डेढ़ करोड़ का विश्वास

घटना 14 जुलाई, 2020 की है. उस रोज राम गोयल सो कर उठे तो घर का अस्तव्यस्त हाल देख कर उन के होश उड़ गए. कमरे में तिजोरी खुली पड़ी थी, जिस में रखी कई किलोग्राम सोनाचांदी व नकदी सब गायब थी. यह देख कर घर में हड़कंप मच गया.

राम गोयल को पता चला कि घर से 3 किलो सोने और चांदी के आभूषण, नकदी और अन्य कीमती सामान गायब है. इस के अलावा परिवार के साथ रह रही बेटी की नौकरानी अनुष्का, जो दिल्ली से आई थी, वह भी गायब थी. अनुष्का राम गोयल की बेटीदामाद की नौकरानी थी. वह उन के बच्चों की देखभाल करती थी.

जून, 2020 महीने में राम गोयल की बेटी एक समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली से राजगढ़ अपने पिता के यहां आई थी. बेटी के बच्चों की देखभाल के लिए अनुष्का भी उस के साथ आ गई थी. इसलिए पिछले एक महीने से वह राम गोयल के घर पर ही रह रही थी.

वह एक नेपाली लड़की थी. नेपाली अपनी बहादुरी और ईमानदारी के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं. राम गोयल की भी अनुष्का के प्रति यही सोच थी. लेकिन कुछ ही समय में अनुष्का अपना असली रंग दिखा कर करोड़ों का माल साफ कर के भाग चुकी थी.

घटना की रात अनुष्का ने अपने हाथ से कढ़ी और खिचड़ी बना कर पूरे परिवार को खिलाई थी. खाने के बाद पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. जाहिर था, खाने में कोई नशीली चीज मिलाई गई थी, जिस के असर से घर में हलचल होने के बावजूद किसी सदस्य की आंख नहीं खुली.

इस बात की खबर मिलते ही थाना पचोर के टीआई डी.पी. लोहिया तुरंत पुलिस टीम के साथ राम गोयल के यहां पहुंचे तथा उन्होंने मौकामुआयना कर सारी घटना की जानकारी एसपी प्रदीप शर्मा को दी. कुछ ही देर में एसपी शर्मा भी मौके पर पहुंच गए.

घटनास्थल की जांच करने के बाद एसपी प्रदीप शर्मा ने आरोपियों को पकड़ने के लिए एडिशनल एसपी नवलसिंह सिसोदिया के निर्देशन में एक टीम गठित कर दी.

टीम में एसडीपीओ पदमसिंह बघेल, टीआई डी.पी. लोहिया, एसआई धर्मेंद्र शर्मा, शैलेंद्र सिंह, साइबर सैल टीम प्रभारी रामकुमार रघुवंशी, एसआई जितेंद्र अजनारे, आरक्षक मोइन खान, दिनेश किरार, शशांक यादव, रवि कुशवाह एवं आरक्षक राजकिशोर गुर्जर, राजवीर बघेल, दुबे अर्जुन राजपूत, अजय राजपूत, सुदामा, कैलाश और पल्लवी सोलंकी को शामिल किया गया.

इधर लौकडाउन के चलते पुलिस का एक काम आसान हो गया था. टीआई लोहिया जानते थे कि लौकडाउन के दिनों में ट्रेन, बस बंद हैं इसलिए लुटेरी नौकरानी अनुष्का ने पचोर से भागने के लिए किसी प्राइवेट वाहन का उपयोग किया होगा.

क्योंकि इतनी बड़ी चोरी एक अकेली लड़की नहीं कर सकती, इसलिए उस के कुछ साथी भी जरूर रहे होंगे. अनुष्का कुछ समय पहले ही दिल्ली से आई थी. टीआई लोहिया ने अनुष्का का मोबाइल नंबर हासिल कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. इस के अलावा उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि अनुष्का एक फोन नंबर पर लगातार बातें करती थी और ताज्जुब की बात यह थी कि वारदात वाले दिन उस फोन नंबर की लोकेशन पचोर टावर क्षेत्र में थी. जाहिर था कि वह मोबाइल वाला व्यक्ति अनुष्का का कोई साथी रहा होगा, जो उस के बुलाने पर ही घटना को अंजाम देने राजगढ़ आया होगा.

एसपी प्रदीप शर्मा के निर्देश पर टीआई लोहिया की टीम पचोर क्षेत्र में हर चौराहे, हर पौइंट, हर क्रौसिंग पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने में जुट गई. इसी कवायद में एक संदिग्ध कार पुलिस की नजर में आई, जिस का रजिस्ट्रेशन नंबर यूपी-14एफ-टी2355 था.

टीआई लोहिया समझ गए कि चोर शायद इसी गाड़ी में सवार हो कर पचोर आए और घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. इसलिए पुलिस की एक टीम ने पचोर से व्यावह हो कर गुना और ग्वालियर तक के रास्ते में पड़ने वाले टोल नाकों के कैमरे चैक कर उस गाड़ी के आनेजाने का रूट पता कर लिया.

जांच में पता चला कि उक्त नंबर की कार दिल्ली के उत्तम नगर के रहने वाले मनोज कालरा के नाम से रजिस्टर्ड थी, इसलिए तुरंत एक टीम दिल्ली भेजी गई. टीम ने मनोज कालरा को तलाश कर उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह किराए पर गाडि़यां देने का काम करता है. उक्त नंबर की कार उस ने एक नौकर पवन उर्फ पद्म नेपाली के माध्यम से 12 जुलाई को इंदौर के लिए बुक की थी.

जबकि इस कार के ड्राइवर से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि 13 जुलाई, 2020 को 3 युवक उसे शादी में जाने की बात बोल कर पचोर ले गए थे. दिल्ली पहुंची पुलिस टीम सारी जानकारी एसपी प्रदीप शर्मा से शेयर कर रही थी. इस से एसपी प्रदीप शर्मा समझ गए कि उन की टीम सही दिशा में आगे बढ़ रही है.

लेकिन वे जल्द से जल्द चोरों को पकड़ना चाहते थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि देर होने पर आरोपी माल सहित नेपाल भाग सकते हैं. ड्राइवर ने यह भी बताया कि वापसी में सभी लोगों को उस ने दिल्ली में बदरपुर बौर्डर पर बस स्टैंड के पास छोड़ा था.

अब पुलिस को जरूरत थी उन तीनों नेपाली लड़कों की पहचान कराने की, जो दिल्ली से गाड़ी ले कर पचोर आए थे.

इस के लिए पुलिस ने दिल्ली में रहने वाले सैकड़ों नेपाली परिवारों से संपर्क किया. शक के आधार पर 16 लोगों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. जिस में एक नया नाम सामने आया बिलाल अहमद का, जो लोगों को घरेलू नौकर उपलब्ध कराने के लिए एशियन मेड सर्विस की एजेंसी चलाता था.

बिलाल ने पुलिस को बताया कि अनुष्का उस के पास आई थी, उस की सिफारिश सरिता पति नवराज शर्मा ने की थी. जिसे उस ने दिल्ली में एक बच्ची की देखभाल के लिए नौकरी पर लगवा दिया था.

जांच के दौरान पुलिस टीम को पवन थापा के बारे में जानकारी मिली. पता चला कि पवन ही वह आदमी है जो उन तीनों लोगों को दिल्ली से पचोर ले कर आया था. पवन भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उस ने पूछताछ में बताया कि उत्तम नगर के सम्राट उर्फ वीरामान ने टैक्सी बुक की थी, जिस के लिए उसे15 हजार रुपए एडवांस भी दिए थे.

इस से पुलिस को पूरा शक हो गया कि इस मामले में सम्राट की खास भूमिका हो सकती है. दूसरी बात यह पुलिस समझ चुकी थी कि इस बड़ी चोरी के सभी आरोपी उत्तम नगर के आसपास के हो सकते हैं. इसलिए न केवल पुलिस सतर्क हो गई, बल्कि अन्य आरोपियों की रैकी भी करने लगी.

आरोपी लगातार अपना ठिकाना बदल रहे थे, इसलिए तकनीकी टीम के प्रभारी एसआई रामकुमार रघुवंशी और आरक्षक मोइन खान ने चाय व समोसे वाला बन कर उन की रैकी करनी शुरू कर दी, जिस से जल्द ही जानकारी हासिल कर सम्राट उर्फ वीरामान धामी को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में वीरामान पहले तो कुछ भी बताने की राजी नहीं था. लेकिन जब उस ने मुंह खोला तो चौंकाने वाला सच सामने आया.

वास्तव में वीरामान खुद वारदात करने के लिए पचोर जाने वाली टीम में शामिल था. अन्य 2 पुरुषों और महिला के बारे में पूछताछ की तो सम्राट ने बताया कि अनुष्का अपने प्रेमी तेज के साथ नई दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहती है.

पुलिस ने बदरपुर इलाके में छापेमारी कर के दोनों को वहां से गिरफ्तार कर उन के पास से चोरी का माल बरामद कर लिया. यहां तेज रोक्यो और अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल के साथ उन का तीसरा साथी भरतलाल थापा भी पुलिस गिरफ्त में आ गए.

मौके पर की गई पूछताछ के बाद दिल्ली गई पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस की मदद से मामले के मुख्य आरोपी वीरामान उर्फ सम्राट मूल निवासी धनगढ़ी, नेपाल, अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल निवासी जनकपुर, तेज रोक्यो मूल निवासी जिला अछम, नेपाल, भरतलाल थापा को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की थी.

इस के अलावा आरोपियों को पचोर तक कार बुक करने वाला पवन थापा निवासी उत्तम नगर नई दिल्ली, बेहोशी की दवा उपलब्ध कराने वाला कमल सिंह ठाकुर निवासी जिला बजरा नेपाल, चोरी के जेवरात खरीदने वाला मोहम्मद हुसैन निवासी जैन कालोनी उत्तम नगर, जेवरात को गलाने में सहायता करने वाला विक्रांत निवासी उत्तम नगर भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

अनुष्का को कंपनी में काम पर लगवाने वाली सरिता शर्मा निवासी किशनपुरा, नोएडा तथा अनुष्का को नौकरानी के काम पर लगाने वाला बिलाल अहमद उर्फ सोनू निवासी जामिया नगर, नई दिल्ली को गिरफ्तार कर के बरामद माल सहित पचोर लौट आई. जहां एसपी श्री शर्मा ने पत्रकार वार्ता में महज 7 दिनों के अंदर जिले में हुई चोरी की सब से बड़ी घटना का राज उजागर कर दिया.

अनुष्का ने बताया कि राम गोयल का पूरा परिवार उस पर विश्वास करता था. इसलिए परिवार के अन्य लोगों की तरह अनुष्का भी घर में हर जगह आतीजाती थी. एक दिन उस के सामने घर की तिजोरी खोली गई तो उस में रखी ज्वैलरी और नकदी देख कर उस की आंखें चौंधिया गईं और उस के मन में लालच आ गया. यह बात जब उस ने दिल्ली में बैठे अपने प्रेमी तेज रोक्यो को बताई तो उसी ने उसे तिजोरी पर हाथ साफ करने की सलाह दी.

योजना को अंजाम देने के लिए उस का प्रेमी तेज रोक्यो ही दिल्ली से बेहोशी की दवा ले कर पचोर आया था. वह दवा उस ने रात में खिचड़ी में मिला कर पूरे परिवार को खिला दी. जिस से खिचड़ी खाते ही पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. तब अनुष्का अलमारी में भरा सारा माल ले कर पे्रमी के संग चंपत हो गई. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक करोड़ 53 लाख रुपए का चोरी का सामान और नकदी बरामद कर ली.

पुलिस ने सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच टीआई डी.पी. लोहिया कर रहे थे.

थानागाजी की निर्भया : सहानुभूति या राजनीति?

लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी. राजस्थान में 2 चरणों में मतदान होना था. पहले चरण में13 सीटों के लिए 29 अप्रैल को वोट डाले जाने थे, जबकि दूसरे चरण में 12 सीटों के लिए 6 मई को मतदान होना था. पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार जोरों पर था. एक तरफ सूरज आग उगल रहा था और दूसरी तरफ सियासत की गरमी थी.

अलवर जिले में एक तहसील है थानागाजी. अलवरजयपुर स्टेट हाइवे पर विश्व प्रसिद्ध सरिस्का बाघ अभयारण्य थानागाजी तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर है.

बीती 26 अप्रैल की बात है, दोपहर के करीब 3 बजे थे. आसमान में कुछ बादल घिर आने से सूरज के तेवर कम हो गए थे. थानागाजी इलाके में एक नवदंपति मोटरसाइकिल पर तालवृक्ष की तरफ जा रहे थे. पति मोटरसाइकिल चला रहा था और पत्नी निर्भया उस के पीछे बैठी थी. निर्भया 19 साल की थी और उस का पति 20 साल का. दोनों की कुछ ही दिन पहले शादी हुई थी.

थानागाजी अलवर बाइपास पर दुहार चौगान वाले रास्ते से कुछ दूर अचानक 2 मोटरसाइकिलों पर सवार 5 युवक तेजी से उन के पास आए. इन युवकों ने नवदंपति की बाइक के आगे अपनी मोटरसाइकिलें लगा कर उन्हें रोक लिया. पतिपत्नी समझ ही नहीं पाए कि क्या बात हो गई, उन्हें क्यों रोका गया.

वे कुछ सवाल करते, इस से पहले ही पांचों युवक उन्हें धमकाते और अश्लील शब्द कहते हुए वहां से सड़क के एक तरफ कुछ दूर बने रेत के बड़ेबडे़ टीलों की तरफ ले गए. रेत के ये टीले इतने ऊंचेऊंचे थे कि उन के पीछे क्या हो रहा है, सड़क से गुजरते लोगों को पता नहीं लग सकता था. टीलों के पीछे से सड़क तक आवाज भी नहीं पहुंच सकती थी.

पतिपत्नी को रेत के टीलों के पीछे ले जा कर पांचों युवकों ने उन से मारपीट की. पति को अधमरा कर एक तरफ बैठा दिया गया. फिर पांचों युवकों ने 19 साल की उस निर्भया से दरिंदगी की. पति ने पत्नी को बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह दरिंदों का मुकाबला नहीं कर सका.

पांचों दरिंदे निर्भया को नोचते रहे. वह हाथ जोड़ कर छोड़ने की भीख मांगती रही, लेकिन दरिंदे अपने साथियों की मर्दानगी पर हंसते और अट्टहास लगाते रहे. निर्भया चीखती रही, लेकिन उस की आवाज उस जंगली इलाके के रेतीले टीबों में ही गूंज कर रह गई.

दरिंदों ने निर्भया के कपड़े फाड़ कर दूर फेंक दिए. इस दौरान वे हैवान अपने मोबाइल से दरिंदगी का वीडियो भी बनाते रहे. इस दौरान युवक आपस में छोटेलाल, जीतू और अशोक के नाम ले रहे थे. जब दरिंदों का मन भर गया तो उन्होंने निर्भया के पति का मोबाइल नंबर लिया. फिर उसे जान से मारने और वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर पांचों मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर भाग गए.

उन के जाने के काफी देर बाद तक लुटेपिटे पतिपत्नी एकदूसरे को ढांढस बंधाते हुए अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाते रहे. कुछ देर बाद जब उन के होशहवास ठीक हुए तो वे फटे कपड़े लपेट कर मोटरसाइकिल से अपने गांव गए.

गांव पहुंच कर उन्होंने घर वालों को इस घटना के बारे में बताया. निर्भया और उस का पति अनुसूचित जाति से होने के साथ गरीब भी थे. दरिंदगी का वीडियो वायरल करने, पति को मारने की धमकी दिए जाने के कारण निर्भया ने उस समय पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई. घटना के दूसरे दिन निर्भया अपने मायके चली गई और उस का पति जयपुर चला गया, जहां वह पढ़ रहा था.

तीसरे दिन 28 अप्रैल की सुबह निर्भया के पति के मोबाइल पर छोटेलाल का फोन आया. वह मिलने के लिए कह रहा था. निर्भया के पति ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘बेटा, मिलना तो तुझे पड़ेगा वरना वीडियो वायरल कर देंगे.’’

निर्भया के पति ने कहा कि तुम से मेरा भाई मिल लेगा. उस ने छोटेलाल को चचेरे भाई का मोबाइल नंबर दे दिया. इस के बाद पति ने यह बात अपने चचेरे भाई को बता दी. उस ने यह सच्चाई निर्भया के पति के सगे भाई को बता दी. छोटेलाल उसे कभी कराणा बुलाता तो कभी थानागाजी आने की बात कहता.

दोपहर में छोटेलाल का फिर फोन आया और उस ने 10 हजार रुपए की डिमांड की. निर्भया के पति ने कहा कि मैं पढ़ता हूं, 10 हजार कहां से दूंगा. इस पर उस ने कहा, ‘‘देने तो पड़ेंगे चाहे एक हजार रुपए कम दे देना.’’

वीडियो वायरल के डर से निर्भया के पति ने उसे कुछ हजार रुपए भिजवा भी दिए. पति के भाई ने यह बात पिता को बताई तो उन्होंने अपने बेटे को जयपुर से बुलवा लिया.

रुपए ऐंठने के बाद भी दरिंदों ने निर्भया के पति को काल कर के फिर पैसे मांगे तो निर्भया का परिवार अपने परिचितों के माध्यम से थानागाजी के विधायक कांती मीणा के पास पहुंचा. उन्होंने विधायक को सारी बात बताई. विधायक ने उन की रिपोर्ट दर्ज करवाने और आरोपियों के खिलाफ काररवाई कराने का आश्वासन दिया, लेकिन चुनाव के बाद.

30 अप्रैल को निर्भया और उस का पति अलवर जा कर एसपी राजीव पचार से मिले. निर्भया ने रोतेरोते एसपी को पति के सामने हुए सामूहिक दुष्कर्म की आपबीती बताई. एसपी ने थानागाजी के थानाप्रभारी सरदार सिंह को वाट्सऐप पर पीडि़ता की रिपोर्ट भेज कर मुकदमा दर्ज करने को कहा.

पुलिस को गैंगरेप भी मामूली सी घटना लगा

पुलिस ने इस शर्मनाक वारदात को भी साधारण तरीके से लिया. थानागाजी थानाप्रभारी ने 2 मई को दोपहर 2.31 बजे इस मामले में धारा 147, 149, 323, 341, 354बी, 376डी, 506 आईपीसी और एससी/एसटी ऐक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. रिपोर्ट में छोटेलाल गुर्जर निवासी कराणा बानसूर और जीतू व अशोक के नाम थे, जबकि 2 आरोपी अज्ञात थे.

भले ही पुलिस ने घटना के 7वें दिन मुकदमा दर्ज कर लिया, लेकिन मीडिया से इसे छिपा लिया. पुलिस ने मामले की जांच में भी लापरवाही बरती. उस दिन पीडि़ता का मैडिकल भी नहीं कराया गया. न ही अभियुक्तों को पकड़ने की कोई काररवाई की गई.

पुलिस को यह बात भी बता दी गई थी कि दरिंदे बारबार फोन कर के वीडियो वायरल करने की धमकी दे रहे हैं, लेकिन पुलिस ने न तो इसे गंभीरता से लिया और न ही इस के दूरगामी परिणामों के बारे में सोचा.

रिपोर्ट दर्ज होने के दूसरे दिन 3 मई को पुलिस ने अलवर में पीडि़ता का मैडिकल कराया. पुलिस ने उसी दिन पीडि़ता, उस के पति, पिता और ससुर के बयान दर्ज किए. उसी दिन पुलिस ने पीडि़ता को साथ ले जा कर मौका नक्शा बनाया.

लापरवाही इतनी रही कि एक आरोपी का नामपता और मोबाइल नंबर होने के बावजूद पुलिस ने उसे पकड़ना तो दूर, उसे थाने बुलाने की जहमत तक नहीं उठाई. इस से उन दरिंदों के हौसले बढ़ गए. इस बीच फोन पर बारबार धमकाने के बावजूद जब दोबारा पैसे नहीं मिले तो दरिंदों ने 4 मई को सोशल मीडिया पर वे वीडियो वायरल कर दिए, जो उन्होंने निर्भया से दरिंदगी करते हुए बनाए थे.

6 मई तक ये वीडियो असंख्य मोबाइलों तक पहुंच चुके थे. 6 मई को ही राजस्थान में अलवर सहित 12 लोकसभा सीटों के लिए मतदान था. मतदान के बाद पुलिस ने इस घटना को मीडिया में उजागर किया. तब तक सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो बम बन चुका था, जो किसी भी गैरतमंद आदमी को हिला देने के लिए काफी था.

7 मई को राजस्थान के मीडिया में थानागाजी गैंगरेप की सुर्खियों ने लोकसभा चुनाव की गरमी को भी ठंडा कर दिया. मीडिया ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए सवाल उठाए कि चुनाव के कारण इस घटना का खुलासा नहीं कर पुलिस क्या किसी को सियासी फायदा देना चाहती थी? या फिर समझौता कर इस मामले को रफादफा करना चाहती थी? पुलिस कहीं आरोपियों के पक्ष में तो नहीं थी? अगर ऐसा नहीं था तो वीडियो वायरल होने के बाद ही पुलिस ने यह घटना उजागर क्यों की?

वीडियो वायरल होने से यह घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई. इस के बाद सरकार और पुलिस अफसरों की नींद खुली. सरकार ने आननफानन में अलवर के एसपी आईपीएस अधिकारी राजीव पचार को हटा कर पदस्थापन की प्रतीक्षा में रख दिया. थानागाजी के थानाप्रभारी सरदार सिंह को निलंबित कर दिया गया. इसी थाने के एएसआई रूपनारायण, कांस्टेबल रामरतन, महेश कुमार और राजेंद्र को लाइन हाजिर कर दिया गया.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि पुलिस की ओर से अगर किसी भी स्तर पर लापरवाही हुई है तो सख्त काररवाई होगी. महिला सुरक्षा के प्रति सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी सामूहिक दुष्कर्म की इस घटना को बेहद शर्मनाक बताया.

डीजीपी कपिल गर्ग ने जयपुर में प्रैस कौन्फ्रैंस कर कहा कि थानागाजी थाने के सभी पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच की जाएगी. रिपोर्ट दर्ज होने के 5 दिन तक निष्क्रिय बैठी पुलिस ने आननफानन में अभियुक्तों को पकड़ने के लिए 14 टीमों का गठन कर दिया. अलवर से ले कर दिल्ली, गुड़गांव और बीकानेर तक पुलिस टीमें भेजी गईं.

पुलिस ने भागदौड़ कर एक 22 वर्षीय अभियुक्त इंदराज गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया. वह जयपुर जिले के प्रागपुरा का रहने वाला था. इस के अलावा वीडियो वायरल करने के आरोप में काली खोहरा निवासी मुकेश गुर्जर को सरिस्का के जंगल से पकड़ा गया.

गैंगरेप में भी राजनीति

सामूहिक दुष्कर्म की घटना सामने आने पर एक ओर जहां लोगों में गुस्सा था, वहीं राजनीति भी शुरू हो गई थी. थानागाजी कस्बे में सर्वसमाज की विशाल पंचायत हुई. इस में राज्यसभा सांसद डा. किरोड़ीलाल मीणा और थानागाजी विधायक कांती मीणा भी शामिल हुए.

पंचायत में फैसला लिया गया कि 24 घंटे में सभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर कस्बे के बाजार बंद कर आंदोलन किया जाएगा. डा. किरोड़ीलाल मीणा ने 8 मई को हजारों कार्यकर्ताओं के साथ जयपुर में मुख्यमंत्री कार्यालय का घेराव करने की भी चेतावनी दी. राजनीति में ऐसा ही होता है.

जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह ने तुरतफुरत पीडि़ता को 4 लाख 12 हजार 500 रुपए की आर्थिक सहायता राशि मंजूर कर दी. दरअसल एससी/एसटी की महिला से दुष्कर्म का मुकदमा होने पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की ओर से प्रथम किस्त के रूप में इतनी राशि देने का प्रावधान है.

8 मई को इस घटना के विरोध में अलवर से ले कर जयपुर तक धरनाप्रदर्शन होते रहे. थानागाजी में हजारों लोगों ने अलवरजयपुर सड़क मार्ग जाम कर दिया और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, मंत्री और अधिकारी पीडि़ता से मिलने के लिए थानागाजी से 7 किलोमीटर दूर उस के गांव पहुंच गए.

लोगों ने कहा कि पुलिस प्रशासन के साथ नेता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. हम ने घटना की जानकारी देने के लिए कई नेताओं को फोन किए लेकिन किसी ने मदद नहीं की.

पीडि़त परिवार ने राजस्थान सरकार के श्रम राज्यमंत्री और अलवर ग्रामीण के विधायक टीकाराम जूली को 30 अप्रैल को फोन किया तो उन्होंने कहा कि अभी चुनाव में व्यस्त हैं. बाद में जूली ने माना कि फोन आया था, लेकिन यह नहीं पता था कि मामला इतना गंभीर है.

जयपुर में राज्यसभा सांसद डा. किराड़ीलाल मीणा एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री आवास के पास सिविललाइन फाटक पर प्रदर्शन किया. इस दौरान प्रदर्शनकारी और पुलिस आपस में गुत्थमगुत्था हो गए. आधे घंटे तक हंगामा होता रहा.

बाद में प्रदर्शनकारियों ने राजभवन जा कर राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया. राजस्थान यूनिवर्सिटी में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के पुतले के साथ प्रदर्शन किया. अलवर में विभिन्न संगठनों के अलावा महिलाओं ने भी जुलूस निकाले और अधिकारियों को ज्ञापन दिए.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में प्रसंज्ञान ले कर राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया. साथ ही मुख्य सचिव और महानिदेशक से 6 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी.

इस मामले में उस समय नया मोड़ आ गया, जब पीडि़ता के पति ने राज्य के पूर्वमंत्री और थानागाजी के पूर्व विधायक हेमसिंह भड़ाना पर समझौते का दबाव बनाने का आरोप लगाया. हालांकि भड़ाना ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता कर सिरे से नकार दिया.

पुलिस ने 8 मई की रात तक 3 अन्य आरोपियों अशोक गुर्जर, महेश गुर्जर और हंसराज गुर्जर को भी गिरफ्तार कर लिया. मुख्य आरोपी छोटेलाल गुर्जर अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगा था.

9 मई को भी अलवर और जयपुर सहित पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन होता रहा. इस के बावजूद सरकार की लापरवाही रही कि वायरल वीडियो ब्लौक करने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश तक नहीं दिए. यह वीडियो गूगल, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया पर 9 मई तक पीडि़तों की इज्जत तारतार करता रहा. भाजपा ने अलवर में धरना दे कर मामले की जांच सीबीआई से कराने, पीडि़ता को 50 लाख रुपए मुआवजा देने, एसपी व थानाप्रभारी पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की.

महिला आयोग भी आया आगे

राष्ट्रीय महिला आयोग के दल ने थानागाजी पहुंच कर पीडि़ता से मुलाकात की. आयोग की सदस्य डा. राहुल बेन देसाई और नेहा महाजन ने इस दौरान मौजूद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विजिलेंस गोविंद गुप्ता और आईजी एस. सेंगाथिर को सोशल मीडिया पर वीडियो फोटो अपलोड करने वालों पर तुरंत एक्शन लेने के निर्देश दिए. देश भर से विभिन्न जनसंगठनों के पदाधिकारी भी थानागाजी पहुंचे और पीडि़त परिवार से मिले.

पुलिस ने घटना के 13 दिन बाद मुख्य आरोपी छोटेलाल गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया. उसे सीकर जिले के अजीतगढ़ से पकड़ा गया, जहां वह एक ट्रक में छिपा हुआ था. छोटेलाल इस ट्रक में सवार हो कर गुजरात भागने की फिराक में था. छोटे शराब की दुकान पर सेल्समैन का काम करता था. बानसूर के रतनपुरा गांव निवासी छोटेलाल के खिलाफ 2 आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं.

दूसरी ओर, पुलिस ने अलवर की अदालत में पीडि़ता के धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराए. वहीं, राज्य सरकार ने मामले की प्रशासनिक जांच के लिए जयपुर के संभागीय आयुक्त को नियुक्त किया. इस के अलावा चुनाव आचार संहिता लगी होने के कारण निर्वाचन आयोग से अनुमति मिलने के बाद आईपीएस औफिसर देशमुख पारिस अनिल को अलवर का एसपी नियुक्त किया गया.

पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाने पर 10 मई को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष एल. मुरुगन इस घटना की जांच करने थानागाजी पहुंचे. वे पीडि़ता और उस के परिवार से भी मिले. इस दौरान राजस्थान के मुख्य सचिव डी.बी. गुप्ता और पुलिस महानिदेशक कपिल गर्ग मौजूद रहे.

आयोग के उपाध्यक्ष ने पीडि़ता से मुलाकात के बाद कहा कि 30 अप्रैल को एसपी को परिवाद देने के बाद भी पुलिस ने 2 मई को मुकदमा दर्ज किया और 7 मई को ऐक्शन में आई, यह साफतौर पर सरकार की लापरवाही है. हम राज्य सरकार की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं.

फिलहाल प्रशासन को पीडि़ता के परिवार की नौकरी की मांग और सरकारी सहायता देने के लिए कहा गया है. इस के अलावा केस दर्ज करने में लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और और पीडि़त परिवार की स्थाई सुरक्षा की व्यवस्था करने को भी कहा गया है.

मुरुगन ने कहा कि आयोग के निर्देश पर यूट्यूब से घटना के वीडियो हटवाए गए हैं. पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए हर जरूरी कदम उठा रहे हैं.

जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उच्चस्तरीय बैठक कर ऐसे मामलों में कड़े कदम उठाने का फैसला किया. उन्होंने कहा कि अगर कोई थानेदार थाने में एफआईआर दर्ज नहीं करेगा तो एसपी को दर्ज करनी होगी. ऐसे थानेदार के खिलाफ सख्त काररवाई होगी. महिला अत्याचार की घटनाओं की मौनिटरिंग के लिए हर जिले में महिला सुरक्षा डीएसपी का नया पद सृजित किया जाएगा.

यह सिर्फ महिलाओं के अपहरण, दुष्कर्म, गैंगरेप आदि मामलों की जांच करेगा. यह डीएसपी महिला थानों की मौनिटरिंग के साथ सामाजिक न्याय व महिला बाल विकास विभाग से समन्वय स्थापित करेगा और महिलाओं व बच्चों पर होने वाले अत्याचार के मामलों में काररवाई करेगा. गहलोत ने कहा कि थानागाजी के मामले को केस औफिसर स्कीम में ले कर आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी.

11 मई को थानागाजी गैंगरेप मामले में देश की सियासत गरमा गई. लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजस्थान सरकार को सीधे निशाने पर लिया.

पीडि़त से हमदर्दी सिर्फ नाम की

मायावती ने लखनऊ में आयोजित चुनावी रैली में इसे अतिघृणित घटना बताते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस सरकार के चलते उस दलित महिला को इंसाफ मिलेगा.

पुलिस ने इस मामले में अलवर जेल में न्यायिक अभिरक्षा भुगत रहे 3 आरोपियों हंसराज गुर्जर, महेश गुर्जर व इंदरराज गुर्जर की शिनाख्त परेड कराई. इस के बाद इन्हें 13 मई तक रिमांड पर लिया गया. 3 आरोपी पहले ही 13 मई तक रिमांड पर थे. बाद में अदालत से सभी 6 आरोपियों की रिमांड अवधि 16 मई तक बढ़वा ली गई.

14 मई को इस मामले में जयपुर कूच करने निकले सांसद डा. किरोड़ीलाल और उन के समर्थकों ने दौसा में जयपुरदिल्ली रेलवे ट्रैक जाम करने का प्रयास किया. पुलिस ने खदेड़ा तो किरोड़ी समर्थकों ने पथराव किया. पथराव के कारण कई ट्रेनें बीच रास्ते में रोक दी गईं. काफी देर तक लाठीभाटा जंग होती रही.

इस जंग में 5 पुलिसकर्मियों सहित 8 लोग घायल हो गए. एसपी व एडीएम सहित कई अधिकारियों को भी चोटें आईं. बाद में पुलिस ने किरोड़ी के साथ पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़, विधायक हनुमान बेनीवाल व गोपीचंद को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.

दूसरी ओर, पीडि़ता के पिता ने कहा कि उन का परिवार इस घटना के बाद लोगों के आनेजाने और इस से हुई बदनामी से परेशान है. उन्होंने सरकार से मांग की कि पीडि़त दंपति को सरकारी नौकरी दे कर किसी ऐसी जगह भेज दिया जाए, जहां उन्हें कोई न पहचान सके. 7 दिन में इतने नेता और लोग घर पहुंचे कि पूरे देश और समाज को पता चल गया कि वीडियो में दिखे पतिपत्नी का मकान यह है.

15 मई को भी अलवर व जयपुर सहित प्रदेश के कई हिस्सों में आंदोलन होते रहे. थानागाजी में सर्वसमाज ने आक्रोश रैली निकाली. इस दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का थानागाजी आने का कार्यक्रम था लेकिन मौसम खराब होने से उन का हेलीकौप्टर दिल्ली से उड़ान नहीं भर सका.

16 मई को राहुल गांधी थानागाजी क्षेत्र में पीडि़ता से मिलने उस के घर पहुंचे. राहुल ने पीडि़ता, उस के पति और उस के परिवार के लोगों से करीब 15 मिनट तक अकेले में बात कर घटना की जानकारी ली. घटना के बारे में बताते हुए पीडि़ता व उस का पति रो पड़े तो राहुल भी भावुक हो गए.

राजनीति के लिए नेताओं के घडि़याली आंसू

राहुल ने पीडि़ता के पति को गले लगाया अैर कहा कि यह राजनीति नहीं है, आप को न्याय जरूर मिलेगा. परिवार ने पीडि़ता व उस के पति के पुनर्वास, सरकारी नौकरी व आरोपियों को कठोर सजा दिलाने की मांग रखी.

इस दौरान मौजूद मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि पीडि़ता के लिए सरकारी नौकरी का इंतजाम किया जाएगा. अलवर जिले में अपराध के आंकड़ों को देखते हुए 2 एसपी लगाए जाएंगे. इस केस में 7 दिनों में चालान पेश कर दिया जाएगा.

पुलिस ने सभी आरोपियों को रिमांड अवधि पूरी होने पर अलवर की अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस ने अदालत में अर्जी पेश कर पीडि़ता के पति को मोबाइल पर धमकी दे कर 10 हजार रुपए मांगने के आरोपी छोटेलाल की आवाज के नमूने लेने की अनुमति मांगी.

17 मई को इस मामले की प्रशासनिक जांच कर रहे जयपुर के संभागीय आयुक्त के.सी. वर्मा ने अलवर में जनसुनवाई कर घटना से संबंधित तथ्य जुटाए. दूसरी ओर राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने राजस्थान में बढ़ रहे यौन अपराधों के मामले में स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लेते हुए पुलिस महानिदेशक और सरकार से जवाब तलब किया है.

यह विडंबना ही है कि चुनाव के दौरान थानागाजी का यह मामला पूरे देश में चर्चा में आ गया. इस से राजनीति में भी उबाल आया. सभी प्रमुख दलों के नेता बयानबाजी करते रहे. कुछ लोग राजनीतिक रोटियां भी सेकते रहे. जबकि जरूरत थी पीडि़ता का दर्द कम करने की. इस के लिए जरूरी था कि राजनीति बंद होती.

पीडि़ता का पुनर्वास होना जरूरी है. सरकारी नौकरी से उसे कुछ सहारा मिलेगा तो शायद वह अपने कामकाज में व्यस्त हो कर दिल दहलाने वाली इस घटना को भुलाने की कोशिश कर सके. साथ ही ऐसे दरिंदों को कठोर सजा मिलनी चाहिए, ताकि ऐसी मानसिकता के लोगों को सबक मिल सके.

थानागाजी गैंगरेप मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने के 16 दिन बाद 18 मई को अलवर की अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी. 500 पेज की चार्जशीट में 6 आरोपी हैं. इनमें 5 मुलजिमों के खिलाफ गैंगरेप, अपहरण, रास्ता रोकने, मारपीट, निर्वस्त्र करने, जातिसूचक शब्द बोलने, मानसम्मान को ठेस पहुंचाने, डकैती व धमकी देने सहित प्रताडि़त करने और एक अभियुक्त पर वीडियो वायरल करने का आरोप है.

पुलिस ने मामले की त्वरित सुनवाई के लिए केस औफिसर नियुक्त किया है. अदालत में दिनप्रतिदिन सुनवाई के लिए अरजी दी गई है, ताकि आरोपियों को जल्द सजा मिल सके. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ जिन धाराओं में चालान पेश किया है, उन में आरोप साबित होने पर इन दरिंदों को मरते दम तक उम्रकैद की सजा हो सकती है.

मामले का वीडियो फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करने पर पुलिस ने यूट्यूब पर बने एक चैनल टौप न्यूज 24 के खिलाफ अलवर शहर कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया है. यह मुकदमा कोतवाली थानाप्रभारी कन्हैयालाल ने खुद दर्ज कराया है.

दूसरी ओर, सरकार ने पीडि़ता को सरकारी नौकरी देने की तैयारी शुरू कर दी है. सरकार ने उसे राजस्थान पुलिस या जेल पुलिस में से कोई एक कांस्टेबल पद चुनने का विकल्प दिया है. इस में पीडि़ता ने राजस्थान के जयपुर सिटी में पोस्टिंग मांगी.

—पीडि़ता का निर्भया नाम काल्पनिक है

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड

श्रेयांश-प्रियांश हत्याकांड : मासूमियत बनी मौत – भाग 3

सौदा तय हो जाने के बाद ब्रजेश रावत को उम्मीद थी कि आरोपी बच्चों को छोड़ देंगे. इधर चित्रकूट सतना और बांदा सहित पूरे मध्य प्रदेश में लोग सड़कों पर आ कर पुलिसिया लापरवाही के खिलाफ धरने प्रदर्शन दे रहे थे, जिस से कुछ और हुआ न हुआ हो लेकिन इन छहों पर बाहरी दबाव बनने लगा था.

20 लाख रुपए देने से ब्रजेश रावत को इकलौता सुकून इस बात का मिला था कि आरोपियों ने 19 फरवरी को उन से फोन पर बच्चों की बात करा दी थी. बेटों की आवाज सुन कर उन्हें आस बंधी थी कि वे सलामत हैं और आरोपी अगर वादे पर खरे उतरे तो बेटे जल्द घर होंगे और उन की किलकारियों से घर फिर गूंजेगा.

आरोपियों ने बच्चों के साथ कोई खास बुरा बर्ताव नहीं किया था लेकिन उन्हें सुलाने के लिए जरूर नींद की गोलियां खिलाई थीं. बच्चों को व्यस्त रखने के लिए वे उन्हें मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने देते थे. अब तक सब कुछ उन की योजना के मुताबिक हो रहा था और इन्होंने फिरौती में मिले 20 लाख रुपयों का बंटवारा भी कर लिया था, जिस का सब से बड़ा हिस्सा पदम शुक्ला को मिला था. एक आरोपी ने तो पैसे मिलते ही बाइक लेने का अपना सपना भी पूरा कर लिया था.

पुलिस अभी भी हवा में हाथपैर मार रही थी. इस मामले की एक हैरत वाली बात यह थी कि ब्रजेश शुक्ला का सेल फोन सर्विलांस पर रखा था लेकिन आरोपियों की पहचान उन के पास आ रहे फोन काल्स से नहीं हो पा रही थी. फिरौती के पैसे भी ब्रजेश रावत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के जरिए दिए थे, जिस की भनक मध्य प्रदेश पुलिस को नहीं लगी थी.

नवगठित इस गैंग के सदस्य कितने शातिर थे इस का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि रामकेश पहले की तरह ही रावत परिवार के दूसरे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए जाता रहा था.

इसी बहाने वह घर के सदस्यों से प्रियांश और श्रेयांश के बारे में पूछ कर ताजा अपडेट हासिल कर लेता था और साथियों को बता देता था. उस की हकीकत से बेखबर रावत परिवार उस की खातिरदारी पहले की तरह करता रहा था.

होहल्ले के चलते इन छहों को अब पकड़े जाने का डर सताने लगा था और ब्रजेश रावत की जेब से और पैसा निकालने की उम्मीदें भी खत्म हो चली थीं. इसलिए इन्होंने शायद बच्चों को छोड़ने का फैसला कर लिया था.

जब फैसला हो गया तो बच्चों को छोड़ने का मन बना चुके आरोपियों को यह खटका लगा कि कहीं ऐसा न हो कि बच्चे जा कर उन की पहचान उजागर कर दें. इन लोगों ने अब तक जिस जुर्म को छिपा रखा था, बच्चों के छोड़ने पर वह खुल सकता था. इसलिए दोनों के कत्ल का इरादा बन गया.

लेकिन इस से पहले मन में आ गए डर को दूर करने की गरज से इन लोगों ने श्रेयांश और प्रियांश से पूछा कि छूट कर वे पुलिस को उन की पहचान यानी नाम वगैरह तो नहीं बता देंगे.

मासूमियत की यह इंतहा ही थी कि दोनों बच्चों ने ईमानदारी से जवाब दे दिया कि वे उन्हें  पहचान लेंगे. यह जवाब सुनना था कि हथकडि़यां इन की आंखों के आगे झूलती नजर आने लगीं. जिस से अब तक के किए धरे पर तो पानी फिरता ही साथ ही हाथ आए 20 लाख रुपयों का लुत्फ भी जाता रहता.

अपना जुर्म छिपाने के लिए इन्होंने दोनों मासूमों के हाथपैर जंजीर से बांधे, फिर उन्हें क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश किया. इस के बाद पत्थर बांध कर उन्हें यमुना नदी के उगासी घाट पर पानी में फेंक दिया. यह 21 फरवरी की बात है.

साथ पैदा हुए साथ पले बढ़े और पढ़ेलिखे जुड़वां श्रेयांश और प्रियांश की लाशें भी साथसाथ 3 दिन पानी में तैरती रहीं और वे मरे भी साथ में. दोनों के शरीर पर वही स्कूल यूनिफार्म थी जो उन्होंने 12 फरवरी को स्कूल जाते वक्त पहनी थी.

लाशें बरामद हुईं तो इन मासूमों की हत्या को ले कर ऐसा बवाल मचा कि पूरा बुंदेलखंड इलाका त्राहित्राहि कर उठा. राजनेताओं ने भी चित्रकूट में बहती मंदाकिनी नदी में खूब हाथ धोए. भाजपाई और कांग्रेसी बच्चों की मौतों पर अफसोस जताते एकदूसरे को कोसते रहे.

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पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को निशाने पर रखा तो कांग्रेसी भी यह कहने से नहीं चूके कि यह सब भाजपाइयों का कियाधरा है.

राजनीतिक बवंडर से परे यह हुआ था कि आईटी से इंजीनियरिंग कर रहे 2 आरोपी बेहतर समझ रहे थे कि अगर वे अपने सेल फोन से ब्रजेश रावत से बात करेंगे तो फौरन धर लिए जाएंगे, इसलिए वे फोन काल के लिए या तो इंटरनेट का सहारा ले रहे थे या फिर बहाने बना कर राहगीरों का फोन इस्तेमाल कर रहे थे जिस से पता नहीं चल रहा था कि अपराधी हैं कौन और कहां से फोन कर रहे हैं.

कहावत पुरानी लेकिन सटीक है कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों हो कोई न कोई भूल कर ही देता है ऐसा ही इस मामले में हुआ.

एक राहगीर से फोन मांग कर उन्होंने ब्रजेश रावत को फोन किया था तो उस राहगीर को बातचीत का मसौदा सुन इन पर शक हुआ था. हर किसी की तरह उसे भी श्रेयांश और प्रियांश के अपहरण के बारे में मालूम था.

ये लोग जिस का भी फोन लेते थे उसे यह कहना नहीं भूलते थे कि जिस नंबर पर फोन किया है उसे डिलीट कर देना. लेकिन इस समझदार और भले आदमी ने ऐसा नहीं किया और चुपचाप बिना इन की जानकारी के उन की बाइक का फोटो भी खींच लिया.

तब पुलिस ने इस राहगीर के नंबर पर फोन किया तो उस ने बाइक के फोटो पुलिस को दे दिए. इस बाइक के नंबर की बिना पर छानबीन की गई तो वह रोहित द्विवेदी की निकली. पुलिस ने उस की गरदन दबोच कर सख्ती की तो उस ने श्रेयांश और प्रियांश की हत्या का राज खोल दिया और पुलिस ने एक के बाद एक छहों हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया.

हत्यारों की गिरफ्तारी की खबर भी आग की तरह फैली और लोगों ने चित्रकूट में बेकाबू हो कर सदगुरु ट्रस्ट पर पत्थर फेंके, वाहन जलाए, तोड़फोड़ की. इस के बाद पूरे मध्य प्रदेश में इन मासूमों को श्रद्धांजलियां दी गईं और हर किसी ने इन हैवानों के लिए मौत की सजा की मांग की.

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श्रेयांश और प्रियांश के शवों का पोस्टमार्टम बांदा में किया गया, जिस के बाद दोनों के शव रावत परिवार को सौंप दिए गए.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कई बातें स्पष्ट नहीं हुई थीं, जिन के कोई खास माने भी नहीं वजह आरोपी अपना जुर्म स्वीकार चुके हैं. पिस्टल, बाइक, 17 लाख रुपए के अलावा वह बोलेरो कार भी बरामद की जा चुकी है. जिस में इन दोनों को चित्रकूट से बाहर ले जाया गया था.

चूंकि इस पर भी भाजपा का झंडा लहरा रहा था इसलिए पुलिस वालों ने उसे नहीं रोका. ब्रजेश रावत लगातार शक जताते रहे कि पकड़े गए लड़के तो मोहरे थे असल अपराधी और कोई है इसलिए मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए. छानबीन में यह बात भी सामने आई थी कि आरोपियों के संबंध उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता राजा भैया से थे. सीबीआई जांच होगी या नहीं यह तो नहीं पता, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने जरूर एक जांच कमेटी गठित कर दी है जो कई बिंदुओं पर जांच कर रही है.

मुमकिन है कुछ हैरान कर देने वाली बातें सामने आएं, लेकिन यह सच है कि चित्रकूट में लाखों की भीड़ जमा रहती है, इसलिए यहां अपराधों की दर बढ़ रही है. सच यह भी है कि निकम्मे और गुंडे किस्म के युवकों ने शार्टकट से पैसा कमाने के लिए एक हंसतेखेलते घर के जुड़वां चिराग बुझा दिए, जिस की भरपाई कोई जांच पूरी नहीं कर सकती.

श्रेयांश-प्रियांश हत्याकांड : मासूमियत बनी मौत – भाग 2

श्रेयांश और प्रियांश कहां और किस हाल में हैं इस का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा था. सदमे में डूबे रावत परिवार के सदस्य बच्चों की खैरियत को लेकर चिंतित थे. हर किसी का रोरो कर बुरा हाल था खासतौर से ब्रजेश रावत की पत्नी बबीता रावत का जो बच्चों की जुदाई के गम में होश खो बैठी थी.

पुलिस भागादौड़ी करती रही, दावे करती रही लेकिन 20 लाख रुपए देने के बाद भी बच्चे वापस नहीं लौटे तो रावत परिवार किसी अनहोनी की आशंका से कांपने लगा.

आशंका गलत नहीं निकली. 24 फरवरी को पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के बबेरू के पास यमुना नदी से प्रियांश और श्रेयांश की लाशें बरामद कीं. इन दोनों मासूमों के शव जंजीर से बंधे हुए थे.

आस और उम्मीदें तो पहले ही टूट चुकी थीं, जिन पर मोहर लगने के बाद 12 फरवरी से ज्यादा हाहाकार मचा. अब हर कोई यह जानने को बेताब था कि अपहरणकर्ता कौन थे, कैसे पकड़े गए और इन्होंने कैसे हैवानियत दिखाते हुए फिरौती की रकम लेने के बाद भी मासूमों पर कोई रहम नहीं किया. प्रदेश भर में पुलिसिया प्रणाली के खिलाफ फिर जम कर हल्ला मचा, धरनेप्रदर्शन हुए और उम्मीद के मुताबिक फिर सियासत गरमाई.

पूरे घटनाक्रम में सुकून देने वाली इकलौती बात यह थी कि हत्यारे पकड़े गए थे, जिन की तादाद 6 थी. हत्यारों को पकड़ने में पुलिस की भूमिका कोई खास नहीं थी, क्योंकि वे इत्तफाकन धरे गए थे. 24 फरवरी को फिर एक बार सनसनी मची और इतनी मची कि पुलिस वालों और सरकार को जवाब देना मुश्किल हो गया.

श्रेयांश और प्रियांश के शव इस दिन उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में यमुना नदी के बबेरू घाट पर मिले थे. दोनों शव के हाथ पैर बंधे हुए थे.

हैवानों ने इन मासूमों की कैसे जान ली होगी, इस के पहले यह जानना जरूरी है कि हत्यारे थे कौन और इतने शातिराना ढंग से उन्होंने कैसे इस वारदात को अंजाम दिया था. जब एक एक कर 6 हत्यारे पकड़े गए तो दिल को दहला देने वाली कहानी कुछ इस तरह सामने आई, जिस ने साबित भी कर दिया कि लोग बेवजह पुलिस को नहीं कोस रहे थे.

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इस वारदात का मास्टरमाइंड पदम शुक्ला निकला, जिस के पिता रामकरण शुक्ला, पुरोहित और सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट में संस्कृत के प्राचार्य हैं. पदम शुक्ला का छोटा भाई विष्णुकांत शुक्ला भाजपा और बजरंग दल से जुड़ा है. जानकीकुंड में रहने वाला शुक्ला परिवार भी चित्रकूट में किसी पहचान का मोहताज नहीं है, लेकिन इस की वजह इन के कुकर्म ज्यादा हैं.

अपहरण और हत्या का दूसरा अहम किरदार रामकेश यादव है जो मूलरूप से बिहार का रहने वाला है और पढ़ाई पूरी करने के बाद चित्रकूट में किराए का मकान ले कर रहता था. रामकेश रावत परिवार के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाता था.

उस का रावत परिवार में वही मान सम्मान था जो आमतौर पर ट्यूटर्स का होता है, रामकेश के दिल में अपराध का बीज यहीं से अंकुरित हुआ और इस से पेड़ बना पदम शुक्ला के दिमाग में.

इसमें कोई शक नहीं कि ब्रजेश रावत के पास पैसों की कमी नहीं थी, जिस का गुरुर उन्हें कभी नहीं रहा. संभ्रांत और संस्कारित रावत परिवार का वैभव रामकेश ने देखा तो इस रामनगरी में एक और रावण आकार लेने लगा.

पैसों की तंगी तो रामकेश को भी नहीं थी लेकिन रावत परिवार की दौलत देख उसके दिल में खयाल आया था कि अगर श्रेयांश और प्रियांश को अगुवा कर लिया जाए तो फिरौती में इतनी रकम तो मिल ही जाएगी कि फिर जिंदगी ऐशोआराम से कटेगी.

पाप का पौधा कितनी जल्दी वृक्ष बन जाता है, यह इस हत्याकांड से भी उजागर होता है. रामकेश ने जब यह आइडिया पदम से साझा किया तो उस की बांछें खिल उठीं. फिर क्या था देखते ही देखते योजना बन गई और उस का पूर्वाभ्यास भी होने लगा. अपनी नापाक मुहिम को सहूलियत से पूरा करने के लिए इन दोनों ने अपने जैसे 4 और राक्षसों को साथ मिला लिया.

रातों रात मालामाल हो जाने के लालच के चलते इस नवगठित गिरोह में बहलपुर का रहने वाला विक्रमजीत, हमीरपुर का अपूर्व उर्फ पिंटू उर्फ पिंटा यादव, बांदा का लक्की सिंह तोमर और राजू द्विवेदी भी शामिल हो गए.

22 से 24 साल की उम्र के ये सभी अपराधी अभी पढ़ रहे थे. पदम आईटी सब्जेक्ट से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. लकी तोमर उस का सहपाठी था. राजू द्विवेदी एग्रीकल्चर फैकल्टी के एग्रोनामी विषय से एमएससी कर रहा था और पिंटू यादव उस का सहपाठी था. ये पांचों ग्रामोदय विश्वविद्यालय के छात्र थे.

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जब गिरोह बन गया तो इन शातिरों ने अपहरण की योजना बनाई. इस बाबत इन के बीच दरजनों मीटिंगें हुईं जिन में संभावित खतरों पर विचार कर उन से बचने के उपाय खोजे गए. पदम का घर घटनास्थल से पैदल दूरी पर है, वह उस इलाके के चप्पेचप्पे से वाकिफ था.

12 फरवरी को श्रेयांश और प्रियांश का अपहरण करने के बाद ये लोग कहीं ज्यादा दूर नहीं भागे थे, जैसा कि हर कोई अंदाजा लगा रहा था. बबुली कौल गिरोह का नाम भी इन्होंने जानबूझ कर अपहरण के वक्त लिया था जिस के चलते पुलिस ने मान लिया था कि हो न हो इस कांड में इसी गिरोह का हाथ है.

श्रेयांश और प्रियांश को इन्होंने 3 दिन चित्रकूट के ही एक मकान में रखा जो लक्की सिंह से किराए पर लिया गया था. आमतौर पर ऐसे हादसों में होता यह है कि अपराधी घटनास्थल से दूर जा कर फिरौती मांगते हैं, जिस से किसी की भी, खासतौर से पुलिस की निगाह में न आएं. जिस मकान में दोनों मासूमों को रखा गया था वह एसपीएस के नजदीक ही है. इस चालाकी की तरफ पुलिस का ध्यान ही नहीं गया.

जिस बाइक से अपहरण किया गया था उस पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी, बल्कि नंबर प्लेट पर रामराज्य लिखा हुआ था. बाइक पर भाजपा का झंडा लगा होने के कारण पुलिस वाले उसे रोकने की हिमाकत नहीं कर पाए थे.

चूंकि पदम का भाई बजरंग दल का संयोजक था, इसलिए पुलिस वालों ने रामराज्य को ही बाइक का नंबर मान लिया था. चित्रकूट और बांदा का हर एक पुलिसकर्मी पदम के भाई विष्णुकांत और उस की बाइक तक को पहचानता है, जिस के छोटे बड़े भाजपा नेताओं से अच्छे संबंध हैं. कई बड़े नेताओं के साथ खिंचाए फोटो उस ने फेसबुक पर श्ेयर भी कर रखे हैं.

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वारदात के तीसरे दिन ही इन्होंने ब्रजेश रावत से फिरौती के 2 करोड़ रुपए मांगे थे लेकिन सौदा 20 लाख रुपए में पट गया था जो ब्रजेश रावत ने इन्हें दे भी दिए थे. जब चित्रकूट में बच्चों को रखना इन्हें जोखिम का काम लगने लगा तो उन्हें वे रोहित द्विवेदी गांव बबेरू ले गए. उस ने ही श्रेयांस और प्रियांश के यहां रहने का इंतजाम किया था. रोहित का पिता ब्रह्मदत्त द्विवेदी सिक्योरिटी गार्ड है.

श्रेयांश-प्रियांश हत्याकांड : मासूमियत बनी मौत – भाग 1

प्रसिद्ध धार्मिक नगरी चित्रकूट (Chitrakoot) का एसपीएस यानी सदगुरु पब्लिक स्कूल (Sadguru Public Schook) अपने आप में एक ब्रांड है. अंग्रेजी माध्यम के इस स्कूल में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों के बच्चे पढ़ते हैं, चित्रकूट (मध्य प्रदेश) से महज 6 किलोमीटर दूर स्थित है, (Karwi) कर्बी जिले (उत्तर प्रदेश) के सैकड़ों बच्चे यहां रोजाना पढ़ने के लिए बस से आते हैं.

इन्हीं सैकड़ों बच्चों में से श्रेयांश रावत (Shreyansh Rawat) और प्रियांश रावत (Priyansh Rawat) की पहचान कुछ अलग हट कर थी. क्योंकि ये दोनों जुड़वां भाई (Twins Brother) भी थे और हमशक्ल भी. दोनों को पहचानने में कोई भी धोखा खा जाता था. 5-5 साल के ये मासूम अभी एलकेजी में पढ़ रहे थे.

जुड़वां होने के अलावा एक और दिलचस्प बात यह भी थी कि रावत परिवार के ये दोनों ही नहीं बल्कि 11 बच्चे एसपीएस में पढ़ रहे थे. इन में से 2 श्रेयांश और प्रियांश (Shreyansh and Priyansh) के सगे बड़े भाई देवांश और शिवांश भी थे.

इन चारों भाइयों के पिता ब्रजेश रावत (Brajesh Rawat) चित्रकूट के जाने माने तेल व्यापारी हैं. आयुर्वेदिक तेलों का कारोबार करने वाले ब्रजेश रावत ईमानदार, कर्मठ और मिलनसार व्यक्ति हैं. तेल के अपने पुश्तैनी कारोबार को उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. इसी वजह से कर्बी से ले कर चित्रकूट तक उन की अपनी एक अलग पहचान है.

अपने कारोबार में मशगूल रहने वाले ब्रजेश रावत हर लिहाज से सुखी और संपन्न कहे जा सकते हैं. कर्बी के रामघाट में उन का बड़ा मकान है, जिस में पूरा रावत परिवार संयुक्त रूप से रहता है. उन के घर में हर वक्तचहलपहल रहती है जिस की बड़ी वजह वे 11 बच्चे भी हैं जो एसपीएस में पढ़ते थे.

ईश्वर में अपार श्रद्धा रखने वाले ब्रजेश रावत ने कभी सपने में भी उम्मीद नहीं की होगी कि कभी उन के साथ भी ऐसी कोई अनहोनी होगी जो जिंदगी भर उन्हें सालती रहेगी और जिन श्रेयांश और प्रियांश की मासूम किलकारियां और शरारतों से उन का घर आबाद रहता है, उन की यादें उम्र भर उन्हें काटने को दौड़ती रहेंगी.

रोजाना की तरह 12 फरवरी को भी दोपहर में लगभग 12 बजे एसपीएस की बसें लाइन से लग गई थीं. बच्चे अपनी बसों का नंबर पढ़ते हुए उन में सवार हो रहे थे. छोटी कक्षाओं के बच्चों में स्कूल की छुट्टी के बाद घर जाने की खुशी ठीक वैसी ही होती है जैसी जेल से लंबी सजा काट कर रिहा हुए कैदियों की होती है.

क्लास से लाइन में लग कर बाहर आए प्रियांश और श्रेयांश भी अपनी बस में सवार हो गए, जिस में ड्राइवर और कंडक्टर के अलावा एक केयरटेकर भी थी. जब बस के सभी बच्चे आ कर अपनीअपनी सीटों पर बैठ गए तो गेट बंद होने के बाद ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी. इस बस का नंबर था एमपी19-0973.

स्कूल कैंपस से बस अभी 500 मीटर का फासला भी तय नहीं कर पाई थी कि न जाने कहां से एक लाल रंग की बाइक आई और बस के सामने रुक गई.

ड्राइवर ने अचकचा कर बस धीमी की लेकिन जब तक वह माजरा समझ पाता तब तक बाइक पर सवार दोनों युवक नीचे उतर आए. उन में से एक के हाथ में पिस्टल थी. दोनों युवकों ने चेहरा भगवा कपड़े से ढक रखा था. फिल्मी स्टाइल में ही बस के गेट तक आए बदमाशों ने डरावनी चेतावनी दी और श्रेयांश और प्रियांश को नीचे उतार लिया.

कोई कुछ समझ या कर पाता इस के पहले ही दोनों ने श्रेयांश और प्रियांश को बाइक पर बीच में बैठाया और आंधीतूफान की तरह जैसे आए थे, वैसे ही उड़नछू हो गए. कहां गए यह कोई उन्हें ढंग से भी नहीं देख पाया.

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यह जरूर है कि हर किसी को समझ आ गया कि दिन दहाड़े स्कूल बस में से दोनों का अपहरण हो गया है और अपहरणकर्ताओं का टारगेट श्रेयांश और प्रियांश ही थे, क्योंकि अगर किसी को भी उठाना होता तो बच्चे आगे की सीटों पर भी बैठे थे. लेकिन बदमाशों ने पीछे की सीट पर बैठे दोनों भाइयों को ही उठाया था यानी अपहरण की यह वारदात पूर्वनियोजित थी.

बाइक के नजरों से दूर होते ही कंडक्टर ड्राइवर और केयरटेकर सहित बच्चों का डर खत्म हुआ तो खासी हलचल मच गई. देखते ही देखते यह बात चित्रकूट की तंग और संकरी गलियों से होती हुई देश भर में फैल गई कि 2 जुड़वां भाईयों का दिनदहाड़े अपहरण हो गया.

अपहरण के बाद मिनटों में वारदात की खबर पुलिस और ब्रजेश रावत तक पहुंच गई. ब्रजेश भागेभागे स्कूल आए, लेकिन वहां उन के जिगर के ये दोनों जुड़वां टुकड़े नहीं थे. थी तो ऊपर बताई गई दास्तां जो हर किसी ने अपने शब्दों मे बयां की, जिस का सार यह था कि एक बाइक पर 2 नकाबपोश बदमाश आए. उन्होंने बाइक अड़ा कर बस रोकी, पिस्टल लहरा कर धमकाया और श्रेयांश व प्रियांश को बीच में बैठा कर उड़नछू हो गए.

मौके पर आई पुलिस के हाथ नया कुछ नहीं लगा, सिवाय उन सीसीटीवी फुटेज के जो स्कूल के कैमरों में कैद हो गई थी. इन फुटेज को देखने के बाद पुलिस वालों ने अंदाजा लगाया कि अपहरणकर्ताओं की उम्र 25-26 साल के लगभग है और उन की हरकतें देख लगता है कि वे पेशेवर हैं. पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि 2 संदिग्ध युवक कुछ दिनों से स्कूल की रैकी कर रहे थे. चूंकि स्कूल में अभिभावकों और दूसरे लोगों की आवाजाही लगी रहती है इसलिए किसी ने उन से कुछ पूछा या कहा नहीं था.

सीसीटीवी फुटेज में दोनों के चेहरे नहीं दिखे क्योंकि उन्होंने भगवा कपड़ा बांध रखा था लेकिन यह जरूर पता चला कि एक बदमाश काली और दूसरा सफेद रंग की टी शर्ट पहने हुए था. यह आशंका भी जताई गई कि दोनों बदमाश बच्चों को ले कर अनुसुइया आश्रम की तरफ भागे हैं और बीच में उन की बाइक रजौरा के पास गिरी भी थी.

चंद घंटों में ही मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में इस हादसे पर खासा बवाल मचा तो पुलिस भी एक्शन में आ गई. सतना के एसपी संतोष सिंह गौर ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद से बच्चों की सुरक्षित वापसी की कोशिशें की जा रही हैं.

अब तक यह भी कहा जाने लगा था कि बदमाश बच्चों को ले कर बीहड़ों में कूद गए होंगे और जल्द ही ब्रजेश रावत से फिरौती मांगेंगे. आशंका यह भी जताई गई कि इस वारदात के पीछे साढ़े 5 लाख के ईनामी बबुली कोल गिरोह का हाथ हो सकता है.

पुलिस ने संदिग्ध लोगों को पकड़ कर उन से पूछताछ शुरू कर दी थी, लेकिन हाथ कुछ नहीं लग रहा था. चित्रकूट को छूती मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को सीज कर दिया गया. कर्बी के एसपी मनोज कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस टीमों ने हर जगह बच्चों और बदमाशों को तलाशना शुरू कर दिया.

ब्रजेश रावत ने बारबार यह बात दोहराई कि उन का किसी से भी व्यक्तिगत या पारिवारिक विवाद नहीं है और न ही अब तक यानि घटना वाले दिन तक उन से किसी ने फिरौती मांगी है. घंटों के सघन अभियान के बाद भी प्रियांश और श्रेयांश का कोई सुराग नहीं लग रहा था. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने डीजीपी वी.के. सिंह को तलब किया था. इसलिए पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते अपने महकमे के उन सभी अधिकारियों को चित्रकूट बुलवा भेजा, जो कभी भी एंटी डकैत गतिविधियों का हिस्सा रहे थे.

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ये तजुर्बेकार अधिकारी नौसिखिए अपराधियों के सामने किस तरह गच्चा खा रहे थे. यह खुलासा बाद में 13 फरवरी को हुआ. उसी दिन आईजी ने मोर्चा संभालते हुए एसआईटी गठित कर डाली, जिस के तहत दोनों राज्यों की पुलिस के लगभग 500 जवान विंध्य के बीहड़ों में बच्चों को तलाशते रहे. अपराधियों का सुराग देने पर डेढ़ लाख रुपए के ईनाम का ऐलान भी किया गया लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

इसी बीच उम्मीद के मुताबिक अपहरणकर्त्ताओं ने रावत परिवार से संपर्क कर के मासूमों की रिहाई के एवज में 2 करोड़ रुपए मांगे. 19 फरवरी को रावत परिवार ने उन्हें 20 लाख रुपए दिए भी, लेकिन इस के बाद भी उन्होंने बच्चों को रिहा नहीं किया.

अब तक सार्वजनिक रूप से पुलिस की कार्यप्रणाली और लापरवाही की आलोचना होने लगी थी. चित्रकूट में तो आक्रोश था ही, कर्बी और सतना में भी लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किए. अब भाजपाई और कांग्रेसी भी राजनीति पर उतर आए थे, जिस से लगा कि इन नेताओं को बच्चों की सलामती और जिंदगी से प्यारी अपनी आरोपप्रत्यारोप की परंपरागत राजनीति है.

100 करोड़ के घोटाले में फंसीं कौशिक बहनें

हरियाणा में सहकारिता विभाग में हुए करोड़ों के घोटाले के बाद एकीकृत सहकारी विकास परियोजना आईसीडीपी को बंद कर दिया गया है. प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सहकारिता विभाग में हुए घोटाले का स्पैशल आडिट करने के आदेश जारी किए हैं.1995 से केंद्र व राज्य सरकार द्वारा एकीकृत सहकारी विकास परियोजना में कितना पैसा दिया गया, कितना खर्च हुआ, कितना धन बचा और कितने धन का गोलमाल हुआ है, सभी धन और खर्च और घोटाले  को स्पैशल आडिट में शामिल किया गया है.

मुख्यमंत्री ने अपने आदेश में कहा था कि आडिट राज्य सरकार किसी प्राइवेट एजेंसी से कराएगी, जिस के लिए टेंडर जारी किए जाएंगे. ज्ञात रहे कि मुख्यमंत्री के आदेश पर हरियाणा की एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) सहकारिता विभाग में हुए घोटाले की जांच कर रही है.

हरियाणा सरकार में सहकारिता विभाग के मंत्री डा. बनवारी लाल का कहना है कि घोटाले में शामिल सभी अधिकारियों को बरखास्त किया जाएगा. सहायक रजिस्ट्रार अनु कौशिक और उपमुख्य लेखा परीक्षक योगेंद्र अग्रवाल को पहले ही बरखास्त करने की सिफारिश की गई है. अन्य अधिकारियों को भी बरखास्त करने की सिफारिश की जाएगी.

अब तक एसीबी जिलों में तैनात 11 अधिकारियों व कर्मचारियों को गिरफ्तार कर चुकी है. घोटाले में शामिल किसी भी अधिकारी व कर्मचारी को बख्शा नहीं जाएगा. एसीबी की जांच रिपोर्ट के आधार पर घोटाले में शामिल अधिकारियों को बरखास्त किया जाएगा.

इस ऐतिहासिक घोटाले को ले कर प्रदेश में विपक्ष के तेवर भी आक्रामक हो गए. विपक्षी पार्टियां प्रदेश के सहकारिता मंत्री डा. बनवारी लाल को जिम्मेदार मानते हुए पद त्याग करने की मांग कर रही हैं. हरियाणा प्रदेश के एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच के बाद सहकारिता विभाग के घोटाले का परदाफाश हुआ है.

प्रारंभिक जांच में करीब 100 करोड़ रुपए के घोटाले की आशंका व्यक्त की गई थी, लेकिन जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही है, घोटाले की राशि भी बढ़ती जा रही है. स्पैशल आडिट में यह राशि बढ़ कर कितने करोड़ होगी, अभी इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

एसीबी ने इस 100 करोड़ के घोटाले की मास्टरमाइंड सहायक रजिस्ट्रार अनु कौशिक और बिजनैसमैन स्टालिनजीत सिंह को बताया है. इन्होंने ही फेक बिल और फरजी कंपनियों के नाम पर सरकारी पैसे को ठिकाने लगाया. साथ ही अपने बैंक अकाउंट का पैसा हवाला के जरिए दुबई और कनाडा तक पहुंचाया. ये दोनों भी विदेश भागने की फिराक में थे, लेकिन हरियाणा एंटी करप्शन ब्यूरो  (एसीबी) को इस की भनक लग गई और दोनों को समय रहते गिरफ्तार कर लिया.

एसीबी ने 13 मई, 2023 को गुरुग्राम में एफआईआर दर्ज कराई थी, जिस में तीनों बहनें अनु कौशिक, गुंजन कौशिक व नताशा कौशिक और उस के मातापिता को नामजद किया गया था. गुंजन को छोड़ कर सभी को गिरफ्तार कर लिया गया था.

गुंजन कौशिक कनाडाई है. इस वजह से एसीबी के द्वारा गुंजन को गिरफ्तार करना संभव नहीं हुआ. एसीबी यह योजना बना रही है कि गुंजन तक पहुंचने के लिए इंटरपोल की सहायता ली जाए. अनु कौशिक ने सहकारिता विभाग के करोड़ों रुपए हवाला के जरिए अपनी बहन गुंजन  के पास कनाडा और दुबई में भेजे थे.

बताया गया है कि अनु कौशिक की सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति की जानकारी एसीबी को मिल गई है. पता चला है कि रिश्वत की रकम से करनाल, कैथल, अंबाला व गुरुग्राम में बेनामी प्रौपर्टी अनु कौशिक ने खरीदी. एसीबी का दावा है कि घोटालेबाजों की 5 करोड़ की संपत्ति अब तक अटैच की जा चुकी है.

एक दरजन से ज्यादा अधिकारी हुए गिरफ्तार

इस घोटाले की जांच कर रही एसीबी की टीम के सूत्रों का कहना है कि गुंजन से पूछताछ में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं.  इस घोटाले में कुछ बड़े नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के नाम आने की संभावना है, इसलिए एसीबी हर पहलू पर पुख्ता सबूत और जानकारी एकत्र करने पर फोकस कर रही है, जिस से कोर्ट में केस की सुनवाई शुरू होने पर अच्छी पैरवी की जा सके.

हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने कहा कि भ्रष्टाचारी चाहे कोई भी हो, कितना ही बड़ा अधिकारी क्यों न हो, दोषी पाए जाने पर बख्शा नहीं जाएगा. उन्होंने कहा कि ब्यूरो पूरी पारदर्शिता व निष्पक्षता के साथ दोषियों के खिलाफ काररवाई करने के लिए वचनबद्ध है. आगे भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ यह अभियान जारी रहेगा.

सब से अहम बात यह है कि इस पूरे मामले का डेली अपडेट चीफ और डीजीपी शत्रुजीत कपूर से खुद सीएम मनोहर लाल खट्टर ले रहे थे. उन्होंने बताया कि एसीबी ने अब तक घोटाले में शामिल 6 राजपत्रित अधिकारियों, आईसीडीपी रेवाड़ी के 4 अन्य अफसरों और 4 निजी व्यक्तियों की गिरफ्तारी की है.

इन आरोपियों में आडिट औफिसर बलविंदर, डिप्टी चीफ आडिटर योगेंद्र अग्रवाल, जिला रजिस्ट्रार सहकारी समितियां, करनाल रोहित गुप्ता, सहायक रजिस्ट्रार सहकारी समिति (एआरसीएस) अनु कौशिक, रामकुमार, जितेंद्र कौशिक, कृष्ण बेनीवाल शामिल हैं.

बाद में हिसार के ए.आर. खटकड़ को भी गिरफ्तार किया गया है. उन के अकाउंट से लाखों के ट्रांजेक्शन मिले हैं और भी कई अधिकारी अभी एसीबी के रडार पर हैं. एंटी करप्शन ब्यूरो का मानना है कि उन्होंने 100 करोड़ का घोटाला तो पकड़ा है, जबकि यह घोटाला कई सौ करोड़ का हो सकता है. सहकारिता विभाग में पिछले 2 सालों से तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिवों के आदेश के बाद भी आडिट नहीं हो रहा था.

एसीबी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सहकारी समितियों में भरतियों के एवज में कर्मचारियों से एक से डेढ़ लाख रुपए लिए गए. अब एसीबी ने सहकारिता विभाग के पास से इन कर्मचारियों की सूची मांग ली है. सूची के आधार पर अनु कौशिक के कार्यकाल के दौरान भरती हुए युवाओं से पूछताछ की जाएगी.

जांच में यह भी सामने आया है कि अनु कौशिक ने अंबाला में निगदू सोसाइटी की 45 एकड़ जमीन अवैध तरीके से बेच दी. इस मामले की जांच अभी चल रही है.

सुनियोजित तरीके से किया घोटाला

एकीकृत सहकारी विकास परियोजना के तहत ग्रामीण तथा कृषि क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हुए विकास कार्य कराए जाने थे और सहकारी समितियों को विकसित किया जाना था. इस के लिए केंद्र सरकार ने पर्याप्त धनराशि दी थी. इस पैसे को कहां खर्च किया गया, इस का कोई उल्लेख अभिलेखों में एसीबी को नहीं मिला है.

जांच में पाया गया है कि आरोपियों ने पैसा कनाडा और दुबई भेजा है. जांच में यह भी सामने आया है कि मुख्यालय स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाले को अंजाम दिया गया. ठेकेदार स्टालियन जीत ने अधिकारियों से मिल कर उन्हें रिश्वत दे कर फरजीवाड़ा किया.

ठेकेदार ने अपनी आधा दरजन से अधिक कंपनियां पंजीकृत करा रखी थीं. अलगअलग जिलों में इटालियन जीत ने अलगअलग कंपनियों के नाम पर सहकारिता विभाग का कार्य लिया. स्वयं सहायता समूह तैयार कर के उन के नाम से रकम निकाल ली. ठेके के लिए इटालियन जीत ने कोटेशन अपनी ही दूसरी कंपनियों के लगाए. फरजी बिल लगाए गए और आडिटरों द्वारा उसे सही करार दे कर घोटाले को महीनों तक जारी रखा गया.

एसीबी को अधिकारियों और ठेकेदार के बीच हुई वाट्सऐप चैट भी मिली है. इस चैट में अधिकारियों को पैसों के लेनदेन सहित बिलों के भुगतान का पूरा लेखाजोखा मिला है. चैट के आधार पर एसीबी ने अंबाला और करनाल में 3-3 केस दर्ज कराए थे. 4 अधिकारियों को यहां से गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की.

इसी जांच के आधार पर 31 जनवरी, 2024 को घोटाले के 6 केस दर्ज किए गए थे. सहकारिता विभाग ने भी अपना पक्ष प्रस्तुत किया है. विभाग का दावा है कि फील्ड आईसीडीसी प्रोजेक्ट के तहत कुल राशि में से 20.87 करोड़ रुपए ही खर्च किए हैं. ऐसे में 100 करोड़ रुपए का गबन कैसे हो सकता है.

आईसीडीसी प्रोजेक्ट के तहत हरियाणा को कुल 139 करोड़ रुपए मिलने थे, लेकिन विभाग को 61.67 करोड़ रुपए ही मिले. इस में से 20.87 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जबकि 41.40 करोड़ रुपए खर्च नहीं हुए हैं. विभाग की ओर से बाकायदा डाटा भी जारी किया गया है. इस के तहत हैफेड को 7.5 करोड़ रुपए दिए गए थे, जो अब विभाग को वापस कर दिए गए हैं.

इसी प्रकार 21.5 करोड़ रुपए हरियाणा वेयरहाउसिंग कारपोरेशन को दिए गए, जो वापस किए जाने हैं. जबकि 9 करोड़ रुपए खजाना विभाग में जमा कराए गए हैं और 40 लाख रुपए कुल राशि का ब्याज जमा कराया गया है.

अभी फील्ड के कार्यालयों में 3 करोड़ रुपए की राशि शेष है, जो खर्च नहीं हो सकी है. ऐसे में कुल 41.40 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हुए हैं. इस बारे में सहकारिता विभाग के मंत्री डा. बनवारी लाल ने कहा कि जब 100 करोड़ रुपए जारी ही नहीं हुए तो इतना घोटाला कैसे हो सकता है.

एसीबी की सहकारिता विभाग के घोटाले की जांच को ले कर अभी तक लोग आश्चर्यचकित हैं कि एसीबी को जांच किस दवाब में सौंपी गई. सरकार और पार्टी के नेताओं का दावा है कि मुख्यमंत्री ने एसीबी को सहकारिता विभाग के घोटाले की जांच सौंपी थी.

सरकार की जीरो टालरेंस नीति के तहत किसी भी घपले, घोटाले या लापरवाही की शिकायत पर मुख्यमंत्री बहुत सख्त हैं. जीरो टालरेंस नीति के तहत केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ यह प्रावधान रखा है कि यदि किसी आरोपी पर घोटाला या भ्रष्टाचार सिद्ध होता है, तब सरकार उन अफसरों को सेवा से हटा सकती है. इस में यह प्रावधान भी है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद सरकार अदालती फैसले से पहले भी काररवाई कर सकती है.

जांच प्रक्रिया पर है लोगों को शक

उधर लोगों का कहना है कि नवंबर 22 में रेवाड़ी जिले की शिकायत आई थी. मुख्य सचिव ने एसीबी को शिकायत पर जांच सौंपी थी. उस वक्त यह अनुमान नहीं था कि यह घोटाला करोड़ों में हो सकता है, लेकिन मुख्य  सचिव को यह अंदाजा हुआ कि बड़े अधिकारी इन शिकायतों पर काररवाई ठीक से नहीं कर रहे हैं.

लोग कहते हैं कि राजाराम इंद्रजीत सिंह विचार मंच रेवाड़ी के संयोजक प्रवीण राव उर्फ बौबी राव ने 2022 में सहकारी समितियों के भ्रष्टाचार की शिकायत की थी. प्रवीण राव सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहते हैं.

उन का कहना है कि शिकायत और आरटीआई के माध्यम से निरंतर प्रयास किए जाने के कारण समाचार पत्रों और सोशल मीडिया तथा चैनलों के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित कराया गया था. मजबूर हो कर सरकार को सहकारी विभाग के घोटाले की जांच करानी पड़ी.

कांग्रेस और विपक्ष के कई नेता भी इस का श्रेय उन्हीं को ही देते हैं. बताया जाता है कि पार्टी के कुछ नेताओं को सहकारिता मंत्री डा. बनवारी लाल की केंद्रीय नेताओं से निकटता और तालमेल पसंद नहीं था. यह पार्टी की अंदरूनी कलह का नतीजा है कि उन्हें हाशिए पर पहुंचाने के लिए उन के विभाग की एसीबी से जांच कर घोटाले का परदाफाश कराया गया है.

विपक्षी दलों का कहना है कि यह जांच भी लाल फीताशाही का शिकार हो कर रह जाएगी. छोटी मछलियों को ही इस का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. जबकि बड़ी मछलियां सरकार के संरक्षण में पहले की तरह पलती रहेंगी.

एसीबी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर  को लोग ईमानदार अफसर बताते हैं. अधिकांश लोगों की नजर में मुख्यमंत्री मनोहर लाल की छवि एक कठोर, ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ की है. दोनों से बहुत आशाएं हैं और उम्मीद है कि छोटीबड़ी मछलियां नहीं, हर घोटालेबाज को सलाखों के पीछे पहुंचाने में कोई नहीं रोक सकता. लोग लोकसभा चुनाव के मद्ïदेनजर भी ऐसी ही कठोर काररवाई की अपेक्षा कर रहे हैं.

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव, पूर्व केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस कार्य समिति की सदस्य, हरियाणा कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष एवं उत्तराखंड की प्रभारी कुमारी शैलजा ने 100 करोड़ के घोटाले के मामले में सरकार को घेरा है तथा कटघरे में खड़ा किया है. कहा कि गठबंधन सरकार की नाक तले सहकारिता विभाग में 100 करोड़ रुपए का घोटाला हो गया और सरकार को भनक तक नहीं लगी, ऐसा कैसे हो सकता है?

सीबीआई जांच की उठी मांग

हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनने पर इस की जांच करवाई जाएगी और इस घोटाले के दोषियों पर कड़ी काररवाई करते हुए उन से एकएक रुपए की वसूली की जाएगी.

मीडिया को जारी एक बयान में कुमारी शैलजा ने कहा कि भाजपा-जजपा गठबंधन की सरकार आने के बाद से ऐसा कोई विभाग नहीं बचा, जहां घोटाले न हुए हों. कभी शराब घोटाला, कभी धान घोटाला और न जाने कौनकौन से घोटाले हुए, सरकार सभी घोटालों में जांच का नाटक करती रही, पर आज तक किसी घोटाले में किसी पर कोई काररवाई नहीं हुई. सरकार अपने लोगों को बचाने में लगी रही.

जनता जानती है कि घोटालों में कौनकौन शामिल था तो सरकार कैसे नहीं जान पाई. उन्होंने कहा कि सहकारिता विभाग के 100 करोड़ रुपए के घोटाले की जड़ें करनाल तक फैली हुई हैं. सब से खास बात यह है कि मुख्यमंत्री खुद करनाल से विधायक हैं.

उन्होंने कहा कि सहकारिता विभाग का घोटाला रेवाड़ी से शुरू हुआ है और मंत्री भी रेवाड़ी के ही रहने वाले हैं. इस घोटाले में मंत्री और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.

जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला जो भाजपा में संयुक्त रूप से सरकार में हैं तथा उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं. इस सहकारिता विभाग के 100 करोड़ से अधिक के घोटाले पर बिलकुल चुप्पी साधे हुए हैं.

सरकार में शामिल होने से पहले उन्होंने आरोप लगाया था कि हरियाणा में भाजपा की खट्टर सरकार में ओवरलोडिंग के नाम पर 5 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है.

वे कुरुक्षेत्र जिले के गांव मथाना, मोरथला सहित आधा दरजन गांवों में जनचौपाल कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों से रूबरू हो रहे थे. उन का यह बयान 31 जुलाई, 2019 को सभी छोटेबड़े समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था.

उन्होंने कहा था कि सुनियोजित ढंग से किए गए इस लूट के घोटाले में अकेली अफसरशाही ही शामिल नहीं, बल्कि इस में सीएम से ले कर भाजपा सरकार के कई मंत्री, विधायकों की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता और इन लोगों ने मिल कर ही इस ‘मनोहर’ घोटाले को अंजाम दिया है.

यह बात  जननायक जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद दुष्यंत चौटाला ने कही थी. उन्होंने मांग की है कि इस घोटाले की जांच सीबीआई से होनी चाहिए, ताकि लूट की कमाई करने वालों के कालिख भरे चेहरे जनता के सामने आ सकें.

दुष्यंत चौटाला ने ओवरलोडिंग के मामले को ‘मनोहर’ घोटाले की संज्ञा देते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार के लोगों को बचाने के लिए अधिकारियों को बलि का बकरा बनाने का प्रयास रहे हैं.

उन्होंने कहा कि एसआईटी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश भर के विभिन्न जिलों से प्रतिमाह 120 करोड़ रुपए की लूट की जा रही थी. इस की गणना की जाए तो एक वर्ष में 1400 करोड़ रुपए एकत्रित किए गए और ओवरलोडिंग के नाम पर 4 सालों में इस काली कमाई का आंकड़ा 5 हजार करोड़ रुपए से अधिक का है.

वर्तमान के उपमुख्यमंत्री व पूर्व सांसद दुष्यंत चौटाला ने कहा था कि मनोहर लाल खट्टर सरकार में आए दिन घोटाले उजागर हो रहे हैं. सब से पहले उन्होंने स्वयं प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए का दवा घोटाले को तथ्यों सहित उजागर किया था, जिस की जांच आज तक खट्टर सरकार ने पूरी नहीं की.

इस के बाद रोडवेज में किलोमीटर स्कीम के नाम एक औन रिकौर्ड एक हजार करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया और इस किलोमीटर स्कीम को मंजूरी देने में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से ले कर परिवहन मंत्री का सीधा दखल था.

दुष्यंत चौटाला ने कहा था कि यदि इन घोटालों की जांच निष्पक्ष व सही ढंग से की जाए तो कई भाजपाइयों के चेहरों को घोटाले का कलंक बेरंगत कर सकता है. यह बात लगभग 5 साल पुरानी है. वो अब सरकार में शामिल हैं और इस सहकारिता विभाग के घोटाले पर चुप्पी साधे हुए हैं.

50 करोड़ का खेल : भीलवाड़ा का बिल्डर अपहरण कांड – भाग 3

पुलिस ने 4 मई, 2019 को धोबी की मदद से शिवदत्त को देहरादून के अरोड़ा पेइंग गेस्टहाउस से बरामद कर लिया. शिवदत्त अपने औफिस के कर्मचारी राकेश शर्मा की आईडी से इस गेस्टहाउस में ठहरा हुआ था. देहरादून से वह लगातार जयपुर की अपनी एक परिचित महिला के संपर्क में था. इस दौरान शिवदत्त ने देहरादून में एक कोचिंग सेंटर में इंग्लिश स्पीकिंग क्लास भी जौइन कर ली थी.

42 दिन तक कथित रूप से लापता रहे शिवदत्त को पुलिस देहरादून से भीलवाड़ा ले आई. उस से की गई पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी.

नाटक और हकीकत में फर्क होता है

शिवदत्त ने प्रौपर्टी व्यवसाय में कई जगह पैर पसार रखे थे. उस ने भीलवाड़ा में विनायक रेजीडेंसी, सांगानेर रोड पर मल्टीस्टोरी प्रोजैक्ट, अजमेर रोड पर श्रीमाधव रेजीडेंसी, कृष्णा विहार बाईपास, कोटा रोड पर रूपाहेली गांव के पास वृंदावन ग्रीन फार्महाउस आदि बनाए. इन के लिए उस ने बाजार से मोटी ब्याज दर पर करीब 50 करोड़ रुपए उधार लिए थे, लेकिन कुछ प्रोजैक्ट समय पर पूरे नहीं हुए.

बाद में प्रौपर्टी व्यवसाय में मंदी आ गई. इस से उसे अपनी प्रौपर्टीज के सही भाव नहीं मिल पा रहे थे. जिन लोगों ने शिवदत्त को रकम उधार दी थी, वह उन पर लगातार तकाजा कर रहे थे. ब्याज का बोझ बढ़ता जा रहा था. इस से शिवदत्त परेशान रहने लगा. वह इस समस्या से निकलने का समाधान खोजता रहता था.

इस बीच जनवरी में शिवदत्त अपने घर पर सीढि़यों से फिसल गया. उस की रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी. कुछ दिन वह अस्पताल में भरती रहा. फिर चोट के बहाने करीब 2 महीने तक घर पर ही रहा. इस दौरान उस ने अपना कारोबार पत्नी शर्मीला और स्टाफ के भरोसे छोड़ दिया था. पैसा मांगने वालों को घरवाले और स्टाफ शिवदत्त के बीमार होने की बात कह कर टरकाते रहे.

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घर पर आराम करने के दौरान एक दिन शिवदत्त ने सारी समस्याओं से निपटने के लिए खुद के अपहरण की योजना बनाई. उस का विचार था कि अपहरण की बात से कर्जदार उस के परिवार को परेशान नहीं करेंगे. उन पर पुलिस की पूछताछ का दबाव भी नहीं रहेगा. यहां से जाने के बाद वह भीलवाड़ा से बाहर जा कर कहीं रह लेगा और मामला शांत हो जाने पर किसी दिन अचानक भीलवाड़ा पहुंच कर अपने अपहरण की कोई कहानी बना देगा.

अपनी योजना को मूर्तरूप देने के लिए उस ने होली का दिन चुना. इस से पहले ही शिवदत्त ने अपनी कार में करीब 8-10 जोड़ी कपड़े और जरूरी सामान रख लिया था. करीब एक लाख रुपए नकद भी उस के पास थे. शिवदत्त ने अपनी योजना की जानकारी पत्नी और किसी भी परिचित को नहीं लगने दी. उसे पता था कि अगर परिवार में किसी को यह बात बता दी तो पुलिस उस का पता लगा लेगी. इसलिए उस ने इस बारे में पत्नी तक को कुछ बताना ठीक नहीं समझा.

योजना के अनुसार, शिवदत्त होली की शाम पत्नी से अपने दोस्त राजेश त्रिपाठी से मिलने जाने की बात कह कर कार ले कर घर से निकल गया. वह अपने दोस्त से मिला और रात करीब 8 बजे वहां से निकल गया. शिवदत्त ने राजेश त्रिपाठी के घर से आ कर अपनी कार सुखाडि़या सर्किल के पास लावारिस छोड़ दी. कार से कपड़े और जरूरी सामान निकाल लिया. कपड़े व सामान ले कर वह भीलवाड़ा से प्राइवेट बस में सवार हो कर दिल्ली के लिए चल दिया.

भीलवाड़ा से रवाना होते ही शिवदत्त ने अपने मोबाइल से पत्नी के मोबाइल पर खुद के अपहरण का मैसेज भेज दिया था. इस के बाद उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया. भीलवाड़ा से दिल्ली पहुंच कर वह ऋषिकेश चला गया.

ऋषिकेश में शिवदत्त ने अपने औफिस के कर्मचारी राकेश शर्मा की आईडी से नया सिमकार्ड खरीदा. फिर एक नया फोन खरीद कर वह सिम मोबाइल में डाल दिया. कुछ दिन ऋषिकेश में रुकने के बाद शिवदत्त देहरादून चला गया. देहरादून में 29 मार्च को उस ने राकेश शर्मा की आईडी से अरोड़ा पेइंग गेस्टहाउस में कमरा ले लिया.

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खेल एक अनाड़ी खिलाड़ी का

देहरादून में उस ने दिखावे के लिए इंग्लिश स्पीकिंग क्लास जौइन कर ली. वह अपने कपड़े धुलवाने और प्रैस कराने के लिए धोबी को देता था. एक दिन गलती से शिवदत्त का पुराना मोबाइल उस के कपड़ों की जेब में धोबी के पास चला गया. इसी से उस का भांडा फूटा.

शुरुआती जांच में सामने आया कि देहरादून में रहने के दौरान शिवदत्त मुख्यरूप से जयपुर की एक परिचित महिला के संपर्क में था. इस महिला से शिवदत्त की रोजाना लंबीलंबी बातें होती थीं. जबकि वह अपनी पत्नी या अन्य किसी परिजन के संपर्क में नहीं था.

भीलवाड़ा के सुभाष नगर थानाप्रभारी अजयकांत शर्मा ने शिवदत्त को 6 मई को जोधपुर ले जा कर हाईकोर्ट में पेश किया और उस के अपहरण की झूठी कहानी से कोर्ट को अवगत कराया. इस पर मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस संदीप मेहता और विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने शिवदत्त के प्रति नाराजगी जताई. जजों ने याचिका का निस्तारण करते हुए अदालत और पुलिस को गुमराह करने पर याचिकाकर्ता शर्मीला पर 5 हजार रुपए का जुरमाना लगाते हुए यह राशि पुलिस कल्याण कोष में जमा कराने के आदेश दिए.

बाद में सुभाष नगर थाना पुलिस ने शिवदत्त के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. उस के खिलाफ अपने ही अपहरण की झूठी कहानी गढ़ कर पुलिस को गुमराह करने, अवैध रूप से देनदारों पर दबाव बनाने और षडयंत्र रचने का मामला दर्ज किया गया. इस मामले की जांच सदर पुलिस उपाधीक्षक राजेश आर्य कर रहे थे.

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पुलिस ने इस मामले में 7 मई, 2019 को बिल्डर शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन उसे अदालत में पेश कर 6 दिन के रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि में भी शिवदत्त से विस्तार से पूछताछ की गई, फिर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

बहरहाल, बिल्डर शिवदत्त मोहमाया के लालच में अपने ही बिछाए जाल में फंस गया. अपहरण की झूठी कहानी से उस के परिजन भी 42 दिन तक परेशान रहे. पुलिस भी परेशान होती रही. भले ही वह जमानत पर छूट कर घर आ जाएगा, लेकिन सौ करोड़ के कारोबारी ने बाजार में अपनी साख तो खराब कर ही ली. इस का जिम्मेदार वह खुद और उस का लोभ है.

50 करोड़ का खेल : भीलवाड़ा का बिल्डर अपहरण कांड – भाग 2

पुलिस जुट गई जांच में

इस बीच 24 मार्च का दिन भी निकल गया. लेकिन अपहर्त्ताओं की ओर से कोई सूचना नहीं आई. जबकि उन्होंने 2 दिन में एक करोड़ रुपए का इंतजाम करने को कहा था. घर वाले इस बात को ले कर चिंतित थे कि कहीं अपहर्त्ताओं को उन के पुलिस में जाने की बात पता न लग गई हो. क्योंकि इस से चिढ़ कर वे शिवदत्त के साथ कोई गलत हरकत कर सकते थे.

शर्मीला पति को ले कर बहुत चिंतित थी. अपहर्त्ताओं की ओर से 3 दिन बाद भी शिवदत्त के परिजनों से कोई संपर्क नहीं किया गया. ऐसे में पुलिस को भी उस की सलामती की चिंता थी.

पुलिस ने शिवदत्त की तलाश तेज करते हुए 4 टीमें जांचपड़ताल में लगा दी. इन टीमों ने शिवदत्त के रिश्तेदारों से ले कर मिलनेजुलने वालों और संदिग्ध लोगों से पूछताछ की, लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला. शिवदत्त की कार जिस जगह लावारिस हालत में मिली थी, उस के आसपास सीसीटीवी फुटेज खंगालने की कोशिश भी की गई, लेकिन पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल सका.

इस पर पुलिस ने 25 मार्च को शिवदत्त के फोटो वाले पोस्टर छपवा कर भीलवाड़ा जिले के अलावा पूरे राजस्थान सहित गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के पुलिस थानों को सार्वजनिक स्थानों पर चस्पा करने के लिए भेजे.

पुलिस को भी नहीं मिला शिवदत्त

जांच में पता चला कि शिवदत्त ने कुछ समय पहले महाराष्ट्र में भी अपना कारोबार शुरू किया था. इसलिए किसी सुराग की तलाश में पुलिस टीम मुंबई और नासिक भेजी गई. लेकिन वहां हाथपैर मारने के बाद पुलिस खाली हाथ लौट आई.

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उधर लोग इस मामले में पुलिस की लापरवाही मान रहे थे. पुलिस के प्रति लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा था. 26 अप्रैल, 2019 को ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधि मंडल ने भीलवाड़ा के कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन दे कर शिवदत्त को सुरक्षित बरामद कर अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार करने की मांग की. ऐसा न होने पर उन्होंने आंदोलन की चेतावनी दे दी.

दिन पर दिन बीतते जा रहे थे, लेकिन न तो अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त के परिजनों से कोई संपर्क किया था और न ही पुलिस को कोई सुराग मिला था. इस से शिवदत्त के परिजन भी परेशान थे. उन के मन में आशंका थी कि अपहर्त्ताओं ने शिवदत्त के साथ कुछ गलत न कर दिया हो. क्योंकि इतने दिन बाद भी न तो अपहर्त्ता संपर्क कर रहे थे और न ही खुद शिवदत्त.

पुलिस की चिंता भी कम नहीं थी. वह भी लगातार भागदौड़ कर रही थी. पुलिस ने शिवदत्त के फेसबुक, ट्विटर, ईमेल एकाउंट खंगालने के बाद संदेह के दायरे में आए 50 से अधिक लोगों से पूछताछ की.

पुलिस की टीमें महाराष्ट्र और गुजरात भी हो कर आई थीं. शिवदत्त और उस के परिवार वालों के मोबाइल की कालडिटेल्स की भी जांच की गई. भीलवाड़ा शहर में बापूनगर, पीऐंडटी चौराहा से पांसल चौराहा और अन्य इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई, लेकिन इन सब का कोई नतीजा नहीं निकला.

बिल्डर शिवदत्त के अपहरण का मामला पुलिस के लिए एक मिस्ट्री बनता जा रहा था. पुलिस अधिकारी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर अपहर्त्ता शिवदत्त को कहां ले जा कर छिप गए. ऐसा कोई व्यक्ति भी पुलिस को नहीं मिल रहा था जिस ने राजेश त्रिपाठी के घर से निकलने के बाद शिवदत्त को देखा हो. त्रिपाठी ही ऐसा शख्स था, जिस से शिवदत्त आखिरी बार मिला था. पुलिस त्रिपाठी से पहले ही पूछताछ कर चुकी थी. उस से कोई जानकारी नहीं मिली थी तो उसे घर भेज दिया गया था.

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जांचपड़ताल में सामने आया कि शिवदत्त का करीब 100 करोड़ रुपए का कारोबार था. साथ ही उस पर 20-30 करोड़ की देनदारियां भी थीं. महाराष्ट्र के नासिक और गुजरात के अहमदाबाद में भी उस ने कुछ समय पहले नया काम शुरू किया था.

शिवदत्त ने सन 2009 में प्रौपर्टी का कारोबार शुरू किया था. शुरुआत में उस ने इस काम में अच्छा पैसा कमाया. कमाई हुई तो उस ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए. एक साथ कई काम शुरू करने से उसे नुकसान भी हुआ. इस से उस की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने लगी तो उस ने लोन लेने के साथ कई लोगों से करोड़ों रुपए उधार लिए. भीलवाड़ा जिले का रहने वाला एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भी शिवदत्त की प्रौपर्टीज में पैसा लगाता था.

शिवदत्त भीलवाड़ा में ब्राह्मण समाज और अन्य समाजों के धार्मिक कार्यक्रमों में मोटा चंदा देता था. इस से उस ने विभिन्न समाजों के धनी और जानेमाने लोगों का भरोसा भी जीत रखा था. ऐसे कई लोगों ने शिवदत्त की प्रौपर्टीज में निवेश कर रखा था.

शिवदत्त के ऊपर उधारी बढ़ती गई तो लेनदार भी परेशान करने लगे. शिवदत्त प्रौपर्टी बेच कर उन लोगों का पैसा चुकाना चाहता था, लेकिन बाजार में मंदी के कारण प्रौपर्टी का सही भाव नहीं मिल रहा था. इस से वह परेशान रहने लगा था. लोगों के तकाजे से परेशान हो कर उसने फोन अटेंड करना भी कम कर दिया था.

हालांकि शर्मीला ने पुलिस थाने में पति के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस को एक भी ऐसा सबूत नहीं मिला, जिस के उस के अपहरण की पुष्टि होती. एक सवाल यह भी था कि शिवदत्त अगर उधारी का पैसा नहीं चुका रहा था तो अपहर्त्ता उन के किसी परिजन को उठा कर ले जाते, क्योंकि लेनदारों को यह बात अच्छी तरह पता थी कि पैसों की व्यवस्था शिवदत्त के अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता.

घूमने लगा पुलिस का दिमाग

आधुनिक टैक्नोलौजी के इस जमाने में पुलिस तीनचौथाई आपराधिक मामले मोबाइल लोकेशन, काल डिटेल्स व सीसीटीवी फुटेज से सुलझा लेती है, लेकिन शिवदत्त के मामले में पुलिस के ये तीनों हथियार फेल हो गए थे. उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. सीसीटीवी फुटेज साफ नहीं थे. काल डिटेल्स से भी कोई खास बातें पता नहीं चलीं.

प्रौपर्टी का काम करने से पहले शिवदत्त के पास बोरिंग मशीन थी. वह हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर सहित कई राज्यों में ट्यूबवैल के बोरिंग का काम करता था. इन स्थितियों में तमाम बातों पर गौर करने के बाद पुलिस शिवदत्त के अपहरण के साथ अन्य सभी पहलुओं पर भी जांच करने लगी.

इसी बीच शिवदत्त की पत्नी शर्मीला ने राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी. इस में शर्मीला ने अपने पति को ढूंढ निकालने की गुहार लगाई. इस पर हाईकोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि शिवदत्त को तलाश कर जल्द से जल्द अदालत में पेश किया जाए.

अब पुलिस के सामने शिवदत्त मामले में दोहरी चुनौती पैदा हो गई. पुलिस ने शिवदत्त की तलाश ज्यादा तेजी से शुरू कर दी. मई के पहले सप्ताह में शिवदत्त का मोबाइल स्विच औन किया गया. इस से उस की लोकेशन का पता चल गया. पता चला कि वह मोबाइल देहरादून में है. भीलवाड़ा से तुरंत एक पुलिस टीम देहरादून भेजी गई. देहरादून में पुलिस ने मोबाइल की लोकेशन ढूंढी तो वह मोबाइल एक धोबी के पास मिला.

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धोबी ने बताया कि पास के ही एक गेस्टहाउस में रहने वाले एक साहब के कपड़ों में एक दिन गलती से उन का मोबाइल आ गया. उस मोबाइल को धोबी के बेटे ने औन कर के अपने पास रख लिया था. मोबाइल औन होने से उस की लोकेशन पुलिस को पता चल गई.

3 करोड़ के सपने ने पहुंचाया जेल

एक तो कड़ाके की सर्दी, दूसरे रात के यही कोई 2 बज रहे थे, तीसरे पहाड़ी इलाका, ऐसे में सड़कों पर धुंध होने की वजह से काफी शांति थी. कभी कभार इक्कादुक्का वाहन सामने से आता जरूर दिखाई दे जाता था. हालात ऐसे थे कि पीछे से आने वाला कोई वाहन आगे जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था. वैसे में उत्तराखंड के हरिद्वार की सड़कों पर एक पुलिस जीप भागी चली जा रही थी.

वह पुलिस जीप जिस समय हरिद्वार के चित्रा लौज के गेट पर पहुंची थी, रात के 3 बज रहे थे. कड़ाके की उस ठंड में हर कोई रजाई में दुबका सो रहा था. लेकिन जीप से आए पुलिस वाले किसी भी चीज की परवाह किए बगैर फुर्ती से जीप से उतरे और सीधे जा कर मैनेजर से मिले.

अपना परिचय दे कर उन्होंने मैनेजर को एक फोटो दिखाया तो वह उन्हें साथ ले कर दूसरी मंजिल की ओर चल पड़ा. दूसरी मंजिल पर पहुंच कर उस ने कमरा नंबर 206 का दरवाजा खटखटाया तो थोड़ी देर बाद आंखें मलते हुए एक युवक ने दरवाजा खोला.

युवक काफी स्वस्थ और सुंदर था. वह वही युवक था, जिस का फोटो पुलिस वाले ने लौज के मैनेजर को दिखाया था. उसे देख कर पुलिस वालों के चेहरे खिल उठे, क्योंकि उन की मंजिल मिल चुकी थी. जबकि उस युवक के चेहरे से साफ लग रहा था कि उतनी रात को दरवाजा खटखटा कर उस की नींद में खलल डालना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगा था.

इस हरकत से क्षुब्ध युवक ने बेरुखी से सामने खड़े मैनेजर से पूछा, ‘‘क्या बात हो गई मैनेजर साहब, जो इतनी रात को दरवाजा खटखटा रहे हैं?’’

मैनेजर ने साथ आए लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘ये लोग आप से मिलने आए हैं.’’

युवक उन लोगों से कुछ पूछता, उस के पीछे से आवाज आई, ‘‘कौन है भाई, इतनी रात को दरवाजा खटखटा रहा है?’’

दरवाजा खोलने वाला युवक अपने साथी के सवाल का जवाब दिए बगैर मैनेजर के साथ आए लोगों को पहचानता नहीं था, इसलिए उन्हें पहचानने की कोशिश करने लगा.

तभी मैनेजर के साथ आए लोगों में से सब से आगे खड़े व्यक्ति ने कहा, ‘‘इतनी रात को किसी का दरवाजा खटखटा कर परेशान करना ठीक नहीं है. लेकिन हम मजबूर थे मि. प्रमोद कुमार भाटी. तुम ने काम ही ऐसा किया है कि इतनी रात को तुम्हें परेशान करना पड़ा.’’

अजनबी के मुंह से अपना नाम सुन कर युवक एकदम से घबरा गया, जो उस के चेहरे पर साफ झलक आया था. लेकिन उस ने जल्दी ही खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘क्या कहा आप ने, प्रमोद कुमार भाटी, यह कौन हैं? यहां तो इस नाम का कोई आदमी नहीं है. आप लोग कौन हैं, मैं तो आप लोगों को पहचानता नहीं?’’

‘‘चिंता मत करो, अभी पहचान जाओगे.’’ कह कर उस आदमी ने युवक का कौलर पकड़ कर बाहर खींचा तो उस के साथ आए अन्य लोगों ने उसे दबोच लिया. इस के बाद कमरे के अंदर बैड पर रजाई में दुबके उस के साथी को भी पकड़ लिया गया.

इस के बाद उस कमरे की तलाशी ली गई. कमरे में जो भी जरूरत की चीज मिली, पुलिस ने जब्त कर लिया. सारे सुबूत और दोनों युवकों को साथ ले कर पुलिस स्थानीय थाने आ गई, जहां औपचारिक पूछताछ के बाद पुलिस ने उन के तीसरे साथी को उस के घर से पकड़ लिया था.

पकड़े गए तीनों युवकों के नाम प्रमोद कुमार भाटी, कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल तथा भावी कुमार मोदी थे. उन पर मुंबई में एक बड़ी चोरी करने का आरोप था. मुबई की थाना कुर्ला पुलिस ने हरिद्वार पुलिस की मदद से 2 लोगों को चित्रा लौज से उस समय गिरफ्तार किया था, जब वे लौज के कमरे में सो रहे थे, जबकि उन के तीसरे साथी को गुजरात से उस के घर से पकड़ा गया था.

30 जनवरी, 2014 की रात साढ़े 11 बजे मुंबई के उपनगर थाना कुर्ला में 73 वर्षीय रतनचंद जैन ने अपनी फर्म में करोड़ों की चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने वाले रतनचंद जैन अपने परिवार के साथ मुंबई के लालबाग के उदय गार्डन में रहते थे. उन का गहने बनाने का कारोबार था. उन का यह कारोबार आर.आर. संघवी एंड कंपनी के नाम की फर्म के माध्यम से होता था. उन की यह कंपनी कुर्ला न्यू मिल रोड पर थी, जो सोनेचांदी से ले कर हीरेजवाहरात के गहने बना कर बेचती थी.

रतनचंद जैन की यह फर्म लगभग 60 साल पुरानी थी, जिसे वह अपने तीन नौकरों की मदद से चलाते थे. फर्म सुबह ठीक 9 बजे खुलती थी अैर रात के ठीक 9 बजे बंद होती थी. फर्म में काम करने वाले तीनों नौकर फर्म में ही रहते थे. फर्म गुरुवार को बंद रहती थी, इसलिए उस दिन नौकरों को कहीं भी आनेजाने की छूट होती थी.

चोरी गुरुवार को ही हुई थी, जिस दिन फर्म बंद रहती थी. रात साढ़े 10 बजे रतनचंद जैन खापी कर सोने की तैयारी कर रहे थे कि फर्म में काम करने वाले नौकर कैलाश कुमार भाटी ने फोन कर के आशंका व्यक्त की थी कि लगता है फर्म में चोरी हो गई है. चोरी की बात सुन कर रतनचंद घबरा गए, क्योंकि करोडों का मामला था. घर वालों को बिना कुछ बताए ही उन्होंने कपड़े पहने और टैक्सी पकड़ कर फर्म पर जा पहुंचे.

फर्म पर पहुंच कर रतनचंद जैन को पता चला कि उन का एक नौकर प्रमोद कुमार भाटी गायब है. उस का फोन भी बंद है. रतनचंद जैन अपने तीनों नौकरों पर आंख मूंद कर विश्वास करते थे. तीनों नौकरों में 2 तो पुराने थे, लेकिन प्रमोद कुमार भाटी को उन्होंने अभी 6 महीने पहले ही रखा था.

लेकिन वह भी कोई बाहरी नहीं था. वह उन के पुराने और विश्वासपात्र नौकर कैलाश कुमार भाटी का चचेरा भाई था. इसलिए वह उस पर भी उसी तरह विश्वास करने लगे थे, जैसा कैलाश पर करते थे.

प्रमोद के गायब होने से उस के प्रति मन में तरहतरह की आशंकाएं उठने लगीं. वैसे तो वह काम में मेहनती और बातचीत में शरीफ था. लेकिन आदमी की कब नीयत खराब हो जाए, कौन जानता है. वह ताला तोड़वा कर अंदर पहुंचे तो फर्म की तिजोरी की स्थिति देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

तिजोरी में रखे सारे जेवरात और पैसे गायब थे. उन्होंने फर्म में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो प्रमोद कुमार भाटी का असली चेहरा सामने आ गया.

कैमरे की फुटेज में प्रमोद कुमार भाटी अपने एक साथी के साथ तिजोरी से गहने निकालते हुए साफ दिखाई दे रहा था. इस के बाद उन्होंने इस मामले में देर करना उचित नहीं समझा और दोनों नौकरों के साथ थाना कुर्ला जा पहुंचे.

रतनचंद जैन ने फर्म में हुई चोरी की रिपोर्ट थाना कुर्ला में लिखाई तो करोड़ों की इस चोरी पर थाने हड़कंप सा मच गया. थाने में ड्यूटी पर तैनात सबइंसपेक्टर प्रदीप पगारे ने तुरंत इस चोरी की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और कंट्रोल रूम को दी. इस के बाद कुछ सिपाहियों को साथ ले कर वह रतनचंद जैन की फर्म पर जा पहुंचे.

तिजोरी का निरीक्षण करने पर पता चला कि वह एकदम ठीकठाक थी. इस का मतलब उसे उसी की चाबी से खोला गया था. सबइंस्पेक्टर प्रदीप पगारे अभी निरीक्षण कर रहे थे कि डीसीपी धनंजय कुलकर्णी, एसीपी प्रकाश लाड़गे, सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे, इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले, असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत, सबइंसपेक्टर तुकाराम कोयडे भी वहां पहुंच गए.

डीसीपी धनंजय कुलकर्णी और एसीपी प्रकाश लाड़गे ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए.

अधिकारियों के जाने के बाद सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे ने रतनचंद जैन और उन के दोनों नौकरों से काफी लंबी पूछताछ की. इसी पूछताछ में चोरी गए गहनों की सूची बनाई गई. पता चला, चोरी गए स्वर्ण आभूषणों का वजन साढ़े 10 किलोग्राम था, जिन की बाजार में कीमत 2 करोड़ 84 लाख रुपए के आसपास थी. इस के अलावा तिजोरी में नकद 5 लाख की रकम भी रखी थी.

रतनचंद जैन और उन के दोनों नौकरों से पूछताछ कर के पुलिस थाने आ गई. अब पुलिस को चोरों तक पहुंचना था. चोरों के बारे में उन्हें पता चल ही गया था. मुख्य चोर प्रमोद कुमार भाटी के बारे में उन्हें सारी जानकारी उस के चचेरे भाई कैलाश कुमार भाटी से मिल गई थी.

सीसीटीवी फुटेज से साफ हो गया था कि चोरी प्रमोद कुमार भाटी ने ही अपने 2 साथियों के साथ मिल कर की थी, इसलिए किसी दूसरी दिशा में जांच का कोई सवाल ही नहीं उठता था. चोरों को जल्दी पकड़ना भी था, क्योंकि अगर उन्होंने चोरी का माल ठिकाने लगा दिया तो परेशानी खड़ी हो सकती थी.

इस बात को ध्यान में रख कर सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे ने इस मामले की जांच इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले को सौंप दी. इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले ने मामले की जांच की रूपरेखा तैयार की और पुलिस की 3 टीमें बना कर अलगअलग लोगों को उन की कमान सौंप दी. इन में से एक टीम का नेतृत्व असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत को सौंपा गया था.

असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत ने अपने सहयोगियों हेडकांस्टेबल निवृत्ती येधे यशवंत पवार, इब्राहीम सैयद, संदीप माने के साथ फर्म के पुराने नौकर कैलाश कुमार भाटी से प्रमोद के बारे में पूरी जानकारी ले कर उसे पकड़ने के प्रयास शुरू कर दिए.

इस तरह की घटना को अंजाम दे कर कोई भी अपराधी जल्दी अपने घर नहीं जाता, यही सोच कर असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत प्रमोद के घर जाने के बजाय उस की तलाश मुंबई में ही रहने वाले उस के नातेरिश्तेदारों के यहां करने लगे. मुंबई में जब उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो उन्होंने उस के गांव का रुख किया.

प्रमोद की तलाश के साथ उस के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा कर का लोकेशन भी पता किया जा रहा था. उस के मोबाइल की पहली लोकेशन बोरीवली नेशनल पार्क की मिली थी. इस से अंदाजा लगाया गया कि प्रमोद साथियों के साथ मुंबई से बाहर निकल गया है, क्योंकि शहर से बाहर जाने वाली बसें वहीं से जाती थीं.

इस के बाद प्रमोद कुमार भाटी के मोबाइल फोन की लोकेशन गुजरात के उस के गांव की मिली थी. उसी लोकेशन के आधार पर असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत उस के गांव पहुंचे. लेकिन पुलिस टीम के वहां पहुंचने तक उस ने दोस्त के साथ गांव छोड़ दिया था. दादादादी ने पुलिस को बताया कि वह दिल्ली जाने की बात कह कर घर से निकला था.

पुलिस टीम दिल्ली पहुंची. लेकिन दिल्ली में भी प्रमोद उन्हें नहीं मिला, क्योंकि पुलिस टीम के दिल्ली पहुंचने तक वह उत्तराखंड के हरिद्वार पहुंच गया था. पुलिस को यह जानकारी उस के मोबाइल फोन के लोकेशन से मिल रही थी. मोबाइल फोन के लोकेशन के आधार पर ही पुलिस टीम हरिद्वार जा पहुंची थी.

पुलिस टीम हरिद्वार तो पहुंच गई थी, लेकिन वहां प्रमोद और उस के साथी को ढूंढ़ना आसान नहीं था. लेकिन चोरों को तो पकड़ना ही था. असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत ने स्थानीय पुलिस की मदद से वहां के होटलों और लौजों में फोटो दिखा कर उन की तलाश शुरू कर दी.

आखिर उन की मेहनत रंग लाई और उन्होंने चित्रा लौज से प्रमोद और उस के साथी कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में प्रमोद ने बताया कि चोरी का सारा माल उस के तीसरे साथी भावी कुमार मोदी के पास रखा है.

असिस्टैंट इंसपेक्टर संपतराव राऊत ने हरिद्वार से ही यह जानकारी सीनियर इंसपेक्टर विनोद शिंदे और इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले को दी तो इंसपेक्टर सर्वेराज जगदाले ने तत्काल सबइंस्पेक्टर प्रदीप पगारे की टीम को चोरी का माल बरामद करने के लिए भावी कुमार मोदी के गांव के लिए रवाना कर दिया था.

सबइंसपेक्टर प्रदीप पगारे अपनी टीम के साथ भावी कुमार मोदी के घर पहुंचे तो संयोग से वह घर पर ही मिल गया. उन्होंने उसे गिरफ्तार कर के चोरी का सारा माल बरामद कर लिया.

तीनों को मुंबई लाया गया और अगले दिन महानगर दंडाधिकारी के सामने पेश कर पूछताछ के लिए 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में प्रमोद कुमार भाटी और उस के साथियों ने आर.आर. संघवी एंड कंपनी में चोरी की जो कहानी सुनाई, वह चोरी कर के जल्दी से जल्दी करोड़पति बनने की निकली.

प्रमोद कुमार भाटी गुजरात के जिला मानसरोवर के गांव पालनपुर का रहने वाला था. उस के पिता प्रकाश कुमार के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, उसी में मेहनत कर के वह किसी तरह गुजारा कर रहे थे. परिवार बड़ा था, इसलिए घर में हमेशा आर्थिक तंगी रहती थी.

प्रमोद कुमार भाटी भाईबहनों में सब से बड़ा था. समझदार हुआ तो कोई कामधंधा कर के वह परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने के बारे में सोचने लगा. इसी चक्कर में वह मुंबई में रहने वाले अपने चचेरे भाई कैलाश कुमार भाटी के पास आ गया.

कैलाश कुमार 15 सालों से मुंबई में रतनचंद जैन की गहने बनाने वाली आर.आर. संघवी एंड कंपनी में काम कर रहा था. वह मेहनती और ईमानदार था, इसलिए रतनचंद जैन उसे बेटे की तरह मानते थे. यही वजह थी कि करोड़ों का माल वह उस के भरोसे छोड़ देते थे.

फर्म की तिजोरी की एक चाबी वह अपने पास रखते थे, जबकि दूसरी चाबी उन की फर्म के ठीक सामने स्थित के.के. ज्वैलर्स के मालिक के पास रहती थी.

यह फर्म रतनचंद जैन के रिश्तेदार की थी. यह चाबी उन के पास इसलिए रहती थी कि अगर कभी किसी ग्राहक को अचानक जरूरत पड़ जाए तो फर्म के नौकर इस चाबी से तिजोरी खोल कर उस ग्राहक को माल दे सकें.

रतनचंद कैलाश पर ही नहीं, अपने सभी नौकरों पर उसी तरह भरोसा करते थे. यही वजह थी कि उन के रहने और सोने की व्यवस्था उन्होंने अपनी कंपनी में ही कर रखी थी.

कैलाश कुमार को अपने चाचा के घर की आर्थिक स्थिति पता थी, इसलिए प्रमोद जब गांव से काम की तलाश उस के पास आया तो उस ने अपने मालिक रतनचंद जैन से कह कर उसे अपनी ही कंपनी में नौकरी दिला दी.

प्रमोद कुमार भाटी भी उसी तरह मेहनत और ईमानदारी से काम करने लगा, जिस तरह कैलाश और अन्य नौकर कर रहे थे. अपनी मेहनत और ईमानदारी से जल्दी ही उस ने फर्म के मालिक रतनचंद जैन के मन में अपने लिए खास जगह बना ली. इस तरह अन्य नौकरों की तरह वह भी उन का विश्वासपात्र बन गया.

रतनचंद जैन को प्रमोद पर भरोसा हो गया तो वह उसे भी फर्म की तिजोरी की चाबी देने लगे. इस के बाद जरूरत पड़ने पर अन्य नौकरों की तरह वह भी के.के. ज्वैलर्स के यहां से चाबी लाने लगा.

प्रमोद कुमार भाटी को नौकरी पर लगे 2-3 महीने ही हुए थे कि किसी काम से उसे गांव जाना पड़ा. छुट्टी ले कर वह गांव गया तो वहां वह अपने दोस्तों कमलेश उर्फ कल्पेश पटेल और भावी कुमार मोदी से मिला.

कमलेश उर्फ कल्पेश पटेल और भावी कुमार मोदी के परिवारों की भी आर्थिक स्थिति वैसी ही थी, जैसी प्रमोद कुमार के परिवार की थी. वे ज्यादा पढ़लिख भी नहीं पाए थे. कामधंधा न होने की वजह से गांव में आवारों की तररह घूमते रहते थे.

मुंबई से आए प्रमोद को देख कर उस के दोनों दोस्त हैरान रह गए. बातचीत में जब उन्हें पता चला कि प्रमोद गहने बनाने वाली कंपनी में काम करता है और वहां रोजाना लाखों का कारोबार होता है तो उन के मुंह में पानी आ गया. उन्हें लगा कि अगर फर्म का सारा माल उन के हाथ लग जाए तो वे तुरंत करोड़पति बन जाएंगे. सही बात है, खाली दिमाग शैतान का घर होता है, वह हमेशा उलटा ही सोचता है.

कमलेश और भावी ने जब यह बात प्रमोद से कही तो उस ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. लेकिन उन दोनों ने हार नहीं मानी और लगातार उसे चोरी के लिए राजी करने में लगे रहे. आखिर वे प्रमोद को पटरी पर लाने में कामयाब हो ही गए. उसे भी लगा कि अगर कंपनी का सारा माल उसे मिल जाता है तो उस के परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी. उस के बाद उसे कहीं काम करने की जरूरत नहीं रहेगी.

प्रमोद को कंपनी की सारी गतिविधियों और कामकाज का पता ही था, यह भी पता था कि कंपनी में हमेशा 3-4 करोड़ का माल यानी सोने के गहने, नकदी रखी रहती है.

दोस्तों के साथ करोड़ों की चोरी करने की योजना बना कर प्रमोद छुट्टी खतम होने के बाद मुंबई आ गया और पहले की ही तरह कंपनी के काम करने लगा. लेकिन अब उसे योजना को अंजाम देने के लिए हमेशा मौके की तलाश रहने लगी थी.

चोरी करने के एक दिन पहले यानी 29 जनवरी, 2014 को प्रमोद ने फोन कर के अपने दोनों दोस्तों, कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल और भावी कुमार मोदी को मुंबई बुला लिया. 30 जनवरी, 2014 को कंपनी बंद थी. उस दिन अगलबगल की भी सारी दुकानें बंद रहती थीं, इसलिए रास्ता पूरी तरह साफ था.

शाम 7 बजे कैलाश और अन्य नौकर घूमने और खाना खाने बाहर चले गए तो प्रमोद अपने काम में लग गया. उस ने तुरंत फोन कर के कुर्ला स्टेशन के आसपास घूम रहे अपने दोस्तों को बुला लिया और खुद तिजोरी की चाबी लेने के.के. ज्वैलर्स के यहां चला गया.

के.के. ज्वैलर्स से चाबी लेते समय उस ने कहा था कि एक बड़ा ग्राहक आया है, जिसे और्डर का समान देना है. ऐसा हमेशा होता आया था, इसलिए तिजोरी की चाबी मिलने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

चाबी ला कर प्रमोद ने भावी कुमार मोदी को फर्म के बाहर निगरानी पर खड़ा कर दिया और खुद कमलेश उर्फ कल्पेश पटेल के साथ अंदर आ गया. इस के बाद तिजोरी खोल कर उस में रखे सारे गहने और 5 लाख रुपए नकद ले कर तिजोरी को बंद कर के चाबी के.के. ज्वैलर्स को दे दी. सारा काम निपटा कर फर्म में बाहर से ताला बंद किया और दोस्तों के साथ चला गया.

तीनों ने कुर्ला स्टेशन के पास से टैक्सी पकड़ी और बोरीवली आ गए, जहां से बस पकड़ कर अपने गांव चले गए. गांव में प्रमोद ने चेरी का सारा माल भावी कुमार मोदी के यहां रखा और गिरफ्तारी से बचने के लिए खुद कमलेश उर्फ कल्पेश के साथ गांव छोड़ दिया.

गांव से दोनों दिल्ली आए, जहां वसंत विहार के एक लौज में ठहरे. अगले दिन दोनों हरिद्वार चले गए. हरिद्वार में एक रात वे बालाजी लौज में ठहरे. इस के अगले दिन वे चित्रा लौज में ठहरे, जहां से पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. इस के बाद पुलिस ने सारा माल भी बरामद कर लिया. इस तरह उन के करोड़पति बनने और ऐशोआराम से जीने का सपना टूट गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रमोद कुमार भाटी, कमलेश उर्फ कल्पेश कुमार पटेल और भावी कुमार मोदी के खिलाफ चोरी का मामला दर्ज कर के पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में आर्थर रोड जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित