Shocking Murder Case : औरत का दूसरा चेहरा

Shocking Murder Case. पत्नी की मौत के बाद रुकुमपाल ने एकलोते बेटे शीलेश और बेटी की वजह से दूसरी शादी नहीं की. उसी बेटे ने पत्नी के कहने पर पिता को काट डाला.  

उत्तर प्रदेश के जिला एटा की कोतवाली देहात के गांव नगला समल में रहता था रुकुमपाल. शहर के नजदीक और सड़क के किनारे  बसा होने की वजह से गांव के लोग खुश और संपन्न थे. रुकुमपाल के पास खेती की जमीन ठीकठाक थी और वह मेहनती भी था, इसलिए गांव के हिसाब से उस के परिवार की गिनती खुशहाल परिवारों में होती थी. हंसीखुशी के साथ जिंदगी गुजार रही थी कि एक दिन अचानक रुकुमपाल की पत्नी श्यामश्री की मौत हो गई.

श्यामश्री की मौत हुई थी तो बेटी आशा 6 साल की थी और बेटा शीलेश 4 साल का. छोटेछोटे बच्चों को संभालना मुश्किल था, इसलिए घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार भी उस की दूसरी शादी कराना चाहते थे. लेकिन रुकुमपाल ने शादी से तो मना किया ही, खुद को भी संभाला और मां की मदद से बच्चों को भी संभाल लिया.

पत्नी की मौत के बाद बच्चों को मां रामरखी के भरोसे छोड़ कर रुकुमपाल परिवार और जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश करने लगा था. शादी से उस ने मना ही कर दिया था, इसलिए दोनों बच्चों को बाप के साथसाथ वह मां का भी प्यार दे रहा था. इस में उसे परेशानी तो हो रही थी, लेकिन बच्चों के लिए वह इस परेशानी को झेल रहा था. क्योंकि वह बच्चों के लिए सौतेली मां नहीं लाना चाहता था.

समय जितना जालिम होता है, उतना ही दयालु भी होता है. समय के साथ बड़ेबड़े जख्म भर जाते हैं. रुकुमपाल की जिंदगी भी सामान्य हो चली थी. बच्चे भी मां को भूल कर अपनीअपनी जिंदगी संवारने में लग गए थे.

आशा पढ़लिख कर शादी लायक हो गई तो रुकुमपाल ने एटा के ही गांव नगला बेल के रहने वाले विनोद कुमार के साथ उस का विवाह कर दिया. विनोद वन विभाग में नौकरी करता था. नौकरी की वजह से वह एटा में रहता था, इसलिए आशा भी उस के साथ एटा में ही रहने लगी थी.

रुकुमपाल बेटे को पढ़ाना चाहता था, लेकिन शीलेश इंटर से ज्यादा नहीं पढ़ सका. पढ़ाई छोड़ कर वह दिल्ली चला गया और किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. हालांकि रुकुमपाल चाहता था कि शीलेश गांव में ही रहे, क्योंकि उस के पास जमीन ठीकठाक थी.

लेकिन शीलेश को जो आजादी दिल्ली में मिल रही थी, शायद वह गांव में नहीं मिल सकती थी, इसलिए उस ने रुकुमपाल से साफ कह दिया था कि वह जहां भी है, वहीं ठीक है.

पत्नी की मौत के बाद रुकुमपाल ने अपना पूरा जीवन यह सोच कर बच्चों के लिए होम कर दिया था कि यही बच्चे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे. बेटी तो ससुराल चली गई थी. बचा था शीलेश, वह उस की कल्पना से अलग ही स्वभाव का लग रहा था. उस का सोचना था कि पिता ने अपना फर्ज पूरा किया है, उस के लिए कोई कुर्बानी नहीं दी है.

अपनी इसी सोच की वजह से कभीकभी शीलेष रुकुमपाल को ऐसी बात कह देता था कि उस के मन को गहरी ठेस पहुंचती थी. लेकिन उस के लिए शीलेश अभी भी बच्चा था. इसलिए वह उस की इन बातों को दिल से नहीं लेता था.

रुकुमपाल को अपने फर्ज पूरे करने थे, इसलिए वह शीलेश की शादी के लिए जीजान से जुट गया. आखिर उस की तलाश रंग लाई और एटा के ही गांव निछौली कलां के रहने वाले सोबरन की बेटी ममता उसे पसंद आ गई. फिर उस ने धूमधाम से उस की शादी कर दी.

सोबरन की 4 बेटियों में ममता सब से छोटी थी. उस का एक ही भाई था किशोरी. अंतिम बेटी होने की वजह से सोबरन ने ममता की शादी खूब धूमधाम से की थी.

ममता के आने से सब से ज्यादा खुशी दादी रामरखी को हुई थी. क्योंकि घर में दुलहन के आ जाने से उसे एक सहारा मिल गया था. कुछ दिन गांव में रह कर ममता शीलेश के साथ दिल्ली चली गई थी. ममता गर्भवती हुई तो शीलेश उसे गांव छोड़ गया.

कुछ दिनों बाद ममता ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी पैदा होने के बाद भी ममता दिल्ली नहीं गई. अब महीने, 2 महीने में शीलेश ही पत्नी और बिटिया से मिलने गांव आ जाता था.

बेटी 2 साल की हुई तो ममता एक बार फिर गर्भवती हुई. इस बार उस ने बेटे को जन्म दिया. ममता दिल्ली जाना तो नहीं चाहती थी, लेकिन रुकुमपाल और रामरखी ने उसे जबरदस्ती दिल्ली भेज दिया.

दिल्ली आने के बाद कुछ दिनों में ममता को लगा कि पति की कमाई से घर ठीक से नहीं चल सकता तो वह गांव लौट आई और रुकुमपाल से साफ कह दिया कि अब वह दिल्ली नहीं जाएगी.

ममता मजबूरी में गांव में रह रही थी, क्योंकि एक तो पति की कमाई में गुजर नहीं होता था, दूसरे उस के छोटे से कमरे में उसे घुटन सी होती थी.

गांव में दिन तो कामधाम में कट जाता था, लेकिन पति के बिना रात काटना मुश्किल हो जाता था. जिस्म की भूख और अकेलापन काटने को दौड़ता था.

ममता ने शीलेश से कई बार कहा कि वह आ कर गांव में रहे, लेकिन शीलेश को शहर का जो चस्का लग चुका था, वह उसे गांव वापस नहीं आने दे रहा था.

पति की इस उपेक्षा से नाराज हो कर ममता मायके चली गई थी. लेकिन अब मायके में तो जिंदगी कट नहीं सकती थी, इसलिए मजबूर हो कर उसे ससुराल आना पड़ा. फिर मांबाप ने भी कह दिया था कि वह जैसी भी ससुराल में है, उसे उसी में खुश रहना चाहिए.

ममता को ससुराल में कोई भी परेशानी नहीं थी. परेशानी थी तो सिर्फ यह कि पति का साथ नहीं मिल पा रहा था. इस परेशानी का भी वह हल ढूंढने लगी. ऐसे में ही एक दिन वह मायके जा रही थी तो एटा में उस की मुलाकात हरीश से हो गई.

हरीश और ममता एकदूसरे को शादी के पहले से ही जानते थे. हरीश उस के गांव के पास का ही रहने वाला था. दोनों एकदूसरे को तब से पसंद करते थे, जब साथसाथ पढ़ रहे थे. बसअड्डे पर हरीश मिला तो ममता ने पूछा, ‘‘हरीश गांव चल रहे हो क्या?’’

‘‘अब शाम हो गई है तो गांव ही जाऊंगा न. तुम्हें देख कर तो यही लग रहा है कि तुम भी मायके जा रही हो?’’ हरीश ने पूछा.

‘‘हां, मायके ही जा रही हूं. अब तुम मिल गए हो तो कोई परेशानी नहीं होगी. बाकी बच्चों को ले कर आनेजाने में बड़ी परेशानी होती है.’’

‘‘किसी को साथ ले लिया करो.’’ हरीश ने कहा तो ममता तुनक कर बोली, ‘‘किसे साथ ले लूं. वह तो दिल्ली में रहते हैं. घर में बूढ़े ससुर हैं, उन्हें खेती के कामों से ही फुरसत नहीं है.’’

‘‘तुम्हारे पति तुम से इतनी दूर दिल्ली में रहते हैं और तुम यहां गांव में रहती हो?’’

‘‘क्या करूं, उन के साथ वहां छोटी सी कोठरी में मेरा दम घुटता है, इसलिए मैं यहां गांव में रहती हूं.’’

‘‘तो उन से कहो, वह भी यहां गांव में आ कर रहें. पति के बिना तुम अकेली कैसे रह लेती हो?’’ हरीश ने कहा तो ममता निराश हो कर बोली, ‘‘उन्हें गांव में अच्छा ही नहीं लगता.’’

‘‘लगता है, वहां उन्हें कोई और मिल गई है. तुम यहां उन के नाम की माला जप रही हो और वह वहां मौज कर रहे हैं.’’

‘‘भई वह मर्द हैं, कुछ भी कर सकते हैं.’’

‘‘तो औरतों को किस ने मना किया है. वह वहां मौज कर रहे हैं, तुम यहां मौज करो. तुम्हारे लिए मर्दों की कमी है क्या.’’

वैसे तो हरीश ने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन ममता ने इसे गंभीरता से ले लिया. उस ने कहा, ‘‘मैं 2 बच्चों की मां हूं, मुझे कौन पूछेगा?’’

‘‘तुम हाथ बढ़ाओ,सब से पहले मैं ही पकड़ूंगा.’’ हरीश ने हंसते हुए कहा, ‘‘ममता, मैं तुम्हें तब से प्यार करता हूं, जब हम साथ पढ़ते थे. लेकिन मैं अपने मन की बात कह पाता, उस के पहले ही तुम किसी और की हो गई.’’

जब ममता ने भी उस से मन की बात कह दी तो दोनों चोरीछिपे मिलने ही नहीं लगे, बल्कि संबंध भी बना लिए. ममता मौका निकाल कर हरीश से मिलने लगी. हरीश से संबंध बनने के बाद ममता को शीलेश की कोई परवाह नहीं रह गई.

शीलेश महीने, 2 महीने में घर आता और 1-2 दिन रह कर दिल्ली वापस चला जाता. उस के बाद ममता को जब भी हरीश से मिलना होता, किसी न किसी बहाने एटा चली जाती और उस से मिल लेती. मोबाइल फोन इस काम में उन की पूरी मदद कर रहा था. अब वह खुश थी.

ममता का बारबार एटा जाना रामरखी को अच्छा नहीं लगता था. उस ने रोका भी, लेकिन ममता के बहाने ऐसे होते थे कि वह रोक नहीं पाती थी. फिर उस पर उस का इतना जोर भी नहीं चलता था, इसलिए ममता आराम से हरीश से मिल रही थी.

लेकिन एक दिन गांव के किसी आदमी ने ममता को हरीश के साथ देख लिया तो उस ने रुकुमपाल को बता दिया कि उस की बहू शहर में किसी लड़के के साथ घूम रही थी. बात चिंता वाली थी. लेकिन रुकुमपाल ने अपनी आंखों से नहीं देखा था, इसलिए वह बहू से कुछ कह नहीं सकता था.

रुकुमपाल को पता था कि उस का बेटा उस से ज्यादा पत्नी पर विश्वास करता था, इसलिए उस से कुछ कहने से कोई फायदा नहीं था.

उसी बीच रामरखी कुछ दिनों के लिए आशा के यहां चली गई तो ममता को हरीश से घर में ही मिलने का मौका मिल गया. रुकुमपाल दिनभर खेतों पर रहता था, इसलिए ममता हरीश को घर में बुलाने लगी. संयोग से एक दिन रुकुमपाल की तबीयत खराब हो गई तो वह दोपहर को ही घर आ गया. घर में अनजान युवक को देख कर उस ने ममता से पूछा, ‘‘यह कौन है?’’

‘‘मेरे मामा का बेटा है.’’ ममता ने कहा.

‘‘आज से पहले तो इसे कभी नहीं देखा.’’

‘‘पापा, यह पहली बार मेरे यहां आया है.’’

ममता और रुकुमपाल बातचीत कर रहे थे, तभी हरीश चुपके से खिसक गया. इस से रुकुमपाल को पूरा शक हो गया कि यह वही लड़का है, जिसे ममता के साथ एटा में देखा गया था.

अब रुकुमपाल ममता पर नजर रखने लगा. बाहर आनेजाने के लिए भी वह उसे मना करने लगा. परेशान हो कर आखिर एक दिन ममता ने कह दिया, ‘‘मैं इस घर की बहू हूं, नौकरानी नहीं कि 24 घंटे घर में कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहूं. मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं. जब देखो तब आप रोकतेटोकते रहते हैं. यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

रुकुमपाल समझ गया कि बहू उस के हाथ से निकल चुकी है. अब इसे संभालना उस के वश का नहीं है. इसलिए उस ने शीलेश को फोन किया कि वह आ कर अपनी बीवीबच्चों को ले जाए. क्योंकि अब उन्हें संभालना उस के वश में नहीं है.

‘‘ऐसा क्या हो गया पापा?’’ शीलेश ने पूछा.

रुकुमपाल ने सच्चाई छिपा ली, क्योंकि वह जानता था कि सच्चाई बताने पर बेटे का घर टूट सकता है. उस ने कहा, ‘‘मुझे लगता है, तुम्हारे बिना ममता उदास रहती है. बच्चे भी तुम्हें बहुत याद करते हैं.’’

‘‘ठीक है पापा, मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर आ रहा हूं.’’

ममता को जब पता चला कि रुकुमपाल उसे दिल्ली भेजना चाहता है तो वह बेचैन हो उठी. उस ने तुरंत शीलेश को फोन किया, ‘‘तुम अपने काम में मन लगाओ. अगर मैं दिल्ली आ गई तो यहां दादी और पापा को कौन देखेगा. तुम मेरी और बच्चों की चिंता बिलकुल मत करो. मेरी तो अब तुम्हारे बिना रहने की आदत सी पड़ गई है.’’

रामरखी के न रहने से ममता आजाद थी. उस ने एक दिन फोन कर के फिर हरीश को बुला लिया.

रुकुमपाल ममता पर बराबर नजर रख रहा था. इसलिए हरीश के आने की खबर उसे लग गई. संयोग से उस दिन ममता ने दरवाजा बंद नहीं किया था, इसलिए रुकुमपाल ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

रुकुमपाल को देख कर हरीश तो भाग खड़ा हुआ, जबकि ममता डर से कांपने लगी. रुकुमपाल ने पहले तो उसे खूब फटकारा. इस के बाद कहा, ‘‘अब तुम्हें गांव में रहने की जरूरत नहीं है. मैं सब कुछ बता कर शीलेश को बुलाता हूं और तुम्हें उस के साथ दिल्ली भेज देता हूं.’’

ममता बुरी तरह डर गई. क्योंकि अगर उस के और हरीश के संबंधों की जानकारी शीलेश को हो जाती तो वह उस की नजरों में गिर जाती. दूसरी ओर वह दिल्ली बिलकुल नहीं जाना चाहती थी. इसलिए सोचने लगी कि वह ऐसा क्या करे कि शीलेश को बाप की बात पर विश्वास न हो.

रुकुमपाल ने ममता को भले ही धमकी दे दी थी, लेकिन शीलेश को वह यह सब बताना नहीं चाहता था. क्योंकि वह बेटे की गृहस्थी बरबाद नहीं करना चाहता था. ममता ने हरीश से कह दिया था कि कुछ दिनों तक वह इधर बिलकुल न आए.

इस के बाद उस ने पूरी योजना बना कर जो ड्रामा रचा, उस में सचमुच उस ने रुकुमपाल को चारों खाने चित कर दिया.

उस ने शीलेश को फोन किया, ‘‘तुम जल्दी से गांव आ जाओ. मैं यहां बहुत परेशान हूं.’’

‘‘तुम्हें जो भी परेशानी हो, पापा से बता दो. मैं अभी नहीं आ सकता, क्योंकि मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी.’’ शीलेश ने कहा.

‘‘उन से क्या बताऊं परेशानी, परेशानी की वजह ही वही हैं. तुम्हें अपनी नौकरी की पड़ी है और मैं यहां उन की हरकतों से परेशान हूं.’’

‘‘क्या… पापा की हरकतों से परेशान हो?’’ शीलेश हैरानी से बोला.

‘‘एक ही बात को कितनी बार कहूं?’’ ममता गुस्से में बोली.

ममता ने ऐसी बात कह दी थी कि मजबूरन शीलेश को छुट्टी ले कर घर आना पड़ा. बेटे को देख कर रुकुमपाल ने राहत की सांस ली. उस ने सोचा था कि बेटा आ गया है तो वह बहू को उस के साथ भेज देगा. उस के बाद सारा झंझट खत्म हो जाएगा.

रुकुमपाल कुछ दूसरा सोच रहा था, जबकि ममता कुछ और ही सोचे बैठी थी. रात में उस ने रोते हुए शीलेश से कहा, ‘‘तुम तो दिल्ली में रहते हो, यहां मुझे इज्जत बचाना मुश्किल हो गया है.’’

‘‘तुम्हें भ्रम हुआ होगा. करने की कौन कहे, पापा ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते.’’ शीलेश ने कहा.

‘‘उन्हें पता है कि तुम मेरी बात पर विश्वास नहीं करोगे, इसीलिए तो वह मुझे गंदी नजरों से देखते हैं. इस हालत में मैं अपनी इज्जत कैसे बचाऊं?’’

शीलेश को पत्नी की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. जिस बाप ने उस की खातिर अपनी जवानी होम कर दी थी, वह उस की पत्नी के साथ गलत काम करने की कैसे सोच सकता था. उस ने ममता को समझाना चाहा, लेकिन ममता अपनी जिद पर अड़ी थी. तब उस ने दिल्ली चलने को कहा तो ममता ने वहां जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘नहीं जाना मुझे दिल्ली, वहां उस छोटी सी कोठरी में मेरा दम घुटता है.’’

उस रात ममता ने रोधो कर ऐसा त्रियाचरित्र रचा कि शीलेश को पूरा विश्वास हो गया कि ममता सही है और उस के पापा गलत. यही नहीं, उस ने वादा भी कर लिया कि सुबह वह इस बात को ले कर पापा से आरपार की बात करेगा.

सुबह रुकुमपाल शीलेश से ममता के बारे में कुछ कहता, उस से पहले ही शीलेश ने कहा, ‘‘पापा, आप एकदम बेशरम ही हो गए हैं क्या?’’

‘‘क्यों? मैं ने ऐसा क्या किया, जो तुम मुझे बेशरम कह रहे हो?’’ रुकुमपाल ने हैरानी से पूछा.

‘‘बहू पर नीयत खराब किए हो और कह रहे हो कि मैं ने क्या किया है.’’

रुकुमपाल की समझ में सारा माजरा आ गया. उस ने बेटे को समझाने के लिए कहा, ‘‘बेटा अपना पाप छिपाने के लिए तुम्हारी पत्नी मेरे ऊपर यह लांछन लगा रही है. सोचो, जिस आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी तुम लोगों के पीछे होम कर दी, अब इस उम्र में वह ऐसी घटिया हरकत करेगा? मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि बुढ़ापे में मुझ पर यह कलंक भी लगेगा.’’

‘‘पापा, आप कुछ और कह रहे हैं और ममता कुछ और.’’

ममता ने रोधो कर शीलेश के मन में रुकुमपाल के खिलाफ जो जहर भरा था, उस की वजह से वह बाप की न कोई बात सुनने को तैयार था न कोई तर्क.

दूसरी रुकुमपाल उस से बहुत कुछ कहना चाहता था, जबकि वह उस की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं था.

ममता खुश थी कि वह बापबेटे के बीच दीवार खड़ी करने में कामयाब हो गई थी. शीलेश चारपाई पर लुढ़का तो सुबह ही उठा. उठते ही उस ने कहा, ‘‘ममता, तुम अपना सारा सामान समेटो. हम दिल्ली चलेंगे.’’

ममता घबरा गई. उस का फेंका पासा उलटा पड़ रहा था. क्योंकि इस हालत में अगर वह दिल्ली चली गई तो फिर लौट नहीं सकती थी. हरीश दिल्ली जा नहीं सकता. तब वह उस से कैसे मिल पाती. अब वह इस सोच में डूब गई कि ऐसा क्या करे कि उसे दिल्ली भी न जाना पड़े और बुड्ढे से भी पिंड छूट जाए.

काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह दिल्ली जाने के बजाय इस कांटे को ही जड़ से निकलवा फेंकेगी. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें पता नहीं, मैं पेट से हूं. इस हालत में मैं दिल्ली नहीं जा सकती. अब तुम्हें सोचना है कि इस हालात में तुम मुझे अपने बाप से कैसे बचा सकते हो? कोई दूसरा होता तो वह ऐसे आदमी को खत्म कर देता, जो उस की पत्नी पर बुरी नजर रखता हो.’’

ममता ने यह चाल बहुत सोचसमझ कर चली थी. उस का सोचना था कि शीलेश अगर अपने बाप को मार देता है तो बाप की हत्या के आरोप में वह जेल चला जाएगा. उस के बाद वह पूरी तरह से आजाद हो जाएगी. फिर वह आराम से हरीश से मिल सकेगी.

रुकुमपाल यह तो जान गया था कि पत्नी के कहने में आ कर बेटा उस के खिलाफ हो गया है. लेकिन उसे यह विश्वास नहीं था कि बेटा उस की जान का ही दुश्मन बन जाएगा. उस का सोचना था कि जब शीलेश को सच्चाई का पता चलेगा तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा.

19 मार्च की शाम को शीलेश ने रुकुमपाल से खेतों से भूसा लाने को कहा. रुकुमपाल भूसा लाने के लिए खेतों की ओर चला तो शीलेश भी फावड़ा ले कर उस के पीछेपीछे वहां जा पहुंचा. उस के साथ ममता भी थी.

रुकुमपाल झुक कर भूसा निकालने लगा तो शीलेश ने पीछे से उस पर फावड़े से वार कर दिया. रुकुमपाल चीख कर गिर पड़ा. उस की चीख सुन कर आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग उस की ओर दौड़े.

वे रुकुमपाल के पास तक पहुंच पाते, इस से पहले शीलेश ने बाप पर फावड़े से कई वार किए और भाग निकला. लेकिन गांव वालों ने उसे ही नहीं, ममता को भी उस के साथ भागते हुए देख लिया था.

गांव वालों ने घटना की सूचना कोतवाली देहात पुलिस को दी. सूचना पा कर कोतवाली प्रभारी पदम सिंह पुलिस बल के साथ गांव नगला समल पहुंच कर रुकुमपाल के खेत पर गए. पहुंचते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले लिया.

गांव वालों ने पूछताछ में बताया कि जब वे रुकुमपाल की चीख सुन कर उस की ओर दौड़े थे तो उन्हें मृतक का बेटा शीलेश और बहू ममता भागते ही दिखाई दिए थे.

पुलिस को लगा कि उन्हीं लोगों ने यह काम किया है, तभी भाग रहे थे अन्यथा बाप की चीख सुन कर वह बचाने दौड़तेभागते नहीं. कोतवाली प्रभारी ने 2 सिपाहियों को घटनास्थल पर छोड़ा और खुद बाकी सिपाहियों को ले कर रुकुमपाल के घर जा पहुंचे.

शीलेश भागने की तैयारी कर रहा था. ममता भी उस के साथ थी. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने मृतक की बेटी आशा को घटना की सूचना दी तो वह दादी रामरखी को साथ ले कर आ गई. रुकुमपाल की लाश देख कर रामरखी बेहोश हो गई तो आशा भी फूटफूट कर रोने लगी.

रामरखी को होश में लाया गया तो वह रोते हुए कहने लगी, ‘‘ममता ने ही अपने यार से मिलने के लिए मेरे बेटे को मरवाया है, क्योंकि मेरा बेटा उसे उस से मिलने से रोकता था.’’

जब आशा को पता चला कि शीलेश ने ही उस के पिता की हत्या की है तो उस का दुख और बढ़ गया. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद शीलेश और ममता को ले कर थाने आ गई.

थाने में शीलेश और ममता ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद ममता ने ससुर की हत्या करवाने के पीछे की अपने अवैध संबंधों की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर शीलेश ने अपना सिर पीट लिया.

लेकिन अब क्या हो सकता था. पत्नी के कहने में आ कर उस ने अपने बच्चों को तो अनाथ किया ही, उस बाप के खून से हाथ रंग लिए, जिस ने उसे बाप का ही नहीं, मां का भी प्यार दिया था. उस ने दादी के बुढ़ापे का सहारा छीनने के साथ भरापूरा परिवार बरबाद कर दिया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शीलेश और ममता को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. रुकुमपाल का भी कैसा दुर्भाग्य था कि जिस बेटे से उस ने उम्मीद लगा रखी थी कि मरने पर उस का अंतिम संस्कार करेगा. उसी ने उसे मौत के घाट उतार दिया.  Shocking Murder Case

Social Awareness : वीरान जिंदगी में भेरें रंग

Social Awareness. हमारे यहां जीवनसाथी खो चुके पुरुषों और औरतों को हेयदृष्टि से ही नहीं देखा जाता, बल्कि उन की उपेक्षा और अपमान भी किया जाता है. हम उन के जीवन में कैसे सुधार ला सकते हैं…

झारखंड के लोहारदगा के रहने वाले 42 साल के महावीर उरांव की पत्नी की मौत एक साल पहले हो गई थी. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन की मुलाकात 45 साल की मनियारी उरांव से हुई तो वह उसे दिल से चाहने लगी. वह भी अकेली थी. उस के पति ने 7 साल पहले उसे छोड़ दिया था. उस की भी 27 साल की एक बेटी थी, जिस की शादी हो चुकी थी.

महावीर और मनियारी, दोनों ही एकदूसरे को न केवल पसंद करते थे, बल्कि प्यार भी करते थे. इस बात की जानकारी महावीर की 17 साल की बेटी प्रमिला टोप्पो को हुई तो उस ने अपने पिता की शादी मनियारी से कराने का निश्चय ही नहीं किया, बल्कि कोशिश कर के करा भी दी. इस तरह जीवनसाथी खो चुके 2 तनहा दिलों की उजड़ी वीरान जिंदगी फिर से संवर गई.

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देखा जाए तो यह कितनी अच्छी कोशिश है. अगर बच्चे या परिवार वाले चाहें तो इस तरह उन के घर के विधवा या विधुर की जिंदगी में एक बार फिर उम्मीद और खुशी की लहर जाग सकती है. हमारे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन का जीवनसाथी समय से पहले उन्हें छोड़ कर जा चुका है.

सन 2011 में मिली जानकारी के अनुसार, हमारे यहां 4.6 प्रतिशत यानी 121 करोड़ में से 5.6 करोड़ लोग अपना जीवनसाथी खो चुके हैं, जो तनहा जिंदगी जी रहे हैं. इन में महिलाओं की संख्या पुरुषों की अपेक्षा काफी ज्यादा है. इस की वजह यह है कि महिला की उम्र लंबी होती है.

सन 2012 में वर्ल्ड बैंक द्वारा मिलेआंकड़ों के मुताबिक भारत में पुरुषों की उम्र जहां 65 साल मानी गई है, वहीं स्त्रियों की 68 साल मानी गई है.

विधवा या विधुर होना कोई अभिशाप नहीं है. फिर भी ऐसे तमाम लोग हैं, जो उन के साथ अछूतों जैसा व्यवहार करते हैं, जिस का खामियाजा वे जीवित रहने तक भुगतते हैं. हमारे यहां ज्यादातर इलाकों में ऐसे लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता. परिवार और समाज से इन्हें लगातार उपेक्षा और तनहाई ही मिलती है. परिवार द्वारा शोषण और सामाजिक वर्जना की भी स्थिति का सामना करना पड़ता है.

सामाजिक वर्जना

42 साल की अनीता (परिवर्तित नाम) बताती हैं कि जब वह 40 साल की थीं, तभी उन के पति की मौत हो गई थी. इस के बाद समाज ही नहीं, उन का परिवार (विशेष रूप से विवाहित महिलाएं) उन से अछूतों जैसा व्यवहार करने लगी थीं. वे औरतें उन के साथ बैठने या साथ खाने से भी परहेज करती थीं.

उन्हें किसी भी आयोजन में नहीं बुलाया जाता था. अगर वह हंसतीमुसकरातीं तो लोग उन्हें शंका की दृष्टि से देखते. लोग उन्हें ऐसा महसूस कराते, जैसे अपने पति की मौत के लिए वही जिम्मेदार हैं. लोगों ने इस अपराधबोध के साथ उन्हें अकेला जीने को छोड़ दिया था.

सिर्फ औरतें ही नहीं, मर्द भी इस स्थिति में सामाजिक अवहेलना का शिकार होते हैं. एक ओर जहां अपने ही घर वाले उन की उपेक्षा करते हैं, वहीं दोस्त और रिश्तेदार कपल्स भी किसी भी तरह के आयोजन में ऐसे लोगों को बुलाने से कतराते हैं. यदि विधुर पुरुष किसी पारिवारिक समारोह में शरीक होता है और अनजाने में किसी जानपहचान वाली महिला से हंसीमजाक करने लगता है तो लोग उन्हें टेढ़ी नजरों से देखने लगते हैं. वह पुरुष शक के दायरे में आ जाता है और लोगों को लगता है कि वह डोरे डाल रहा है.

शोषण

विधुरों की अपेक्षा विधवाओं को ज्यादा शोषण और पीड़ा झेलनी पड़ती है. देश में अभी भी कुछ ऐसे इलाके हैं, जहां विधवाओं को अपशकुनी या डायन का तमगा लगा कर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल की सीमा से लगे कुछ ग्रामीण इलाकों में इस तरह की घटनाएं अकसर सामने आती रहती हैं.

आवाज उठानी है जरूरी

अनीता का कहना है कि पति की मौत के बाद परिवार वाले उन के साथ काफी बुरा व्यवहार करने लगे थे. उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया जाता था. उन्हें मारापीटा तो जाता ही था, सारे अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया था. तब किसी तरह एक पारिवारिक मित्र की मदद से उन्होंने थाने में मामला दर्ज कराया.

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Sarita

आईपीसी की धारा 498ए, घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उन के मामले की सुनवाई हुई, जिस में उन के परिवार वालों को 4 महीने की कैद और जुर्माने की सजा हुई. उन्हें संपत्ति में उन का हिस्सा मिल गया. अब वह स्वतंत्र और सुरक्षित जिंदगी जी रही हैं. इस का मतलब यह है कि विधवा स्त्री चाहे तो कानूनी मदद ले कर खुद को सुरक्षित कर सकती हैं.

सौलिसिटर व एडवोकेट केएमए लौ फर्म (दिल्ली हाईकोर्ट) चलाने वाले कुणाल मदान कहते हैं कि यह कितनी बुरी बात है कि एक ओर हम 21वीं सदी में पहुंचने की बात कर रहे हैं, प्रोद्यौगिकी और आधुनिकीकरण के इस दौर में भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिस में हम अभी भी परिवर्तन का इंतजार कर रहे हैं और वह है विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार. हमारे यहां विधवापन निचली जातियों में ही नहीं, उच्च जातियों में भी एक सामाजिक मौत जैसी अवस्था है.

ज्यादातर मामलों में विधवा को ससुराल की संपत्ति में हिस्सेदारी से वंचित कर दिया जाता है, क्योंकि भारत में संपत्ति आमतौर पर बड़ों के नाम होती है और इस स्थिति में (ससुराल वालों द्वारा स्वयं अर्जित संपत्ति में) विधवा किसी भी चीज में हकदार नहीं मानी जाती. यदि संपत्ति विधवा के पति के नाम पर है तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत विधवा की सास भी उस संपत्ति की सहमालकिन होती है.

समाज में महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करने वाली गैरसरकारी संस्था ‘मिर्ची झोंक’ की अध्यक्ष सीमा मलिक का कहना है कि देश में तमाम विधवाएं ऊंचे और महत्त्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं. वे स्वतंत्र और स्वाभिमानपूर्ण जिंदगी जी रही हैं. जिन की उपेक्षा और शोषण हो रहा है, वह गरीबी और अशिक्षा की वजह से हो रहा है. इसलिए हमारा फर्ज है कि ऐसी महिलाओं की मदद करें और उन्हें आत्मनिर्भर बनने या पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित करें. आपराधिक तत्त्वों और पुराने रीतिरिवाजों से उन्हें आजादी दें.

स्त्रियां ज्यादा बेहतर ढंग से जूझती हैं अकेलेपन से

इस तरह की स्त्रियां या पुरुष दुख और अकेलेपन से अलगअलग तरह से जूझते हैं. उदाहरण के लिए दुनिया के कुछ देशों में आधे से ज्यादा विधुर 18 महीनों के अंदर दूसरी शादी कर लेते हैं, जबकि विधवाओं के मामले में ऐसा बहुत कम है. इस की वजह यह नहीं है कि विधुर सिर्फ अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरी शादी करते हैं, बल्कि हकीकत यह है कि वे खुल कर सारी बातें जीवनसाथी को ही बताते हैं.

इसलिए वे उस के बगैर खुद को काफी तनहा महसूस करते हैं. इस के विपरीत स्त्रियां भावनात्मक तौर पर खुद को जल्दी संभाल लेती हैं और बहुओं, नातीपोतों में घुलमिल कर घर के कामों में मन लगाने की कोशिश करती हैं. घर वालों की उपेक्षा के बावजूद महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अकेलेपन से लड़ना ज्यादा बेहतर ढंग से जानती हैं.

जरूरत है दर्द समझने की

वृंदा के पति की मौत अभी जल्दी हुई है. शाम को सब के लिए खाना निकालते समय वह पति के लिए भी खाना परोसने लगती है, पर जैसे ही उन्हें गलती का अहसास होता है, वह फूटफूट कर रोने लगती हैं. महिलाओं में इस तरह की परिस्थितियां अक्सर आती हैं, जबकि पुरुष भी अपने जीवनसाथी को याद कर के भावुक हो उठता है. कोई खास दिन, कोई अवसर या फिर जीवनसाथी द्वारा दी गई कोई भेंट, पुरानी याद आने पर आदमी की आंखों में अकसर आंसू आ जाते हैं.

ऐसे में उस आदमी को किसी ऐसे इंसान की जरूरत होती है, जिस से वह अपने दिल का हर गम बांट सके, जिस से वह अपने जीवनसाथी के बारे में खुल कर बातें कर सके, उन की पसंदनापसंद के बारे में चर्चा कर सके और अपने जज्बात जाहिर कर सके. आप चाहें तो उन के लिए ऐसा ही साथी बन सकते हैं.

परिवार वालों को चाहिए कि उन्हें छोटेमोटे कामों में व्यस्त रखें, उन के शौक जिंदा रखें, प्रोत्साहन देने का प्रयास करें, ताकि जिंदगी के प्रति उन की रुचि बरकरार रहे और उन्हें जीने का नया मकसद मिल सके. ऐसे व्यक्ति को किसी के साथ की बहुत जरूरत होती है. जितना हो सके, उन के साथ समय बिताएं और संभव हो सके तो उन के लिए एक जीवन भर का साथी ढूंढ़ दें.

सरकारी प्रयास

करीब 9 साल पहले एक गैरसरकारी संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की थी, जिस में अपनों द्वारा छोड़ी गई विधवाओं की दयनीय स्थिति को सुधारने की बात कही गई थी. उस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से विधवाओं को रहने के लिए पर्याप्त घर उपलब्ध कराने और मासिक अनुदान में इस साल यानी 1 जनवरी से 1300 रुपए से बढ़ा कर 1500 रुपए करने के लिए कहा था.

केंद्र सरकार दिसंबर, 2017 तक वृंदावन में एक हजार विधवाओं के लिए घर बनवाएगी. इस के लिए 57 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है.

उन के मेंटीनैंस के लिए हर साल 4 करोड़ रुपए दिए जाएंगे. सिर्फ वृंदावन ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और उत्तरखंड को भी रिलीफ दिए जाने की बात कही है. विधवाओं के हित के लिए आम जनता को अच्छे काम करने चाहिए.

Social Crime: रेप करने के बाद न्यूड फोटो खींचता निर्मल बाबा

Social Crime: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक ढोंगी बाबा ने महिलाओं के साथ रेप किया और उस के बाद उन की न्यूड फोटो खींच लीं. चलिए जानते हैं आखिर कौन था यह ढोंगी बाबा जिस ने महिलाओं की इज्जत के साथ खेला था. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से, जिस से आप होंगे ऐसी घटनाओं के प्रति सजग और सचेत.

यह घटना छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले से सामने आई है. यहां एक महिला निर्मल बाबा के पास शरीर का दर्द ठीक कराने के लिए आई हुई थी. इस के बाद बाबा ने महिला के शरीर का दर्द ठीक करने का वायदा किया. महिला को इस तथाकथित बाबा ने मैहर के एक होटल में बुलाया. बाबा ने महिला को प्रसाद खिलाया. प्रसाद खा कर जब महिला बेहोश हो गई तो उस ने उस के साथ दुष्कर्म किया. दुष्कर्म करने के बाद उस ने महिला के न्यूड फोटो खींच लिए थे. महिला ने जब इस का विरोध किया तो उस ने अश्लील फोटो इंस्टाग्राम पर वायरल कर दिए.

पुलिस के अनुसार, यह मामला 11 अप्रैल, 2026 को पामगढ़ थाने में आया है, जहां एक पीड़ित महिला ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. महिला ने पुलिस को बताया कि निर्मल बाबा चैत्र नवरात्रि में पदयात्रा करते हुए आया था. निर्मल बाबा ने खुद को एक चमत्कारी बाबा बताया और कहा कि वह सारी समस्याएं दूर कर देता है. इस के बाद महिला अपने शरीर के दर्द की बीमारी को ठीक कराने के लिए अपनी सहेली के साथ बाबा के पास गई थी. इस के बाद बाबा ने उस का नंबर ले लिया.

महिला ने पुलिस को बताया कि इस के बाद बाबा ने कौल करके मार्केट बुलाया और प्रसाद का झांसा दिया और कहा इस से सब ठीक हो जाएगा. फिर वह उसे अपने साथ बिलासपुर ले गया, फिर ट्रेन से मध्य प्रदेश पहुंचा, जहां उसे एक होटल में ठहराया गया. वहां उस ने उस के साथ कई बार दुष्कर्म किया और अश्लील फोटो खींचीं और उसे छोड़कर भाग निकला.

बाबा महिला को बारबार कौल करके परेशान करने लगा, जिस से महिला ने परेशान हो कर उसे ब्लौक कर दिया. फिर बाबा ने महिला के नाम से एक इंस्टाग्राम आईडी बनाई और अश्लील फोटो वायरल कर उसे ब्लैकमेल करने लगा.

एसपी उमेश कश्यप के मार्गदर्शन और एसडीओपी (अकलतरा) प्रदीप कुमार सोरी ने बाबा की लोकेशन ट्रेस की. इस के बाद आरोपी को पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया.

बाबा के खिलाफ बीएन्स की धारा 64(2)(एम) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज किया गया है और उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
अगर आप भी ऐसे ढोंगी बाबाओं से सावधान रहना चाहते हैं, जो झूठी कहानियां सुनाकर लोगों को ठग लेते हैं तो इन घटनाओं को जरूर पढ़ें. मनोहर कहानियां आप को ऐसी घटनाओं के प्रति सचेत और जागरूक बनाती है, ताकि आप हर तरह की धोखाधड़ी और ठगी से खुद को बचा सकें. Social Crime

Love Crime: 10 साल बाद

Love Crime: सीमा ने 10 साल पहले भाग कर दूसरी जाति के रामू के साथ प्रेम विवाह कर लिया था. वह उस के साथ सुखी तो थी ही, उस के 2 बच्चों की मां भी बन गई थी. इतने दिनों बाद भी घर वाले उस के इस प्रेम को बरदाश्त नहीं कर सके और…

अमित ने जीजा के पैर छूते हुए उन का उखड़ा मूड देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है जीजाजी, आजआप कुछ नाराज से लग रहे हैं?’’

‘‘नाराजगी की वजह तुम अच्छी तरह जानते हो अमित. 10 साल से हम जिस आग में जल रहे हैं, वह तुम्हें बताने की जरूरत नहीं है.’’

अमित ने बहनोई को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, बात काफी पुरानी हो चुकी है, इसलिए अब तो उसे भूल जाना चाहिए.’’

लेकिन जगदीश उस बात को भुलाना नहीं चाहता था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी जगह मैं होता तो परिवार की उस बेइज्जती का बदला ले कर रहता.’’

जगदीश की इस बात से अमित सोच में पड़ गया. उस की बहन सीमा ने जो किया था, क्या वह इतना बड़ा अपराध था कि उस के लिए जीजाजी जो कह रहे हैं, क्या वह उचित है? अमित उर्फ भूरा 23 साल का हो गया था. जब उस की बहन सीमा ने दूसरे जाति के लड़के से शादी कर के घर छोड़ा था, तब वह 10-11 साल का था. खटीक जाति का गंगा सिंह एटा जिले के थाना रिजोर के गांव इब्राहीमपुर में रहता था. उसी का बेटा था अमित. उस के अलावा गंगा सिंह की 4 बेटियां थीं ममता, यशोदा, रमा और सीमा. परिवार बकरियों की खरीदफरोख्त का काम करता था. इस धंधे में इतनी कमाई हो जाती थी कि जिंदगी मजे से चल रही थी.

गंगा सिंह के घर से कुछ ही दूरी पर कुम्हार जाति का काशीराम रहता था. उस के 2 बेटे थे रामू और पुष्पेंद्र. पुष्पेंद्र की शादी रीना से हो गई थी, जबकि रामू अविवाहित था. पड़ोसी होने के नाते गंगा सिंह और काशीराम का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. इसी आनेजाने में गंगा सिंह की बेटी सीमा और काशीराम का बेटा रामू एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

सीमा खूबसूरत और हमेशा खुश रहने वाली लड़की थी तो रामू जवान और कामकाजी लड़का था. सीमा उसी जैसे पति के सपने देखती थी. इसीलिए वह जब भी रामू को देखती, उस का दिल धड़क उठता. रामू पढ़ालिखा भी था, जबकि सीमा की जाति में पढ़ेलिखे लड़के कम ही मिलते थे. इस तरह सीमा मन ही मन उसे चाहने लगी थी.

सीमा गांव की अन्य लड़कियों से थोड़ा अलग थी, इसलिए वह लड़कों में आकर्षण का केंद्र थी. लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कोई उसे कुछ कह दे. एक दिन सीमा खेतों में बकरियों का चारा लेने गई. वह चारे का बोझ उठाने के लिए इधरउधर देख रही थी. तभी रामू न जाने कहां से आ गया. सीमा ने उसे इशारे से बुलाया तो उस ने पास आ कर कहा, ‘‘सीमा, तुम इतना बड़ा बोझ उठा ले जाओगी?’’

सीमा ने तिरछी नजरों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘अब तुम आ गए हो तो इसे संभालोगे नहीं?’’

रामू ने सीमा की आंखों में झांका तो उन में उसे कुछ ऐसा दिखाई दिया, जो उसे अपनी ओर खींच रहा था. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘इस बोझ को तो मैं हंसतेहंसते जीवन भर संभालने को तैयार हूं.’’

‘‘अच्छा, तुम्हें खुद पर इतना गुमान है?’’

‘‘अगर अच्छी सूरत मेरे ऊपर इस तरह मेहरबान है तो मुझे गुमान होगा ही.’’ कह कर रामू ने बोझ उठा लिया.

सीमा ने हैरानी से कहा, ‘‘लाओ, बोझ मुझे दे दो, गांव के किसी ने देख लिया तो बिना मतलब की बातें होंगी.’’

‘‘पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो और कौन करेगा?’’ रामू ने कहा.

‘‘रामू, बहुत दिनों से मैं तुम से एक बात कहना चाहती हूं.’’

‘‘तो आज कह डालो.’’

‘‘तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो. क्या मैं भी तुम्हें अच्छी लगती हूं?’’

रामू सोच में पड़ गया. अच्छे लगने का मतलब वह अच्छी तरह से समझता था. उस के दिमाग में तुरंत आया कि अगर इस बात की जानकारी खटीकों को हो गई तो बवाल हो जाएगा. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सीमा ने अपना हाथ बढ़ा कर कहा, ‘‘मेरा हाथ थाम लो रामू, मैं सिर्फ तुम्हारी हूं.’’

रामू की रगों में जवानी का खून था. वह भी सीमा को पसंद करता था. सीमा के स्पर्श से वह आवेश में आ गया. उस ने सीमा का हाथ थाम कर कहा, ‘‘लो हाथ थाम लिया, अब तुम मेरी हो. मैं जीवन भर तुम्हारा यह हाथ नहीं छोड़ूंगा. इस के लिए मुझे चाहे जो भी करना पड़े.’’

उस दिन दोनों ने एकदूसरे को मन और वचन से अपना तो लिया, लेकिन उन्हें पता था कि उन के प्यार की राह में जाति एक ऐसी बाधा है, जिसे पार करना आसान नहीं होगा. इस के बावजूद उन्होंने प्यार ही नहीं किया, उसे आजीवन निभाने का निर्णय भी ले लिया. रामू को पता था कि शादी के लिए न तो उस के घर वाले राजी होंगे और न सीमा के. इसलिए वह पैसे इकट्ठे करने लगा कि अगर सीमा के साथ उसे घर छोड़ना पड़े तो उस के पास इतने पैसे होने चाहिए कि वह कहीं भी व्यवस्थित हो सके. अगर हाथ में पैसा रहेगा तो वह कहीं भी रह लेगा.

सीमा की 3 तीनों बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थीं. सब से बड़ी बहन ममता डुड़ला में जगदीश के साथ ब्याही थी. वह फूल बेचने का काम करता था. सीमा के घर वालों को उस के और रामू के प्यार का पता नहीं चल पाया, लेकिन न जाने कहां से उस के जीजा जगदीश को इस बात की जानकारी हो गई. उस ने ससुराल आ कर सासससुर को खूब खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुम लोग एक लड़की नहीं संभाल सके. दूसरे गांव में रह कर मुझे पता चल गया कि सीमा रामू कुम्हार के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है और तुम लोग हो कि आंखें मूंदे बैठे हो.’’

दामाद की बात पर गंगा सिंह के कान खड़े हो गए. उस ने सीमा से पूछा तो उस ने मना करते हुए कहा कि जीजाजी उस पर झूठा इल्जाम लगा रहे हैं, वह रामू से बाहर कभी नहीं मिली. दामाद की बात को गंगा सिंह और निर्मला ने भले ही गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन उन की समझ में यह बात जरूर आ गई थी कि बेटी जवान हो चुकी है, अब इस का ब्याह कर देना चाहिए. उस के लिए लड़के की खोज तो शुरू ही हो गई, उस पर नजर भी रखी जाने लगी.

जबकि जगदीश ने यह दांव चल कर कुछ दूसरा ही सोचा था. वह सीमा की शादी अपने छोटे भाई से करवाना चाहता था. उसे सीमा की ऐसी कमी मिल गई थी, जिस की बदौलत वह सासससुर को बदनामी का डर दिखा कर मौके का फायदा उठाना चाहता था. दरअसल, उस का भाई शराबी और जुआरी तो था ही, कोई कामधंधा भी नहीं करता था. इसलिए सीमा के घर वाले इस रिश्ते के लिए जल्दी तैयार नहीं होते.

मौके का फायदा उठाने के लिए एक दिन जगदीश ससुराल आया और सासससुर से बदनामी की बात कह कर उस ने सीमा की शादी अपने भाई से करने को कहा तो उस की बातें सुन कर सीमा ने गुस्से में कहा, ‘‘जीजा, तुम ने सोच कैसे लिया कि मैं तुम्हारे उस आवारा भाई से शादी कर लूंगी.’’

गंगा सिंह और निर्मला सन्न रह गए. रामू और सीमा के मिलनेजुलने की बात भले ही उन्हें बरदाश्त नहीं थीं, लेकिन वे सीमा की शादी जगदीश के भाई से भी नहीं करना चाहते. उन्होंने दामाद को यह कह कर चुप करा दिया कि इस मामले पर फिर कभी बात करेंगे. सीमा सब कुछ समझ चुकी थी. वह रामू से मिली और उस से साफसाफ कह दिया कि जो भी करना है, जल्दी करो, वरना किसी दिन जगदीश अपने भाई से उस की शादी करा देगा.

गांव में रहते रामू और सीमा की शादी हो नहीं सकती थी. इसलिए एक दिन रामू ने सीमा के साथ गांव छोड़ दिया. पैसे उस ने जमा ही कर रखे थे. वह सीमा को ले कर हरियाणा के शहर पानीपत आ गया और कमरा किराए पर ले कर सीमा के साथ रहने लगा. उस ने सीमा के साथ मंदिर में शादी भी कर ली थी. गुजरबसर के लिए उस ने एक फैक्ट्री में नौकरी भी कर ली थी. इस तरह रामू और सीमा ने जातिबिरादरी के पचड़ों से दूर आ कर अपनी अलग दुनिया बसा ली थी.

लेकिन दूसरी ओर वे जिस दुनिया को छोड़ आए थे, वहां आग लग चुकी थी. सब से ज्यादा नाराज जगदीश था. उस ने पहले तो सासससुर की खूब लानतमलानत की, उस के बाद ससुर को साथ ले कर थाना रिजोर पहुंचा और रामू के खिलाफ सीमा को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने जितना हो सकता था, रामू के घर वालों को तो परेशान किया ही, कुरकी तक कर डाली, पर रामू और सीमा का कुछ पता नहीं चला. पता चलता भी कैसे, रामू ने घर छोड़ने के बाद उधर झांका ही नहीं. सब कुछ भुला कर रामू और सीमा अपनी दुनिया में खुश थे. उन्होंने घर वालों से पूरी तरह संबंध तोड़ लिए थे. सीमा ने देव को जन्म दिया तो दोनों बेटे के साथ अपनी दुनिया में मस्त हो गई.

लेकिन सीमा के घर वाले उस की इस हरकत को पचा नहीं पा रहे थे. इस की एक वजह यह थी कि बिरादरी वाले सीमा के घर वालों को अपमानित करते रहते थे. सीमा जब घर से भागी थी, तब अमित काफी छोटा था. लेकिन जब वह बड़ा हुआ और बहन के भागने की बात समझ में आई तो उसे लगा कि बहन ने दूसरी जाति के लड़के ताने मार कर के साथ भाग कर अच्छा नहीं किया. रहीसही कसर जगदीश पूरी कर देता था.

एक दिन अचानक गांव में यह बात फैल गई कि रामू, सीमा और बच्चे के साथ फिरोजाबाद में रह रहा है. अमित की नफरत भड़क उठी, लेकिन गंगा सिंह और निर्मला ने उसे समझाया कि जब सीमा रामू के साथ खुश है तो अब उन्हें सब कुछ भुला देना चाहिए. मांबाप के समझाने पर अमित रामू से मिलने गया तो रामू ने उसे गले लगा लिया. इस से अमित को लगा कि रामू इतना बुरा नहीं है, जितना जगदीश उसे बताता रहा है.

इस के बाद सीमा की बहनें भी उस के यहां आनेजाने लगीं. लेकिन रामू ने कभी किसी पर विश्वास नहीं किया. यही वजह थी कि वह सीमा और बेटे को ले कर कभी गांव नहीं गया. उसी बीच बेटी तनु पैदा हुई. अब उन के 2 बच्चे हो गए थे. सब ठीक हो गया था, लेकिन जगदीश के कलेजे की आग अभी तक ठंडी नहीं हुई थी. वह रामू को खत्म कर के सीमा की शादी अपने भाई से करवा कर अपनी उस आग को ठंडी करना चाहता था. इस के लिए वह अमित को अपने साथ मिलाना चाहता था. यही वजह थी कि मौका मिलने पर वह उसे भड़काता रहता था.

एक दिन जगदीश भी सीमा के घर जा पहुंचा. जीजा का आना सीमा को अच्छा नहीं लगा, लेकिन घर आए मेहमान को वह भगा भी नहीं सकती थी. बातचीत में जगदीश ने जब कहा कि उस की वजह से समाज में उन की बड़ी बदनामी हुई है, अगर वह चाहे तो अभी भी सब ठीक हो सकता है. इस पर सीमा ने पूछा कि वह कैसे तो जगदीश ने कहा, ‘‘हम रामू को ठिकाने लगा कर तुम्हारी शादी अपने भाई से करवा देंगे. इस तरह तुम्हारा घर भी बस जाएगा और समाज में हमारी इज्जत भी वापस आ जाएगी.’’

‘‘तो अभी तक तुम्हारे भाई की शादी नहीं हुई? वैसे भी उस आवारा से शादी करेगा ही कौन? जीजाजी, अच्छा यही होगा कि अब तुम चुपचाप यहां से निकल लो, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. एक बात और, अगर किसी ने मेरे पति पर बुरी नजर डाली तो मैं उसे छोड़ूंगी नहीं.’’

जगदीश साली से बेइज्जत हो कर चला तो आया, लेकिन उस ने तय कर लिया कि वह उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. इस के बाद उस ने रामू को कई बार ठिकाने लगाने की कोशिश की, लेकिन हर बार रामू बच गया.

अब सीमा उस के निशाने पर थी. उस ने सीमा के मौसेरे भाई अशोक और अमित को भड़काना शुरू किया. उस की बातों में आ कर अमित को भी लगने लगा कि सीमा ने जो किया है, उस से उस के परिवार की बड़ी बेइज्जती हुई है, इसलिए उसे जिंदा रहने का हक नहीं. आखिर सब ने मिल कर सीमा के नाम मोत का फरमान जारी कर दिया. रामू फिरोजाबाद के किशननगर में वीरपाल यादव के मकान में किराए पर रहता था.

10 अक्तूबर, 2015 की शाम 4 बजे सीमा ने मकान मालकिन राजबेदी से कहा कि भाई का फोन आया है कि मां की तबीयत बहुत खराब है, इसलिए वह आसफाबाद चौराहे पर उस का इंतजार कर रहा है. वह उस के साथ मां को देखने अस्पताल जा रही है. इस के बाद सीमा अपने 8 साल के बेटे देव और 4 साल की बेटी तनु को ले कर चली गई. आसफाबाद चौराहे पर अमित थ्री व्हीलर लिए खड़ा था. वह सीमा और बच्चों को उस पर बैठा कर इधरउधर घुमाने और लगा. शाम होने लगी तो सीमा ने कहा, ‘‘जल्दी करो, मुझे घर भी जाना है.’’

अमित ने किसी को फोन किया तो थोड़ी ही देर में एक कार उस के पास आ कर रुकी. उस में से जगदीश और अशोक उतरे तो सीमा को शक हुआ. उस ने बच्चों के साथ भागना चाहा तो तीनों ने मारपीट कर बच्चों के साथ उसे कार में बैठाया और जंगल की ओर चल पड़े. अगले दिन थाना नारखी के उमरगढ़ से कुतुबपुर जाने वाले रास्ते पर खेतों के बीच पड़ने वाले एक कुएं में कुछ बच्चों ने एक महिला और 2 बच्चों की लाशें देखीं. शाम का समय था, लोग पंचायत चुनाव में वोट डाल कर लौट रहे थे.

बच्चों ने उन्हें कुएं में 3 लाशें पड़ी होने की बात बताई तो वे कुएं के पास पहुंचे. पुलिस को सूचना दे कर 2 लोग कुएं में उतर गए. नीचे जाने पर पता चला कि औरत और लड़की तो मर चुकी थी, जबकि लड़के की सासें चल रही थीं. उन्होंने लड़के को बाहर निकाला. तब तक पुलिस भी पहुंच गई थी. इंसपेक्टर श्रवण कुमार राणा ने बच्चे को तुरंत जिला अस्पताल भिजवाया. उस के बाद उन्होंने लाशें निकलवाईं. लाशों की शिनाख्त नहीं हो सकी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि मृतक यहां के रहने वाले नहीं थे.

दूसरी ओर शाम को रामू घर पहुंचा तो जब मकान मालकिन ने बताया कि सीमा के भाई का फोन आया था और वह बच्चों को ले कर अपनी मां को देखने अस्पताल गई है तो वह सिर थाम कर बैठ गया. उस ने सीमा को फोन किया तो उस का फोन बंद था. उस ने भाई को फोन किया तो पता चला कि गंगा सिंह के घर में ताला लगा है. रामू समझ गया कि कुछ अनहोनी हो गई है. 13 अक्तूबर के अखबार में जब 2 लाशें और एक बेहोश बच्चे के कुएं में मिलने की खबर छपी तो खबर पढ़ कर रामू के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह जिला अस्पताल पहुंचा तो बेटे को देख कर सन्न रह गया. उस ने रोरो कर पुलिस को बताया कि बेहोश बच्चा उस का बेटा है.

इस के बाद पोस्टमार्टम में रखी महिला और बच्ची की लाशों की शिनाख्त उस ने अपनी पत्नी और बेटी के रूप में कर दी. रामू की दुनिया लुट चुकी थी. देव को होश आया तो उस ने सारी बात बता दी. उस के बाद अपराध संख्या 958/15 पर भादंवि की धारा 302, 307, 201 के तहत जगदीश, अशोक और अमित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

जगदीश को उसी दिन उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उस की गिरफ्तारी की खबर पा कर अमित और अशोक गांव छोड़ कर भाग गए. 9 जनवरी को नए थानाप्रभारी जसपाल सिंह पंवार ने अमित को दिल्ली के गोविंदपुरी से गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अशोक कथा लिखे जाने तक पकड़ा नहीं जा सका था. अमिल और जगदीश अपने किए की भले ही सजा पा जाएं, लेकिन उस से रामू की उजड़ी दुनिया तो अब बस नहीं सकती.

अमित का कहना था कि उसे अपनी बहन और उस के बच्चों को मारने का जरा सा भी अफसोस नहीं है, क्योंकि उस की वजह से गांव में उन लोगों की जो बदनामी हुई थी, उस के लिए यही उचित था. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bhopal Crime Story: देवेंद्र से देविका बनने की दर्द भरी दास्तां

Bhopal Crime Story: मुसीबत और परेशानियां ऐसी थीं कि देवेंद्र को उनका कोई हल नहीं सूझ रहा था और जो सूझा वह हैरान कर देने वाला है. साल 2017 तक एक एनजीओ में काम करने बाला यह हट्टा कट्टा  युवा आम लड़कों की तरह ही रहता था लेकिन अब औपरेशन के जरिये लड़की यानि ट्रांसजेंडर बनकर अपने ही शहर भोपाल में किन्नरों की टोली में तालियां बजाता नजर आता है .

आमतौर पर कोई भी लड़का ट्रांसजेंडर तभी बनने की सोचेगा जब उसमें बचपन से ही लड़कियों जैसे लक्षण हों या फिर वह खुद को सेक्स कर पाने में असमर्थ पाये पर देवेंद्र के साथ ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि उसकी कहानी दिल को छू जाने वाली है. खासतौर से उस वक्त जब रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है. देवेंद्र अपनी बहन के लिए देविका बना था जिसका उसे कोई मलाल भी नहीं है, उल्टे वह खुश है कि बलात्कार के झूठे आरोप में फंसने से भी बच गया.

देवेंद्र अपनी बहन को बहुत चाहता था और उसकी विदाई 20 मई 2016 को इन दुआओं के साथ उसने की थी कि बहन ससुराल जाकर खुशहाल ज़िंदगी जिये लेकिन भगवान कहीं होता तो उसकी सुनता. हुआ यूं कि शादी के कुछ दिनों बाद ही बहन की ससुराल वालों ने उस पर तरह तरह के जुल्मों सितम ढाने शुरू कर दिये ठीक वैसे ही जैसे फिल्मों और टीवी सीरियलों में दिखाये जाते हैं. दहेज के लालची ससुराल वालों ने उसकी बहन को इतना सताया कि वह खून के आंसू रो दी .

अब देवेंद्र ने वही गलती की जो आमतौर पर दहेज के लिए सताई जाने वाली लड़कियों के घर वाले करते हैं. यह गलती थी ससुराल वालों के हाथ पैर जोड़ना और अपनी पगड़ी उनके चरणों में रख देना. ऐसे फिल्मी टोटकों से तो फिल्मों में भी बात नहीं बनती फिर यह तो सामने से होकर गुजर रही हकीकत थी. देवेंद्र ने मध्यस्थता करते हर मुमकिन कोशिश की कि जैसे भी हो बगैर किसी झगड़े फसाद विवाद या कोर्ट कचहरी के बहन की ज़िंदगी में खुशियां आ जाएं पर कोई कोशिश कामयाब नहीं हुई तो उसने भी थकहार कर वही रास्ता पकड़ा जो सभी पकड़ते हैं.

ननद की धमकी

लेकिन थाने जाने से पहले उसने बहन की ससुराल बालों को आगाह करना या धोंस देना कुछ भी समझ लें जरूरी समझा कि शायद इससे उनमें अक्ल आ जाए. आमतौर पर ससुराल वाले इस बात से डरते हैं कि अगर बहू या उसके घर वालों ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो कभी कभी जमानत के भी लाले पड़ जाते हैं. यही इस मामले में भी हुआ, शुरू में तो बहन के ससुराल वाले डरे लेकिन जल्द ही बहन की चालाक ननद ने इस का भी तोड़ निकाल लिया और ऐसा निकाला कि देवेंद्र की सारी हेकड़ी तो हेकड़ी मर्दानगी भी हमेशा के लिए हवा हो गई.

इस ननद ने उसे ही यह धमकी देना शुरू कर दिया था कि अगर वह थाने गया तो वह भी थाने जाकर देवेंद्र के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देगी. इस धमकी का उम्मीद के मुताबिक असर हुआ और देवेंद्र ने बहन की ससुराल जाना बंद कर दिया. लेकिन इससे बहन का कोई भला या मदद नहीं हो पा रही थी इसलिए एक दिन उसने जी कडा करते बचाव का रास्ता ढूंढ़ ही लिया कि अगर वह मर्द ही न रह जाये तो बहन की ननद क्या खाकर उसके खिलाफ बलात्कार की झूठी रिपोर्ट लिखाएगी .

नवंबर 2017 में देवेंद्र ऑपरेशन करा कर लड़की बन गया और अपना नया नाम रखा देविका . अब उसे ननद का डर नहीं रह गया था लिहाजा उसने बहन को बचाने पुलिसिया और कानूनी काररवाई शुरू कर दी . मामला जब विधिक सेवा प्राधिकरण पहुंचा तो उसने बेहिचक सारे पत्ते सचिव आशुतोष मिश्रा के सामने खोलते अपने  मेडिकल दस्तावेज़ भी दिखाये  और बताया कि बहन की ननद की धमकियों से आजिज़ आकर उसने यह फैसला लिया था .

देखते ही देखते बहन को तलाक मिल गया और वह ससुराल नाम की जेल से आजाद हो गई . लेकिन डर के चलते और बहन की सलामती के लिए देविका बन गए देवेंद्र को बहुत बड़ी क़ुर्बानी देनी पड़ी जिसकी मिसाल शायद ही ढूंढे से मिले. साड़ी और सलवार सूट पहने देविका माथे पर बिंदी और बड़ा सा टीका भी लगाती है और चूड़ियां भी पहनती है. उसका मेकअप भी लड़कियों जैसा तड़क भड़क भरा होता है .

देवेंद्र, देविका बनकर खुश है और अब ट्रांसजेंडर्स के भले के लिए काम करना चाहता है . मुमकिन है जल्द ही उसकी ज़िंदगी और बहन के लिए त्याग पर कोई फिल्म निर्माता फिल्म बनाए जिसमें भरपूर मसाला और जायका होगा लेकिन देवेंद्र की ज़िंदगी में जरूर कोई जायका नहीं रह गया है. बेहतर तो यह होगा कि वह फिर से आपरेशन कराके पहले की तरह लड़का बन जाये और ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ उठाए.

Hindi Stories : देह के दलदल में देश की दत्तक बेटियां

Hindi Stories : कई आदिवासी समुदायों में लुप्तप्राय होने के कगार पर पहुंच चुकी कोरवा जनजाति जीवन निर्वाह के लिए संघर्ष कर रही है. चिंताजनक बात यह है कि इस बात की चर्चा न केवल संसद तक में हो चुकी है, बल्कि उन्हें संरक्षित रखने के उद्देश्य से राष्ट्रपति द्वारा इस जनजाति को दत्तक संतान का दरजा भी मिल चुका है.

अंजना के होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक दूर से चमक रही थी. शैंपू और कंडीशनर से चमकते लहराते बाल, आंखों के सामने लटकती लटों के बीच चेहरा पाउडर और क्रीम के मेकअप से दमक रहा था. नए कपड़े के पहनावे में उस का यौवन खिल उठा था. एक दिन पहले ही वह मुंबई से अपने गांव आई थी. हाथ में पर्स लटकाए गांव की गलियों में इठलाती घूम रही थी. कलाई में खनकती नई चूडि़यों की आवाज से गांव के हर किसी की नजर बरबस उठ रही थी. उसे देखते ही सामने से आ रही गांव की सिलमिना ने टोका, ‘‘अरे अंजना, तू तो हीरोइन लग रही है. कब आई रे?’’

‘‘कल ही तो शाम को मुंबई से आई हूं, मैं तुम्हारे घर ही जा रही थी.’’ अंजना चहकती हुई बोली.

दोनों बचपन की सहेलियां थीं. प्यार से अंजना ने पूछा, ‘‘कैसी है रे तू?’’

यह सुन कर सिलमिना का चेहरा उतर गया. उदासी से आंखें नम हो गईं. धीरे से बोली, ‘‘अब तुम्हें क्या बताऊं अपनी हालत, देख ही रही हो. यहां न भरपेट खाने को मिलता है और न ही पहनने को अच्छे कपड़े. सब कुछ तो तुम जानती ही हो, बस तरसते हुए जी रही हूं.’’ सिलमिना बोली. अंजना ने उस के हाथों को पकड़ लिया, फिर गले लग गई. उस का ऐसा करना सिलमिना को अच्छा लगा. वह थोड़ी सहज हुई. बोली, ‘‘तू तो एकदम नहीं बदली!’’

‘‘वह सब छोड़, बता तू मेरे साथ मुंबई चलेगी?’’ अंजना ने अपनी सहेली सिलमिना से सीधा सवाल किया.

इस के लिए सिलमिना तैयार नहीं थी. वह उसे एकटक देखने लगी.

‘‘अरे, तू देखती क्या है यह देख मुझे, सब कुछ मुंबई में ही तो मिला है. अरे वहां स्वर्ग है, स्वर्ग.’’ अंजना बोली.‘‘मैं तो चली चलूं, मगर मां का क्या होगा?’’ सिलमिना ने चिंता जताई.

‘‘मां की फिक्र तुम मत करो, मां के पास हर महीने पैसे भेज देना.’’ अंजना ने सुझाव दिया.

‘‘क्या, सचमुच ऐसा हो सकता है? मुझे वहां इतने पैसे मिल जाएंगे कि मैं मां को भी पैसे भेज सकती हूं.’’ सिलमिना बोली.

‘‘ और नहीं तो क्या?’’ अंजना बोली.

‘‘तो फिर जैसा तुम कहो मैं चलने को तैयार हूं.’’

अंजना से बात कर सिलमिना की आंखों में चमक आ गई थी. उसे अंजना ने एक अद्भुत आत्मविश्वास से भर दिया था. दोनों छत्तीसगढ़ के बीहड़ जंगलों में निवास करने वाली कोरवा समुदाय की थीं. वहां के लोगों के पास कोई ठोस कामधंधा नहीं था, जिस से उन का पेट भर पाता और वे सामान्य जीवन गुजार पाते. ऐसे में सभी अभावग्रस्त दर्दभरी जिंदगी गुजार रहे थे.  जब भी अंजना गांव आती थी, तब बहुत परिवारों के लिए वह आशा की किरण बन जाती. परिवार में बुजुर्ग मांबाप को लगता था कि उन की बेटी को दिल्ली या मुंबई में घरेलू नौकरानी का काम मिल जाएगा. सिलमिना अपनी सहेली अंजना के कहने पर मुंबई जाने के लिए तैयारी में जुट गई. उस के अलावा गांव की कुछ और लड़कियां भी तैयार हो गईं, जो आसपास के इलाके की थीं.

उन्हें अंजना ने विश्वास दिलाया था कि सभी को मुंबई या दिल्ली में काम मिल जाएगा. जो जहां जाना चाहे चल सकती है, उस की जानपहचान दोनों जगहों के काम दिलाने वाले खास लागों से है. उस के भरोसे पर 14 से 18 साल के उम्र की कुल 16 लड़कियां अच्छी जिंदगी की उम्मीद में गांव से महानगर के लिए निकल पड़ीं. उन्हें अंजना ने बताया कि महानगरों में घरेलू काम करने वाली लड़कियों की बहुत कमी है. घर में साफसफाई करने, कपड़ेलत्ते धोने और बरतन मांजने का काम करना होता है. उस के काम के हिसाब से महीने में पगार मिलता है. खाने और रहने का इंतजाम मालकिन द्वारा ही किया जाता है. उस का पैसा नहीं लगाता है. बीचबीच में उपहार भी मिलता रहता है. किसी अतिथि के आने पर वे अलग से पैसे दे जाते हैं. यह सब अंजना समझा ही रही थी कि एक लड़की मधु पूछ बैठी, ‘‘दीदी और क्या करना होता है?’’

‘‘और क्या करना है, घर में बच्चे हों तो उन्हें खिलाओ, घुमाओ और आराम की जिंदगी गुजारो.’

‘‘इन सब के लिए कितने पैस मिल जाते हैं दीदी?’’ उत्सुकता से मधु ने पूछा.

‘‘पैसे बहुत मिलते हैं पगली. 5 हजार रुपए महीने तो मिलेंगे ही. उस में तुम्हें एक पैसा खर्च नहीं होगा. बाकी जो मैं ने और कुछ बताया, उस के अलावा है.’’ अंजना बोली.

‘‘क्या?’’ अंजना की बात सुन कर मधु की आंखें फटी की फटी रह गईं.

‘‘लेकिन तू अभी छोटी है इसलिए 3 हजार ही मिलेंगे.’’ यह सुन कर सभी लड़कियां हंसने लगीं.

मधु ने आंखें घुमाते हुए कहा, ‘‘दीदी मुझे भी पूरे पैसे दिलवाना, मैं 2 के बराबर अकेली ही काम कर दूंगी.’’

‘‘मधु, तुम चिंता नहीं करो वहां पहुंच कर तुम्हें लगेगा कि तुम कहां पहुंच गई हो. समझो स्वर्ग है स्वर्ग. और जिंदगी की सभी खुशियां मिलेंगी, मजे करोगी, मजे!’’ कहती हुई अंजना ने उस की गालों को थपथपा दिया.

इस तरह आकर्षक सपने दिखा कर अंजना अपने साथ 16 लड़कियों को मुंबई ले गई. वहां पहुंच कर उस ने लड़कियों को अपने खास लोगों को सौंप दिया, जहां से उन्हें काम के लिए भेजा जाना था. उस के बाद लड़कियों के साथ जो हुआ, वह सब उसे दिखाए गए सपने के काफी उलट था. मधु एक्का सांवली सी सुतवां नाकनक्श की आकर्षक किशोरी थी. उसे एक प्लाई शौप के मालिक ने अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. महीने की पगार 4 हजार रुपए तय हुई थी. इसी तरह से 18 वर्षीया सिलमिना सिदार को आरटीओ एजेंट रमेश चंद्रा ने अपने घर में घरेलू नौकरानी के तौर पर 5 हजार के मासिक वेतन पर रख लिया था.

16 साल की प्रमिला मंझवार एक व्यापारी के घर पहुंच गई थी, जबकि 17 साल की सुनीता धनुहार एक कामकाजी महिला रजनी के यहां लग गई थी. इसी तरह से सभी लड़कियां कहीं न कहीं काम पर लगा दी गई थीं. मगर जैसेजैसे समय बीतता चला गया, लड़कियों के सपने टूटते चले गए. वे अमानवीय दौर से गुजरने लगीं. उन्हें घरपरिवार से बात करने की मनाही थी. उन में कुछ लड़कियां देह के धंधे पर उतरने को विवश हो गईं. उन्हें पूरी तरह से एहसास हो गया था कि वे पिंजरे में कैद हो कर रह गई हैं. उन की अशिक्षा किसी दुर्भाग्य से कम नहीं थी. उन्हें न तो किसी अधिकार के बारे में मालूम था और न ही सामने दीवारों और पोस्टरों पर लिखी पंक्तियों का अर्थ समझ पाती थीं.

एक दिन मधु एक्का को फोन करने का मौका मिल गया. उस ने अपने एक परिचित को फोन कर दिया. फोन पर उस ने एक सांस में सारी तकलीफें बयां कर डाली. परिचित ने यह बात अपने दोस्त को बताई. बात पूरे कोरवा में फैल गई और मामला पुलिस तक जा पहुंचा. पुलिस पर जांच का दबाव भारत सरकार के गृह मंत्रालय से पड़ा. इस का असर हुआ और सभी लड़कियों की बरामदगी हो गई. फिर उन्हें कोरवा उन के परिजनों को सौंप दिया गया. उन्होंने पुलिस और परिजनों को अपनी आपबीती सुनाई. उस के बाद जो देहव्यापार की दर्दनाक दास्तान सामने आई, उस की एक झलक इस प्रकार है.

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर, रायगढ़, जशपुर जिले में कोरवा जनजाति को राष्ट्रपति का संरक्षण प्राप्त है. उन्हें विशेष दरजा दे कर दत्तक संतान का दरजा दिया गया है. उन के जनजीवन को सुधारने के लिए सरकार की तरफ से कई योजनाएं चलाई गई हैं, फिर भी उन की आय में गिरावट बनी हुई है. उस समुदाय के बच्चे मुश्किल से 5वीं, 8वीं तक पढ़ पाते हैं. उन की जिंदगी एकदम से ठहरी हुई जंगली वातावरण सी उलझ गई है. यही कारण है कि उन पर महानगरों की प्लेसमेंट ऐजेंसियों की नजर टिकी रहती है. वे अपना निशाना कमसिन लड़कियों को बनाते हैं और उन्हें दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद आदि शहरों में नौकरी के बहाने अपने जाल में फंसा लेते हैं.

कहने को तो उन से घरेलू नौकरानी, मौल, प्राइवेट कंपनियां, औफिस में काम दिलवाने का वादा किया जाता है, लेकिन अधिकतर देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं.  ऐसी ही एक लड़की ने बताया, ‘‘मैं काफी गरीब परिवार से हूं. मुंबई यही सोच कर गई थी कि हमें नौकरी से पैसा मिलेगा और शांति से जिंदगी गुजरेगी. लेकिन वहां देह बेचना पड़ा. इस बारे में हम किसी को बता भी नहीं सकते थे. इस का विरोध करना तो बहुत ही मुश्किल काम था. कई बार तो एक दिन में आधेआधे घंटे पर अलगअलग मर्द के साथ सोना पड़ा.’’

उस ने बताया कि कैसे उसे उस के जानपहचान वाले राजकुमार ने काम दिलाने के नाम पर दुर्गाबाई नाम की महिला के हाथों बेच दिया था. वह बिहार के रोहतास जिले की रहने वाली थी. उस ने उस की खूबसूरती और उभार वाले वदन को देख कर कीमत सवा लाख रुपए लगाई थी. इस काम में राजकुमार के साथ महेश और सरला नाम की युवती भी शामिल थे. दुर्गाबाई के पास छत्तीसगढ़ की 6 लड़कियां थीं, जिन्हें बाद में 5 जनवरी, 2021 को पुलिस ने बरामद किया था. दुर्गाबाई लड़कियों को ग्राहकों के पास भेजती थी. हर ग्राहक से उसे डेढ़ हजार से ढाई हजार रुपए तक मिलते थे, जबकि वह हर लड़की को उसी में से खर्चे के नाम पर 300 से 500 तक देती थी.

मुक्त करवाई गई एक लड़की ने बताया कि किस तरह से वह राजकुमार के जाल में फंसी. उसे पहले बिलासपुर से बिक्रमगंज लाया था. वहां महेश और सरला मिले थे. दोनों ने पतिपत्नी होने का परिचय दिया. वह उसे दुर्गाबाई के पास ले गए. महेश ने बताया कि वह उन की सास है और मुंबई में रहती हैं. उन के साथ उसे 6 महीने तक रहना होगा. बाद में दोनों जब वहां आ जाएंगे तब वह वापस आना चाहे तो आ सकती है. या फिर उन के साथ रहना चाहे तो रह सकती है. लड़की को उन की बातों में सच्चाई दिखी और वह दुर्गाबाई के साथ 27 दिसंबर, 2020 को मुंबई आ गई.

वहां उस ने देखा कि उसी के जिले की 7 और लड़कियां रह रही हैं. उन में से ही एक लड़की ने उस के कान में चुपके से बताया कि वह गलत जगह आ गई है. उस की किस्मत अच्छी थी कि एक सप्ताह बाद ही दुर्गाबाई के उस मकान पर पुलिस ने छापा मारा और वह दूसरी लड़कियों के साथ मुक्त करवा ली गई. मुक्त करवाई गई जशोपुर जिले की एक पीडि़ता की मां ने बताया कि उस की बच्ची को 15 हजार रुपए महीने पर आर्केस्ट्रा में काम दिलवाने के नाम पर ले गया था. उन्होंने बताया कि उस की बच्ची को नाचने का शौक था, इसलिए सोचा अच्छा काम है. पैसा मिलेगा और धीरेधीरे शोहरत मिलेगी तब बड़ा कलाकार भी बन सकती है. वहां से उसे अंबिकापुर लाया गया. बाद में नशीली कोल्ड ड्रिंक्स पिला कर उत्तर प्रदेश में सोनभद्र जिला ले जाया गया.

वहां बिंदास आर्केस्ट्रा ग्रुप के संचालक मनोज कुमार और अन्नू उर्फ गोलू को सौंप दिया गया. उन्होंने लड़की को छोटे से कमरे में बंद कर दिया. 3 दिन बीतने के बाद जब लड़की ने पूछा कि उस का प्रोग्राम कब होगा तब उन्होंने उस के साथ जबरदस्ती की और फिर सजासंवार कर एक ग्राहक के पास भेज दिया. इस तरह से वह कथित आर्केस्ट्रा ग्रुप की एक नई सैक्सवर्कर बना दी गई. उस की मां ने बताया कि लड़की 12 मई को किसी ग्राहक के पास भेजी जाने वाली थी. बताया गया था कि वहां उसे 6 लड़कियों के साथ एक निजी पार्टी में शामिल होना है. म्यूजिक पर नाचगाना करना होगा.

संयोग से इस पार्टी की जानकारी पुलिस को भी लग गई थी. पुलिस को किसी ने सूचना दी थी कि कोई बर्थडे सेलिब्रशन के बहाने ड्रग कारोबारियों से डील करने वाला है. लेकिन जब पुलिस ने वहां छापेमारी की तब वहां से 7 लड़कियां रंगेहाथों पकड़ी गईं. उन से पूछताछ होने पर आर्केस्ट्रा ग्रुप की आड़ में देहव्यापर का भंडाफोड़ हो गया. आर्केस्ट्रा संचालक भी पकड़े गए. उस के बाद पुलिस को नई जानकारी मिली. इस तरह देहव्यापार के दलाल कोरवा जनजाति की लड़कियों को किसी न किसी तरह से अपने जाल में फांस कर जिस्मफरोशी के धंधे में शामिल कर रहे हैं. कहानी में कुछ नाम परिवर्तित हैं. Hindi Stories

 

Crime Story : स्कूल कर्मचारी ने 4 साल की बच्ची को बनाया हवस का शिकार

Crime Story एक जानेमाने स्कूल के कर्मचारी ने 2 बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया. ताज्जुब की बात यह कि पेरैंट्स की शिकायत के बाद भी न तो स्कूल प्रशासन और न ही पुलिस ने कोई काररवाई की. इस पर जब लोगों का गुस्सा भड़का तो…

महाराष्ट्र के पुणे जिलांतर्गत बदलापुर में एक बहुत ही चर्चित स्कूल है, जहां नर्सरी-केजी से ले कर 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है. यहां मराठी और अंगरेजी माध्यम से पढऩे वाले बच्चों की संख्या 1200 के करीब है. मराठी माध्यम के स्कूल सरकारी अनुदान से चलते हैं, जबकि अंगरेजी वाले स्कूल पूरी तरह से प्राइवेट हैं. यहां केजी के बच्चों में खासकर लड़कियां कक्षा शुरू होने से पहले काफी चहकतीफुदकती रहती हैं. उन की हंसी और मीठीमीठी बातें स्कूल के बरामदे, कक्षाएं और खेलकूद के लगे झूलों आदि की जगहों पर गूंजती रहती हैं. यह सब प्रार्थना शुरू होने से पहले कुछ समय तक चलता रहता है, फिर लंच के समय भी ऐसा ही माहौल बन जाता है.

इस दरम्यान बच्चों के लिए एक कोने में बने टायलेट के पास भी उन का लगातार आनाजाना लगा रहता है. उन को अकसर दरवाजे की कुंडी खोलने और बंद करने में मुश्किल आती है. वे अपने कद के मुताबिक वाश बेसिन तक नहीं पहुंच पाते हैं. उन की मदद और टायलेट की साफसफाई के लिए कुछ कर्मचारी नियुक्त हैं. उन्हीं में 24 साल का अक्षय शिंदे भी था, जो पहली अगस्त से नौकरी पर लगा था. इसी तरह से कई बार टायलेट की कुंडी भीतर से नहीं बंद हो पाती थी. शिंदे भिड़े हुए दरवाजे पर खड़ा हो जाता था, ताकि उस के रहते दूसरा कोई दरवाजा न खोल दे. इस क्रम में कई बार दरवाजे के कुछ खुले हिस्से से स्कर्ट के नीचे अर्धनग्न लड़की दिख जाती थी.

यह सब विवाहित अक्षय की दिनचर्या का मजेदार हिस्सा बन चुका था. उस की नजरें बच्चियों पर घूरने लगी थीं. खुराफाती दिमाग में वासना की आग सुलग चुकी थी. वह वैसे मौके की तलाश में रहने लगा था, जब कोई बच्ची एकांत में मिल जाए. कक्षा के दौरान बच्ची टायलेट आए. यह मौका भी उसे 13 अगस्त को मिल गया. एक 4 साल की बच्ची जैसे ही बाथरूम में घुसी, पीछे से वह भी घुस गया. बच्ची कुछ समझ पाती, इस से पहले उस ने बाहर के दरवाजे की कुंडी भीतर से लगा दी. कुछ मिनटों में जब बच्ची बाहर आई, तब हमेशा की तरह बच्ची को वाश बेसिन के पास उठा लिया. एक हाथ से उस की कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से बच्ची के प्राइवेट पार्ट को छेडऩे लगा. बच्ची ठुनकने लगी. बोली, ”दादा, क्या करते हो, गंदी बात है.’’

”चुप रहो, नहीं तो गला दबा दूंगा…’’ शिंदे की घुड़की से बच्ची चुप हो गई.

वह डरी हुई बच्ची के साथ दुष्कर्म कर बैठा. इस के बाद उस ने उसे अपने हाथों से कपड़े पहनाए, आंसू पोंछे और धमकाते हुए बोला, ”यह सब किसी को मत बताना, वरना तुम्हें गाड़ी से कुचलवा दूंगा. वहीं मर जाओगी मोटे टायर के नीचे दब कर…’’

उसी दिन शिंदे ने एक दूसरी 3 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया, अपनी वासना की आग ठंडी की. उसे भी डराधमका दिया था. लड़की के दादाजी उसे स्कूल छोडऩे जाने के लिए हर रोज की तैयार बैठे थे, लेकिन वह अभी सो रही थी. उन्होंने उस की मां से पूछा कि वह अभी तक तैयार क्यों नहीं हुई? स्कूल जाने का समय हो गया है. लड़की की मां ने बताया कि उस की देह थोड़ी गर्म है. उन्होंने वायरल फीवर की आशंका जताते हुए उसे आराम करने दिया.

बच्ची पूरे दिन वह गुमसुम बैड पर लेटी रही. उस की मम्मी ने उसे वहीं गोद में बिठा कर खाना खिला दिया. फिर सो गई. शाम को भी कमरे से बाहर नहीं निकली, जबकि वह स्वस्थ दिख रही थी. फिर भी मम्मी ने उसे आराम करने दिया. 15 अगस्त को भी बच्ची ने स्कूल जाने से इनकार कर दिया. मम्मी ने प्यार से पुचकारते हुए पूछा, ”क्या बात है बेटा… स्कूल में टीचर ने डांटा क्या?’’

इस का जवाब उस ने कुछ भी नहीं दिया. चुप्पी साधे रही.

काफी प्यारदुलार के बाद उस ने बताया, ”मम्मी, सूसू करने में मुझे तकलीफ होती है.’’

”कैसी तकलीफ…ठीकठीक बताओ… डाक्टर के पास ले चलूंगी.’’ मम्मी चिंतित हो गई.

”सूसू में लगता है चींटियां चल रही हैं.’’ बच्ची बोली.

इस पर उस ने अपनी पति से बात की और तुरंत डाक्टर के यहां ले जाने के लिए कहा.

बच्ची को तुरंत डाक्टर के पास ले जाया गया. डाक्टर ने उस का चैकअप किया और पेशाब करने में आई शिकायत पर जांच की. जांच के बाद डाक्टर ने बताया कि बच्ची के साथ यौनाचार किया गया है, जिस कारण उस का प्राइवेट पार्ट जख्मी हो गया है. डाक्टर से यह सुनना था कि लड़की के मम्मीपापा ने सिर पकड़ लिया. वे गुस्से में भी आ गए. उन्होंने उस के साथ पढऩे वाली उस की फ्रैंड के घर फोन मिलाया. उन के पैरेंट्स से मालूम हुआ कि वह भी 2 दिनों से स्कूल नहीं जा रही है…डरी हुई है. बारबार कहती है…मुझे मार देगा…नहीं जाऊंगी स्कूल!

उन्हें जब स्कूल नहीं जाने का कारण मालूम हुआ, तब वे भी गुस्से में आ गए. दोनों लड़कियों के पेरैंट्स ने तुरंत स्कूल प्रशासन को इस की सूचना दी, लेकिन स्कूल ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. दोनों के साथ स्कूल के दौरान रेप की घटना से इनकार कर दिया. सिर्फ इतना कहा कि सीसीटीवी 15 दिन से बंद है. इस के बाद पेरैंट्स बच्ची को हौस्पिटल ले कर गए. वहां के डाक्टर ने भी रेप की पुष्टि कर दी. फिर बदलापुर थाने पहुंच कर आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने की मांग की. लेकिन सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शुभदा शितोले ने केस दर्ज करने में आनाकानी की. दोनों बच्चियों के पेरैंट्स को घंटों थाने में बिठाए रखा. इस के बाद पुलिस अधिकारी हरकत में आए. इस लापरवाही और देरी के लिए सीनियर इंसपेक्टर शुभदा शितोले को सीनियर पुलिस अधिकारी ने सस्पेंड कर दिया.

मैडिकल जांच में यह साबित हो गया था कि बच्चियों के साथ घिनौना काम हुआ है. पुलिस स्टेशन में रात साढ़े 12 बजे जा कर शिकायत दर्ज होने के बाद पीडि़त बच्चियों ने पुलिस को दिए बयान में दुष्कर्म करने वाले स्कूल कर्मचारी अक्षय शिंदे का नाम बता दिया था. उस की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने पहल की और सुबह होतेहोते वह गिरफ्तार कर लिया गया. तब तक यह खबर पूरे शहर में आग की तरह फैल चुकी थी. बदलापुर रेप केस के आरोपी अक्षय शिंदे की करतूत कोलकाता रेप कांड के आरोपी संजय राय के मामले के बाद ही सामने आई थी. कोलकाता रेप कांड पर लोग पहले से ही गुस्से में थे. पूरे देश में जगहजगह विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. उन्हीं दिनों इस घटना ने आंदोलन की आग में और घी डाल दिया. लोग सड़कों पर उतर आए.

आंदोलनकारी बदलापुर स्टेशन पर रेलवे ट्रैक पर विरोध जताने लगे. ट्रेन की आवाजाही बंद हो गई. विरोध प्रदर्शन के कारण मुंबई सूरत वंदे भारत, पुणे दुरंतो और अन्य प्रमुख ट्रेनों सहित कई लंबी दूरी की ट्रेनों के मार्ग भी बदलने पड़े. इस के साथ ही इंटरनेट बंद करने का भी आदेश दे दिया गया. साथ ही स्कूल में तोडफ़ोड़ हुई. आरोपी अक्षय शिंदे के घर पर भी हंगामा हुआ, तोडफ़ोड़ हुई. लोग इस घटना पर आक्रोश व्यक्त करने और आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग करने लगे. महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए. उन्होंने विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन करने के भी आदेश दिए. वरिष्ठ वकील उज्ज्वल निकम को विशेष सरकारी वकील नियुक्त किया गया. सरकार ने आश्वासन दिया कि मामले की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में होगी. शिंदे के खिलाफ पोक्सो कानून के तहत मामला दर्ज किया गया.

आरोपी शिंदे को लगातार कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया गया. शिंदे से पूछताछ के सिलसिले में चौंकाने वाली घटना सामने आई. उस की करतूतों की पोल भी खुलती चली गई. पता चला कि उस ने 3 शादियां की थीं, लेकिन तीनों पत्नियां उसे छोड़ कर जा चुकी थीं. अक्षय शिंदे ने अपना जुर्म कुबूल भी कर लिया था. उस के वीडियो को पुलिस को कोर्ट में पेश करना था. वह स्कूल में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करता था. इस मामले में पहले तो स्कूल प्रशासन ने भी घटना से इनकार किया था. पुलिस की तरह ही स्कूल के प्रिंसिपल तक ने वारदात की गंभीरता को नहीं समझा. जब पुलिस में मामला दर्ज हो गया, तब स्कूल प्रशासन ने भी आननफानन में सख्त कदम उठाए और स्कूल के प्रिंसिपल, क्लास टीचर और एक महिलाकर्मी को भी सस्पेंड कर दिया.

स्कूल के ट्रस्टी फरार हो गए थे, जिन की अक्तूबर में गिरफ्तारी हो गई. हालांकि वे बचने के लिए हर 2-3 दिन में अपना ठिकाना बदलते रहे. उन्होंने अपने फोन बंद कर लिए. इस के अलावा डेढ़ महीने तक फरार रहने के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने घर वालों से संपर्क नहीं किया. मामले की जांच कर रही स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम (एसआईटी) को पूछताछ के दौरान स्कूल ट्रस्टी उदय कोतवाल और तुषार आप्टे ने बताया कि उन से बहुत बड़ी गलती हो गई थी. दोनों ही इस वारदात की खबर फैलने के बाद बेहद घबरा गए थे और जनता के आक्रोश से डर कर भागते फिर रहे थे.

इस की सुनवाई बौंबे हाईकोर्ट में चल रही थी. हाईकोर्ट ने स्वत:संज्ञान लिया था और मामले को गंभीरता से लेते हुए सुनवाई कर रही थी, जबकि आरोपी अक्षय शिंदे पुणे की तलोजा जेल में बंद था. हाईकोर्ट के न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और पृथ्वीराज चह्वाण की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्कूल प्रशासन को भी जबरदस्त फटकार लगाते हुए कहा था कि स्कूल भी सुरक्षित नहीं. 4 साल की बच्ची को भी नहीं बख्श रहे.  सुनवाई में कोर्ट ने कई सवाल पूछे. पीठ ने आरोपी की गिरफ्तारी पर सवाल किया कि क्या 164 के तहत बयान रिकौर्ड किया गया है? इसी के साथ सुनवाई में न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि क्या पोक्सो के तहत एक्शन हुआ या नहीं?

जिस का जवाब देते हुए सरकारी वकील सर्राफ ने बताया कि महिला औफिसर की मौजूदगी में केस रजिस्टर किया जा चुका है. इस के बाद अदालत ने इस केस में डायरी और एफआईआर मांगी, जिस में बच्चियों के बयान दर्ज किए गए हों. लेकिन जब जज महोदय को मालूम हुआ कि बयान 164 के तहत रजिस्टर नहीं किया गया है और पोक्सो एक्ट के तहत स्कूल ने कोई ऐक्शन नहीं लिया था, तब स्कूल प्रशासन को फटकार लगाई गई. साथ ही स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम को जल्द से जल्द काररवाई करने के आदेश जारी किए गए. पुलिस को फटकार लगाते हुए जज ने कहा कि जब एफआईआर में यह लिखवाया गया है कि स्कूल को इस मामले की जानकारी दी गई थी, तब पुलिस को स्कूल पर पहले ही ऐक्शन लेना चाहिए था.

कोर्ट ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि 2 पीडि़ताओं में सिर्फ एक के बयान ही क्यों दर्ज किए गए? क्या अधिकारियों ने सीआरपीसी की धारा 173 के तहत अनिवार्य रूप से पीडि़तों के बयान दर्ज किए?

कोर्ट ने एडवोकेट सर्राफ से अगली तारीख पर यह बताने को कहा कि उन के बयान दर्ज करने में देरी क्यों हुई? कोर्ट ने कहा कि यह बहुत गंभीर अपराध है. 2 बच्चियों के साथ यौन उत्पीडऩ हुआ, पुलिस मामले को गंभीरता से कैसे नहीं लेती? कोर्ट ने पीडि़तों की उम्र पूछी, जिस पर सर्राफ ने बताया कि एक बच्ची 4 साल और दूसरी 3 साल की है. कोर्ट ने कहा कि यह सब से बुरा है. कोर्ट ने कहा कि न केवल एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई, बल्कि स्कूल के संबंधित अधिकारियों ने शिकायत भी दर्ज नहीं की. यह एफआईआर कापी से साफ हो रहा है.

कोर्ट ने पूछा कि क्या बच्चियों की काउंसलिंग की जा रही है? पीडि़त बच्चियों के साथ जो हुआ, हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते. हम जानना चाहते हैं कि राज्य ने पीडि़त बच्चियों की काउंसलिंग के लिए क्या किया है. कोर्ट ने कहा कि धारा 161 के बयानों के तहत दूसरी बच्ची के पिता के हस्ताक्षर क्यों लिए गए? कोर्ट ने आगे कहा कि हम यह जान कर आश्चर्यचकित हैं कि बदलापुर पुलिस ने दूसरे पीडि़त के परिवार के बयान दर्ज नहीं किए. हमारे स्वत:संज्ञान लेने के बाद ही पुलिस ने दूसरी पीडि़ता के पिता के बयान दर्ज किए, वह भी आधी रात के बाद.

कोर्ट ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि आप न केवल पीडि़त बच्चियों के बल्कि उन के परिवारों के भी बयान सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज करेंगे. कोर्ट ने कहा कि अगली तारीख तक उन्हें केस की फाइल देखनी है कि पुलिस ने क्या जांच की?

इधर कोर्ट में सुनवाई चल रही थी, उधर बदलापुर में बवाल बढ़ता जा रहा था. महाविकास अघाड़ी ने 24 अगस्त को महाराष्ट्र बंद का ऐलान कर दिया था. महाराष्ट्र में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचार, रेप की घटनाओं और सरकार पर असंवेदनशीलता का आरोप लगाते हुए महाविकास अघाड़ी सरकार पर हमलावर बनी हुई थी. बदलापुर रेलवे स्टेशन पर 300 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. 70 से ज्यादा लोगों को अरेस्ट भी किया गया.

आरोपी की मजिस्ट्रैट के सामने सुनवाई पूरी सुरक्षा में हो रही थी. क्राइम ब्रांच के अधिकारी 23 सितंबर, 2024 की शाम साढ़े 5 बजे जेल से आरोपी अक्षय शिंदे को हिरासत में लेने के बाद तलोजा जेल से निकले थे. शाम करीब साढ़े 6 बजे पुलिस टीम जब मुंब्रा बाईपास के पास पहुंची तो अक्षय ने कथित तौर पर एक कांस्टेबल से हथियार छीन लिया और गोली चलाने लगा. इस के जवाब में पुलिस ने भी फायरिंग कर दी. इस में वो बुरी तरह से घायल हो गया और घटनास्थल पर ही उस की मौत हो गई.

इस तरह से बदलापुर रेप केस के मुख्य आरोपी की पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई. हालांकि खून से लथपथ आरोपी को अस्पताल में भरती कराया गया था, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था.

 

Rail की पटरी पर बलात्कार : समाज में होता अपराध

31 अक्तूबर, 2017 की शाम भोपाल में खासी चहलपहल थी. ट्रैफिक भी रोजाना से कहीं ज्यादा था. क्योंकि अगले दिन मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस समारोह लाल परेड ग्राउंड में मनाया जाना था. सरकारी वाहन लाल परेड ग्राउंड की तरफ दौड़े जा रहे थे.

सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात मार्गों में भी बदलाव किया गया था, जिस की वजह से एमपी नगर से ले कर नागपुर जाने वाले रास्ते होशंगाबाद रोड पर ट्रैफिक कुछ ज्यादा ही था. इसी रोड पर स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन के बाहर तो बारबार जाम लगने जैसे हालात बन रहे थे. एमपी नगर में कोचिंग सेंटर और हौस्टल्स बहुतायत से हैं, जहां तकरीबन 85 हजार छात्रछात्राएं कोचिंग कर रहे हैं. इन में लड़कियों की संख्या आधी से भी अधिक है. आसपास के जिलों के अलावा देश भर के विभिन्न राज्यों के छात्र यहां नजर आ जाते हैं.

शाम होते ही एमपी नगर इलाका छात्रों की आवाजाही से गुलजार हो उठता है. कालेज और कोचिंग आतेजाते छात्र दीनदुनिया की बातों के अलावा धीगड़मस्ती करते भी नजर आते हैं. अनामिका भी यहीं के एक कोचिंग सेंटर से पीएससी की कोचिंग कर रही थी. अनामिका ने 12वीं पास कर एक कालेज में बीएससी में दाखिला ले लिया था. उस का मकसद एक अच्छी सरकारी नौकरी पाना था, इसलिए उस ने कालेज की पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी थी. सर्दियां शुरू होते ही अंधेरा जल्दी होने लगा था. इसलिए 7 बजे जब कोचिंग क्लास छूटी तो अनामिका ने जल्द हबीबगंज रेलवे स्टेशन पहुंचने के लिए रेलवे की पटरियों वाला रास्ता चुना.

रेलवे लाइनें पार कर शार्टकट रास्ते से जाती थी स्टेशन अनामिका विदिशा से रोजाना ट्रेन द्वारा अपडाउन करती थी. उस के पिता भोपाल में ही रेलवे फोर्स में एएसआई हैं और उन्हें हबीबगंज में ही स्टाफ क्वार्टर मिला हुआ है पर वह वहां जरूरत पड़ने पर ही रुकती थी. उस की मां भी पुलिस में हवलदार हैं. कोचिंग से छूट कर अनामिका हबीबगंज स्टेशन पहुंच कर विदिशा जाने वाली किसी भी ट्रेन में बैठ जाती थी. फिर घंटे सवा घंटे में ही वह घर पहुंच जाती थी, जहां उस की मां और दोनों बड़ी बहनें उस का इंतजार कर रही होती थीं.

रोजाना की तरह 31 अक्तूबर को भी वह शार्टकट के रास्ते से हबीबगंज स्टेशन की तरफ जा रही थी. एमपी नगर से ले कर हबीबगंज तक रेल पटरी वाला रास्ता आमतौर पर सुनसान रहता है. केवल पैदल चल कर पटरी पार करने वाले लोग ही वहां नजर आते हैं. बीते कुछ सालों से रेलवे पटरियों के इर्दगिर्द कुछ झुग्गीबस्तियां भी बस गई हैं, जिन मेें मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं. यह शार्टकट अनामिका को सुविधाजनक लगता था, क्योंकि वह उधर से 10-12 मिनट में ही रेलवे स्टेशन पहुंच जाती थी. अनामिका एक बहादुर लड़की थी. मम्मीपापा दोनों के पुलिस में होने के कारण तो वह और भी बेखौफ रहती थी. शाम के वक्त झुग्गीझोपडि़यों और झाडि़यों वाले रास्ते से किसी लड़की का यूं अकेले जाना हालांकि खतरे वाली बात थी, लेकिन अनामिका को गुंडेबदमाशों से डर नहीं लगता था.

उस वक्त उस के जेहन में यही बात चल रही थी कि विदिशा जाने के लिए कौनकौन सी ट्रेनें मिल सकती हैं. वैसे शाम 6 बजे के बाद विदिशा जाने के लिए 6 ट्रेनें हबीबगंज से मिल जाती हैं, इसलिए नियमित यात्रियों को आसानी हो जाती है. नियमित यात्रियों की भी हर मुमकिन कोशिश यही रहती है कि जल्दी प्लेटफार्म तक पहुंच जाएं. शायद देरी से चल रही कोई ट्रेन खड़ी मिल जाए और ऐसा अकसर होता भी था कि प्लेटफार्म तक पहुंचतेपहुंचते किसी ट्रेन के आने का एनाउंसमेंट सुनाई दे जाता था.

एमपी नगर से कोई एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद ही रेलवे के केबिन और दूसरी इमारतें नजर आने लगती हैं तो आनेजाने वालों को उन्हें देख कर बड़ी राहत मिलती है कि लो अब तो पहुंचने ही वाले हैं.

बदमाश ने फिल्मी स्टाइल में रोका रास्ता

यही उस दिन अनामिका के साथ हुआ. पटरियों के बीच चलते स्टेशन की लाइटें दिखने लगीं तो उसे लगा कि वक्त पर प्लेटफार्म पहुंच ही जाएगी. जब दूर से आरपीएफ थाना दिखने लगा तो अनामिका के पांव और तेजी से उठने लगे. लेकिन एकाएक ही वह अचकचा गई. उस ने देखा कि गुंडे से दिखने वाले एक आदमी ने फिल्मी स्टाइल में उस का रास्ता रोक लिया है. अनामिका यही सोच रही थी कि क्या करे, तभी उस बदमाश ने उस का हाथ पकड़ लिया. आसपास कोई नहीं था और थीं भी तो सिर्फ झाडि़यां, जो उस की कोई मदद नहीं कर सकती थीं. अनामिका के दिमाग में खतरे की घंटी बजी, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी और उस बदमाश से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी.

प्रकृति ने स्त्री जाति को ही यह खूबी दी है कि वह पुरुष के स्पर्श मात्र से उस की मंशा भांप जाती है. अनामिका ने खतरा भांपते हुए उस बदमाश से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश तेज कर दी. अनामिका ने उस पर लात चलाई, तभी झाडि़यों से दूसरा गुंडा बाहर निकल आया. तुरंत ही अनामिका को समझ आ गया कि यह इसी का ही साथी है.

मदद के लिए चिल्लाने का कोई फायदा नहीं हुआ

अभी तक तीनों रेल की पटरियों के नजदीक थे, जहां कभी भी कोई ट्रेन आ सकती थी. बाहर आए दूसरे गुंडे ने भी अनामिका को पकड़ लिया और दोनों उसे घसीट कर नजदीक बनी पुलिया की तरफ ले जाने लगे. अनामिका ने पूरी ताकत और हिम्मत लगा कर उन से छूटने की कोशिश की पर 2 हट्टेकट्टे मर्दों के चंगुल से छूट पाना अब नाममुकिन सा था. अनामिका का विरोध उन्हें बजाए डराने के उकसा रहा था, इसलिए वे घसीटते हुए उसे पुलिया के नीचे ले गए. उन्होंने अनामिका को लगभग 100 फुट तक घसीटा लेकिन इस दौरान भी अनामिका हाथपैर चलाती रही और मदद के लिए चिल्लाई भी लेकिन न तो उस का विरोध काम आया और न ही उस की आवाज किसी ने सुनी.

आखिरकार अनामिका हार गई. दोनों गुंडों ने उस के साथ बलात्कार किया. इस बीच वह इन दोनों के सामने रोईगिड़गिड़ाई भी. इतना ही नहीं, उस ने अपनी हाथ घड़ी, मोबाइल फोन और कान के बुंदे तक उन के हवाले कर दिए पर इन गुंडों का दिल नहीं पसीजा. ज्यादती के पहले ही खींचातानी में अनामिका के कपड़े तक फट चुके थे. उन दोनों की बातचीत से उसे इतना जरूर पता चल गया कि इन बदमाशों में से एक का नाम अमर और दूसरे का गोलू है. जब इन दोनों ने अपनी कुत्सित मंशाएं पूरी कर लीं तो अनामिका को लगा कि वे उसे छोड़ देंगे. इस बाबत उस ने उन दरिंदों से गुहार भी लगाई थी.

राक्षसों की दयानतदारी भी कितनी भारी पड़ती है, इस का अहसास अनामिका को कुछ देर बाद हुआ. लगभग एक घंटे तक ज्यादती करने के बाद अमर और गोलू ने तय किया कि अनामिका को यूं निर्वस्त्र छोड़ा जाना ठीक नहीं, इसलिए उस के लिए कपड़ों का इंतजाम किया जाए. नशे में डूबे इन हैवानों की यह दया अनामिका पर और भारी पड़ी. गोलू ने अमर को अनामिका की निगरानी करने के लिए कहा और खुद अनामिका के लिए कपड़े लेने गोविंदपुरा की झुग्गियों की तरफ चला गया. वहां उस के 2 दोस्त राजेश और रमेश रहते थे. गोलू ने उन से एक जोड़ी लेडीज कपड़े मांगे तो इन दोनों ने इस की वजह पूछी. इस पर गोलू ने सारा वाकया उन्हें बता दिया.

गोलू की बात सुन कर राजेश और रमेश की हैवानियत भी जाग उठी. वे दोनों कपड़े ले कर गोलू के साथ उसी पुलिया के नीचे पहुंच गए, जहां अनामिका निर्वस्त्र पड़ी थी. अनामिका अब लाश सरीखी बन चुकी थी. उन चारों में से कोई जा कर स्टेशन के बाहर से चाय और गांजा ले आया. इन्होंने छक कर चाय गांजे की पार्टी की और बेहोशी और होश के बीच झूल रही अनामिका के साथ अमर और गोलू ने एक बार फिर ज्यादती की. फूल सी अनामिका इस ज्यादती को झेल नहीं पाई और बेहोश हो गई.

जब वासना का भूत उतरा तो इन चारों ने अनामिका को जान से मार डालने का मशविरा किया, जिसे इन में से ही किसी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि रहने दो, लड़की किसी को कुछ नहीं बता पाएगी, क्योंकि यह तो हमें जानती तक नहीं है. बेहोश पड़ी अनामिका इन चारों की नजर में मर चुकी थी, इसलिए चारों अपने साथ लाए कपड़े उस के पास फेंक कर फरार हो गए और अनामिका से लूटे सामान का आपस में बंटवारा कर लिया.

थोड़ी देर बाद अनामिका को होश आया तो वह कुछ देर इन के होने न होने की टोह लेती रही. उसे जब इस बात की तसल्ली हो गई कि बदमाश वहां नहीं हैं तो उस ने जैसेतैसे उन के लाए कपडे़ पहने और बड़ी मुश्किल से महज 100 फीट दूर स्थित जीआरपी थाने पहुंची.

पुलिस ने नहीं किया सहयोग

थाने का स्टाफ उसे पहचानता था. मौजूदा पुलिसकर्मियों से उस ने कहा कि पापा से बात करा दो तो एक ने उस के पिता को नंबर लगा कर फोन उसे दे दिया. फोन पर सारी बात तो उस ने पिता को नहीं बताई, सिर्फ इतना कहा कि आप तुरंत यहां थाने आ जाइए. बेटी की आवाज से ही पिता समझ गए कि कुछ गड़बड़ है इसलिए 15 मिनट में ही वे थाने पहुंच गए. पिता को देख कर अनामिका कुछ देर पहले की घटना और तकलीफ भूल उन से ऐसे चिपट गई मानो अब कोई उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. बेटी की नाजुक हालत देख पिता उसे घर ले आए और फोन पर पत्नी को भी तुरंत भोपाल पहुंचने को कहा तो वह भी भोपाल के लिए रवाना हो गईं. देर रात मां वहां पहुंची तो कुछकुछ सामान्य हो चली अनामिका ने उन्हें अपने साथ हुई ज्यादती की बात बताई. जाहिर है, सुन कर मांबाप का कलेजा दहल उठा.

बेटी की एकएक बात से उन्हें लग रहा था कि जैसे कोई धारदार चाकू से उन के कलेजे को टुकड़ेटुकडे़ कर निकाल रहा है. चूंकि रात बहुत हो गई थी और भोपाल में मध्य प्रदेश स्थापना दिवस की तैयारियां चल रही थीं, इसलिए उन्होंने तय किया कि सुबह होते ही सब से पहला काम पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का करेंगे, जिस से अपराधी पकड़े जाएं.

इधर से उधर टरकाती रही पुलिस

अनामिका के मातापिता अगली सुबह ही कोई साढ़े 10 बजे एमपी नगर थाने पहुंचे. खुद को बेइज्जत महसूस कर रही अनामिका को उम्मीद थी कि थाने पहुंच कर फटाफट आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी. एमपी नगर थाने में इन तीनों ने मौजूद सबइंसपेक्टर आर.एन. टेकाम को आपबीती सुनाई. तकरीबन आधे घंटे तक इस सबइंसपेक्टर ने अनामिका से उस के साथ हुई ज्यादती के बारे में पूछताछ की लेकिन रिपोर्ट लिखने के बजाय वह इन तीनों को घटनास्थल पर ले गया. घटनास्थल का मुआयना करने के बाद टेकाम ने उन पर यह कहते हुए गाज गिरा दी कि यह जगह तो हबीबगंज थाने में आती है, इसलिए आप वहां जा कर रिपोर्ट लिखाइए.

यह दरअसल में एक मानसिक और प्रशासनिक बलात्कार की शुरुआत थी. लेकिन दिलचस्प इत्तफाक की बात यह थी कि ये तीनों जब एमपी नगर से हबीबगंज थाने की तरफ जा रहे थे, तब हबीबगंज रेलवे स्टेशन के बाहर सामने की तरफ से गुजरते अनामिका की नजर गोलू पर पड़ गई. रोमांचित हो कर अनामिका ने पिता को बताया कि जिन 4 लोगों ने बीती रात उस के साथ दुष्कर्म किया था, उन में से एक यह सामने खड़ा है. इतना सुनते ही उस के मातापिता ने वक्त न गंवाते हुए गोलू को धर दबोचा.

गोलू का इतनी आसानी और बगैर स्थानीय पुलिस की मदद से पकड़ा जाना एक अप्रत्याशित बात थी. अब उन्हें उम्मीद हो गई कि अब तो बाकी इस के तीनों साथी भी जल्द पकडे़ जाएंगे. गोलू को दबोच कर ये तीनों हबीबगंज थाने पहुंचे. हबीबगंज थाने के टीआई रवींद्र यादव को एक बार फिर अनामिका को पूरा हादसा बताना पड़ा.

रवींद्र यादव ने गोलू से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपने साथियों के नामपते भी बता दिए. उन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए आला अफसरों को भी वारदात के बारे में बता दिया. टीआई उन तीनों को ले कर फिर घटनास्थल पहुंचे. हबीबगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई पर अच्छी बात यह थी कि मुजरिमों के बारे में काफी कुछ पता चल गया था. आला अफसरों के सामने भी अनामिका को दुखद आपबीती बारबार दोहरानी पड़ी.

रवींद्र यादव ने हबीबगंज जीआरपी को भी फोन किया था, लेकिन वहां से कोई पुलिस वाला नहीं आया. सूरज सिर पर था लेकिन अनामिका और उस के मातापिता की उम्मीदों का सूरज पुलिस की काररवाई देख ढलने लगा था. बारबार फोन करने पर जीआरपी का एक एएसआई घटनास्थल पर पहुंचा लेकिन उस का आना भी एक रस्मअदाई साबित हुआ. जैसे वह आया था, सब कुछ सुन कर वैसे ही वापस भी लौट गया.

इस के कुछ देर बाद हबीबगंज जीआरपी के टीआई मोहित सक्सेना घटनास्थल पर पहुंचे. उन के और रवींद्र यादव के बीच घंटे भर बहस इसी बात पर होती रही कि घटनास्थल किस थाना क्षेत्र में आता है. इस दौरान अनामिका और उस के मांबाप भूखेप्यासे उन की बहस को सुनते रहे कि थाना क्षेत्र तय हो तो एफआईआर दर्ज हो और काररवाई आगे बढ़े. आखिरी फैसला यह हुआ कि अनामिका गैंगरेप का मामला हबीबगंज जीआरपी थाने में दर्ज होगा. अब तक रात के 8 बज चुके थे. अनामिका के पिता को बेटी की चिंता सताए जा रही थी, जो थकान के चलते सामान्य ढंग से बातचीत भी नहीं कर पा रही थी. तमाम पुलिस वालों के सामने अनामिका को अपने साथ घटी घटना दोहरानी पड़ी. यह सब बताबता कर वह इस तरह अपमानित हो रही थी, जैसे उस ने अपराध खुद किया हो.

मीडिया में बात आने के बाद पुलिस हुई सक्रिय

24 घंटे थाने दर थाने भटकने के बाद तीनों का भरोसा पुलिस और इंसाफ से उठने लगा था. मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस बगैर किसी अड़चन के मन चुका था, जिस में पुलिस का भारीभरकम अमला तैनात था. 2 नवंबर, 2017 को जब अनामिका के साथ हुए अत्याचारों की भनक मीडिया को लगी तो अगले दिन के अखबार इस जघन्य, वीभत्स और शर्मनाक बलात्कार कांड से रंगे हुए थे, जिन में पुलिस की लापरवाही, मनमानी और हीलाहवाली पर खूब कीचड़ उछाली गई थी. लोग अब बलात्कारियों से ज्यादा पुलिस को कोसने लगे थे. जब आम लोगों का गुस्सा बढ़ने लगा तो स्थापना दिवस की खुमारी उतार चुके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आला पुलिस अफसरों की बैठक ली.

मीटिंग में सक्रियता और संवेदनशीलता दिखाते मुख्यमंत्री ने डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला और डीआईजी संतोष कुमार सिंह की जम कर खिंचाई की और टीआई जीआरपी हबीबगंज मोहित सक्सेना, एमपी नगर थाने के टीआई संजय सिंह बैंस और हबीबगंज थाने के टीआई रवींद्र यादव के अलावा जीआरपी के एक सबइंसपेक्टर भवानी प्रसाद उइके को तत्काल सस्पेंड कर दिया.

कानूनी प्रावधान तो यह है कि छेड़खानी और दुष्कर्म के मामलों में पुलिस को एफआईआर लिखना अनिवार्य है. आईपीसी की धारा 166 (क) साफसाफ कहती है कि धारा 376, 354, 326 और 509 के तहत हुए अपराधों की एफआईआर दर्ज न करने पर दोषी पुलिस वालों को 6 महीने से ले कर 2 साल तक की सजा दी जा सकती है. किसी भी सूरत में कोई भी पुलिस वाला इन धाराओं के अपराध की एफआईआर लिखने से मना नहीं कर सकता. चाहे घटनास्थल उस की सीमा में आता है या नहीं. गोलू की निशानदेही पर पुलिस ने 3 नवंबर को अमर और राजेश उर्फ चेतराम को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन चौथा अपराधी रमेश मेहरा पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका. बाद में पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस गिरफ्तारी पर भी पुलिस की हड़बड़ी और गैरजिम्मेदाराना बरताव उजागर हुआ.

छानबीन में यह बात सामने आई कि गिरफ्तार किए गए अभियुक्त बेहद शातिर और नशेड़ी हैं. वे हबीबगंज इलाके के आसपास की झुग्गियों में ही रहते थे. ये लोग पन्नियां बीनने का काम करते थे. लेकिन असल में इन का काम रेलवे का सामान लोहा आदि चोरी कर कबाडि़यों को बेचने का था. जांच में पता चला कि आरोपियों में सब से खतरनाक गोलू उर्फ बिहारी है. गोलू ने अपनी नाबालिगी में ही हत्या की एक वारदात को अंजाम दिया था. उस ने एक पुलिसकर्मी के बेटे की हत्या की थी. इतना ही नहीं एक औरत से उस के नाजायज संबंध हो गए थे, जिस से उस के एक बच्चा भी हुआ था. गोलूकितना बेरहम है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी माशूका से हुए बेटे को वह उस के पैदा होने के 4 दिन बाद ही रेल की पटरी पर रख आया था, जिस से ट्रेन से कट कर उस की मौत हो गई थी.

दूसरा आरोपी अमर उस का साढ़ू है. अमर भी शातिर अपराधी है कुछ दिन पहले ही वह अरेरा कालोनी में रहने वाले एक रिटायर्ड पुलिस अफसर के यहां चोरी करने के आरोप में पकड़ा गया था. पूछताछ में आरोपियों ने अपने नशे में होने की बात स्वीकारी और यह भी बताया कि अनामिका आती दिखी तो उन्होंने लूटपाट के इरादे से पकड़ा था लेकिन फिर उन की नीयत बदल गई.

मुख्यमंत्री के निर्देश पर एसआईटी को दिया केस

अनामिका बलात्कार मामले का शोर देश भर में मचा. इस से पुलिस प्रशासन की जम कर थूथू हुई. शहर में लगभग 50 जगहों पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनैतिक दलों ने धरनेप्रदर्शन किए. विरोध बढ़ता देख मुख्यमंत्री ने जांच के लिए एसआईटी टीम गठित करने के निर्देश दे डाले. कांग्रेसी सांसदों ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ ने भी सरकार और लचर कानूनव्यवस्था की जम कर खिंचाई की. बचाव की मुद्रा में आए राज्य के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने एक बचकाना बयान यह दे डाला कि क्या कांग्रेस शासित प्रदेशों में ऐसा नहीं होता.

भोपाल में जो हुआ, वह वाकई मानव कल्पना से परे था. जनाक्रोश और दबाव में पुलिस ने एक और भारी चूक यह कर डाली कि जल्दबाजी में नाम की गफलत में एक ड्राइवर राजेश राजपूत को गिरफ्तार कर डाला. बेगुनाह राजेश से जुर्म कबूलवाने के लिए उसे थाने में अमानवीय यातनाएं दी गईं. बकौल राजेश, ‘मुझे गिरफ्तार कर गुनाह स्वीकारने के लिए जम कर लगातार मारा गया. प्लास्टिक के डंडों से बेहोश होने तक मारा जाता रहा. इस दौरान एक महिला पुलिस अधिकारी ने उस से कहा था कि तू गुनाह कबूल कर जेल चला जा और वहां बेफिक्री से कुछ दिन काट ले क्योंकि रिपोर्ट दर्ज कराने वाली मांबेटी फरजी हैं.’

राजेश के मुताबिक उस का मोबाइल फोन पुलिस ने छीन लिया. उसे पत्नी से बात भी नहीं करने दी गई थी. हकीकत में राजेश राजपूत हादसे के वक्त और उस दिन भोपाल में था ही नहीं. वह शिवसेना के एक नेता के साथ इंदौर गया था. उस की पत्नी दुर्गा को जब किसी से पता चला कि उस के पति को पुलिस ने गैंगरेप मामले में गिरफ्तार कर रखा है तो वह घबरा गई. दुर्गा जब थाने पहुंची तो पति की एक झलक दिखा कर उसे दुत्कार कर भगा दिया गया. इस के बाद वह अपने पति की बेगुनाही के सबूत ले कर वह यहांवहां भटकती रही, तब कहीं जा कर उसे 3 नवंबर को छोड़ा गया.

थाने से छूटे राजेश ने बताया कि वह हबीबगंज स्टेशन के बाहर भाजपा कार्यालय के पीछे की बस्ती में रहता है. जिनजिन पुलिस अधिकारियों ने उस के साथ ज्यादती की है, वह उन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराएगा. अनामिका की हालत पुलिसिया पूछताछ और मैडिकल जांच में बेहद खराब हो चली थी लेकिन अच्छी बात यह थी कि इस बहादुर लड़की ने हिम्मत नहीं हारी. मीडिया के सपोर्ट और संगठनों के धरनेप्रदर्शनों ने उस के जख्मों पर मरहम लगाने का काम किया. अब वह आईपीएस अधिकारी बन कर सिस्टम को सुधारना चाहती है. उस के मातापिता भी उसे हिम्मत बंधाते रहे और हरदम उस के साथ रहे, जिस से भावनात्मक रूप से वह टूटने व बिखरने से बच गई.

बवाल शांत करने के उद्देश्य से सरकार ने भोपाल के आईजी योगेश चौधरी और रेलवे पुलिस की डीएसपी अनीता मालवीय को भी पुलिस हैडक्वार्टर भेज दिया. अनीता मालवीय इस बलात्कार कांड पर ठहाके लगाती नजर आई थीं, जिस पर उन की खूब हंसी उड़ी थी. डाक्टरों ने डाक्टरी जांच में की बहुत बड़ी गलती हर कोई जानता है कि ऐसी सजाओं से लापरवाह और दोषी पुलिस कर्मचारियों का कुछ नहीं बिगड़ता. आज नहीं तो कल वे फिर मैदानी ड्यूटी पर होंगे और अपने खिलाफ लिए गए एक्शन का बदला और भी बेरहमी से अपराधियों के अलावा आम लोगों से लेंगे.

सरकारी अमले किस मुस्तैदी से काम करते हैं, इस की एक बानगी फिर सामने आई. अनामिका की मैडिकल जांच सुलतानिया जनाना अस्पताल में हुई थी. प्रारंभिक रिपोर्ट में एक जूनियर डाक्टर ने लिखा था कि संबंध ‘विद कंसर्न’ यानी सहमति से बने थे. इस रिपोर्ट में एक हास्यास्पद बात एक्यूज्ड की जगह विक्टिम शब्द का प्रयोग किया था. इस पर भी काफी छीछालेदर हुई. तब सीनियर डाक्टर्स ने गलती स्वीकारते हुए इसे लिपिकीय त्रुटि बताया, मानो कुछ हुआ ही न हो. रेलवे की नई एसपी रुचिवर्धन मिश्रा ने इसे मानवीय त्रुटि बताया तो भोपाल के कमिश्नर अजातशत्रु श्रीवास्तव ने लापरवाही बरतने वाली डाक्टरों खुशबू गजभिए और संयोगिता को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. ये दोनों डाक्टर इस के पहले ही अपनी गलती स्वीकार चुकी थीं. उन की यह कोई महानता नहीं थी बल्कि मजबूरी हो गई थी. बाद में रिपोर्ट सुधार ली गई.

अगर वक्त रहते इस गलती की तरफ ध्यान नहीं जाता तो इस का फायदा केस के आरोपियों को मिलता. वजह बलात्कार के मामलों में मैडिकल रिपोर्ट काफी अहम होती है. तरस और हैरानी की बात यह है कि जिस लड़की के साथ 6 दफा बलात्कार हुआ,उस की रिपोर्ट में सहमति से संबंध बनाना लिख दिया गया. शायद इस की आदत डाक्टरों को पड़ गई है या फिर इस की कोई और वजह हो सकती है, जिस की जांच किया जाना जरूरी है. अनामिका बलात्कार कांड में एक भाजपा नेता का नाम भी संदिग्ध रूप से आया था, जो बारबार पुलिस थाने में आरोपियों के बचाव के लिए फोन कर रहा था.

पुलिस ने चारों दुर्दांत वहशी दरिंदों गोलू चिढार उर्फ बिहारी, अमर, राजेश उर्फ चेतराम और रमेश मेहरा से पूछताछ कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया. अनामिका चाहती है कि इन दरिंदों को चौराहे पर फांसी दी जाए पर बदकिस्मती से देश का कानून ऐसा है, यहां पीडि़ता की भावनाओं की कोई कीमत नहीं होती. भोपाल बार एसोसिएशन ने यह एक अच्छा संकल्प लिया है कि कोई भी वकील इन अभियुक्तों की पैरवी नहीं करेगा. गुस्साए आम लोग भी कानून में बदलाव चाहते हैं. उन का यह कहना है कि सुनवाई में देर होने से अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं और ऐसे अपराधों को शह मिलती है.

हालांकि खुद को आहत बता रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शीघ्र नया विधेयक ला कर कानून बनाने की बात कर चुके हैं और मामले की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में कराने की बात कर चुके हैं, पर सच यह है कि अब कोई उन पर भरोसा नहीं करता. खासतौर से इस मामले में पुलिस की भूमिका को ले कर तो वे खुद कटघरे में हैं.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अनामिका परिवर्तित नाम है. 

दो दूल्हों की अनोखी शादी

शादी हमेशा विपरीत लिंगी यानी लड़का या लड़की के बीच होती है. लेकिन 30 मार्च, 2019 को  अमेरिका के टेक्सास (Texas) प्रांत के किलीन शहर में एक ऐसी अनोखी शादी (Gay Couple Wedding) हुई, जिस की खबर सुन कर लोग आश्चर्यचकित रह गए.

पारंपरिक रूप से हुई इस शादी में बैंडबाजा, बारात, मंडप, नाचनागाना, मस्ती, विदाई, तरहतरह के व्यंजन सब कुछ था, लेकिन नहीं थी तो दुलहन. इस शादी में 2 दूल्हे अलगअलग घोडि़यों पर सवार हो कर आए थे. लग रहा था जैसे 2 बारातें हों, लेकिन हकीकत कुछ और ही थी. हकीकत तब सामने आई जब दोनों दूल्हों ने पारंपरिक रस्मों के बाद अग्नि के 7 फेरे लिए. पता चला दोनों ही एकदूसरे के हसबैंड भी हैं और दुलहन भी.

यह अनोखी शादी करने वाले वैभव और पराग (Vaibhav And Parag) एनआरआई हैं. वैभव एक रिसर्चर हैं और पब्लिक हेल्थ इशूज पर काम कर रहे हैं. जबकि पराग यूएस के प्रेसिडेंट ओबामा की एडमिनिस्ट्रैशन टीम के सदस्य रहे  हैं और वर्तमान में वह मास्टरकार्ड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट हैं.

दोनों ही न्यूयार्क में रहते हैं. वैभव और पराग दोनों ही उच्च शिक्षित हैं और अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं. जाहिर है उन्हें शादी के लिए अच्छे परिवारों की लड़कियां मिल सकती थीं. लेकिन ऐसी क्या वजह रही जो दोनों ने लड़कियों के बजाए आपस में ही शादी कर ली.

वैभव दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार में पलाबढ़ा था. यहीं पर उस की पढ़ाई हुई. उस के परिवार में कई चाचाचाची, चचेरे भाईबहन वगैरह थे. वैभव दिखने में तो अन्य लड़कों की तरह सामान्य था लेकिन जब वह बड़ा हुआ तो वह खुद को दूसरे लड़कों से अलग महसूस करने लगा.

उस की चाल और बात करने के तरीके को देख कर क्लास के अन्य लड़के उस की मजाक उड़ाते थे. दूसरे लड़के टोंट कसते तो उसे उन पर गुस्सा आता, लेकिन वह चुप रह जाता था. क्लास में हर साल मौनिटर चुने जाते थे. जिस में एक मौनिटर मेल होता था और एक फीमेल.

उस समय वैभव सिर झुका कर बैठा रहता था क्योंकि जब फीमेल मौनिटर को नामिनेट करने की बारी आती तो क्लास के कुछ बच्चे वैभव का नाम ले कर चिल्लाते थे. तभी क्लास के बाकी बच्चे और टीचर हंसने लगते थे. उस समय वैभव की आंखें आंसुओं से भर जाती थीं. जैसे जैसे वैभव की उम्र बढ़ रही थी, उस की चिंता भी बढ़ती जा रहा थी.

ऐसी मनोस्थिति में वैभव ने अपनी पढ़ाई को डिस्टर्ब नहीं होने दिया. वह जब 12 साल का हुआ तो उस का झुकाव लड़कों की तरफ ज्यादा होने लगा. तभी उसे अहसास हुआ कि वह गे है. उस की यह समस्या ऐसी थी जिस के बारे में वह किसी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. वह बहुत कंफ्यूजन में था.

उस वक्त वैभव को बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं थी लेकिन वह यह बात अच्छी तरह जानता था कि उस की बात को कोई स्वीकार नहीं कर पाएगा. इसलिए शर्म और झिझक की वजह से वह अपनी समस्या को लोगों से छिपाता रहा. एक तरह से वह दोहरी जिंदगी जीता रहा था.

वह लोगों के सामने खुद को सामान्य लड़का दिखाना चाहता था, इसलिए लड़कियों के साथ न चाहते हुए भी दोस्ती करने लगा. वह उन के साथ चैटिंग भी करता यानी वह दोस्तों के सामने हेट्रोसेक्सुअल होने का दिखावा करता. लेकिन अंदर ही अंदर उसे खुद से नफरत होती थी. इस दौरान वह धार्मिक भी हो गया. मंदिर में जा कर वह खुद को नौरमल बनाने की प्रार्थना करता.

वैभव कालेज की पढ़ाई करने के लिए जब बेंगलुरु गया तो वहां कालेज के दोस्त उस से बात करते तो वह झूठ कह देता कि दिल्ली में उस की गर्लफ्रैंड है. ऐसे ही जब वह दिल्ली आता तो दिल्ली के दोस्तों से कह देता कि बेंगलुरु में उस की गर्लफ्रैंड है.

इस तरह वह दोहरी जिंदगी जी रहा था. लेकिन दोस्तों के इस तरह के सवाल उस का पीछा नहीं छोड़ रहे थे कि तुम क्रिकेट क्यों नहीं खेलते. तुम लड़कियों की तरह क्यों चलते हो? क्या तुम मर्दों की तरह लड़ सकते हो?

हालांकि दोस्तों के द्वारा पूछे गए इन सवालों में सच्चाई थी, लेकिन वह अपने अंदर की सच्चाई अपने मातापिता को भी नहीं बता पा रहा था. इस बात को छिपा कर जीना उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था. वैभव ने पराग को पहली बार एक गे प्राइड परेड में डांस करते देखा था. तभी से वह उस से इम्प्रैस हो गया था. इस के बाद उस ने पराग की फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेस्ट का मैसेज भेजा. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती हो गई. पराग यूएस में रहता था.

पराग भी वैभव की तरह गे था. दोनों में फर्क इतना था कि देश के कल्चर और पारिवारिक संस्कारों को देखते हुए वैभव ने अपने गे होने की बात अपने मांबाप तक से नहीं बताई, जबकि यूएस में पलेबढ़े पराग ने यह बात अपने मांबाप से बता दी थी.

वैसे शुरुआत में पराग ने भी वैभव  की तरह दोहरी जिंदगी जी थी. वह भी अपनी सैक्सुअल ओरिएंटेशन लोगों से छिपाता रहा. लेकिन वह चूंकि यूएस कल्चर में बड़ा हुआ था. धीरेधीरे उसे वहां के कल्चर में घुलीमिली गे पुरुर्षों की कहानियां सामने आने लगी थी.

जल्दी ही पराग को यह जानकारी भी मिल गई कि ऐसे लोगों का एक नाम और कम्युनिटी भी है. जब वह कालेज में पहुंचा तो यूएस में गार्डन गे राइट्स मूवमेंट बढ़ने लगा था. सन 1999 में पराग जब कालेज के फाइनल ईयर में था तब उस ने अपने मातापिता को इस बारे में बता दिया था.

बेटे के मुंह से सच्चाई सुन कर वे दोनों जैसे सदमे में आ गए थे. क्योंकि वे लोग किसी अच्छी लड़की से उस की शादी करने के बारे में सोच रहे थे. लेकिन पिता ने बेटे की खुशी पर अपनी सोच थोपना जरूरी नहीं समझा. इसलिए उन्होंने पराग को तुरंत गले लगा लिया.

इतना ही नहीं, उस का उन्होंने हर कदम पर साथ देने का आश्वासन दिया. उन्होंने अपने परिवार और सभी करीबी लोगों को एक लैटर लिखा, जिस में उन्होंने अपने बेटे का यह सच उजागर किया. साथ ही बताया कि उन्हें अपने बेटे पर फख्र है और वह उसे बहुत प्यार करते हैं, पिता का यह सपोर्ट पा कर पराग भी बेहद खुश था.

इधर सोशल साइट पर पराग और वैभव की दोस्ती बढ़ती जा रही थी. दोनों ही एकदूसरे को गहराई से जानना पहचानना चाहते थे. फलस्वरूप दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे. वैभव ने पराग के साथ डेटिंग शुरू कर दी.

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वैभव की जिंदगी में आया पराग

अब तक की बातचीत से वैभव जान गया था कि पराग अपनी सैक्सुअल ओरिएंटेशन को छिपाता नहीं है. अगर उसे पराग के साथ रिश्ता रखना है तो वह छिप कर नहीं रहेगा. वैभव सोशल मीडिया के माध्यम से पराग को अपनी फोटो भी भेज चुका था.

इसी बीच किसी तरह वैभव के घर वालों को पता चल गया कि वैभव का अपने दोस्त पराग के साथ कुछ चल रहा है. घर वालों ने इस बारे में वैभव से कुछ पूछा तो नहीं था लेकिन उन की बातों से वैभव को कुछ भनक  जरूर मिल गई थी. इस बारे में वैभव ने पराग को बताया तो उस ने कहा कि इस से पहले कि पैरेंट्स को यह जानकारी कहीं और से पता चले, बेहतर होगा वे लोग इस हकीकत को तुम्हारे मुंह से सुनें.

पराग और वैभव की पहली मुलाकात काफी इंट्रैस्टिंग थी. बिलकुल किसी बौलीवुड फिल्म की तरह. दरअसल इस बीच वैभव भी अमेरिका चला गया था. 12 जून, 2012 को दोनों वाशिंगटन डीसी के एक थाई रेस्टोरेंट में पहली बार मिले. हालांकि उस रेस्टोरेंट का खाना उन्हें बहुत खराब लगा, लेकिन उन के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो 6 घंटे चला. दोनों ही एकदूसरे के दीवाने से हो गए. उस दौरान दोनों ने कुछ बौलीवुड गाने भी गुनगुनाए. इस पहली मुलाकात में ही दोनों जान गए थे कि दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं.

चूंकि पराग अपने बारे में 10 साल पहले अपने मातापिता को सब कुछ बता चुका था इसलिए उस ने वैभव को कुछ टिप्स दिए. उस ने कहा कि मातापिता को तब बताओ जब वे तुम्हारे किसी एचीवमेंट पर बहुत खुश हों और प्राउड फील कर रहे हों. इस के बाद वैभव मौके का इंतजर करने लगा. यह बात सन 2013 की है.

वैभव ने तय कर लिया कि वह अपने गे होने की बात सन 2013 की गरमियों की छुट्टियों में मांबाप को जरूर बता देगा. इत्तफाक से वैभव को विश्व स्वास्थ्य संगठन  (डब्ल्यूएचओ) के जेनेवा, स्विट्जरलैंड की फैलोशिप के चुन लिया गया.

वैभव के इस अचीवमेंट पर उस के मातापिता और परिवार के अन्य लोग फूले नहीं समा रहे थे. इतना ही नहीं उस के पैरेट्ंस उस से मिलने के लिए स्विटजरलैंड पहुंच गए. वैभव ने उन्हें वहां खूब घुमाया फिराया. लेकिन इस दौरान भी वह मन की बात पेरेंट्स से नहीं कह सका.

मातापिता के सामने आई बेटे की सच्चाई

20 जुलाई, 2013 को वैभव के पैरेंट्स होटल में जब वापस जाने के लिए तैयारी कर रहे थे तब उन्हें जाते देख कर वैभव इमोशनल हो कर रोने लगा. जवान बेटे को इस तरह देख कर पिता ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है बेटा, तुम परेशान क्यों हो?’’

‘‘पापा मैं कुछ बताना चाहता हूं.’’ वैभव अपनी हथेलियों से आंसू पोंछते हुए बोला.

‘‘बोलो, क्या बात है?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘पापा बात यह है कि मुझे लड़कियां पसंद नही हैं. मैं शादी नहीं करना चाहता.’’ वैभव ने बताया.

‘‘कोई बात नहीं बेटा, बहुत से लोग हैं जो शादी नहीं करते. लेकिन इस में परेशान होने वाली क्या बात है. मन जब नहीं कर रहा तो मत करना शादी.’’ मां ने कहा.

‘‘बात इतनी सी नहीं है मां, दरअसल मैं गे हूं और मुझे लड़के अच्छे लगते हैं. मैं उन की तरफ ही आकर्षित होता हूं.’’ वैभव के मुंह से इतना सुन कर जैसे दोनों के होश उड़ गए. मां वो बुत ही बन गई.

पिता कुछ देर बाद आए. वह बोले, ‘‘बेटा चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा. हम तुम्हें किसी अच्छे डाक्टर को दिखाएंगे.’’

वैभव के मातापिता की चिंता भी जायज थी, क्योंकि वह उन का होनहार बेटा था. वे उस की शादी के तमाम सपने मन में संजोय हुए थे. बेटे को समझाने के मकसद से उस दिन वे लोग होटल से नहीं गए. रात भर वह वैभव को समझाते रहे लेकिन वैभव ने भी उन से इस तरह बात की जैसे कि उसे किसी डाक्टर की जरूरत नहीं है. उस ने उन्हें अपने मन की बातें सहज रूप से बता दीं. वह रात भर नहीं सोए और इसी टौपिक पर बातें करते रहे.

बातचीत के बाद पिता ने वैभव से कहा, ‘‘बतौर पैरेंट्स हम फेल हो गए बेटा.’’

‘‘मैं गे हूं इसलिए.’’ वैभव ने पूछा.

‘‘नहीं, क्योंकि तुम्हें सच बताने में इतने साल लग गए और तुम सब कुछ अकेले ही झेलते रहे.’’ कह कर पिता ने वैभव को सीने से लगाते हुए कहा, ‘‘बेटा, समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है. यह कुछ ऐसा है जिस पर किसी का जोर नहीं है और न ही इसे बदला जा सकता है. इसलिए तुम्हारी खुशी में मैं तुम्हारे साथ हूं्.’’

पिता की बातों और प्यार से वैभव के सिर से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया था. इस के बाद वह एक बच्चे की तरह चैन की नींद सोया. अगले दिन वैभव ने यह जानकारी पराग को दी तो वह भी बहुत खुश हुआ. इस के बाद दोनों ने मुलाकात करने का कार्यक्रम बनाया.

पराग की योजना

सितंबर, 2016 में पराग का 40वां बर्थडे था. बर्थडे पर दोनों ने न्यू मेक्सिको का एक ट्रिप प्लान किया. लेकिन इस ट्रिप पर पराग ने पहले से ही एक सरप्राइज प्लान कर रखा था, उस की जानकारी वैभव को नहीं थी. वह प्लान था वैभव को प्रपोज करने का.

निश्चित तारीख पर वैभव पराग के साथ न्यू मेक्सिको की ट्रिप पर चला गया. उसी दौरान पराग ने फेसबुक लाइव के साथ वैभव के सामने इंगेजमेंट का प्रपोजल रखा. वैभव ने उस का प्रपोजल स्वीकार कर लिया. फिर क्या था उसी समय दोनों ने एकदूसरे को इंगेजमैंट रिंग पहनाई और जीवन भर साथ रहने का कमिटमेंट किया. फेसबुक लाइव के माध्यम से दुनिया के हजारों लोग इस के गवाह बने.

इंगेजमेंट हो जाने के बाद दोनों का मिलने मिलाने का कार्यक्रम चलता रहा. दोनों के घर वालों को उन की शादी पर कोई ऐतराज नहीं था. इसलिए उन्होंने उन से कह दिया कि वे अपनी लाइफ उसी तरह से जिएं जिस में उन्हें खुशी मिलती हो.

पराग और वैभव जिम्मेदार पदों पर नौकरी करते थे और अपनी नौकरी पर पूरा ध्यान दे रहे थे. वैभव ने बताया कि सेक्शन 377 पर भारतीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस जैसे लोगों के लिए ऐतिहासिक था. न्यूयार्क में उस रात वह 2 बजे तक जागा था. जैसे ही फैसला आया. उस की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. उसे लगा कि उस के देश ने भी उसे स्वीकार कर लिया है. इस के करीब ढाई साल बाद दोनों ने शादी करने का फैसला लिया.

इस के लिए 30 मार्च, 2019 शादी की तारीख निश्चित कर दी गई. दोनों के घर वाले, दोस्त, रिश्तेदार आदि इस अनोखी शादी में शामिल होने के लिए अमेरिका के किलीन शहर पहुंच गए थे. उन्होंने शादी की सभी तैयारियां कर ली थीं. 29-30 मार्च को 3 मुख्य इवेंट्स रखे गए. पहला संगीत और गरबा का था. मेंहदी के लिए आर्टिस्ट भी बुलवा लिए थे, और बौलीवुड थीम में फोटोशूट का भी इंतजाम कर रखा था.

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हो गई शादी

संगीत कार्यक्रम में परिवार के लोगों और दोस्तों ने डांस परफोमैंस भी दिए जो उन्होंने पहले से ही तैयार कर रखे थे. पराग को सरप्राइज देने के लिए वैभव ने भी बेहतरीन डांस फरफोर्मेंस दिया. अंत में जब ग्रुप परफार्मेंस हुआ तो दोनों के पेरेंट्स भी डांस करने के लिए आ गए. फिर 30 मार्च, 2019 को दोनों की शादी भी पारंपरिक तरीके से हो गई.

इस शादी में पराग और वैभव दूल्हे के रूप में सज कर अलगअलग घोड़े वाले रथ पर सवार हो कर कार्यक्रम स्थल पर विपरीत दिशा से एक साथ पहुंचे.

दूल्हे 2 थे तो बारात भी 2 थीं. कार्यक्रम स्थल पर दोनों की मांओं ने रीतिरिवाज के साथ अपने बेटे और दामाद का तिलक कर आरती उतारी और उन का स्वागत किया. वैसे तो यह शादी पूरे रीतिरिवाज से हुई थी पर इस में इतना फर्क था कि आम शादियां जेंडर स्पेसिफिक होती हैं. लेकिन यहां कुछ रस्में बदल कर जेंडर न्यूट्रल कर दीं. जयमाला भी हुई.

दोनों ने अग्नि के 2-2 फेरे लिए, पहला फेरा प्यार का और दूसरा धर्म का. दुलहन नहीं तो यहां पर पारंपरिक कन्यादान को वरदान में बदल लिया गया. बाद में रिसेप्शन हुआ. उस मौके पर वैभव और पराग ने अपनी पसंद के बौलीवुड गानों पर डांस किया. कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों ने दोनों को आशीर्वाद दिया.

पराग और वैभव का कहना है कि मंडप तक पहुंचने में बड़ी रुकावटों का सामना किया था, खुशकिस्मती से वह उन सब से जीत गए. लेकिन लाखों लेस्बियन, गे, बाई सैक्सुअल और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए दुनियाभर में अभी भी रुकावटें बाकी हैं. इस संसार में हर कोई प्यार का हकदार है तो इन सब के साथ इतनी नाइंसाफी क्यों?

लड़की से लड़का क्यों बनी स्वाति?

यह कहानी स्वाति से शिवाय बने (Swati to Shivaay) 35 साल के एक सौफ्टवेयर इंजीनियर की है, जिन्होंने 3 साल की लंबी मशक्कत के बाद अपना जेंडर फीमेल (Gender Change) से बदल कर मेल करवा लिया.

स्वाति का फ्रस्ट्रेशन तब और बढ़ गया, जब आठवीं क्लास में आते ही उसे पीरियड शुरू हो गए. वह अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगी. उसे अपने शरीर से ही नफरत होने लगी थी. हायर सेकेंडरी पास होते ही, घर वालों ने उस की शादी के लिए लड़का भी देखना शुरू कर दिया.

एकदो रिश्ते आए भी, मगर उस की हेयर स्टाइल और कपड़े देख कर वे हैरान रह जाते.  एक दिन उस की मम्मी उर्मिला ने उसे पास बिठाया और उस के सिर पर हाथ रखते हुएकहा, ”देख स्वाति, अब तो तू बड़ी हो रही है. अपने बाल बढ़ा ले और लड़के वाले कपड़े पहनना छोड़ दे.’’

मगर स्वाति इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. उस ने मम्मी से दोटूक कह दिया, ”देखो मम्मी, मुझे बारबार टोका मत करो, मैं तो लड़के के रूप में ही अच्छी हूं.’’

घर में सब से लाडली होने के कारण कोई भी उस से कुछ भी कहने के बजाय खामोश हो जाता. मगर आसपास रहने वाले लोग स्वाति के घर वालों को ताना देने लगे थे, इस से स्वाति का मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा था.

बचपन से ही स्वाति शरीर से भले ही लड़की थी, मगर उसे अपना वह शरीर कतई पसंद नहीं था. उस के बाल, कपड़े इस तरह के थे कि कोई अनजान व्यक्ति उसे लड़का ही समझता था. लड़कियों के स्कूल में पढऩे जाने पर जब उसे यूनिफार्म में सलवार कमीज पहनने को मजबूर किया जाता तो वह स्कूल से बंक मारने लगी.

स्वाति ने बताया कि उस की आत्मा यही कहती थी कि ‘मैं वह नहीं हूं, जो दिखाई देती हूं. मेरा दिमाग और शरीर एकदूसरे से मेल नहीं खाते थे. कभीकभी मुझे अपने ही शरीर से चिढ़ सी होने लगी थी.’

आखिरकार एक दिन खुद को मजबूत करते हुए स्वाति ने घर वालों से बात की. उस ने मम्मीपापा से साफ कह दिया, ”तुम मुझे भले ही लड़की समझते हो, मगर मुझे फीलिंग लड़कों वाली आती है. मैं तो अपना जेंडर चेंज करा कर लड़का बनना चाहता हूं.’’

इतना सुन कर घर वालों की स्थिति और खराब हो गई. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस लड़की के साथ क्या किया जाए. स्वाति के रंगढंग देख उस के पापा पवन ने पत्नी उर्मिला से कहा, ”देखो, ये लड़की समाज में हमारी बदनामी करने पर तुली हुई है.’’

उर्मिला यह कह कर अपने पति को समझा देती कि ‘स्वाति अभी नादान है. उम्र के साथ सब कुछ समझ जाएगी.’

ताप्ती नदी के किनारे बसे मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के बैतूल (Baitul) में संजय कालोनी में रहने वाले पवन सूर्यवंशी और पत्नी उर्मिला सूर्यवंशी की 4 बेटियों और एक बेटे में स्वाति सब से छोटी थी.

बैतूल (Baitul) के सिविल लाइंस इलाके की संजय कालोनी में रहने वाले पवन सूर्यवंशी मसाले और सब्जी का बिजनैस करते थे. एक सड़क हादसे में अपना एक पैर खोने के बाद घर की जिम्मेदारी पत्नी उर्मिला पर आ गई. उर्मिला ने अपने बेटे बेटियों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी. आज उन की 2 बड़ी बेटियां श्रद्धा और संगीता हौस्पिटल में एकाउंटेंट हैं, जबकि छोटी बेटी बबीता एक नर्स है. बड़ा बेटा कृष्णा सरकारी स्कूल में टीचर है.

स्वाति स्कूल में भी पहनती थी लड़कों के कपड़े

स्वाति का जन्म 6 मार्च, 1988 को हुआ था. उस की स्कूली शिक्षा बैतूल के गवर्नमेंट स्कूल में हुई थी. पहले तो सब कुछ ठीक था, लेकिन जैसेजैसे उम्र बढ़ती गई, स्वाति को अपने शरीर को ले कर अजीब सी फीलिंग आने लगी. 8वीं पास होतेहोते एक दिन लगा कि उसे शरीर लड़की का जरूर दे दिया है, लेकिन वह लड़की नहीं है. क्योंकि उसे भगवान ने मुझे गलत बौडी दे दी. हर काम लड़कों वाले करना पसंद थे.

मसलन लड़कों जैसे रहना, कपड़े पहनना अच्छा लगता था. गेम भी लड़कों वाले ही खेलती थी. यहां तक कि यदि उसे कोई लड़कियों की तरह संबोधन से बुलाता तो उसे बहुत बुरा लगता था. पवन सूर्यवंशी का पूरा परिवार धार्मिक विचारों वाला था. इस वजह से घर के सभी लोगों ने उसे शिवाय कहना शुरू कर दिया. उस के बाद तो सभी उसे शिवाय के नाम से ही पुकारने लगे.

घर वालों ने जब स्वाति का एडमिशन 9वीं क्लास में गल्र्स स्कूल में करा दिया तो वहां ड्रेस के रूप में सलवारकमीज चलती थी. उसे यह पहनना पसंद नहीं था. यही वजह थी कि वह स्कूल जाना पसंद नहीं करती थी. जिस दिन ड्रेस चेंज होती थी, सिर्फ उसी दिन स्कूल जाती थी. इसी जद्दोजहद में दिन बीतते गए और स्वाति 12वीं में पहुंच गई.

रहनसहन, कपड़े और लड़कों के साथ खेलने की वजह से घर वालों का दबाव बढऩे लगा था जोकि स्वाति को कतई पसंद नहीं था. अब स्वाति में लड़कियों के शरीर में होने वाले शारीरिक परिवर्तन भी होने लगे थे.

पीरियड की शुरुआत और अपनी छाती पर आए उभार देख कर उसे अच्छा नहीं लगता था. इस कारण उस का फ्रस्ट्रेशन और बढऩे लगा था. उसे अपने शरीर से चिढ़ होने लगी थी. स्वाति को यह सब रास नहीं आ रहा था और वह इस से डिप्रेशन में जाने लगी थी.

स्वाति का रुझान बचपन से ही बास्केट बाल खेल के प्रति रहा था. ऐसे में स्कूल में पढ़ते समय जब स्वाति लड़कियों के साथ बास्केट बाल खेलती तो उसे अजीब सा लगता था. तब उन के कोच रविंद्र गोटे स्वाति को लड़कों के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित करते थे.

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बास्केट बाल गेम लड़कियों के ज्यादा खेलने की वजह से स्वाति उर्फ शिवाय बाद में फुटबाल खेलने लगी. बड़ी होने पर स्वाति को पुलिस में रहे कोच संजय ठाकुर ने काफी प्रोत्साहित किया. संजय ठाकुर उसे लड़कों जैसी फिटनैस रखने और सभी खेलों में भाग लेने के लिए कहते थे.

कोच संजय ठाकुर उस के खेल से प्रभावित हो कर अकसर यही कहते थे, ”स्वाति, तुझे तो लड़का होना चाहिए था, कुदरत ने तुझे लड़की क्यों बना दिया.’’  बस यही बात उस समय स्वाति को कचोटने लगी थी.

2006 में गवर्नमेंट गल्र्स स्कूल बैतूल से हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करने के बाद स्वाति ने भोपाल के कालेज से 2010 में बीसीए पास कर लिया. बीसीए की पढ़ाई के दौरान उसे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. उस समय स्वाति से यह सब सहन नहीं हो रहा था, इसलिए उस ने फैसला किया कि वह अपना जेंडर जरूर चेंज कराएगी.

उस ने इस के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया का सहारा लिया. इंटरनेट पर उस ने  खूब सर्च किया और बहुत सारी जानकारी हासिल की. वह जेंडर चेंज के लिए 2010 से 2015 तक लगातार कई तरह की जानकारियां जुटाती रही.

बौडी बिल्डर आर्यन पाशा से हुई प्रभावित

स्वाति ने यूट्यूब पर आर्यन पाशा का एक वीडियो देखा था, जिसे देख कर उसे मालूम हुआ कि आर्यन पाशा का जन्म 1991 में नायला नाम की एक लड़की के रूप में हुआ था. आर्यन पाशा की मां को सब से पहले पता चला कि वह एक महिला शरीर में फंसा हुआ लड़का था.

जब वह 16 वर्ष का था तो पाशा की मां ने उसे लिंग परिवर्तन सर्जरी(Gender Change Surgery) के बारे में बताया. 2011 में जब पाशा सिर्फ 19 साल का था, तब उस ने दिल्ली एनसीआर के एक अस्पताल में सर्जरी के द्वारा अपना जेंडर चेंज कराया.

इस बदलाव के बाद उस ने 12वीं कक्षा में अपने स्कूल में टौप किया, फिर उस ने अपने सभी दस्तावेजों में खुद को ‘पुरुष’ के रूप में पहचाना और यहां तक कि अपने लिए एक नया नाम आर्यन भी लिया.

स्नातक पाठ्यक्रम के लिए दिल्ली के एक प्रमुख विश्वविद्यालय में प्रवेश से इनकार करने के बाद अंतत: उस ने मुंबई विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और कानून की पढ़ाई की. आर्यन बाद में बौडी बिल्डर बना और पुरुष वर्ग में बौडी बिल्डिंग इवेंट मसल मेनिया में प्रतिस्पर्धा करने वाला पहला भारतीय ट्रांसमैन बन गया. वह पोडियम पर दूसरे स्थान पर रहा.

इस के बाद स्वाति एक्सपर्ट डाक्टर से भी मिली और डाक्टर से बात कर यह जाना कि इस की सर्जरी की क्या प्रक्रिया है. जब सारी बातें साफ हो गईं तो उस ने उन लोगों से भी मुलाकात की, जिन्होंने अपना जेंडर चेंज करवाया था.

स्वाति ने इस के लिए आर्यन पाशा और राजवीर सिंह जैसे जेंडर चेंज करने वाले लोगों से मुलाकात की. इस के बाद अपने इरादे मजबूत कर लिए तो एक दिन सारी बातें घर वालों के सामने रख दीं और उन्हें जेंडर चेंज करवाने के लिए मनाना शुरू किया.

पहले तो घर वालों ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. उस के पीछे आर्थिक स्थिति का कमजोर होना तो था ही, समाज में नकारात्मक सोच का डर भी घर वालों को था. यही वजह रही कि घर वालों ने ऐसा करने की इजाजत नहीं दी. उस वक्त स्वाति के लिए शादी के लिए रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

3 साल का वक्त लगा जेंडर बदलने में

यह बात उस के तनाव को और बढ़ा रही थी. उस ने घर वालों को काफी मनाया समझाया और कुछ ऐसे लोगों से घर वालों की मुलाकात कराई, जो जेंडर चेंज कराने के बाद अपना पारिवारिक जीवन बेहतर ढंग से जी रहे थे.

राजवीर सिंह से मुलाकात और काफी कोशिशों के बाद मम्मीपापा के सोचने का नजरिया बदला. इस काम में स्वाति की 3 बहनों ने भी काफी सपोर्ट किया. आखिरकार लंबी मशक्कत के बाद घर वाले  जेंडर चेंज करवाने के लिए राजी हुए.

शिवाय को बाइक चलाने का भी शौक है. अब जेंडर चेंज सर्जरी करा कर स्वाति से शिवाय सूर्यवंशी बन गया है. जेंडर चेंज के बारे में जब हम ने शिवाय से बातचीत की तो खुशी और आत्मविश्वास से लबरेज नजर आया.

लंबी बातचीत में शिवाय (स्वाति) ने बताया कि एक बार यूट्यूब पर आर्यन पाशा को देखा था, आर्यन लड़की से लड़का बना और फिर बौडी बिल्डर बन गया. यह वीडियो मेरे लिए प्रेरणास्रोत रहा और इस के बाद मैं ने भी लड़का बनने की ठान ली.

जेंडर चेंज सर्जरी की शुरुआत 2020 में हुई थी. दिल्ली के एक निजी हौस्पिटल में उस ने 3 स्टेप में सर्जरी कराई है. जानेमाने सर्जन डा. नरेंद्र कौशिक ने उस की सर्जरी की थी.

पहली सर्जरी 2020 में जब शुरू हुई तो साइकोलौजिस्ट डा. राजीव ने मानसिक टेस्ट किया और डा. अरविंद कुमार ने हारमोंस थैरेपी की थी, जिस में हारमोंस चेंज होते हैं. इस थैरेपी के कुछ दिनों बाद ही वाइस चेंज होने लगी थी और चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आने लगी थीं.

वहीं दूसरी टौप सर्जरी में शिवाय के दोनों ब्रेस्ट को बौडी से रिमूव किया गया था. थर्ड सर्जरी में बौटम पार्ट की सर्जरी की गई थी. इस सर्जरी के दौरान यूट्रस निकाला गया और सब से लास्ट में पेनिस डेवलप किया गया था. हर सर्जरी के बाद 3 माह का आराम करना होता था. शिवाय ने हर सर्जरी के बाद 5 से 6 महीने का गैप लिया.

अभी कुछ महीने पहले ही शिवाय की चौथी सर्जरी हुई थी, जिस में स्किन टाइट करवाई गई है. इस के बाद आराम किया और अब नवंबर 2023 से इंदौर में रह कर फिर से अपना जौब शुरू कर दिया है. पूरी सर्जरी में लगभग 10 लाख रुपए खर्च हुए थे.

शिवाय ने बताया कि वह पहले ही सर्जरी कराना चाहता था, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से सर्जरी नहीं करा पाया.

शिवाय सूर्यवंशी ने बताया, ”सर्जरी करवा कर मैं बहुत खुश हूं. अब लगता है कि मुझे जो शरीर चाहिए था, वह मिल गया है.’’

दस्तावेजों में लिंग बदलवाना नहीं था आसान

शिवाय के परिवार में भी लोग खुश हैं.  शिवाय के बड़े भाई कृष्णा सूर्यवंशी ने बताया, ”पहले जरूर हम ने इस का विरोध किया था, लेकिन बाद में पूरे परिवार ने सहयोग किया.  अब उन्हें एक भाई और मिल गया है, जिस से उन्हें काफी मदद मिल रही है. हम पहले 5 भाईबहन थे. स्वाति सब से छोटी बहन थी. अब स्वाति के शिवाय बनने से 3 बहन और 2 भाई हो गए हैं.’’

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जेंडर चेंज करवाने के बाद सब से चुनौतीपूर्ण काम पहचान दस्तावेजों में नाम व जेंडर बदलने का था. इस के लिए स्वाति से शिवाय बन कर सब से पहले बैतूल कलेक्टर के समक्ष उपस्थित हो कर आवेदन किया.

कलेक्टर औफिस से जारी किए गए पत्र के साथ शिवाय सूर्यवंशी ने बोर्ड औफ सेकेंडरी एजुकेशन, भोपाल के साथ माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल जहां से बीसीए किया और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर जहां से एमबीए किया था, वहां आवेदन किया. आवेदन के साथ उस ने जेंडर चेंज सर्जरी के समस्त डाक्यूमेंट्स भी पेश किए.

इस आधार पर हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूल परीक्षा की मार्कशीट जो स्वाति नाम से बनी है, वहीं अब स्वाति का नाम परिवर्तित हो कर शिवाय हो गया है. जेंडर फीमेल से मेल हो गया है. इसी तरह बीसीए, एमबीए की मार्कशीट के साथ आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक और वोटर आईडी कार्ड में भी उस का नाम बदल कर अब शिवाय सूर्यवंशी हो गया है.

शिवाय के सभी दस्तावेज पहले स्वाति सूर्यवंशी नाम से थे, लेकिन सर्जरी के बाद उस के सभी दस्तावेजों में भी नाम बदल चुका है. शिवाय ने अब ऐसे लोगों को, जो जेंडर चेंज के लिए सर्जरी कराना चाहते हैं, उन्हें जागरूक करना शुरू कर दिया है. शिवाय एमपी वाला चैनल बनाया है. बहुत सारे लोग इस संबंध में पूछताछ करते हैं शिवाय ने बताया कि अधिकांश लोग लड़का से लड़की बनना पसंद करते हैं.

जेंडर चेंज करने वाले माहिर डाक्टर बताते हैं कि जिन लोगों को जेंडर डायसफोरिया होता है, वो इस प्रकार का औपरेशन कराते हैं. इस बीमारी में लड़का, लड़की की तरह और लड़की, लड़के की तरह जीना चाहती है. एक का लड़के से लड़की बनना और दूसरे का लड़की से लड़का बनना जिसे मैडिकल टर्म में ‘जेंडर डिस्फोरिया’ या बौडी वर्सेस सोल कहते हैं. यानी शरीर और आत्मा की लड़ाई.

आसान नहीं होता जेंडर चेंज कराना

कई लड़के और लड़कियों में 12 से 16 साल के बीच जेंडर डायसफोरिया के लक्षण शुरू हो जाते हैं, लेकिन समाज के डर की वजह से ये अपने मातापिता को इन बदलावों के बारे में बताने से डरते हैं.

आज भी समाज में कई ऐसे लड़केलड़कियां हैं, जो इस समस्या के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं, लेकिन इस बात को किसी से बताने से डरते हैं. लेकिन जो हिम्मत जुटा कर कदम उठाते हैं. वे जेंडर चेंज के लिए सर्जरी कराने का फैसला लेते हैं.

हालांकि जेंडर चेंज कराने वालों को समाज में एक अलग ही नजरिए से देखा जाता है और उन से लोग कई तरह के सवालजवाब भी करते हैं.

सैक्स-रिअसाइनमेंट सर्जरी या फिर जेंडर चेंज सर्जरी कराना एक चुनौतीपूर्ण काम होता है. इस का खर्च भी लाखों रुपए में है और इस सर्जरी को कराने से पहले मानसिक तौर पर भी तैयार रहना पड़ता है. यह सर्जरी हर जगह उपलब्ध भी नहीं है. कुछ मैट्रो सिटी के अस्पतालों में ही ऐसे सर्जन मौजद हैं, जो सैक्स-रिअसाइनमेंट सर्जरी को कर सकते हैं.

सैक्स चेंज कराने के इस औपरेशन के कई लेवल होते हैं. यह प्रक्रिया काफी लंबे समय तक चलती है. फीमेल से मेल बनने के लिए करीब 32 तरह की प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. मेल से फीमेल बनने में 18 चरण होते हैं.

सर्जरी को करने से पहले डाक्टर यह भी देखते हैं कि लड़का और लड़की इस के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं या नहीं. इस के लिए मनोरोग विशेषज्ञ की सहायता ली जाती है. इस के साथ ही यह भी देखा जाता है कि शरीर में कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है.

जेंडर चेंज कराने की प्रक्रिया में सब से पहले डाक्टर एक मानसिक टेस्ट करते हैं. मानसिक टेस्ट में फिट होने के बाद इलाज के लिए हारमोंस थेरेपी शुरू की जाती है. यानी जिस लड़के को लड़की वाले हारमोंस की जरूरत है, वो इंजेक्शन और दवाओं के जरिए उस के शरीर में पहुंचाए जाते हैं.

इस इंजेक्शन के करीब 3 से 4 डोज देने के बाद बौडी में हार्मोनल बदलाव होने लगते हैं. फिर इस का प्रोसीजर शुरू किया जाता है.

दूसरे चरण में पुरुष या महिला के प्राइवेट पार्ट और चेहरे की शेप को बदला जाता है. महिला से पुरुष बनने वाले में पहले ब्रेस्ट को हटाया जाता है और पुरुष का प्राइवेट पार्ट डेवलप किया जाता है.

पुरुष से महिला बनने वाले व्यक्ति में उस के शरीर से लिए गए मांस से ही महिला के अंग बना दिए जाते हैं. इस में ब्रेस्ट और प्राइवेट पार्ट शामिल होता है. ब्रेस्ट के लिए अलग से 3 से 4 घंटे की सर्जरी करनी पड़ती है. यह सर्जरी 4 से 5 महीने के गैप के बाद ही की जाती है.

जेंडर चेंड सर्जरी की पूरी प्रक्रिया में कई डाक्टर शामिल होते हैं. इस में मनोरोग विशेषज्ञ, सर्जन, गायनेकोलौजिस्ट और एक न्यूरो सर्जन भी मौजूद रहता है. डाक्टर बताते हैं कि यह सर्जरी 21 साल से अधिक उम्र के लोगों पर ही की जाती है. इस से कम उम्र में मातापिता की ओर से लिखित में सहमति लेने के बाद ही औपरेशन किया जाता है.

डाक्टर से होने वाली है शिवाय की शादी

जिस स्वाति के लिए घर वाले शादी के लिए लड़का देख रहे थे, जेंडर बदलने के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर शिवाय सूर्यवंशी अब एक डाक्टर से शादी करने जा रहा है. जेंडर चेंज करवाने के दौरान ही शिवाय की मुलाकात इंदौर की रहने वाली एक लड़की से हौस्पिटल में हुई थी, जो बीएएमएस का कोर्स कंपलीट कर चुकी है और उस का खुद का क्लीनिक भी है.

सर्जरी के दौरान शिवाय को अपनी मंगेतर से काफी सपोर्ट मिला था. दोनों के परिवार वाले भी इस रिश्ते से काफी खुश हैं. शिवाय की यह अरेंज कम लव मैरिज होगी. कुछ ही दिनों बाद शिवाय मंगेतर के साथ परिणय सूत्र में बंधने जा रहा है. शिवाय ने बाद में महर्षि महेश योगी यूनिवर्सिटी से एमएससी (आईटी) पास करने के साथ सौफ्टवेयर डेवलपमेंट का कोर्स किया  है. फिलहाल वह विदेशी कंपनियों के कुछ प्रोजैक्ट को फ्रीलांस के तौर पर कर रहा है. इस के अलावा शिवाय आलमाइटी सोल्यूशन सौफ्टवेयर कंपनी को भी अपनी सेवाएं दे रहा है.

शिवाय के पास हर दिन उन लोगों के फोन आते हैं, जो जेंडर चेंज तकनीक की जानकारी हासिल करना चाहते हैं. शिवाय ऐसे लोगों से खुशमिजाज हो कर बात करता है और लोगों की जेंडर सर्जरी संबधी जिज्ञासाओं का समाधान भी करता है.

यूट्यूब चैनल से दिया जा रहा है संदेश

एक छोटे से नगर में रह कर जेंडर चेंज कराने वाले शिवाय ने बताया कि उस के पास रोज ही ऐसे नौजवानों के फोन काल आते हैं, जो इस तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं. शिवाय ऐसे युवाओं को फोन पर ही मार्गदर्शन करता है.

अपने चैनल के माध्यम से शिवाय जेंडर चेंज सर्जरी के साथ ही दस्तावेजों में नामपता बदलने की जानकारी भी विस्तार से देता है. उस के चैनल को बड़ी संख्या में युवा फालो भी कर रहे हैं.

शिवाय ने बताया कि इस तरह की समस्याओं से परेशान युवक युवतियां घुटघुट कर जीते हैं. घर वाले उन की फीलिंग्स को नहीं समझते और निराश हो कर युवक युवतियां आत्महत्या जैसा कदम तक उठा लेते हैं.

शिवाय का कहना है कि इस तरह की समस्या का सामना करने वाले नौजवान युवकयुवतियां डरने के बजाय अपना आत्मविश्वास जगाएं और बिना संकोच किए अपने घर वालों से बातचीत कर अपना जेंडर चेंज करा सकते हैं. आजकल तो सरकार की आयुष्मान योजना का लाभ उठा कर भी जेंडर चेंज सर्जरी कराई जा सकती है.

—कथा शिवाय सूर्यवंशी से की गई लंबी बातचीत पर आधारित