50 करोड़ का खेल : भीलवाड़ा का बिल्डर अपहरण कांड – भाग 1

21 मार्च, 2019 की बात है. उस दिन होली थी. होलिका दहन के अगले दिन रंग गुलाल से खेले जाने वाले त्यौहार का आमतौर पर दोपहर तक ही धूमधड़ाका रहता है. दोपहर में रंगेपुते लोग नहाधो कर अपने चेहरों से रंग उतारते हैं. फिर अपने कामों में लग जाते हैं. कई जगह शाम के समय लोग अपने परिचितों और रिश्तेदारों से मिलने भी जाते हैं.

भीलवाड़ा के पाटील नगर का रहने वाला शिवदत्त शर्मा भी होली की शाम अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने के लिए अपनी वेरना कार से बापूनगर के लिए निकला था. शिवदत्त ने जाते समय पत्नी शर्मीला से कहा था कि वह रात तक घर आ जाएगा. थोड़ी देर हो जाए तो चिंता मत करना.

शिवदत्त जब देर रात तक नहीं लौटा तो शर्मीला को चिंता हुई. रात करीब 10 बजे शर्मीला ने पति के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद शर्मीला घरेलू कामों में लग गई. उस के सारे काम निबट गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया था. शर्मीला ने दोबारा पति के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन इस बार भी उस का फोन स्विच्ड औफ ही मिला. उसे लगा कि शायद पति के मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई होगी, इसलिए स्विच्ड औफ आ रहा है.

शर्मीला बिस्तर पर लेट कर पति का इंतजार करने लगी. धीरेधीरे रात के 12 बज गए, लेकिन शिवदत्त घर नहीं आया. इस से शर्मीला को चिंता होने लगी. वह पति के दोस्त राजेश त्रिपाठी को फोन करने के लिए नंबर ढूंढने लगी, लेकिन त्रिपाठीजी का नंबर भी नहीं मिला.

शर्मीला की चिंता स्वाभाविक थी. वैसे भी शिवदत्त कह गया था कि थोड़ीबहुत देर हो जाए तो चिंता मत करना, लेकिन घर आने की भी एक समय सीमा होती है. शर्मीला बिस्तर पर लेटेलेटे पति के बारे में सोचने लगी कि क्या बात है, न तो उन का फोन आया और न ही वह खुद आए.

पति के खयालों में खोई शर्मीला की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. त्यौहार के कामकाज की वजह से वह थकी हुई थी, इसलिए जल्दी ही गहरी नींद आ गई.

वाट्सऐप मैसेज से मिली पति के अपहरण की सूचना

22 मार्च की सुबह शर्मीला की नींद खुली तो उस ने घड़ी देखी. सुबह के 5 बजे थे. पति अभी तक नहीं लौटा था. शर्मीला ने पति को फिर से फोन करने के लिए अपना मोबाइल उठाया तो देखा कि पति के नंबर से एक वाट्सऐप मैसेज आया था.

शर्मीला ने मैसेज पढ़ा. उस में लिखा था, ‘तुम्हारा घर वाला हमारे पास है. इस पर हमारे एक करोड़ रुपए उधार हैं. यह हमारे रुपए नहीं दे रहा. इसलिए हम ने इसे उठा लिया है. हम तुम्हें 2 दिन का समय देते हैं. एक करोड़ रुपए तैयार रखना. बाकी बातें हम 2 दिन बाद तुम्हें बता देंगे. हमारी नजर तुम लोगों पर है. ध्यान रखना, अगर पुलिस या किसी को बताया तो इसे वापस कभी नहीं देख पाओगी.’

मोबाइल पर आया मैसेज पढ़ कर शर्मीला घबरा गई. वह क्या करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. पति की जिंदगी का सवाल था, घबराहट से भरी शर्मीला ने अपने परिवार वालों को जगा कर मोबाइल पर आए मैसेज के बारे में बताया.

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मैसेज पढ़ कर लग रहा था कि शिवदत्त का अपहरण कर लिया गया है. बदमाशों ने शिवदत्त के मोबाइल से ही मैसेज भेजा था ताकि पुष्टि हो जाए कि शिवदत्त बदमाशों के कब्जे में है. यह मैसेज 21 मार्च की रात 9 बज कर 2 मिनट पर आया था, लेकिन उस समय शर्मीला इसे देख नहीं सकी थी.

शिवदत्त के अपहरण की बात पता चलने पर पूरे परिवार में रोनापीटना शुरू हो गया. जल्दी ही बात पूरी कालोनी में फैल गई. चिंता की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त पर अपने एक करोड़ रुपए बकाया बताए थे और वह रकम उन्होंने 2 दिन में तैयार रखने को कहा था.

शर्मीला 2 दिन में एक करोड़ का इंतजाम कहां से करती? शिवदत्त होते तो एक करोड़ इकट्ठा करना मुश्किल नहीं था लेकिन शर्मीला घरेलू महिला थी, उन्हें न तो पति के पैसों के हिसाब किताब की जानकारी थी और न ही उन के व्यवसाय के बारे में ज्यादा पता था. शर्मीला को बस इतना पता था कि उस के पति बिल्डर हैं.

शर्मीला और उस के परिवार की चिंता को देखते हुए कुछ लोगों ने उन्हें पुलिस के पास जाने की सलाह दी. शर्मीला परिवार वालों के साथ 22 मार्च को भीलवाड़ा के सुभाषनगर थाने पहुंच गई और पुलिस को सारी जानकारी देने के बाद अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने शर्मीला और उन के परिवार के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि कपड़ा नगरी के नाम से देश भर में मशहूर भीलवाड़ा के पथिक नगर की श्रीनाथ रेजीडेंसी में रहने वाले 42 साल के शिवदत्त शर्मा की हाइपर टेक्नो कंसट्रक्शन कंपनी है. शिवदत्त का भीलवाड़ा और आसपास के इलाके में प्रौपर्टी का बड़ा काम था. उन के बिजनैस में कई साझीदार हैं और इन लोगों की करोड़ों अरबों की प्रौपर्टी हैं.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने इस की जानकारी एडिशनल एसपी दिलीप सैनी को दे दी. इस के बाद पुलिस ने शिवदत्त की तलाश शुरू कर दी. साथ ही शिवदत्त की पत्नी से यह भी कह दिया कि अगर अपहर्त्ताओं का कोई भी मैसेज आए तो तुरंत पुलिस को बता दें.

चूंकि शिवदत्त अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी के घर जाने की बात कह कर घर से निकले थे, इसलिए पुलिस ने राजेश त्रिपाठी से पूछताछ की. राजेश ने बताया कि शिवदत्त होली के दिन शाम को उन के पास आए तो थे लेकिन वह रात करीब 8 बजे वापस चले गए थे.

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जांचपड़ताल के दौरान 23 मार्च को पुलिस को शिवदत्त की वेरना कार भीलवाड़ा में ही सुखाडि़या सर्किल से रिंग रोड की तरफ जाने वाले रास्ते पर लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पुलिस ने कार जब्त कर ली. पुलिस ने कार की तलाशी ली, लेकिन उस से शिवदत्त के अपहरण से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. कार भी सहीसलामत थी. उस में कोई तोड़फोड़ नहीं की गई थी और न ही उस में संघर्ष के कोई निशान थे.

पुलिस ने शिवदत्त के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन मोबाइल के स्विच्ड औफ होने की वजह से उस की लोकेशन नहीं मिल रही थी. जांच की अगली कड़ी के रूप में पुलिस ने शिवदत्त, उस की पत्नी और कंपनी के स्टाफ के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस के अलावा शिवदत्त के लेनदेन, बैंक खातों, साझेदारों के लेनदेन से संबंधित जानकारियां जुटाईं. यह भी पता लगाया गया कि किसी प्रौपर्टी को ले कर कोई विवाद तो नहीं था.

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड – भाग 3

अभिजीत और मोमिता दोनों कला प्रेमी थे. चालाकियों से उन का वास्ता नहीं था इसलिए भरोसा कर लिया. राजू के तीनों दोस्त भी टैक्सी में सवार हो गए. थोड़ा आगे जाने पर बबलू व अन्य ने राजू से स्थानीय भाषा में मोमिता से छेड़छाड़ करने की बात कही तो उस ने थोड़ा अंधेरा होने का इंतजार करने को कहा.

मोमिता व अभिजीत नहीं जानते थे कि विश्वास कर के वह चंडालों की चौकड़ी में फंस चुके हैं. हलका अंधेरा हुआ तो राजू के साथियों ने मोमिता से छेड़छाड़ शुरू कर दी. उन का यह रवैया दोनों को ही खराब लगा. उन्हें ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी.

अभिजीत ने उन का विरोध किया, ‘‘यह क्या बदतमीजी है.’’

‘‘क्यों, क्या हम कुछ नहीं कर सकते?’’ तीनों ने बेशरमी से हंसते हुए उसे धमकाया, ‘‘चुपचाप बैठा रह, वरना…’’

‘‘…वरना क्या?’’

‘‘उठा कर खाई में फेंक देंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’

उस वक्त सड़क पर सन्नाटा था. बावजूद इस के अभिजीत नहीं डरा. अभिजीत को लगा कि वह ऐसे नहीं मानेंगे तो उस ने उन लोगों से हाथापाई शुरू कर दी. इस से बौखलाए युवकों ने टैक्सी में पड़ी रस्सी निकाल कर अभिजीत का गला दबा दिया. फलस्वरूप उस ने छटपटा कर दम तोड़ दिया.

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मोमिता ने विरोध किया तो उन्होंने उस के साथ भी मारपीट की. वह डर से कांप रही थी. तीनों ने अभिजीत के शव को टैक्सी में पीछे डाल दिया. युवकों के सिर पर हैवानियत सवार थी. चलती टैक्सी में बबलू ने मोमिता के साथ दुराचार किया. बाकी साथियों ने उस की मदद की.

मोमिता चीखी चिल्लाई तो उस के साथ मारपीट की गई. इस के बाद उन्होंने दुपट्टे से गला दबा कर उस की भी हत्या कर दी. मरने से पहले मोमिता बहुत गिड़गिड़ाई, लेकिन किसी को भी उस पर दया नहीं आई. दोनों का सामान लूट कर थोड़ा आगे जा कर राजू ने टैक्सी रोक दी. चारों ने मिल कर लाखामंडल के पास एक पुल से मोमिता के शव को यमुना नदी में फेंक दिया.

ये लोग अभिजीत का शव भी फेंकने वाले थे कि तभी एक गाड़ी आती दिख जाने से रुक गए और वहां से आगे बढ़ गए. आगे जा कर उन्होंने अभिजीत के शव को चकराता के लाखामंडल मार्ग पर क्वांसी के पास नौगांव इलाके में खाई में फेंक दिया.

लूटा गया सामान आपस में बांट कर सभी अपनेअपने घर चले गए. दोनों के मोबाइल उन्होंने स्विच औफ कर के उन के सिम कार्ड निकाल कर फेंक दिए. उधर संपर्क टूटने से मोमिता व अभिजीत के घर वाले परेशान हो गए थे और उन्होंने दोनों की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

लूटे गए मोबाइलों का किसी ने इस्तेमाल नहीं किया. इस बीच कई दिन बीत गए. इसी बीच 30 अक्तूबर को उत्तरकाशी जनपद के पुरोला थाना क्षेत्र की नौगांव पुलिस चौकी क्षेत्र में एक युवक का शव मिला. सूचना पा कर थानाप्रभारी ठाकुर सिंह रावत मौके पर पहुंचे. उन्होंने उत्तरकाशी के एसपी जगतराम जोशी को घटना से अवगत कराया.

मृतक युवक के पास कोई सामान या शिनाख्त के लिए पहचानपत्र नहीं मिला था. पुलिस को यह मामला लूटपाट के लिए की गई हत्या का लगा था. इसलिए अज्ञात हत्यारे के खिलाफ धारा 302 व 201 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने शव की शिनाख्त का प्रयास किया, लेकिन एक तो शव पुराना था दूसरे उस की शिनाख्त भी नहीं हो पा रही थी. उसे ज्यादा दिन रखना संभव नहीं था इसलिए उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक की मौत का कारण गला दबाना पता चला. यह शव अभिजीत का ही था.

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बाद में दिल्ली पुलिस जांचपड़ताल करते हुए राजू तक पहुंची तो उस ने सीधेपन का नाटक करते हुए पुलिस को बहका दिया. पुलिस ने भी उस पर विश्वास कर लिया क्योंकि ऐसा नहीं लग रहा था कि वह इतना भयानक कृत्य कर सकता है.

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इस के बाद चारों दोस्तों ने एक बार फिर जश्न मनाया कि पुलिस को उन पर शक नहीं है और उस ने झूठ बोल कर मामला सुलटा दिया है. राजू व उस के दोस्तों को यह विश्वास हो गया था कि उन का राज अब कभी नहीं खुलेगा और दिल्ली पुलिस इतनी दूर बारबार पूछताछ करने नहीं आएगी.

यही सोच कर राजू ने मोमिता के मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. उस की इस बेवकूफी ने पुलिस की मंजिल को आसान कर दिया और वह दोस्तों के साथ शिकंजे में फंस गया. अभिजीत का मोबाइल आरोपी कुंदन ने अपनी बहन को बतौर गिफ्ट दे दिया था. पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से मोमिता व अभिजीत का मोबाइल, पर्स, शौल व अन्य सामान भी बरामद कर लिया.

फोटो के आधार पर अभिजीत के शव की शिनाख्त हो चुकी थी, लेकिन मोमिता का शव अभी तक नहीं मिला था. अगले दिन पुलिस टीम हत्यारोपियों को ले कर चकराता व उत्तरकाशी पहुंच गई. एसपी जगतराम जोशी व थानाप्रभारी पुरोला ठाकुर सिंह रावत भी आ गए.

आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने गोताखोरों की मदद से नदी के 12 किलोमीटर एरिया में मोमिता के शव की तलाश की लेकिन उस का शव नहीं मिल सका. उस के शव का मिलना भी एक बड़ी चुनौती थी.

अगले दिन पुलिस ने फिर तलाशी अभियान चलाया. इस बीच आरोपियों को पुरोला पुलिस के हवाले कर दिया गया. पुलिस ने अपराध संख्या 50/2014 पर आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी ठाकुर सिंह रावत ने सुरक्षा के बीच सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

13 नवंबर को आखिर पुलिस को मोमिता का शव नदी में मिल गया. पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. मोमिता के परिजन भी आ चुके थे. शव की हालत ऐसी नहीं थी कि उसे वे लोग ले जा सकते. इसलिए उन्होंने पोस्टमार्टम के बाद उस के शव का केदारघाट पर अंतिम संस्कार कर दिया.

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चकराता जैसे शांत इलाके में अपनी तरह की यह पहली घिनौनी घटना थी. इस घटना को ले कर चकराता व आसपास के लोगों में बहुत गुस्सा था. वे हत्यारों को फांसी देने की मांग कर रहे थे. इलाकाई लोगों ने अभिजीत व मोमिता की आत्मा की शांति के लिए कई कैंडल मार्च निकाले और मौनव्रत रखा.

इस घटना को ले कर 16 नवंबर को चकराता में कई गांवों के करीब 300 लोगों की पंचायत हुई. पंचायत में सर्वसम्मति से आरोपियों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. निर्णय लिया गया कि उन के घर वाले न तो उन से जेल में मिलने जाएंगे और न ही उन की पैरवी करेंगे.

घर वालों ने उन से नाता तोड़ दिया. लोगों को आशंका है कि इलाके की छवि धूमिल होने से पर्यटकों की संख्या पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. आरोपियों के घर वालों की मांग है कि उन के बेटों को फांसी की सजा दी जाए. मोमिता व अभिजीत ने राजू पर विश्वास किया था, लेकिन उस ने उन के विश्वास को बुरी तरह छल कर उन की जिंदगी का चिराग हमेशा के लिए बुझा दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड – भाग 2

पुलिस ने मोमिता अभिजीत के मोबाइल को सर्चिंग में लगा दिया. दरअसल पुलिस को उम्मीद थी कि अगर उन के साथ कुछ गलत हुआ होगा तो हो सकता है कोई अन्य व्यक्ति उन के मोबाइलों का इस्तेमाल कर रहा हो. नवंबर के पहले सप्ताह में मोमिता के मोबाइल का इस्तेमाल किया गया. पुलिस ने उस नंबर की जांच कराई, जो उस के मोबाइल में इस्तेमाल हुआ था. वह नंबर चकराता के टैक्सी चालक राजू का ही निकला. इस से वह शक के दायरे में आ गया.

हालांकि पहली पूछताछ में पुलिस ने राजू के बयानों को सही मान लिया था. लेकिन मोमिता का मोबाइल उस के पास कैसे आया, यह एक बड़ा सवाल था. अब पुलिस को आशंका होने लगी कि मोमिता और अभिजीत के साथ जरूर कोई अनहोनी हुई है.

इस के बाद पुलिस टीम एक बार फिर उत्तराखंड के लिए रवाना हो गई. इस टीम में एसआई दुर्गादास सिंह, हेडकांस्टेबल सुधीर कुमार और गोपाल शामिल थे. डीआईजी संजय गुंज्याल ने दिल्ली पुलिस को पूरे सहयोग का आश्वासन दिया. उन्होंने इस बाबत विकासनगर सीओ एसके सिंह को काररवाई के निर्देश भी दे दिए.

दिल्ली पुलिस की टीम के साथ थानाप्रभारी विकासनगर चंदन सिंह बिष्ट, चकराता थानाप्रभारी मुकेश थलेड़ी, विकासनगर थाने के सबइंसपेक्टर दिनेश ठाकुर, चौकीप्रभारी नरेंद्र, कांस्टेबल अमित भप्त, धर्मेंद्र धामी और सोवन सिंह भी थे. दिल्ली व उत्तराखंड पुलिस की टीम ने 10 नवंबर को टैक्सी चालक राजू को हिरासत में ले लिया.

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विकासनगर के सीओ एसके सिंह ने राजू से पूछताछ की तो उस ने पुलिस को घुमाने का प्रयास किया. लेकिन पुलिस इस बार उस के साथ सख्ती से पेश आई तो उस ने जो राज खोला उसे सुन कर सभी शर्मसार हो गए. राजू ने अपने ही गांव के 3 दोस्तों के साथ मिल कर मोमिता और अभिजीत की हत्या कर दी थी. पुलिस ने उस के दोस्तों बबलू, गुड्डू और कुंदन को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की विस्तृत पूछताछ में इन लोगों की सारी करतूत सामने आ गई.

राजू का परिवार बेहद साधारण था. उस ने बचपन से ही गरीबी देखी थी, लेकिन युवा होतेहोते उस ने परिवार को गरीबी से निजात दिलाने की ठान ली थी. वह टैक्सी चलाने लगा. उस के टैक्सी रूट में विकासनगर, चकराता और देहरादून शामिल थे. राजू बुरी लतों का शिकार था. इस के लिए वह अकेला नहीं, बल्कि उस की संगत भी जिम्मेदार थी. गांव के ही बबलू, गुड्डू और कुंदन से उस की गहरी दोस्ती थी. वह भी उसी की तरह थे.

वह आए दिन बैठते थे और बड़ीबड़ी बातें करते थे. चारों की सोच एक जैसी थी. वे लोग हमेशा एक ही बात सोचा करते थे कि शार्टकट अपना कर जीवन में कैसे आगे बढ़ा जाए. शराब पीने के बाद उन के सपने और भी जाग जाते थे. राजू जो कमाता था, उस में उस का पूरा नहीं पड़ता था. कोई और होता, तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती. उस की बुरी लतों की वजह से उस की कमाई की आधी रकम पीने पिलाने में उड़ जाती थी.

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उत्तराखंड की आबादी का एक हिस्सा पर्यटन पर निर्भर है. यहां लाखों पर्यटक आते हैं जिन से स्थानीय लोगों की आजीविका चलती है. पुराने विचारों वाले लोग आज भी पर्यटकों को सम्मान की नजर से देखते हैं. वे लोग यह भी जानते हैं कि अगर पर्यटक नहीं आएंगे और वे उन के साथ अपना व्यवहार अच्छा नहीं रखेंगे, तो उन का काम नहीं चलेगा.

लेकिन राजू नई पीढ़ी का युवक था, उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं था. वह पर्यटकों से उल्टेसीधे पैसे ऐंठने को अपनी कला समझता था. जो लोग समय हालात के हिसाब से खुद को स्थापित नहीं करते, जिंदगी अकसर उन्हें अपने हिसाब से परेशान करती रहती है. राजू के साथ भी ऐसा ही था, वह आर्थिक तंगियों से जूझता रहता था.

22 अक्तूबर को मोमिता और अभिजीत दोनों ट्रेन से देहरादून पहुंचे थे. उन्होंने रेलवे स्टेशन के नजदीक ही एक होटल में कमरा ले लिया. पहले दिन वह विकासनगर घूमने गए. लौट कर शाम को होटल से नंबर ले कर उन्होंने टैक्सी चालक राजू से बात की और उसे अगले दिन चकराता चलने के लिए बुक कर लिया. चकराता का नाम अभिजीत व मोमिता ने पहले ही सुन रखा था कि वह खूबसूरत जगह है.

समुद्र तल से 6730 फुट की ऊंचाई पर बसा चकराता उत्तराखंड का प्रमुख पर्यटन स्थल है. इस के साथसाथ यहां भारतीय सेना का क्षेत्रीय कार्यालय है. यहां सेना के कमांडोज को प्रशिक्षण दिया जाता है. चकराता में जहां खूबसूरत घने जंगल हैं वहीं टाइगर फाल, यमुना नदी जैसे स्थल पर्यटकों को लुभाते हैं. गर्मियों में पर्यटकों की संख्या यहां और भी ज्यादा बढ़ जाती है.

जैसी कि 22 अक्तूबर की शाम को ही बात हो चुकी थी, अगले दिन यानी 23 अक्तूबर की दोपहर को राजू अभिजीत और मोमिता को अपनी टैक्सी में बैठा कर चकराता ले गया. वहां का प्राकृतिक सौंदर्य देख कर दोनों बहुत खुश हुए. राजू के व्यवहार से भी दोनों खुश थे. राजू पूरे रास्ते उन की बातें सुनता रहा और वहां के बारे में बताता रहा.

बातचीत व पहनावा देख कर राजू को लग गया था कि दोनों ही अच्छे घरों से ताल्लुक रखते हैं. बस यहीं से उस का दिमाग घूम गया और उस ने उन्हें लूटने की ठान ली. अभिजीत व मोमिता चकराता घूमते रहे. इस बीच राजू ने कुछ देर में वापस आने की बात कही और अपने तीनों आवारा दोस्तों से मिला.

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राजू ने उन्हें बताया, ‘‘बाहर की एक पार्टी है. मुझे लगता है उन के पास अच्छा माल है. उन्हें लूटा जाए तो कुछ दिन आराम से बीत जाएंगे.’’

‘‘हम पकड़े भी तो जा सकते हैं?’’

‘‘खाक पकड़े जाएंगे. दोनों बंगाल के रहने वाले हैं, यहीं कहीं ठिकाने लगा देंगे.’’ राजू ने कहा तो चारों ने मिल कर लूटपाट की योजना बना ली. इस के बाद उन्होंने शराब पी. शराब पी कर राजू जाने लगा तो उस ने तीनों दोस्तों से टाइगर फौल के बाहर मिलने को कहा.

इस के बाद राजू अभिजीत व मोमिता के पास गया और उन्हें टाइगर फौल घुमाने ले गया. दोनों को प्राकृतिक नजारों ने बहुत लुभाया. वहां से वापसी के वक्त शाम होनी शुरू हो गई थी. जैसे ही वह सड़क पर आए, तो योजना के अनुसार वहां बबलू, गुड्डू व कुंदन मिल गए. राजू ने उन्हें अपनी टैक्सी में बैठा लिया. यह देख कर मोमिता ने विरोध किया, ‘‘भैया, जब टैक्सी बुक है तो किसी को क्यों बैठा रहे हो?’’

‘‘मेमसाहब, ये मेरे गांव के साथी हैं. इन्हें बस थोड़ा आगे रास्ते में छोड़ना है. आप को कोई परेशानी नहीं होगी. आप आराम से बैठिए.’’ राजू ने समझाया तो मोमिता व अभिजीत ने विश्वास कर लिया.

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड – भाग 1

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रहने वाले मृणाल कृष्णा दास उन खुशहाल लोगों में से थे जो अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर किसी काबिल बना देते हैं. वह एक सरकारी बैंक में नौकरी करते थे. कुछ साल पहले मिली सेवानिवृत्ति के बाद उन का अधिकांश समय घर पर ही बीतता था. उन के परिवार में पत्नी काजोल दास के अलावा 2 बच्चे थे, मोमिता दास और बेटा मृगांक दास.

मोमिता को चित्रकारी का शौक था. स्कूलकालेजों में होने वाली आर्ट प्रतियोगिताओं में वह हमेशा अव्वल आती थी. इसी के मद्देनजर उस ने एमए तक की पढ़ाई आर्ट से ही की.

प्राकृतिक फोटोग्राफी भी उस के शौक में शामिल थी. मोमिता की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. इसलिए 2 साल पहले घर वालों की सलाह पर वह कैरियर बनाने के लिए नदिया से दिल्ली आ गई. वह चूंकि समझदार थी इसलिए उस के अकेले दिल्ली आने पर मातापिता को ज्यादा चिंता नहीं थी. मोमिता का छोटा भाई मृगांक भी पढ़ाई के लिए बेंगलुरु चला गया.

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दिल्ली आ कर मोमिता ने अपने एक परिचित के माध्यम से दक्षिणी दिल्ली के लाडोसराय इलाके में किराए पर एक कमरा ले लिया और अपने लिए नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी. थोड़ी कोशिश के बाद उसे गुडगांव, हरियाणा के एक निजी स्कूल में आर्ट टीचर की नौकरी मिल गई. 28 वर्षीय मोमिता स्वभाव से मिलनसार व खुशमिजाज थी.

कुछ दिनों बाद मोमिता की दोस्ती ग्राफिक डिजाइनर अभिजीत पौल से हो गई. अभिजीत भी पश्चिमी बंगाल के कोलकाता शहर का रहने वाला था और दिल्ली में रह कर अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहा था. दोनों की आदतें, विचार और शौक एक जैसे थे. लिहाजा उन की दोस्ती बदलते वक्त के साथ प्यार में बदल गई थी.

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उन की इस दोस्ती की खबर उन के परिजनों तक भी पहुंच गई थी. मोमिता के मातापिता ने इस बात पर कोई ऐतराज नहीं किया. वे जानते थे कि बेटी ने जो कदम उठाया है वह कुछ सोच कर ही उठाया होगा.

मोमिता को प्राकृतिक सौंदर्य से बहुत प्यार था. वह जब भी कहीं घूमने के लिए जाती थी, तो अकसर वहां की फोटोग्राफी किया करती थी. कुछ पत्र पत्रिकाओं में उस के द्वारा खींचे गए फोटो छपने भी लगे थे. बेटी की उपलब्धियों से मृणाल बहुत खुश थे. वह लगातार उस के संपर्क में रहते थे.

22 अक्तूबर, 2004 की सुबह का वक्त था. मृणाल कृष्णदास के पास मोमिता का फोन आया. उस ने बताया, ‘‘पापा, मैं आज उत्तराखंड जा रही हूं.’’

‘‘क्यों?’’ मृणाल ने पूछा.

‘‘बस घूमने और अच्छे फोटोग्राफ के लिए.’’

‘‘अकेली जाओगी?’’

‘‘नहीं पापा मेरे साथ अभिजीत है. हम दोनों जा रहे हैं.’’ बेटियां भले ही कितनी भी समझदार क्यों न हो जाएं, मातापिता को हमेशा उन की फिक्र लगी ही रहती है. मृणाल को भी उस की फिक्र रहती थी. इसलिए उन्होंने उसे सफर की सावधानियों के बारे में समझा दिया.

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मृणाल ने शाम को मोमिता को फोन किया तो उस ने बताया कि वे लोग देहरादून पहुंच गए हैं और कल से घूमने का प्रोग्राम बनाएंगे. अगले दिन उन की बात हुई, तो मोमिता ने बताया, ‘‘पापा, आज हम लोग चकराता जाएंगे. यहां की बहुत खूबसूरत जगह है.’’ मोमिता की बातों से ही झलक रहा था कि उत्तराखंड पहुंच कर वह बहुत खुश थी.

24 अक्तूबर को मृणाल बहुत परेशान थे. उन की परेशानी की वजह मोमिता थी. 23 अक्तूबर की शाम से उन का मोमिता से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था. बारबार मिलाने पर भी मोबाइल स्विच औफ आ रहा था. कृष्णा समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मोमिता का मोबाइल अचानक क्यों बंद हो गया. वह सैकड़ों मील दूर थे. उन की परेशानी पत्नी काजोल से भी नहीं छिपी रह सकी.

‘‘क्यों परेशान हैं आप?’’ काजोल ने पूछा.

‘‘मोमिता का नंबर नहीं लग रहा है.’’ मृणाल ने कहा.

‘‘नेटवर्क में नहीं होगी या मोबाइल की बैटरी वीक हो गई होगी.’’

‘‘वह तो मैं भी समझता हूं. लेकिन बहुत वक्त हो गया.’’ इस बात से वह भी परेशान हो गईं. इस के बाद इंतजार का सिलसिला शुरू हो गया. लेकिन न तो मोमिता का नंबर मिला और न उस का फोन आया. इस से पतिपत्नी को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. देखतेदेखते 4 दिन बीत गए. अगर मोमिता का मोबाइल खो गया था तो भी उसे संपर्क करना चाहिए था. ऐसा कभी नहीं होता था कि वह उन लोगों से बात न करें. नाते रिश्तेदारों की सलाह पर मृणाल कृष्णा दिल्ली आ गए.

अपने बेटे को भी उन्होंने बेंगलुरु से बुलवा लिया. मृणाल कृष्णा ने दिल्ली के थाना साकेत जा कर पुलिस को बेटी से संबंधित अपनी चिंता बताई. चिंता की बात यह थी कि मोमिता का अपने घर वालों से सपंर्क नहीं हो पा रहा था. पुलिस ने गुमशुदगी संख्या 33 ए पर मोमिता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. दूसरी तरफ कोलकाता में अभिजीत के घर वाले भी परेशान थे, उस का भी कुछ पता नहीं चल रहा था. उस के घर वालों ने कोलकाता में ही उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

गुमशुदगी दर्ज कर के मोमिता के मामले की जांच सबइंसपेक्टर दुर्गादास सिंह के हवाले कर दी गई. मामला एक युवक युवती के लापता होने का था. इस मामले में अपनी मरजी से गायब हो जाने की आशंकाएं भी नहीं थीं क्योंकि मोमिता व अभिजीत के रिश्ते उन के परिजनों से छिपे नहीं थे.

पुलिस ने कुछ दिन इंतजार किया. जब कोई पता नहीं चला तो दिल्ली पुलिस की एक टीम उत्तराखंड के लिए रवाना हो गई. इस बीच पुलिस ने मोमिता के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल कर ली थी. उस के मोबाइल की अंतिम लोकेशन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 98 किलोमीटर दूर पर्यटनस्थल चकराता में पाई गई थी. इस से पहले उस के मोबाइल की लोकेशन देहरादून और विकासनगर में थी. यह भी पता चला कि मोमिता ने 23 अक्तूबर को अंतिम बार एक स्थानीय नंबर पर बात की थी.

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दिल्ली पुलिस ने देहरादून के डीआईजी संजय गुंज्याल और एसएसपी अजय रौतेला से संपर्क किया. पुलिस ने उस नंबर की जांचपड़ताल कराई जिस पर मोमिता की बात हुई थी. वह नंबर एक टैक्सी चालक राजू दास पुत्र मोहन दास का निकला. राजू चकराता के गांव टुंगरौली का रहने वाला था. वह विकासनगर और चकराता के बीच टैक्सी चलाता था. दिल्ली पुलिस राजू तक पहुंच गई.

पुलिस ने मोमिता का फोटो दिखा कर उस से पूछताछ की, तो उस ने बताया, ‘‘हां सर, यह लड़की एक लड़के के साथ विकासनगर से मेरी टैक्सी में चकराता तक गई थी.’’

‘‘उस के बाद?’’

‘‘उस के बाद मुझे नहीं पता सर. मुझे लड़की ने फोन कर के बुलाया था कि उन्हें चकराता जाना है. उस दिन हम लोग दोपहर में विकासनगर से चले थे. चकराता पहुंच कर उन्होंने मुझे मेरा भाड़ा दे दिया और मैं वापस आ गया.’’

‘‘तुम्हें उन्होंने कुछ बताया. मतलब आगे का कोई प्रोग्राम?’’

‘‘नहीं सर, लेकिन हां दोनों काफी खुश थे और पूरा उत्तराखंड घूमने की बात कर रहे थे.’’ टैक्सी चालक राजू देखने में सीधासादा युवक लगता था. उस की बातों में सच्चाई झलक रही थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया. उस से पूछताछ के बाद दिल्ली पुलिस वापस आ गई. मोमिता व अभिजीत के इस तरह गायब होने की वजह पुलिस भी नहीं समझ पा रही थी. पुलिस को जांच के लिए कोई ऐसा सिरा नहीं मिल पा रहा था जिस से दोनों के लापता होने का राज खुल सके.

लंदन में रची दत्तक पुत्र की हत्या की साजिश

साजिश के चक्रव्यूह में मासूम

11 वर्षीय आदर्श सिंह अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, तभी उस के कानों में आवाज आई, ‘‘हैलो आदर्श!’’  आदर्श ने पलट कर देखा तो कमरे के दरवाजे पर मुकेश खड़ा था. आदर्श मुकेश पांडेय को अच्छी तरह जानता था. वह पड़ोस में रहने वाली चांदमती का भतीजा था. मुकेश बुआ के पास घूमने आया था. मुकेश को देखते ही आदर्श बोला, ‘‘नमस्ते मुकेश भैया.’’

‘‘नमस्ते नमस्ते, क्या कर रहे हो आदर्श?’’ मुकेश ने सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठते हुए पूछा.

‘‘कुछ भी नहीं भैया, किताबों में मन नहीं लग रहा था इसलिए चंपक पढ़ रहा हूं.’’ आदर्श ने शालीनता से उत्तर दिया.

‘‘अच्छा, मुझे भी बचपन में चंपक पढ़ने का बड़ा शौक था,’’ मुकेश ने कहा, ‘‘लगता है तुम्हें कहानियों और कार्टून का बहुत शौक है.’’

‘‘हां भैया,’’ आदर्श ने कहा.

‘‘तो ठीक है, मैं तुम्हें तुम्हारे ही काम की एक चीज दिखाता हूं.’’

कहने के बाद मुकेश ने अपनी पैंट की जेब से एक बड़े आकार का चमचमाता हुआ सेलफोन निकाला. नया मोबाइल फोन देख कर आदर्श के चेहरे पर मुसकान थिरक उठी. मुकेश के हाथ से मोबाइल ले कर आदर्श उत्सुकतावश उसे उलटपलट कर देखने लगा, ‘‘ये तो काफी महंगा होगा भैया?’’

‘‘हां, महंगा तो है,’’ मुकेश ने जवाब दिया, फिर उस की ओर देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें पसंद हो तो तुम इसे अपने पास रख सकते हो.’’

आदर्श उस की तरफ आश्चर्य से देखते हुआ बोला, ‘‘इतना महंगा फोन भला कोई दूसरे को देता है क्या, जो आप मुझे दे दोगे.’’

‘‘तुम्हारे लिए यह फोन क्या चीज है, आदर्श मैं तो तुम्हारे लिए जान भी दे दूं, एक बार कह कर तो देखो.’’

‘‘नहीं भैया, मुझे आप की जान नहीं चाहिए. आप सहीसलामत रहें. यही मेरे लिए काफी होगा. आप मुझे एक काम की कोई चीज दिखा रहे थे. वो क्या है?’’ आदर्श ने पूछा.

‘‘ठीक है बाबा, दिखाता हूं तुम्हें वो चीज, तुम भी क्या याद रखोगे कि मुकेश भैया जो कहता है वह कर के दिखाता भी है.’’

मुकेश ने अपने फोन में इंटरनेट औन कर के बच्चों वाली एक कार्टून फिल्म चला दी. फिल्म चालू कर के उस ने फोन उस के हाथों में थमा दिया. कार्टून फिल्म देख कर आदर्श का चेहरा खुशियों से खिल उठा और वह पूरी तन्मयता से फिल्म देखने लगा.

मोबाइल के जरिए मुकेश और आदर्श के बीच धीरेधीरे दोस्ती गहरी होती गई. शाम के वक्त जब भी आदर्श स्कूल से घर लौटता, उस के थोड़ी देर बाद ही मुकेश उस के पास पहुंच जाता था.

फिर मोबाइल में उस की पसंदीदा कार्टून फिल्म चालू कर के उसे मोबाइल पकड़ा देता था. आदर्श भी स्कूल का काम छोड़कर घंटों फिल्म देखने में मशगूल हो जाता था. ये देख कर आदर्श की मां और पिता दोनों परेशान रहते थे कि मुकेश मोबाइल में फिल्म दिखा कर उन के बेटे को बिगाड़ रहा है.

एक दिन जयप्रकाश सिंह ने आदर्श को अपने पास बैठा कर बड़े लाड़प्यार से घंटों तक समझाया कि वह मुकेश से दूर रहा करे. मुकेश अच्छा लड़का नहीं है, जिस तरह वह तुम्हें मोबाइल दे कर बिगाड़ रहा है, उस की हरकतें उन्हें पसंद नहीं हैं. बेटा, तुम उस से दूर ही रहा करो, यही तुम्हारे लिए बेहतर होगा.

आदर्श पिता की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था. उस ने पिता की बातों पर अमल भी किया. उस दिन के बाद आदर्श ने मुकेश के मोबाइल पर कार्टून फिल्म देखनी बंद कर दी. इतना ही नहीं, उस ने मुकेश से मिलना भी कम कर दिया.

बात 4 अक्तूबर, 2018 की है. शाम के 5 बज रहे थे. आदर्श अब तक स्कूल से घर नहीं लौटा था. उस की मां पूनम सिंह बेटे को ले कर बेहद परेशान और चिंतित थी. पूनम के 2 और बेटे रितिक व बैजनाथ भी भाई की वजह से परेशान थे. जबकि तीनों बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते थे.

उन की स्कूल की छुट्टी भी साथ ही होती थी और साथ ही घर से निकलते भी थे. लेकिन उस दिन पता नहीं कैसे तीनों का साथ छूट गया. उस दिन घर के लिए आगे पीछे निकले थे. रितिक और बैजनाथ तो घर लौट आए थे, लेकिन आदर्श नहीं लौटा था.

पूनम ने बच्चों से आदर्श के बारे में पूछा तो रितिक ने कहा कि वह आ रहा होगा. हो सकता है, छुट्टी के समय हम से पहले निकल लिया होगा, तभी छुट्टी होने पर हमें दिखाई नहीं दिया था. थोड़ी देर इधरउधर तलाशने के बाद जब वह हमें नहीं मिला तो हम यह सोच कर घर आ गए कि वह घर पहुंच गया होगा. शायद अपने दोस्तों के साथ पीछे आ रहा होगा. बेटे का जवाब सुन कर पूनम चुप हो गई और अपने कामों में लग गई.

शाम के 5 बज रहे थे. अब से पहले आदर्श को घर लौटने में इतनी देर कभी नहीं हुई थी. बेटे की चिंता में पूनम का दिल बुरी तरह घबरा रहा था. उस ने पति जयप्रकाश सिंह को फोन कर के यह बात बता दी. बेटे के स्कूल से घर न लौटने की बात सुन कर जयप्रकाश सिंह घर पहुंच गए.

उन्होंने अपने मोहल्ले के लोगों के साथ बेटे को संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. वह मायूस हो कर घर लौट आए.

रहस्यमय तरीके से गायब बेटे को ले कर जयप्रकाश सिंह काफी परेशान थे. धीरेधीरे अंधेरा भी घिरता जा रहा था. जयप्रकाश सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें. मोहल्ले के लोग भी उन्हें तरह तरह की सलाह देने लगे.

अंतत: अपने शुभचिंतकों के साथ वह अपने नजदीकी थाने सिकरीगंज पहुंच गए. यह थाना गोरखपुर जिले के अंतर्गत आता है. जयप्रकाश ने वहां मौजूद इंसपेक्टर दिनेश मिश्र को बेटे के गायब होने की जानकारी दे दी.

पुलिस ने आदर्श की गुमशुदगी दर्ज कर जांच शुरू कर दी. दूसरे दिन शाम को पुलिस को एक अहम सुराग हाथ लगा. किसी ने इंसपेक्टर को बताया कि बीती शाम लगभग 4 बजे आदर्श स्कूल ड्रेस और बैग लिए गांव के ही मुकेश पांडेय और गौतम पांडेय के साथ गांव के बाहर पुलिया के पास कहीं जाते हुए दिखा था.

पुलिस ने जयप्रकाश सिंह से मुकेश और गौतम के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मुकेश और गौतम पड़ोस में रहने वाली चांदमती का भतीजा और नाती हैं. ये दोनों कई दिनों से यहां आ कर रह रहे हैं. इतना ही नहीं पिछले कई दिनों से मुकेश घर आ कर आदर्श से मिलता था.

आदर्श उस के साथ घंटों मोबाइल पर खेलता था. उन्होंने कई बार बेटे को समझाया भी, पर वह नहीं माना. यह सुन कर पुलिस का माथा ठनका कि कहीं आदर्श के गायब होने में उन दोनों का हाथ तो नहीं है.

उसी शाम पुलिस चांदमती देवी के घर पहुंची और उस से मुकेश और गौतम के बारे में से पूछताछ की. पूछताछ के दौरान पता चला कि मुकेश और गौतम बीती रात अपने अपने घर चले गए. मुकेश गोपालगंज (बिहार) के मीरगंज के बड़कागांव में रहता था, जबकि गौतम संत कबीर नगर जिले की धनघटा के मझौरा का रहने वाला था.

यह बात पुलिस को कुछ हजम नहीं हुई कि आदर्श के अचानक लापता होते ही मुकेश और गौतम भी गांव से अचानक गायब क्यों हो गए. यह बात इत्तफाक नहीं हो सकती थी. इस में उन्हें जरूर कोई न कोई लोचा दिखाई दिया.

2 दिन बीत जाने के बाद आदर्श का कहीं पता नहीं चला तो गांव वालों के दिलों में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ने लगा. धीरेधीरे माहौल विस्फोटक बनता जा रहा था. इंसपेक्टर दिनेश मिश्र माहौल को भांप गए और इस से एसएसपी को अवगत करा दिया. एसएसपी शलभ माथुर ने गुत्थी को सुलझाने के लिए इंसपेक्टर दिनेश मिश्र को अहम दिशानिर्देश दिए.

एसएसपी के आदेश पर इंसपेक्टर दिनेश मिश्र ने आदर्श के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. चूंकि आदर्श के पिता ने गौतम और मुकेश पर शक जताया था, इसलिए इन की तलाश में एक पुलिस टीम उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर और दूसरी टीम बिहार के गोपालगंज रवाना कर दी गई. लेकिन दोनों जगहों पर गईं पुलिस टीमें खाली हाथ वापस लौट आईं.

पता चला कि मुकेश और गौतम अपने गांव नहीं पहुंचे थे. इस से यह बात साफ हो गई कि आदर्श के अपहरण में दोनों का कहीं न कहीं हाथ जरूर है, तभी दोनों पुलिस से बचने के लिए इधरउधर भागते फिर रहे थे.

इधर पुलिस अपहरण की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में जुटी हुई थी कि 8 अक्तूबर, 2018 की दोपहर बारी गांव के बाहर रामपाल अपने धान के खेत में सिंचाई करने गया तो उस ने वहां लाश पड़ी देखी. वह उलटे पैर गांव लौट आया और यह सूचना थाना सिकरीगंज को दे दी.

सूचना मिलते ही इंसपेक्टर दिनेश मिश्र मय फोर्स के मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का मुआयना किया तो वह किसी बच्चे की लाश निकली. लाश इतनी क्षतविक्षत थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था. जंगली जानवरों और चील कौओं ने उसे नोचनोच कर खा लिया था. साथ ही तेज बदबू भी आ रही थी.

लाश की सूचना मिलते ही मौके पर गांव वालों का मजमा लग गया. सूचना मिलते ही जयप्रकाश सिंह भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने जब वह लाश देखी तो उस की कमर पर अंडरवियर के अलावा कोई कपड़ा नहीं था. उस की कदकाठी और चेहरे की बनावट देख कर जयप्रकाश सिंह पहचान गए. उन्होंने उस की पुष्टि अपने बेटे आदर्श के रूप में की.

बेटे की लाश देख कर जयप्रकाश सिंह वहीं गश खा कर गिर पड़े. थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तो वह दहाड़ें मार कर रोने लगे. इंसपेक्टर दिनेश मिश्र ने अपहरण हुए बच्चे की लाश मिलने की सूचना एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (साउथ) और सीओ (बासगांव) को दे दी.

सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का मुआयना कर के अंदाजा लगाया कि आदर्श जिस दिन लापता हुआ था, शायद उसी दिन उस की हत्या कर दी गई होगी.

पुलिस ने मौके की आवश्यक काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गोरखपुर भिजवा दी. पुलिस ने पहले से दर्ज अपहरण की रिपोर्ट में भादंवि की धारा 302 और 201 और जोड़ दीं.

4 दिनों से रहस्यमय तरीके से गायब आदर्श की हत्या से परिवार वाले दुखी थे. वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि बदमाशों ने उन के मासूम बेटे की हत्या क्यों की थी? उन्हें उन के बेटे या उन से क्या चाहिए था? जिस की वजह से उस की हत्या कर दी.

पुलिस ने दोनों नामजद आरोपियों की तलाश तेज कर दी. कहीं से पुलिस को दोनों आरोपियों मुकेश और गौतम के मोबाइल नंबर मिल गए. दोनों नंबरों को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया और उन का पता लगाने के लिए मुखबिर भी लगा दिए.

5वें दिन यानी 12 अक्तूबर, 2018 को पुलिस को बड़ी सफलता मिली. इंसपेक्टर दिनेश मिश्र को मुखबिर से सूचना मिली कि दोनों आरोपी मुकेश और गौतम सिकरीगंज के पिपरी तिराहे के पास खड़े हैं. वे कहीं भागने की फिराक में हैं.

मुखबिर की सूचना मिलते ही इंसपेक्टर दिनेश मिश्र सादे कपड़ों में अपनी टीम के साथ पिपरी चौराहा पहुंच गए. सरकारी जीप उन्होंने चौराहे से थोड़ी दूर खड़ी कर दी और आरोपियों को चारों ओर से घेर लिया ताकि वे भाग न सकें.

सादा वेश में कुछ लोगों को अपनी ओर आता देख मुकेश और गौतम समझ गए कि शायद वे पुलिस वाले हैं. जैसे ही वह भागने को हुए तो पुलिस टीम ने दोनों को पकड़ लिया. पुलिस दोनों को थाने ले आई.

थाने ला कर इंसपेक्टर दिनेश मिश्र ने मुकेश और गौतम से अलगअलग पूछताछ की. पूछताछ के दौरान दोनों आरोपी पुलिस के सामने टूट गए और आदर्श का अपहरण करने के बाद उस की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.

उन की निशानदेही पर पुलिस ने चांदमती के घर से हत्या में इस्तेमाल चाकू, खून से सनी शर्ट, ताबीज, स्कूल के जूतेमोजे और स्कूल बैग बरामद कर लिया. पूछताछ के बाद आदर्श सिंह अपहरण और हत्याकांड की सनसनीखेज कहानी इस तरह सामने आई—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के सिकरीगंज थाने के बारीगांव के रहने वाले जयप्रकाश के 3 बेटे थे, जिन में 11 वर्षीय आदर्श कुमार सिंह मंझले नंबर का था. आदर्श पढ़ाई में बहुत होशियार था. जयप्रकाश सिंह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. उन के वेतन से परिवार का भरणपोषण होता था.

जयप्रकाश अपनी सैलरी के सारे पैसे पत्नी के हाथों पर रख देते थे. आदर्श अकसर पिता द्वारा मां को पैसे देते देखता था. पैसे देख कर उस के बालमन को लगता था कि उस के पिता की महीने की कमाई लाखों रुपए है. उस के पापा के पास बहुत सारा पैसा है.

यह बात आदर्श अकसर बाहर वालों को बता भी देता था कि उस के पापा के पास बहुत सारा पैसा है. वह पैसे घर की अलमारी में रखते हैं.

यह बात आदर्श के पड़ोस में रहने वाली 80 वर्षीय विधवा चांदमती देवी के 30 वर्षीय भतीजे मुकेश पांडेय ने भी सुन ली थी. उस ने मासूम आदर्श के मुंह से जब से रुपए वाली बात सुनी थी, उस दिन से उस के दिमाग में शैतानी कीड़े कुलबुलाने लगे थे.

चूंकि मुकेश अपनी बुआ चांदमती के यहां अकसर आता रहता था, इसलिए गांव वाले उसे अच्छी तरह जानते और पहचानते थे. जयप्रकाश सिंह के यहां भी मुकेश का आनाजाना लगा रहता था. वह मोबाइल चार्ज करने के बहाने जयप्रकाश सिंह के घर आता था और घंटों बैठा रहता था.

धीरेधीरे उस ने आदर्श की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. मुकेश आदर्श को अपने फोन में कार्टून फिल्म दिखाता था. आदर्श चूंकि बच्चा था, इसलिए वह उस की बातों में फंसता गया.

30 वर्षीय मुकेश पांडेय मूलरूप से बिहार के गोपालगंज के मीरगंज थाना क्षेत्र के बड़का गांव का रहने वाला था. वह पढ़ालिखा और परिश्रमी युवक था. पढ़लिख कर उस ने सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की थी, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिली थी.

मुकेश कुछ ऐसा करना चाहता था जिस से कम मेहनत और कम समय में वह लखपति बन जाए. वह जिस गांव में रहता था, उस गांव में कम ही लोगों के घरों में शौचालय थे. सरकार गांवों में शौचालय बनवाने के लिए गांव वालों को प्रोत्साहन राशि मुहैया कराती थी.

मुकेश के दिमाग में आया कि क्यों न वह सरकारी योजनाओं का लाभ उठाए, जिस से गांव वालों को भी लाभ पहुंचे और उस की भी जेब गरम होती रहे. मुकेश ने सरकार से मिलने वाली योजनाओं का लाभ गांव वालों को समझाया कि शौचालय बनवाने के लिए कुछ पैसे सरकार उन्हें दे रही है और कुछ पैसे उन्हें अपने पास से लगाने होंगे. तब जा कर एक बेहतर शौचालय बन सकता है.

मुकेश ने गांव वालों को इस शातिराना अंदाज से बातों में फंसाया कि वे उस के झांसे में आ गए. करीब 20-25 लोगों ने उसे 10-10 हजार रुपए इकट्ठा कर के दे दिए. इस तरह उस के पास जब ढाई लाख रुपए जमा हो गए तो वह गांव से गायब हो गया. महीनों बीत गए, न तो मुकेश का पता चला और न ही उन के शौचालय बने.

गांव वालों को अपने साथ धोखे का अहसास हुआ तो वे मुकेश के घर वालों पर रुपए लौटाने के लिए दबाव बनाने लगे. मुकेश ने सारे पैसे खर्च कर डाले थे. उस के पास फूटी कौड़ी तक नहीं बची थी. तब वह बिहार से भाग कर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की सिकरीगंज थाने के बारीगांव में अपनी बुआ चांदमती के यहां जा कर छिप गया.

उधर गांव वाले रुपए को ले कर उस के घर वालों पर जबरदस्त दबाव बनाए हुए थे. मुकेश का दिमाग काम नहीं कर रहा था कि वह दो ढाई लाख रुपयों का इंतजाम कहां से करे. उसे डर था कि अगर उस ने उन के रुपए वापस नहीं किए तो वह उस पर मुकदमा कर देंगे. इस से मुकेश डर गया. वह नहीं चाहता था कि उस पर पुलिस केस हो. पुलिस केस हो जाने से उस का जीवन बरबाद हो सकता था.

इसी बीच उस की मुलाकात गांव के जयप्रकाश सिंह के बेटे आदर्श से हो गई. आदर्श ने बताया कि उस के पिता के पास लाखों रुपए हैं. आदर्श को ले कर मुकेश के दिमाग में एक खतरनाक योजना यह पनपी कि यदि आदर्श का अपहरण कर लिया जाए तो फिरौती के तौर पर उसे 10-20 लाख रुपए आसानी से मिल सकते हैं.

वह उन्हीं रुपयों से गांव वालों के रुपए लौटा देगा और बाकी के रुपयों से ऐश करेगा. यह बात दिमाग में आते ही उस के चेहरे पर शैतानी मुसकान थिरक उठी.

यह काम मुकेश के अकेले के वश का नहीं था. इत्तफाक से उन्हीं दिनों चांदमती की बेटी का बेटा यानी उन का नाती गौतम पांडेय अपनी ननिहाल में रहने के लिए आया. मुकेश और गौतम रिश्ते में मामाभांजे थे. मुकेश ने रुपए का लालच दे कर भांजे गौतम को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

योजना के मुताबिक, मुकेश फोन चार्ज करने के बहाने जयप्रकाश सिंह के घर जाया करता था और आदर्श को मोबाइल पर कार्टून फिल्म दिखा कर उस से घर का सारा भेद ले लेता था. भावावेश में आ कर मासूम आदर्श घर की सारी जानकारी मुकेश को दे देता था. जानकारी पाने के बाद मुकेश ने अपनी योजना गौतम को बताई.

योजना के अनुसार आदर्श का अपहरण करने के बाद उसी दिन उस की हत्या कर देनी थी. उस के बाद उस के कपड़े, बैग, जूते आदि को हथियार बना कर आदर्श को जिंदा बताया जाता. फिर उस के पिता जयप्रकाश से 15 लाख की फिरौती वसूली जाती. यह योजना गौतम को जंच गई. यह 4 अक्तूबर, 2018 की बात है.

योजना के अनुसार 4 अक्तूबर की शाम आदर्श के स्कूल से आने की प्रतीक्षा में मुकेश और गौतम गांव के बाहर पुलिया के पास खड़े हो गए. आदर्श को अकेला आता देख कर दोनों के चेहरे पर शातिराना मुसकान थिरक उठी.

जैसे ही आदर्श पुलिया के पास पहुंचा मुकेश ने मोबाइल फोन दिखा कर उसे अपनी बातों में उलझा लिया और पुलिया से ही उसे दूसरी ओर ले कर चल दिया. गौतम भी उस के साथ था. गांव के एक युवक ने आदर्श को मुकेश और गौतम के साथ जाते हुए देख लिया था. उसी ने पुलिस को यह जानकारी दी थी.

गौतम और मुकेश आदर्श को अपनी बातों के जाल में उलझा कर शाम ढलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. शाम ढलते ही दोनों आदर्श को ले कर रामपाल के धान के खेत में पहुंचे. खेत में पहुंचते ही मुकेश ने आदर्श का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. फिर चाकू से उस का गला रेत दिया ताकि वह जीवित न बचे. क्योंकि उस के जीवित रहने से उन्हें जेल की हवा खानी पड़ती.

आदर्श की हत्या के बाद मुकेश और गौतम ने उस के कपड़े, जूते, बैग और गले में पहना ताबीज अपने पास रख लिया ताकि वह जयप्रकाश सिंह को यह विश्वास दिला सकें कि उन का बेटा जिंदा है, जिस से फिरौती की रकम आसानी से वसूली जा सके.

मुकेश और गौतम चांदमती के जिस कमरे में रह रहे थे, उसी में उन्होंने आदर्श का सामान छिपा कर रख दिया. जब आदर्श की खोज तेज हुई और मामला पुलिस तक पहुंचा तो दोनों डर गए और गांव छोड़ कर भाग गए.

लेकिन एक चश्मदीद गवाह ने मुकेश के इरादों पर पानी फेर दिया और वे दोनों जा पहुंचे जेल. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में बंद थे. पुलिस अदालत में दोनों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

40 महीने कैद में रहा कंकाल

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बलात्कारियों को मिली अंतिम सांस तक उम्रकैद

31अगस्त, 2018 को चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पूनम आर. जोशी की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. अदालत की काररवाई शुरू होने से पहले ही वकील, कई सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, पत्रकार वगैरह कोर्टरूम में पहुंच चुके थे.

इस फास्टट्रैक कोर्ट में उस दिन एक ऐसे केस का फैसला सुनाया जाना था, जिस की चर्चा पंजाब में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हुई थी. मामले के मीडिया में चर्चित बने रहने की वजह से केस की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में हुई थी. मात्र 122 दिनों में कोर्ट ने पूरी सुनवाई पूरी कर आरोपियों को 27 अगस्त को दोषी ठहरा कर 31 अगस्त को फैसला सुनाने का दिन मुकर्रर कर दिया था.

माननीय न्यायाधीश पूनम आर. जोशी निर्धारित समय पर कोर्ट में पहुंचीं. उन्होंने सब से पहले केस की फाइल पर नजर डाली. फिर सामने कटघरे की तरफ देखा. तीनों दोषी मोहम्मद इरफान, किस्मत अली और मोहम्मद गरीब कटघरे में मुंह लटकाए खड़े थे. उन्हें शायद इस बात का अंदेशा हो गया था कि अदालत उन्हें सख्त सजा ही सुनाएगी, इसलिए उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ी हुई थीं.

अदालत का फैसला जानने से पहले उस मामले के बारे में जान लिया जाए तो बेहतर होगा, जिसे सौल्व करने के लिए पंजाब पुलिस ने रातदिन एक कर दिया था. चंडीगढ़ के विभिन्न थानों के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के अलावा इस मामले के इनवैस्टीगेशन में क्राइम ब्रांच और साइबर सेल का भी सहयोग लिया गया था.

बात 17 नवंबर, 2017 की है. देहरादून निवासी 21 वर्षीय रमा शाम के करीब 7 बजे चंडीगढ़ के सेक्टर-37 स्थित कोचिंग सेंटर से अपनी कोचिंग क्लास खत्म कर के जैसे ही बाहर निकली, उस के घर वालों का देहरादून से फोन आ गया. वह फोन पर बातें करते हुए औटो पकड़ने के लिए मेनरोड पर स्थित बसस्टाप पर पहुंच गई.

फोन पर बात करते करते ही उस ने औटो रुकवाया. उस के बाद वह औटो में बैठ गई. औटो में पहले से ही 2 सवारियां बैठी हुई थीं, जिन की ओर रमा ने ध्यान नहीं दिया था. वह फोन पर बातें करने में व्यस्त थी.

रमा चंडीगढ़ की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी. नौकरी के अलावा उस ने सेक्टर-37 के एक कोचिंग सेंटर में कोचिंग लेनी भी शुरू की थी. उस का कोचिंग में वह तीसरा दिन था. कुछ दूर आगे चलने के बाद औटो ड्राइवर ने पैट्रोल भरवाने की बात कहते हुए औटो सेक्टर-42 की ओर मोड़ दिया.

रमा ने वहीं उतारने की बात कही तो औटो ड्राइवर ने अपनी बेटी की बीमारी की बात कह कर उसे औटो से न उतरने को कहा. फलस्वरूप वह औटो में ही बैठी रही. इस दौरान औटो ड्राइवर उसे बच्ची बच्ची कह कर अपनी बेटी और उस की बीमारी की कहानी सुना कर सांत्वना जुटाता रहा.

बाद में सेक्टर-42 स्थित पैट्रोल पंप के पास आ कर औटो रुक गया. औटो ड्राइवर और दोनों सवारियां औटो को धक्का मार कर अंदर ले गए थे, क्योंकि औटो में पैट्रोल खत्म हो गया था.

औटो में पैट्रोल भरवा कर ड्राइवर ने सेक्टर-43 से यू टर्न लिया. सेक्टर-53 पहुंच कर ड्राइवर ने औटो को स्लिप रोड पर ले लिया. कुछ दूर आगे जा कर ड्राइवर ने औटो खराब होने का नाटक करते हुए औटो रोक लिया.

ड्राइवर ने औटो खराब होने की बात कही, तो रमा औटो से उतर गई और ड्राइवर को पैसे देने लगी. वह कोई दूसरा औटो पकड़ कर जल्द जाना चाहती थी, क्योंकि पैट्रोल वगैरह के चक्कर में उस का काफी समय बरबाद हो चुका था और उसे घर जाने की जल्दी थी.

रमा औटो ड्राइवर को किराए के पैसे देने ही वाली थी कि पीछे बैठे दोनों युवकों ने उसे औटो के अंदर खींच लिया. यह देख ड्राइवर ने औटो दौड़ा दिया और एक सुनसान जगह पर ले गया. रमा ने विरोध करते हुए शोर मचाना चाहा तो युवकों ने उस का मुंह बंद कर दिया, जिस से वह शोर नहीं मचा सकी.

सुनसान जगह पर पहुंचने के बाद तीनों रमा को औटो से निकाल कर पास के जंगली एरिया में ले गए. वहां तीनों ने मिल कर उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया. दुष्कर्म के बाद उन्होंने रमा को चाकू दिखाते हुए चुप रहने की धमकी दी. इस से वह बुरी तरह डर गई.

वारदात को अंजाम देने के बाद वे तीनों रमा को छोड़ कर वहां से भाग निकले थे. साथ ही वे रमा का मोबाइल भी ले गए थे. रमा लड़खड़ाते कदमों से किसी तरह मेन रोड पर पहुंची और उस ने एक बाइक सवार को रोक कर अपनी आपबीती सुनाई. उस बाइक सवार की मदद से उस ने फोन द्वारा अपने साथ घटी घटना की सूचना पुलिस को दी.

सूचना मिलते ही सेक्टर-36 के एसएचओ इंसपेक्टर नसीब सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. वह रमा को सेक्टर-16 के सरकारी अस्पताल ले गए. रमा गहरे सदमे में थी.

पुलिस हुई सक्रिय

मामला एक छात्रा से संबंधित था, इसलिए खबर मिलते ही डीएसपी (साउथ) और एसएसपी नीलांबरी विजय जगदले तुरंत अस्पताल पहुंच गईं.

डाक्टरों ने बताया कि रमा सदमे में तो है लेकिन उस की हालत खतरे से बाहर है. रमा के बयानों के आधार पर पुलिस ने 3 अज्ञात लोगों के खिलाफ सामूहिक दुराचार का मामला भादंवि की धारा 376(डी), 376(2) जी और 506 के अंतर्गत दर्ज कर लिया. देहरादून में मौजूद रमा के घर वालों को भी फोन से इस मामले की सूचना दे दी गई थी.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने तुरंत पूरे शहर में अलर्ट जारी कर दिया और चंडीगढ़ से बाहर जाने वाली हरियाणा-पंजाब और हिमाचल की सीमाओं को सील कर दिया गया. उसी रात रमा की निशानदेही पर उस पैट्रोल पंप की सीसीटीवी फुटेज निकाल कर चैक की गई और रमा को साथ ले कर पूरा क्राइम सीन रीक्रिएट किया गया.

दरअसल, रमा चंडीगढ़ में नई थी. उसे रास्तों की पूरी जानकारी भी नहीं थी, इसीलिए औटो ड्राइवर उसे बहका कर गलत रास्ते पर ले गया था. सीसीटीवी फुटेज से पुलिस को कुछ खास हाथ नहीं लगा. ऐसा लगता था जैसे अपराधियों ने इस घटना को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया था.

औटो की आगेपीछे की नंबर प्लेट को 2 युवकों ने अपने हाथों से ढक रखा था. केवल एक युवक का ही अस्पष्ट चेहरा दिखाई दे रहा था. पुलिस ने उसी अस्पष्ट चेहरे को ले कर अपनी जांच आगे बढ़ानी शुरू कर दी.

अगले दिन इस घटना को ले कर पूरे शहर में हंगामा खड़ा हो गया. इस मामले को दिल्ली के निर्भया कांड से जोड़ कर देखा जाने लगा. स्कूलों कालेजों के छात्रछात्राएं, समाजसेवी संस्थाएं और राजनीतिक दल सड़कों पर उतर आए. आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर सजा देने की मांग उठने लगी.

विधानसभा में भी पुलिस की नाकामी और इस घटना की निंदा की गई. विपक्ष ने जम कर हंगामा किया. उसी दिन यानी 18 नवंबर को सीआरपीसी की धारा 164 के तहत पीडि़ता रमा के अदालत में मजिस्ट्रैट के समक्ष बयान दर्ज करवाए गए.

रमा ने मजिस्ट्रैट को पूरा घटनाक्रम विस्तार से बता दिया. उस ने यह भी दरख्वास्त की कि मीडियाकर्मियों को उस से दूर रखा जाए. रमा की अपील पर मजिस्ट्रैट ने पुलिस को आदेश दिया कि इस मामले से जुड़ा कोई भी दस्तावेज लीक नहीं होना चाहिए.

एसएसपी नीलांबरी विजय जगदले ने आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने के लिए क्राइम ब्रांच, स्पैशल सेल और साइबर क्राइम सेल को अलर्ट करने के साथ सभी थानों के एसएचओ और पूरी फोर्स को इस काम पर लगा दिया.

चंडीगढ़ पुलिस का पूरा अमला लगा आरोपियों को ढूंढने में

उन्होंने यह भी आदेश दिया कि सभी अफसर अपने अपने एंगल से इस केस पर काम करते हुए आरोपियों तक पहुंचें. साथ ही उन्होंने थाना सेक्टर-36 के एसएचओ इंसपेक्टर नसीब सिंह व अन्य थानों के तेजतर्रार इंसपेक्टर रामरतन, इंसपेक्टर रंजीत सिंह, इंसपेक्टर बलदेव, इंसपेक्टर आर.आर. शर्मा के नेतृत्व में कई टीमें बना कर आरोपियों की तलाश शुरू करवा दी.

इस के अलावा कई डीएसपी और इंसपेक्टरों को भी इस केस पर लगाया गया. पुलिस हर एंगल से जांच कर रही थी. पुलिस ने सीसीटीवी में कैद एक आरोपी के चेहरे को लोकल टीवी, सोशल मीडिया पर दिखा कर उसे पकड़वाने में सहयोग की अपील की. साथ ही गली गली में उस के पोस्टर भी चिपकवा दिए गए, पर इतना कुछ करने के बावजूद घटना के 24 घंटे बाद भी पुलिस के हाथ खाली ही रहे.

पुलिस इस एंगल पर भी काम कर रही थी कि कहीं यह औटो ड्राइवरों का कोई गैंग तो नहीं जो मौका देख अकेली युवतियों को पकड़ कर उन से बलात्कार करता है. क्योंकि 12 सितंबर, 2016 को भी एक ऐसी ही वारदात हुई थी.

इस मामले में कालसेंटर में काम करने वाली युवती ने सेक्टर-34 से अपने घर जाने के लिए औटो लिया था. औटो में 2 लोग पहले से ही सवार थे. ड्राइवर सहित 3 लोगों ने उस युवती के साथ सामूहिक दुराचार किया था. इस केस में 6 दिन बाद औटो ड्राइवर तो पकड़ा गया था पर बाकी के 2 लोग अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर थे.

अगस्त, 2016 को ही मिस्र की रहने वाली एक युवती से औटो में दुष्कर्म का प्रयास हुआ था, जिस का आरोपी पकड़ा गया था. इसी तरह 24 मार्च, 2017 को एक युवती के साथ चलते औटो में दुष्कर्म का प्रयास किया गया था. उस युवती ने किसी तरह औटो से कूद कर अपनी जान और इज्जत बचाई थी. इस केस का दोषी भी अभी तक नहीं पकड़ा गया था. इन सब मामलों को देखते हुए पुलिस इस एंगल पर भी काम कर रही थी. सैकड़ों औटो ड्राइवरों से पूछताछ की गई.

इस के अलावा आसपास के हिस्ट्रीशीटरों से भी पूछताछ की गई पर नतीजा शून्य ही रहा. इस घटना के 4 दिन बीत जाने पर भी जब पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा तो चंडीगढ़ पुलिस ने 21 नवंबर को ईनाम के पोस्टर छपवा कर गली गली में चिपकवा दिए. पुलिस ने आरोपी औटो ड्राइवर के बारे में या इस केस से संबंधित कोई भी जानकारी देने वाले को एक लाख रुपए का ईनाम देने की घोषणा की थी.

देर से ही सही, मिल गई सफलता

दिनरात की भागदौड़ के बाद आखिर 7 दिन बाद पुलिस को इस मामले में सफलता मिली. सेक्टर-49 की थाना पुलिस ने जीरकपुर निवासी मोहम्मद इरफान को चंडीगढ़ से ही गिरफ्तार कर लिया. यह वही औटो ड्राइवर था, जिस के औटो में रमा बैठी थी.

इस के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर 28 नवंबर, 2017 को अन्य दोनों अभियुक्तों मोहम्मद गरीब और किस्मत अली उर्फ पोपू को उत्तर प्रदेश स्थित उन के पैतृक घर अमेठी और फैजाबाद से गिरफ्तार किया. पुलिस उन के घर में इंश्योरेंस एजेंट बन कर पहुंची थी और उन की पहचान होने पर उन्हें उन के घर से ही धर दबोचा था.

25 नवंबर को पीडि़ता रमा ने मजिस्ट्रैट के सामने मुख्य अभियुक्त औटो ड्राइवर मोहम्मद इरफान की पहचान कर ली थी. पहचान हो जाने के बाद पुलिस इरफान को अदालत में पेश कर उसे रिमांड पर लेना चाहती थी. लेकिन उसी समय उस ने खिड़की का कांच तोड़ कर अपने पेट पर 3-4 वार कर आत्महत्या करने का प्रयास किया. नतीजतन उसे अस्पताल में भरती करवाया गया.

पुलिस ने मोहम्मद गरीब और किस्मत अली की भी शिनाख्त मजिस्ट्रैट के सामने करवाई. पीडि़ता ने उन्हें भी पहचान लिया. इस मामले में पुलिस ने अभियुक्तों की पहचान से ले कर डीएनए टेस्ट तक कराने के बाद अपनी सारी काररवाई पूरी कर तीनों अभियुक्तों को अदालत पर पेश कर जेल भेज दिया था. अभियुक्तों को जेल भेजने के बाद 21 फरवरी, 2018 को पुलिस ने तीनों अभियुक्तों के खिलाफ अदालत में चालान भी दाखिल कर दिया.

13 मार्च, 2018 को पुलिस ने रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में मोहम्मद इरफान के अपराध स्वीकार करने के बाद दिसंबर 2016 को काल सेंटर में काम करने वाली एक युवती से गैंगरेप मामले में भी उसे आरोपी बनाया. 23 अप्रैल, 2018 को औटो गैंगरेप के तीनों दोषियों पर अदालत में आरोप तय किए गए और 2 मई, 2018 को इस केस का ट्रायल फास्टट्रैक कोर्ट में शुरू हुआ.

8 मई, 2018 को पीडि़ता रमा ने अदालत में अपना बयान दर्ज करवाया और तीनों अभियुक्तों के खिलाफ गवाही भी दी. 23 मई, 2018 को तीनों आरोपियों के डीएनए टेस्ट की सीएफएसएल रिपोर्ट अदालत में सौंपी गई. रिपोर्ट पौजिटिव थी. फिर पहली अगस्त, 2018 को तीनों दोषियों के सीआरपीसी की धारा 313 के तहत बयान दर्ज हुए.

फास्टट्रैक कोर्ट ने 122 दिनों में दिया फैसला

कोर्ट ने आरोपियों को अपनी बात रखने का मौका दिया. अदालत की काररवाई तेज गति से चल रही थी. 21 अगस्त, 2018 को इस केस की अंतिम बहस के बाद केस का ट्रायल पूरा हो गया था. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पूनम आर. जोशी ने 27 अगस्त, 2018 को तीनों आरोपियों को दोषी करार दिया और बताया कि इस केस का फैसला 31 अगस्त को सुनाया जाएगा.

फैसला जानने के लिए शहर के तमाम लोग 31 अगस्त, 2018 को अदालती काररवाई शुरू होने से पहले ही विशेष अदालत में पहुंच गए थे. जैसे ही माननीय जज एडीजे पूनम आर. जोशी अपनी सीट पर आ कर बैठीं तो कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया. सभी की निगाहें माननीय जज पर ही लगी थीं. उन्होंने कहा कि दोषियों ने ऐसा अपराध किया है जिस की सजा इन्हें अवश्य मिलनी चाहिए.

तमाम गवाहों के बयान और सबूतों के आधार पर अदालत ने मोहम्मद इरफान, किस्मत अली और मोहम्मद गरीब को भादंवि की धारा 376(डी) सामूहिक दुराचार और 506 आपराधिक धमकी के तहत दोषी करार देते हुए अंतिम सांस तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

विशेष अदालत ने 122 दिनों में ट्रायल समाप्त करते हुए सजा के अलावा तीनों मुजरिमों पर अलगअलग 2 लाख 5 हजार रुपए का जुरमाना भी लगाया. जुरमाना राशि में से 2-2 लाख यानी 6 लाख रुपए पीडि़ता को बतौर मुआवजा देने के आदेश दिए.

पुलिस ने मोहम्मद इरफान, मोहम्मद गरीब और किस्मत अली उर्फ पोपू के खिलाफ आईपीसी की धारा 376(डी), 376(2)जी और 506 के तहत केस दर्ज किया था. हालांकि बाद में पुलिस ने तीनों के खिलाफ चार्जशीट आईपीसी की धारा 376(डी) सामूहिक दुराचार और 506 आपराधिक धमकी देने के तहत दायर की थी. इन्हीं दोनों धाराओं में अदालत में ट्रायल चला था. इस केस में पुलिस की ओर से कुल 19 सरकारी गवाह पेश किए गए, जिन्होंने अदालत में अभियुक्तों के खिलाफ गवाही दी थी.

इस केस का ट्रायल फास्टट्रैक कोर्ट में 122 दिनों तक चला. शुक्र है कि यह फास्टट्रैक कोर्ट थी, जिस में इतनी जल्दी न्याय पाना आसान हुआ. अगर साधारण कोर्ट होती तो 122 दिनों की जगह 122 महीने या फिर साल भी लग सकते थे. आए दिन बच्चियों से ले कर वरिष्ठ महिला नागरिकों तक, हर उम्र हर तबके की औरतों का बलात्कार ब्रेकिंग न्यूज बनता है. मीडिया में आक्रोश बढ़ता है तब कहीं जा कर एकाध केस में फास्टट्रैक कोर्ट की घोषणा की जाती है.

जब हम अपने देश में बुलेट ट्रेन का संकल्प कर रहे हैं तो न्याय की बुलेट ट्रेन क्यों नहीं चल सकती. न्याय में देरी अपने आप में अन्याय है. इस घातक विलंब में कई मूल मसले कुचल दिए जाते हैं. अगर अपराधियों के खिलाफ त्वरित कानूनी काररवाई अमल में लाई जाए तो निश्चित ही अपराधियों में कानून का डर बैठेगा.

—मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पीडि़ता का नाम बदला गया है.

प्यार करने की खौफनाक सजा

सुबह करीब साढ़े 5 बजे आगरा के पुलिस नियंत्रण कक्ष को सूचना मिली कि आगरा-ग्वालियर की अपलाइन रेल पर शाहगंज और  सदर बाजार के बीच में एक युवक ने ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या कर ली है. सूचना शाहगंज और सदर बाजार के बीच होने की मिली थी. यह बात मौके पर जा कर ही पता चल सकती थी कि घटना किस थाने में आती है, इसलिए नियंत्रणकक्ष द्वारा इत्तला शाहगंज व सदर बाजार दोनों थानों को दे दी गई.

खबर मिलने के बाद दोनों थानों की पुलिस के साथसाथ थाना राजकीय रेलवे पुलिस आगरा छावनी की पुलिस टीम भी वहां पहुंच गई. पुलिस को रेलवे लाइनों के बीच एक युवक की लाश 2 टुकड़ों में पड़ी मिली. यह 25 जुलाई, 2014 की बात है.

सब से पहले पुलिस ने यह देखा कि जिस जगह पर लाश पड़ी है, वह क्षेत्र किस थाने में आता है. जांच के बाद यह पता चला कि वह क्षेत्र थाना सदर की सीमा में आता है.

रेलवे लाइनों में लाश पड़ी होने की सूचना पा कर आसपास के गांवों के तमाम लोग वहां पहुंच गए. लोगों ने उस की शिनाख्त करते हुए कहा कि मरने वाला युवक शिवनगर के रहने वाले नत्थूलाल का बेटा मनीष है. लोगों ने जल्द ही मनीष के घर वालों को खबर कर दी तो वे भी रोते बिलखते वहां पहुंच गए. जवान बेटे की मौत पर वे फूटफूट कर रो रहे थे.

सदर बाजार के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एएसपी डा. रामसुरेश यादव, एसपी सिटी समीर सौरभ व एसएसपी शलभ माथुर को भी घटना की जानकारी दे दी तो वे भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

जिस तरीके से वहां लाश पड़ी थी, देख कर पुलिस अधिकारियों को मामला आत्महत्या का नहीं लगा बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे उस की हत्या कहीं और कर के लाश ट्रैक पर डाल दी हो ताकि उस की मौत को लोग हादसा या आत्महत्या समझें.

कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट और कमीज की जेबें खाली निकलीं. मनीष के घर वालों ने बताया कि उस के पास 2 मोबाइल फोनों के अलावा पर्स में पैसे व वोटर आईडी कार्ड व जेब में छोटी डायरी रहती थी जिस में वह लेबर का हिसाब किताब रखता था. इस से इस बात की पुष्टि हो रही थी कि किसी ने हत्या करने के बाद उस की ये सारी चीजें निकाल ली होंगी ताकि इस की शिनाख्त नहीं हो पाए.

पुलिस ने नत्थूलाल से प्रारंभिक पूछताछ  कर मनीष की लाश का पंचनामा तैयार कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी और नत्थूलाल की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच थानाप्रभारी सुनील कुमार ने संभाल ली. एसएसपी शलभ माथुर ने जांच में क्राइम ब्रांच को भी लगा दिया.

थानाप्रभारी ने सब से पहले मनीष के घर वालों से बात कर के यह जानने की कोशिश की कि उस का किसी से कोई झगड़ा या दुश्मनी तो नहीं थी. इस पर नत्थूलाल ने बताया कि मनीष पुताई के काम का ठेकेदार था. वह बहुत शरीफ था. मोहल्ले में वह सभी से हंसता बोलता था.

उन से बात करने के बाद पुलिस को यह लगा कि उस की हत्या के पीछे पुताई के काम से जुड़े किसी ठेकेदार का तो हाथ नहीं है या फिर प्रेमप्रसंग के मामले में किसी ने उस की हत्या कर दी. इसी तरह कई दृष्टिकोणों को ले कर पुलिस चल रही थी.

अगले दिन पुलिस को मनीष की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई. पुलिस को शक हो रहा था, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से वह सही साबित हुआ. यानी मनीष ने सुसाइड नहीं किया था, बल्कि उस की हत्या की गई थी. रिपोर्ट में बताया गया कि उस की सभी पसलियां टूटी हुई थीं, उस के दोनों फेफड़े फट गए थे. गुप्तांगों पर भी भारी वस्तु से प्रहार किया गया था. इस के अलावा उस के शरीर पर घाव के अनेक निशान थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह बात साफ हो गई कि मनीष की हत्या कहीं और की गई थी और हत्यारे उस से गहरी खुंदक रखते थे तभी तो उन्होंने उसे इतनी बेरहमी से मारा.

मनीष के पास 2 महंगे मोबाइल फोन थे जो गायब थे. पुलिस ने उस के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. उस से पता चला कि उन की की अंतिम लोकेशन सोहल्ला बस्ती की थी.

इस बारे में उस के पिता नत्थू सिंह से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि सोहल्ला बस्ती में मनीष का कोई खास यारदोस्त तो नहीं रहता. उन्होंने यह जरूर बताया कि मनीष के 2 कारीगर मुन्ना और बंडा इस बस्ती में रहते हैं. वह उन के पास अकसर जाता रहता था.

मनीष की कालडिटेल्स पर नजर डाल रहे एएसपी डा. रामसुरेश यादव को एक ऐसा नंबर नजर आया था जिस से अकसर रात के 12 बजे से ले कर 2 बजे के बीच लगातार बातचीत की जाती थी. जिस नंबर से उस की बात होती थी, बाद में पता चला कि वह नंबर माधवी नाम की किसी लड़की की आईडी पर लिया गया था.

जांच में लड़की का नाम सामने आते ही पुलिस को केस सुलझता दिखाई दिया. क्योंकि मुन्ना और बंडा उस के भाई थे. एसएसपी को जब इस बात से अवगत कराया तो उन्होंने माधवी और उस के भाइयों से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एक पुलिस टीम फौरन माधवी के घर दबिश देने निकल गई. लेकिन घर पहुंच कर देखा तो मुख्य दरवाजे पर ताला बंद था. यानी घर के सब लोग गायब थे.

माधवी के पिता भूपाल सिंह, भाई और अन्य लोग कहां गए, इस बारे में पुलिस ने पड़ोसियों से पूछा तो उन्होंने अनभिज्ञता जता दी. पूरे परिवार के गायब होने से पुलिस का शक और गहरा गया.

किसी तरह पुलिस को भूपाल सिंह का मोबाइल नंबर मिल गया. उसे सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन आगरा के नजदीक धौलपुर गांव की मिली. पुलिस टीम वहां रवाना हो गई. फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने माधवी, उस के पिता भूपाल सिंह, 3 भाइयों कुंवरपाल सिंह, बंडा और मुन्ना को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर उन सब से मनीष की हत्या के बारे में पूछताछ की तो भूपाल सिंह ने स्वीकार कर लिया कि मनीष की हत्या उस ने ही कराई है. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली.

मनीष के पिता और दादा दोनों ही रेलवे कर्मचारी थे. इसलिए उस का जन्म और परवरिश आगरा की रेलवे कालोनी में हुई थी. उस की 3 बहनें और एक छोटा भाई था. पिता नत्थूलाल रेलवे कर्मचारी थे ही, साथ ही मां विमलेश ने भी घर बैठे कमाई का अपना जरिया बना रखा था. वह आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर आनेजाने वाले ट्रेन चालकों व गार्डों के लिए खाने के टिफिन पैक कर के उन तक पहुंचाती थी. इस से उन्हें भी ठीक आमदनी हो जाती थी.

मनीष समय के साथ बड़ा होता चला गया. इंटरमीडिएट करने के बाद वह रेलवे के ठेकेदारों के साथ कामकाज सीखने लगा. फिर रेलवे के एक अफसर की मदद से उसे मकानों की पुताई के छोटेमोटे ठेके मिलने लगे. देखते ही देखते उस ने रेलवे की पूरी कालोनी में रंगाई पुताई का ठेका लेना शुरू कर दिया. वह ईमानदार था इसलिए उस के काम से रेलवे अधिकारी भी खुश रहते थे.

मोटी कमाई होने लगी तो मनीष के हावभाव, रहनसहन, खानपान सब बदल गया. महंगे कपड़े, ब्रांडेड जूते, नईनई बाइक पर घूमना मनीष का जैसे शौक था. 2-3 सालों में उस की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई थी.

वह जिस तरह कमा रहा था, उसी तरह दान आदि भी करता. गांव में गरीब लड़कियों की शादी में वह अपनी हैसियत के अनुसार सहयोग करता था. मोहल्ले में भी वह अपने बड़ों को बहुत सम्मान करता था. इन सब बातों से वह गांव में सब का चहेता बना हुआ था.

करीब 4-5 साल पुरानी बात है. मनीष का कामकाज जोरों पर चल रहा था. उसे रंगाई पुताई के कारीगरों की जरूरत पड़ी तो वह पास की ही बस्ती सोहल्ला पहुंच गया. वहां पता चला कि बंडा और मुन्ना नाम के दोनों भाई यह काम करते हैं.

वह इन दोनों के पास पहुंचा और बातचीत कर के अपने काम पर ले गया. मनीष को दोनों भाइयों का काम पसंद आया तो उन से ही अपने ठेके का काम कराने लगा. वह उन्हें अच्छी मजदूरी देता था इसलिए वे भी मनीष से खुश थे.

धीरेधीरे मनीष का मुन्ना के घर पर भी आनाजाना शुरू हो गया. इसी दौरान मनीष की आंखें मुन्ना की 17-18 साल की बहन माधवी से लड़ गईं. माधवी उन दिनों कक्षा-9 में पढ़ती थी. यह ऐसी उम्र होती है जिस में युवत युवती विपरीतलिंगी को अपना दोस्त बनाने के लिए आतुर रहते हैं. माधवी और मनीष के बीच शुरू हुई बात दोस्ती तक और दोस्ती से प्यार तक पहुंच गई. फिर जल्दी ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी कायम हो गए.

इस तरह करीब 4 सालों तक उन के बीच प्यार और रोमांस का खेल चलता रहा. माधवी भी अब इंटरमीडिएट में आ चुकी थी. प्यार के चक्कर में पड़ कर वह अपनी पढ़ाई पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दे रही थी, जिस से वह इंटरमीडिएट में एक बार फेल भी हो गई. उस के घर वालों को यह बात पता तक नहीं चली कि उस का मनीष के साथ चक्कर चल रहा है.

माधवी सुबह साइकिल से स्कूल के लिए निकलती लेकिन स्कूल जाने की बजाय वह एक नियत जगह पहुंच जाती. मनीष भी अपनी बाइक से वहां पहुंच जाता. मनीष किसी के यहां उस की साइकिल खड़ी करा देता था. इस के बाद वह मनीष की बाइक पर बैठ कर फुर्र हो जाती.

स्कूल का समय होने से पहले वह वापस साइकिल उठा कर अपने घर चली जाती. उधर मनीष भी अपने कार्यस्थल पर पहुंच जाता. वहां माधवी के भाइयों को पता भी नहीं चल पाता कि उन का ठेकेदार उन की ही बहन के साथ मौजमस्ती कर के आ रहा है.

माधवी के पिता भूपाल सिंह गांव से दूध खरीद कर शहर में बेचते थे. वह बहुत गुस्सैल थे. आए दिन मोहल्ले में छोटीछोटी बातों पर लोगों से झगड़ना आम बात थी. झगड़े में उन के तीनों बेटे भी शरीक  हो जाते थे, जिस से मोहल्ले में एक तरह से भूपाल सिंह की धाक जम गई थी.

लेकिन इतना सब होने के बाद भी मनीष के साथ इस परिवार के संबंध मधुर थे. मुन्ना और बंडा भी मनीष के घर जाने लगे.

मनीष और माधवी एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. उन्होंने शादी कर के साथसाथ रहने का फैसला कर लिया था. लेकिन उन के सामने समस्या यह थी कि उन की जातियां अलगअलग थीं. दूसरे माधवी के पिता और भाई गुस्सैल स्वभाव के थे इसलिए वे डर रहे थे कि घर वालों के सामने शादी की बात कैसे करें. लेकिन बाद में उन्होंने तय कर लिया कि उन के प्यार के रास्ते में जो भी बाधा आएगी, उस का वह मिल कर मुकाबला करेंगे.

माधवी जब घर पर अकेली होती तो मनीष को फोन कर के घर बुला लेती थी. एक बार की बात है. उस के पिता ड्यूटी गए थे भाई भी अपने काम पर चले गए थे और मां ड्राइवरों के टिफिन पहुंचाने के बाद खेतों पर गई हुई थी. माधवी के लिए प्रेमी के साथ मौजमस्ती करने का अच्छा मौका था. उस ने उसी समय मनीष को फोन कर दिया तो वह माधवी के घर पहुंच गया.

मनीष माधवी के घर तक अपनी बाइक नहीं लाया था वह उसे रेलवे फाटक के पास खड़ी कर आया था. उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई नहीं था इसलिए वे अपनी हसरत पूरी करने लगे. इत्तफाक से उसी समय घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया. दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनते ही दोनों के होश उड़ गए. उन के जहन से मौजमस्ती का भूत उड़नछू हो गया. वे जल्दीजल्दी कपड़े पहनने लगे.

तभी माधवी का नाम लेते हुए दरवाजा खोलने की आवाज आई. यह आवाज सुनते ही माधवी डर से कांपने लगी क्योंकि वह आवाज उस के पिता की थी. वही उस का नाम ले कर दरवाजा खोलने की आवाज लगा रहे थे.

माधवी पिता के गुस्से से वाकिफ थी. इसलिए उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए. कमरे में भी ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां मनीष को छिपाया जा सके. दरवाजे के पास जाने के लिए भी उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. उधर उस के पिता दरवाजा खोलने के लिए बारबार आवाजें लगा रहे थे.

दरवाजा तो खोलना ही था इसलिए डरते डरते वह दरवाजे तक पहुंची. दरवाजा खुलते ही मनीष वहां से भाग गया. मनीष के भागते ही भूपाल सिंह को माजरा समझते देर नहीं लगी. वह गुस्से से बौखला गया. घर में घुसते ही उस ने बेटी से पूछा कि मनीष यहां क्यों आया था.

डर से कांप रही माधवी उस के सामने मुंह नहीं खोल सकी. तब भूपाल सिंह ने उस की जम कर पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि आइंदा वह उस से मिली तो वह दोनों को ही जमीन में जिंदा गाड़ देगा.

शाम को जब भूपाल के तीनों बेटे कुंवर सिंह, मुन्ना व बंडा घर आए तो उस ने उन्हें पूरा वाकया बताया. बेटों ने मनीष की करतूत सुनी तो वे उसी रात उसे जान से मारने उस के घर जाने के लिए तैयार हो गए. लेकिन भूपाल सिंह ने उन्हें गुस्से पर काबू कर ठंडे दिमाग से काम लेने की सलाह दी.

इस के बाद बंडा व मुन्नालाल ने मनीष के साथ काम करना बंद कर दिया था. 15 दिनों बाद माधवी की बोर्ड की परीक्षाएं थीं इसलिए उन्होंने माधवी पर भी पाबंदी लगाते हुए उस का स्कूल जाना बंद करा दिया.

4 महीने बीत गए. माधवी ने सोचा कि घर वाले इस बात को भूल गए होंगे. इसलिए उस ने मनीष से फिर से फोन पर बतियाना शुरू कर दिया. लेकिन अब वह बड़ी सावधानी बरतती थी. लेकिन माधवी की यही सोच गलत निकली. उसे पता नहीं था कि उस के घर वाले मनीष को ठिकाने लगाने के लिए कितनी खौफनाक साजिश रच चुके हैं.

योजना के अनुसार 28 जून, 2014 को सुबह के समय बंडा ने मेज पर रखा माधवी का फोन फर्श पर गिरा कर तोड़ डाला. माधवी को यह पता न था कि वह फोन जानबूझ कर तोड़ा गया है. घंटे भर बाद बंडा उस के फोन को सही कराने की बात कह कर घर से निकला.

इधर भूपाल सिंह ने यह कह कर अपनी पत्नी को मायके भेज दिया कि उस के भाई का फोन आया था कि वहां पर उस की बेटी को देखने वाले आ रहे हैं. पिता के कहने पर मां के साथ माधवी भी अपने मामा के यहां चली गई. जाते समय भूपाल सिंह ने पत्नी से कह दिया था कि मायके में वह माधवी पर नजर रखे.

उन दोनों के घर से निकलते ही बंडा घर लौट आया. उस ने तब तक माधवी का सिम कार्ड निकाल कर अपने फोन में डाल लिया. उस ने माधवी के नंबर से मनीष को एक मैसेज भेज दिया. उस ने मैसेज में लिखा कि आज घर पर कोई नहीं है. रात 8 बजे वह घंटे भर के लिए घर आ जाए.

पे्रमिका का मैसेज पढ़ते ही मनीष का दिल बागबाग हो गया. उस ने माधवी को फोन करना भी चाहा लेकिन उस ने इसलिए फोन नहीं किया क्योंकि माधवी ने उसे मैसेज के अंत में मना कर रखा था कि वह फोन न करे. केवल रात में जरूर आ जाए, ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा.

रात 8 बजे मनीष दबेपांव माधवी से मिलने उस के घर पर पहुंच गया. घर का मुख्य दरवाजा भिड़ा हुआ था. दरवाजा खोल जैसे ही वह सामने वाले कमरे में गया, उसे पीछे से माधवी के भाइयों ने दबोच लिया.

माधवी के भाइयों ने उस का मुंह दबा कर उस के सिर पर चारपाई के पाए से वार कर दिया. जोरदार वार से मनीष बेहोश हो कर गिर पड़ा. उस के गिरते ही उस पर उन्होंने लातघूंसों की बरसात शुरू कर दी. उन्होंने उस के गुप्तांग को पैरों से कुचल दिया. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

हत्या करने के बाद लाश को ठिकाने भी लगाना था. आपस में सलाह करने के बाद उस के शव को तलवार से नाभि के पास से 2 हिस्सों में काट डाला. करीब 4 घंटे तक मनीष की लाश उसी कमरे में पड़ी रही.

लाश के टुकड़ों से खून निकलना बंद हो गया तो रात करीब 1 बजे जूट की बोरी में दोनों टुकड़े भर लिए. उन्हें रेलवे लाइन पर फेंकने के लिए मुन्ना और बंडा बाइक से निकल गए. हत्या करने के बाद उस की सभी जेबें खाली कर ली गई थीं ताकि पहचान न हो सके. उस के महंगे दोनों मोबाइल स्विच्ड औफ कर के घर पर ही रख लिए.

मुन्ना और बंडा जब लाश ले कर घर से निकल गए तो घर पर मौजूद भूपाल और उस के बेटे कुंवरपाल ने कमरे से खून के निशान आदि साफ किए. इस के बाद उन्होंने हत्या में प्रयुक्त हथियार, मनीष के दोनों मोबाइल आदि को एक मालगाड़ी के डिब्बे में फेंक दिया. वह मालगाड़ी आगरा से कहीं जा रही थी. मनीष की जेब से मिले कागजों और पर्स को भी उन्होंने जला दिया.

मुन्ना और बंडा लाश को सोहल्ला रेलवे फाटक से करीब आधा किलोमीटर दूर आगरा-ग्वालियर रेलवे ट्रैक पर ले गए. बाइक रोक कर ये लोग मनीष के शव को बोरे से निकाल कर मुख्य लाइन पर फेंकना चाह रहे थे तभी उन्हें सड़क पर अपनी ओर कोई वाहन आता दिखाई दिया.

तब तक वे शव को बोरे से निकाल चुके थे. उन्होंने तुरंत लाश के दोनों टुकड़े लाइन पर डाल दिए और बोरी उठा कर वहां से भाग निकले.

दोनों भाइयों ने रास्ते में एक खेत में वह बोरी जला दी और घर आ गए. घर आ कर मुन्ना व बंडा ने खून के निशान वाले कपड़े नहाधो कर बदल लिए. जब उन्होंने शव को पास की ही रेलवे लाइन पर फेंकने की बात अपने पिता को बताई तो भूपाल ने माथा पीट लिया.

वह समझ गया कि लाश पास में ही डालने की वजह से उस की शिनाख्त हो जाएगी और पुलिस उन के घर पहुंच जाएगी. इसलिए सभी लोग घर का ताला लगा कर रात में ही 2 बाइकों पर सवार हो कर वहां से भाग निकले.

घर से भाग कर वे चारों माधवी व उस की मां के पास पहुंचे. वहां पर भूपाल सिंह ने पत्नी को सारा वाकया बताया तो वह भी डर गई. उसे पति व बेटों पर बहुत गुस्सा आया. लेकिन अब होना भी क्या था अब तो बस पुलिस से बचना था.

वे चारों वहां से भाग कर आगरा के पास धौलपुर स्थित एक परिचित के यहां पहुंचे. लेकिन पुलिस के लंबे हाथों से बच नहीं सके. सर्विलांस टीम की मदद से वे पुलिस के जाल में फंस ही गए. हत्या में माधवी का कोई हाथ नहीं था इसलिए उसे पूछताछ के बाद छोड़ दिया.

पूछताछ के बाद सभी हत्यारोपियों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक सभी हत्यारोपी जेल की सलाखों के पीछे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों व मनीष के घर वालों के बयानों पर आधारित. माधवी परिवर्तित नाम है.