूटी अंगरेजी बोलते थे. सख्ती करने पर ‘आई डोंट नो आई डोंट नो’ कह कर चुप हो जाते थे.

  पुलिस की पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

रोमानिया के रहने वाले काटनेस्कू, डुयिका बोगडन निकोलेई और सियोबानू अलगअलग समय पर दिल्ली आए थे. सब से पहले डुयिका बोगडन निकोलेई सितंबर में दिल्ली आया. इस के बाद काटनेस्कू दिसंबर में और बाद में सियोबानू दिल्ली पहुंचा. इन्होंने दिल्ली में ग्रेटर कैलाश में 7 हजार रुपए महीने के किराए पर एक फ्लैट लिया. दिल्ली में इन के साथ एक महिला मित्र भी थी. दिल्ली में इन्होंने तुर्की के बदमाशों से स्किमिंग डिवाइस खरीदी थी. दिल्ली से ये लोग कई दूसरे शहरों में भी वारदात करने के लिए गए. बीच में डुयिका बोगडन निकोलेई करीब एक महीने तक मुंबई और 3 सप्ताह तक आगरा में ठहरा. तीनों साथी दिल्ली में कुछ दिन रुके. फिर महिला मित्र को छोड़ कर ये जयपुर आ गए.

जयपुर में त्रिवेणीनगर में इन्होंने इंटरनेट पर बुकिंग करा कर 22 हजार रुपए महीने के किराए पर एक अपार्टमेंट में फ्लैट लिया. मकान मालिक ने सीआईडी के लिए सी फार्म पर इस की औनलाइन जानकारी दी थी. जयपुर में घूमने के लिए इन्होंने एमआई रोड से 300 रुपए प्रतिदिन किराए पर 2 एक्टिवा स्कूटी लीं.

जयपुर में घूम कर इन्होंने एटीएम बूथों को चिह्नित किया. चिह्नित किए गए एटीएम बूथों पर अलसुबह जा कर इन्होंने स्किमर और कैमरे लगा दिए. एटीएम मशीन पर जहां कार्ड स्वाइप किया जाता है, वहां इन्होंने एक चिप लगाई और जहां पर पिन नंबर लिया जाता है, उस जगह के ऊपर माइक्रो कैमरे फिट किए. इन बदमाशों ने एटीएम बूथ पर स्किमर व कैमरे लगाते समय अपने चेहरों पर हेलमेट लगा रखे थे. इस से इन के चेहरे वीडियो फुटेज में नजर नहीं आए.

जब कोई उपभोक्ता एटीएम बूथ में एटीएम कार्ड को स्वाइप करता तो चिप उसे पढ़ लेती थी और उस कार्ड की सारी जानकारी चिप में चली जाती थी. जब रुपए निकालने के लिए पिन नंबर डाला जाता था तो पासवर्ड वाली जगह के ऊपर लगे माइक्रो कैमरे से ठगों को उस एटीएम कार्ड का पिन नंबर पता चल जाता था. बाद में वे एटीएम कार्ड का क्लोन बना कर दूसरी जगह के किसी एटीएम से रकम निकाल लेते थे.

इन ठगों ने फरवरी के पहले सप्ताह में जयपुर में महेशनगर, जवाहर सर्किल, बजाज नगर और ज्योतिनगर में 8 एटीएम बूथों पर स्किमर और माइक्रो कैमरे लगाए थे. 20 फरवरी के आसपास ये लोग जयपुर में एटीएम बूथों पर लगाए स्किमर व माइक्रो कैमरे निकाल कर दिली चले गए.

दिल्ली में इन्होंने स्किमर व माइक्रो कैमरे से डाटा निकाल कर एटीएम कार्ड की क्लोनिंग की. इस के बाद विभिन्न स्थानों पर अलगअलग बैंकों के एटीएम से उन फरजी एटीएम कार्ड के जरिए लोगों के बैंक खातों से रकम निकाल ली.

इन साइबर ठगों ने पूछताछ में बताया कि वे 12 मार्च को रोमानिया जाने वाले थे. इस से पहले वे बैंक खातों से फरजीवाड़े से निकाली गई 50 लाख रुपए से ज्यादा की रकम को बिटकौइन में बदलनी थी, ताकि दिल्ली एयरपोर्ट पर इतनी बड़ी रकम के साथ न पकड़े जाएं. इन्होंने यूरोप समेत 6 देशों में कार्ड क्लोनिंग कर लोगों के बैंक खातों से रकम निकालने की बात बताई. भारत में इन्होंने जयपुर के अलावा आगरा व मुंबई में वारदात करने की बात भी कही है. पुलिस इन मामलों की पुष्टि करने में जुटी है.

गिरफ्तार सियोबानू के खिलाफ रोमानिया में हत्या समेत कई आपराधिक मामले दर्ज हैं. जयपुर पुलिस ने रोमानिया के दूतावास को ये सारी जानकारियां दे कर तीनों आरोपियों का आपराधिक ब्यौरा भी मंगाया गया है.

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गिरफ्तारी के बाद रिमांड अवधि के दौरान इन तीनों विदेशी साइबर ठगों से जयपुर के अशोक नगर में पूछताछ की जा रही थी. इस बीच एक दिन आरोपी डुयिका बोगडन निकोलेई ने पुलिस की मौजूदगी में थाने से भागने का प्रयास किया. हालांकि पुलिस ने उसे तुरंत दबोच लिया. इस संबंध में अशोक नगर थाने के रोजनामचे में रपट लिखी गई.

इन ठगों से बरामद 53 लाख रुपए में से करीब 28 लाख रुपए की ठगी के मामले जयपुर के विभिन्न थानों में दर्ज हैं. जयपुर पुलिस ने आगरा व मुंबई पुलिस से इस तरह की ठगी के मामलों की जानकारी मांगी थी, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला. अगर जल्दी ही किसी राज्य की पुलिस ने कोई दावा नहीं किया तो बाकी के 25 लाख रुपए की राशि अदालत से आदेश ले कर सरकारी खजाने में जमा कराई जाएगी.

हालांकि जयपुर पुलिस ने साइबर ठगों को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली, लेकिन देश भर में ऐसे पचासों गिरोह सक्रिय हैं, जो रोजाना किसी न किसी तरीके से लोगों के बैंक खातों से पैसे निकाल रहे हैं. ऐसे मामलों में उपभोक्ताओं को ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है.

भारत में एटीएम कार्ड क्लोनिंग के अभी बहुत कम मामले सामने आए हैं. चिंता की बात यह है कि ऐसे गिरोह से महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं. पिछले साल देहरादून में 97 लोगों के एटीएम क्लोनिंग के आरोप में पकड़े गए साइबर ठगों के गिरोह में हरियाणा के सोनीपत की अनिल कुमारी भी शामिल थी. इस गिरोह ने जयपुर में रकम निकाली थी. जयपुर पुलिस द्वारा पकड़े गए विदेशी साइबर ठगों के साथ भी उन की महिला मित्र थी. हालांकि अभी उस महिला की आपराधिक संलिप्तता सामने नहीं आई है. फिर भी पुलिस उस की तलाश कर रही है.

साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक क्रैडिट व डेबिट कार्ड पर एक चुंबकीय पट्टी होती है, जिस में खाताधारक और उस के खाते की डिटेल की कोडिंग होती है. इस मैगनेट टेप से डाटा कौपी करने की प्रक्रिया को स्किमिंग कहते हैं.

इस के लिए इलैक्ट्रौनिक डिवाइस स्किमर लगा कर चुंबकीय पट्टी में दर्ज जानकारी कौपी हो जाती है. इस से एटीएम कार्ड का क्लोन तैयार किया जाता है.

रिजर्व बैंक ने पिछले साल जुलाई में औनलाइन बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी से संबंधित नियमों में बदलाव किया था. इस के मुताबिक कार्ड क्लोनिंग से संबंधित मामलों में बैंक नुकसान की भरपाई करने के लिए जिम्मेदार है.

कार्ड क्लोनिंग का पता चलने पर होम ब्रांच को सूचना दे कर 3 दिन में पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं. बैंक में स्टैंडर्ड औपरेटिंग प्रोसीजर फौर्म भरें. इस फौर्म पर बैंक की कमेटी नुकसान की भरपाई का फैसला लेगी. औनलाइन फ्रौड से बचने के लिए बीमा भी करा सकते हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अंधविश्वास का अंधेरा : समाज क्यों इनसे घिरता जा रहा है

जून की दहकती दोपहर का दहला देने वाला दृश्य था. बीहड़ सरीखे सघन जंगल के बीच बने विशाल मंदिर के बाहर लंबेचौड़े दालान में एकत्र सैकड़ों स्त्रीपुरुषों की भीड़ टकटकी लगाए उस लोमहर्षक मंजर को देख रही थी. सुर्ख अंगारों की तरह दहकती आंखों और शराब के नशे में धुत अघोरी जैसे लगने वाले 2 भोपे (ओझा) बेरहमी के साथ 4 युवतियों की जूतों से पिटाई कर रहे थे.

अंगारे सी बरसती धूप की चुभन और दर्द से बेहाल युवतियां चीखतीचिल्लाती तपते आंगन में लोटपोट हुई जा रही थीं. धूप से बचने के लिए तमाशाई आंगन के ओसारों की छाया में सरक आए थे. जिस निर्विकार भाव से लोग इस जल्लादी जुल्म का नजारा देख रहे थे, उस से लगता था कि यह सब उन के लिए नया नहीं था.

लगभग एक घंटे तक अनवरत चलने वाली इस दरिंदगी से युवतियां बुरी तरह लस्तपस्त और निढाल हो चुकी थीं. उन पर गुर्राते और गंदी गालियों की बौछार करते भोपे उन्हें बालों से घसीटते हुए फिर से खड़ा करने की मशक्कत में जुट गए.

नारकीय यातना का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, अब उन्हें पीठ के बल रेंगतेघिसटते मंदिर की तपती सुलगती 200 सीढि़यां तय करनी थी.

जल्लादी जुल्म ढाने वाले आतताइयों को भी मात करने वाले इन दरिंदों की चाबुक सरीखी फटकार के आगे बेबस युवतियों ने यह काम भी किया. तब तक उन के कपड़े तारतार हो चुके थे, पीठ और कोहनियां छिलने के साथ बुरी तरह लहूलुहान हो गई थीं. हांफती, कराहती, बिलखती युवतियों पर कहर अभी थमा नहीं था.

यातना का दुष्चक्र उन्हें मारे जाने वाले जूतों के साथ आगे बढ़ता रहा. पांव उठाने तक में असमर्थ इन युवतियों को जूते सिर पर रख कर और मुंह में दबा कर 2 किलोमीटर नंगे पांव चलते देखना तो और भी भयावह था. और इस से भी कहीं ज्यादा दर्दनाक और दयनीय दृश्य था, उन जूतों में भर कर पीया जाने वाला जलकुंड का गंदा पानी.

आतंक और भय से थर्राई हुई युवतियों को जूतों में भर कर पानी पिलाया जाने वाला पानी कैसा था, इस की कल्पना मात्र ही विचलित करने वाली थी. बांक्याराणी मंदिर परिसर में ही बना है हनुमान मंदिर. इस के निकट बने जलकुंड में दिन भर में लगभग 300 से ज्यादा महिलाएं स्नान करती हैं.

समझा जा सकता है कि कुंड का पानी कितना मैला रहा होगा. इसी गंदे पानी को युवतियों को जूतों में भर कर पीने को बाध्य किया गया और वह भी एक बार नहीं लगातार 7 बार.

मंदिर की जिन सीढि़यों पर महिलाओं को पीठ के बल रेंग कर उतरना होता है, वह सफेद संगमरमर की है, जो गर्मियों में भट्ठी की तरह सुलगती हैं. नतीजतन औरतों की पीठ न केवल छिल जाती है, बल्कि उस पर फफोले भी पड़ जाते हैं.

जुल्म की इंतहा तो तब होती है, जब सीढि़यां उतर चुकने के बाद भोपा उन्हें अपने सामने ज्वाला मंदिर में बिठाता है और लहूलुहान और निढाल युवतियों पर एक बार फिर जूते बरसाता है. पीड़ा से रोतीबिलखती युवतियों की दहला देने वाली चीखपुकार जब वहां मौजूद उन के परिजन ही नहीं सुनते तो और कौन सुनेगा?

भोपों के रूप में अंधविश्वास का क्रूर चेहरा

राजस्थान में अंधविश्वास का यह वीभत्स और क्रूर चेहरा सिर्फ भीलवाड़ा जिले के बांक्याराणी मंदिर का ही नहीं है, बल्कि राजसमंद, बांसवाड़ा और चित्तौड़गढ़ भी महिलाओं को डायन घोषित कर के उन के कथित निवारण के नाम पर असहनीय अत्याचार के अड्डे बन गए हैं.

अंधविश्वास की वजह से किसी को डायन बता कर भयानक यातनाएं देना और मार डालना सिद्ध करता है कि राजस्थान के पूर्वोत्तर समाज का एक बड़ा हिस्सा आदिम युग में जी रहा है.

इस सूबे का आदिवासी समुदाय आज भी आधुनिकता और बर्बरता के बीच असहज अस्तित्व में फंसा हुआ है. आदिवासी बहुल इलाकों में स्त्रियों को डायन घोषित कर उन्हें प्रताडि़त करना, यहां तक कि मार डालना सदियों पुराना चलन है.

प्रेत निवारण की परंपरा का मूल स्वरूप क्या था और उस की शुरुआत कैसे हुई? यह जानने के लिए हमें राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा के गांवों में अपने दिवंगत पूर्वजों के नाम पर पत्थर गाड़ने की परंपरा को जानना होगा, जिसे ‘चीरा’ कहा जाता है. गाजेबाजे के साथ गाड़े गए ‘चीरे’ पर लोकदेवता की तसवीर उकेरी जाती है और विधिवत परिवार के पूर्वज का नाम अंकित किया जाता है.

ये चीरे आमतौर पर खुली जगहों में होते हैं, लेकिन कहींकहीं टापरों में स्थापित किए जाते हैं. चीरे मृत स्त्रियों के नाम पर भी गाड़े जाते हैं, लेकिन बहुत कम. इन को ‘मातोर’ कह कर पूजा जाता है. ऐसे कई शिलाखंडों पर तो साल, नाम आदि भी खुदे होते हैं. जिस गांव में चीरा स्थापित किया जाना होता है, उस स्थान पर गांव की कुंवारी कन्या दूध, जल आदि से ‘बावजी’ को स्नान कराती है और कुमकुम आदि से पूजा करती है.

संभवत: ‘बावजी’ शब्द लोक देवता के लिए इस्तेमाल किया जाता है. गांव के बाहर निर्धारित स्थल ‘गोदरा’, जहां चीरे स्थापित किए जाने होते हैं, उस जगह के जानकार को खत्री कहा जाता है. खत्री चीरे के भूतवंश की पूरी जानकारी कवितामय लहजे में सुनाता है. शिलाखंडों में कथित रूप से रह रही आत्मा के आह्वान की अलग प्रक्रिया है.

खत्री ही मृतात्माओं से संवाद स्थापित करता है. उस समय खत्री के हावभाव और बोली असामान्य हो जाती है, फिर शुरू होता है भविष्य कथन और कष्ट निवारण का क्रम. मृतात्मा, जिसे खाखरिया देव माना जाता है, खत्री उस का इन शब्दों के साथ आह्वान करता है, ‘कूंकड़ो बोल्यो, नेकालू साल्यो, कालू देवती, सोनावाला ने भला, वैसे हैं भाई कारूदेव, जोड़ी रा हुंकार है…’

इस अवसर पर निकट बैठे भोपों द्वारा कांसे की थाली और ढोलमजीरों से विशेष तरह का संगीत पैदा किया जाता है, जिस की सम्मिलित ध्वनि वातावरण को अजीब माहौल में बदल देती है. आदिवासियों की प्रचलित परंपराओं को समझें तो इन देवरों के भोपे अपनी जानकारी के मुताबिक लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए विशेष गणित का सहारा लेते हैं. यही है आदिवासियों की अपने पुरखों को ‘देव स्वरूप’ में सम्मानित करने की परंपरा.

लेकिन अब ये सारी परंपराएं नष्ट हो चुकी हैं और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने भोपों का रूप धारण कर नशे के उन्माद में लूटखसोट और यौनाचार को अपना कारोबार बना लिया है. अन्यथा आदिवासियों में चीरा प्रथा व्याधियों का उपचार करने, समस्याओं का निवारण करने और पूर्वजों की मृत आत्माओं का आह्वान करने की है.

बावजी आदिवासियों के लोकदेवता को कहा जाता है. कुछ अरसा पहले बांसवाड़ा के पड़ारिया गांव में तैनात एक शिक्षक ने चीरे की परंपरा को वृक्षारोपण से जोड़ दिया था, लेकिन यह सब तभी तक चला, जब तक शिक्षक का दूसरी जगह स्थानांतरण नहीं हो गया. चीरों के निकट काफी संख्या में दरख्त बन चुके फलदार पेड़ इस बात की तसदीक करते हैं. दूसरी ओर सरकार ने यहां कुछ भी संवारने की पहल तक नहीं की.

डायन के नाम पर मौत का नंगा नाच

आदिवासी जिलों में अब तक 105 स्त्रियों को डायन का बाना पहना कर अभिशप्त घोषित किया जा चुका है, जबकि 8 महिलाओं की पीटपीट कर हत्या की जा चुकी है. साथ ही 2 दरजन महिलाओं को मारपीट कर गांवों से निकाला जा चुका है.

स्वस्थ महिलाओं को डायन बनाने के ये आंकड़े पिछले 4 साल के हैं, लेकिन क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े 4 तक भी नहीं पहुंचते. काला जादू के नाम पर भोपे आज भी आदिवासी इलाकों में अपना सिक्का जमाए हुए हैं. आस्था यहां अकसर बदला लेने का हथियार बन चुकी है.

प्रेतों से मुक्ति पाने की कहानी जहां से शुरू होती है, उसे देखना ही दहशत पैदा करता है. पीडि़त महिलाओं के परिजन ही मंदिर पहुंच कर उन्हें भोपों के हवाले कर देते हैं. भोपा इन्हें उलटे पांवों चला कर मंदिर परिसर में ले आता है. महिला को पीठ मंदिर की तरफ रखनी होती है तथा हथेलियों को प्रणाम की मुद्रा में रखना होता है.

महिला को सुलगती जमीन पर नंगे पांव चलना होता है. भोपों के बारे में कहा जाता है कि निर्दयता और दुर्दांतता में इन का कोई सानी नहीं होता. अपने जल्लादी काम में ये प्रोफेशनल की तरह पारंगत होते हैं. इन की फीस कोई निश्चित नहीं होती, हालांकि 5 सौ से हजार रुपए में ये अपनी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं. इन भोपों को नकदी के साथ दारू भी देनी होती है, अपना काम ये नशे में धुत्त हो कर ही करते हैं. भोपों के कारोबार में मर्द और औरतें दोनों शामिल होते हैं.

बांक्याराणी मंदिर एक ट्रस्ट के अधीन है, लेकिन इस वीभत्स कारोबार में ट्रस्ट के अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं होती. अलबत्ता ट्रस्ट के अध्यक्ष नारायणलाल गुर्जर की मजबूरी चौंकाती है. उन का कहना है, ‘भोपों की मनमानी मंदिर ट्रस्ट के लिए मुसीबत बनी हुई है.’

नारायणलाल कहते हैं, ‘महिलाओं को इतनी दारूण यातना देना पूरी तरह अमानवीय और शैतानी कृत्य है. ट्रस्ट पूरी तरह इस के खिलाफ है. लेकिन फिर भी ये लोग डराधमका कर मनमानी पर उतारू हैं.’

बांक्याराणी मंदिर में प्रेत बाधा निवरण के नाम पर स्त्रियों के भयावह उत्पीड़न की खबरें मीडिया में सुर्खियां बनीं तो राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा बांक्याराणी मंदिर पहुंचीं भी, लेकिन पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकीं. भोपों की भयावह कारस्तानियों का खुलासा होने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान ले कर पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा कि बताएं कितने भोपों पर काररवाई की गई.

हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ के न्यायाधीश गोपालकृष्ण व्यास ने इस बात पर हैरानी जताई कि महिलाओं को कोई डायन कैसे बता सकता है? कानून होने के बाद भी इस तरह के मामले क्यों हो रहे हैं?

विद्वान न्यायाधीश ने तो यहां तक कहा, ‘भोपे किसी महिला को डायन न बना पाएं और उन्हें प्रताडि़त न कर सकें, इस के लिए जागरुकता अभियान चलाया जाए.’ लेकिन हाईकोर्ट की इस हिदायत पर अमल नहीं हुआ.

नतीजतन भोपों के हौसले आज भी बुलंद हैं और महिलाएं आज भी जूते मुंह में दबाए उत्पीड़न का दर्द सहने को मजबूर हैं. घिनौनी आस्था के मल कुंड में डूबे लोगों का रूझान तब बुरी तरह चौंकाता है, जब नवरात्रों में भोपों के दरबार में लोगों की भीड़ का सैलाब उमड़ने लगता है.

हाईकोर्ट की सख्ती और पुलिस की दबिश का भोपों की मनमानी पर कोई असर तो क्या होता, इस के उलट वे और बेलगाम हो गए. अब तक प्रदेश के आदिवासी इलाकों में ही अंधविश्वास की परत मोटी करने वाले इन भोपों को फिल्म ‘पद्मावत’ विवाद से उफान में आए चेतन मृत्यु प्रकरण ने शहरी इलाकों में घुसपैठ करने का अवसर दे दिया.

खबरिया चैनलों ने टीवी स्क्रीन पर जो फुटेज दिखाए, उस का वर्णन करें तो नशे की तरंग और उन्माद में डूबे उन्मत्त भोपे पूरे दबदबे के साथ लोगों को डरा रहे थे और सूबे पर अंधविश्वास की काली चादर फैलाने में जुटे थे. तांत्रिकों का उत्पात और हवा में तलवारें भांजते हुए उन का डरावना अट्टहास. बदहवास लोग खबरिया चैनलों पर चकित भाव से देख रहे थे. इशारा साफ था कि भोपों को चेतन की घटना ने मौत का नाच दिखाने का अवसर दे दिया था.

भोपे अपना उन्मादी चेहरा तब दिखा रहे थे, जब तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह यह कह कर हटे ही थे कि हम ने भोपों के गिर्द शिकंजा सख्त कर दिया है. लेकिन कथित तांत्रिक चेतन के आत्मघात की घटना पर उन्मत्त भोपों ने भयाक्रांत करने वाली उछलकूद मचा कर इस बात को हवा में उड़ा दिया.

सवाल है कि भीलवाड़ा जिले के गांव निंबाहेड़ा जाटान की महिला भोपी झूमरी जीभ लपलपाते हुए कैसे तलवार चमकाने का दुस्साहस कर रही थी? सिगरेट के धुआंधार कश लगाती हुई झूमरी अपने आप को 9 देवियों का अवतार बता रही थी. कांता भोपी तो निरंतर भाला घुमाते हुए अपना दरबार लगाए हुए थी. जाहिर है कि कानून इन के ठेंगे पर था.\

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आतंक का गहराता साया

डायन बता कर उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं भीलवाड़ा और राजसमंद जिलों में हुई हैं. भीलवाड़ा के भोली गांव के दबंगों की बेटी बीमार हुई तो रामकन्या को डायन घोषित कर दिया गया. लगभग एक महीने तक दबंगों की कैद में रहने के बाद बमुश्किल छुड़ाई गई रामकन्या को 6×4 फीट की अंधेरी कोठरी में बंद कर के रखा गया था. गांव के दबंग जाट शिवराज की 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी पूजा बीमार हुई तो भोपे के कहने पर नजला रामकन्या पर गिरा.

भोपे का कहना था, ‘इसे डायन खा रही है.’ भोपे की बात पर शिवराज का शक रामकन्या पर गया, जिस का घर पूजा के स्कूल के पास ही था. नतीजतन रामकन्या को डायन करार दे दिया गया.

जिस बदतर हालत में रामकन्या को दबंगों की कैद से छुड़ाया गया, उसे देख कर डाक्टर का कहना था कि ये जिंदा कैसे बच गई? इस की हालत तो बहुत खराब है.

भीलवाड़ा में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां 20 साल में डायन प्रताड़ना के 87 मामले आ चुके हैं और इन में एक दरजन से ज्यादा महिलाओं की मौत हो चुकी है. तंत्रमंत्र की ओट में इन भोपों की व्यभिचारी मानसिकता को समझें तो चित्तौड़गढ़ जिले के पुरोली गांव का बाबा सिराजुद्दीन महिलाओं के शरीर से डायन निकालने के करतबी तरीकों में निर्लज्जता के साथ उन के प्राइवेट पार्ट्स को टटोलता है.

भीलवाड़ा जिले के भुवास गांव के भोपा देवकिशन की दरिंदगी तो देखने वालों के शरीर में सिहरन पैदा कर देती है. यह भोपा महिलाओं की पीठ पर पूरी निर्ममता से कोड़े बरसाता है और देखने वाले उफ्फ भी नहीं करते.

भीलवाड़ा जिले की सुहाणा तहसील के आगरपुरा गांव की विधवा महिला रामगणी के पति और 2 बेटों की मौत के बाद उस की पुश्तैनी जमीन हथियाने के लिए पड़ोसियों ने रामगणी समेत परिवार की सभी महिलाओं को डायन घोषित कर दिया था.

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कितने ही मामले संपत्ति के लिए

राजसमंद जिले के रणका गांव के दबंग परिवार में एक मौत क्या हुई, डोलीबाई को डायन बता कर उसे जगहजगह गरम सलाखों से दागा गया. राजसमंद के थाली का तलागांव की केशीबाई को डायन बता नंगा कर के गधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाया गया. दबंगों की नजर उस की संपत्ति पर थी.

भीलवाड़ा जिले के बालवास गांव की नंदू देवी का पूरा परिवार पिछले साढ़े 4 साल से गांव के बाहर रहने को मजबूर है. पड़ोसी डालू का बेटा क्या बीमार हुआ, भोपे ने इस का इलजाम नंदू देवी पर डाल दिया. इस के बाद तो पूरे गांव ने मिल कर उसे पीटा और गांव से बाहर कर दिया. नंदू देवी गांव आने वाले हर अजनबी से पूछती है, ‘मैं डायन होती तो क्याआज मेरा पूरा परिवार जीवित रहता?’

भीलवाड़ा की करेड़ा तहसील के ऊदलपुरा गांव की गीता बलाई की जिंदगी उसी के परिजनों ने छीन ली. पति के मंदबुद्धि होने के कारण घर और खेती का सारा काम गीता ही संभाल रही थी, जो उस की जेठानी को बरदाश्त नहीं हुआ.

गीता पर डायन होने का आरोप लगा कर जेठानी उसे घनोप माता मंदिर ले गई, जहां नवरात्रों में उसे 11 दिनों तक भूखाप्यासा रखा गया. बाद में गीता जब कुएं से पानी निकाल रही थी तो जेठानी ने उसे धक्का दे दिया. कुएं में एक पेड़ पर गीता का शव 10 दिनों तक लटका रहा.

चाहे भोपा हो या भोपी, शराब के नशे में धुत्त ये डरावने चेहरे डायन निकालने के नाम पर पूरी हैवानियत पर उतारू रहते हैं. भोपों के ठौरठिकानों को अंधविश्वास की अदालतों का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा.

अंधविश्वास की परत दर परत दबे इन आदिवासी इलाकों में यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर महिलाएं ही डायन क्यों बनती हैं? और ऐसी कौन सी वजह होती है कि महिलाओं को सामान्य जीवनयापन करतेकरते एकाएक डायन करार दे दिया जाता है? सूत्र बताते हैं कि डायन प्रताड़ना के अधिकांश मामलों में संपत्ति और जमीन हड़पने के लिए उन के नातेरिश्तेदार ही ऐसी साजिश रचते हैं. कई मामलों में लोगों ने अदावत और रंजिश के चलते महिलाओं को डायन करार दे दिया.

अलबत्ता यह एक कड़वी सच्चाई यह है कि डायन बनने का नजला अधिकांशत: उन्हीं महिलाओं पर गिरता है, जो गरीब, निराश्रित या दलित वर्ग से होती हैं. स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों इन आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास का अंधेरा इतना घना हो गया है कि डायन से निजात पाने के लिए आने वाली महिलाओं की कतार नहीं थमती और न ही उन के परिजन उन्हें दहशत के तंदूर में धकेलने से बाज आते हैं?

एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि कुछ मामलों में तो डायन बता कर की गई हत्याएं भूमाफिया का काम है. बेइंतहा दर्द की ऐसी ढेरों अंतहीन कथाएं हैं, जिन में भोपों का कहर टूटा और सामान्य जीवनयापन करने वाली औरतों को यातनाएं भुगतने के लिए छोड़ दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीचंद पंत कहते हैं, ‘इन घटनाओं से अगर हमारी नसें नहीं चटखीं और दिल बेचैन नहीं हुआ तो मानवीय रिश्तों की बंदिशें कैसे बच पाएंगी?’